JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

Jharkhand Board JAC Class 10 Sanskrit Solutions अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः Questions and Answers, Notes Pdf.

JAC Board Class 10th Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

अधोलिखितं गद्यांशं पठित्वा एतदाधारित प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया यथानिर्देशं लिखत।
(निम्न गद्यांश को पढ़कर इस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत भाषा में दीजिए।)

1. सरदार भगतसिंहः क्रान्तिकारिणां यूनां नेतृत्वं स्वातन्त्र्य सङ्गरे कृतवान्। सोऽभूत् च आदर्शभूतो भारतीयः युवा-वर्गस्य। न केवलं भगतसिंहः स्वतन्त्रतासंग्रामे संलग्नः आसीत्, तस्य समग्र परिवारः स्वतन्त्रतायुद्धे प्रवृत्तः आसीत्। सरदार भगतसिंहस्य जन्म-समये तस्य जनकः सरदार किशनसिंहो योऽभूत् स्वतन्त्रता सैनिकः सः कारागारे गौराङ्गैः निपातितः। स्वतन्त्रता सैनिकोऽस्य पितृव्यः सरदार अजीत सिंहः निर्वासितश्चासीत्। 1907 ई० वर्षे सितम्बरमासे, लॉयलपुर मण्डले बङ्गाख्ये ग्रामे सरदार भगतसिंहस्य जन्म बभूव। प्राथमिकी शिक्षा चास्य ग्रामे एव अभूत्। उच्चाध्ययनायायं लाहौर नगरं गतवान्। अध्ययन समकालमेव भगतसिंहोऽपि क्रान्तिकारिणां संसर्गे समागतः देशभक्ति-भावनया सोऽध्ययनं मध्ये विहाय दिल्ली-नगरं प्रत्यागच्छत्। तत्राय ‘दैनिक अर्जुन’ इत्याख्ये समाचार पत्रे संवाददातृ रूपेण कार्यमकरोत।

(सरदार भगतसिंह ने स्वाधीनता संग्राम में क्रान्तिकारी जवानों का नेतृत्व किया था। वह भारतीय युवावर्ग का आदर्श हो गया था। न केवल भगतसिंह स्वतन्त्रता संग्राम में संलग्न था, उसका सारा परिवार स्वतन्त्रतायुद्ध में लगा हुआ था। सरदार भगतसिंह के जन्म के समय उसके पिता सरदार किशनसिंह जो स्वतन्त्रता सैनिक हो गये थे, वे अंग्रेजों ने जेल में डाल दिये। स्वतन्त्रता सेनानी इनके चाचा सरदार अजीत सिंह को निर्वासित कर दिया था।

1907 ई. वर्ष में सितम्बर माह में लायलपुर मण्डल में बड़ा नाम के गाँव में भगतसिंह का जन्म हुआ। और इनकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में ही हुई। ये उच्च अध्ययन के लिए लाहौर नगर को गये। अध्ययन के समय ही भगतसिंह भी क्रान्तिकारियों के स पर्क में आए। देशभक्ति की भावना से (प्रेरित होकर) वह अध्ययन बीच में छोड़कर दिल्ली नगर लौट आये। वहाँ पर ‘दैनिक अर्जुन’ इस नाम के समाचार-पत्र में संवाददाता के रूप में कार्य किया।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए) –
(i) सरदार भगतसिंहः स्वातन्त्र्यसङ्गरे केषां नेतृत्वं कृतवान्?
(सरदार भगतसिंह ने स्वतन्त्रता-संग्राम में किनका नेतृत्व किया?
उत्तरम् :
क्रान्तिकारिणां यूनाम् (क्रान्तिकारी जवानों का।)

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(ii) भगतसिंहस्य जनकस्य किं नाम आसीत्?
(भगतसिंह के पिता का क्या नाम था?)
उत्तरम् :
सरदार किशनसिंहः।

(iii) भगतसिंहेन कस्मिन् समाचारपत्रे संवाददातरूपेण कार्यमकरोत्?
(भगतसिंह ने किस अखबार में संवाददाता के रूप में काम किया?)
उत्तरम् :
‘दैनिक अर्जुन’ इत्याख्ये। (‘दैनिक अर्जुन’ नाम के।)

(iv) भगतसिंहस्य प्राथमिकी शिक्षा कुत्र अभूत ?
(भगतसिंह की प्रारम्भिक शिक्षा कहाँ हुई?)
उत्तरम् :
बङ्गाख्ये ग्रामे। (बंगा नाम के गाँव में।)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) सरदार भगतसिंहस्य पितृव्यस्य किं नाम आसीत्?
(सरदार भगतसिंह के चाचा का नाम क्या था?)
उत्तरम् :
सरदार भगतसिंहस्य पितृव्यस्य नाम सरदार अजीत सिंहः आसीत्।
(सरदार भगतसिंह के चाचा का नाम सरदार अजीतसिंह था।)

(ii) भगतसिंहः उच्चाध्ययनाय कुत्र गतवान्?
(भगतसिंह उच्च शिक्षा के लिए कहाँ गया?)
उत्तरम् :
भगतसिंहः उच्चाध्ययनाय लाहौर नगरं गतवान्।
(भगतसिंह उच्च शिक्षा के लिये लाहौर गया।)

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(iii) भगतसिंहः कदा क्रान्तिकारिणां संसर्गे समागतः?
(भगतसिंह कब क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आया?)
उत्तरम् :
भगतसिंहः अध्ययन समकालमेव क्रान्तिकारिणां संसर्गे समागतः।
(भगतसिंह अध्ययन के समय ही क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आया।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत। (इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
क्रान्तिवीरः सरदार भगतसिंहः।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
सरदार भगतसिंहः स्वातन्त्र्य-सैनिकोऽभवतः तस्य सम्पूर्ण परिवारः एक स्वातन्त्र्य सङ्गरे प्रवृत्तोऽभव स्वातन्त्र्य सैनिकः किशन सिंह गौराङ्गैः कारागारे निपातित पितृव्यश्च निर्वासितः बङ्गा ग्रामे जातः असौ ग्रामे एव प्राथमिकी शिक्षा प्राप्य उच्च शिक्षार्थ लाहौरम् अगच्छत्। अध्ययनकाले एव अयं क्रान्तिवीरः अभवत् दैनिक अर्जुनस्य च सम्वाददातारूपेण कार्यमकरोत्।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशं प्रश्नान्
उत्तरत :
(निर्देशानुसार प्रश्नों के उत्तर दीजिए-)
(i) ‘सोऽभूच्चादर्शभूतो……।’ वाक्ये कर्तृपदं किमस्ति?
(अ) सः
(ब) अभूत
(स) च
(द) आदर्शभूतो।
उत्तरम् :
(अ) सः

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(ii) ‘प्राथिमिकी शिक्षा’ अत्र विशेषणपदं किम् अस्ति?
(अ) प्राथमिकी
(ब) शिक्षा
(स) पूर्णा
(द) ग्रामे।
उत्तरम् :
(अ) प्राथमिकी

(iii) ‘तस्य समग्रः परिवारः स्वातन्त्र्य-युद्धे प्रवृत्तः आसीत्।’ अत्र ‘तस्य’ सर्वनाम-स्थाने संज्ञापदं लिखत।
(अ) सरदार भगतसिंहस्य
(ब) सरदार किशनसिंहस्य
(स) सरदार अजयसिंहस्य
(द) सरदार अजीत सिंहस्य।
उत्तरम् :
(अ) सरदार भगतसिंहस्य

(iv) ‘परतन्त्रता’ इत्यस्य पदस्य विलोमपदमनुच्छेदात् चित्वा लिखत –
(अ) स्वतन्त्रता
(ब) स्वाधीनता
(स) पराधीनता
(द) स्वातन्त्र्यम्।
उत्तरम् :
(अ) स्वतन्त्रता

2. संस्कृत भाषायाः वैज्ञानिकतां विचार्य एव सङ्गणक-विशेषज्ञाः कथयन्ति यत् संस्कृतम् एव सङ्गणकस्य कृते सर्वोत्तमाभाषा विद्यते। अस्याः वाङ्मयं वेदैः पुराणैः नीति शास्त्रैः चिकित्सा शास्त्रादिभिश्च समृद्धमस्ति। कालिदास सदृशानां विश्वकवीनां काव्य सौन्दर्यम् अनुपमम्। चाणक्य रचितम् अर्थशास्त्रम् जगति प्रसिद्धमस्ति। गणितशास्त्रे शून्यस्य प्रतिपादनं सर्वप्रथमं भास्कराचार्यः सिद्धान्त शिरोमणी अकरोत्। चिकित्साशास्त्रे चरक सुश्रुतयोः योगदानं विश्व प्रसिद्धम्। भारत सर्वकारस्य विभिन्नेषु विभागेषु संस्कृतस्य सूक्तयः ध्येयवाक्यरूपेण स्वीकृताः सन्ति। भारतसर्वकारस्य राजचिहने प्रयुक्तां सूक्तिं- ‘सत्यमेव जयते’ सर्वे जानन्ति। एवमेव राष्ट्रिय शैक्षिकानुसन्धान प्रशिक्षण परिषदः ध्येय वाक्यं ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ वर्तते।

(संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता पर विचार करके ही कम्प्यूटर के विशेषज्ञों ने कहा है कि संस्कृत ही कम्प्यूटर के लिए सबसे उत्तम भाषा है। इसका साहित्य वेदों, पुराणों, नीतिशास्त्रों और चिकित्सा आदि शास्त्रों से समृद्ध है। कालिदास जैसे विश्वकवियों का काव्य सौन्दर्य अतुलनीय है। चाणक्य द्वारा रचा गया अर्थशास्त्र संसार में प्रसिद्ध है। गणित शास्त्र में शून्य का प्रतिपादन सर्वप्रथम भास्कराचार्य ने सिद्धान्त शिरोमणि में किया। चिकित्सा शास्त्र में चरक और सुश्रुत का योगदान संसार में प्रसिद्ध है। भारत सरकार के विभिन्न विभागों में संस्कृत की सूक्तियाँ ध्येय वाक्य के रूप में स्वीकार की गई हैं। भारत सरकार के राजचिहन में प्रयोग की गई सूक्ति-“सत्यमेव जयते’ को सभी जानते हैं। इसी प्रकार राष्ट्रिय शैक्षिक अनुसन्धान प्रशिक्षण परिषद का ध्येयवाक्य है – “विद्ययाऽमृतमश्नुते’ (विद्या से अमृत प्राप्त होता है।) (संस्कृत में ही है।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) अर्थशास्त्र केन रचितम्? (अर्थशास्त्र की रचना किसने की?)
उत्तरम् :
चाणक्येन (चाणक्य के द्वारा)।

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(ii) शन्यस्य प्रतिपादनं सर्वप्रथम भास्कराचार्यः का अकरोत?
(शून्य का प्रतिपादन सबसे पहले भास्कराचार्य ने कहाँ किया?)
उत्तरम् :
सिद्धान्तशिरोमणौ (सिद्धान्त शिरोमणि में)।

(iii) कस्य कृते संस्कृतमेव सर्वोत्तमा भाषा विद्यते?
(किसके लिए संस्कृत ही सबसे उत्तम भाषा है?)
उत्तरम् :
सङ्गणकस्य कृते (कंप्यूटर के लिए)।

(iv) चिकित्सा शास्त्रे कयोः योगदानं विश्वप्रसिद्धम्?
(चिकित्सा शास्त्र में किनका योगदान विश्व-विख्यात है?)
उत्तरम् :
चरकसुश्रुतयोः (चरक और सुश्रुत का)।

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत –
(पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) भारत सर्वकारस्य राजचिह्न किम् अस्ति?
(भारत सरकार का राजचिह्न क्या है?)
उत्तरम् :
‘सत्यमेव जयते’ इति भारत सर्वकारस्य राज-चिह्नम्।
(‘सत्य की विजय होती है’ यह भारत सरकार का राज चिह्न है।)

(ii) ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ कस्य ध्येयवाक्यम्?
(‘विद्या से अमृत प्राप्त होता है’ यह किसका ध्येयवाक्य है?)
उत्तरम् :
‘राष्ट्रिय शैक्षिकानुसन्धान प्रशिक्षण परिषदः ध्येयवाक्यं ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ वर्तते।
(राष्ट्रिय शैक्षिक अनुसन्धान प्रशिक्षण परिषद का ध्येय वाक्य ‘विद्या से अमृत प्राप्त होता है।’)

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(ii) केषां कवीनां काव्य सौन्दर्यम् अनुपमम्?
(किन कवियों का काव्य सौन्दर्य अनुपम है?)
उत्तरम् :
कालिदास सदृशानां विश्वकवीनां काव्य सौन्दर्यमम् अनुपमम्।
(कालिदास जैसे विश्व-कवियों का काव्य- सौन्दर्य अनुपम है।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत –
(इस अनुच्छेद का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
संस्कृत भाषायाः महत्वम्/संस्कृत भाषायाः महनीयता।
(संस्कृत भाषा का महत्त्व)।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
सङ्गणकाय संस्कृतभाषा एव सरलतमा। अस्य वाङ्मयं वेदादिषु सर्व शास्त्रेषु समृद्धमस्ति। संस्कृत भाषया काव्यशास्त्र-काव्य-अर्थशास्त्र, विज्ञान, गणितादिषु सर्वेषु विषयेषु विद्वद्भिः प्रभूतं लिखितम्। कालिदास-चाणक्य भास्कर-चरके-सुश्रुतादयः संस्कृतस्यैव स्तम्भाः अभवन् । अस्याः भाषायाः ध्येयवाक्यरूपेण अनेका सूक्तयः अनेकत्र ध्येयवाक्यरूपेण स्वीकृताः सन्ति। ‘सत्यमेव जयते’ ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ इत्यादीनि वाक्यानि विश्वं विश्रुतानि सन्ति।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशं प्रश्नान् उत्तरत – (निर्देशानुसार प्रश्नों के उत्तर दीजिए-)
(i) ‘सङ्गणकविशेषज्ञाः कथयन्ति’ अत्र कर्तृपदमस्ति
(अ) सङ्गणकः
(ब) विशेषज्ञाः
(स) सङ्गणकविशेषज्ञाः
(द) कथयन्ति
उत्तरम् :
(स) सङ्गणकविशेषज्ञाः

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(ii) ‘सर्वोत्तमा भाषा विद्यते’ अत्र विशेषणपदमस्ति –
(अ) सर्व
(ब) उत्तमा
(स) विद्यते
(द) सर्वोत्तमा
उत्तरम् :
(द) सर्वोत्तमा

(iii) ‘सूक्तयः स्वीकृताः सन्ति’ इत्यत्र संज्ञापदम् अस्ति –
(अ) सूक्तयः
(ब) स्वीकृताः
(स) सन्ति
(द) कश्चिन्न
उत्तरम् :
(अ) सूक्तयः

(iv) ‘अविचार्य’ इत्यस्य विलोमपद अनुच्छेदात् चित्वा लिखत्।
(अ) विचार्य
(ब) अनुपमम्
(स) स्वीकृत
(द) अश्नुते
उत्तरम् :
(अ) विचार्य

3. विवेकानन्दस्य जन्म कालिकाता नगरे अभवत्। तस्य पिता विश्वनाथ दत्तः माता च भुवनेश्वरी देवी आस्ताम्। तस्य प्रथमं नाम नरेन्द्रः आसीत्। नरेन्द्र बाल्याद् एव क्रीडापटुः, दयालुः, विचारशीलः च आसीत्। ‘ईश्वरः अस्ति न वा इति शङ्का आसीत्। शास्त्राणाम् अध्ययनेन बहूनां साधूनां च समीपं गत्वा अपि शङ्का परिहारः न अभवत्। अन्ते च श्री रामकृष्ण परमहंसस्य सकाशात् तस्य सन्देह-परिहारः अभवत्। परमहंसस्य दिव्य प्रभावेण आकृष्टः सः तस्य शिष्यः अभवत्। सः विश्वधर्म सम्मेलने भागं ग्रहीतुम् अमेरिका देशस्य शिकागो नगरंगतवान्। तत्र विविधदेशीयान् जनानुद्दिश्य हिन्दु-धर्म-विषये भाषणं कृतवान्। सः भारतीयान् ‘उत्तिष्ठ जाग्रत, दीनदेवो भव, दरिद्र देवोभव’-इति संबोधितवान्। अमूल्याः तस्योपदेशाः।

(विवेकानन्द का जन्म कालिकाता नगर में हुआ। उनके पिता विश्वनाथ दत्त तथा माता भुवनेश्वरी देवी थे। उनका पहला (बचपन का) नाम नरेन्द्र था। नरेन्द्र बचपन से ही खेलने में चतुर, दयालु और विचारशील था। ‘ईश्वर है अथवा नहीं’ यह उसकी शंका थी। शास्त्रों के अध्ययन से और बहुत से साधुओं के पास जाकर भी शङ्का का निराक श्रीरामकृष्ण परमहंस के पास से उनके सन्देह का समाधान हुआ। परमहंस के दिव्य प्रभाव से आकर्षित हुआ वह उसका शिष्य हो गया। वह विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने अमेरिका देश के शिकागो नगर को गया। वहाँ विभिन्न देशों के लोगों को लक्ष्य करके हिन्दू धर्म के विषय में भाषण किया। उन्होंने भारतीयों से उठो, जागो, दीनों के देवता, दरिद्रों के देवता हो, ऐसा संबोधित किया। उनके उपदेश अमूल्य हैं।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) विवेकानन्दस्य जन्म कुत्र अभवत्?
(विवेकानन्द का जन्म कहाँ हुआ था?)
उत्तरम् :
कालिकातानगरे ।

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(ii) विवेकानन्दस्य प्रथमं नाम किम् आसीत्?
(विवेकानन्द का पहला नाम क्या था?)
उत्तरम् :
नरेन्द्रः ।

(iii) नरेन्द्रः कस्य प्रभावेण आकृष्टः अभवत्?
(नरेन्द्र किसके प्रभाव से आकर्षित हुआ?)
उत्तरम् :
श्रीरामकृष्ण परमहंसस्य।

(iv) विश्वधर्म सम्मेलनः कुत्र आयोजितः?
(विश्वधर्म सम्मेलन कहाँ आयोजित हुआ?)
उत्तरम् :
अमेरिकादेशस्य शिकागोनगरे।
(अमेरिका देश के शिकागो नगर में।)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-) ।
(i) नरेन्द्रः’बाल्यकाले कीदृशः आसीत्?
(नरेन्द्र बचपन में कैसा था?)
उत्तरम् :
नरेन्द्रः बाल्यकाले क्रीडापटुः, दयालुः विचारशीलः च आसीत्।
(नरेन्द्र बचपन में खेलने में चतुर, दयालु और विचारशील था।)

(ii) नरेन्द्रस्य ईश्वरविषयक शङ्कायाः परिहारः कुत्र अभवत् ?
(नरेन्द्र की ईश्वर सम्बन्धी शंका का समाधान कहाँ हुआ?)
उत्तरम् :
नरेन्द्रस्य ईश्वरविषयक शङ्काया परिहारः श्रीरामकृष्ण परमहंसस्य सकाशात् अभवत्।
(नरेन्द्र की ईश्वर सम्बन्धी शंका का निराकरण श्री रामकृष्ण परमहंस के पास से हुआ।)

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(iii) विवेकानन्दः शिकागो सम्मेलने के विषयम् आश्रित्य भाषणं कृतवान्?
(विवेकानन्द ने शिकागो सम्मेलन में किस विषय के आधार पर भाषण दिया?)
उत्तरम् :
विवेकानन्दः हिन्दुधर्म-विषयम् आश्रित्य भाषणं कृतवान्।
(विवेकानन्द ने हिन्दूधर्म के विषय का आश्रय लेकर भाषण दिया।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत। (इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
विवेकानन्दः।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
कालिकाता नगरे जातस्य भुवनेश्वरी देवी विश्वनाथयो रात्मजस्य प्रथमं नाम नरेन्द्रः आसीत्। सः बाल्याद् एव क्रीडादिषु कार्येषु पटुः विचारशीलः जिज्ञासुः च आसीत्। सः शस्त्रामध्येता ईश्वर चिन्तकः सत्यान्वेषक: चाभवत्। शंका निवारणत्वात् असौ रामकृष्ण परमहंसस्य शिष्योऽभवत्। सः विश्वधर्म सम्मेलने अमेरिका देशे भारतस्य धर्म तत्वम् प्रकाशितवान्। हिन्दूधर्मः विश्वविश्रुतः कृतः तस्योपदेश आसीत्- उत्तिष्ठ जाग्रत दरिद्रदेवोभव।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशं प्रश्नान् उत्तरत –
(निर्देशानुसार प्रश्नों के उत्तर दीजिए-)
(i) ‘ईश्वरः अस्ति नास्ति वा’ अत्र ‘अस्ति’ क्रियापदस्य कर्ता अस्ति –
(अ) ईश्वर
(ब) अस्ति
(स) नास्ति
(द) वा
उत्तरम् :
(अ) ईश्वर

(ii) ‘उपदेशाः’ इत्यस्य विशेष्य पदस्य विशेषण पदं अस्ति –
(अ) अमूल्याः
(ब) तस्य
(स) उपदेशाः
(द) विशेष्याः
उत्तरम् :
(अ) अमूल्याः

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(iii) ‘अमूल्याः तस्पोपदेशाः’ वाक्ये ‘तस्य’ सर्वनाम पद प्रयुक्तम् –
(अ) रामकृष्ण परमहंसस्य
(ब) स्वामी विवेकानन्दस्य
(स) विश्वनाथ दत्तस्य
(द) भुवनेश्वरी देव्या
उत्तरम् :
(ब) स्वामी विवेकानन्दस्य

(iv) ‘दरिद्रदेवो भव’ अत्र ‘दरिद्र’ पदस्य पर्याय पद अस्ति
(अ) दरिद्रः
(ब) निर्धन
(स) संपन्नः
(द) धनिकः
उत्तरम् :
(ब) निर्धन

4. एकदा द्रोणाचार्यः कौरवान् पाण्डवान् च पाठमेकम् अपाठयत्। ‘सत्यं वद धर्म चर।’ अग्रिमे दिने सर्वे शिष्याः पाठं कण्ठस्थी कृत्य गुरुम् अश्रावयन्। किन्तु युधिष्ठिरः तूष्णीम् एव अतिष्ठत्। आचार्येण पृष्टः सः प्रत्युवाच-‘मया पाठः न स्मृतः’ उत्तरं श्रुत्वा सर्वेऽपि सहपाठिनः अहसन्। गुरुः च रुष्टः अभवत्। पञ्चमे दिवसे युधिष्ठिरः गुरवे न्यवेदयत् यन्मया सम्पूर्णः पाठः स्मृतः। गुरु अपृच्छत्- “लघीयान आसीत् एषः पाठः। किमर्थं चिरात् स्मृतः?” सः अवदत्- “हे गुरो? वचसा तु पाठैः स्मृतः आसीत्, परं प्रमादेन हास्येन वा अनेकवारम् असत्यम् अवदम्। ह्यः प्रभृति मया असत्य वचनं न भाषितम्। अधुना दृढतया वक्तुं शक्नोमि, यत् मया भवता पठितः पाठः स्मृतः।” इदं श्रुत्वा प्रीतः दोण: अवदत्-त्वं धन्योऽसि यः पाठं व्यवहारे आनीतवान्। त्वया एव पाठस्य अर्थः ज्ञातः बोधितः च?” वस्तुतः प्रयोगं विना ज्ञानं तु भारम् एव भवति।

(एक दिन द्रोणाचार्य ने कौरव और पाण्डवों को एक पाठ पढ़ाया। ‘सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो।’ अगले दिन सभी शिष्यों ने पाठ को कण्ठस्थ कर गुरुजी को सुना दिया। किन्तु युधिष्ठिर चुप ही रहा । आचार्य के पूछे जाने पर वह
‘मैंने पाठ याद नहीं किया।’ उत्तर को सुनकर सभी सहपाठी हँस पड़े और गुरु नाराज हो गये। पाँचवें दिन युधिष्ठिर ने गुरुजी से निवेदन किया कि मैंने सम्पूर्ण पाठ याद कर लिया है। गुरु जी ने पूछा- यह पाठ तो छोटा-सा था, इतनी देर से किसलिए याद हुआ? वह बोला- गुरुजी! वाणी से तो पाठ याद हो गया था परन्तु लापरवाही अथवा हँसी-मजाक में अनेक बार झूठ बोला । कल से मैंने असत्य वचन नहीं बोला है । अब मैं दृढ़ता के साथ कह सकता हूँ कि मैंने आपके द्वारा पढ़ाया हुआ पाठ याद कर लिया। यह सुनकर प्रसन्न हुए गुरुजी बोले- “तुम धन्य हो, जिसने पाठ को व्यवहार में लाया। तुमने ही पाठ का अर्थ जाना है और समझा है ।” वास्तव में प्रयोग (व्यवहार) के बिना विद्या (ज्ञान) भार है।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) कौरवपांडवानां गुरुः कः आसीत्?
(कौरव पांडवों का गुरु कौन था?)
उत्तरम् :
द्रोणाचार्यः (द्रोणाचार्य।)

(ii) पाठः केन न स्मृतः ?
(पाठ किसने याद नहीं किया?)
उत्तरम् :
युधिष्ठिरेण (युधिष्ठिर ने।)

(ii) प्रयोगं विना ज्ञानं कीदृशम् ?
(प्रयोग के बिना ज्ञान कैसा होता है?)
उत्तरम् :
भारम् (भार)।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(iv) युधिष्ठिरेण कः पाठः न स्मृतः ?
(युधिष्ठिर ने कौन-सा पाठ याद नहीं किया?)
उत्तरम् :
सत्यं वद धर्मं चर (सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो।)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) कीदृशं ज्ञानं भारम्?
(कैसा ज्ञान भार होता है?)
उत्तरम् :
प्रयोगं विना ज्ञानं भारम् (व्यवहार के बिना ज्ञान भार है।)

(ii) प्रीतः द्रोणः युधिष्ठिरं किम् अवदत्?
(प्रसन्न द्रोण ने युधिष्ठिर से क्या कहा?)
उत्तरम् :
प्रीतः द्रोणः युधिष्ठिरम् अवदत् यत् त्वं धन्योऽसि यः पाठं व्यवहारे आनीतवान् त्वया एव पाठस्य अर्थः ज्ञान: बोधि तश्च।” (प्रसन्न द्रोण ने युधिष्ठिर से कहा-तुम धन्य हो जो पाठ को व्यवहार में लाये। तुमने ही पाठ को जाना और समझा है।)

(ii) सहपाठिन: कस्मात् अहसन्?
(सहपाठी किसलिए हँसे?)
उत्तरम् :
‘मया पाठं न स्मृतः’ इति युधिष्ठिरस्य उत्तरं श्रुत्वा सहपाठिनः अहसन्।
(‘मैंने पाठ याद नहीं किया’ युधिष्ठिर के इस उत्तर को सुनकर सहपाठी हँस पड़े।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
ज्ञानं भारं प्रयोगं विना। (प्रयोग के बिना ज्ञान भार है।)

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
द्रोणाचार्यः शिष्यान् पाठमपाठयत् ‘सत्यं वद धर्मं चर’। सर्वे पाठं कण्ठस्थी कृत्य अश्रावयन् परञ्च युधिष्ठिर ना
श्रवयत्, ‘न मया स्मृत।’ पञ्चमे दिवसे न श्रावयत् गुरौ पृष्ठे सोऽवदत्- हे गुरो! वचनातु मया स्मृतः परञ्च अनेक
वारं असत्यम् अवदम्। ह्योऽहं नासत्यमपदम् अतः इदानीं सुदृढोऽस्मि। उत्तरं श्रुत्वा क्रुद्धो गुरुः प्रसन्नोऽभवत्। – धन्योऽसि। पाठं व्यवहारम् आनीय एव स्मृतः मतः। यतः प्रयोगं विना तु ज्ञानं भारम् एव।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘अपाठयत्’ क्रियापदस्य कर्ता अनुच्छेदे अस्ति –
(अ) द्रोणाचार्यः
(ब) युधिष्ठिरः
(स) दुर्योधनः
(द) अर्जुनः
उत्तरम् :
(अ) द्रोणाचार्यः

(ii) ‘प्रीतः द्रोणः’ इत्यनयोः विशेष्य पदमस्ति –
(अ) प्रीतः
(ब) द्रोणः
(स) युधिष्ठिरः
(द) अर्जुनः
उत्तरम् :
(ब) द्रोणः

(iii) मया पाठ: न स्मृतः’ वाक्ये मया सर्वनाम पदं प्रयुक्तम्
(अ) द्रोणाचार्याय
(ब) अर्जुनाय
(स) युधिष्ठिराय
(द) भीमाय
उत्तरम् :
(स) युधिष्ठिराय

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(iv) ‘त्वं धन्योऽसि’ अत्र ‘तत्वं’ पदस्य विलोम पदमस्ति
(अ) त्वम्
(ब) धन्यः
(स) वयं
(द) अन्यत्
उत्तरम् :
(स) वयं

5. कस्मिंश्चिद् वने कोऽपि काकः निवसति स्म। वर्षायाः अभावे वने कुत्रापि जलं नासीत्। नद्यः तडागाः च जलविहीनाः आसन्। एकदाः काकः अति पिपासितः आसीत्। सः इतस्त: अपश्यत् परञ्च न कुत्रापि जलाशयः दृष्टः। सः जलस्य अन्वेषणे इतस्ततः अभ्रमत्। यावत् असौ पिपासितः काकः ग्रामे गच्छति तावत् दूरे एकं घटम् अपश्यत्। काकः घटस्य समीपम् अगच्छत्। घटस्य उपरि अतिष्ठत्। सोऽपश्यत् यत् घटे जलम् अत्यल्पम् आसीत् अतः दूरम् आसीत।

सः चञ्च्वा जलं न पातुम् अशक्नोत्। किञ्चिद दूरे प्रस्तर खण्डान् दृष्ट्वा सः उपायम् अचिन्तयत्। स एकैकम् प्रस्तर खण्ड स्व चञ्च्वा आनयत् तानि प्रस्तरखण्डानि घटे न्यक्षिपत्। यथायथा पाषाण खण्डानि जले न्यमज्जन् तथा-तथा एव जलस्तरः उपरि आगच्छत्। उपर्यागतं जलमवलोक्य काकः अति प्रसन्नः जातः। सः जलम् पीतवान् मुक्तगगने च उड्डीयत। उड्डीयमानः काकोऽचिन्तयत्- उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

(किसी जंगल में कोई कौआ रहता था। वर्षा के अभाव में वन में कहीं पानी नहीं था। नदी-तालाब जलविहीन थे। एक दिन वह कौवा बहुत प्यासा था। उसने इधर-उधर देखा परन्तु कहीं भी जलाशय दिखाई नहीं पड़ा। वह जल की खोज में इधर-उधर घूमने लगा। जैसे ही वह प्यासा कौआ गाँव को गया वैसे ही दूर पर एक घड़े को देखा। कौआ घड़े के पास गया, घड़े के ऊपर बैठा। उसने देखा कि घड़े में जल बहुत थोड़ा था, अत: दूर था। वह चोंच से पानी नहीं पी सका।

कुछ दूरी पर पत्थर के टुकड़ों (कंकड़ों) को देखकर उसने उपाय सोचा। वह एक-एक कंकड़ चोंच में लाया, उन कंकड़ों को घड़े में डाल दिया। जैसे-जैसे कंकड़ पानी में डूबे वैसे-वैसे ही जलस्तर ऊपर आ गया। ऊपर आये हुए पानी को देखकर कौआ बहुत प्रसन्न हुआ। उसने पानी पिया और मुक्त गगन में उड़ गया। उड़ते हुए कौवे ने सोचा- उद्यम (परिश्रम) से ही कार्य सिद्ध होते हैं, न कि मनोरथ से।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) नद्यः तडागाः कीदृशाः आसन्? (नदी-तालाब कैसे थे?)
(ii) कांक घटे कानि न्यक्षिपत्? (कौआ ने घड़े में क्या डाले?)
(iii) घटे कियत् जलम् आसीत? (घड़े में कितना पानी था?)
(iv) कार्याणि केन सिद्ध्यन्ति? (कार्य किससे सिद्ध होते हैं?)
उत्तरम् :
(i) जलविहीनाः
(ii) प्रस्तरखण्डानि
(iii) अत्यल्पम्
(iv) उद्यमेन।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) उड्डीयमानः काकः किम् अचिन्तयत्? (उड़ते हुए कौए ने क्या सोचा?)
(ii) उपर्यागतं जलमवलोक्य काकः कीदृशः अभवत्? (ऊपर आये पानी को देखकर कौआ कैसा हो गया?)
(iii) काकः किम् उपायम् अचिन्तयत्? (कौआ ने क्या उपाय सोचा?)
उत्तरम् :
(i) सोऽचिन्तयत् यत् उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
(उसने सोचा-उद्यम (परिश्रम) से ही कार्य सिद्ध होते हैं, न कि मनोरथ से।)
(ii) काकः प्रसन्नः अभवत्। (कौआ प्रसन्न हो गया।)
(iii) काकः चञ्च्वा एकैकं प्रस्तर खण्डम् आनीय घटे न्यक्षिपत्।
(कौआ ने चोंच से एक-एक कंकड़ लाकर घड़े में डाला।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत। (इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि/पिपासितः काकः।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
वर्षायाः अभावे शुष्केषु जलाशयेषु एकः काकः जलस्यान्वेषणे सर्वत्र अभ्रभात्। ग्रामे एक घटं दृष्टवान्। घटेऽत्यल्पं जलम् आसीत्। अतः चञ्च्वा जलं न पातुम् शक्नोत्। किंचिद्रात् प्रस्तरखण्डान् आनीय घटे न्यक्षिपत्। जलम् उपरि आगच्छत्। काक जलं पीत्वा अति प्रसन्नः सन् आकाशे विचरन्नवदत्- उद्यमेन हि सिद्यन्ति कार्याणि न च मनोरथैः।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘जलं नासीत्’ अनयोः कर्तृपदम् अस्ति
(अ) जलम्
(ब) न
(स) आसीत्
(द) जलविहीनाः
उत्तरम् :
(अ) जलम्

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(ii) ‘काकः अति पिपासितः आसीत्’ अत्र काकस्य विशेषण पदम् अस्ति
(अ) काकः
(ब) अति
(स) पिपासितः
(द) अस्ति ।
उत्तरम् :
(स) पिपासितः

(iii) ‘सोऽपश्यत्’ अत्र ‘सः’ इति सर्वनाम पदं कस्मै प्रयुक्तम् –
(अ) घटः
(ब) जलम्
(स) काकः
(द) प्रस्तर खण्डम्
उत्तरम् :
(स) काकः

(iv) ‘तृषितः’ इति पदस्य पर्यायवाचि पदं गद्यांशे प्रयुक्तम् –
(अ) पिपासितः
(ब) जलविहीनः
(स) अत्यल्पम्
(द) इतस्ततः
उत्तरम् :
(अ) पिपासितः

6. एकस्य भिक्षुकस्य भिक्षापात्रे अञ्जलि परिमिताः तण्डुलाः आसन्। सः अवदत् – ‘भगवन्। दयां कुरु। कथम् अनेन उदरपूर्तिः भविष्यति?” तदैव अन्यः भिक्षुकः तत्र आगच्छति वदति च, ‘भिक्षां देहि!’ क्रुद्धः प्रथमः भिक्षुकः अगर्जत्- ‘रे भिक्षुक! भिक्षुकम् एव भिक्षां याचते? तव लज्जा नास्ति?” द्वितीयः भिक्षुकः उक्तवान्- “तव भिक्षा पात्रे अञ्जलि परिमिताः तण्डुलाः, मम तु पात्रं रिक्तम्। दयां कुरु। अर्धं देहि।” प्रथमः भिक्षुकः तत् न स्वीकृतवान्।

द्वितीयः भिक्षुकः पुनः अवदत्, “भो कृपणः मा भव। केवलम् एकं तण्डुलं देहि।” प्रथमः भिक्षुकः तस्मै एकमेव तण्डुलं ददाति। द्वितीये भिक्षुके गते सति प्रथमः भिक्षुकः भिक्षापात्रे तण्डुलाकारं स्वर्णकणं पश्यति। आश्चर्यचकितः शिरः ताडयन् सः पश्चात्तापम् अकरोत्-धिक माम, धिङ् मम मूर्खताम्।”

(एक भिक्षुक के भिक्षापात्र में अञ्जलि भर चावल थे। वह बोला-भगवान् दया करो। इससे कैसे पेट भरेगा? तभी दूसरा भिक्षुक वहाँ आ जाता है और कहता है- ‘भिक्षा दो।’ क्रुद्ध होकर पहला भिखारी गरजा- अरे भिखारी! भिखारी से ही भीख माँगता है? तुझे शर्म नहीं आती (तेरे शर्म नहीं है)। दूसरा भिक्षुक बोला- “तेरे भिक्षा पात्र में अंजलि भर चावल तो हैं, मेरा पात्र तो खाली (ही) है।

दया करो। आधा दे दो। पहले भिक्षुक ने यह स्वीकार नहीं किया। दूसरा भिक्षुक फिर बोला- “अरे कंजूस मत हो। केवल एक चावल दे दे।” पहला भिक्षुक उसे एक ही चावल देता है। दूसरे भिक्षुक के चले जाने पर पहला भिक्षुक भिक्षापात्र में चावल के आकार का सोने का कण देखता है । आश्चर्यचकित हुआ सिर पीटता हुआ वह पश्चात्ताप करने लगा- धिक्कार है मुझे, मेरी मूर्खता को धिक्कार है।”)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) भिक्षुकस्य भिक्षापात्रे कियत्परिमिता तण्डुलं आसन्? (भिक्षुक के भिक्षापात्र में कितने चावल थे?)
(ii) द्वितीयो भिक्षुकः कं भिक्षाम् अयाचत? (दूसरे भिखारी ने किससे भीख माँगी?)
(iii) द्वितीया भिक्षकः प्रथमं कति तण्डलानि अयाचत? (दसरे भिक्षक ने पहले से कितने चावल माँगे?)
(iv) द्वितीये भिक्षुके गते सति प्रथमः भिक्षुकः स्वभिक्षापात्रे किम् अपश्यत्?
(दूसरे भिक्षुक के चले जाने पर पहले भिक्षुक ने अपने भिक्षापात्र में क्या देखा?)
उत्तरम् :
(i) अञ्जलि परिमिताः
(ii) प्रथमं भिक्षुकम्
(iii) एक तण्डुलम्
(iv) स्वर्णकणम्।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) प्रथमः भिक्षुकः भगवन्तं किम् अयाचत? (पहले भिखारी ने भगवान से क्या माँगा?)
(ii) प्रथमः भिक्षुकः किम् अगर्जत? (पहला भिक्षुक क्या गरजा?)
(iii) द्वितीयः भिक्षुकः प्रथमं कति तण्डुलानि अयाचत? (दूसरे भिखारी ने पहले से कितने चावल माँगे?)
उत्तरम् :
(i) सोऽयाचत, भगवन् दयां कुरु। कथम् अनेन उदरपूर्तिः भविष्यति?
(उसने याचना की- भगवन् ! दया करो। इससे पेट पूर्ति कैसे होगी?)
(ii) प्रथमः भिक्षुकः अगर्जत्- रे भिक्षुक! भिक्षुकमेव भिक्षां याचते। तव लज्जा नास्ति?
(पहले भिक्षुक ने गर्जना की- अरे भिक्षुक! भिक्षुक से ही भिक्षा माँगता है। तेरे कोई शर्म नहीं है?)
(iii) द्वितीय भिक्षुकः प्रथम भिक्षुकं एकमेव तण्डुलम् अयाचत् ।
(दूसरे भिखारी ने पहले भिखारी से. एक ही चावल माँगा।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत – (इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
उदारतायाः फलम् (उदारता का फल)

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
एकस्य भिक्षुकस्य भिक्षापात्रे अञ्जलि मात्र तण्डुला आसन्। द्वितीय भिक्षुकः तम् अय द्वितीयोवदत् तव पात्रेषु अञ्जलिपूर्ण तण्डुलाः सन्ति मम पात्रे तु एकमपिनास्ति अत्र एकमेव तण्डुलम् यच्छ। प्रथम एकमेव तण्डुलम् अयच्छत् द्वितीये भिक्षुके गते सति प्रथमः स्व पात्रम् अपश्यत् यत् तत्र एक तण्डुलाकारं स्वर्णकण आसीत्। साश्चर्यमसौ पश्चात्तापम् करोत्।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘भविष्यति’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदमस्ति
(अ) अञ्जलि
(ब) उदरपूर्तिः
(स) भिक्षा
(द) कथम्
उत्तरम् :
(ब) उदरपूर्तिः

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(ii) ‘क्रुद्धः प्रथमः भिक्षुकः अगर्जत्’ अत्र विशेष्यपदमस्ति
(अ) प्रथमः
(ब) क्रुद्धः
(स) भिक्षुकः
(द) अगर्जत्
उत्तरम् :
(स) भिक्षुकः

(iii) “धिक् मम मूर्खताम्’ अत्र ‘मय’ इति सर्वनाम पद कस्मै प्रयुक्तम् –
(अ) प्रथम भिक्षुकाय
(ब) द्वितीय भिक्षुकाय
(स) तण्डुलेभ्यः
(द) याचाय
उत्तरम् :
(अ) प्रथम भिक्षुकाय

(iv) ‘दयां कुरु’ अत्र ‘दयां’ पदस्य विलोमपदमस्ति –
(अ) दयाम्
(ब) अदयां
(स) भिक्षां
(द) देहि
उत्तरम् :
(ब) अदयां

7. परेषां प्राणिनामुपकारः परोपकारोऽस्ति। परस्य हित सम्पादनं मनसा वाचा कर्मणा च अन्येषां हितानुष्ठानमेव परोपकार शब्देन गृह्यते। संसारे परोपकारः एव सः गुणो विद्यते, येन मनुष्येषु सुखस्य प्रतिष्ठा वर्तते। परोपकारेण हृदयं पवित्र सरलं, सरसं, सदयं च भवति। सत्पुरुषा कदापि स्वार्थपराः न भवन्ति। ते परेषां दुःखं स्वीयं दुःखं मत्वा तन्नाशाय यतन्ते। सज्जनाः परोपकारेण एव प्रसन्नाः भवन्ति। परोपकार-भावनैव दधीचिः देवानां हिताय स्वकीयानि अस्थीनि ददौ। महाराजशिविः कपोत रक्षणार्थ स्वमांसं श्येनाय प्रादात्। अस्माकं शास्त्रेषु परोपकारस्य महत्ता वर्णिता। प्रकृतिरपि परोपकारस्यै शिक्षा ददाति। अतः सर्वेरपि सर्वदा परोपकारः करणीयः।

(दूसरे प्राणियों का उपकार परोपकार है। दूसरे का हित-सम्पादन और मन-वाणी और कर्म से दूसरों का हितकार्य ही परोपकार शब्द से ग्रहण किया जाता है । संसार में परोपकार ही वह गुण है जिससे मनुष्यों में सुख की प्रतिष्ठा होती है। परोपकार से हृदय पवित्र, सरल, सरस और दयालु होता है। सज्जन कभी स्वार्थ के लिए तत्पर नहीं होते। वे दूसरों के दुख को अपना दुःख मानकर उसको दूर करने का प्रयत्न करते हैं। सज्जन परोपकार से ही प्रसन्न होते हैं। परोपकार भावना से ही दधीचि ने देवताओं के हित के लिए अपनी हड्डियों को दे दिया। महाराज शिवि ने कबूतर की रक्षा के लिए अपना मांस बाज के लिए दे दिया। हमारे शास्त्रों में परोपकार की महिमा वर्णित है। प्रकृति भी परोपकार की शिक्षा देती है। अतः सभी को हमेशा परोपकार करना चाहिए।) प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)

(i) के स्वार्थतत्पराः न भवन्ति ? (कौन स्वार्थ तत्पर नहीं होते?)
(ii) देवानां हिताय स्वकीयानि अस्थीनि कः ददौ? (देवताओं के हित के लिए अपनी हड्डियाँ किसने दे दी? )
(iii) मनुष्येषु परोपकारेण किं भवति? (मनुष्यों में परोपकार से क्या होता है?)
(iv) महाराजशिविः कपोत रक्षणार्थं स्वमांसं कस्मै प्रादात्?
(महाराज शिवि ने कबूतर की रक्षार्थ अपना मांस किसको दिया?)
उत्तरम् :
(i) सत्पुरुषाः
(ii) दधीचिः
(iii) सुखस्य प्रतिष्ठा
(iv) श्येनाय।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) परोपकारः कः अस्ति? (परोपकार क्या है?)
(ii) महाराज शिविः परोपकाराय किम् अकरोत?
(महाराज शिवि ने परोपकार में क्या किया?)
(iii) प्रकृति किं शिक्षते? (प्रकृति किसकी शिक्षा देती है?)
उत्तरम् :
(i) परेषां प्राणिनाम् उपकारः परोपकारः अस्ति।
(दूसरे प्राणियों का उपकार परोपकार है।)
(ii) महाराज शिवि परोपकाराय कपोतरक्षणार्थं श्येनाय स्वमांसं ददौ।
(महाराज शिवि ने परोपकार के लिए बाज को अपना मांस दे दिया।)
(ii) प्रकृति परोपकारस्य एव शिक्षां ददाति।
(प्रकृति परोपकार की ही शिक्षा देती है।)

प्रश्न 3.
अस्य गद्यांशस्य समुचितं शीर्षकं लिखत।
(इस गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
परोपकारस्य महत्वम्।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
मनसा वचसा कर्मणा च परेषां हित सम्पादनमेव परोपकारः इति कथ्यते। अनेनैव संसारे मनुष्य प्रतिष्ठति। दयादयः गुणाः भवन्ति। सञ्जनाः स्वार्थं परित्यज्यासि परेषां दुःखं स्वकीय मन्यते। ते परोपकारेणैव प्रसीदन्ति न तु स्वार्थ सिद्धि पूर्णेन। महर्षि दधीचिः महाराजाशिविस्य इत्यादय परोपकारस्य निदर्शनानि सन्ति। प्रकृति अपि परोपकारमेवशिक्षति। तस्या प्रत्येकम् अङ्गमेव परोपकारे निरतः अस्ति।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘प्रकृतिरपि परोपकारस्यैव शिक्षा ………’ अत्र कर्तृ पदमस्ति
(अ) सत्पुरुषाः
(ब) परोपकारिणः
(स) प्रकृतिः
(स) सज्जनाः
उत्तरम् :
(स) प्रकृतिः

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(ii) ‘अपरमित सुखस्य प्रतिष्ठा वर्तते’ अत्र विशेष्य पदमस्ति
(अ) सुखस्य
(ब) प्रतिष्ठा
(स) वर्तते
(द) मनुष्येषु
उत्तरम् :
(अ) सुखस्य

(iii) ‘ते परेषां दुःखं …….’ अत्र ‘ते’ सर्वनाम पदस्य स्थाने संज्ञा पदं भवेत
(अ) सत्पुरुषा
(ब) वृक्षाः
(स) प्रकृतेः अंगानि
(द) दुर्जनाः
उत्तरम् :
(अ) सत्पुरुषा

(iv) ‘कठिन’ इति पदस्य विलोम पदं भवति
(अ) सरसम्
(ब) सदयम्
(स) सरलम्
(द) पवित्रम्
उत्तरम् :
(स) सरलम्

8. मेवाडराज्यं बहूनां शूराणां जन्मभूमिः। तस्य राजा राणाप्रतापः सिंहासनम् आरूढ़वान्। हस्तच्युतानां भागानां प्रति प्राप्तिः कथमिति विचिन्त्य सः पुर प्रमुखाणां सभामायोजितवान्। तत्र सः प्रतिज्ञां कृतवान्- ‘चित्तौड़स्थानं यावत् न प्रति प्राप्स्यामि तावत् सुवर्ण पात्रे भोजनं न करिष्यामि। राजप्रासादे वासं न करिष्यामि। मृदुतल्ये शयनम् अपि न करिष्यामि’ इति। तदा पुर प्रमुखाः अवदन् वयम् अपि सुख-साधनानि त्यक्ष्याम। देशाय यथा शक्ति धनं दास्यामः। अस्मत्पुत्रान् सैन्यं प्रति प्रेषयिष्यामः इति। तदनन्तरं ग्राम प्रमुखाः अवदन्- वयं धान्यागारं धान्येन परिपूरयिष्यामः। ग्रामे आयुधानि सज्जीकरिष्यामः। युवकान् युद्धकलां बोधयिष्यामः। अद्यैव कार्यारम्भः करिष्यामः।

(मेवाड़ राज्य बहुत से वीरों की जन्मभूमि है। उसका राजा राणा प्रताप सिंहासन पर आरूढ़ हुआ, हाथ से निकले हुए भागों की वापिस प्राप्ति कैसे हो ? यह सोचकर उसनें नगर प्रमुखों की सभा आयोजित की। वहाँ उसने प्रतिज्ञा की- चित्तौड़ स्थान को जब तक वापिस प्राप्त नहीं कर लूँगा तब तक सोने की थाली में भोजन नहीं करूंगा। राजमहल में निवास नहीं करूँगा। कोमल गद्दों पर शयन भी नहीं करूंगा। तब पुर-प्रमुखों ने कहा- हम भी सुख-साधनों को त्यागेंगे। देश के लिए यथा शक्ति धन देंगे। अपने पुत्रों को सेना में भेजेंगे। इसके बाद ग्राम प्रमुखों ने कहा- हम धान्यागारों को धान से भरपूर कर देंगे। गाँव में हथियार तैयार करेंगे। जवानों को युद्ध कला का ज्ञान करायेंगे। आज ही कार्य आरंभ करेंगे।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) राणा प्रतापः कस्य राज्यस्य राजा आनीत? (राणा प्रताप किस राज्य के राजा थे?)
(ii) ‘सुवर्ण पात्रे भोजनं न करिष्यामिक प्रतिज्ञां कृतवान् ।
(‘सोने की थाली में भोजन नहीं करना’ यह प्रतिज्ञा किसने की?)
(iii) मेवाड़ राज्यं केषां जन्मभूमिः? (मेवाड़ राज्य किनकी जन्मभूमि है?)
(iv) धान्यागारं के पूरयिष्यन्ति? (धान्यागार को कौन भरेंगे?)
उत्तरम् :
(i) मेवाड़राज्यस्य
(ii) महाराणा प्रतापः
(iii) शूराणाम्
(iv) ग्रामप्रमुखाः ।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) मेवाड़ राज्यं केषां जन्मभूमिः?
(मेवाड़ राज किनकी जन्मभूमि है?)
(ii) कः पुरप्रमुखाणां सभाम् आयोजितवान् ?
(पुर प्रमुखों की सभा किसने आयोजित की?)
(iii) महाराणा किं विचिन्त्य पुरप्रमुखानां सभाम् आयोजितवान् ? ।
(महाराणा ने क्या सोचकर पुर-प्रमुखों की सभा आयोजित की?) ।
उत्तरम् :
(i) मेवाडराज्यं शूराणां जन्मभूमिः।
(मेवाड़ राज्य शूरवीरों की जन्मभूमि है।)
(ii) महाराणाप्रतापः पुरप्रमुखानां सभामायोजितवान्।
(महाराणा प्रताप ने पुरप्रमुखों की सभा का आयोजन किया।)
(iii) हस्तच्युताना भागाना प्रतिप्राप्ति कथ भवेत् इति विचिन्त्य प्रतापः पुर प्रमुखाना सभामायोजितवान्।

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
महाराणा प्रतापः।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीक
उत्तरम् :
मेवाड़ राज्ये बहवः शूराः अभवन्। प्रतापादयोऽनेके सिंहासनम् आरूढ़वन्तः। सभायां प्रतापः प्रतिज्ञातवान् चित्तौड राज्यमेव प्राप्य स्वर्णपात्रे भोजनं न करिष्यामि। प्रासादे न निवत्स्यामि मृदुतल्पे न शयिष्ये पुर प्रमुखाः अपि सुखसाधनानि अत्यजन। धन-पुत्र-धान्य-आयुधादीन प्रदाय प्रतिज्ञात वन्त युद्धाय च तत्पराः आसन्।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘तत्र सः प्रतिज्ञां कृतवान्’ इत्यस्मिन् वाक्ये क्रिया पदमस्ति
(अ) कृतवान्
(ब) तत्र
(स) सः
(द) प्रतिज्ञाम्
उत्तरम् :
(अ) कृतवान्

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(ii) ‘मृदुतल्पे’ इत्यनयोः विशेषण पदमस्ति
(अ) तल्पे
(ब) मृदु
(स) प्रसाद
(द) स्वपात्राणि
उत्तरम् :
(ब) मृदु

(iii) ‘तदा पुर प्रमुखाः अवदन’ अस्मिन् वाक्ये संज्ञापदमस्ति
(अ) तदा
(ब) अवदन्
(स) वदन्
(द) पुरप्रमुखाः
उत्तरम् :
(द) पुरप्रमुखाः

(iv) ‘वयं धान्यागारं धान्येन पूरयिष्यामः’ अत्र ‘धान्येन’ पदस्य पर्याय पदमस्ति
(अ) अन्नेन
(ब) धान्यागारम्
(स) धान्यम्
(द) पूरयिष्यामः
उत्तरम् :
(अ) अन्नेन

9. शाक्यवंशीयः शुद्धोदनः नाम कश्चिद् राजा आसीत्। कपिलवस्तु नाम तस्य राजधानी आसीत्। अस्य एव राज्ञः सुपुत्रः सिद्धार्थः आसीत्। सः बाल्यकालाद् एव अति करुणापरः आसीत्। तस्य मनः क्रीडायाम् आखेटे वा नारमत। एवं स्वपुत्रस्य राजभोगं प्रति वैराग्यं दृष्ट्वा शुद्धोदनः चिन्तितः अभवत्। सः सिद्धार्थस्य यौवनारम्भे एव विवाहम् अकरोत्। तस्य पत्नी यशोधरा सुन्दरी साध्वी च आसीत्। शीघ्रमेव तयोः राहुल: नाम पुत्रः अंजायत।

एकदा सिद्धार्थः भ्रमणाय नगरात् बहिः अगच्छत्। तत्र सः एकं वृद्धम् एकं रोगार्तम्, एकं मृत पुरुषम् एकं च संन्यासिनम् अपश्यत्। एतान् दृष्ट्वा तस्य मनसि वैराग्यम् उत्पन्नम् अभवत्। ततः सः स्वधर्मपत्नीम् अबोधं सुतं राहुलं राज्यं च त्यक्त्वा गृहात् निरगच्छत्। सः कठिनं तपः अकरोत्। तपसः प्रभावात् सः बुद्धः अभवत्। अहिंसा पालनं तस्य प्रमुखा शिक्षा आसीत्। सः जनानां कल्याणाय बौद्ध-धर्मस्य प्रचारम् अकरोत्।

(शाक्यवंश का शुद्धोदन नाम का कोई राजा था। कपिलवस्तु नाम की उसकी राजधानी थी। इसी राजा का सुपुत्र सिद्धार्थ था। वह बचपन से ही अत्यन्त दयालु था। उसका मन खेल और मृगया में नहीं लगता था। इस प्रकार अपने बेटे को राजभोग के प्रति वैराग्य देखकर शुद्धोदन चिन्तित हुआ। उसने सिद्धार्थ का यौवन के आरम्भ में ही विवाह कर दिया। उसकी पत्नी यशोधरा सुन्दर और साध्वी थी। शीघ्र ही उन दोनों के राहुल नाम का पुत्र हुआ। एक दिन सिद्धार्थ भ्रमण के लिए नगर से बाहर गया। वहाँ उसने एक बुड्ढे, एक रोग से पीड़ित, एक मरे हुए पुरुष को और एक संन्यासी को देखा। इनको देखकर उसके मन में वैराग्य पैदा हो गया। तब वह अपनी पत्नी, अबोध पुत्र राहुल और राज्य को त्याग कर घर से निकल गया। उसने कठोर तप किया। तप के प्रभाव से वह बुद्ध हो गया। अहिंसा-पालन इसकी प्रमुख शिक्षा थी। उसने लोगों के कल्याण के लिए बौद्ध धर्म का प्रचार किया।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) शाक्यवंशीय नृपस्य किम्, नाम आसीत्?
(शाक्यवंशीय राजा का क्या नाम था?)
(ii) शुद्धोदनस्य किं नाम राजधानी आसीत्?
(शुद्धोदन की राजधानी का क्या नाम था?)
(iii) शुद्धोदनस्य आत्मजः काः आसीत?
(शुद्धोदन का पुत्र कौन था?)
(iv) सिद्धार्थः बाल्यकालात् कीदृशः आसीत्?
(सिद्धार्थ बचपन में कैसा था?)
उत्तरम् :
(i) शुद्धोदनः
(ii) कपिलवस्तु
(iii) सिद्धार्थः
(iv) करुणापरः।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) सिद्धार्थः किमर्थं बौद्ध धर्मस्य प्रचारमकरोत् ? (सिद्धार्थ ने बौद्ध धर्म का प्रचार किसलिए किया?)
(ii) नगरात् बहिः मार्गे सिद्धार्थः किमपश्यत्? (नगर से बाहर मार्ग में सिद्धार्थ ने क्या देखा?)
(iii) बुद्धस्य प्रमुखा शिक्षा का आसीत्? (बुद्ध की प्रमुख शिक्षा क्या थी?)
उत्तरम् :
(i) सः जनानां कल्याणाय बौद्धधर्मस्यप्रचारमकरोत् ? (उन्होंने लोक-कल्याण हेतु बौद्ध धर्म का प्रचार किया।)
(ii) नगरात् बहिः सिद्धार्थः एकं वृद्धं, एकं मृतं, एकं रोगार्तम् एकं संन्यासिन चापश्यत् ।
(नगर के बाहर सिद्धार्थ ने एक बुड्ढे, एक मृत, एक बीमार और एक संन्यासी को देखा।)
(ii) अहिंसापालने तस्य प्रमुखा शिक्षा आसीत्। (अहिंसा का पालन करना उसकी प्रमुख शिक्षा थी।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत। (इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
बुद्धस्य वैराग्यम् (बुद्ध का वैराग्य)।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
कपिलवस्तु राज्यस्य शासकस्य शुद्धोदनस्य पुत्रस्य नाम सिद्धार्थः आसीत्। सः बाल्यादेव करुणापरः क्रीडाखेटादिभ्यो विरक्तः आसीत्। वैराग्यं दृष्ट्वा नृपः तस्य विवाहमकरोत्। पुत्रः राहुलोऽपि अजायत। सिद्धार्थः भ्रमणाय वनमगच्छत् तत्रैकदा एकं वृद्ध, रोगार्तम् मृतम् संन्यासिनं च अपश्यत्। एतान् दृष्ट्वा वैराग्योऽजायत, गृहस्थं त्यक्त्वा गृहात् निरगच्छत् तपसासौ बोध प्राप्तवान् बौद्धधर्मं च संस्थाप्य प्रचारमकरोत।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत- (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘अरमत्’ क्रियायाः कर्तृपदमनुच्छेदे प्रयुक्तमस्ति
(अ) शुद्धोदनः
(ब) सिद्धार्थः
(स) कपिलवस्तु
(द) यशोधरायाः
उत्तरम् :
(ब) सिद्धार्थः

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(ii) ‘तस्य प्रमुख शिक्षा आसीत्’ अत्र विशेषण पदमस्ति
(अ) तस्य
(ब) प्रमुख
(स) शिक्षा
(द) आसीत्
उत्तरम् :
(ब) प्रमुख

(iii) ‘तस्य मनः’ अत्र ‘तस्य’ इति सर्वनाम पदं प्रयुक्तम् –
(अ) सिद्धार्थाय
(ब) शुद्धोदनाय
(स) यशोधरायै
(द) वैराग्याय
उत्तरम् :
(स) यशोधरायै

(iv) ‘वैराग्यम् उत्पन्नम् अभवत्’ अत्र ‘उत्पन्नम्’ पदस्य विलोमपदम् अस्ति
(अ) वैराग्यम्
(ब) उत्पन्नम्
(स) नष्टम्
(द) न किञ्चित्
उत्तरम् :
(अ) वैराग्यम्

10. नगरस्य समीपे एकस्मिन् वने एकः सिंहः निवसति स्म। एकदा तस्य गुहायाम् एकः मूषकः प्राविशत्। सः सिंहस्य शरीरस्योपरि इतस्तततोऽधावत्। कुपितः सिंहः तं मूषकं करे गृह्णाति स्म। भीतः मूषकः सिंहाय मोक्तु न्यवेदयत् अवदत च भो मृगराज! मां मा मारय, कदाचिदहं भवतः सहायतां करिष्यामि। सिंहः अहसत् अवदत् च-“लघुमूषक त्वं मम कथं सहायतां करिष्यसि? अस्तु, इदानीन्तु त्वां मोचयामि।” इत्युक्त्वा सिंहः मूषकम् अमुञ्चत्। एकदा कोऽपि व्याधः जालं प्रसारयति, सिंहः जाले पतित: बहिरागमनाय प्रयत्नं अकरोत्। तस्य गर्जनं श्रुत्वा मूषकः विलात् बहिरागत्य दन्तैः च जालं अकर्तयत् बन्धनमुक्तः सिंह: ‘मित्रं तु लघु अपि वरम्’ इति ब्रुवन् वने निर्गतः।

(नगर के समीप एक वन में एक शेर रहता था। एक दिन उसकी गुफा में एक चहा घुस गया। वह सिंह के शरीर पर इधर-उधर दौड़ने लगा। नाराज हुए उस शेर ने चूहे को पकड़ लिया। डरे हुए चूहे ने सिंह छोड़ने के लिए निवेदन किया और बोला- हे मृगराज! मुझे मत मारो, कभी मैं आपकी सहायता करूँगा। सिंह हँसा और बोला- छोटा-सा चूहा तू मेरी क्या सहायता करेगा? खैर, अब तो तुम्हें छोड़ देता हूँ, ऐसा कहकर सिंह ने चूहे को छोड़ दिया। एक दिन किसी बधिक ने जाल ।। सिंह जाल में पड़ा हुआ बाहर आने का प्रयत्न करने लगा। उसकी गर्जना को सुनकर चूहे ने बिल से बाहर आकर दाँतों से जाल काट दिया। बन्धन से मुक्त शेर ‘मित्र तो छोटा-सा भी श्रेष्ठ होता है’ कहता हुआ वन में निकल गया।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए) –
(i) नगरस्य समीपे कः निवसति स्म? (नगर के समीप कौन रहता था?)
(ii) सिंहस्य गुहायां कः प्राविशत्? (सिंह की गुफा में कौन घुस गया?)
(ii) मूषकः सिंहाय कस्मै निवेदयति? (चूहा सिंह को किसलिए निवेदन करता है?)
(iv) सिंहः कुत्र बद्धः? (सिंह कहाँ बँध गया?) ।
उत्तरम् :
(i) सिंहः
(ii) मूषकः
(iii) मोक्तुम्
(iv) जाले/पाशे।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) मूषकः सिंहस्योपरि किं कृतवान् ? (चूहे ने शेर के ऊपर क्या किया?)
(ii) भीत: मूषकः कथं निवेदयति? (डरा हुआ चूहा कैसे निवेदन करता है?)
(iii) सिंह: मषकं कथम उपहसति? (सिंह चहा पर कैसे उपहास करता है?)
उत्तरम् :
(i) मूषकः सिंहस्योपरि इतस्ततः धावति। (सिंह के ऊपर चूहा इधर-उधर दौड़ता है।)
(ii) हे मृगराज! मां मा मारय। कदाचिद् अहं भवतः सहायतां करिष्यामि।
(हे मृगराज! मुझे मत मारो। कदाचित् मैं आपकी सहायता करूँगा।)
(ii) लघुमूषकः त्वम्, मम कथं सहायतां करिष्यति? अस्तु इदानीं तु त्वां मोचयामि। ।
(तुम छोटे से चूहे, मेरी कैसे सहायता करोगे? खैर अब तो तुम्हें मैं छोड़ देता हूँ।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
मित्रं तु लघु अपि वरम्। (मित्र तो छोटा-सा ही अच्छा।)

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
सिंहस्य गुहायाम् एकदा एक मूषकः प्राविशत्। मूषकः तस्योपरि अधावत्, स तम् गृह्णाति स्म हन्तुं चेच्छति।
मूषको न्यवेदयतः मां मा मारय, अहं कदाचित् ते सहायतां करिष्यामि। सिंहः उपहस्य तं त्यजति। एकदा मूषकः सिंहस्य गर्जनाम् अश्रृणोत्। सः तत्र अगच्छत् व्याधस्य पाशे पतितं तं सिंह मोचयति। सिंहोऽवदत्-“मित्र तु लघु अपि वरम्।”

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘सः सिंहस्योपरि धावति’ अत्र अनयोः क्रियापदम् अस्ति
(अ) व्याधः
(ब) धावतिः
(स) सिंहः
(द) जालः
उत्तरम् :
(ब) धावतिः

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(ii) ‘भीतः मूषकः’ अत्र भीत: कस्य पदस्य विशेषम्
(अ) मूषकस्य
(ब) सिंहस्य
(स) व्याधस्य
(द) जालस्य
उत्तरम् :
(अ) मूषकस्य

(iii) ‘बद्ध सिंहः’ अत्र संज्ञापदमस्ति
(अ) व्याधः
(ब) मृगराज
(स) सिंहः
(द) न कश्चिद्
उत्तरम् :
(स) सिंहः

(iv) ‘दूरे’ इति पदस्य अनुच्छेदे विलोम पदमस्ति
(अ) समीपे
(ब) करे
(स) जाले
(द) वने
उत्तरम् :
(अ) समीपे

11. कालिदासः मेघदूतं रचितवान। मेघदूते मानसून विज्ञानस्य अद्भुतं वर्णनम् अस्ति। मानसून-समय: आषाढ़मासात् आरभते। श्याममेघान् दृष्ट्वा सर्वे जनाः प्रसन्ना भवन्ति। मयूराः नृत्यन्ति। मानसून मेघाः सर्वेषा जीवानां कष्टम् अपहरन्ति। मेघानां जलं वनस्पतिभ्यः, पशु-पक्षिभ्यः किं वा सर्वेभ्यः प्राणिभ्यः जीवनं प्रयच्छति। मेघजलैः भूमेः उर्वराशक्तिः वा ति। क्षेत्राणां सिञ्चनं भवति। गगने यदा कदा इन्द्रधनुः अपि दृश्यते। वायुः शीतलः भवति। शुष्क भूमौ वर्षायाः बिन्दवः पतन्ति। भूमेः सुगन्धितं वाष्पं निर्गच्छति। कदम्ब पुष्पाणि विकसन्ति। तेषु भ्रमरा गुञ्जन्ति। हरिणाः प्रसन्ना सन्तः इतस्ततः धावन्ति।

चातका जलबिन्दून गगने एव पिवन्ति। बलाकाः पंक्तिं बद्ध्वा आकाशे उड्डीयन्ते। मेघदूते मेघः विरहि यक्ष सन्देशं नेतुं प्रार्थते। अत्र कालिदासः वायुमार्गस्य ज्ञानवर्धकं वर्णनं करोति। (कालिदास ने मेघदूत की रचना की। मेघदूत में मानसून विज्ञान का अद्भुत वर्णन है। मानसून का समय आषाढ़ माह से आरम्भ होता है। काले मेघों को देखकर सभी लोग प्रसन्न होते हैं। मोर नाचते हैं। मानसून के मेघ सभी जीवों के कष्ट का हरण करते हैं। मेघों का जल वनस्पतियों, पशु-पक्षियों अधिक तो क्या सभी प्राणियों को जीवन प्रदान करते हैं। मेघ के जल से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है।

खेतों की सिंचाई होती है। आकाश में जब कभी इन्द्रधनुष भी दिखाई देता है। वायु शीतल होती है। सूखी धरती पर वर्षा की बूंदें पड़ती हैं । भूमि से सुगन्धित भाप निकलती है। कदम्ब के फूल खिलते हैं। उन पर भौरे गूंजते हैं। हिरन प्रसन्न हुए इधर-उधर दौड़ते हैं। पपीहे जल बिन्दुओं को आकाश में ही पीते हैं। बगुले कतार बनाकर आकाश में उड़ते हैं। मेघदूत में मेघ से विरही यक्ष सन्देश ले. जाने के लिए प्रार्थना करता है। यहाँ कालिदास वायुमार्ग का ज्ञान-वर्धक वर्णन करता है।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) मेघानां जलं प्राणिभ्यः किं प्रयच्छति? (बादलों का जल प्राणियों को क्या देता है?)
(ii) भ्रमराः कुत्र गुञ्जन्ति? (भौरे कहाँ गूंजते हैं?)
(iii) मेघ जलैः किं वर्धते? (बादल-जल से क्या बढ़ता है?)
(iv) वर्षाकाले वायु कीदृशी भवति ? (वर्षाकाल में हवा कैसी होती है?)
उत्तरम् :
(i) जीवनम्
(ii) कदम्ब पुष्पेषु
(ii) भूमेः उर्वरा शक्तिः
(iv) शीतलः।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) मेघदूतं कः रचितवान्? (मेघदूत को किसने रचा?)
(ii) मानसनमेघाः केषां कष्टम् अपहरन्ति? (मानसून के बादल किनके कष्ट को हरण करते हैं?)
(iii) मेघदूते कस्य वर्णनम् अस्ति? (मेघदूत में किसका वर्णन है?)
उत्तरम् :
(i) मेघदूतं कालिदासः रचितवान्। (मेघदूत की रचना कालिदास ने की।)
(iii) मानसून मेघाः सर्वेषां जीवानां कष्टम् अपहरन्ति। (मानसून के बादल सब जीवों के कष्ट का हरण करते हैं।)
(iii) मेघदूते मानसून विज्ञानस्य अद्भुतं वर्णनम् अस्ति। (मेघदूत में मानसून विज्ञान का अनोखा वर्णन है।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत। (इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
कालिदासस्य मेघदूतकाव्यम्। (कालिदास का मेघदूत काव्य।)

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
कालिदासस्य मेघदूत काव्ये मानसून विज्ञानस्य अद्भुतम् वर्णनम् अस्ति। पृथिव्या शोभा वर्धते। मेघैः प्रदत्तेन जलेन . मनुष्या, पशवः, खगाः, वृक्षाः, पादपा च प्रसन्नाः भवन्ति। इन्द्रधनुः शोभते गगने वायुः शीतलः भवति। भूमेः
सुगन्धिः प्रसराति हरिणाः बालकाः च प्रसन्ना सन्तः इतस्ततः भ्रम्यन्ति धावन्ति च आनन्देन। मेघदूतम् वायुमार्गस्य
ज्ञानं वर्धयति।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘धावन्ति’ इति क्रियापदस्य कर्ता अस्ति –
(अ) भ्रमराः
(ब) मेघाः
(स) हरिणाः
(द) चातकाः
उत्तरम् :
(स) हरिणाः

(ii) ‘ज्ञानवर्धकम्’ इति कस्य विशेषणम्?
(अ) मानसून विज्ञानस्य
(ब) वायु मार्गस्य
(स) प्रकृति चित्रणस्य
(द) विरहि यक्षस्य।
उत्तरम् :
(ब) वायु मार्गस्य

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(iii) ‘तेषु भ्रमरा गुञ्जन्ति’ यहाँ तेषु सर्वनाम पदं कस्मै प्रयुक्तम्?
(अ) कदम्ब पुष्पेषु
(ब) श्याम मेघेषु
(स) क्षेत्रेषु
(द) गगने
उत्तरम् :
(अ) कदम्ब पुष्पेषु

(iv) ‘उर्वरा शक्तिः वर्धते’ अत्र ‘उर्वरा’ पदस्य विलोमपदमस्ति
(अ) उर्वरा
(ब) शक्तिः
(स) अनुर्वरा
(द) भूमेः
उत्तरम् :
(स) अनुर्वरा

12. सुबुद्धिः दुर्बुद्धिश्च द्वौ धनिको आस्ताम्। सुबुद्धेः विशालं भवनम् आसीत्। तस्य अनेके उद्योगाः चलन्ति स्म। अत एव सः सर्वदा प्रसन्नचित्तः ईश्वरं स्मरन् आनन्दे निमग्नः भवति स्थ। दुर्बुद्धि तावत् लोभी आसीत्। अधिकाधिकं धन-संग्रहं कर्तुम् इच्छति स्म। सर्वदा असन्तुष्टः, क्रुद्धः दुःखी च भवति स्म। एकदा दुर्बुद्धिः कार्यवशात् सुबुद्धेः गृहम् अगच्छत्। आनन्द-मग्नं तं दृष्ट्वा अपृच्छत्- “भवतः आनन्दरूप शान्तिः च किं रहस्य?” सुबुद्धिः उवाच-“मित्र! मम चत्वारः अंगरक्षकाः सन्ति। प्रथमः सत्यं यत् माम् अपराधात् सदा रक्षति। द्वितीयः स्नेहः, अहं सर्वान् कर्मचारिणः पुत्रवत् मन्ये। तृतीयः न्यायः, यः माम् अन्यायात् रक्षति। चतुर्थः त्यागः मां दानाय प्रेरयति। अतः एतेषां सहायतया अहं सर्वदा, आनन्देन जीवामि लोकहितं च करोमि इति।” दुर्बुद्धि श्रद्धया तस्य चरणयोऽपतत्।

(सुबुद्धि और दुर्बुद्धि नाम के दो धनवान थे। सुबुद्धि का विशाल भवन था। उसके अनेक उद्योग चलते थे। अतः एक वह हमेशा प्रसन्न रहता था और ईश्वर का स्मरण करता हुआ आनन्द में डूबा रहता था। दुर्बुद्धि तो लोभी था। अधिक से अधिक धन संग्रह करना चाहता था। हमेशा असन्तुष्ट, क्रुद्ध और दुखी रहता था। एक दिन दुर्बुद्धि काम से सुबुद्धि के घर गया। उसको आनन्दमग्न देखकर पूछा- आपके आनन्द और शान्ति का क्या रहस्य है? सुबुद्धि ने कहा- “मित्र! मेरे चार अंगरक्षक हैं- पहला सत्य जो मेरी अपराध से सदैव रक्षा करता है। दूसरा स्नेह, मैं सभी कर्मचारियों से पुत्र की तरह व्यवहार करता हूँ। तीसरा न्याय जो मेरी अन्याय से रक्षा करता है। चौथा त्याग मुझे दान के लिए प्रेरित करता है। अतः इनकी सहायता से मैं सदैव आनन्द में जीता हूँ और लोक-कल्याण करता हूँ।” दुर्बुद्धि श्रद्धा से उसके चरणों में गिर गया।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) सुबुद्धेः कति अङ्गरक्षकाः आसन्? (सुबुद्धि के कितने अंगरक्षक थे?)
(ii) सबद्धिः सर्वदा कस्मिन निमग्नः भवति स्म? (सबद्धि सदा किसमें डूबा रहता था?)
(iii) दुर्बुद्धिः किमर्थं सुबुद्धेः गृहम् आगच्छत? (दुर्बुद्धि किसलिए सुबुद्धि के घर आया?)
(iv) द्वितीयस्य अंगरक्षकस्य किम् नाम आसीत्? (दूसरे अंगरक्षक का क्या नाम था?)
उत्तरम् :
(i) चत्वारः
(ii) आनन्दे
(iii) कार्यवशात्
(iv) स्नेह।

