JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व 

Jharkhand Board JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

बहुचयनात्मक प्रश्न

1. शीत युद्ध का अंत हुआ
(अ) 1991 में
(ब) 1891
(स) 2001 में
(द) 2010 में
उत्तर:
(अ) 1991 में

2. प्रथम खाड़ी युद्ध का सम्बन्ध था
(अ) सोवियत संघ और अमेरिका के अफगानिस्तान विवाद से
(ब) ईरान और इराक के संघर्ष से
(स) अरब-इजरायल संघर्ष से
(द) अमेरिका द्वारा अपने लगभग 34 देशों की सेनाओं के साथ इराक पर हमले से।
उत्तर:
(द) अमेरिका द्वारा अपने लगभग 34 देशों की सेनाओं के साथ इराक पर हमले से।

3. न्यूयार्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादियों का हमला हुआ था
(अ) 11 सितम्बर, 2001
(स) 11 दिसम्बर, 2001
(ब) 11 सितम्बर, 2003
(द) 11 नवम्बर, 2001
उत्तर:
(अ) 11 सितम्बर, 2001

4. एकध्रुवीय शक्ति के रूप में अमरीकी वर्चस्व की शुरुआत हुई
(अ) 1991 से।
(स) 2006 से।
(ब). 1993 से।
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(अ) 1991 से।

5. वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उभरती प्रवृत्ति है।
(अ) एकल ध्रुवीय विश्व व्यवस्था
(ब) निःशस्त्रीकरण
(स) सैनिक गठबंधन
(द) शीत युद्ध में तीव्रता
उत्तर:
(अ) एकल ध्रुवीय विश्व व्यवस्था

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6. ऑपरेशन इनफाइनाइट रीच का सम्बन्ध है।
(अ) तालिबान और अलकायदा के खिलाफ
(ब) पाकिस्तान के खिलाफ
(स) अफगानिस्तान के खिलाफ
(द) सूडान पर मिसाइल से हमला
उत्तर:
(द) सूडान पर मिसाइल से हमला

7. ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म का सम्बन्ध है।
(अ) अमरीका के खिलाफ देशों का समूह
(ब) सोवियत संघ के खिलाफ देशों का समूह
(स) इराक पर हमले के इच्छुक देशों का गठबंधन
(द) भारत व पड़ौसी देशों के गठबंधन
उत्तर:
(स) इराक पर हमले के इच्छुक देशों का गठबंधन

8. अमेरिका ने आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध के रूप में चलाई मुहिम का नाम दिया-
(अ) ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम
(स) ऑपरेशन इराकी फ्रीडम
(ब) ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म
(द) ऑपरेशन इनफाइनाइट रीच
उत्तर:
(अ) ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए 

1. …………………………. के अगस्त में इराकने कुवैत पर हमला किया और उस पर कब्जा जमा लिया।
उत्तर:
1990,

2. अमरीका रक्षा विभाग का मुख्यालय …………………………….. में है।
उत्तर:
पेंटागन,

3. ……………………… में जापानियों ने …………………………… पर हमला किया था।
उत्तर:
1941, पर्ल हार्बर,

4. विश्व की अर्थव्यवस्था में अमरीका की ……………………………. प्रतिशत की हिस्सेदारी है। में की गई थी।
उत्तर:
21

5. विश्व के पहले ‘बिजनेस स्कूल’ की स्थापना सन् ………………………………. में की गई थी।
उत्तर:
1881

6. शीतयुद्ध के बाद अधिकतर मामलों में यू. ए. एन. द्वारा चुप्पी साध लेना एक नाटकीय फैसला था जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति ने ………………………….. की संज्ञा दी।
उत्तर:
नई विश्व व्यवस्था

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
न्यूयार्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला कब हुआ?
उत्तर:
11 सितम्बर, 2001 को।

प्रश्न 2.
ब्रेटनवुड प्रणाली के अन्तर्गत किस प्रकार के नियम तय किये गये?
उत्तर:
ब्रेटनवुड प्रणाली के अन्तर्गत वैश्विक व्यापार के नियम तय किये गये।

प्रश्न 3.
विश्व का पहला बिजनेस स्कूल कहाँ खोला गया?
उत्तर:
संयुक्त राज्य अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑव पेंसिलवेनिया में वाहर्टन स्कूल के नाम से सन् 1881 में विश्व का पहला स्कूल खोला गया।

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प्रश्न 4.
नागरिक परमाणु समझौता किन देशों के मध्य हुआ?
उत्तर:
भारत और अमरीका के बीच हाल ही में नागरिक परमाणु समझौता हुआ।

प्रश्न 5.
फरवरी, 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान हटती इराकी सेना पर अमरीकी विमानों द्वारा जानबूझकर सड़क पर किये गये हमले को विद्वानों ने क्या कहकर आलोचना की है?
उत्तर:
अनेक विद्वानों और पर्यवेक्षकों ने इस हमले को ‘युद्ध अपराध’ की संज्ञा दी है।

प्रश्न 6.
20 मार्च, 2003 को अमरीका ने इराक पर किस कूट नाम से सैन्य हमला किया?
उत्तर:
‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ के कूट नाम से।

प्रश्न 7.
‘हाइवे ऑव डैथ’ (मृत्यु का राजपथ ) किस सड़क को कहा गया है?
उत्तर:
कुवैत और बसरा के बीच की सड़क को।

प्रश्न 8.
सन् 1990 में किस देश ने कुवैत पर आक्रमण कर उसे अपने राज्य में मिला लिया था?
उत्तर:
इराक ने।

प्रश्न 9.
तालिबान किस देश से संबंधित है?
उत्तर:
अफगानिस्तान से

प्रश्न 10.
आतंकवाद के खिलाफ विश्वव्यापी युद्ध के अंग के रूप में अमेरिका ने कौन सा अभियान चलाया?
अथवा
आतंकवाद के विरुद्ध अमेरिका ने कौन-सा अभियान चलाया?
उत्तर:
ऑपरेशन एण्डयूरिंग फ्रीडम।

प्रश्न 11.
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में ताकत का एक ही केन्द्र हो तो इसे किस शब्द के इस्तेमाल से वर्णित करना ज्यादा उचित होगा?
उत्तर:
वर्चस्व ( हेगेमनी) शब्द के इस्तेमाल से।

प्रश्न 12.
प्रथम खाड़ी युद्ध को किस ऑपरेशन के नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
प्रथम खाड़ी युद्ध को ‘ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म’ के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 13.
समकालीन विश्व राजनीति में ‘9/11’ का प्रयोग किस घटना के लिए किया जाता है?
उत्तर:
समकालीन विश्व राजनीति में ‘ 9/11’ का प्रयोग अमेरिका में हुए आतंकवादी हमलों के लिए किया जाता

प्रश्न 14.
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 9/11 के आक्रमण में लगभग कितने लोग मारे गये थे।
उत्तर:
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर 9/11 के आक्रमण में लगभग तीन हजार लोग मारे गये।

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प्रश्न 15.
अमेरिकन वर्चस्व के तीन क्षेत्रों के नाम लिखें।
उत्तर:
सैन्य क्षेत्र , आर्थिक क्षेत्र, सांस्कृतिक क्षेत्र।

प्रश्न 16.
विश्व व्यवस्था के एकध्रुवीय होने के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:
शीत युद्ध की समाप्ति, सोवियत संघ का विघटन।

प्रश्न 17.
आर्थिक क्षेत्र में अमेरिका को किन देशों से चुनौती मिल रही है?
उत्तर:
आर्थिक क्षेत्र में संयुक्त राज्य अमेरिका को जापान, चीन एवं भारत से कड़ी चुनौती मिल रही है।

प्रश्न 18.
वर्चस्व से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में वर्चस्व का अर्थ शक्ति का केवल एक ही केन्द्र का होना है।

प्रश्न 19.
विश्व राजनीति में अमरीकी वर्चस्व से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
विश्व में राजनीतिक, आर्थिक, सामरिक व सांस्कृतिक मामलों में अमरीकी दबदबा ही अमरीकी वर्चस्व है।

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प्रश्न 20.
इराक पर अमेरिकी आक्रमण के कोई दो उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  1. इराक के तेल भण्डारों पर कब्ज़ा करना
  2. इराक में अपनी पसंद की सरकार का निर्माण करना।

प्रश्न 21.
विश्व में अमरीकी वर्चस्व की शुरुआत कब हुई?
उत्तर:
सोवियत संघ के 1991 में विघटन के बाद से विश्व में अमरीकी वर्चस्व की शुरुआत हुई।

प्रश्न 22.
भारत-अमेरिका के मध्य परस्पर सम्बन्धों को दर्शाने वाले दो तथ्यों को लिखें।
उत्तर:

  1. दोनों देश लोकतंत्र के समर्थक हैं।
  2. दोनों ही अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के विरोधी हैं।

प्रश्न 23.
कश्मीर तथा मानवाधिकार हनन के मुद्दों को लेकर अमरीका भारत पर दबाव क्यों डालता रहा है?
उत्तर:
इसके पीछे अमरीका का एकमात्र लक्ष्य परमाणु अप्रसार संधि तथा व्यापक परमाणु परीक्षण संधि पर भारत के हस्ताक्षर करवाना है।

प्रश्न 24.
सी. टी. बी. टी. का पूरा नाम क्या है?
उत्तर:
सी. टी. बी. टी. का पूरा नाम है। व्यापक परीक्षण प्रतिबंध संधि (Comprehensive Test Ban Treaty)।

प्रश्न 25.
‘ऑपरेशन डेजर्ट स्टार्म’ क्या है?
उत्तर:
अमरीका के नेतृत्व में 1991 में कुवैत को मुक्त कराने हेतु इराक के विरुद्ध छेड़ा गया सैनिक अभियान ‘ऑपरेशन डेजर्ट स्टार्म’ कहलाता है।

प्रश्न 26.
‘ऑपरेशन इन्फाइनाइट रीच’ किस अमेरिकन राष्ट्रपति के आदेश से किया गया था?
उत्तर:
राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के आदेश से।

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प्रश्न 27.
‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ क्या है?
उत्तर:
20 मार्च, 2003 को अमरीका के इराक के विरुद्ध युद्ध को ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ कहा जाता है।

प्रश्न 28.
अफगानिस्तान किन देशों के मध्य बफर राज्य है?
उत्तर:
अफगानिस्तान रूस से पृथक् हुए मध्य एशियाई राष्ट्रों, ईरान तथा भारत-पाक के मध्य बफर राज्य है।

प्रश्न 29.
अफगानिस्तान में 1979 का रूसी हस्तक्षेप ‘प्रमुखता अधिकार’ पर आधारित था। यह प्रमुखता अधिकार क्या है?
उत्तर:
प्रमुखता अधिकार किसी महाशक्ति का किसी छोटे देश में अपने हितों की रक्षा हेतु हस्तक्षेप का अधिकार है।

प्रश्न 30.
अमरीका की ढांचागत ताकत का एक उदाहरण दीजिये।
उत्तर:
अमरीका की ढांचागत ताकत का एक मानक उदाहरण एमबीए (मास्टर ऑव बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन) की अकादमिक डिग्री है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
एक- ध्रुवीयता किसे कहते हैं?
एक – ध्रुवीय विश्व- व्यवस्था से क्या आशय है?
अथवा
उत्तर:
विश्व की राजनीति में जब किसी एक ही महाशक्ति का वर्चस्व हो और अधिकांश अन्तर्राष्ट्रीय निर्णय उसकी इच्छानुसार ही लिये जाएं, तो उसे एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था कहते हैं। वर्तमान में अमेरिका का विश्व – व्यवस्था में वर्चस्व स्थापित है।

प्रश्न 2.
एक ध्रुवीय विश्व में अमेरिका अपना प्रभाव किस प्रकार जमा रहा है?
उत्तर:
एक – ध्रुवीय विश्व में अमेरिका निम्न प्रकार अपना प्रभाव जमा रहा है-

  1. अमेरिका अधिकांश देशों में आर्थिक हस्तक्षेप कर रहा है।
  2. अमेरिका दूसरे देशों में सैनिक हस्तक्षेप भी कर रहा है।
  3. यह संयुक्त राष्ट्र संघ की भी अवहेलना कर रहा है।

प्रश्न 3.
सांस्कृतिक वर्चस्व से क्या आशय है?
उत्तर:
सांस्कृतिक वर्चस्व का आशय है। सामाजिक, राजनैतिक विशेषकर विचारधारा के धरातल पर किसी वर्ग का दबदबा स्थापित होना सांस्कृतिक वर्चस्व में रजामंदी से बात मनवाई जाती है, न कि दबाव से।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

प्रश्न 4.
ऑपरेशन एन्ड्यूरिंग फ्रीडम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये। ‘ऑपरेशन एन्ड्यूरिंग फ्रीडम’ क्या था?
अथवा
उत्तर:
9/11 की घटना के पश्चात् आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध के अंग के रूप में अमरीका ने ‘ऑपरेशन एन्ड्यूरिंग फ्रीडम’ चलाया। यह अभियान उन सभी के खिलाफ चला जिन पर 9/11 का शक था। इस अभियान में मुख्य निशाना अल-कायदा और अफगानिस्तान के तालिबान शासन को बनाया गया।

प्रश्न 5.
‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ के पीछे अमरीका का असली मकसद क्या था?
उत्तर:
19 मार्च, 2003 को ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ के कूट नाम से इराक पर अमेरिकी नेतृत्व में किये गये सैनिक हमले के पीछे असली मकसद था। इराक के तेल- भंडार पर नियंत्रण करना तथा इराक में अमरीका की मनपसंद सरकार कायम करना।

प्रश्न 6.
अमरीका के मौजूदा वर्चस्व का प्रमुख आधार क्या है?
उत्तर:
अमरीका के मौजूदा वर्चस्व का प्रमुख आधार उसकी बढ़ी चढ़ी तथा बेजोड़ सैन्य शक्ति है। कोई भी देश अमरीकी सैन्य शक्ति की तुलना में उसके पासंग के बराबर भी नहीं है। इसके सैन्य प्रभुत्व का आधार सैन्य व्यय के साथ- साथ उसकी गुणात्मक बढ़त है।

प्रश्न 7.
अमरीका की आर्थिक प्रबलता किस बात से जुड़ी हुई है?
उत्तर:
अमरीका की आर्थिक प्रबलता उसकी ढांचागत ताकत अर्थात् वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक खास शक्ल में ढालने की ताकत से जुड़ी हुई है। अमरीका द्वारा कायम की गयी ब्रेटनवुड प्रणाली आज भी विश्व की अर्थव्यवस्था की मूल संरचना का काम कर रही है।

प्रश्न 8.
‘ बैंडवैगन’ रणनीति से क्या आशय है?
उत्तर:
किसी देश को सबसे ताकतवर देश के विरुद्ध रणनीति बनाने के स्थान पर उसके वर्चस्व तंत्र में रहते हुए अवसरों का फायदा उठाने की रणनीति को ही ‘बैंडवैगन’ अथवा ‘जैसी बहे बयार पीठ तैसी कीजै’ की रणनीति कहते हैं।

प्रश्न 9.
‘अपने को छुपा लें’ नीति से क्या आशय है?
उत्तर:
अपने को छुपा लें’ का अर्थ होता है। दबदबे वाले देश से यथासंभव दूर-दूर रहना चीन, रूस और यूरोपीय संघ सभी एक न एक तरीके से अपने को अमरीकी निगाह में चढ़ने से बचा रहे हैं। इस तरह अमरीका के बेवजह या बेपनाह क्रोध की चपेट में आने से ये देश अपने को बचाते हैं।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

प्रश्न 10.
अमरीकी वर्चस्व के सामने आई किन्हीं दो चुनौतियों को संक्षेप में लिखिये।
उत्तर:
अमरीकी वर्चस्व के समक्ष आतंकवादियों ने निम्न दो चुनौतियाँ प्रस्तुत कीं-

  1. अलकायदा द्वारा नैरोबी, केन्या तथा दारेसलाम (तंजानिया) स्थित अमरीकी दूतावास पर वर्ष 1998 में बम वर्षा की गई।
  2. तालिबानी आतंकवादियों ने अमेरिकी विमानों का अपहरण कर न्यूयार्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर के साथ उन्हें टकराकर भारी नुकसान पहुँचाया।

प्रश्न 11.
संयुक्त राज्य अमेरिका के संदर्भ में 9/11 का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
11 सितम्बर, 2011 को आतंकवादियों द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर हमला किया गया। इस घटना के बाद अमरीका एवं पश्चिमी देश आतंकवाद पर अधिक ध्यान देने लगे तथा अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ विश्वव्यापी अभियान छेड़ दिया ।

प्रश्न 12.
नई विश्व व्यवस्था से क्या आशय है?
उत्तर:
समकालीन विश्व में नई विश्व व्यवस्था से यह आशय है कि वर्तमान में सोवियत संघ के विखण्डन के बाद विश्व में द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था समाप्त हो गई है और उसके स्थान पर विश्व में एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था कायम हुई है। इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व की एक सबसे शक्तिशाली ताकत के रूप में उभरा है।

प्रश्न 13.
समकालीन नई विश्व व्यवस्था की शुरुआत कब से और क्यों मानी जाती है?
उत्तर:
समकालीन नई विश्व व्यवस्था में अमरीका के वर्चस्व की शुरुआत उस समय हुई, जब सन् 1991 से एक महाशक्ति के रूप में सोवियत संघ अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य से ओझल हो गया । सोवियत संघ के पतन के बाद आज विश्व में केवल अमरीका ही महाशक्ति है।

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प्रश्न 14.
खाड़ी युद्ध को अमेरिकी सैन्य अभियान ही क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
यद्यपि खाड़ी युद्ध में इराक के विरुद्ध बहुराष्ट्रीय सेना ने मिलकर आक्रमण किया, तथापि इस युद्ध को काफी हद तक अमरीकी सैन्य अभियान ही कहा जाता है क्योंकि इसके प्रमुख एक अमरीकी जनरल नार्मन स्वार्जकाव थे और मिली-जुली सेना में 75 प्रतिशत सैनिक अमरीका के ही थे।

प्रश्न 15.
‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ पर टिप्पणी लिखिये|
अथवा
अमेरिका द्वारा 2003 में इराक पर किये गये आक्रमण का संक्षिप्त विवरण दीजिये।
उत्तर:
ऑपरेशन इराकी फ्रीडम: 19 मार्च, 2003 को अमेरिका ने ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ के कूट नाम से इराक पर सैन्य हमला किया। अमेरिकी अगुवाई वाले आकांक्षियों के गठबंधन में 40 से अधिक देश शामिल हुए। कुछ ही दिनों में सद्दाम हुसैन की सरकार का पतन हो गया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस हमले की अनुमति नहीं दी थी।

प्रश्न 16.
‘बैंड- वेगन’ रणनीति क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘ बैंड वेगन’ की रणनीति:
सबसे ताकतवर देश के विरुद्ध जाने के बजाय उसके वर्चस्व – तंत्र में रहते हुए अवसरों का फायदा उठाने की रणनीति को ही ‘ बैंड वेगन’ की रणनीति कहा जाता है। इसका आशय यह है कि ” जैसी बहे बयार, पीठ तैसी कीजे।” उदाहरण के लिए – आर्थिक वृद्धि दर को ऊंचा करने के लिए व्यापार को बढ़ाना, प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण और निवेश जरूरी है और अमरीका के साथ मिलकर काम करने से इसमें आसानी होगी, न कि उसका विरोध करने से। अतः वर्चस्वजनित अवसरों से लाभ उठाने की रणनीति ही बैंड वेगन की रणनीति है।

प्रश्न 17.
इराक द्वारा कुवैत पर अधिकार जमा लेने के बाद अमेरिका के इराक के विरुद्ध कार्यवाही करने के पीछे क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
सद्दाम हुसैन के विरुद्ध कार्यवाही करने के पीछे अमरीका के सामने निम्नलिखित लक्ष्य थे-

  1. पश्चिमी एशिया के देशों से तेल की आपूर्ति को होने वाले खतरे का निवारण करना।
  2. इजरायल की सुरक्षा को आंच न आने देना।
  3. सद्दाम हुसैन के परमाणु अस्त्रों व कारखानों को नष्ट करना।
  4. समूचे खाड़ी क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखना।
  5. इराक की विस्तारवादी सोच पर प्रतिबंध लगाना।
  6. इराक को पश्चिम एशिया के राजनीतिक मानचित्र में परिवर्तन के अवसर न देना।
  7. विश्व की एकमात्र सर्वोच्च शक्ति के रूप में अमरीका की छवि तथा अमरीकी नेतृत्व की विश्वसनीयता को बनाए रखना।

प्रश्न 18.
खाड़ी युद्ध ( प्रथम ) से अमेरिका को क्या लाभ हुए?
उत्तर:
खाड़ी युद्ध (प्रथम) से अमेरिका को निम्न लाभ हुए-

  1. इस युद्ध के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका का विश्व में वर्चस्व व दबदबा कायम हुआ। अब उसे ही विश्व की एकमात्र महाशक्ति माना जाने लगा क्योंकि इस युद्ध में साम्यवादी चीन, रूस, गुट निरपेक्ष आंदोलन कुछ भी नहीं कर पाया।
  2. खाड़ी के इस तेल उत्पादक क्षेत्र पर संयुक्त राज्य अमेरिका का वर्चस्व स्थापित हो गया। उसने उसके अर्थिक आधार को मजबूती प्रदान की।
  3. इस युद्ध के बाद अमेरिका ने इराक के तेल निर्यात की बहुत बड़ी राशि क्षतिपूर्ति के रूप में वसूल कर ली।
  4. इस युद्ध में अमरीका ने जितना खर्च किया उससे ज्यादा रकम उसे जर्मनी, जापान व सऊदी अरब जैसे देशों से मिली थी।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

प्रश्न 19.
‘ऑपरेशन इनफाइनाइट रीच’ पर एक टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
ऑपरेशन इनफाइनाइट रीच – 1998 में केन्या और तंजानिया के अमरीकी दूतावासों पर आतंकवादी . आक्रमण हुए। एक अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठन अलकायदा को इन दूतावासों पर आक्रमण के लिए जिम्मेवार माना गया। परिणामतः इस बमबारी के कुछ दिनों बाद क्लिंटन प्रशासन ने आतंकवाद की समाप्ति के नाम पर एक नया अभियान शुरू किया जिसे ‘ऑपरेशन इनफाइनाइट रीच’ का नाम दिया। इस अभियान के अन्तर्गत अमेरिका ने किसी की परवाह किये बिना सूडान और अफगानिस्तान में अलकायदा के ठिकानों पर क्रूज मिसाइलों से हमले किये। इस अभियान की संयुक्त राष्ट्र संघ से भी अनुमति नहीं ली गई। विश्व में अमरीकी वर्चस्व का यह एक उदाहरण है कि वह जब चाहे जिस देश में चाहे अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय की परवाह किए बिना क्रूज मिसाइलों से हमला किया जा सकता है।

प्रश्न 20.
अलकायदा पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
अलकायदा- अलकायदा एक आतंकवादी संगठन है जो धार्मिक और राजनीतिक आतंक के माध्यम से धार्मिक वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। यह इस्लामी राज का समर्थक तथा पोषक है। इसकी जड़ें अफगानिस्तान में हैं। आधुनिक हथियारों से सुसज्जित इसके कार्यकर्ता किसी की जान लेना या अपनी जान देना एक खेल समझते हैं। इस प्रकार अलकायदा अतिवादी इस्लामी विचारधारा से प्रभावित एक आतंकवादी संगठन है। आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध के रूप में अमेरिका ने ‘ऑपरेशन एन्ड्यूरिंग फ्रीडम’ नामक सैन्य अभियान चलाया, उसका मुख्य लक्ष्य अलकायदा को बनाया गया क्योंकि 9/11 के अमेरिका के आतंकवादी हमले का सन्देह अमेरिका को अलकायदा पर ही था।

प्रश्न 21.
एक ध्रुवीय व्यवस्था के कोई तीन लाभ लिखिये।
उत्तर:
एकध्रुवीय व्यवस्था के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं-

  1. शांतिपूर्ण व्यवस्था की स्थापना: वर्तमान विश्व में एकध्रुवीय व्यवस्था का प्रमुख लाभ यह है कि इससे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शांतिपूर्ण व्यवस्था की स्थापना होती है।
  2. तकनीकी और वैज्ञानिक विकास: एकध्रुवीय विश्व में शीत युद्ध की संभावना कम होने के कारण तकनीकी तथा वैज्ञानिक विकास को बढ़ावा मिला है।
  3. जनता के जीवन स्तर में सुधार: इससे विश्वस्तर पर जनता के जीवन स्तर में बहुत सुधार आया है। एक ध्रुवीय विश्व में उदारवाद, वैश्वीकरण को बढ़ावा मिला है।

प्रश्न 22.
इतिहास हमें वर्चस्व के विषय में क्या सिखाता है? संक्षेप में लिखिये।
उत्तर:
वर्चस्व का इतिहास – इतिहास हमें वर्चस्व के विषय में निम्न बातें सिखाता है।

  • वर्चस्व बदलता रहता है-शक्ति संतुलन की दृष्टि से देखें तो वर्चस्व की स्थिति अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में एक असामान्य घटना है। हर देश को अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होती हैं। इसलिए अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था में वे किसी एक देश को इतना ताकतवर नहीं बनने देते कि वह शेष देशों के लिए भयंकर खतरा बन जाए। वर्तमान में अमरीकी वर्चस्व के स्थापित होने के बाद उसके संतुलनकारी शक्तियों पर विचार-मंथन चल रहा है। शक्ति सन्तुलन की राजनीति वर्चस्वशील देश की ताकत को आने वाले समय में कम कर देती है।
  • फ्रांस और ब्रिटेन का वर्चस्व – इतिहास में अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में वर्चस्व की स्थिति दो बार आयी है।
    1. यूरोप की राजनीति के संदर्भ में सन् 1660 से 1713 तक फ्रांस का वर्चस्व था।
    2. सन् 1860 से 1910 तक ब्रिटेन का वर्चस्व समुद्री व्यापार के बल पर कायम रहा।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

प्रश्न 23.
अमरीकी वर्चस्व को दर्शाने वाली शक्ति के चार रूपों का संक्षेप में उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
अमरीकी वर्चस्व को दर्शाने वाले चार रूप निम्नलिखित हैं-

  1. सैन्य शक्ति के रूप में: अमरीकी वर्चस्व का मुख्य आधार उसकी बढ़ी चढ़ी सैन्य शक्ति है। वर्तमान में यह सैन्य शक्ति अपने आप में सम्पूर्ण तथा बेजोड़ है।
  2. ढांचागत शक्ति के रूप में: आज अमरीका के आर्थिक कार्य व नीतियाँ पूरे विश्व में अपनी धाक जमाए हुए हैं। अभी महासागरों पर उसकी उपस्थिति देखी जा सकती है। हमें विश्वव्यापी सार्वजनिक वस्तुएँ मुहैया कराने में अमरीकी वर्चस्व की झलक दिखाई देती है। अमरीकी वर्चस्व को बढ़ाने में व्यावसायिक शिक्षा ने भी अहम भूमिका अदा की है।
  3. सांस्कृतिक शक्ति के रूप में अमरीका अपनी भाषा, साहित्य, फिल्मों, जीवन प्रणाली व शैली को किसी न किसी तरह से बढ़ावा देता रहता है। वह अन्य देशों को इसे अपनाने को प्रेरित करता रहता है।
  4. आर्थिक वर्चस्व: अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं के बाजार में अमेरिका का वर्चस्व बना हुआ है।

प्रश्न 24.
आपके मतानुसार एक स्वतन्त्र देश स्वयं को ‘वर्चस्व’ के प्रभाव से कैसे बचा सकता है? कोई चार सुझाव दीजिए। वर्चस्व पर नियंत्रण कैसे पाया जा सकता है?
अथवा
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में एक स्वतन्त्र देश वर्चस्व के प्रभाव से निम्नलिखित तरीकों से बच सकता है।

  1. सामाजिक आंदोलनों एवं जनमत निर्माण के द्वारा वर्चस्व पर नियंत्रण पाया जा सकता है
  2. गैर-सरकारी संस्थाओं के संयुक्त प्रयास द्वारा भी वर्चस्व पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
  3. वर्चस्व के प्रति विरोध द्वारा भी वर्चस्व को नियंत्रित किया जा सकता है।
  4. वर्चस्व द्वारा उत्पन्न परिस्थितियों का विरोध न करके भी वर्चस्व पर नियंत्रण पाया जा सकता।

प्रश्न 25.
अमरीकी आर्थिक वर्चस्व पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये। है।
उत्तर:
अमरीकी आर्थिक वर्चस्व: अमरीकी आर्थिक वर्चस्व से अभिप्राय यह है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में वह सर्वाधिक शक्ति – सम्पन्न है। यथा।

  1. वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमरीका के नियम-कानून लागू किये जाते हैं
  2. विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन तथा इण्टरनेट इत्यादि पर अमेरिका का वर्चस्व बना हुआ है।
  3. खुली वैश्विक अर्थव्यवस्था में मुक्त व्यापार का आधार समुद्री व्यापार है और अमेरिका का समुद्र पर वर्चस्व स्थापित है। अमरीका अपनी नौसेना के बल पर समुद्री व्यापार के मार्गों पर आने-जाने के नियम निर्धारित करता है तथा अन्तर्राष्ट्रीय समुद्री मार्ग को अबाधित करता है। अमेरिकी नौसेना की उपस्थिति विश्व के समस्त महासागरों में है।

प्रश्न 26.
सैन्य शक्ति के रूप में अमरीकी वर्चस्व के कारणों को स्पष्ट कीजिए।
अथवा
सैन्य शक्ति के रूप में अमरीका के वर्चस्व की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
अथवा
अमेरिकी वर्चस्व की सैन्य शक्ति के रूप में व्याख्या कीजिए।
अथवा
सैन्य शक्ति में अमरीकी वर्चस्व पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
सैन्य शक्ति में अमरीकी वर्चस्व: समकालीन विश्व राजनीति में अमरीका सम्पूर्ण भू-मंडल में एक प्रमुख सैन्य शक्ति है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं।

  1. आज अमरीका की सैन्य क्षमता विश्व के अन्य देशों की तुलना में बेजोड़ है । सैन्य मामलों में क्रांति और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उसकी प्रमुखता है।
  2. अमरीकी सैन्य क्षमता आज इसलिए भी सर्वोच्च है क्योंकि आज वह विश्व जनमत की परवाह किये बिना विश्व के किसी कोने पर निशाना साध सकता है। आज वह अपनी सेना को अपने घर में रखकर भी अपने दुश्मन को उसके घर में ही बरबाद कर सकता है।
  3. अमरीका का रक्षा बजट विश्व के 12 अन्य शक्तिशाली देशों के कुल सैन्य व्यय से अधिक है।
  4. अमरीका की सैन्य शक्ति, सैन्य शक्ति में गुणात्मक बढ़त भी लिए हुए है।

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प्रश्न 27.
अमरीका तथा विश्व के प्रमुख देशों के रक्षा बजट को दर्शाइये।
उत्तर:
अमरीका तथा विश्व के

देश रक्षा व्यय (अरब डालर में)
सं. रा. अमेरिका 602.8
रूस 76.7
चीन 150.5
इटली 22.9
सऊदी अरब 61.2
भारत 46.0
फ्रांस
ब्रिटेन 52.5
जापान 48.6
जर्मनी 41.7
दक्षिण कोरिया 35.7
आस्ट्रेलिया 29.4

उक्त तालिका से स्पष्ट होता है कि अमेरिका रक्षा बजट की दृष्टि से अपने अधिकांश प्रतिद्वन्द्वियों की तुलना में अधिक सृदृढ़ स्थिति में है

प्रश्न 28.
ढाँचागत शक्ति के अर्थ में अमरीकी वर्चस्व को समझाइये
उत्तर:
ढाँचागत शक्ति के अर्थ में अमरीकी वर्चस्व – ढाँचागत शक्ति के अर्थ में अमरीकी वर्चस्व को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है-

  1. वैश्विक अर्थव्यवस्था: वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी इच्छा व नीतियाँ थोपने की स्थिति को वर्चस्व की स्थिति कह सकते हैं। आज अमरीका के आर्थिक कार्य व नीतियाँ पूरे विश्व में अपनी धाक जमाए हुए हैं। सभी महासागरों पर आज अमरीकी उपस्थिति अनुभव की जा सकती है। इंटरनेट अमरीकी सैन्य योजना शोध का ही परिणाम है।
  2. सार्वजनिक वस्तुएँ: हमें विश्वव्यापी सार्वजनिक वस्तुओं को मुहैया कराने में अमरीकी वर्चस्व की झलक दिखती है।
  3. शैक्षणिक प्रभाव: अमरीकी वर्चस्व को बढ़ाने में व्यावसायिक शिक्षा ने भी अहम भूमिका अदा की है। एम. बी. ए. जैसे शैक्षणिक पाठ्यक्रमों ने अमरीकी प्रभाव को बढ़ाया है।

प्रश्न 29.
स्पष्ट कीजिये कि अमरीकी आर्थिक प्रबलता उसकी ढाँचागत शक्ति से अलग नहीं है।
उत्तर:
अमरीका की आर्थिक प्रबलता उसकी ढाँचागत ताकत यानी वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक खास शक्ल में ढालने की ताकत से जुड़ी हुई है। यथा

  1. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रेटनवुड प्रणाली कायम हुई थी। अमरीका द्वारा कायम यह प्रणाली आज भी विश्व की अर्थव्यवस्था की बुनियादी संरचना का काम कर रही है।
  2. विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन अमरीकी वर्चस्व का ही परिणाम है।
  3. अमरीका की ढाँचागत ताकत का एक मानक उदाहरण एमबीए की अकादमिक डिग्री है। एमबीए के शुरुआती पाठ्यक्रम 1900 में आरंभ हुए जबकि अमरीका के बाहर इसकी शुरुआत सन् 1950 में ही जाकर हो सकी। आज दुनिया में कोई भी देश ऐसा नहीं है जिसमें एमबीए को प्रतिष्ठित अकादमिक दर्जा हासिल न हो।

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प्रश्न 30.
अमेरिकी वर्चस्व की दो प्रमुख चुनौतियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
अमेरिकी वर्चस्व की दो प्रमुख चुनौतियाँ इस प्रकार हैं।

