JAC Class 12 History Solutions Chapter 9 शासक और इतिवृत्त : मुगल दरबार

Jharkhand Board JAC Class 12 History Solutions Chapter 9 शासक और इतिवृत्त : मुगल दरबार Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Solutions Chapter 9 शासक और इतिवृत्त : मुगल दरबार

Jharkhand Board Class 12 History शासक और इतिवृत्त : मुगल दरबार In-text Questions and Answers

पृष्ठ संख्या 226 : चर्चा कीजिए

प्रश्न 1.
पता लगाने की कोशिश कीजिए कि आप जिस राज्य में रहते हैं, क्या वह मुगल साम्राज्य का भाग था ? क्या साम्राज्य स्थापित होने के परिणामस्वरूप उस क्षेत्र में किसी तरह के परिवर्तन हुए थे ?
उत्तर:
मुगल सम्राटों ने अपने साम्राज्य को अनेक प्रान्तों में विभाजित किया था। मुगल सम्राट अकबर के समय में मुगल साम्राज्य 15 प्रान्तों में विभक्त था जिनमें पंजाब, बंगाल, गुजरात, राजस्थान, कश्मीर, खानदेश आदि सम्मिलित थे। राजस्थान भी मुगल साम्राज्य का एक भाग था। मुगल साम्राज्य स्थापित होने के कारण राजस्थान के प्रशासन पर भी काफी प्रभाव पड़ा। राजस्थान के अनेक राजपूत – नरेशों को उच्च पदवियाँ प्राप्त हुई। औरंगजेब ने जयसिंह और जसवन्तसिंह को ‘मिर्जा’ की उपाधि प्रदान की।

पृष्ठ संख्या 228 : चर्चा कीजिए

प्रश्न 2.
आज तैयार होने वाली पुस्तकें किन मायनों में मुगल इतिवृत्तों की रचना के तरीकों से भिन्न अथवा समान हैं ?
उत्तर:
(1) मुगल इतिवृत्तों की रचना का उद्देश्य निरंकुश और प्रबुद्ध मुगल सम्राटों की प्रशंसा करना तथा मुगल साम्राज्य को एक उत्कृष्ट साम्राज्य के रूप में दर्शाना है, परन्तु वर्तमान पुस्तकों के लेखकों का ऐसा उद्देश्य नहीं है।

(2) मुगल इतिवृत्तों के लेखक दरबारी इतिहासकार थे जो मुगल सम्राटों के दृष्टिकोणों को ध्यान में रखकर इतिवृत्त लिखते थे। परन्तु वर्तमान पुस्तकों के लेखक लोकतान्त्रिक विचारधारा के समर्थक हैं। ये रचनाएँ निष्पक्ष रूप से लिखी गई हैं।

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पृष्ठ संख्या 229

प्रश्न 3.
अबुल फजल चित्रकला को महत्त्वपूर्ण क्यों मानता था? वह इस कला को वैध कैसे ठहराता था ?
उत्तर:
अबुल फजल ने चित्रकारी का एक ‘जादुई कला’ के रूप में वर्णन किया है। उसकी राय में यह कला किसी भी निर्जीव वस्तु को भी इस रूप में प्रस्तुत कर सकती है कि उसमें जीवन हो। अबुल फजल के अनुसार चित्रकला न केवल किसी वस्तु के सौन्दर्य को बढ़ावा देने वाली, बल्कि वह लिखित माध्यम से राजा और राजा की भक्ति के विषय में जो बात कही न जा सकी हों, ऐसे विचारों के सम्प्रेषण का भी एक शक्तिशाली माध्यम थी। ब्यौरे की सूक्ष्मता, परिपूर्णता और प्रस्तुतीकरण की निर्भीकता, जो चित्रों में दिखाई पड़ती है, वह अतुलनीय है। यहाँ तक कि निर्जीव वस्तुएँ भी प्राणवान प्रतीत होती हैं अबुल फसल का कहना था कि कलाकार के पास खुदा को पहचानने का अद्वितीय तरीका है। चूँकि कहीं-न-कहीं उसे यह महसूस होता है कि खुदा की रचना को वह जीवन नहीं दे सकता।

पृष्ठ संख्या 229

प्रश्न 4.
इस लघुचित्र में (चित्र 9.4) चित्रित मुगल पांडुलिपि की रचना में संलग्न अलग-अलग कार्यों की पहचान कीजिए।
उत्तर:
पृष्ठ संख्या 229 के चित्र 94 को ध्यान से देखने पर व्यक्ति निम्न कार्यों में संलग्न दिखाई देते हैं –

  • पृष्ठों को व्यवस्थित करता व्यक्ति,
  • पृष्ठों को पढ़ता हुआ एक व्यक्ति,
  • एक दूसरे व्यक्ति को बोलकर लिखवाता एक व्यक्ति,
  • अपने वृत्तान्त लिखवाता एक व्यक्ति, (s) दुपट्टे से हवा करता एक व्यक्ति,
  • कार्मिकों की सेवा में खड़े कुछ व्यक्ति।

पृष्ठ संख्या 230 चर्चा कीजिए

प्रश्न 5.
चित्रकार के साहित्यिक और कलात्मक रचना प्रदर्शन की तुलना अबुल फजल की साहित्यिक और कलात्मक रचना-शक्ति से कीजिए।
उत्तर:
चित्र 94 की तुलना स्रोत 1 से करने पर निम्नलिखित विशेषताएँ दिखाई देती हैं-

  • पुस्तक लेखन में अनेक व्यक्ति कार्यरत हैं। जिनमें कुल व्यक्तियों की संख्या 8 है और 4 सेवक हैं।
  • अबुल फजल ने स्रोत-1 में निरीक्षक तथा लिपिकों की बात कही है जो चित्र 94 में स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है
  • अबुल फजल ने उस समय की चित्रकारी को अत्यधिक सजीव कहा है। यह सच भी है क्योंकि चित्र 94 सजीवता के अत्यधिक समीप है।
  • अबुल फजल ने चित्रकारों की सूक्ष्मता के लिए भी प्रशंसा की है। चित्र 94 को देखने से स्पष्ट होता है कि यहाँ दरवाजे, खम्भों तथा मेहराबों पर सुन्दर तथा अतिसूक्ष्म नक्काशी का कार्य किया है।
  • उपर्युक्त के अतिरिक्त अबुल फजल ने उस समय के चित्रकारों के कार्य को परिपूर्ण तथा प्रस्तुतीकरण में उच्चकोटि का माना है। चित्र 94 को देखने से अबुल फजल की यह बात भी पूर्ण रूप से सत्य हो जाती है।

पृष्ठ संख्या 233

प्रश्न 6.
यह चित्र पिता-पुत्र के बीच के सम्बन्ध को कैसे चित्रित करता है? आपको क्यों लगता है कि मुगल कलाकारों ने निरन्तर बादशाहों को गहरी अथवा फीकी पृष्ठभूमि के साथ चित्रित किया है? इस चित्र में प्रकाश के कौनसे स्रोत हैं?
उत्तर:

  • यह चित्र पिता-पुत्र के मध्य आत्मीय सम्बन्धों को दर्शा रहा है।
  • मुगल चित्रकारों ने बादशाहों को गहरी तथा फीकी पृष्ठभूमि में दिखाया है क्योंकि इससे बादशाहों की तस्वीरें साफ तथा स्पष्ट दिखाई देती हैं।
  • इस चित्र में अकबर तथा जहाँगीर के पीछे सूरज को प्रकाश के स्रोत के रूप में दिखाया गया है।

पृष्ठ संख्या 235 चर्चा कीजिए

प्रश्न 7.
मुगल साम्राज्य में न्याय को राजतन्त्र का इतना महत्त्वपूर्ण सद्गुण क्यों माना जाता था?
उत्तर:
मुगल साम्राज्य में न्याय को राजतन्त्र का सर्वोत्तम सद्गुण माना जाता था अबुल फजल ने लिखा है कि बादशाह अपनी प्रजा के चार सत्वों की रक्षा करता है –

  • जीवन (जन)
  • धन (माल)
  • सम्मान (नामस)
  • विश्वास (दीन)।

इसके बदले में वह आज्ञापालन तथा संसाधनों में हिस्से की माँग करता है। केवल न्यायपूर्ण सम्प्रभु ही शक्ति और देवी मार्गदर्शन के साथ इस अनुबन्ध का सम्मान कर पाते थे। इसी कारण न्याय के विचार के दृश्य रूप में निरूपण के लिए अनेक प्रतीकों की रचना की गई। कलाकारों द्वारा प्रयुक्त सर्वाधिक लोकप्रिय प्रतीकों में से एक था -एक-दूसरे के साथ चिपटकर। शान्तिपूर्वक बैठे हुए शेर और बकरी अथवा शेर और गाय इसका उद्देश्य राज्य को एक ऐसे क्षेत्र के रूप में दर्शाना था, जहाँ दुर्बल तथा सबल सभी परस्पर सद्भाव से रह सकते 7 थे। गद्दी पर बैठने के बाद जहाँगीर ने जो पहला आदेश दिया वह न्याय की जंजीर को लगाने का था। कोई भी उत्पीड़ित व्यक्ति इस जंजीर को हिलाकर बादशाह के सामने अपनी फरियाद प्रस्तुत कर सकता था।