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) दुर्बुद्धिः सर्वदा कस्य संग्रहं कर्तुम् इच्छति स्म?
(दुर्बुद्धि सदा क्या संग्रह करना चाहता था?)
(ii) सुबुद्धिः सर्वान् कर्मचारिणः कथं मन्यते स्म?
(सुबुद्धि सभी कर्मचारियों को कैसे मानता था?)
(iii) सुबुद्धेः चत्वारः रक्षकाः के सन्ति ?
(सुबुद्धि के चार रक्षक कौन हैं?)
उत्तरम् :
(i) दुर्बुद्धि सर्वदा अधिकाधिकं धन-संग्रहं कर्तुम् इच्छति स्म।
(दुर्बुद्धि सदा अधिक धन-संग्रह करना चा
(ii) सुबुद्धिः सर्वान् कर्मचारिणः पुत्रवत् मन्यते स्म।
(सुबुद्धि सब कर्मचारियों को पुत्रवत् मानता था।)
(iii) सत्यं, स्नेहः, न्यायः त्यागः च एते चत्वारः अंगरक्षकाः।
(सत्य, स्नेह, न्याय और त्याग ये चार अंगरक्षक हैं।)

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
सुबुद्धिदेव जयते।
(सुबुद्धि की ही विजय होती है।)

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
सुबुद्धि दुर्बुद्धिश्च द्वौ धनिकौ आस्ताम् सुबुद्धि सुखी आसीत्, दुर्बुद्धिश्च लोभी दुःखी आसीत्। अति धन संचिते अपि सः असन्तुष्टः क्रुद्ध, दुखी आसीत, एकदा दुर्बुद्धिः सुबुद्धि तस्य आनन्दस्य कारणमपृच्छत्। सुबुद्धिः उवाच मित्र! मम सत्य-स्नेह-न्याय-त्यागाः इति चत्वारः सेवकाः सन्ति ये माम् अन्यायात् पक्षपातात्, उपराधात् रक्षन्ति त्यागः दानाय प्रेरयति। अतोऽहम् आनन्दितः अस्मि। दुर्बुद्धिः श्रद्धया तस्य चरणयोपपत्।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘चलन्ति स्म’ क्रियापदस्य कर्तृपदमस्ति –
(अ) उद्योगाः
(ब) अङ्गरक्षकाः
(स) कर्मचारिणः
(द) सहायतया
उत्तरम् :
(अ) उद्योगाः

(ii) ‘सर्वान्’ इति विशेषणपदस्य विशेष्यमस्ति –
(अ) अङ्गरक्षकाः
(ब) कर्मचारिणः
(स) अन्यायाः
(द) सहायकाः
उत्तरम् :
(ब) कर्मचारिणः

(iii) ‘एतेषां सहायतया’ इत्यत्र एतेषां सर्वनाम पदं केभ्यः प्रयुक्तम् –
(अ) कर्मचारिणाम्
(ब) अङ्गरक्षकाणाम्
(स) उद्योगानाम्
(द) अन्यायानाम्
उत्तरम् :
(ब) अङ्गरक्षकाणाम्

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(iv) ‘मां दानाय प्रेरयति’ अत्र ‘दानाय’ पदस्य विलोमपदमस्ति –
(अ) माम्
(ब) दानाय
(स) सञ्चायः
(द) त्यागः
उत्तरम् :
(स) सञ्चायः

13. एकदा एकः वैदेशिकः प्रथम राष्ट्रपतेः श्री राजेन्द्र प्रसादस्य गृहं प्राप्तवान्। राष्ट्रपतेः परिचारकः तम् आतिथ्यगृहे प्रतीक्षितुम् अकथयत् तम् असूचयत् च यद् राष्ट्रपति महोदयः सम्प्रति पूजां कुर्वन्ति। सः अतिथिः ज्ञातुम् ऐच्छत् यद् राष्ट्रपतिः कथं करोति पूजाम्? सङ्कोचं कुर्वन् अपि सः अन्तः पूजागृह प्रविष्टः राष्ट्रपतेः समक्षं विद्यमानं मृत् पिण्डम् अवलोक्य सः अवन्दत श्रद्धया च तत्र उपविशत्। ‘पूजां परिसमाप्य राष्ट्रपति महोदयः पूजागृहे स्थिते तम् दृष्ट्वा प्रसन्नः अभवत्। ससम्मानं तय् अन्तः अनयत्। आगन्तुकस्य ललाटे विद्यमानं भावं दृष्ट्वा श्री राजेन्द्र महोदयः तस्य कौतूहल विज्ञाय तस्मै सम्बोधयत् एतद् मृत्पिण्ड भारतस्य भूम्याः प्रतीकम् अस्ति। एतेन मृत्पिण्डेन. एव भारतीया महती अन्नात्मिकां सम्पदां प्राप्नुवन्नि। अत एव वयं मृत्तिकायाः कणेषु ईश्वरस्य दर्शनपि कुर्मः। अस्माकं विचारे तु मानवेषु पशु-पक्षिषु, पाषाणेषु, वृक्षादिषु किंवा अचेतनेषु अपि ईश्वरस्य सत्ता अस्ति।

(एक दिन एक विदेशी प्रथम राष्ट्रपति श्री राजेन्द्र प्रसाद के घर पर पहुँच गया। राष्ट्रपति के सेवक ने उसको अतिथि गृह में प्रतीक्षा करने के लिए कह दिया और उसे सूचित कर दिया कि राष्ट्रपति महोदय अभी पूजा कर रहे हैं। वह अतिथि यह जानना चाहता था कि राष्ट्रपति पूजा कैसे करते हैं? संकोच करते हुए भी वह पूजागृह में प्रवेश हो गया। राष्ट्रपति के समक्ष विद्यमान मिट्टी के ढेले को देखकर उसने वन्दना की और श्रद्धापूर्वक बैठ गया। पूजा को समाप्त करके राष्ट्रपति माहेदय ने पूजागृह में बैठे उसको देखकर प्रसन्न हुए। सम्मानपूर्वक उसे अन्दर ले गये। आगन्तुक के ललाट पर विद्यमान भाव को देखकर श्री राजेन्द्र महोदय ने उसके कुतूहल को जानकर उसे संबोधित किया कि यह मिट्टी का ढेल भारत की भूमि का प्रतीक है। इस मिट्टी के ढेले से ही भारतीय बहत-सी अन्नात्म सम्पदा प्राप्त करते हैं। अतएव हम मिट्टी के कणों में भी ईश्वर के विचार से तो मानव, पशु, पक्षी, पत्थर, वृक्षादि और तो क्या अचेतनों में भी ईश्वर की सत्ता है।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) कः श्री राजेन्द्र प्रसादस्य गृहं प्राप्तवान् ?
(श्री राजेन्द्र प्रसाद के घर कौन पहुँच गया?)
(ii) भारत भूम्याः प्रतीक किम् अस्ति?
(भारतभूमि का प्रतीक क्या है?)
(ii) कस्याः कणेषु वयम् ईश्वर दर्शनं कुर्मः?
(किसके कणों में हम ईश्वर के दर्शन करते हैं?)
(iv) किं कुर्वन् आगन्तुकः पूजागृहं प्रविष्ट:?
(क्या करता हुआ आगन्तुक पूजागृह में घुस गया?)
उत्तरम् :
(i) वैदेशिक :
(i) मृत्पिण्डम्
(iii) मृत्तिकायाः
(iv) सङ्कोचम्।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) राष्ट्रपति महोदयः आगन्तुकं कुत्र दृष्ट्वा प्रसन्नः?
(राष्ट्रपति महोदय आगन्तुक को कहाँ देखकर प्रसन्न हुए?)
(ii) राजेन्द्र प्रसाद महोदयः आगन्तुकस्य कौतूहलं विज्ञाय तस्मै किं सम्बोधयत?
(राजेन्द्र प्रसाद जी ने आगन्तुक के कुतूहल को जानकर उसको क्या संबोधित किया?)
(iii) अतिथि महोदयः किं ज्ञातुम् ऐच्छत्? (अतिथि महोदय क्या जानना चाहते थे?)
उत्तरम् :
(i) तं पूजागृहे स्थितं दृष्ट्वा राष्ट्रपति महोदयः प्रसन्नः अभवत् ?
(उसे पूजागृह में बैठा देखकर राष्ट्रपति महोदय प्रसन्न हो गये।)
(ii) एतत्मृतपिण्डं भारतस्य भूम्याः प्रतीकम् अस्ति, एतेन भारतीया अन्न सम्पदां प्राप्नुवन्ति अतः वयं मृत्कणेषु ईश्वरस्य दर्शनं कुर्मः। (यह मिट्टी का पिण्ड भारतभूमि का प्रतीक है। इससे भारतीय अन्न सम्पदा को प्राप्त करते हैं। अतः हम मिट्टी के कणों में ईश्वर के दर्शन करते हैं।
(iii) अतिथि महोदयः ज्ञातुमैच्छत् यत् राष्ट्रपति महोदयः कथं करोति पूजाम्?
(अतिथि महोदय जानना चाहते थे कि राष्ट्रपति महोदय कैसे पूजा करते हैं?)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत। (इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
ईश्वरः सर्वव्यापकः। (ईश्वर सर्वव्यापक है।)

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
एक: वैदेशिकः राष्ट्रपतेः डॉ. राजेन्द्र प्रसादस्य गृहम् आगच्छत्। तदा सः पूजां करोति स्म। परिचायक प्रतीक्षितुं न्यवेदयतः परञ्च सः तस्य पूजा विधि दृष्टुम् इच्छति स्म अतः पूजा गृहं प्रविष्ट, पूजाविधौ सम्पन्ने आगतः राष्ट्रपतिम् अपृच्छत् महोदय! किमिदं मृत्पिण्डम् त्वं पूजयसि? मित्र! एष भारत भूम्याः प्रतीकमस्ति। एषा भारतीया मृदा एव भारतीयेभ्यः अन्नादिकं प्रदाय उदरं पूरयति पालयति च। वयं भारतस्य सर्वेषु वस्तुषु ईश्वरस्य सत्तां पश्यामः। अतः ईश्वरः सर्वव्यापकः।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत- (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘प्राप्नुवन्ति’ अस्याः क्रियापदस्य कर्तृपदम् अस्ति –
(अ) अन्नात्मिकां
(ब) सम्पदाम्
(स) भारतीयाः
(द) महती
उत्तरम् :
(स) भारतीयाः

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(ii) ‘भावम्’ इति विशेष्यस्य अत्र विशेषण पदम् अस्ति –
(अ) आगन्तुकस्य
(ब) ललाटे
(स) विद्यमानम्
(द) भावम्
उत्तरम् :
(स) विद्यमानम्

(iii) ‘मृत्पिण्डं दृष्ट्वा सोऽवन्दत’ अत्र सः इति सर्वनाम पदं प्रयुक्तम्
(अ) राजेन्द्र प्रसादः
(ब) परिचायकः
(स) आगन्तुकः
(द) वैदेशिक:
उत्तरम् :
(द) वैदेशिक:

(iv) ‘तं दृष्ट्वा प्रसन्नः अभवत् अत्र ‘प्रसन्न’ शब्दस्य विलोमपदम् अस्ति
(अ) अप्रसन्नः
(ब) दृष्ट्वा
(स) प्रसन्नः
(द) अभवत्।
उत्तरम् :
(अ) अप्रसन्नः

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

14. षट् कारणानि श्रियं विनाशयन्ति। प्रथमं कारणम् अस्ति असत्यम्। यः नरः असत्यं वदति तस्य कोऽपि जन: विश्वासं न करोति। निष्ठुरता अस्ति द्वितीयं कारणम्। उक्तं च – सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।’ तृतीयं कारणं अस्ति कृतघ्नता। जीवने अनेके जनाः अस्मान् उपकुर्वन्ति। प्रायः जनाः उपकारिण विस्मरन्ति, प्रत्युपकारं न कुर्वन्ति। एतादृशः स्वभावः कृतघ्नता इति उच्यते। आलस्यम् अपरः महान् दोषः, ‘आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।’ अहंकारः मनुष्या मतिं नाशयति। अहङ्कारी मनुष्यः सर्वदा आत्मप्रसंशाम् एव करोति। न कदापि कस्यचित् उपकारं करोति व्यसनानि अपि श्रियं हरन्ति। ये मद्यपानं कुर्वन्ति तेषाम् आत्मबलं, बुद्धिबलं, शारीरिक बलं च नश्यति। अतः बुद्धिमान् एतान् दोषान् सर्वथा त्यजेत्।

(छ: कारण लक्ष्मी के विनाशक होते हैं। पहला कारण है असत्य। जो मनुष्य झूठ बोलता है उसका कोई विश्वास नहीं करता। निष्ठुरता दूसरा कारण है। कहा भी गया है- सत्य बोलना चाहिए (परन्तु) प्रिय या मधुर सत्य ही बोलना चाहिए। अप्रिय (कटु) सत्य भी नहीं बोलना चाहिए। तीसरा कारण है- कृतघ्नता। जीवन में अनेक लोग हमारा उपकार करते हैं। प्रायः लोग उपकारी को भूल जाते हैं, उसके बदले में उसका उपकार नहीं करते हैं। इस प्रकार का स्वभाव कृतघ्नता कहलाता है। आलस्य एक अन्य महान् दोष है। आलस्य मनुष्यों का शरीर में ही स्थित महान् शत्रु हैं। अहंकार (घमंड) मनुष्य की मति को नष्ट करता है। अहंकारी मनुष्य हमेशा आत्मप्रशंसा ही करता है। कभी किसी का उपकार नहीं करता है। दुर्व्यसन भी लक्ष्मी का हरण करते हैं, जो लोग मद्यपान करते हैं उनका आत्म-बल, बुद्धिबल और शारीरिक बल नष्ट हो जाता है। अतः बुद्धिमान को ये दोष हमेशा त्याग देने चाहिए।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) कति कारणानि श्रियं विनाशयन्ति ?
(कितने कारण लक्ष्मी का विनाश करते हैं?)
(ii) लक्ष्मी विनाशस्य किं प्रथम कारणम्?
(लक्ष्मी विनाश का पहला कारण क्या है?)
(iii) कीदृशं सत्यं ब्रूयात् ?
(कैसा सत्य बोलना चाहिए?)
(iv) मनुष्याणां कः शरीरस्थो रिपुः?
(मनुष्यों के शरीर में स्थित शत्रु कौन है?)
उत्तरम् :
(i) षड्
(ii) असत्यम्
(iii) प्रियम्
(iv) आलस्यम्।

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प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) असत्य वादनेन का हानिः?
(असत्य बोलने से क्या हानि है?)
(ii) कीदृशाः जनाः कृतघ्नाः भवन्ति?
(कैसे मनुष्य कृतघ्न होते हैं?)
(iii) मद्यपानं किं किं हरति?
(मद्यपान क्या-क्या हरण करता है?)
उत्तरम् :
(i) यः असत्यं वदति तस्य कोऽपि विश्वासं न करोति।।
(जो झूठ बोलता है उस पर कोई विश्वास नहीं करता है।)
(ii) यो जनाः उपकारिणं विस्मरन्ति प्रत्युपकारं न कुर्वन्ति ते कृतघ्नाः भवन्ति।
(जो लोग उपकारी को भूल जाते हैं तथा बदले में उपकार नहीं करते, वे कृतघ्न होते हैं।)
(ii) मद्यपानं मानवस्य आत्मबलं, बुद्धिबलं शारीरिकं बलं च हरति।
(मद्यपान मानव के आत्मबल, बुद्धिबल और शारीरिक बल को हर लेता है।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
षड्दोषान् वर्जयेत्। (छः दोषों को त्यागना चाहिए।)

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
षट् कारणानि श्रियं विनाशयन्ति असत्यात् न तस्मिन् कोऽपि विश्वसिति निष्ठुरता प्रियताम्, कृतघ्नता प्रत्युपकारं
विस्मारयति, आलस्यं मानवस्य महान् शत्रुः अहंकारश्च मानवस्य मतिं नाशयति आत्मश्लाघां करोति परहितम् अकृत्वा व्यसनेषु पतित्वा आत्मबलं, बुद्धिबलं शारीरिक शक्ति च नश्यति। त्याज्याः एते दोषाः।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘…..प्रत्युपकारं न कुर्वन्ति’ अत्र ‘कुर्वन्ति’ क्रियापदस्य कर्तृपदमस्ति –
(अ) अहंकारिणः जनाः
(ब) व्यसनिनः
(स) कृतघ्नजनाः
(द) अलसाः जना।
उत्तरम् :
(स) कृतघ्नजनाः

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(ii) ‘प्रथमं कारणम्’ इत्यनयोः विशेषणपदमस्ति –
(अ) प्रथमम्
(ब) कारणम्
(स) अस्ति
(द) असत्यम्
उत्तरम् :
(अ) प्रथमम्

(iii) ‘तस्य कोऽपिजनः विश्वासं न करोति’ अत्र ‘तस्य’ सर्वनाम पदं कस्य स्थाने प्रयुक्तम्?
(अ) असत्य वादिनः नरस्य
(ब) कृतघ्नस्य
(स) निष्ठुरस्य
(द) अलसस्य।
उत्तरम् :
(अ) असत्य वादिनः नरस्य

(iv) ‘अहङ्कारः मनुष्यस्य मतिं नाशयति’ ‘मतिं’ शब्दस्य पर्यायपदमस्ति
(अ) अहङ्कारः
(ब) मनुष्यस्य
(स) मतिम्
(द) बुद्धिं
उत्तरम् :
(द) बुद्धिं

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

15. अस्माकं देशस्य उत्तरस्यां दिशि पर्वतराजः हिमालयः अस्ति। अस्य पर्वतस्य श्रृंखला विस्तृता वर्तते। सः ‘पर्वतराज’ इति कथ्यते। संसारस्य उच्चतमः पर्वतः अस्ति। अयं सर्वदा हिमाच्छादितः भवति। सः भारतदेशस्य मुकुटमिव रक्षकः च अस्ति। अनेकाः नद्यः इतः एव निःसरन्ति। नदीषु पवित्रतमा गङ्गा अपि हिमालयात् एव प्रभवति। अनेकानि तीर्थस्थलानि हिमालय क्षेत्रे वर्तन्ते। वस्तुतः हिमालयः तपोभूमिः अस्ति। पुरा अनेके जनाः तत्र तपः कृतवन्तः।

अत्रत्यं वातावरणं मनोहरं शान्तं चित्ताकर्षकं च भवति। हिमालयस्य विविधाः वनस्पतयः ओषधिनिर्माणे उपर सन्ति। तत्र दुर्लभ रत्नानि मिलन्ति बहुमूल्यं काष्ठं च तत्र प्राप्यते। हिमालय क्षेत्रे बहूनि मन्दिराणि सन्ति। प्रतिवर्ष भक्ताः श्रद्धालयः, पर्यटनशीलाः जनाश्च मन्दिरेषु अर्चनां कुर्वन्ति, स्वास्थ्यलाभमपि प्राप्नुवन्ति। अस्य हिमालयस्य महत्वम् आध्यात्मिक-दृष्ट्या, पर्यावरण-दृष्ट्या भारतस्य रक्षा-दृष्ट्या च अपि वर्तते। अतः अयं पर्वतराजः हिमालयः अस्माकं गौरवम् अस्ति।

(हमारे देश की उत्तर दिशा में पर्वतराज हिमालय है। इस पर्वत की श्रृंखला विस्तृत है। वह ‘पर्वतराज’ कहलाता है। संसार का सबसे ऊँचा पर्वत है। यह हमेशा बर्फ से ढका रहता है। वह भारतदेश के मुकुट की तरह और रक्षक है। अनेक नंदियाँ इसी से निकलती हैं। नदियों में पावनतम गंगा भी हिमालय से ही निकलती है। हिमालय के क्षेत्र में अनेक तीर्थस्थल हैं। वास्तव में हिमालय तपोभूमि है। पहले अनेक लोग यहाँ तप किया करते थे।

यहाँ का वातावरण मनोहर, शान्त और चित्ताकर्षक है। हिमालय की विविध वनस्पतियाँ ओषधि बनाने में उपयोगी हैं। वहाँ दुर्लभ रत्न भी मिलते हैं। बहुमूल्य लकड़ी भी वहाँ प्राप्त होती है। हिमालय के क्षेत्र में बहुत से मन्दिर हैं। प्रतिवर्ष भक्त, श्रद्धालु और पर्यटनशील लोग मन्दिरों में अर्चना करते हैं, स्वास्थ्य लाभ भी प्राप्त करते हैं। इस हिमालय का महत्व आध्यात्मिक, पर्यावरण और भारत की रक्षा की दृष्टि से भी है। अतः यह पर्वतराज हिमालय हमारा गौरव है।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) अस्माकं देशस्य उत्तरस्यां दिशि किं नाम पर्वतः अस्ति ?
(हमारे देश की उत्तर दिशा में किस नाम का पर्वत है?)
(ii) हिमालय पर्वत श्रृंखला कीदृशी अस्ति?
(हिमालय पर्वत श्रृंखला कैसी है?)
(iii) भारतदेशस्य मुकुटमिव रक्षकः च कः ?
(भारत देश का मुकुट की तरह और रक्षक कौन है?
(iv) हिमालय कस्य भूमिः ?
(हिमालय किसकी भूमि है ?)
उत्तरम् :
(i) हिमालयः नाम
(ii) विस्तृता
(iii) हिमालयः
(iv) तपोभूमिः

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) काभि दृष्टिभिः हिमालयस्य महत्वम् अस्ति ?
(किन दृष्टियों से हिमालय का महत्व है?)
(ii) जनाः मन्दिरेषु किं कुर्वन्ति ?
(लोग मन्दिरों में क्या करते हैं?)
(ii) हिमालयस्य वातावरणं कीदृश अस्ति?
(हिमालय का वातावरण कैसा है?)
उत्तरम् :
(i) आध्यात्मिक-पर्यावरण-रक्षा दृष्टिभिः हिमालयः महत्वपूर्णः अस्ति।
(अध्यात्म, पर्यावरण-रक्षा की दृष्टि से हिमालय महत्वपूर्ण है।)
(ii) मन्दिरेषु अर्चनां कुर्वन्ति स्वास्थ्य लाभं च प्राप्नुवन्ति ।
(मंदिरों में पूजा करते हैं और स्वास्थ्य- लाभ प्राप्त करते हैं।)
(iii) हिमालयस्य वातावरणं मनोहरं, शान्तं, चित्ताकर्षकं च अस्ति।
(हिमालय का वातावरण मनोहर, शांत और चित्ताकर्षक है।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
पर्वतराज हिमालयः।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
भारतस्य उत्तरस्यां दिशि हिमालयः अस्ति विस्तारात् पर्वतराजः, हिमाच्छादनात् हिमालय सर्वोच्चत्वात् भारतस्य
मुकुटमिव अस्य नद्यः पावनं जलं, वनानि औषधानि यच्छन्ति तीर्थानि पावनं कुर्वति। अनेकेषु देवालयेषुजनाः
स्वइष्टानाम् अर्चनां कुर्वन्ति। स्वास्थ्य एव आध्यात्मिक लाभेन सह भारत रक्षकोऽपि। भारत गौरवस्य प्रतीतोऽयम्।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत- (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘तीर्थानि पावनं कुर्वति’ वाक्ये क्रियापदमस्ति –
(अ) तीर्थानि
(ब) पावन
(स) कुर्वति
(द) पवित्र
उत्तरम् :
(स) कुर्वति

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(ii) ‘श्रृंखला विस्तृता वर्तते’ अत्र विशेषण पदमस्ति?
(अ) श्रृंखला
(ब) विस्तृता
(स) वर्तते
(द) अस्य
उत्तरम् :
(ब) विस्तृता

(iii) ‘अस्य पर्वतस्य’ इत्यत्र ‘अस्य’ सर्वनाम पदं कस्मै प्रयुक्तम्
(अ) हिमालयस्य
(ब) आडावलस्य
(स) ऋष्यमूकस्य
(द) चित्रकूटस्य
उत्तरम् :
(अ) हिमालयस्य

(iv) ‘उद्भवति’ पदस्य पर्यायवाचिपदम् अनुच्छेदे अस्ति
(अ) प्रभवति
(ब) प्राप्यते
(स) प्राप्नुवन्ति
(द) वर्तते
उत्तरम् :
(अ) प्रभवति

16.लालबहादुर शास्त्रि-महोदयस्य नाम को न जानाति? भारतस्य द्वितीयः प्रधानमन्त्री लालबहादुर शास्त्री उत्तरप्रदेशस्य वाराणसी जनपदे जन्म प्राप्तवान्। 1904 तमे ईसवीये वर्षे अक्टूबर मासस्य 2 दिनांक तस्य जन्म अभवत्। तस्य जनकस्य नाम शारदा प्रसादः मातुश्च नाम रामदुलारी आसीत्। बाल्यावस्थायामेव तस्य पितुः देहावसान जातम्। सः वाराणसीस्थे हरिश्चन्द्र विद्यालये, शिक्षा प्राप्तवान्। उच्च शिक्षा तु सः काशी विद्यापीठे गृहीतवान्। महात्मागान्धी महोदयस्य नेतृत्वे सञ्चालिते स्वतन्त्रता आन्दोलने सोऽपि प्रविष्टवान्। वर्षद्वयात्मकं कारावासम् अपि प्राप्तवान्। गुणैः जनतायाः श्रद्धाभाजनम् अभूत्। स्वतन्त्रभारते विविधानि पदानि अलङ्कुर्वन् असौ भारतस्य द्वितीयः प्रधानमन्त्री अभवत्। 1966 तमे ईसवीये वर्षे जनवरीमासस्य। 11 तमे दिनाङ्के तस्य देहावसानं जातम्।

(लालबहादुर शास्त्री महोदय का नाम कौन नहीं जानता। भारत के दूसरे प्रधानमन्त्री लालबहादुर शास्त्री ने उत्तरप्रदेश के वाराणसी जनपद में जन्म लिया। उनका जन्म 2 अक्टूबर सन् 1904 ईसवी वर्ष में हुआ। उनके पिताजी का नाम शारदाप्रसाद और माँ का नाम रामदुलारी था। बचपन में ही उनके पिताजी का देहावसान हो गया। उन्होंने वाराणसी स्थित हरिश्चन्द्र विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की। उच्च शिक्षा उन्होंने काशी विद्यापीठ में ग्रहण की। महात्मा गांधी महोदय के नेतृत्व में संचालित स्वतन्त्रता आन्दोलन में भी वे प्रविष्ट हुए। दो वर्ष का कारावास भी प्राप्त किया। गुणों से जनता के श्रद्धा-पात्र हो गये। स्वतन्त्र भारत में विविध पदों को अलंकृत करते हुए भारत के दूसरे प्रधानमन्त्री हुए। 11 जनवरी सन् 1966 ईस्वी वर्ष में उका देहावसान हो गया।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) भारतस्य द्वितीयः प्रधानमंत्री कः आसीत?
(भारत का द्वितीय प्रधानमंत्री कौन था?)
(ii) लालबहादुर शास्त्रिणः जन्म कदा अभवत्?
(लालबहादुर शास्त्री का जन्म कब हुआ?
(iii) लालबहादुर शास्त्रिणः पितुः नाम किमासीत्?
(लालबहादुर शास्त्री के पिताजी का नाम क्या था?)
(iv) शास्त्रिमहाभागः कस्मिन् जनपदे अजायता?
(शास्त्री जी किस जनपद में पैदा हुए?)
उत्तरम् :
(i) लालबहादुर शास्त्री
(ii) 2 अक्टूबर 1904
(iii) शारदा प्रसादः
(iv) वाराणसी जनपदे।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) लालबहादुर शास्त्रि महाभागः कदा दिवंगतः?
(लाल बहादुर शास्त्री कब दिवंगत हुए?)
(ii) शास्त्रि महाभागः कियत् कालं कारावासे अतिष्ठत्?
(शास्त्री जी कितने दिन कारावास में रहे?)
(iii) शास्त्रि महोदयस्य उच्चशिक्षा कुत्र अभवत्?
(शास्त्री जी की उच्च शिक्षा कहाँ हुई?)
उत्तरम् :
(i) 1966 तमे ईसवीये वर्षे जनवरी मासस्य एकादश दिवसे दिवंगतः।
(ii) सः वर्षद्वयात्मकं कारावासम् प्राप्तवान्।
(iii) शास्त्रि महाभागस्य उच्चशिक्षा काशी विद्यापीठे अभवत्।

प्रश्न 3.
अस्य अनच्छेदस्य उपयक्तं शीर्षकं लिखत। (इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
लालबहादुर शास्त्री महाभागः।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
भारतस्य द्वितीय प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री वाराणसी जनपदे 1904 तमे अक्टूबर मासे द्वितीये दिवसे जन्म लेभे। रामदुलारी शारदा प्रसादयोऽयं सुतः तत्रैव विद्यालयी शिक्षा प्राप्य उच्च शिक्षामसौ काशी विद्यापीठ प्राप्तवान्। स्वातन्त्र्य संग्रामे प्रविश्य सोऽपि वर्षद्वयात्मकं कारावासं प्राप्तवान्। गुणैः जनतायाः श्रद्धाभाजनमभवत्। स्वतन्त्र भारते विविधानि पदानि प्राप्यासौ प्रधनमन्त्री पदमलंकृतवान्। 11-1-1960 तमे देहावसानं जातम्।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘अभूत्’ इति क्रियापदस्य कर्ता अनुच्छेदानुसारमस्ति
(अ) शारदाप्रसादः
(ब) रामदुलारी
(स) लालबहादुर शास्त्री
(द) श्रद्धाभाजनम्
उत्तरम् :
(स) लालबहादुर शास्त्री

(ii) ‘उच्चशिक्षा’ इत्यनयो विशेषण पदमस्ति
(अ) उच्च
(ब) शिक्षा
(स) काशी
(द) विद्यापीठ
उत्तरम् :
(अ) उच्च

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(iii) ‘तस्य जन्म अभवत्’ तस्य सर्वनाम पदस्य स्थाने संज्ञापदं भवेत
(अ) शारदा प्रसादस्य
(ब) रामदुलार्याः
(स) लाल बहादुर शास्त्रिण
(द) भारतस्य
उत्तरम् :
(स) लाल बहादुर शास्त्रिण

(iv) ‘अलभत’ इति क्रियापदस्य पर्यायवाचिपदं अनुच्छेदे अस्ति –
(अ) प्राप्तवान्
(ब) अभवत्
(स) गृहीतवान्
(द) अभूत
उत्तरम् :
(अ) प्राप्तवान्

17. गौः भारतीय-संस्कृतेः प्रधानः पशुः अस्ति। वेदेषु-शास्त्रेषु इतिहासे लोकमान्यतायां च सर्वत्र अस्याः विषये श्रद्धापूर्ण वर्णनं प्राप्यते। भारते गौः माता इव पूज्या भवति। यथा माता स्व-दुग्धेन शिशून् पालयति तथैव गौ अपि दुग्ध धृतादिदानेन अस्माकं शरीरं बुद्धिं च पोषयति। भारतवासिनः जनाः आदरेण श्रद्धया चं गोपालनं कुर्वन्ति। गौः अस्माकं कृते बहु उपयोगिनी अस्ति। सा अस्माकं कृते दुग्धं ददाति। तेन दुग्धेन दधि तक्रं मिष्ठान्नं घृतमादि निर्माय तस्य सेवनेन च वयं स्वस्थाः पुष्टाः भवामः। गावः अस्माकं क्षेत्राणि कर्षन्तिं। येन कृषिकार्यं प्रचलति। तस्य गोमयस्य इन्धनरूपेण प्रयोगः भवति। गोमयस्य, गोमूत्रस्य च उपयोगः औषधिनिर्माणे, सुगन्धवर्तिका निर्माणे, कीटनाशक द्रव्य निर्माणे इत्यादिषु कर्मसु भवति। एवं प्रकारेण गावः मानवानां सर्वदैव उपकारं कुर्वन्ति।

(गाय भारतीय संस्कृति का प्रधान पशु है। वेदों, शास्त्रों, इतिहास और लोकमान्यता में सब जगह इसके विषय में श्रद्धापूर्ण वर्णन प्राप्त होता है। भारत में गाय माता की तरह पूजी जाती है। जैसे माता अपने दूध से शिशुओं को पालती है उसी प्रकार गाय भी दूध-घी आदि देकर हमारे शरीर और बुद्धि का पोषण करती है। भारतवासी लोग आदर और श्रद्धा से गोपालन करते हैं। गाय हमारे लिए बहुत उपयोगी होती है। वह हमारे लिये दूध देती है। उस दूध से दही, छाछ, मिठाई, घी आदि बनाकर उसके सेवन से हम स्वस्थ और पुष्ट होते हैं। गायें (बैल) हमारे खेतों को जोतते हैं जिससे कृषिकार्य चलता है। उसके गोबर का ईंधन के रूप में प्रयोग होता है। गाय के गोबर और मूत्र का उपयोग औषधि निर्माण, अगरबत्ती निर्माण, कीटनाशक निर्माण आदि कार्यों में होता है। इस प्रकार से गायें मानवों का सदैव उपकार करती हैं।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) भारतीय संस्कृतेः प्रधानपशुः कः?
(भारतीय संस्कृति का प्रधानपशु कौन है?)
(ii) भारतं गौः केषु पूज्यते?
(भारत में गौ किसकी तरह पूजी जाती है?)
(iii) गौः अस्माकं कृते किं ददाति?
(गाय हमारे लिए क्या देती है?)
(iv) गावः सर्वत्र कीदृशं वर्णनम् प्राप्यते?
(गाय का सब जगह कैसा वर्णन मिलता है?)
उत्तरम् :
(i) गौः
(ii) मातेव
(iii) दुग्धम्
(iv) श्रद्धापूर्णम्।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) गोमयस्य गोमूत्रस्य च प्रयोगः कुत्र भवति?
(गोबर और गोमूत्र का प्रयोग कहाँ होता है?)
(ii) धेनोः गोमस्य केन रूपेण प्रयोगः भवति?
(गाय के गोबर का किस रूप में प्रयोग होता है?)
(iii) गौः अस्मान् कथं पोषयति? (गाय हमारा पोषण कैसे करती है?)
उत्तरम् :
(i) औषधि निर्माण, सुगन्धवर्तिका निर्माणे, कीटनाशक द्रव्य निर्माणे इत्यादिषु गोमयस्य गोमूत्रस्य च प्रयोगः भवति।
(औषधि-निर्माण, अगरबत्ती निर्माण, कीटनाशक द्रव्य निर्माण इत्यादि में गोमय और गौमूत्र का प्रयोग होता है।)
(i) धेनो गोमयम् इन्धनरूपेण प्रयुज्यते।
(गाय के गोबर का ईंधन के रूप में प्रयोग होता है।)
(iii) यथा माता शिशून स्वदुग्धेन पालयति तथैव गौः दुग्धघृतादि दानेन अस्माकं शरीरं बुद्धिं च पोषयति।
(जैसे माता अपने दूध से बालक को पालती है, उसी प्रकार गाय दूध, घी देकर हमारे शरीर व बुद्धि का पोषण करती है।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
गावः महत्वम् (गाय का महत्व)।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
गौः भारतीय संस्कृतेः प्रधानः पशु। संस्कृत साहित्ये गौः मातेव पूज्या प्रतिष्ठापिता। सा मातेव दुग्धादिभिः पौष्टिक पदार्थैः शिशून् बालान् च पालयति। तस्या दुग्धेन दधि, तक्र, घृतं, नवनीतादयः प्राप्यन्ते। तस्य सेवनेन मानवः हृष्ट-पुष्टश्च भवति। तस्य पञ्चगव्योऽपि औषधिरूपेण हितकरः। गोमयः इंधन रूपेण प्रयुज्यते। धेनो पञ्चगव्यं . पवित्रं, कीटनाशकं, रोगावरोधक पावनं च भवति।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘घृतस्य सेवनेन कः लाभः भवति?’ अत्र भवति क्रियापदस्य कर्ता अस्ति –
(अ) घृतस्य
(ब) सेवनेन
(स) कः
(द) लाभ:
उत्तरम् :
(द) लाभ:

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(ii) ‘पूज्या गौः’ अत्र विशेषणपदमस्ति
(अ) पूज्याः
(ब) गौःर्जा
(स) धेनुः
(द) पूज्याः गौ
उत्तरम् :
(अ) पूज्याः

(iii) ‘सा अस्माकं कृते दुग्धं ददाति’ अत्र ‘सा’ इति सर्वनाम पदं कस्य स्थाने प्रयुक्तम्?
(अ) माता
(ब) गौः
(स) महिषी
(द) अजा
उत्तरम् :
(ब) गौः

(iv) ‘धेनुः’ इति पदस्य स्थाने गद्यांशे किं पदं प्रयुक्तम्?
(अ) गौः
(ब) पशु
(स) माता
(द) गो
उत्तरम् :
(ब) पशु

18. अद्य औद्योगिक विकासात् नगराणां विकासात् च जायते पर्यावरण प्रदूषितम्। अतः अद्य नागरिकाणां कर्त्तव्यमस्ति यद् वयं पर्यावरण संरक्षणार्थ प्रयत्नं कुर्मः तत्कृते वयं स्वच्छतां च धारयामः। महात्मागांधि महोदयस्यापि स्वच्छतोपरि विशेषः आग्रहे आसीत्। साम्प्रतमपि सर्वकारेण ‘स्वच्छ भारताभियानम्’ प्रचालितम्। तस्योद्देश्यमपि पर्यावरणस्य संरक्षण अस्ति। एवमेव नदीतडागवापीनां जलस्य स्वच्छतायाः प्रेरणा वयं ‘नमामि गड़े’ इति अभियानेन ग्रहीतुं शक्नुमः। वयम् अस्मिन् अभियाने सहभागितां च कृत्वा भारतस्य नवस्वरूपं प्रकटीकर्तुं शक्नुमः। एतस्य कृते वयं अवकरस्य समुचितं निस्तारणं कुर्मः। जनान् शौचालय निर्माणाय प्रेरणाय। जलाशयेषु स्वच्छतामाचरामः सार्वजनिक स्थानेषु प्रदूषणं न कुर्मः। प्रदूषणकराणां पदार्थानां प्रयोगं न कुर्मः। जनजागरणे सहायतां कुर्मः।

(आज औद्योगिक और नगरों के विकास से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। अतः आज नागरिकों का कर्त्तव्य है कि हम पर्यावरण-संरक्षण का प्रयत्न करें। उसके लिए हम सफाई रखें। महात्मा गांधी का भी स्वच्छता के ऊपर बहुत आग्रह था। अब भी सरकार द्वारा ‘स्वच्छ भारत’ अभियान चलाया गया है। उसका उद्देश्य भी पर्यावरण का संरक्षण ही है। इसी प्रकार नदी, तालाव, बावड़ियों के जल की स्वच्छता की प्रेरणा हम ‘नमामि गंगे’ अभियान से ले सकते हैं और हम इस अभियान में सहभागिता करके भारत का नया स्वरूप प्रकट कर सकते हैं। इसके लिए हम कूड़े का उचित निस्तारण करें, लोगों को शौचालय निर्माण के लिए प्रेरित करें। जलाशयों में स्वच्छता रखें, सार्वजनिक स्थानों पर प्रदूषण न करें। प्रदूषण करने वाले पदार्थों का प्रयोग न करें। जनजागरण में सहायता करें।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) पर्यावरणस्य संरक्षणार्थं वयं किं धारयामः?
(पर्यावरण के संरक्षण के लिए हम क्या धारण करें?)
(ii) सर्वकारेण किम् अभियान सञ्चालितम् ?
(सरकार द्वारा क्या अभियान चलाया जा रहा है?)
(ii) स्वच्छभारत अभियानस्य किमुद्देश्यम्?
(स्वच्छ भारत अभियान का क्या उद्देश्य है?)
(iv) स्वच्छतायाः प्रेरणा के ग्रहीतुं शक्यते?
(स्वच्छता की प्रेरणा किससे ली जा सकती है?)
उत्तरम् :
(i) स्वच्छताम्
(ii) स्वच्छभारताभियानम्
(ii) पर्यावरणसंरक्षणम्
(iv) ‘नमामि गङ्गे’ इति अभियानात्।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) पर्यावरण प्रदूषणं कस्मात् जायते?
(पर्यावरण प्रदूषण किससे पैदा होता है?)
(ii) नागरिकाणां किं कर्त्तव्यम् अस्ति?
(नागरिकों का क्या कर्त्तव्य है?)
(iii) महात्मागान्धिनः अपि कस्योपरि विशेष आग्रहः आसीत्?
(महात्मा गाँधी का किस पर विशेष आग्रह था?)
उत्तरम् :
(i) औद्योगिक विकासात् नगराणां च विकासात् पर्यावरण प्रदूषणं जायते।
(औद्योगिक विकास से और नगरों के विकास से पर्यावरण प्रदूषण उत्पन्न होता है।)
(ii) नागरिकाणां कर्त्तव्यम् अस्ति पर्यावरण संरक्षणार्थं प्रयत्न कुर्वन्तु ।
(पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रयत्न करना नागरिकों का कर्तव्य है।)
(iii) महात्मागान्धिन स्वच्छतायाः उपरि विशेष आग्रह आसीत्।
(महात्मा गांधी का स्वच्छता के ऊपर विशेष आग्रह था।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
पर्यावरण संरक्षणम्।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
औद्योगिक विकासेन सदैवं पर्यावरण प्रदूषणं वर्धते। पर्यावरण रक्षणं नागरिकानां कर्त्तव्यम् अस्ति। पर्यावरण संरक्षण उद्देश्येन एव स्वच्छता, अभियानमपि सर्वकारेण सञ्चालितम् अस्ति। जलाशयानां जल-संरक्षणम् अपि नमामि गंगेन अभियानेन प्रवर्तते। एतस्य कृते अवकरस्य निस्तारणं करणीयम्। शौचालयानां निर्माण करणीयम्।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘प्रयोग न कुर्मः’ अत्र ‘कुर्मः’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदम् अस्ति –
(अ) प्रदूषणकराणाम्
(ब) पदार्थानाम्
(स) वयम्
(द) प्रयोगम्
उत्तरम् :
(स) वयम्

(ii) ‘स्वच्छभारतम्’ इत्यनयो विशेषणपदम् अस्ति –
(अ) स्वच्छ
(ब) भारतम्
(स) साम्प्रतम्
(द) सर्वकारेण
उत्तरम् :
(अ) स्वच्छ

(iii) ‘तस्योद्देश्यमपि’ अत्र ‘तस्य’ इति सर्वनामपदं कस्य स्थाने प्रयुक्तम्?
(अ) नमामि गङ्गे
(ब) स्वच्छ भारताभियानम्
(स) शौचालय निर्माणम्
(द) अवकर निस्तारणम्।
उत्तरम् :
(ब) स्वच्छ भारताभियानम्

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(iv) ‘अधुना’ इति पदस्य पर्यायवाचिपदं गद्यांशेऽस्ति –
(अ) अद्य
(ब) साम्प्रतम्
(स) आग्रहे
(द) अभियाने
उत्तरम् :
(ब) साम्प्रतम्

19. हृद्यया मनोरमया च रीत्या राज्यधर्मस्य लोकव्यवहारस्य च शिक्षार्थमेव पञ्चतन्त्रं प्रवृत्तम्। विष्णु शर्मणा संस्कृत भाषया लिखिताः पञ्चतन्त्र कथा: जगतः सर्वाधिक भाषासु अनूदिताः सन्ति। विष्णुशर्मा अमरशक्ति नामकस्य नृपस्य त्रीन् पुत्रान् षड्भिः मासै: राजनीतिं शिक्षायितुम् ग्रन्थमिमं रचितवान्। षष्ठ शताब्द्यां लिखितोऽयं ग्रन्थः अतीव लोकप्रियः वर्तते। अस्य कथा: नीतिं शिक्षयन्त्यः मनोरञ्जनमपि कुर्वन्ति पाठकानाम्। पञ्चतन्त्राणां नामानि मित्रभेदः मित्रसम्प्राप्तिः, काकोलूकीयः लब्धप्रणाशः, अपरिक्षित कारकञ्चं सन्ति। पञ्चतन्त्रस्य कथासु पशुपक्ष्यादीनि एव पात्राणि सन्ति तथापि तेषां माध्यमेन सर्वसाधरणोपयोगिनः व्यवहार-ज्ञानस्य मनोहररीत्या अत्र वर्णनं कृतम्।

(हार्दिक और मन को अच्छी लगने वाली रीति से राजधर्म और लोक-व्यवहार की शिक्षा के लिए पंचतन्त्र प्रवृत्त हुआ। विष्णु शर्मा द्वारा संस्कृत भाषा में लिखे गये पंचतन्त्र की कथायें संसार में सबसे अधिक भाषाओं में अनूदित हैं। विष्णु शर्मा ने अमरशक्ति नाम के राजा के तीन पुत्रों को छ: महीने में राजनीति को सिखाने के लिए इस ग्रन्थ को रचा। छटी शताब्दी में लिखा गया यह ग्रन्थ अत्यन्त लोकप्रिय है। इसकी कथाएँ पाठकों की नीति सिखाती हुई मनोरञ्जन भी करती हैं। पंचतन्त्रों के नाम हैं- मित्र भेद, मित्र सम्प्राप्ति, काकोलूकीय, लब्ध प्रणाश तथा अपरीक्षित कारक। पंचतन्त्र की कथाओं में पशु-पक्षी आदि ही पात्र हैं। फिर भी उनके माध्यम से सर्व-साधारण के उपयोगी व्यावहारिक ज्ञान का मनोहर रीति से यहाँ वर्णन किया गया है।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) ‘पञ्चतन्त्रम्’ इति ग्रन्थं केन रचितम्?
(पंचतन्त्र ग्रंथ की रचना किसने की?)
(ii) विष्णुशर्मा कस्य नृपस्य पुत्रान् पाठितवान्?
(विष्णु शर्मा ने किस राजा के पुत्रों को पढ़ाया?)
(iii) पञ्चतन्त्रम् कति तन्त्राणि सन्ति?
(पंचतन्त्र में कितने तन्त्र हैं?)
(iv) अमरशक्तिः नृपस्य कति पुत्रा आसन्?
(अमर शक्ति राजा के कितने पुत्र थे?)
उत्तरम् :
(i) विष्णुशर्माणा
(ii) अमरशक्तेः
(iii) पञ्च
(iv) त्रयः।

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) पञ्चतन्त्राणाम् नामानि लिखत।
(पाँच तन्त्रों के नाम लिखिए।)
(ii) पञ्चतन्त्राणाम् ख्यातिः किं प्रमाणम्?
(पंचतन्त्र की ख्याति का क्या प्रमाण है?)
(ii) पञ्चतन्त्रं कदा लिखितम?
(पंचतंत्र कब लिखा गया?)
उत्तरम् :
(i) मित्रभेदः, मित्र सम्प्राप्तिः, काकोलूकीयः, लब्धप्रणाशः अपरीक्षित कारकञ्चेति पञ्चतन्त्राणां नामानि।
(मित्र सम्प्राप्ति, काकोलूकीयः, लब्ध प्रणाशः और अपरीक्षित कारक ये पाँच तंत्रों के नाम हैं।)
(ii) जगतः सर्वाधिक भाषासु अनूदितः इति अस्य ख्यातिः प्रमाणम्।।
(संसार की अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ, यह इसकी ख्याति का प्रमाण है।)
(iii) पञ्चतन्त्रं नामग्रन्थं षष्ठ शताब्दयां रचितम्।
(पञ्चतन्त्र नामक ग्रंथ छठवीं शताब्दी में रचा गया।)

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत। (इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
पञ्चतन्त्रम्।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
पं. विष्णु शर्मणः संस्कृत भाषया लिखितम् पञ्चतन्त्र-नाम ग्रन्थं बालानां कृते लिखितम्। अस्य कथाः सर्वासु प्रमुखासु भाषासु अनूदिताः। आभिः कथाभिः षड्मासे एक राजनीतिज्ञाः कृताः। अस्य कथाः नीति, राजनीति कूटनीतिं च शिक्षन्ति। अस्य पञ्चतन्त्राणि सन्ति-मित्रभेदः, मित्रसम्प्राप्तिः, काकोलूकीयः लब्ध प्रणाश: अपरीक्षित कारकञ्च। अस्य कथानां पात्राणि प्रायः जन्तवः एव।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत- (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘अनूदिताः सन्ति’ सन्ति क्रियापदस्य कर्तृपदमस्ति
(अ) तन्त्राणि
(ब) कथाः
(स) पात्राणि
(द) भाषासु
उत्तरम् :
(ब) कथाः

(ii) ‘ग्रन्थः अतीव लोकप्रियः वर्तते’ एतेषु पदेषु विशेषणपदम् अस्ति –
(अ) ग्रन्थः
(ब) अतीव
(स) लोकप्रिय
(द) वर्तते
उत्तरम् :
(स) लोकप्रिय

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(iii) ‘अस्य कथाः’ अत्र ‘अस्य’ इति सर्वनामपदं कस्य संज्ञायाः स्थाने प्रयुक्तम्?
(अ) विष्णु शर्मणः
(ब) पञ्चतन्त्रस्य
(स) मित्रभेदस्य
(द) काकोलूकीयस्य
उत्तरम् :
(ब) पञ्चतन्त्रस्य

(iv) ‘संसारस्य’ इति पदस्य अनुच्छेद पर्यायवाचि पदम् अस्ति
(अ) लोक व्यवहारस्य
(ब) जगत:
(स) लोकप्रियः
(द) व्यवहारज्ञानं
उत्तरम् :
ब) जगत:

20. एतद्विज्ञानस्य युगमस्ति। मानव जीवनस्य प्रत्येकस्मिन् क्षेत्रे विज्ञानमस्माकं महदुपकारं करोति। शिक्षाया क्षेत्रे विज्ञानेन महती उन्नतिकृता। मुद्रण यन्त्रेण पुस्तकानि मुद्रितानि भवन्ति। समाचारपत्राणि च प्रकाश्यन्ते। दूरदर्शनमपि शिक्षायाः प्रभावोत्पादकं साधनस्ति। सूचनायाः क्षेत्रे तु अनेन क्रान्तिकारीणि परिवर्तनानि कृतानि। अनेन मनोरञ्जनेन सह देशविदेशानां वृत्तमपि ज्ञायते। सङ्गणकयन्त्रम् आकाशवाणी चापि एवस्मिन् कार्ये सहाय्यौ भवतः। विज्ञानेन अस्माकं यात्रा सुकराभवत्। शकटात् आरभ्य राकेटयानपर्यन्तं सर्वमेव विज्ञानेन एव प्रदत्तम्। भूभागे वयं वाष्पयानादिभिः विविधैः यानैः यथेच्छं भ्रमामः वायुयानेन आकाशे खगवत् विचरामः जलयानेन च जलचरैरिव प्रगाढे सागरे संतरामः। इदानीं तु चन्द्रलोकस्यापि यात्रा अन्तरिक्ष यानेन सम्भवति।

(यह विज्ञान का युग है। मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विज्ञान हमारा महान् उपकार करता है। शिक्षा के क्षेत्र में विज्ञान ने महान उन्नति की है। छापेखाने से अनेकों पुस्तकें छपी हैं और समाचार-पत्र प्रकाशित किये जाते हैं। दूरदर्शन भी शिक्षा का प्रभावी साधन है। सूचना के क्षेत्र में इसने क्रान्तिकारी परिवर्तन किये हैं। इससे मनोरञ्जन के साथ-साथ देश-विदेश के समाचार भी जाने जाते हैं। कम्प्यूटर और आकाशवाणी भी इस विषय में सहायक हुई है। विज्ञान से हमारी यात्रा सरल हो गई है। बैलगाड़ी से लेकर राकेट तक सब कुछ विज्ञान द्वारा ही दिया गया है । धरती के भाग को हम रेलगाड़ी आदि विविध वाहनों से इच्छानुसार भ्रमण करते हैं। वायुयान से आकाश में पक्षी की तरह विचरण करते हैं तथा जलयान से जलचरों की तरह गहरे सागर में तैरते हैं। अब तो चन्द्रलोक की यात्रा भी अन्तरिक्ष यान से सम्भव है।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) कस्य युगमेतत्?
(यह किसका युग है?)
(ii) शिक्षायाः प्रभावोत्पादकं साधनं किमस्ति?
(शिक्षा का प्रभावोत्पादक साधन क्या है?)
(iii) सूचनायाः क्षेत्र केन क्रान्तिकारीणि परिवर्तनानि कृतानि?
(सूचना के क्षेत्र में किसने क्रान्तिकारी परिवर्तन किये हैं?)
(iv) दूरदर्शनेन मनोरञ्जन सह किमन्यत् ज्ञायते?
(दूरदर्शन से मनोरंजन के साथ और क्या जाना जाता है?)
उत्तरम् :
(i) विज्ञानस्य
(ii) दूरदर्शनम्
(iii) दूरदर्शनेन
(iv) देशविदेशानां वृत्तम्।

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प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) विज्ञानेन मानवस्य यात्रा कीदृशी जाता?
(विज्ञान से मानव की यात्रा कैसी हो गई?)
(ii) वृत्तज्ञाने दूरदर्शनस्य के सहायकाः भवन्ति?
(समाचार जानने में दूरदर्शन के सहायक कौन होते हैं?)
(iii) दूरदर्शनम् सूचनायाः क्षेत्रे किं कृतम्?
(दूरदर्शन ने सूचना के क्षेत्र में क्या किया?)
उत्तरम् :
(1) विज्ञानेन मानवस्य यात्रा सुकरा अभवत्।
(विज्ञान से मानव की यात्रा सरल हो गई है।)
(ii) सङ्गणक-आकाशवाणी चापि अस्मिन् वृत्तज्ञाने सहाय्यौ भवतः।
(कंप्यूटर और आकाशवाणी भी समाचार जानने में सहायक होते हैं।)
(iii) सूचनायाः क्षेत्रे तु दूरदर्शनेन क्रान्तिकारीणि परिवर्तनानि कृतानि।
(सूचना के क्षेत्र में तो दूरदर्शन ने क्रांतिकारी परिवर्तन किया है।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
विज्ञानस्य महत्वम् (विज्ञान का महत्व)।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
अस्मिन् युगे विज्ञानस्य महती आवश्यकता वर्तते। शिक्षायाः क्षेत्रे मुद्रण, समाचार पत्राणि, दूरदर्शनं च प्रभावोत्पादकानि च साधनानि सन्ति। सूचना-मनोरञ्जनादिषु कार्येषु, सङ्गणकयन्त्रम् आकाशवाणी च सहाय्यौ भवतः। वाष्पयान, – वायुयान, जलयानादिभि वयं स्थले जले आकाशे च स्वैरं विचरामः। चन्द्रलोकस्यापि यात्रा सम्भवति।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत- (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘सागरे सन्तरामः’ अत्र ‘सन्तरामः’ क्रियाया कर्ता अस्ति –
(अ) वयम्
(ब) वायुयानैः
(स) जलयानैः
(द) चन्द्रयानैः
उत्तरम् :
(अ) वयम्

(ii) ‘महदुपकारकम्’ इत्यनयोः पदयोः विशेषण पदं अस्ति
(अ) महत्
(ब) उपकारकम्
(स) विज्ञानम्
(द) अस्माकम्
उत्तरम् :
(अ) महत्

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(iii) ‘अनेन क्रान्तिकारीणि …..।’ अत्र ‘अनेन’ इति सर्वनाम पदं कस्य स्थाने प्रयुक्तम्?
(अ) विज्ञानेन
(ब) दूरदर्शनेन
(स) आकाशवाण्या
(द) मुद्रणेन
उत्तरम् :
(ब) दूरदर्शनेन

(iv) ‘जले आकाशे च स्वैरं विचरामः” अत्र आकाशे पदस्य पर्यायपदमस्ति
(अ) जले
(ब) नभे
(स) आकाशे
(द) स्वैरं
उत्तरम् :
(ब) नभे

21. एकस्मिन् राज्ये एकः नृपः शासनं करोति स्म। तस्य अङ्गरक्षकः एकः वानरः आसीत्। वानरः स्वामिभक्तः आसीत्। नृपोऽपि तस्मिन् वानरे प्रभूतं विश्वासं करोति स्म। किन्तु वानरः मूर्खः आसीत्। एकदा नृपः सुप्तः आसीत्। वानरः तं व्यजनं करोति स्म। तस्मिन् समये नृपस्य वक्षस्थले एका मक्षिका अतिष्ठत। वानरः वारं-वारं तां मक्षिकाम् अपसारयितुं प्रायतत। परन्तु सा मक्षिका पुनः नृपस्य ग्रीवायाम् उपविशति स्म। मक्षिका दृष्ट्वा वानरः कुपितः अभवत्। मूर्ख वानरः मक्षिकायाः उपरि प्रहारम् अकरोत्। मक्षिका तु ततः उड्डीयते स्म। परञ्च खड्गप्रहारेण नृपस्य ग्रीवाम् अच्छिनत्। तेन नृपस्य मृत्युः अभवत्। अतः मूर्खस्य मित्रता घातिका भवति।

(एक राज्य में एक राजा शासन करता था। उसका अंगरक्षक एक बन्दर था। वानर स्वामिभक्त था। राजा भी उस बन्दर पर बहुत विश्वास करता था। किन्तु वानर मूर्ख था। एक दिन राजा सोया हुआ था। वानर उसे पंखा झुला रहा था। अर्थात् हवा कर रहा था। उसी समय राजा के वक्षस्थल पर एक मक्खी आ बैठी। वानर ने बार-बार उस मक्खी को हटाने (उड़ाने) का प्रयत्न किया। परन्तु वह मक्खी पुनः राजा की गर्दन पर बैठ गई। मक्खी को देखकर वानर नाराज हुआ। मूर्ख वानर ने मक्खी पर प्रहार किया। मक्खी तो वहाँ से उड़ गई परन्तु तलवार के प्रहार से राजा की गर्दन कट गई। उससे राजा की मृत्यु हो गई। अतः मूर्ख की मित्रता घातक होती है।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) नृपस्य अपरक्षकः कः आसीत्?
(राजा का अंगरक्षक कौन था?)
(ii) वानरः कीदशः आसीत् ?
(वानर कैसा था?)
(iii) नृपः कस्मिन् विश्वसिति स्म?
(राजा किस पर विश्वास करता था?)
(iv) एकदा सप्ते नपे वानरः किं करोति स्म?
(एक दिन राजा के सो जाने पर बन्दर क्या कर रहा था?)
उत्तरम् :
(i) वानरः
(ii) स्वामिभक्तः
(iii) वानरे
(iv) व्यजनं करोति

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूर्ण वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) नृपस्य मृत्यु कथम् अभवत्? (राजा की मौत कैसे हो गई?)
(ii) मर्खस्य मित्रता कीदशी भवति? (मर्ख की मित्रता कैसी होती है?)
(iii) वानरः कुपितः कथमभवत्? (वानर नाराज क्यों हो गया?)
उत्तरम् :
(i) मक्षिका नृपस्य ग्रीवायाम् अतिष्ठत। वानरः ते अपसारयितुमैच्छत अतः खड्गेन प्रहारम् अकरोत् नृपः च हतः।
(मक्खी राजा की गर्दन पर बैठी। बन्दर ने उसे हटाने की इच्छा से तलवार से प्रहार किया और राजा मर गया।)
(ii) मूर्खस्य मित्रता घातिका भवति। (मूर्ख की मित्रता घातक होती है।)
(iii) ग्रीवायाम् उपविष्टां मक्षिका दृष्ट्वा वानरः कुपितः अभवत।
(गर्दन पर बैठी मक्खी को देखकर बंदर क्रोधित हो गया ।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
मूर्खस्य मित्रता घातिका।
(मूर्ख की मित्रता घातक है।)

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
कस्यचित् शासकस्य अङ्गरक्षकः वानरः आसीत्। स्वामिभक्त गुणात् सः नृपस्य विश्वासपात्रम् आसीत्, परञ्च सः मूर्खः आसीत्। एकदा नृपः शेते स्म। एका मक्षिका तस्य वक्षे उड्डीयते स्म। वानरः ताम् अपासरत् परञ्च न अपासरत्। सः क्रुद्ध सन् खड्गेन तस्योपरि प्रहारमकरोत् । तेन नृपः हतः ‘मूर्खस्य मैत्री घातिका भवति।’

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत- (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘नृपः शासनं करोति’ अत्रं ‘करोति’ क्रियापदस्य कर्तृपदमस्ति
(अ) वानरः
(ब) नृपः
(स) अङ्गरक्षकः
(द) मक्षिका
उत्तरम् :
(ब) नृपः

(ii) ‘क्रुद्धः वानरः’ अत्र विशेषणपदम् अस्ति –
(अ) क्रुद्धः वानरः
(ब) क्रुद्धः
(स) मर्कटः
(द) वानरः
उत्तरम् :
(द) वानरः

(iii) ‘वानरः तं व्यजनं करोति स्म’ अत्र ‘तम्’ इति सर्वनामपदं कस्य स्थाने प्रयुक्तम्?
(अ) वानरम्
(ब) नृपम्
(स) मक्षिकाम्
(द) ग्रीवाम्
उत्तरम् :
(ब) नृपम्

(iv) ‘जागृतः’ इति पदस्य विलोमपदं अनुच्छेद अस्ति –
(अ) कुपितः
(ब) घातिका
(स) सुप्तः
(द) स्थिता
उत्तरम् :
(स) सुप्तः

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

22. जिवायाः माधुर्यं स्वर्ग प्रापयति, जिह्वायाः कटुता नरके पातयति। एक एव शब्दः जीवनं विभूषयेत्, अन्यः एकः शब्दः जीवनं नाशयेत। एकदा द्वयोः धनिनोः मध्ये विवादः उत्पन्नः जातः। तौ न्यायालयं गतौ। एक धनिकः अचिन्तयत् अहं लक्ष्यं रुप्यकाणि न्यायाधीशाय यच्छामि इति। सः स्यूते लक्ष रुप्यकाणि स्थापयित्वा न्यायाधीशस्य गृहम् गतवान्। न्यायाधीशः तस्य मन्तव्यं ज्ञात्वा क्रुद्धः अभवत्। धनिकः अवदत्-भोः मत् सदृशाः लक्षरुप्यकाणां दातारः दुर्लभा एव।” न्यायाधीशः अवदत् – “लक्षरुप्यकाणां दातारः कदाचित् अन्येऽपि भवेयुः परन्तु लक्ष रुप्यकाणां निराकारः मत्सदृशाः अन्ये विरला एवं अतः कृपया गच्छतु। न्याय स्थानं मलिनं मा कुरु। लज्जितः धनिकः धनस्यूत गृहीत्वा ततः निर्गतः।

(जिह्वा की मधुरता स्वर्ग प्राप्त करा देती है (तो) जिह्वा की कटुता नरक में गिरा सकती है। एक ही शब्द जीवन को विभूषित कर दे (तो) अन्य एक शब्द जीवन को नष्ट कर दे। एक बार दो धनवानों में विवाद हो गया। दोनों न्यायालय में गये। एक धनिक सोचता था- मैं लाख रुपये न्यायाधीश को दे देता हूँ। वह थैले में लाख रुपये रखकर न्यायाधीश के घर गया। न्यायाधीश उसके मन्तव्य को जानकर नाराज हो गया। धनिक बोला- अरे! मेरे समान लाख रुपयों के दाता दुर्लभ ही हैं। न्यायाधीश ने कहा- “लाख रुपयों के दाता कदाचिद् अन्य भी हों परन्तु लाख रुपयों को त्यागने वाले मेरे जैसे अन्य विरले ही होते हैं। अत: कृपया (यहाँ से) चले जाओ। न्याय के स्थान को मलिन (अपवित्र) मत करो।” शर्मिन्दा हुआ धनिक धन का थैला लेकर वहाँ से निकल गया।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) धनिकः धनम् आदाय कस्य गृहं गतवान्?
(धनिक धन लेकर किसके घर गया।)
(ii) कस्याः कटुता नरके पातयति?
(किसका कड़वापन नरक में गिरा देता है?)
(ii) केषां निराकारः विरला एव?
(किसके मना करने वाले विरले ही होते हैं?)
(iv) एक एव शब्दः किं विभूषयेत?
(एक ही शब्द क्या विभूषित कर दे?)
उत्तरम् :
(i) न्यायाधीशस्य
(ii) जिह्वायाः
(iii) लक्षरुप्याकाणाम्
(iv) जीवनम्।

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) कः न्याय स्थानं मलिनं कर्तुम् इच्छति स्म?
(कौन न्याय स्थान को मलिन करना चाहता था?)
(i) न्यायाधीशः किमर्थं क्रुद्धः अभवत्?
(न्यायाधीश क्यों नाराज हुआ?)
(iii) जिहवाया माधय॑स्य कटतायाः च का परिणतिः?
(जिहवा की मधुरता और कट्ता का क्या परिणाम होता है?)
उत्तरम् :
(i) धनिकः एक लक्षम् उत्कोचं दत्त्वा न्यायस्थानं मलिनं कर्तुम् इच्छति स्म।
(धनी एक लाख रुपये रिश्वत देकर न्यायस्थान को मलिन करना चाहता था।)
(ii) न्यायाधीशः धनिकस्य उत्कोच दानस्य मन्तव्यं ज्ञात्वा क्रुद्धेऽभवत्।
(न्यायाधीश धनी के धन दाव के मन्तव्य को जानकर क्रोधित हुआ।)
(iii) जिह्वायाः माधुर्यं स्वर्गं प्रापयति, कटुता च नरके पातयति।
(जिह्वा की मधुरता स्वर्ग प्राप्त कराती है और कटुता नरक।)

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य समुचितं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
जिह्वायाः माधुर्यं स्वर्गं प्रापयति, कटुता च नरके पातयति।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
मनुष्यः मधुरैः वचनैः स्वर्ग कटुभि च नरकं प्राप्नोति। विवदमानौ धनिनौ न्यायालयं गतौ। तयोः एकः धनेन प्रभावितं कर्तुम् ऐच्छत्। अतः स्यूते लक्ष रुप्यकम् अनयत् परन्तु न्यायाधीशः तं श्रुत्वा क्रुद्धोऽभवत् लक्ष रुप्यकाणां च निराकरणम् अकरोत्।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत- (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘कुरु’ क्रियापदस्य कर्तृपदम् अस्ति –
(अ) न्यायाधीशः,
(ब) प्रथमः धनिकः
(स) द्वितीय धनिकः
(द) त्वम्
उत्तरम् :
(द) त्वम्

(ii) ‘लज्जितः’ इति पदं कस्य विशेषणम्?
(अ) प्रथमः धनिकः
(ब) द्वितीयः धनिकः
(स) न्यायाधीशः
(द) अन्यः
उत्तरम् :
(अ) प्रथमः धनिकः

(iii) ‘तौ न्यायालयं गतौ’ इति वाक्ये ‘तौ’ इति पदं काभ्याम् प्रयुक्तम्?
(अ) धनिकाय
(ब) द्वितीय धनिकाय
(स) धनिकाभ्याम्
(द) न्यायाधीशाय
उत्तरम् :
(स) धनिकाभ्याम्

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(iv) ‘अतः कृपया गच्छतु’ अत्र गच्छतु पदस्य विलोमपदं लिखत्। –
(अ) अत्रः
(ब) कृपयाः
(स) आगच्छतु
(द) गम्यताम्
उत्तरम् :
(स) आगच्छतु

23. भारते गुरु-शिष्य-परम्परा प्राचीना वर्तते। गुरोः सन्निधौ अनेके महापुरुषा अभवन्। अस्यां परम्परायाम् एक: प्रमुखः वर्तते समर्थ गुरु रामदास शिववीरयोः। यथा विवेकानन्दः परमहंसस्य आशीर्वादेन स्व जिज्ञासायाः समाधान प्राप्य देशस्य प्रतिष्ठा पुनः स्थापितवान तथैव शिवाजी महाराजः गुरोः सान्निध्ये मार्गदर्शनं प्राप्य स्वराज्यस्य स्थापनां कृतवान्। एतादृशानि अनेकानि उदाहरणानि भारते वर्तन्ते। वयमपि एतानि उदाहरणानि अनुसृत्य जीवने गुरोः महत्वं स्वीकृत्य स्वशिक्षकानां सम्मानं कुर्मः। गुरुं प्रति सम्मान प्रकटयितुं भारते गुरुपूर्णिमोत्सवः शिक्षक दिवसस्य च आयोजनं भवति। यथा विवेकानन्दः विश्वपटले भारतस्य श्रेष्ठतां स्वाचरणेन कृत्यैः ज्ञानेन च स्थापितवान्। सः भारतीय ज्ञानं संस्कृतिं च श्रेष्ठतमां मन्यते स्म। तथैव अनेके महापुरुषाः सन्ति ये विभिन्न प्रकारेण देशस्य गौरवं वर्धितवन्तः।

(भारत में गुरु-शिष्य परम्परा प्राचीन है। गुरु के सान्निध्य में अनेक महापुरुष हो गये, इस परम्परा में एक प्रमुख है समर्थ गुरु रामदास शिवाजी का। जैसे विवेकानन्द ने परमहंस के आशीर्वाद से अपनी जिज्ञासा का समाधान प्राप्त कर देश की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित किया उसी प्रकार शिवाजी महाराज ने गुरु के सान्निध्य में मार्गदर्शन प्राप्त कर स्वराज्य की स्थापना की। इस प्रकार के अनेक उदाहरण भारत में हैं। हम भी इन उदाहरणों का अनुसरण करके जीवन में गुरु के महत्व को स्वीकार कर अपने शिक्षकों का सम्मान करें। गुरु के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए भारत में गुरुपूर्णिमा उत्सव और शिक्षक दिवस का आयोजन होता है। जिस प्रकार विवेकानन्द ने विश्वपटल पर भारत की श्रेष्ठता अपने आचरण, कृत्यों और ज्ञान से स्थापित की। वह भारतीय ज्ञान और संस्कृति को श्रेष्ठतम मानते थे। उसी प्रकार अनेक महापुरुष हैं, जिन्होंने विभिन्न प्रकार से देश के गौरव को बढ़ाया।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) गुरो सन्निधौ जनाः के अभवन्? (गुरु के सान्निध्य में लोग क्या हो गये?)
(ii) शिववीरस्य गुरोः किन्नाम आसीत्? (शिवाजी के गुरु का क्या नाम था?)
(iii) विवेकानन्दः कस्य शिष्यः आसीत्? (विवेकानंद किसके शिष्य थे?)
(iv) भारतीय संस्कृति कः श्रेष्ठतमा मन्यते स्म? (भारतीय संस्कृति को श्रेष्ठतम किसने माना?)
उत्तरम् :
(i) महापुरुषाः
(ii) समर्थगुरु रामदास
(ii) रामकृष्ण परमहंसस्य
(iv) विवेकानन्द।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) विवेकानन्दः किं स्थापितवान्?
(विवेकानन्द ने क्या स्थापित किया?)
(ii) गुरु-शिष्य सम्मान प्रकटयितुं के महोत्सवाः आयोज्यन्ते?
(गुरु-शिष्य सम्मान प्रकट करने के लिए कौन से महोत्सव आयोजित किए जाते हैं?)
(ii) शिवाजी: गुरोः सान्निध्ये मार्गदर्शन प्राप्य किम् अकरोत?
(शिवाजी ने गुरु के सान्निध्य में मार्गदर्शन पाकर क्या किया?)
उत्तरम :
(i) देशस्य प्रतिष्ठा पुनः स्थापितवान्। (देश की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित की।)
(ii) गुरु-शिष्य सम्मान प्रकटयितुं गुरुपूर्णिमा च शिक्षक दिवसयोः आयोजनं क्रियते।
(गुरु-शिष्य सम्मान प्रकट करने के लिए गुरुपूर्णिमा और शिक्षक दिवस का आयोजन किया जाता है।)
(iii) स्वराज्यस्य स्थापनाम् अकरोत्। (स्वराज की स्थापना की।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य समुचितं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
गुरु-शिष्य परम्परा/गुरोः महत्वम्।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
भारते गुरु-शिष्य परम्परा प्राचीना अस्ति। अनेके गुरु-शिष्याः अभवन्। ये भारतस्य नाम-प्रतिष्ठाम् अकुर्वन्
यथा – समर्थ गुरु रामदासः परमहंसश्च स्वाशीर्वादेन शिवराजं विवेकानन्दं च शिखरमगमयगताम्। एकानि अनेकानि उदाहरणानि सन्ति गुरुपूर्णिमादिषु अनेकेषु पर्वसु एवः परंपरा शिष्यैः वर्ध्यते। अस्माभिः अपि प्रवर्धनीया।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत- (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘कृतवान्’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदमस्ति
(अ) समर्थ गुरु रामदासः
(ब) रामकृष्ण परमहंस
(स) शिवाजी
(द) अहम्
उत्तरम् :
(स) शिवाजी

(ii) ‘परम्परा प्राचीना वर्तते’ एतेषु पदेषु विशेषणम् अस्ति
(अ) परम्परा
(ब) प्राचीना
(स) वर्तते
(द) भारते
उत्तरम् :
(ब) प्राचीना

(iii) ‘ज्ञातुमिच्छायाः’ इति पदस्य स्थाने अनुच्छेदे पदं प्रयुक्तम् –
(अ) सन्निधौ
(ब) परम्परा
(स) जिज्ञासायाः
(द) अनुसृत्य
उत्तरम् :
(स) जिज्ञासायाः

(iv) ‘नवीना’ इति पदस्य विलोमपदम् अस्ति –
(अ) परम्परा
(ब) प्रमुखा
(स) प्राचीना
(द) भारतीया
उत्तरम् :
(अ) परम्परा

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

24. अद्य स्वस्थं स्वच्छं पर्यावरणस्य आवश्यकता वर्तते। पर्यावरणस्य रक्षा धर्मसम्मतमेव अस्ति। इति अस्माकं ऋषयः प्रतिपादितवन्तः। आवश्यकं वर्तते यद् वयं स्वजीवनं सन्तुलितं कुर्मः। प्रकृतेः संसाधनानां संरक्षणं कुर्मः। अपशिष्ट पदार्थानामवकरस्य वा निक्षेपण सावधानेन कुर्मः। अद्य प्रदूषणाद् निवारणार्थ सर्वकारेण महान्तः प्रयासाः क्रियन्ते। तेषु प्रयासेषु वयमपि सहभागिने: भवाम। अधिकाधिक वृक्षारोपणं तेषां संरक्षणंचं कुर्मः। प्राकृतिक जलस्रोतानां सुरक्षां कुर्मः। अनेन एव सौरोर्जायाः वायूर्जायाः च उपयोगं कुर्मः। सर्वत्र स्वच्छता च पालयामः। जीवमात्रस्य संरक्षणं कुर्मः। नदीतडागवापीना च स्वच्छतां स्थापयामः। ध्वनि विस्तारकयंत्राणां उपयोगं अवरोधयामः। पर्यावरणस्य महत्वमावश्यकतां च संस्मृत्य सर्वे वयं तस्य संरक्षणाय प्रयत्नं करिष्यामः। तर्हि विश्वः सुखी-सम्पन्नश्च भविष्यति। तदैव अस्माकं ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।’ कामना सफला भविष्यति।

(आज स्वस्थ और स्वच्छ पर्यावरण की आवश्यकता है। पर्यावरण की रक्षा धर्मसम्मत है। ऐसा हमारे ऋषियों ने प्रतिपादन किया है। आवश्यक है कि हम अपना जीवन सन्तुलित करें। प्रकृति के संसाधनों का संरक्षण करें। उच्छिष्ट पदार्थों अथवा कूड़े-करकट को सावधानी से फेंकें (डालें)। आज प्रदूषण के निवारण के लिए सरकार ने महान प्रयास किए हैं। उन प्रयासों में हम सभी सहयोगी हों। अधिकाधिक वृक्षों का आरोपण तथा संरक्षण करें। प्राकृतिक जलस्रोतों की सुरक्षा करें। इससे इस प्रकार सौर ऊर्जा और वायु ऊर्जा का उपयोग करें। सर्वत्र स्वच्छता का पालन करें। जीवमात्र का संरक्षण करें। नदी-तालाब और वावड़ियों में सफाई स्थापित करें। ध्वनि विस्तारक यन्त्रों का प्रयोग रोकें। पर्यावरण का महत्व और आवश्यकता के महत्व को याद कर हम सभी उसकी सुरक्षा के लिए प्रयत्न करेंगे तो विश्व सुखी और समृद्ध होगा। तभी हमारा ‘सभी सुखी हों और नीरोग हों।’ की कामना सफल होगी।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) अद्य कीदृशस्य पर्यावरणस्य आवश्यकता वर्तते?
(आज कैसे पर्यावरण की आवश्यकता है?)
(ii) ‘पर्यावरणस्य रक्षा धर्मसम्मतमेक’ इति के प्रतिपादयन्ति।’
(‘पर्यावरण की रक्षा धर्मसम्मत ही है’ यह किसने प्रतिपादित किया है?)
(iii) कस्य ऊर्जायाः प्रयोगः कर्तव्यः?
(किस ऊर्जा का प्रयोग करना चाहिए?)
(iv) वयं स्वजीवनं कीदृशं कुर्मः?
(हम अ जीवन कैसा करें?)
उत्तरम् :
(i) स्वस्थं-स्वच्छं
(ii) ऋषयः
(iii) सौरोर्जायाः वायूर्जायाः च
(iv) सन्तुलितम्।