  1. अमरीका की संस्थागत बुनावट:
    यहाँ शासन के तीनों अंगों के बीच शक्ति का बँटवारा है और यही संस्थागत ‘बुनावट कार्यपालिका द्वारा सैन्य शक्ति के बेलगाम इस्तेमाल पर अंकुश लगाने का काम करती है।
  2. अन्दरूनी चुनौती:
    अमरीकी वर्चस्व की अन्दरूनी चुनौती के मूल में अमरीकी समाज है जो अपनी प्रकृति में उन्मुक्त है। अमरीकी राजनीतिक संस्कृति में शासन के उद्देश्य और तरीके को लेकर गहरे संदेह का भाव भरा है। अमरीका के विदेशी सैन्य अभियानों पर अंकुश रखने में यह बात बड़ी कारगर भूमिका निभाती है।

प्रश्न 31.
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भारत-अमरीकी सम्बन्धों में परिवर्तन लाने वाली स्थितियों को संक्षेप में बताइये।
उत्तर:
सोवियत संघ की समाप्ति के बाद अमरीकी नीति-निर्धारकों ने भारत-अमरीकी संबंधों की सुधार की तरफ ध्यान दिया निम्न दो घटनाओं ने अमरीकी विदेश नीति को इस दिशा में प्रेरित किया
1. सोवियत संघ के बिखराव से कुछ ही महीने पहले भारत ने आर्थिक उदारीकरण का सूत्रपात किया आर्थिक खुलेपन के कारण विदेशी व्यापारी समुदाय के लिए विशाल मध्यम वर्ग वाले भारतीय बाजार का आकर्षण काफी बढ़ गया।

2. शीत युद्ध के बाद अमरीकी विदेश नीति में आर्थिक मुद्दों पर अधिक बल दिया तथा ऐसे भारत के साथ गहरे व्यापारिक सम्बन्ध बनाने के प्रयास किये गये तथा 1995 में दोनों देशों के बीच 11 व्यापारिक समझौते किए गए। उसके बाद भारत व अमरीका के आर्थिक सम्बन्धों में और अधिक निकटता आने लगी।

प्रश्न 32.
अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने ‘नई विश्व व्यवस्था’ की संज्ञा किसे कहते हैं?
उत्तर:
1990 के अगस्त में इराक ने कुवैत पर हमला किया और बड़ी तेजी से उस पर कब्जा जमा लिया। इराक को समझाने-बुझाने की तमाम राजनायिक कोशिशें जब नाकाम रहीं तो संयुक्त राष्ट्रसंघ ने कुवैत को मुक्त कराने के लिए ल-प्रयोग की अनुमति दे दी। शीतयुद्ध के दौरान ज्यादातर मामलों में चुप्पी साध लेने वाले संयुक्त राष्ट्रसंघ के लिहाज से यह एक नाटकीय फैसला था। अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने इसे ‘नई विश्व व्यवस्था’ की संज्ञा दी।

प्रश्न 33.
‘नाइन इलेवन’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
11 सितम्बर, 2001 के दिन विभिन्न अरब देशों के 19 अरहरणकर्ताओं ने उड़ान भरने के चंद मिनटों बाद चार अमरीकी व्यावसायिक विमानों पर कब्जा कर लिया। अपहरणकर्ता इन विमानों को अमरीका की महत्त्वपूर्ण इमारतों की सीध में उड़ाकर ले गए। दो विमान न्यूयार्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के उत्तरी और दक्षिणी टावर से टकराए। तीसरा विमान वर्जिनिया के अर्लिंगटन स्थित ‘पेंटागन’ से टकराया। ‘पेंटागन’ में अमरीकी रक्षा विभाग का मुख्यालय है। चौथे विमान को अमरीकी कांग्रेस की मुख्य इमारत से टकराना था लेकिन वह पेन्सिलवेनिया के एक खेत में गिर गया। इस हमले को ‘नाइन इलेवन’ कहा जाता है।

प्रश्न 34.
‘इराक पर अमरीकी हमले से अमरीका की कुछ कमजोरियाँ उजागर हुई हैं।’ इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इराक पर अमरीकी हमले से अमरीका की कुछ कमजोरियाँ उजागर हुई हैं। अमरीका इराक की जनता को अपने नेतृत्व वाली गठबंधन सेना के आगे झुका पाने में सफल नहीं हुआ है। अमरीका की इस कमजोरी को हम ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से समझ सकते हैं। इतिहास इस बात का गवाह है कि साम्राज्यवादी शक्तियों ने सैन्य बल का प्रयोग महज चार लक्ष्यों जीतने, अपरोध करने, दंड देने ओर कानून व्यवस्था बहाल रखने के लिए किया है। इराक के उदाहरण से प्रकट है कि अमरीका की विजय क्षमता विकट है। इसी तरह अपरूद्ध करने और दंड देने की भी उसकी क्षमता स्वतः सिद्ध है। अमरीकी सैन्य क्षमता की कमजोरी सिर्फ एक बात में जाहिर हुई है। वह अपने अधिकृत भू-भाग में कानून व्यवस्था नहीं बहाल कर पाया है

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प्रश्न 35.
हाल के सालों में भारत-अमरीकी संबंधों के बीच दो नई बातें उभरी हैं। तथ्यों के माध्यम से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हाल के सालों में भारत-अमरीकी संबंधों के बीच दो नई बातें उभरी हैं। इन बातों का संबंध प्रौद्योगिकी और अमरीका में बसे अनिवासी भारतीयों से है। ये दोनों बातें आपस में जुड़ी हुई हैं। इस बात को निम्नलिखित तथ्यों के माध्यम से समझ सकते हैं।

  1. सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में भारत के कुल निर्यात का 65 प्रतिशत अमरीका को जाता है।
  2. बोईंग के 35 प्रतिशत तकनीकी कर्मचारी भारतीय मूल के हैं।
  3. 3 लाख भारतीय ‘सिलिकन वैली’ में काम करते हैं।
  4. उच्च प्रौद्योगिकी के क्षेत्र की 15 प्रतिशत कंपनियों की शुरुआत अमरीका में बसे भारतीयों ने की है।

प्रश्न 36.
वैश्विक अर्थव्यवस्था के संदर्भ में सार्वजनिक वस्तु का सबसे बढ़िया उदाहरण समुद्री व्यापार मार्ग है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वैश्विक अर्थव्यवस्था के संदर्भ में सार्वजनिक वस्तु का सबसे बढ़िया उदाहरण समुद्री व्यापार मार्ग है। जिनका इस्तेमाल व्यापारिक जहाज करते हैं। खुली वैश्विक अर्थव्यवस्था में मुक्त व्यापार समुद्री व्यापार मार्गों के खुलेपन के बिना संभव नहीं । दबदबे वाला देश अपनी नौसेना की ताकत से समुद्री व्यापार मार्गों पर आवाजाही के नियम तय करता है और अन्तर्राष्ट्रीय समुद्र में अबाध आवाजाही को सुनिश्चित करता है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश नौसेना का जोर घट गया। अब यह भूमिका अमरीकी नौसेना निभाती है जिसकी उपस्थिति दुनिया के लगभग सभी महासागरों में है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अफगानिस्तान युद्ध एवं खाड़ी युद्धों के संदर्भ में एक ध्रुवीय विश्व (अमेरिका) के विकास की व्याख्या करें।
एक – ध्रुवीय विश्व (अमेरिका) का विकास
सोवियत संघ के पतन के बाद हुई निम्नलिखित घटनाओं से एक ध्रुवीय विश्व में अमरीका के विकास की व्याख्या की जा सकती है;

1. प्रथम खाड़ी युद्ध: अमेरिका ने कुवैत को स्वतंत्र कराने के सैनिक अभियान में लगभग 75 प्रतिशत सैनिक अमेरिका के थे और अमेरिका ही इस युद्ध को निर्देशित एवं नियंत्रित कर रहा था। विश्व इतिहास में यह दूसरी बार हुआ कि जब सुरक्षा परिषद् ने किसी देश के खिलाफ सैनिक कार्यवाही की अनुमति दी हो।

2. सूडान एवं अफगानिस्तान पर अमेरिकन प्रक्षेपास्त्र हमला: अमेरिका ने सूडान एवं अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र संघ की अनुमति के बिना तथा विश्व जनमत की परवाह किये बिना अल-कायदा के ठिकानों पर क्रूज प्रक्षेपास्त्रों से हमला किया।

3. 9/11 की घटना और आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध: 11 सितम्बर, 2001 को अमेरिका में आतंकवादी हमले के विरोध में अमेरिका ने आतंकवाद के विरुद्ध चलाए ‘ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम’ नामक विश्वव्यापी युद्ध अभियान में शक के आधार पर किसी के खिलाफ भी कार्यवाही की गयी। इस अभियान के तहत अमरीकी सरकार ने अनेक स्वतंत्र राष्ट्रों में गिरफ्तारियाँ कीं और जिन देशों में गिरफ्तारियाँ की गई थीं, उन देशों की सरकारों से पूछना अमरीका ने जरूरी नहीं समझा।

4. द्वितीय खाड़ी युद्ध: खाड़ी युद्ध द्वितीय में अमेरिका ने विश्व जनमत, संयुक्त राष्ट्र संघ तथा विश्व के अन्य देशों की परवाह किये बिना इराक पर मार्च, 2003 को उसके तेल भण्डारों पर कब्जा करने तथा इराक में अपने समर्थन वाली सरकार के गठन के उद्देश्य से आक्रमण कर दिया।

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प्रश्न 2.
अमेरिका के अधिक से अधिक शक्तिशाली होने एवं विश्व के एक ध्रुवीय होने के प्रमुख कारणों का विवेचन कीजिये।
उत्तर:
अमेरिका के शक्तिशाली होने
एवं
विश्व के एक ध्रुवीय होने के कारण
अमेरिका के अधिक से अधिक शक्तिशाली होने एवं विश्व के एक ध्रुवीय होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

  1. शीत युद्ध की समाप्ति: सोवियत संघ के विघटन तथा शीत युद्ध की समाप्ति ने विश्व को एक ध्रुवीय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।
  2. रूस की कमजोर स्थिति: सोवियत संघ के पतन के बाद रूस अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण सोवियत संघ जैसी प्रभावशाली स्थिति प्राप्त नहीं कर सका है
  3. संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका का बढ़ता प्रभाव: सोवियत संघ के पतन के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की उपेक्षा करके अमेरिका अब विश्व राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने लगा है।
  4. गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता में कमी आना:शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अमेरिका पर अंकुश लगाने वाला गुटनिरपेक्ष आंदोलन कमजोर पड़ गया है, जिससे अमेरिका उत्तरोत्तर शक्तिशाली होता चला गया।
  5. उदारवादी विचारधारा का विस्तार: शीत युद्ध की समाप्ति के बाद सोवियत संघ से विघटित हुए सभी समाजवादी देशों ने लोकतांत्रिक उदारवादी चोगा धारण कर लिया है। इस प्रकार अब समूचे विश्व में उस उदारवादी राजनीतिक विचारधारा का बोलबाला हो गया। इससे विश्व राजनीति में अमेरिका का प्रभाव और बढ़ता गया तथा विश्व एक ध्रुवीय बन गया।
  6. शीत युद्ध के बाद अमेरिका के वर्चस्ववादी प्रयास – शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अमेरिका ने भी अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिए ऐसे अनेक वर्चस्ववादी प्रयास किये जिसके चलते एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था का स्वरूप एकदम स्पष्ट हो गया और विश्व – राजनीति में अमेरिका का वर्चस्व स्थापित हो गया।

प्रश्न 3.
विश्व राजनीति में अमेरिकी सैन्य शक्ति वर्चस्व की विवेचना कीजिए।
अथवा
सैनिक शक्ति के रूप में अमरीकी वर्चस्व को समझाइये।
उत्तर:
सैनिक शक्ति के अर्थ में अमरीकी वर्चस्व सैनिक शक्ति के अर्थ में अमरीकी वर्चस्व को अग्रलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है।

  1. बेजोड़ तथा अनूठी सैन्य शक्ति: अमेरिका की मौजूदा ताकत की रीढ़ उसकी बढ़ी चढ़ी सैन्य शक्ति है। आज अमेरिका की सैन्य शक्ति अपने आप में अनूठी है और बाकी देशों की तुलना में बेजोड़ है क्योंकि आज अमेरिका अपनी सैन्य क्षमता के बल पर पूरे विश्व में कहीं भी निशाना साध सकता है।
  2. सैन्य व्यय: आज कोई भी देश अमरीकी सैन्य शक्ति की तुलना में उसके पासंग के बराबर भी नहीं है। अमरीका के नीचे के कुल 12 ताकतवर देश एक साथ मिलकर अपनी सैन्य क्षमता के लिए जितना व्यय करते हैं, उससे कहीं ज्यादा अपनी सैन्य क्षमता के लिए अकेले अमरीका करता है।
  3. सैनिक दृष्टि से गुणात्मक बढ़त: अमेरिका आज सैन्य प्रौद्योगिकी के मामले में इतना आगे है कि किसी और देश के लिए इस मामले में उसकी बराबरी कर पाना संभव नहीं है।
  4. जन-मनोबल को झुकाने में पूर्ण समर्थ नहीं: इराक के उदाहरण से प्रकट हुआ है कि अमेरिका की विजय- क्षमता विकट है। उसकी अपराध करने और दंड देने की क्षमता भी स्वतः सिद्ध है, लेकिन जन – मनोबल को झुकाकर कानून व्यवस्था बहाल कर पाने की उसकी क्षमता पर सवालिया निशान उभरे हैं।

प्रश्न 4.
ढाँचागत शक्ति के अर्थ में अमेरिकन वर्चस्व पर एक लेख लिखिये।
उत्तर:
ढाँचागत शक्ति के अर्थ में अमेरिकी वर्चस्व: ढाँचागत शक्ति के अर्थ में अमेरिकन वर्चस्व को हम निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट कर सकते हैं।

  1. वैश्विक अर्थव्यवस्था की अच्छी समझ: ढांचागत शक्ति के अर्थ में अमरीकी वर्चस्व का सम्बन्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था की एक खास समझ से है। अमेरिका के पास अपने मतलब की चीजों के बनाए रखने हेतु व्यवस्था कायम करने के लिए नियमों व तरीकों को लागू करने की क्षमता व इच्छा दोनों हैं।
  2. विश्वव्यापी सार्वजनिक वस्तुओं को मुहैया करने में प्रभावी भूमिका: विश्वव्यापी ढाँचागत शक्ति के वर्चस्व की झलक हमें विश्वव्यापी सार्वजनिक वस्तुओं, जैसे स्वच्छ वायु, सड़क, समुद्री व्यापार मार्ग आदि को उपलब्ध कराने की अमेरिकी भूमिका में दिखाई देती है।
  3. समुद्री व्यापार मार्गों पर आवाजाही के नियम तय करना: आज अमेरिका अपनी नौ सेना की ताकत से समुद्री व्यापार मार्गों पर आवाजाही के नियम तय करता है और अन्तर्राष्ट्रीय समुद्र में अबाध आवाजाही को सुनिश्चित करता है।
  4. इंटरनेट पर अमरीकी वर्चस्व: इंटरनेट अमेरिकी सैन्य अनुसंधान परियोजना का परिणाम है। आज भी इंटरनेट उपग्रहों के एक वैश्विक तंत्र पर निर्भर है और इनमें से अधिकांश उपग्रह अमेरिका के हैं।
  5. वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण अमरीकी हिस्सेदारी: अमेरिका वैश्विक अर्थव्यवस्था के हर भाग, हर क्षेत्र तथा प्रौद्योगिकी के हर क्षेत्र में विद्यमान है।
  6. वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक खास शक्ल में ढालने की ताकत: दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रेटनवुड प्रणाली कायम हुई थी। अमेरिका द्वारा कायम यह प्रणाली आज भी विश्व की अर्थव्यवस्था की बुनियादी संरचना का काम कर रही है।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

प्रश्न 5.
अमेरिकी सांस्कृतिक वर्चस्व की विवेचना कीजिए।
अथवा
सांस्कृतिक अर्थ में अमेरिकन वर्चस्व की विवेचना कीजिये।
उत्तर:
सांस्कृतिक अर्थ में वर्चस्व से आशय सांस्कृतिक अर्थ में वर्चस्व का सम्बन्ध ‘सहमति गढ़ने’ की ताकत से है। कोई प्रभुत्वशाली वर्ग या देश अपने असर में रहने वालों को इस तरह सहमत कर सकता है कि वे भी दुनिया को उसी नजरिये से देखने लगें जिसमें प्रभुत्वशाली वर्ग या देश देखता है। इससे प्रभुत्वशाली देश की बढ़त और उसका वर्चस्व कायम होता है।

सांस्कृतिक अर्थ में अमरीकी वर्चस्व:
आज विश्व में अमेरिका की सांस्कृतिक मौजूदगी भी इसका एक कारण है। आज अच्छे जीवन और व्यक्तिगत सफलता के बारे में जो धारणाएँ पूरे विश्व में प्रचलित हैं; दुनिया के अधिकांश लोगों और समाजों के जो सपने हैं। – वे सब 20वीं सदी के अमरीका में प्रचलित व्यवहार के ही प्रतिबिंब हैं। अमरीकी संस्कृति बड़ी लुभावनी है और इसी कारण सबसे ताकतवर है।

वर्चस्व का यह सांस्कृतिक पहलू है जहाँ जोर-जबर्दस्ती से नहीं बल्कि रजामंदी से बात मनवायी जाती है। समय गुजरने के साथ हम इसके अत्यधिक अभ्यस्त हो गये हैं। उदाहरण के लिए सोवियत संघ की एक पूरी पीढ़ी के लिए नीली जीन्स ‘अच्छे जीवन’ की आकांक्षाओं का प्रतीक बन गयी थी – एक ऐसा ‘अच्छा जीवन’ जो सोवियत संघ में उपलब्ध नहीं था।

प्रश्न 6.
वर्तमान में ‘अमेरिका और भारत के सम्बन्ध’ विषय पर एक लेख लिखिये।
उत्तर:
अमेरिका के भारत से सम्बन्ध वर्तमान में अमेरिका और भारत के सम्बन्धों का विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है।

  1. अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर समान दृष्टिकोण: वर्तमान में भारत और अमरीका के अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के विरोध में समान दृष्टिकोण के कारण दोनों देशों में नजदीकी आई है।
  2. लोकतांत्रिक: उदारवादी राजनीतिक व्यवस्था: दोनों देशों में विद्यमान उदारवादी लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था के कारण भी सम्बन्धों में निकटता आई है।
  3. व्यापारिक सहयोग: वर्तमान में अमरीका को भारत एक बड़े बाजार के रूप में दिखाई देता है और भारत को विदेशी पूँजी के निवेश की आवश्यकता है। अमरीकी कम्पनियाँ अपने उत्पादों को भारत के बाजार में बेचने को उत्सुक हैं। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच विभिन्न व्यापारिक समझौते इस काल में हुए हैं।
  4. असैन्य नाभिकीय सहयोग: अमरीका ने भारत के साथ 2 मार्च, 2006 को ‘असैन्य नाभिकीय समझौता या परमाणु ऊर्जा समझौता’ किया है।

यह समझौता अमेरिका की विदेश नीति को भारतोन्मुखी बनाता है। एक शक्तिशाली भारत के माध्यम से वह दक्षिण एशिया क्षेत्र में अपने हितों को सुरक्षित करना चाहता है। भारत का बड़ा बाजार, भारत की बौद्धिक सम्पदा, विज्ञान तथा तकनीकी श्रेष्ठता तथा उसकी आकर्षक भू-राजनैतिक स्थिति के कारण अमरीका भारत से मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों को 21वीं सदी के लिए आवश्यक मान रहा है।

प्रश्न 7.
अमरीका से निर्वाह करने हेतु भारत को विदेश नीति की कई रणनीतियों का समुचित मेल तैयार करना होगा। किन्हीं तीन संभावित रणनीतियों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारत को अमरीका के साथ किस तरह का संबंध रखना चाहिए यह तय कर पाना कोई आसान काम नहीं है। अत: भारत में तीन संभावित रणनीतियों पर बहस चल रही है। यथा
1. भारत के जो विद्वान अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को सैन्य शक्ति के संदर्भ में देखते: समझते हैं, वे भारत और अमरीका की बढ़ती हुई नजदीकी से भयभीत हैं। इन विद्वानों के अनुसार भारत को वाशिंगटन से अपना अलगाव बनाए रखना चाहिए तथा अपना ध्यान अपनी राष्ट्रीय शक्ति को बढ़ाने पर लगाना चाहिए।

2. कुछ विद्वानों का मानना है कि भारत और अमरीका के हितों में बढ़ता हुआ हेलमेल, भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर है। ये विद्वान ऐसी रणनीति अपनाने की तरफदारी करते हैं जिससे भारत अमरीकी वर्चस्व का फायदा उठाए वे चाहते हैं कि दोनों के आपसी हितों का मेल हो तथा भारत अपने लिए सबसे बढ़िया विकल्प ढूँढ़ सके इन विद्वानों के अनुसार अमरीका के विरोध की रणनीति व्यर्थ साबित होगी और आगे चलकर इससे भारत को नुकसान होगा।

3. कुछ विद्वानों के मतानुसार भारत को अपनी अगुआई में विकासशील देशों का गठबंधन बनाना चाहिए। समय के साथ यह गठबंधन ताकतवर होगा जिससे अमरीकी वर्चस्व के प्रतिकार में सहायक होगा। अतः अमरीका से निर्वाह करने के लिए भारत को विदेश नीति की कई रणनीतियों का समुचित मेल तैयार करना होगा।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

प्रश्न 8.
भारत-अमरीकी परमाणु समझौते का भारत के संदर्भ में मूल्यांकन कीजिये।
उत्तर:
2 मार्च 2006 को नई दिल्ली में भारत और अमरीका के बीच ‘भारत-अमरीका असैन्य नाभिकीय सहयोग’ समझौता हुआ। भारत के संदर्भ में इस परमाणु समझौते का मूल्यांकन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया गया है। (अ) भारत के लिए परमाणु समझौते की उपयोगिता भारत के संदर्भ में परमाणु समझौते के पक्ष में निम्न प्रमुख तर्क दिये गये हैं।

  1. भारत के आर्थिक विकास के लिए यह समझौता उपयोगी है क्योंकि भारत इस समझौते के तहत परमाणु ऊर्जा प्राप्त कर सकेगा।
  2. इस समझौते से भारत को परमाणु सम्पन्न राष्ट्र का दर्जा भी प्राप्त हुआ है।
  3. यह समझौता इस बात का परिचायक है कि भारत अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक शक्ति के रूप में उभर रहा है।
  4. इस समझौते से भारत के परमाणु संयंत्रों को संवर्द्धित यूरेनियम की प्राप्ति हो जायेगी।

(ब) परमाणु समझौते के विपक्ष (विरोध) में तर्क: भारत के संदर्भ में भारत:अमरीका परमाणु समझौते की निम्न प्रमुख आलोचनाएँ की गई हैं:

  1. यह समझौता भारत को परमाणु सम्पन्न राष्ट्र का दर्जा प्रदान नहीं करता है।
  2. भारत के परमाणु कार्यक्रम व राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए यह समझौता खतरा साबित हो सकता है।
  3. परमाणु ऊर्जा न तो सस्ती है, न स्वच्छ है और न सुरक्षित है।

प्रश्न 9.
अमेरिकी वर्चस्व से कैसे निपटा जा सकता है?
उत्तर:
वर्तमान में बढ़ते अमेरिकी वर्चस्व से निपटने के लिए विद्वानों ने निम्नलिखित रास्ते प्रस्तुत किये हैं।
1. वर्चस्व तंत्र में रहते हुए अवसरों का लाभ उठाया जाए – बढ़ते अमरीकी वर्चस्व से निपटने के लिए उसके विरुद्ध जाने के बजाय उसके वर्चस्व तंत्र में रहते हुए अवसरों का फायदा उठाना कहीं अधिक उचित रणनीति है। इसे ‘बैंडवैगन’ अथवा ‘जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी दीजै’ की रणनीति कहते हैं।

2. वर्चस्व वाले देश से दूर रहना- देशों के सामने दूसरा विकल्प यह है कि वे वर्चस्व वाले देश से यथासंभव दूर-दूर रहें। चीन, रूस और यूरोपीय संघ सभी एक तरीके से अपने को अमेरिकी निगाह में चढ़ने से बचा रहे हैं।

3. राज्येतर संस्थाएँ अमरीकी वर्चस्व का प्रतिकार करने के लिए आगे आएँगी – कुछ लोग मानते हैं कि राज्येतर संस्थाएँ अमेरिकी वर्चस्व के प्रतिकार के लिए आगे आएँगी अमेरिकी वर्चस्व को आर्थिक और सांस्कृतिक धरातल पर चुनौती मिलेगी। यह चुनौती स्वयंसेवी संगठन, सामाजिक आन्दोलन और जनमत के आपसी मेल से प्रस्तुत होगी मीडिया का एक तबका, बुद्धिजीवी, कलाकार और लेखक आदि अमरीकी वर्चस्व के प्रतिरोध के लिए आगे आएँगे ये राज्येतर संस्थाएँ विश्वव्यापी नेटवर्क बना सकती हैं जिसमें अमेरिकी नागरिक भी शामिल होंगे और साथ मिलकर अमेरिकी नीतियों की आलोचना तथा प्रतिरोध किया जा सकेगा।

प्रश्न 10.
9/11 के बाद अमेरिकी विदेश नीति में क्या परिवर्तन आए और इसका विश्व राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ा?
अथवा
9/11 और आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
9/11 की घटना: 11 सितम्बर, 2001 को अमरीका पर एक आतंकवादी हमला हुआ इस आतंकवादी हमले के कारण अकेले अमरीका में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में भय का माहौल उत्पन्न हो गया। आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध की अमरीकी मुहिम – ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम – अमरीका पर हुए इस आतंकवादी हमले की प्रतिक्रिया में अमरीका ने आतंकवादियों के खिलाफ कई देशों में मुहिम चलायी, उसे आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध के अंग के रूप में जाना गया यह एक ऐसा अभियान था, जिसमें शक के आधार पर किसी के खिलाफ भी कार्यवाही की जा सकती थी।

अमरीका पर 9/11 के आक्रमण के लिए मुख्य रूप से अलकायदा और अफगानिस्तान के तालिबान शासन को उत्तरदायी ठहराया गया। अमरीकी वर्चस्व या दादागिरी का विकास- आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध ‘ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम’ के तहत अमरीका की विदेश नीति में यह परिवर्तन आया कि अमेरिका ने अब न केवल ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ की अवहेलना या उपेक्षा की, बल्कि देशों की ‘संप्रभुता’ की भी उपेक्षा की। यथा

  1. ‘ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम’ के तहत शक के आधार पर अमरीकी सरकार ने अनेक स्वतंत्र राष्ट्रों में गिरफ्तारियाँ कीं और जिन देशों में गिरफ्तारियाँ की गई थीं, उन देशों की सरकारों से पूछना भी जरूरी नहीं समझा।
  2. विभिन्न देशों से गिरफ्तार लोगों को अलग देशों के खुफिया जेलखानों में बंद कर दिया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिनिधियों को भी इन बंदियों से मिलने तक नहीं दिया गया।
  3. विश्व का कोई भी देश अब अमरीकी दादागिरी को रोकने की स्थिति में नहीं रहा।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

प्रश्न 11.
सोवियत संघ के विघटन के बाद उभरी अफगानिस्तान की समस्या पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
अफगानिस्तान संकट
1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया। ऐसे में सोवियत संघ के सहारे अफगानिस्तान में शासन चलाने वाले शासक मोहम्मद नजीबुल्ला को सत्ताविहीन कर दिया गया। इस्लामिक जिहाद काउंसिल का गठन-अफगानिस्तान में शासन सम्बन्धी विभिन्न धड़ों की एकता के लिए 1992 में ‘इस्लामिक जिहाद काउन्सिल’ का गठन किया गया। अनेक प्रयासों के बावजूद यह शांति स्थापित करने में सफल रही। अफगानिस्तान में तालिबान संकट – 1995 में अमेरिका और पाकिस्तान के सहयोग से तालिबान ने उत्तरी तथा मध्य अफगानिस्तान के प्रमुख क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। तालिबान को अमरीका तथा पाकिस्तान ने सशस्त्र इस्लामवादी बनाया था।

अमेरिका का तालिबान पर आक्रमण: 1999 में तालिबान अमरीका विरोधी संगठन के रूप में उभरा। अमेरिका ने तालिबान को चेतावनी दी कि वह अलकायदा को किसी प्रकार का सहयोग न करे, लेकिन अमरीका द्वारा दी गई सलाह व चेतावनी पर तालिबान ने कोई ध्यान नहीं दिया। परिणामस्वरूप 7 अक्टूबर, 2001 को अमरीका व उसके सहयोगी देशों ने अफगानिस्तान पर आक्रमण कर दिया तथा अफगानिस्तान में तालिबान शासन का पतन हो गया।

वैकल्पिक सरकार का गठन: अब अफगानिस्तान में वैकल्पिक सरकार के गठन की प्रक्रिया प्रारंभ हुई और 22 दिसम्बर, 2001 को हामिद करजई के नेतृत्व में अफगानिस्तान में सत्ता का हस्तांतरण शांतिपूर्ण तरीके से हुआ। नई सरकार के सत्तासीन होने के साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय सेना वहाँ तैनात कर दी गई।

प्रश्न 12.
‘खाड़ी युद्ध और अमरीकी हस्तक्षेप’ पर एक निबन्ध लिखिए।
उत्तर:
खाड़ी युद्ध की पृष्ठभूमि: 2-अगस्त, 1990 को इराक ने कुवैत पर आक्रमण कर उस पर अपना कब्जा कर लिया। इराक के शासक सद्दाम हुसैन ने यह घोषणा की कि वह कुवैत को किसी भी स्थिति में खाली नहीं करेगा। इराक की हठधर्मिता तथा इराक के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अमरीकी कार्यवाही – अमरीका ने इराक के विरुद्ध सीधी कार्यवाही न करके संयुक्त राष्ट्र संघ को माध्यम बनाया तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के प्रायः सभी सदस्यों इराकी आक्रमण की निंदा की, उसके खिलाफ कठोर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाये तथा यह प्रस्ताव पारित किया कि यदि इराक 15 जनवरी, 1991 तक कुवैत से नहीं हटता है तो उसके विरुद्ध सैनिक कार्यवाही की जा सकती है।

खाड़ी युद्ध संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् द्वारा इराक को दी गई समय-सीमा तक इराक ने कुवैत को खाली नहीं किया और बहुराष्ट्रीय सेना ने 17 जनवरी, 1991 को इराक पर आक्रमण कर दिया और देखते ही देखते इराक की सेनाएँ धराशायी हो गईं और कुवैत मुक्त हो गया। युद्ध की समाप्ति के पश्चात् भी इराक के खिलाफ लगाए प्रतिबंध जारी रहे ताकि इराक फिर से शस्त्रास्त्रों से लैस नहीं हो सके। खाड़ी युद्ध के निम्न प्रमुख प्रभाव हुए- खाड़ी युद्ध का प्रभाव

  1. खाड़ी युद्ध में अमरीकी सफलता के कारण विश्व में अमरीका का वर्चस्व कायम हुआ। उसे ही विश्व की एकमात्र महाशक्ति माना जाने लगा।
  2. खाड़ी के इस अमूल्य तेल उत्पादक क्षेत्र पर अमरीका का वर्चस्व स्थापित हो गया।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

प्रश्न 13.
नई विश्व व्यवस्था क्या है? नई विश्व व्यवस्था में अमरीकी वर्चस्व का एहसास किन घटनाओं के बाद हो पाया?
उत्तर:
नई विश्व व्यवस्था:
सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व में एकध्रुवीय नई विश्व व्यवस्था कायम हुई है जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व की एक सबसे शक्तिशाली ताकत के रूप में उभर गया है। सम्पूर्ण भूमण्डल में यह सैन्य व आर्थिक रूप से शक्तिशाली है। इसके अतिरिक्त सैन्य प्रौद्योगिकी तथा अनुसंधान तथा विकास सुविधाओं में इसका नेतृत्व है। अमरीकी वर्चस्व का एहसास – नई विश्व व्यवस्था में अमरीकी वर्चस्व का एहसास अग्र घटनाओं के बाद हो पाया।
1. प्रथम खाड़ी युद्ध”:
1990 के अगस्त में इराक ने कुवैत पर हमला कर उस पर कब्जा जमा लिया। इराक को समझाने-बुझाने की राजनयिक कोशिशों के असफल हो जाने के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ ने इराक पर बल प्रयोग की अनुमति दे दी। अमरीका के नेतृत्व में 34 देशों की फौज ने इराक के विरुद्ध मोर्चा खोला और उसे परास्त कर दिया। इराक को कुवैत से हटने को मजबूर होना पड़ा। इस युद्ध में अमरीका ने लाभ कमाया।

2. यूगोस्लाविया पर नाटो की बमबारी: 1999 में यूगोस्लाविया पर अमरीकी नेतृत्व में नाटो ने दो माह तक बमबारी की। यूगोस्लाविया की सरकार गिर गयी और कोसाबो (यूगोस्लाविया के एक प्रान्त) पर नाटो की सेना काबिज हो गयी।

3. सूडान और अफगानिस्तान में अलकायदा के ठिकानों पर बमबारी: 1999 में केन्या और तंजानिया में अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र की परवाह किये बिना सूडान और अफगानिस्तान के अलकायदा ठिकानों पर मिसाइलों से हमले किये।

4. आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी कार्यवाही:  9/11 की घटना के बाद अमेरिका ने अलकायदा और अफगानिस्तान के तालिबान को निशाना बनाते हुए आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध छेड़ दिया।

5. इराक पर आक्रमण: 19 मार्च, 2003 को संयुक्त राष्ट्र को धत्ता बताते हुए इराक के तेल भंडारों पर नियंत्रण करने तथा इराक में मनपसन्द सरकार बनाने हेतु इराक पर आक्रमण कर दिया तथा उस पर नियंत्रण कर लिया।

प्रश्न 14.
अमेरिका के इराक आक्रमण के कारणों पर प्रकाश डालिये।
उत्तर:
अमेरिका के इराक आक्रमण के कारण 19. मार्च, 2003 को अमरीका ने ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ के कूट नाम से इराक पर सैन्य हमला किया। अमरीकी अगुवाई वाले ‘आकांक्षियों के महाजोट’ में 40 से ज्यादा देश शामिल हुए। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस हमले की अनुमति नहीं दी थी। अमेरिका के इराक आक्रमण के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:
1. इराक को सामूहिक संहार के हथियारों को बनाने से रोकना: अमेरिका ने इराक पर आक्रमण करने के पीछे यह कारण बताया कि इराक को सामूहिक संहार के हथियार बनाने से रोकने के लिए इराक पर यह हमला किया। लेकिन इराक में सामूहिक संहार के हथियारों की मौजूदगी के कोई प्रमाण नहीं मिले। इससे स्पष्ट होता है कि इराक पर अमेरिका के हमले के पीछे यह कारण नहीं था।