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पृष्ठ संख्या 235

प्रश्न 8.
इस चित्र (चित्र 9.7) के प्रतीकों की पहचान कर उनकी व्याख्या कीजिए और इस चित्र का सार प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

  • यह चित्र जहाँगीर के प्रिय चित्रकार अबुल हसन ने बनाया है।
  • इस चित्र में जहाँगीर को दखितारूपी मानवीय आकृति को मारते हुए दिखाया गया है।
  • यहाँ देवदूत जहाँगीर को उसका मुकुट प्रदान कर रहे हैं। चित्र में देवदूत जहाँगीर को न्याय के अधिकार के रूप में अस्त्र प्रदान कर रहा है।
  • चित्र में एक प्लेटफार्म दिखाया गया है जिस पर जहाँगीर की न्याय की जंजीर बंधी हुई है तथा इसको आकाश में एक देवदूत पकड़े हुए है।
  • जहाँगीर के शासन काल को न्यायप्रिय शासनकाल के रूप में दिखाया गया है, जहाँ शेर तथा बकरी एक साथ रह सकते हैं। यहाँ शेर का सम्बन्ध सम्पन्न तथा सबल वर्ग से है तो बकरी का सम्बन्ध दुर्बल वर्ग से है। चित्र का सार चित्र में राजा के दैवीय रूप को पूर्ण रूप से स्थापित किया गया है तथा उसकी न्याय व्यवस्था को अत्यधिक न्यायसंगत तथा देवताओं को प्रिय के रूप में दर्शाया गया है।

पृष्ठ संख्या 237

प्रश्न 9.
मुगल सम्राट अकबर के दरबार में होने वाली गतिविधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • दरबार लगाते समय एक विशाल ढोल पीटा जाता था और साथ-साथ अल्लाह का गुणगान भी किया जाता था।
  • बादशाह के पुत्र, पौत्र, दरबारी तथा सभी लोग दरबार में उपस्थित होते थे जिन्हें दरबार में प्रवेश की अनुमति थी।
  • वे बादशाह का अभिवादन करके अपने स्थान पर खड़े हो जाते थे।
  • प्रसिद्ध विद्वान तथा विशिष्ट कलाओं में निपुण लोग बादशाह के प्रति आदर व्यक्त करते थे।
  • न्याय अधिकारी अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते थे।
  • सम्राट अपनी सूझ-बूझ के अनुसार आदेश देते थे तथा मामलों को सन्तोषजनक ढंग से निपटाते थे।

पृष्ठ संख्या 240

प्रश्न 10.
चित्र 9.11 (क), 9.11 ( ख ), 9.11 (ग) में आप जो देख रहे हैं उसका वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चित्र 9.11 (क) में दाराशिकोह का विवाह दिखाया गया है। चित्र 9.11 (क) में अभिजात दाराशिकोह के विवाह के अवसर पर विभिन्न उपहार अपने साथ ला रहे हैं। चित्र 9.11 (ख) में शाहजहां की उपस्थिति में मौलवी तथा काजी विवाह सम्पन्न करा रहे हैं। चित्र 9.11 (ग) में विवाह के अवसर पर महिलाएँ अपना नृत्य प्रस्तुत कर रही हैं। इसी चित्र में विभिन्न गायक तथा संगीतकार अपना कौशल दिखा रहे हैं।

पृष्ठ संख्या 241 : चर्चा कीजिए

प्रश्न 11.
क्या मुगलों से जुड़े कुछ रिवाजों और | व्यवहारों का अनुपालन आज के राजनेता करते हैं?
उत्तर:
(1) आज के राजनेता भी मुगलों की भाँति अपने पुत्र-पुत्रियों का विवाह बड़ी धूम-धाम से करते हैं और इन अवसरों पर विपुल धन खर्च करते हैं।
(2) आज के राजनेता भी अपने निवास स्थानों पर होली, दीवाली ईद आदि अनेक त्यौहार धूम-धाम से मनाते हैं। इन अवसरों पर विभिन्न समुदायों और सम्प्रदायों के लोग वहाँ एकत्रित होते हैं और एक-दूसरे को बधाई देते हैं।
(3) योग्य व्यक्तियों को आज भी अनेक पुरस्कार, पदवियाँ आदि दी जाती हैं योग्य व्यक्तियों को भारतरत्न, पद्म विभूषण, पद्मश्री आदि अनेक पदवियाँ दी जाती हैं। खिलाड़ियों को अर्जुन पुरस्कार, खेल रत्न पुरस्कार आदि अनेक प्रकार के पुरस्कार दिए जाते हैं। सैनिकों को विशिष्ट सैनिक सेवाओं के कारण अशोक चक्र, महावीर चक्र आदि अनेक पुरस्कार दिए जाते हैं।

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पृष्ठ संख्या 245

प्रश्न 12.
फादर मान्सेरेट की टिप्पणी मुगल बादशाह अकबर व उनके अधिकारियों के बीच सम्बन्ध के बारे में क्या संकेत देती है?
उत्तर:
फादर मान्सेरेट की टिप्पणी मुगल बादशाह अकबर व उनके अधिकारियों के बीच सम्बन्ध के बारे में यह संकेत देती है कि अकबर निरकुंशतापूर्वक शासन करता था। वह लिखता है कि सत्ता के निर्भीकतापूर्ण उपयोग से उच्च अभिजातों को नियन्त्रित करने के लिए सम्राट उन्हें अपने दरबार मैं बुलाता था और उन्हें निरंकुश आदेश देता था जैसे कि वे उसके दास हों। इन आदेशों का पालन उन अभिजातों के उच्च पदों और हैसियत से मेल नहीं खाता था। वास्तव में फादर मान्सेरेट का दृष्टिकोण जातीय अभिमान का प्रतीक है। अन्य साक्ष्यों से प्रतीत होता है कि अकबर अभिजात वर्ग के लोगों के साथ उदारतापूर्ण तथा सम्मानपूर्ण व्यवहार करता था । अभिजात वर्ग के लोग भी बादशाह के प्रति स्वामिभक्ति रखते थे तथा उसके आदेशों का सहर्ष पालन करते थे।

पृष्ठ संख्या 250

प्रश्न 13.
वे कौनसे मुद्दे और सरोकार थे जिन्होंने मुगल शासकों के उनके समसामयिकों के साथ सम्बन्धों को निर्धारित किया ?
उत्तर:
(1) मुगल सम्राट सामरिक महत्त्व के प्रदेशों विशेष कर काबुल और कन्धार पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहते थे। दूसरी ओर ईरान के शासक भी कन्धार पर अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहते थे। अन्त में 1622 ई. में ईरानी सेना ने कन्धार पर आक्रमण किया और मुगल सेना को पराजित कर कन्धार पर अधिकार कर लिया।
(2) मुगल सम्राट आटोमन नियन्त्रण वाले क्षेत्रों में व्यापारियों व तीर्थयात्रियों के स्वतन्त्र आवागमन को बनाये रखना चाहते थे।
(3) इसी प्रकार जेसुइट धर्म प्रचारकों का सम्मान करता था। सार्वजनिक सभाओं में जेसुइट लोगों की अकबर के सिंहासन के निकट स्थान दिया जाता था। इन्हीं जेसुइट धर्म प्रचारकों, यात्रियों आदि के विवरणों से यूरोप को भारत के बारे में जानकारी प्राप्त हुई

Jharkhand Board Class 12 History शासक और इतिवृत्त : मुगल दरबार  Text Book Questions and Answers

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 100-150 शब्दों में दीजिए-

प्रश्न 1.
मुगल दरबार में पांडुलिपि तैयार करने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए। थीं?
अथवा
मुगल दरबार में पाण्डुलिपियाँ कैसे तैयार की जाती
अथवा
मुगलों के शासनकाल में पाण्डुलिपियों की रचना से जुड़े विविध कार्यों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
मुगल दरबार में बांडुलिपि तैयार करने की प्रक्रिया मुगल काल में पांडुलिपि रचना का मुख्य केन्द्र शाही किताबखाना था। किताबखाना एक लिपिपर था, जहाँ बादशाह की पांडुलिपियों का संग्रह रखा जाता था तथा नई पांडुलिपियों की रचना की जाती थी पांडुलिपि की रचना में विविध प्रकार के कार्य करने वाले लोग शामिल होते –