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) अद्य कस्य आवश्यकता वर्तते?
(आज किसकी आवश्यकता है?)
(ii) जीवनस्य आवश्यकं किं वर्तते?
(जीवन के लिए आवश्यक क्या है?)
(ii) पर्यावरण-प्रदूषण-निवारणाय मानवेन किं करणीयम्? एकं कार्यं लिखत।
(पर्यावरण प्रदूषण निवारण के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिए? एक कार्य लिखिये।)
उत्तरम् :
(i) अद्य स्वस्थं-स्वच्छं पर्यावरणस्य आवश्यकता वर्तते।
(आज स्वस्थ और स्वच्छ पर्यावरण की आवश्यकता है।)
(ii) आवश्यकं वर्तते यद् वयं स्व-जीवनं सन्तुलितं कुर्मः।
(आवश्यकता है कि हम अपने जीवन को संतुलित करें।)
(iii) अधिकाधिक वृक्षारोपण तेषां संरक्षणं च मानवेन करणीयम्।
(अधिकाधिक वृक्षारोपण, उनका संरक्षण मनुष्यों को करना चाहिए।)

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
पर्यावरणम्।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
पर्यावरण रक्षणं धर्मसम्मतम्। प्रकृते रक्षणं अपशिष्टस्य अपसारणं वृक्षारोपणं च करणीयाः कार्याः। जल-स्वच्छता पर्यावरण संरक्षणम् अस्माभि अवश्यमेव करणीयम्। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया इति इच्छा स्वस्थ पर्यावरणेन एक सम्भाव्या अस्ति।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत- (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) वयम् सहभागिनः भवामः प्रयासेषु। अत्र ‘भवामः’ क्रियापदस्य कर्तृपदम् अस्ति
(अ) वयम्
(ब) सहभागिनः
(स) भवामः
(द) प्रयासेषु।
उत्तरम् :
(अ) वयम्

(ii) ‘स्वच्छ पर्यावरणम्’ अत्र किं पदं विशेष्यम्
(अ) स्वच्छ
(ब) पर्यावरणम्
(स) स्वच्छपर्यावरणम्
(द) अन्यत्
उत्तरम् :
(ब) पर्यावरणम्

(iii) ‘सर्वे भवन्त सखिनः’ अत्र ‘सर्वे’ कस्य पदस्य सर्वनामपदम वर्तते –
(अ) भवन्तु
(ब) सुखिन्
(स) प्राणिनाम्
(द) वृक्षानाम्
उत्तरम् :
(स) प्राणिनाम्

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(iv) ‘दुःखिनः’ इति पदस्य अनुच्छेदात् विलोम पदं लिखत
(अ) सन्तुलितं
(ब) सुखिनः
(स) सहभागिनः
(द) सम्पन्ना
उत्तरम् :
(ब) सुखिनः

25. अस्त्युज्जयिन्यां माधवो नाम विप्रः। एकदा तस्य भार्या स्वबालापत्यस्य रक्षार्थं तमवस्थाप्य स्नातुं गता। अथ ब्राह्मणो राज्ञा श्राद्धार्थे निमन्त्रितः। ब्राह्मणस्तु सहजदारिद्रयात् अचिन्तयत्-यदि सरवरं न गच्छामि तदान्यः कश्चित् श्राद्धार्थं वृतो भवेत्। परन्तु बालकस्य अत्र रक्षको नास्ति। तत् किं करोमि? भवतु चिरकाल पालितम् इयं पुत्रविशेष नकुलं बाल रक्षायां व्यवस्थाप्य गच्छामि। तथा कृत्वा सः गतः। ततः तेन नकुलेन बालसमीपम् उपसर्पन कृष्ण सर्पो दृष्टः। स तं व्यापाद्य खण्डशः कृतवान्। अत्रान्तरे ब्राह्मणोऽपि श्राद्धं कृत्वा गृहमुपावृतः ब्राह्मणं दृष्ट्वा नकुलो रक्त विलिप्त मुखपादः तच्चरणयोः अलुठत्। विप्रस्तथाविधं तं दृष्ट्वा बालकोऽनेन खादित इति अवधार्य कोपात् नकुलं व्यापादितवान्। अनन्तरं यावत उपसृत्यापत्यं पश्यति तावत् बालकः सर्पश्च व्यापादितः तिष्ठति। ततः तमोपकारकं नकुलं मृतं निरीक्ष्य आत्मानं मुषितं मन्यमानः ब्राह्मण परम विषादमगमत्।

(उज्जयिनी में एक माधव नाम का ब्राह्मण था। एक दिन इसकी पत्नी अपने छोटे बच्चे की रक्षा के लिए उसे रखकर स्नान करने चली गई। इसके बाद ब्राह्मण राजा द्वारा श्राद्ध के लिए निमन्त्रित कर लिया गया। ब्राह्मण स्वाभाविक रूप से दरिद्री होने के कारण सोचने लगा- यदि मैं जल्दी नहीं जाता हूँ तो दूसरा कोई श्राद्ध को ले जायेगा। परन्तु यहाँ बालक का कोई रक्षक नहीं है। तो क्या करूँ । खैर बहुत समय से पाले हुए इस. विशेष नेवला को बच्चे की रक्षा के लिए रखकर जाता हूँ। ऐसा ही करके वह गया। तब उस नेवले ने बालक के समीप रेंगता हुआ एक काला साँप देखा।

उस (नेवले) ने उसको मार कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया। इसके बाद ब्राह्मण भी श्राद्ध करके घर आ गया। ब्राह्मण को देखकर खून से लथपथ मुख वाला नेवला उसके पैरों में लोटने लगा। ब्राह्मण ने इस प्रकार के उसको देखकर ‘बालक को इसने खा लिया है।’ ऐसा समझकर क्रोध के कारण नेवले को मार दिया। इसके पश्चात् जब पास जाकर बालक को देखता है तो बालक अच्छी तरह तथा सर्प मरा हुआ पड़ा है। तब उस उपकार करने वाले नेवले को मरा हुआ देखकर अपने को ठगा मानता हुआ ब्राह्मण बहुत दुखी हुआ।

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) उज्जयिन्यां किन्नाम विप्रः अस्ति?
(उज्जयिनी में किस नाम का विप्र है?)
(ii) एकदा तस्य भार्या कुत्र अगच्छत्?
(एक दिन उसकी पत्नी कहाँ गई?)
(iii) ‘नकुल रक्षायां व्यवस्थाप्य माधवः कुत्र अगच्छत्?
(नेवले को रक्षा व्यवस्था में छोड़कर माधव कहाँ गया?)
(iv) नकुलेन बालकस्य समीपे किं दृष्टम्?
(नेवले ने बच्चे के पास क्या देखा?)
उत्तरम् :
(i) माधवः
(ii) स्नातुम्
(iii) श्राद्धाय
(iv) कृष्णसर्पम्।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) “राज्ञः निमन्त्रणं प्राप्य किम् अचिन्तयत्?
(राजा के निमन्त्रण को पाकर ब्राह्मण ने क्या सोचा?)
(ii) माधवः बालकस्य रक्षायां के व्यवस्थापयत्?
(माधव ने बालक की रक्षा-व्यवस्था में किसको रखा?)
(iii) उपसर्पन कृष्णसर्पम् दृष्ट्वा नकुलः किमकरोत्?
(रेंगते साँप को देखकर नेवले ने क्या किया?)
उत्तरम् :
(i) यदि सत्वरं न गच्छामि तदन्यः कश्चित् श्राद्धाय व्रतो भवेत्।
(यदि जल्दी नहीं जाता हूँ, तो कोई और श्राद्ध को ले जाएगा।)
(ii) माधवः बालकस्य रक्षायां नकुलं व्यवस्थापयत्।
(माधव ने बालक की रक्षा में नकुल की व्यवस्था की।)
(iii) नकुलेन कृष्ण सर्पः व्यापाद्य खण्डशः कृतः।
(नेवले ने काले साँप को मारकर टुकड़े-टुकड़े कर दिया।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत। (इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
अविवेकं परमापदा/सहसा विदधीत न क्रियाम्।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
विप्रस्य भार्या नकुलं पुत्रस्य रक्षार्थं नियुज्य जलाशये स्नातुम् अगच्छत् तदैव सः राज्ञा निमन्त्रितः श्राद्धाय अगच्छत्। सः नकुलं बालके रक्षितुं नियुज्य अगच्छत्। तदैव एकः सर्पः तत्रागतः। नकुलेन सर्पः हतः द्वारे च अगच्छत्। भार्या नकुलम् अपश्यत् बालकस्य हन्तारं च ज्ञात्वा तम् अहनत्। बालकस्य समीपे गते सा अपश्यत् यत् तम नकुलेन हतः एक: सर्पः आसीत्। सा सर्वम् अजानत् यत् तेन अज्ञानात् नकुलः हतः। बालकः तत्र सुरक्षितः आसीत्।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘ब्राह्मणः परम विषादम् अगमत्’ अत्र ‘अगमत्’ क्रियायाः कर्तपदम् अस्ति –
(अ) बालकः
(ब) नकुलः
(स) सर्पः
(द) ब्राह्मण (माधव:)
उत्तरम् :
(अ) बालकः

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(ii) तमुपकारकम् नकुलम् अयं किं विशेषण पदम्?
(अ) माधवम्
(ब) सर्पम्
(स) नकुलम्
(द) भार्याम्
उत्तरम् :
(स) नकुलम्

(iii) ‘तथा कृत्वा सः गत:’ अत्र ‘सः’ इति सर्वनाम पदं कस्मै प्रयुक्तम्?
(अ) माधवाय
(ब) बालाय
(स) नकुलाय
(द) सर्पाय
उत्तरम् :
(अ) माधवाय

(iv) ‘पुत्रस्य’ इति पदस्य पर्यायपदमस्ति –
(अ) आत्मजस्य
(ब) अपत्यस्य
(स) बालस्य
(द) बालकस्य
उत्तरम् :
(ब) अपत्यस्य

26. देशाटनं मानवायं अतिहितकरम्। देशाटनस्य बहवः गुणाः भवन्ति। नानादेशजलवायु प्रभावेण अस्माकं स्वास्थ्य लाभः भवति। देशान्तर कला कौशल-ज्ञानेन वयं स्वदेशमपि कला कौशल सम्पन्नं कुर्मः अधिकोन्नतस्य देशस्य नागरिकाः प्रायः पर्यटनप्रिया भवन्ति। ब्रिटिश शासनकाले शासकाः भारतीयानाम् देशाटनरुविं नोत्साहयन्ति स्म। भारतीयाश्च प्रेरणां बिना न किमपि कुर्वन्ति इति सर्वविदितम्। परमधुना न वयं परतन्त्राः, अतः शासकानामेतत् कर्तव्यमापद्यते यत्रे भारतीयानां देशाटनं प्रति अभिरुचिं प्रोत्साहयेयुः। अधुना बहवः भारतीयाश्छात्रा अमरीका इङ्गलैण्ड, रूस प्रभृति देशेषु विविध कला कौशल ज्ञानार्जनाय गताः सन्ति। स्वदेशमागत्य ते स्वोपार्जितज्ञानेन स्वदेशामवश्यमेव उन्नमयिष्यन्ति इति जानीमः।

(देशाटन मनुष्य के लिए अति हितकर होता है। देशाटन के बहुत से गुण होते हैं। विविध देशों की जलवायु के प्रभाव से हमें स्वास्थ्य लाभ हो गया है। दूसरे देशों के कला-कौशल के ज्ञान से हम अपने देश को भी कला-कौशल से सम्पन्न करते हैं। अधिक उन्नत देश के नागरिक प्रायः पर्यटन प्रिय होते हैं। अंग्रेजी शासन काल में शासकों ने भारतीयों की देशाटन रुचि को उत्साहित नहीं किया और भारतीय बिना प्रेरणा के कुछ नहीं करते हैं, यह सर्वविदित है। लेकिन अब हम परतन्त्र नहीं हैं। अतः शासकों का यह कर्तव्य हो जाता है कि वे भारतीयों की देशाटन के प्रति अभिरुचि को प्रोत्साहित करें। आजकल बहुत से भारतीय छात्र अमेरिका, इंग्लैण्ड, रूस आदि देशों में विविध कला-कौशल ज्ञानार्जन के लिए गये हुए हैं। अपने देश में आकर वे अपने उपार्जित ज्ञान से अपने देश को अवश्य उन्नत करेंगे, ऐसा हम जानते हैं।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) कस्य बहवः गुणाः भवन्ति?
(किसके बहुत से गुण होते हैं?)
(ii) अधिकोन्नतस्य देशस्य नागरिकाः कीदृशाः भवन्ति?
(अधिक उन्नत देश के नगारिक कैसे होते हैं?)
(ii) भारतीयाः कां विना न किमपि कुर्वन्ति?
(भारतीय किसके बिना कुछ नहीं कर सकते?)
(iv) कदा शासकाः भारतीयानां देशाटन रुचिं नोत्साहन्ति स्म?
(कब शासक भारतीयों की देशाटन की रुचि को उत्साहित नहीं करते थे?)
उत्तरम् :
(i) देशाटनस्य
(ii) पर्यटनप्रियाः
(iii) प्रेरणाम्
(iv) ब्रिटिशशासनकाले।

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प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) अस्माकं स्वास्थ्य लाभ: केन भवति?
(हमारा स्वास्थय लाभ किससे होता है?)
(ii) देशान्तरकला कौशल ज्ञाननेन वयं कि कुर्मः?
(दूसरे देश के कला-कौशल के ज्ञान से हम क्या करें?)
(iii) अद्य शासकानां किं कर्त्तव्यम् आपद्यते?
(आज शासकों का क्या कर्त्तव्य आ पड़ा है?)
उत्तरम् :
(i) नानादेश जलवायु प्रभावेण अस्माकं लाभो भवति।
(अनेक देश की जलवायु के प्रभाव से हमको लाभ होता है।)
(ii) वयं स्वदेशमपि कला-कौशल सम्पन्नं कुर्मः।
(हम अपने देश को भी कला-कौशल से संपन्न करें।)
(iii) यत्रे भारतीयानां देशाटनं प्रत्यभि रुचिं प्रोत्साहयेयुः।
(यहाँ भारतीयों की देशाटन के प्रति रुचि को प्रोत्साहित करें।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
देशाटनस्य महत्वम्।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
देशाटनेन मनुष्यः स्वास्थ्य लाभ, ज्ञान लाभं, व्यवहार, कलाकौशलं च प्राप्य स्वदेशं च वर्धयति। यदा वयं परतन्त्राः आसन् तदा देशाटनाय रुचिः नासीत् परञ्च इदानीं तु वयं स्वाधीना स्मः अतएव अनेके भारतीयाः छात्रा अध्येतुम् अन्य देशान् गच्छन्ति तथा ज्ञान, कला, संस्कृति च ज्ञात्वा स्वदेशं संवर्धयन्ति।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘नागरिकाः प्रायः पर्यटनप्रियाः भवन्ति’ अत्र ‘भवन्ति’ क्रियापदस्य कर्तृपदमस्ति –
(अ). नागरिकाः
(ब) प्रायः
(स) पर्यटन
(द) प्रियाः
उत्तरम् :
(अ). नागरिकाः

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(ii) ‘अनेक’ जनाः अत्र विशेषणपदमस्ति –
(अ) बहवः
(ब) प्रायः
(स) जनाः
(द) विना।
उत्तरम् :
(स) जनाः

(iii) ‘ते अध्येतुम् गच्छन्ति’ अत्र ‘ते’ सर्वनामपदस्य संज्ञापद भवति –
(अ) तेन
(ब) अध्येतुम्
(स) गच्छन्ति
(द) छात्रा
उत्तरम् :
(द) छात्रा

(iv) ‘स्वतन्त्रता’ इति पदस्य विलोमार्थक पदम् अस्ति –
(अ) परतन्त्राः
(ब) देशान्तरम्
(स) शासकाः
(द) भारतीयाः
उत्तरम् :
(अ) परतन्त्राः

27. आतङ्कवादः आधुनिक विश्वस्य गुरुतमा समस्या अस्ति। संसारस्य प्रत्येकं देशः आतङ्कवादेन येन केन प्रकारेण पीडितः अस्ति। आतङ्कवादः विनाशस्य सा लीला या विश्वं ग्रसितुं तत्परा अस्ति। आतङ्कवादेन विश्वस्य अनेकानि क्षेत्राणि रक्तविलिप्तानि सन्ति। अनेन अनेके निर्दोषाः जनाः प्राणान् अत्यजन्। महिलाः विधवाः जाताः। बालाश्च अनाथाः अभवन्। सर्वशक्तिमान् अमेरिकादेशोऽपि अनेन सन्तप्तः अस्ति। भारतदेशस्तु आतङ्कवादेन्य अनेकैः वर्षेः पीड़ितः वर्तते। आतलवादस्य राक्षसस्य विनाशाय मिलित्वा एव प्रयत्नाः समाधेयां: अन्यथा एषा समस्या सुरसा मुखम् इव प्रतिदिनं वृद्धिं पास्यति।

(आतङ्कवाद आधुनिक विश्व की सबसे बड़ी समस्या है। संसार का प्रत्येक देश आतङ्कवाद से जिस किसी भी प्रकार से पीड़ित है। आतङ्कवाद विनाश की वह लीला है जो संसार को ग्रसित करने के लिए तत्पर है। आतङ्कवाद से संसार के अनेक क्षेत्र रक्त से लथपथ हैं। इससे अनेक निर्दोष लोगों ने प्राणों को त्याग दिया। महिलाएं विधवा हो गई । बच्चे अनाथ हो गये। सर्वशक्तिमान अमेरिका देश भी इससे सन्तप्त है। भारत देश तो आतङ्कवाद से अनेकों वर्षों से पीड़ित है। आतवाद में तो वे ही लोग सम्मिलित हैं जो स्वार्थपूर्ति करना चाहते हैं और संसार में अशान्त वातावरण देखना चाहते हैं। शान्तिप्रिय देशों द्वारा आतङ्कवाद के असुर के विनाश करने के लिए मिलकर प्रयत्न करना चाहिए, अन्यथा यह समस्या सुरसा के मुख की तरह से प्रतिदिन बढ़ती जायेगी।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) आधुनिक विश्वस्य गुरुतमा समस्या का?
(आधुनिक विश्व की सबसे बड़ी समस्या क्या है?)
(i) आतङ्कवादस्य प्रमुख कारणं किम् उक्तम्?
(आतंकवाद का प्रमुख कारण क्या कहा गया है?)
(iii) आतङ्कवादः किमिव प्रतिदिनं बुद्धिं यास्यति?
(आतंकवाद किसकी तरह प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त होगा?)
(iv) अनुच्छेदे कः देशः सर्वशक्तिमान् इति उक्तः?
(अनुच्छेद में किस देश को सर्वशक्तिमान् कहा गया है?)
उत्तरम् :
(i) आतङ्कवादः
(ii) स्वार्थः
(iii) सुरसामुखमिव
(iv) अमेरिकादेशः।

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प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) आतङ्कवादः कीदृशी लीला अस्ति?
(आतङ्कवाद कैसी लीला है?)
(ii) शान्तिप्रियैः देशैः आतङ्कवादस्य समस्या समाधानुं किं कर्त्तव्यम्?
(शान्तिप्रिय देशों को आतंकवाद की समस्या के समाधान के लिए क्या करना चाहिए?)
(iii) आतङ्कवादे के जनाः सम्मिलिताः भवन्ति?
(आतंकवाद में कौन लोग सम्मिलित होते हैं?)
उत्तरम् :
(i) आतङ्कवादः विनाशस्य लीला या विश्वं ग्रसितुं तत्परा अस्ति।
(ii) सर्वेः मिलित्वा एव प्रयत्नाः समाधेयाः।
(iii) आतङ्कवादे तु एव जनाः सम्मिलिताः, ये स्वार्थपूर्ति कर्तुम् इच्छन्ति, संसारे च अशान्तेः वातावरणं द्रष्टुम् इच्छन्ति।

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य समुचितं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
आतङ्कवादः।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
आतङ्कवादेन प्रत्येकं देशः पीडितः। आतङ्कवादः विनाश लीलां कुर्वन् रक्तविलिप्तानि करोति। निर्दोष जनाः निष्प्राणाः भवन्ति। समर्थैः देशैः एषा समस्या समाधेया। एषः सुरसा-मुखमेव प्रतिदिनं वर्धते एव।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘ये स्वार्थपूर्तिम् इच्छन्ति’ अत्र ‘इच्छन्ति’ क्रियापदस्य कर्तृपदमस्ति –
(अ) अनेके
(ब) ये
(स) निर्दोषाः
(द) अनाथाः
उत्तरम् :
(ब) ये

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(ii) विश्वस्य गुरुतरा समस्या अस्ति। अत्र ‘गुरुतमा’ इति पदं कस्य पदस्य विशेषणम्?
(अ) विश्वस्य
(ब) समस्यायाः
(स) अस्ति
(द) गुरु
उत्तरम् :
(ब) समस्यायाः

(ii) ‘अनेन सन्तप्तः अस्ति’ अत्र अनेन सर्वनाम पदं कस्मै प्रयुक्तम् –
(अ) विनाशेन
(ब) आतङ्वादेन
(स) समस्यया
(द) पीडिता
उत्तरम् :
(स) समस्यया

(iv) ‘लघुतमा’ इति पदस्य विलोमपदं गद्यांशेऽस्ति –
(अ) गुरुतमा
(ब) समस्या
(स) तत्परा
(द) अन्यथा
उत्तरम् :
(अ) गुरुतमा

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28. दीपावली अस्माकं राष्ट्रियोत्सवः वर्तते। अस्मिन् उत्सवे सर्वेजनाः परस्परं भेदभावं विस्मृत्य आनन्दमग्नाः भवन्ति। त्रेतायुगे कैकेय्याः वरयाचनात् अयोध्यायाः राज्ञा दशरथेन रामाय चतुर्दशानां वर्षाणां वनवासः प्रदत्तः। श्रीरामः अस्मिन्नेव दिवसे सीतालक्ष्मणाभ्यां सह अयोध्या प्रत्यावर्तितवान्। तान् स्वागतं व्याहतम् अयोध्यावासिनः नगरे सर्वत्र दीपा प्रज्वलितवन्तः। तदा आरभ्य अधावधि प्रतिवर्ष कार्तिक मासे अमावस्यायां तिथौ भारते दीपावली महोत्सवः महता उत्साहेन आयोजितः भवति। दीपावल्या जनाः गृहाणि परिष्कर्वन्ति। अस्मिन्नवसरे ते स्वमित्रेभ्यः बन्धुभ्यश्च उपहारान् यच्छन्ति, परस्परम् अभिनन्दन्ति च। बालकेभ्यः मिष्ठान्नं यच्छन्ति । सर्वेजनाः लक्ष्मी-गणेशयोः पूजनं कुर्वन्ति। पितरः स्व सन्ततिभ्य स्फोटकानि ददति। अस्मिन् महोत्सवे सर्वे सर्वेभ्यः सुखाय समृखये च शुभेच्छाः प्रकटयन्ति।

(दीपावली हमारा राष्ट्रीय उत्सव है। इस उत्सव में सभी लोग आपस में भेदभाव भूलकर आननदमग्न हो जाते हैं। त्रेतायुग में कैकेई के वर माँगने के कारण अयोध्या के राजा दशरथ ने राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास दिया। श्रीराम इसी दिन सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या वापिस लौटे थे। उनका स्वागत करने के लिए अयोध्यावासियों ने सब जगह दीप जलाये। तभी से लेकर आज तक प्रत्येक वर्ष कार्तिक माह में अमावस्या को भारत में दीपावली महोत्सव महान् उत्साह के साथ आयोजित होता है। दीपावली पर लोग घरों की सफाई करते हैं। इस अवसर पर वे अपने मित्रों और भाई-बन्धुओं के लिए उपहार प्रदान करते हैं और परस्पर अभिनन्दन करते हैं। बालकों के लिए मिठाइयाँ दी जाती हैं। सभी लोग लक्ष्मी-गणेश का पूजन करते हैं। माता-पिता अपनी सन्तान को पटाखे देते हैं। इस महोत्सव पर सभी सबके लिए सुख और समृद्धि के लिए शुभेच्छाएँ प्रकट करते हैं।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) कस्याः वरयाचनात् दशरथेन रामाय वनवास प्रदत्तः?
(किसके वर माँगने के कारण दशरथ ने राम के लिए वनवास प्रदान किया।)
(ii) श्रीरामः काभ्यां सह अयोध्यां प्रत्यावर्तितवान्?
(श्रीराम किनके साथ अयोध्या लौटे?)
(iii) कदा जनाः गृहाणि परिष्कुर्वन्ति?
(कब लोग घरों की सफाई करते हैं?)
(iv) पितरः स्वसन्ततिभ्यः कानि ददति?
(माता-पितादि अपनी सन्तान को क्या देते हैं ?)
उत्तरम् :
(i) कैकेय्याः
(ii) सीतालक्ष्मणाभ्याम्
(ii) दीपावल्याम्
(iv) स्फोटकानि।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) सर्वेजनाः किं विस्मृत्य आनन्दमग्नाः भवन्ति?
(सब लोग क्या भूलकर आनन्दमग्न हो जाते हैं? )
(ii) दशरथेन रामाय कति वर्षाणां वनवासः प्रदत्तः।
(दशरथ ने राम को कितने वर्ष का वनवास दिया?)
(iii) भारते कदा दीपावली महोत्सवः आयोजितः भवति?
(भारत में कब दीपावली का त्योहार आयोजित होता है?)
उत्तरम् :
(i) सर्वेजनाः परस्परं भेदभावं विस्मृत्य आनन्दमग्नाः भवन्ति।
(सब लोग परस्पर भेदभाव को भूलकर आनन्दमग्न होते हैं।)
(ii) दशरथेन रामाय चतुर्दशानां वर्षाणां वनवासः प्रदत्तः।
(दशरथ ने राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास दिया।)
(iii) भारते प्रतिवर्ष कार्तिक मासे अमावस्यायां तिथौ दीपावली महोत्सवः आयोजितः भवति।
(भारत में प्रतिवर्ष कार्तिक महीने की अमावस्या तिथि को दीपावली महोत्सव आयोजित होता है।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य समुचितं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उचित शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
दीपावली-महोत्सवः।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
दीपावली उत्सवे सर्वेजनाः उच्चनीचयोः भेद-भावं त्यक्त्वा महता उत्साहने महोत्सव आयोजयन्ति। पितुः दशरथस्या देशेन वनं गतः रामः यदा अयोध्याम्आगच्छत् तदा सर्वे अयोध्यावासिनः दीपान् प्रज्वाल्य स्वागतंमकुर्वन्। ततः अस्मिन् अवसरे जनाः गृहाणि परिष्कुर्वन्ति, सज्जयन्ति, उपहारान् यच्छन्ति, अभिनन्दन्ति, बालकेभ्यः मिष्ठान्नं वितरन्ति ‘सर्वे सर्वेभ्यः वर्धापनं वितरन्ति।

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प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘मिष्ठान्नं यच्छन्ति’ अत्र किं क्रियापदम् –
(अ) मिष्ठान्नम्
(ब) यच्छन्ति
(स) पूजनं कुर्वन्ति
(द) स्फोटकानि ददति
उत्तरम् :
(ब) यच्छन्ति

(ii) ‘राष्ट्रीयोत्सवः’ इत्यत्र किं विशेषण पदम् –
(अ) राष्ट्रीयः
(ब) उत्सवः
(स) दीपावली
(द) महोत्सवः
उत्तरम् :
अ) राष्ट्रीयः

(iii) ‘अस्मिन् अवसरे’ अत्र अस्मिन्’ इति सर्वनामपदं कस्य स्थाने प्रयुक्तम् –
(अ) उत्सवे
(ब) त्रेतायुगे
(स) दीपावल्याम्
(द) महोत्सवम्
उत्तरम् :
(स) दीपावल्याम्

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(iv) ‘स्मृत्वा’ इति पदस्य विलोमपदं गद्यांशेऽस्ति –
(अ) विस्मृत्वा
(ब) स्मृत्वा
(स) विस्मृत्य
(द) व्याहृत्य
उत्तरम् :
(स) विस्मृत्य

29. तस्य परिवारस्य आर्थिक स्थितिः समीचीना नासीत्। सः न्यूनातिन्यून समये अधिकाधिकपुस्तकानाम् अध्ययनं करोति स्म। 11 वर्षात्मके वयसि सः कुमारसम्भवम् रघुवंशादि साहित्यिक ग्रन्थानां व्याख्या कर्तुं समर्थः अभवत्। कक्षायां प्रथम स्थानं लब्धवान्। अस्मात् कारणात् शासनेन तस्मै छात्रवृत्तिः प्रदत्ता। सः स्व-अपेक्षया अपि अधिकम् अभावग्रस्तं जीवनं यः छात्र जीवति स्म तस्य सहाय्यं करोति स्म।।

एकदा सः मातरम् उक्तवान्-अम्बगृहस्य सर्वाणि कार्याणि त्वमेकाकीरोषि, कोऽपि सेवकः नास्ति। अतः अद्य आरभ्य अहमेव भोजनं पक्ष्यामि। माता पुत्रस्य निश्चयं दृष्ट्वा आह्लादिता अभवत्। भोजन पाकात् अतिरिच्य सः गृहनिर्मितं वस्त्र धृत्वा अपि धनस्य सञ्चय करोति स्म। सञ्चितं धनम् अपरेषां सहाय्यार्थं व्ययं करोति स्म। अयम् ईश्वरचन्द्रः विद्यासागर अग्रे महान् त्यागी सेवाभावी श्रमनिष्ठः च अभवत्।।

(उस परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। वे थोड़े से थोड़े समय में अधिक से अधिक पुस्तकों का अध्ययन करते थे। ग्यारह वर्ष की उम्र में वे कुमारसंभव, रघुवंश आदि साहित्यिक ग्रन्थों की व्याख्या करने के लिए समर्थ हो गये थे। कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया, इस कारण से सरकार ने उनके लिए छात्रवृत्ति प्रदान की। वे अपनी अपेक्षाकृत अधिक अभावग्रस्त जीवन जो छात्र जी रहे थे, उनकी सहायता करते थे।

एक दिन वे’माँ से बोले- माँ घर के सारे काम तुम अकेली ही करती हो, कोई नौकर नहीं है। अतः आज से लेकर मैं ही भोजन पकाऊँगा। माता पुत्र के निश्चय को देखकर आह्लादित हुई। भोजन पकाने के अलावा वह घर में बने हुए वस्त्र पहनकर भी धन संचय करते थे। संचित धन का दूसरों की सहायता के लिए व्यय करते थे। ये ईश्वरचन्द्र विद्यासागर आगे चलकर महान त्यागी, सेवाभावी और परिश्रमी हुए।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) विद्यासागरः कक्षायां किं स्थान प्राप्तवान्?
(विद्यासागर ने कक्षा में कौन-सा स्थान प्राप्त किया?)
(ii) विद्यासागराय केन छात्रवृत्तिः प्रदत्ता?
(विद्यासागर को किसने छात्रवृत्ति दी?)
(iii) विद्यासागरस्य निर्णयं श्रुत्वा माता किमन्वभवत्?
(विद्यासागर के निर्णय को सुनकर माता ने कैसा अनुभव.किया?)
(iv) विद्यासागरः कीदृक् वस्त्राणि धारयति स्म?
(विद्यासागर कैसे वस्त्र पहनते थे?)
उत्तरम् :
(i) प्रथमम्
(ii) शासनेन
(iii) आह्लादम्
(iv) गृहनिर्मितानि।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) विद्यासागरः कथम् अध्ययनं करोति स्म?
(विद्यासागर कैसे अध्ययन करता था?)
(ii) एकादश वर्षदेशीयोऽसौ किं कर्तुं समर्थेऽभवत्?
(ग्यारह वर्ष की उम्र में वह क्या करने में समर्थ हो गया?)
(iii) विद्यासागरः स्वः अर्जितं धनं कथं व्ययते स्म?
(विद्यासागर अर्जित धन को कैसे खर्च करता था?)
उत्तरम् :
(i) सः न्यूनातिन्यून समये अधिकाधिक पुस्तकानाम् अध्ययनं करोति स्म।
(वह कम से कम समय में अधिकाधिक पुस्तकों का अध्ययन करता था।)
(ii) एकादश वयसि सः कुमारसम्भवम् रघुवंशादि साहित्यिक ग्रन्थानां व्याख्यां कर्तुं समर्थः अभवत्। (ग्यारह
वर्ष की उम्र में उसने कुमारसंभव, रघुवंश आदि साहित्यिक ग्रंथों की व्याख्या करने में समर्थ हो गया।)
(iii) सः अर्जितं धनं स्व अपेक्षया अपि अधिकं अभावग्रस्तं जीवनं य छात्रः जीवति स्म तस्य सहाय्यं करोति स्म।’
(वह अर्जित धन को अपनी अपेक्षा अधिक अभावग्रस्त जीवन वाले जो छात्र थे, उनकी सहायता करते थे।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
ईश्वरचन्द्र विद्यासागरस्य महनीयता।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
ईश्वर चन्द्र विद्यासागरः बाल्यकाले निर्धनः आसीत्। अल्पकाले एव प्रभूतं साहित्यं पठति स्म। एकादशवर्षे कुमार सम्भवस्य टीका सम्पादितवान्। सः छात्रवृत्ति प्राप्तवान् परन्तु अन्येषामपि सहाय्यं करोति स्म। माता नाधिकपीडिता भवेत् अतः भोजनं स्वयमेव पचति स्म। गृहनिर्मितं वस्त्रं धारयति स्म। सञ्चितं धनं अन्येभ्यः निर्धनेभ्य एव ददाति स्म।।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘भोजनं पक्ष्यामि’ अत्र ‘पक्ष्यामि’ क्रियापदस्य कर्ता अस्ति
(अ) माता
(ब) श्रमनिष्ठ
(स) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर (अहम)
(द) शिष्य
उत्तरम् :
(स) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर (अहम)

(ii) ‘अभावग्रस्तं जीवनम्’ इत्यत्र विशेषण पदमस्ति –
(अ) जीवनम्
(ब) अभावग्रस्तम्
(स) अभाव
(द) ग्रस्तम्
उत्तरम् :
(ब) अभावग्रस्तम्

(iii) ‘तस्य परिवारस्य’ अत्र ‘तस्य’ इति सर्वनाम पदं कस्मै प्रयुक्तम्?
(अ) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
(ब) सेवाभावी
(स) कर्मनिष्ठ
(द) परिवारस्य
उत्तरम् :
(अ) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(iv) ‘माता’ इति पदस्य विलोम पदं अस्ति –
(अ) जननी
(ब) पिता
(स) अम्बा
(द) भगिनी
उत्तरम् :
(ब) पिता

30. भारतीय संविधानस्य निर्माणं 1949 ईसवीये वर्षे नवम्बर मासस्य 26 दिनाङ्के सम्पन्नमभवत्। 1950 ईसवीये वर्षे जनवरी मासस्य 26 दिनांके देशेन स्वीकृतम्। संविधान सभायाः अध्यक्षः डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, प्रारूपाध्यक्षः डॉ. भीमराव अम्बेडकरश्चासीत्। अस्माकं संविधानं विश्वस्य विशालं संविधानमस्ति। लिखिते अस्मिन् संविधाने 395 अनुच्छेदाः 10 अनुसूच्यश्च सन्ति। अस्माकं संविधानं सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्नं पंथनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक गणराज्यस्य स्वरूपं देशस्य कृते प्रददाति। अत्रत्यं लोकतन्त्र संसदीय व्यवस्थानुरूपं कार्यं करोति यत्र नागरिकाणां मूलाधिकाराः कर्त्तव्याणि च लिखितानि सन्ति। अस्माकं संविधानम् न्यायिक-पुनरवलोकनस्य अधिकारमपि अस्मभ्यं प्रददाति। समये-समये आवश्यकताम् अनुभूय अस्मिन् संविधाने परिवर्तनम् संशोधनं च भवति। इदानं संशोधनानि जातानि।

(भारतीय संविधान का निर्माण सन् 1949 ई. वर्ष में नवम्बर माह की 26 तारीख को सम्पन्न हुआ। सन् 1950 ई. वर्ष में 26 जनवरी को देश ने इसे स्वीकार किया। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और प्रारूपाध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर थे। हमारा संविधान विश्व का विशाल संविधान है। इस लिखित संविधान में 395 अनुच्छेद और 10 अनुसूचियाँ हैं। हमारा संविधान सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न (सम्प्रभुतासम्पन्न) सम्प्रदाय-निरपेक्ष लोकतान्त्रिक गणराज्य का स्वरूप देश के लिए प्रदान करता है।

यहाँ का लोकतन्त्र संसदीय व्यवस्था के अनुरूप कार्य करता है। जहाँ पर नागरिकों के मूल अधिकार और कर्त्तव्य लिखे हुए हैं। हमारा संविधान न्यायिक पुनरावलोकन का भी हमें अधिकार प्रदान करता है। समय-समय पर आवश्यकता का अनुभव करके इस संविधान में परिवर्तन और संशोधन भी होते हैं। अभी तक 80 संशोधन हो चुके हैं।)

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)
(i) भारतीय संविधानस्य निर्माणं कदा सम्पन्नं अभवत्?
(भारतीय संविधान का निर्माण कब सम्पन्न हुआ?)
(ii) भारतीय संविधान राष्ट्रिण कदा स्वीकृतम्?
(भारतीय संविधान राष्ट्र ने कब स्वीकार किया?)
(iii) संविधान सभायाः अध्यक्षः कः आसीत्?
(संविधान सभा का अध्यक्ष कौन था?)
(iv) संविधान सभायां डॉ. भीमराव अम्बेडकरस्य किं पदम् आसीत्?
(संविधान सभा में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का क्या पद था ?)
उत्तरम् :
(i) 26 नवम्बर 1949 ई. तमे
(ii) 26 जनवरी 1950 ई. वर्षे
(iii) डॉ. राजेन्द्र प्रसादः
(iv) प्रारूपाध्यक्षः

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(i) अस्माकं लिखिते संविधाने कति अनुच्छेदाः अनुसूचयश्च सन्ति?
(हमारे लिखित संविधान में कितने अनुच्छेद और अनुसूचियाँ हैं?)
(ii) अस्माकं संविधानं देशस्य कृते कीदृशं स्वरूपं प्रददाति?
(हमारा संविधान देश के लिए कैसा स्वरूप प्रदान करता है?)
(iii) अत्रत्यं लोकतन्त्रं कथं कार्यं करोति? (यहाँ का लोकतन्त्र कैसे काम करता है?)
उत्तरम् :
(i) अस्माकं लिखिते संविधाने 395 अनुच्छेदाः 10 अनुसूच्यः च सन्ति।
(हमारे लिखित संविधान में 395 अनुच्छेद और 10 अनुसूची हैं।)
(ii) अस्माकं संविधानं सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्नं पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्यस्य स्वरूपं देशस्य कते प्रददाति।
(हमारा संविधान संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक-गणराज्य का स्वरूप देश के लिए प्रदान करता है।)
(iii) अत्रत्यं लोकतन्त्रं संसदीय व्यवस्थानुरूपं कार्यं करोति।
(यहाँ का लोकतंत्र संसदीय व्यवस्था के अनुरूप कार्य करता है।)

प्रश्न 3.
अस्य अनुच्छेदस्य उपयुक्तं शीर्षकं लिखत।
(इस अनुच्छेद का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।)
उत्तरम् :
अस्माकं संविधानम्।

प्रश्न 4.
उपर्युक्त गद्यांशस्य संक्षिप्तीकरणं कुरुत।
उत्तरम् :
भारतीय संविधानस्य निर्माणं 26-11-1949 तमे स्वीकृतिश्च 26-1-1950 दिनाङ्के अभवत्। लिखितेऽस्मिन् संविधाने अनुच्छेदाः 395 अनुसूच्यश्च 10 सन्ति। विश्वस्य विशालं संविधानं सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्नं पंथनिरपेक्षं लोकतान्त्रिक गणराज्यस्य स्वरूपाय देशाय प्रददाति। अत्र नागरिकाणां मूलाधिकाराः कर्त्तव्यानि च सन्ति। एषः न्यायिक पुनरावलोकनस्य अधिकारं ददाति परिवर्तनीय संशोधनीय परिवर्धनीय च अस्ति।

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

प्रश्न 5.
यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(i) ‘अधिकारमपि अस्मभ्यं ददाति’ अत्र ‘ददाति’ क्रियायाः कर्तामस्ति –
(अ) अधिकारम्
(ब) अस्मभ्यं
(स) संविधानम्
(द) देश:
उत्तरम् :
(स) संविधानम्

(ii) ‘सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्नम्’ अत्र विशेषणपदमस्ति –
(अ) सम्पूर्णम्
(ब) प्रभुत्वसम्पन्नम्
(स) संविधानम्
(द) देशः
उत्तरम् :
(अ) सम्पूर्णम्

(iii) ‘अस्माकं संविधानम् अत्र ‘अस्माकम्’ इति सर्वनामपदस्य स्थानने संज्ञा पदं भविष्यति –
(अ) भारतीयानाम्
(ब) सांसदानाम्
(स) अधिकारिणाम्
(द) संविधान सभा-सदस्याणाम्
उत्तरम् :
(अ) भारतीयानाम्

JAC Class 10 Sanskrit अपठित-अवबोधनम् अपठित गद्यांशः

(iv) ‘संसारस्य’ इति पदस्य स्थाने किं पर्याय पदं प्रयुक्तम्?
(अ) जगतः
(ब) विश्वस्य
(स) संविधानस्य
(द) मासस्य
उत्तरम् :
(ब) विश्वस्य

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

Jharkhand Board JAC Class 10 Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 12 अन्योक्तयः Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

JAC Class 10th Sanskrit अन्योक्तयः Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखिए)
(क) कस्य शोभा एकेन राजहंसेन भवति?
(किसकी शोभा एक राजहंस से होती है?)
उत्तरम् :
सरसः (सरोवर की)।

(ख) सरसः तीरे के वसन्ति?
(तालाब के किनारे कौन रहते हैं?)
उत्तरम् :
वकसहस्रम् (हजारों बगुले)।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

(ग) कः पिपासः प्रियते?
(कौन प्यासा मर जाता है?)
उत्तरम् :
चातकः (पपीहा)।

(घ) के रसाल मुकुलानि समाश्रयन्ते ?
(आम की मंजरियों का आश्रय कौन लेते हैं ?)
उत्तरम् :
भृङ्गाः (भौरे)।

(ङ) अम्भोदाः कुत्र सन्ति? (बादल कहाँ हैं?)
उत्तरम् :
गगने (आकाश में)।

प्रश्न 2.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर संस्कृत भाषा में लिखिए)
(क) सरसः शोभा केन भवति ?
(तालाब की शोभा किससे होती है ?)
उत्तरम् :
सरसः शोभा एकेन एव राजहंसेन भवति।
(तालाब की शोभा एक ही राजहंस से होती है।)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

(ख) चातकः किमर्थं मानी कथ्यते ?
(चातक किस अर्थ में स्वाभिमानी है?)
उत्तरम् :
चातकः तृषितः मरणम् आप्नोति परञ्च सर्वान् वारिदान् न याचते, केवलं पुरन्दरं याचते।
(चातक प्यासा मर जाता है, लेकिन अन्य बादलों से नहीं माँगता, केवल इन्द्र से माँगता है।)

(ग) मीनः कदा दीनां गतिं प्राप्नोति ?
(मछली कब दीन गति को प्राप्त होती है ?)
उत्तरम् :
यदा सरः सङ्कोचमञ्चति तदा मीन: दीनां गतिं प्राप्नोति।
(जब तालाब सूख जाता है तब मछली दीन दशा को प्राप्त होती है।)

(घ) कानि पूरयित्वा जलदः रिक्तः भवति ?
(किन्हें भरकर बादल खाली हो जाता है ?)
उत्तरम् :
नानानदीनदशतानि पूरयित्वा जलदः रिक्तः भवति।
(अनेक नदी और सैकड़ों नदों को भरकर बादल खाली हो जाता है।)

(ङ) वृष्टिभिः वसुधां के आर्द्रयन्ति ?
(वर्षा से धरती को कौन गीला कर देते हैं ?)
उत्तरम् :
अम्भोदाः वृष्टिभिः वसुधां आर्द्रयन्ति।
(बादल वर्षा से धरती को गीला कर देते हैं।)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

प्रश्न 3.
अधोलिखितवाक्येष रेखाकितपदानि आधुत्य प्रश्ननिर्माणं करुत –
(निम्नलिखित वाक्यों में रेखांकित पदों के आधार पर प्रश्न निर्माण कीजिए)
(क) मालाकारः तोयैः तरोः पुष्टिं करोति।
(माली जल से वृक्ष का पोषण करता है।)
उत्तरम् :
मालाकार: कैः तरोः पुष्टिं करोति ?
(माली किनसे वृक्ष का पोषण करता है ?)
(ख) भृङ्गाः रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते।
(भौरे आम के बौर का आश्रय लेते हैं।)
उत्तरम् :
भृङ्गाः कानि समाश्रयन्ते ?
(भौरे किनका आश्रय लेते हैं ?)
(ग) पतङ्गाः अम्बरपथम् आपेदिरे।
(पक्षियों ने आकाश मार्ग पाया।)
उत्तरम् :
के अम्बरपथं आपेदिरे ?
(किन्होंने आकाश मार्ग पाया ?)
(घ) जलदः नानानदीनदशतानि पूरयित्वा रिक्तोऽस्ति।
(बादल अनेक नदी और सैकड़ों नदों को भरकर खाली है।)
उत्तरम् :
कः नानानदीनदशतानि पूरयित्वा रिक्तोऽस्ति ?
(कौन अनेक नदी और सैकड़ों नदों को भरकर खाली है ?)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

(ङ) चातकः वने वसति। (पपीहा वन में रहता है।)
उत्तरम् :
चातकः कुत्र वसति ? (पपीहा कहाँ रहता है ?)

प्रश्न 4.
अधोलिखितयो श्लोकयोः भावार्थ संस्कृतभाषया लिखत –
(निम्नलिखित श्लोकों का भावार्थ संस्कृत भाषा में लिखिये)
(अ) तोयैरल्पेरपि ………… वारिदेन।।
उत्तरम् :
भावार्थ – सुयोग्यः समर्थः एव व्यक्ति कार्य सम्यग् रूपेण सम्पादयितुं शक्नोति। यथा हि कवि पण्डित राज कथयति-‘रे उद्यानपाल! यं वृक्षं त्वं सकरुणं प्रचण्ड ग्रीष्म? अल्पैः जलै, अर्थात् आवश्यकतानुसारमसिञ्चः, एवम् असौ वृक्षः शनैः पालितः, किं तत् कार्यम् समर्थोऽसन् वृष्टिः धारा प्रवाहेण प्रभूतेन जलेन कर्तुं शक्नोति।

यथावश्यकमेव पोषणम् अपेक्ष्यते।’ (सुयोग्य और समर्थ व्यक्ति ही कार्य सुचारु रूप से सम्पन्न कर सकता है। जैसा कि कवि पण्डितराज कहते हैं- ‘हे माली! जिस वृक्ष को तुमने करुणा के साथ प्रचण्ड ग्रीष्म ऋतु में आवश्यकतानुसार थोड़ा-थोड़ा पानी देकर पाला था, क्या इस कार्य में समर्थ होते हुये भी वर्षा (अनावश्यक) बहुत से धारा प्रवाह जल से कर सकता है। सभी यथावश्यक पोषण की अपेक्षा करते हैं।)

(आ) रे रे चातक ………………….. दीनं वचः।

भावार्थ: – श्लोकेऽस्मिन् कवि चातकस्य माध्यमेन कथयति यत् सर्वे धनिकाः समृद्धाः वा जनाः दातारः न भवन्ति अतः यं कञ्चित् मानवं मा याचनां कुरु यथा हि कविः भर्तहरि कथयति – ‘रे रे चातक! सावहितः सन् शृणु मित्र। आकाशे अनेके मेघाः आयान्ति यान्ति च परञ्च तेषु केचनैव वर्षन्ति। एवं एव संसारे अनेके धनिका समृद्धाः च मानवा आयान्ति यान्ति च। तेषु केचन यच्छन्ति अन्ये तु व्यर्थमेव आत्मानं प्रदर्शयन्ति। अतोऽहं ब्रवीमि यत् त्वम यं कञ्चनं पश्यति तस्य सम्मुखं याचनाय मा गच्छ। सु दानभावोपेतं जनं ज्ञात्वा एवं याचनाय हस्तौ प्रसारय।

यथा सर्वे वारिदाः चातकाय स्वाति बिन्दुं न दातुं शक्नोति तथैव सर्वे जनाः याचकाय दान न दातुं शक्नुवन्ति। (इस श्लोक में कवि चातक के माध्यम से कहता है कि सभी धनवान या समद्ध लोग दानदाता नहीं होते। अतः जिस किसी मानव से मत याचना करो। जैसा कि कवि भर्तृहरि कहता है-‘ओ चातक! सावधान होकर सुन। मित्र! आकाश में अनेक मेघ आते हैं और चले जाते हैं। उनमें से कुछ ही देते हैं अन्य तो व्यर्थ ही अपना दिखावा करते हैं। अतः मैं चाहता हूँ कि तुम जिस किसी को देखो उसी के सामने याचना के लिये मत जाओ। (अच्छे दान भाव से युक्त व्यक्ति को जानकर याचना के लिये हाथ फैलाओ। जैसे सभी बादल चातक को स्वाति की बूंद नहीं दे सकते हैं वैसे ही सभी लोग याचक को दान नहीं दे सकते हैं।)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

प्रश्न 5.
अधोलिखित श्लोकयोः अन्वयं लिखत। (निम्नलिखित श्लोकों का अन्वय लिखो)
(अ) आपेदिरे …………. कतमां गतिमभ्युपैति।
अन्वयः – पतङ्गाः परितः अम्बरपथम् आपेदिरे, भृङ्गाः रसाल मुकलानि समाश्रयन्ते। सरः त्वयि सङ्कोचम् अञ्चति, हन्त दीन-दीनः मीनः नु कतमां गतिम् अभ्युपैतु।

(आ) आश्वास्य ………….. सैवतवोत्तमा श्रीः।।
अन्वयः – तपनोष्णतप्तम् पर्वतकुलम् आश्वास्य उदाम दावविधुराणि काननानि च आश्वास्य नाना नदी गतानि पूरयित्वा च हे जलद। यत् रिक्तः असि तव सा एव उत्तमा श्रीः।

प्रश्न 6.
उदाहरणमनुसृत्य सन्धिं/सन्धिविच्छेदं वा कुरुत –
(उदाहरण के अनुसार सन्धि/सन्धि-विच्छेद कीजिए)
(i) यथा – अन्य + उक्तयः = अन्योक्तयः।
(क) …………. + ………….. = निपीतान्यम्बूनि।
(ख) …………. + उपकारः = कृतोपकारः।
(ग) तपन + …………… = तपनोष्णतप्तम्।
(घ) तव + उत्तमा = …………………।
(ङ) न + एतादृशाः = …………………।
उत्तरम् :
(क) निपीतानि + अम्बूनि = निपीतान्यम्बूनि।
(ख) कृत + उपकारः = कृतोपकारः।
(ग) तपन + उष्णतप्तम् = तपनोष्णतप्तम्।
(घ) तव + उत्तमा = तवोत्तमा।
(ङ) न + एतादृशाः = नैतादृशाः।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

(ii) यथा – पिपासितः + अपि = पिपासितोऽपि।
(क) ……………. + ……………… = कोऽपि।
(ख) ……………. + ………………. = रिक्तोऽसि।
(ग) मीनः + अयम् = ………………।
(घ) सर्वे + आदि = …………
उत्तरम् :
(क) कः + अपि = कोऽपि।
(ख) रिक्तः + असि = रिक्तोऽसि।
(ग) मीनः + अयम् = मीनोऽयम्।
(घ) सर्वे + ऽपि = ………………..

(iii) यथा – सरस: + भवेत् = सरसोभवेत्।
(क) खगः + मानी – ……………।
(ख) …………. + नु = मीनो नु।
(ग) पिपासितः + वा = ………..।
(घ) …………. + ………. = पुरुतोमा।
उत्तरम् :
(क) खगः + मानी = खगो मानी।
(ख) मीनः + नु = मीनो नु।
(ग) पिपासितः + वा = पिपासितोवा।
(घ) पुरतः + मा = पुरुतोमा।

(iv) यथा – मुनिः + अपि = मुनिरपि।
(क) तोयैः + अल्पैः = …………..।
(ख) ………… + अपि = अल्पैरपि।
(ग) तरोः + अपि = ………………।
(घ) ………. + आर्द्रचन्ति = वृष्टिमिरार्द्रयन्ति।
उत्तरम् :
(क) तोयैः + अल्पैः = तोयैरल्पैः
(ख) अल्पैः + अपि = अल्पैरपि
(ग) तरोः + अपि = तरोरपि।
(घ) वृष्टिमिः + आर्द्रयन्ति = वृष्टिमिरार्द्रयन्ति।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

प्रश्न 7.
उदाहरणमनुसृत्य अधोलिखितैः विग्रहपदैः समस्तपदानि रचयत –
(उदाहरण के अनुसार निम्नलिखित विग्रह पदों से समस्त पद बनाइए)
JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः 1

JAC Class 10th Sanskrit अन्योक्तयः Important Questions and Answers

शब्दार्थ चयनम् –

अधोलिखित वाक्येषु रेखांकित पदानां प्रसङ्गानुकूलम् उचितार्थ चित्वा लिखत –

प्रश्न 1.
एकेन राजहंसेन या शोभा सरसो भवेत्।
(अ) तडागस्य
(ब) कटु
(स) सरसः
(द) जलदः
उत्तरम् :
(अ) तडागस्य

प्रश्न 2.
न सा. बकसहस्रेण परितस्तीरवासिना।
(अ) भवेत्
(ब) अभितः
(स) शृगालः
(द) भवति
उत्तरम् :
(ब) अभितः

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

प्रश्न 3.
भुक्ता मृणालपटली भवता निपीता।
(अ) भवता
(ब) युक्ता
(स) खादिता
(द) अम्बूनि
उत्तरम् :
(स) खादिता

प्रश्न 4.
न्यम्बूनि यत्र नलिनानि निषेवितानि।
(अ) राजहंस
(ब) सरोवरस्य
(स) भविता
(द) सेवितानि
उत्तरम् :
(द) सेवितानि

प्रश्न 5.
तोवैरल्यैरपि करुणया भीमभानौ निदाघे।
(अ) ग्रीष्मकाले
(ब) भानवेः
(स) निर्दय
(घ) भवता
उत्तरम् :
(अ) ग्रीष्मकाले

प्रश्न 6.
व्यरचि भवता या तरोरस्य पुष्टिः।
(अ) विश्वतः
(ब) कृता
(स) जनयितुम्
(द) शक्या
उत्तरम् :
(ब) कृता

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

प्रश्न 7.
भृङ्गा रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते।
(अ) आपेदिरे
(ब) समाश्रयन्ते
(स) द्विरेफा
(द) दीनदीनः
उत्तरम् :
(स) द्विरेफा

प्रश्न 8.
एक एव खगो मानी वने वसति चातकः।
(अ) पिपासितः
(ब) पुरन्दरम्
(स) याचते
(द) स्तोककः
उत्तरम् :
(द) स्तोककः

प्रश्न 9.
यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः।
(अ) वद
(ब) बहवः
(स) आर्द्रयन्ति
(द) पश्यसि
उत्तरम् :
(अ) वद

प्रश्न 10.
नानानदीनदशतानि च पूरयित्वा।
(अ) पूर्णिमाया
(ब) पूरणी:
(स) आश्वास्य
(द) पूर्णं कृत्वा
उत्तरम् :
(स) आश्वास्य

संस्कृतमाध्यमेन प्रश्नोत्तराणि –

एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)

प्रश्न 1.
राजहंसोऽत्र कस्य प्रतीकः ?
(राजहंस यहाँ किसका प्रतीक है ?)
उत्तरम् :
सज्जनस्य (सज्जन का)।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

प्रश्न 2.
कविः ‘बकसहस्रम्’ कं कथयति ?
(कवि ‘बकसहस्रम्’ किसे कहता है ?)
उत्तरम् :
मूर्खान् (मूरों को)।

प्रश्न 3.
मालाकारेण तरोः पुष्टिः कैः कृता ?
(माली ने वृक्ष का पोषण किनसे किया ?)
उत्तरम् :
तोयैः (जल से)।

प्रश्न 4.
मालाकारः कथं तोयैः वृक्षस्य पुष्टिः व्यरचि ?
(माली ने किस प्रकार पानी से वृक्ष की पुष्टि की ?)
उत्तरम् :
करुणया (करुणा से)।

प्रश्न 5.
सङ्कचिते सरोवरे पतङ्गाः कुत्र आपेदिरे ?
(सरोवर के सूख जाने पर पक्षी कहाँ गये ?)
उत्तरम् :
अम्बरपथम् (आकाश मार्ग में)।

प्रश्न 6.
कीदृशः चातकः पिपासितो म्रियते ?
(कैसा चातक प्यासा मरता है ?)
उत्तरम् :
मानी (स्वाभिमानी)।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

प्रश्न 7.
कविः कं सम्बोध्य श्लोकं अरचयत् ?
(कवि किसको संबोधित करके श्लोक की रचना करता है?)
उत्तरम् :
मेघः (बादल)।

प्रश्न 8.
काननानि कः आश्वास्यति ?
(जंगलों को कौन आश्वस्त करता है ?)
उत्तरम् :
जलदः (बादल)।

प्रश्न 9.
कविः मित्रः इति शब्देन के सम्बोधयति ?
(कवि ‘मित्र’ इस शब्द से किसको संबोधित करता है?)
उत्तरम् :
चातकः (पपीहा को)।

प्रश्न 10.
केचिद् अम्भोदाः कथं गर्जन्ति ?
(कुछ बादल कैसे गर्जते हैं ?)
उत्तरम् :
वृथा (व्यर्थ ही)।

प्रश्न 11.
एकेन राजहंसेन कस्य शोभा भवेत् ?
(एक हंस से किसकी शोभा होती है?)
उत्तरम् :
सरसः (तालाब की)।

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प्रश्न 12.
सरसः तीरवासिनः के सन्ति ?
(तालाब के किनारे वास करने वाले कौन हैं ?)
उत्तरम् :
बकसहस्रम् (हजारों बगुले)।

प्रश्न 13.
मृणालपटली केन भुक्ता ?
(कमलनालों का समूह किसके द्वारा खाया गया है ?)
उत्तरम् :
राजहंसेन (राजहंस के द्वारा)।

प्रश्न 14.
राजहंसेन कानि निपीतानि ?
(राजहंस ने किन्हें पीया ?)
उत्तरम् :
अम्बूनि (जल)।

प्रश्न 15.
तरोः पुष्टिः केन कृतः ?
(वृक्ष का पोषण किसके द्वारा किया गया है ?)
उत्तरम् :
मालाकारेण (माली द्वारा)।

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प्रश्न 16.
मालाकारेण तरोः कदा पुष्टिः कृता ?
(माली ने वृक्ष का पोषण कब किया ?)
उत्तरंम् :
निदाघे (गर्मी में)।

प्रश्न 17.
सङ्कुचिते सरोवरे परितः अम्बरपथं कः आपेदिरे ?
(सरोवर के सूख जाने पर चारों ओर आकाशमार्ग को कौन प्राप्त कर लेते हैं ?)
उत्तरम् :
पतङ्गाः (पक्षी)।

प्रश्न 18.
रसालमुकुलानि के समाश्रयन्ते ?
(आम की मजरी को आश्रय कौन लेते हैं ?)
उत्तरम् :
भृङ्गाः (भौरे)।

प्रश्न 19.
एकः एव मानी वने कः वसति ?
(एक ही स्वाभिमानी वन में कौन निवास करता है ?)
उत्तरम् :
खगः (पक्षी)।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

प्रश्न 20.
पुरन्दरात् कः याचते ?
(इन्द्र से कौन माँगता है ?)
उत्तरम् :
चातकः (पपीहा)।

प्रश्न 21.
कः नदी नद शतानि पूरयति ?
(कौन सैकड़ों नद-नदियों को भर देता है ?)
उत्तरम् :
जलदः (बादल)।

प्रश्न 22.
तपनोष्णतप्तम् किम् ?
(सूर्य की गर्मी से कौन तपी है ?)
उत्तरम् :
पर्वतकुलम् (पर्वतों के समूह)।

प्रश्न 23.
के वृष्टिभः वसुधां आर्द्रयन्ति ?
(कौन बरसकर धरती को गीला कर देते हैं ?)
उत्तरम् :
अम्भोदाः (बादल)।

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प्रश्न 24.
कीदृशं वचः मा ब्रूहिः ?
(कैसे वचन मत बोलो?)
उत्तरम् :
दीनंवचः (दीन वचन)।

पूर्णवाक्येन उत्तरत (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए)

प्रश्न 25.
कृतोपकारः कः भविष्यति ?
(उपकार करने वाला कौन होगा ?)
उत्तरम् :
कृतोपकारः राजहंसः भविष्यति।
(उपकार करने वाला राजहंस होगा।)

प्रश्न 26.
धारासारान् कः विकिरति।
(जलधाराओं को कौन बरसाता है ?)
उत्तरम् :
धारासारान् वारिदः विकिरति।
(जलधाराओं को बादल बरसाता है।)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

प्रश्न 27.
चातकः मानी कथम् ?
(चातक मानी कैसे है ?)
उत्तरम् :
चातकः पिपासितो म्रियते पुरन्दरम् वा याचते।
(चातक या तो प्यासा मरता है या इन्द्र से याचना करता है।)

प्रश्न 28.
जलदः कान् पूरयति ? (बादल किनको भरता है?)
उत्तरम :
जलदः नानानदीनदशतानि पूरयति।
(बादल अनेक नदी और सैकड़ों नदों को भरता है।)

प्रश्न 29.
कविः श्रोतारं किं कारणाद् वर्जयति?
(कवि श्रोताओं को किस कारण रोकता है?)
उत्तरम् :
कवि श्रोतारं वर्जयति-मा ब्रूहि दीनं वचः
(कवि सुनने वालों को रोकता है–किसी के सामने दीन वचन मत बोलो)।

प्रश्न 30.
सरसः शोभा केन न भवति ?
(तालाब की शोभा किससे नहीं होती ?)
उत्तरम् :
सरसः शोभा परितः तीरवासिना बकसहस्रेण न भवति।
(तालाब की शोभा चारों ओर किनारे पर बैठे हजारों बगलों से नहीं होती।)

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प्रश्न 31.
राजहंसेन कानि निषेवितानि ?
(राजहंस द्वारा किनका सेवन किया गया ?)
उत्तरम् :
राजहंसेन नलिनानि निषेवितानि।
(राजहंस ने कमलनालों का सेवन किया।)

प्रश्न 32.
मालाकार: केन प्रकारेण तरोः पुष्टिं करोति ?
(माली किस प्रकार से वृक्ष की पुष्टि करता है ?)
उत्तरम् :
मालाकार: निदाघे अल्पैः तोयैः अपि करुणया तरोः पुष्टिं करोति।
(माली गर्मी में थोड़े जल से भी करुणा के साथ वृक्ष का पोषण करता है।)

प्रश्न 33.
सरोवरे सङ्कुचिते भृङ्गाः कानि समाश्रयन्ते ?
(सरोवर के सूख जाने पर भौरे किनका आश्रय ले लेते हैं?)
उत्तरम् :
सरोवरे सङ्कुचिते भृङ्गाः रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते।
(सरोवर के सूख जाने पर भौरे आम की मंजरी का आश्रय ले लेते हैं।)

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प्रश्न 34.
वने कः वसति ?
(वन में कौन रहता है ?)
उत्तरम् :
वने एकः मानी खगः चातकः वसति।
(वन में एक स्वाभिमानी पक्षी चातक रहता है।)

प्रश्न 35.
जलदः कीदृशानि काननानि आवश्स्य रिक्तो भवति ?
(बादल वनों को किस प्रकार आश्वस्त करके जलहीन (खाली) हो जाता है?)
उत्तरम् :
जलदः रिक्तोभवति उद्दामदावविधुराणि काननानि आश्वस्तं करोति।
(बादल खाली होकर दावाग्नि से नष्ट हुए वनों को आश्वस्त करता है।)

प्रश्न 36.
कवि के सम्बोध्य श्लोकं कथयति ?
(कवि श्लोक किसको सम्बोधित करके कहता है?)
उत्तरम् :
कवि चातकः सम्बोध्य श्लोक कथयति।
(कवि श्लोक चातक को सम्बोधित करके कहता है।

अन्वय-लेखनम् –

अधोलिखितश्लोकस्यान्वयमाश्रित्य रिक्तस्थानानि मञ्जूषातः समुचितपदानि चित्वा पूरयत।
(नीचे लिखे श्लोक के अन्वय के आधार पर रिक्तस्थानों की पूर्ति मंजूषा से उचित पद चुनकर कीजिए।)

1. एकेन ……….. ………… तीरवासिना।। .
मञ्जूषा – तीरवासिना, राजहंसेन, सा, शोभा।
एकेन (i) …………. सरस: या (ii) …………. भवेत् परितः (iii) …………. बकसहस्रेण (iv) …………. (शोभा) न (भवति)।
उत्तरम् :
(i) राजहंसेन (ii) शोभा (iii) तीरवासिना (iv) सा।

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2. भुक्ता …………………. कृतोपकारः।।
मञ्जूषा – निषेवितानि, अम्बूनि, मृणालपटली, कृतोपकारः।
यत्र भवता (i) ………… भुक्ता, (ii) ………… निपीतानि नलिनानि (iii) ………… रे राजहंस ! तस्य सरोवरस्य केन कृत्येन (iv) …………. भविता असि, वद।
उत्तरम् :
(i) मृणालपटली (ii) अम्बूनि (iii) निषेवितानि (iv) कृतोपकारः।

3. तोयैरल्पैरपि………………………. वारिदेन।।
मञ्जूषा – प्रावृषेण्येन, भीमभानौ, विकिरता, करुणया।
हे मालाकार ! (i) …………. निदाघे अल्पैः तोयैः अपि भवता (ii) …………. अस्य तरोः या पुष्टिः व्यरचि। वारां (iii) …………. विश्वतः धारासारान् अपि (iv) …………. वारिदेन इह जनयितुं सा किं शक्या।
उत्तरम् :
(i) भीमभानौ (ii) करुणया (iii) प्रावृषेण्येन (iv) विकिरता।

4. आपेदिरेऽम्बरपथं ………………… गतिमभ्युपैतु।।
मञ्जूषा – कतमां, भृङ्गाः, परितः, अञ्चति। (सङ्कुचिते सरोवरे)
पतङ्गाः (i) …………. अम्बरपथम् आपेदिरे, (ii) …………. रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते। सरः त्वयि सङ्कोचम् (iii) …………., हन्त दानदान: मीनः नु (iv) ………….गतिम् अभ्युपतु।।
उत्तरम् :
(i) परितः (ii) भृङ्गाः (iii) अञ्चति (iv) कतमां।

5. एक एव खगो ……………………….. पुरन्दरम्।।
मञ्जूषा – पुरन्दरं, चातकः, एव, पिपासितः।
एक: (i) ……….. मानी खगः (ii) ……….. वने वसति वा (iii) ……….. म्रियते (ii) ………… याचते।।
उत्तरम् :
(i) एव (ii) चातकः (iii) पिपासितः (iv) पुरन्दरं।।

6. आश्वास्य पर्वतकुलं ……….. …… तवोत्तमा श्रीः।।
मञ्जूषा – काननानि, पर्वतकुलम्, उत्तमा, जलद।
तपनोष्णतप्तम् (i) ……….. आश्वास्य उद्दामदावविधुराणि (ii) ……….. च (आश्वास्य) नानानदीनदशतानि पूरयित्वा च हे (ii) ……….. ! यत् रिक्तः असि तव सा एव (ii) ……….. श्रीः।
उत्तरम् :
(i) पर्वतकुलम् (ii) काननानि (iii) जलद (iv) उत्तमा।

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7. रे रे चातक ! ……………………….. दान …….. दीनं वचः।।
मञ्जूषा – एतादृशाः, अम्भोदाः, श्रूयताम, आर्द्रयन्ति।
रे रे मित्र चातक ! सावधानमनसा क्षणं (i) …………. गगने हि बहवः (ii) …………. सन्ति, सर्वेऽपि (iii) … ” ………. न (सन्ति) केचित् वसुधां वृष्टिभिः (iv) …………. केचित् वृथा गर्जन्ति, यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतः दीनं वचः मा ब्रूहि।
उत्तरम् :
(i) श्रूयताम् (ii) अम्भोदाः (iii) एतादृशाः (iv) आर्द्रयन्ति।

प्रश्ननिर्माणम् –

अधोलिखित वाक्येषु स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत –

1. सरसः शोभा राजहंसेन भवेत्.। (तालाब की शोभा राजहंस से होनी चाहिए।)
2. राजहंसेन सरोवरस्य नलिनानि निषेवितानि। (राजहंस द्वारा सरोवर के कमलनालों का सेवन किया गया।)
3. भृङ्गाः रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते। (भौरे आम के बौर का आश्रय लेते हैं।)
4. पतङ्गाः परितः अम्बरपथं आपेदिरे। (पक्षी चारों ओर आकाश में पहुँच गए।)
5. सरसि संकोचम् अञ्चति मीन: दु:खीभवति। (तालाब के सूख जाने पर मछली दःखी होती है।)
6. मानी चातकः वने वसति। (स्वाभिमानी चातक वन में रहता है।)
7. चातक: पुरन्दरं याचते। (पपीहा इन्द्र से याचना करता है।)।
8. जलदः तपनोष्णतप्तं पर्वतकुलम् आश्वासयति। (बादल सूर्य से सन्तप्त पर्वत समूहों को आश्वस्त करता है।) .
9. जलदः नानानदीनदशतानि पूरयित्वा रिक्तो भवति। (बादल सैकड़ों नदी-नदों को भरकर रिक्त होता है।)
10. वारिदाः वृष्टिभिः वसुधाम् आर्द्रयन्ति। (बादल वर्षा से धरती को गीला करते हैं।)
उत्तराणि :
1. सरसः शोभा केन भवेत् ?
2. राजहंसेन सरोवरस्य कानि निषेवितानि ?
3. भृङ्गाः कानि समाश्रयन्ते ?
4. पतङ्गाः परितः कम् आपेदिरे ?
5. सरसि सङ्कोचमञ्चति कः दुःखी भवति ?
6. मानी चातकः कुत्र वसति ?
7. चातकः कम् याचते ?
8. जलदः के आश्वासयति ?
9. जलदः कानि पूरयित्वा रिक्तो भवति ?
10. वारिदाः काभिः वसुधाम् आर्द्रयन्ति ?