2. इराक के तेल भंडार पर नियंत्रण करना: इराक पर अमेरिकी हमले का प्रमुख कारण था। इराक के तेल भंडारों पर अमेरिकी नियंत्रण स्थापित करना। इस हमले के पश्चात् खाड़ी के इस तेल उत्पादक देश पर अमरीकी वर्चस्व स्थापित हो गया।

3. इराक में कठपुतली सरकार कायम करना: इराक पर अमेरिकी आक्रमण का एक अन्य प्रमुख कारण था। इराक में अमरीका की मनपसंद सरकार कायम करना। सद्दाम हुसैन के रहते अमरीका वहाँ अपनी कठपुतली सरकार बनाने में सफल नहीं हो पाया था। इस कारण उसका प्रमुख उद्देश्य था। इराक से सद्दाम हुसैन की सत्ता को समाप्त करना और इस उद्देश्य की पूर्ति उस पर आक्रमण कर तथा उसे समाप्त करके ही हो सकती थी।

4. अमरीकी राजनैतिक वर्चस्व का स्थापित करना: इराक पर अमरीकी आक्रमण का एक अन्य कारण था। इराक में सद्दाम हुसैन की सत्ता समाप्त कर, इराक पर अपना अधिकार जमाकर, विश्व में अपने वर्चस्व को स्थापित करना तथा यह दिखाना कि अब विश्व में उसका प्रतिरोध कोई भी शक्ति नहीं कर सकती।

प्रश्न 15.
इतिहास हमें वर्चस्व के बारे में क्या सिखाता है?
उत्तर:
शक्ति-संतुलन के तर्क को देखते हुए वर्चस्व की स्थिति अंतर्राष्ट्रीय मामलों में एक असामान्य परिघटना है। इसका कारण बड़ा सीधा-सादा है। विश्व – सरकार जैसी कोई चीज नहीं होती और ऐसे में हर देश को अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होती है। कभी-कभी अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में उसे यह भी सुनिश्चित करना होता है कि कम से कम उसका वजूद बना रहे। इस कारण, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था में विभिन्न देश शक्ति संतुलन को लेकर बड़े सतर्क होते हैं और आमतौर पर वे किसी एक देश को इतना ताकतवर नहीं बनने देते कि बाकी के देशों के लिए भयंकर खतरा बन जाए।

सौ साल बीत चुके हैं। इस दौरान सिर्फ दो अवसर आए जब किसी एक देश ने अंतर्राष्ट्रीय फलक पर वही प्रबलता प्राप्त की जो आज अमरीका को हासिल है। यूरोप की राजनीति के संदर्भ में 1660 से 1713 तक फ्रांस का दबदबा था और यह वर्चस्व का पहला उदाहरण है। ब्रिटेन का वर्चस्व और समुद्री व्यापार के बूते कायम हुआ उसका साम्राज्य 1860 से 1910 तक बना रहा। यह वर्चस्व का दूसरा उदाहरण है। वर्चस्व अपने चरमोत्कर्ष के समय अजेय जान पड़ता है लेकिन यह हमेशा के लिए कायम नहीं रहता इसके ठीक विपरीत शक्ति-संतुलन की राजनीति वर्चस्वशील देश की ताकत को आने वाले समय में कम कर देती है।

1660 में लुई 14वें के शासनकाल में फ्रांस अपराजेय था लेकिन 1713 तक इंग्लैण्ड, हैवसबर्ग, आस्ट्रिया और रूस फ्रांस की ताकत को चुनौती देने लगे। 1860 में विक्टोरियाई शासन का सूर्य अपने पूरे चरम पर था और ब्रिटिश साम्राज्य हमेशा के लिए सुरक्षित लगता था। 1910 तक यह स्पष्ट हो गया कि जर्मनी, जापान और अमरीका ब्रिटेन की ताकत को ललकारने के लिए उठ खड़े हुए हैं। अब से 20 साल बाद एक और महाशक्ति या कहें कि शक्तिशाली देशों का गठबंधन उठ खड़ा हो सकता है क्योंकि तुलनात्मक रूप से देखें तो अमरीका की ताकत कमजोर पड़ रही है।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत

Jharkhand Board JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 Political Science Important Questions Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत

बहुचयनात्मक प्रश्न

1. सोवियत संघ का विघटन हुआ
(अ) 1990 में
(स) 1992 में
(ब) 1991 में
(द) 1993 में।
उत्तर:
(ब) 1991 में

2. पूँजीवादी दुनिया और साम्यवादी दुनिया के बीच विभाजन का प्रतीक थी
अथवा
शीत युद्ध का सबसे बड़ा प्रतीक थी-
(अ) बर्लिन की दीवार का खड़ा किया जाना।
(ब) बर्लिन की दीवार का गिराया जाना।
(स) हिटलर के नेतृत्व में नाजी पार्टी का उत्थान।
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(अ) बर्लिन की दीवार का खड़ा किया जाना।

3. बर्लिन की दीवार बनाई गई थी
(अ) 1961 में
(ब) 1951 में
(स) 1971 में
(द) 1981 में।
उत्तर:
(अ) 1961 में

4. पूर्वी जर्मनी के लोगों ने बर्लिन की दीवार गिरायी-
(अ) 1946 में
(ब) 1991 में
(स) 1989 में
(द) 1961 में।
उत्तर:
(स) 1989 में

5. सोवियत संघ के विघटन के लिए किस नेता को जिम्मेदार माना गया
(अ) निकिता ख्रुश्चेव
(स) बोरिस येल्तसिन
(ब) स्टालिन
(द) मिखाइल गोर्बाचेव।
उत्तर:
(द) मिखाइल गोर्बाचेव।

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6. सोवियत संघ के विभाजन के बाद विश्व पटल पर कितने नए देशों का उद्भव हुआ
(अ) 11
(ब) 9
(स) 10
(द) 15
उत्तर:
(द) 15

7. साम्यवादी गुट के विघटन का प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय प्रभाव पड़ा
(अ) द्वि- ध्रुवीय विश्व व्यवस्था का उदय
(ब) बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का उदय
(स) एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का उदय
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(स) एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का उदय

8. वर्तमान विश्व में कौनसा देश एकमात्र महाशक्ति है-
(अ) रूस
(ब) चीन
(स) अमेरिका
(द) फ्रांस।
उत्तर:
(स) अमेरिका

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

1. 1964 से 1982 तक ………………… सोवियत संघ के राष्ट्रपति थे।
उत्तर:
लियोनेड ब्रेझनेव

2. …………………… द्वारा समाजवादी सोवियत संघ की व्यवस्था को सुधारने की चाह और प्रयास उसके विघटन का कारण बने।
उत्तर:
मिखाइल गोर्बाचेव

3. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सोवियत संघ का राष्ट्राध्यक्ष ……………………… था।
उत्तर:
जोजेफ स्टालिन

4. …………………… पूरी दुनिया में साम्यवाद के प्रेरणास्रोत थे।
उत्तर:
व्लादिमीर लेनिन

5. रूस ने भारत के अन्तरिक्ष उद्योग में जरूरत के वक्त ………………………..देकर मदद की।
उत्तर:
क्रायोजेनिक रॉकेट

6. 2001 के भारत-रूस सामरिक समझौते के अंग के रूप में भारत और रूस के बीच …………………….. पर हस्ताक्षर हुए।
उत्तर:
6.80

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
बर्लिन की दीवार किसका प्रतीक थी ?
उत्तर:
बर्लिन की दीवार पूँजीवादी दुनिया और साम्यवादी दुनिया के बीच विभाजन का प्रतीक थी।

प्रश्न 2.
समाजवादी सोवियत गणराज्य कब अस्तित्व में आया?
उत्तर:
समाजवादी सोवियत गणराज्य रूस में हुई 1917 की समाजवादी क्रांति के बाद अस्तित्व में आया।

प्रश्न 3.
बोल्शेविक कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक कौन थे?
उत्तर:
बोल्शेविक कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक ब्लादिमीर लेनिन थे।

प्रश्न 4.
1917 की रूसी क्रांति के नायक कौन थे?
उत्तर:
ब्लादिमीर लेनिन।

प्रश्न 5.
विश्व में सर्वप्रथम कब और कहाँ साम्यवादी पार्टी की सरकार लोकतांत्रिक चुनावों के आधार पर बनी?
उत्तर:
अक्टूबर, 1917 में, सोवियत संघ में।

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प्रश्न 6.
सोवियत प्रणाली के अनुसार राज्य की प्रमुख प्राथमिकता क्या थी?
उत्तर:
सोवियत प्रणाली के अनुसार राज्य की प्रमुख प्राथमिकता देश के समस्त संसाधनों पर सार्वजनिक स्वामित्व वाले साम्यवादी शासन की स्थापना थी।

प्रश्न 7.
सोवियत संघ के नेतृत्व में बने पूर्वी यूरोप के देशों के सैनिक गठबंधन का नाम लिखिये।
उत्तर:
वारसा पैक्ट।

प्रश्न 8.
लेनिन के उत्तराधिकारी कौन थे?
उत्तर:
जोजेफ स्टालिन।

प्रश्न 9.
पश्चिम के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का सुझाव रखने वाले सोवियत संघ के नेता कौन थे?
उत्तर:
निकिता ख्रुश्चेव।

प्रश्न 10.
शीतयुद्ध काल में हुए किन्हीं दो संघर्षों (युद्धों) का उल्लेख कीजिए, जिनमें अमेरिका ने निर्णायक भूमिका निभाई।
उत्तर:

  1. बर्लिन संकट
  2. क्यूबा संकट।

प्रश्न 11.
मिखाइल गोर्बाचेव ने आर्थिक और राजनैतिक सुधार हेतु किन दो नीतियों को अपनाया?
उत्तर:

  1. पेरेस्त्रोइका (पुनर्रचना) और
  2. ग्लासनोस्त ( खुलेपन) की नीतियों को।

प्रश्न 12.
सोवियत संघ कितने गणराज्यों से मिलकर बना था?
उत्तर:
15 गणराज्यों से।

प्रश्न 13.
सोवियत संघ का अन्त ( विघटन) कब हुआ?
उत्तर:
25 दिसम्बर, 1991 को।

प्रश्न 14.
सोवियत संघ के विघटन के समय राष्ट्रपति कौन था?
अथवा
सोवियत संघ का अन्तिम राष्ट्रपति कौन था ?
उत्तर:
मिखाइल गोर्बाचेव।

प्रश्न 15.
गोर्बाचेव सोवियत संघ के राष्ट्रपति किस वर्ष बने?
उत्तर:
1985 में।

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प्रश्न 16.
समाजवादी सोवियत गणराज्य कब अस्तित्व में आया?
उत्तर:
समाजवादी सोवियत गणराज्य रूस में हुई 1917 की समाजवादी क्रान्ति के बाद अस्तित्व में आया।

प्रश्न 17.
1917 की रूसी क्रान्ति क्यों हुई थी?
उत्तर:
1917 की रूसी क्रान्ति पूँजीवादी व्यवस्था के विरोध में हुई थी तथा समाजवाद के आदर्शों और समतामूलक समाज की जरूरत से प्रेरित थी।

प्रश्न 18.
सोवियत राजनीतिक प्रणाली की धुरी क्या थी?
उत्तर:
सोवियत राजनीतिक प्रणाली की धुरी कम्युनिस्ट पार्टी थी।

प्रश्न 19.
सोवियत राजनीतिक प्रणाली किस विचारधारा पर आधारित थी?
उत्तर:
सोवियत राजनीतिक प्रणाली साम्यवादी विचारधारा पर आधारित थी।

प्रश्न 20.
दूसरी दुनिया किसे कहा जाता है?
उत्तर:
पूर्वी यूरोप के जो देश समाजवादी खेमे में शामिल हुए थे, उनको दूसरी दुनिया कहा जाता है।

प्रश्न 21.
सोवियत संघ के किन क्षेत्रों की जनता उपेक्षित और दमित महसूस करती थी और क्यों?
उत्तर:
रूस गणराज्य के अतिरिक्त सोवियत संघ के अन्य क्षेत्रों की जनता प्रायः उपेक्षित और दमित महसूस करती

प्रश्न 22.
गोर्बाचेव ने सोवियत संघ में सुधार हेतु क्या प्रयत्न किये?
उत्तर:
गोर्बाचेव ने देश के अन्दर आर्थिक-राजनीतिक सुधारों और लोकतन्त्रीकरण की नीति चलायी।

प्रश्न 23.
गोर्बाचेव के सुधारों का विरोध किन नेताओं ने किया?
उत्तर:
कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने गोर्बाचेव की सुधार नीतियों का विरोध किया।

प्रश्न 24.
रूस के पहले चुने हुए राष्ट्रपति कौन थे?
उत्तर:
बोरिस येल्तसिन।

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प्रश्न 25.
‘शॉक थेरेपी’ की सर्वोपरि मान्यता क्या थी?
उत्तर:
शॉक थेरेपी की सर्वोपरि मान्यता थी कि मिल्कियत का सबसे प्रभावी रूप निजी स्वामित्व होगा।

प्रश्न 26.
सोवियत संघ के पतन का प्रमुख कारण क्या रहा?
उत्तर:
सोवियत संघ की राजनीतिक-आर्थिक संस्थाओं की अन्दरूनी कमजोरी सोवियत संघ के पतन का प्रमुख कारण रही।

प्रश्न 27.
बाल्टिक गणराज्य में कौन-कौनसे राष्ट्र आते हैं?
उत्तर:
बाल्टिक गणराज्य के अन्तर्गत एस्टोनिया, लताविया और लिथुआनिया आते हैं।

प्रश्न 28.
सोवियत संघ के विघटन का अन्तिम और सर्वाधिक तात्कालिक कारण क्या रहा?
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन का अन्तिम और सर्वाधिक तात्कालिक कारण रहा बाल्टिक गणराज्यों, उक्रेन, जार्जिया और रूस जैसे विभिन्न गणराज्यों में राष्ट्रीयता और सम्प्रभुता का उभार।

प्रश्न 29.
सोवियत संघ के विघटन के कोई दो परिणाम लिखिए।
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के परिणामस्वरूप

  1. शीत युद्ध का दौर समाप्त हो गया।
  2. एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का उदय हुआ।

प्रश्न 30.
शीत युद्ध की समाप्ति के प्रभाव का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. दूसरी दुनिया (सोवियत संघ खेमे ) का पतन तथा
  2. एकध्रुवीय विश्व का उदय शीत युद्ध की समाप्ति का प्रभाव था।

प्रश्न 31.
सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् रूस ने किस तरह की अर्थव्यवस्था को अपनाया?
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् रूस ने उदारवादी अर्थव्यवस्था को अपनाया।

प्रश्न 32.
सोवियत संघ के विघटन के बाद अधिकांश गणराज्यों की अर्थव्यवस्था के पुनर्जीवित होने का क्या कारण था?
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के बाद अधिकांश गणराज्यों की अर्थव्यवस्था खनिज तेल, प्राकृतिक गैस के निर्यात से पुनर्जीवित हुई। मिले ?

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प्रश्न 33.
सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् भारत को रूस के साथ मित्रता बनाए रखने से कौन से दो लाभ
उत्तर:

  1. भारत को रूस से आधुनिकतम सैनिक सामान मिलते रहे।
  2. विघटित हुए नवीन गणराज्यों के साथ भारत अपने व्यापारिक सम्बन्ध कायम रख पाया।

प्रश्न 34.
सोवियत संघ के विघटन के समय किन दो गणराज्यों में हिंसक अलगाववादी आंदोलन हुए?
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के समय दो पूर्व गणराज्यों

  1. चेचन्या तथा
  2. दागिस्तान में हिंसक अलगाववादी आंदोलन हुए लादना।

प्रश्न 35.
शॉक थैरेपी से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर;
शॉक थैरेपी से आशय है। धीरे-धीरे परिवर्तन न करके एकदम आमूल-चूल परिवर्तन के प्रयत्नों को

प्रश्न 36.
शॉक थैरेपी का कोई एक परिणाम बताइए।
अथवा
‘शॉक थैरेपी’ के परिणामस्वरूप सोवियत खेमे का प्रत्येक राज्य किस अर्थतन्त्र में समाहित हुआ?
उत्तर:
शॉक थैरेपी के परिणामस्वरूप सोवियंत खेमे का प्रत्येक राज्य पूँजीवादी अर्थतन्त्र में समाहित हुआ।

प्रश्न 37.
सोवियत प्रणाली की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  1. सोवियत राजनीतिक प्रणाली की धुरी कम्युनिस्ट पार्टी थी।
  2. अर्थव्यवस्था योजनाबद्ध और राज्य के नियन्त्रण में थी।

प्रश्न 38.
सोवियत प्रणाली के दो गुण बताइये।
उत्तर:

  1. सरकार बुनियादी जरूरत की चीजें रियायती दर पर उपलब्ध कराती थी।
  2. बेरोजगारी नहीं थी।

प्रश्न 39.
सोवियत प्रणाली में आये किन्हीं दो दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. सोवियत प्रणाली पर नौकरशाही का शिकंजा कसता चला गया।
  2. यह प्रणाली सत्तावादी हो गई तथा नागरिकों का जीवन कठिन होता चला गया।

प्रश्न 40.
1991 में सोवियत संघ के कौनसे गणराज्यों ने अपने लिये स्वतन्त्रता की माँग नहीं की?
उत्तर:
मध्य एशियाई गणराज्यों ने सोवियत संघ से अपने लिए स्वतन्त्रता की माँग नहीं की।

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प्रश्न 41.
सोवियत संघ पर हथियारों की होड़ से क्या प्रभाव पड़े?
उत्तर:
हथियारों की होड़ के कारण सोवियत संघ प्रौद्योगिकी और बुनियादी ढांचे (मसलन- परिवहन, मामले में पश्चिमी देशों की तुलना में पीछे रह गया।

प्रश्न 42.
सोवियत संघ से सबसे पहले और कब, किस गणराज्य ने स्वतन्त्रता की घोषणा की?
उत्तर:
मार्च, 1990 में लिथुआनिया ने सबसे पहले सोवियत संघ से स्वतन्त्रता की घोषणा की।

प्रश्न 43.
पूर्व सोवियत संघ से स्वतन्त्र हुए राष्ट्रों ने किस संगठन का निर्माण किया?
उत्तर:
पूर्व सोवियत संघ से स्वतन्त्र हुए राष्ट्रों ने ‘स्वतन्त्र राज्यों के राष्ट्रकुल’ संगठन का निर्माण किया।

प्रश्न 44.
सोवियत संघ के इतिहास की सबसे बड़ी ‘गराज सेल’ कौन सी थी?
अथवा
सोवियत संघ की ‘गराज सेल’ किसे कहा गया है?
उत्तर:
पूर्व सोवियत संघ के सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को अनाप-शनाप कीमतों पर निजी कम्पनियों को बेचने को उसके इतिहास की सबसे बड़ी ‘गराज सेल’ कहा गया।

प्रश्न 45.
मध्य एशियाई गणराज्यों में किस संसाधन का विशाल भंडार है?
उत्तर:
मध्य एशियाई गणराज्यों में हाइड्रोकार्बनिक (पेट्रोलियम) संसाधनों का विशाल भंडार है।

प्रश्न 46.
सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस ने किस तरह की अर्थव्यवस्था को अपनाया?
उत्तर:
उदारवादी अर्थव्यवस्था को।

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प्रश्न 47.
ताजिकिस्तान में हुआ गृह-युद्ध कितने वर्ष तक चलता रहा?
उत्तर:
ताजिकिस्तान में हुआ गृह-युद्ध 1991 से 2001 तक दस वर्षों तक चलता रहा।

प्रश्न 48.
पूर्व सोवियत संघ में कितने गणराज्य तथा स्वायत्तशासी गणराज्य सम्मिलित थे?
उत्तर:
पूर्व सोवियत संघ में 15 गणराज्य तथा 20 स्वायत्त गणराज्य और 18 स्वायत्तशासी गणराज्य सम्मिलित थे।

प्रश्न 49.
ब्लादिमीर लेनिन कौन थे?
उत्तर:
ब्लादिमीर लेनिन रूस में बोल्शेविक पार्टी के संस्थापक, 1917 की रूसी क्रांति के नायक तथा सोवियत संघ के संस्थापक अध्यक्ष थे।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
बर्लिन की दीवार का निर्माण एवं विध्वंस किस प्रकार की ऐतिहासिक घटना कहलाती है?
उत्तर:
शीत युद्ध के उत्कर्ष के चरम दौर में सन् 1961 में बर्लिन की दीवार खड़ी की गई। यह दीवार शीत युद्ध का प्रतीक रही। सन् 1989 में पूर्वी जर्मनी की आम जनता ने इसे गिरा दिया। यह दोनों जर्मनी के एकीकरण, साम्यवादी खेमे की समाप्ति तथा शीत युद्ध की समाप्ति की शुरूआत थी ।

प्रश्न 2.
सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था में गतिरोध क्यों आया?
उत्तर:
सोवियत संघ ने अपने संसाधनों का अधिकांश भाग परमाणु हथियारों के विकास, सैन्य साजो-सामान के निर्माण तथा पूर्वी यूरोप के देशों के विकास पर लगाया इसलिए इसकी राजनीतिक-आर्थिक संस्थाएँ आंतरिक रूप से कमजोर हो गईं। फलतः इसकी अर्थव्यवस्था में गतिरोध आ गया।

प्रश्न 3.
द्वि- ध्रुवीयता से आप क्या समझते हैं? युद्ध के पश्चात्
उत्तर:
द्विध्रुवीयता से आशय है विश्व का दो गुटों में बंटा होना द्वितीय विश्व विश्व पूँजीवादी तथा साम्यवादी दो गुटों में बंट गया पूँजीवादी गुट का नेता अमरीका तथा साम्यवादी गुट का नेता सोवियत संघ था।

प्रश्न 4.
द्वि- ध्रुवीय विश्व के पतन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व सोवियत संघ और अमेरिका के दो गुटों में विभाजित हो गया था। इसलिए इसे द्विध्रुवीय विश्व कहा जाता था। लेकिन 1991 में सोवियत संघ के पतन होने से दूसरे ध्रुव (गुट) का पतन हो गया। इसी को द्वि- ध्रुवीय विश्व का पतन कहा जाता है।

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प्रश्न 5.
शॉक थेरेपी से क्या आशय है?
उत्तर:
शॉक थेरेपी से आशय है कि धीरे-धीरें परिवर्तन न करके एकदम आमूल-चूल परिवर्तन के प्रयत्नों को लादना रूसी गणराज्य में शॉक थैरेपी के अन्तर्गत तुरत-फुरत निजी स्वामित्व, मुक्त व्यापार, वित्तीय खुलापन तथा मुद्राओं की आपसी परिवर्तनीयता पर बल दिया गया

प्रश्न 6.
आपकी राय में शॉक थेरेपी का रूस की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा? ‘शॉक थेरेपी’ से क्या हानि हुई ?
अथवा
उत्तर:

  1. शॉक थेरेपी से रूस में पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गयी;
  2. इससे इस क्षेत्र की जनता को बर्बादी की मार झेलनी पड़ी;
  3. इससे रूस का औद्योगिक ढाँचा चरमरा गया।

प्रश्न 7.
आपकी राय में सोवियत संघ के विघटन के दो मुख्य कारण क्या थे?
अथवा
सोवियत संघ के विघटन का तात्कालिक कारण क्या था ?
उत्तर:

  1. सोवियत संघ के विघटन का पहला कारण उसकी राजनीतिक आर्थिक संस्थाओं की अंदरूनी कमजोरी था।
  2. सोवियत संघ के विघटन का दूसरा और सर्वाधिक तात्कालिक कारण था – विभिन्न गणराज्यों – बाल्टिक गणराज्य, उक्रेन, रूस तथा जार्जिया आदि में राष्ट्रीयता और संप्रभुता के भावों का उभार।

प्रश्न 8.
सोवियत संघ में आम जनता कम्युनिस्ट पार्टी तथा राजनीतिक व्यवस्था तथा शासकों से अलग- थलग क्यों पड़ गयी थी?
उत्तर:
सोवियत संघ में 90 के दशक में कम्युनिस्ट पार्टी जनता के प्रति जवाबदेह नहीं रह गयी थी। गतिरुद्ध प्रशासन, भारी भ्रष्टाचार, शासकों की अक्षमता, खुलापन लाने की अनिच्छा तथा सत्ता के केंन्द्रीकृत होने आदि बातों के कारण आम जनता शासन व शासकों से अलग-थलग पड़ गयी थी।

प्रश्न 9.
सोवियत संघ के विघटन के कोई दो परिणाम स्पष्ट कीजिए।
अथवा
सोवियत संघ के पतन के परिणाम लिखिए।
उत्तर:

  1. सोवियत संघ के पतन के परिणामस्वरूप शीतयुद्ध के दौर का संघर्ष समाप्त हो गया।
  2. सोवियत संघ के पतन के परिणामस्वरूप एकध्रुवीय विश्व का उदय हुआ।
  3. सोवियत संघ के पतन के परिणामस्वरूप अनेक नये देशों को स्वतंत्र पहचान मिली।

प्रश्न 10.
भारत-रूस सम्बन्धों को संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  1. भारत-रूस सम्बन्धों का इतिहास आपसी विश्वास और साझे हितों का इतिहास है।
  2. भारत और रूस दोनों देशों के आपसी सम्बन्ध इन देशों की जनता की अपेक्षाओं से मेल खाते हैं।
  3. दोनों देशों का सपना बहुध्रुवीय विश्व का है।

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प्रश्न 11.
सोवियत प्रणाली का पूर्वी यूरोप या दूसरी दुनिया पर क्या प्रारम्भिक प्रभाव पड़ा था?
उत्तर:
दूसरे विश्व युद्ध के बाद पूर्वी यूरोप के देश सोवियत संघ के अंकुश में आ गये थे। सोवियत सेना ने उन्हें फासीवादी ताकतों के चंगुल से मुक्त कराया था। इन सभी देशों की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को सोवियत संघ की समाजवादी प्रणाली की तर्ज पर ढाला गया।

प्रश्न 12.
जोजेफ स्टालिन का सोवियत संघ के एक महत्त्वपूर्ण नेता के रूप में संक्षिप्त परिचय दीजिए
उत्तर:
जोजेफ स्टालिन – जोजेफ स्टालिन लेनिन के बाद सोवियत संघ के सर्वोच्च नेता और राष्ट्राध्यक्ष बने उन्होंने सोवियत संघ का 1924 से 1953 तक नेतृत्व किया। उनके काल में सोवियत संघ में औद्योगीकरण को बढ़ावा मिला तथा खेती का बलपूर्वक सामूहिकीकरण किया गया। उन्हीं के काल में शीतयुद्ध का प्रारम्भ हुआ।

प्रश्न 13.
निकिता ख्रुश्चेव का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
निकिता ख्रुश्चेव निकिता ख्रुश्चेव स्टालिन के बाद सन् 1953 में सोवियत संघ के राष्ट्रपति बने और 1964 तक वे इस पद पर बने रहे। उन्होंने पश्चिम के साथ ‘शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व’ का सुझाव रखा तथा हंगरी के जन- विद्रोह का दमन किया।

प्रश्न 14.
लिओनिद ब्रेझनेव का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
लिओनिद ब्रेझनेव लिओनिद ब्रेझनेव सन् 1964 से 1982 तक सोवियत संघ के राष्ट्रपति रहे थे। उन्होंने एशिया की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था का सुझाव दिया था। वे सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच सम्बन्ध सुधारने तथा पारस्परिक तनाव में कमी लाने के लिए प्रयत्नशील रहे।

प्रश्न 15.
मिखाइल गोर्बाचेव पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
मिखाइल गोर्बाचेव मिखाइल गोर्बाचेव सोवियत संघ के अन्तिम राष्ट्रपति (1985 से 1991 तक) थे। उन्होंने सोवियत संघ में पेरेस्त्रोइका (पुनर्रचना) और ग्लासनोस्त ( खुलेपन) के आर्थिक और राजनैतिक सुधार शुरू किये। उन्होंने शीतयुद्ध समाप्त किया।

प्रश्न 16.
बोरिस येल्तसिन का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
बोरिस येल्तसिन सोवियत संघ के विघटन के बाद बोरिस येल्तसिन रूस के प्रथम चुने हुए राष्ट्रपति बने । इस पद पर उन्होंने 1991 से 1999 तक कार्य किया। सन् 1991 में सोवियत संघ के शासन के विरुद्ध उठे विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व करते हुए उन्होंने सोवियत संघ के विघटन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी

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प्रश्न 17.
चेकोस्लोवाकिया के विघटन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
सोवियत संघ के साम्यवादी गठबंधन से मुक्त होकर लोकतंत्रीय आंदोलन में चेकोस्लोवाकिया में राष्ट्रवादी ज्वार उठा और चेकोस्लोवाकिया शांतिपूर्ण ढंग से चेक और स्लोवाकिया नामक दो देशों में विभाजित हो गया। चेकोस्लोवाकिया इन्हीं दो राष्ट्रीयताओं से मिलकर बना था।

प्रश्न 18.
यूगोस्लाविया का विघटन किस प्रकार हुआ ?
उत्तर:
यूगोस्लाविया में गहन जातीय संघर्ष हुआ और सन् 1991 में यूगोस्लाविया कई प्रान्तों में विभाजित हो गया। यूगोस्लाविया में शामिल बोस्निया हर्जेगोविना, स्लोवेनिया तथा क्रोएशिया ने अपने को स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया ।

प्रश्न 19.
सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् स्वतंत्र हुए 15 गणराज्यों के नाम लिखिये।
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् स्वतंत्र हुए 15 गणराज्य ये हैं।
रूसी संघ, कजाकिस्तान, एस्टोनिया, लताविया, लिथुआनिया, बेलारूस, उक्रेन, माल्दोवा, आर्मेनिया, जार्जिया, अजरबैजान, तुर्कमेनिस्तान,  उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान।

प्रश्न 20.
शीत युद्ध के दौरान भारत व सोवियत संघ के बीच आर्थिक सम्बन्धों की विवेचना कीजिए
उत्तर:
शीत युद्ध के दौरान भारत व सोवियत संघ के बीच आर्थिक सम्बन्ध घनिष्ठ थे। यथा

  1. सोवियत संघ ने भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों को ऐसे वक्त में आर्थिक और तकनीकी मदद की जब ऐसी मदद पाना मुश्किल था।
  2. भारत में जब विदेशी मुद्रा की कमी थी तब उसने रुपये में भारत के साथ व्यापार किया।

प्रश्न 21.
सोवियत संघ के प्रति राष्ट्रवादी असन्तोष यूरोपीय और अपेक्षाकृत समृद्ध गणराज्यों में सबसे प्रबल क्यों रहा?
उत्तर:
सोवियत संघ के प्रति राष्ट्रवादी असन्तोष यूरोपीय और अपेक्षाकृत समृद्ध गणराज्यों रूस, उक्रेन, जार्जिया और बाल्टिक क्षेत्र में सबसे प्रबल रहा क्योंकि-

  1. यहाँ के आम लोग अपने को मध्य एशियाई गणराज्यों के लोगों से अलग-थलग महसूस कर रहे थे।
  2. यहाँ के लोगों में यह भाव घर कर गया था कि ज्यादा पिछड़े इलाकों को सोवियत संघ में शामिल रखने की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।

प्रश्न 22.
सोवियत संघ के विघटन का तात्कालिक कारण क्या रहा तथा इसके पीछे निहित कारणों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन का अन्तिम और तात्कालिक कारण था राष्ट्रवादी भावनाओं और सम्प्रभुता की इच्छा का उभार। सोवियत संघ के विभिन्न गणराज्य सोवियत संघ से स्वतन्त्र होकर अपना पृथक् सम्प्रभु राज्य के निर्माण करने को आन्दोलनरत हुए। राष्ट्रीयता और सम्प्रभुता के ज्वार के उठने के अनेक कारण बताये जाते हैं-

  1. सोवियत संघ के आकार, विविधता तथा उसकी बढ़ती हुई आन्तरिक समस्याओं ने लोगों को इस ओर सोचने को प्रेरित किया।
  2. गोर्बाचेव के सुधारों ने राष्ट्रवादियों के असन्तोष को इस सीमा तक भड़काया कि उस पर शासकों का नियन्त्रण नहीं रहा ।
  3. यूरोपीय तथा बाल्टिक गणराज्यों में यह भाव घर कर गया था कि ज्यादा पिछड़े इलाकों को सोवियत संघ में शामिल रखने की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।

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प्रश्न 23.
सोवियत प्रणाली क्या थी?
अथवा
सोवियत प्रणाली की विशेषताओं का उल्लेख कीजिये ।
उत्तर:
समाजवादी सोवियत गणराज्य (यू.एस.एस.आर.) रूस में हुई 1917 की समाजवादी क्रान्ति के बाद अस्तित्व में आया। सोवियत प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ ये थीं

  1. सोवियत राजनीतिक प्रणाली की धुरी कम्युनिस्ट पार्टी थी। इसमें किसी अन्य राजनीतिक दल या विपक्ष के लिए जगह नहीं थी।
  2. सोवियत आर्थिक प्रणाली योजनाबद्ध और राज्य के नियन्त्रण में थी, सम्पत्ति पर राज्य का स्वामित्व व नियन्त्रण था।
  3. सोवियत संघ की संचार प्रणाली बहुत उन्नत थी।
  4. उसके पास विशाल ऊर्जा संसाधन था, घरेलू उपभोक्ता उद्योग भी बहुत उन्नत था । सरकार ने अपने सभी नागरिकों के लिए न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित कर दिया था । बेरोजगारी नहीं थी ।

प्रश्न 24.
सोवियत संघ के विघटन में गोर्बाचेव की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन में गोर्बाचेव की भूमिका – सोवियत संघ के विघटन का एक प्रमुख कारण गोर्बाचेव की सुधारवादी नीतियाँ भी रही थीं। गोर्बाचेव ने देश में स्वतंत्रता, समानता, राष्ट्रीयता और भ्रातृत्व व एकता के वातावरण को तैयार किए बिना ही पुनर्गठन (पेरेस्त्रोइका) व खुलापन ( ग्लासनोस्त) जैसी नीतियों को लागू कर दिया। परिणामस्वरूप सोवियत संघ के कुछ राष्ट्रों को संघ से अलग होने के निर्णय को मान्यता देनी पड़ी। तत्पश्चात् एक के बाद एक सभी गणराज्य : स्वतंत्र होते चले गये और देखते ही देखते सोवियत संघ का विघटन हो गया।

प्रश्न 25.
सोवियत प्रणाली की किन्हीं चार कमियों का वर्णन कीजिए।
अथवा
सोवियत प्रणाली के प्रमुख दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
सोवियत प्रणाली में निम्नलिखित प्रमुख दोषों ने अपनी पैठ बना ली थी, जिसके कारण सोवियत अर्थव्यवस्था ठहर गयी थी। यथा