  • पांडुलिपि के पन्ने तैयार करने के लिए कागज बनाने वाले
  • पाठ की नकल तैयार करने हेतु सुलेखक
  • पृष्ठों को चमकाने के लिए कोफ्तगर
  • पाठ से दृश्यों को चित्रित करने के लिए चित्रकार
  • पन्नों को इकट्ठा करके उसे अलंकृत आवरण में बाँधने के लिए जिल्दसाज तैयार पांडुलिपि को एक बहुमूल्य वस्तु तथा बौद्धिक सम्पदा तथा सौन्दर्यपूर्ण कार्य के रूप में देखा जाता था। इस प्रकार के सौन्दर्य को उजागर करके इन पांडुलिपियों के संरक्षक मुगल सम्राट अपनी शक्ति को दर्शाते थे। मुगल सम्राट पाण्डुलिपि तैयार करने वालों को विभिन्न पदवियों तथा पुरस्कार प्रदान करते थे।

प्रश्न 2.
मुगल दरबार से जुड़े दैनिक कर्म और विशेष उत्सवों के दिनों ने किस तरह से बादशाह की सत्ता के भाव को प्रतिपादित किया होगा?
उत्तर:
(1) राजसिंहासन मुगल शासन की सत्ता का केन्द्र बिन्दु राजसिंहासन था जिसने सम्राट के कार्यों को भौतिक स्वरूप प्रदान किया था।

(2) दरबार में अनुशासन दरबार में किसी भी दरबारी की हैसियत इस बात से निर्धारित होती थी कि वह बादशाह के कितना निकट और दूर बैठा है। किसी भी दरबारी को शासक द्वारा दिया गया स्थान सम्राट की दृष्टि से उसकी महत्ता का प्रतीक था। सिंहासन पर सम्राट के बैठने के बाद किसी भी दरबारी अतवा व्यक्ति को अपने स्थान से कहीं और जाने की अनुमति नहीं थी।

(3) अभिवादन के तरीके-बादशाह को किए गए अभिवादन के तरीके से पदानुक्रम में उस दरबारी की हैसियत का पता चलता था। अभिवादन का उच्चतम रूप ‘सिजदा या दंडवत लेटना था।

(4) राजनयिक दूतों से सम्बन्धित अभिवादन के तरीके मुगल दरबार में राजनयिक दूतों से सम्बन्धित अभिवादन के तरीके भी निर्धारित थे।

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(5) झरोखा दर्शन झरोखा दर्शन की प्रथा अकबर शुरू की थी। इसके अनुसार बादशाह अपने दिन की शुरुआत सूर्योदय के समय कुछ व्यक्तिगत धार्मिक प्रार्थनाओं से करता था।

(6) दीवान-ए-आम व दीवान-ए-खास बादशाह सरकारी कार्यों के संचालन के लिए दीवान-ए-आम में आता था। इसके बाद बादशाह दीवान-ए-खास में गोपनीय मुद्दों पर चर्चा करता था।

(7) विशिष्ट अवसर बादशाह सिंहासनारोहण की वर्षगांठ, ईद, शब-ए-बारात तथा होली आदि त्यौहार अपने दरबार में धूम-धाम से मनाता था।

प्रश्न 3.
मुगल साम्राज्य में शाही परिवार की स्त्रियों द्वारा निभाई गई भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
अथवा
मुगल राजघरानों में महिलाओं की भूमिका का मूल्यांकन कीजिये।
उत्तर:
मुगल साम्राज्य में शाही परिवार की स्त्रियों की भूमिका-
(1) वित्तीय संसाधनों पर नियन्त्रण- जहाँगीर के शासन काल में नूरजहाँ ने शासन के संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। नूरजहाँ के बाद मुगल रानियों और राजकुमारियों ने महत्त्वपूर्ण वित्तीय संसाधनों पर नियन्त्रण रखना शुरू कर दिया। शाहजहाँ की पुत्रियों, जहाँआरा और रोशनआरा को ऊँचे शाही मनसबदारों के समान वार्षिक आय होती थी इसके अतिरिक्त, जहाँआरा को सूरत के बंदरगाह नगर से राजस्व प्राप्त होता था।

(2) निर्माण कार्य मुगल परिवार की महत्त्वपूर्ण महिलाओं ने इमारतों एवं बागों का निर्माण करवाया। जहाँआरा ने शाहजहाँ की नई राजधानी शाहजहाँनाबाद (दिल्ली) की अनेक वास्तुकलात्मक परियोजनाओं में भाग लिया। शाहजहाँनाबाद के मुख्य केन्द्र चाँदनी चौक की रूपरेखा भी जहाँआरा द्वारा बनाई गई थी।

(3) साहित्यिक क्षेत्र में योगदान गुलबदन बेगम द्वारा रचित ‘हुमायूँनामा’ से हमें मुगलों की घरेलू दुनिया की एक झलक मिलती है। गुलबदन ने जो लिखा, वह मुगल बादशाहों की प्रशस्ति नहीं थी। उसने राजाओं और राजकुमारों के बीच चलने वाले संघर्षों तथा तनावों के बारे में भी लिखा। उसने कुछ संघर्षों को सुलझाने में परिवार की वयोवृद्ध स्त्रियों की महत्त्वपूर्ण भूमिकाओं के बारे में भी विस्तार से लिखा था।

प्रश्न 4.
वे कौन से मुद्दे थे, जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर क्षेत्रों के प्रति मुगल नीतियों व विचारों को आकार प्रदान किया?
उत्तर:
(1) सफ़ावी तथा कन्धार- मुगल सम्राटों तथा ईरान व तूरान के पड़ोसी देशों के बीच राजनीतिक व राजनयिक सम्बन्ध हिन्दुकुश पर्वत द्वारा निर्धारित सीमाओं के नियन्त्रण पर निर्भर करते थे। कन्धार सफ़ावियों ( ईरानियों) और मुगलों के बीच झगड़े का मुख्य कारण था कन्धार का किला नगर शुरू में हुमायूँ के अधिकार में था 1595 ई. में अकबर ने कन्धार पर पुनः अधिकार कर लिया था। 1613 में जहाँगीर ने ईरान के शासक शाह अब्बास को कहलवाया कि कन्धार को मुगल अधिकार में रहने दिया जाए, परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। 1622 में फारसी सेना ने कन्धार पर अधिकार कर लिया।

(2) ऑटोमन साम्राज्य ऑटोमन साम्राज्य के साथ अपने सम्बन्धों में मुगल बादशाह प्रायः धर्म एवं वाणिज्य के मुद्दों को जोड़ने का प्रयास करते थे। वे विभिन्न वस्तुओं की बिक्री से अर्जित आय को उस क्षेत्र के धर्मस्थलों व फकीरों में दान में बाँट दिया करते थे परन्तु जब औरंगजेब को अरब भेजे जाने वाले धन के दुरुपयोग का पता चला, तो उसने भारत में उसके बाँटे जाने पर बल दिया।

(3) मुगल दरबार में जेसुइट धर्मप्रचारक-मुगल दरबार के यूरोपीय विवरणों में जेसुइट वृतांत सबसे पुराने वृतान्त हैं। 15वीं शताब्दी के अन्त में पुर्तगाली व्यापारियों ने भारत के तटीय नगरों में व्यापारिक केन्द्रों को स्थापित किया। अकबर के निमन्त्रण पर अनेक जेसुइट पादरी दरबार में आए। इन जेसुइट लोगों ने ईसाई धर्म के विषय में अकबर से बात की और उसे काफी प्रभावित किया। अकबर इन जेसुइट पादरियों का बड़ा सम्मान करता था।

प्रश्न 5.
मुगल प्रान्तीय शासन के मुख्य अभिलक्षणों की चर्चा कीजिए। केन्द्र किस तरह से प्रान्तों पर नियन्त्रण रखता था?
उत्तर:
प्रशासन की सुविधा के लिए मुगल साम्राज्य को अनेक प्रान्तों (सूबों में बाँटा गया था। प्रान्तीय शासन … का प्रमुख गवर्नर (सूबेदार) होता था, जो सीधा बादशाह को प्रतिवेदन प्रस्तुत करता था प्रान्त के अन्य अधिकारियों में दीवान, बख्शी, काजी तथा सद्र उल्लेखनीय थे दीवान प्रान्त की आय व्यय का विवरण रखता था। बख्शी प्रान्तीय सेना का प्रमुख अधिकारी होता था। सद्र लोगों के नैतिक चरित्र का निरीक्षण करता था तथा काजी प्रान्त का प्रमुख न्यायिक अधिकारी होता था।

सरकार प्रत्येक सूबा कई सरकारों में बँटा हुआ था। प्रायः सरकार की सीमाएँ फौजदार के नीचे आने वाले क्षेत्रों की सीमाओं से मेल खाती थीं। इन प्रदेशों में फौजदारों को विशाल घुड़सवार सेना तथा लोपचियों के साथ रखा जाता था। परगना प्रत्येक सरकार को अनेक परगनों में बाँटा गया था। परगना (उप-जिला) स्तर पर स्थानीय प्रशासन की देख-रेख तीन अर्थ वंशानुगत अधिकारियों द्वारा की जाती थी ये अधिकारी थे –