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भावार्थ-लेखनम् –

अधोलिखित पद्यांश संस्कृते भावार्थ लिखत –

1. एकेन राजहंसेन या ………………………. परितस्तीरवासिना।।
भावार्थ – एकेन मरालेन सरोवरस्य सौन्दर्य स्मात् परञ्च अभितः तट उषितैः सहस्रवकैः सा शोभा न सम्भवति।

2. भुक्ता मृणालपटली भवता …………………………… भवितासि कृतोपकारः।।
भावार्थ – यस्मिन् स्थाने त्वया श्रीमता कमलनाल समूह खादितः नि:शेषाणि जलानि पीतानि कमलानां सेवनं कृतम् रे मराल! अमुष्य तडागस्य केन कार्येण तस्य हितकारकः भविष्यसि (कथं तस्योपकारं करिष्यसि) कथय कथं भविष्यति।

3. तोयैरल्पैरपि करुणया ……………………….. विकिरता विश्वतो वारिदेन।।
भावार्थ – हे उद्यान पाल! भयंकर प्रचण्ड सूर्ये प्रतप्ते ग्रीष्मौ किञ्चित जलेन अपि त्वया अनुकम्पया त्वया एतस्य वृक्षस्य यत्पोषणं त्वया कृतम् किं वर्षा कालिकेन सर्वतः जलधारा वर्षयता जलदेन कर्तुं शक्यते।

4. आपेदिरेऽम्बरपथं परितः …………………………………. कतमां गतिमभ्युपैतु।।
भावार्थ – शुष्के सरसि खगाः सर्वतः आकाशमार्गम् प्राप्नुवन्ति, भ्रमराः रसालानां मञ्जरीणां शरणं गृह्णन्ति। हे सरोवर! त्वयि जलाभावेसति हा अतिदीनाः मत्स्याः कां स्थिति प्राप्स्यन्ति अर्थात् तेषां न कोऽपि आश्रयः।

5. एक एव खगो मानी ……………………….. याचते वा पुरन्दरम्।।
भावार्थ – एकः एव स्वाभिमानी पक्षी सारङ्ग स्तोकको वा कानने निवसति, सः तृषितः मरणम् आप्नोति अन्यथा इन्द्रं देवराजमेव याचनां करोति। (सर्वान् अन्यान् वारिदान् न याचते)।

6. आश्वास्य पर्वतकुलं ………………. यज्जलद ! सैव तवोत्तमा श्रीः।।
भावार्थ – सूर्यस्य उष्णतया प्रतप्तम् गिरिणाम् समूहे विश्वासम् उत्पाद्य विश्वस्तं वा विधायः, उन्नत काष्ठ रहितानि वनानि च समाश्वास्य, अनेकाषां सरितां महानदानां शतानां च कलेवरान् पूर्ण विधाय हे वारिद् ! यत्त्वम् स्वकीयं सर्वं त्यक्त्वा जलहीनो जातोऽसि असावेव ते श्रेष्ठतमा शोभा तदैव ते महनीयता।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

7. रे रे चातक ! सावधानमनसा ………………………………. मा ब्रूहि दीनं वचः।।
भावार्थ – हे सुहृद सारङ्ग! सावहितः सन् किञ्चित् कालम् आकर्णताम् यतः आकाशे अनेके वारिदाः सन्ति (विद्यन्ते) परञ्च निः शेषाः एव न वर्तन्ते एवं विधा। केचिद् तु धराम् वर्षायाः जलेन सिञ्चन्ति यावत् केचन तु व्यर्थमेव गर्जनां कुर्वन्ति अतः त्वं यं यं वारिदं ईक्षसे अमुष्य अमुष्य सम्मुखे याचनायाः करुणं वचनं न वद अर्थात् तं न याचस्व।

अधोलिखितानां सूक्तीनां भावबोधनं सरलसंस्कृतभाषया लिखत –
(निम्नलिखित सूक्तियों का भावबोधन सरल संस्कृत भाषा में लिखिए-)

(i) एकेन राजहंसेन या शोभा सरसो भवेत् न सा बकसहस्रेण।
भावार्थः – यथा एकेन एव हंसेन सरोवरस्य सौन्दर्यं वर्धते न तु सहस्रः बकैः तथैव एकेन एव सज्जनेन पण्डितेन सभायाः शोभा वर्धते न च सहस्रः मूर्खः। (जैसे एक ही हंस से सरोवर का सौन्दर्य बढ़ जाता है न कि हजारों बगुलों से, इसी प्रकार एक ही सज्जन या विद्वान् से सभा की शोभा बढ़ जाती है न कि हजारों मूों से।)

(ii) एक एव खगो मानी वने वसति चातकः।
पिपासितो वा म्रियते याचते वा पुरन्दरम्।।
भावार्थ: – यथा स्वाभिमानी चातकः वने निवसन्नपि तृषया मृत्यु प्राप्नोति परञ्च स्वातिबिन्दुं विना अन्यं जलं न पिबति तथैव धीराः जनाः अपि मरणासन्ने अपि कस्माद् अपि न याचन्ते, ते परमात्मानम् एव याचन्ते। (जिस प्रकार स्वाभिमानी चातक वन में रहते हुए भी प्यास से मृत्यु को प्राप्त हो जाता है परन्तु स्वाति की बूँद के अतिरिक्त अन्य जल नहीं पीता, उसी प्रकार धीर पुरुष मरने की स्थिति में भी किसी से माँगते नहीं, वे परमात्मा से ही याचना करते हैं।)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

(iii) यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो माहदानं वचः।
भावार्थ: – कविः चातकस्य व्याजेन मानवाय उपदिशति यत् संसार बहवः धनाढ्याः सन्ति परन्तु ते सर्वे उदारहदयं दातारः न भवन्ति.अत: यं यं पश्यसि त त मा याचे। (कवि बातक के बहाने मनुष्य को उपदेश देता है कि संसार में बहुत से धनवान् हैं परन्तु सभी उदार हृदय दाता नहीं हैं अतः जिस-जिस को देखो उसी-उसी से मत माँगो।)

अन्योक्तयः Summary and Translation in Hindi

पाठ-परिचय – अन्योक्ति का अर्थ है- अन्य (दूसरे) को लक्ष्य करके कही गई बात अर्थात् किसी की प्रशंसा अथवा निन्दा प्रत्यक्ष रूप से कहने की अपेक्षा किसी अन्य को माध्यम बनाकर कहना। कवियों की ऐसी अभिव्यक्ति को ही अन्योक्ति कहते हैं। ये उक्तियाँ (कथन) अत्यन्त मार्मिक होती हैं जो सीधे लक्ष्य का भेदन करती हैं। प्रस्तुत पाठ में ऐसी ही सात अन्योक्तियाँ विविध ग्रन्थों से संकलित की गई हैं जिनमें राजहंस, कोकिल, मेघ, मालाकार, सरोवर तथा चातकं के माध्यम से मानव को परोपकार आदि सवृत्तियों एवं सत्कर्मों में प्रवृत्त होने के लिए प्रेरित किया गया है। पाठ में संकलित अन्योक्तियों में छठी अन्योक्ति महाकवि माघ के ‘शिशुपालवध’ महाकाव्य से तथा सातवीं अन्योक्ति महाकवि भर्तहरि के ‘नीतिशतक’ से ली गई है तथा शेष पाँच पण्डितराज जगन्नाथ के ‘भामिनीविलास’ के अन्योक्ति भाग से संकलित हैं।

मूलपाठः,अन्वयः,शब्दार्थाः, सप्रसंग हिन्दी-अनुवादः।

1 एकेन राजहंसेन या शोभा सरसो भवेत्।
न सा बकसहस्रेण परितस्तीरवासिना।।1।।

अन्वयः – एकेन राजहंसेन सरसः या शोभा भवेत्। परितः तीरवासिना बकसहस्रेण सा (शोभा) न (भवति)।

शब्दार्थाः – एकेन राजहंसेन = एकेन मरालेन (एक हंस से), सरसः = तडागस्य, सरोवरस्य (तालाब की), या शोभा = या सौन्दर्यवृद्धिः, श्रीः (जो शोभा), भवेत् = स्यात् (होनी चाहिए), परितः = अभितः (चारों ओर), तीरवासिना = तटे स्थितैः उषितैः (किनारे पर वास करने वाले), बकसहस्त्रेण = सहस्त्रैः बकैः, बकानां सहस्रेण (हजारों बगुलों से), सा = असौ शोभा (वह शोभा) न भवति = (नहीं होती है)।।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह पद्य हमारी पाठ्यपुस्तक शेमुषी के ‘अन्योक्तयः’ पाठ से लिया गया है। मूलतः यह श्लोक पण्डितराज जगन्नाथ कृत ‘भामिनी विलास’ ग्रन्थ से संकलित है। इस श्लोक में कवि पण्डितराज जगन्नाथ सज्जन-दुर्जन का भेद वर्णन करते हैं।

हिन्दी-अनुवादः – एक (ही) हंस से तालाब की जो शोभा होनी चाहिए, चारों ओर किनारे पर रहने वाले हजारों बगुलों से वह शोभा नहीं होती।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

2. भुक्ता मृणालपटली भवता निपीता न्यम्बूनि यत्र नलिनानि निषेवितानि।
रे राजहंस ! वद तस्य सरोवरस्य, कृत्येन केन भवितासि कृतोपकारः।।2।।

अन्वयः – यत्र भवता मृणालपटली भुक्ता, अम्बूनि निपीतानि नलिनानि निषेवितानि। रे राजहंस ! तस्य सरोवरस्य केन कृत्येन कृतोपकारः भविता असि, वद।।

शब्दार्थाः – यत्र = यस्मिन् स्थाने (जहाँ), भवता = त्वया श्रीमता (आपके द्वारा), मृणालपटली = कमलनाल समूहः (कमलनालों का समूह), भुक्ता = खादिता (खाया गया, भोगा गया), अम्बूनि = जलानि (जल), निपीतानि = निःशेषेण पीतानि, सम्पूर्णरूपेण पीतानि, सम्यक् पीतानि (भलीभाँति पीया गया), नलिनानि = कमलानि (कमलों को), निषेवितानि = सेवितानि (सेवन किए गए), रे राजहंस! = रे मराल ! (अरे राजहंस!), तस्य = अमुष्य (उस), सरोवरस्य = तडागस्य, सरसः (सरोवर का, तालाब का), केन कृत्येन – केन कार्येण (किस कार्य से), कृतोपकारः = कृतः उपकारः येन सः सम्पादितोपकारः, हितकारकः (उपकार किया हुआ, प्रत्युपकार करने वाला), भविता असि = भविष्यति (होगा), वद = ब्रूहि, कथय (बोलो)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह पद्य हमारी पाठ्यपुस्तक शेमुषी के ‘अन्योक्तयः’ पाठ से लिया गया है। मूलतः यह श्लोक पण्डितराज जगन्नाथ विरचित ‘भामिनी विलास’ ग्रन्थ से संकलित है। इसमें कवि राजहंस के बहाने मनुष्य को प्रत्युपकार करने हेतु प्रेरित करता है।

हिन्दी-अनुवादः – जहाँ आपके द्वारा कमलनालों का समूह खाया गया, जल भलीभाँति पिया गया, कमलों का सेवन किया गया। हे राजहंस! उस तालाब का किस कार्य से प्रत्युपकार करने वाले होंगे अर्थात् उसका प्रत्युपकार किस कार्य से करेंगे।

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3. तोयैरल्यैरपि करुणया भीमभानौ निदाघे, मालाकार ! व्यरचि भवता या तरोरस्य पुष्टिः।
सा किं शक्या जनयितुमिह प्रावृषेण्येन वारां, धारासारानपि विकिरता विश्वतो वारिदेन।।3।।

अन्वयः – हे मालाकार! भीमभानौ निदाघे अल्पैः तोयैः अपि भवता करुणया अस्य तरोः या पुष्टिः व्यरचि। वारां प्रावृषेण्येन विश्वतः धारासारान् अपि विकिरता वारिदेन इह जनयितुम् सा (पुष्टि:) किं शक्या।।

शब्दार्थाः – हे मालाकार ! = हे उद्यानपाल, हे सक्कार ! (अरे माली!), भीमभानौ = भीमः भानुः यस्मिन् सः भीमभानुः, तस्मिन् अति तीक्ष्णांशुमति तपति (ग्रीष्मकाल में सूर्य के अत्यधिक तपने पर), निदाघे = ग्रीष्मकाले (ग्रीष्म काल में), अल्पैः तोयैः अपि = किञ्चित् जलेन अपि (थोड़े पानी से भी), भवता = त्वया (आपके द्वारा), करुणया = अनुकम्पया, दयया (करुणा द्वारा, करुणा के साथ, दया से), अस्य तरोः = एतस्य वृक्षस्य (इस वृक्ष की), या पुष्टिः = या पुष्टता, या वृद्धिः, यत्पोषणम् (जो पोषण), व्यरचि = कृता, कृतम्, रचना क्रियते (की जाती है, की गई), वाराम् = जलानां (जलों के), प्रावृषेण्येन = वर्षाकालिकेन (वर्षाकालिक, वर्षाकाल के), विश्वतः = सर्वतः (सभी ओर), धारासारान् अपि = धाराणाम् आसारा अपि (जलधाराओं के प्रवाहों को भी), विकिरता = जलं वर्षयता (जल बरसाते हुए), वारिदेन = जलदेन (बादल द्वारा), इह = अस्मिन् संसारे (इस संसार में), जनयितुम् = उत्पादयितुम् (उत्पन्न/पैदा करने के लिए), सा पुष्टिः = तत्पोषणम् (वह पुष्टि), किम् शक्या = अपि सम्भवा, सम्भवति (क्या सम्भव है)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह पद्य हमारी शेमुषी पाठ्यपुस्तक के ‘अन्योक्तयः’ पाठ से लिया गया है। मूलतः यह पद्य पण्डितराज जगन्नाथ रचित ‘भामिनी विलास’ काव्य से संकलित है। इस पद्य में कवि माली के बहाने से एक अच्छे पालनकर्ता के लक्षण बताता है।

हिन्दी-अनुवादः – अरे माली ! सूर्य के अत्यधिक तपने वाले ग्रीष्मकाल में थोड़े पानी से भी आपके द्वारा करुणा के साथ इस वृक्ष का जो पोषण किया गया है (किया जाता है) वर्षा-कालिक जल की सभी ओर से जलधाराओं के प्रवाह से भी जल बरसाते हुए बादल के द्वारा इस संसार में उस पोषण को पैदा करने में समर्थ है क्या ?

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4. आपेदिरेऽम्बरपथं परितः पतङ्गाः, भृङ्गा रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते।
सङ्कोचमञ्चति सरस्त्वयि दीनदीनो, मीनो नु हन्त कतमां गतिमभ्युपैतु।।4।।

अन्वयः – (सङ्कुचिते सरोवरे) पतङ्गाः परितः अम्बरपथम् आपेदिरे, भृङ्गाः रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते। सरः त्वयि सङ्कोचम् अञ्चति, हन्त दीनदीन: मीनः नु कतमां गतिम् अभ्युपैतु।।

शब्दार्थाः – [सङ्कुचिते सरोवरे (सरोवर के सूख जाने पर)] पतङ्गाः = खगाः (पक्षी), परितः = सर्वतः, (सभी ओर), अम्बरपथम् = आकाशमार्गम् (आकाश मार्ग को), आपेदिरे = प्राप्तवन्तः, प्राप्नुवन्ति (प्राप्त कर लिए/लेते हैं), भृङ्गाः = भ्रमराः, द्विरेफाः (भौरे, भँवरे), रसालमुकुलानि = रसालानाम् आम्राणां मुकुलानि मञ्जरीम मञ्जाः मञ्जरीणाम् (आम की मञ्जरियों को/का), समाश्रयन्ते = शरणं प्राप्नुवन्ति (आश्रय लेते हैं), सरः = हे सरोवर ! हे तडाग ! (हे तालाब !), त्वयि = ते, तव भवति (तेरे), सङ्कोचम् अञ्चति = सङ्कचिते सति गच्छति (तुम्हारे संकुचित हो जाने पर, सूखकर जल कम हो जाने पर), हन्त = खेदः (खेद है), दीनदीनः = अतिदीनः (बेचारा), मीनः नुः = मत्स्यः , मत्स्यगणः (मछलियाँ), कतमां गतिम् = कां स्थितिं (किस गति को), अभ्युपैतु = प्राप्नोतु (प्राप्त करें)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह पद्य हमारी शेमुषी पाठ्यपुस्तक के ‘अन्योक्तयः’ पाठ से लिया गया है। मूलतः यह पद्य पण्डितराज जगन्नाथ कृत् ‘भामिनी विलास’ काव्य से संकलित है। इस पद्य में कवि तालाब के माध्यम से मानव को उसकी स्थिति से अवगत कराते हुये कहता है। जैसे तालाब के सूख जाने पर सभी जीव उसे अकेला छोड़कर चले जाते हैं। वैसे मनुष्य को भी स्वार्थ पूरा होने पर छोड़ जाते हैं।

हिन्दी-अनुवादः – (सरोवर के सूख जाने पर) पक्षी चारों ओर आकाश मार्ग को प्राप्त कर लेते हैं अर्थात् आकाश में उड़ जाते हैं। भौरे आम की मञ्जरी का आश्रय ले लेते हैं (प्राप्त कर लेते हैं) हे तालाब ! तुम्हारे संकुचित हो जाने पर (सूख जाने पर) खेद है बेचारी मछलियाँ किस गति को प्राप्त करें (करेंगी)।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

5. एक एव खगो मानी वने वसति चातकः।
पिपासितो वा म्रियते याचते वा पुरन्दरम्।।5।।

अन्वयः – एकः एव मानी खग: चातक: वने वसति वा पिपासितः म्रियते पुरन्दरं याचते।।

शब्दार्थाः — एक एव मानी = एक एव स्वाभिमानी (एक ही स्वाभिमानी), खगः = पक्षी, अण्डजः (पक्षी), चातकः = स्तोककः, सारङ्गः (पपीहा), वने = कानने (वन में), वसति = निवसति (रहता है), वा = अथवा (अथवा), पिपासितः = तृषितः (प्यासा), म्रियते = मरणं प्राप्नोति, मृत्युं लभते, मृत्युं वृणोति (मर जाता है), पुरन्दरम् = इन्द्रम् (इन्द्र से), याचते = याचनां करोति (माँगता है, याचना करता है)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह पद्य हमारी शेमुषी पाठ्यपुस्तक के ‘अन्योक्तयः’ पाठ से लिया गया है। मूलतः यह पद्य पण्डितराज जगन्नाथ रचित ‘भामिनीविलास’ ग्रन्थ से लिया गया है। इस श्लोक में कवि चातक पक्षी के माध्यम से स्वाभिमान को कायम रखने के लिये कहता है।

हिन्दी-अनुवादः – एक ही स्वाभिमानी पक्षी पपीहा वन में निवास करता है (वह) या तो प्यासा (ही) मर जाता है अथवा इन्द्र से याचना करता है (किसी अन्य से नहीं)।

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6. आश्वास्य पर्वतकुलं तपनोष्णतप्तमुद्दामदावविधुराणि च काननानि।
नानानदीनदशतानि च पूरयित्वा, रिक्तोऽसि यज्जलद ! सैव तवोत्तमा श्रीः।।6।।

अन्वयः – तपनोष्णतप्तम् पर्वतकुलम् आश्वास्य उद्दामदावविधुराणि काननानि च (आश्वास्य) नानानदीनदशतानि पूरयित्वा च हे जलद ! यत् रिक्तः असि तव सा एव उत्तमा श्रीः।

शब्दार्थाः – तपनोष्णतप्तम् = सूर्यस्य उष्णतया प्रतप्तम् (सूर्य की गर्मी से तपे हुए), पर्वतकुलम् = गिरीणाम् समूहम् (पर्वतों के समूह को), आश्वास्य = विश्वासम् उत्पाद्य, समाश्वास्य सन्तोष्य (सन्तुष्ट/आश्वस्त करके), उद्दामदाववि धुराणि = उन्नतकाष्ठरहितानि (ऊँचे काष्ठों अर्थात् वृक्षों से रहित), काननानि च = बनानि च (और वनों को), [आश्वास्य = समाश्वास्य (आश्वस्त करके)], नानानदीनदशतानि = अनेकसरितः नदानां शतानि च (अनेक नदियों और सैकड़ों नदों को), पूरयित्वा च = पूर्णं कृत्वा च (और पूर्ण करके, भरकर), हे जलद ! – हे वारिद ! (हे मेघ !), यत् रिक्तः असि = यत्त्वम् जलहीनः जातोऽसि (जो तुम जलहीन हो गए हो), तव सा एव = तेऽअसावेव (तेरी वही), उत्तमा श्रीः = श्रेष्ठा/श्रेष्ठतमा शोभा (अस्ति), (उत्तम शोभा है)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च- यह पद्य हमारी शेमुषी पाठ्यपुस्तक के ‘अन्योक्तयः’ पाठ से लिया गया है। मूलतः यह पद्य महाकवि माघकृत ‘शिशुपालवधम्’ महाकाव्य से संकलित है। इस श्लोक में कवि जलद (मेघ) के माध्यम से मानव को दान और परोपकार के लिये प्रेरित करता है।

हिन्दी-अनुवादः – सूर्य की गर्मी से तपे हुए पर्वतों के समूह को सन्तुष्ट करके और ऊँचे काष्ठों अर्थात् वृक्षों से रहित वनों को आश्वस्त करके अनेक नदियों और सैकड़ों नदों को भरकर हे मेघ ! जो तुम जलहीन (खाली) हो गएं हो, वही तुम्हारी उत्तम शोभा है।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

7. रे रे चातक ! सावधानमनसा मित्र क्षणं श्रूयता –
मम्भोदा बहवो हि सन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः।
केचिद् वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचिद् वृथा,
यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः।।7।।

अन्वयः – रे रे मित्र चातक ! सावधानमनसा क्षणं श्रूयताम, गगने हि बहवः अम्भोदाः सन्ति, सर्वेऽपि एतादृशाः न (सन्ति), केचित् वसुधां वृष्टिभिः आर्द्रयन्ति, केचित् वृथा गजेन्ति, (त्व म्) यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतः दीनं वचः मा ब्रूहि।

शब्दार्थाः – रे मित्र चातक! = हे सुहृद् सारङ्ग ! (हैं मित्र पपीहे !), सावधानमनसा = सावहितः सन् (सावधान मन से), क्षणम् = क्षणमात्रम्, किञ्चित् कालम् (क्षणभर), श्रूयताम् = आकण्यताम् श्रुणुहि (सुनिए), गगने = आकाशे (आकाश में). हि = यतः (क्योंकि). बहवः = अनेके (बहत से). अभीदाः – वारिदाः (बादल हैं). सर्वेऽपि = निः शेषाः अपि (सभी), एतादृशाः = एवं विधाः (इस प्रकार के), न सन्ति = नहि वर्तन्ते (नहीं हैं), केचित् वसुधां = केचन् पृथिवी, धरातलं (धरती को), वृष्टिभिः = वर्षया जलेन (पानी बरसाकर), आद्रयन्ति – आद्रं कुर्वन्ति, सिञ्चन्ति, क्लेदयन्ति (गीला कर देते हैं), केचित् – केचन (कुछ), वृथा = व्यर्थमेव (व्यर्थ ही), गर्जन्ति = गर्जनं कुर्वन्ति (गरजते है), [त्वम् = तुम], यं यं पश्यसि = यं यम् ईक्षसे (जिस जिसको देखते हो), तस्य तस्य पुरुतः = अमुष्य अमुष्य सम्मुखे, समक्षे (उस उसके सामने), दीनं वचः = करुणवचनं (दीन वचन), मा. न (मत), ब्रूहि = वद (बोलो)।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 12 अन्योक्तयः

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह पद्य हमारी शेमुषी पाठ्यपुस्तक के ‘अन्योक्तयः’ पाठ से लिया गया है। मूलतः यह श्लोक कवि नीतिकार भर्तृहरि रचित नीति शतक से संकलित है। इस श्लोक में कवि नीतिकार मानव को चातक के माध्यम से उपदेश देता है जिस किसी के सामने हाथ मत फैलाओ क्योंकि सभी धार्मिक (बादल) दाता नहीं होते।

हिन्दी-अनुवादः – हे मित्र पपीहे ! सावधान मन से (ध्यान से) क्षणभर सुनिए कि आकाश में बहुत से बादल हैं (परन्तु) सभी इस प्रकार के नहीं हैं। कुछ तो पानी बरसाकर धरती को गीला कर देते हैं (और) कुछ व्यर्थ ही गर्जते हैं। तुम जिस जिस को देखो उस उसके सामने दीन वचन मत बोलो अर्थात् याचना मत करो।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्

Jharkhand Board JAC Class 10 Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद् Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्

JAC Class 10th Sanskrit प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद् Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखिये)
(क) कः चन्दन दासं दृष्टुम् इच्छति?
(चन्दनदास से कौन मिलना चाहता है?)
उत्तरम् :
चाणक्यः।

(ख) चन्दनदासस्य वणिज्या कीदृशी आसीत्?
(चन्दनदास का व्यापार कैसा था?)
उत्तरम् :
अखण्डिता (बाधा रहित)।

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(ग) किं दोषम् उत्पादयति?
(क्या दोष पैदा करता है?)
उत्तरम् :
गृहजन प्रच्छादनम्। (घरवालों को छुपाना)।

(घ) चाणक्य के द्रष्टुम् इच्छति?
(चाणक्य किससे मिलना चाहता है?)
उत्तरम् :
चन्दनदासम् (चन्दन दास का)।

(ङ) कः शङ्कनीयः भवति ?
(कौन शंका के योग्य होता है?)
उत्तरम् :
अत्यादरः (अधिक आदर)।

प्रश्न 2.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत –
(निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत भाषा में लिखिए)
(क) चन्दनदासः कस्य गहजनं स्वगृहे रक्षति स्म ?
(चन्दनदास किसके परिवारवालों को अपने घर में रखता था ?)
उत्तरम् :
चन्दनदासः अमात्यराक्षसस्य गृहजनं स्वगृहे रक्षति स्म।
(चन्दनदास अमात्य राक्षस के परिवार के लोगों को अपने घर में रखता था।)

(ख) तृणानां केन सह विरोधः अस्ति ?
(तिनको का किसके साथ विरोध है ?)
उत्तरम् :
तृणानाम् अग्निना सह विरोधः अस्ति।
(तिनकों का अग्नि के साथ विरोध है।)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्

(ग) पाठेऽस्मिन् चन्दनदासस्य तुलना केन सह कृता ?
(इस पाठ में चन्दनदास की तुलना किसके साथ की गई है?)
उत्तरम् :
पाठेऽस्मिन् चन्दनदासस्य तुलना शिविना सह कृता।
(इस पाठ में चन्दनदास की तुलना शिवि के साथ की गई है।)

(घ) प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः प्रतिप्रियं के इच्छन्ति ?
(कौन (लोग) प्रसन्नस्वभाव वालों से उपकार का बदला चाहते हैं ?)
उत्तरम् :
प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः प्रतिप्रियं राजानः इच्छन्ति। (राजा (लोग) प्रसन्न स्वभाव वालों से उपकार का बदला चाहते

(ङ) कस्य प्रसादेन चन्दनदासस्य वणिज्या अखण्डिता ? (किसकी कृपा से चन्दनदास का व्यापार निर्बाध था ?)
उत्तरम् :
आर्यचाणक्यस्य प्रसादेन चन्दनदासस्य वणिज्या अखण्डिता।
(आर्य चाणक्य की कृपा से चन्दनदास का व्यापार निर्बाध था।)

प्रश्न 3.
स्थूलाक्षरपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत –
(मोटे छपे शब्दों के आधार पर प्रश्न-निर्माण कीजिए)
(क) शिविना विना इदं दुष्करं कार्यं कः कुर्यात्
(शिवि के बिना यह दुष्कर कर्म कौन करे।)
उत्तरम् : केन विना इदं दुष्करं कार्य कः कुर्यात् ?
(किसके बिना यह दुष्कर कर्म कौन करे ?)

(ख) प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृत्।
(प्राणों से भी प्यारा मित्र (होता है)।)
उत्तरम् :
प्राणेभ्योऽपि प्रियः कः ?
(प्राणों से भी प्यारा कौन है?)

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(ग) आर्यस्य प्रसादेनं मे वणिज्या अखण्डिता।
(आर्य की कृपा से मेरा व्यापार निर्बाध है।)
उत्तरम् :
कस्य प्रसादेन मे वणिज्या अखण्डिता।
(किसकी कृपा से मेरा व्यापार निर्बाध है ?)

(घ) प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः राजानः प्रतिप्रियमिच्छन्ति।
(प्रसन्नस्वभाव वालों से राजा लोग प्रत्युपकार का बदला चाहते
उत्तरम् :
प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः के प्रतिप्रियमिच्छन्ति ?
(प्रसन्न स्वभाव वालों से कौन प्रत्युपकार का बदला चाहते हैं ?)

(ङ) तणानाम् अग्निना सह विरोधो भवति।
(तिनकों का आग के साथ विरोध होता है।)
उत्तरम् :
केषाम् अग्निना सह विरोधो भवति ?
(किनका अग्नि के साथ विरोध होता है ?)

प्रश्न 4.
यथानिर्देशमुत्तरत् –
(क) ‘अखण्डिता मे वणिज्या’- अस्मिन् वाक्ये क्रियापदं किम्?
(ख) पूर्वम् ‘अनृतम्’ इदानीम् आसीत् इति परस्परविरुद्ध वचने – अस्मात् वाक्यात् ‘अधुना’ इति पदस्य समानार्थकपदं चित्वा लिखत।
(ग) ‘आर्य! किं मे भयं दर्शयसि’ अत्र ‘आर्य’ इति सम्बोधनपदं कस्मै प्रयुक्तम्?
(घ) ‘प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः प्रतिप्रियमिच्छन्ति राजानः’ अस्मिन् वाक्ये कर्तृपदं किम्?
(ङ). तस्मिन् समये आसीदस्मद्गृहे’ अस्मिन् वाक्ये विशेष्यपदं किम्?
उत्तरम् :
(क) अखण्डिता
(ख) इदानीम्
(ग) चाणक्याय
(घ) राजानः
(ङ) गृहे।

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प्रश्न 5. निर्देशानुसारम् सन्धि/सन्धिविच्छेदं कुरुत –
(निर्देश के अनुसार सन्धि/सन्धि-विच्छेद कीजिए)
(क) यथा – कः + अपि = कोऽपि
प्राणेभ्यः + अपि = …………
………. + अस्मि = सज्जोऽस्मि
आत्मनः + ………. = आत्मनोऽधिकारसदृशम्।
उत्तरम् :
प्राणेभ्यः + अपि = प्राणेभ्योऽपि
सज्जः + अस्मि = सज्जोऽस्मि
आत्मनः + अधिकारसदृशम् = आत्मनोऽधिकारसदृशम्।

(ख) यथा – सत् + चित् = सच्चित्।
शरत् + चन्द्रः = ……………..।
कदाचित् + च = ……………..।
उत्तरम् :
शरत् + चन्द्रः = शरच्चन्द्रः।
कदाचित् + च = कदाचिच्च।

प्रश्न 6.
कोष्ठकेषु दत्तयोः पदयोः शुद्धं विकल्पं विचित्य रिक्तस्थानानि पूरयत –
(कोष्ठकों में दिए हुए दो पदों में से शुद्ध विकल्प चुनकर रिक्तस्थानों की पूर्ति कीजिए)
(क) …………… विना इदं दुष्करं कः कुर्यात् ? (चन्दनदासस्य/चन्दनदासेन)
उत्तरम् :
चन्दनदासेन

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(ख) …………… इदं वृत्तान्तं निवेदयामि। (गुरवे/गुरोः)
उत्तरम् :
गुरवे

(ग) आर्यस्य ……….. अखण्डिता मे वणिज्या। (प्रसादात्/प्रसादेन)
उत्तरम् :
प्रसादेन

(घ) अलम् ……………। (कलहेन/कलहात्)
उत्तरम् :
कलहेन।

(ङ) वीरः …………… बालं रक्षति। (सिंहेन/सिंहात्)
उत्तरम् :
सिंहात्।

(च) ………. भीतः मम भ्राता सोपानात् अपतत्।। (कुक्कुरेण/कुक्कुरात्)
उत्तरम् :
कुक्कुरात्।

(छ) छात्रः …………… प्रश्नं पृच्छति। (आचार्यम्/आचार्येण)
उत्तरम् :
आचार्यम्।

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प्रश्न 7.
अधोदत्तमञ्जूषातः समुचितपदानि गृहीत्वा विलोमपदानि लिखत –
(नीचे दिए गए मञ्जूषा (बॉक्स) से उचित पद लेकर विलोम पद लिखिए)
[असत्यम्, पश्चात्, गुणः, आदरः, तदानीम्, तत्र पदानि]
(क) अनादरः ………..
(ख) गुणः ………..
(ग) पश्चात् ………..
(घ) असत्यम् ………..
(ङ) तदानीम् ………..
(च) तत्र ………..
उत्तराणि :
(क) आदरः
(ख) दोषः
(ग) पूर्वम्
(घ) सत्यम्
(ङ) इदानीम्
(च) अत्र

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प्रश्न 8.
उदाहरणमनुसृत्य अधोलिखितानि पदानि प्रयुज्य पञ्चवाक्यानि रचयत –
(उदाहरण के अनुसार निम्न पदों का प्रयोग करके पाँच वाक्य बनाइए-)
यथा – निष्क्रम्य – शिक्षिका पुस्तकालयात् निष्क्रम्य कक्षां प्रविशति।
पदानि –
(क) उपसृत्य ……………….
(ख) प्रविश्य ………………
(ग) द्रष्टुम् …………………
(घ) इदानीम् ……………..
(ङ) अत्र ………………
उत्तराणि :
(क) उपसत्य स आह, एषः श्रेष्ठी चन्दनदासः।
(ख) वने प्रविश्य रामः पर्णकुटीम् अरचयत्।
(ग) अहं त्वां द्रष्टुम् इच्छामि।
(घ) इदानीं भवान् कुत्र गच्छति ?
(ङ) अत्र मम विद्यालयः स्थितः।

JAC Class 10th Sanskrit प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद् Important Questions and Answers

शब्दार्थ चयनम् –

अधोलिखित वाक्येषु रेखांकित पदानां प्रसङ्गानुकूलम् उचितार्थ चित्वा लिखत –

प्रश्न 1.
वत्स ! मणिकारश्रेष्ठिनं चन्दनदासमिदानीं द्रष्टुमिच्छामि।
(अ) रत्नकार
(ब) तथेति
(स) श्रेष्ठिन्
(द) परिक्रामतः
उत्तरम् :
(अ) रत्नकार

प्रश्न 2.
उपाध्याय ! अयं श्रेष्ठी चन्दनदासः।
(अ) स्वागतं ते
(ब) गुरुदेव
(स) आत्मगतम्
(द) वणिज्या
उत्तरम् :
(ब) गुरुदेव

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प्रश्न 3.
नन्दस्यैव अर्थसम्बन्धः प्रीतिमुत्पादयति।
(अ) नन्दराज्यम्
(ब) नन्दस्यैव
(स) धनस्य सम्बधः
(द) उत्पादयति
उत्तरम् :
(स) धनस्य सम्बधः

प्रश्न 4.
पुनरधन्यो राज्ञो विरुद्ध इति आर्येणावगम्यते ?
(अ) श्रेष्ठिन्!
(ब) आज्ञापयतु
(स) प्रथमम्
(द) नृपस्य
उत्तरम् :
(द) नृपस्य

प्रश्न 5.
अयमीदृशो विरोधः यत् त्वमद्यापि-
(अ) मतभेदः
(ब) राजापथ्यकारिणः
(स) स्वगृहे
(द) निवेदितम्
उत्तरम् :
(अ) मतभेदः

प्रश्न 6.
गृहेषु गृहजनं निक्षिप्य देशान्तरं व्रजन्ति।
(अ) इच्छतामपि
(ब) स्थापयित्वा
(स) दोषमुत्पादयति।
(द) परस्परं
उत्तरम् :
(ब) स्थापयित्वा

प्रश्न 7.
भो श्रेष्ठिन् ! शिरसि भयम्, अतिदूरं तत्प्रतिकारः।
(अ) इदानीम्
(ब) कथम् न
(स) मस्तके
(द) तंदुलः
उत्तरम् :
(स) मस्तके

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प्रश्न 8.
चन्दनदास ! एष एव ते निश्चयः ?
(अ),समर्पयामि
(ब) अयम्
(स) त्वम्
(द) तव
उत्तरम् :
(द) तव

प्रश्न 9.
क इदं दुष्करं कुर्यादिदानीं शिविना विना –
(अ) कठिन।
(ब) स्वगतम्
(स) साधुः
(द) अतिदूरम्
उत्तरम् :
(अ) कठिन।

प्रश्न 10.
ननु भवता प्रष्टव्याः स्मः –
(अ) निश्चितमेव
(ब) राज्ञो विरुद्धः
(स) प्रथमम्
(घ) पिधाय
उत्तरम् :
(अ) निश्चितमेव

संस्कृतमाध्यमेन प्रश्नोत्तराणि –

एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)

प्रश्न 1.
चाणकस्य कृपया कस्य वणिज्या अखण्डिता ?
(चाणक्य की कृपा से किसका व्यापार बाधारहित था ?)
उत्तरम् :
चन्दनदासस्य (चन्दनदास का)।

प्रश्न 2.
कः सम्बन्धः प्रीतिमुत्पादयति ?
(कौनसा सम्बन्ध प्रेम पैदा करता है ?)
उत्तरम् :
अर्थसम्बन्धः (धन का संबंध)।

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प्रश्न 3.
कुत्र अविरुद्धवृत्तिः ?
(कहाँ विरोध रहित स्वभाव वाले बनो ?)
उत्तरम् :
राजनि (राजा के प्रति)।

प्रश्न 4.
केन चन्दनदासो राज्ञो विरुद्ध इति अवगम्यते ?
(कौन ‘चन्दनदास राजा के विरुद्ध है’ यह जानता है? )
उत्तरम् :
चाणक्यः (चाणक्य)।

प्रश्न 5.
अमात्यराक्षसस्य गृहजनः का क्या गृहे असीत ?
(अमात्य राक्षस के घरवाले किसके घर में थे ?)
उत्तरम् :
चन्दनदासस्य (चन्दनदास के)।

प्रश्न 6.
चन्दनदासानुसारम् अलीकम चायनसाय क्रेन निवेदितम् ?
(चन्दनदास के अनुसार चाणवले मिथ्या किसने कहा ?)
उत्तरम् :
केनाप्यनार्येण (किलो दुष्ट थे)।

प्रश्न 7.
चन्दनदासस्य दुष्कर कार्य किमामील ?
(चन्दनदास का दुष्कर कार्य क्या था ?)
उत्तरम् :
निश्चयः (निश्चय)।

प्रश्न 8.
‘क इदं दुष्करं कुर्यादिदानीं शिविना विना’ अत्र किं क्रियापदम् ?
(‘क इदं दुष्करं कुर्यादिदानी शिविना विना’ यहाँ क्रियापद क्या है ?)
उत्तरम् :
कुर्यात् (करे)।

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प्रश्न 9.
मणिकारश्रेष्ठिनं कः द्रष्टुम् इच्छति ?
(जौहरी सेठ से कौन मिलना चाहता है ?)
उत्तरम् :
चाणक्यः (चाणक्य)।

प्रश्न 10.
चाणक्यः कं द्रष्टुम् इच्छति ?
(चाणक्य किससे मिलना चाहता है ?)
उत्तरम् :
चन्दनदासम् (चन्दनदास से)।

प्रश्न 11.
चाणक्यानुसारं चन्दनदासः राजानं प्रति कीदृशः भवितव्य ?
(चाणक्य के अनुसार चन्दनदास राजा के प्रति कैसा हो?)
उत्तरम् :
अविरुद्धवृत्तिर्भव (विरोध रहित स्वभाव वाले।)

प्रश्न 12.
कस्तावत् प्रथमम् ? (कौन प्रमुख है?)
उत्तरम् :
भवान् (आप, चन्दनदास)।

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प्रश्न 13.
के भीताः देशान्तरं व्रजन्ति ?
(डरे हुए कौन परदेश जाते हैं ?)
उत्तरम् :
राजपुरुषाः (राजपुरुष)।

प्रश्न 14.
चाणक्यानुसारं चन्दनदासस्य वचने कीदृशे आस्ताम् ?
(चाणक्य के अनुसार चन्दनदास के दोनों वचन कैसे थे ?)
उत्तरम् :
परस्परविरुद्धे (दोनों परस्पर विरुद्ध)।

प्रश्न 15.
चन्दनदासः कस्य गृहजनं न समर्पयति ?
(चन्दनदास किसके परिवारीजनों को नहीं सौंपता है?)
उत्तरम् :
राक्षसस्य (राक्षस के)।

प्रश्न 16.
अस्मिन् नाट्यांशे चन्दनदासस्य तुलना केन सह कृता ?
(इस नाट्यांश में चन्दनदास कीतुलना किसके साथ की गई है ?)
उत्तरम् :
शिविना (शिवि से)।

पूर्णवाक्येन उत्तरत (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए)

प्रश्न 17.
चन्दनदासः काम् आज्ञाम् इच्छति ?
(चन्दनदास क्या आज्ञा चाहता है ?)
उत्तरम् :
चन्दनदास: ‘किं कियत् च अस्मज्जनादिश्यते’ इति आज्ञाम् इच्छति।
(चन्दनदास ने ‘क्या और कितना हम लोगों को आदेश दिया जाता है’ ऐसी आज्ञा चाहता है।)

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प्रश्न 18.
चन्दनदासेन चाणक्यः किं प्रष्टव्यः ?
(चन्दनदास से चाणक्य क्या पूछता है?)
उत्तरम् :
यो श्रेष्ठिन ! स चापरिक्लेशः कथमाविर्भवति ?
(सेठजी, वह सुख किस प्रकार प्राप्त होता है ?)

प्रश्न 19.
चन्दनदासः कर्णौ पिधाय किम् अवदत्?
(चन्दनदास कानों को ढंककर क्या बोला ?)
उत्तरम् :
चन्दनदासः कर्णौ पिधाय अवदत्-शान्तं पापम्, शान्तं पापम्। कीदृशस्तृणानामाग्निना सह विरोधः?
(कानों पर हाथ रखकर चन्दनदास ने कहा- पाप शान्त हो, पाप शांत हो तिनकों के साथ आग का कैसा विरोध ?)

प्रश्न 20.
अमात्यराक्षसस्य गृहजनविषये चन्दनदासः कथं स्वीकरोति ?
(अमात्य राक्षस के घरवालों के विषय में चन्दनदास कैसे स्वीकार करता है ?)
उत्तरम् :
‘तस्मिन् समये तु अमात्यराक्षसस्य गृहजनः मम गृहे आसीत्’ इदानीं क्व गतः, न जानामि।
(उस समय तो अमात्य राक्षस के घरवाले मेरे घर में थे, अब कहाँ गये, नहीं जानता हूँ।)

प्रश्न 21.
चन्दनदासः कोऽस्ति ?
(चन्दनदास कौन है ?)
उत्तरम् :
चन्दनदासः मणिकारः श्रेष्ठी अस्ति।
(चन्दनदास जौहरी सेठ है।)

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प्रश्न 22.
अविरुद्धवत्तिः कस्मिन भवेत ?
(किसके प्रति अनकल व्यवहार करने वाला होना चाहिए ?)
उत्तरम् :
राजनि अविरुद्धवृत्तिर्भवेत्।
(राजा के प्रति अनुकूल व्यवहार करने वाला होना चाहिए।)

प्रश्न 23.
भीताः पूर्वराजपुरुषाः किं कुर्वन्ति ?
(डरे हुए पूर्व राजपुरुष क्या करते हैं?)
उत्तरम् :
भीताः पूर्वराजपुरुषाः पौराणामिच्छतामपि गृहेषु गृहजनं निक्षिप्य देशान्तरं व्रजन्ति।
(डरे हुए पूर्व राजपुरुष नगरवासियों के चाहने पर भी उनके घरों पर स्वजनों को रखकर परदेश चले जाते हैं।)

प्रश्न 24.
“किं मे भयं दर्शयसि” इति कः कं प्रति कथयति?
(…. कौन किसके प्रति कहता है ?)
उत्तरम् :
चन्दनदासः चाणक्यं प्रति कथयति।
(चन्दनदास चाणक्य के प्रति कहता है।)

अन्वय-लेखनम् –

अधोलिखितश्लोकस्यान्वयमाश्रित्य रिक्तस्थानानि मञ्जूषातः समुचितपदानि चित्वा पूरयत।
(नीचे लिखे श्लोक के अन्वय के आधार पर रिक्तस्थानों की पूर्ति मंजूषा से उचित पद चुनकर कीजिए।)
सुलभेष्वर्थलाभेषु ……………. …………………. शिविना विना।।

मञ्जूषा – सुलभेषु, संवेदने, शिविना, कः।

परस्य (i)……… अर्थलाभेषु (ii)……… इदं दुष्करं कर्म जने (लोके) (iii)……… विना (iv)……… कुर्यात्।
उत्तरम् :
(i) संवेदने (ii) सुलभेषु (iii) शिविनाः (iv) कः।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्

प्रश्ननिर्माणम् –

अधोलिखित वाक्येषु स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत –

1. चाणक्यः मणिकारश्रेष्ठिनं चन्दनदासं द्रष्टुमिच्छति।
(चाणक्य रत्नकार चन्दनदास को देखना चाहता है।)
2. शिष्यः चन्दनदासेन सह प्रविशति।
(शिष्य चन्दनदास के साथ प्रवेश करता है।)
3. आर्यस्य प्रसादेन अखण्डिता मे वणिज्या।
(आर्य की कृपा से मेरा व्यापार निर्विघ्न है।)
4. राजानः प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः प्रतिप्रियमिच्छन्ति।
(राजा लोग प्रसन्न प्रकृति वाले का प्रत्युपकार करते हैं।)
5. नन्दस्य अर्थसम्बन्धः प्रीतिमुत्पादयति।
(नन्द का अर्थ सम्बन्ध प्रीति पैदा करता है।)
6. राजनि अविरुद्धवृत्तिर्भवेत्।
(राजा में विरोधी प्रवृत्ति वाला नहीं होना चाहिए।)
7. भीताः पूर्वराजपुरुषाः गृहजनं निक्षिप्य देशान्तरं व्रजन्ति।
(डरे हुए पूर्व राजपुरुष घरवालों (स्वजनों) को रखकर परदेश चले जाते हैं।)
8. अग्निना सह तृणानां विरोधः।
(अग्नि के साथ तिनकों (घास) का विरोध है।)
9. प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहत्।
(प्राणों से भी प्रिय स्वजन होता है।)
(माध्यमिक परीक्षा, 2013)
10. अत्यादरः शङ्कनीयः।
(अधिक आदर शंका करने योग्य होता है।)
उत्तराणि :
1. चाणक्यः कं द्रष्टुम् इच्छति ?
2. शिष्यः केन सह प्रविशति ?
3. कस्य प्रसादेन अखण्डिता मे वणिज्या ?
4. राजानः काभ्यः प्रतिप्रियमिच्छन्ति ?
5. कस्य अर्थसम्बन्धः प्रीतिम् उत्पादयति ?
6. कस्मिन् अविरुद्धवृत्तिर्भवेत् ?
7. के गृहजनं निक्षिप्य देशान्तरं व्रजन्ति ?
8. केन सह तृणानां विरोधः ?
9. कः प्राणेभ्योऽपि प्रियः ?
10. कः शङ्कनीयः ?

भावार्थ-लेखनम् –

अधोलिखित पद्यांश संस्कृते भावार्थं लिखत सुलभेष्वर्थलाभेषु ……………………………कुर्यादिदानीं शिविना विना।।

भावार्थ – अन्यस्य वस्तु समर्पिते कृते, धन प्राप्तेषु, सहजेषु सत्सु एतत् स्वार्थं त्यक्त्वा परस्य वस्तु रक्षणं-कर्त्तव्यम् लोके कठिनम्, शिविमन्तरेण कः सम्पादयेत्।।

अधोलिखितानां सूक्तीनां भावबोधनं सरलसंस्कृतभाषया लिखत –
(निम्नलिखित सूक्तियों का भावबोध सरल संस्कृत भाषा में लिखिए-)

(i) अत्यादरः शङ्कनीयः।

भावार्थः – यः मनुष्यः अत्यधिकम् आदरं करोति, सः वञ्चनप्रयोजनेन करोति अतः अत्यधिक: आदरः शङ्कां जनयति। (जो मनुष्य अत्यधिक आदर करता है, वह छलने के प्रयोजन से करता है। अत: अधिक आदर शंका को पैदा करता है।)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्

(ii) प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः प्रतिप्रियमिच्छन्ति राजानः।

भावार्थ: – प्रसन्नेभ्यः प्रजाजनेभ्यः नृपाः प्रतिकाररूपेण आत्मानं प्रति अपि प्रियम् एव इच्छन्ति।
(प्रसन्न प्रजाजनों से राजा लोग बदले में अपने लिए भी प्रिय ही चाहते हैं।)

(iii) राजनि अविरुद्धवृत्तिर्भव।

भावार्थ: – प्रजाजनैः सदैव राजानं प्रति अनुकूलवृत्तिः एव भवेत्।
(प्रजाजनों को सदैव राजा के प्रति अनुकूल व्यवहार वाला ही होना चाहिए।)

(iv) कः पुनरधन्यो राज्ञो विरुद्धः।

भावार्थ: – कोऽपि मनुष्यः नृपस्य प्रतिकूलं कार्यं न कुर्यात्। यः नृपस्य विरुद्धः भवति सः धन्यः न भवति। (किसी भी मनुष्य को राजा के प्रतिकूल कार्य नहीं करना चाहिए। जो राजा के विरुद्ध होता है वह धन्य नहीं होता।)

(v) कीदृशस्तृणानाम् अग्निना सह विरोधः।

भावार्थ: – अग्निः तु तृणान् ज्वालयति, यतः असौ सामर्थ्यवान् भवति अत: अग्निना सह तृणानां विरोधः कथं सम्भवति तथैव नृपैः सह अपि प्रजाजनानां वैरम् अपि असम्भवः। (आग तो घास को जलाती है। क्योंकि वह सामर्थ्यवान् होती है अतः आग के साथ तिनकों का विरोध कैसे सम्भव हो सकता है। उसी प्रकार राजाओं के साथ प्रजाजनों का वैर भी असम्भव है।)

प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद् Summary and Translation in Hindi

पाठ-परिचय – ‘काव्येषु नाटकं रम्यम्’ ऐसी उक्ति प्रसिद्ध है। संस्कृत साहित्य में नाटकों की एक लम्बी श्रृंखला है जिसमें विविध नाटकों की कड़ियाँ जुड़ी हुई हैं। इन्हीं नाटकों में कूटनीति एवं राजनीति से भरपूर एक प्रसिद्ध नाटक है ‘मुद्राराक्षसम्’। प्रस्तुत पाठ ‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्’ महाकवि विशाखदत्त रचित ‘मुद्राराक्षसम्’ के प्रथम अंक से सङ्कलित है। नन्दवंश का विनाश करने के बाद उसके हितैषियों को खोज-खोजकर पकड़वाने के क्रम में चाणक्य, अमात्य राक्षस एवं उसके परिजनों की जानकारी प्राप्त करने के लिए चन्दनदास से वार्तालाप करते हैं किन्तु चाणक्य को अमात्य राक्षस के विषय में कोई सुराग न देता हुआ चन्दनदास अपनी मित्रता पर दृढ़ रहता है।

उसके मैत्री भाव से प्रसन्न होते हुए भी चाणक्य जब उसे राजदण्ड का भय दिखाता है तब चन्दनदास राजदण्ड भोगने के लिए सहर्ष प्रस्तुत हो जाता है। इस प्रकार अपने मित्र के लिए प्राणों का भी उत्सर्ग करने के लिए तत्पर चन्दनदास अपनी सुहृद्-निष्ठा का एक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत करता है।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्

मूलपाठः,शब्दार्थाः, सप्रसंग हिन्दी-अनुवादः

1.

  • चाणक्यः – वत्स ! मणिकारश्रेष्ठिनं चन्दनदासमिदानीं द्रष्टुमिच्छामि।
  • शिष्यः – तथेति (निष्क्रम्य चन्दनदासेन सह प्रविश्य) इतः इतः श्रेष्ठिन् (उभौ परिक्रामतः)
  • शिष्यः – (उपसृत्य) उपाध्याय ! अयं श्रेष्ठी चन्दनदासः।
  • चन्दनदासः – जयत्वार्यः
  • चाणक्यः – श्रेष्ठिन् ! स्वागतं ते। अपि प्रचीयन्ते संव्यवहाराणां वृद्धिलाभाः ?
  • चन्दनदासः – (आत्मगतम्) अत्यादरः शङ्कनीयः। (प्रकाशम्) अथ किम्। आर्यस्य प्रसादेन अखण्डिता मे वणिज्या।
  • चाणक्यः – भो श्रेष्ठिन् ! प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः प्रतिप्रियमिच्छन्ति राजानः।
  • चन्दनदासः – आज्ञापयतु आर्यः, किं कियत् च अस्मज्जनादिष्यते इति।

शब्दार्थाः = वत्स ! = पुत्र ! (बेटा)। मणिकारश्रेष्ठिनम् = रत्नकारं वणिजम्, रत्नानां व्यवसायिनम् (रत्नों के व्यापारी)। चन्दनदासमिदानीम् = चन्दनदास इत्याख्यम् अधुना (चन्दनदास नामक को अब)। द्रष्टुमिच्छामि = परामृष्टुं वाञ्छामि (मिलना चाहता हूँ )। तथेति = तथैव भवतु (वैसा ही हो)। निष्क्रम्य = बहिर्गत्वा (बाहर निकलकर)। चन्दनदासेन सह प्रविष्य = चन्दनदासेन श्रेष्ठिना सार्धं प्रवेशं कृत्वा (चन्दनदास के साथ प्रवेश करके)। इतः इतः = अत्र एहि (इधर-इधर आएँ)।

श्रेष्ठिन् = हे धनिक ! (हे सेठ जी !)। उभौ = द्वावेव (दोनों)। परिक्रामतः = घूमते हैं। उपसृत्य = समीपं गत्वा (पास जाकर)। उपाध्याय ! = हे गुरुदेव ! (हे गुरु जी !)। अयम् = एषः (यह)। श्रेष्ठी = धनिकः (सेठ)। जयत्वार्यः = विजयतामार्यः (आर्य की जय हो)। स्वागतं ते = अभिनन्दन भवतः (आपका स्वागत है)। अपि = किम् (क्या)। प्रचीयन्ते = वृद्धिं प्राप्नुवन्ति (बढ़ रहे हैं)। संव्यवहाराणां = व्यापाराणाम् (व्यापारों का)। वृद्धिलाभाः = लाभ वृद्धयः (लाभांशों की वृद्धि)। आत्मगतम् = मनसि एव (मन ही मन)। अत्यादरः = अत्यधिक: सम्मानः (अत्यधिक आदर)।

शङ्कनीयः = सन्देहास्पदम् (शंका करने योग्य है)। प्रकाशम् = प्रकटम् (सबके समक्ष)। अथ किम् = आम् कथन्न (जी हाँ, क्यों नहीं)। आर्यस्य = श्रीमतः (आर्य की)। प्रसादेन = कृपया (कृपा से)। अखण्डिताः = निर्बाधः (बाधा रहित हैं)। मे = मम (मेरे)। वणिज्या = व्यवसायाः वाणिज्यम् (व्यापार)। भो श्रेष्ठिन्! = रे धनिक ! (अरे सेठ जी !)। प्रीताभ्यः = प्रसन्नाभ्यः (प्रसन्नजनों के प्रति)। प्रकृतिभ्यः = प्रजायैः (प्रजा के लिये)। प्रतिप्रियमिच्छन्ति = प्रत्युपकारम् वाञ्छन्ति (उपकार के बदले उपकार करना चाहते हैं)। राजानः = नृपाः (राजा लोग)। आज्ञापयतु आर्यः = श्रेष्ठजनः आज्ञां देहि, आदिशतु (आर्य आज्ञा दें, आदेश दें)। किं कियत् च = किं कियन्मानञ्च (क्या और कितना)। अस्मज्जनादिष्यते = अस्मभ्यम् आज्ञां दीयते (हमें आज्ञा दी जाती है)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह नाट्यांश हमारी शेमुषी पाठ्य-पुस्तक के ‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सहृद’ पाठ से लिया गया है। मूलतः यह पाठ महाकवि विशाखदत्त रचित ‘मुद्राराक्षसम्’ नाटक के पहले अंक से सङ्कलित है। इस नाट्यांश में चाणक्य मणिकार चन्दनदास से मिलना चाहता है परन्तु चन्दनदास इस अत्यादर में शङ्का करता है।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्

हिन्दी-अनुवादः :

  • चाणक्य – बेटा (वत्स) ! अब मैं रत्नों के व्यापारी चन्दनदास से मिलना चाहता हूँ।
  • शिष्य – वैसा ही हो। (बाहर निकलकर और चन्दनदास के साथ प्रवेश करके) इधर, इधर (आइए) सेठ जी ! (दोनों घूमते हैं)।
  • शिष्य – (पास जाकर) गुरुदेव ! यह सेठ चन्दनदास है।
  • चन्दनदास – आर्य की जय हो।
  • चाणक्य – सेठ जी ! आपका स्वागत है। क्या व्यापार में आपकी लाभवृद्धियाँ बढ़ रही हैं ?
  • चन्दनदास – (मन ही मन) अत्यधिक आदर शंका करने योग्य होता है। (प्रकट में) जी हाँ, आर्य की कृपा से मेरे व्यापार बाधारहित हैं।
  • चाणक्य – अरे सेठ जी ! प्रसन्न स्वभाव से लोगों के लिए राजा प्रत्युपकार चाहते हैं।
  • चन्दनदास – आर्य आज्ञा दें, क्या और कितना हमारे लिए आदेश दिया जाता है।

2 चाणक्यः – भो श्रेष्ठिन् ! चन्द्रगुप्तराज्यमिदं न नन्दराज्यम्। नन्दस्यैव अर्थसम्बन्धः प्रीतिमुत्पादयति।
चन्द्रगुप्तस्य तु भवतामपरिक्लेश एव।
चन्दनदासः – (सहर्षम्) आर्य ! अनुगृहीतोऽस्मि।
चाणक्यः – भो श्रेष्ठिन् ! स चापरिक्लेशः कथमाविर्भवति इति ननु भवता प्रष्टव्याः स्मः।
चन्दनदासः – आज्ञापयतु आयः।।
चाणक्यः – राजनि अविरुद्धवृत्तिर्भव।
चन्दनदासः – आर्य ! कः पुनरधन्यो राज्ञो विरुद्ध इति आर्येणावगम्यते ?
चाणक्यः – भवानेव तावत् प्रथमम्।
चन्दनदासः – (कर्णी पिधाय) शान्तं पापम्, शान्तं पापम्। कीदृशस्तृणानामग्निना सह विरोध: ?

शब्दार्थाः – भो श्रेष्ठिन् = हे धनिक ! (अरे सेठ जी)। चन्द्रगुप्तराज्यमिदम् = चन्द्रगुप्तस्य एतद् शासनम् (यह चन्द्रगुप्त का राज्य है)। न नन्दराज्यम् = न तु नंदस्य शासनम् (न कि नन्द का राज्य)। नन्दस्यैव = नन्दस्य राज्यम् एव (नंद के राज्य में ही)। अर्थसम्बन्धः = धनस्य सम्बन्धः (धन के प्रति लगाव)। प्रीतिमुत्पादयति = स्नेहं जनयति (स्नेह पैदा करता है)। चन्द्रगुप्तस्य तु = चन्द्रगुप्तमौर्यस्य तु (चन्द्रगुप्त मौर्य का तो)। भवताम् = युष्माकम् (आपका)। अपरिक्लेश एव = दुःखाभावः एव (दुःख का अभाव ही है)। सहर्षम् = प्रसन्नतासहितम् (प्रसन्नता के साथ)। अ = श्रीमन् ! (हे श्रीमान् जी!)।

अनगृहीतोऽस्मि = सानुकम्पोऽस्मि (अनुगृहीत हुआ हूँ )। भो श्रेष्ठिन! = हे वणिक ! (अरे सेठ जी!)। स चापरिक्लेशः = असौ च दुःखाभावः (और वह दुःख का अभाव)। कथमाविर्भवति = कथम् अवतरितः (कैसे अवतरित होता है)। इति ननु भवता = एवं निश्चितमेव त्वया (इस प्रकार निश्चय ही आपके द्वारा)। प्रष्टव्याः स्मः = प्रष्टुं योग्याः स्मः (पूछने योग्य हैं)। आज्ञापयतु आर्यः = आर्यः आदिशतु (आर्य आदेश दें)। राजनि = नृपे (राजा में, राजा के प्रति)। अविरुद्धवत्तिर्भव = अविरुद्धस्वभावः भव (विरोध-रहित स्वभाव वाले बनो)।

आर्य ! = हे श्रीमन् !(हे श्रीमान् जी!)। कः पुनरधन्यो = पुनः कः हतभाग्यः (फिर कौन अभागा)। राज्ञो विरुद्धः = नृपस्य विरोधे (राजा के विरोध में)। अस्ति = है। इति आर्येणावगम्यते – इति देवेन ज्ञायते (इसे श्रीमान् द्वारा जाना जाता है, अर्थात् आप इसे जानते हैं)। भवान् एव = त्वम् एव, श्रीमान् एव (आप ही)। तावत् = तर्हि (तो)। प्रथमम् = प्रमुखः (प्रमुख हैं)। कर्णी = श्रवणौ (कानों को)। पिधाय = आच्छाद्य (बन्द करके)। शान्तं पापम् = अघः नश्यतु (पाप शान्त हो)। कीदृशस्तृणानामग्निना सह विरोधः = अनलेन सह घासस्य/तृणस्य कीदृशः मतभेदः (अग्नि के साथ तिनके का क्या विरोध)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह नाट्यांश हमारी शेमुषी पाठ्य-पुस्तक के ‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्’ पाठ से लिया गया है। मूलत: यह पाठ महाकवि विशाखदत्त रचित ‘मुद्राराक्षसम्’ नाटक के प्रथम अंक से सङ्कलित है। इस नाट्यांश में चाणक्य और चन्दनदास के संवाद के बहाने प्रसंग आरंभ किया जाता है।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्

हिन्दी-अनुवादः –

  • चाणक्य – अरे सेठ जी ! यह चन्द्रगुप्त मौर्य का राज्य है न कि नन्द का राज्य। नन्द के राज्य में ही धन के प्रति लगाव स्नेह पैदा करता है। चन्द्रगुप्त मौर्य के (राज्य में) तो आपको दुःख का अभाव ही है।
  • चन्दनदास – (प्रसन्नता के साथ) आर्य ! मैं अनुगृहीत हुआ।
  • चाणक्य – अरे सेठ जी ! और वह दुःख का अभाव अति सुख कैसे उत्पन्न होता है, यह आपको निश्चित ही हमसे पूछना चाहिए।
  • चन्दनदास – आर्य ! आदेश दें।
  • चाणक्य – राजा के प्रति अविरोधी (विरोधहीन अर्थात् अनुकूल) व्यवहार वाले बनो।
  • चन्दनदास – आर्य ! फिर ऐसा कौन अभागा है जो राजा का विरोधी हो। ऐसा श्रीमान् जानते ही हैं आप ही बताएँ।
  • चाणक्य – प्रथम (प्रमुख) तो आप ही हैं।
  • चन्दनदास – (कानों को बन्द करके अर्थात् कानों पर हाथ रखकर) पाप शान्त हो, पाप शान्त हो (अरे राम, राम) तिनकों के साथ आग का कैसा विरोध ?

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्

3 चाणक्यः – अयमीदृशो विरोधः यत् त्वमद्यापि राजापथ्यकारिणोऽमात्यराक्षसस्य गृहजनं स्वगृहे रक्षसि।
चन्दनदासः – आर्य ! अलीकमेतत्। केनाप्यनार्येण आर्याय निवेदितम्।।
चाणक्यः – भो श्रेष्ठिन् ! अलमाशङ्कया। भीताः पूर्वराजपुरुषाः पौराणामिच्छतामपि गृहेषु गृहजनं निक्षिप्य देशान्तरं व्रजन्ति। ततस्तत्तच्छादनं दोषमुत्पादयति।
चन्दनदासः – एवं नु इदम्। तस्मिन् समये आसीदस्मद्गृहे अमात्यराक्षसस्य गृहजन इति।
चाणक्यः – पूर्वम् ‘अनृतम्’, इदानीम् ‘आसीत्’ इति परस्परविरुद्ध वचने।
चन्दनदासः – आर्य ! तस्मिन् समये आसीदस्मद्गृहे अमात्यराक्षस्य गृहजन इति।

शब्दार्थाः – अयम् = एषः (यह)। ईदृशो = अस्य प्रकारस्य, एतद्विधः (ऐसा, इस प्रकार का)। विरोधः = मतभेदः (विरोध)। यत् त्वमद्यापि = यद् भवान् अधुनापि (कि आप अब, आज भी)। राजापथ्यकारिणः = नृपस्य अपकारिणः (राजा का अहित करने वाले)। अमात्यराक्षसस्य = मन्त्रिणः राक्षसस्य (मन्त्री राक्षस के)। गृहजनम् = परिवारिजनम् (परिवार वालों की)। स्वगृहे = आत्मनः भवने (अपने घर में)। रक्षसि = रक्षां करोति (रक्षा करते हो)। आर्य ! = (हे महोदय!)। अलीकमेतत् = असत्यम् इदम्, अनृतमिदम् (यह झूठ है)। केनाप्यनार्येण = कोऽपि दुष्टः (किसी दुष्ट ने)।

आर्याय = महोदयाय (आर्य से)। निवेदितम् = निवेदितवान् (निवेदन किया है; कहा है)। भो श्रेष्ठिन् = रे धनिक ! (अरे सेठजी)। अलमाशङ्कया = सन्देहस्य आवश्यकता न वर्तते, सन्देहं मा कुरु (शङ्का मत करो)। भीताः = भयाक्रान्ताः (डरे हुए)। पूर्वराजपुरुषाः = पूर्वराज्ञः सैनिकाः, पूर्वनृपस्य सेवकाः (भूतपूर्व राजा के सैनिक)। पौराणाम् = नगरवासिनाम् (नगरवासियों के)। इच्छतामपि = वाञ्छतामपि, इच्छुकानामपि (चाहने वालों के भी)। गृहेषु = भवनेषु (घरों में)। गृहजनम् = परिवारिजनान् (परिवार के लोगों को)। निक्षिप्य = स्थापयित्वा (रखकर)।

देशान्तरम् = परदेशम् (परदेश को)। व्रजन्ति = गच्छन्ति, प्रस्थानं कुर्वन्ति (चले जाते हैं)। ततः = तत्पश्चात् (उसके बाद)। तत् आच्छादनम् = तस्य गोपायनम् (उसे छिपाना, छुपाकर रखना)। दोषमुत्पादयति = अपराधं जनयति (अपराध को जन्म देता है, पैदा करता है)। एवं नु इदम् = नैवम् एत् (ऐसा नहीं है)। तस्मिन् समये = तदा (उस समय)। अस्मद् गृहे = अस्माकम् आवासे (हमारे घर पर)। अमात्यराक्षसस्य = मन्त्रिणः राक्षसस्य (अमात्य राक्षस के)। गृहजनः = परिजनः (परिवार के लोग)। आसीत् = अवर्तत (थे)। पूर्वम् = पूर्वकाले, प्रथमस्तु (पहले तो)। अनृतम् = मिथ्या, असत्यम् (झूठ)। इदानीम् = अधुना (अब)।

आसीत् = अवर्तत (था)। इति परस्परं = एवम् अन्यान्ययोः (इस प्रकार एक दूसरे .के)। विरुद्ध वचने = विपरीतकथने (विपरीत वचन होने पर)। आर्य ! = हे श्रीमन् ! (हे महोदय!)। तस्मिन् समये = तस्मिन् काले, तदा (तब, उस समय)। अस्मद्गृहे = अस्माकम् आवासे (हमारे घर में)। अमात्यराक्षसस्य = मन्त्रिणः राक्षसस्य (अमात्य राक्षस के)। गृहजनः = परिजनः (परिवार के लोग)। आसीत् = अवर्तत (था/थे)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह नाट्यांश हमारी शेमुषी पाठ्य-पुस्तक के ‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्’ पाठ से लिया गया है। मूलतः यह पाठ महाकवि विशाखदत्त रचित ‘मुद्राराक्षसम्’ नाटक के प्रथम अंक से सङ्कलित है। इस नाट्यांश में चाणक्य अपने कथ्य को चन्दनदास से कहता है और अन्वेषण आरम्भ कर देता है।।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्

हिन्दी-अनुवादः :

  • चाणक्य – यह ऐसा विरोध है कि आप अब भी राजा का अहित करने वाले मन्त्री राक्षस के परिवारवालों को अपने घर में छुपाकर रक्षा करते हैं।
  • चन्दनदास – आर्य ! यह (बिल्कुल) झूठ है। किसी दुष्ट ने (आपसे) ऐसा कह दिया है।
  • चाणक्य – अरे सेठ जी ! शंका मत करो। भूतपूर्व राजा के डरे हुए सैनिक चाहने वाले नगरवासियों के घरों में अपने परिजनों को भी रखकर परदेश को जाते हैं। तब उस अमात्य राक्षस का छुपाना दोष या अपराध को जन्म देता है।
  • चन्दनदास – ऐसा नहीं है, उस समय हमारे घर में अमात्य राक्षस के परिवार के लोग थे।
  • चाणक्य – पहले ‘अनृतम्’ (झूठ) अब ‘आसीत्’ (थे) इस प्रकार आपस में (परस्पर) विरोधी वचन है।
  • चन्दनदास – आर्य ! उस समय (तब) हमारे घर में अमात्य राक्षस के परिवार वाले थे (अब नहीं हैं)।

4. चाणक्यः – अथेदानी क्व गतः ?
चन्दनदासः – न जानामि।
चाणक्यः – कथं न ज्ञायते नाम ? भो श्रेष्ठिन् ! शिरसि भयम्, अतिदूरं तत्प्रतिकारः।
चन्दनदासः – आर्य! किं मे भयं दर्शयसि ? सन्तमपि गेहे अमात्यराक्षसस्य गृहजनं न समर्पयामि, किं पुनरसन्तम् ?
चाणक्यः – चन्दनदास ! एष एव ते निश्चयः ?
चन्दनदासः – बाढम्, एष एव मे निश्चयः।
चाणक्यः – (स्वगतम्) साधु ! चन्दनदास साधु।

सुलभेष्वर्थलाभेषु परसंवेदने जने।
क इदं दुष्करं कुर्यादिदानीं शिविना विना।।

शब्दार्थाः – अथ = एतत्पश्चात् (तो फिर)। इदानीम् = अधुना (अब)। क्व – कुत्र (कहाँ)। गतः = प्रस्थितः यातः (गए)। न जानामि = न मया ज्ञायते (नहीं जानता, मुझे पता नहीं)। कथम् न = कस्मात् न (क्यों नहीं)। ज्ञायते नाम = अवगम्यते (जानते हो)। भो श्रेष्ठिन् ! = रे धनिक ! (अरे सेठजी)। शिरसि = मस्तके (सिर पर)। भयम् = भीतिः (डर है)। तत्प्रतिकारं = तस्योपचारम् (उसका उपचार)। अतिदूरम् = अत्यधिकं दूरे स्थितम् (बहुत दूर पर है)। आर्य! = (हे महोदय)। किं मे भयं दर्शयति = अपि मां भयभीतं करोषि (क्या मुझे डरा रहे हो)।

सन्तमपि गेहे = गृहे विद्यमानं अपि (घर में होते हुए भी)। अमात्यराक्षसस्य = मन्त्रिणः राक्षसस्य (अमात्य राक्षस के)। गृहजनम् = परिवारस्य सदस्यान् (परिवारीजनों को)। न समर्पयामि = न प्रत्यर्पयामि (नहीं लौटाता)। किं पुनरसन्तम् = किं पुनः न निवसन्तम् (न रहने वालों का तो कहना क्या)। एष एव = अयमेव (यही)। ते = तव (तेरा)। निश्चयः = संकल्पः (निश्चय है)। बाढम् = आम् (हाँ)। एषः एव = अयमेव (यही)। मे = मम (मेरा)। निश्चयः = दृढसंकल्पः (निश्चय है)। स्वगतम् = आत्मगतम् (मन ही मन)। साधुः धन्यः = अतिसुन्दरम् (बहुत अच्छे, निश्चय ही, धन्य हो)। चन्दनदास साधु = धन्योऽसि चन्दनदास! (चन्दनदास, तुम धन्य हो)।

सुलभेष्वर्थलाभेषु …………………………. शिविना विना।।

अन्वयः – परस्य संवेदने अर्थलाभेषु सुलभेषु इदं दुष्करं कर्म जने (लोके) शिविना विना कः कुर्यात्।

शब्दार्थाः – परस्य = अन्यस्य (दूसरे की वस्तु को)। संवेदने = समर्पणे कृते सति (समर्पित करने पर)। सुलभेषु = धन प्राप्तेषु सहजेषु सत्सु (धन की प्राप्ति आसान हो जाने पर भी)। इदम् = एतद् स्वार्थं त्यक्त्वा परस्य वस्तुरक्षणम् (यह)। कर्म = कर्त्तव्यम् (कार्य)। जने = लोके (मनुष्यों में)। दुष्करम् = कठिनम् (मुश्किल है)। शिविना विना = शिविमन्तरेण (दानवीर शिवि के अतिरिक्त)। कः कुर्यात् = कः सम्पादयेत् (कौन करे)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह नाट्यांश हमारी शेमुषी पाठ्य-पुस्तक के ‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्’ पाठ से लिया गया है। मूलतः यह पाठ महाकवि विशाखदत्त रचित नाटक ‘मुद्राराक्षसम्’ नाटक के प्रथम अंक से सङ्कलित किया गया है। इस अंश में चाणक्य और चन्दनदास का संवाद विवाद में परिवर्तित हो जाता है।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्

हिन्दी-अनुवादः :

  • चाणक्य – तो अब कहाँ गए ?
  • चन्दनदास – मैं नहीं जानता (मुझे पता नहीं)।
  • चाणक्य – क्यों नहीं जानते हो। अरे सेठजी, डर तो सिर पर सवार है और (उसका) उपाय बहुत दूर है।
  • चन्दनदास – आर्य ! क्या मुझे डरा रहे हैं ? घर में होते हुए भी अमात्य राक्षस के परिवार के लोगों को नहीं दे सकता हूँ फिर न होने पर तो कहना ही क्या ?
  • चाणक्य – चन्दनदास ! क्या तुम्हारा यही निश्चय है ?
  • चन्दनदास – हाँ, मेरा यही निश्चय है।
  • चाणक्य – (मन ही मन) धन्य हो चन्दनदास, तुम धन्य हो।
    दूसरे की वस्तु को समर्पित करने पर धन की प्राप्ति आसान हो जाने पर भी यह (स्वार्थ त्यागकर दूसरे की वस्तु की रक्षा करने का) कार्य मनुष्यों में अत्यन्त कठिन कार्य है। दानवीर शिवि के (तुम्हारे) अलावा (अतिरिक्त) इसे और कौन करे।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

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प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखिये)
(क) कस्य दारुण विभीषिका गुर्जरक्षेत्रं ध्वंसावशेषेषु परिवर्तितवती?
(किसकी दारुण विभीषिका ने गुजरात क्षेत्र को ध्वंसावशेषों में परिणित कर दिया?)
(ख) कीदृशानि भवनानि धाराशायीनि जातानि?
(कैसे भवन धराशायी हो जाते हैं?)
(ग) दुर्वार-जलधाराभिः किमुपस्थितम्?
(कठिनाई से रोके जाने वाली जल धाराओं ने क्या उपस्थित कर दिया?)
(घ) कस्य उपशमनस्य स्थिरोपायः नास्ति?
(किसको शान्त करने का स्थिर उपाय नहीं है?)
(ङ) कीदृशाः प्राणिनः भूकम्पेन निहन्यन्ते ?
(कैसे प्राणी भूकम्प द्वारा नष्ट कर दिये जाते हैं ?)
उत्तराणि :
(क) भूकम्पस्य (भूकम्प की)
(ख) बहुभूमिकानि (बहुमञ्जिले)
(ग) महाप्लावनदृश्यम् (महान बाढ़ के दृश्य को)
(घ) भूकम्पस्य (भूकम्प के)
(ङ) विवशा (मजबूर)

प्रश्न 2.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत –
(निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत भाषा में लिखिए)
(क) समस्तराष्ट्र कीदृक् उल्लासे मग्नम् आसीत् ?
(सारा राष्ट्र कैसे उल्लास में मग्न था ?)
उत्तरम् :
समस्तराष्ट्रं नृत्य-गीतवादित्राणाम् उल्लासे मग्नम् आसीत्।।
(सम्पूर्ण राष्ट्र नाच-गान और वादनों के उल्लास में डूबा हुआ था।)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

(ख) भूकम्पस्य केन्द्रभूतं किं जनपदः आसीत् ?
(भूकम्प का केन्द्रस्थित जनपद कौन-सा था ?)
उत्तरम् :
भूकम्पस्य केन्द्रभूतं कच्छजनपदः आसीत्।
(भूकम्प का केन्द्रस्थित भुज जनपद था।)

(ग) पृथिव्याः स्खलनात् किं जायते ?
(पृथ्वी के स्खलन से क्या पैदा होता है ?)
उत्तरम् :
पृथिव्याः स्खलनात् बहुभूमिकानि भवनानि क्षणेनैव पतन्ति। विद्युद्दीपस्तम्भाः पतन्ति। गृहसोपानमार्गाः विशीर्यन्ते।
भूमिः फालद्वये विभक्ता भवति। भूमिग दुपरि निस्सरन्तीभिः दुर्वारजलधाराभिः महाप्लावनदृश्यम् उपतिष्ठति। (पृथ्वी के अपने स्थान से खिसकने (हिलने) से बहुमंजिले मकान पलभर में गिर जाते हैं। बिजली के खम्भे गिर जाते हैं। घरों की सीढ़ियाँ टूटकर बिखर जाती हैं। भूमि दो भागों में बँट जाती है। पृथ्वी के भीतरी भाग से निकलने वाली अनियंत्रित जलधाराओं से बाढ़ जैसा दृश्य उपस्थित हो जाता है।)।

(घ) समग्रो विश्वः कैः आतङ्कितः दृश्यते ?
(सम्पूर्ण विश्व किनसे आतङ्कित दिखाई देता है ?)।
उत्तरम् :
समग्रो विश्वः भूकम्पैः आतङ्कितः दृश्यते।
(सम्पूर्ण संसार भूकम्पों से आतङ्कित दिखाई देता है।)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

(ङ) केषां विस्फोटैरपि भूकम्पो जायते ?
(किनके विस्फोटों से भी भूकम्प पैदा होता है ?)
उत्तरम् :
ज्वालामुखपर्वतानां विस्फोटैरपि भूकम्पो जायते। (ज्वालामुखी पर्वतों के विस्फोटों से भी भूकम्प पैदा होता है।)

प्रश्न 3.
रेखांकितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत –
(रेखांकित शब्दों के आधार पर प्रश्नों का निर्माण कीजिए-)
(क) भूकम्पविभीषिका विशेषेण कच्छजनपदं ध्वंसावशेषेषु परिवर्तितवती।।
(भूकम्प की विभीषिका ने विशेषतः कच्छ जिले को ध्वंसावशेषों में परिवर्तित कर दिया।)
उत्तरम् :
भूकम्पविभीषिका विशेषेण कच्छजनपदं केषु परिवर्तितवती ?
(भूकम्प की विभीषिका ने विशेषतः कच्छ जिले को किसमें परिवर्तित कर दिया ?)

(ख) वैज्ञानिकाः कथयन्ति यत् पृथिव्याः अन्तर्गर्भे, पाषाणशिलानां संघर्षणेन कम्पनं जायते।
(वैज्ञानिक कहते हैं कि पृथ्वी के गर्भ में पत्थर की शिलाओं के रगड़ने से कम्पन पैदा होता है।)
उत्तरम् :
के कथयन्ति यत् पृथिव्याः अन्तर्गर्भ, पाषाणशिलानां संघर्षणेन कम्पनं जायते ?
(कौन कहते हैं कि पृथ्वी के गर्भ में पत्थर की शिलाओं की रगड़ से कंपन पैदा होता है ?)