  1. सोवियत प्रणाली पर नौकरशाही का शिकंजा कसता चला गया। यह प्रणाली सत्तावादी होती गई और नागरिकों का जीवन कठिन होता चला गया।
  2. सोवियत संघ में कम्युनिस्ट पार्टी के शासन का सभी संस्थाओं पर गहरा अंकुश था। यह दल जनता के प्रति जवाबदेह नहीं था।
  3. संघ के 15 गणराज्यों में रूस का हर मामले में प्रभुत्व था । अन्य गणराज्यों की जनता अक्सर उपेक्षित और दमित महसूस करती थी।
  4. उत्पादकता और प्रौद्योगिकी के मामले में सोवियत संघ पश्चिम के देशों से बहुत पीछे रह गया था। इससे हर तरह की उपभोक्ता वस्तुओं की कमी हो गई थी।

प्रश्न 26.
स्पष्ट कीजिए कि पूर्व सोवियत संघ के अधिकांश गणराज्य संघर्ष व संघर्ष की आशंका से ग्रस्त रहे हैं।
उत्तर:
पूर्व सोवियत संघ के अधिकांश गणराज्य संघर्षों से ग्रस्त रहे हैं। यथा

  1. रूस के दो गणराज्यों चेचन्या और दागिस्तान में हिंसक अलगाववादी आन्दोलन चले।
  2. ताजिकिस्तान दस वर्षों तक अर्थात् 2001 तक गृहयुद्धों की चपेट में रहा।
  3. अजरबैजान का एक प्रान्त नगरनो कराबाख है। यहाँ के कुछ स्थानीय अर्मेनियाई अलग होकर आर्मेनिया से मिलना चाहते हैं।
  4. जार्जिया में दो प्रान्त स्वतन्त्रता चाहते हैं और गृहयुद्ध लड़ रहे हैं।
  5. युक्रेन, किरगिझस्तान तथा जार्जिया में मौजूदा शासन को उखाड़ फेंकने के लिए आन्दोलन चल रहे हैं।
  6. कई देश और प्रान्त नदी – जल के प्रश्न पर आपस में भिड़े हुए हैं।

प्रश्न 27.
मध्य एशियाई गणराज्यों में बाहरी ताकतों की बढ़ती दखल की स्थिति को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मध्य एशियाई गणराज्यों में पेट्रोलियम संसाधनों का विशाल भण्डार है। इसी कारण से यह क्षेत्र बाहरी ताकतों और तेल कम्पनियों की आपसी प्रतिस्पर्द्धा का अखाड़ा भी बन गया है। यथा

  1. यह क्षेत्र रूस, चीन और अफगानिस्तान से सटा है और पश्चिम एशिया के नजदीक है।
  2. अमरीका इस क्षेत्र में सैनिक ठिकाना बनाना चाहता है।
  3. रूस इन राज्यों को अपना निकटवर्ती ‘विदेश’ मानता है और उसका मानना है कि इन राज्यों को रूस के प्रभाव में रहना चाहिए।
  4. खनिज तेल जैसे संसाधन की मौजूदगी के कारण चीन के हित भी इस क्षेत्र से जुड़े हैं और चीनियों ने सीमावर्ती क्षेत्रों में आकर व्यापार करना शुरू कर दिया है।

प्रश्न 28.
मिखाइल गोर्बाचेव सोवियत प्रणाली में सुधार क्यों लाना चाहते थे?
अथवा
किन कारणों ने गोर्बाचेव को सोवियत संघ में सुधार करने के लिए बाध्य किया?
उत्तर:
मिखाइल गोर्बाचेव सोवियत प्रणाली में निम्नलिखित कारणों की वजह से सुधार लाना चाहते थे-

  1. सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था पश्चिमी देशों की तुलना में काफी पिछड़ गई थी; अर्थव्यवस्था में गतिरोध पैदा होने की वजह से देश में उपभोक्ता वस्तुओं की भारी कमी उत्पन्न हो रही थी। सोवियत संघ को उत्पादकता और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पाश्चात्य देशों की बराबरी करने के लिए गोर्बाचेव सोवियत प्रणाली में सुधार लाना चाहते थे।
  2. सोवियत संघ के अधिकांश गणराज्य समाजवादी शासन से ऊब गये थे और वे विद्रोह करने पर आमादा हो गये थे।
  3. गोर्बाचेव ने पश्चिम के देशों के साथ संबंधों को सामान्य बनाने तथा सोवियत संघ को लोकतांत्रिक रूप देने के लिए वहां सुधार करने का फैसला किया।

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प्रश्न 29.
द्वि- ध्रुवीकरण से क्या आशय है?
उत्तर:
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में दो महाशक्तियाँ उभर कर आयीं। ये थीं-

  1. संयुक्त राज्य अमेरिका और
  2. सोवियत संघ। दोनों ने अपने प्रभाव क्षेत्र में विस्तार करने के लिए प्रयास किये; इससे उनके मध्य शीत युद्ध प्रारम्भ हो गया। इस शीत युद्ध ने यूरोप को अमेरिकी खेमे और साम्यवादी खेमे में बाँट दिया। सन्धियों व प्रतिसन्धियों ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में विश्व को परस्पर दो विरोधी खेमों में बाँट दिया, जिसमें प्रत्येक का नेतृत्व एक महाशक्ति द्वारा किया जा रहा था । इसी अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था को द्वि- ध्रुवीकरण कहा गया।

प्रश्न 30.
“भारत का उज्बेकिस्तान से मजबूत सांस्कृतिक संबंध है इसका उदाहरण यह है कि इस देश में हिन्दुस्तानी फिल्मों की धूम रहती है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
उज्बेकिस्तान तथा भारत में अच्छे तथा मजबूत सांस्कृतिक संबंध है। इसका प्रमाण हमें फिल्मों द्वारा मिलता है। सोवियत संघ को विघटित हुए सात साल बीत गए लेकिन हिन्दी फिल्मों के लिए उज्बेक लोगों में वही ललक मौजूद है। हिन्दुस्तान में कोई नई फिल्म रिलीज होने के चंद हफ्तों के भीतर इसकी पाइरेटेड कॉपियाँ उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में बिकने के लिए उपलब्ध हो जाती है । उज्बेक लोग मध्य एशियाई हैं, वे एशिया के अंग हैं। उनकी एक साझी संस्कृति है। यहाँ अधिकांश लोग – हिन्दी गा लेते हैं। अर्थ चाहे न मालूम हो लेकिन उसका उच्चारण सही होता है और वे संगीत भी पकड़ लेते हैं। भारतीय फिल्मों और उनके ‘हीरो’ के लिए उज्बेकी लोगों की दीवानगी उज्बेकिस्तानवासी अनेक भारतीयों को आश्चर्यजनक जान पड़ती है।

प्रश्न 31.
द्वि- ध्रुवीय विश्व के पतन के कोई चार कारण लिखिए।
उत्तर:
द्विध्रुवीय विश्व के पतन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  1. अमेरिकी गुट में फूट – द्वि- ध्रुवीय विश्व के पतन का एक प्रमुख कारण अमेरिकी गुट में फूट पड़ना था। फ्रांस जैसा देश अमेरिका पर अविश्वास करने लगा था।
  2. सोवियत गुट में फूट – सोवियत गुट से पूर्वी यूरोपीय देशों तथा चीन का अलग होना सोवियत खेमे को कमजोर कर गया।
  3. सोवियत संघ का पतन – द्विध्रुवीय विश्व के पतन का अन्तिम प्रभावी कारण सोवियत संघ का पतन रहा।
  4. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन – गुटनिरपेक्ष आन्दोलन ने अधिकांश विकासशील देशों को दोनों गुटों से अलग रखने में सफलता पायी। इससे द्विध्रुवीय विश्व को झटका लगा।

प्रश्न 32.
सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप की समाजवादी व्यवस्था की दूसरी दुनिया के विघटन के परिणाम विश्व राजनीति के लिहाज से गंभीर रहे – स्पष्ट कीजिये।
अथवा
सोवियत संघ तथा पूर्वी यूरोप की समाजवादी व्यवस्था के विघटन के विश्व राजनीति में क्या परिणाम निकले?
उत्तर:
पूर्वी यूरोप की समाजवादी व्यवस्था तथा सोवियत संघ के विघटन के परिणाम विश्व राजनीति के लिहाज से गंभीर रहे। इसके निम्न परिणाम रहे

  1. दूसरी दुनिया के पतन का एक परिणाम शीत युद्ध के दौर के संघर्ष की समाप्ति में हुआ। शीत युद्ध के समाप्त होने से हथियारों की होड़ भी समाप्त हो गई और एक नई शांति की संभावना का जन्म हुआ।
  2. दूसरी दुनिया के पतन से विश्व राजनीति में शक्ति-संबंध बदल गए और इस कारण विचारों और संस्थाओं के आपेक्षिक प्रभाव में भी बदलाव आया।
  3. सोवियत संघ के पतन के बाद अमरीका अकेली महाशक्ति बन कर उभरा और एक- ध्रुवीय विश्व राजनीति सामने आयी।
  4. सोवियत खेमे के अन्त से अनेक नये देशों का उदय हुआ। इन देशों ने रूस के साथ अपने मजबूत रिश्ते को जारी रखते हुए पश्चिमी देशों के साथ सम्बन्ध बढ़ाये।

प्रश्न 33.
मान लीजिए सोवियत संघ का विघटन नहीं हुआ होता तथा विश्व 1980 के मध्य की तरह द्वि- ध्रुवीय होता, तो यह अन्तिम दो दशकों के विकास को किस प्रकार प्रभावित करता? इस प्रकार के विश्व के तीन क्षेत्रों या प्रभाव तथा विकास का वर्णन करें, जो नहीं हुआ होता?
उत्तर:
1991 में यदि सोवियत संघ का पतन नहीं हुआ होता तो ये अन्तिम दोनों दशक भी शीत युद्ध की राजनीति से प्रभावित रहते और विश्व में निम्नलिखित प्रभाव होते-

  1. एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था की स्थापना नहीं होती – यदि सोवियत संघ का पतन नहीं हुआ होता तो विश्व राजनीति में एक ही महाशक्ति अमरीका का यह वर्चस्व नहीं होता।
  2. अफगानिस्तान तथा इराक देशों की स्थिति में परिवर्तन- यदि सोवियत संघ का पतन न हुआ होता तो अफगानिस्तान और इराक में सोवियत संघ अमेरिका का विरोध करता और युद्ध का विरोध करता।
  3. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थिति में परिवर्तन – यदि सोवियत संघ का पतन नहीं होता तो संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका की मनमानी नहीं चलती और संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रभावशीलता समाप्त नहीं होती।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत

प्रश्न 34.
रूस और भारत दोनों का सपना बहुध्रुवीय विश्व का है। संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
रूस और भारत दोनों का सपना बहुध्रुवीय विश्व का है। बहुध्रुवीय विश्व से इन दोनों देशों का आशय यह है कि अन्तर्राष्ट्रीय फलक पर कई शक्तियाँ मौजूद हों, सुरक्षा की सामूहिक जिम्मेदारी हो (यानी किसी भी देश पर हमला हो तो सभी देश उसे अपने लिए खतरा माने और साथ मिलकर कार्रवाई करें ); क्षेत्रीयताओं का ज्यादा जगह मिले; अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों का समाधान बातचीत के द्वारा हो; हर देश की स्वतन्त्रता विदेश नीति हो और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं द्वारा फैसले किए जाएँ तथा इन संस्थाओं को मजबूत, लोकतांत्रिक और शक्तिसंपन्न बनाया जाए।

प्रश्न 35.
शीतयुद्ध के दौरान भारत और सोवियत संघ के राजनीतिक संबंध पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
शीतयुद्ध के दौरान सोवियत संघ ने कश्मीर मामले पर संयुक्त राष्ट्रसंघ में भारत के रूख को समर्थन दिया । सोवियत संघ ने भारत के संघर्ष के गाढ़े दिनों, खासकर सन् 1971 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान मदद की। भारत ने भी सोवियत संघ की विदेश नीति का अप्रत्यक्ष, लेकिन महत्त्वपूर्ण तरीके से समर्थन किया।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सोवियत संघ के विघटन के प्रमुख कारण स्पष्ट कीजिए । सोवियत संघ के विघटन के कारण
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-
1. राजनीतिक:
आर्थिक संस्थाओं की अंदरूनी कमजोरी- सोवियत संघ की राजनीतिक-आर्थिक संस्थाएँ अंदरूनी कमजोरी के कारण लोगों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकीं। कई सालों तक उसकी अर्थव्यवस्था गतिरुद्ध रही इससे उपभोक्ता वस्तुओं की बड़ी कमी हो गई और सोवियत संघ की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपनी राज व्यवस्था को शक की नजर से देखने लगा, उस पर खुले आम सवाल खड़े करने शुरू किये।

2. लोगों को अपने पिछड़ेपन की पहचान होना:
जब पश्चिमी देशों की प्रगति और अपने पिछड़ेपन के बारे में सोवियत संघ के आम नागरिकों की जानकारी बढ़ी तो इससे सोवियत संघ के लोगों को राजनीतिक मनोवैज्ञानिक रूप से धक्का लगा।

3. प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से गतिरुद्धता:
सोवियत संघ की प्रशासनिक गतिरुद्धता, पार्टी का जनता के प्रति जवाबदेह न रह जाना, भारी भ्रष्टाचार, शासन में ज्यादा खुलापन लाने की अनिच्छा तथा सत्ता का केन्द्रीकृत रूप आदि के कारण सरकार का जनाधार खिसकता चला गया।

4. गोर्बाचेव के समर्थन की समाप्ति:
जनता का एक तबका सुधारों की धीमी गति के कारण गोर्बाचेव से नाराज हो गया, तो सुविधाभोगी वर्ग उसके सुधारों की तीव्र गति से नाराज हो गया। इस प्रकार सुधारों के कारण गोर्बाचेव का समर्थन चारों तरफ से समाप्त हो गया।
(5) राष्ट्रवादी भावनाओं और संप्रभुता का ज्वार – बाल्टिक गणराज्य, उक्रेन, जार्जिया जैसे गणराज्यों में राष्ट्रीयता और संप्रभुता के भावों का उभार सोवियत संघ के विघटन का अंतिम और तात्कालिक कारण सिद्ध हुआ।

प्रश्न 2.
सोवियत प्रणाली से आप क्या समझते हैं? विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सोवियत प्रणाली का अर्थ समाजवादी सोवियत गणराज्य 1917 की समाजवादी क्रांति के बाद अस्तित्व में आया। उसने समाजवाद के आदर्शों एवं समतामूलक समाज की जरूरतों को पूरा करने के लिए निजी संपत्ति की संस्था को समाप्त करने और समाज को समानता के सिद्धान्त पर रचने की जो कोशिश की, उसे ही सोवियत प्रणाली कहा गया। इसमें राज्य और पार्टी की संस्था को प्राथमिक महत्त्व दिया गया। इसकी धुरी कम्युनिस्ट पार्टी थी। अर्थव्यवस्था योजनाबद्ध और राज्य के नियंत्रण में थी। विशेषताएँ – सोवियत प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

  1. समाजवादी खेमे की स्थापना: दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ के नेतृत्व में पूर्वी यूरोप के देशों की राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था को सोवियत प्रणाली की तर्ज पर ढाला गया। इस खेमे का नेता समाजवादी सोवियत गणराज्य था।
  2. राज्य का स्वामित्व तथा नियंत्रण:  सोवियत प्रणाली में सम्पत्ति का प्रमुख रूप राज्य का स्वामित्व था तथा भूमि और अन्य उत्पादक संपदाओं पर स्वामित्व होने के अलावा नियंत्रण भी राज्य का ही था।
  3. सत्तावादी प्रणाली: सोवियत प्रणाली पर नौकरशाही का शिकंजा कसता चला गया और यह प्रणाली सत्तावादी हो गयी। लोगों को लोकतंत्र तथा अभिव्यक्ति की आजादी नहीं थी।
  4. कम्युनिस्ट पार्टी का शासन:  सोवियत प्रणाली में एक दल यानी कम्युनिस्ट पार्टी का शासन था और इस दल का सभी संस्थाओं पर गहरा अंकुश था। यह दल जनता के प्रति जवाबदेह नहीं था।
  5. रूसी गणराज्य का प्रभुत्व: हालांकि सोवियत संघ के नक्शे में रूस, संघ के 15 गणराज्यों में से एक था लेकिन वास्तव में रूस का हर मामले में प्रभुत्व था।

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प्रश्न 3.
सोवियत संघ के विघटन के कारणों व परिणामों का वर्णन करें।
अथवा
सोवियत संघ का विघटन क्यों हुआ? इस विघटन के परिणाम बताइए।
अथवा
सोवियत संघ के विघटन ( पतन) के उत्तरदायी कारकों का विवेचन कीजिए । सोवियत संघ के पतन के उत्तरदायी कारक
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन या पतन के प्रमुख उत्तरदायी कारक निम्नलिखित थे-

  1. सोवियत संघ की राजनीतिक-आर्थिक संस्थाएँ अपनी आन्तरिक कमजोरियों के कारण लोगों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकीं।
  2. सोवियत संघ ने अपने संसाधन परमाणु हथियार, सैन्य साजो-सामान तथा पूर्वी यूरोप के अन्य पिछलग्गू देशों के विकास पर भी खर्च किए ताकि वे सोवियत नियन्त्रण में बने रहें इससे सोवियत संघ पर गहरा आर्थिक दबाव बना और सोवियत व्यवस्था इसका सामना नहीं कर सकी।
  3. सोवियत संघ के पिछड़ेपन की पहचान से वहां के लोगों को राजनीतिक – मनोवैज्ञानिक रूप से धक्का लगा।
  4. कम्युनिस्ट पार्टी जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं रह गयी थी।
  5. गोर्बाचेव ने देश में स्वतन्त्रता, समानता और राष्ट्रीयता व भ्रातृत्व व एकता के वातावरण को तैयार किए बिना ही पुनर्गठन (पेरेस्त्रोइका) व खुलापन ( ग्लासनोस्त) जैसी महत्त्वपूर्ण नीतियों को लागू कर दिया था

सोवियत संघ के विघटन के परिणाम – विश्व राजनीति पर सोवियत संघ के विघटन के गम्भीर परिणाम रहे हैं 1

  1. सोवियत संघ के विघटन के परिणामस्वरूप शीत युद्ध समाप्त हो गया तथा हथियारों की दौड़ भी समाप्त हो गई।
  2. अब संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति बन गया तथा विश्व पर उसका वर्चस्व स्थापित हो गया।
  3. अब पूँजीवादी अर्थव्यवस्था अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभुत्वशाली अर्थव्यवस्था बन गई तथा तृतीय विश्व में साम्यवादी विचारधारा का प्रचार- प्रसार रुक गया।
  4. सोवियत संघ के विघटन के परिणामस्वरूप विश्व में 15 स्वतन्त्र और सम्प्रभु राज्यों की संख्या में बढ़ोतरी हुई।
  5. तृतीय विश्व को अब नए उपनिवेशवाद के खतरे का सामना करना पड़ रहा है तथा मध्य-पूर्व के तेल भण्डारों पर अमरीका ने अपना एकछत्र प्रभुत्व स्थापित कर लिया है।

प्रश्न 4.
मिखाइल गोर्बाचेव द्वारा किये गये सुधारों से सोवियत संघ का विघटन किस प्रकार हुआ? समझाइये गोर्बाचेव और सोवियत संघ का विघटन
उत्तर:
मिखाइल गोर्बाचेव 1980 के दशक के मध्य में सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पद पर आसीन हुए। इस समय सोवियत संघ आर्थिक, प्रशासनिक तथा राजनीतिक रूप से गतिरुद्ध हो चुका था। गोर्बाचेव ने अर्थव्यवस्था को सुधारने, पश्चिम की बराबरी पर लाने और प्रशासनिक ढांचे में ढील देने के लिए सुधारों को लागू किया। लेकिन इन सुधारों से सोवियत संघ का विघटन हो गया। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित रहे

  1. लोगों की आकांक्षाओं पर ज्वार उमड़ना: जब गोर्बाचेव ने सुधारों को लागू किया और अर्थव्यवस्था में ढील दी तो लोगों की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं का ऐसा ज्वार उमड़ा कि उस पर काबू पाना असंभव हो गया।
  2. राष्ट्रवादी भावनाओं और संप्रभुता की इच्छा का उभार: सोवियत संघ के विभिन्न गणराज्यों में राष्ट्रवादी भावना और संप्रभुता का उभार उठा। राष्ट्रीयता और संप्रभुता के भावों का उभार सोवियत संघ के विघटन का अंतिम और सर्वाधिक तात्कालिक कारण सिद्ध हुआ।
  3. राष्ट्रवादियों का असंतुष्ट होना- कुछ लोगों का मत है कि गोर्बाचेव के सुधारों ने राष्ट्रवादियों के असंतोष को इस सीमा तक भड़काया कि उस पर शासकों का नियंत्रण नहीं रहा।

प्रश्न 5.
शीत युद्ध के दौरान भारत तथा सोवियत संघ सम्बन्धों का वर्णन कीजिए।
अथवा
शीत युद्ध के दौरान पूर्ववर्ती सोवियत संघ के साथ भारत के सम्बन्धों का परीक्षण कीजिए।
उत्तर:
भारत और सोवियत संघ सम्बन्ध
शीत युद्ध के दौरान भारत और सोवियत संघ के सम्बन्ध बहुआयामी थे। यथा-
1. आर्थिक सम्बन्ध:
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में सोवियत संघ भारत का सबसे बड़ा साझीदार था। इस व्यापार का सालाना कारोबार दो हजार करोड़ रुपये से ऊपर पहुँच गया था। सोवियत संघ ने भारत के सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों की ऐसे वक्त में मदद की जब ऐसी मदद पाना मुश्किल था। भारत में जब विदेशी मुद्रा की कमी थी तब सोवियत संघ ने रुपये को माध्यम बनाकर भारत के साथ व्यापार किया।

2. राजनीतिक सम्बन्ध:
सोवियत संघ ने कश्मीर मामले पर संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के दृष्टिकोण को समर्थन दिया। सोवियत संघ ने भारत को सन् 1971 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान सहायता की। भारत ने भी सोवियत संघ की विदेश नीति का अप्रत्यक्ष, लेकिन महत्त्वपूर्ण तरीके से समर्थन किया।

3. भारत:
सोवियत सैन्य सम्बन्ध – शीत युद्ध काल में सैनिक साजो-सामान के आयात व उत्पादन के मामले में भारत सोवियत संघ पर काफी निर्भर रहा सोवियत संघ ने भारत को सैनिक सामान के सम्बन्ध में पूर्ण मदद की। उसने भारत के साथ ऐसे कई समझौते किये जिससे भारत संयुक्त रूप से सैन्य उपकरण तैयार कर सका।

4. भारत:
सोवियत सांस्कृतिक सम्बन्ध – प्रारम्भ से ही भारत व सोवियत संघ का यह प्रयत्न रहा है कि आर्थिक व सामरिक परिप्रेक्ष्य में सम्बन्धों को सांस्कृतिक आदान-प्रदान का जामा पहनाया जाए। यही कारण है कि हिन्दी फिल्म तथा भारतीय संस्कृति सोवियत संघ में काफी लोकप्रिय रहीं।

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प्रश्न 6.
शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद भारत-रूस तथा पूर्व साम्यवादी गणराज्य के सम्बन्धों का विवरण दीजिये।
उत्तर:
भारत और रूस सम्बन्ध शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भारत-रूस सम्बन्धों को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है।

  • दोनों देशों की जनता की अपेक्षाओं में समानता: भारत-रूस के आपसी सम्बन्ध इन देशों की जनता की अपेक्षाओं से मेल खाते हैं। हम वहाँ हिन्दी फिल्मों के गीत बजते सुन सकते हैं। भारत यहाँ के जनमानस का एक अंग है।
  • बहुध्रुवीय विश्व पर दोनों देशों का समान दृष्टिकोण: रूस और भारत दोनों का सपना बहुध्रुवीय विश्व का है। बहुध्रुवीय विश्व से इन दोनों का आशय यह है कि अन्तर्राष्ट्रीय फलक पर कई शक्तियाँ विद्यमान हों; सुरक्षा की सामूहिक जिम्मेदारी की व्यवस्था हो; क्षेत्रीयताओं को ज्यादा जगह मिले; अन्तर्राष्ट्रीय संघर्षों का समाधान बातचीत के द्वारा हो, हर देश की स्वतंत्र विदेश नीति हो और संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं द्वारा फैसले किये जाएं तथा इन संस्थओं को मजबूत, लोकतांत्रिक और शक्ति – सम्पन्न बनाया जाये।
  • विभिन्न मुद्दों व विषयों में परस्पर सहयोग:
    1. कश्मीर समस्या, ऊर्जा – आपूर्ति तथा अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के दृष्टिकोणों में समानता रही है।
    2. भारतीय सेनाओं को अधिकांश सैनिक साजो-सामान रूस से प्राप्त होते हैं तथा भारत रूस के लिए हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा खरीददार है।
    3. रूस ने तेल के संकट के समय हमेशा भारत की मदद की है तथा रूस के लिए भारत तेल के आयातक देशों में एक प्रमुख देश है।

भारत और पूर्व – साम्यवादी गणराज्यों के साथ सम्बन्ध: भारत कजाकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान गणराज्यों के साथ पारस्परिक सहयोग की परम्परागत नीति का पालन कर रहा है। इन गणराज्यों के साथ सहयोग के अन्तर्गत तेल वाले इलाकों में साझेदारी और निवेश करना भी शामिल है।

प्रश्न 7.
सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस की विश्व परिदृश्य पर भूमिका का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस की विश्व राजनीति में भूमिका सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस की विश्व परिदृश्य में भूमिका का विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है।

  • रूस तथा राष्ट्रकुल: सोवियत संघ के सभी गणराज्यों ने संयुक्त राष्ट्र संघ में सोवियत संघ का स्थान रूसी गणराज्य को दिये जाने की सिफारिश की।
  • रूस तथा विश्व के अन्य राष्ट्रों से सम्बन्ध:  सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस के अमरीका व विश्व के अन्य प्रमुख राष्ट्रों के बीच सम्बन्धों को निम्न प्रकार रेखांकित किया जा सकता है।
    1. रूस संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है।
    2. रूस ने अब अमरीका व यूरोपीय देशों के साथ घनिष्ठ आर्थिक सम्बन्ध स्थापित किये हैं।
    3. परस्पर एक-दूसरे के देशों की यात्राओं व समझौतों के द्वारा रूस चीन की निकटता बढ़ी है।
    4. रूस और जापान के सम्बन्धों में भी निकटता आयी है।

इस प्रकार विभिन्न प्रमुख देशों से संबंध सुधार कर रूस पुनः विश्व राजनीति में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

3. विश्व राजनीति में गौण भूमिका:
रूस (सोवियत संघ के विघटन के बाद) वर्तमान में एक महाशक्ति नहीं रहा है, यद्यपि उसके पास अणु-परमाणु अस्त्रों-प्रक्षेपास्त्रों का भण्डार है लेकिन आर्थिक दृष्टि से उसकी अर्थव्यवस्था जर्जर है। वर्तमान में दूसरे देशों की भूमि पर उनकी उपस्थिति घट गई है। अब वह घटनाओं को अपनी इच्छानुसार मोड़ नहीं दे सकता। इसी तरह अब वह अपने पुराने मित्रों की सहायता करने में सक्षम नहीं रहा है। सुरक्षा परिषद् में अब वह अमेरिका का विरोध कर सकने की स्थिति में नहीं रह गया है।

प्रश्न 8.
सोवियत खेमे के विघटन के घटना चक्र पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
सोवियत खेमे के विघटन का घटना चक्र सोवियत संघ नीति साम्यवादी गुट के विघटन की प्रक्रिया को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है।

  1. मार्च, 1985 में गोर्बाचेव सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव चुने गए। बोरिस येल्तसिन को रूस की कम्युनिस्ट पार्टी का प्रमुख बनाया। उन्होंने सोवियत संघ में सुधारों की श्रृंखला प्रारम्भ कर दी।
  2. 1988 में लिथुआनिया में आजादी के लिए आन्दोलन शुरू हुए। यह आंदोलन एस्टोनिया और लताविया में भी फैला।
  3. अक्टूबर, 1989 में सोवियत संघ ने घोषणा कर दिया कि ‘वारसा समझौते’ के सदस्य अपना भविष्य तय करने के लिए स्वतंत्र है। नवंबर में बर्लिन की दीवार गिरी।
  4. फरवरी, 1990 में गोर्बाचेव ने सोवियत संसद ड्यूमा के चुनाव के लिए बहुदलीय राजनीति की शुरुआत की। सोवियत सत्ता पर कम्युनिस्ट पार्टी का 72 वर्ष पुराना एकाधिकार समाप्त।
  5. जून, 1990 में रूसी संसद ने सोवियत संघ से अपनी स्वतंत्रता घोषित की।
  6. मार्च, 1990 में लिथुआनिया स्वतंत्रता की घेषणा करने वाला पहला सोवियत गणराज्य बना।
  7. जून, 1991 में येल्तसिन का कम्युनिस्ट पार्टी से इस्तीफा दे दिया और रूस के राष्ट्रपति बने।
  8. अगस्त, 1991 में कम्युनिस्ट पार्टी के गरमपंथियों ने गोर्बाचेव के खिलाफ एक असफल तख्तापलट किया।
  9. एस्टोनिया, लताविया और लिथुआनिया तीनों बाल्टिक गणराज्य सितंबर, 1991 में संयुक्त राष्ट्रसंघ के सदस्य बने।
  10. दिसंबर, 1991 में रूस, बेलारूस और उक्रेन ने 1922 की सोवियत संघ के निर्माण से संबद्ध संधि को समाप्त करने का फैसला किया और स्वतंत्र राष्ट्रों का राष्ट्रकुल बनाया। आर्मेनिया, अजरबैजान, माल्दोवा, कजाकिस्तान, किरगिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान ओर उज्बेकिस्तान भी राष्ट्रकुल में शामिल हुए। जार्जिया 1993 में राष्ट्रकुल का सदस्य बना। संयुक्त राष्ट्रसंघ में सोवियत संघ की सीट रूस को मिली।
  11. 25 दिसंबर, 1991 में गोर्बाचेव ने सोवियत संघ के राष्ट्रपति के पद से इस्तीफा दिया। इस प्रकार सोवियत संघ का अंत हो गया।

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प्रश्न 9.
शॉक थेरेपी का अर्थ बताते हुए इसके परिणाम बताइये।
अथवा
शॉक थेरेपी क्या है? शॉक थेरेपी के परिणाम बताइये।
अथवा
शॉक थेरेपी से क्या अभिप्राय है? उत्तर साम्यवादी सत्ताओं पर इसके परिणामों का आकलन कीजिए।
उत्तर:
शॉक थेरेपी से आशय शॉक थेरेपी का आशय है कि धीरे-धीरे परिवर्तन न करके एकदम आमूल-चूल परिवर्तन के प्रयत्नों को लादना । रूसी गणराज्य में इसके तहत तुरत-फुरत निजी स्वामित्व, मुक्त व्यापार, वित्तीय खुलापन · तथा मुद्रा परिवर्तनीयता पर बल दिया गया। ‘शॉक थेरेपी’ के परिणाम 1990 में अपनायी गयी ‘शॉक थेरेपी’ के निम्नलिखित प्रमुख परिणाम निकले

  1. अर्थव्यवस्था का तहस-नहस होना: शॉक थेरेपी से सोवियत संघ के पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गई। लगभग 90 प्रतिशत उद्योगों को निजी हाथों या कम्पनियों को बेचा गया। यह कदम सभी उद्योगों को मटियामेट करने वाला साबित हुआ।
  2. रूसी मुद्रा ( रूबल ) में गिरावट: शॉक थेरेपी के कारण ‘रूबल’ को भारी गिरावट का सामना करना पड़ा। इस गिरावट के कारण मुद्रास्फीति इतनी ज्यादा बढ़ गई कि लोगों ने जो पूँजी जमा कर रखी थी, वह धीरे-धीरे समाप्त हो गई और लोग कंगाल हो गये।
  3. खाद्यान्न सुरक्षा की समाप्ति: ‘शॉक थेरेपी’ के परिणामस्वरूप सामूहिक खेती प्रणाली समाप्त हो चुकी थी। अब लोगों की खाद्यान्न सुरक्षा व्यवस्था भी समाप्त हो गयी।
  4. समाज कल्याण की समाजवादी व्यवस्था का खात्मा: शॉक थेरेपी के परिणामस्वरूप रूस तथा अन्य राज्यों में गरीबी का दौर बढ़ता ही चला गया तथा वहाँ अमीरी और गरीबी के बीच विभाजन रेखा बढ़ती चली गई।
  5. लोकतान्त्रिक संस्थाओं के निर्माण को प्राथमिकता नहीं-‘शॉक थेरेपी’ के अन्तर्गत लोकतान्त्रिक संस्थाओं का निर्माण हड़बड़ी में किया गया। फलस्वरूप संसद अपेक्षाकृत कमजोर संस्था रह गयी।

प्रश्न 10.
सोवियत संघ से स्वतन्त्र हुए गणराज्यों में हुए आन्तरिक संघर्ष और तनाव पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन से 15 प्रभुतासम्पन्न राज्यों का जन्म हुआ सोवियत संघ का मुख्य उत्तरदायित्व रूस गणराज्य ने संभाला, क्योंकि सोवियत संघ के अधिकांश गणराज्यों में संघर्ष और तनाव की स्थिति थी। यथा
1. आंदोलन, तनाव तथा संघर्ष की स्थितियाँ: केन्द्रीय एशिया के अधिकांश राज्य सोवियत संघ से विघटन के पश्चात् अनेक समस्याओं का सामना कर रहे हैं। चेचन्या, दागिस्तान, ताजिकिस्तान तथा अजरबैजान आदि देशों में हिंसा की वारदातों के कारण गृह-युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। ये देश जातीय और धार्मिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। ताजिकिस्तान, उक्रेन, किरगिझस्तान तथा जार्जिया में शासन से जनता नाराज है और उसको उखाड़ फेंकने के लिए अनेक आन्दोलन चल रहे हैं।

2. नदी जल के सवाल पर संघर्ष – कई देश और प्रान्त नदी जल के सवाल पर परस्पर भिड़े हुए हैं।