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  • कानूनगो ( राजस्व आलेख रखने वाला)
  • चौधरी (राजस्व संग्रह का प्रभारी) तथा
  • काजी (न्याय करने वाला अधिकारी) थे।

लिपिकों का सहायक समूह-शासन के प्रत्येक विभाग के पास लिपिकों का एक बड़ा सहायक समूह लेखाकार, लेखा परीक्षक, सन्देशवाहक और अन्य कर्मचारी होते थे ये मानकीकृत नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार कार्य करते थे। मुगल इतिहासकारों के अनुसार ग्राम स्तर तक के सम्पूर्ण प्रशासनिक तन्त्र पर बादशाह तथा उसके दरबार का नियन्त्रण होता था।

निम्नलिखित प्रश्नों पर लघु निबन्ध लिखिए। (लगभग 250- 300 शब्दों में उत्तर)

प्रश्न 6.
उदाहरण सहित मुगल इतिहासों के विशिष्ट अभिलक्षणों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
मुगल इतिहासों के विशिष्ट अभिलक्षण-मुगल इतिहासों के विशिष्ट अभिलक्षणों का वर्णन अग्रलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है –
(1) दरबारी इतिहासकारों को इतिहास-लेखन का कार्यं सौंपना मुगल सम्राटों ने दरबारी इतिहासकारों को इतिहास-लेखन का कार्य सौंपा। इन विवरणों में बादशाहों के समय की घटनाओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया। इसके अतिरिक्त इन इतिहास-लेखकों ने बादशाहों को अपने प्रदेशों के शासन में सहायता के लिए उपमहाद्वीप के अन्य प्रदेशों से महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ भी एकत्रित कीं।

(2) कालक्रमानुसार घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करना मुगल इतिवृत्त घटनाओं का कालक्रम के अनुसार विवरण देते थे। मुगलों का इतिहास लिखने के इच्छुक विद्वानों के लिए ये इतिवृत्त अनिवार्य स्रोत हैं। ये एक ओर तो मुगल साम्राज्य की संस्थाओं के बारे में जानकारी देते थे तो दूसरी ओर उन उद्देश्यों का प्रसार करते थे, जिन्हें मुगल- सम्राट अपने क्षेत्र में लागू करना चाहते थे।

(3) मुगल साम्राज्य के महत्त्वपूर्ण स्रोत-मुगल सम्राटों द्वारा तैयार करवाए गए इतिवृत्त साम्राज्य और उसके दरबार के अध्ययन के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। ये इतिवृत्त मुगल- साम्राज्य के अन्तर्गत आने वाले सभी लोगों के सामने एक प्रबुद्ध राज्य के रूप में दर्शाने के उद्देश्य से लिखे गए थे। इतिवृत्तों के माध्यम से मुगल सम्राट यह भी सुनिश्चित कर लेना चाहते थे कि भावी पीढ़ियों के लिए उनके शासन के विवरण उपलब्ध रहें।

(4) दरबारी लेखक- मुगल इतिवृत्त मुगल दरबारियों द्वारा लिखे गए थे। अकबर, शाहजहाँ और आलमगीर के शासनकाल की घटनाओं पर आधारित इतिवृत्तों के शीर्षक ‘अंकबरनामा’, ‘शाहजहाँनामा’, ‘आलमगीरनामा’ यह संकेत देते हैं कि इनके लेखकों की दृष्टि में साम्राज्य एवं दरबार का इतिहास और बादशाह का इतिहास एक ही था।

(5) फारसी भाषा का प्रयोग मुगल दरबारी इतिहास फारसी भाषा में लिखे गए थे। ‘अकबरनामा’ जैसे मुगल इतिहास फारसी में लिखे गए थे, जबकि बाबर के संस्मरणों का ‘बाबरनामा’ के नाम से तुर्की से फारसी में अनुवाद किया गया था। मुगल बादशाहों ने ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसे संस्कृत ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद करवाया था।

(6) रंगीन चित्र एक मुगल बादशाह के शासन की घटनाओं का विवरण देने वाले इतिहासों में लिखित पाठ के साथ ही उन घटनाओं का चित्रों के माध्यम से दृश्य रूप में भी वर्णन किया जाता था।

प्रश्न 7.
इस अध्याय में दी गई दृश्य सामग्री किस सीमा तक अबुल फजल द्वारा किये गए ‘तसवीर’ के वर्णन (स्त्रोत 1) से मेल खाती है?
उत्तर:
अबुल फज्जाल द्वारा किए गए ‘तसवीर’ के वर्णन से इस अध्याय में दी गई दश्प-सामश्री का मेलइस अध्याद में दी गई दूर्य सामती मुख्य रूप से रंगीन चित्र हैं। यह दृश्य-सामग्री अयुल फणल द्वारा किए गए ‘ तास्वीर’ के बर्णन से मेल खाती है। (पाठ्य-पुस्तक के पूष्ठ संख्या 229 का अवलोकन करें)

(1) दुश्य-सामग्री का महत्च-सुगल हतिहाखें में रंगीन चिर्त्रों का समावेश किया जाता या। चित्र न केखल किसी पुस्तक के सौन्दर्य में वृद्धि करते थे, बस्कि वे लिखिए माध्यम से राजा और उसकी शक्ति के विषय में जो बातें न कही जा सकी हों, ऐसे बिचारों की अभिव्यक्ति के एक सशक्त माध्यम भी थे। इस अध्याय के चित्ञ 9.14 में चित्रकार रामदास ने फरेहपुर सीकरी में ज्ञाहजादे सलीम के जन्होत्सव का चित्र प्रस्तुज किया है जिससे मुगल दरबार में मनाए जाने वाले उस्सवों के बारे में जानकारी मिलती है। चित्र 9.10 में तुलादान समारोह में ज्ञाहजादे सहुरम को बहुमूल्य धातुओं से तोले जने का स्पष्ट और सजीव चित्रण किया गया है। चित्र 9.6 में जहांगीर द्वारा शाहजादे सुरंम को पगड़ी में लगाई जाने वाली मणी देने का दृश्य अंकित किया गया है।

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(2) चित्रकला एक ‘जादुई कला’-इतिहासकार अबुल फरलल ने चित्रकला का एक ‘जाद्दई कला’ के रूप में वर्णन किला है।

(3) मुगल सम्राटों की चित्रकला में रुचि-ये चित्र मुगल सम्राटों की चित्रकला में गहरी रुचि दर्शाते हैं। बे इस कला को अध्ययन और मनोरंजन दोनों का ही साधन मानते थे तध्धा इस कला को हरसम्भव प्रोत्साहन देते थे। मुगल पांदुधििषियों में चिर्धो के अंकन के लिए चित्रकारों। की एक बड़ी संख्या लगाई जाठी थी।

(4) उत्कृष्ट चित्रकारों का उपलब्ध होना-चित्रकारों को प्रेत्साहन दिए जने के परिणामस्वश्र्प उस समय सर्यांिक उत्कृष्ट चित्रकार मिलने लगो घे।

(5) चित्रों की विशेषताएँ-विबरण की सूक्ष्मता, परिपूर्णत या प्रस्तुतीकरण की निर्भीकल जो मुगल-दूतिहासंें के चित्रों में दिखाई पझुती है, वह अतुलनीय थी। यहाँ तक कि निर्जींब वस्तुएँ भी सजीब प्रतीत होती थीं। इस अध्याय के चिन्न संख्या 9.1 में तैमूर बाबर को राजवंशीय मुकुट सीपता दिखाया गया है।

यह चित्र चित्रकार गोवर्धन द्वारा चिशित है। इससे ज्ञात होता है कि मुगल अपने को तैमूरी कहते थे क्योंकि फित पक्ष से वे तुर्की शासक वैमूर के बंझज थे। चिं्र $9.5$ में चितकार अवुल हसन ने जाँाँगीर को दैदीध्यमान वस्ग्रों तथा आभूषणों में अपने पिता अफघर के चित्र को हाथ में लिए दिख्या है। इससे ज्ञात होता है कि 17वीं शताब्दी से मुगल चित्रकारों ने मुगल-रु प्रभामंडल के साथ चित्रित करना शुरू किया था।

JAC Class 12 History Solutions Chapter 9 शासक और इतिवृत्त : मुगल दरबार

प्रश्न 8.
मुगल अभिजात वर्ग के विशिष्ट अभिलक्षण क्या थे? बादशाह के साथ उनके सम्बन्ध किस तरह बने?
अथवा
मुगल अभिजात वर्ग की विशेषताओं का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
मुगल अभिजात वर्ग के विशिष्ट अभिलक्षण- मुगल अभिजात वर्ग के विशिष्ट अभिलक्षण निम्नलिखित थे –
(1) विभिन्न नृजातीय तथा धार्मिक समूह-मुगलकाल में अभिजात वर्ग अत्यन्त विस्तृत था। यह अभिजात वर्ग मुगल साम्राज्य का एक महत्त्वपूर्ण स्तम्भ था। अभिजात- वर्ग में भर्ती विभिन्न नृजातीय तथा धार्मिक समूहों से होती थी। मुगल साम्राज्य की स्थापना के आरम्भिक वर्षों से ही तूरानी और ईरानी अभिजात अकबर की शाही सेवा में उपस्थित थे।