(ग) विवशाः प्राणिनः आकाशे पिपीलिकाः इव निहन्यन्ते।
(विवश प्राणी आकाश में चींटी की तरह मारे जाते हैं।)
उत्तरम् :
विवशाः प्राणिनः कस्मिन् स्थाने (कुत्र) पिपीलिकाः इव निहन्यन्ते ?
(विवश प्राणी किस स्थान पर (कहाँ) चींटी की तरह मारे जाते हैं ?)

(घ) एतादृशी भयावहघटना गढवालक्षेत्रे घटिता।
(ऐसी भयानक घटना गढ़वाल क्षेत्र में घटी थी।)
उत्तरम् :
कीदृशी भयावहघटना गढवालक्षेत्रे घटिता ?
(कैसी भयानक घटना गढ़वाल क्षेत्र में घटी थी ?)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

(ङ) तदिदानीम् भूकम्पकारणं विचारणीयं तिष्ठति।
(तो अब भूकम्प का कारण विचारणीय है।)
उत्तरम् :
तदिदानीम् किं विचारणीयं तिष्ठति ?
(तो अब क्या विचारणीय है ?)

प्रश्न 4.
‘भूकम्पविषये’ पञ्चवाक्यमितम् अनुच्छेदं लिखत – (भूकम्प के विषय में पाँच वाक्यों का अनुच्छेद लिखिये-)
उत्तरम् :
भूकम्पेन प्रकृतेः सन्तोलनं नश्यति। प्रकृतेः असन्तोलनस्य भीषणः परिणामः भवति। भूकम्पेन बहुभूमिकानि भवनानि क्षणमात्रेण ध्वस्तानि भवन्ति। पतितेषु भवनेषु बहवः प्राणिनः मृत्युं प्राप्नुवन्ति। एवं भूकम्पेन भीषणा क्षतिः भवति। (भूकम्प से प्राकृतिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। प्रकृति के असंतुलन का भीषण परिणाम होता है। भूकम्प से बहुमंजिले मकान पलभर में गिर जाते हैं। गिरे हुए मकानों में बहुत-से प्राणी मर जाते हैं। इस प्रकार भूकम्प से भयंकर हानि होती है।)

प्रश्न 5.
कोष्ठकेष दत्तेष धातष निर्देशानसारं परिवर्तनं विधाय रिक्तस्थानानि परयत –
(कोष्ठक में दी हुई धातुओं में निर्देश के अनुसार परिवर्तन करके रिक्तस्थानों की पूर्ति कीजिए)
(क) समग्रं भारतं उल्लासे मग्नः ……………. (अस् + लट् लकारे)
(ख) भूकम्पविभीषिका कच्छजनपदं विनष्टं …………. (कृ + क्तवतु + ङीप्)
(ग) क्षणेनैव प्राणिनः गृहविहीनाः ………….. (भू + लङ्, प्रथमपुरुष, बहुवचन)
(घ) शान्तानि पञ्चतत्त्वानि भूतलस्य योगक्षेमाभ्याम् ………. (भू + लट्, प्रथमपुरुष, बहुवचन)
(ङ) मानवाः ……………….. यत् बहुभूमिकभवननिर्माणं करणीयं न वा? (पृच्छ + लट्, प्रथमपुरुष, बहुवचन)
(च) नदीवेगेन ग्रामाः तदुदरे ……………… (सम् + आ + विश् + विधिलिङ्, प्रथमपुरुष, एकवचन)
उत्तरम् :
(क) अस्ति
(ख) कृतवती
(ग) अभवन्
(घ) भवन्ति
(ङ) पृच्छन्ति
(च) समाविशे

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

प्रश्न 6.
(अ) सन्धिं/सन्धिविच्छेदं च कुरुत (सन्धि तथा सन्धि-विच्छेद कीजिए।)
(अ) परसवर्णसन्धिनियमानुसारम् (परसवर्ण सन्धि के नियमानुसार)
(क) किञ्च = ………..+ च।
(ख) ………… = नगरम् + तु।
(ग) विपन्नञ्च = ……….. + ……….।
(घ) ………… = किम् + नु।
(ङ) भुजनगरन्तु = …………… + ………..।
(च) ………… = सम् + चयः।
उत्तर :
(क) किञ्च = किं + च।
(ख) नगरन्तु = नगरम् + तु।
(ग) विपन्नञ्च = विपन्नम् + च।
(घ) किन्नु = किम् + नु।
(ङ) भुजनगरन्तु = भुजनगरम् + तु।
(च) सञ्चयः = सम् + चयः।

(आ) विसर्गसन्धिनियमानसारम (विसर्गसन्धि के नियमानुसार)
(क) शिशवस्तु = …….. + …….।
(ख)………… = विस्फोटैः + अपि।
(ग) सहस्रशोऽन्ये =……….+ अन्ये।
(घ) विचित्रोऽयम् = विचित्रः + ……।
(ङ) ……… = भूकम्पः + जायते।
(च) वामनकल्य एव = …….. + ……..।
उत्तरम् :
(क) शिशवस्तु = शिशवः + तु।
(ख) विस्फोटैरपि = विस्फोट: + अपि।
(ग) सहस्रशोऽन्ये = सहस्रशः + अन्ये।
(घ) विचित्रोऽयम् = विचित्रः + अयम्।
(ङ) भूकम्पो जायते = भूकम्प: + जायते।
(च) वामनकल्प एव = वामनकल्पः + एव।

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प्रश्न 7.
(अ) ‘क’ स्तम्भे पदानि दत्तानि ‘ख’ स्तम्भे विलोमपदानि, तयोः संयोगं करुत
(‘क’ स्तम्भ में दिए गए पदों को ‘ख’ स्तम्भ में दिए गए उनके विलोम पदों से मिलाइए-)
(क) – (ख)
सम्पन्नम् – प्रविशन्तीभिः
ध्वस्तभवनेषु – सुचिरेणैव
निस्सरन्तीभिः – विपन्नम्
निर्माय – नवनिर्मितभवनेषु
क्षणेनैव – विनाश्य
उत्तर :
(क) – (ख)
सम्पन्नम् – विपन्नम्
ध्वस्तभवनेषु – नवनिर्मितभवनेषु
निस्सरन्तीभिः – प्रविशन्तीभिः
निर्माय – विनाश्य
क्षणेनैव – सुचिरेणैव

(आ) ‘क’ स्तम्भे पदानि दत्तानि ‘ख’ स्तम्भे समानार्थकपदानि तयोः संयोगं कुरुत- (माध्यमिक परीक्षा, 2013) (‘क’ स्तम्भ में पद दिए हुए हैं और ‘ख’ स्तम्भ में उनके समानार्थी पद हैं, उन दोनों का मेल कीजिए-)
(क) – (ख)
पर्याकुलम् – नष्टाः
विशीर्णाः – क्रोधयुक्ताम्
उगिरन्तः – संत्रोट्य
विदार्य – व्याकुलम्
प्रकुपिताम् – प्रकटयन्तः
उत्तर :
(क) – (ख)
पर्याकुलम् – व्याकुलम्
विशीर्णाः – नष्टाः
उगिरन्तः – प्रकटयन्तः
विदार्य – संत्रोट्य
प्रकुपिताम् – क्रोधयुक्ताम्

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

प्रश्न 8.
(अ) उदाहरणमनुसृत्य प्रकृति-प्रत्ययोः विभागं कुरुत
(उदाहरण के अनुसार प्रकृति-प्रत्यय को पृथक् कीजिए-)
यथा – परिवर्तितवती – परि + वृत् + क्तवतु + ङीप् (स्त्री)

  • धृतवान् – …………. + …………..
  • हसन् …………. + …………..
  • विशीर्णा – वि + श + क्त + ………..
  • प्रचलन्ती – …………. + ………….. + शतृ + ङीप् (स्त्री)
  • हतः – …………. + …………..

उत्तरम् :

  • धृतवान् ‘- धृ + क्तवतु
  • हसन् – हस् + शत्र
  • विशीर्णा – वि + शृ + क्त + टाप् (स्त्री)
  • प्रचलन्ती – प्र + चल् + शतृ + ङीप् (स्त्री)
  • हतः – हन् + क्त

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

(आ) पाठात् विचित्य समस्तपदानि लिखत – (पाठ से चुनकर समस्त पद लिखिए-)
(क) महत् च तत् कम्पनम् = …………
(ख) दारुणा च सा विभीषिका = …………
(ग) ध्वस्तेषु च तेषु भवनेषु = …………
(घ) प्राक्तने च तस्मिन् युगे = ………
(ङ) महत् च तत् राष्ट्र तस्मिन् = …………
उत्तरम् :
(क) महाकम्पनम्
(ख) दारुणविभीषिका
(ग) ध्वस्तभवनेषु
(घ) प्राक्तनयुगे
(ङ) महाराष्ट्रे।

JAC Class 10th Sanskrit भूकम्पविभीषिका Important Questions and Answers

शब्दार्थ चयनम् –

अधोलिखित वाक्येषु रेखांकित पदानां प्रसङ्गानुकूलम् उचितार्थ चित्वा लिखत –

प्रश्न 1.
भारतराष्ट्र नृत्य-गीत-वादित्राणाम् उल्लासे मग्नमासीत् –
(अ) प्रसन्नतायाम्
(ब) प्रमादे
(स) भग्न
(द) दुखे
उत्तरम् :
(अ) प्रसन्नतायाम्

प्रश्न 2.
विशीर्णाः गृहसोपान-मार्गाः।
(अ) विभीषिका
(ब) नष्य
(स) विशेषेण
(द) भूकम्पस्य
उत्तरम् :
(ब) नष्य

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

प्रश्न 3.
फालद्वये विभक्ता
(अ) संपुज्य
(ब) धराः
(स) विभाजिता
(द) निस्सरन्तीभिः
उत्तरम् :
(स) विभाजिता

प्रश्न 4.
द्वित्राणि दिनानि जीवनं धारितवन्तः।
(अ) सहस्रमिताः
(ब) सहायतार्थम्
(स) मृतप्रायाः
(द) प्राणान्.
उत्तरम् :
(द) प्राणान्.

प्रश्न 5.
इयमासीत् भैरवविभीषिका कच्छभूकम्पस्य।
(अ) भीषण
(ब) ऋजु
(स) दुर्बलः
(द) कटु
उत्तरम् :
(अ) भीषण

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प्रश्न 6.
तदैव भयावहकम्पनं धराया
(अ) प्रकम्पते
(ब) प्रथिव्याः
(स) कथयन्ति
(द) संघर्षण
उत्तरम् :
(ब) प्रथिव्याः

प्रश्न 7.
विस्फोटैरपि भूकम्पो जायत इति कथयन्ति- .
(अ) कथम्
(ब) सञ्चयम्
(स) वदन्ति
(द) सर्वमेव
उत्तरम् :
(स) वदन्ति

प्रश्न 8.
ज्वालामुगिरन्त एते पर्वता अपि भीषणं भूकम्पं जनयन्ति।
(अ) नदीवेगेन
(ब) ग्रामाः
(स) पर्वताः
(द) उत्पादयन्ति
उत्तरम् :
(द) उत्पादयन्ति

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

प्रश्न 9.
यद्यपि दैवः प्रकोपो भूकम्पो नाम
(अ) ईश्वरीयः
(ब) उपशमनस्य
(स) कोऽपि
(द) तथापि
उत्तरम् :
(अ) ईश्वरीयः

प्रश्न 10.
अशान्तानि खलु तान्येव महाविनाशम् उपस्थापयन्ति।
(अ) तटबन्धम्
(ब) वस्तुतः
(स) मित्र
(घ) रिपुः
उत्तरम् :
(ब) वस्तुतः

संस्कृतमाध्यमेन प्रश्नोत्तराणि –

एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)

प्रश्न 1.
भूकम्पेन भुजनगरं कीदृशं जातम् ?
(भुजनगर भूकम्प से कैसा हो गया?)
उत्तरम् :
खण्ड-खण्डम् (टुकड़े-टुकड़े)।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

प्रश्न 2.
कीदृशानि भवनानि धराशायीनि जातानि ?
(कैसे भवन धराशायी हो गये ?)
उत्तरम् :
बहुभूमिकानि (बहुमंजिले)।

प्रश्न 3.
भूकम्पेन क्षणेन कति मानवाः मृताः ?
(भूकम्प से क्षणभर में कितने मनुष्य मर गये ?)
उत्तरम् :
सहस्रमिताः (हजारों)।

प्रश्न 4.
ध्वस्तभवनेषु सम्पीडिताः मानवाः किं कुर्वन् आसन् ?
(ध्वस्त भवनों में पीड़ित मनुष्य क्या कर रहे थे ?)
उत्तरम् :
करुणक्रन्दनम् (करुण क्रन्दन)।

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प्रश्न 5.
बृहत्यः पाषाणशिलाः कस्मात् कारणात् त्रुट्यन्ति ?
(विशाल पत्थर की शिलाएँ किस कारण से टूटती हैं ?)
उत्तरम् :
संघर्षणवशात् (घर्षण के कारण)।

प्रश्न 6.
पृथिव्याः स्खलनात् किं जायते ?
(पृथ्वी के स्खलन से क्या होता है ?)
उत्तरम् :
महाविनाशम् (महाविनाश)।

प्रश्न 7.
अग्निः शिलादिसञ्चयं किं करोति ?
(आग शिला आदि संचय का क्या करती है ?)
उत्तरम् :
क्वथयति (उबाल देती है)।

प्रश्न 8.
गगनं केन आवृणोति? (आकाश किससे ढक जाता है ?)
उत्तरम् :
धूमभस्माभ्याम् (धुआँ और राख से)।

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प्रश्न 9.
प्रकृतेः असन्तुलनवशात् किं सम्भवति ?
(प्रकृति के असन्तुलन के कारण क्या होता है ?)
उत्तरम् :
भूकम्पः (पृथ्वी का हिलना)।

प्रश्न 10.
एकस्मिन् स्थले किं न पुञ्जीकरणीयम् ?
(एक जगह पर क्या एकत्रित नहीं करना चाहिए ?)
उत्तरम् :
नदीजलम् (नदियों का पानी)।

प्रश्न 11.
भूकम्पावसरे भारतराष्ट्र केषाम् उल्लासे मग्नमासीत् ?
(भूकम्प के अवसर पर भारत राष्ट्र किसके उल्लास में डूबा हुआ था ?)
उत्तरम् :
गणतन्त्र-दिवस-पर्वणि (गणतन्त्र दिवस समारोह में)।

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प्रश्न 12.
भूकम्पस्य दारुण-विभीषिका कस्मिन् जनपदे आसीत् ?
(भूकम्प की भयंकर घटना किस जिले में थी ?)
उत्तरम् :
कच्छजनपदे (कच्छ जिले में)।

प्रश्न 13.
कति फाले विभक्ता भूमिः ?
(भूमि कितने भागों में बँट गई ?)
उत्तरम् :
फालद्वये (दो भागों में)।

प्रश्न 14.
भूमिग दुपरि निस्सरन्तीभिः दुरजलधाराभिः किं दृश्यम् उपस्थितम् ?
(धरती के भीतरी भाग से ऊपर निकलती अनियंत्रित जलधाराओं से क्या दृश्य उपस्थित हो गया ?)
उत्तरम् :
महाप्लावनम् (भयंकर बाढ़ का)।

प्रश्न 15.
कच्छजनपदे कस्य भैरवविभीषिका आसीत् ?
(कच्छजनपद में किसकी भयंकर विभीषिका थी ?)
उत्तरम् :
भूकम्पस्य (भूकम्प की)।

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प्रश्न 16.
कस्याः अन्तर्गर्भे बृहत्यः पाषाणशिलाः विद्यमानाः भवन्ति ?
(किसके भीतरी भाग में पत्थर की बड़ी-बड़ी शिलाएँ मौजूद होती हैं ?)
उत्तरम् :
पृथिव्याः (धरती के)।

प्रश्न 17.
ग्रामाः नगराणि च कस्मिन् समाविशन्ति ?
(गाँव और नगर किसमें समाविष्ट हो जाते हैं ?)
उत्तरम् :
लावारसोदरे (लावे के अन्दर)।

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प्रश्न 18.
केषां विस्फोटैः भूकम्पः जायते ?
(किनके विस्फोट से भूकंप पैदा होता है ?)
उत्तरम् :
ज्वालामुखपर्वतानाम् (ज्वालामुखी पहाड़ों के)।

प्रश्न 19.
अद्यापि विज्ञानगर्वितः मानवः कीदृशः अस्ति ?
(आज भी विज्ञान से गर्वित मानव कैसा है ?)
उत्तरम् :
वामनकल्पः (बौना-सा)।

प्रश्न 20.
केषां प्रकोपः भूकम्पः अस्ति ?
(भूकम्प किनका प्रकोप है ?)
उत्तरम् :
देवानाम् (देवताओं का)।

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पूर्णवाक्येन उत्तरत (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए)

प्रश्न 21.
भूकम्पेन कच्छजनपदस्य का दशा अभवत् ?
(भूकम्प से कच्छ जिले की क्या स्थिति हो गई ?)
उत्तरम् :
भूकम्पेन कच्छ जनपदं ध्वंसावशेषु परिवर्तितम्।
(भूकम्प से कच्छ जिला खण्डहरों में बदल गया।)

प्रश्न 22.
सहस्रमिता: प्राणिनः कथं मृताः ?
(हजारों प्राणी कैसे मर गये ?)
उत्तरम् :
भूकम्पस्य विभीषिकया सहस्रमिताः प्राणिनः मृताः।
(भूकम्प की विभीषिका से हजारों प्राणी मर गये।)

प्रश्न 23.
भूकम्पात् किं भवति ?
(भूकम्प से क्या होता है ?)
उत्तरम् :
भूकम्पात् अपार-जन-धन-हानिः भवति।
(भूकम्प से अपार जन और धन की हानि होती है।)

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प्रश्न 24.
पृथिव्याः गर्भे विद्यमानोऽग्निः किं करोति?
(धरती के गर्भ में स्थित आग क्या करती है ?)
उत्तरम् :
पृथिव्याः गर्भे विद्यमानोऽग्निः खनिजमृत्तिकाशिलादि सञ्चयं क्वथयति।
(पृथ्वी के गर्भ में स्थित आग खनिज-मिट्टी की शिलाओं के संचय को उबालती है।)

प्रश्न 25.
मानवः वामनकल्पः कुत्र भवति ? (मनुष्य बौने के समान कहाँ होता है ?)
प्रकत्याः समक्षं मानवः वामनकल्पः एव भवति।
(प्रकृति के समक्ष मानव बौना-सा ही होता है।)

प्रश्न 26.
भूकम्पेन गुर्जरराज्यं कीदृशम् अभवत् ?
(भूकम्प से गुजरात राज्य कैसा हो गया ?)
उत्तरम् :
भूकम्पेन गुर्जर-राज्यं पर्याकुलं, विपर्यस्तं क्रन्दनविकलं च जातम्।
(भूकम्प से गुजरात राज्य चारों ओर से व्याकुल, अस्त-व्यस्त तथा क्रन्दन से व्याकुल हो गया।)

प्रश्न 27.
महाप्लावनदृश्यं कथम् उपस्थितम्? (महाप्लावन का दृश्य कैसे उपस्थित हो गया ?)
उत्तरम् :
भूमिगर्भाद् उपरि निस्सरन्तीभिः दुरिजलधाराभिः महाप्लावनदृश्यम् उपस्थितम्।
(भूमि के गर्भ से ऊपर निकलती कठिनाई से रोकने योग्य जल की धाराओं से महाप्लावन का दृश्य उपस्थित हो गया।)

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प्रश्न 28.
कश्मीरप्रान्ते कदा महाकम्पनम् आगतम् ?
(कश्मीर प्रान्त में महाभूकम्प कब आया ?)
उत्तरम् :
कश्मीरप्रान्ते पञ्चोत्तरद्विसहस्रख्रीष्टाब्दे भूकम्पम् आगतम्।
(कश्मीर प्रान्त में 2005 ई. में भूकम्प आया।)

प्रश्न 29.
भूकम्पः कैः अपि जायते ?
(भूकम्प किनसे भी पैदा होता है ?)
उत्तरम् :
भूकम्पः ज्वालामुखपर्वतानां विस्फोटः अपि जायते।
(भूकम्प ज्वालामुखी पर्वतों के विस्फोटों से भी पैदा होता है।)

प्रश्न 30.
कस्य स्थिरोपायो न दृश्यते ?
(किसका स्थायी उपचार नहीं दिखाई देता ?)
उत्तरम् :
भूकम्पोपशमनस्य कोऽपि स्थिरोपायः न दृश्यते।
(भूकम्प शान्ति का कोई स्थिर उपाय नहीं दिखाई देता।)

प्रश्ननिर्माणम् –

अधोलिखित वाक्येषु स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत –

1. गुर्जरराज्ये एकोत्तरद्विसहस्त्रख्रीष्टाब्दे भूकम्पः जातः।
(गुजरात में 2001 ई. में भूकम्प आया।)
2. भूकम्पेन बहुभूमिकानि भवनानि क्षणेनैव धराशायीनि जातानि।
(भूकम्प से बहुमञ्जिले मकान क्षणभर में धराशायी हो गए।)
3. भूकम्पेन फालद्वये भूमिः विभक्ता।
(भूकम्प से धरती दो भागों में विभक्त हो गई।)
4. जलधाराभिः महाप्लावनदृश्यम् उपस्थितम्।
(जल की धाराओं से महान् बाढ़ का दृश्य पैदा हो गया।)
5. सहस्रमिताः प्राणिनस्तु क्षणेनैव भूकम्पेन मृताः।
(हजारों प्राणी क्षणभर में ही भूकम्प से मारे गए।)
6. ध्वस्तभवनेषु सम्पीडिताः क्रन्दन्ति स्म।
(ध्वस्त भवनों में पीड़ित (लोग) क्रन्दन कर रहे थे।)
7. शिशवः ईश्वरकृपया जीवनं धारितवन्तः।
(बच्चे ईश्वर की कृपा से जीवन धारण किए हुए थे।)
8. कश्मीरप्रान्ते पञ्चोत्तरद्विसहस्त्रख्रीष्टाब्दे धरायाः महत्कम्पनं जातम्।।
(कश्मीर प्रान्त में 2005 ई. में धरती का महान् कम्पन हुआ।)
9. कश्मीरे धरायाः महत्कम्पनात् लक्षपरिमिताः जनाः अकालकालकवलिताः।
(कश्मीर में धरती के महान् कम्पन से लाखों लोग असमय में काल के ग्रास बन गए।)
10. महाकम्पनेन महाविनाशदृश्यम् समुत्पद्यते।
(महाकम्पन से महाविनाश का दृश्य पैदा हो जाता है।)
उत्तराणि :
1. गुर्जरराज्ये कदा भूकम्पः जातः ?
2. भूकम्पेन कानि क्षणेनैव धराशायीनि जातानि ?
3. केन फालद्वये भूमिः विभक्ता ?
4. काभिः महाप्लावनदृश्यमुपस्थितम् ?
5. कति प्राणिनः क्षणेनैव भूकम्पेन मृताः ?
6. केषु सम्पीडिताः क्रन्दन्ति स्म ?
7. शिशवः कया जीवनं धारितवन्तः ?
8. कश्मीरप्रान्ते कदा धरायाः महत्कम्पनं जातम् ?
9. कश्मीरे जनाः अकालकालकवलिताः ?
10. केन महाविनाशदृश्यं समुत्पद्यते ?

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

पाठसार लेखनम –

प्रश्न :
‘भूकम्पविभीषिका’ इति पाठस्य सारांश: हिन्दीभाषायां लिखत।
उत्तरम् :
ईसवी सन् 2001 में गणतन्त्र दिवस समारोह में जिस समय सम्पूर्ण भारत देश तल्लीन था, उस समय अनायास ही धरती हिलने के भयंकर त्रास ने सारे ही गुजरात प्रदेश को विशेष रूप से कच्छ नाम के जनपद को खण्डहरों में बदल दिया था। केन्द्र बना भुजनामक नगर तो मिट्टी के खिलौने की तरह चकनाचूर हो गया था। अनेक मंजिलों वाले भवन तो क्षणमात्र में ही धराशायी हो गये। जल की धाराओं से महान् बाढ़ का दृश्य उपस्थित हो गया।

हजारों की संख्या में जीवधारी क्षण मात्र में ही मारे गये। घरों के नष्ट हो जाने पर पीड़ित हजारों की संख्या में दूसरे सहयोग के लिये अति करुण क्रन्दन कर रहे थे। हे विधाता! भूख से सूखे गले वाले मरणासन्न कुछ बच्चे भगवान् की कृपा से दो-तीन दिन तक ही प्राणों को धारण कर सके। कच्छ क्षेत्र में उत्पन्न भूकम्प की भयानक आपत्ति की यह स्थिति थी। ईशवी सन् 2005 में भी कश्मीर प्रदेश और पाकिस्तान देश में महान् भूकम्प आया।

जिसमें लाखों की संख्या में मानव असमय में ही मर गये। ‘धरती किस कारण से हिलती है। वैज्ञानिक इस विषय में कहते हैं कि पृथ्वी के आन्तरिक भाग में विद्यमान विशाल पत्थर की चट्टानें जिस समय आपस में टकराने से दुकड़े-टुकड़े हो जाती है उस समय भयंकर विचलन होता है। विचलन से उत्पन्न कम्पन्न उसी समय पृथ्वी के बाहरी तल पर आकर महान् कम्पन पैदा करता है। जिसके कारण अतिविनाश का दृश्य उत्पन्न हो जाता है।

ज्वालामुखी पर्वतों के विस्फोटों से भी भूकम्प होता है। ऐसा भूगर्भ रहस्य वेत्ताओं ने कहा है। भूकम्प दैवी प्रकोप है। परन्तु इसका कोई स्थायी शान्ति का कोई उपचार नजर नहीं आता है। प्रकृति के सामने आज भी मनुष्य बौना है। परंतु फिर भी भूकम्प के रहस्य को जानने वाले वैज्ञानिक कहते हैं कि बहुमञ्जिले भवनों का निर्माण नहीं करना चाहिये। पानी के बाँधों का निर्माण करके बड़ी मात्रा में नदी के जल को एक जगह संग्रह नहीं करना चाहिये। नहीं तो सन्तुलन के अभाव में भूकम्प सम्भव है।

भूकम्पविभीषिका Summary and Translation in Hindi

पाठ-परिचय – प्रकृति ने जहाँ हमें अनेक प्रकार के भौतिक सुख-साधन उपलब्ध कराए हैं, वहीं अनेक आपदाएँ भी प्रदान की हैं। कभी किसी महामारी की आपदा, बाढ़ तथा सूखे की आपदा या तूफान के रूप में भयंकर प्रलय। ये सभी आपदाएँ देखते-ही-देखते महाविनाश करके मानव-जीवन को अस्त-व्यस्त कर देती हैं। इन्हीं भयङ्कर आपदाओं में से एक है- भूकम्प। भूकम्प में पृथ्वी अकस्मात् काँपने लगती है। फलस्वरूप विशालकाय निर्माण, बहुमंजिले भवन, सड़कें और बिजली के खम्भे आदि गिरकर महाविनाश का कारण बनते हैं। प्रस्तुत पाठ इसी आपदा पर आधारित है। इस पाठ के माध्यम से बताया गया है कि किसी भी आपदा में बिना किसी घबराहट के, हिम्मत के साथ किस प्रकार हम अपनी सुरक्षा स्वयं कर सकते हैं।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

मूलपाठः,शब्दार्थाः, सप्रसंग हिन्दी-अनुवादः

1. एकोत्तरद्विसहस्रनीष्टाब्दे (2001 ईस्वीये वर्षे) गणतन्त्र-दिवस-पर्वणि यदा समग्रमपि भारतराष्ट्र नृत्य-गीत-वादित्राणाम् उल्लासे मग्नमासीत् तदाकस्मादेव गुर्जर-राज्यं पर्याकुलं, विपर्यस्तम्, क्रन्दनविकलं, विपन्नञ्च जातम्। भूकम्पस्य दारुण-विभीषिका समस्तमपि गुर्जरक्षेत्रं विशेषेण च कच्छजनपदं ध्वंसावशेषु परिवर्तितवती। भूकम्पस्य केन्द्रभूतं भुजनगरं तु मृत्तिकाक्रीडनकमिव खण्डखण्डम् जातम्। बहुभूमिकानि भवनानि क्षणेनैव धराशायीनि जातानि। उत्खाता विद्युद्दीपस्तम्भाः। विशीर्णाः गृहसोपान-मार्गाः।

शब्दार्थाः – एकोत्तर द्विसहस्रख्रीष्टाब्दे = 2001 ईस्वीये वर्षे (सन् 2001 ईग्वी वर्ष में)। गणतन्त्र-दिवस-पर्वणि = गणतन्त्रदिवसोत्सवे (गणतन्त्र दिवस समारोह में)। यदा = यस्मिन् काले जब)। समग्रमपि भारतराष्ट्रम् = सम्पूर्णोऽपि भारतदेशः (सारा भारत राष्ट्र)। नृत्य-गीत-वादित्राणाम् = नर्तनस्य, गानस्य वाद्यवादनस्य च (नाच-गाने और बाजे बजाने के)। उल्लासे = प्रसन्नतायाम् (खुशी में)। मग्नमासीत् = तल्लीनः निमग्नः, व्यापृतः वा अवर्तत (डूबा हुआ था)। तदा = तस्मिन् काले (तब)। अकस्मादेव = अनायासमेव (अचानक ही)। गुर्जर-राज्यम् = गुजराताख्यं प्रान्तम् (गुजरात प्रान्त)। पर्याकुलम् = परितः व्याकुलम् (चारों ओर से बेचैन)। विपर्यस्तम् = अस्तव्यस्तम् (अस्तव्यस्त)। क्रन्दनविकलम् = चीत्कारेण व्याकुलम् (क्रन्दन, रुदन से बेचैन)।

विपन्नम् = विपत्तियुक्तम्, विपत्तिग्रस्तम् (मुसीबत में)। जातम् = अभवत्, अजायत (हो गया, पड़ गया)। भूकम्पस्य = धरादोलनस्य (धरती हिलने की)। दारुण = भयङ्करः (भयानक)। विभीषिका = त्रासः (भयंकर घटना ने)। समस्तमपि = सम्पूर्णमपि (सारे)। गुर्जरक्षेत्रम् = गुजरातप्रदेशम् (गुजरात प्रान्त को)। विशेषेण च = विशेषरूपेण च (और विशेष रूप से)। कच्छजनपदम् = कच्छाख्यं जनपदम् (कच्छ जिले को)। ध्वंसावशेषु = नाशोपरान्त-अवशिष्टेषु भग्नावशिष्टेषु (विनाश के बाद बचे हुए खंडहरों में)। परिवर्तितवती = परिणितम् अकरोत् (बदल दिया, परिणत कर दिया)। भूकम्पस्य = धरादोलनस्य (धरती हिलने के)। केन्द्रभूतम् = मध्येस्थितम् (मध्य में या केन्द्र स्थित)। भुजनगरं तु = भुजनामकं पुरं तु (भुजनगर तो)।

मृत्तिका-क्रीडनकमिव = (मिट्टी के खिलौने की तरह)। खण्डखण्डम् = विखण्डितम् (टुकड़े-टुकड़े)। जातम् = अभवत् (हो गया)। बहुभूमिकानि भवनानि = बहव्यः भूमिकाः येषु तानि भवनानि, अनेकतलगृहाणि (बहुमंजिले मकान)। क्षणेनैव = क्षणमात्रकालेन एव (क्षणभर में ही)। धराशायीनि जातानि = पृथिव्यां पतितानि (धरती पर गिर गए)। उत्खाताः = उत्पाटिताः (उखड़ गए)। विधुदीपस्तम्भाः = दामिनी-दीप-यूपाः (बिजली के खंभे)। विशीर्णाः = नष्टाः (टूट गए)। गृहसोपान-मार्गाः = भवनस्य आरोहणपद्धत्यः (झीने, सीढ़ियाँ)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्य पुस्तक के ‘भूकम्पविभीषिका’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ भूकम्प की विभीषिका को दर्शाता है।

हिन्दी-अनुवादः – सन् 2001 ईस्वी वर्ष में जब सारा भारत राष्ट्र गणतन्त्र दिवस समारोह में नाचने, गाने और बजाने की खुशी में डूबा हुआ था तब अचानक ही गुजरात नामक प्रदेश चारों ओर से बेचैन, अस्तव्यस्त, क्रन्दन-रुदन से व्याकुल तथा विपत्तिग्रस्त हो गया। भूकम्प की भयंकर घटना ने सम्पूर्ण गुजरात प्रान्त को विशेष रूप से कच्छ जिले को भग्नावशेषों-खण्डहरों में बदल दिया। धरती हिलने के मध्य भाग में (केन्द्र में) स्थित भुज नामक नगर तो मिट्टी के खिलौने की तरह टुकड़े-टुकड़े हो गया। बहु-मंजिले मकान क्षण-भर में ही धराशायी हो गए अर्थात् गिर गए। बिजली के खम्भे उखड़ गए (और) झीने टूटकर बिखर गए अर्थात् मकानों में ऊपर जाने के लिए बनी सीढ़ियों के टुकड़े-टुकड़े हो गए।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

2. फालद्वये विभक्ता भूमिः। भूमिग दुपरि निस्सरन्तीभिः दुरजलधाराभिः महाप्लावनदृश्यम् उपस्थितम्। सहस्रमिताः प्राणिनस्तु क्षणेनैव मृताः। ध्व इम्पीडिताः सहस्रशोऽन्ये सहायतार्थं करुणकरुणं क्रन्दन्ति स्म। हा दैव ! क्षत्क्षामकण्ठाः मृतप्रायाः केचन शिशवस्तु ईश्वरकृपया एव द्वित्राणि दिनानि जीवनं धारितवन्तः।

शब्दार्थाः – फालद्वये = खण्डद्वये, द्वयोः खण्डयोः (दो भागों में)। विभक्ता = विभाजिता (बँटी हुई)। भूमिः = धरा (धरती)। भूमिग दुपरि = पृथिव्या गर्भात् (धरती के अन्दर से)। निस्सरन्तीभिः = निर्गच्छन्तीभिः (निकलती हुई)। दुर्वार = दुःखेन निवारयितुं योग्यम् (अनियन्त्रित, जिनको रोकना कठिन है; न रोके जाने योग्य)। जलधाराभिः = तोयधाराभिः (पानी की धाराओं से)। महाप्लावनदृश्यम् = महत्प्लावनस्य दृश्यम् (भयंकर बाढ़ का दृश्य)। उपस्थितम् = प्रस्तुतम्, उपस्थितोऽजायत् (उपस्थित हो गया था)। सहस्रमिताः = सहस्रसंख्यकाः, सहस्रपरिमिताः (हजारों की संख्या में)। प्राणिनस्तु = जीवधारिणः तु (प्राणी तो)। क्षणेनैव = पलमात्रेण एव (पलभर में ही)। मृताः = हताः (मारे गए)।

ध्वस्तभवनेषु = विनष्टावासेषु, गृहेषु (गिरे हुए भवनों में)। सम्पीडिताः = पीडिताः (पीडित)। सहस्रशोऽन्ये = सहस्रसंख्यकाः अपरे (हजारों दूसरे)। सहायतार्थम् = सहयोगार्थम् (सहायता के लिए)। करुणकरुणम् = अतिकरुणया (करुणामय)। क्रन्दन्ति स्म = क्रन्दनं कुर्वन्ति स्म (क्रन्दन कर रहे थे)। हा दैव ! = हा विधातः ! (हाय विधाता)। क्षुत्क्षामकण्ठाः = क्षुधाक्षामः कण्ठाः येषाम् ते, बुभुक्षया दुर्बलस्वरः (भूख से दुर्बल स्वर वाले)। मृतप्रायाः = मरणासन्नाः (मरणासन्न)। केचन् = केचिद् (कुछ)। शिशवस्तु = बालाः तु (छोटे बच्चे तो)। ईश्वरकृपया एव = भगवत्कृपया एव (ईश्वर की कृपा से ही)। द्वित्राणि दिनानि = द्वे त्रीणि दिनानि वा (दो या तीन दिन)। जीवनम् =प्राणान् (प्राणों को)। धारितवन्तः =धृतवन्तः (धारण किया)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्य-पुस्तक के ‘भूकम्पविभीषिका’ पाठ से लिया गया है। गद्यांश में भूकम्प द्वारा किये गये विनाश का चित्रण है।

हिन्दी-अनुवादः – धरती दो भागों में बँट गई। बैंटी हुई धरती के अन्दर से निकलती हुई न रोके जाने योग्य पानी की धाराओं से भयंकर बाढ़ का-सा दृश्य उपस्थित हो गया था। हजारों की संख्या में जीवधारी (प्राणी) तो पल-भर में ही मारे गए। गिरे हुए (ध्वस्त) भवनों में पीड़ित हजारों दूसरे सहयोग के लिए (सहायता के लिए) करुणापूर्ण क्रन्दन कर रहे थे। हाय विधाता ! भूख से दुर्बल कण्ठ (स्वर) वाले मरणासन्न कुछ बालक तो ईश्वर की कृपा से ही दो-तीन दिन प्राणों (जीवन) को धारण किए रहे अर्थात् जीवित रहे।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

3. इयमासीत् भैरवविभीषिका कच्छभूकम्पस्य। पञ्चोत्तरद्विसहस्त्रनीष्टाब्दे (2005 ईस्वीये वर्षे) अपि कश्मीरप्रान्ते पाकिस्तानदेशे च धरायाः महत्कम्पनं जातम्। यस्मात्कारणात् लक्षपरिमिताः जनाः अकालकालकवलिताः। पृथ्वी कस्मात्प्रकम्पते वैज्ञानिकाः इति विषये कथयन्ति यत् पृथिव्या अन्तर्गर्भे विद्यमानाः बृहत्यः पाषाणशिला यदा संघर्षणवशात् त्रुट्यन्ति तदा जायते भीषणं संस्खलनम, संस्खलनजन्यं कम्पनञ्च। तदैव भयावहकम्पनं धराया उपरितलमप्यागत्य महाकम्पनं जनयति येन महाविनाशदृश्यं समुत्पद्यते।

शब्दार्थाः – इयम् = एषा (यह ऐसी)। कच्छभूकम्पस्य = कच्छक्षेत्रे आगतस्य धरादोलनस्य (कच्छ क्षेत्र में आए भूकम्प की)। भैरवविभीषिका = भीषणा आपदा (भयंकर घटना, भयावह आपदा)। आसीत् = अवर्तत (थी)। पञ्चोत्तरद्विसहस्रख्रीष्टाब्दे = 2005 ईस्वीये वर्षे (सन् 2005 ई. वर्ष में)। अपि = (भी)। कश्मीरप्रान्ते = शारदादेशे (कश्मीर में)। पाकिस्तानदेशे च = (पाकिस्तान देश में, और पाकिस्तान में)। धरायाः = भुवः, (पृथ्वी का)। महत्कम्पनम् = प्रभूतं महद्दोलनमजायत (बहुत अधिक कम्पन हुआ)। यस्मात् कारणात् = यस्मात् हेतोः (जिस कारण से, जिससे)।

लक्षपरिमिताः = शतसहस्रमिताः, शतसहस्रसंख्यकाः (लाखों की संख्या में)। जनाः = मनुष्याः, मानवाः (लोग)। अकालकालकवलिताः = असमये एव दिवंगताः (अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए, असमय ही मर गये)। पृथ्वी = धरा (धरती)। कस्मात् = केन कारणेन (किस कारण से)। प्रकम्पते = दोलायते (हिलती है)। वैज्ञानिकाः = विज्ञानवेत्तारः (मौसम विज्ञान के जानकार)। इति विषये = अस्मिन् सन्दर्भे (इस विषय में)। कथयन्ति = वदन्ति (बोलते हैं, कहते हैं)। यत् = (कि)। पृथिव्याः अन्तर्गर्भे = धरायाः निम्नभागे, आन्तरिकभागे वा (पृथ्वी के केन्द्र भाग में)।

विद्यमानाः = उपस्थिताः (विद्यमान, मौजूद)। बृहत्यः = विशाला: (बड़ी-बड़ी)। पाषाण-शिलाः = प्रस्तर या भीतरी पट्टिकाः (पत्थर की शिलाएँ)। यदा = यस्मिन् काले (जब)। संघर्षणवशात् = परस्परघर्षणात् (आपस में टकराने से)। त्रुटयन्ति = भञ्जन्ति, खण्डखण्डं भवन्ति (टुकड़े-टुकड़े होती हैं)। तदा = तस्मिन् काले (तब)। भीषणं = भयंकरम् (भयंकर)। संस्खलनम् = विचलनम् (खिसकना, दूर हटना)। जायते = भवति (होता है)। संस्खलनजन्यम् = विचलनात् उत्पन्नम् (खिसकने से उत्पन्न)।

कम्पनञ्च = दोलनञ्च (हिलना, काँपना)। तदैव = तस्मिन्नेव काले (उसी समय, तभी)। भयावहकम्पनम् = भयंकरम् दोलनम् (भयानक कंपन)। धरायाः = पृथिव्याः (धरती के)। उपरितलमप्यागत्य = बाह्य तलं प्राप्य (ऊपर के तल पर आकर)। महाकम्पनम् = महद्दोलनम् (अत्यधिक कम्पन)। जनयति = उत्पन्नं करोति (पैदा करता है)। येन = येन कारणेन (जिससे)। महाविनाशदृश्यम् = (महाविनाश का दृश्य)। समुत्पद्यते = प्रादुर्भवति, उद्भवति (पैदा होता है)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्य-पुस्तक के ‘भूकम्पविभीषिका’ पाठ से उद्धृत है। इस गद्यांश में सन् 2005 ईसवी में आये भूकम्प की भयानक विभीषिका का चित्रण है।

हिन्दी-अनुवादः- यह कच्छक्षेत्र में आई भूकम्प की भयंकर आपदा (घटना) थी। सन् 2005 ई. में भी कश्मीर प्रान्त में और पाकिस्तान देश में पृथ्वी का बहुत अधिक कम्पन हुआ, जिससे लाखों की संख्या में लोग अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए अर्थात् असमय में ही मर गए। धरती किस कारण से काँपती है। मौसम विज्ञान के जानकार इस विषय में कहते हैं कि पृथ्वी के आन्तरिक (भीतरी) भाग में विद्यमान बड़ी-बड़ी पत्थर की शिलाएँ जब आपस में टकराने से टूटती हैं (टुकड़े-टुकड़े होती हैं) तब भयंकर स्खलन होता है। स्खलन से कम्पन उत्पन्न होता है। तभी भयानक कम्पन पृथ्वी के ऊपरी तल पर आकर अत्यधिक कम्पन उत्पन्न करता है, जिससे अत्यधिक विनाश का दृश्य पैदा होता है।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

4. ज्वालामुखपर्वतानां विस्फोटैरपि भूकम्पो जायत इति कथयन्ति भूकम्पविशेषज्ञाः। पृथिव्याः गर्भे विद्यमानोऽग्निर्यदा खनिजमृत्तिकाशिलादिसञ्चयं क्वथयति तदा तत्सर्वमेव लावारसताम् उपेत्य दुरगत्या धरां पर्वतं वा विदार्य बहिनिष्क्रामति। धूमभस्मावृतं जायते तदा गगनम्। सेल्सियस-ताप-मात्राया अष्टशताङ्कता मुपगतोऽयं लावारसो यदा नदीवेगेन प्रवहति तदा पार्श्वस्थग्रामा नगराणि वा तदुदरे क्षणेनैव समाविशन्ति। निहन्यन्ते च विवशाः प्राणिनः। ज्वालामुदगिरन्त एते पर्वता अपि भीषणं भूकम्पं जनयन्ति।।

शब्दार्थाः – ज्वालामुखपर्वतानाम् = अग्न्याननगिरीणाम् (ज्वालामुखी पर्वतों के)। विस्फोटैरपि = विस्फोटै: अपि (विस्फोटों से भी)। भूकम्पो जायते = धरादोलनं भवति (धरती में कम्पन होता है) (इति = ऐसा)। भूकम्प-विशेषज्ञाः = भुवः कम्पन-रहस्यस्य ज्ञातारः (भूमि के काँपने के रहस्य को जानने वाले)। कथयन्ति = वदन्ति, आहुः, ब्रुवन्ति (कहते हैं)। पृथिव्याः = धरायाः (धरती के)। गर्भे = आन्तरिक-भागे (भीतरी भाग में)। विद्यमानः = स्थितः (उपस्थित)। अग्निः = अनलः, पावकः, हुताशनम् (आग)। यदा = यस्मिन् काले (जब)। खनिज = उत्खननात् प्राप्तं द्रव्यम् (खनिज)। मृत्तिका = मृद् (मिट्टी)। शिलादिसञ्चयम् = प्रस्तरपट्टिकादीनां संग्रहम् (शिला आदि के संचय को)। क्वथयति = उत्तप्तं करोति (उबालती है, तपाती है)। तदा = ततः (तब)। तत्सर्वमेव = तत्सम्पूर्णं, सकलमेव (वह सब ही)।

लावारसताम् = खनिद्रव-रसत्वम्, लावाद्रवत्वम् (लावा द्रवत्व को)। उपेत्य = प्राप्य (प्राप्त करके)। दुर्वारगत्या = अनियन्त्रित-वेगेन (अनियन्त्रित वेग से)। धराम् = पृथिवीम् (धरती को)। वा = अथवा। पर्वतम् = गिरिम् (पहाड़ को)। विदार्य = विदीर्णं कृत्वा (फाड़कर)। बहिर्निष्क्रामति = बहिर् निस्सरति, उपर्यागच्छति (बाहर निकलता है)। तदा = तस्मिन् काले (तब, उस समय)। गगनम् = आकाशमण्डलम् (आकाश)। धूमभस्मावृतं जायते = धूमेन, भस्मेन च आवृतं भवति (धुआँ और राख से ढक जाता है)। सेल्सियसतापमात्रायाः = तापस्य परिमाणमस्य सेल्सियसः (ताप के परिमाण की मात्रा का सेल्सियस)। अष्टशताकताम् = अष्टशत-अङ्कपर्यन्तम् (800 डिग्री तक)। उपगतो = उपेतः (प्राप्त हुआ)। अयम् = एषः (यह)। लावारसः = खनिद्रवप्रवाहः (लावा)। यदा = यस्मिन् काले (जिस समय)।

नदीवेगेन = तटिनी गत्या (नदी के वेग से)। प्रवहति = द्रवति (बहता है)। तदा = तरिमन् काले (उस समय)। पार्श्वस्थ = (समीप)। स्थिता: ग्रामाः = निकटस्थग्रामाः (पास या समीप में स्थित, आस-पास के)। ग्रामाः नगराणि वा = वसत्यः, पुराणि वा (गाँव अथवा नगर)। तदुदरे = तत् कुक्षौ, जठरे (उसके पेट में)। क्षणेनैव = पलमात्रेणैव (क्षणमात्र में ही)। समाविशन्ति = अन्तः गच्छन्ति, समाविष्टाः भवन्ति (समा जाते हैं)। निहन्यन्ते = म्रियन्ते (मारे जाते हैं)। विवशाः प्राणिनश्च = अवशाः जीव-जन्तवः (बेबस जीव-जन्तु)। ज्वालामुगिरन्तः = अग्निं प्रकटयन्तः वमन्तः (आग उगलते हुए)। एते पर्वताः = इमे गिरयः (ये पर्वत)। अपि = (भी)। भीषणम् = भयंकरम् (भयावह)। भूकम्पं जनयन्ति = धरादोलनं उत्पादयन्ति (भूकम्प को पैदा करते हैं)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्य-पुस्तक के ‘भूकम्पविभीषिका’ पाठ से उद्धृत है। इस गद्यांश में भूकम्प के कारणों का उल्लेख किया गया है। ज्वालामुखी पर्वत का विस्फोट इनमें से प्रमुख है।

हिन्दी-अनुवादः – ज्वालामुखी पर्वतों के विस्फोटों से भी धरती काँपती (हिलती) है, ऐसा भूमि के काँपने के रहस्य को जानने वाले कहते हैं। धरती के गर्भ में स्थित आग जब खनिज, मिट्टी, शिला आदि के संचय (समूह) को उबालती (तपाती) है, तब वह सब ही लावा-द्रवत्व को प्राप्त होकर अनियन्त्रित वेग (गति) से धरती अथवा पहाड़ को फाड़कर (चीरकर) बाहर निकलता है। उस समय आकाश धुएँ और राख से ढक जाता है। ताप के परिमाण की मात्रा 800° सेल्सियस तक पहुँचा हुआ यह लावा जब नदी के वेग से बहता है, उस समय आस-पास के गाँव अथवा शहर उसके पेट में (गर्भ में) क्षणमात्र में समाविष्ट (विलीन) हो जाते हैं। विवश (बेबस) जीव-जन्तु मारे जाते हैं। आग उगलते हुए ये पर्वत भी भयंकर भूकम्प को पैदा करते हैं।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

5 यद्यपि दैवः प्रकोपो भूकम्पो नाम, तस्योपशमनस्य न कोऽपि स्थिरोपायो दृश्यते। प्रकृति-समक्षमद्यापि विज्ञानगर्वितो मानवः वामनकल्प एव तथापि भूकम्परहस्यज्ञाः कथयन्ति यत् बहुभूमिकभवननिर्माणं न करणीयम्। तटबन्ध निर्माय बृहन्मानं नदीजलमपि नैकस्मिन् स्थले पुञ्जीकरणीयम् अन्यथा असन्तुलनवशाद् भूकम्पस्सम्भवति। वस्तुतः शान्तानि एव पञ्चतत्त्वानि क्षितिजलपावकसमीरगगनानि भूतलस्य योगक्षेमाभ्यां कल्पन्ते। अशान्तानि खलु तान्येव महाविनाशम् उपस्थापयन्ति।

शब्दार्थाः – भूकम्पः = धरादोलनम् (धरती का हिलना)। दैवः = ईश्वरीय (दैवीय)। प्रकोपः = प्रकृष्टः कोप: (अत्यधिक कोप है)। तस्य = (उसके)। उपशमनस्य = शान्तेः (शान्त करने का)। कोऽपि = कश्चिदपि (कोई भी)। स्थिरोपायो = स्थायी उपचारः (स्थायी इलाज)। न दृश्यते = न लक्ष्यते (दिखाई नहीं देता है)। प्रकृतिसमक्षम् = प्रकृत्याः, निसर्गस्य सम्मुखे (प्रकृति के सामने)। अद्यापि = अधुनापि, इदानीमपि (आज भी)। मानवः = मनुष्यः (मनुष्य)। वामनकल्प एव = ह्रस्वकायः सदृशः ह्रस्वः (बौने की तरह ही)। (अस्ति = है।) तथापि = पुनरपि (फिर भी)। भूकम्परहस्यज्ञाः = धरादोलनरहस्यविदः (धरती हिलने के रहस्य को जानने वाले)। कथयन्ति = ब्रुवन्ति, आहुः (कहते हैं)। यत् = कि। बहुभूमिकभवननिर्माणम् = अनेकतलोपेतानां गृहाणां सर्जनम् [अनेक तलों से (मंजिलों से) युक्त घरों का निर्माण)। न करणीयः = न कर्त्तव्यम् (नहीं करना चाहिए)।

तटबन्धम् = जलबंधम् (बाँध)। निर्माय = निर्माणं कृत्वा (बनाकर)। बृहन्मात्रम् = विशालमात्रम् (बहुत मात्रा में)। नदीजलमपि = सरित्तोयमपि (नदी का पानी भी)। एकस्मिन् स्थले = एकस्मिन्नेव स्थाने (एक ही स्थान पर)। न पुञ्जीकरणीयम् = नैकत्र करणीयम्, संग्रहणीयम् (इकट्ठा नहीं करना चाहिए)। अन्यथा = नहीं तो। असन्तुलनवशात् = सन्तुलनाभावात् (सन्तुलन के अभाव में)। भूकम्पः = धरादोलनम् (धरती का हिलना)। सम्भवति = सम्भाव्यमस्ति (सम्भव होता है)। वस्तुतः = यथार्थतः (वास्तव में)। शान्तानि एव = प्रशान्तान्येव (प्रशान्त ही)। पञ्चतत्त्वानि = पृथिव्यादिनि पञ्चतत्त्वानि (धरती आदि पाँच तत्त्व)।

क्षितिजलपावकसमीरगगनानि = पृथ्वी, आपः, अग्निः, वायुः, आकाशादीनि (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश आदि)। भूतलस्य = धरातलस्य (पृथ्वीतल की)। योगक्षेमाभ्यां = अप्राप्तस्य प्राप्तिः, योगः प्राप्तस्य रक्षणम् (क्षेमः) ताभ्याम् (अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा)। कल्पन्ते = रचयन्ति (रचना करते हैं)। अशान्तानि = शमनाभावे (शान्ति के अभाव में)। खलु = वस्तुतः (वास्तव में)। तान्येव = अमूनि एव (वे ही)। महाविनाशम् = महाप्रलयं (महान् विनाश को)। उपस्थापयन्ति = उपस्थितं कुर्वन्ति (उपस्थित करते हैं)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्य पुस्तक के ‘भूकम्पविभीषिका’ पाठ से उद्धृत है। इस गद्यांश में भूकम्प के अन्य कारणों को दर्शाया है।

हिन्दी-अनुवादः – यद्यपि धरती का हिलना एक ईश्वरीय प्रकोप है, तथापि उसको शान्त करने का कोई स्थायी उपचार दिखाई नहीं देता है। प्रकृति के सामने आज भी मनुष्य बौने के समान ही है। फिर भी धरती हिलने के रहस्य को जानने वाले (लोग) कहते हैं कि हमें बहुमंजिले मकान नहीं बनाने चाहिए (और) बाँधों का निर्माण करके अत्यधिक मात्रा में नदी का जल भी एक जगह इकट्ठा नहीं करना चाहिए, नहीं तो असन्तुलन होने के कारण या सन्तुलन के अभाव में धरती का हिलना सम्भव है। वास्तव में पाँचों प्रशान्त तत्त्व-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश पृथ्वी तल के योग (अप्राप्त की प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त की रक्षा) की रचना करते हैं; अर्थात् उपर्युक्त पाँचों तत्त्वों के शान्तिपूर्ण सन्तुलन में ही पृथ्वी की कुशलता निहित है। अशान्त होने पर वास्तव में वे ही तत्त्व पृथ्वी पर महाविनाश उपस्थित कर देते हैं।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

Jharkhand Board JAC Class 10 Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 9 सूक्तयः Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

JAC Class 10th Sanskrit सूक्तयः Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत। (एक शब्द में उत्तर लिखिये)
(क) पिता पुत्राय बाल्ये किं यच्छति? (पिता पुत्र के लिये बचपन में क्या देता है?)
उत्तरम् :
विद्याधनम् (विद्यारूपी धन)।

(ख) विमूढधीः कीदृशीं वाचं परित्यजति? (मूढ़ कैसी वाणी त्यागता है?)
उत्तरम् :
धर्मप्रदाम् (धर्म प्रदान करने वाली)।

(ग) अस्मिन् लोके के एव चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तिताः? (इस लोक में कैसे व्यक्ति आँखों वाले कहलाते हैं?)
उत्तरम् :
विद्वान्सः (विद्वान लोग)।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

(घ) प्राणेभ्योऽपि कः रक्षणीयः? (प्राणों से भी कौन रक्षा करने योग्य है?)
उत्तरम् :
सदाचारः (सदाचरण)।

(ङ) आत्मनः श्रेयः इच्छन् नरः कीदृशं कर्म न कुर्यात्?
(अपना श्रेय चाहने वाले व्यक्ति को कैसा कर्म नहीं करना चाहिये?)
उत्तरम् :
परेभ्योऽहितम् (दूसरों के लिये अहित)।

(च) वाचि किं भवेत्? (वाणी कैसी हो?)
उत्तरम् :
धर्मप्रदा।

प्रश्न 2.
स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्न निर्माणं कुरुत (मोटे पदों के आधार पर प्रश्न निर्माण कीजिये।)
यथा – विमूढधीः पक्वं फलं परित्यज्य अपक्वं फलं भुङ्क्ते?
कः पक्वं फलं परित्यज्य अपक्वं फलं भुङ्क्ते।
(क) संसारे विद्वांसः ज्ञानचक्षुभिः नेत्रवन्तः कथ्यन्ते।
उत्तरम् :
संसारे के ज्ञानचक्षुभिः नेत्रवन्तः कथ्यन्ते?

(ख) जनकेन सुताय शैशवे विद्याधनं दीयते।
उत्तरम् :
जनकेन कस्मै शैशवे विद्याधनं दीयते?

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

(ग) तत्वार्थस्य निर्णयः विवेकेन कर्तुं शक्यः।
उत्तरम् :
कस्य निर्णयः विवेकेन कर्तुं शक्यः?

(घ) धैर्यवान् लोके परिभवं न प्राप्नोति।
उत्तरम् :
धैर्यवान् कुत्र परिभवं न प्राप्नोति?

(ङ) आत्मकल्याणम् इच्छन् नरः परेषाम् अनिष्टं न कुर्यात्।
उत्तरम् :
आत्मकल्याणम् इच्छन् नरः केषाम् अनिष्टं न कुर्यात्।

प्रश्न 3.
पाठात् चित्वा अधोलिखितानां श्लोकानाम् अन्वयम् उचित पदं क्रमेण पूरयत –
(पाठ से छाँटकर उचित पद के क्रम से निम्नलिखित श्लोकों के अन्वयों की पूर्ति कीजिए-)
(क) पिता ………… बाल्ये महत् विद्याधनम् यच्छति अस्य पिता किं तपः तेपे इत्युक्तिः ……….. ।
उत्तरम् :
पिता पुत्राय बाल्ये महत् विद्याधनम् यच्छति अस्य पिता किं तपः तेपे इत्युक्तिः कृतज्ञता ।

(ख) येन ………… यत् प्रोक्तं तस्य तत्वार्थ निर्णयः येन कर्तुं ………… भवेत्, सः ……….. इति ……… ।
उत्तरम :
येन केनापि यत् प्रोक्तं तस्य तत्वार्थ निर्णयः येन कर्तुं शक्यो भवेत. सः विवेक इति ईरितः ।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

(ग) य आत्मनः श्रेयः …………. सुखानि च इच्छति, परेभ्य अहितं ………… कदापि च न ………. ।
उत्तरम् :
यः आत्मनः श्रेयः प्रभूतानि सुखानि च इच्छति, परेभ्य अहितं कर्म कदापि च न कुर्यात् ।

प्रश्न 4.
अधोलिखितम् उदाहरणद्वयं पठित्वा अन्येषां प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत – (निम्न दो उदाहरणों को पढ़कर अन्य प्रश्नों के उत्तर लिखिए-)
JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः 1

प्रश्न 5.
मञ्जूषायाः तद्भावात्मकसूक्ती: विचित्य अधोलिखितकथनानां समक्षं लिखत – (मंजूषा से उस भाव की सूक्ति छाँटकर निम्न कथनों के सामने लिखिए-)
(क) विद्याधनं महत। …………….
(ख) आचारः प्रथमो धर्मः ……………
(ग) चित्ते वाचि च अवक्रता एव समत्वम्। ………………
[मञ्जूषा – आचरेण तु संयुक्तः सम्पूर्ण फल भाग्भवेत्। मनसि एक वचसि एक कर्मणि एकं महात्मनाम्। विद्याधनं सर्वधन प्रधानम्। सं वो मनांसि जानताम्। विद्याधनं श्रेष्ठं तन्मूलमितरद्धनम्। आचारप्रभवो धर्मः सन्तश्चाचारलक्षाः]
उत्तर :
(क) विद्याधनं महत।
(i) विद्याधनं सर्वधन प्रधानम्।
(ii) विद्याधनं श्रेष्ठं तन्मूलमितरद्धनम्।

(ख) आचारः प्रथमो धर्मः
(i) आचरेण तु संयुक्तः सम्पूर्ण फल भाग्भवेत्।
(ii) आचार प्रभवो धर्मः सन्तश्चाचारलक्षणाः

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

(ग) चित्ते वाचि च अवक्रता एव समत्वम्।
(i) मनसि एक वचसि एक कर्मणि एकं महात्मनाम्
(ii) सं वो मनांसि जानताम्।

प्रश्न 6.
(अ) अधोलिखितानां शब्दानां पुरतः उचितं विलोम शब्द कोष्ठकात् चित्वा लिखत
(निम्नलिखित शब्दों के सामने उचित विलोम शब्द कोष्ठक से छाँटकर लिखिए-)
(क) पक्वः ……………. । (परिपक्व, अपक्व, क्वथितः)
(ख) विमूढधीः …………… । (सुधी, निधिः मन्दधी:)
(ग) कातरः ……………. । (अकरुणः, अधीरः, अकातरः)
(घ) कृतज्ञता ……………. (कृपणता, कृतघ्नता, कातरता)
(ङ) आलस्यम् ……………. । (उद्विग्नता, विलासिता, उद्योगः)
(च) परुषा ……………. । (पौरुषी, कोमला, कठोरा)
उत्तरम् :
(क) अपक्व
(ख) सुधी
(ग) अकातरः
(घ) कृतघ्नता
(ङ) उद्योगः
(च) कोमला।

(आ) अधोलिखितानां शब्दानां त्रयः समानार्थकाः शब्दाः मञ्जूषायाः चित्वा लिखन्ताम्।
(निम्न शब्दों के तीन समानार्थक शब्द मंजूषा से छाँटकर लिखिए-)
JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः 2
उत्तरम् :
(क) प्रभूतम् – भूरि, विपुलम्, बहु
(ख) श्रेयः – शुभम्, शिवम्, कल्याणम्
(ग) चित्तम् – मनः, मानसम्, चेतः
(घ) सभा – परिषद्, संसद, सभा
(ङ) चक्षुष – लोचनम्, नेत्रम्, नयनम्
(च) मुखम् – ‘ आननम्, वदनम्, वक्त्रम्

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

प्रश्न 7.
अधस्तात् समास विग्रहाः दीयन्ते तेषां समस्त पदानि पाठाधारण दीयन्ताम्।
(नीचे समास विग्रह दिए हैं, उनके समस्त पद पाठ के आधार पर दीजिए-)
उत्तरम् :
JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः 3

JAC Class 10th Sanskrit सूक्तयः Important Questions and Answers

शब्दार्थ चयनम् –

अधोलिखित वाक्येषु रेखांकित पदानां प्रसङ्गानुकूलम् उचितार्थ चित्वा लिखत –

प्रश्न 1.
पिता यच्छति पुत्राय बाल्ये विद्याधनं महत्।
(अ) दीप्ति
(ब) अशनम्
(स) महत्
(द) ददाति
उत्तरम् :
(द) ददाति

प्रश्न 2.
पिताऽस्य किं तपस्तेपे इत्युक्तिस्तत्कृतज्ञता –
(अ) विद्या
(ब) तस्य
(ब) तस्य
(स) जनक
(द) उक्तिः
उत्तरम् :
(स) जनक

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

प्रश्न 3.
अवकता यथा चित्ते तथा वाचि भवेद् यदि –
(अ) वक्रता
(ब) ऋजुता
(स) सुचि
(द) वृत्त
उत्तरम् :
(ब) ऋजुता

प्रश्न 4.
तदेवाहुः महात्मानः समत्वमिति तथ्यतः –
(अ) यथार्थरूपेण
(ब) यदात्मनः
(स)
(द) इत्याहुः
उत्तरम् :
(अ) यथार्थरूपेण

प्रश्न 5.
त्यक्त्वा धर्मप्रदां वाचं परुषां योऽभ्युदीरयेत्।
(अ) परित्यज्य
(ब) विमूढ़धीः
(स) तथ्यतः
(द) अपक्वं
उत्तरम् :
(अ) परित्यज्य

प्रश्न 6.
विद्वांस एव लोकेऽस्मिन् चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तिताः –
(अ) जिह्वः
(ब) नेत्रवंतः
(स) अन्येषाम्
(द) चक्षुर्नामनी
उत्तरम् :
(ब) नेत्रवंतः

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

प्रश्न 7.
यत् प्रोक्तं येन केनापि तस्य तत्त्वार्थनिर्णयः।
(अ) तेन
(ब) परिणामम्
(स) परिणति
(द) विवेक
उत्तरम् :
(स) परिणति

प्रश्न 8.
वाक्पटुधैर्यवान् मंत्री सभायामप्यकातर:
(अ) प्रतिभाशालिनः
(ब) अकातरः
(स) नपरिभूयते
(द) धृतिमान्
उत्तरम् :
(द) धृतिमान्

प्रश्न 9.
य इच्छत्यात्मनः श्रेयः प्रभूतानि सुखानि च –
(अ) कल्याणम्
(ब) इच्छति
(स) परेभ्य
(द) कदापि
उत्तरम् :
(अ) कल्याणम्

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

प्रश्न 10.
आचारः प्रथमो धर्मः इत्येतद् विदुषां वचः –
(अ) तस्मात्
(ब) प्रज्ञानां
(स) प्राणेभ्यः
(घ) सदाचारम्
उत्तरम् :
(ब) प्रज्ञानां

संस्कृतमाध्यमेन प्रश्नोत्तराणि –

एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)

प्रश्न 1.
पिता पुत्राय किं यच्छति?
(पिता पुत्र के लिये क्या देता है?
उत्तरम् :
विद्याधनम् (विद्यारूपी धन)।

प्रश्न 2.
पिता कस्मै विद्याधनं यच्छति?
(पिता किसके लिये विद्या धन देता है?)
उत्तरम् :
पुत्राय (पुत्र के लिये)।

प्रश्न 3.
यथा अवक्रता चित्ते तथैव कुत्रापि भवेत्।
(जैसी सरलता चित्त में होती है वैसी ही कहाँ होनी चाहिए?)
उत्तरम् :
वाचि (वाणी में)।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

प्रश्न 4.
चित्ते वाचि च किं गुणः भवेत्?
(चित्त और वाणी में क्या गुण होना चाहिये?)
उत्तरम् :
अवक्रता (सरलता)।

प्रश्न 5.
बुद्धिमन्तः पुरुषाः कीदृशीं वाणी वदन्ति?
(बुद्धिमान लोग कैसी वाणी बोलते हैं?)
उत्तरम् :
धर्मप्रदाम् (धर्मयुक्त)।

प्रश्न 6.
कीदृशीं वाचं न वदेत्?
(कैसी वाणी नहीं बोलनी चाहिये।)
उत्तरम् :
परुषाम् (कठोर)।

प्रश्न 7.
अस्मिन् लोके चक्षुमन्तः के?
(इस लोक में नेत्रों वाला कौन हैं?)
उत्तरम् :
विद्वांस (विद्वान लोग)।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

प्रश्न 8.
विद्वांसः एव अस्मिन् लोके के प्रकीर्दिना?
(विद्वान लोग ही इस लोक में क्या कहलाता है?)
उत्तरम् :
चक्षुष्मन्तः (आँखों वाले)।

प्रश्न 9.
येन तत्वार्थ निर्णयः कर्तुं शक्यो भवेत् सः किं कथ्यते?
(जिसके द्वारा यथार्थ निर्णय किया जाना समर्थ है, वह क्या कहलाता है?)
उत्तरम् :
विवेकः।

प्रश्न 10.
विवेकः कीदृशः निर्णयं कर्तुं शक्यो भवेत?
(विवेक कैसा निर्णय करने में समर्थ होता है?)
उत्तरम् :
तत्वार्थ (यथार्थ)।

प्रश्न 11.
वाक्पटुः मंत्री कैः न परिभूयते?
(वाक्पटु मंत्री किनसे पराजित नहीं होता?)
उत्तरम् :
परैः (शत्रुओं से)।

प्रश्न 12.
मन्त्रिपदस्थस्य एकं गुणं लिखत।
(मन्त्रि पद पर स्थित व्यक्ति का एक गुण लिखिये।)
उत्तरम् :
वाक्पटुता।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

प्रश्न 13.
यः आत्मनः श्रेयः इच्छति तेन परेभ्यः किं न करणीय?
(अपना भला चाहता है, उसे अन्य व्यक्तियों के साथ क्या नहीं करना चाहिये?)
उत्तरम् :
अहितम् (अहित)।

प्रश्न 14.
अहितं कर्म केभ्यः न कुर्यात्।
(अहित कर्म किसके लिये नहीं करना चाहिये।)
उत्तरम् :
परेभ्यः (अन्यों के लिये)।

प्रश्न 15.
कः प्रथमः धर्मः? (प्रथम धर्म क्या है?)
उत्तरम् :
आचारः।

प्रश्न 16.
विशेषतः प्राणेभ्योऽपि किं रक्षेत्?
(विशेषतः प्राणों से भी किसकी रक्षा करनी चाहिये?)
उत्तरम् :
सदाचारम्।

पूर्णवाक्येन उत्तरत (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए)

प्रश्न 17.
के प्रति कृतज्ञो भवेत् ?
(किसके प्रति कृतज्ञ होना चाहिये?)
उत्तरम् :
पितरं प्रति। (पिता के प्रति।)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

प्रश्न 18.
समत्वं किमुच्यते? (समत्व क्या कहलाता है?)
उत्तरम् :
मनसि वाचि च अवक्रता समत्वमिति कथ्यते।
(मन और वाणी में सरलता भी समत्व कहलाता है।)

प्रश्न 19.
परुषां वाचं त्यक्त्वा कीदृशी वाणी वदेत्?
(कठोर वाणी को त्यागकर कैसी वाणी बोलनी चाहिये?
उत्तरम् :
परुषां वाचं त्यक्त्वा धर्मप्रदां वाचं वदेत्।
(कठोर वचनों को त्यागकर धर्मप्रद वाणी बोलनी चाहिए।)

प्रश्न 20.
चक्षुर्नामनी के मते ? (चक्षुर्नामनी क्या माने जाते हैं?)
उत्तरम् :
वदने ये नेत्रे ते तु चक्षुर्नामनी मते।
(चेहरे पर जो नेत्र हैं वे तो नाम मात्र की आँखें हैं।)

प्रश्न 21.
मन्त्री कैः गुणैरुपेतो भवेत्।
(मन्त्री किन गुणों से युक्त होना चाहिये?)
उत्तरम् :
मन्त्री वाक्पटुता, धैर्य सभायां वीरतादिभिः गुणैरुपेतो भवेत् ।
(मंत्री वाक्पटुता, धैर्य, सभा में वीरता आदि गुणों से युक्त होना चाहिए।)

प्रश्न 22.
‘कथमपि’ इति पदस्य हेतोः किं पदं प्रयुक्तम्?
(‘कथमपि’ पद के लिये किस पद का प्रयोग किया है?)
उत्तरम् :
केनापि प्रकारेण (कैसे भी या किसी प्रकार से)।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

प्रश्न 23.
मानवः संसारे किं लब्धम् इच्छति?
(मानव संसार में क्या प्राप्त करना चाहता है?)
उत्तरम् :
मानवः संसारे श्रेयः सुखानि च लब्धुम् इच्छति।
(मानव संसार में कल्याण और सुख प्राप्त करना चाहता है?)