3. विदेशी शक्तियों की इस क्षेत्र में रुचि बढ़ना – मध्य एशियाई गणराज्यों में पैट्रोलियम संसाधनों का विशाल भण्डार होने से यह क्षेत्र बाहरी ताकतों और तेल कम्पनियों की आपसी प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा भी बन चला है। फलतः अमेरिका इस क्षेत्र में सैनिक ठिकाना बनाना चाहता है। रूस इन राज्यों को अपना निकटवर्ती ‘विदेश’ मानता है और उसका मानना है कि इन राज्यों को रूस के प्रभाव में रहना चाहिए। चीन के हित भी इस क्षेत्र से जुड़े हैं और चीनियों ने सीमावर्ती क्षेत्रों में आकर व्यापार करना शुरू कर दिया है।

प्रश्न 11.
यदि सोवियत संघ का विघटन नहीं हुआ होता तो एक ध्रुवीय विश्व में हुए कौन-कौन से आर्थिक विकास नहीं होते?
उत्तर:
यदि सोवियत संघ का विघटन नहीं होता तो अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में पिछले दो दशकों में हुए निम्नलिखित आर्थिक परिवर्तन या विकास नहीं होते-
1. अर्थव्यवस्था का वैश्वीकरण शुरू नहीं होता:
द्विध्रुवीय विश्व की स्थिति में संयुक्त राष्ट्र संघ में अमरीकी वर्चस्व स्थापित नहीं होता और व्यापार संगठन पर भी उसका वर्चस्व स्थापित नहीं हो पाता ऐसी स्थिति में अमेरिका विकासशील देशों को उदारीकरण की नीति अपनाने के लिए मजबूर नहीं कर पाता तथा इन देशों में व्यापार नियंत्रण, कोटा प्रणाली और लाइसेंस नीति चलती रहती तो मुक्त व्यापार जैसी स्थितियाँ नहीं आतीं।

2. वैश्विक स्तर पर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का वर्चस्व नहीं होता:
यदि सोवियत संघ का विघटन नहीं हुआ होता तो पूँजीवादी अर्थव्यवस्था सीमा का अतिक्रमण करने वाली छलांग नहीं लगा पाती क्योंकि साम्यवादी अर्थव्यवस्था उसके मार्ग को अवरुद्ध कर देती और न ही संयुक्त राष्ट्र संघ के विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संगठन अनेक देशों से शक्तिपूर्वक अपनी बात मनवा पाते। अमेरिका ने इन अन्तर्राष्ट्रीय अभिकरणों के द्वारा ही अपने. वर्चस्व का विस्तार किया है।

3. पूर्वी यूरोप के साम्यवादी देश शॉक थेरेपी के दौर से नहीं गुजरते:
सोवियत संघ के विघटन के बाद सोवियत संघ के सभी स्वतंत्र गणराज्यों तथा पूर्वी यूरोप के देशों को शॉक थेरेपी के दौर से गुजरना पड़ा तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग निजी क्षेत्र की कम्पनियों को औने-पौने कीमत पर बेच दिये गये। यदि सोवियत संघ का विघटन नहीं हुआ होता तो ये देश शॉक थेरेपी के दौर से नहीं गुजरते।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

Jharkhand Board JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

बहुचयनात्मक प्रश्न 

1. द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत दो महाशक्तियाँ उभर कर सामने आयी थीं-
(अ) संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत
(स) संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ
(ब) सोवियत संघ और ब्रिटेन
(द) सोवियत संघ और चीन
उत्तर:
(स) संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ

2. क्यूबा प्रक्षेपास्त्र संकट किस वर्ष उत्पन्न हुआ था ?
(अ) 1967
(ब) 1971
(स)1975
(द) 1962
उत्तर:
(द) 1962

3. बर्लिन दीवार कब खड़ी की गई थी?
(अ) 1961
(बं) 1962
(स) 1960
(द) 1971
उत्तर:
(अ) 1961

4. उत्तर एटलांटिक संधि-संगठन की स्थापना की गई थी-
(अ) 1962 में
(ब) 1967 में
(स) 1949 में
(द) 1953 में
उत्तर:
(स) 1949 में

5. वारसा संधि कब हुई ?
(अ) 1965 में
(ब) 1955 में
(स) 1957 में
(द) 1954 में
उत्तर:
(ब) 1955 में

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6. तीसरी दुनिया से अभिप्राय है-
(अ) अज्ञात और शोषित देशों का समूह
(ब) विकासशील या अल्पविकसित देशों का समूह
(स) सोवियत गुट के देशों का समूह
(द) अमेरिकी गुट के देशों का समूह
उत्तर:
(ब) विकासशील या अल्पविकसित देशों का समूह

7. द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की प्रमुख
(अ) एकध्रुवीय विश्व राजनीति
(ब) द्वि-ध्रुवीय राजनीति
(स) बहुध्रुवीय राजनीति
(द) अमेरिकी गुट विशेषता है
उत्तर:
(ब) द्वि-ध्रुवीय राजनीति

8. गुटनिरपेक्ष देशों का प्रथम शिखर सम्मेलन हुआ था।
(अ) नई दिल्ली में
(ब) द्वि- ध्रुवीय राजनीति
(स) अफ्रीका में
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं

9. वर्तमान में गुटनिरपेक्ष आंदोलन में कितने सदस्य हैं। के देशों का समूह
(अ) 115
(ब) 116
(स) 117
(द) 120
उत्तर:
(द) 120

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. प्रथम विश्व युद्ध ………………….. से………………….. के बीच हुआ था।
उत्तर:
1914, 1918

2. शीतयुद्ध ……………….. और ……………….. तथा इनके साथी देशों के बीच प्रतिद्वंद्विता, तनाव और संघर्ष की श्रृंखला
उत्तर:
अमरिका, सोवियत संघ

3. धुरी – राष्ट्रों की अगुआई जर्मनी, ………………….. और जापान के हाथ में थी।
उत्तर:
इटली

4. …………………. विश्व युद्ध की समाप्ति से ही शीतयुद्ध की शुरुआत हुई।
उत्तर:
द्वितीय

5. जापान के हिरोशिमा तथा नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम का गुप्तनाम …………………. तथा ……………………. थी।
उत्तर:
लिटिल ब्वॉय, फैटमैन

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
नाटो का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर:
नाटो का पूरा नाम है। उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन)।

प्रश्न 2.
‘वारसा संधि’ की स्थापना का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर:
‘वारसा संधि’ की स्थापना का मुख्य कारण नाटो के देशों का मुकाबला करना था।

प्रश्न 3.
भारत के पहले प्रधानमंत्री कौन थे?
उत्तर:
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे।

प्रश्न 4.
यूगोस्लाविया में एकता कायम करने वाले नेता कौन थे?
उत्तर:
जोसेफ ब्रॉज टीटो।

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प्रश्न 5.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक कौन थे?
उत्तर:
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक वामे एनक्रूमा थे।

प्रश्न 6.
शीतयुद्ध का चरम बिन्दु क्या था?
उत्तर:
क्यूबा मिसाइल संकट।

प्रश्न 7.
क्यूबा में सोवियत संघ द्वारा परमाणु हथियार तैनात करने की जानकारी संयुक्त राज्य अमेरिका को कितने समय बाद लगी?
उत्तर:
तीन सप्ताह बाद।

प्रश्न 8.
शीतयुद्ध के काल के तीन पश्चिमी या अमेरिकी गठबंधनों के नाम लिखिये।
उत्तर:

  1. उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो )।
  2. दक्षिण-पूर्व एशियाई संगठन ( सेन्टो)।
  3. केन्द्रीय संधि संगठन (सीटो )।

प्रश्न 9.
मार्शल योजना क्या थी?
उत्तर:
शीतयुद्ध काल में अमेरिका ने पश्चिमी यूरोप की अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन हेतु जो आर्थिक सहायता की, वह मार्शल योजना के नाम से जानी जाती है।

प्रश्न 10.
परमाणु अप्रसार संधि कब हुई?
उत्तर;
परमाणु अप्रसार संधि 1 जुलाई, 1968 को हुई।

प्रश्न 11.
शीतयुद्ध का सम्बन्ध किन दो गुटों से था?
उत्तर:
शीत युद्ध का सम्बन्ध जिन दो गुटों से था, वे थे

  1. अमेरिका के नेतृत्व में पूँजीवादी गुट और
  2.  सोवियत संघ के नेतृत्व में साम्यवादी गुट।

प्रश्न 12.
शीतयुद्ध के दौरान महाशक्तियों के बीच
1. 1950-53
2. 1962 में हुई किन्हीं दो मुठभेड़ों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. 1950-53 कोरिया संकट
  2. 1962 में बर्लिन और कांगो मुठभेड़।

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प्रश्न 13.
नाटो में शामिल किन्हीं चार देशों के नाम लिखिय।
उत्तर:

  1. अमेरिका
  2.  ब्रिटेन
  3. फ्रांस
  4. इटली।

प्रश्न 14.
शीत युद्ध के युग में एक पूर्वी गठबंधन और तीन पश्चिमी गठबंधनों के नाम लिखिये।
उत्तर:
पूर्वी गठबंधन – वारसा पैक्ट, पश्चिमी गठबंधन

  1. नाटो,
  2. सीएटो और
  3. सैण्टो।

प्रश्न 15.
वारसा पैक्ट में शामिल किन्हीं चार देशों के नाम लिखिये।
उत्तर:

  1. सोवियत संघ
  2. पोलैण्ड
  3. पूर्वी जर्मनी
  4. हंगरी।

प्रश्न 16.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के किन्हीं चार अग्रणी देशों के नाम लिखिये।
उत्तर:

  1. भारत
  2. इण्डोनेशिया
  3. मिस्र
  4. यूगोस्लाविया।

प्रश्न 17.
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर शीत युद्ध के कोई दो नकारात्मक प्रभाव लिखिये।
उत्तर:

  1. दो विरोधी गुटों का निर्माण।
  2. शस्त्रीकरण की प्रतिस्पर्धा का जारी रहना।

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प्रश्न 18.
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर शीत युद्ध के कोई दो सकारात्मक प्रभाव लिखिये।
उत्तर:

  1. गुटनिरपेक्ष आंदोलन का जन्म
  2. शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को प्रोत्साहन।

प्रश्न 19.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रणेता कौन थे?
उत्तर:
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रणेता थे

  1. जवाहरलाल नेहरू
  2. मार्शल टीटो
  3. कर्नल नासिर और
  4. डॉ. सुकर्णो।

प्रश्न 20.
द्वितीय विश्व युद्ध में जापान को कब घुटने टेकने पड़े?
उत्तर:
सन् 1945 में अमेरिका ने जब जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराये तो जापान को घुटने टेकने पड़े।

प्रश्न 21.
शीत युद्ध में पश्चिमी गठबंधन की विचारधारा क्या थी?
उत्तर:
शीत युद्ध काल में पश्चिमी गठबंधन उदारवादी लोकतंत्र तथा पूँजीवाद का समर्थक था।

प्रश्न 22.
सोवियत गठबंधन की विचारधारा क्या थी?
उत्तर:
सोवियत संघ गुट की वैचारिक प्रतिबद्धता समाजवाद और साम्यवाद के लिए थी।

प्रश्न 23.
पारमाणविक हथियारों को सीमित या समाप्त करने के लिए दोनों पक्षों द्वारा किये गये किन्हीं दो समझौतों के नाम लिखिये।
उत्तर:

  1. परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि
  2. परमाणु अप्रसार संधि।

प्रश्न 24.
1960 में दो महाशक्तियों द्वारा किये गए किन्हीं दो समझौतों का उल्लेख करें।
उत्तर:

  1. परमाणु प्रक्षेपास्त्र परिसीमन संधि
  2. परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि।

प्रश्न 25.
पृथकतावाद से क्या आशय है?
उत्तर:
पृथकतावाद का अर्थ होता है। अपने को अन्तर्राष्ट्रीय मामलों से काटकर रखना।

प्रश्न 26.
गुटनिरपेक्षता पृथकतावाद से कैसे अलग है?
उत्तर:
पृथकतावाद अपने को अन्तर्राष्ट्रीय मामलों से काटकर रखने से है जबकि गुट निरपेक्षता में शांति और स्थिरता के लिए मध्यस्थता की सक्रिय भूमिका निभाना है।

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प्रश्न 27.
अल्प विकसित देश किन्हें कहा गया था?
उत्तर:
गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल अधिकांश देशों को अल्प विकसित देश कहा गया था।

प्रश्न 28.
अल्प विकसित देशों के सामने मुख्य चुनौती क्या थी?
उत्तर:
अल्पं विकसित देशों के सामने मुख्य चुनौती आर्थिक रूप से और ज्यादा विकास करने तथा अपनी जनता को गरीबी से उबारने की थी।

प्रश्न 29.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता के रूप में शीत युद्ध के दौर में भारत ने क्या भूमिका निभाई?
उत्तर:
भारत ने एक तरफ तो अपने को महाशक्तियों की खेमेबन्दी से अलग रखा तो दूसरी तरफ अन्य नव स्वतंत्र देशों को महाशक्तियों के खेमों में जाने से रोका।

प्रश्न 30.
भारत ‘नाटो’ अथवा ‘सीटो’ का सदस्य क्यों नहीं बना?
उत्तर:
भारत ‘नाटो’ अथवा ‘सीटो’ का सदस्य इसलिए नहीं बना क्योंकि भारत गुटनिरपेक्षता की नीति में विश्वास रखता है।

प्रश्न 31.
शीत युद्ध किनके बीच और किस रूप में जारी रहा?
उत्तर:
शीत युद्ध सोवियत संघ और अमेरिका तथा इनके साथी देशों के बीच प्रतिद्वन्द्विता, तनाव और संघर्ष की एक श्रृंखला के रूप में जारी रहा।

प्रश्न 32.
द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों की अगुवाई कौन-से देश कर रहे थे?
उत्तर:
अमरीका, सोवियत संघ, ब्रिटेन और फ्रांस।

प्रश्न 33.
शीतयुद्ध के काल में पूर्वी गठबंधन का अगुआ कौन था तथा इस गुट की प्रतिबद्धता किसके लिए थी?
उत्तर:
शीतयुद्ध के काल में पूर्वी गठबंधन का अगुआ सोवियत संघ था तथा इस गुट की प्रतिबद्धता समाजवाद तथा साम्यवाद के लिए थी।

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प्रश्न 34.
अमरीका ने जापान के किन दो शहरों पर परमाणु बम गिराया?
उत्तर:
हिरोशिमा तथा नागासाकी।

प्रश्न 35.
द्वितीय विश्व युद्ध कब से कब तक हुआ था?
उत्तर:
1939 से 1945।

प्रश्न 36.
वारसा संधि से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
सोवियत संघ की अगुआई वाले पूर्वी गठबंधन को वारसा संधि के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 37.
उत्तर अटलांटिक संधि संगठन को पश्चिमी गठबंधन भी कहा जाता है, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि पश्चिमी यूरोप के अधिकतर देश अमरीका में शामिल हुए।

प्रश्न 38.
भारत ने सोवियत संध के साथ आपसी मित्रता की संधि पर कब हस्ताक्षर किय ?
उत्तर:
1971 में।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
शीतयुद्ध का क्या अर्थ है?
शीतयुद्ध से आप क्या समझते हैं?
अथवा
उत्तर:
शीत युद्ध वह अवस्था है जब दो या दो से अधिक देशों के मध्य तनावपूर्ण वातावरण हो, लेकिन वास्तव में कोई युद्ध न हो। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच वाद-विवाद, रेडियो प्रसारणों तथा सैनिक शक्ति के प्रसार द्वारा लड़े गये स्नायु युद्ध को शीत युद्ध कहा जाता है।

प्रश्न 2.
अपरोध का तर्क किसे कहा गया?
उत्तर:
अगर कोई शत्रु पर आक्रमण करके उसके परमाणु हथियारों को नाकाम करने की कोशिश करता है तब भी दूसरे के पास उसे बर्बाद करने लायक हथियार बच जायेंगे। इसी को अपरोध का तर्क कहा गया।

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प्रश्न 3.
सीमित परमाणु परीक्षण संधि के बारे में आप क्या जानते हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सीमित परमाणु परीक्षण संधि – वायुमण्डल, बाहरी अंतरिक्ष तथा पानी के अन्दर परमाणु हथियारों पर प्रतिबंध लगाने के लिए अमरीका, ब्रिटेन तथा सोवियत संघ ने मास्को में 5 अगस्त, 1963 को इस संधि पर हस्ताक्षर किये। यह संधि 10 अक्टूबर, 1963 से प्रभावी हो गई।

प्रश्न 4.
शीत युद्ध के दायरे से क्या आशय है?
उत्तर:
शीत युद्ध के दायरे से यह आशय है कि ऐसे क्षेत्र जहाँ विरोधी खेमों में बँटे देशों के बीच संकट के अवसर आए, युद्ध हुए या इनके होने की संभावना बनी, लेकिन बातें एक हद से ज्यादा नहीं बढ़ीं।

प्रश्न 5.
तटस्थता से क्या आशय है?
उत्तर:
तटस्थता का अर्थ है – मुख्य रूप से युद्ध में शामिल न होने की नीति का पालन करना ऐसे देश युद्ध में न तो शामिल होते हैं और न ही युद्ध के सही-गलत होने के बारे में अपनी कोई राय देते हैं।

प्रश्न 6.
शीत युद्ध की कोई दो सैनिक विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:
शीत युद्ध की दो सैनिक विशेषताएँ ये थीं:

  1. सैन्य गठबंधनों का निर्माण करना तथा इनमें अधिक से अधिक देशों को शामिल करना।
  2. शस्त्रीकरण करना तथा परमाणु मिसाइलों को बनाना तथा उन्हें युद्ध के महत्त्व के ठिकानों पर स्थापित करना।

प्रश्न 7.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की आलोचना के दो आधारों को स्पष्ट कीजिये किन्हीं दो को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की आलोचना के दो आधार निम्नलिखित हैं-

  1. सिद्धान्तहीनता: गुटनिरपेक्ष आंदोलन की गुटनिरपेक्षता की नीति सिद्धान्तहीन रही है।
  2. अस्थिरता की नीति: भारत की गुटनिरपक्षता की नीति में अस्थिरता रही है।

प्रश्न 8.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने दो-ध्रुवीयता को कैसे चुनौती दी थी?
उत्तर:
गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने

  1. एशिया, अफ्रीका व लातिनी अमरीका के नव स्वतंत्र देशों को गुटों से अलग रखने का तीसरा विकल्प देकर तथा
  2. शांति व स्थिरता के लिए दोनों गुटों में मध्यस्थता द्वारा दो – ध्रुवीयता को चुनौती दी थी।

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प्रश्न 9.
शीत युद्ध में विचारधारा के स्तर पर क्या लड़ाई थी?
उत्तर:
शीत युद्ध में विचारधारा की लड़ाई इस बात को लेकर थी कि पूरे विश्व में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन को सूत्रबद्ध करने का सबसे बेहतर सिद्धान्त कौनसा है? अमरीकी गुट जहाँ उदारवादी लोकतंत्र तथा पूँजीवाद का हामी था, वहाँ सोवियत संघ गुट की प्रतिबद्धता समाजवाद और साम्यवाद के लिए थी।

प्रश्न 10.
किस घटना के बाद द्वितीय विश्वयुद्ध का अंत हुआ?
उत्तर:
अगस्त, 1945 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने जापान के दो शहर हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराये और जापान को घुटने टेकने पड़े। इन बमों के गिराने के बाद ही दूसरे विश्व युद्ध का अन्त हुआ।

प्रश्न 11.
मार्शल योजना के तहत पश्चिमी यूरोप के देशों को क्या लाभ हुआ?
उत्तर:
1947 से 1952 तक जारी की गई अमरीकी मार्शल योजना के तहत पश्चिमी यूरोप के देशों को अपने पुनर्निर्माण हेतु अमरीका की आर्थिक सहायता प्राप्त हुई।

प्रश्न 12.
शीत युद्ध के दौरान महाशक्तियों के बीच हुई किन्हीं चार मुठभेड़ों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
शीत युद्ध के दौरान दोनों महाशक्तियों के बीच निम्न मुठभेड़ें हुईं-

  1. 1950-53 का कोरिया युद्ध तथा कोरिया का दो भागों में विभक्त होना।
  2. 1954 का फ्रांस एवं वियतनाम का युद्ध जिसमें फ्रांसीसी सेना की हार हुई।
  3. बर्लिन की दीवार का निर्माण।
  4.  क्यूबा मिसाइल संकट (1962 )

प्रश्न 13.
निम्नलिखित को सुमेलित कीजिए:
(i) जवाहरलाल नेहरू मिस्र
(ii) जोसेफ ब्रॉज टीटो
(iii) गमाल अब्दुल नासिर
(iv) सुकर्णो
उत्तर:
(i) जवाहरलाल नेहरू – मिस्र
(ii) जोसेफ ब्राज टीटो – इण्डोनेशिया
(iii) गमाल अब्दुल नासिर – भारत
(iv) सुकर्णो – यूगोस्लाविया

प्रश्न 14.
महाशक्तियों के बीच गहन प्रतिद्वन्द्विता होने के बावजूद शीत युद्ध रक्तरंजित युद्ध का रूप क्यों नहीं ले सका?
उत्तर:
शीत युद्ध शुरू होने के पीछे यह समझ भी कार्य कर रही थी कि परमाणु युद्ध की सूरत में दोनों पक्षों को इतना नुकसान उठाना पड़ेगा कि उनमें विजेता कौन है यह तय करना भी असंभव होगा इसलिए कोई भी पक्ष युद्ध का खतरा नहीं उठाना चाहता था।

प्रश्न 15.
“शीत युद्ध में परस्पर प्रतिद्वन्द्वी गुटों में शामिल देशों से अपेक्षा थी कि वे तर्कसंगत और जिम्मेदारीपूर्ण व्यवहार करेंगे।” यहाँ तर्कसंगत और जिम्मेदारी भरे व्यवहार से क्या आशय है?
उत्तर:
यहाँ तर्कसंगत भरे व्यवहार से आशय है कि आपसी युद्ध में जोखिम है। पारस्परिक अपरोध की स्थिति में युद्ध लड़ना दोनों के लिए विध्वंसक साबित होगा। इस संदर्भ में जिम्मेदारी का अर्थ है- संयम से काम लेना और तीसरे विश्व युद्ध के जोखिम से बचना। बताइये।

प्रश्न 16.
शीत युद्ध के दौरान दोनों महाशक्तियों को छोटे देशों ने क्यों आकर्षित किया? कोई दो कारण
उत्तर:
शीत युद्ध के दौरान दोनों महाशक्तियों को छोटे देशों ने निम्न कारणों से आकर्षित किया

  1. महाशक्तियाँ इन देशों में अपने सैनिक अड्डे बनाकर दुश्मन के देशों की जासूसी कर सकती थीं।
  2. छोटे देश सैन्य गठबन्धन के अन्तर्गत आने वाले सैनिकों को अपने खर्चे पर अपने देश में रखते थे। इससे महाशक्तियों पर आर्थिक दबाव कम पड़ता था।

प्रश्न 17.
शीत युद्ध के दौरान अन्तर्राष्ट्रीय गठबंधनों का निर्धारण कैसे होता था?
उत्तर:
शीत युद्ध के दौरान अन्तर्राष्ट्रीय गठबंधनों का निर्धारण महाशक्तियों की जरूरतों और छोटे देशों के लाभ- हानि के गणित से होता था।

  1. दोनों महाशक्तियाँ विश्व के विभिन्न हिस्सों में अपने प्रभाव का दायरा बढ़ाने के लिए तुली हुई थीं।
  2. छोटे देशों ने सुरक्षा, हथियार और आर्थिक मदद की दृष्टि से गठबंधन किया।

प्रश्न 18.
उत्तर – एटलांटिक संधि संगठन (नाटो) कब बना तथा इसमें कितने देश शामिल थे?
उत्तर:
नाटो (NATO) : अप्रैल, 1949 में अमेरिका के नेतृत्व में उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की स्थापना हुई जिसमें 12 देश शामिल थे। ये देश थे: संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, स्पेन, पुर्तगाल, इटली, बेल्जियम, नीदरलैंड, डेनमार्क, नार्वे , फिनलैंड,

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प्रश्न 19.
वारसा संधि से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
नाटो के जवाब में सोवियत संघ के नेतृत्व में पूर्वी यूरोप के देशों के गठबंधन ने सन् 1955 में ‘वारसा संधि’ की। इसमें ये देश सम्मिलित हुए – सोवियत संघ, पोलैंड, पूर्वी जर्मनी, चैकोस्लोवाकिया, हंगरी, रोमानिया और बुल्गारिया इसका मुख्य काम था – ‘नाटो’ में शामिल देशों का यूरोप में मुकाबला करना।

प्रश्न 20.
शीतयुद्ध के कारण बताएँ।
उत्तर:
शीत युद्ध के कारण – शीत युद्ध के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  1. अमेरिका और सोवियत संघ के महाशक्ति बनने की होड़ में एक-दूसरे के मुकाबले में खड़े होना शीत युद्ध का कारण बना।
  2. विचारधाराओं के विरोध ने भी शीत युद्ध को बढ़ावा दिया।
  3. अपरोध के तर्क ने प्रत्यक्ष तीसरे युद्ध को रोक दिया। फलतः शीतयुद्ध का विकास हुआ।

प्रश्न 21.
शीतयुद्ध के अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन करें। उत्तर – शीतयुद्ध के अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ने वाले प्रभाव निम्नलिखित थे-

  1. विश्व का दो गुटों में विभाजन: शीतयुद्ध के कारण अमेरिका और सोवियत संघ के नेतृत्व में विश्व दो खेमों में विभाजित हो गया। एक खेमा पूँजीवादी गुट कहलाया और दूसरा साम्यवादी गुट कहलाया।
  2. सैनिक गठबन्धनों की राजनीति: शीतयुद्ध के कारण सैनिक गठबंधनों की राजनीति प्रारंभ हुई।
  3. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की उत्पत्ति: शीतयुद्ध के कारण गुटनिरपेक्ष आंदोलन की उत्पत्ति हुई एशिया- अफ्रीका के नव-स्वतंत्र राष्ट्रों ने दोनों गुटों से अपने को अलग रखने के लिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन का हिस्सा बनाया।
  4. शस्त्रीकरण को बढ़ावा: शीत युद्ध के प्रभावस्वरूप शस्त्रीकरण को बढ़ावा मिला। दोनों गुट खतरनाक शस्त्रों का संग्रह करने लगे।

प्रश्न 22.
शीत युद्ध की तीव्रता में कमी लाने वाले कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
निम्न कारणों से शीतयुद्ध की तीव्रता में कमी आयी-
1. अपरोध का तर्क:
अपरोध ( रोक और सन्तुलन ) के तर्क ने शीत युद्ध में संयम बरतने के लिए दोनों गुटों को मजबूर कर दिया । अपरोध का तर्क यह है कि जब दोनों ही विरोधी पक्षों के पास समान शक्ति तथा परस्पर नुकसान पहुँचाने की क्षमता होती है तो कोई भी युद्ध का खतरा नहीं उठाना चाहता।

2. गठबंधन में भेद आना:
सोवियत संघ के साम्यवादी गठबंधन में भेद पैदा होने की स्थिति ने भी शीत युद्ध की तीव्रता को कम किया। साम्यवादी चीन की 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध में सोवियत संघ से अनबन हो गयी।

3. गुटनिरपेक्ष आंदोलन का विकास: गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने भी नव-स्वतंत्र राष्ट्रों को दो ध्रुवीय विश्व की गुटबाजी से अलग रहने का मौका दिया।

प्रश्न 23.
शीत युद्ध के काल में ‘अपरोध’ की स्थिति ने युद्ध तो रोका लेकिन यह दोनों महाशक्तियों के बीच पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता को नहीं रोक सकी। क्यों? स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
अपरोध की स्थिति शीत युद्ध काल में दोनों महाशक्तियों की प्रतिद्वन्द्विता को निम्न कारणों से नहीं रोक सकी-

  1. दोनों ही गुटों के पास परमाणु बमों का भारी भण्डारण था। दोनों एक- दूसरे से निरंतर सशंकित थ। इसलिए प्रतिस्पर्द्धा बनी रही, यद्यपि सम्पूर्ण विनाश के भय ने युद्ध को रोक दिया।
  2. दोनों महाशक्तियों की पृथक्-पृथक् विचारधाराएँ थीं। दोनों में विचारधारागत प्रतिद्वन्द्विता जारी रही क्योंकि उनमें कोई समझौता संभव नहीं था।
  3. दोनों महाशक्तियाँ औद्योगीकरण के चरम विकास की अवस्था में थीं और उन्हें अपने उद्योगों के लिए कच्चा माल विश्व के अल्पविकसित देशों से ही प्राप्त हो सकता था। इसलिए सैनिक गठबंधनों के द्वारा इन क्षेत्रों में दोनों अपने- अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने के लिए छीना-झपटी कर रहे थे।

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प्रश्न 24.
महाशक्तियों ने ‘अस्त्र- नियंत्रण’ संधियाँ करने की आवश्यकता क्यों समझी?
उत्तर:
यद्यपि महाशक्तियों ने यह समझ लिया था कि परमाणु युद्ध को हर हालत में टालना जरूरी है। इसी समझ के कारण दोनों महाशक्तियों ने संयम बरता और शीत युद्ध एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र की तरफ खिसकता रहा; तथापि दोनों के बी प्रतिद्वन्द्विता जारी थी। इस प्रतिद्वन्द्विता के चलते रहने से दोनों ही महाशक्तियाँ यह समझ रही थीं कि संयम के बावजूद गलत अनुमान या मंशा को समझने की भूल या किसी परमाणु दुर्घटना या किसी मानवीय त्रुटि के कारण युद्ध हो सकता है! इस बात को समझते हुए दोनों ही महाशक्तियों ने कुछेक परमाणविक और अन्य हथियारों को सीमित या समाप्त करने के लिए आपस में सहयोग करने का फैसला किया और अस्त्र नियंत्रण संधियों द्वारा हथियारों की दौड़ पर लगाम लगाई और उसमें स्थायी संतुलन लाया है।

प्रश्न 25.
1947 से 1950 के बीच शीतयुद्ध के विकास का वर्णन करें।
उत्तर:
1947 से 1950 के बीच शीतयुद्ध का विकास:

  1. मार्शल योजना (1947): अमेरिका ने यूरोप में रूसी प्रभाव को रोकने की दृष्टि से 1947 में पश्चिमी यूरोप के पुनर्निर्माण हेतु मार्शल योजना बनायी।
  2. बर्लिन की नाकेबन्दी: सोवियत संघ ने 1948 में बर्लिन कीं नाकेबंदी कर शीत युद्ध को बढ़ावा दिया।
  3. नाटो की स्थापना: 4 अप्रैल, 1949 को अमेरिकी गुट ने नाटो की स्थापना कर शीत युद्ध को बढ़ावा
  4. कोरिया संकट: 1950 में उत्तरी तथा दक्षिणी कोरिया के बीच हुए युद्ध ने भी शीत युद्ध को बढ़ावा दिया।

प्रश्न 26.
क्यूबा का मिसाइल संकट क्या था? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
क्यूबा का मिसाइल संकट 1962 में सोवियत संघ के नेता नीकिता ख्रुश्चेव ने अमरीका के तट पर स्थित एक द्वीपीय देश क्यूबा को रूस के सैनिक अड्डे के रूप में बदलने हेतु वहाँ परमाणु मिसाइलें तैनात कर दीं। हथियारों की इस तैनाती के बाद सोवियत संघ पहले की तुलना में अब अमरीका के मुख्य भू-भाग के लगभग दो गुने ठिकानों या शहरों पर हमला बोल सकता था। क्यूबा में मिसाइलों की तैनाती की जानकारी अमरीका को तीन हफ्ते बाद लगी।

इसके बाद अमरीकी राष्ट्रपति कैनेडी ने आदेश दिया कि अमरीकी जंगी बेड़ों को आगे करके क्यूबा की तरफ जाने वाले सोवियत जहाजों को रोका जाय। इस चेतावनी से लगा कि युद्ध होकर रहेगा। इसी को क्यूबा संकट के रूप में जाना गया। लेकिन सोवियत संघ के जहाजों के वापसी का रुख कर लेने से यह संकट टल गया।

प्रश्न 27.
1960 के दशक को खतरनाक दशक क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
निम्न घटनाओं के कारण 1960 का दशक खतरनाक दशक कहा जाता है-

  1. कांगो संकट: 1960 के दशक के प्रारंभ में ही कांगो सहित अनेक स्थानों पर प्रत्यक्ष रूप से मुठभेड़ की स्थिति पैदा हो गई थी।
  2. क्यूबा संकट: 1961 में क्यूबा में अमरीका द्वारा प्रायोजित ‘बे ऑफ पिग्स’ आक्रमण और 1962 में ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ ने शीतयुद्ध को चरम पर पहुँचा दिया।
  3. अन्य: सन् 1965 में डोमिनिकन रिपब्लिक में अमेरिकी हस्तक्षेप और 1968 में चेकोस्लोवाकिया में सोवियत संघ के हस्तक्षेप से तनाव बढ़ा।

प्रश्न 28.
गुटनिरपेक्षता क्या है? क्या गुटनिरपेक्षता का अभिप्राय तटस्थता है?.
उत्तर:
गुटनिरपेक्षता का अर्थ- गुटनिरपेक्षता का अर्थ है कि महाशक्तियों के किसी भी गुट में शामिल न होना तथा इन गुटों के सैनिक गठबंधनों व संधियों से अलग रहना तथा गुटों से अलग रहते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करना तथा विश्व राजनीति में भाग लेना। गुटनिरपेक्षता तटस्थता नहीं है – गुट निरपेक्षता तटस्थता की नीति नहीं है।

तटस्थता का अभिप्राय है युद्ध में शामिल न होने की नीति का पालन करना। ऐसे देश न तो युद्ध में संलग्न होते हैं और न ही युद्ध के सही-गलत के बारे में अपना कोई पक्ष रखते हैं। लेकिन गुटनिरपेक्षता युद्ध को टालने तथा युद्ध के अन्त का प्रयास करने की नीति है।

प्रश्न 29.
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति की पाँच विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति की विशेषताएँ-

  1. भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति महाशक्तियों के गुटों से अलग रहने की नीति है।
  2. भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति एक स्वतंत्र नीति है तथा यह अन्तर्राष्ट्रीय शांति और स्थिरता हेतु अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में सक्रिय सहयोग देने की नीति है
  3. भारत की गुटनिरपेक्ष विदेश नीति सभी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने पर बल देती है।
  4. भारत की गुटनिरपेक्ष नीति नव-स्वतंत्र देशों के गुटों में शामिल होने से रोकने की नीति है।
  5. भारत की गुटनिरपेक्ष नीति अल्पविकसित देशों को आपसी सहयोग तथा आर्थिक विकास पर बल देती है।