(2) भारतीय मूल के अभिजात 1560 के बाद भारतीय मूल के दो शासकीय समूहों – राजपूतों व भारतीय मुसलमानों (शेखजादाओं ने शाही सेवा में प्रवेश किया। इनमें नियुक्त होने वाला प्रथम व्यक्ति एक राजपूत सरदार आम्बेर का राजा भारमल कछवाहा था। खत्री जाति के टोडरमल को वित्तमंत्री के पद पर नियुक्त किया था।

(3) ईरानी जहाँगीर के शासन में ईरानियों को उच्च पद प्राप्त हुए।

(4) मराठे औरंगजेब ने राजपूतों को उच्च पदों पर नियुक्त किया। मुगल शासन में अधिकारियों के समूह में मराठे भी पर्याप्त संख्या में थे।

(5) ‘जात’ तथा ‘सवार’ मनसबदार सभी सरकारी अधिकारियों के दर्जे और पदों में दो प्रकार के संख्या- विषयक पद होते थे-जात और सवार ‘जात’ मनसबदार के पद और वेतन का सूचक था तथा ‘सवार’ वह सूचित करता था कि उसे सेवा में कितने घुड़सवार रखने होंगे।

(6) अभिजात वर्ग की भूमिका तथा बादशाह के

साथ उनके सम्बन्ध –

  • अभिजात वर्ग के लोग सैन्य अभियानों में अपनी सेनाओं के साथ भाग लेते थे।
  • वे प्रान्तों में साम्राज्य के अधिकारियों के रूप में भी कार्य करते थे।
  • प्रत्येक सैन्य कमांडर घुड़सवारों को भर्ती करता था तथा उन्हें हथियारों से सुसज्जित करता था और प्रशिक्षण देता था।
  • निम्नतम पदों के अधिकारियों को छोड़कर बादशाह स्वयं सभी अधिकारियों के पदों, पदवियों और आधिकारिक नियुक्तियों पर अपना नियन्त्रण रखता था। अकबर ने अपने अभिजात वर्ग के कुछ लोगों को शिष्य (मुरीद) की भाँति मानते हुए उनके साथ आध्यात्मिक सम्बन्ध भी स्थापित किये।
  • अभिजात वर्ग के लोगों के लिए शाही सेवा शक्ति, धन तथा उच्चतम प्रतिष्ठा प्राप्त करने का एक साधन थी।

केन्द्र में दो अन्य महत्त्वपूर्ण मन्त्री थे –

  • दीवान- ए-आला (वित्तमन्त्री) तथा
  • सद्र उस सुदूर (मदद- ए-माश अथवा अनुदान का मन्त्री और स्थानीय न्यायाधीशों अथवा काजियों की नियुक्ति का प्रभारी) ।

(7) तैनात ए रकाब दरबार में नियुक्त तैनात-ए- रकाब’ अभिजातों का एक ऐसा सुरक्षित दल था जिसे किसी भी प्रान्त या सैन्य अभियान में प्रतिनियुक्त किया जा सकता था। वे दिन-रात बादशाह और उसके घराने की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उठाते थे।

(8) दरबार की सभी कार्यवाहियों का विवरण तैयार करना- अभिजातों और क्षेत्रीय शासकों के प्रतिनिधि (वकील) दरबार की बैठकों (पहर) की तिथि और समय के साथ ‘उच्च दरबार से समाचार’ (अखबारात ए-दरबार- ए-मुअल्ला ) शीर्षक के अन्तर्गत दरबार की सभी कार्यवाहियों का विवरण तैयार करते थे राजाओं और अभिजातों के सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन का इतिहास लिखने के लिए ये सूचनाएँ बहुत उपयोगी होती थीं।

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प्रश्न 9.
राजत्व के मुगल आदर्श का निर्माण करने वाले तत्त्वों की पहचान कीजिए।
उत्तर:
राजत्व के मुगल आदर्श का निर्माण करने वाले तत्त्व – राजत्व के मुगल आदर्श का निर्माण करने वाले तत्त्वों का वर्णन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है –
(1) राजा दैवीय प्रकाश का प्रतीक दरबारी इतिहासकारों ने अनेक साक्ष्यों का हवाला देते हुए यह बताया कि मुगल सम्राटों को सीधे ईश्वर से शक्ति प्राप्त हुई थी।

(2) अबुल फजल द्वारा मुगल राजत्व को सर्वोच्च स्थान देना अबुल फजल ने ईश्वरीय प्रकाश को ग्रहण करने वाली चीजों में मुगल राजत्व को सबसे ऊँचे स्थान पर रखा। इस विषय में वह प्रसिद्ध ईरानी सूफी शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी के विचारों से प्रभावित था जिन्होंने सर्वप्रथम इस प्रकार का विचार प्रस्तुत किया था।

(3) चित्रकारों द्वारा बादशाहों को प्रभामंडलों के साथ चित्रित करना-सत्रहवीं शताब्दी से मुगल | कलाकारों ने बादशाहों को प्रभामण्डलों के साथ चित्रित करना शुरू कर दिया। ये प्रभामंडल ईश्वर के प्रकाश के प्रतीक थे।

(4) सुलह-ए-कुल एकीकरण का एक स्रोत- मुगल इतिवृत्तों के अनुसार साम्राज्य में हिन्दुओं, जैनों, जरतुश्तियों और मुसलमानों जैसे अनेक भिन्न-भिन्न नृजातीय तथा धार्मिक समुदायों के लोग रहते थे। बादशाह शान्ति और स्थायित्व के स्रोत के रूप में इन सभी धार्मिक एवं नृजातीय समूहों से ऊपर होता था। वह इनके बीच मध्यस्थता करता था तथा यह सुनिश्चित करता था कि साम्राज्य में न्याय और शान्ति बनी रहे।

(5) सुलह-ए-कुल के आदर्श को लागू करना –
(i) तीर्थयात्रा कर तथा जजिया कर समाप्त करना- सुलह-ए-कुल का आदर्श राज्य नीतियों के द्वारा लागू किया गया। मुगलों के अधीन अभिजात वर्ग एक मिश्रित वर्ग था। उसमें ईरानी तूरानी, अफगानी, राजपूत, दक्खनी सभी शामिल थे। इन्हें दिए गए पद और पुरस्कार पूर्णरूप से राजा के प्रति उनकी सेवा और निष्ठा पर आधारित थे। इसके अतिरिक्त अकबर ने 1563 में तीर्थयात्रा कर तथा 1564 में जजिया को समाप्त कर दिया क्योंकि ये दोनों कर धार्मिक पक्षपात पर आधारित थे।
(ii) उपासना स्थलों के निर्माण व रख-रखाव के लिए अनुदान देना सभी मुगल सम्राटों ने उपासना स्थलों के निर्माण व रख-रखाव के लिए अनुदान दिए। युद्ध के दौरान जब मन्दिरों को नष्ट कर दिया जाता था तो बाद में उनकी मरम्मत के लिए अनुदान जारी किये जाते थे।
(6) सामाजिक अनुबन्ध के रूप में न्यायपूर्ण प्रभसुत्ता-अबुल फजल ने प्रभुसत्ता की एक सामाजिक अनुबन्ध के रूप में परिभाषा दी है उसने लिखा है कि बादशाह अपनी प्रजा के चार सत्यों की रक्षा करता है –

  • जीवन (जन)
  • धन (माल)
  • सम्मान (नामस) तथा
  • विश्वास (दीन) केवल न्यायपूर्ण संप्रभु ही शक्ति और दैवीय मार्गदर्शन के साथ इस अनुबन्ध का सम्मान कर पाते थे।

(7) न्याय के विचार को दृश्य रूप में निरूपण के लिए प्रतीकों की रचना न्याय के विचार के दृश्य रूप में निरूपण के लिए अनेक प्रतीकों की रचना की गई। इसका उद्देश्य राज्य को एक ऐसी संस्था के रूप में दिखाना था जहाँ दुर्बल तथा सबल सभी परस्पर सद्भाव से रह सकते थे।

शासक और इतिवृत्त : मुगल दरबार JAC Class 12 History Notes

→ इतिवृत्त इतिवृत्त घटनाओं का अनवरत कालानुक्रमिक विवरण प्रस्तुत करते हैं। ये इतिवृत्त मुगल राज्य की संस्थाओं के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी देते हैं इनका उद्देश्य उन नीतियों को स्पष्ट करना था जिन्हें मुगल शासक अपने क्षेत्र में लागू करना चाहते थे।