प्रश्न 24.
कस्मात् रक्षेत् सदाचारम्? (किसलिये सदाचार की रक्षा करनी चाहिये?)
उत्तरम् :
आचार: प्रथमः धर्मः तस्मात् सदाचारं रक्षेत्।
(आचार पहला धर्म है, अतः सदाचार की रक्षा करनी चाहिये।)

प्रश्न 25.
का उक्तिः कृतज्ञता? (क्या कथन कृतज्ञता है?)
उत्तरम् :
‘पिताऽस्य किं तपस्तेपे’ इति उक्तिः कृतज्ञता।
(पिता ने इसके लिये कितना तप किया, यह उक्ति ही कृतज्ञता है)

प्रश्न 26.
चित्ते वाचि च अवक्रता कस्य समत्वं भवति?
(चित्त और वाणी में सरलता किसका समत्व होता है?)
उत्तरम् :
तत्महात्मनः तथ्यतः समत्वमिति कथ्यते।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

प्रश्न 27.
ये परुषां वाणीं वदन्ति ते कीदृशः मनाः ?
(जो कठोर वाणी बोलते हैं वे कैसे लोग हैं?)
उत्तरम् :
ये जनाः परुषां वाणी वदन्ति ते मूढधियः भवन्ति।
(जो छ । कठोर वाणी बोलते हैं वे विमूढ़मति होते हैं।)

प्रश्न 28.
अन्येषां ये वदने नेत्रे ते के मते ?
(अन्य लोगों के चेहरे पर जो आँखें हैं वह क्या माने गये हैं?)
उत्तरम् :
अन्येषां ये वदने नेत्रे ते तु चक्षुर्नामनी मते।
(दूसरों के चेहरे पर जो नेत्र हैं वे तो मात्र आँखें ही मानी गई हैं।)

प्रश्न 29.
मंत्री कीदृशः भवेत्? (मन्त्री कैसा होना चाहिये?)
उत्तरम् :
मन्त्री: वाक्पटुः धैर्यवान् सभायामपि अकातरः भवेत्।
(मन्त्री वाक्पटु, धैर्यवान् और सभा में भी वीर या साहसी होना चाहिये)।

प्रश्न 30.
यः अन्येभ्योः अहितं न करोति सः किं लभते?
(दूसरों के लिये जो अहित नहीं करता वह क्या पाता है?)
उत्तरम् :
यो अन्येभ्यः अहितं न करोति स: श्रेयः प्रभूतानि सुखानि लभते।
(जो अन्यों के लिये अहित नहीं करता, वह श्रेय और बहुत से सुख प्राप्त करता है।)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

प्रश्न 31.
आचारः प्रथमः धर्मः इति केषां वचः?
(आचार प्रथम धर्म है, यह किसका वचन है?)
उत्तरम् :
आचार: प्रथमः धर्मः इति विदुषां वचः।
(आचार प्रमुख धर्म है, यह विद्वानों का वचन है।)

अन्वय-लेखनम् –

अधोलिखितश्लोकस्यान्वयमाश्रित्य रिक्तस्थानानि मञ्जूषातः समुचितपदानि चित्वा पूरयत।
(नीचे लिखे श्लोक के अन्वय के आधार पर रिक्तस्थानों की पूर्ति मंजूषा से उचित पद चुनकर कीजिए ।)

1. पिता यच्छति पुत्राय ………………………………. इत्युक्तिस्तत्कृतज्ञता॥
मञ्जूषा – पिता, तत्, तपः, विद्याधनं।
बाल्ये (i)…… पुत्राय महत् (ii)……यच्छति। अस्य पिता किं (iii)…… तेपे इति उक्तिः (iv)……कृतज्ञता।
उत्तरम् :
(i) पिता (ii) विद्याधनं (iii) तपः (iv) तत् ।

2. अवकता यथा चित्ते ……………. समत्वमिति तथ्यतः।
मञ्जूषा – महात्मनः, अवक्रता, इति, वाचि।।
यथा (i)…… चित्ते तथा यदि (ii)…… भवेत् तदैव (अवक्रता) (iii)…… तथ्यतः समत्वम् (iv)……आहुः। उत्तरम् : (i) अवक्रता (ii) वाचि (iii) महात्मनः (iv) इति।

3. त्यक्त्वा धर्मप्रदां …………………………………… विमूढधीः।
मञ्जूषा – त्यक्त्वा, विमूढधीः, फलं, फलम्।
यो (i)…… धर्मप्रदां वाचं (i)…… परुषामभ्युदीरयेत सः पक्वं (iii)…… परित्यज्यं अपक्वं (iii)……भुङ्क्ते।
उत्तरम् :
(i) विमूढधी: (ii) त्यक्त्वा (iii) फलम् (iv) फलं।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

4. विद्वास एवं ……………………………………………………….. चक्षुर्नामनी मते ॥
मञ्जूषा – चक्षुर्नामनी, लोके, अन्येषां, चक्षुष्मन्तः।
अस्मिन् (i)…… विद्वान्सः एव (ii)…… प्रकीर्तिताः। (iii)……वदने तु ये (iv)….. मते।
उत्तरम् :
(i) लोके (ii) चक्षुष्मन्तः (iii) अन्येषां (iv) चक्षुर्नामनी।

5. यत् प्रोक्तं येन केनापि ………………………….. विवेक इतीरितः॥
मञ्जूषा – शक्यो, तत्वार्थ, विवेक, केनापि। येन (i) ……… यत् प्रोक्तम् तस्य (ii) ……….. निर्णयः येन कर्तुं (iii) ………. भवेत् सः (iii)…… इति ईरितः।
उत्तरम् :
(i) केनापि (ii) तत्वार्थ (iii) शक्यो (iv) विवेक।

6. वाक्पटुधैर्यवान् मंत्री ……………………………….. परैर्न परिभूयते।।
मञ्जूषा – धैर्यवान्, परैः, केनापि, अकातरः।
वाक्पटुः (i) …………. सभायाम् अपि (ii) ………… सः (iii)…… प्रकारेण (iv)…… न परिभूयते।
उत्तरम् :
(i) धैर्यवान् (ii) अकातरः (iii) केनापि (iv) परैः।

7. य इच्छत्यात्मनः श्रेयः …………………….. परेभ्यः कदापि च ।
मणूणा – परेभ्यः, सुखानि, कलापि, आत्मना यः (i)…… श्रेयः प्रभूतानि (ii)…… च इच्छति, (iii)…… अहितं कर्म (iv)…… च न कुर्यात्।
उत्तरम् :
(i) आत्मनः (ii) सुखानि (iii) परेभ्यः (iv) कदापि।

8. आचारः प्रथमो धर्मः …………………… प्राणेभ्योऽपि विशेषतः।।
आचारः (i) ……….. धर्मः इति एतद् (i) ………. वचः तस्मात् (iii)…… सदाचारं प्राणेभ्योऽपि (iii) ………..।
उत्तरम् :
(i) प्रथमो (ii) विदुषां (iii) विशेषतः (iv) रक्षेत्।

प्रश्ननिर्माणम् –

अधोलिखित वाक्येषु स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत –

1. पितापुत्राय बाल्ये विद्याधनं यच्छति। (पिता पुत्र को बचपन में विद्या ही धन देता है।)
2. अवक्रता यथा चित्ते तथा वाचि भवेत् । (सरलता जैसी चित्त में होती है, वैसी वाणी में होनी चाहिए।)
3. त्यक्त्वा धर्मप्रदां वाचं परुषां चः वदति। (धर्मनिष्ठ विद्या को त्याग कर जो कठोर वाणी बोलता है।)
4. विमूढधीः भुङ्क्तेऽपक्वं फलम्। (मूर्ख व्यक्ति कच्चा फल खाते हैं।)
5. विद्वान एव लोकेऽस्मिन् चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तितः। (विद्वान ही संसार में नेत्रवान कहलाते हैं।)
6. वाक्पटुः मन्त्री परैर्नः परिभूयते। (वाक्पटु मंत्री शत्रुओं द्वारा अपमानित नहीं होता है।) ।
7. यः इच्छति प्रभूतानि सुखानि न कुर्यात् अहितं परेभ्यः। (जो बहुत से सुख चाहता है, उसे दूसरों के लिये अहित कार्य नहीं करने चाहिये।)
8. आचारः परमोधर्मः। (आचार परम धर्म है।)
9. तस्मात् रक्षेत् सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषतः।
10. तदेवाहुः महात्मन् समत्वमिति तथ्यतः। (वही महापुरुष का यथार्थ समत्व कहलाता है।)
11. पिता पुत्राय विद्याधनं ददाति।
12. तदेवाहुः महात्मानः समत्वमिति तथ्यतः।
13. भुङ्क्तेऽपक्वं विमूढधीः।
14. विद्वांस एव लोकेऽस्मिन् चक्षुष्मन्तः।
15. स केनापि प्रकारेण परैः न परिभूयते।
उत्तराणि :
1. पिता पुत्राय कदा विद्याधने यच्छति?
2. अवक्रता यथा चित्ते तथा कस्याम् भवेत् ?
3. कीदृशीं वाणी त्यक्त्वा यः पुरुषां य वदति?
4. कः भुङ्क्तेऽपक्वं फलम्।
5. के एव लोकेऽस्मिन् चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तिता?
6. कीदृशः मन्त्री परैः नः परिभूयते?
7. यः इच्छति प्रभूतानि सुखानि किं न कुर्यात् परेभ्यः?
8. कः परमोधर्म:?
9. तस्मात् प्राणेभ्योऽपि विशेषतः किम् रक्षेत्?
10. तदेवाहुः कस्य समत्वमिति तथ्यत:?
11. पिता कस्मै विद्याधनं ददाति?
12. तदेवाहुः कान् समत्वमिति तथ्यतः?
13. भुङ्क्तेऽपक्वं कः?
14. के एव लोकेऽस्मिन् चक्षुष्मन्तः?
15. स केनापि प्रकारेण कैः न परिभूयते?

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

भावार्थ-लेखनम –

अधोलिखित पद्यांश संस्कृते भावार्थं लिखत –

1. पिता यच्छति पुत्राय …………………………… इत्युक्तिस्तत्कृतज्ञता॥

संस्कृत व्याख्या: – बाल्यकाले जनक : स्व-आत्मजाय श्रेष्ठं ज्ञान धनं ददाति। अमुष्य जनकः किं तपस्यां कृतवान् इति कथनं एव तस्योपकारः कृतज्ञता वा।

2. अवक्रता यथा चित्ते ………………………. समत्वमिति तथ्यतः।।

संस्कृत व्याख्या: – येन प्रकारेण ऋजुता मनसि भवति तेनैव प्रकारेण चेत् वाच्याम् स्यात् तदैव ऋजुता महापुरुषस्य यथार्थरूपेण समता इति उच्यते।

3. त्यक्त्वा धर्मप्रदां वाचं ………………… भुङ्क्तेऽपक्वं विमूढधीः।।

संस्कृत व्याख्या: – यः मूर्खः धार्मिकभावोत्पादिकां वाणी परित्यज्य कटुकां वाणी कठोर वचनानि वा वदति असौ तु पक्वं फलं त्यक्त्वा अपक्वं फलमेव परिणामेव भुनक्ति।

4. विद्वांस एव लोकेऽस्मिन् …………………………. चक्षुर्नामनी मते।।

संस्कृत व्याख्या:- एतस्मिन् संसारे, समाजे वा प्राज्ञा एव यथार्थतः नेत्रवन्तः कथ्यन्ते, अपरेषाम् आनने तु नाममात्रस्यैव नेत्रे स्त: मन्यते वा।

5. यत् प्रोक्तं येन ………………….. विवेक इतीरितः॥

संस्कृत व्याख्याः – येन केनापि यत्किञ्चित् अकथत् अमुष्य समता यथार्थतः परिणति कर्तुं निर्णय वा कर्तुम् समर्थः यः च कर्तुं शक्नोति असावेव विचारशीलता विवेकः वा कथ्यते।

6. वाक्पटुधैर्यवान् मंत्री …………………………………….. परैर्न परिभूयते।।

संस्कृत व्याख्याः – वाण्यां भाषणे वा चतुरः यश्च धृतिमान्, संसदि चापि यः साहसी वीरः प्रगल्भो वा असौ पुरुषः कथमपि अरिभिः नाभिभूयते अर्थात् सः कदापि न पराजयते।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

7. य इच्छत्यात्मनः श्रेयः ……………………….. परेभ्यः कदापि च ।।

संस्कृत व्याख्या: – यः (मानवः) स्वकीयं कल्याणम् बहूनि सुखानि च ईहते सः अन्येभ्यः अहित कार्य न कुर्यात्। अर्थात् तेन अन्येभ्यः अहित कार्य कदापि न कर्त्तव्यम्।

8. आचारः प्रथमो धर्मः ……………………. प्राणेभ्योऽपि विशेषतः।।

संस्कृत व्याख्या: – सदाचारः सदाचरणं वा मानवस्य प्रमुखो धर्म कर्त्तव्य वा। एवं प्राज्ञानां वचनानि। अनेन प्रकारेण सद्व्यवहारं सदाचरणं वा प्राणपणेनापि रक्षणीयम् भवति।

सूक्तयः Summary and Translation in Hindi

पाठ-परिचय – यह पाठ मूलत: तमिल भाषा के ‘तिरक्कुरल’ नामक ग्रंथ से लिया गया है। यह ग्रन्थ तमिल भाषा का वेद कहलाता है। इसके रचनाकार ‘तिरुवल्लुवर’ हैं। प्रथम शताब्दी इसका रचना काल स्वीकार किया गया है। धर्म, अर्थ और काम का प्रतिपाद्य है यह ग्रंथ। यह तीन भागों में विभक्त है। तिरु शब्द श्रीवाचक है अर्थात् तिरु का अर्थ है ‘श्री’। अतः तिरक्कुरल शब्द का अभिप्राय होता है- श्री से युक्त वाणी। इस ग्रंथ में मानवों के लिये जीवनोपयोपी सत्य को सरल और सुबोधगम्य पद्यों द्वारा प्रतिपादित किया गया है।

मूलपाठः, अन्वयः,शब्दार्थाः, सप्रसंग हिन्दी-अनुवादः

1. पिता यच्छति पुत्राय बाल्ये विद्याधनं महत्।
पिताऽस्य किं तपस्तेपे इत्युक्तिस्तत्कृतज्ञता॥1॥

अन्वयः – बाल्ये पिता पुत्राय महत् विद्याधनं यच्छति। अस्य पिता किं तपः तेपे इति उक्तिः तत् कृतज्ञता।

शब्दार्थाः – बाल्ये = बाल्यकाले (बचपन में). पिता = जनकः (पिता ने), पत्राय = आत्मजस्य कते (पत्र के लिये), महत् = श्रेष्ठं (उत्तम, महान), विद्याधनं = ज्ञान रूपं धनं (विद्या धन), यच्छति = ददाति (देता है), तस्य = अमुष्य (उसका), पिता = जनक (पिता), किं तपः तेपे = कि तपस्यां कृतवान (क्या तपस्या की), इति उक्तिः = एवं कथनं (ऐसा कहना), तत् कृतज्ञता = तस्य उपकृति (उसका अहसान है)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह श्लोक हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्यपुस्तक के ‘सूक्तयः’ पाठ से लिया गया है। इस श्लोक में कवि कहता है कि पिता ही बाल्यकाल में शिक्षक होता है, जिसका मानव को कृतज्ञ होना चाहिये।

हिन्दी-अनुवादः – बाल्यकाल में पिता ही पुत्र को महान् विद्यारूपी धन प्रदान करता है। पिता इसके लिये कितनी तपस्या करता है। यह उसका अहसान है।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

2. अवक्रता यथा चित्ते तथा वाचि भवेद् यदि।
तदेवाहुः महात्मानः समत्वमिति तथ्यतः।।2।।

अन्वयः – यथा अवक्रता चित्ते तथा यदि वाचि भवेत् तदैव (अवक्रता) महात्मनः तथ्यतः समत्वम् इति आहुः।

शब्दार्थाः – यथा = येन प्रकारेण (जिस प्रकार), अवकता = ऋजुता, सरलता (सीधापन), चित्ते = यदि (यदि), वाधि = वाच्याम, वाण्याम् अपि (वाणी में भी), भवेत् – स्यात् (हो), अवकता – सरलता, ऋजुता (सीधापन), यदात्मनः = महापुरुषस्य (महात्मा को), तथ्यता – यथार्थरूपेण (वास्तव में), समत्वम् – समता (समानता), इत्याहुः = इत्युच्यते (इस प्रकार कहलाती है।)

सन्दर्भः प्रसङ्गश्च – यह पद्य हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्यपुस्तक के सूक्तयः पाठ से लिया गया है। यह पाठ मूलतः तिरुवल्लुवर कृत ‘तिरक्कुरल’ के संस्कृत अनुवाद से लिया गया है। इस पद्य में अवक्रता और समता भाव के महत्व को प्रतिपादित किया है।

हिन्दी-अनुवादः – सरलता जैसे मन में हो वैसी ही वाणी में भी होनी चाहिये। वास्तव में यही महापुरुष या महान् आत्मा का समत्व कहलाता है।

3. त्यक्त्वा धर्मप्रदां वाचं परुषां योऽभ्युदीरयेत्।
परित्यज्य फलं पक्वं भुङ्क्तेऽपक्वं विमूढधीः।।3।।

अन्वयः – यो विमूढ़धीः धर्मप्रदां वाचं त्यक्त्वा परुषामभ्युदीरयेत सः पक्वं फलम् परित्यज्यं अपक्वं फलं भुङ्क्ते।

शब्दार्थाः – यः = यो जनः (जो व्यक्ति), विमूढधीः = मूर्खः, बुद्धिहीनः (मूर्ख या बुद्धिहीन, अज्ञानी), धर्मप्रदां = धार्मिकभावोत्पादिकां (धर्म भाव पैदा करने वाली), वाचं = वाणीम् (वाणी को), त्यक्त्वा = परित्यज्य (त्यागकर), परुषाम् = कटुकं, कर्कशां (कठोर), अभ्युदीरयेत = प्रयुज्यते, वदति (बोलता है, प्रयोग करता है) सः = असौ (वह), पक्वं फलं = (पके फल से), परित्यज्य = त्यक्त्वा (त्यागकर) अपक्वं = न पक्वं (कच्चे) फलम् = परिणामं (फल को) भुक्ते = खादति। –

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह श्लोक हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्यपुस्तक के सूक्तयः पाठ से लिया गया है। यह पाठ मूलतः तिरुवल्लुवर कृत ‘तिरक्कुरल’ इस काव्य के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। इस श्लोक में धर्मप्रदा वाणी का महत्व प्रतिपादित किया गया है।

हिन्दी-अनुवादः – धर्म प्रदान करने वाली वाणी को त्याग कर जो कठोर वाणी बोलता है वह मूढ़मति पके हुए फल . को त्याग कर कच्चे फल को ही खाता है।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

4. विद्वांस एव लोकेऽस्मिन् चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तिताः।
अन्येषां वदने ये तु ते चक्षुर्नामनी मते।। 4।।

अन्वयः – अस्मिन् लोके विद्वान्सः एव चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तिताः। अन्येषां वदने तु ये चक्षुर्नामनी मते ।

शब्दार्थाः – अस्मिन् लोके = एतस्मिन् संसारे, समाजे वा (संसार या समाज में), विद्वांस एव = प्राज्ञः एव (विद्वान् ही) चक्षषमन्तः = नेत्रवंतः (नेत्रों वाले), प्रकीर्तिता = मताः, कथ्यन्ते (कहलाते हैं) अन्येषाम् = अपरेषां (दूसरे) मुखे = आनने (मुँह, पर तो), चक्षुर्नामनी = नाममात्र चक्षु (नाममात्र की आँख), मते = मन्वते (मानी जाती है)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह श्लोक हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्यपुस्तक के सूक्तयः पाठ से लिया गया है। यह पाठ मूलतः तमिल कवि तिरुवल्लुवर कृत ‘तिरक्कुरल’ के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। इस पद्य में कवि ने विद्वानों को ही नेत्रों वाला बताया गया है।

हिन्दी-अनुवादः – विद्वान लोगों को ही इस लोक में आँखों वाला कहा गया है। अन्य के मुख (आनन) पर जो आँखें होती हैं, वे तो नाम की आँखें मानी गई हैं।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

5. यत् प्रोक्तं येन केनापि तस्य तत्त्वार्थनिर्णयः।
कर्तुं शक्यो भवेद्येन स विवेक इतीरितः॥5॥

अन्वयः – येन केनापि यत् प्रोक्तम् तस्य तत्वार्थ निर्णयः येन कर्तुं शक्यो भवेत् सः विवेक इति ईरितः।।

शब्दार्थाः – येन केनापि यत् प्रोक्तम् = यः कश्चित् यदकथयत् (जिस किसी से जो कहा), तस्य = अमुष्य (उसका), तत्वार्थ = यथार्थ (जैसा का तैसा), निर्णयः = परिणति (निर्णय करना) येन कर्तुं शक्यो भवेत् = यः कर्तुम् शक्नोति (जो कर सकता है), सः = असौ (वह), विवेक = ज्ञानं (सोच-समझ), इति ईरितः = इति कथ्यते (ऐसा कहलाता है)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च- यह पद्य हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्यपुस्तक के ‘सूक्तयः’ पाठ से लिया गया है। मूलतः यह पाठ तमिल कवि तिरुवल्लुवर कृत ‘तिरक्कुरल’ के संस्कृतानुवाद से संकलित है। इस श्लोक में कवि कहता है कि तत्वार्थ निर्णय विवेक से ही सम्भव है।

हिन्दी-अनुवादः – जिस किसी के द्वारा जो कहा गया है वह उसका यथार्थ निर्णय है, वह करने में समर्थ होना चाहिये, वह विवेक कहलाता है।

6. वाक्पटुधैर्यवान् मंत्री सभायामप्यकातरः।
स केनापि प्रकारेण परैर्न परिभूयते ।।6।।

अन्वयः – वाक्पटुः धैर्यवान् सभायाम् अपि अकातरः सः केनापि प्रकारेण परैः न परिभूयते।

शब्दार्थाः – वाक्पटु = वाचि, सम्भाषणे वा पटुः (बातचीत में चतुर), धैर्यवान् = धृतिमान् (धैर्य रखने वाला), सभायामपि = संसदि अपि (सभा में भी), अकातरः = वीरः, साहसी च (वीर और साहसी), सः = असौ (वह), केनापिप्रकारेण = कथमपि (ये भी), परैः = शत्रुभिः, अरिभिः (शत्रुओं द्वारा), नपरिभूयते = नाभिभूतये पराभूत (पराजित नहीं होगा)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह पद्य ‘शेमुषी’ पाठ्यपुस्तक के सूक्तयः पाठ से लिया है। मूलतः यह तमिल कवि रचित तिरुक्कुरल ग्रंथ के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। इस श्लोक में कवि कहता है कि जिसका मंत्री वाक्कुशल, धैर्यवान व सभा में निर्भय होता है, वह शत्रुओं से कभी भी पराजित नहीं होता।

हिन्दी-अनुवादः – वाणी में चतुरता, धैर्ययुक्त, सभा में भी जो साहसी हो, ऐसा मंत्री किसी भी प्रकार से शत्रुओं द्वारा पराजित नहीं किया जा सकता है।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

7. य इच्छत्यात्मनः श्रेयः प्रभूतानि सुखानि च।
न कुर्यादहितं कर्म स परेभ्यः कदापि च ।।7।।

अन्वयः – यः आत्मनः श्रेयः प्रभूतानि सुखानि च इच्छति, परेभ्यः अहितं कर्म कदापि च न कुर्यात्।

शब्दार्थाः – यः = यो (जो), आत्मनः = स्वकीयं (अपने), श्रेयः = कल्याणम् (कल्याण को) (तथा), प्रभूतानि = बहूनि (बहुत से), सुखानि = सुखसाधनानि (सुखों को), इच्छति = ईहते (चाहता है), सः = उसे, परेभ्य = अन्येभ्यो (दूसरों का), अहितं = नुकसान (हानि), कार्यम् = करणीयम् (काम), कदापि न कुर्यात् = कदापि न कर्त्तव्यम् (कभी नहीं करना चाहिये।)

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह पद्य हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्य-पुस्तक के ‘सूक्तयः’ पाठ से लिया गया है। मूलतः यह पाठ तमिल ल्लुवरकृत ‘तिरुकुरुल’ के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। इस श्लोक में कवि कहता है कि जो मनुष्य अपना भला चाहता है उसे दूसरों का अहित नहीं करना चाहिये।

हिन्दी-अनुवादः – जो व्यक्ति अपना भला तथा बहुत सारे सुख चाहता है उसे दृ मरे के लिये कभी कोई अहित कर्म नहीं करना चाहिये।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 9 सूक्तयः

8. आचारः प्रथमो धर्मः इत्येतद् विदुषां वचः।
तस्माद् रक्षेत् सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषतः।।8।।

अन्वयः – आचारः प्रथमो धर्मः इति एतद् विदुषां वचः तस्मात् विशेषतः सदाचारं प्राणेभ्योऽपि रक्षेत्।

शब्दार्थाः – आचारः = सदाचारः (आचरण), प्रथमः धर्मः = प्रमुखो धर्मः (पहला धर्म है), इति = एव (इस प्रकार), विदुषां – प्रज्ञानां (विद्वान में), वचन = वचनानि, (उक्ति), तस्मात् = अनेन कारणेन (इसी वजह से), सदाचारम् = सद्व्यवहारं (सदाचार की), प्राणेभ्यः = प्राणपणेन (प्राणों की बाजी लगाकर), रक्षेत् = त्रायेत (रक्षा करनी चाहिये)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह पद्य हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्य-पुस्तक के ‘सूक्तयः’ इस ग्रन्थ से उद्धृत है। यह पाठ मूलतः तमिल कवि तिरुवल्लुवर विरचित ‘तिरुकुरुल’ के संस्कृत-अनुवाद से सङ्कलित है। इस श्लोक में कवि आचार को प्रथम धर्म कहते हुए सदाचार का महत्व कहता है।

हिन्दी-अनुवादः – सदाचार पहला धर्म है। यह विद्वानों का वचन है, इसलिये विशेष रूप से प्राणों की बाजी लगाकर भी सदाचार की रक्षा करनी चाहिये।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 8 विचित्रः साक्षी

Jharkhand Board JAC Class 10 Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 8 विचित्रः साक्षी Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 8 विचित्रः साक्षी

JAC Class 10th Sanskrit विचित्रः साक्षी Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत। (एक शब्द में उत्तर लिखिये)
(क) कीदृशे प्रदेशे पदयात्रा न सुखावहा?
(कैसे प्रदेश में पदयात्रा सुखद नहीं होती?)
(ख) अतिथिः केन प्रबुद्धः?
(अतिथि किससे जाग गया?)
(ग) कृशकायः कः आसीत्?
(कृशकाय कौन था?)
(घ) न्यायाधीश: कस्मै कारागार दण्डम् आदिष्टवान् ?
(न्यायाधीश ने किसके लिये कारागार दण्ड का आदेश दिया)
(ङ) कं निकषा मृत शरीरेण आसीत्?
(किसके निकट मृत शरीर था?)
उत्तराणि :
(क)विजने प्रदेश
(ख) चौरस्य पादध्वनिना
(ग) अभियुक्तः
(घ) आरक्षिणे
(ङ) राजमार्गम्।

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प्रश्न 2.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत –
(निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत भाषा में लिखिए)
(क) निर्धनः जनः कथं वित्तम् उपार्जितवान् ?
(निर्धन व्यक्ति ने कैसे धन कमाया?)
उत्तरम् :
निर्धनः जनः भूरि परिश्रम्य वित्तम् उपार्जितवान्।
(निर्धन व्यक्ति ने पर्याप्त परिश्रम करके धन अर्जित किया।)

(ख) जनः किमर्थं पदातिः गच्छति ?
(व्यक्ति किसलिए पैदल चलता है ?)
उत्तरम् :
जनः परमर्थकार्येन पीडितः बसयानं विहाय पदातिरेव गच्छति।
(व्यक्ति अत्यधिक.धनाभाव से पीड़ित हुआ बस को छोड़कर पैदल ही जाता है।)

(ग) प्रसते निशान्धकारे सः किम अचिन्तयत?
(रात का अँधेरा फैल जाने पर उसने क्या सोचा ?)
उत्तरम् :
सोऽचिन्तयत् यत् निशान्धकारे प्रसृते विजने प्रदेशे पदयात्रा न शुभावहा।
(उसने सोचा कि रात्रि का अन्धकार फैल जाने पर निर्जन प्रदेश में पैदल यात्रा कल्याणकारी नहीं होती।)

(घ) वस्तुतः चौरः कः आसीत् ?
(वास्तव में चोर कौन था ?)
उत्तरम् :
वस्तुतः चौरः आरक्षी आसीत्।
(वास्तव में चोर चौकीदार था।)

(ङ) जनस्य क्रन्दनं निशम्य आरक्षी किमुक्तवान् ?
(व्यक्ति के रुदन को सुनकर चौकीदार ने क्या कहा?)
उत्तरम् :
‘रे दुष्ट! तस्मिन् दिने त्वयाऽहम् चोरितायाः मञ्जूषायाः ग्रहणात् वारितः। इदानीं निज कृत्यस्य फलं भुव। अस्मिन् चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे।’
(‘अरे दुष्ट! उस दिन तूने मुझे चुराई गई पेटी ले जाने से रोका था। अब अपने किये हुए का फल भोग। इस चोरी के आरोप में तीन वर्ष का कारावास भोगेगा।’)

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(च) मतिवैभवशालिनः दुष्कराणि कार्याणि कथं साधयन्ति ?
(बुद्धिमान् लोग कठिन कार्यों को कैसे साधते हैं ?)
उत्तरम् :
मतिवैभवशालिनः दुष्कराणि कार्याणि नीतिं युक्तिं समालम्ब्य लीलयैव साधयन्ति।
(बुद्धिमान् लोग कठोर कर्मों को भी नीति और युक्ति का सहारा लेकर खेल ही खेल में साध लेते हैं।)

प्रश्न 3.
रेखांकितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत –
(रेखांकित पदों के आधार पर प्रश्न-निर्माण कीजिए -)
(क) पुत्रं द्रष्टुं सः प्रस्थितः।
(पुत्र को देखने के लिए वह प्रस्थान कर गया।)
उत्तरम् :
कं द्रष्टुं सः प्रस्थितः ?
(किसको देखने के लिए वह प्रस्थान कर गया ?)

(ख) करुणापरो गृही तस्मै आश्रयं प्रायच्छत्।
(दया गृहस्वामी ने उसके लिए आश्रय प्रदान किया।)
उत्तरम् :
करुणापरो गृही कस्मै आश्रयं प्रायच्छत् ?
(दया गृहस्वामी ने किसके लिए आश्रय प्रदान किया ?)

(ग) चौरस्य पादध्वनिना अतिथिः प्रबुद्धः।
(चोर की पदचाप से अतिथि जागा।)
उत्तरम् :
कस्य पादध्वनिना अतिथिः प्रबुद्धः ?
(किसके पदचाप से अतिथि जागा ?)

(घ) न्यायाधीश: बंकिमचन्द्रः आसीत्।
(न्यायाधीश बंकिमचन्द्र था।)
उत्तरम् :
न्यायाधीशः कः आसीत् ?
(न्यायाधीश कौन था ?)

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(ङ) सः भारवेदनया क्रन्दति स्म।
(वह वजन की पीड़ा से रोने लगा।)
उत्तरम् :
सः कया क्रन्दति स्म ?
(वह किससे रोने लगा ?)

(च) उभौ शवं चत्वरे स्थापितवन्तौ।
(दोनों ने शव चौराहे पर रख दिया।)
उत्तरम् :
उभौ शवं कुत्र स्थापितवन्तौ ?
(दोनों ने शव कहाँ रख दिया ?)

प्रश्न 4.
यथानिर्देशमुत्तरत –
(निर्देशानुसार उत्तर दीजिए)
(क) आदेशं प्राप्य उभौ अचलताम्’ अत्र किं कर्तृपदम्?
(यहाँ कर्तृपद क्या है?)
उत्तरम् :
उभौ (दोनों)।

(ख) एतेन आरक्षिणा अध्वनि यदुक्तं तदवर्णयामि? अत्र ‘मार्गे’ इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम्?
उत्तरम् :
अध्वनि (मार्ग में)।

(ग) ‘करुणापरो गृही तस्मै आश्रय प्रायच्छत्’ अत्र ‘तस्मै ‘ इति सर्वनाम पदं कस्मै प्रयुक्तम्?
(यहाँ ‘तस्मै’ सर्वनाम किसके लिये प्रयोग किया गया है? यहाँ ‘मार्गे ‘अर्थ में किस पद का प्रयोग किया गया है?)
उत्तरम् :
अतिथये (अतिथि के लिए)।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 8 विचित्रः साक्षी

(घ) ‘ततोऽसौ तौ अग्रिमे दिने उपस्थातुम् आदिष्टवान्’ अस्मिन् वाक्ये किं क्रियापदम्?
(इस वाक्य में क्रियापद क्या है?)
उत्तरम् :
आदिष्टवान् (आदेश दिया)।

(ङ) ‘दुष्कराण्यपि कर्माणि मतिवैभवशालिना?’ अत्र विशेष्य पदं किम्? (यहाँ विशेष्य पद क्या है?)
उत्तरम् :
कर्माणि (कर्म विशेष्य है)।

प्रश्न 5.
सन्धि/सन्धिविच्छेदं च कुरुत (सन्धि/सन्धि-विच्छेद कीजिए) –
(क) पदातिरेव = ………….. + ……………
(ख) निशान्धकारे = …………. + …………
(ग) अभि + आगतम् = ……………………
(घ) भोजन + अन्ते = ………………………
(ङ) चौरोऽयम् = …………….. + …………
(च) गृह + अभ्यन्तरे = ………………….
(छ) लीलयैव = ………….. + ………..
(ज) यदुक्तम् = ………….. + ………..
(झ) प्रबुद्धः + अतिथिः = …………………।
उत्तरम् :
(क) पदातिरेव = पदातिः + एव
(ख) निशान्धकारे = निशा + अन्धकारे
(ग) अभि + आगतम् = अभ्यागतम्
(घ) भोजन + अन्ते = भोजनान्ते
(ङ) चौरोऽयम् = चौरः + अयम्
(च) गृह + अभ्यन्तरे = गृहाभ्यन्तरे
(छ) लीलयैव = लीलया + एव
(ज) यदुक्तम् = यत् + उक्तम्
(झ) प्रबुद्धः + अतिथिः = प्रबुद्धोऽतिथिः।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 8 विचित्रः साक्षी

प्रश्न 6.
अधोलिखितानि पदानि भिन्न-भिन्नप्रत्ययान्तानि सन्ति। तानि पृथक् कृत्वा निर्दिष्टानां प्रत्ययानामधः लिखत –
(निम्नलिखित पद भिन्न-भिन्न प्रत्ययान्त हैं, उन्हें अलग-अलग करके निर्दिष्ट प्रत्ययों के नीचे लिखिए-)
[परिश्रम्य, उपार्जितवान्, दापयितुम्, प्रस्थितः, द्रष्टुम्, विहाय, पृष्टवान्, प्रविष्टः, आदाय, क्रोशितुम्, नियुक्तः, नीतवान्, निर्णेतुम्, आदिष्टवान्, समागत्य, मुदितः।]
उत्तरम् :
JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 8 विचित्रः साक्षी 1

प्रश्न 7.
(अ) अधोलिखितानि वाक्यानि बहुवचने परिवर्तयत –
(निम्नलिखित वाक्यों को बहुवचन में बदलिए)
(क) स बसयानं विहाय पदातिरेव गन्तुं निश्चयं कृतवान्।
(उसने बस छोड़कर पैदल ही जाने का निश्चय किया।)
उत्तरम् :
ते बसयानं विहाय पदातिरेव गन्तुं निश्चयं कृतवन्तः।
(उन्होंने बस छोड़कर पैदल ही जाने का निश्चय किया।)

(ख) चौरः ग्रामे नियुक्तः राजपुरुषः आसीत्।
(चोर गाँव में नियुक्त राजपुरुष था।)
उत्तरम् :
चौरा: ग्रामे नियुक्ताः राजपुरुषाः आसन्।
(चोर ग्राम में नियुक्त सिपाही थे।)

(ग) कश्चन चौरः गृहाभ्यन्तरं प्रविष्टः।
(कोई चोर घर के अन्दर घुस गया।)
उत्तरम् :
केचन चौराः गृहाभ्यन्तरं प्रविष्टाः।
(कुछ चोर घर के अन्दर घुस गए।)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 8 विचित्रः साक्षी

(घ) अन्येयुः तौ न्यायालये स्व-स्व-पक्षं स्थापितवन्तौ।
(दूसरे दिन उन दोनों ने न्यायालय में अपने-अपने पक्ष को रखा।)
उत्तरम् :
अन्येयुः ते न्यायालये स्व-स्व-पक्षं स्थापितवन्तः।
(दूसरे दिन उन्होंने न्यायालय में अपने-अपने पक्ष को रखा।)

(आ) कोष्ठकेषु दत्तेषु पदेषु यथानिर्दिष्टां विभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत –
(कोष्ठक में दिए गए पदों में निर्देशानुसार विभक्ति का प्रयोग करके रिक्तस्थानों की पूर्ति कीजिए)

(क) सः …………. निष्क्रम्य बहिरगच्छत्। (गृहंशब्दे पंचमी)
(ख) गृहस्थः ……… आश्रयं प्रायच्छत्। (अतिथिशब्दे चतुर्थी)
(ग) तौ …………… प्रति प्रस्थितौ। (न्यायाधीशशब्दे द्वितीया)
(घ) ……………. चायाभियाग त्व वषत्रयस्य कारादण्ड लस्यय। (इदम् शब्दे सप्तमी)
चौरस्य ……………… प्रबुद्धः अतिथिः। (पादध्वनि शब्दे तृतीया)
उत्तरम् :
(क) सः गृहात् निष्क्रम्य बहिरगच्छत्।
(वह घर से निकलकर बाहर आ गया।)

(ख) गृहस्थः अतिथये आश्रयं प्रायच्छत्।
(गृहस्थ ने अतिथि के लिए सहारा दे दिया।)

(ग) तौ न्यायाधीशं प्रति प्रस्थितौ।
(वे दोनों न्यायाधीश की ओर प्रस्थान कर गए।)

(घ) अस्मिन् चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे।
(इस चोरी के आरोप में तुम तीन वर्ष के कारावास का दण्ड भोगोगे।

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(ङ) चौरस्य पादध्वनिना प्रबुद्धः अतिथिः।
(चौर के पैरों की ध्वनि से जागा हुआ अतिथि।)

भाषिकविस्तार:

उपार्जितवान् – उप +। ✓अर्ज + तवतु
दापयितुम् – ✓दा + णिच् + तुमुन्

अदस् (यह) पुँल्लिग सर्वनाम शब्द

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अध्वन् (मार्ग) नकारान्त पुंल्लिङ्ग

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JAC Class 10th Sanskrit विचित्रः साक्षी Important Questions and Answers

शब्दार्थ चयनम् –

अधोलिखित वाक्येषु रेखांकित पदानां प्रसङ्गानुकूलम् उचितार्थ चित्वा लिखत – 

प्रश्न 1.
कश्चन निर्धनो जनः भूरि परिश्रम्य किञ्चिद् वित्तमुपार्जितवान्।
(अ) महत्
(ब) निर्धनः
(स) किञ्चित्
(द) स्वपुत्रम्
चतुर्थी
उत्तरम् :
(अ) महत्

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प्रश्न 2.
विजने प्रदेशे पदयात्रा न शुभावहा।
(अ) प्रवेशं
(ब) निर्जने
(स) तत्रैव
(द) निवसन्
उत्तरम् :
(ब) निर्जने

प्रश्न 3.
रात्रौ तस्मिन् गृहे कश्चन चौरः गृहाभ्यन्तरं प्रविष्ट:
(अ) तस्यामेव
(ब) निहिता
(स) भवने
(द) पलायितः
उत्तरम् :
(स) भवने

प्रश्न 4.
यद्यपि ग्रामस्य आरक्षी एव चौर आसीत्
(अ) ध्वनिना
(ब) धावत्
(स) आरभत
(द) रक्षापुरुषः
उत्तरम् :
(द) रक्षापुरुषः

प्रश्न 5.
अग्रिमे दिने स आरक्षी चौर्याभियोगे तं न्यायालयं नीतवान्।
(अ) अमुम्
(ब) अन्येधुः
(स) लयम्
(द) श्रुतवान्
उत्तरम् :
(अ) अमुम्

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प्रश्न 6.
तस्य मृतशरीरं राजमार्ग निकषा वर्तते –
(अ) वृत्तमवगल्य
(ब) समया
(स) उपस्थातुम्
(द) समागत्य
उत्तरम् :
(ब) समया

प्रश्न 7.
आदेशं प्राप्य उभौ प्राचलताम् –
(अ) चलताम्
(ब) काष्ठपटले
(स) द्वावेव
(द) अभियुक्तश्च
उत्तरम् :
(स) द्वावेव

प्रश्न 8.
इदानीं निजकृत्यस्य फलं भुव –
(अ) आसीत्
(ब) चोरितायाः
(स) चौर्याभियोगे
(द) परिणामम्
उत्तरम् :
(द) परिणामम्

प्रश्न 9.
न्यायाधीशेन पुनस्तौ घटनायाः विषये वक्तुमादिष्टौ –
(अ) कथयितुम्
(ब) प्रस्तुतवति
(स) आश्चर्यमघटत्
(द) मान्यवर
उत्तरम् :
(अ) कथयितुम्

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प्रश्न 10.
न्यायाधीशः आरक्षिणे कारादण्डमादिश्य तं जनं ससम्मानं मुक्तवान् –
(अ) अध्वनि
(ब) अत्यजत्
(स) रक्षिणे
(घ) अपमानं
उत्तरम् :
(ब) अत्यजत्

संस्कृतमाध्यमेन प्रश्नोत्तराणि –

एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)

प्रश्न 1.
उच्चैः क्रोशितुं कः आरभत ?
(जोर-जोर से कौन चीखने लगा ?)
उत्तरम् :
चौरः (चोर)।

प्रश्न 2.
स्वगृहात् निष्क्रम्य तत्र के आगच्छन् ?
(अपने घर से निकलकर वहाँ कौन आ नये ?)
उत्तरम् :
ग्रामवासिनः (ग्रामवासी)।

प्रश्न 3.
चौरः काम् आदाय पलायितः ?
(चोर किसको लेकर भागा ?)
उत्तरम् :
मञ्जूषाम्। (पेटी को)

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प्रश्न 4.
न्यायाधीशः कं निर्दोषम् अमन्यत ?
(न्यायाधीश ने किसको निर्दोष माना ?)
उत्तरम् :
अतिथिम् (अतिथि को)।

प्रश्न 5.
शवं न्यायालये आनेतुं कः आदिष्टवान् ?
(शव को न्यायालय में लाने का आदेश किसने दिया ?)
उत्तरम् :
न्यायाधीशः (न्याय करने वाले अधिकारी ने)।

प्रश्न 6.
भारवेदनया कः क्रन्दति स्म ?
(भार के कष्ट से कौन चीखा ?)
उत्तरम् :
अभियुक्तः (अपराधी)।

प्रश्न 7.
उच्चैः कः अहसत् ?
(जोर से कौन हँसा ?)
उत्तरम् :
आरक्षी (चौकीदार)।

प्रश्न 8.
तम् अतिथिं ससम्मानं कः मुक्तवान् ?
(उस अतिथि को ससम्मान किसने मुक्त किया ?)
उत्तरम् :
न्यायाधीशः (न्यायाधिकारी ने)।

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प्रश्न 9.
किं समालम्ब्य दुष्कराण्यपि कर्माणि कुर्वते ?
(किसका सहारा लेकर कठिन कार्य भी कर लेते हैं ?)
उत्तरम् :
नीतियुक्तिम् (नीति से पूर्ण)।

प्रश्न 10.
निशान्धकारे प्रसृते कुत्र पदयात्रा न शुभावहा ?
(रात का अँधेरा फैलने पर कहाँ पैदल यात्रा हितकारी नहीं ?)
उत्तरम् :
विजनेप्रदेशे (एकान्त प्रदेश में)।

प्रश्न 11.
भूरिपरिश्रम्य कः किञ्चिद् वित्तमुपार्जितवान् ?
(बहुत परिश्रम करके किसने कुछ धन कमाया ?)
उत्तरम् :
कश्चन निर्धनोजनः (किसी गरीब ने)।

प्रश्न 12.
रात्रौ तस्मिन् गृहे कः प्रविष्टः ?
(रात्रि में उस घर में कौन प्रविष्ट हो गया ?)
उत्तरम् :
चौरः (चोर)।

प्रश्न 13.
चौरस्य पादध्वनिना कः प्रबुद्धः ?
(चोर के पैरों की ध्वनि से कौन जाग गया ?)
उत्तरम् :
अतिथिः (आया हुआ व्यक्ति)।

प्रश्न 14.
चौर्याभियोगे तं न्यायालयं कः नीतवान् ?
(चोरी के मुकदमे में उसको न्यायालय कौन ले गया ?)
उत्तरम् :
आरक्षी (चौकीदार)।

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प्रश्न 15.
न्यायाधीशो नाम किम् आसीत् ?
(न्यायाधीश का नाम क्या था ?)
उत्तरम् :
बंकिमचन्द्रः (बंकिमचन्द्र चटर्जी)।

प्रश्न 16.
आदेशं प्राप्य उभौ किम् अकुरुताम् ?
(आदेश पाकर दोनों ने क्या किया ?)
उत्तरम् :
प्राचलताम् (चल दिए)।

प्रश्न 17.
सुपुष्टदेह कः आसीत् ?
(हष्ट-पुष्ट शरीर वाला कौन था ?)
उत्तरम् :
आरक्षी (चौकीदार)।

प्रश्न 18.
न्यायाधीशेन पुनस्तौ कस्य विषये वक्तुमादिष्टौ?
(न्यायाधीश ने फिर से उन दोनों को किसके विषय में बोलने
का आदेश दिया ?)
उत्तरम् :
घटनायाः (घटना के)।

प्रश्न 19.
न्यायाधीशः कस्मै कारादण्डमादिष्टवान्।
(न्यायाधीश ने किसके लिए कारावास (कैद) के दण्ड का आदेश दिया ?)
उत्तरम् :
आरक्षिणे (चौकीदार के लिए)।
पूर्णवाक्येन उत्तरत (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए)

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प्रश्न 20.
पुत्रं द्रष्टुं कः प्रस्थितः ?
(पुत्र को देखने के लिए किसने प्रस्थान किया ?)
उत्तरम् :
निर्धन: पिता (गरीब पिता ने)।

प्रश्न 21.
कः तस्मै आश्रयं प्रायच्छत् ?
(किसने उसे आश्रय प्रदान किया ?)
उत्तरम् :
करुणापरो गृही तस्मै आश्रयं प्रायच्छत्।
(दयालु गृहस्थ ने उसे सहारा प्रदान किया।)

प्रश्न 22.
पिता कस्मात् व्याकुलोऽजायत ?
(पिता किसलिए व्याकुल हो गया ?)
उत्तरम् :
एकदा पिता तनूजस्य (पुत्रस्य) रुग्णावस्थाम् आकर्ण्य व्याकुलोऽजायत।
(एक दिन पिता पुत्र के बीमार होने की सूचना पाकर व्याकुल हो गया।)

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प्रश्न 23.
सर्ववृत्तम् अवगम्य न्यायाधीशः किम् अमन्यत ?
(सारा वृत्तान्त जानकर न्यायाधीश ने क्या माना ?)
उत्तरम् :
सर्वं वृत्तम् अवगम्य न्यायाधीशः तम् अतिथिं निर्दोषम् अमन्यत आरक्षिणं च दोषभाजनम्।।
(सारा वृत्तान्त जानकर न्यायाधीश ने उस अतिथि को निर्दोष माना और चौकीदार को दोष का पात्र।)

प्रश्न 24.
अभियुक्तस्य कृते किं दुष्करम् आसीत् ?
(अभियुक्त के लिए क्या मुश्किल था ?)
उत्तरम् :
भारवतः शवस्य स्कन्धेन वहनम् अभियुक्तस्य कृते दुष्करम् आसीत्।।
(बोझिल लाश का कन्धे पर ढोना अभियुक्त के लिए मुश्किल था।)

प्रश्न 25.
शवः उत्थाय किमवदत् ?
(लाश ने उठकर क्या कहा ?)
उत्तरम् :
मान्यवर ! एतेन आरक्षिणा अध्वनि यदुक्तं तद् वर्णयामि – ‘त्वया अहं चोरितायाः मञ्जूषायाः ग्रहणात् वारितः, अतः निजकृत्यस्य फलं भुव’। (मान्यवर ! इस चौकीदार ने रास्ते में जो कहा उसका मैं वर्णन करता हूँ- ‘तुमने मुझे चुराई गई पेटी को ले जाने से रोका अतः अपने कृत्य का फल भोगो’।)

प्रश्न 26.
निर्धनजनस्य पुत्रः कुत्र निवसन् अध्ययने संलग्नः समभूत्।
(गरीब का बेटा कहाँ रहकर अध्ययन में लग गया?)
उत्तरम् :
निर्धनजनस्य पुत्रः छात्रावासे निवसन् अध्ययने संलग्नः समभूत्।
(गरीब का बेटा छात्रावास में रहते हुए अध्ययन में लग गया।)

प्रश्न 27.
चौरः उच्चैः क्रोशितुं किम् आरभत?
(चोर ने जोर-जोर से क्या चीखना प्रारंभ किया ?)
उत्तरम् :
चौरः उच्चैः क्रोशितुमारभत् “चौरोऽयं चौरोऽयम्” इति।
(चोर ने जोर से चीखना प्रारंभ किया-यह चोर है, यह चोर है।

प्रश्न 28.
अग्रिमे दिने स आरक्षी किम् अकरोत् ?
(अगले दिन चौकीदार ने क्या किया ?)
उत्तरम् :
अग्रिमे दिने स आरक्षी तं अतिथिं चौर्याभियोगे न्यायालयं नीतवान्।
(अगले दिन वह चौकीदार उस अतिथि को चोरी के मुकदमे में न्यायालय ले गया।)

प्रश्न 29.
आरक्षी अभियुक्तश्च कीदृशौ आस्ताम् ?
(चौकीदार और अभियुक्त कैसे थे ?)
उत्तरम् :
आरक्षी सुपुष्टदेहः आसीत् अभियुक्तश्च अतीव कृषकायः आसीत्।
(चौकीदार हृष्टपुष्ट था और अभियुक्त अत्यन्त दुबला-पतला था।)

प्रश्न 30.
न्यायालये किमाश्चर्यम् अघटत् ?
(न्यायालय में क्या आश्चर्य घटा ?)
उत्तरम् :
सः शवः प्रावारकमपसार्य उतिष्ठत् ?
(वह शव चादर हटाकर उठ खड़ा हुआ।)

अन्वय-लेखनम् –

अधोलिखितश्लोकस्यान्वयमाश्रित्य रिक्तस्थानानि मञ्जूषातः समुचितपदानि चित्वा पूरयत।
(नीचे लिखे श्लोक के अन्वय के आधार पर रिक्तस्थानों की पूर्ति मंजूषा से उचित पद चुनकर कीजिए।)

दुष्कराण्यपि कर्माणि ………………… लीलयैव प्रकुर्वते।।

मञ्जूषा – नीतियुक्तिम्, लीलया दुष्कराणि, अपि।

‘मति वैभवशालिनः (i) ……… समालम्ब्य (ii) ……… कर्माणि (iii) ………. (iv) ……… एव प्रकुर्वते।’ उत्तरम् : (i) नीतियुक्तिम् (ii) दुष्कराणि (ii) अपि (iv) लीलया।

प्रश्ननिर्माणम् –

अधोलिखित वाक्येषु स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत –

1. निर्धनः भूरि परिश्रम्य किञ्चिद्वित्तमुपार्जितवान्।
(निर्धन ने बहुत परिश्रम करके कुछ धन उपार्जित किया।)

2. तस्य तनयः छात्रावासे निवसन् अध्ययने संलग्नः समभूत्।
(उसका बेटा छात्रावास में रहता हुआ अध्ययन में लग गया।)

3. व्याकुलो निर्धनः पत्रं द्रष्टुं प्रस्थितः।
(व्याकुल निर्धन पुत्र को देखने प्रस्थान कर गया।)

4. परमर्थकार्येन पीडितः सः बसयानं विहाय पदातिरेव प्राचलत्।
(अत्यधिक आर्थिक कमजोरी से पीड़ित वह बस को छोड़कर पैदल ही चल पड़ा।)

5. सायं समयेऽसौ गन्तव्याद् दूरे आसीत्।
(शाम के समय वह गन्तव्य से दूर था।)

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6. करुणापरो गृही अतिथये आश्रयं प्रायच्छत्।
(दयालु गृहस्वामी ने अतिथि के लिए आश्रय दे दिया।)

7. विचित्रा दैवगतिः।
(भाग्य की गति विचित्र है।)

8. कश्चन चौरः गृहाभ्यन्तरं प्रविष्टः।
(कोई चोर घर के अन्दर घुस गया।)

9. अतिथिमेव चौरं मत्वाऽभर्त्सयन्।
(अतिथि को ही चोर मानकर निन्दा की।)

10. अग्रिमे दिने तौ न्यायालये उपस्थातुम् आदिष्टवान्। – (अगले दिन उन दोनों को न्यायालय में उपस्थित होने का आदेश दिया।)
उत्तराणि :
1. निर्धन: भूरि परिश्रम्य किम् उपार्जितवान् ?
2. तस्य तनयः छात्रावासे निवसन् कस्मिन् संलग्नः समभूत्?
3. व्याकुलो निर्धनः कं द्रष्टुं प्रस्थितः ?
4. केन पीडितः सः बसयानं विहाय पदातिरेव प्राचलत् ?
5. सायं समयेऽसौकस्मात् दूरे आसीत् ?
6. करुणापरो गृही कस्मै आश्रयं प्रायच्छत् ?
7. कीदृशा दैवगतिः ?
8. कश्चन चौरः कुत्र प्रविष्टः ?
9. कम् एव चौरं मत्वाऽभर्स्यन् ?
10. अग्रिमे दिने तौ किं कर्तुम् आदिष्टवान् ?

भावार्थ-लेखनम् –

अधोलिखित पद्यांश संस्कृते भावार्थं लिखत –
दुष्कराण्यपि ………………………… लीलयैव प्रकुर्वते।।

भावार्थ – बुद्धिमन्तः नीत्याः युक्तयाः च आश्रयं गृहीत्वा कष्टकराणि अपि करणीयानि कार्याणि कौतुकेन सुगमतया वा सम्पादयन्ति।

अधोलिखितानां सूक्तीनां भावबोधनं सरलसंस्कृतभाषया लिखत –
(निम्नलिखित सूक्तियों का भावार्थ सरल संस्कृत भाषा में लिखिए-)

(i) निशान्धकारे प्रसृते विजने प्रदेशे पदयात्रा न शुभावहा।
भावार्थः – रात्रिकाले विस्तृते अन्धकारे निर्जने भूभागे मार्गे वा पदयात्रा शोभनीया सुखदा वा न भवति यतः अन्धकारे किमपि अशोभनीयं घटितुं शक्नोति।
(रात के समय विस्तृत अँधेरे में सुनसान प्रदेश में अथवा मार्ग में पैदल यात्रा शोभनीय या सुखद नहीं होती क्योंकि अन्धकार में कुछ भी अशोभनीय घटना घट सकती है।)

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(ii) विचित्रा दैवगतिः।
भावार्थ: – भाग्यस्य गतिः अद्भुत आश्चर्यकरा च भवति। दैवात् अकस्मात् एव शुभमशुभम् वा किमपि घटितुं शक्नोति। (भाग्य की गति अद्भुत और आश्चर्य करने वाली होती है। भाग्यवश अचानक ही शुभ या अशुभ कुछ भी घट सकता है।)

(iii) दुष्कराण्यपि कर्माणि मतिवैभवशालिनः।।
भावार्थ: – बुद्धिमन्तः जनाः नीतिगतां युक्तिम् आश्रित्य दुर्लभकार्याणि अपि सुगमतया सम्पादयन्ति।
(बुद्धिमान् लोग नीतियुक्त तरीके का सहारा लेकर कठिन कार्य को भी सम्पन्न कर सकते हैं।)

पाठ-सार –

प्रश्न – ‘विचित्र साक्षी’ इति पाठस्य सारांशः हिन्दी भाषायां।
उत्तर :
किसी धनहीन मनुष्य ने पर्याप्त मेहनत करके कुछ धन अर्जित किया। इससे वह अपने बेटे को महाविद्यालय में प्रवेश दिलाने के योग्य हो गया। एक दिन वह पिता पुत्र की अस्वस्थता के बारे में सुनकर उद्विग्न हो गया। बेटे को देखने के लिये उसने बस की सवारी छोड़कर पैदल ही चल दिया रात के अंधकार के फैलने पर समीप के गाँव में किसी दयालु गृहस्थ के यहाँ उसने आश्रय लिया। भाग्य की गति अनोखी होती है।

उसी रात उस घर में चोर घुस गया। उस घर में रखी हुई पेटी को लेकर भाग गया। आगन्तुक ने चोर को पकड़ लिया परन्तु वह चोर ही चिल्लाने लगा – “यह चोर है यह चोर है।” इस प्रकार चोर जो कि वहाँ का चौकीदार था, उसने उस आगन्तुक को चोर है, ऐसा प्रचार करके आगन्तुक को ही जेल में डाल दिया। आगामी दिन वह रक्षापुरुष उस (अतिथि) को न्यायालय ले गया। न्यायाधिकारी बंकिम चन्द्र ने अलग-अलग दोनों का स्पष्टीकरण सुना।

उसी समय कोई वहीं का निवासी कर्मचारी निवेदन करने लगा कि यहाँ से दो कोस दूर पर कोई मनुष्य किसी द्वारा मारा हुआ है। उसका शव सड़क के समीप है। आदेश दीजिये क्या किया जाये? न्यायाधिकारी ने रक्षापुरुष और अभियुक्त को उस शव को न्यायालय के अन्दर लाने का आदेश दिया। आज्ञा प्राप्त करके दोनों प्रस्थान कर गये। उस स्थान पर समीप ही एक काठ के तख्ते पर रखे हुये चादर से ढंके हुये शरीर को कंधे पर उठाकर न्यायालय की ओर प्रस्थान कर गये।

रक्षापुरुष (चौकीदार) हृष्ट-पुष्ट शरीर था और अभियोगी दुर्बल शरीर वाला था। भारयुक्त लाश को कंधे पर ढोना उसके लिये कष्टदायक था। वह वजन के कष्ट से चिल्ला उठा। उसकी चीख को सुनकर प्रसन्न हुआ चौकीदार उससे बोला “अरे दुष्ट! उस दिन मुझे तुमने चोरी की पेटी को ले जाने से रोका था, अब भोग अपने कर्म का फल। इस चोरी के मुकदमे में तुम तीन साल तक कारावास का दण्ड प्राप्त करोगे। ऐसा कहकर वह उच्च स्वर से हँसा। जैसे-तैसे दोनों ने लाश को लाकर एक चबूतरे पर रख दिया।

न्यायाधीश ने पुनः उन दोनों को घटना के विषय में कहने की आज्ञा दी। रक्षापुरुष द्वारा अपना बयान करने पर अर्थात् जब रक्षापुरुष अपना बयान कर रहा था तभी एक अनोखी घटना घटी, उस लाश ने (जो कि जीवित था) चादर को हटाकर न्यायाधीश महोदय को प्रणाम करके रास्ते का सारा वृत्तांत सुना दिया। न्यायाधीश ने रक्षापुरुष (चौकीदार) को अपराधी मानकर जेल में डालने की आज्ञा दी तथा उस व्यक्ति (अतिथि) को सम्मान सहित मुक्त कर दिया। अतएव कहा गया है-बुद्धिमान नीति का सहारा लेकर कठिनाई से किए जाने वाले कार्य को सरलता से अथवा खेल-खेल में पूरा करते हैं।

विचित्रः साक्षी Summary and Translation in Hindi

पाठ-परिचय – प्रस्तुत कथा बंगला के सुप्रसिद्ध साहित्यकार बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा न्यायाधीश के रूप में दिये गये एक फैसले पर आधारित है। इसके रचयिता श्री ओमप्रकाश ठाकुर हैं। चटर्जी जितने महान् साहित्यकार थे, उतने ही प्रसिद्ध न्यायाधीश भी रहे। नीर-क्षीर विभागार्थ वे कभी-कभी ऐसी युक्तियों का प्रयोग करते थे कि गवाह के अभाव में भी न्याय हो सके। इस कथा में भी विद्वान न्यायाधीश ने एक ऐसी ही युक्ति का प्रयोग करके न्याय करने में सफलता पायी है।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 8 विचित्रः साक्षी

मूलपाठः,शब्दार्थाः,सप्रसंग हिन्दी-अनुवादः

1 कश्चन निर्धनो जनः भूरि परिश्रम्य किञ्चिद् वित्तमुपार्जितवान्। तेन स्वपुत्रं एकस्मिन् महाविद्यालये प्रवेशं दापयितुं सफलो जातः। तत्तनयः तत्रैव छात्रावासे निवसन् अध्ययने संलग्नः समभूत्। एकदा स पिता तनूजस्य रुग्णतामाकर्ण्य व्याकुलो जातः पुत्रं द्रष्टुं च प्रस्थितः। परमर्थकार्येन पीडितः स बसयानं विहाय पदातिरेव प्राचलत्।

पदातिक्रमेण संचलन् सायं समयेऽप्यसौ गन्तव्याद् दूरे आसीत्। निशान्धकारे प्रसृते विजने प्रदेशे पदयात्रा न शुभावहा। एवं विचार्य स पावस्थिते ग्रामे रात्रिनिवासं कर्तुं कञ्चिद् गृहस्थमुपागतः। करुणापरो गृही तस्मै आश्रयं प्रायच्छत्।

शब्दार्थाः – कश्चन = कश्चित् (किसी), निर्धनः = धनहीनः, दरिद्रः (गरीब), जनः = मनुष्यः (व्यक्ति ने). भूरि = महत्, पर्याप्तम् (बहुत, पर्याप्त), परिश्रम्य = श्रमं कृत्वा (मेहनत करके), किञ्चित् = कतिपयं (कुछ), वित्तम् : धनम् (धन), उपार्जितवान् = अर्जितवान्, (कमाया), तेन = अमुना (उससे), [सः = वह], स्वपुत्रम् = स्वकीयम् आत्मजम्, सुतम् (अपने बेटे को), एकस्मिन् महाविद्यालये = (एक महाविद्यालय में), प्रवेशं दापयितुम् = प्रवेशं कारयितुम्, प्रापयितुम् (प्रवेश दिलाने में), सफलो जातः = समर्थः अभवत् (सफल हो गया), तत्तनयः = तस्य पुत्रः, आत्मजः (उसका बेटा),

तत्रैव = तस्मिन्नेव (उसी, वही), छात्रावासे = विद्यार्थिनिवासे (छात्रावास में), निवसन् = निवासं कुर्वन् (रहता हुआ), अध्ययने = पठने (अध्ययन करने में), संलग्नः = निरत (संलग्न हो गया) समभूत् = अजायत (हो गया), एकदा = एकस्मिन् दिवसे (एक दिन), स पिता = असौ जनकः (वह पिता), तनूजस्य = पुत्रस्य (बेटे की), रुग्णताम् = अस्वस्थताम् (बीमारी को), आकर्ण्य = श्रुत्वा (सुनकर), व्याकुलो = व्यग्रः, उद्विग्नः (व्याकुल), जातः = अजायत, अभवत् (हो गया, हुआ), पुत्रम् च = सुतम् च आत्मजम् (और बेटे को), द्रष्टुम् = ईक्षितुम्, अवलोकयितुम् (देखने के लिए), प्रस्थितः = प्रस्थानम् अकरोत् (प्रस्थान कर गया), परमर्थकार्येन = परञ्च धनस्य अत्यधिक अभावेन (परन्तु धन के अत्यधिक अभाव से), पीडितः = क्लेशयुक्तः, दुःखितः (खिन्न), स = असौ (वह), बसयानं (बस-गाड़ी को), विहाय = त्यक्त्वा (छोड़कर), पदातिरेव = पादाभ्याम् एव (पैदल ही), प्राचलत् = प्रस्थितः (चला गया)।

पदातिक्रमेण = पादाभ्याम् एव सतत् (पैदल ही लगातार), सञ्चलन् = चलन्नेव (चलते हुए), सायं समये अपि = संध्याकाले अपि (सायंकाल भी), असौ = सः (वह), गन्तव्याद् दूरे = गन्तव्यस्थानात् दूरे (गन्तव्य स्थान से दूर), आसीत् = अवर्तत (था), निशान्धकारे = रात्रेः तमसि (रात के अंधेरे के), प्रसृते = विस्तृते (फैलने पर), विजने प्रदेशे = निर्जन प्रदेशे (निर्जन प्रदेश में), पदयात्रा = पदातियात्रा, पादाभ्याम् प्रयाणम् (पदयात्रा), न शुभावहा = न. कल्याणकर: (कल्याणकारी नहीं), एवं विचार्य = इत्थं विचिन्त्य (इस प्रकार सोचकर), सः = असौ (वह),

पाशवस्थिते ग्रामे = समीपस्थे ग्रामे, समीपे विद्यमाने ग्रामे (पास में बसे गाँव में), रात्रिनिवासम् = निशावासम् (रैन बसेरा), कर्तुम् = विधातुम् (करने के लिए), कञ्चिद् = कञ्चन (किसी), गृहस्थमुपागतः = दम्पत्योः समीपम् आगच्छत् (दम्पती के पास आया), करुणापरो = करुणोपेतः, दयार्द्रः (करुणामय), गही = गृहस्वामी (घर के मालिक ने), तस्मै = अमुष्मै (उसके लिए), आश्रयम् = शरणम् (सहारा), प्रायच्छत् =प्राददात् (दे दिया)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक शेमुषी के ‘विचित्र साक्षी’ पाठ से लिया गया है। यह पाठ मूलतः श्रीमान् ओम प्रकाश ठक्कुर द्वारा रचित कथा का सम्पादित अंश है। इस कथा में न्यायाधीश श्री वंकिम चन्द्र चटर्जी महोदय द्वारा एक ऐसी युक्ति का प्रयोग किया गया है जिसे बिना गवाह के भी न्याय किया जा सकता है। इस गद्यांश में कथानायककी आर्थिक स्थिति का चित्रण किया गया है, जिससे बाध्य होकर वह एक किसी गृहस्थ में आश्रय लेता है।

हिन्दी-अनुवादः – किसी गरीब व्यक्ति ने बहुत परिश्रम करके कुछ धन कमाया। उससे वह अपने बेटे को एक महाविद्यालय में प्रवेश दिलाने में समर्थ हो गया। उसका बेटा वहीं छात्रावास में रहता हुआ अध्ययन में संलग्न हो गया। एक दिन वह पिता बेटे की बीमारी (की बात) सुनकर व्याकुल हुआ और बेटे को देखने के लिए चल दिया, परन्तु धन के अत्यधिक अभाव के कारण खिन्न हुआ वह बस को छोड़कर पैदल ही चल पड़ा।

पैदल ही लगातार चलते हुए सायंकाल को भी वह अपने गन्तव्य से दूर रहा (था) रात का अँधेरा फैलने पर ‘एकान्त प्रदेश में पैदल यात्रा हितकारी (कल्याणकारी) नहीं’ इस प्रकार सोचकर वह पास में बसे गाँव में रैन-बसेरा करने के लिए किसी गृहस्थ के पास आया। करुणामय घर के मालिक ने उसे सहारा (आश्रय) प्रदान किया।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 8 विचित्रः साक्षी

2 विचित्रा दैवगतिः। तस्यामेव रात्रौ तस्मिन् गृहे कश्चन चौरः गृहाभ्यन्तरं प्रविष्टः। तत्र निहितामेकां मञ्जूषाम् आदाय पलायितः। चौरस्य पादध्वनिना प्रबुद्धोऽतिथि: चौरशङ्कया तमन्वधावत् अगृह्णाच्च, परं विचित्रमघटत। शितुमारभत “चौरोऽयं चौरोऽयम्” इति। तस्य तारस्वरेण प्रबुद्धाः ग्रामवासिनः स्वगृहाद् निष्क्रम्य तत्रागच्छन् वराकमतिथिमेव च चौरं मत्वाऽभसंयन्। यद्यपि ग्रामस्य आरक्षी.एव चौर आसीत्। तत्क्षणमेव रक्षापुरुषः तम् अतिथिं चौरोऽयम् इति प्रख्याप्य कारागृहे प्राक्षिपत्।

शब्दार्थाः – दैवगतिः = दैवस्य भाग्यस्य, गतिः स्थितिः, विधेर्विधानम् (भाग्य की गति, लीला), विचित्रा = अद्भुता (अनोखी), [भवति = होती है], तस्यामेव रात्रौ = अमुष्याम् एव निशायाम् (उसी रात में), तस्मिन् गृहे = अमुष्मिन् भवने (उस घर में), कश्चन चौरः = कश्चित् तस्करः (कोई चोर), गृहाभ्यान्तरं प्रविष्टः = भवनस्य मध्ये प्रवेशमकरोत् (घर के अन्दर घुस गया), तत्र = तस्मिन् गृहे (वहाँ), निहितामेकाम् = विद्यमानां, स्थितामेकां (रखी हुई एक), मञ्जूषाम् = पेटिकाम् (पेटी को), आदाय = नीत्वा, गृहीत्वा (लेकर), पलायितः = अधावत्, (भाग गया), चौरस्य = तस्करस्य (चोर की), पादध्वनिना = चरणपातशब्देन (पदचाप से),

प्रबुद्धो = जागृतः (जागा हुआ), अतिथिः = आगन्तुकः, अभ्यागतः (अतिथि), चौरशङ्कया = तस्करस्य संशयेन (चोर की आशङ्का से), तमन्वधावत् = अमुमन्वसरत् अन्वगच्छत् (उसके पीछे दौड़ा), अगृहणाच्च = प्राप्तवान् च (और पकड़ लिया), परम् = परञ्च (लेकिन), विचित्रमघटत = अद्भुतमजायत घटितवान् (अनोखी घटना घटी), चौरः एव = तस्करः एव (चोर ही), उच्चैः = उच्चस्वरेण (जोर-जोर से), क्रोशितुम् = क्रन्दितुम्, चीत्कर्तुम् (चिल्लाना/चीखना), आरभत = आरम्भमकरोत्, आरब्धवान् (आरम्भ कर दिया), ‘चौरोऽयं चौरोऽयम्’ = एषः चौरः, एषः चौरः (यह चोर है, यह चोर है ), इति = एवं (इस प्रकार), तस्य = अमुष्य (उसके), तारस्वरेण = उच्चस्वरेण (उच्चस्वर से), प्रबुद्धाः = जागृताः (जागे हुए), ग्रामवासिनः = ग्राम्याः, ग्रामीणजनाः (गाँव में रहने वाले लोग),

स्वगृहाद् = स्व स्व भवनात् (अपने-अपने घर से), निष्क्रम्य = निर्गत्य (निकलकर), तत्रागच्छन् = तस्मिन् स्थाने आयाताः, आगतवन्तः (वहाँ आ गये), वराकमतिथिमेव च = दीनमागन्तुकमेक च (और उस बेचारे अतिथि को ही), चोरं मत्वा = तस्करं मत्वा (चोर मानकर), अभर्स्यन् = भर्त्सना, निन्दामकुर्वन् (निन्दा की), यद्यपि = वस्तुतः (वास्तव में), ग्रामस्य आरक्षी = ग्रामस्य रक्षापुरुषः (गाँव का पुलिस कर्मचारी, चौकीदार), एव चौरः आसीत् = एव तस्करोऽवर्तत (ही चोर था), तत्क्षणमेव = तत्कालमेव (तत्काल ही), रक्षापुरुषः = आरक्षी (रक्षापुरुष ने), तमतिथिम् = तमागन्तुकम् (उस अतिथि को), चौरोऽयम् = एषः तस्करः (यह चोर है), इति प्रख्याप्य = इति प्रचार्य (इस प्रकार प्रचार करके), (तम्) कारागारे = बन्दीगृहे (जेल में), प्राक्षिपत् = न्यगृणीत (डाल दिया)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक शेमुषी के ‘विचित्रः साक्षी’ पाठ से लिया गया है। मूलतः यह पाठ श्रीमान् ओम प्रकाश ठक्कुर महोदय रचित कथा का सम्पादित अंश है। इस अंश में कथा-नायक का दुर्भाग्य वर्णित है कि उसकी उपस्थिति में ही घर में कोई चोर प्रवेश करता है तथा अतिथि द्वारा किया गया हित भी अहित हो गया।

हिन्दी-अनुवादः – भाग्य की लीला बड़ी अनोखी होती है। उसी रात में उस घर में कोई चोर घर के अन्दर घुस गया। वहाँ रखी एक पेटी को लेकर वह भाग गया। चोर की पदचाप से जागा हुआ अतिथि चोर की आशंका से चोर के पीछे दौड़ा और पकड़ लिया। लेकिन एक अनोखी घटना घटी कि उस चोर ने ही जोर-जोर से चीखना आरम्भ कर दिया। ‘यह चोर है, यह चोर है’। उसके उच्च स्वर से जागे हुए गाँव में रहने वाले लोग अपने-अपने घर से निकलकर वहाँ आ गये और उस बेचारे अतिथि को ही चोर मानकर निन्दा करने लगे। वास्तव में गाँव का चौकीदार ही चोर था। तत्काल ही उस आरक्षी (रखवाले, पुलिसवाले) ने ‘यह चोर है’ ऐसा प्रचार करके उसे बंदीगृह अर्थात् जेल में डाल दिया।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 8 विचित्रः साक्षी

3 अनिमे दिने स आरक्षी चौर्याभियोगे तं न्यायालयं नीतवान्। न्यायाधीशो बंकिमचन्द्रः उभाभ्यां पृथक्-पृथक् विवरणं श्रुतवान्। सर्वं वृत्तमवगत्य स तं निर्दोषम् अमन्यत आरक्षिणं च दोषभाजनम्। किन्तु प्रमाणाभावात् स निर्णेतुं नाशक्नोत्। ततोऽसौ तौ अग्रिमे दिने उपस्थातुम् आदिष्टवान्। अन्येद्यः तौ न्यायालये स्व-स्व-पक्षं पुनः स्थापितवन्तौ। तदैव कश्चिद् तत्रत्यः कर्मचारी समागत्य न्यवेदयत् यत् इतः क्रोशद्वयान्तराले कश्चिज्जनः केनापि हतः। तस्य मृतशरीरं राजमार्ग निकषा वर्तते। आदिश्यतां किं करणीयमिति। न्यायाधीशः आरक्षिणम् अभियुक्तं च तं शवं न्यायालये आनेतुमादिष्टवान्।

शब्दार्थाः – अग्रिमे दिने = आगामिदिवसे, अन्येधुः (अगले दिन), स आरक्षी = असौ रक्षापुरुषः (वह चौकीदार), चौर्याभियोगे = स्तेयस्यप्रकरणे (चोरी के मुकदमे में), तम् = अमुम् (उसको), न्यायालयम् = न्यायाधिकरणम् (न्यायालय को), नीतवान् = अनयत् (ले गया), न्यायाधीशः बंकिमचन्द्रः = न्यायाधिकारी बंकिमचन्द्रः (न्यायाधीश बंकिमचन्द्र ने), पृथक-पृथक् = भिन्नभिन्नम् (अलग-अलग), विवरणम् = स्पष्टीकरणम् (विवरण को), श्रुतवान् = अशृणोत् (सुना), सर्वम् = सम्पूर्णम् (पूरे), वृत्तमवगत्य = विवरणं, वृत्तान्तम् ज्ञात्वा (वृत्तान्त को जानकर),

स तं = असौ अमुम् (उसने उसे), निर्दोषम् = निरपराद्धम् (निरपराध), अमन्यत = मतघान् (माना), आरक्षिणं च = रक्षापुरुषं च सैनिकं (और रखवाले या चौकीदार को), दोषभाजनम् = अपराधस्य पात्रम् (दोष का भागीदार), किन्तु = परञ्च (लेकिन), प्रमाणाभावात् = प्रमाणस्य साक्षिणः अभावात् (गवाह के अभाव में, गवाह न होने के कारण), सः = असौ (वह), निर्णेतुम् नाशक्नोत् = निर्णयं कर्तुम् न अशक्नोत् (निर्णय नहीं कर सका), ततोऽसौ = ततः सः (तब उसने), तौ = अमू (उन दोनों को), अग्रिमे दिने = आगामिदिवसे, अपरेधुः (अगले दिन), उपस्थातुम् = उपस्थापयितुम् (उपस्थित होने के लिए), आदिष्टवान् = आज्ञप्तवान्, आज्ञां दत्तवान् (आदेश प्रदान किया), अन्येयुः = अपरे दिवसे (दूसरे दिन), तौ = अमू उभौ (उन दोनों ने),

न्यायालये = न्यायाधिकरणे (न्यायालय में), स्व- स्व-पक्षम् = आत्मनः कथनं, मन्तव्यम् (अपने-अपने पक्ष को), पुनः = द्वि-वारम् (फिर से), स्थापितवन्तौ = अस्थापयताम् (स्थापित किया), तदैव = तस्मिन्नेव काले (उसी समय, तभी), कश्चित् = कश्चन, कोऽपि (किसी), तत्रत्यः = तत्रभवः, तत्र निवसन् तत्रैव वास्तव्यः (वहाँ के निवासी), कर्मचारी = कर्मकारः, कार्यकर्ता, सेवकः, भृत्यः (कर्मचारी ने), समागत्य = प्राप्य, आगम्य (आकर), न्यवेदयत् = निवेदितवान् (निवेदन किया), यत् = कि, इतः = अत्रतः (यहाँ से), कोशद्वयान्तराले = द्वयोः क्रोशयोः मध्ये (दो कोस के मध्य, दो कोस की दूरी पर),

कश्चिज्जनः = कोऽपि मनुष्यः (कोई आदमी), केनापि = केनचित् (किसी के द्वारा), हतः = मारितः व्यापदितः (मारा गया), तस्य = अमुष्य (उसकी), मृतशरीरम् = शवः (लाश), राजमार्गम् = राज्ञः पथम्, जनपथस्य (राजमार्ग के, सड़क के), निकषा = समया, समीपं (समीप), वर्तते = अस्ति (है), आदिश्यताम् = आदेशं दीयताम् (आदेश दिया जाय, दीजिए), किं करणीयमिति = किं कर्त्तव्यमिति (क्या करना चाहिए), न्यायाधीशः = न्यायाधिकारी (न्यायाधीश ने), आरक्षिणम् = रक्षापुरुषम् (सैनिक को), अभियुक्तम् च = अपराधिनम् च अभियोगारोपितम् (और अभियुक्त को), तं शवम् = अमुम् मृतशरीरम् (उस लाश को), न्यायालये = न्यायाधिकरणे (न्यायालय में), आनेतुम् = आनयनाय (लाने के लिए), आदिष्टवान् = आज्ञां दत्तवान्, आज्ञप्तवान् (आदेश दिया)।।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी शेमुषी पाठ्यपुस्तक के विचित्र साक्षी’ पाठ से लिया गया है। यह पाठ मूलतः श्री ओम प्रकाश ठक्कुर रचित कथा का संपादित अंश है। इस गद्यांश में एक शव लाया जाता है, जो न्यायालय में साक्षी बनेगा।

हिन्दी-अनुवादः – अगले दिन वह चौकीदार (रक्षापुरुष) चोरी के मुकदमे में उस (अतिथि) को न्यायालय ले गया। न्यायाधीश बंकिमचन्द्र ने अलग-अलग विवरण (बयान) सुना। पूरे वृत्तान्त को जानकर उस (न्यायाधीश) ने उस (अतिथि) को निरपराध माना और रक्षापुरुष को अपराधी (माना) लेकिन प्रमाण के अभाव में वह (न्यायाधीश) निर्णय नहीं कर सका। तब उस (न्यायाधीश) ने उन दोनों (अतिथि एवं राजपुरुष) को अगले दिन उपस्थित होने के लिए आदेश प्रदान किया। दूसरे दिन उन दोनों ने न्यायालय में अपने-अपने पक्ष को फिर से स्थापित किया। तभी वहाँ के किसी रहने वाले ने आकर निवेदन किया कि यहाँ से दो कोस की दूरी पर कोई आदमी किसी के द्वारा मार दिया गया है, उसकी लाश सड़क के पास (समीप) है। आदेश दीजिए, क्या करना चाहिए। न्यायाधीश ने रक्षा पुरुष (सैनिक) और अभियुक्त को, उस शव को न्यायालय में लाने के लिए आदेश दिया।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 8 विचित्रः साक्षी