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प्रश्न 30.
भारत के गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के कोई चार कारण बताओ। भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति क्यों अपनाई?
अथवा
उत्तर-भारत के गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  1. राष्ट्रीय हित की दृष्टि से भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति इसलिए अपनाई ताकि वह स्वतंत्र रूप से ऐसे अन्तर्राष्ट्रीय फैसले ले सके जिनसे उसका हित सधता हो; न कि महाशक्तियों और खेमे के देशों का।
  2. दोनों महाशक्तियों से सहयोग लेने हेतु भारत ने दोनों महाशक्तियों से सम्बन्ध व मित्रता स्थापित करते हुए दोनों से सहयोग लेने के लिए गुटनिरपेक्षता की नीति अपनायी।
  3. स्वतंत्र नीति-निर्धारण हेतु भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति इसलिए भी अपनाई ताकि भारत स्वतंत्र नीति का निर्धारण कर सके।
  4. भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए – भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए भारत ने गुट निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया।

प्रश्न 31.
बेलग्रेड शिखर सम्मेलन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये|
उत्तर:
बेलग्रेड शिखर सम्मेलन;
सन् 1961 में गुटनिरपेक्ष देशों का पहला शिखर सम्मेलन बेलग्रेड में हुआ। इसी को बेलग्रेड शिखर सम्मेलन के नाम से जाना जाता है। यह सम्मेलन कम-से-कम निम्न तीन बातों की परिणति था

  1. भारत, यूगोस्लाविया, मिस्र, इण्डोनेशिया और घाना इन पाँच देशों के बीच सहयोग।
  2. शीत युद्ध का प्रसार और इसके बढ़ते दायरे।
  3. अन्तर्राष्ट्रीय फलक पर बहुत से नव-स्वतंत्र अफ्रीकी देशों का नाटकीय उदय।

बेलग्रेड शिखर सम्मेलन में 25 सदस्य देश शामिल हुए। सम्मेलन में स्वीकार किये गये घोषणा-पत्र में कहा गया कि विकासशील राष्ट्र बिना किसी भय व बाधा आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास को प्रेरित करें।

प्रश्न 32.
सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता ‘साल्ट प्रथम’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता (साल्ट ) प्रथम सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता (साल्ट) का प्रथम चरण सन् 1969 के नवम्बर में प्रारंभ हुआ सोवियत संघ के नेता लियोनेड ब्रेझनेव और अमरीका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने मास्को में 26 मई, 1972 को निम्नलिखित समझौते पर हस्ताक्षर किए

  1. परमाणु मिसाइल परिसीमन संधि (ए वी एम ट्रीटी) – इस संधि के अन्तर्गत दोनों ही राष्ट्रों ने हवाई सुरक्षा एवं सामरिक प्रक्षेपास्त्र सुरक्षा को छोड़कर सामरिक युद्ध कौशल के प्रक्षेपास्त्रों व प्रणालियों पर प्रतिबंध लगा दिया था।
  2. सामरिक रूप से घातक हथियारों के परिसीमन के बारे में अंतरिम समझौता हुआ जो 3 अक्टूबर, 1972 से प्रभावी हुआ।

प्रश्न 33.
” गुटनिरपेक्ष आंदोलन वैश्विक सम्बन्धों में खतरनाक दुश्मनी के युग में एक संस्थात्मक आशावादी अनुक्रिया के रूप में सामने आया। इसका मुख्य सिद्धान्त यह था कि जो महाशक्ति नहीं है या जिनके सदस्यों की किसी भी गुट में शामिल होने की अपनी कोई इच्छा नहीं थी। हमारे नेताओं ने किसी गुट में शामिल होने से मना करके तटस्थ रहना स्वीकार किया, इस तरह उन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना की। ” ऊपर लिखित अनुच्छेद को पढ़ें एवं निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें-
(क) अनुच्छेद में संकेत दिए गए वैश्विक दुश्मनी का नाम लिखें।
(ख) दो महाशक्तियों का नाम लिखें, जिनका आपस में तनाव था।
(ग) भारत द्वारा गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल होने के कोई दो कारण बताइये।
उत्तर:
(क) इस पैरे में वैश्विक दुश्मनी का अर्थ अमेरिका एवं सोवियत संघ के बीच चल रहे शीत युद्ध से है।

(ख) अमेरिका एवं सोवियत संघ के बीच तनाव था।

(ग) भारत निम्नलिखित कारणों से गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल हुआ-
(i) भारत गुटों की राजनीति से अलग रहना चाहता था।
(ii) भारत दोनों शक्ति गुटों से लाभ प्राप्त करना चाहता था।

प्रश्न 34.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन को अनवरत जारी रखना द्वि-ध्रुवीय विश्व में एक चुनौती भरा काम था। क्यों? स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
शीत युद्ध काल के द्विध्रुवीय विश्व में गुटनिरपेक्ष आंदोलन को चलाये रखना एक चुनौती भरा काम था, क्योंकि:

  1. विश्व की दोनों महाशक्तियाँ नवस्वतंत्रता प्राप्त तीसरे विश्व के अल्पविकसित देशों को लालच देकर, दबाव डालकर तथा समझौते कर अपने-अपने गुट में मिलाने का प्रयास कर रही थीं।
  2. शीत युद्ध के दौरान महाशक्तियों द्वारा अनेक देशों पर हमले किये गये थे। ऐसी विषम परिस्थितियों में गुट- निरपेक्ष आंदोलन को निरन्तर जारी रखना स्वयं में एक चुनौतीपूर्ण कार्य था।
  3. पाँच सदस्य देशों ने मिलकर गुट निरपेक्ष आंदोलन का सफर शुरू किया था जिसकी संख्या बढ़ते हुए 120 तक हो गई है। शीतयुद्ध काल में अपने समर्थक देशों की इतनी संख्या बनाना भी एक चुनौतीपूर्ण कार्य था।

प्रश्न 35.
नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था:
नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से अभिप्राय है। ऐसी अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था जिसमें नवोदित विकासशील राष्ट्रों का राष्ट्रीय विकास पूँजीवादी राष्ट्रों की इच्छा पर निर्भर न रहे। विश्व आर्थिक व्यवस्था का संचालन एक-दूसरे की संप्रभुता का समादर, अहस्तक्षेप एवं कच्चे माल व उत्पादन राष्ट्र का पूर्ण अधिकार आदि सिद्धान्तों पर आधारित हो। नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के मूल सिद्धान्त हैं।

  1. अल्प विकसित देशों को अपने उन प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण प्राप्त हो, जिनका दोहन पश्चिम में विकसित देश करते हैं।
  2. अल्प विकसित देशों की पहुँच पश्चिमी देशों के बाजार तक हो।
  3. पश्चिमी देशों से मंगायी जा रही प्रौद्योगिकी की लागत कम हो।
  4. अल्प विकसित देशों की अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थानों में भूमिका बढ़े।

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प्रश्न 36.
नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के प्रमुख उद्देश्य लिखिये।
उत्तर:
नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के उद्देश्य – नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित

  1. नई अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था वैश्विक व्यापार प्रणाली में सुधार हेतु प्रस्तावित की गई थी।
  2. इसमें अल्पविकसित देशों को उनके उन प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण प्राप्त होने का उद्देश्य रखा गया है जिनका दोहन पश्चिम के विकसित देश करते हैं।
  3. इसमें अल्प विकसित देशों की पहुँच पश्चिमी देशों के बाजार तक होगी।
  4. इसमें पश्चिमी देशों से मंगायी जा रही प्रौद्योगिकी की लागत कम होगी।
  5. अल्प विकसित देशों की अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थानों में भूमिका बढ़ेगी।
  6. विकसित देश विकासशील देशों में पूँजी का निवेश करेंगे, उन्हें न्यूनतम ब्याज की शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराया जायेगा तथा उनके पुनर्भुगतान की शर्तें भी लचीली होंगी।

प्रश्न 37.
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति के समर्थन में दो तर्क दीजिये।
उत्तर:
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति के समर्थन में तर्क-

  1. गुटनिरपेक्षता के कारण भारत ऐसे अन्तर्राष्ट्रीय फैसले ले सका जिनसे उसका हित सता था न कि महाशक्तियों और उनके खेमे के देशों का।
  2. इसके कारण भारत हमेशा इस स्थिति में रहा कि एक महाशक्ति उसके खिलाफ हो जाए तो वह दूसरी महाशक्ति के नजदीक आने की कोशिश करे। अगर भारत को महसूस हो कि महाशक्तियों में से कोई उसकी अनदेखी कर रहा है या अनुचित दबाव डाल रहा है तो वह दूसरी महाशक्ति की तरफ अपना रुख कर सकता था। दोनों गुटों में से कोई भी भारत को लेकर न तो बेफिक्र हो सकता था और न ही धौंस जमा सकता था।

प्रश्न 38.
दक्षिण-पूर्व एशियाई संधि संगठन पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
शीतयुद्ध के दौरान अंतर्राष्ट्रीय गठबंधनों का निर्धारण महाशक्तियों की जरूरतों और छोटे देशों के लाभ-हानि के गणित से होता था। महाशक्तियों के बीच की तनातनी का मुख्य अखाड़ा यूरोप बना। कई मामलों में यह भी देखा गया है कि अपने गुट में शामिल करने के लिए महाशक्तियों ने बल प्रयोग किया। सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप में अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया। इस क्षेत्र के देशों में सोवियत संघ की सेना की व्यापक उपस्थिति ने यह सुनिश्चित करने के लिए अपना प्रभाव जमाया कि यूरोप का पूरा पूर्वी हिस्सा सोवियत संघ के दबदबे में रहे। पूर्वी और दक्षिण-पूर्व एशिया तथा पश्चिम एशिया में अमरीका ने गठबंधन का तरीका अपनाया। इन गठबंधनों को दक्षिण-पूर्व एशियाई संधि संगठन (SEATO) और केन्द्रीय संधि संगठन कहा जाता है।

प्रश्न 39.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की सटीक परिभाषा कर पाना मुश्किल है। इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समय के साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सदस्यों की संख्या बढ़ती गई। 2019 में अजरबेजान में हुए 18वें सम्मेलन में 120 सदस्य देश और 17 पर्यवेक्षक देश शामिल हुए। जैसे-जैसे गुटनिरपेक्ष आंदोलन एक लोकप्रिय अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में बढ़ता गया वैसे-वैसे इसमें विभिन्न राजनीतिक प्रणाली और अलग-अलग हितों के देश शामिल होते गए। इससे गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मूल स्वरूप में बदलाव आया इसी कारण गुटनिरपेक्ष आंदोलन की सटीक परिभाषा कर पाना मुश्किल है।

प्रश्न 40.
गुटनिरपेक्षता के आंदोलन की बदलती प्रकृति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
समय बीतने के साथ गुटनिरपेक्षता की प्रकृति भी बदली तथा इसमें आर्थिक मुद्दों को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा। बेलग्रेड में हुए पहले सम्मेलन (1961) में आर्थिक मुद्दे ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं थे। सन् 1970 के दशक के मध्य तक आर्थिक मुद्दे प्रमुख हो उठे। इसके परिणामस्वरूप गुटनिरपेक्ष आंदोलन आर्थिक दबाव समूह बन गया। सन् 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध तक नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को बनाये चलाये रखने के प्रयास मंद पड़ गए।

प्रश्न 41.
” अमरीका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराना एक राजनीतिक खेल था। ” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अगस्त, 1945 में अमरीका ने जापान के दो शहर हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए और तब जापान को आत्मसमर्पण करना पड़ा इसके साथ ही द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति हो गई। यद्यपि अमरीका इस बात को जानता था कि जापान आत्मसमर्पण करने वाला है। अमरीका की इस कार्रवाई का लक्ष्य सोवियत संघ को एशिया तथा अन्य जगहों पर सैन्य और राजनीतिक लाभ उठाने से रोकना था। वह सोवियत संघ के सामने यह भी जाहिर करना चाहता था कि अमरीका ही सबसे बड़ी ताकत है। अर्थात् यह कहा जा सकता है कि अमरीका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराना एक राजनीतिक खेल था।

प्रश्न 42.
हथियारों की होड़ पर लगाम लगाने हेतु महाशक्तियों द्वारा किए गए प्रयत्नों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दोनों महाशक्तियों को इस बात का अंदाजा था कि परमाणु युद्ध दोनों के लिए विनाशकारी होगा। इस कारण, अमेरिका और सोवियत संघ ने कुछेक परमाण्विक और अन्य हथियारों को सीमित या समाप्त करने हेतु आपस में सहयोग का फैसला किया। अतः दोनों ने ‘अस्त्र – नियन्त्रण’ का फैसला किया। इस प्रयास की शुरुआत 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध में हुई और एक ही दशक के भीतर दोनों पक्षों ने तीन अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किए। ये समझौते थे– परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि, परमाणु अप्रसार सन्धि और परमाणु प्रक्षेपास्त्र परिसीमन सन्धि तत्पश्चात् महाशक्तियों ने ‘अस्त्र परिसीमन के लिए वार्ताओं के कई दौरे किए और हथियारों पर अंकुश रखने के लिए अनेक सन्धियाँ कीं।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
क्यूबा का मिसाइल संकट क्या था? यह संकट कैसे टला ? क्यूबा का मिसाइल संकट
उत्तर:
क्यूबा में सोवियत संघ द्वारा परमाणु मिसाइलें तैनात करना: सोवियत संघ के नेता नीकिता ख्रुश्चेव ने अमरीका के तट पर स्थित एक छोटे से द्वीपीय देश क्यूबा को रूस के ‘सैनिक अड्डे’ के रूप में बदलने हेतु 1962 में क्यूबा परमाणु मिसाइलें तैनात कर दीं।

अमरीका का नजदीकी निशाने की सीमा में आना: मिसाइलों की तैनाती से पहली बार अमरीका नजदीकी निशाने की सीमा में आ गया। अब सोवियत संघ पहले की तुलना में अमरीका के मुख्य भू-भाग के लगभग दोगुने ठिकानों या शहरों पर हमला बोल सकता था।

अमरीका की प्रतिक्रिया तथा सोवियत संघ को संयम भरी चेतावनी: क्यूबा में इन परमाणु मिसाइलों की तैनाती की जानकारी अमरीका को तीन हफ्ते बाद लगी। इसके बाद अमरीकी राष्ट्रपति कैनेडी ने आदेश दिया कि अमरीकी जंगी बेड़ों को आगे करके क्यूबा की तरफ जाने वाले सोवियत जहाजों को रोका जाये। अमरीका की इस चेतावनी से ऐसा लगा कि युद्ध होकर रहेगा। इसी को क्यूबा मिसाइल संकट के रूप में जाना गया।

सोवियत संघ का संयम भरा कदम और संकट की समाप्ति: अमरीका की गंभीर चेतावनी को देखते हुए सोवियत संघ ने संयम से काम लिया और युद्ध को टालने का फैसला किया। सोवियत संघ के जहाजों ने या तो अपनी गति धीमी कर ली या वापसी का रुख कर लिया। इस प्रकार क्यूबा मिसाइल संकट टल गया।

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प्रश्न 2.
शीतयुद्ध से आप क्या समझते हैं? अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों पर इसके प्रभाव का परीक्षण कीजिये । उत्तर- शीत युद्ध का अर्थ – द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से लेकर 1990 तक विश्व राजनीति में दो महाशक्तियों- अमेरिका और सोवियत संघ के नेतृत्व में उदारवादी पूँजीवादी गुट तथा साम्यवादी समाजवादी गुट के बीच जो शक्ति व प्रभाव विस्तार की प्रतिद्वन्द्विता चलती रही, उसे शीत युद्ध का नाम दिया गया। दोनों के बीच यह वाद-विवादों, पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो प्रसारणों तथा भाषणों से लड़ा जाने वाला युद्ध; शस्त्रों की होड़ को बढ़ाने वाली एक सैनिक प्रवृत्ति तथा दो भिन्न विचारधाराओं का युद्ध था। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर शीतयुद्ध का प्रभाव: अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर शीत युद्ध के नकारात्मक और सकारात्मक दोनों प्रकार के प्रभाव पड़े। यथा
(अ) नकारात्मक प्रभाव:

  1. शीत युद्ध ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में भय और सन्देह के वातावरण को निरन्तर बनाए रखा।
  2. इसने सैनिक गठबन्धनों को जन्म दिया; सैनिक अड्डों की स्थापना की, शस्त्रों की दौड़ तेज की और विनाशकारी शस्त्रों के निर्माण को बढ़ावा दिया।
  3. इसने विश्व में दो विरोधी गुटों को जन्म दिया।
  4. इसके कारण सम्पूर्ण विश्व पर परमाणु युद्ध का भय छाया रहा।
  5. शीत युद्ध ने निःशस्त्रीकरण के प्रयासों को अप्रभावी बना दिया।

(ब) सकारात्मक प्रभाव-

  1. शीत युद्ध के कारण गुटनिरपेक्ष आंदोलन का जन्म तथा विकास हुआ।
  2. इसकी भयावहता के कारण शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को प्रोत्साहन मिला।
  3. इसके कारण आणविक शक्ति के क्षेत्र में तकनीकी और प्राविधिक विकास को प्रोत्साहन मिला।
  4. इसने नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना को प्रोत्साहित किया।

प्रश्न 3.
शीतयुद्ध के उदय के प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिये।
उत्तर:
शीत
युद्ध
शीत युद्ध के उदय के कारण के उदय के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:

  1. परस्पर सन्देह एवं भय: दोनों गुटों के बीच शीत युद्ध के प्रारंभ होने का प्रमुख कारण परस्पर संदेह, अविश्वास तथा डर का व्याप्त होना था।
  2. विरोधी विचारधारा: दोनों महाशक्तियों के अनुयायी देश परस्पर विरोधी विचारधारा वाले देश थे। विश्व में. दोनों ही अपना-अपना प्रभाव – क्षेत्र बढ़ाने में लगे थे।
  3. अणु बम का रहस्य सोवियत संघ से छिपाना: अमरीका ने अणु बम बनाने का रहस्य सोवियत संघ से छुपाया। जापान पर जब उसने अणु बम गिरा कर द्वितीय विश्व युद्ध को समाप्त किया तो सोवियत संघ ने इसे अपने विरुद्ध भी समझा। इससे दोनों महाशक्तियों के बीच दरार पड़ गयी।
  4. अमेरिका और सोवियत संघ का एक-दूसरे का प्रतिद्वन्द्वी बनना: अमरीका और सोवियत संघ का महाशक्ति बनने की होड़ में एक-दूसरे के मुकाबले खड़ा होना शीत युद्ध का कारण बना।
  5. अपरोध का तर्क: शीत युद्ध शुरू होने के पीछे यह समझ भी कार्य कर रही थी कि परमाणु युद्ध की सूरत में दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। इसे अपरोध का तर्क कहा गया।

प्रश्न 4.
शीत युद्धकालीन द्वि-ध्रुवीय विश्व की चुनौतियों का वर्णन करें।
उत्तर:
शीत युद्धकालीन द्वि-ध्रुवीय विश्व की चुनौतियाँ – शीत युद्ध के दौरान विश्व दो प्रमुख गुटों में बँट गया एक गुट का नेतृत्व संयुक्त राज्य अमेरिका कर रहा था और दूसरे गुट का नेतृत्व सोवियत संघ कर रहा था। लेकिन शीत युद्ध के दौरान ही द्विध्रुवीय विश्व को चुनौतियाँ मिलना शुरू हो गयी थीं। ये चुनौतियाँ निम्नलिखित थीं-
1. गुटनिरपेक्ष आंदोलन:
शीत युद्ध के दौरान द्विध्रुवीय विश्व को सबसे बड़ी चुनौती गुटनिरपेक्ष आंदोलन से मिली। गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने अल्पविकसित तथा विकासशील नव-स्वतंत्र देशों को दोनों गुटों से अलग रहने का तीसरा विकल्प दिया। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के देशों ने स्वतंत्र विदेश नीति अपनायी; शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिद्वन्द्वी गुटों के बीच मध्यस्थता में सक्रिय भूमिका निभायी।

2. नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था:
नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था ने भी द्विध्रुवीय विश्व को चुनौती दी। मई, 1974 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के छठे विशेष अधिवेशन में महासभा ने पुरानी विश्व अर्थव्यवस्था को समाप्त करके एक नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना के लिए विशेष कार्यक्रम बनाया; गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों ने भी इसकी स्थापना के लिए दबाव बनाया।

3. साम्यवादी गठबंधन में दरार पड़ना:
साम्यवादी चीन की 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध में सोवियत संघ से अनबन हो गई। 1971 में अमरीका ने चीन के नजदीक आने के प्रयास किये इस प्रकार साम्यवादी गठबंधन में दरार पड़ने से भी द्विध्रुवीय विश्व को चुनौती मिली।

प्रश्न 5.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन से आप क्या समझते हैं? इसकी प्रकृति एवं सिद्धान्तों की विवेचना कीजिये।
उत्तर:
गुटनिरपेक्षता का अर्थ- गुटनिरपेक्षता का अर्थ है। दोनों महाशक्तियों के गुटों से अलग रहना। यह महाशक्तियों के गुटों में शामिल न होने तथा अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाते हुए विश्व राजनीति में शांति और स्थिरतां के लिए सक्रिय रहने का आंदोलन है। अतः गुटनिरपेक्षता का अर्थ है – किसी भी देश को प्रत्येक मुद्दे पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय लेने की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय हित एवं विश्व शांति के आधार पर गुटों से अलग रहते हुए स्वतन्त्र विदेश नीति अपनाने की स्वतन्त्रता।

गुटनिरपेक्षता की प्रकृति एवं सिद्धान्त; गुटनिरपेक्षता की प्रकृति को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है-

  1. गुटनिरपेक्षता पृथकतावाद नहीं: पृथकतावाद का अर्थ होता है कि अपने को अन्तर्राष्ट्रीय मामलों से काटकर रखना। जबकि गुटनिरपेक्षता की नीति विश्व के मामलों में सक्रिय रहने की नीति है।
  2. गुटनिरपेक्ष तटस्थता नहीं है: तटस्थता का अर्थ होता है। मुख्य रूप से युद्ध में शामिल न होने की नीति का पालन करना। जबकि गुटनिरपेक्ष देश युद्ध में शामिल हुए हैं। इन देशों ने दूसरे देशों के बीच युद्ध को होने से टालने के लिए काम किया है और हो रहे युद्ध के अंत के लिए प्रयास भी किये हैं।
  3. विश्व शांति की चिन्ता: गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रमुख चिंता विश्व में शांति स्थापित करना है।
  4. आर्थिक सहायता लेना: गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल देश अपने आर्थिक विकास के लिए आर्थिक सहायता प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं, ताकि वे अपना आर्थिक विकास कर आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर हो सकें।
  5. नई अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था की स्थापना: गुटनिरपेक्ष देशों ने नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की धारणा का समर्थन किया और इसकी स्थापना के लिए अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में दबाव बनाया।

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प्रश्न 6.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक नेता कौन थे? गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत की भूमिका बताइये
उत्तर:
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक:
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की जड़ में यूगोस्लाविया के जोसेफ ब्रॉज टीटो, भारत के जवाहर लाल नेहरू और मिस्र के गमाल अब्दुल नासिर प्रमुख थे। इंडोनेशिया के सुकर्णो और घाना के वामे एनक्रूमा ने इनका जोरदार समर्थन किया। ये पांच नेता गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक कहलाये।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत की भूमिका:
गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत की भूमिका को निम्न प्रकार स्पष्ट किया गया है-

  1. गुटनिरपेक्ष आंदोलन का संस्थापक – भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का संस्थापक सदस्य रहा है। भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्षता की नीति का प्तिपादन किया।
  2. स्वयं को महाशक्तियों की खेमेबन्दी से अलग रखा – शीत युद्ध के दौर में भारत ने सजग और सचेत रूप से अपने को दोनों महाशक्तियों की खेमेबन्दी से दूर रखा।
  3. नव – स्वतंत्र देशों को आंदोलन में आने की ओर प्रेरित किया- भारत ने नव-स्वतंत्र देशों को महाशक्तियों के खेमे में जाने का पुरजोर विरोध किया तथा उनके समक्ष तीसरा विकल्प प्रस्तुत करके उन्हें गुटनिरपेक्ष आंदोलन का सदस्य बनने को प्रेरित किया।
  4. विश्व शांति और स्थिरता के लिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन को सक्रिय रखना – भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में सक्रिय हस्तक्षेप की नीति अपनाने पर बल दिया।
  5. वैचारिक एवं संगठनात्मक ढाँचे का निर्धारण- गुटनिरपेक्ष आंदोलन के वैचारिक एवं संगठनात्मक ढाँचे के निर्धारण में भारत की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।
  6. समन्वयकारी भूमिका – भारत ने समन्वयकारी भूमिका निभाते हुए सदस्यों के बीच उठे विवादास्पद मुद्दों को टालने या स्थगित करने पर बल देकर आंदोलन को विभाजित होने से बचाया।

प्रश्न 7.
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति का आलोचनात्मक विवेचना कीजिये।
उत्तर:
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति का आलोचनात्मक विवेचना:
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति का आलोचनात्मक विवेचन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया गया है। भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति के लाभ गुटनिरपेक्षता की नीति ने निम्न क्षेत्रों में भारत का प्रत्यक्ष रूप से हित साधन किया है।

  1. राष्ट्रीय हित के अनुरूप फैसले: गुटनिरपेक्षता की नीति के कारण भारत ऐसे अन्तर्राष्ट्रीय फैसले और पक्ष ले सका जिनसे उसका हित सधता था, न कि महाशक्तियों और उनके खेमे के देशों का।
  2. अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में अपने महत्त्व को बनाए रखने में सफल: गुटनिरपेक्ष नीति अपनाने के कारण भारत हमेशा इस स्थिति में रहा कि अगर भारत को महसूस हो कि महाशक्तियों में से कोई उसकी अनदेखी कर रहा है या अनुचित दबाव डाल रहा है, तो वह दूसरी महाशक्ति की तरफ अपना रुख कर सकता था। दोनों गुटों में से कोई भी भारत सरकार को लेकर न तो बेफिक्र हो सकता था और न ही धौंस जमा सकता था।

भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति की आलोचना: भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति की निम्नलिखित कारणों से आलोचना की गई है।
1. सिद्धान्तविहीन नीति:
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति सिद्धान्तविहीन है। कहा जाता है कि भारत के अपने राष्ट्रीय हितों को साधने के नाम पर अक्सर महत्त्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय मामलों पर कोई सुनिश्चित पक्ष लेने से बचता रहा।

2. अस्थिर नीति: भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति में अस्थिरता रही है और कई बार तो भारत की स्थिति विरोधाभासी रही।

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प्रश्न 8.
शीत युद्ध काल में दोनों महाशक्तियों द्वारा निःशस्त्रीकरण की दिशा में किये गये प्रयासों का उल्लेख कीजिये
उत्तर:
निःशस्त्रीकरण के प्रयास: शीत युद्ध काल में दोनों पक्षों ने निःशस्त्रीकरण की दिशा में निम्नलिखित प्रमुख प्रयास किये
1. सीमित परमाणु परीक्षण संधि (एलटीबीटी):
1963, वायुमण्डल, बाहरी अंतरिक्ष तथा पानी के अन्दर परमाणु हथियारों के परीक्षण पर प्रतिबंध लगाने के लिए अमरीका, ब्रिटेन तथा सोवियत संघ ने मास्को में 5 अगस्त, 1963 को इस संधि पर हस्ताक्षर किये। यह संधि 10 अक्टूबर, 1963 से प्रभावी हो गयी।

2. परमाणु अप्रसार संधि, 1967: यह संधि केवल पांच परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों को ही एटमी हथियार रखने की अनुमति देती है और शेष सभी देशों को ऐसे हथियार हासिल करने से रोकती है। यह संधि 5 मार्च, 1970 से प्रभावी हुई। इस संधि को 1995 में अनियतकाल के लिए बढ़ा दिया गया है।

3. सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता – I ( स्ट्रेटजिक आर्म्स लिमिटेशन टॉक्स – साल्ट – I) सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता का पहला चरण सन् 1969 के नवम्बर में आरंभ हुआ सोवियत संघ के नेता लियोनेड ब्रेझनेव और अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने मास्को में 26 मई, 1972 को निम्नलिखित समझौते पर हस्ताक्षर किए-
(क) परमाणु मिसाइल परिसीमन संधि (एबीएम ट्रीटी)।
(ख) सामरिक रूप से घातक हथियारों के परिसीमन के बारे में अंतरिम समझौता। ये अक्टूबर, 1972 से प्रभावी

4. सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता – II ( स्ट्रेटजिक आर्म्स लिमिटेशन टॉक्स – सॉल्ट – II ) यह संधि अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर और सोवियत संघ के नेता लियोनेड ब्रेझनेव के बीच 18 जून, 1979 को हुआ था। इस संधि का उद्देश्य सामरिक रूप से घातक हथियारों पर प्रतिबंध लगाना था।

5. सामरिक अस्त्र न्यूनीकरण संधि – I: अमरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश (सीनियर) और सोवियत संघ के राष्ट्रपति गोर्बाचेव ने 31 जुलाई, 1991 को घातक हथियारों के परिसीमन और उनकी संख्या में कमी लाने से संबंधित संधि पर हस्ताक्षर किए।

6. सामरिक अस्त्र न्यूनीकरण संधि – II: सामरिक रूप से घातक हथियारों को सीमित करने और उनकी संख्या में कमी करने हेतु इस संधि पर रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन और अमरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश (सीनियर) ने मास्को में 3 जनवरी, 1993 को हस्ताक्षर किए।

प्रश्न 9.
नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था से आप क्या समझते हैं? इसके बुनियादी सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से आशय – नई अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में जिन बातों पर जोर दिया गया है, वे हैं। विकासशील देशों को खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना; साधनों को विकसित देशों से विकासशील देशों में भेजना अल्प विकसित देशों का अपने उन प्राकृतिक साधनों पर नियंत्रण प्राप्त हो, जिनका दोहन पश्चिमी विकसित देश करते हैं; अल्प विकसित देशों की पहुँच पश्चिमी देशों के बाजार तक हो तथा पश्चिमी देशों से मंगायी जा रही प्रौद्योगिकी की लागत कम हो। नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद तथा नव उपनिवेशवाद व नव-साम्राज्यवाद को उनके सभी रूपों में समाप्त करना चाहती है। यह न्याय तथा समानता पर आधारित, लोकतंत्र के सिद्धान्त पर आधारित अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था है।

नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के मूल सिद्धान्त: नवीन अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के मूल सिद्धान्त इस प्रकार हैं-

  1. खनिज पदार्थों और समस्त प्रकार के आर्थिक क्रियाकलापों पर उसी राष्ट्र की संप्रभुता की स्थापना करना।
  2. कच्चे माल और तैयार माल की कीमतों में ज्यादा अन्तर न होना।
  3. विकसित देशों के साथ व्यापार की वरीयता का विस्तार करना।
  4. विकासशील देशों द्वारा उत्पादित औद्योगिक माल के निर्यात को प्रोत्साहन देना।
  5. विकासशील देशों द्वारा विकसित देशों के मध्य तकनीकी विकास की खाई को पाटना।
  6. विकासशील देशों पर वित्तीय ऋणों के भार को कम करना।
  7. बहुराष्ट्रीय निगमों की गतिविधियों पर समुचित नियंत्रण लगाना।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

प्रश्न 10.
नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की स्थापना हेतु विभिन्न संगठनों द्वारा किये गये प्रयासों का वर्णन करें।
उत्तर:
नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की स्थापना हेतु विभिन्न संगठनों द्वारा किये गये प्रयास 70 के दशक में नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की स्थापना के लिए विभिन्न स्तरों पर अनेक प्रयास हुए हैं।

1. संयुक्त राष्ट्र संघ के स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ के स्तर पर ‘अंकटाड’ तथा ‘यू.एन.आई.डी. ओ. के माध्यम से अनेक प्रयत्न किये गये:
(अ) अंकटाड के स्तर पर 1964 से लेकर कई सम्मेलन हुए जिनका उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को संप्रभुता सम्पन्न, समानता तथा सहयोग के आधार पर पुनर्गठित करना रहा है जिससे इसको न्याय पर आधारित बनाया जा सके। 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ के व्यापार एवं विकास से संबंधित सम्मेलन वैश्विक व्यापार प्रणाली में सुधार का प्रस्ताव किया गया ताकि अल्प विकसित देशों के अपने समस्त प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण प्राप्त हो सके, वे अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अपना माल बेच सकें। कम लागत से उन्हें प्रौद्योगिकी मिल सके आदि।

(ब) यू.एन.आई.डी.ओ. के माध्यम से विकासशील देशों में औद्योगीकरण की गति को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया हैं

2. गुटनिरपेक्ष आंदोलन के स्तर पर: 1970 के दशक में गुटनिरपेक्ष आंदोलन आर्थिक दबाव समूह बन गया । इन देशों की पहल के क्रियान्वयन के रूप में संयुक्त राष्ट्र महासभा का छठा अधिवेशन बुलाया गया जिसने ‘नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था’ स्थापित करने की घोषणा की।

3. विकासशील राष्ट्रों के स्तर पर: 1982 में दिल्ली में हुए विकासशील देशों के सम्मेलन में इनको आत्मनिर्भर बनाने के लिए आह्वान किया गया और नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था में सहयोग हेतु आठ सूत्री कार्यक्रम रखा गया। इसमें संरक्षणवाद की समाप्ति पर भी बल दिया गया।

प्रश्न 11.
‘अपरोध’ का तर्क किसे कहा गया है? विस्तार में समझाइये।
उत्तर:
दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति से ही शीतयुद्ध की शुरुआत हुई। विश्वयुद्ध की समाप्ति के कारण कुछ भी हो परंतु इसका परिणामस्वरूप वैश्विक राजनीति के मंच पर दो महाशक्तियों का उदय हो गया। जर्मनी और जापान हार चुके थे और यूरोप तथा शेष विश्व विध्वंस की मार झेल रहे थे। अब अमरीका और सोवियत संघ विश्व की सबसे बड़ी शक्ति थे। इनके पास इतनी क्षमता थी कि विश्व की किसी भी घटना को प्रभावित कर सके। अमरीका और सोवियत संघ का महाशक्ति बनने की होड़ में एक-दूसरे के मुकाबले खड़ा होना शीतयुद्ध का कारण बना। शीतयुद्ध शुरू होने के पीछे यह समझ भी काम कर रही थी कि परमाणु बम होने वाले विध्वंस की मार झेलना किसी भी राष्ट्र के बूते की बात नहीं।

जब दोनों महाशक्तियों के पास इतनी क्षमता के परमाणु हथियार हों कि वे एक-दूसरे को असहनीय क्षति पहुँचा सके तो ऐसे में दोनों के बीच रक्तरंजित युद्ध होने की संभावना कम रह जाती है। उकसावे के बावजूद कोई भी पक्ष युद्ध का जोखिम मोल लेना नहीं चाहेंगा क्योंकि युद्ध से राजनीतिक फायदा चाहे किसी को भी हो, लेकिन इससे होने वाले विध्वंस को औचित्यपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता। परमाणु युद्ध की सूरत में दोनों पक्षों को इतना नुकसान उठाना पड़ेगा कि उनमें से विजेता कौन है – यह तय करना भी मुश्किल होगा। यदि कोई अपने शत्रु पर आक्रमण करके उसके परमाणु हथियारों को नाकाम करने की कोशिश करता है तब भी दूसरे के पास उसे बर्बाद करने लायक हथियार बच जाएँगे। इसे ‘अपरोध’ का तर्क कहा गया है।

JAC Class 9 Hindi व्याकरण प्रत्यय

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JAC Board Class 9 Hindi Vyakaran प्रत्यय

परिभाषा – जो शब्दांश धातु रूप या शब्दों के अंत में लगकर उनके अर्थ में परिवर्तन कर देते हैं व नए शब्दों को बनाते हैं, उन्हें प्रत्यय कहते हैं। ये मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं कृते प्रत्यय, तद्धित प्रत्यय।

(क) कृत प्रत्यय – जो प्रत्यय क्रिया के मूल धातु रूप के साथ लगकर संज्ञा और विशेषण को बनाते हैं, उन्हें कृत प्रत्यय कहते हैं। जैसे –
बुलवा – बोल + आवा, दौड़ना – दौड़ + ना!