→ मुगल शासक और उनका साम्राज्य मुगल की उत्पत्ति ‘मंगोल’ शब्द से हुई है। मुगल राजवंश के शासकों ने स्वयं के लिए यह नाम नहीं चुना था। वे अपने को तैमूरी कहते थे क्योंकि पितृपक्ष से वे तुर्की शासक तिमूर के वंशज थे। पहला मुगल शासक बाबर मातृपक्ष से चंगेज खाँ का सम्बन्धी था बाबर मुगल साम्राज्य का संस्थापक था। 1526 में वह अपने दल की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए क्षेत्रों और संसाधनों की खोज में भारतीय उपमहाद्वीप में आगे की ओर बढ़ा। हुमायूँ ने साम्राज्य की सीमाओं में विस्तार किया, परन्तु शेरशाह सूरी ने उसे पराजित किया। 1555 में उसने सूरों को पराजित कर सिंहासन पर अधिकार कर लिया, परन्तु 1556 में उसकी मृत्यु हो गई।

→ अकबर और उसके उत्तराधिकारी- अकबर मुगल साम्राज्य का सबसे महान शासक (1556-1605) था। उसने न केवल मुगल साम्राज्य का विस्तार ही किया, बल्कि इसे अपने समय का विशालतम दृढ़तम और सब समृद्ध राज्य बना दिया। अकबर के बाद जहाँगीर ( 1605-1627), शाहजहाँ (1628-1658) और औरंग (1658-1707) के रूप में भिन्न-भिन्न व्यक्तित्वों वाले तीन बहुत योग्य उत्तराधिकारी। हुए। औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् मुगल साम्राज्य का विघटन शुरू हो गया। 1857 में इस वंश के अन्तिम शासक बहादुर शाह जफर द्वितीय को अंग्रेजों ने उखाड़ फेंका।

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→ इतिवृत्तों की रचना – मुगल सम्राटों द्वारा तैयार करवाए गए इतिवृत्त साम्राज्य और उसके दरबार के अध्ययन के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। ये इतिवृत्त एक प्रबुद्ध राज्य के दर्शन की प्रस्तुति के उद्देश्य से लिखे गए थे। इनका उद्देश्य लोगों को यह भी बताना था कि मुगल विरोधियों का असफल होना निश्चित था। मुगल इतिवृत्तों के लेखक दरबारी ही थे। उन्होंने जो इतिवृत्त लिखे उनके केन्द्रबिन्दु में शासक पर केन्द्रित घटनाएँ, शासक का परिवार, दरबार व अभिजात, युद्ध और प्रशासनिक व्यवस्थाएँ थीं। अकबर, शाहजहाँ और आलमगीर (औरंगजेब) की कहानियों पर आधारित इतिवृत्तों के शीर्षक ‘अकबरनामा’, ‘शाहजहाँनामा’, ‘आलमगीरनामा’ यह संकेत करते हैं कि इनके लेखकों की दृष्टि में साम्राज्य व दरबार का इतिहास और बादशाह का इतिहास एक ही था।

→ तुर्की से फारसी की ओर मुगल दरबारी इतिहास फारसी भाषा में लिखे गए थे। अकबर ने सोच समझकर | फारसी को दरबार की मुख्य भाषा बनाया। फारसी को दरबार की भाषा का उच्च स्थान दिया गया तथा उन लोगों को शक्ति तथा प्रतिष्ठा प्रदान की गई जिनका इस भाषा पर अच्छा नियन्त्रण था। यह सभी स्तरों के प्रशासन की भी भाषा | बन गई। स्थानीय मुहावरों को समाविष्ट करने से फारसी का भारतीयकरण हो गया था। फारसी के हिन्दवी के साथ | पारस्परिक सम्पर्क से उर्दू के रूप में एक नई भाषा का जन्म हुआ। मुगल सम्राटों ने ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ जैसे संस्कृत ग्रन्थों के फारसी में अनुवाद करवाए। ‘महाभारत’ का अनुवाद ‘रज्मनामा’ (युद्धों की पुस्तक) के रूप में हुआ।

→ पांडुलिपि की रचना – मुगल भारत की सभी पुस्तकें पांडुलिपियों के रूप में थीं अर्थात् वे हाथ से लिखी जाती थीं। पांडुलिपि रचना का मुख्य केन्द्र शाही किताबनामा था सुलेखन अर्थात् हाथ से लिखने की कला अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कौशल मानी जाती थी। नस्तलिक अकबर की पसन्द की शैली थी। यह एक ऐसी तरल शैली थी जिसे लम्बे सपाट प्रवाही ढंग से लिखा जाता था।

→ रंगीन चित्र चित्र पुस्तक के सौन्दर्य में वृद्धि करते थे तथा राजा और राजा की शक्ति के विषय में जो बात न कही जा सकी हो, उसे चित्र के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता था। इतिहासकार अबुल फराल ने चित्रकारी को एक ‘जादुई कला’ के रूप में वर्णन किया है। उसके अनुसार चित्रकला किसी निर्जीव वस्तु में भी प्राण फूँक सकती है। ईरान से मीर सैयद अली तथा अब्दुस समद जैसे प्रसिद्ध चित्रकार मुगल दरबार में लाये गये। अबुल फसल ऐसे लोगों को पसन्द नहीं करता था, जो चित्रकला से घृणा करते थे।

→ अकबरनामा’ और ‘बादशाहनामा’ – महत्त्वपूर्ण चित्रित मुगल इतिहासों में ‘अकबरनामा’ तथा ‘बादशाहनामा’ सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। ‘अकबरनामा’ का लेखक अबुल फजल तथा ‘बादशाहनामा’ का लेखक अब्दुल हमीद लाहौरी था।’ अकबरनामा’ को तीन जिल्दों में विभाजित किया गया है जिनमें से प्रथम दो इतिहास हैं। तीसरी जिल्द ‘आइन- ए-अकबरी’ है। ‘अकबरनामा’ में राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण घटनाओं का विवरण दिया गया है। इसमें अकबर के साम्राज्य के भौगोलिक, सामाजिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक सभी पक्षों का विवरण भी प्रस्तुत किया गया है। अबुल फजल की भाषा बहुत अलंकृत थी। इस भाषा में लय तथा कथन शैली को बहुत महत्त्व दिया जाता था।

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‘बादशाहनामा’ भी सरकारी इतिहास है। इसकी तीन जिल्दें हैं तथा प्रत्येक जिल्द दस चन्द्र वर्षों का विवरण देती है। लाहौरी ने शाहजहाँ के शासन (1627-47) के पहले दो दशकों पर पहली व दूसरी जिल्द लिखी। 1784 ई. सर विलियम जोन्स ने एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल की स्थापना की। इस संस्था ने कई भारतीय पांडुलिपियों के सम्पादन, प्रकाशन और अनुवाद का दायित्व अपने ऊपर लिया था।

→ आदर्श राज्य- एक दैवीय प्रकाश दरबारी इतिहासकारों के अनुसार मुगल सम्राटों को सीधे ईश्वर से | शक्ति मिली थी। ईश्वर से उद्भूत प्रकाश को ग्रहण करने वाली वस्तुओं में मुगल राजत्व को अबुल फजल ने सबसे ऊँचे स्थान पर रखा। इस विषय में वह प्रसिद्ध ईरानी सूफी शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी के विचारों से प्रभावित था। इस विचार के अनुसार एक पदानुक्रम के अन्तर्गत यह दैवीय प्रकाश राजा में सम्प्रेषित होता था जिसके बाद राजा अपनी | प्रजा के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन का स्रोत बन जाता था।

→ सुलह-ए-कुल एकीकरण का एक स्रोत अबुल फजल ने सुलह-ए-कुल (पूर्ण शान्ति) के आदर्श प्रबुद्ध शासन की आधारशिला बतलाया है। सुलह-ए-कुल में सभी धर्मों और मतों की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता ओं, परन्तु उसकी एक शर्त थी कि वे राज्य सत्ता को हानि नहीं पहुँचायेंगे अथवा आपस में नहीं लड़ेंगे। सुलह-ए- कुल के आदर्श को राज्य नीतियों के द्वारा लागू किया गया। अकबर ने 1563 में तीर्थयात्रा कर तथा 1564 में जजिया कर को समाप्त कर दिया। सभी मुगल सम्राटों ने मन्दिरों के निर्माण व रख-रखाव के लिए अनुदान दिए।