4 आदेशं प्राप्य उभौ प्राचलताम्। तत्रोपेत्य काष्ठपटले निहितं पटाच्छादितं देहं स्कन्धेन वहन्तौ न्यायाधिकरणं प्रति प्रस्थितौ। आरक्षी सुपुष्टदेह आसीत्, अभियुक्तश्च अतीव कृशकायः। भारवतः शवस्य स्कन्धेन वहनं तत्कृते दुष्करम् आसीत्। स भारवेदनया क्रन्दति स्म। तस्य क्रन्दनं निशम्य मुदित आरक्षी तमुवाच- ‘रे दुष्ट ! तस्मिन् दिने त्वयाऽहं चोरिताया मञ्जूषाया ग्रहणाद्वारितः। इदानीं निजकृत्यस्य फलं भुक्ष्व। अस्मिन् चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे’ इति प्रोच्य उच्चैः अहसत्। यथाकथञ्चिद् उभौ शवमानीय एकस्मिन् चत्वरे स्थापितवन्तौ।

शब्दार्थाः – आदेशम् = आज्ञाम् (आदेश को), प्राप्य = लब्ध्वा (पाकर), उभौ = द्वावेव (दोनों ही), प्राचलताम् = प्रस्थितौ (चल पड़े), तत्रोपेत्य = तस्मिन् स्थाने समीपं गत्वा (वहाँ पास जाकर), काष्ठपटले = काष्ठस्य पटले (लकड़ी के तख्ते पर), निहितं = स्थापितम् (रखे), पटाच्छादितम् = वस्त्रेण आवृतम् (कपड़े से ढके हुए), देहम् = शरीरम् (मृत शरीर को), स्कन्धेन = कन्धे से, वहन्तौ = वहनं कुर्वन्तौ, वहमानौ (ढोते हुए), न्यायाधिकरणम् प्रति + न्यायालयं प्रति (न्यायालय की ओर), प्रस्थितौ = प्रस्थानं कृतवन्तौ (प्रस्थान कर गये/किया), आरक्षी = रक्षापुरुषः (सैनिक, चौकीदार), सुपुष्टदेहः = सुपोषितशरीरः (हृष्ट-पुष्ट शरीर वाला), आसीत् = अवर्तत (था), अभियुक्तश्च = अभियोगोपेतः च (अपराधी), कृशकायः = दुर्बल शरीरः (कमजोर शरीर वाला), (आसीत् = था), भारवतः = भारयुक्तस्य भारवाहिनः (भारी),

शवस्य = मृतशरीरस्य (लाश को), (स्कन्धेन = कन्धे पर), वहनं = वोढुम् (ढोना), तत्कृते = तस्मै (उसके लिए), दुष्करम् = कष्टकरम् (मुश्किल), आसीत् = अवर्तत (था), सः = असौ (वह), भारवेदनया = भारस्य वेदनया, भारपीडया (वजन की पीड़ा से), क्रन्दति स्म = चीत्करोति स्म, रोदिति स्म (चीख रहा था), तस्य = अमुष्य (उसके), क्रन्दनं = चीत्कारं (चीत्कार को), निशम्य = श्रुत्वा (सुनकर), मुदितः = प्रसन्न, आरक्षी = रक्षापुरुषः (चौकीदार), तमुवाच = अमुम् अवदत् (उससे बोला), रे दुष्ट ! = अरे दुर्जन! (अरे दुष्ट !), तस्मिन् = अमुष्मिन् (उस), दिने = दिवसे (दिन), त्वयाऽहं = भवता अहम् त्वया (तुमने मुझे), चोरितायाः = चौर्यस्य (चोरी की), मञ्जूषायाः = पेटिकायाः (पेटी को), ग्रहणात् = नयनात् (ले जाने से),

वारितः = वारितवान् (रोका), इदानीम् = अधुना (अब), निजकृत्यस्य = स्वकर्मणः (अपने कर्म का, करनी का), फलम् = परिणामम् (परिणाम), भुक्ष्व = भवान् अनुभवतु (भोगो, अनुभव करो), अस्मिन् = एतस्मिन् (इस), चौर्याभियोगे = स्तेयाभियोगे, प्रकरणे (चोरी के मुकदमे में), त्वम् = भवान् (तुम), वर्षत्रयस्य = त्रयाणाम् अब्दानाम् (तीन वर्ष का), कारादण्डम् = कारावासस्य दण्डम् (कैद, जेल का दण्ड), लप्स्यसे = प्राप्स्यसि (पाओगे, भोगोगे), इति प्रोच्य = एवं उक्त्वा (ऐसा कहकर), उच्चैः = उच्चस्वरेण (जोर से), अहसत् = हसितवान् (हँसा), यथाकथंचित् = येन-केन-प्रकारेण (जैसे-तैसे), उभौ = द्वावेव (दोनों), शवमानीय = मृतशरीरम् नीत्वा (लाश को लेकर), एकस्मिन् चत्वरे = एकस्मिन् चतुर्मार्गे, चतुस्थे (एक चौराहे पर), स्थापितवन्तौ = अस्थापयताम् (रख दिया)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘विचित्र साक्षी’ पाठ से लिया गया है। मूलतः यह पाठ श्री ओम प्रकाश ठक्कुर रचित कथा का सम्पादित अंश है। इस गद्यांश में आरक्षी और अतिथि का संवाद प्रस्तुत किया गया है, जो संवाद न्यायालय में प्रमाण होगा।

हिन्दी-अनुवादः – आदेश पाकर दोनों (अभियुक्त और आरक्षी) ही चल पड़े। वहाँ पास जाकर लकड़ी के तख्ने पर रखे हुए कपड़े से ढके हुए (मृत) शरीर को कन्धे पर ढोते हुए न्यायालय की ओर प्रस्थान किया। चौकीदार हृष्ट-पुष्ट शरीर वाला था (और) अपराधी कमजोर (दुबले-पतले) शरीर वाला (था)। भारी लाश का कन्धे पर ढोना उसके लिए मुश्किल (कठिन कार्य) था। वह वजन की पीड़ा से चीख रहा था। उसके चीत्कार (रुदन) को सुनकर प्रसन्न हुआ चौकीदार उससे बोला -‘अरे दुष्ट! उस दिन तूने मुझे चोरी की पेटी को ले जाने से रोका था। अब अपनी करनी का फल भोग। इस चोरी के मुकदमे में तुम तीन वर्ष की कैद भोगोगे’ ऐसा कहकर वह जोर से हँसा। जैसे-तैसे दोनों ने लाश को लाकर चौराहे पर रख दिया।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 8 विचित्रः साक्षी

5. न्यायाधीशेन पुनस्तौ घटनायाः विषये वक्तुमादिष्टौ। आरक्षिणि निजपक्षं प्रस्तुतवति आश्चर्यमघटत् स शवः प्रावारकमपसार्य न्यायाधीशमभिवाद्य निवेदितवान्- मान्यवर ! एतेन आरक्षिणा अध्वनि यदुक्तं तद् वर्णयामि ‘त्वयाऽहंचोरितायाः मञ्जूषायाः ग्रहणाद्वारितः, अतः निजकृत्यस्य फलं भुक्ष्व। अस्मिन् चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य
कारादण्ड लप्स्यसे’ इति।
न्यायाधीशः आरक्षिणे कारादण्डमादिश्य तं जनं ससम्मानं मुक्तवान्।
अतएवोच्यते-दुष्कराण्यपि कर्माणि मतिवैभवशालिनः।
नीतिं युक्ति समालम्ब्य लीलयैव प्रकुर्वते।।

शब्दार्थाः – न्यायाधीशेन = न्यायाधिकारिणा (न्यायाधीश ने), पुनस्तौ = पुनः अमू उभौ (फिर से उन दोनों को), घटनायाः विषये = घटितस्य विषये (घटना के विषय में), वक्तुमादिष्टौ = कथयितुम् आज्ञप्तौ (कहने/बोलने का आदेश दिया), आरक्षिणि = रक्षापुरुषे (रक्षापुरुष के), निजपक्षम् = आत्मकथ्यम् (अपने पक्ष को), प्रस्तुतवति = उक्तवति (कह देने पर), अर्थात् जब रक्षापुरुष (चौकीदार) अपना पक्ष प्रस्तुत कर रहा था (तब), आश्चर्यमघटत् = अद्भुतमजायत (आश्चर्यजनक घटना घटी), सः = असौ (वह), शवः = मृतकायः (लाश), प्रावारकम् = उत्तरीय वस्त्रम् (लबादे को), अपसार्य = अपवार्य (दूर करके), न्यायाधीशमभिवाद्य = न्यायाधिकारिणम् प्रणम्य अभिवादनं कृत्वा (जज को प्रणाम करके),

निवेदितवान् = न्यवेदयत् (निवेदन किया), मान्यवर ! = मान्येषु श्रेष्ठ ! (हे माननीय!), एतेन = अनेन (इस), आरक्षिणा = रक्षापुरुषेण (चौकीदार ने), अध्वनि = मार्गे (मार्ग में), यदुक्तम् = यत् कथितम् (जो कहा था), तद् वर्णयामि = तस्य वर्णनं करोमि, तत् वदामि (उसका वर्णन करता हूँ), त्वयाहम् = त्वं माम् (तुमने मुझे), चोरितायाः = चौर्यस्य (चोरी की), मञ्जूषायाः = पेटिकायाः (पेटी को), ग्रहणात् = नयनात् (ले जाने से), वारितः = अवरोधितः, निवारितः, न्यवारयः (रोका था), अत: निजकृत्यस्य = अतः स्वकर्मणः, कृतस्य (अपनी करनी का), फलम् = परिणाम (परिणाम), भुक्ष्व = अनुभव (भोगो), अस्मिन् = एतस्मिन् (इस),

चौर्याभियोगे = स्तेयप्रकरणे (चोरी के मुकदमे में, आरोप में), त्वं वर्षत्रयस्य = त्वं त्रयाणां अब्दानां (तीन वर्ष का), कारादण्डम् = कारागृह निग्रहस्य दण्डं (कैद/जेल का दण्ड), लप्स्यसे = प्राप्स्यसि (प्राप्त करोगे, पाओगे), न्यायाधीशः = न्यायाधिकारी (जज ने), आरक्षिणे = रक्षापुरुषाय (चौकीदार को), कारादण्डमादिश्य = कारागृहनिग्रहदण्डम् आज्ञाप्य (कैद के दण्ड की आज्ञा देकर), तम् जनं = अमुम् पुरुषम् (उस मनुष्य को), ससम्मानम् – सम्मानेन सहितम् (सम्मान/इज्जत के साथ), मुक्तवान् = अत्यजत् (छोड़ दिया), अत एवोच्यते = अतः एव कथ्यते (इसलिए कहा जाता है)।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 8 विचित्रः साक्षी

दुष्कराण्यपि ……………………………………… प्रकुर्वते।।

अन्वयः – मतिवैभवशालिनः नीतिं युक्तिं समालम्ब्य दुष्कराणि कर्माणि अपि लीलया एव प्रकुर्वते।

शब्दार्थाः – मतिवैभवशालिनः = बुद्धिमन्तः (बुद्धिमान् लोग), नीतियुक्तिम् = नीतिगतयुक्तिम् (नैतिक तरीके का), समालम्ब्य = आश्रयं गृहीत्वा, आश्रित्य (सहारा लेकर), दुष्कराणि = कष्टेन करणीयानि (कठिनाई से किए जाने योग्य), कार्याणि अपि = कर्माणि अपि (कार्यों को भी), लीलयैव = कौतुकेन, सुगमतया (खेल ही खेल में, सरलता से), प्रकुर्वते = कुर्वन्ति, सम्पादयन्ति (कर लेते हैं )।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक शेमुषी के ‘विचित्र साक्षी’ पाठ से लिया गया है। यह पाठ मूलतः श्री ओम प्रकाश ठक्कुर रचित कथा का सम्पादित अंश है। इस गद्यांश में न्यायालय में शव को साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, क्योंकि वह जीवित था। उसने पूरे संवाद को सुना था। यही संवाद यहाँ प्रमाण है।

हिन्दी-अनुवादः – न्यायाधीश ने फिर से उन दोनों को घटना के विषय में बोलने का आदेश दिया। रक्षापुरुष (चौकीदार) के अपने पक्ष को प्रस्तुत करने पर अर्थात् जब चौकीदार अपना पक्ष प्रस्तुत कर रहा था, तब एक आश्चर्यजनक घटना घटी। वह लाश लबादे चादर को दूर करके (फेंककर) [उठ खडी हुई तथा] न्यायाधिकारी (जज) को अभिवादन करके (पुरुष रूप से) निवेदन करने लगी- “माननीय! इस चौकीदार ने मार्ग में जो कहा था (मैं) उसका वर्णन करता हूँ तुमने मुझे चोरी की पेटी को ले जाने से रोका था। अतः अब अपने किये हुए (करनी) का फल भोगो। इस चोरी के आरोप में तुम तीन वर्ष का कैद का दण्ड पाओगे।” न्यायाधीश ने चौकीदार सिपाही को कैद के दण्ड का आदेश (आज्ञा) देकर उस व्यक्ति (अतिथि) को ससम्मान (सम्मान के साथ) मुक्त कर दिया। इसलिए कहा जाता है बुद्धिमान् लोग नैतिक तरीके का सहारा लेकर कठिनाई से किये जाने योग्य कार्यों को भी खेल ही खेल में कर लेते हैं।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 7 सौहार्द प्रकृतेः शोभा

Jharkhand Board JAC Class 10 Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 सौहार्द प्रकृतेः शोभा Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 7 सौहार्द प्रकृतेः शोभा

JAC Class 10th Sanskrit सौहार्द प्रकृतेः शोभा Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखिए)
(क) वनराजः कै दुरवस्थां प्राप्तः?
(वनराज किनके द्वारा दुरवस्था को प्राप्त हुआ?)
(ख) कः वातावरणं कर्कश ध्वनिना आकुली करोति?
(वातावरण को कर्कश ध्वनि से कौन व्याकुल करता है?)
(ग) काकचेष्टः विद्यार्थी कीदृशः छात्रः मन्यते?
(काकचेष्टा विद्यार्थी कैसा छात्र माना जाता है?)
(घ) कः आत्मानं बलशाली, विशालकायः पराक्रमी च कथयति?
(अपने आपको कौन बलशाली, विशालकाय और पराक्रमी कहता है?)
(ङ) वकः कीदृशान् मीनान् क्रूरतया भक्षयति?
(बगुला किस प्रकार की मछलियों को क्रूरता से खा जाता है?)
उत्तराणि :
(क) वानरैः
(ख) काकः
(ग) आदर्श छात्रः
(घ) गजः
(ङ)वराकान्

प्रश्न 2.
अधोलिखित प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत। –
(निम्न प्रश्नों के उत्तर पूर्ण वाक्य में लिखिए)
(क) निःसंशय कः क्रूतान्त मन्यते?
(निःसंदेह यमराज कौन कहलाता है?)
उत्तरम् :
यः नृपः वित्रस्तान् पीड्यमानान् जन्तूनं परैः न रक्षति सः निःसंशयः पार्थिव रूपेण कृतान्त (जो राजा डरे तथा पीड़ित जन्तुओं की रक्षा नहीं करता, वह नि:संदेह राजा के रूप में यमराज है।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 7 सौहार्द प्रकृतेः शोभा

(ख) वकः वन्यः जन्तूनां रक्षोपायाम् कथं चिन्तयितुं कथयति?
(बगुला वन्य जीवों के रक्षा के उपाय कैसे सोचने के लिए कहता है?)
उत्तरम् :
अहं तु शीतले जलं बहुकालपर्यन्तम् अविचलः ध्यानमग्न स्थितप्रज्ञ इव स्थित्वा सर्वेषां रक्षायाः उपायान् चिन्तमिष्यामि।
(मैं तो शीतल जल में बहुत देर तक अचल ध्यानमग्न हुआ स्थितप्रज्ञ की तरह बैठकर सभी की रक्षा के उपाय सोचूँगा।)

(ग) अन्ते प्रकृति माता प्रविश्य सर्वप्रथमं किं वदति?
(अन्त में प्रकृति माता प्रवेश करके सबसे पहले क्या कहती है?)
उत्तरम् :
भोः भोः प्राणिनः यूयं सर्वे एव मे सन्ततिः। कथं मिथः एव कलहं कुर्वन्ति । वस्तुतः सर्वे वन्यजीविनः अन्योन्याश्रिताः।
(अरे-अरे प्राणियो! तुम सब ही मेरी सन्तान हो। क्यों आपस में ही कलह करते हो। वास्तव में सभी वन्य जीव एक दूसरे पर आश्रित हैं।)

(घ) यदि राजा सम्यक् न भवति तदा प्रजा कथं विप्लवेत्?
(यदि राजा अच्छा न हो तो प्रजा कैसे डूब जाती है?)
उत्तरम् :
यदि राजा सम्यक् न भवति तदा प्रजा-जलधौ अकर्णधारा नौरिव विप्लवेत्।
(यदि राजा सही नहीं होता है तब प्रजा सागर में बिना नाविक की नौका की तरह डूब जाती है।)

(ङ) मयूरः कथं नृत्य मुद्रायां स्थितः भवति?
(मोर कैसे नृत्य मुद्रा में खड़ा होता है?)
उत्तरम् :
मयूरः पिच्छान् उद्घाट्य नृत्य मुद्रायां स्थितः भवति।
(मोर पंखों को उघाड़कर नृत्य की मुद्रा में खड़ा हो जाता है।)

(च) ‘अन्ते सर्वे मिलित्वा’ कस्य राज्याभिषेकस्य तत्पराः भवन्ति?
(अन्त में सभी मिलकर किसका राज्याभिषेक करने के लिए तत्पर होते हैं?)
उत्तरम :
अन्ते सर्वे मिलित्वा उलूकस्य राज्याभिषेकाय तत्पराः भवन्ति।
(अन्त में सभी मिलकर उल्लू का राज्याभिषेक करने के लिए तैयार हो जाते हैं।)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 7 सौहार्द प्रकृतेः शोभा

(छ) अस्मिन्नाटके कति पात्राणि सन्ति?
(इस नाटक में कितने पात्र हैं?)
उत्तरम् :
अस्मिन्नाटके द्वादश पात्राणि सन्ति।
(इस नाटक में बारह पात्र हैं।)

प्रश्न 3.
रेखाङ्कित पदमाधृत्य प्रश्न निर्माणं कुरुत –
(रेखांकित पद को आधार बनाकर प्रश्न निर्माण करो)
(क) सिंहः वानराभ्यां स्वरक्षायाम् असमर्थः एव आसीत्।
(ख) गजः पशून् तुदन्तं शुण्डेन पोथयित्वा मारयति।
(ग) वानरः आत्मानं वनराजपदाय योग्यः मन्यते।
(घ) मयूरस्य नृत्यं प्रकृतेः आराधना।
(ङ) सर्वे प्रकृति मातरम् प्रणमन्ति।
उत्तरम् :
(क) सिंह वानराभ्यां कस्याम् असमर्थः एवासीत् ?
(ख) गजः पशून् तुदन्तं केन पोथयित्वा मारयति?
(ग) वानरः आत्मानं कस्मै योग्यः मन्यते?
(घ) मयूरस्य नृत्यम् कस्याः आराधना?
(ङ) सर्वे काम् प्रणमन्ति?

प्रश्न 4.
शुद्ध कथनानां समक्षम् (आम्) अशुद्ध कथनानां च समक्षं (न) इति लिखत –
(शुद्ध कथनों के सामने (आम्) अशुद्ध कथनों के सामने (न) लिखिए)
(ख) का का इति वकस्य ध्वनिः भवति।
(क) सिंहः आत्मानं तुदन्तं वानरं मारयति।
(ग) काकपिकयोः वर्णः कृष्णः भवति।
(घ) गजः लघुकाय निर्बलश्च भवति ।
(ङ) मयूरः वक्रस्य कारणात् पक्षिकुलम् अवमानितं मन्यते।
(च) अन्योन्य सहयोगेन प्राणिनां लाभ: जायते।
उत्तरम् :
(ख) का का इति वकस्य ध्वनिः भवति। – (न)
(क) सिंहः आत्मानं तुदन्तं वानरं मारयति। – (न)
(ग) काकपिकयोः वर्णः कृष्णः भवति। – (आम्)
(घ) गजः लघुकाय निर्बलश्च भवति । – (नं)
(ङ) मयूरः वक्रस्य कारणात् पक्षिकुलम् अवमानितं मन्यते। – (आम्)
(च) अन्योन्य सहयोगेन प्राणिनां लाभ: जायते। – (आम्)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 7 सौहार्द प्रकृतेः शोभा

प्रश्न 5.
मञ्जूषातः समुचितं पदं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत – (मञ्जूषा से उचित पद चुनकर रिक्तस्थान की पूर्ति कीजिए)
[स्थितप्रज्ञ, यथासमयम्, मेध्यामेध्य भक्षकः, अहिभुक्, आत्म श्लाघाहीनः, पिकः]
(क) काकः …………. भवति।
(ख) ………….. परभृत् अपि कथ्यते।
(ग) वकः अविचलं …………. इव तिष्ठति।
(घ) मयूरः …………. इति नाम्नाऽपि ज्ञायते।
(ङ) उलूकः …………. पदनिर्लिप्त चासीत्।
(च) सर्वेषामेव महत्वं विद्यते …………. ।
उत्तरम् :
(क) मेध्यामेध्य भक्षकः
(ख) पिकः
(ग) स्थितप्रज्ञः
(घ) अहिभुक्
(ङ) आत्मश्लाघाहीनः
(च) यथासमयम्

प्रश्न 6.
वाच्य परिवर्तनं कृत्वा लिखत (वाच्य परिवर्तन करके लिखिए)
उदाहरणम् : क्रुद्धः सिंहः इतस्ततः धावति गर्जति च।
क्रुद्धेन सिंहेन इतस्ततः धाव्यते गय॑ते च।
(क) त्वया सत्यं कथितम्।
(ख) सिंहः सर्वजन्तून् पृच्छति।
(ग) काकः पिकस्य सन्तति पालयति।।
(घ) मयूरः विधात्रा एव पक्षिराजः वनराजः वा कृतः।
(ङ) सर्वेः खगैः कोऽसि खगः एव वनराजः कर्तुमिष्यते स्म।
(च) सर्व मिलित्वा प्रकृति सौन्दर्याय प्रयत्न कुर्वन्तु।
उत्तरम् :
(क) त्व सत्यं अकथयः।
(ख) सिंहेन सर्वजन्तवः पृच्छ्यन्ते।
(ग) काकेन पिकस्य सन्ततिः पाल्यते।
(घ) मयूरं विधाता एव पक्षिराज वनराजं वा कृतवान्।
(ङ) सर्वे खगाः कमपि खगं एव वनराजं कर्तुम् इच्छन्ति स्म।
(च) सर्वैः मिलित्वा प्रकृति सौन्दर्याय प्रयत्नः कर्त्तव्य।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 7 सौहार्द प्रकृतेः शोभा

प्रश्न 7.
समास विग्रहं समस्तपदं वा लिखत (समासविग्रह या समास पद लिखिए)
(क) तुच्छ जीवैः…………।
(ख) वृक्षोपरि…………।
(ग) पक्षिणां सम्राट…………।
(घ) स्थिता प्रज्ञा यस्य सः………… ।
(ङ) अपूर्वम्…………।
(च) व्याघ्रचित्रको
उत्तरम् :
(क) तुच्छ: च असौ जीव तैः च
(ख) वृक्षस्य उपरि
(ग) पक्षिसम्राट
(घ) स्थित प्रज्ञः
(ङ) न पूर्वम्
(च) व्याघ्रः च चित्रकः च

JAC Class 10th Sanskrit सौहार्द प्रकृतेः शोभा Important Questions and Answers

शब्दार्थ चयनम् –

अधोलिखित वाक्येषु रेखांकित पदानां प्रसङ्गानुकूलम् उचितार्थ चित्वा लिखत –

प्रश्न 1.
वनस्य दृश्यं समीपे एवैका नदी वहति।
(अ) पार्वे
(ब) दूरे
(स) विश्राम्यते
(द) तदैव
उत्तरम् :
(अ) पार्वे

प्रश्न 2.
एवमेव वानराः वारं वारं सिंहं तुदन्ति।
(अ) बाढम्
(ब) अवसादयन्ति
(स) असमर्थः
(द) नेवास्ति
उत्तरम् :
(ब) अवसादयन्ति

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 7 सौहार्द प्रकृतेः शोभा

प्रश्न 3.
निद्राभङ्गदुःखेन वनराजः सन्नपि तुच्छजीवैः।
(अ) तुच्छजीवैः
(ब) दुरवस्थया
(स) भवन्नपि
(द) किमर्थम्
उत्तरम् :
(स) भवन्नपि

प्रश्न 4.
वस्तुतः वनराजः भवितुं तु अहमेव योग्यः।
(अ) भवितुं तु
(ब) कृष्णवर्णः
(स) काकचेष्टः
(द) यथार्थतः
उत्तरम् :
(द) यथार्थतः

प्रश्न 5.
अलम् अलम् अतिविकत्थनेन।
(अ) प्रचुरम्
(ब) पिकः
(स) समीपतः
(द) श्रृण्वन्नेवादम्
उत्तरम् :
(अ) प्रचुरम्

प्रश्न 6.
भोः गजः मामप्येवमेवातुदन् एते वानराः।
(अ) लोमश
(ब) करिः
(स) सिंहः
(द) शृगालः
उत्तरम् :
(ब) करिः

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प्रश्न 7.
अविचलः ध्यानमग्नः स्थितप्रज्ञ इव स्थित्वा।
(अ) विहाय
(ब) स्थित
(स) उपविष्य
(द) रक्षायाः
उत्तरम् :
(स) उपविष्य

प्रश्न 8.
अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव।
(अ) आत्मश्लाघायाः
(ब) ध्यानावस्थाम्
(स) अधिगृह्य
(द) सागरे
उत्तरम् :
(द) सागरे

प्रश्न 9.
अरे वानर! तूष्णीं भव।
(अ) मौनं
(ब) राज्याभिषेकाय
(स) वन्यजीवा
(द) सज्जाः भवन्तु
उत्तरम् :
(अ) मौनं

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प्रश्न 10.
यतः मम नृत्यं तु प्रकृतेः आराधना।
(अ) मत्सदृशः
(ब) उपासना
(स) आक्रमणं कर्तारं
(घ) वनराजपदाय
उत्तरम् :
(ब) उपासना

संस्कृतमाध्यमेन प्रश्नोत्तराणि –

एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)

प्रश्न 1.
मयूरस्य किं प्रमुखं वैशिष्ट्यमस्ति?
(मयूर की प्रमुख विशेषता क्या है ?)
उत्तरम् :
नृत्यम् (नृत्ये)।

प्रश्न 2.
सर्वदा सम्यग्युक्तम् इति कस्मै कथितम्?
(सर्वथा सम्यग्युक्तम् यह किसके लिए कहा गया है?)
उत्तरम् :
सिंहाय (सिंह के लिए)।

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प्रश्न 3.
सर्वे पक्षिणः एतयोः पदयोः विशेष्य पदं किम् ?
(सर्वे पक्षिणः इनमें विशेषण पद क्या है?)
उत्तरम् :
सर्वे (सभी)।

प्रश्न 4.
सदयम् पदस्य विलोमपदं लिखत।
(सदयम् पद का विलोमपद लिखिए।)
उत्तरम् :
क्रूरम् (निर्दयम्)।

प्रश्न 5.
प्राणिनां परस्पर विवादेन किम् जायते?
(प्राणियों के परस्पर विवाद करने से क्या होता है?
उत्तरम् :
हानिः (नुकसान)।

प्रश्न 6.
वने का वहति?
(वन में क्या बहती है?)
उत्तरम् :
नदी।

प्रश्न 7.
सिंहस्य कर्णं कः कर्षति?
(सिंह का कान कौन खींचता है।)
उत्तरम् :
वानरः।

प्रश्न 8.
वानराः बार-बार कम् तुदन्ति?
(वानर बार-बार किसे परेशान करते हैं?
उत्तरम् :
सिंहम्। (शेर को)।

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प्रश्न 9.
धावन्तं सिंहं दृष्ट्वा वानराः किं कुर्वन्ति?
(दौड़ते हुए सिंह को देखकर वानर क्या करते हैं।)
उत्तरम् :
हसन्ति (हँसते हैं)।

प्रश्न 10.
सिंह केन श्रान्त ?
(सिंह किससे थक गया।)
उत्तरम् :
दुरवस्थया (दुर्दशा से)।

प्रश्न 11.
कीदृशां नृपः कृतान्तः इति कथ्यते?
(कैसा राजा यमराज कहलाता है?)
उत्तरम् :
यः त्रस्तान् पीडितान् च न रक्षति सः नृपः कृतान्तः कथ्यते।
(जो डरे और पीड़ितों की रक्षा नहीं करता, वह राजा यमराज है।)

प्रश्न 12.
‘सत्यं कथितं त्वया’ इति कस्य वाक्यम्।
(‘सत्यं कथितं त्वया’ पद किसका वचन है।)
उत्तरम् :
काकस्य (कौवा का)।

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प्रश्न 13.
काके पिकं च किं साम्यम्?
(कौवा और कोयल में क्य समानता है?)
उत्तरम् :
कृष्णत्वम् (कालापन)।

प्रश्न 14.
अतिविकत्थनं कः करोति?
(अधिक आत्मश्लाघा कौन करता है?)
उत्तरम् :
काक :(कौवा)।

प्रश्न 15.
गजस्य पुच्छं कः आकृषय?
(हाथी की पूँछ कौन खींचता है?)
उत्तरम् :
वानरः (बन्दर)।

प्रश्न 16.
गजः कीदृशः अस्ति? (हाथी कैसा है?)
उत्तरम् :
गजः विशालकायः पराक्रमी भयकरश्च अस्ति।
(हाथी विशाल शरीर वाला, पराक्रमी और भय पैदा करने वाला है।)

प्रश्न 17.
वकः बहुकाल पर्यन्तं कुत्र वसति?
(बगुला बहुत समय तक कहाँ रहता है?)
उत्तरम् :
शीतलजले (ठंडे पानी में)।

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प्रश्न 18.
स्थितप्रज्ञः इव कः ध्यानमग्नः तिष्ठति?
(स्थित प्रज्ञ की तरह कौन ध्यानमग्न होकर बैठता है?)
उत्तरम् : वकः (बगुला)।

प्रश्न 19.
कीदृशः नेता भवेत्? (कैसा नेता होना चाहिए?)
उत्तरम् :
सम्यक् (उत्तम)।

प्रश्न 20.
कीदृशी नौ जलधौ विप्लवेत?
(कैसी नौका सागर में डूब जाती है?)
उत्तरम् :
अकर्णधारा (बिना नाविक की)।

प्रश्न 21.
‘अरे वानर तूष्णी भव’ इति कः कथयति? (यह कौन कहता है?)
उत्तरम् :
मयूरः (मोर)।

प्रश्न 22.
मयूरस्य स्थाने सव्यङ्ग्यम् किम् पदं प्रयुक्तम्?
(मोर के स्थान पर व्यङ्ग्यसहित किस पद का प्रयोग किया है?
उत्तरम् :
अहिभुक् (सर्पभोजी)।

प्रश्न 23.
मयूरस्य नृत्यं कस्याः आराधना?
(मोर का नृत्य किसकी कृपा से है?)
उत्तरम् :
प्रकृतेः (प्रकृति की)।

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प्रश्न 24.
व्याघ्रचित्रको कस्मात् आगतौ?
(बाघ और चीता किसलिए आये थे?)
उत्तरम् :
जलं पातुम् (जल पीने)

प्रश्न 25.
व्याघ्र चित्रको क इव भक्षको।
(बाघ और चीता किसके समान भक्षक हैं?)
उत्तरम् :
सिंह सदृशौ (सिंह के समान)।

प्रश्न 26.
सर्वसम्मत्या कः राजा भवेत?
(सर्व सम्मति से कौन राजा होना चाहिए?)
उत्तरम् :
कोऽपि खगः (कोई पक्षी)।

प्रश्न 27.
पूर्ण दिनं निद्रायमाणः कः तिष्ठति?
(पूरे दिन कौन सोता रहता है?)
उत्तरम् :
उलूकः (उल्लू)।

प्रश्न 28.
खगपशून कलहमानान् अवलोक्य कः प्रविशति?
(पशु-पक्षियों को कलह करते हुओं को देखकर कौन प्रवेश करती है?)
उत्तरम् :
प्रकृतिमाता।

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प्रश्न 29.
वन्य प्राणिनः कस्य सन्ततिः ?
(वन्य प्राणी किस की सन्तति हैं ?)
उत्तरम् :
प्रकृतिमातुः (प्रकृति माता की)।

प्रश्न 30.
वन्य जीवानां किम् आश्रयः
(वन्य जीवों का आश्रय क्या है?)
उत्तरम् :
अन्योन्याश्रयः
(एक दूसरे का आश्रय है)।

प्रश्न 31.
अस्माकं सर्वेषां जननी का?
(हम सब की जननी कौन है?)
उत्तरम् :
प्रकृति (निसर्ग)।

प्रश्न 32.
राज्ञः सुखं कस्मिन्?
(राजा का सुख किसमें है?)
उत्तरम् :
प्रजासुखे (प्रजा के सुख में)।

प्रश्न 33.
अगाध जल सञ्चारी अपि को न गवं याति?
(गहरे पानी में विचरण करती हुई कौन नहीं गर्व करती है?)
उत्तरम् :
रोहितः (लोहित मछली)।

पूर्णवाक्येन उत्तरत (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए)

प्रश्न 34.
प्राणिनां लाभः कदा भवति?
(प्राणियों का लाभ कब होता है?)
उत्तरम् :
अन्योन्य सहयोगेन प्राणिनां लाभ: जायते।
(अन्योन्य सहयोग से प्राणियों को लाभ होता है।)

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प्रश्न 35.
सुप्ते सिहे वानरः किमकरोत् ?
(सिंह के सो जाने पर वानर ने क्या किया।)
उत्तरम :
सुप्ते सिंहे वानरः तस्य पुच्छ धुनोति स्म।
(सिंह के सो जाने पर वानर ने उसकी पूँछ हिलाई।)

प्रश्न 36.
खगाः सिंहस्य दशां दृष्ट्वा किं कुर्वन्ति?
(पक्षी सिंह की दशा को देखकर क्या करते हैं?)
उत्तरम् :
खगाः सिंहस्य एवं दशां दृष्ट्वा हर्षमिश्रितं कलरवं कुर्वन्ति।
(पक्षी सिंह की ऐसी दशा देखकर हर्षमिश्रित कलरव करते हैं।)

प्रश्न 37.
‘पिकः’ परभृत् कस्मात् कथ्यते?
(पिक परभृत् क्यों कहलाती है?)
उत्तरम् :
परैः काकैः ध्रियते अतः परभृत् कथ्यते।
(दूसरों अर्थात् कौवों के द्वारा पाली जाती है अतः परभृत् कहलाती है।)

प्रश्न 38.
वकः आगत्य किं कथयति?
(बगुला आकर क्या कहता है?)
उत्तरम् :
मां विहाय कथमन्यः कोऽपि राजा भवितुमर्हति?
(मुझे छोड़कर कौन दूसरा राजा हो सकता है?)

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प्रश्न 39.
वकः स्थितप्रज्ञ व्याजेन किं करोति? (बगुला स्थितप्रज्ञ के बहाने क्या करता है?)
उत्तरम् :
वकः ध्यानमग्न स्थितप्रज्ञ इति व्याजेन बराकान् मीनान् छलेन अधिगृह्य क्रूरतया भक्षयति।
(बगुला ध्यानमग्न स्थितप्रज्ञ के बहाने बेचारी मछलियों को धोखे से पकड़कर क्रूरता के साथ खा जाता है।)

प्रश्न 40.
मयूरः वन्य पशून् कस्यहेतोः सज्जयितुं कथयति?
(मोर वन्य जीवों से किसके लिए तैयार होने के लिए कहता है?)
उत्तरम् :
वने निवसन्तं माम् वनराजरूपेण द्रष्टुं सज्जाः भवन्तु।
(वन में रहने वाले मुझे वनराज के रूप में देखने के लिए तैयार हो जाइये।)

प्रश्न 41.
मयूरस्य का गर्वोक्ति आसीत्? (मोर की क्या गर्वोक्ति थी?)
उत्तरम् :
न कोऽपि त्रैलोक्ये मत्सदृशः सुन्दरः।
(तीनों लोकों में मेरा जैसा कोई सुन्दर नहीं।)

प्रश्न 42.
सर्वे पक्षिणः कं राज्यासने स्थापयितुमिच्छन्ति।
(सभी लोग किसको राजा के आसन पर बैठाना चाहते हैं।)
उत्तरम् :
सर्वे खगाः कमपि खगमेव राज्यासने स्थापयितुमिच्छन्ति।
(सभी पक्षी किसी पक्षी को ही राज्यासन पर स्थापित करना चाहते हैं।)

प्रश्न 43.
उलूकः रक्षणे कस्मात् अयोग्य आसीत्?
(उल्लू रक्षण में किसलिए अयोग्य था?)
उत्तरम् :
पूर्ण दिने यावत् निद्रायमाणः कथं अस्मान् रक्षिष्यति इति विचार्य काकेन अयोग्यः घोषितः।
(पूरे दिन सोता रहता है, हमारी रक्षा कैसे करेगा, ऐसा विचार कर कौवे ने अयोग्य घोषित कर दिया।)

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प्रश्न 44.
प्रीते किं लक्षणम्? (प्रीति का क्या लक्षण है?)
उत्तरम् :
ददाति आददाति गुह्यमाख्याति, पृच्छति भुङ्कते भोजयते च इति षड्विध प्रीते: लक्षणम्।
(देता है, लेता है, गुप्त बात को बताता है, पूछता है, खाता है, खिलाता है, यह छः प्रकार के प्रीति के लक्षण हैं।)

प्रश्न 45.
जीवनं कथं यापयेत? (जीवनयापन कैसे करना चाहिए?)
उत्तरम् :
सर्वे मिलित्वा एव मोदयेयुः जीवनं च रसमयं कुर्युः।
(सभी को मिलकर प्रसन्न रहना चाहिए. तथा जीवन को मधुर बनाना चाहिए।)
प्रश्न 46.
सिंहः किं करोति स्म? (सिंह क्या कर रहा था?
उत्तरम् :
सिंह सुखेन विश्राम्यते स्म। (सिंह आराम से विश्राम कर रहा था।)

प्रश्न 47.
क्रुद्धः सिंहः किं करोति? (नाराज शेर क्या करता है?)
उत्तरम् :
क्रुद्धः सिंहः इतस्ततः धावति गर्जति परं किमपि कर्तुमसमर्थः एव तिष्ठति।
(नाराज सिंह इधर-उधर दौड़ता है, दहाड़ता है लेकिन कुछ भी करने में असमर्थ खड़ा रहता है।)

प्रश्न 48.
क्रोधेन गर्जन सिंहः जन्तून दृष्ट्वा किमवदत्।
(क्रोध से दहाड़ते हुए सिंह ने जन्तुओं को देखकर क्या कहा?)

प्रश्न 49.
काकस्य सत्यप्रियता केन उदाहरणेन व्यज्यते?
(काक की सत्यप्रियता किस वाक्य से व्यक्त की जाती है?)
उत्तरम् :
अनृतं वदसि चेत काकः दशेत् (झूठ बोले कौवा काटे)।

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प्रश्न 50.
काक-पिकयोः भेदः कदा ज्ञायेत?
(कौवा और कोयल का भेद कब ज्ञात होता है?)
उत्तरम् :
वसन्त काले प्राप्ते काक-पिकयोः भेदः ज्ञायते।
(बसन्त काल के आने पर कौवा और कोयल का भेद ज्ञात होता है।)

प्रश्न 51.
वानरे वृक्षमारूढे गजः किं करोति?
(वानर के पेड़ पर चढ़ जाने पर हाथी क्या करता है?)
उत्तरम् :
गजः तम् वृक्षम् एव स्वशुण्डेनालोडयति।
(हाथी उस वृक्ष को अपनी सँड़ से ही हिला देता है।)

प्रश्न 52.
वकः कैः सह मिलित्वा रक्षोपायान् करिष्यति?
(बगुला किनके साथ मिलकर रक्षा के उपाय करेगा?)
उत्तरम् :
जन्तुभिः सह मिलित्वा रक्षोपायान् कारयिष्यति।
(जन्तुओं के साथ मिलकर रक्षा के उपाय करायेगा।)

प्रश्न 53.
मयूरः कुतः साट्टहासपूर्वकमवदत्?
(मोर कहाँ से अट्टहासपूर्वक बोला?)
उत्तरम् :
मयूरः वृक्षस्य उपरितः साट्टहासपूर्वकमवदत्।
(मोर वृक्ष के ऊपर से हास्यपूर्वक बोला।)

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प्रश्न 54.
वानरः किं कर्तुं कथयति? (वानर क्या करने के लिए कहता है?)
उत्तरम् :
शीघ्रमेव मम राज्याभिषेकाय तत्परा भवन्तु सर्वे वन्यजीवा।
(शीघ्र ही मेरे राज्याभिषेक के लिए सभी वन्यजीव तैयार हो जाएँ।)

प्रश्न 55.
मयूरः कथं केन वा पक्षिराजः नियुक्तः?
(मोर कैसे और किसके द्वारा पक्षिराज नियुक्त किया गया?
उत्तरम् :
विधात्रा शिरसि राज मुकुटमिव शिखां स्थापयता एव अहम् पक्षिराजः कृतः।
(विधाता द्वारा शिर पर राजमुकुट की तरह चोटी स्थापित करके मुझे पक्षिराज बनाया गया।)

प्रश्न 56.
वन्यजीवाः कं रक्षकपद योग्यं न मन्यन्ते।
(वन्य जीव किसे रक्षक के पद के योग्य नहीं समझते हैं।)
उत्तरम् :
वन्यजीवाः कमपि भक्षकं रक्षकपद योग्यं न मन्यन्ते।
(वन के जीव किसी भक्षक को रक्षक पद के योग्य नहीं समझते।)

प्रश्न 57.
किं वैशिष्ठ्यमवलोक्य खगाः उलूकं वनराज पदाय अचिन्वन्?
(किस विशेषता को देखकर पक्षियों ने उल्लू को वनराज पद के लिए चुना है?)
उत्तरम् :
आत्मश्लाघाहीनत्वं पदनिर्लिप्त चावलोक्य उलूकम् वनराजपदाय अचिन्वन्।
(आत्मप्रशंसा से हीन, पद निर्लिप्त उल्लू को देखकर उसे वनराज पद के लिए चुना।)

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प्रश्न 58.
काकेन उलूकस्य अवगुणाः कथं वर्णिताः ?
(कौवे ने उल्लू के अवगुणों का कैसे वर्णन किया है?)
उत्तरम् :
उलूकः स्वभावेन रौद्रः, अत्युग्रः क्रूरः, अप्रियवादी च भवति दिवान्ध पूर्णं दिनं यावत् स्वपिति।
(उल्लू स्वभाव से क्रोधी, अति उग्र, क्रूर और अप्रिय भाजी होता है। दिवान्ध वह पूरे दिन सोता रहता है।)

प्रश्न 59.
अस्माकं सर्वेषां कस्मै महत्वं यथाकालम्?
(हम सबका किसके लिए महत्व है?)
उत्तरम् :
अस्माकं सर्वेषां यथासमयं प्रकृत्यै महत्वं विद्यते।
(हम सबका प्रकृति के लिए महत्व है।)

प्रश्न 60.
शफरी कथम् आत्मनः गर्वं दर्शयति?
(शफरी कैसे अपने गर्व को प्रदर्शित करती है?)
उत्तरम् :
अङ्गुष्ठ मात्र जले अपि विचरन्ती शफरी फुफ़रायते।
(अँगूठे के बराबर जल में विचरण करती हुई शफरी फरफराती है।)

अन्वय-लेखनम् –

अधोलिखितश्लोकस्यान्वयमाश्रित्य रिक्तस्थानानि मञ्जूषातः समुचितपदानि चित्वा पूरयत।
(नीचे लिखे श्लोक के अन्वय के आधार पर रिक्तस्थानों की पूर्ति मंजूषा से उचित पद चुनकर कीजिए ।)

1. यो न रक्षति ………………………. न संशयः॥
मञ्जूषा – वित्रस्तान्, रक्षति, कृतान्त, पार्थिवरूपेण।
यः सदा (i)…….. परैः पीड्यमानान् (ii)……. जन्तून् न (iii)…….., सः (iv)……., न संशयः।
उत्तरम् :
(i) पार्थिवरूपेण, (ii) वित्रस्तान्, (iii) रक्षति, (iv) कृतान्तः।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 7 सौहार्द प्रकृतेः शोभा

2. यदि न स्यान्नरपतिः ………………………………….. विप्लवेतेह नौरिव।।
मञ्जूषा – जलधौ, नरपतिः, नेता, अकर्णधारा।
यदि (i)…….. सम्यक् (ii)…….. न स्यात्, ततः इह प्रजा (iii)…….. नौः इव (iv)…….. विप्लवेत्।
उत्तरम् :
(i) नरपतिः, (ii) नेता, (iii) अकर्णधारा, (iv) जलधौ।

3. स्वभावरौद्रमत्युग्रं ………………………….. सिद्धिर्भविष्यति।।
मञ्जूषा – सिद्धिः, नृपतिं, अप्रियवादिनम्, अत्युग्रम।
स्वभावरौद्रम् (i)……..क्रूरम् (ii)……..(च) उलूकं (iii)…….. कृत्वा नु का (iv)…….. भविष्यति।
उत्तरम् :
(i) अत्युग्रम् (ii) अप्रियवादिनम् (iii) नृपतिं (iv) सिद्धिः ।।

4. ददाति प्रतिगृह्णाति ……….. …………………… प्रीतिलक्षणम्।।
मञ्जूषा – योजयते, षड्विधम्, आख्याति, प्रतिगृह्णाति।
ददाति (i)…….. गुह्यम् (ii)…….., पृच्छति, भक्ते (iii)…….. च, प्रीतिलक्षणं (iv)……. एव (भवति)।
उत्तरम् :
(i) प्रतिगृह्णाति (ii) आख्याति (iii) योजयते (iv) षड्विधम्।

5. अगाधजलसञ्चारी …………… …………………. फुफुरायते।।
मञ्जूषा – याति, मात्रेण, फुफुरायते, रोहितः।
अगाधजलसञ्चारी (i)……. गर्वं न (ii)…….. । अङ्गुष्ठोदक (iii)……. शफरी (iv)……..।
उत्तरम् :
(i) रोहितः (ii) याति, (iii) मात्रेण (iv) फुफुरायते।

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6. प्राणिनां जायते …………………………… प्रजायते।।
मञ्जूषा – लाभः, विवादतः, हानिः, सहयोगेन।
परस्पर (i)…….. प्राणिनां (ii)…….. जायते। अन्योन्य (iii)…….. तेषां (iv)……..प्रजायते। उत्तरम् : (i) विवादतः (ii) हानिः (ii) सहयोगेन (iv) लाभः।

प्रश्ननिर्माणम् –

अधोलिखित वाक्येषु स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत –

1. समीपे एव एका नदी बहति। (पास ही एक नदी बहती है।)
2. वानरः आगत्य तस्य पुच्छ धुनाति। (वानर आकर उसकी पूँछ खींचता है।)
3. वानरस्तु कूर्दित्वा वृक्षमारूढः। (वानर कूदकर वृक्ष पर चढ़ गया।)
4. क्रुद्ध सिंहः इतस्ततः धावति। (कुद्ध सिंह इधर-उधर दौड़ता है।)
5. वानराः हसन्ति वृक्षोपरि। (वानर वृक्ष के ऊपर हँसते हैं।)
6. श्रान्तः सर्वजन्तून् दृष्ट्वा पृच्छति। (थके हुए सभी जन्तुओं को देखकर पूछता है।)
7. राजा तु रक्षकः भवति। (राजा तो रक्षक होता है।)
8. अनृतं वदसि चेत् काकः दशेत्। (झूठ बोले कौवा खाये)
9. अस्माकं एक्यं विश्व प्रथितम्। (हमारी एकता विश्व प्रसिद्ध है।)
10. सर्वं सम्भाषणं शृण्वन्नेवाहम् अत्रागच्छम्। (सारी बात सुनकर ही मैं यहाँ आ गया हूँ।)
उत्तराणि :
1. समीपे एव का बहति?
2. वानरः आगत्य तस्य किम् धुनाति?
3. वानरस्तु कूर्दित्वा कम् आरूढ़ ?
4. क्रुद्धः सिंहः कुत्र धावति?
5. वानरः वृक्षोपरि किं कुर्वन्ति?
6. श्रान्तः कान् दृष्ट्वा पृच्छति?
7. राजा तु कीदृशः भवति?
8. अनृत वदसि चेत् कः दशेत् ?
9. अस्माकं किम् विश्व प्रथितम् ?
10. सर्व किं कुर्वन्नेव अहम् अत्र आगच्छम्।

भावार्थ-लेखनम् –

अधोलिखित पद्यांश संस्कृते भावार्थ लिखत –

(i) यो न रक्षति …………………………… कृतान्तो न संशयः।।
भावार्थ – अन्यः वानरः कथयति-अपि नाकर्णिता भवता पञ्चतन्त्रस्य सूक्तिः? ‘यो भयभीतान् भयानि वा पीड्यानान् सर्वदा शत्रुभिः प्राणिनः न त्रायते सः राज्ञः रूपेण यमराज एव इति नात्र शङ्का।

(ii) काकः कृष्णः ……………………………. पिकः पिकः।।
भावार्थ – वायसः श्याम, कोकिलोऽपि श्यामः भवति, वायस कोकिलयोः किमन्तरम् परञ्च मधुमासे तु वायसः वायस रूपेण ज्ञायते यावत कोकिलः कोकिलः इव ज्ञायते।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 7 सौहार्द प्रकृतेः शोभा

(iii) यदि न ……………………………… नौरिव।।
भावार्थ – यत् यदि श्रेष्ठः नृपः नायकः च न भवति तदा प्रजाः प्रकृत्यः वाः सागरे नाविक विहीन तरणी व निमज्जति।

(iv) स्वभावरौद्रमत्युग्रं ……………………… सिद्धिर्भवष्यिति।।
भावार्थ – यथार्थतः तु प्रकृत्या कोपान्वितं महत्प्रचण्ड जिम कटुवक्तार उलूकं नृपतिं विधाय किं साध्यं सिद्धं भविष्यति।

(v) ‘ददाति …………………………………. प्रीतिलक्षणम्।।
भावार्थ – प्रकृति माता कथयति-सर्वदा स्मरणं कुरुत-यच्छति, आददाति, गुप्तं, कथयति, प्रश्नयति, खादति, खादयति इति प्रीत्या षड्विध लक्षणम्।

(vi) प्रजासुखे ……………………… प्रियं हितम्।।
भावार्थ – यदि प्रजा प्रकृति वा सुखी भवति तदैव नृपस्य प्रसन्नता भवति प्रजाजनानां लाभस्य कार्ये एव शासकस्य लाभ: यः नृपः स्वार्थ प्रियः भवति नैतत् शासकस्य हितम्। प्रजाजनानां हितं करणमेव सर्वप्रियं हितं भवति।

(vii) अगाध जल सञ्चारी ……………….. फुफुरायते।।
भावार्थ – अति गहने जले विचरन्ती विशालो मृगमीनः नाभिमानं करोति परन्तु वृद्धाङ्गुली मात्र जलेऽपि शफरीति लघु मत्स्यः गर्वेण उद्विग्नो भवति।।

(viii) प्राणिनां जायते ……………………… प्रजायते।।
भावार्थ – मिथः कलहात् जीवानं क्षयमेव भवति परञ्च परस्पर सहयोगे अमीषां लाभः एव भवति।

सौहार्द प्रकृतेः शोभा Summary and Translation in Hindi

पाठ-परिचय – यह पाठ परस्पर स्नेह एवं मैत्री भाव से पूर्ण व्यवहार हो, इसका बोध कराता है। अब हम देख रहे हैं कि समाज में लोग आत्माभिमानी हो गये, वे आपस में तिरस्कार करते हैं। स्वार्थपूर्ति में लगे हुए वे दूसरों के कल्याण के विषय में कुछ भी नहीं सोचते हैं। उनके जीवन का उद्देश्य अब यह हो गया है- नीच, उच्च और अति नीच उपायों से फल ही सिद्ध होना चाहिए।

अतः समाज में आपस में स्नेह की वृद्धि के लिए इस पाठ में पशु-पक्षियों के माध्यम से समाज में व्यवहार किया हुआ, आत्मसम्मान दिखाते हुये प्रकृति माता के माध्यम से अन्त में निष्कर्ष स्थापित किया कि समय पर सभी का महत्व होता है, सभी एक-दूसरे पर आश्रित हैं अतः हमें अपने कल्याण के लिए आपस में प्रेम और मैत्रीपूर्ण व्यवहार से रहना चाहिए।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 7 सौहार्द प्रकृतेः शोभा

मूलपाठः,शब्दार्थाः, सप्रसंग हिन्दी-अनुवादः

1. वनस्य दृश्यं समीपे एवैका नदी वहति। एकः सिंहः विश्राम्यते तदैव एकः वानरः आगत्य तस्य पुच्छं धुनाति। क्रुद्धः सिंहः तं प्रहर्तुमिच्छति परं वानरस्तु कूर्दित्वा वृक्षमारूढः। तदैव अन्यस्मात् वृक्षात् अपरः वानरः सिंहस्य कर्णमाकृष्य पुनः वृक्षोपरि आरोहति।

शब्दार्थाः – वनस्य = अरण्यस्य (जंगल का)। दृश्य = दर्शनीयं चित्रणम् (दृश्य), समीपे = पार्वे (पास में), एवैका = एव एका (ही एक), नदी = सरित् (नदी), वहति = प्रवहति (बह रही है)। एकः सिंह = एक: केसरी (एक शेर), सुखेन = सुखपूर्वकं, विश्राम्यते = विश्रामं करोति। (विश्राम करता है)। तदैव = तत्कालमेव (तभी), एकः वानरः = मर्कटः (एक बन्दर), आगत्य = आगम्य, प्राप्य (आकर) तस्य = अमुष्य (उसकी)। पुच्छ = लांगूलं (पूंछ), धुनोति = गृहीत्वा आन्दोलयति, चालयति (हिलाता है), क्रुद्धः = कुपितः (नाराज)। सिंह = हरिः, केसरी (शेर) तम् = अमुम् (उस पर) प्रहर्तुमिच्छति = आघातं कर्तुम् ईहते = (चोट करना चाहता है)। परं = परञ्च (लेकिन) वानरस्तु = कपिः तु (बन्दर तो) कुर्दित्वा = उत्प्लुत्य (उछलकर), वृक्षमारूढ़ = तरोः उपरि आरुरोह (वृक्ष के ऊपर चढ़ गया) तदैव = तत्कालमेव (उसी समय तभी), अन्यस्मात् = अपस्मात्), वृक्षात् = तरोः (वृक्ष से), अपरः अन्यः (दूसरा), वानरः कपिः (बन्दर), सिंहस्यकेसरिणः (शेर से), कर्णम्-श्रोत्रम् (कान को), आकृष्य-कर्षयित्वा (खींचकर), पुनः = भूयः (फिर), वृक्षोपरि-तरोः उपरि (पेड़ पर), आरोहति आरूढ़ भवति।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक शेमुषी के ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ पाठ से लिया गया है। इस गद्यांश में वन्य पशुओं की परस्पर मैत्रीपूर्ण क्रीडा का वर्णन किया गया है।

हिन्दी अनुवादः – जंगल का दृश्य है। पास में ही एक नदी बह रही है। एक शेर आराम से विश्राम कर रहा है। तभी एक वानर आकर उसकी पूँछ हिलाता (मरोड़ता) है। नाराज हुआ शेर उस पर प्रहार करना चाहता है परन्तु बन्दर तो उछलकर पेड़ पर चढ़ जाता है। तभी दूसरे पेड़ से दूसरा बन्दर सिंह के कान को खींचकर वृक्ष पर चढ़ जाता है।

2. एवमेव वानराः वारं वारं सिंहं तुदन्ति। क्रुद्धः सिंहः इतस्ततः धावति, गर्जति परं किमपि कर्तुमसमर्थः एव तिष्ठति। वानराः हसन्ति वृक्षोपरि च विविधाः पक्षिणः अपि सिंहस्य एतादृशी दशां दृष्ट्वा हर्षमिश्रितं कलरवं कुर्वन्ति।

शब्दार्था: – एवमेव = अनेन प्रकारेण एव (इस प्रक्रम से ही), वानराः = मर्कट (बन्दर), बारंबारम् = मुहुर्मुहुः (बार-बार), सिंहम् = केसरिणं (शेर को), तुदन्ति = अवसादयन्ति (तंग करते हैं), क्रुद्धः सिंहः = प्रकुपितः केसरी (नाराज शेर), इतस्ततः = अत्र-तत्र (इधर-उधर), धावति = पलायते (दौड़ गये), गर्जति = नदति (दहाड़ता है), परं = परन्तु (लेकिन), किमपि = किञ्चिदपि (कुछ भी) कर्तुम् = विधातुम् (करने में), असमर्थ: अक्षमः (असमर्थ), एवास्ति = एव वर्तते (ही है), वानरा: = कपयः (बन्दर), हसन्ति = हासं/उपहासं वा कुर्वन्ति (हँसी उड़ाते हैं) वृक्षोपरि = तरोः उपरि (पेड़ पर), च = तथा (और), विविधा = अनेक प्रकार का (विभिन्न प्रकार के), पक्षिण: = खगाः (पक्षी), अपि सिंहस्य = अपि केसरिणः (शेर के भी), एतादृशी = ईदृशी (इस प्रकार की), दशाम् = स्थितिम् (हालत को), दृष्ट्वा = अवलोक्य (देखकर) हर्षमिश्रितं = आह्लादयुतं (खुशी से युक्त) कलरवम् = कूजनम् (कलरव), कुर्वन्ति = विदधति (करते हैं)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘सौहार्दै प्रकृतेः शोभा’ पाठ से लिया गया है। इस गद्यांश में सिंह के साथ बन्दरों की क्रीड़ा का वर्णन है।

हिन्दी अनुवादः – इस प्रकार बन्दर बार-बार सिंह को परेशान करते हैं। नाराज हुआ सिंह इधर-उधर दौड़ता है, दहाड़ता है। परन्तु कुछ भी करने में असमर्थ है। वानर हँसते हैं और वृक्ष के ऊपर विविध प्रकार के पक्षी भी सिंह की ऐसी स्थिति देखकर प्रसन्नता से मिला कलरव करते हैं।

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3. निद्राभङ्गदुःखेन वनराजः सन्नपि तुच्छजीवैः आत्मनः एतादृश्या दुरवस्थया श्रान्तः सर्वजन्तून् दृष्ट्वा पृच्छति –
सिंहः – (क्रोधेन गर्जन) भोः ! अहं वनराजः किं भयं न जायते? किमर्थं मामेवं तुदन्ति सर्वे मिलित्वा?
एकः वानरः – यतः त्वं वनराजः भवितुं तु सर्वथाऽयोग्यः। राजा तु रक्षकः भवति परं भवान् तु भक्षकः। अपि च स्वरक्षायामपि समर्थः नासि तर्हि कथमस्मान् रक्षिष्यसि?
अन्यः वानरः – किं न श्रुता त्वया पञ्चतन्त्रोक्तिः
यो न रक्षति वित्रस्तान् पीड्यमानान्परैः सदा।
जन्तून् पार्थिवरूपेण स कृतान्तो न संशयः।।

शब्दार्थाः – निद्रा = सुप्ति (नींद), भङ = विच्छेद (टूटा), दुःखेन = क्लेशेन, कष्टेन (दुःख से), वनराज: = मृगराजः (सिंह), सन्नपि = भवन्नपि (होते हुए भी), तुच्छजीवैः = लघु प्राणिभिः (छोटे जीवों द्वारा), आत्मनः = स्वकीय (अपना), एतादृश्या = ईदृश्या (इस प्रकार की), दुरवस्थया = दुर्दशया (बुरी स्थिति से), श्रान्तः = श्रमार्तः, क्लांत: (थका हुआ), सर्वजन्तून सर्वान् प्राणिनः (सभी प्राणियों को), दृष्ट्वा अवलोक्य, वीक्ष्य (देखकर), पृच्छति = पृच्छां करोति, प्रश्नयति (पूछता है) क्रोधेन कोपेन (नाराजी से) गर्जन्नादयन् (दहाड़ते हुए), भोः = ओ (अरे) अहं वनराज: अहं मृगराजः (मैं वन का राजा), किं भयं न जायते = अपि भीतिः न भवति (क्या डर नहीं होता) किमर्थम् कस्मात् (क्यों) मामेवमा एव (मुझको ही), सर्वे = मिलित्वा तुदन्ति = सर्वे सम्भूय अवसादयन्ति (सब मिलकर कष्ट दे रहे हो), यतः यस्मात (क्योंकि), त्वम् भवान् (आप),

वनराज = मृगराजः (वन का राजा), भवितु तु = आप्तुम् (होने के), सर्वथाऽयोग्यः = पूर्णतः अक्षमः (पूरी तरह असमर्थ हो), राजा = शासकः, नृपः (राजा), रक्षकःत्राता (रक्षा करने वाला) भवति (होता है), परम्परञ्च (लेकिन), भवान् = तु-त्वं तु (तुम तो) भक्षक: = भोक्ता (खाने वाले), अपि च किं च (और क्या), स्वरक्षायामपिआत्मानं त्रातुमपि (रक्षा करने में), समर्थः = सक्षमः (समर्थ), तदा तर्हि (तो) कथम् केन प्रकारेण (किस प्रकार), रक्षिष्यति = त्रास्यते (रक्षा करेंगे), किं न श्रुता त्वया = अपि भवता न श्रुतं (क्या आपने सुना नहीं), पञ्चतन्त्रोक्तिः पञ्चतन्त्र कथा = ग्रन्थस्य सूक्तय (पञ्चतंत्र की यह युक्ति), श्रुत = आकर्णिता (सुनी), यः न रक्षति वित्रस्तान = यः भयार्तान् न त्रायते (जो भयभीत लोगों की रक्षा नहीं करता), पीड्यमानान्परैः = अन्यैः तुदन्तः (दूसरों से पीड़ित लोगों को), जन्तून = प्राणिना (जीवों को), पार्थिव रूपेण = राज्ञः रूपेण (राजा के रूप में), सः = असौ (यह), न संशयः नि:संदेहः (निःसन्देह), कृतान्तः = यमराजः (यमराज है)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ पाठ से लिया गया है। इस गद्यांश में बन्दर सिंह की उपेक्षा करते हुए स्वयं को वनराज के पद के योग्य प्रतिपादित करते हैं।

हिन्दी अनुवादः – नींद टूटने के दुःख से वन का राजा होते हुए भी तुच्छ जीवों द्वारा स्वयं को दुर्दशा से थका हुआ, सभी जन्तुओं को देखकर पूछता है।

सिंह – (क्रोध से दहाड़ता हुआ) अरे! मैं वन का राजा हूँ, तुम्हें डर नहीं लगता। तुम किसलिए मुझे इस प्रकार सब मिलकर परेशान कर रहे हो?

एक वानर – क्योंकि तुम वनराज होने के पूर्णतः अयोग्य हो। राजा तो रक्षक होता है परन्तु आप तो भक्षक हैं और तो और अपनी रक्षा करने में भी समर्थ नहीं हो तो हमारी रक्षा कैसे करेंगे?

अन्य वानर – क्या तुमने पंचतंत्र का कथन नहीं सुना-जो विशेष रूप से डरे हुओं और पीड़ित होते हुए दूसरे प्राणियों की रक्षा नहीं करता, वह निःसंदेह राजा के रूप में यमराज है।

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4. काकः – आम् सत्यं कथितं त्वया-वस्तुतः वनराजः भवितुं तु अहमेव योग्यः।
पिकः – (उपहसन्) कथं त्वं योग्यः वनराजः भवितुं, यत्र तत्र का का-इति कर्कशध्वनिना वातावरणमाकुलीकरोषि। न रूपम्, न ध्वनिरस्ति कृष्णवर्णम् मेध्यामध्यभक्षकं त्वां कथं वनराजं मन्यामहे वयम्?
काकः – अरे!अरे! किंजल्पसि? यदि अहंकृष्णवर्णः तर्हि त्वं किंगौरागः? अपि च विस्मर्यते किं यत् मम सत्यप्रियता तु जनानां कृते
उदाहरणस्वरूपा – ‘अनृतं वदसि चेत् काकः दशेत्-इति प्रकारेण। अस्माकं परिश्रमः ऐक्यं च विश्वप्रथितम्। अपि च काकचेष्टः विद्यार्थी एव आदर्शच्छात्रः मन्यते।

शब्दार्था: – आम् = ओम् (हाँ), सत्यम् = ऋतम् (सच), त्वया = भवता (आपने), कथितम् = उक्तम् (कह दिया), वस्तुतः = यथार्थतः (वास्तव में), वनराजः = मृगराजः (सिंह), भवितुं तु = (होने) योग्यः = सक्षमः (योग्य) अहमेव = (मैं ही हूँ) उपहसन् = उपहासं आक्षेपं वा कुर्वन् (उपहास करते हुए), कथम् कस्मात् (कैसे) त्वम् भवान् (आप), योग्य = क्षमः (योग्य), वनराजः भवितुम् मृगराजः इति विधातुम् (राजा के लिए), यत्र-तत्र = यस्मिन् तस्मिन् स्थाने (जहाँ-तहाँ) का का = काँव-काँव (काँव-काँव) कर्कष ध्वनिना = प्रचण्ड कटु स्वरेण (तेज और कटु स्वर से) वातावरणम् पर्यावरणम् (वातावरण को) आकुली करोति = अशान्तं, उद्विग्नं वा करोति (बेचैन करते हो) न रूपम्न = आकार सौन्दर्यम् (न रूप-सौन्दर्य) न ध्वनिः अस्ति = न स्वरम् अस्ति (स्वर भी नहीं है) कृष्णवर्ण: = श्याम, असित रङ्गः (काला रंग) मेध्यामेध्य-भक्षक: विशुद्धम् अशुद्धम् च भोजिन्। (शुद्ध-अशुद्ध का भक्षक) त्वाम् भवन्तम् (आपको), कथं कस्मात् (कैसे) वनराजम् मृगराजम् (वन का राजा), मन्यामहे = मनिष्यामहे (मानेंगे), अरे = अरे रे रे (अरे) किं जल्पसि = किं प्रलपसि (क्या कहता है), यदि= चेत् (यदि) अहं कृष्णवर्ण: अहं श्यामरङ्ग (मैं काला हूँ) तर्हि तदा भवान् (तो आप) किम् गौरा = श्वेताङ्ग (क्या गोरे हो), अपि च विस्मयते किं त्वं = विस्मरति, न स्मरति (क्या तुम्हें याद नहीं है) किम् (क्या) यत् (कि) मम सत्यप्रियता मे सत्यानुग्रह (मेरी सत्यप्रियता) जनानां = कृते जनेभ्यः (लोगों के लिए)। उदाहरणस्वरूपा = निदर्शन योग्य क्षमा (उदाहरण देने योग्य है) अनृतम् = असत्यम् (झूठ) वदसि = ब्रूषे (बोले) चेत् = यदि (यदि) काकः = वायसः (कौआ), दशेत = दशति (काटे), इति प्रकारेण = अनया विधया (इस प्रकार से) अस्माकंन: (हमारा), परिश्रमं = उद्यम (मेहनत), ऐक्यम् च = एकता च (और एकता), विश्व पृथितम् = संसारे प्रसिद्धम् (संसार में प्रसिद्ध है), अपि च = अन्य च (और) काकचेष्ट: = वायस इव आचरति यः (जो कौवे की तरह आचरण करता है), विद्यार्थी = ज्ञानेच्छु (विद्यार्थी), आदर्श प्रतिरूपम् (आदर्श) छात्रा (विद्यार्थी) मन्यते = मान्यः (माना जाता है)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘सौहार्दै प्रकृतेः शोभा’ पाठ से लिया गया है। इस गद्यांश में कौवा और कोयल के संवाद में दोनों वनराज पद की अपनी-अपनी योग्यता प्रतिपादित करते हैं। सिंह की सभी उपेक्षा करते हैं।

हिन्दी अनुवादः – काक-हाँ, सत्य कहते हो तुम-वास्तव में वनराज होने के लिए तो मैं ही योग्य हूँ। पिक – (उपहास करते हुए) तू वनराज होने योग्य कैसे है? जहाँ-तहाँ काँव-काँव की कर्कश ध्वनि से वातावरण को व्याकुल या बेचैन करते हो। न रूप है न ध्वनि है। काले रंग के, शुद्ध-अशुद्ध को खाने वाले तुमको हम वनराज मानें।

काक – अरे रे, तू क्यों बकवास करता है? यदि मैं काला हूँ तो तू कौन-सा गोरा है? क्या तुम लोगों के लिए मेरी सत्य प्रियता को भूल रहे होंगे। उदाहरण के रूप में है – झूठ बोले कौवा खाये इस प्रकार से। हमारा परिश्रम और एकता विश्व प्रसिद्ध है। और भी काक जैसी चेष्टा वाला विद्यार्थी ही आदर्श छात्र माना जाता है।

5. पिकः – अलम् अलम् अतिविकत्थनेन। किं विस्मर्यते यत् – काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः। वसन्तसमये प्राप्ते काकः पिकः पिकः।।
काकः – रे परभृत! अहं यदि तव संततिं न पालयामि तर्हि कुत्र युः पिका:? अतः अहम् एव करुणापरः पक्षिसम्राट् काकः।
गजः – समीपतः एवागच्छन् अरे! अरे! सर्वं सम्भाषणं शृण्वन्नेवाहम् अत्रागच्छम्। अहं विशालकायः,बलशाली, पराक्रमी च। सिंहः वा स्यात् अथवा अन्यः कोऽपि, वन्यपशून् तु तुदन्तं जन्तुमहं स्वशुण्डेन पोथयित्वा मारयिष्यामि। किमन्यः कोऽप्यस्ति एतादृशः पराक्रमी। अतः अहमेव योग्यः वनराजपदाय।

शब्दार्थाः – अलम् अलम्-पर्याप्तं, प्रचुरम् (बस-बस), अतिविकत्थनेन = अधिकं आत्मश्लाघया (अधिक अपनी सराहना), किं विस्मर्यते यत् = अपि विस्मृतां भवान् यत् (क्या आप भूल गये हैं कि), काकः = वायसः (कौआ), पिकः = कोकिलः (कोयल) कृष्णः = श्यामः (काला), को भेदः पिककाकयोः = कोकिल-काकयो किमन्तरम् (कोयल और कौवे में क्या अम्तर है) बसन्तसमये = मधुमास काले (बसन्त ऋतु में) प्राप्ते = आगते (आने पर) काकः काकः-वायसः = वायसः (कौवा कौवा ही) पिकः पिकः = कोकिल कोकिला एव (कोयल कोयल ही रहती है) रे परभृत = अरे परेण पालित पिकः (दूसरों के द्वारा भरण = पोषण की गई कोयल) अहं यदि तव संतति = अहम् चेत् ते अपत्यान् (यदि मैं तेरी सन्तान को) न पालयामि = पालनं न करोमि (पालन न करूँ) तर्हि = तदा (तो) कुत्र = कस्मिन् स्थाने (कहाँ) स्युः भविष्यन्ति (होगी) पिका = कोकिला: (कोयल) अतः एवम् (इस प्रकार)

अहमेव करुणापर = अहमेन करुणापेतः (मैं ही दयालु हूँ) पक्षि सम्राट् = खगानां शासकः (पक्षियों का सम्राट) काकः = वायसः (बोझा) समीपत: = पार्वात् (पास से) एव = ही आगच्छन्-आगम्य (आकर) अरे = रे (अरे) सर्वं सम्पूर्णम् (सारा) सम्भाषणम् संवादम् (बातचीत) अण्वन्नेवादम् = अकर्णमन्नेव अहम् (सुनता हुआ मैं) अत्रागच्छम् = इतः आगतोऽस्मि (आया हुआ हूँ) अहम् विशालकायः = वृहत्कायः (विशाल शरीर वाला) बलशाली = शक्तियुतः (ताकतवर) पराक्रमी च = पौरुष युतः च (और पराक्रमी) सिंहः केसरी (शेर)। स्यात् = भवतु (हो) अथवा अन्यः कोऽपि अन्यो वा कश्चिदपि (अथवा और कोई) वन्यपशून् = श्वापदान (जंगली जानवरों) तुदन्तुं = कष्टं ददानम् (कष्ट देते हुए को) स्वशुण्डेन् = आत्मकरेण (अपनी सूंड से) पोथयित्वा = पीडयित्वा (पीड़ा देकर) मारयिष्यामि-हनिष्यामि (मार दूंगा) किमन्य = किमन्यत् (और तो क्या) कोऽप्यस्ति = कश्चिदास्ति (कोई है) एतादृशः ईदृशा (ऐसा) पराक्रमी = पौरुषपुत्रः (पराक्रमी) अत: अहम् एव योग्यः = अतएव अयमेव समः (मैं ही योग्य हूँ) वन राजपदायाः = मृगराज पदव्या (वन के राजा के योग्य)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ पाठ से लिया गया है। इस गद्यांश में कोयल, कौवा और हाथी अपने-अपने को वनराज पद के लिए योग्य प्रतिपादित करते हैं।

हिन्दी अनुवाद – पिक:-बस-बस अधिक आत्म-सराहना की आवश्यकता नहीं। क्या भूल रहे हो कि कौवा काला और कोयल भी काली, कौवे और कोयल में क्या अन्तर है। बसन्त का समय आने पर कौवा-कौवा होता है और कोयल कोयल।

काक – अरे! दूसरों द्वारा पाली हुई, यदि मैं तुम्हारी सन्तान को नहीं पालूँ तो कोयल कहाँ दोगे? अतः मैं कौवा ही करुणामय खग सम्राट हूँ।

हाथी – (पास से आता हुआ) अरे-अरे! सारा संवाद सुनता हुआ ही मैं यहाँ आया हूँ। मैं विशाल शरीरवाला, शक्तिशाली और पराक्रमी हूँ। चाहे सिंह हो अथवा कोई और हो, वन्य पशुओं को तंग करने वाले प्राणी को मैं सँड़ से पीड़ित करके मार डालूँगा। क्या अन्य कोई भी ऐसा पराक्रमी है। अतः मैं ही वन के राजा के योग्य हूँ।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 7 सौहार्द प्रकृतेः शोभा

6 वानरः – अरे! अरे! एवं वा (शीघ्रमेव गजस्यापि पुच्छं विधूय वृक्षोपरि आरोहति)
(गजः तं वृक्षमेव स्वशुण्डेन आलोडयितुमिच्छति परं वानरस्तु कूर्दित्वा अन्यं वृक्षमारोहति। एवं गजं वृक्षात् वृक्षं प्रति धावन्तः दृष्ट्वा सिंहः अपि हसति वदति च।)
सिंहः – भोः गजः मामप्येवमेवातुदन् एते वानराः।
वानरः – एतस्मादेव तु कथयामि यदहमेव योग्यः वनराजपदाय येन विशालकायं पराक्रमिणं, भयंकर चापि सिंह गजं व पराजेतुं अस्माकं जातिः। अतः वन्यजन्तूनां रक्षायै वयमेव क्षमाः।
(एतत्सर्वं श्रुत्वा नदीमध्यस्थितः एकः बकः)