(ख) तद्धित प्रत्यय – जो प्रत्यय क्रिया के धातु रूपों को छोड़कर संज्ञा, विशेषण, सर्वनाम आदि के साथ लगकर नए शब्द बनाते हैं, उन्हें तद्धित प्रत्यय कहते हैं। जैसे – गुस्सैल – गुस्सा + ऐल, रंगत – रंग + ता।

1. हिंदी के कृत प्रत्यय – अंत, अक्कड, अन्, आलू, आवा, आवना, आवट, आ, आई, आऊ, आक, आका, आक्, आन, आव, आस, आहट, इयल, इया, ई, उ, एटा, ऐत, ऐया, ऐल, धौती, औना, क, या, वाई, ना, ती, ता, त, कर।
2. संस्कृत के कृत प्रत्यय – अन, अना, अनीय, आ, ई, उक, ऐया, क, ता, ति, य, र, व्य, स्थ।
3. हिंदी के तद्धित प्रत्यय – आ, आई, आऊ, आना, आनी, आर, आरी, आस, आहट इक, इन, इया, ई, ईना, ईला, अ, ऐं एटा, एल, ऐल, क, कार, खोर, गुना, गर, चो, डा, डी, त, तया, दार, पन, पा, रौं, री, ला, वाँ, वान, वाला, सरा, सार, हरा, हार, हारा।
4. संस्कृत के तद्धित प्रत्यय – अ, आलु, इक, इत, इमा, इल, ईय, तः, तम, ता, त्व, नीय, मान, य, व, वान।
5. उर्दू के प्रत्यय – आना, इंदा, इश, ई, ईना, दान, मंद, बाज।

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1. कर्तृवाचक तद्धित

जो शब्द क्रिया के अतिरिक्त अन्य शब्दों में प्रत्यय लगने से बनते हैं और संज्ञा बनकर वाक्यों में कर्ता के रूप में प्रयुक्त होते हैं, उन्हें कर्तृवाचक तद्धित कहते हैं।
ये शब्द प्रायः जातिवाचक और व्यक्तिवाचक संज्ञाओं से बनते हैं।

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JAC Class 9 Hindi व्याकरण प्रत्यय

2. भाववाचकतद्धित

संज्ञा और विशेषण या क्रिया – शब्दों में प्रत्यय लगाने से जो शब्द बनते हैं, वे भाववाचक तद्धित होते हैं ।
भाववाचक संज्ञाएँ निम्नलिखित तीन रीतियों से बनाई जाती हैं –

1. जातिवाचक संज्ञा से

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2. विशेषण शब्दों से

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3. क्रिया शब्दों से

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उर्दू के भाववाचक प्रत्यय

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3. विशेषण प्रत्यय

संज्ञा या क्रिया शब्दों में जिन प्रत्यय को लगाने से विशेषण शब्द बनाए जाते हैं, उन्हें विशेषण प्रत्यय कहते हैं।

संज्ञा से विशेषण

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क्रिया से विशेषण

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4. लघुतावाचक तद्धित – जातिवाचक

संज्ञाओं में इया, ई, डा, री आदि प्रत्ययों के प्रयोग से लघुतावाचक तद्धित शब्द बनते हैं।

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JAC Class 9 Hindi व्याकरण उपसर्ग

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JAC Board Class 9 Hindi Vyakaran उपसर्ग

परिभाषा – उपसर्ग उस शब्दांश अथवा अव्यय को कहते हैं, जो किसी शब्द से पूर्व जुड़कर विशेष अर्थ प्रकट करता है।
उपसर्ग निम्नलिखित कार्य करते हैं –

  1. उपसर्ग के प्रयोग से शब्द के अर्थ में नवीनता आ जाती है।
  2. उपसर्ग के प्रयोग से शब्द के अर्थ में कोई अंतर नहीं आता।
  3. उपसर्ग के प्रयोग से शब्द के अर्थ में विपरीतता आ जाती है।

JAC Class 9 Hindi व्याकरण उपसर्ग

तत्सम उपसर्ग (संस्कृत के उपसर्ग)

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संस्कृत में कभी-कभी एक से अधिक उपसर्गों का प्रयोग भी होता है, जैसे –

निर् + अप + राध = निरपराध
वि + आ + करण = व्याकरण
सम + आ + लोचना = समालोचना
सु + वि + ख्यात = सुविख्यात

JAC Class 9 Hindi व्याकरण उपसर्ग

उपसर्ग के समान कुछ अन्य अव्यय

ये शब्दांश विशेषण अथवा अव्यय हैं, जो उपसर्ग के रूप में प्रयुक्त होते हैं।

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हिंदी के उपसर्ग

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उर्दू के उपसर्ग

JAC Class 9 Hindi व्याकरण उपसर्ग 4

अंग्रेज़ी के उपसर्ग

JAC Class 9 Hindi व्याकरण उपसर्ग 5

JAC Class 9 Hindi अपठित बोध अपठित गद्यांश

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JAC Board Class 9 Hindi अपठित बोध अपठित गद्यांश

अपठित-बोध के अंतर्गत विद्यार्थी को किसी अपठित गद्यांश और काव्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर देने हैं। उत्तर देने से पूर्व अपठित को अच्छी प्रकार से पढ़कर समझ लेना चाहिए। जिन प्रश्नों के उत्तर पूछे जाते हैं, वे उसी में ही छिपे रहते हैं। उत्तर पूर्ण रूप से सटीक होने चाहिए। काव्यांश पर आधारित प्रश्नों में भावात्मकता, लाक्षणिकता और प्रतीकात्मकता की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। अपठित का शीर्षक भी पूछा जाता है। शीर्षक अपठित में व्यक्त भावों के अनुरूप होना चाहिए। ध्यान रहे कि शीर्षक से अपठित का मूल – भाव भी स्पष्ट होना चाहिए। व्याकरण से संबंधित प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं।

अपठित गद्यांश के महत्वपूर्ण उदाहरण –

निम्नलिखित गद्यांशों को ध्यानपूर्वक पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए –

1. भाषा और धर्म किसी भी संस्कृति के मूलाधार होते हैं। धर्म वह मूल्य तय करता है जिनसे जनसमूह संचालित होते हैं और भाषा सनातन मानव परंपराओं की वाहक और नई अभिव्यक्ति का वाहन दोनों है। निर्मल के रचना संसार में भारतीय धर्मों और भाषाओं की आश्यचर्यपूर्ण भिन्नता के प्रति एक सहज उत्सुकता और आदर का भाव हर कहीं है लेकिन इसी के साथ एक त्रासद अहसास भी है कि असली लड़ाई बाहरी युद्ध क्षेत्रों में नहीं, मनुष्यों के मनों में चलती है और आवश्यकता नहीं कि उस लड़ाई में जीत हमेशा उदात्त, धैर्यवान और क्षमाशील तत्वों की ही हो।

इस दर्शन के कारण आदमी, देवता, नदी, पर्वत, वनोपवन से जुड़े मिथकों की एक धुंध हमेशा उनके मन को आधुनिक जीवन जीने के बीच स्वदेश, परदेश पर कहीं घेरे रहती है। ” मिथक मनुष्य को ‘सर्जना’ उतनी नहीं, जितना वह मनुष्य की अज्ञात, अनाम, सामूहिक चेनता का अंग हैं इसके द्वारा अर्थ ग्रहण किया जाता है।…. कला चेतना की उपज है (जो)….. उदात्ततम क्षणों में मिथक होने का स्वप्न देखती है….. जिसमें व्यक्ति और समूह का भेद मिट जाता है।”

प्रश्न :

  1. ‘संस्कृति’ और ‘सामूहिक’ शब्दों में प्रत्यय लिखिए।
  2. संस्कृति के मूलाधार किसे माना जाता है ?
  3. निर्मल वर्मा के साहित्य में क्या उपलब्ध होता है ?
  4. कला क्या है ?
  5. संस्कृति के अनुशासन से क्या उत्पन्न होता है ?
  6. गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।

उत्तर :

  1. ‘इ’ और ‘इक’।
  2. संस्कृति के मूलाधार भाषा और धर्म को माना जाता है क्योंकि इन्हीं के द्वारा जीवन मूल्य और सनातन परंपराओं का वहन और जीवन का संचालन होता है।
  3. निर्मल वर्मा के साहित्य में भारतीय धर्मों और भाषाओं की आश्चर्यजनक उत्सुकता और आदर का भाव विद्यमान है। साथ ही मानव के मन में उत्पन्न होने वाले भिन्न-भिन्न भाव भी उपलब्ध होते हैं।
  4. कला चेतना की उपज है जिसमें मिथकों के माध्यम से व्यक्ति और समूह का भेद मिट जाता है।
  5. संस्कृति के अनुशासन से किसी लेखक में सच्चे और कठोर आत्मालोचन की क्षमता उत्पन्न होती है। इससे संस्कृति के नए आयाम रचने की शक्ति मिलती है।
  6. भाषा और धर्म।

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2. हमारा हिमालय से कन्याकुमारी तक फैला हुआ देश, आकार और आत्मा दोनों दृष्टियों से महान और सुंदर है। उसका बाह्य सौंदर्य विविधता की सामंजस्यपूर्ण स्थिति है और आत्मा का सौंदर्य विविधता में छिपी हुई एकता की अनुभूति है। चाहे कभी न गलने वाला हिम का प्राचीर हो, चाहे कभी न जमने वाला अतल समुद्र हो, चाहे किरणों की रेखाओं से खचित हरीतिमा हो, चाहे एकरस शून्यता ओढ़े हुए मरु हो, चाहे साँवले भरे मेघ हों, चाहे लपटों में साँस लेता हुआ बवंडर हो, सब अपनी भिन्नता में भी एक ही देवता के विग्रह को पूर्णता देते हैं। जैसे मूर्ति के एक अंग का टूट जाना संपूर्ण देव – विग्रह को खंडित कर देता है, वैसे ही हमारे देश की अखंडता के लिए विविधता की स्थिति है।

यदि इस भौगोलिक विविधता में व्याप्त सांस्कृतिक एकता न होती, तो यह विविध नदी, पर्वत, वनों का संग्रह मात्र रह जाता। परंतु इस महादेश की प्रतिभा ने इसकी अंतरात्मा को एक रसमयता में प्लावित करके इसे विशिष्ट व्यक्तित्व प्रदान किया है, जिससे यह आसमुद्र एक नाम की परिधि में बँध जाता है। हर देश अपनी सीमा में विकास पाने वाले जीवन के साथ एक भौतिक इकाई है, जिससे वह समस्त विश्व की भौतिक और भौगोलिक इकाई से जुड़ा हुआ है। विकास की दृष्टि से उसकी दूसरी स्थिति आत्म-रक्षात्मक तथा व्यवस्थापरक राजनीतिक सत्ता में है।

प्रश्न :

  1. अवतरण का उचित शीर्षक दीजिए।
  2. ‘सुंदरता’ और ‘भौगोलिक’ में प्रत्यय बताइए।
  3. कौन एक ही देवता के विग्रह को पूर्णता प्रदान करते हैं ?
  4. हमारे देश की अखंडता के लिए विविधता की स्थिति कैसी है ?
  5. विकास की दृष्टि से किसी देश की स्थिति किसमें है?
  6. हमारे देश की अखंडता के लिए कैसी स्थिति आवश्यक है ?

उत्तर :

  1. देश की सांस्कृतिक एकता।
  2. ‘ता’ और ‘इक’।
  3. ऊँचे-ऊँचे बर्फ से ढके पर्वत, अतल गहराई वाले सागर, रेगिस्तान घने काले बादल, बवंडर आदि देवता के विग्रह को पूर्णता प्रदान करते हैं।
  4. हमारे देश की अखंडता के लिए विविधता की स्थिति वैसी ही है जैसे किसी मूर्ति की पूर्णता। मूर्ति का एक अंग भी टूट जाना देव-विग्रह को जैसे खंडित कर देता है वैसे ही हमारे देश की अखंडता है।
  5. विकास की दृष्टि से किसी देश की स्थिति आत्मरक्षात्मक और व्यवस्थात्मक राजनीतिक सत्ता में है। वह उसकी सांस्कृतिक गतिशीलता में है।
  6. हमारे देश की अखंडता के लिए विविधता की स्थिति आवश्यक है।

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3. आज हम एक स्वतंत्र राष्ट्र की स्थिति पा चुके हैं, राष्ट्र की अनिवार्य विशेषताओं में दो हमारे पास हैं – भौगोलिक अखंडता और सांस्कृतिक एकता, परंतु अब तक हम उस वाणी को प्राप्त नहीं कर सके हैं जिसमें एक स्वतंत्र राष्ट्र दूसरे राष्ट्रों के निकट अपना परिचय देता है जहाँ तक बहुभाषा- भाषी होने का प्रश्न है, ऐसे देश की संख्या कम नहीं है जिनके भिन्न भागों में भिन्न भाषाओं की स्थिति है। पर उनकी अविच्छिन्न स्वतंत्रता की के परंपरा ने उन्हें सम-विषम स्वरों से एक राग रच लेने की क्षमता दे दी है।

हमारे देश की कथा कुछ दूसरी है। हमारी परतंत्रता आँधी-तूफ़ान समान नहीं आई, जिसका आकस्मिक संपर्क तीव्र अनुभूति से अस्तित्व को कंपित कर देता है। वह तो रोग के कीटाणु लाने वाले मंद समीर के समान साँस में समाकर शरीर में व्याप्त हो गई है। हमने अपने संपूर्ण अस्तित्व से उसके भार को दुर्वह नहीं अनुभव किया और हमें यह ऐतिहासिक सत्य भी विस्मृत हो गया कि कोई भी विजेता विजित कर राजनीतिक प्रभुत्व पाकर ही संतुष्ट नहीं होता, क्योंकि सांस्कृतिक प्रभुत्व के बिना राजनीतिक विजय न पूर्ण है, न स्थायी। घटनाएँ संस्कारों में चिर जीवन पाती हैं और संस्कार के अक्षय वाहक, शिक्षा, साहित्य, कला आदि हैं। राष्ट्र-जीवन की पूर्णता के लिए उसके मनोजगत को मुक्त करना होगा और यह कार्य विशेष प्रयत्न- साध्य है, क्योंकि शरीर को बाँधने वाली श्रृंखला से आत्मा को जकड़ने वाली श्रृंखला अधिक दृढ़ होती है।

प्रश्न :

  1. राष्ट्र की कौन-सी अनिवार्य विशेषताएँ हमारे पास हैं ?
  2. हमारी परतंत्रता कैसे आई ?
  3. किसके बिना राजनीतिक विजय अपूर्ण है ?
  4. संस्कार के अक्षय वाहक क्या हैं ?
  5. राष्ट्र जीवन की पूर्णता के लिए किसे मुक्त करना होगा ?
  6. उपरोक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।

उत्तर :

  1. हमारे पास राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता एवं भौगोलिक अखंडता है।
  2. हमारी परतंत्रता रोग के कीटाणु लाने वाली वायु जैसी आई।
  3. सांस्कृतिक प्रभुत्व के बिना राजनीतिक विजय न पूर्ण है और न ही स्थायी है।
  4. संस्कार के अक्षय वाहक कला, शिक्षा एवं साहित्य हैं।
  5. राष्ट्र जीवन की पूर्णता के लिए हमें अपने मनोजगत को मुक्त करना होगा।
  6. राष्ट्र – जीवन।

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4. जल और मानव-जीवन का संबंध अत्यंत घनिष्ठ है। वास्तव में जल ही जीवन है। विश्व की प्रमुख संस्कृतियों का जन्म बड़ी-बड़ी नदियों के किनारे ही हुआ है। बचपन से ही हम जल की उपयोगिता, शीतलता और निर्मलता के कारण उसकी ओर आकर्षित होते रहे हैं। किंतु नल के नीचे नहाने और जलाशय में डुबकी लगाने में ज़मीन-आसमान का अंतर है। हम जलाशयों को देखते ही मचल उठते हैं, उसमें तैरने के लिए। आज सर्वत्र सहस्त्रों व्यक्ति प्रतिदिन सागरों, नदियों और झीलों में तैरकर मनोविनोद करते हैं और साथ ही अपना शरीर भी स्वस्थ रखते हैं।

स्वच्छ और शीतल जल में तैरना तन को स्फूर्ति ही नहीं मन को शांति भी प्रदान करता है। तैराकी आनंद की वस्तु होने के साथ-साथ हमारी आवश्यकता भी है। नदियों के आस – पास गाँव के लोग सड़क मार्ग न होने पर एक-दूसरे से तभी मिल सकते हैं जब उन्हें तैरना आता हो अथवा नदियों में नावें हों। प्राचीनकाल में नावें कहाँ थीं ? तब तो आदमी को तैरकर ही नदियों को पार करना पड़ता था। किंतु तैरने के लिए आदिम मनुष्य को निश्चय ही प्रयत्न और परिश्रम करना पड़ता होगा, क्योंकि उसमें अन्य प्राणियों की भाँति तैरने की जन्मजात क्षमता नहीं है।

जल में मछली आदि जलजीवों को स्वच्छंद विचरण करते देख मनुष्य ने उसी प्रकार तैरना सीखने का प्रयत्न किया और धीरे-धीरे उसने इस कार्य में इतनी निपुणता प्राप्त कर ली कि आज तैराकी एक कला के रूप में गिनी जाने लगी। विश्व में जो भी खेल प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं, उनमें तैराकी प्रतियोगिता अनिवार्य रूप से सम्मिलित की जाती है।

प्रश्न :

  1. विश्व की प्रमुख संस्कृतियों का जन्म कहाँ से हुआ ?
  2. तैराकी के द्वारा क्या लाभ प्राप्त होते हैं ?
  3. प्राचीनकाल में तैराकी मानव के लिए आवश्यक क्यों थी ?
  4. आदिमानव को तैराकी की प्रेरणा कैसे मिली होगी ?
  5. मनुष्य के लिए ‘तैराकी’ कैसी क्षमता है ?
  6. तैराकी की विश्व में महत्ता कैसे प्रकट होती है ?

उत्तर :

  1. विश्व की प्रमुख संस्कृतियों का जन्म बड़ी-बड़ी नदियों के किनारे हुआ।
  2. तैराकी द्वारा मनोविनोद, शारीरिक स्फूर्ति और मानसिक शांति मिलती है।
  3. एक-दूसरे तक पहुँचने के लिए नदियों को तैरकर पार करना पड़ता था।
  4. आदिमानव को तैराकी की प्रेरणा जलचरों से मिली होगी।
  5. मनुष्य के लिए तैराकी अभ्यास से प्राप्त क्षमता है।
  6. तैराकी की विश्वस्तरीय विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेकर विजित होने से।

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5. भाषणकर्ता के गुणों में तीन गुण श्रेष्ठ माने जाते हैं – सादगी, असलियत और जोश। यदि भाषणकर्ता बनावटी भाषा में बनावटी बातें करता है तो श्रोता तत्काल ताड़ जाते हैं। इस प्रकार के भाषणकर्ता का प्रभाव समाप्त होने में देरी नहीं लगती। यदि वक्ता में उत्साह की कमी हो तो भी उसका भाषण निष्प्राण हो जाता है। उत्साह से ही किसी भी भाषण में प्राणों का संचार होता है। भाषण को प्रभावशाली बनाने के लिए उसमें उतार- चढ़ाव, तथ्य और आँकड़ों का समावेश आवश्यक है। अतः उपर्युक्त तीनों गुणों का समावेश एक अच्छे भाषणकर्ता के लक्षण हैं तथा इनके बिना कोई भी भाषणकर्ता श्रोताओं पर अपना प्रभाव उत्पन्न नहीं कर सकता।

प्रश्न :

  1. इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
  2. अच्छे भाषण के कौन-से गुण होते हैं ?
  3. श्रोता किसे तत्काल ताड़ जाते हैं ?
  4. कैसे भाषण का प्रभाव देर तक नहीं रहता ?
  5. ‘श्रोता’ तथा ‘जोश’ शब्दों के अर्थ लिखिए।
  6. ‘उत्साह से ही किसी भी भाषण में प्राणों का संचार होता है।’ अर्थ की दृष्टि से कौन – सा भेद है?

उत्तर :

  1. श्रेष्ठ भाषणकर्ता।
  2. अच्छे भाषण में सादगी, तथ्य, उत्साह, आँकड़ों का समावेश होना चाहिए।
  3. जो भाषणकर्ता बनावटी भाषा में बनावटी बातें करता है, उसे श्रोता तत्काल ताड़ जाते हैं।
  4. जिस भाषण में सादगी, वास्तविकता और उत्साह नहीं होता, उस भाषण का प्रभाव देर तक नहीं रहता।
  5. श्रोता = सुनने वाला। जोश = आवेग, उत्साह।
  6. विधानवाचक वाक्य।

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6. सांप्रदायिक सद्भाव और सौहार्द बनाए रखने के लिए हमें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि प्रेम से प्रेम और विश्वास से विश्वास उत्पन्न होता है और यह भी नहीं भूलना चाहिए कि घृणा से घृणा का जन्म होता है जो दावाग्नि की तरह सबको जलाने का काम करती है। महात्मा गांधी घृणा को प्रेम से जीतने में विश्वास करते थे। उन्होंने सर्वधर्म सद्भाव द्वारा सांप्रदायिक घृणा को मिटाने का आजीवन प्रयत्न किया। हिंदू और मुसलमान दोनों की धार्मिक भावनाओं को समान आदर की दृष्टि से देखा। सभी धर्म शांति के लिए भिन्न-भिन्न उपाय और साधन बताते हैं। धर्मों में छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं है। सभी धर्म सत्य, प्रेम, समता, सदाचार और नैतिकता पर बल देते हैं, इसलिए धर्म के मूल में पार्थक्य या भेद नहीं है।

प्रश्न :

  1. घृणा से किसका जन्म होता है ?
  2. इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
  3. सभी धर्म किन बातों पर बल देते हैं ?
  4. सांप्रदायिक सद्भावना कैसे बनाए रखी जा सकती है ?
  5. महात्मा गांधी घृणा को कैसे जीतना चाहते थे ?
  6. ‘छोटे-बड़े’ शब्द में कौन-सा समास है?

उत्तर :

  1. घृणा का जन्म होता है
  2. सांप्रदायिक सद्भाव
  3. सभी धर्म, सत्य, प्रेम, समता, सदाचार और नैतिकता पर बल देते हैं।
  4. सांप्रदायिक सद्भावना बनाए रखने के लिए सब धर्मों वालों को आपस में प्रेम और विश्वास बनाए रखते हुए सब धर्मों का समान रूप से आदर करना चाहिए।
  5. महात्मा गांधी घृणा को प्रेम से जीतना चाहते थे।
  6. द्वंद्व समास।

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7. विद्यार्थी का अहंकार आवश्यकता से अधिक बढ़ता जा रहा है और दूसरे उसका ध्यान अधिकार पाने में है, अपना कर्तव्य पूरा करने में नहीं। अहं बुरी चीज़ कही जा सकती है। यह सब में होता है। एक सीमा तक आवश्यक भी है। परंतु आज के विद्यार्थियों में इतना बढ़ गया है कि विनय के गुण उनमें नाम मात्र को नहीं रह गए हैं। गुरुजनों या बड़ों की बात का विरोध करना उनके जीवन का अंग बन गया है। इन्हीं बातों के कारण विद्यार्थी अपने उन अधिकारों को, जिनके वे अधिकारी नहीं हैं, उसे भी वे अपना समझने लगे हैं। अधिकार और कर्तव्य दोनों एक- दूसरे से जुड़े रहते हैं। स्वस्थ स्थिति वही कही जा सकती हैं जब दोनों का संतुलन हो। आज का विद्यार्थी अधिकार के प्रति सजग है, परंतु वह अपने कर्तव्यों की ओर से विमुख हो गया है।

प्रश्न :

  1. आधुनिक विद्यार्थियों में नम्रता की कमी क्यों होती जा रही है ?
  2. विद्यार्थी प्रायः किसका विरोध करते हैं ?
  3. विद्यार्थी में किसके प्रति सजगता अधिक हैं ?
  4. रेखांकित शब्दों के अर्थ लिखिए।
  5. गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
  6. ‘अधिकारी’ शब्द से प्रत्यय और उपसर्ग अलग करके लिखिए।

उत्तर :

  1. आधुनिक विद्यार्थियों में अहंकार बढ़ने और विनम्रता न होने से नम्रता की कमी होती जा रही है।
  2. विद्यार्थी प्रायः गुरुजनों या बड़ों की बातों का विरोध करते हैं।
  3. विद्यार्थियों में अपने अधिकारों के प्रति सजगता अधिक है।
  4. विनय = नम्रता। सजग = सावधान।
  5. विद्यार्थियों में अहंकार।
  6. अधि उपसर्ग, ई प्रत्यय।

8. जीवन घटनाओं का समूह है। यह संसार एक बहती नदी के समान है। इसमें बूँद न जाने किन-किन घटनाओं का सामना करती जूझती आगे बढ़ती है। देखने में तो इस बूँद की हस्ती कुछ भी नहीं। जीवन में कभी-कभी ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जो मनुष्य को असंभव से संभव की ओर ले जाती हैं। मनुष्य अपने को महान कार्य कर सकने में समर्थ समझने लगता है। मेरे जीवन में एक रोमांचकारी घटना है जिसे मैं आपको सुनाना चाहती हूँ। यह घटना जीवन के सुख-दुख के मधुर मिलन का रोमांच लिए है।

प्रश्न :

  1. जीवन क्या है ?
  2. लेखिका क्या सुनाना चाहती है ?
  3. नदी की धारा में पानी की एक बूँद का क्या महत्व है ?
  4. रेखांकित शब्दों के अर्थ लिखिए।
  5. यह संसार कैसा है?
  6. गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।

उत्तर :

  1. जीवन घटनाओं का समूह है।
  2. लेखिका अपने जीवन की एक रोमांचकारी घटना सुनाना चाहती है।
  3. नदी की धारा पानी की एक-एक बूँद से मिलकर बनती है, इसलिए नदी की धारा में पानी की एक बूँद भी बहुत महत्त्वपूर्ण है।
  4. हस्ती = महत्व, अस्तित्व, वजूद। रोमांचकारी = आनंद देने वाली, पुलकित करने वाली।
  5. यह संसार एक बहती नदी के समान है।
  6. जीवन : एक संघर्ष।

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9. लोग कहते हैं कि मेरा जीवन नाशवान है। मुझे एक बार पढ़कर लोग फेंक देते हैं। मेरे लिए एक कहावत बनी है “पानी केरा बुदबुदा अस अखबार की जात, पढ़ते ही छिप जात है, ज्यों तारा प्रभात।” पर मुझे अपने इस जीवन पर भी गर्व है। मर कर भी मैं दूसरों के काम आता हूँ। मेरे सच्चे प्रेमी मेरे सारे शरीर को फाइल में क्रम से सँभाल कर रखते हैं। कई लोग मेरे उपयोगी अंगों को काटकर रख लेते हैं। मैं रद्दी बनकर भी ग्राहकों की कीमत का एक तिहाई भाग अवश्य लौटा देता हूँ। इस प्रकार महान उपकारी होने के कारण मैं दूसरे ही दिन नया जीवन पाता हूँ और अधिक ज़ोर-शोर से सज-धज के आता हूँ। इस प्रकार एक बार फिर सबके मन में समा जाता हूँ। तुमको भी ईर्ष्या होने लगी है न मेरे जीवन से। भाई ईर्ष्या नहीं स्पर्धा करो। आप भी मेरी तरह उपकारी बनो। तुम भी सबकी आँखों के तारे बन जाओगे।

प्रश्न :

  1. अखबार का जीवन नाशवान कैसे है ?
  2. अखबार क्या- क्या लाभ पहुँचाता है ?
  3. यह किस प्रकार उपकार करता है ?
  4. इन शब्दों के अर्थ लिखिए – उपयोगी, स्पर्धा।
  5. गद्यांश का उपयुक्त ‘शीर्षक’ दीजिए।
  6. हमें ईर्ष्या के स्थान पर क्या करना चाहिए?

उत्तर :

  1. इसे लोग एक बार पढ़ कर फेंक देते हैं। इसलिए अखबार का जीवन नाशवान है।
  2. अखबार ताज़े समाचार देने के अतिरिक्त रद्दी बनकर लिफाफे बनाने के काम आता है। कुछ लोग उपयोगी समाचार काट कर फाइल बना लेते हैं।
  3. रद्दी के रूप में बिककर वह अपना एक-तिहाई मूल्य लौटाकर उपकार करता है।
  4. उपयोगी = काम में आने वाला। स्पर्धा = मुकाबला।
  5. ‘अखबार’।
  6. हमें ईर्ष्या के स्थान पर स्पर्धा करनी चाहिए।

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10. आपका जीवन एक संग्राम स्थल है जिसमें आपको विजयी बनना है। महान जीवन के रथ के पहिए फूलों से भरे नंदन वन में नहीं गुज़रते, कंटकों से भरे बीहड़ पथ पर चलते हैं। आपको ऐसे ही महान जीवन पथ का सारथी बनकर अपनी यात्रा को पूरा करना है। जब तक आपके पास आत्म-विश्वास का दुर्जय शास्त्र नहीं है, न तो आप जीवन की ललकार का सामना कर सकते हैं, न जीवन संग्राम में विजय प्राप्त कर सकते हैं और न महान जीवनों के सोपानों पर चढ़ सकते हैं। जीवन पथ पर आप आगे बढ़ रहे हैं, दुख और निराशा की काली घटाएँ आपके मार्ग पर छा रही हैं, आपत्तियों का अंधकार मुँह फैलाए आपकी प्रगति को निगलने के लिए बढ़ा चला आ रहा है। लेकिन आपके हृदय में आत्म-विश्वास की दृढ़ ज्योति जगमगा रही है तो इस दुख एवं निराशा का कुहरा उसी प्रकार कट जाएगा, जिस प्रकार सूर्य की किरणों के फूटते ही अंधकार भाग जाता है।

प्रश्न :

  1. महान जीवन के रथ किस पथ से गुज़रते हैं ?
  2. आप किस शस्त्र के द्वारा जीवन के कष्टों का सामना कर सकते हैं ?
  3. निराशा की काली घटाएँ किस प्रकार समाप्त हो जाती हैं ?
  4. रेखांकित शब्दों के अर्थ लिखिए।
  5. गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
  6. आत्मविश्वास को कौन – सा शास्त्र कहा गया है?

उत्तर :

  1. महान जीवन के रथ फूलों से भरे वनों से ही नहीं गुज़रते बल्कि कांटों से भरे बीहड़ पथ पर भी चलते हैं। द्वारा हम जीवन के कष्टों का सामना कर सकते हैं।
  2. आत्म-विश्वास के शस्त्र के द्वारा हम जीवन के कष्टों का सामना कर सकते हैं।
  3. आत्म-विश्वास की दृढ़ ज्योति के आगे निराशा की काली घटाएँ समाप्त हो जाती हैं।
  4. सोपानों सीढ़ियों। ज्योति प्रकाश।
  5. शीर्षक – आत्मविश्वास।
  6. आत्मविश्वास को दुर्जय शास्त्र कहा गया है।

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11. सहयोग एक प्राकृतिक नियम है, यह कोई बनावटी तत्व नहीं है, प्रत्येक पदार्थ, प्रत्येक व्यक्ति का काम आंतरिक सहयोग पर अवलंबित है। किसी मशीन का उसके पुर्जों के साथ संबंध है। यदि उसका एक भी पुर्जा खराब हो जाता है तो वह मशीन चल नहीं सकती। किसी शरीर का उसके आँख, कान, नाक, हाथ, पाँव आदि पोषण करते हैं। किसी अंग पर चोट आती है, मन एकदम वहाँ पहुँच जाता है। पहले क्षण आँख देखती है, दूसरे क्षण हाथ सहायता के लिए पहुँच जाता है। इसी तरह समाज और व्यक्ति का संबंध है। समाज शरीर है तो व्यक्ति उसका अंग है। जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अंग परस्पर सहयोग करते हैं उसी तरह समाज के विकास के लिए व्यक्तियों का आपसी सहयोग अनिवार्य है। शरीर को पूर्णता अंगों के सहयोग से मिलती है। समाज को पूर्णता व्यक्तियों के सहयोग से मिलती है। प्रत्येक व्यक्ति, जो कहीं पर भी है, अपना काम ईमानदारी और लगन से करता रहे, तो समाज फलता-फूलता है।

प्रश्न :

  1. समाज कैसे फलता-फूलता है ?
  2. शरीर के अंग कैसे सहयोग करते हैं ?
  3. समाज और व्यक्तियों का क्या संबंध है ?
  4. ‘अवलंबित’ में कौन-सा प्रत्यय है?
  5. गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
  6. समाज को पूर्णता कैसी मिलती है?