→ सामाजिक अनुबन्ध के रूप में न्यायपूर्ण प्रभुसत्ता अबुल फजल के अनुसार बादशाह अपनी प्रजा के | चार सत्त्वों की रक्षा करता था— (1) जीवन (जन), (2) धन (माल), (3) सम्मान (नामस) तथा (4) विश्वास (दीन)। इसके बदले में वह प्रजा से आज्ञापालक तथा संसाधनों में हिस्से की माँग करता था। केवल न्यायपूर्ण संप्रभु ही शक्ति और दैवीय मार्गदर्शन के साथ इस अनुबन्ध का सम्मान कर पाते थे। न्याय के विचार का प्रतिपादन करने के लिए अनेक प्रतीकों की रचना की गई। इन प्रतीकों में से एक सर्वाधिक लोकप्रिय था— एक-दूसरे के साथ चिपटकर शान्तिपूर्वक बैठे हुए शेर और बकरी या शेर और गाय ।

→ राजधानियाँ और दरबार- 1570 के दशक में अकबर ने फतेहपुर सीकरी में एक नई राजधानी बनाने का निर्णय लिया। इसका एक कारण यह हो सकता है कि सीकरी अजमेर को जाने वाली सीधी सड़क पर स्थित था, जहाँ शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह उस समय तक एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल बन चुकी थी। 1585 में अकबर ने उत्तर- पश्चिम पर पूर्ण नियन्त्रण रखने के लिए राजधानी को लाहौर स्थानान्तरित कर दिया था। शाहजहाँ के समय में 1648 में शाहजहांनाबाद को नई राजधानी बनाया गया।

→ मुगल दरबार- दरबार में सभी दरबारियों का स्थान मुगल सम्राट द्वारा ही निर्धारित किया जाता था । सिंहासन पर बादशाह के बैठने के बाद किसी को भी अपने स्थान से कहीं और जाने की अनुमति नहीं थी और न ही कोई अनुमति के बिना दरबार से बाहर जा सकता था। शिष्टाचार का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को तुरन्त ही दण्डित किया जाता था। शासक को किए गए अभिवादन के तरीके से उस व्यक्ति की हैसियत का पता चलता था। जिस व्यक्ति के सामने अधिक झुक कर अभिवादन किया जाता था, उस व्यक्ति की हैसियत अधिक ऊँची मानी जाती थी। आत्म- निवेदन का उच्चतम रूप सिजदा या दंडवत लेटना था। शाहजहाँ के समय में इन तरीकों के स्थान पर चार तसलीम तथा जमींबोसी (जमीन चूमना) के तरीके अपनाए गए।

→ झरोखा दर्शन मुगल बादशाह अपने दिन की शुरुआत सूर्योदय के समय कुछ व्यक्तिगत धार्मिक प्रार्थनाओं से करता था और इसके बाद वह एक छोटे छज्जे अर्थात् झरोखे में आता था। इसके नीचे लोगों की भीड़ बादशाह की एक झलक पाने के लिए प्रतीक्षा करती थी। अकबर द्वारा शुरू की गई झरोखा दर्शन की प्रथा का उद्देश्य जन विश्वास के रूप में शाही सत्ता की स्वीकृति को और विस्तार देना था।

→ दीवान-ए-आम तथा दीवान-ए-खास झरोखे में एक घंटा बिताने के बाद बादशाह अपनी सरकार के प्राथमिक कार्यों के संचालन के लिए सार्वजनिक सभा भवन (दीवान-ए-आम) में आता था। दो घण्टे बाद बादशाह ‘दीवान-ए-खास’ में निजी सभाएँ और गोपनीय मामलों पर चर्चा करता था।

→ दरबार को सुसज्जित करना सिंहासनारोहण की वर्षगाँठ, ईद, शब-ए-बरात तथा होली के अवसरों पर दरबार को खूब सजाया जाता था मुगल सम्राट वर्ष में तीन मुख्य त्यौहार मनाया करते थे-सूर्यवर्ष और चन्द्रवर्ष के अनुसार सम्राट का जन्मदिन तथा वसन्तगमन पर फारसी नववर्ष शाही परिवारों में विवाहों का आयोजन बहुत खर्चीला होता था।

→ पदवियाँ, उपहार और भेंट राज्याभिषेक के समय अथवा किसी शत्रु पर विजय के बाद मुगल सम्राट विशाल पदवियाँ ग्रहण करते थे। योग्य व्यक्तियों को बादशाह द्वारा पदवियाँ दी जाती थीं औरंगजेब ने जयसिंह और जसवन्त सिंह को ‘मिर्जा राजा’ की पदवी प्रदान की।

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→ शाही परिवार मुगल परिवार में बादशाह की पत्नियाँ और उपपत्नियाँ, उसके निकटस्थ और दूर के सम्बन्धी आदि होते थे। राजपूत कुलों तथा मुगलों दोनों के लिए विवाह राजनीतिक सम्बन्ध बनाने व मैत्री सम्बन्ध स्थापित करने का एक तरीका थे। मुगल परिवारों में शाही परिवारों से आने वाली स्वियों (बेगमों) और अन्य स्वियों (अगहा) में अन्तर रखा जाता था। अगहा वे स्त्रियाँ थीं जिनका जन्म कुलीन परिवार में नहीं हुआ था। दहेज (मेहर) के रूप में विपुल धन नकद और बहुमूल्य वस्तुएँ लेने के बाद विवाह करके आई बेगमों को अपने पतियों से स्वाभाविक रूप से ‘अगहाओं’ की तुलना में अधिक ऊँचा दर्जा और सम्मान मिलता था। राजतन्त्र से जुड़े महिलाओं के पदानुक्रम में उपपत्नियों (अगाचा) की स्थिति सबसे निम्न थी।

→ शाही परिवार की महिलाओं की भूमिका नूरजहाँ के बाद मुगल रानियों और राजकुमारियों ने महत्त्वपूर्ण वित्तीय स्रोतों पर नियन्त्रण रखना शुरू कर दिया। शाहजहाँ की पुत्रियों— जहाँआरा तथा रोशनआरा को उच्च शाही मनसबदारों के समान वार्षिक आय होती थी। इसके अतिरिक्त जहाँआरा को सूरत के बन्दरगाह नगर से राजस्व प्राप्त होता था जहाँआरा ने शाहजहाँ की नई राजधानी ‘शाहजहाँनाबाद’ (दिल्ली) की कई वास्तुकलात्मक परियोजनाओं में भाग लिया। गुलबदन बेगम ने ‘हुमायूँनामा’ पुस्तक लिखी। इससे हमें मुगलों की घरेलू दुनिया की झलक मिलती है। गुलबदन आबर की पुत्री हुमायूँ की बहन तथा अकबर की चाची थी। गुलबदन स्वयं तुर्की तथा फारसी में धाराप्रवाह लिख सकती थी।

→ शाही नौकरशाही मुगल साम्राज्य का एक महत्त्वपूर्ण स्तम्भ इसके अधिकारियों का दल था जिसे इतिहासकार सामूहिक रूप से अभिजात वर्ग भी कहते हैं अभिजात वर्ग में भर्ती विभिन्न नृजातीय तथा धार्मिक समूहों से होती थी। इससे यह सुनिश्चित हो जाता था कि कोई भी दल इतना बड़ा न हो कि वह राज्य की सत्ता को चुनौती दे सके। मुगलों के अधिकारी वर्ग को गुलदस्ते के रूप में वर्णित किया जाता था जो स्वामिभक्ति से बादशाह से जुड़े हुए थे। प्रारम्भ से ही तूरानी और ईरानी अभिजात अकबर की शाही सेवा में उपस्थित थे। 1560 से आगे भारतीय मूल के दो शासकीय समूहों – राजपूतों व भारतीय मुसलमानों (शेखजादाओं) ने शाही सेवा में प्रवेश किया। इसमें नियुक्त होने वाला पहला व्यक्ति आम्बेर का राजा भारमल कछवाहा था जिसकी पुत्री से अकबर का विवाह हुआ था। टोडरमल अकबर का वित्तमन्त्री था।

→ जात और सवार सभी सरकारी अधिकारियों के दर्जे तथा पदों में दो प्रकार के संख्या-विषयक पद होते थे – जात और सवार ‘जात’ शाही पदानुक्रम में अधिकारी (मनसबदार) के पद और वेतन का सूचक था तथा ‘सवार’ यह सूचित करता था कि उससे सेवा में कितने घुड़सवार रखना अपेक्षित था। सत्रहवीं शताब्दी में 1000 या उससे ऊपर जात वाले मनसबदार अभिजात (उमरा) कहे गए।

→ अभिजात सैन्य अभियानों में ये अभिजात अपनी सेनाओं के साथ भाग लेते थे तथा प्रान्तों में वे साम्राज्य के अधिकारियों के रूप में भी कार्य करते थे। प्रत्येक सैन्य कमांडर घुड़सवारों की भर्ती करता था, उन्हें हथियारों से सुसज्जित करता था और उन्हें प्रशिक्षण करता था। मनसब प्रथा की शुरुआत करने वाले अकबर ने अपने अभिजात वर्ग के कुछ लोगों को शिष्य (मुरीद) की भाँति मानते हुए उनके साथ आध्यात्मिक सम्बन्ध भी स्थापित किए।