शब्दार्थाः – अरे अरे रे रे (अरे अरे) एवं वा-अथवा अनेन प्रकारेण (अथवा इस प्रकार) शीघ्रमेव क्षिप्रमेव (जल्दी ही) गजस्य = करिणः (हाथी की) पुच्छं लागलं (पूँछ को) विधूय आकृष्य (खींचकर) वृक्षोपरि = तरोरुपरिष्ठात् (पेड़ के ऊपर) आरोहति = आरूढ़ोभवति (चढ़ जाता है) गजः = करि (हाथी) तं वृक्षमेव = अमुम् तरुमेव (उस पेड़ को ही) स्वशुण्डेन = आत्मकरेण (अपनी सूंड़ से) आलोडयितुमिच्छति = संक्षोभितं कर्तुमीहते (हिलाना चाहता है) परम् = परन्तु (लेकिन) वानरस्तु कपिस्तु (बन्दर तो) कूर्दित्वा = उत्प्लुत्य (उछलकर) अन्यं = अपरं (दूसरे) वृक्षं = तरुम् (पेड़ पर) आरोहरि आरूढं भवति (चढ़ जाते हैं) एवं अनेन = प्रकारेण (इस प्रकार) गजंकरिणं (हाथी को) वृक्षात् वृक्षम् = तरोः तरुम् (पेड़ एवं पेड़ पर) धावन्तम् उत्प्लुन्तं (उछलते या दौड़ते हुए को) दृष्ट्वा = वीक्ष्य (देखकर) सिंहः अपि = केसरी अपि (शेर भी) हसति वदति च = हासं करोति कथयति च (हँसता है और कहता है) भोः गजः = अरे करि (अरे हाथी)

मामप्येवमेवातुदन् = मामपि अनेन एव प्रकारेण पीडयन् (मुझे भी इसी प्रकार पीड़ित किया) एते वानराः अमी कपयः (इन बन्दरों ने) एतस्मात् एव = अतः एव (इसीलिए), कथयामि वदामि (कहता हूँ) यत् अहमेव योग्यः = यदहमेव समर्थः (मैं ही योग्य हूँ) वनराजपदाय = अरण्यस्य राज्ञः पदस्य हेतोः (जंगल के राजा पद के योग्य) येन विशालकायं = येन वृहत् शरीरं (विशालकाय को) पराक्रमिणम् पौरुषोपेतम् (पौरुषयुक्त को) भयंकरम् = भीतिकरं चापि (भय पैदा करने वाले को) सिंह गजं वा केसरिणं = करिणं वा परास्तं कर्तुम् (सिंह अथवा हाथी को हराने के लिए) अस्माकं जाति = अस्मज्जातिः (हमारी जाति) समर्था = सक्षमा (समर्थ हैं) अतः = अतएव (इसलिए) वन्यजन्तूनां = श्वापदानां (जंगली पशुओं की) रक्षायै = रक्षणाय (रक्षा के लिए) वयमेव क्षमा = वयमेव समर्थाः (मैं ही समर्थ हूँ), एतत्सर्व श्रुत्वा = इदं सर्वं, निशम्य आकर्ण्य वा (इस सबको सुनकर) नदी मध्यस्थितः = सरितः मध्ये स्थितः (नदी के बीच स्थित), एकः वकः = एकः वकुलः (एक बगुला)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ पाठ से लिया गया है। इस गद्यांश में वानरों की लीला का वर्णन है। वानर स्वयं को हाथी और सिंह को पराजित करने में समर्थ बताता है।

हिन्दी अनुवादः – वानर-अरे अरे, यह बात है क्या (शीघ्र ही हाथी की पूँछ को खींचकर वृक्ष के ऊपर चढ़ जाता है।)
(हाथी उस वृक्ष को सँड़ से हिलाना चाहता है परन्तु वानर तो कूदकर अन्य वृक्ष पर चढ़ जाता है। इस प्रकार हाथी को वृक्ष से वृक्ष की ओर दौड़ते हुए को देखकर सिंह भी हँसता है और कहता है।)

सिंह – अरे गजराज! मुझे भी इसी प्रकार से वानर पीड़ित कर रहे हैं।

वानर – इसीलिए तो कहता हूँ कि मैं ही वनराज के पद के योग्य हूँ, जिससे कि विशालकाय पराक्रमी और भयंकर शेर अथवा हाथी को पराजित करने में हमारी जाति समर्थ है। अतः वन्य जन्तुओं की रक्षा के लिए हम भी समर्थ हैं। (इस सबको सुनकर नदी के मध्य बैठा एक बगुला)।

7. बकः – अरे! अरे! मां विहाय कथमन्यः कोऽपि राजा भवितुमर्हति। अहं तु शीतले जले बहुकालपर्यन्तम् अविचलः ध्यानमग्नः स्थितप्रज्ञ इव स्थित्वा सर्वेषां रक्षायाः उपायान् चिन्तयिष्यामि, योजना निर्मीय च स्वसभायां विविधपदमलंकुर्वाणैः जन्तुभिश्च मिलित्वा रक्षोपायान् क्रियान्वितान् कारयिष्यामि, अतः अहमेव वनराजपदप्राप्तये योग्यः।

शब्दार्थाः – अरे अरे = रे रे (अरे) माम् = मा (मुझे) विहाय = अतिरिच्य, परित्यज्य (छोड़कर) कथमन्यः = कस्मात् अपरः (दूसरा कैसे) कोऽपि = कश्चिदपि (कोई भी) भवितुमर्हति = भवितुं शक्नोति (हो सकता है) अहं तु शीतले जले = अहं तु हिमाम्बु मध्ये (ठंडे पानी में) बहुकालपर्यन्तम् = प्रचुरं समय यावत् (पर्याप्त समय तक) अविचल = अनवरुद्ध (निरन्तर) ध्यानमग्न = ध्याने तल्लीनः निमग्नः (ध्यान लगा हुआ) स्थितप्रज्ञः = स्थिरा बुद्धिः यस्य सा (जिसकी बुद्धि स्थिर है) स्थित्वा = उपविश्य (बैठकर) सर्वेषाम् = सकलानाम् (सबकी) रक्षायाः = रक्षणस्य (रक्षा के) उपायान् = उपचारान् (उपायों को) चिन्तयिष्यामि = विचारयिष्यामि (विचार या चिन्ता करूँगा)

योजनाम् = कार्यप्रारूपकल्पनां (प्रारूप) निर्माय = निर्माणं कृत्वा, रचयित्वा (बनाकर) स्वसभायाम् = आत्मनः समित्याम् (अपनी सभा या गोष्ठी में) विविधपदमलकुर्वाण: = बहुविध स्थानानि विभूषयद्भिः (अनेक पदों को सुशोभित करने वाले) जन्तुभिः = प्राणिभिः (प्राणियों द्वारा) मिलित्वा = सम्भूय (मिलकर) रक्षोएन् = रक्षणस्य उपचारान् (रक्षा के उपायों को) क्रियान्वितान् = क्रियान्विति (अनुरूप कार्य) कारयिष्यामि = कर्तुं प्रेरयिष्यामि (करवाऊँगा) अतः अहम् एव वनराज पदप्राप्तये योग्यः = अतएव अहम् एव अरण्याधिपतेः आसनं प्राप्तुं समर्थ (इसलिए मैं ही वन के राजा का पद प्राप्त करने योग्य हूँ।)

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक शेमुषी के ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ पाठ से लिया गया है। इस गद्यांश में बगुला सबकी उपेक्षा करके स्वयं को वनराज पद के योग्य प्रतिपादित करता है।

हिन्दी अनुवादः – अरे, अरे! मुझे छोड़कर कैसे कोई अन्य राजा हो सकता है। मैं तो शीतल जल में बहुत समय तक बिना विचलित हुए ध्यान में मग्न हुआ स्थितप्रज्ञ की तरह बैठकर हमेशा रक्षा के उपाय सोचूँगा, योजना बनाकर अपनी सभा में विविध पदों को अलंकृत करते हुए जीवों के साथ मिलकर रक्षा के उपायों का क्रियान्वयन करूँगा। अतः मैं ही वनराज पद प्राप्त करने योग्य हूँ।

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8. मयूरः – (वृक्षोपरितः-साट्टहासपूर्वकम्) विरम विरम आत्मश्लाघायाः किं न जानासि यत् –
यदि न स्यान्नरपतिः सम्यङनेता ततः प्रजा।
अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव।
को न जानाति तव ध्यानावस्थाम्। ‘स्थितप्रज्ञ’ इति व्याजेन वराकान् मीनान् छलेन अधिगृह्य क्रूरतया भक्षयसि। धिक् त्वाम्। तव कारणात् तु सर्वं पक्षिकुलमेवावमानितं जातम्।

शब्दार्थाः – वृक्षोपरित = तरोः उपरिष्ठात् (पेड़ के ऊपर से) साट्टहासपूर्वक: = उच्चैः हासेन सहितम् (जोर से हँसते हुए) विरम-विरम = तिष्ठ तिष्ठ (ठहर ठहर) आत्मश्लाघायाः = स्वकीयया प्रशंसया (बस बस अपनी प्रशंसा) किं न जानासि यत् = अपि नावगच्छसि यत् (क्या नहीं जानते कि) यदि = चेत् (यदि) न स्यात् = न भविष्यति (नहीं होगा) नरपतिः = राजा (राजा) सम्यक् = सुष्ठु (अच्छा साधु) ततः = तदा (तब) प्रजा: प्रजाजनाः (प्रजा) जलधौ = सागरे (समुद्र में) अकर्णधारा नौरिव नाविक रहित तरणी इव निमज्जेत, (बिना नाविक नौका की तरह डूब जाती है), को न जानाति = केन न ज्ञायते (किसे ज्ञात नहीं, कौन नहीं जानता) तव = ते (तेरी) ध्यानावस्थाम् = अवधानस्य स्थितिं दशां व (तुम्हारी ध्यान की स्थिति को) स्थितप्रज्ञः = स्थिर ज्ञानस्य इव (स्थित प्रज्ञ के) व्याजेन = मिषेण (बहाने से) वराकान् = दीनान् निरवलम्बान् (बेसहारों को) मीनान् = मत्स्यान् (मछलियों को) छलेन = वञ्चनेन (धोखे से) अधिगृह्य = गृहीत्वा (पकड़कर) करतया = क्रौर्येन सह (निष्ठुरता के साथ) भक्षयसि = खादसि (खा जाते हो) धिक् त्वाम् त्वम् मर्त्सनाह (तुम्हें धिक्कार है), तव = ते (तेरे) कारणात् = हेतोः (वजह से) सर्वं पक्षिकुलमेव = सकलं खगकुलम् एव (सारा खगकुल) अवमानितं = तिरस्कृतं, अवधीरणम् (अपमानित) जातम् = अभवत् (हो गई)

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक शेमुषी के ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ पाठ से लिया गया है। इस गद्यांश में मोर स्वयं को न केवल पक्षिराज ही प्रतिपादित करता है अपितु वनराजपद के योग्य भी कहता है।

हिन्दी अनुवादः-मोर-(वृक्ष के ऊपर से अट्टहासपूर्वक) रुको-रुको अपनी सराहना करने से। क्या नहीं जानते कि-यदि उत्तम राजा अथवा नेता नहीं होगा तो प्रजा बिना नाविक की नौका की तरह सागर में डूब जायेगी। तुम्हारे ध्यान की स्थिति को कौन नहीं जानता। स्थितप्रज्ञ के बहाने बेचारी मछलियों को पकड़कर क्रूरतापूर्वक खा जाते हो। धिक्कार है तुम्हें! तुम्हारे कारण संसार में पक्षियों की जाति ही अपमानित हो गई है।

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9 वानरः – (सगर्वम्) अतएव कथयामि यत् अहमेव योग्यः वनराजपदाय। शीघ्रमेव मम राज्याभिषेकाय तत्पराः भवन्तु सर्वे वन्यजीवाः।
मयूरः – अरे वानर! तूष्णीं भव। कथं त्वं योग्यः वनराजपदायः? पश्यतु पश्यतु मम शिरसि राजमुकुटमिव शिखां स्थापयता विधात्रा एवाहं पक्षिराजः कृतः, अतः वने निवसन्तं मां वनराजरूपेणापि द्रष्टुं सज्जाः भवन्तु अधुना। यतः कथं कोऽप्यन्यः विधातुः निर्णयम् अन्यथाकर्तुं क्षमः।
काकः – (सव्यङ्ग्यम्) अरे अहिभुक्। नृत्यातिरिक्तं का तव विशेषता यत् त्वां वनराजपदाय योग्य मन्यामहे वयम्।

शब्दार्थाः – सगर्वम् = गर्वेण सहितम्, साभिमान (अहंकार सहित) अतएव = अतः (इसलिए) कथयामि = वदामि, ब्रवीमि (कहता हूँ) यत् अहम् एव योग्य: = अहम् एव सक्षमः (कि मैं ही योग्य हूँ) वनराज पदाय = काननाधिपतेः स्थानाय (वन के राजा के पद के लिए) मममे (मेरे) राज्याभिषेकाय-राजासने स्थापयितुं स्थानाय (राज्याभिषेक के लिए) तत्पराः भवन्तु व्यग्राः सन्तु (तैयार हो जाओ) सर्वे सकलाः (सभी) वन्यजीवा = अरण्य-प्राणिन् (जंगल के जन्तु) अरे वानर!: = रे मर्कट! (अरे बन्दर) तूष्णीं भव = मौनं धारय (चुप रह) कथं त्वं गोग्य = कस्मात् भवान् क्षमः (आप कैसे योग्य हैं) वनराजपदाय = काननाधिपस्य स्थानाय (वन के राजा के पद के लिए। यतु पश्यतु = वीक्षताम् वीक्षताम् (देख-देख) मम शिरसि = मे मस्तके (मेरे शिर पर) राजमुकुटमिव = राज्ञः चूडामणिम् इव (राजा के मुकुट की तरह) शिखां = शिखरम् (चोटी) स्थापयता = स्थापितं कृत्वा (लगाकर) विधात्रा = सृष्टिकर्ता (विधाता के द्वारा)

अहमेव पक्षिराज: अहमेन खगराजः = कृताः नियुक्तः निर्मितः (बनाया हूँ) अत: = अतएव (इसलिए) वने = कानने (जंगल में) निवसन्तं माम् = निवासं कुर्वाणं (निवास करते मुझको) अधुना इदानीम् (अब) वनराज रूपेण = वनस्य राज्ञोः रूपेण (वनराज के रूप में) माम् द्रष्टुम् मामवलोकयितुं (मुझे देखने के लिए) सज्जाः भवन्तु = तत्पराः भवन्तु (तैयार हो जाओ) यतः = कस्मान् (किसलिए) कोऽन्ये = कश्चिदन्यः (कोई दूसरा) विधातुम् = कर्तुम् (करने के लिए) निर्णयम् = निश्चयम् (निर्णय को) अन्यथा = मिथ्यां कर्तुं (झूठा करने के लिए), क्षमः = समर्थः (सक्षम) सव्यङ्ग्यम् = व्यञ्जनया सहितम् (व्यंग्यपूर्वक) अरे अहिभुक = रे सर्पभक्षक (अरे सांप खाने वाले), नृत्यातिरिक्तं का तव विशेषता = नृत्ययतिरिच्य किम् ते वैशिष्ट्यम् (नाचने के अलावा और तेरी,क्या विशेषता है।) यत् त्वां = यत् भवन्तम् (कि आपको) वनराज = मृगराज (वन के राजा के) योग्यम् = क्षमम् (योग्य) वयं मन्यामहे वयं मन्यामहे (हम मानें)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक शेमुषी के ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ पाठ से लिया गया है। इस गद्यांश में बन्दर, मोर और कौवा अपने-अपने को योग्य प्रतिपादित करते हुए विवाद करते हैं।

हिन्दी अनुवाद-वानर – (अभिमान के साथ) इसीलिए कहता हूँ कि मैं ही वनराज पद के योग्य हूँ। आप शीघ्र ही सभी वन्य जीव मेरे राज्याभिषेक के लिए तैयार हो जाओ।

मयूर – अरे वानर! चुप रह! तुम वनराज के पद के योग्य कैसे हो। देखो देखो मेरे सिर पर राज्यमुकट की तरह चोटी को स्थापित करके विधाता ने ही मुझे पक्षिराज बना दिया है। अतः वन में निवास करते हुए मुझको वनराज के रूप में अब देखने को तैयार हो जाओ। क्योंकि कोई अन्य विधाता के निर्णय को झुठला सकता है।

काकः – (व्यंग्य के साथ) अरे साँ५ खाने वाले नृत्य के अतिरिक्त और तुम में क्या विशेषता है कि तुम्हें वनराज पद के योग्य हम समझें।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 7 सौहार्द प्रकृतेः शोभा

10 मयूरः – यतः मम नृत्यं तु प्रकृतेः आराधना। पश्य! पश्य! मम पिच्छानामपूर्वं सौन्दर्यम् (पिच्छानुद्घाट्य नृत्यमुद्रायां स्थितः सन्) न कोऽपि त्रैलोक्ये मत्सदृशः सुन्दरः। वन्यजन्तूनामुपरि आक्रमणं कर्तारं तु अहं स्वसौन्दर्येण नृत्येन च आकर्षित कृत्वा वनात् बहिष्करिष्यामि। अतः अहमेव योग्यः वनराजपदायः।
(एतस्मिन्नेव काले व्याघ्रचित्रकौ अपि नदीजलं पातुमागतौ एवं विवादं शृणुतः वदतः च)
व्याघ्रचित्रको अरे किं वनराजपदाय सुपात्रं चीयते?
एतदर्थं तु आवामेव योग्यौ। यस्य कस्यापि चयनं तु सर्वसम्मत्या।

शब्दार्थाः – यतः = यस्मात (क्योंकि), मम = मे (मेरा) नत्यम नर्तनम् (नाच) प्रकतेः = प्रकृतितत्वस्य (प्रकृति की) आराधना: = उपासना (कृपा) पश्य = अवलोकय, ईक्षस्व (देखो) मममे (मेरी) पिच्छानाम् = पुच्छस्य (पूँछ की) अपूर्व सौन्दर्यम् = विचक्षणं सुन्दरताम् (अनोखी सुन्दरता के) पिच्छान् = पुच्छं (पंखों को) उद्घाट्य = अनावृत्य, उत्थाय (उठाकर) नृत्य मुद्रायां स्थित: नर्तनस्य स्थिति तिष्ठति (नाचने की मुद्रा में स्थित हो जाता है) न कोऽपि त्रैलोक्यं त्रिषु = लोकेषु कश्चिदपि (तीनों लोकों में कोई) मत्सदश: मादृशः (मेरे जैसा) सुन्दर = मनोरमः (सुन्दर), वन्य जन्तूनाम् = अरण्य प्राणिनाम् (जंगली जानवरों के) उपरि = उपरिष्ठात् (ऊपर) आक्रमणं कर्तारं आक्रान्तारम् (आक्रमण करने वाले को) अहम् = मैं, स्व सौन्दर्ये = आत्मनः सुन्दरतया (अपनी सुन्दरता से) नृत्येन = च-नर्तनेन च (नाचने से)

आकर्षितं = कृत्वा आकृष्य (आकर्षित करके) वनात् = काननात् (जंगल से), बहिष्करिष्यामि = बहिष्कारं विधास्यमि (बहिष्कार कर दूंगा) अत: अतएव (इसलिए) अहमेव = मैं ही। वनराजपदाय = वनराजस्य पद एव योग्य (वन के राजा के पद के योग्य हूँ)) एतस्मिन् काले तदैव (इसी समय), व्याघ्रचित्रकैः = द्वीपीमृगान्तकश्च (बाघ और चीता भी) नदीजलं = सरिज्जलम् (नदी का पानी) पातुम् = आचमिमतुम् (पीने के लिए), आगतौ = आयातौ (आ गये) एवं ईदृशं (ऐसे) विवादम् = प्रतिवादम् (विवाद को) श्रृणुतः = आकर्णत (सुनते) वदतः = कथयतः, बूतः = वः (कहते हैं) अरे = रे (अरे) किम् = अपि (क्या) वनराजपदाय = अरण्यराज्ञः आसनाय (वनराज के पद के लिए) सुपात्रम् = सत्पात्रम् (अच्छा पात्र) चीयते = चयनं क्रियते (चुना जा रहा है) एतदर्थम् = अस्य कृतं (इसके लिए) आवामेव = आवामुभावेव (हम दोनों ही) योग्यौ = क्षमौ (योग्य हैं) यस्य कस्यापि = यं कमपि प्राणिनाम् (जिस किसी प्राणी का) चयनं कुर्वन्ति = चिन्नन्तु (चुनें) सर्वसम्मत्या = सर्वेषां समान मतेन एव (सबके समान मत से चुनें)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘सौहार्दै प्रकृतेः शोभा’ पाठ से लिया गया है। इस गद्यांश में बाघ और चीता भी आ जाते हैं जो मोर को नीचा बताकर प्रत्येक स्वयं को सुयोग्य प्रतिपादित करते हैं।

हिन्दी अनुवादः – मयूर-क्योंकि मेरा नृत्य तो प्रकृति की मेहरबानी है। देखो-देखो, मेरे पंखों का अपूर्व सौन्दर्य। (पूँछ को उठाकर नृत्य की मुद्रा में स्थित होकर) तीनों लोकों में कोई भी मेरे समान सुन्दर नहीं है। वन्य पशुओं पर आक्रमण करने वाले को तो मैं अपने सौन्दर्य और नृत्य से आकर्षित करके जंगल से बहिष्कार कर दूंगा। अत: मैं ही वनराज पद के योग्य हूँ। (इस समय बाघ और चीता भी नदी का जल पान करने के लिये आ गये, इस प्रकार के विवाद को सुनते हैं और कहते हैं)

बाघ और चीता – अरे क्या वनराज पद के लिये सुपात्र चुना जा रहा है? इसके लिए तो हम दोनों ही योग्य हैं। जिस किसी का चयन करें, सर्वसम्मति से करना।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 7 सौहार्द प्रकृतेः शोभा

11. सिंहः – तूष्णीं भव भोः। युवामपि मत्सदृशौ भक्षको न तु रक्षको। एते वन्यजीवाः भक्षक रक्षकपदयोग्यं न मयन्ते अतएव विचारविमर्शः प्रचलित।
बकः – सर्वथा सम्यगुक्तम् सिंहमहोदयेन। वस्तुतः एव सिंहन बहुकालपर्यन्तं शासनं कृतम् परमधुना तु कोऽपि पक्षी एव राजेति निश्चेतव्यम् अत्र तु संशीतिलेशस्यापि अवकाशः एवं नास्ति। सर्वे पक्षिणः (उच्चैः)- आम् आम्- कश्चित् खगः एव वनराजः भविष्यति इति।

शब्दार्था: – तूष्णीं भव = शान्तं एधि, मौने धारय (चुप रहो)। युवामपि = भवन्तौ अपि (आप भी), मत्सदशी – मादृशौ, माम् इव (मेरे जैसे, मुझ से, मेरी तरह), भक्षको = भोजिनौ (खाने वाले ) न तु रक्षको = न च त्रातारौ (न कि रक्षक) एते = इमे (ये), वन्यजीवाः = अरण्यप्राणिन् (जंगली जानवर) भक्षक = भोजिनम्, ‘भोक्तारम् (खाने वाले को) रक्षक पद योग्यम् = त्रातुः स्थानाय सक्षम (रक्षक के पद के योग्य) न मन्यन्ते = न मन्वते (नहीं मानते हैं) अतएव = अस्मादेव (इसलिए) विचार = विमर्श = विचाराणाम् आदान प्रदान (विचारों का आदान-प्रदान) प्रचलति = चलन्नस्ति (चल रहा है) सर्वथा पूर्णतः (पूरी तरह) सम्यगुक्तम् = समीचीनमेव कथितम् (ठीक ही कहा)

सिंह महोदयेन = मृगेन्द्रेण, केसरिणा महाशयेन (सिंह जी ने) वस्तुत = यथार्थतः (वास्तव में) एव = ही। सिंहेन = केसरिणा (सिंह द्वारा), बहुकालपर्यन्तम् = दीर्घकालं यावत् (लम्बे समय तक), शासनं कृतम् = आधिपत्यं सम्पादितं (राज्य किया गया) परञ्चाधुना = परन्तु इदानीम् तु (परन्तु अब तो) कोऽपिपक्षी एव = कश्चित खगः एव (कोई पक्षी ही), राजेति = नृपेति (राजा) निश्चेतव्यम् = निश्चित एव चेतव्यम् (निश्चित करना चाहिए) अत्र = इतस्तु (यहाँ) संशीतिलेशस्यापि = सन्देह मात्रस्य (सन्देह मात्र से) अवकाशः एव = अवसर एव (अवसर ही) नास्ति = न वर्तते (नहीं है) सर्वे पक्षिणः = सकलाः खगः (सभी पक्षी) उच्चै = उच्च स्वरेण (जोर से) आम् आम् = ओम ओम (हाँ हाँ), कश्चित् = कोऽपि (कोई) कश्चन = (कोई) खगः एव = पक्षी एव (पक्षी ही) वनराज = अरण्यधिपतिः (वन का राजा) भविष्यति = नियोज्यते (नियुक्त किया जायेगा)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह गद्यांश हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्यपुस्तक के ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ पाठ से लिया गया है। इस गद्यांश में बाघ और चीता स्वयं को राजपद के लिए प्रस्तुत करते हैं और बगुला ‘सिंह ने बहुत दिन तक शासन कर लिया है’ ऐसा आरोप लगाकर किसी पक्षी को राजपद के लिये प्रस्तुत करते हैं।

हिन्दी अनुवाद – सिंह- अरे चुप हो जाओ। तुम भी मेरे समान ही भक्षक हो न कि रक्षक। ये जंगली जीव भक्षक को रक्षक पद के योग्य नहीं मानते। अतः विचार-विमर्श चल रहा है।

वक: – सिंह महोदय ने सर्वथा उचित ही कहा है। वास्तव में सिंह ने बहुत समय तक शासन किया है परन्तु अब तो कोई भी पक्षी राजा नियुक्त किया जाना चाहिए। इसमें कोई सन्देह नहीं है। सभी पक्षी (जोर से)हाँ हाँ कोई पक्षी ही वनराज होगा।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 7 सौहार्द प्रकृतेः शोभा

12. (परं कश्चिदपि खगः आत्मानं विना नान्यं कमपि अस्मै पदाय योग्यं चिन्तयति तर्हि कथं निर्णयः भवेत् तदा तैः सर्वैः गहननिद्रायां निश्चिन्तं स्वपन्तम् उलूकं वीक्ष्य विचारितम् यदेषः आत्मश्लाघाहीनः पदनिर्लिप्त: उलूको एवास्माकं राजा भविष्यति। परस्परमादिशन्ति च तदानीयन्तां नृपाभिषेकसम्बन्धिनः सम्भाराः इति।)
सर्वे पक्षिणः सज्जायैः गन्तुमिच्छन्ति तर्हि अनायास एव

काकः – (अट्टहासपूर्णेन-स्वरेण) सर्वथा अयुक्तमेतत् यन्मयूर-हंस-कोकिल-चक्रवाक-शुक सारसादिषु पक्षिप्रधानेषु विद्यमानेषु दिवान्धस्यास्य करालवकास्याभिषेकार्थं सर्वे सज्जाः। पूर्णं दिनं यावत् निद्रायमाणः एषः कथमस्मान् रक्षिष्यति। वस्तुतस्तु स्वभावरौद्रमत्युग्रं क्रूरमप्रियवादिनम्।
उलूकं नृपतिं कृत्वा का नु सिद्धिर्भवष्यिति।।
(ततः प्रविशति प्रकृतिमाता)।

शब्दार्था:- परं = परञ्च (लेकिन) कश्चिदपि = कश्चन् अपि (कोई भी) खगः = पक्षी (पक्षी) आत्मानं विना = स्वं विना (अपने अलावा) नान्यं कमपि = नापरं किञ्चदपि (किसी दूसरे को नहीं) अस्मै पदाय = एतस्मै स्थानाय (इस पद के लिए) योग्यं = सक्षम (समर्थ) चिन्तयन्ति = विचारयन्ति (सोचते हैं) तर्हि = तदा (तो) कथम् = कस्मात् (कैसे) निर्णयः = निश्चयः (फैसला) भवेत = स्यात् (हो) तदा = तस्मिन् काले (उस समय) सर्वे = सकलैः (सभी) गहन निद्रायाम् = प्रगाढां सुप्त्याम् (गहरी नींद में सोने पर) निश्चिन्तम् स्वपन्तम् = निश्चिन्तरूपेण शयानं। (निश्चिन्त सोते हुये) उलूकं वीक्ष्य = पेचकं अवलोक्य (उल्लू को देखकर) विचारितम् = चिंतितम् (विचार किया या सोचा),

यदेषः = यतोऽयम् (क्योंकि यह) आत्मश्लाघाविहीन = स्वस्य प्रशंसा रहितः (अपनी बड़ाई से दूर) पदनिर्लिप्त = स्थान प्राप्तुं विरक्तः (पदलोलुपता रहित) उलूके एव = धूक एव (उल्लू ही) अस्माकं राजा = अस्मन्नृपः (हमारा राजा) भविष्यति = स्यात् (होना चाहिए) परस्परमादिशन्ति च = मिथः आदेशं कुर्वन्ति च (और आपस में आदेश करते हैं।) तदा = तर्हि (तो) आनीयन्ताम् = आनेतव्यानि (लाये जाने चाहिए) नृपाभिषेक सम्बन्धिनः = राज्याभिषेकेन सम्बन्धितान् (राज्याभिषेक से सम्बन्धित) सम्भाराः = सामग्रयः (सामग्री) साधनानि वा (अथवा साधन) सर्वेपक्षिणः = सकला खगाः (सारे पक्षी), सज्जायैः गन्तुमिच्छन्ति = व्यवस्थाय प्रस्थानं कुर्वन्ति (व्यवस्था के लिए प्रस्थान करते हैं) तर्हि = तदा (तब) अनायास एव = प्रयत्न बिना एव (अनायास ही) काक: (कौआ) अट्टहासपूर्णेन = साट्टहासम् (अट्टहासपूर्वक)

स्वरेण = ध्वानेन (स्वर से) सर्वथा = सर्व प्रकारेण (सब प्रकार से) अयुक्तमेतत् = इदमनुचितम् (यह अनुचित है) यत् = यतः (क्योंकि) मयूर = हंस-कोकिल-चक्रवाक-शुक-सारिकादिषु पक्षिप्रधानेषु = बर्हि क्षीराश -पिक-कोक-कीर-पीतपादादिकाषु खग प्रमुखेषु (मोर-हंस-कोयल-चकवा-तोता, मैना आदि पक्षी प्रमुखों के) विद्यमानेषु = सत्सु (होते हुए) दिवान्धस्यास्य करालवक्त्रस्थ = एतस्याहरन्धस्य भयङ्करमुखस्य (दिन में अन्धा तथा भयंकर मुख वाले के) अभिषेकार्थम् – राजस्नाय (राज्याभिषेक) सर्वेसज्जाः = अखिलाः सकला वा तत्पराः (सभी तैयार हैं) पूर्ण: दिन यावत् = सकलं दिवसं पर्यन्त (पूरे दिनभर) निद्रायमाणः = स्वपन् उनिद्रः (सोता हुआ, उनींदा)

एष = अयं (यह) कथम् = केन प्रकारेण कस्मात् (कैसे) अस्मान् रक्षिष्यति = अस्माकं रक्षां विधास्यती (कैसे रक्षा कर सकेगा) (वास्तव में तो) स्वभाव रौद्रम् = प्रकृत्या कोपान्वितः (स्वभाव से क्रोधी) अति उग्रम् = महत् प्रचण्डम् (बहुत उग्र), क्रूरम् = जिम, कराल (वक्र) अप्रियवादिनम् = कटु वक्ताम् (कड़वा बोलने वाले) उलूकम् = घूकम् (उल्लू को), नृपतिं = राजानं (राजा) कृत्वा = विधाय (करके) का नु सिद्धिर्भविष्यति = किं साध्यं सम्भविष्यति (क्या सिद्धि होगी) ततः = तदैव (तभी) प्रकृतिमाता = निसर्ग अम्बिका (प्रकृति रूपी माता) प्रविशति = प्रवेश करोति (प्रवेश करती है)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह नाट्यांश हमारी शेमुषी पाठ्य-पुस्तक के सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ पाठ से उद्धृत है। इस नाट्यांश में सभी पक्षी मिलकर आत्मश्लाघा रहित तथा पद लोलुप न होने कारण उल्लू को राजा नियुक्त करना इसका विरोध कर देता है।

हिन्दी अनुवादः – परन्तु कोई भी पक्षी अपने अलावा अन्य किसी को इस पद के लिए नहीं सोचता तो निर्णय कैसे हो? तब उन सभी ने गहरी नींद में निश्चित सोते हुए उल्लू को देखकर विचारने लगे कि यह आत्म प्रशंसा रहित तथा पद से निर्लिप्त उल्लू ही हमारा राजा होगा। आपस में आदेश देने लगे तो राज्याभिषेक की सामग्री लाई जाये। सभी पक्षी तैयारी के लिए जाना चाहते हैं तब अनायास ही काक ने अट्टहासपूर्ण स्वर से कहा- यह पूरी तरह अनुचित है, क्योंकि मोर, हंस, कोयल, चकवा, तोता, मैना आदि पक्षियों के होते हुये भी दिन में अंधे, भयंकर मुख वाले को अभिषेक करने के लिए सभी तैयार हो। पूरे दिन तक सोता हुआ यह हमारी रक्षा कैसे करेगा। वास्तव में तो स्वभाव से क्रोधी, बहुत उग्र, कुटिल तथा कटुवादी उल्लू को राजा बनाकर तुम्हारी कौन-सी सिद्धि होगी। (तब प्रकृति माता प्रवेश करती है।)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 7 सौहार्द प्रकृतेः शोभा

13. प्रकृतिमाता – (सस्नेहम्) भोः भोः प्राणिनः। यूयम् सर्वे एव मे सन्ततिः। कथं मिथः कलहं कुर्वन्ति। वस्तुतः सर्वे
वन्यजीविनः अन्योन्याश्रिताः। सदैव स्मरत ददाति प्रतिगृह्णाति, गुह्यमाख्याति पृच्छति। भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्-विधं प्रीतिलक्षणम्।।
(सर्वे प्राणिनः समवेतस्वरेण) मातः ! कथयति तु भवन्ती सर्वथा सम्यक परं वयं भवतीं न जानीमः। भवत्याः परिचयः कः?

शब्दार्थाः – सस्नेहम् = स्नेहपूर्वक (प्रेम से), भोः प्राणिनः = अरे अरे जपाः (अरे प्राणियो), यूयं सर्वे एव मे सन्ततिः = भवन्त सकलाः एव मम अपत्यानि (आप सब मेरी सन्तान हो) कथं = कस्मात् (किसलिए) मिथः = परस्परम् (आपस में) कलहं कुर्वन्ति = विवादं रचयन्ति(विवाद कर रहे हो) वस्तुतः = यथार्थतस्तु (वास्तव में तो) सर्वे = सकलाः (सभी) वन्यं जीविनः = अरण्यप्राणिनः (जंगली जीव) अन्योन्याश्रिता = परस्परम् शरण्याः सन्ति (आपस में एक दूसरे पर आश्रित हैं) सदैव = सर्वदा एव (हमेशा ही) स्मरत = स्मरणं कुरुत (याद रखो) ददाति = यच्छति (देते हो) प्रतिगृह्णाति = आदति (लेते हो) गुहयम् = गुप्तरूपेण (गुप्तरूप से)

आख्याति = कथयति (कहते हो) पृच्छति च = प्रश्नयति च (पूछते हो) भुङक्ते = खादति (खाते हो) भोजयते च= खादयति च (खिलाते हो) च एव = (और ही प्रकारकं (छः प्रकार के) लक्षणम् = लिङ्गम् (लक्षण) सर्वे = सकलाः (सभी) प्राणिनः = जन्तवः (जीव) समवेत स्वरेण = सम्भूत स्वरेण (एक साथ स्वरों में) मातः हे मातः (हे माता) भवती = त्वम् (तू) कथयति = वदति तु (कहती तो) सर्वथा सम्यक् = सर्व प्रकारेण सत्यमेव (सभी प्रकार से उचित) परं वयं भवती न जानीमः = परञ्च वयं त्वां न अवगच्छामः भवत्याः = तव (तुम्हारा) परिचयः = अभिज्ञता (पहचान परिचय) किम = किमस्ति (क्या है)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह नाट्यांश हमारी शेमुषी पाठ्यपुस्तक के ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा, पाठ से उद्धृत है। प्रस्तुत नाट्यांश में लेखक प्रकृति माता को प्रवेश करवाता है, प्रकृति माता सभी को सौहार्द का उपदेश देती है।

हिन्दी अनुवादः – प्रकृतिमाता – (स्नेह के साथ) अरे अरे प्राणियो! तुम सब ही मेरी सन्तान हो, क्यों आपस में कलह कर रहे हो। वास्तव में सभी वन्य जीव एक दूसरे पर आधारित हैं। सदैव याद रखो-देता है, लेता है, गोपनीय को कहता है, पूछता है, खाता है, खिलाता है, ये छः प्रकार के प्रीति के लक्षण हैं। (सभी प्राणी समवेत स्वर में) हे माँ! आप पूर्णत उचित ही कहती हैं परन्तु हम आपको जानते नहीं है, आपका परिचय क्या है?

14 प्रकृतिमाता- अहं प्रकृतिः युष्माकं सर्वेषां जननी? यूयं सर्वे एव मे प्रियाः। सर्वेषामेव मत्कृते महत्त्वं विद्यते
यथासमयम् न तावत् कलहेन समयं वृथा यापयन्तु अपितु मिलित्वा एव मोदध्वं जीवनं च रसमयं कुरुध्वम्। तद्यथा कथितम्

प्रजासुखे सुखं राज्ञः, प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः, प्रजानां तु प्रियं हितम्।।

शब्दार्थाः – प्रकृतिमाता = निसर्गजननी (प्रकृति माता) अहं प्रकृति = अहं निसर्ग (मैं प्रकृति हूँ) युष्माकंभवताम् (आपके) सर्वेषाम् समेषाम् (सभी की) जननी = जन्मदात्री (जन्मदायिनी) यूयं सर्वे एव मे प्रियाः = भवन्तः सर्वे एव मय स्निग्धा (आप सब मेरे प्रिय हैं) सर्वेषामेव समेषाम् (सबका) मत्कृते-मह्य (मुझे) महत्वं महनीयता (महानता) विद्यते = अस्ति (है) तावत् = तर्हि, तदा (तब) कलहेन = विवदमानः विवादेन (झगड़ते हुए) समयंकालं (समय को) वृथा = व्यर्थमेव (व्यर्थ ही) मा नहिं (नहीं) यापयन्तु व्यतीतं = मा कुरुत (व्यतीत मत कसे) अपितु अन्यथा (बल्कि) मिलित्वा = सम्भूय (मिलकर) एव = ही, मोदध्वं जीवनं च = जीवनस्य आनन्दं अनुभवत् (जीवन का आनन्द लो) रसमयं च. = मधुरं च (और रसमय जीवन) कुरुध्वम् कुरुत् (करो) तद्यथा = तदेनं (वह इस प्रकार से) कथितम् उक्तम् (कहा गया है) प्रजासुखे-प्रजा यदि सुखं लभते (प्रजा यदि सुख पाती है) (तर्हि-तो) राज्ञः सुखम् = नृपस्य अपि सौख्यम् (राजा का भी गुख होता है) प्रजानां = प्रजाजनानां (प्रजाजनों के) हिते हितम् = लाभेलाभम् (लाभ में लाभ है) नात्मप्रियंन = स्वार्थी, आत्मलाभे निरतं (अपने हित में रत) राज्ञः = नृपस्य (राजा के) प्रजानां = प्रजाजनानाम् (प्रजा का) हितम् = लाभः (लाभ) प्रियं न = प्रियं न भवति। तेभ्यः स्वार्थमेव = प्रियं भवति (उनका स्वार्थ ही प्रिय होता है)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ पाठ से लिया गया है। इस अंश में प्रकृतिमाता अपने और प्राणियों के सम्बंध का वर्णन करती है तथा आनन्द का मार्ग दर्शाती है।

हिन्दी अनुवादः-प्रकृतिमाता- मैं प्रकृति तुम्हारी सभी की जन्मदात्री हूँ। तुम सब ही मेरे प्रिय हो। यथासमय तुम सभी को मेरे प्रति महत्व है तो कलह से व्यर्थ समय मत गँवाओ, अपितु मिलकर के ही प्रसन्न रहो और जीवन को रसमय करो। तो जैसा कहा मया है-प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है, प्रजा के हित में ही राजा का हित है। राजा का हित आत्मप्रिय नहीं होता अपितु प्रजा का हित ही प्रिय होता है।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 7 सौहार्द प्रकृतेः शोभा

15 अपि च –
अगाधजलसञ्चारी न गर्वं याति रोहितः। अगुष्ठोदकमात्रेण शफरी फुफुरायते।। अत: भवन्तः सर्वेऽपि शफरीवत् एकैकस्य गुणस्य चर्चा विहाय’- मिलित्वा प्रकृतिसौन्दर्याय वनरक्षायै च प्रयतन्ताम्। सर्वे प्रकृतिमातरं प्रणमन्ति मिलित्वा दृढ़संकल्पपूर्वकं च गायन्ति प्राणिनां जायते हानिः परस्परविवादतः।
अन्योन्यसहयोगेन लाभस्तेषां प्रजायते।।

शब्दार्थाः – अपि च = और भी, अगाध अथाह (अथाह), जलसञ्चारी = तोये विचरन्ती (अथाह जल में विचरण करने वाली), रोहित: = रोहित मत्स्य, मृगमीनः (रोहित नाम की मछली) न गर्वं याति = अभिमानं न प्राप्नोति (अभिमान नहीं करती है), परञ्च = परन्तु, अङ्गुष्ठोदकमात्रेण = वृद्धाङ्गुलि मात्रेण उदकेन (अँगूठा की बराबर गहरे पानी में) शफरी = लघुमत्स्य (छोटी मछली शफरी) फुर्फरायते = गर्वेण उद्विग्ना भवति (फरफराती है) अतः = अतएव (इसलिए) भवन्तः = यूयम् (तुम) सर्वेऽपि = सकलाः एव (सभी) सफरीवत् = सफरी मत्स्य इव (शफरी मछली की तरह) एकैकस्य एकस्य एकस्य (एक एक के) गुणस्यवैशिष्ट्यम् (गुण की) चर्चा = संवादे (चर्चा को) विहायः त्यक्त्वा (त्यागकर) मिलित्वा = सम्भूय (एकत्र होकर) प्रकृति सौन्दर्या य च = प्रकृतेः निसर्गस्य वा सुन्दरतायै (प्रकृति की सुन्दरता के लिए)

वनरक्षायै च = काननं संरक्षाय, त्रातुं वा (वन की रक्षा के लिए) प्रयतन्ताम् = प्रयासं कुर्वन्तु, प्रयस्यन्ताम् (प्रयत्न करें) सर्वे सकलाः (सभी) प्रकृति मातरम् = निसर्ग जननी (प्रकृति माता को) प्रणमन्ति = नमन्ति (नमस्कार करते हैं, झुकते हैं) मिलित्वा = सम्भूय (मिलकर) दृढसङ्कल्पपूर्वकम् = वद्धपरिकरम् (कटिवद्ध हुए को) पूर्वकम् = युक्तम् (युक्त, उचित) च गायन्ति = सस्वरं उच्चरानेन (सस्वर उच्चारण करते हैं) प्राणिनो = जन्तूनाम् (प्राणियों की) हानिः = क्षया (नुकसान) जायते = भवति (होती है) परस्पर विवादतः = मिथः विवादात् (परस्पर विवाद से) अन्योन्य = परस्पर, मिथ (आपसी सहयोग से) तेषाम् = अमीषाम् (उनका) लाभ: = हित (लाभ) प्रजायते = प्रभवति (होता है)।

सन्दर्भ-प्रसङ्गश्च – यह नाट्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ पाठ से लिया गया है। इस नाट्यांश में प्रकृति माता उपदेश (सन्देश) देती है कि विवाद में लोगों की हानि तथा परस्पर सहयोग से ही लाभ है।

हिन्दी अनुवादः – और भी-अगाध जल में विचरण करने वाली रोहित मछली तो गर्व नहीं करती है (परन्तु) मात्र अँगूठे के बराबर गहरे पानी में शफरी मछली (घमण्ड से) फरफराती है। अतः आप सभी शफरी की तरह से एक-एक गुण की चर्चा त्यागकर मिल करके प्रकृति सौन्दर्य के लिए और वन की रक्षा के लिए प्रयत्न करो। सभी प्रकृति माता को प्रणाम करते हैं, मिलकर पूर्ण (दृढ़) संकल्पपूर्वक गाते हैं-आपस में विवाद करने से प्राणियों की हानि होती है तथा एक-दूसरे के सहयोग से उनका लाभ होता है।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 6 सुभाषितानि

Jharkhand Board JAC Class 10 Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10th Sanskrit Solutions Chapter 6 सुभाषितानि

JAC Class 10th Sanskrit सुभाषितानि Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरं लिखत (एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) मुनष्याणां महान रिपुः कः? (मनुष्यों का महान् शत्रु कौन है?)
(ख) गुणी किं वेत्ति? (गुणी क्या जानता है?)
(ग) केषां सम्पत्तौ च विपत्तौ च एकरूपता? (सम्पत्ति और विपत्ति में समान कौन होते हैं?)
(घ) पशुना अपि कीदृशः ग्रहयते? (पशु द्वारा कैसे ग्रहण किया जाता है?)
(ङ) उदयसमये अस्तसमये च कः रक्तः भवति? (उदय और अस्त के समान कौन लाल रहता है)
उत्तराणि-
(क) आलस्यम् (आलस्य)
(ख) गुणम् (गुण को)
(ग) महताम् (महापुरुषों के)
(घ) उदीरितः (कहा हुआ)
(ङ) सविता (सूर्य)

प्रश्न 2.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत –
(निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत भाषा में लिखिए)
(क) केन समः बन्धुः नास्ति ? (किसके समान भाई नहीं है ?)
उत्तरम् :
उद्यमेन समः बन्धुः नास्ति। (परिश्रम के समान भाई नहीं है।)

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 6 सुभाषितानि

(ख) वसन्तस्य गुणं कः जानाति ? (वसन्त के गुण को कौन जानती है ?)
उत्तरम् :
पिको वसन्तस्य गुणं जानाति। (कोयल वसन्त के गुण जानती है।)

(ग) बुद्धयः कीदृश्यः भवन्ति ? (बुद्धियाँ किस प्रकार की होती हैं ?)
उत्तरम् :
परेङ्गितज्ञानफला: हि बुद्धयः। (बुद्धियाँ अर्थात् बुद्धिमान् लोग दूसरे के संकेत से बात को समझने वाले होते हैं।)

(घ) नराणां प्रथमः शत्रुः कः ? (मनुष्यों का पहला शत्रु कौन है ?)
उत्तरम् :
नराणां क्रोधो हि प्रथमः शत्रुः। (मनुष्यों का निश्चित रूप से क्रोध पहला शत्रु है।)।

(ङ) सुधियः सख्यं केन सह भवति ? (बुद्धिमानों की मित्रता किसके साथ होती है ?)
उत्तरम् :
सुधियः सख्यं सुधीभिः सह भवति। (बुद्धिमानों की मित्रता बुद्धिमानों के साथ होती है।)

(च) अस्माभिः कीदृशः वृक्षः सेवितव्यः ? (हमें कैसे वृक्ष का सेवन करना चाहिए?)
उत्तरम् :
अस्माभिः फलच्छाया-समन्वितः महावृक्षः सेवितव्यः। (हमें फल-छाया से युक्त महावृक्ष का सेवन करना
चाहिए।)

प्रश्न 3.
अधोलिखिते अन्वयद्वये रिक्तस्थानपूर्तिं कुरुत (निम्नलिखित दो अन्वयों के रिक्तस्थानों की पूर्ति कीजिए।)
(क) यः ………… उद्दिश्य प्रकुप्यति तस्य ……….. सः ध्रुवं प्रसीदति। यस्य मनः अकारणद्वेषि अस्ति, तं कथं ………… परितोषयिष्यति ?
उत्तरम् :
यः निमित्तम् उद्दिश्य प्रकुप्यति तस्य अपगमे सः ध्रुवं प्रसीदति। यस्य मनः अकारणद्वेषि अस्ति, तं कथं जनः परितोषयिष्यति?

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 6 सुभाषितानि

(ख) ……… खलु संसारे ……… निरर्थकं नास्ति। अश्वः चेत् ……… वीरः, खरः ……… (वीरः) (भवति)। उत्तरम-विचित्रे खलु संसारे किञ्चित् निरर्थकम् नास्ति। अश्वः चेत् धावने वीरः, खरः भारस्य वहने (वीरः) (भवति)।

प्रश्न 4.
अधोलिखितानां वाक्यानां कृते समानार्थकान् श्लोकांशान् पाठात् चित्वा लिखत –
(निम्नलिखित वाक्यों के लिए समान अर्थ वाले श्लोकों के अंश पाठ से चुनकर लिखिए)
(क) विद्वान् स एव भवति यः अनुक्तम् अपि तथ्यं जानाति।
(विद्वान वह होता है जो बिना कहे तथ्य को भी जान लेता है।)।
(ख) मनुष्यः समस्वभावै: जनैः सह मित्रतां करोति।
(मनुष्य समान स्वभाव वाले व्यक्तियों के साथ मित्रता करता है।)
(ग) परिश्रमं कुर्वाणः नरः कदापि दुःखं न प्राप्नोति।
(परिश्रम करता हुआ मनुष्य कभी दुःख नहीं पाता है।)
(घ) महान्तः जनाः सर्वदैव समप्रकृतयः भवन्ति।
(महान् पुरुष सदा ही समान स्वभाव के होते हैं।)
उत्तरम् :
(क) अनुक्तमप्यूहति पण्डितोजनः।
(ख) समान-शील-व्यसनेषु सख्यम्।
(ग) नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति।
(घ) सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशं परिवर्तनं विधाय वाक्यानि रचयत –
(निर्देशानुसार परिवर्तन करके वाक्य-रचना कीजिए)
(क) गुणी गुणं जानाति। (बहुवचने)
(ख) पशुः उदीरितम् अर्थं गृह्णाति। (कर्मवाच्ये)
(ग) मृगाः मृगैः सह अनुव्रजन्ति। (एकवचने)
(घ) कः छायां निवारयति ? (कर्मवाच्ये)
(ङ) तेन एव वह्निना शरीरं दह्यते। (कर्तृवाच्ये)।
उत्तरम :
(क) गुणिनः गुणान् जानन्ति।
(ख) पशुना उदीरितः अर्थः गृह्यते।
(ग) मृगः मृगेण सह अनुव्रजति।
(घ) केन छाया निवार्यते।
(ङ) तेमै नैव क्रोधः शरीरं दह्यते।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 6 सुभाषितानि

प्रश्न 6.
(अ) सन्धिं/सन्धिविच्छेदं कुरुत (सन्धि/सन्धि-विच्छेद कीजिए)
(क) न + अस्ति + उद्यमसमः
(ख) तस्यापगमे
(ग) अनुक्तम् + अपि + ऊहति
(घ) गावश्च
(ङ) नास्ति
(च) रक्तः + च + अस्तमये
(छ) योजकस्तत्र।
उत्तरम् :
(क) न + अस्ति + उद्यमसमः = नास्त्युद्यमसमः
(ख) तस्य + अपगमे = तस्यापगमे
(ग) अनुक्तम् + अपि + ऊहति = अनुक्तमप्यूहति
(घ) गावः + च = गावश्च
(ङ) न + अस्ति = नास्ति
(च) रक्तः + च + अस्तमये = रक्तश्चास्तमये
(छ) योजकः + तत्र = योजकस्तत्र।

(आ) समस्तपदं/विग्रहं लिखत –

(क) उद्यमसमः
(ख) शरीरे स्थितः
(ग) निर्बल:
(घ) देहस्य विनाशनाय
(ङ) महावृक्षः
(च) समानं शीलं
व्यसनं येषां तेषु
(छ) अयोग्यः।
उत्तरम् :
(क) उद्यमेन सदृश:
(ख) शरीरस्थितः
(ग) निर्गत: बलः येषाम्
(ङ) महान चासौ वृक्षः
(च) समानशील – व्यसनेषु
(छ) नः योग्यः।

JAC Class 10 Sanskrit Solutions Chapter 6 सुभाषितानि

प्रश्न 7.
(अ) अधोलिखितानां पदानां विलोमपदानि पाठात् चित्वा लिखत –
(निम्नलिखित पदों के विलोम पद पाठ से चुनकर लिखिए।)
(क) प्रसीदति ……………….
(ख) मूर्खः …………………..
(ग) बली ………………..
(घ) सुलभः ……………..
(ङ) सम्पत्तौ ………………
(च) अस्ते ………………
(छ) सार्थकम् ………………..
उत्तरम् :
विलोम पद –
(क) अवसीदति (दुःख पाता है)
(ख) पण्डितः (विद्वान्)
(ग) निर्बलः (कमजोर)
(घ) दुर्लभः (दुष्प्राप्य)
(ङ) विपत्तौ (संकट में)
(च) उदये (उदय होने पर)
(छ) निरर्थकम् (व्यर्थ)

(आ) संस्कृतेन वाक्यप्रयोगं कुरुत (संस्कृत में वाक्य प्रयोग कीजिए)

(क) वायसः ……………..
(ख) निमित्तम् …………….
(ग) सूर्यः …………..
(घ) पिकः ……………
(ङ) वहिनः ………….
उत्तर-
(क) वसन्तस्य गुणं वायसः न जानाति।
(ख) यः निमित्तम् उद्दिश्य प्रकुप्यति सः तस्य अपगमे प्रसीदति।
(ग) सूर्यः प्रात:काले पूर्वस्यां दिशि उदेति।
(घ) पिकः मधुरस्वरेण कूजति।
(ङ) वह्निः काष्ठं दहति।

परियोजनाकार्यम्।

(क) उद्यमस्य महत्त्वं वर्णयन् पञ्चश्लोकान् लिखत। (उद्यम का महत्त्व वर्णन करते हुए पाँच श्लोक लिखिए।)
अथवा
कापि कथा या भवद्भिः पठिता स्यात् यस्याम् उद्यमस्य महत्त्वं वर्णितं तां स्वभाषया लिखत।
(आपने कोई ऐसी कहानी पढ़ी हो जिसमें परिश्रम के महत्त्व का वर्णन किया गया हो, तो उसे अपनी भाषा मेंलिखें।)
नोट- छात्र अपनी पढ़ी हुई कोई ऐसी कहानी अपनी भाषा में स्वयं लिखें।
उत्तरम् :
1. उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः , दैवेन देयमिति कापुरुषाः वदन्ति।
दैवं निहित्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या, यत्नेकृते यदि न सिद्ध्यति कोऽत्र दोषः।।

2. उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।

3. उद्यमः साहसं धैर्य, बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः।
षडेते यत्र वर्तन्ते, तत्र दैवः सहायकृत्।।

4. न दैवमिति संचिन्त्य त्यजेदुद्योगमात्मनः।
अनुद्योगेन कस्तैलं, तिलेभ्यः प्राप्तुमर्हति।।

5. गच्छन् पिपीलिका याति, योजनानां शतान्यपि।।
अगच्छन् वैनतेयोऽपि, पदमेकं न गच्छति।।

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(ख) निमित्तमुद्दिश्य यः प्रकुप्यति ध्रुवं स तस्यापगमे प्रसीदति। यदि भवता कदापि ईदृशः अनुभवः कृतः तर्हि स्वभाषया लिखत।
(किसी कारण से जो नाराज होता है वह उसके समाप्त हो जाने पर प्रसन्न होता है। यदि आपने कभी ऐसा अनुभव किया है तो अपनी भाषा में लिखिए।)
उत्तरम् संकेत :
छात्र अपने अनुभव को स्वयं अपनी भाषा में लिखें।

योग्यताविस्तार –

1. तत्पुरुष समास –

समस्तपदम् – समास-विग्रहः

  • शरीरस्थः – शरीरे स्थितः
  • गृहस्थः – गृहे स्थितः
  • मनस्स्थः – मनसि स्थितः
  • तटस्थ: – तटे स्थितः
  • कूपस्थः – कूपे स्थितः
  • वृक्षस्थः – वृक्षे स्थितः

2. अव्ययीभाव समास –

  • विमानस्थः – विमाने स्थितः
  • निर्गुणम् – गुणानाम् अभाव:
  • निर्मक्षिकम् – मक्षिकाणाम् अभाव:
  • निर्जलम् – जलस्य अभावः
  • निराहारम् – आहारस्य अभावः

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3. पर्यायवाचि पदानि –

शब्दाः – पर्यायवाचिपदानि

  • शत्रु: – रिपुः, अरिः, वैरिः।
  • मित्रम् – सखा, बन्धुः, सुहृद्।
  • वह्निः – अग्निः, अनलः, पावकः।
  • सुधियः – विद्वांसः, विज्ञाः, अभिज्ञाः।
  • अश्वः – तुरगः, हयः, घोटकः।
  • गजः – करी, हस्ती, दन्ती, नागः।
  • वृक्षः – द्रुमः, तरुः, महीरुहः।
  • सविता – सूर्यः, मित्रः, दिवाकरः, भास्करः।

JAC Class 10th Sanskrit सुभाषितानि Important Questions and Answers

शब्दार्थ चयनम् –

अधोलिखित वाक्येषु रेखांकित पदानां प्रसङ्गानुकूलम् उचितार्थ चित्वा लिखत –

प्रश्न 1.
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
(अ) शत्रुः
(ब) आस्य
(स) महान्
(द) अवसीदति
उत्तरम् :
(अ) शत्रुः

प्रश्न 2.
गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणो –
(अ) निर्गुणः
(ब) जानाति
(स) बलं
(द) नाति
उत्तरम् :
(ब) जानाति

प्रश्न 3.
निमित्तमुद्दिश्य हि यः प्रकुप्यति –
(अ) प्रकुति
(ब) ध्रुवम्
(स) परितोषयिष्यति
(द) कोपं करोति
उत्तरम् :
(द) कोपं करोति

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प्रश्न 4.
दीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते –
(अ) कथितः
(ब) दीरितः
(स) वहन्ति
(द) बोधिताः
उत्तरम् :
(द) बोधिताः

प्रश्न 5.
क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणां –
(अ) देहविनाशनाय
(ब) काष्ठगतः
(स) मनुष्याणां
(द) शरीरं
उत्तरम् :
(अ) देहविनाशनाय

प्रश्न 6.
मृगाः मृगैः सङ्गमनुव्रजन्ति
(अ) हरिणैः
(ब) सिंह
(स) मूर्खाः
(द) सख्यम्
उत्तरम् :
(अ) हरिणैः

प्रश्न 7.
अमन्त्रमक्षरं नास्ति, नास्ति मूलमनौषधम्।
(अ) क्षरम्
(ब) मूल
(स) न वर्तते
(द) योजकः
उत्तरम् :
(स) न वर्तते

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प्रश्न 8.
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता –
(अ) धनिकः
(ब) अभ्युदये
(स) सविता
(द) अस्तमये
उत्तरम् :
(ब) अभ्युदये

प्रश्न 9.
विचित्रे खलु संसारे नास्ति किञ्चिन्निरर्थकम् –
(अ) सारे
(ब) अश्वः
(स) लोके
(द) अस्ति
उत्तरम् :
(स) लोके

प्रश्न 10.
अश्वचेद धावने वीरः भारस्य वहने खरः।।
(अ) गौः
(ब) श्वानः
(स) अश्वः
(द) गर्दभः
उत्तरम् :
(द) गर्दभः

संस्कृतमाध्यमेन प्रश्नोत्तराणि –

एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दीजिए)

प्रश्न 1.
शरीरस्थः महान् रिपुः कः अस्ति ? (शरीर में स्थित महान् शत्रु कौन है ?)
उत्तरम् :
आलस्यम् (आलस्य)।

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प्रश्न 2.
वसन्तं कः जानाति ? (वसन्त को कौन जानता है ?)
उत्तरम् :
पिकः (कोयल)।

प्रश्न 3.
सिंहस्य बलं कः जानाति ? (सिंह की शक्ति को कौन जानता है?)
उत्तरम् :
करी (हाथी)।

प्रश्न 4.
वायसः कस्य गुणं न वेत्ति ? (कौआ किसके गुण नहीं जानता ?)
उत्तरम् :
वसन्तस्य (वसन्त के)।

प्रश्न 5.
कः न परितोषयिष्यति ?
(कौन सन्तुष्ट नहीं होगा।)
उत्तरम् :
अकारणद्वेषी
(बिना कारण द्वेष करने वाला)।

प्रश्न 6.
कस्य अपगमे मनुष्यः प्रसीदति ?
(किसके दूर होने पर मनुष्य प्रसन्न हो जाता है ?)
उत्तरम् :
प्रकोपस्य (नाराजगी के)।

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प्रश्न 7.
हयाः कीदृशाः भारं वहन्ति ?
(घोड़े कैसे बोझा ढोते हैं ?)
उत्तरम् :
बोधिताः (समझाये हुए)।

प्रश्न 8.
‘परेङ्गितज्ञानम्’ इति पदयोः विशेष्यः कः ?
(‘परेङ्गितज्ञानम्’ इन पदों में विशेष्य क्या है ?)
उत्तरम् :
ज्ञानम्।

प्रश्न 9.
क्रोधः कुत्र स्थितः भवति ?
(क्रोध कहाँ स्थित होता है ?)
उत्तरम् :
शरीरे (शरीर में)।

प्रश्न 10.
शरीरगतः वह्निः कः भवति ?
(शरीर में स्थित आग क्या होती है ?)
उत्तरम् :
क्रोधः।

प्रश्न 11.
समान-शील-व्यसनेषु मध्ये किं भवति ?
(समान चरित्र और स्वभाव वालों के मध्य क्या होता है ?)
उत्तरम् :
सख्यम् (दोस्ती)।

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प्रश्न 12.
सुधीभिः सङ्गं के अनुव्रजन्ति ?
(विद्वानों के साथ कौन चलते हैं ?)
उत्तरम् :
सुधियः (विद्वान् लोग)।

प्रश्न 13.
कीदृशः पुरुषः संसारे न भवति ?
(कैसा पुरुष संसार में नहीं होता ?)
उत्तरम् :
अयोग्यः।

प्रश्न 14.
संसारः कीदृशः अस्ति ?
(संसार कैसा है ?)
उत्तरम् :
विचित्रः (अनोखा)।

प्रश्न 15.
खरः कस्मिन् कार्ये वीरः ?
(गधा किस काम में वीर है ?)
उत्तरम् :
भारवहने (बोझा ढोने में)।

प्रश्न 16.
उद्यमः केन समः अस्ति ?
(परिश्रम किसके समान है ?)
उत्तरम् :
बन्धुना (बन्धु के)।

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प्रश्न 17.
आलस्यं केषां रिपुः अस्ति ?
(आलस्य किनका शत्रु है ?)
उत्तरम् :
मनुष्याणाम् (मनुष्यों का)।

प्रश्न 18.
गुणं कः वेत्ति ?
(गुण को कौन जानता है ?)
उत्तरम् :
गुणी।

प्रश्न 19.
निर्बलः किं न जानाति ?
(निर्बल क्या नहीं जानता है ?)
उत्तरम् :
बलम् (बल को)।

प्रश्न 20.
मनुष्यः किम् उद्दिश्य प्रकुप्यति ?
(मनुष्य किसे उद्देश्य करके अत्यधिक क्रोधित होता है ?)
उत्तरम् :
निमित्तम् (प्रयोजन)।

प्रश्न 21.
प्रकोपे अपगमे मनुष्यः किं अनुभवति ?
(प्रकोप / नाराजगी के दूर होने पर मनुष्य कैसा अनुभव करता है ?)
उत्तरम् :
प्रसीदति (प्रसन्न होता है।)

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प्रश्न 22.
उदीरितोऽर्थः केन गृह्यते?
(कहने पर अर्थ किसके द्वारा ग्रहण किया जाता है ?)
उत्तरम् :
पशुना (पशु द्वारा)।

प्रश्न 23.
बुद्धयः कीदृशाः भवन्ति ?
(बुद्धियाँ अर्थात् बुद्धिमान् लोग कैसे होते हैं ?)
उत्तरम् :
परेङ्गितज्ञानफलाः (दूसरे के संकेत से समझने वाले)।

प्रश्न 24.
क्रोधः केषां प्रथमः शत्रुः ?
(क्रोध किनका प्रथम शत्रु है ?)
उत्तरम् :
नराणाम् (मनुष्यों का)।

प्रश्न 25.
काष्ठगतः वह्निः कं दहते ?
(काष्ठ में स्थित आग किसे जलाती है ?)
उत्तरम् :
काष्ठम् (लकड़ी को)।

प्रश्न 26.
मृगैः सह के अनुव्रजन्ति ?
(मृगों के साथ पीछे-पीछे कौन चलते हैं ?)
उत्तरम् :
मृगाः (मृग)।

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प्रश्न 27.
तुरगाः कैः सङ्गमनुव्रजन्ति ?
(घोड़े किसके संग जाते हैं ?)
उत्तरम् :
तुरङ्गैः सह (घोड़ों के साथ)।

प्रश्न 28.
कः सेवितव्यः ?
(किसका सेवन करना चाहिए ?)
उत्तरम् :
महावृक्षः (विशाल पेड़)।

प्रश्न 29.
फलहीनात् अपि वृक्षात् किं प्राप्यते ?
(फलहीन वृक्ष से भी क्या प्राप्त किया जाता है ?)
उत्तरम् :
छाया (छाया अथवा आश्रय)।

प्रश्न 30.
कीदृशम् अक्षरं नास्ति ?
(कैसा अक्षर नहीं होता ?)
उत्तरम् :
अमन्त्रम् (मन्त्रहीन)।

प्रश्न 31.
अनौषधं किं नास्ति ?
(औषधीय गुणों से युक्त क्या नहीं है ?)
उत्तरम् :
मूलम् (जड़)।

प्रश्न 32.
सविता उदये कीदृशः भवति ?
(सूर्य उदय होने पर कैसा होता है ?)
उत्तरम् :
रक्तः (लाल)।

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प्रश्न 33.
सम्पत्तौ विपत्तौ च केषाम् एकरूपता?
(सुख-दुःख में कौन एक रूप रहते हैं ?)
उत्तरम् :
महताम् (महापुरुष)।

प्रश्न 34.
अश्वः कस्मिन् कार्ये वीरः?
(घोड़ा किस कार्य में वीर है ?)
उत्तरम् :
धावने (दौड़ने में)।

प्रश्न 35.
भारस्य वहने कः वीरः भवति ?
(बोझा ढोने में कौन वीर है ?)
उत्तरम् :
खरः (गधा)।

पूर्णवाक्येन उत्तरत (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए)

प्रश्न 36.
किं कृत्वा मनुष्यः नावसीदति ?
(क्या करके मनुष्य दुःखी नहीं होता ?)
उत्तरम् :
उद्यमं कृत्वा मनुष्यः नावसीदति।
(परिश्रम करके मनुष्य दुःखी नहीं होता।)

प्रश्न 37.
अकारणद्वेषि मनुष्यः किं न अनुभवति ?
(अकारण द्वेष करने वाला मनुष्य क्या अनुभव नहीं करता है ?)
उत्तरम् :
अकारणद्वेषि जनः परितोषं न अनुभवति।
(अकारण द्वेष करने वाला मनुष्य सन्तोष का अनुभव नहीं करता।)

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प्रश्न 38.
परेङ्गितज्ञानफलाः के भवन्ति ?
(दूसरे के संकेत से समझने वाले कौन होते हैं ?) .
उत्तरम् :
बुद्धिमन्तः जनाः परेङ्गितज्ञानफलाः भवन्ति।
(बुद्धिमान् लोग दूसरे के संकेत मात्र से समझने वाले होते हैं ?)

प्रश्न 39.
क्रोधः नराणां कीदृशः शत्रुः ?
(क्रोध मनुष्यों का कैसा शत्रु है ?)
उत्तरम् :
क्रोधो नराणां देहस्थितः शत्रुः।
(क्रोध मनुष्यों का शरीर में स्थित शत्रु है।)

प्रश्न 40.
मूर्खाः कैः सह अनुव्रजन्ति ?
(मूर्ख किनका अनुसरण करते हैं ?)
उत्तरम् :
मूर्खाः मूखैः सह अनुव्रजन्ति।
(मूर्ख मूल् का अनुसरण करते हैं।

प्रश्न 41.
महावृक्षाः कस्मात् सेवितव्यः ?
(महावृक्ष की सेवा किस कारण से करनी चाहिए ?)
उत्तरम् :
महावृक्षः सेवितव्यः यतः यदि दैवात् फलं नास्ति, तर्हि छाया केनापि न निवार्यते ?
(महावृक्ष की सेवा करनी चाहिए क्योंकि यदि भाग्यवश फल न हो तो छाया को कौन रोकता है ?)

प्रश्न 42.
अस्तंगते सूर्यः कीदृशः भवति ?
(अस्त होने पर सूर्य कैसा होता है ?)
उत्तरम् :
अस्तंगते सूर्यः रक्तः भवति।
(अस्त होने पर सूर्य लाल होता है।)

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प्रश्न 43.
श्लोके महापुरुषाणां तुलना केन सह कृता ?
(श्लोक में महापुरुषों की तुलना किससे की है ?)
उत्तरम् :
सवित्रा सह (सूर्य के साथ)।।

प्रश्न 44.
धावने कः वीरः भवति ?
(दौड़ने में कौन वीर होता है ?)
उत्तरम् :
धावने अश्वः वीरः भवति।
(दौड़ने में घोड़ा वीर होता है।)

प्रश्न 45.
आलस्यं मनुष्याणां कीदृशः रिपुः ?
(आलस्य मनुष्य का कैसा शत्रु है ?)
उत्तरम् :
आलस्यं मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः।
(आलस्य मनुष्यों का शरीर में स्थित महान् शत्रु है।)

प्रश्न 46.
बलंकः वेत्ति को वा न वेत्ति ?
(बल को कौन जानता है अथवा कौन नहीं जानता?)।
उत्तरम् :
बली बलं जानाति न वेत्ति निर्बलः।
(बलवान् बल को जानता है निर्बल नहीं जानता।)

प्रश्न 47.
मनुष्यः कदा प्रसीदति ? (मनुष्य कब प्रसन्न होता है ?)।
उत्तरम् :
कोपस्य निमित्तम् अपगमे मनुष्यः प्रसीदति।
(क्रोध का कारण दूर हो जाने पर मनुष्य प्रसन्न होता है।)

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प्रश्न 48.
अनुक्तमपि कः ऊहति ?
(बिना कहे कौन समझ लेता है ?)
उत्तरम् :
पण्डितो जनः अनुक्तमपि ऊहति।
(विद्वान् व्यक्ति बिना कहे ही समझ लेता है।)

प्रश्न 49.
क्रोधः शरीरं कथं दहते ?
(क्रोध शत्रु को कैसे जलाता है ?)
उत्तरम् :
यथा काष्ठगतः वहिनः काष्ठं दहते तथैव देहस्थितः क्रोधः शरीरं दहते।।
(जैसे लकड़ी में स्थित आग लकड़ी को जला देती है वैसे ही शरीर में स्थित क्रोध शरीर को जला देता है।)

प्रश्न 50.
सख्यं केषु भवति ?
(मित्रता किन में होती है ?)
उत्तरम् :
सख्यं समान शील-व्यसनेषु मध्ये भवति।
(मित्रता समान चरित्र और स्वभाव वालों के मध्य होती है।)

प्रश्न 51.
अस्माभिः कीदृशः वृक्षः सेवितव्यः?
(हमें कैसे वृक्ष की सेवा करनी चाहिए ?)
उत्तरम् :
फलच्छाया समन्वितः महावृक्षः सेवितव्यः।
(फल और छाया से युक्त महावृक्ष की सेवा करनी चाहिए।)

प्रश्न 52.
महापुरुषाः एकरूपाः कदा भवन्ति ?
(महापुरुष कब एकरूप होते हैं ?)
उत्तरम् :
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महताम् एकरूपता भवति।
(सम्पत्ति और विपत्ति में महापुरुषों की एकरूपता होती है।)

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प्रश्न 53.
विचित्रे संसारे किं वैशिष्ट्यम् ?
(विचित्र संसार में क्या विशिष्टता है ?)
उत्तरम् :
विचित्रे खलु संसारे नास्ति किञ्चित् निरर्थकम्।
(विचित्र संसार में निश्चित ही कुछ निरर्थक नहीं है।)

अन्वय-लेखनम् –

अधोलिखितश्लोकस्यान्वयमाश्रित्य रिक्तस्थानानि मञ्जूषातः समुचितपदानि चित्वा पूरयत।
(नीचे लिखे श्लोक के अन्वय के आधार पर रिक्तस्थानों की पूर्ति मंजूषा से उचित पद चुनकर कीजिए।)

1. आलस्यं हि मनुष्याणां ……………………… यं नावसीदति।।
मञ्जूषा – कृत्वा, आलस्यम्, शरीरस्थो, बन्धुः।

हि मनुष्याणां (i)…….. महान् रिपुः (ii)…….. (अस्ति)। उद्यमसमः (iii)…….. न अस्ति यं (iv)…….. (मानवः) न अवसीदति।
उत्तरम् :
(i) शरीरस्थो (ii) आलस्यम् (iii) बन्धुः (iv) कृत्वा।

2. गुणी गुणं वेत्ति ……………………… बलं न मूषकः।।
मञ्जूषा – निर्गुणः, सिंहस्य, वसन्तस्य, बलं।

गुणी गुणं वेत्ति, (i)…….. (गुणं) न वेत्ति। बली (ii)…….. वेत्ति, निर्बलः (बलं) न वेत्ति। (iii)……..गुणं पिकः (वेत्ति), वायसः न (वेत्ति), (iv)…….. बलं करी (वेत्ति) मूषकः न।
उत्तरम् :
(i) निर्गुणः (ii) बलं (iii) वसन्तस्य (iv) सिंहस्य।

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3. निमित्तमुद्दिश्य हि …………………………………… परितोषयिष्यति।।
मञ्जूषा – प्रसीदति, प्रकुप्यति, अकारणद्वेषि, कथं।

यः निमित्तम् उद्दिश्य (i)…….., सः तस्य अपगमे ध्रुवं (ii)……..। यस्य मनः (iii)…….. (अस्ति), तं जनः (iv) …….. परितोषयिष्यति।
उत्तरम् :
(i) प्रकुप्यति (ii) प्रसीदति (iii) अकारणद्वेषि (iv) कथं।

4. उदीरितोऽर्थः पशुनापि ………………………… हि बुद्धयः।।
मञ्जूषा – परेङ्गितज्ञानफलाः, बोधिताः, ऊहति, उदीरितः।

पशुना अपि (i)…….. अर्थ: गृह्यते, हयाः नागाः च (ii)…….. (भारं) वहन्ति। (परञ्च) पण्डितः जनः अनुक्तम् अपि (iii)…….. (यतः) बुद्धयः (iv)……. भवन्ति।
उत्तरम् :
(i) उदीरितः (ii) बोधिताः (iii) ऊहति (iv) परेङ्गितज्ञानफलाः।

5. क्रोधो हि शत्रुः ……………………………. वह्निर्दहते शरीरम्।।
मञ्जूषा – देहस्थितः, देहविनाशनाय, वह्निः, शरीरं।

नराणां (i)…….. प्रथमः शत्रुः (ii)…….. क्रोधः। यथा काष्ठगतः स्थित: (iii)…….. काष्ठम् एव दहते (तथैव शरीरस्थः क्रोधः) (iv) …….. दहते।
उत्तरम :
(i) देहविनाश