अभिजात वर्ग के सदस्यों के लिए शाही सेवा शक्ति, धन तथा उच्चतम प्रतिष्ठा प्राप्त करने का एक साधन था। मीर बख्शी (उच्चतम वेतनदाता) मनसबदार के पद पर नियुक्ति तथा पदोन्नति के इच्छुक सभी उम्मीदवारों को प्रस्तुत करता था। उसका कार्यालय उसकी मुहर व हस्ताक्षर के साथ-साथ बादशाह की मुहर व हस्ताक्षर वाले आदेश तैयार करता था। केन्द्र में दो अन्य महत्त्वपूर्ण मंत्री थे दीवान-ए-आला (वित्तमन्त्री) तथा सद्र उस सुदूर ( मदद-ए-माश अथवा अनुदान का मन्त्री और स्थानीय न्यायाधीश अथवा काजियों की नियुक्ति का प्रभारी)।

→ तैनात-ए-रकाब – दरबार में नियुक्त (तैनात ए रकाब) अभिजातों का एक ऐसा सुरक्षित दल था, जिसे किसी भी प्रान्त या सैन्य अभियान में प्रतिनियुक्त किया जा सकता था। वे प्रतिदिन दो बार प्रातःकाल व सायंकाल को सार्वजनिक सभा भवन में बादशाह को आत्म-निवेदन करते थे। वे दिन-रात बादशाह और उसके घराने की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उठाते थे।

→ सूचना तथा साम्राज्य-मीर बख्शी दरबारी लेखकों (वाकिया नवीस) के समूह का निरीक्षण करता था। ये लेखक ही दरबार में प्रस्तुत की जाने वाली सभी अर्जियों तथा दस्तावेजों और सभी शासकीय आदेशों (फरमान) का आलेख तैयार करते थे। इसके अतिरिक्त अभिजातों तथा क्षेत्रीय शासकों के प्रतिनिधि दरबार की बैठकों की तिथि और समय के साथ ‘उच्चदरबार से समाचार’ (अखबारात ए- दरबार-ए-मुअल्ला ) शीर्षक के अन्तर्गत दरबार की सभी कार्यवाहियों का विवरण तैयार करते थे। समाचार वृत्तान्त और महत्त्वपूर्ण शासकीय दस्तावेज शाही डाक के द्वारा मुगल शासन के अधीन क्षेत्रों में एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते थे। कागज के डिब्बों में लपेट कर हरकारों ( कसीद अथवा पथमार) के दल दिन-रात दौड़ते रहते थे। काफी दूर स्थित प्रान्तीय राजधानियों से भी वृत्तान्त बादशाह को कुछ ही दिनों में मिल जाया करते थे।

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→ प्रान्तीय शासन केन्द्र के समान प्रान्तों में भी मंत्रियों के अनुरूप अधीनस्थ दीवान, बख्शी और सद्र होते थे। प्रान्तीय शासन का प्रमुख गवर्नर (सूबेदार) होता था, जो सीधा बादशाह को प्रतिवेदन प्रस्तुत करता था। प्रत्येक सूबा कई ‘सरकारों में बँटा होता था। ‘सरकार’ का प्रमुख अधिकारी फौजदार होता था जिसके पास विशाल घुड़सवार सेना और तोपची होते थे। सरकार ‘परगनों’ (उप-जिलों) में विभाजित थे। इनके प्रमुख अधिकारी कानूनगो, चौधरी और काजी होते थे। शासन के प्रत्येक विभाग के पास लिपिकों का एक बड़ा सहायक समूह, लेखाकार, लेखा परीक्षक, सन्देशवाहक और अन्य कर्मचारी होते थे जो तकनीकी रूप से दक्ष अधिकारी थे।

→ विदेशों से सम्बन्ध-सफावी और कन्धार – मुगल सम्राटों की यह नीति थी कि सामरिक महत्त्व की चौकियों विशेषकर काबुल व कन्धार पर नियन्त्रण रखा जाए। कन्धार सफावियों और मुगलों के बीच झगड़े का कारण था। 1595 में अकबर ने कन्धार पर अधिकार कर लिया। 1622 की शीत ऋतु में एक फारसी सेना ने कन्धार पर घेरा डाल दिया। फारसी सेना ने मुगल सेना को पराजित कर दिया और कन्धार के किले तथा नगर पर अधिकार कर लिया।

→ मुगल दरबार में जैसुइट धर्मप्रचारक – अकबर, ईसाई धर्म के विषय में जानने को बहुत उत्सुक था। उसने | जेसुइट पादरियों को आमन्त्रित करने के लिए एक दूतमंडल गोवा भेजा। पहला जेसुइट शिष्टमण्डल फतेहपुर सीकरी के मुगल दरबार में 1580 में पहुँचा और वहाँ लगभग दो वर्ष रहा। इन जेसुइट लोगों ने ईसाई धर्म के विषय में अकबर से बात की और इसकी विशेषताओं के विषय में उलमा से उनका वाद-विवाद हुआ। लाहौर के मुगल दरबार में दो और शिष्टमण्डल 1591 और 1595 में भेजे गए। जेसुइट विवरण व्यक्तिगत प्रेक्षणों पर आधारित हैं तथा वे मुगल बादशाह अकबर के चरित्र और सोच पर गहरा प्रकाश डालते हैं। सार्वजनिक सभाओं में जेसुइट लोगों को अकबर के सिंहासन के काफी निकट स्थान दिया जाता था। वे उसके साथ अभियानों में जाते, उसके बच्चों को शिक्षा देते तथा अवकाश के समय में वे प्रायः उसके साथ रहते थे।

→ इबादतखाना – सभी धर्मों और सम्प्रदायों के सिद्धान्तों की जानकारी प्राप्त करने के लिए 1575 ई. में अकबर ने फतेहपुर सीकरी में ‘इबादतखाने’ का निर्माण करवाया। उसने विद्वान मुसलमानों, हिन्दुओं, जैनों, पारसियों और ईसाइयों के धार्मिक सिद्धान्तों पर चर्चा की। उसके धार्मिक विचार, विभिन्न धर्मों व सम्प्रदायों के विद्वानों से प्रश्न पूछने और उनके धार्मिक सिद्धान्तों के बारे में जानकारी एकत्रित करने से परिपक्व हुए धीरे-धीरे वह धर्मों को समझने में रूढ़िवादी तरीकों से दूर प्रकाश और सूर्य पर केन्द्रित दैवीय उपासना के स्वकल्पित विभिन्न दर्शनग्राही रूप की ओर बढ़ा। अकबर और अबुल फजल ने प्रकाश के दर्शन का सृजन किया और राजा की छवि तथा राज्य की विचारधारा को आकार देने में इसका प्रयोग किया। इसमें दैवीय रूप से प्रेरित व्यक्ति का अपने लोगों पर सर्वोच्य प्रभुत्व तथा अपने शत्रुओं पर पूर्ण नियन्त्रण होता है।

→ हरम में होम अब्दुल कादिर बदायूँनी ने लिखा है कि युवावस्था के आरम्भ से ही अकबर अपनी पत्नियों अर्थात् भारत के राजाओं की पुत्रियों के सम्मान में हरम में होम का आयोजन कर रहे थे। यह एक ऐसी धर्म क्रिया थी जो अग्नि-पूजा से व्युत्पन्न हुई थी परन्तु अपने 25वें शासनवर्ष (1578) के नए वर्ष पर उसने सार्वजनिक रूप से सूर्य और अग्नि को दंडवत प्रणाम किया। शाम को चिराग और मोमबत्तियाँ जलाए जाने पर समस्त दरबार को आदरपूर्वक उठना पड़ा।

काल-रेखा
कुछ प्रमुख मुगल इतिवृत्त तथा संस्मरण

लगभग 1530 बाबर के संस्मरणों की पांडुलिपि का तिमूरियों के पारिवारिक संग्रह का हिस्सा बनना। तुर्की भाषा में लिखे गए ये संस्मरण किसी तरह एक तूफान से बचा लिए गए।
लगभग 1587 गुलबदन बेगम द्वारा ‘हुमायूँनामा ‘ के लेखन की शुरुआत।
1589 बाबर के संस्मरणों का ‘बाबरनामा’ के रूप में फारसी में अनुवाद।
1589-1602 अबुल फज़ल द्वारा ‘अकबरनामा ‘ पर कार्य करना।
1605-22 जहाँगीर द्वारा ‘जहाँगीरनामा ‘ नाम से अपना संस्मरण लिखना।
1639-47 लाहौरी द्वारा ‘बादशाहनामा ‘ के पहले दो दफ्तरों का लेखन।
लगभग 1650 मुहम्मद वारिस द्वारा शाहजहाँ के शासन के तीसरे दशक के इतिवृत्त लेखन की शुरुआत।
1668 मुहम्मद काज़िम द्वारा औरंगजेब के शासन के पहले दस वर्षों के इतिहास का ‘आलमगीरनामा’ के नाम से संकलन।

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