उत्तर :

  1. प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपना काम मेहनत, लगन और ईमानदारी से करने पर समाज फलता-फूलता है।
  2. शरीर के अंग शरीर को स्वस्थ रखने में सहयोग करते हैं। जैसे जब शरीर के किसी अंग को चोट लगती है तो मन के संकेत पर आँख और हाथ उसकी सहायता के लिए पहुँच जाते हैं।
  3. समाज और व्यक्तियों का आपस में घनिष्ठ संबंध है। समाज के विकास के लिए व्यक्तियों को आपस में मिल-जुलकर काम करना होता है। समाज को पूर्णता भी व्यक्तियों के सहयोग से मिलती है।
  4. ‘इत’ प्रत्यय है।
  5. शीर्षक – व्यक्ति और समाज।
  6. व्यक्तियों के सहयोग से समाज को पूर्णता मिलती है।

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12. भारतवर्ष एक धर्म-निरपेक्ष गणतंत्र है। यहाँ प्रत्येक धर्मावलम्बी को अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुरूप अपने आराध्य देव की आराधना करने की स्वतंत्रता है। किंतु कुछ स्वार्थी तत्व देश की एकता को खंडित करने के लिए धर्म के नाम पर लोगों के मन में विष भरकर सांप्रदायिक दंगे कराते रहते हैं। इसमें कुछ लोग देश का विभिन्न संप्रदायों के आधार पर विभाजन करना चाहते हैं। हमें इस षड्यंत्र से सावधान रहना चाहिए तथा देश में सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखना चाहिए, क्योंकि “मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।”

प्रश्न :

  1. भारतवर्ष कैसा गणतंत्र है ?
  2. हमारे देश में प्रत्येक धर्मावलंबी को किस कार्य की स्वतंत्रता है ?
  3. हमें किस षड्यंत्र से सावधान रहना चाहिए ?
  4. ‘आराध्य’ और ‘मज़हब’ शब्दों के अर्थ लिखिए।
  5. गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए !
  6. ‘धर्मावलंबी’ में कौन-सा समास है?

उत्तर :

  1. भारतवर्ष एक धर्मनिरपेक्ष गणतन्त्र है।
  2. हमारे देश में प्रत्येक धर्मावलम्बी को अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुरूप अपने आराध्य देव की आराधना करने की स्वतन्त्रता है।
  3. हमें देश की एकता को खंडित करने वाले तथा धर्म के नाम पर सांप्रदायिक दंगा कराने वालों के षड्यन्त्र से सावधान रहना चाहिए।
  4. आराध्य = पूजनीय, मज़हब = धर्म।
  5. सांप्रदायिक सद्भाव।
  6. संबंध तत्पुरुष समास।

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13. राष्ट्रीयता का प्रमुख उपकरण देश होता है जिसके आधार पर राष्ट्रीयता का जन्म तथा विकास होता है। इस कारण देश की इकाई राष्ट्रीयता के लिए आवश्यक है। राष्ट्रीय एकता को खंडित करने के उद्देश्य से कुछ विघटनकारी शक्तियाँ हमारे देश को देश न कहकर उपमहाद्वीप के नाम से संबोधित करती हैं। भौगोलिक दृष्टि से भारत के विस्तृत भू-खंड, जिसमें अनेक नदियाँ और पर्वत कभी-कभी प्राकृतिक बाधाएँ भी उपस्थित कर देते हैं, को ये शक्तियाँ संकीर्ण क्षेत्रीयता की भावनाएँ विकसित करने में सहायता करती हैं।

प्रश्न :

  1. राष्ट्रीयता का प्रमुख उपकरण क्या है ?
  2. देश की इकाई किसलिए आवश्यक है ?
  3. भौगोलिक दृष्टि से भारत कैसा है ?
  4. ‘राष्ट्रीय तथा भौगोलिक’ शब्दों से प्रत्यय अलग करके लिखिए।
  5. इस गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
  6. भारत के विस्तृत भूखंड में कौन प्राकृतिक बाधाएँ उत्पन्न करते हैं?

उत्तर :

  1. राष्ट्रीयता का प्रमुख उपकरण देश है।
  2. देश की इकाई राष्ट्रीयता के लिए आवश्यक है।
  3. भौगोलिक दृष्टि से भारत उपमहाद्वीप जैसा है जिसमें अनेक नदियाँ, पहाड़ और विस्तृत भूखंड है।
  4. ईय और इक।
  5. राष्ट्रीयता।
  6. नदियाँ और पर्वत प्राकृतिक बाधाएँ उत्पन्न करते हैं।

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14. दस गीदड़ों की अपेक्षा एक सिंह अच्छा है। सिंह – सिंह और गीदड़ – गीदड़ है। यही स्थिति परिवार के उन सदस्य की होती है जिनकी संख्या आवश्यकता से अधिक हो। न भरपेट भोजन, न तन ढकने के लिए वस्त्र। न अच्छी शिक्षा, न मनचाहा रोज़गार। गृहपति प्रतिक्षण चिंता में डूबा रहता है। रात की नींद और दिन का चैन गायब हो जाता है। बार-बार दूसरों पर निर्भर होने की विवशता। सम्मान और प्रतिष्ठा तो जैसे सपने की बातें हों। यदि दुर्भाग्यवश गृहपति न रहे तो आश्रितों का कोई टिकाना नहीं। इसलिए आवश्यक है कि परिवार छोटा हो।

प्रश्न :

  1. परिवार के सदस्यों की क्या स्थिति होती है ?
  2. गृहपति प्रतिक्षण चिंता में क्यों डूबा रहता है ?
  3. रात की नींद और दिन का चैन क्यों गायब हो जाता है ?
  4. ‘प्रतिक्षण’ में कौन-सा समास है?
  5. गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
  6. गृहपति किसे कहा गया है ?

उत्तर :

  1. जिस परिवार की संख्या आवश्यकता से अधिक होती है, उस परिवार को न भरपेट भोजन, न वस्त्र, न अच्छी शिक्षा और न ही मनचाहा रोज़गार मिलता है। उनकी स्थिति दस गीदड़ों जैसी हो जाती है।
  2. गृहपति प्रतिक्षण परिवार के भरण-पोषण की चिंता में डूबा रहता है कि इतने बड़े परिवार का गुजारा कैसे होगा ?
  3. रात की नींद और दिन का चैन इसलिए गायब हो जाता है क्योंकि बड़े परिवार के गृहपति को दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। उसका सम्मान तथा प्रतिष्ठा समाप्त हो जाती है। उसे अपने मरने के बाद परिवार की दुर्दशा के संबंध में सोचकर बेचैनी होती है।
  4. क्षण-क्षण = अव्ययीभाव समास।
  5. छोटा परिवार : सुखी परिवार।
  6. गृहपति घर के मालिक को कहा गया है।

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15. अकेलेपन की समस्या आज के मशीनी युग में बढ़ती ही जा रही है। यह समस्या घर-परिवार व समाज में प्रत्येक स्थान पर मुँह खोले खड़ी दिखाई देती है। यह अकेलापन मनुष्य की नियति बनकर उसे ग्रसित कर रहा है। इसका कारण चाहे विघटित होते हुए संयुक्त परिवार हों, चाहे पारस्परिक संबंधों की विच्छिन्नता हो, चाहे मशीनी सभ्यता का प्रभाव हो, चाहे पुराने जीवन मूल्यों का खंड-खंड होकर बिखरा जाना हो, परंतु इस वास्तविकता को किसी भी दशा में नकारा नहीं जा सकता कि आज यह अकेलेपन की समस्या समाज में धीरे-धीरे अपने प्रभाव व अनुपात में वृद्धि की ओर अग्रसर हो चुकी है। आज पारिवारिक संबंधों में भी औपचारिकता घर कर चुकी है। हममें से न जाने कितने ऐसे लोग हैं जो बताएँ या न बताएँ; पर कहीं-न-कही किसी-न-किसी सीमा तक अकेलेपन की समस्या से संत्रस्त हैं।

प्रश्न :

  1. मशीनी युग में कौन-सी समस्या बढ़ती जा रही है ?
  2. आज के पारिवारिक संबंध कैसे हो चुके हैं ?
  3. अकेलेपन के मुख्य कारण कौन-से हैं ?
  4. ‘अकेलापन’ और ‘औपचारिकता’ में कौन-से प्रत्यय हैं?
  5. इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
  6. अकेलापन क्या बनकर मनुष्य को ग्रसित कर रहा है?

उत्तर :

  1. मशीनी युग में अकेलेपन की समस्या बढ़ती जा रही है ?
  2. आज के पारिवारिक संबंध औपचारिक हो गए हैं।
  3. अकेलेपन के मुख्य कारण विघटित होते हुए संयुक्त परिवार, आपसी संबंध में गिरावट, मशीनी युग का प्रभाव तथा पुराने मूल्यों का बिखरना है।
  4. पन तथा इक, ता।
  5. अकेलेपन की त्रासदो।
  6. अकेलापन मनुष्य को नियति बनकर ग्रसित कर रहा है।

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16. हिंदी की वर्तमान दशा पर प्रकाश डालने से पूर्व इसके उद्भव और विकास से आपका परिचय कराना चाहती हूँ। हिंदी के उद्भव की प्रक्रिया बहुत प्राचीन है। संस्कृत दो रूपों में बँटी – वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत। संस्कृत के लौकिक रूप से प्राकृत भाषा आई। प्राकृत के अपभ्रंश से शौरसैनी भाषा उत्पन्न हुई जिससे आज प्रयुक्त होने वाली पश्चिमी हिंदी भाषा का आविर्भाव हुआ। तुलसीदास और जायसी ने जिस अवधी भाषा का प्रयोग किया वह अर्ध मागधी प्राकृत से विकसित हुई। सूरदास, नंददास और अष्टछाप के कवियों ने जिस ब्रजभाषा में काव्य-रचना की वह शौरसैनी अथवा नगर अपभ्रंश से विकसित हुई।

भौगोलिक दृष्टि से खड़ी बोली उस बोली को कहते हैं जो रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, मेरठ, मुजफ़्फ़रनगर, सहारनपुर, देहरादून, अंबाला और पटियाला के पूर्वी भागों में बोली जाती है। चौदहवीं शताब्दी में सर्वप्रथम अमीर खुसरो ने इसे ‘भारत के मुसलमानों की भाषा’ कहकर इसमें काव्य-रचना की थी। तत्पश्चात भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, निराला, पंत आदि ने इसे अपने साहित्य में प्रयुक्त किया और आज देश के लाखों साहित्यकार इसमें साहित्य-रचना कर रहे हैं। भाषा विज्ञान की दृष्टि से पश्चिमी हिंदी को ही हिंदी कहा जाता है और इस भू-भाग की भाषा थी जिसे प्राचीनकाल में अंतर्वेद कहते थे। इस भाषा में अरबी, फ़ारसी के शब्दों को भी स्वीकार किया गया।

प्रश्न :

  1. हिंदी के उद्भव से पूर्व संस्कृत की क्या दशा थी ?
  2. प्राकृत भाषा का विकास किससे हुआ था ?
  3. भाषा विज्ञान की दृष्टि से हिंदी का क्या स्वरूप है ?
  4. शौरसैनी से विकसित किस भाषा से किन कवियों ने काव्य रचना की ?
  5. ‘भौगोलिक’ शब्द में कौन-सा प्रत्यय प्रयुक्त हुआ है ?
  6. भौगोलिक दृष्टि से खड़ी बोली किसे कहते हैं?

उत्तर :

  1. हिंदी के उद्भव से पूर्व संस्कृत भाषा वैदिक और लौकिक संस्कृत दो रूपों में विभक्त हो गई थी।
  2. प्राकृत भाषा का विकास संस्कृत भाषा के लौकिक रूप से हुआ था।
  3. भाषा विज्ञान की दृष्टि से पश्चिमी हिंदी को हिंदी कहा जाता है, जिसमें अरबी-फ़ारसी के शब्दों को भी स्वीकार किया गया है।
  4. शौरसैनी से विकसित ब्रजभाषा में अष्टछाप के सूरदास, नंददास आदि कवियों ने काव्य रचना की।
  5. ‘इक’ प्रत्यय।
  6. भौगोलिक दृष्टि से खड़ी बोली उस बोली को कहते हैं जो रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, अंबाला और पटियाला के पूर्वी भागों में बोली जाती है।

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17. मुंशी प्रेमचंद जी का जन्म 31 जुलाई, सन् 1880 को बनारस के लमही नामक ग्राम में हुआ। उनका वास्तविक नाम धनपत राय था। उनका बचपन अभावों में ही बीता और हर प्रकार के संघर्षों को झेलते हुए उन्होंने बी० ए० तक शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने शिक्षा विभाग में नौकरी की किंतु असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और पूरी तरह लेखन कार्य में जुट गए। वे तो जन्म से ही लेखक और चिंतक थे। शुरू में वे उर्दू में नवाबराय के नाम से लिखने लगे। एक ओर समाज की कुरीतियों और दूसरी ओर तत्कालीन व्यस्था के प्रति निराशा और आक्रोश था। उनके लेखों में कमाल का जादू था।

वे अपनी बात को बड़ी ही प्रभावशाली ढंग से लिखते थे। जनता की खबरें पहुँच गयीं। अंग्रेजा सरकार ने उनके लेखों पर रोक लगा दी। किंतु, उनके मन में उठने वाले स्वतंत्र एवं क्रांतिकारी विचारों को भला कौन रोक सकता था। इसके बाद उन्होंने ‘प्रेमचंद’ के नाम से लिखना शुरू कर दिया। इस तरह से धनपतराय से प्रेमचंद बन गए। ‘सेवासदन’, ‘प्रेमाश्रम’, ‘निर्मला’, ‘रंगभूमि’, ‘कर्मभूमि’ और ‘गोदान’ आदि इनके प्रमुख उपन्यास हैं जिनमें सामाजिक समस्याओं का सफल चित्रण है।

इनके अतिरिक्त उन्होंने ‘ईदगाह’, ‘नमक का दारोगा’, ‘दो बैलों की कथा’, ‘बड़े भाई साहब’ और ‘पंच परमेश्वर’ आदि अनेक अमर कहानियाँ भी लिखीं। वे आजीवन शोषण, रूढ़िवादिता, अज्ञानता और अत्याचारों के विरुद्ध अबाधित गति से लिखते रहे। गरीबों, किसानों, विधवाओं और दलितों की समस्याओं का प्रेमचंद जी ने बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है। वे समाज में पनप चुकी कुरीतियों से बहुत आहत होते थे इसलिए उन्हें जड़ से उखाड़ फेंकने का प्रयास इनकी रचनाओं में सहज ही देखा जा सकता है। निःसंदेह वे महान उपन्यासकार और कहानीकार थे। सन 1936 में इनका देहांत हो गया।

प्रश्न :

  1. मुंशी प्रेमचंद जी का वास्तविक नाम क्या था ?
  2. प्रेमचंद ने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र क्यों दे दिया था ?
  3. वे आजीवन किसके विरुद्ध लिखते रहे?
  4. ‘अबाधित’ तथा ‘आहत’ शब्दों के अर्थ लिखिए।
  5. प्रेमचंद के मन में किसके प्रति आक्रोश और निराशा थी ?
  6. प्रेमचंद के प्रमुख उपन्यासों के नाम बताइए।

उत्तर :

  1. मुंशी प्रेमचंद जी का वास्तविक नाम धनपत राय था।
  2. प्रेमचंद ने असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था।
  3. वे आजीवन सामाजिक समस्याओं से जुड़कर शोषण, अज्ञानता, रूढ़िवादी और गरीब किसानों, विधवाओं, दलितों आदि की विभिन्न समस्याओं और कुरीतियों को विरुद्ध लिखते रहे।
  4. ‘अबाधित’ – बिना किसी रुकावट के, ‘आहत’ – दुखी।
  5. प्रेमचंद के मन में समाज की कुरीतियों और देश की तत्कालीन व्यवस्था के प्रति आक्रोश और निराशा थी।
  6. प्रेमचंद के प्रमुख उपन्यास – सेवासदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि तथा गोदान हैं।

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18. आज की मौत कल पर ढकेलते-ढकेलते एक दिन ऐसा आ जाता है कि उस दिन मरना ही पड़ता है। यह प्रसंग उन पर नहीं आता, जो ‘मरण के पहले ‘ मर लेते हैं। जो अपना मरण आँखों से देखते हैं, जो मरण का ‘ अगाऊ’ अनुभव कर लेते हैं उनका मरण है। और, जो मरण के अगाऊ अनुभव से जी चुराते हैं, उनकी छाती पर मरण आ पड़ता है। सामने खंभा है, यह बात अंधे को उस खंभे का छाती में प्रत्यक्ष धक्का लगने के बाद मालूम होती है। आँख वाले को यह खंभा पहले ही दिखाई देता है। अतः उसका धक्का उसकी छाती को नहीं लगता। जिंदगी की ज़िम्मेदारी कोई गिरी मौत नहीं है और मौत कौन ऐसी बड़ी मौत है ? अनुभव के अभाव से यह सारा होता है।

जीवन और मरण दोनों आनंद की वस्तु होनी चाहिए। कारण, अपने परम प्रिय पिता ने – ईश्वर ने वे हमें दिए हैं। ईश्वर ने जीवन दुखमय नहीं रचा। पर, हमें जीवन जीना आना चाहिए। कौन पिता है, जो अपने बच्चों के लिए परेशानी की जिंदगी चाहेगा ? तिस पर ईश्वर के प्रेम और करुणा का कोई पार है ? वह अपने लाडले बच्चों के लिए सुखमय जीवन का निर्माण करेगा कि परेशानियों और झंझटों से भरा जीवन रचेगा ? कल्पना की क्या आवश्यकता है, प्रत्यक्ष ही देखिए न, हमारे लिए जो चीज़ जितनी ज़रूरी है, उसके उतनी ही सुलभता से मिलने का इंतज़ाम ईश्वर की ओर से है।

पानी से हवा ज़्यादा ज़रूरी है, तो ईश्वर ने हवा को अधिक सुलभ किया है। जहाँ नाक है, वहाँ हवा मौजूद है। पानी से अन्न की ज़रूरत कम होने की वजह से पानी प्राप्त करने की बनिस्बत अन्न प्राप्त करने में अधिक परिश्रम करना पड़ता है। आत्मा सबसे अधिक महत्व की वस्तु होने के कारण, वह हर एक को हमेशा के लिए दे डाली गई है। ईश्वर की ऐसी प्रेमपूर्ण योजना है। इसका ख्याल न करके हम निकम्मे, जड़-जवाहरात जमा करने में जितने जड़ बन जाएँ, उतनी तकलीफ़ हमें होगी। पर, यह हमारी जड़ता का दोष है, ईश्वर का नहीं।

प्रश्न :

  1. अनुभव और अभाव में प्रयुक्त उपसर्ग लिखिए।
  2. मरण से पहले मरने का क्या तात्पर्य है?
  3. जीवन और मरण कैसे होने चाहिए?
  4. जीवन के लिए आवश्यक सुख-दुख कौन प्रदान करता है?
  5. सबसे अधिक महत्वपूर्ण वस्तु कौन-सी है ? वह कहाँ है ?
  6. आत्मा किस प्रकार की योजना है? इसका ख्याल न करने से क्या होगा ?

उत्तर :

  1. ‘अनु’ और ‘अ’।
  2. मृत्यु तो सभी को आनी है चाहे कोई इससे भयभीत हो या न हो। जो मौत से बिना भयभीत हुए जीवन की राह में आने वाली मुसीबतों को बिना परवाह किए टकराने का साहस रखते हैं वे मरण से पहले ही नहीं मरते।
  3. जीवन और मरण दोनों ही आनंद की वस्तुएँ होनी चाहिए क्योंकि इन दोनों को ईश्वर ने प्रदान किया है।
  4. जीवन के लिए सभी सुख – दुःख ईश्वर ही प्रदान करता है। उसी ने हवा दी और उसी ने पानी।
  5. सबसे महत्वपूर्ण वस्तु आत्मा है जो परमात्मा ने सभी को सदा के लिए दे दी है।
  6. आत्मा एक प्रेम पूर्ण योजना है। इसका ख्याल न करके हम जड़, निकम्मे तथा जड़-जवाहरात जमा करने में जड़ बन जाएँगे और तकलीफ होगी।

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19. सच्चरित्र दुनिया की समस्त संपत्तियों में श्रेष्ठ संपत्ति मानी गयी है। पृथ्वी, आकाश, जल, वायु और अग्नि पंचभूतों से बना मानव शरीर मौत के बाद समाप्त हो जाता है किंतु चरित्र का अस्तित्व बना रहता है। बड़े- बड़े चरित्रवान ऋषि-मुनि, विद्वान, महापुरुष आदि इसका प्रमाण हैं। आज भी श्रीराम, महात्मा बुद्ध, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती आदि अनेक विभूतियाँ समाज में पूजनीय हैं। ये अपने सच्चरित्र के द्वारा इतिहास और समाज को नयी दिशा देने में सफल रहे हैं। समाज में विद्या और धन भला किस काम का।

अतः विद्या और धन के साथ-साथ चरित्र का अर्जन अत्यंत आवश्यक है। यद्यपि लंकापति रावण वेदों और शास्त्रों का महान ज्ञाता और अपार धन का स्वामी था किंतु सीता हरण जैसे कुकृत्य के कारण उसे अपयश का सामना करना पड़ा। आज युगों बीत जाने पर भी उसकी चरित्रहीनता के कारण उसके प्रतिवर्ष पुतले बनाकर जलाए जाते हैं। चरित्रहीनता को कोई भी पसंद नहीं करता। ऐसा व्यक्ति आत्मशांति, आत्मसम्मान और आत्मसंतोष से सदैव वंचित रहता है। वह कभी भी समाज में पूजनीय स्थान नहीं ग्रहण कर पाता है। जिस तरह पक्की ईंटों से पक्के भवन का निर्माण होता है उसी तरह सच्चरित्र से अच्छे समाज का निर्माण होता है। अतएव सच्चरित्र ही अच्छे समाज की नींव है।

प्रश्न :

  1. दुनिया की समस्त संपत्तियों में किसे श्रेष्ठ माना गया है ?
  2. रावण को क्यों अपयश का सामना करना पड़ा ?
  3. चरित्रहीन व्यक्ति सदैव किससे वंचित रहता है?
  4. ‘सच्चरित्र’ और ‘यद्यपि ‘ में संधि-विच्छेद कीजिए।
  5. उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
  6. चरित्रहीन व्यक्ति के पुतले क्यों जलाए जाते हैं?

उत्तर :

  1. सच्चरित्र को दुनिया की समस्त संपत्तियों में श्रेष्ठ माना गया है।
  2. रावण को सीता जी के हरण के कारण अपयश का सामना करना पड़ा।
  3. चरित्रहीन व्यक्ति सदैव आत्मशांति, आत्मसम्मान और आत्मसंतोष से वंचित रहता है।
  4. सत् + चरित्र, यदि + अपि।
  5. श्रेष्ठ संपत्ति – सच्चरित्रता।
  6. उसकी चरित्रहीनता के कारण उसके प्रतिवर्ष पुतले जलाए जाते हैं।

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20. हस्तकला ऐसे कलात्मक कार्य को कहा जाता है जो उपयोगी होने के साथ-साथ सजाने, पहनने आदि के काम आता है। ऐसे कार्य मुख्य रूप से हाथों से अथवा छोटे-छोटे आसान उपकरणों या साधनों की मदद से ही किए जाते हैं। अपने हाथों से सजावट, पहनावे, बरतन, गहने, गहने, खिलौने आदि से संबंधित चीजों का निर्माण करने वालों को हस्तशिल्पी या दस्तकार कहा जाता है। इसमें अधिकतर पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिवार काम करते आ रहे हैं। जो चीजों मशीनों के माध्यम से बड़े स्तर पर बनाई जाती हैं उन्हें हस्तशिल्प की श्रेणी में नहीं लिया जाता।

भारत में हस्तशिल्प के पर्याप्त अवसर हैं। सभी राज्यों की हस्तकला अनूठी है। पंजाब में हाथ से की जाने वाली कढ़ाई की विशेष तकनीक को फुलवारी कहा जाता है। इस प्रकार की कढ़ाई से बने दुपट्टे, सूट, चादरें विश्व भर में बहुत प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त मंजे (लकड़ी के ढाँचे पर रस्सियों से बने हुए एक प्रकार के पलंग), पंजाबी जूतियाँ आदि भी प्रसिद्ध हैं। राजस्थान वस्त्रों, कीमती हीरे जवाहरात से जड़े आभूषणों, चमकते हुए बर्तनों, मीनाकारी, वड़ियाँ, पापड़, चूर्ण, भुजिया के लिए जाना जाता है।

आंध्र प्रदेश सिल्क की साड़ियों, केरल हाथी दाँत की नक्काशी और शीशम की लकड़ी के फर्नीचर, बंगाल हाथ से बुने हुए कपड़े, तमिलनाडु ताम्र मूर्तियों एवं कांजीवरम साड़ियों, मैसूर रेशम और चंदन की लकड़ी की वस्तुओं, कश्मीर अखरोट की लकड़ी के बने फर्नीचर, कढ़ाई वाली शालों तथा गलीचों, असम बेंत के फर्नीचर, लखनऊ चिकनकारी वाले कपड़ों, बनारस ज़री वाली सिल्की साड़ियों, मध्य प्रदेश चंदेरी और कोसा सिल्क के लिए प्रसिद्ध है। हस्तकला के क्षेत्र में रोज़गार की अनेक संभावनाएँ हैं। हस्तकला के क्षेत्र में निपुणता प्राप्त करके अपने पैरों पर खड़ा हुआ जा सकता है। इसमें निपुणता के साथ-साथ आत्मविश्वास, धैर्य और संयम की भी आवश्यकता रहती है। इस क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि जब आप उत्कृष्ट व अनूठी चीज़ बनाते हैं तो हस्तकला के मुरीद लोगों की कमी नहीं रहती।

प्रश्न :

  1. हस्तशिल्पी किसे कहते हैं?
  2. हस्तकला किसे कहते हैं?
  3. किन चीज़ों को हस्तकला की श्रेणी में नहीं लिया जाता ?
  4. पंजाब में हस्तकला के रूप में कौन-कौन सी चीजें प्रसिद्ध हैं?
  5. ‘दस्तकार’ तथा ‘निपुणता’ शब्दों से प्रत्यय अलग करके लिखिए।
  6. फुलवारी किसे कहा जाता है?

उत्तर :

  1. अपने हाथों से सजावट, पहनावे, बरतन, गहने, खिलौने आदि का निर्माण करने वाले को हस्तशिल्पी कहते हैं।
  2. हस्तकला उस श्रेष्ठ कलात्मक कार्य को कहते हैं जो समाज के लिए उपयोगी होने के साथ-साथ सजाने, पहनने आदि के काम आता है।
  3. वे चीजें जो मशीनों के माध्यम से बड़े स्तर पर तैयार की जाती हैं उन्हें हस्तशिल्प की श्रेणी में नहीं लिया जाता।
  4. पंजाब में हाथ से की जाने वाली कढ़ाई (फुलकारी) से बने दुपट्टे, सूट, चादरें विश्व भर में बहुत प्रसिद्ध हैं। इसके अतिरिक्त मंजे (लकड़ी के ढाँचे पर रस्सियों से बने हुए एक प्रकार के पलंग), पंजाबी जूतियाँ आदि भी अति प्रसिद्ध हैं।
  5. कार, ता।
  6. पंजाब में हाथ से की जाने वाली विशेष कढ़ाई की विशेष तकनीक को फुलवारी कहते हैं।

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21. व्यापार और वाणिज्य ने यातायात के साधनों को सुलभ बनाने में योग दिया है। यद्यपि यातायात के साधनों में उन्नति युद्धों के कारण भी हुई है, तथापि युद्ध स्थायी संस्था नहीं है। व्यापार से रेलों, जहाजों आदि को प्रोत्साहन मिलता है और इनसे व्यापार को। व्यापार के आधार पर हमारे डाक तार विभाग भी फले-फूले हैं। व्यापार ही देश की सभ्यता का मापदंड है। दूसरे देशों से जो हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, वह व्यापार के बल – भरोसे होती है। व्यापार में आयात और निर्यात दोनों ही सम्मिलित हैं। व्यापार और वाणिज्य की समृद्धि के लिए व्यापारी को अच्छा आचरण रखना बहुत आवश्यक है। उसे सत्य से प्रेम करना चाहिए।

अकेला यही गुण उसे अनेक सांसारिक झंझटों से बचाने में सफल हो सकेगा और उसे एक चतुर व्यापारी बना सकेगा, क्योंकि जो आदमी सच्चा होता है वह अपने काम-काज और व्यवहार में सादगी से काम लेता है। फल यह होता है कि उससे गलती कम होती है और नुकसान उठाने के अवसर बहुत कम आते हैं। जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं उनके अपने रोज्याना के काम-काज और व्यवहार में उचित – अनुचित और अच्छे-बुरे का ध्यान अवश्य बना रहता है। व्यापारी को आशावादी और शांत स्वभाव का होना चाहिए।

उसे न निराश होने की आवश्यकता है और न क्रोध करने की। यदि आज थोड़ा नुकसान हुआ है तो कल फ़ायदा भी ज़रूर होगा, यह सोचकर उसे घबराना नहीं चाहिए। सेवा की पतवार के सहारे अपने व्यापार अथवा व्यवसाय की नाव को उत्साह सहित भँवर से निकाल ले जाने में बुद्धिमानी है। हारकर हाथ-पैर छोड़ देने से यश नहीं मिलता। व्यापार ने हमारे सुख-साधनों को बढ़ाकर हमारे जीवन का स्तर ऊँचा किया है। हमारे विशाल भवन, गगनचुंबी अट्टालिकाएँ, स्वच्छ दुग्ध, फेनोज्ज्वल कटे-छटे वस्त्र, विद्युत – प्रकाश, रेडियो, तार, टेलीविजन, रेल और मोटरें सब हमारे व्यापार पर ही आश्रित हैं। व्यापार में दूसरे देशों पर हमारी निर्भरता अभी बढ़ी हुई है। जब तक यह निर्भरता रहेगी तब तक हम सच्चे अर्थ में स्वतंत्र नहीं हो सकते हैं।

प्रश्न :

  1. इस गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
  2. देश की सभ्यता का मापदंड किसे कहा गया है?
  3. किसी व्यापारी का आचरण कैसा होना चाहिए?
  4. व्यापारी को आशावादी क्यों होना चाहिए ?
  5. व्यापार ने सुख-साधनों को कैसे बढ़ाया है?
  6. हमें व्यापार के क्षेत्र में क्या करना चाहिए?

उत्तर :

  1. शीर्षक सफल व्यापारी है।
  2. व्यापार देश की सभ्यता का मापदंड है।
  3. व्यापार और वाणिज्य की समृद्धि के लिए किसी भी व्यापारी के सत्य प्रेमी, सादगी पसंद, चतुर और व्यवहार कुशल होना चाहिए। उसे उचित – अनुचित में भेद की समझ होनी चाहिए। उसे विवेकी और आशावादी होना चाहिए।
  4. किसी भी व्यापार में लाभ-हानि तो लगी रहती है। आशावादी बनकर उसे नुकसान की स्थिति को सहना आना चाहिए। निराशा की भावना उसे और उसके व्यापार को अधिक क्षति पहुँचा सकती है।
  5. व्यापार ने सारे समाज के सुख-साधनों को बढ़ाया है। हमारे जीवन स्तर को ऊँचा किया है। ऊँचे-ऊँचे भवन, वैज्ञानिक उपकरण तथा सभी सुख – सामग्री व्यापार पर ही आश्रित हैं।
  6. हमें व्यापार के क्षेत्र में आयात को कम कर निर्यात को बढ़ाना चाहिए। जब तक हम सामग्री के लिए दूसरे देशों पर निर्भर करते रहेंगे तब तक हम विकसित नहीं होंगे। हमें आत्मनिर्भर बनना चाहिए।

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22. किशोरावस्था में शारीरिक और सामाजिक परिवर्तन आते हैं और इन्हीं परिवर्तनों के साथ किशोरों की भावनाएँ भी प्रभावित होती हैं। बार-बार टोकना, अधिक उपदेशात्मक बातें किशोर सहन नहीं करना चाहते। कोई बात बुरी लगने पर वे क्रोध में शीघ्र आ जाते हैं। यदि उनका कोई मित्र बुरा है तब भी वे यह दलील देते हैं कि वह चाहे बुरा है किन्तु मैं तो बुरा नहीं हूँ। कई बार वे बेवजह बहस एवं ज़िद्द के कारण क्रोध करने लगते हैं। अभिभावकों को उनके साथ डाँट-डपट नहीं अपितु प्यार से पेश आना चाहिए।

उन्हें सृजनात्मक कार्यों में लगाने के साथ-साथ बाज़ार से स्वयं फल-सब्ज़ियाँ लाना, बिजली-पानी का बिल अदा करना आदि कार्यों में लगाकर उनकी ऊर्जा को उचित दिशा में लगाना चाहिए। अभिभावकों को उन पर विश्वास दिखाना चाहिए। उनके अच्छे कामों की प्रशंसा की जानी चाहिए। किशोरों को भी चाहिए कि वे यह समझें कि उनके माता-पिता मात्र उनका भला चाहते हैं। किशोर पढ़ाई को लेकर भी चिंतित रहते हैं। वे परीक्षा में अच्छे नंबर लेने का दबाव बना लेते हैं जिससे उनके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव पड़ता है।

इसके लिए उन्हें स्वयं योजनाबद्ध तरीके से मन लगाकर पढ़ना चाहिए। उन्हें दिनचर्या में खेलकूद, सैर, व्यायाम, संगीत आदि को भी शामिल करना चाहिए। इससे उनका तनाव कम होगा। उन्हें शिक्षकों से उचित मार्गदर्शन लेना चाहिए। माता-पिता को भी उन पर अच्छे नंबरों का दबाव नहीं बनाना चाहिए और न ही किसी से उनकी तुलना करनी चाहिए। अपने किसी सहपाठी या पड़ोस में किसी को सफलता मिलने पर कई किशोरों में ईर्ष्या की भावना आ जाती है। जबकि उन्हें ईर्ष्या नहीं, प्रतिस्पर्धा रखनी चाहिए।

कई बार कुछ किशोर किसी विषय को कठिन मानकर उससे भय खाने लगते हैं कि इसमें पास होंगे कि नहीं जबकि उन्हें समझना चाहिए कि किसी समस्या का हल डर से नहीं अपितु उसका सामना करने से हो सकता है। इसके अतिरिक्त कुछ किशोर शर्मीले स्वभाव के होते हैं, अधिक संवेदनशील होते हैं। उनका दायरा भी सीमित होता है। वे अपने उसी दायरे के मित्रों को छोड़कर अन्य लोगों से शर्माते हैं। इसके लिए उन्हें स्कूल की पाठ्येतर क्रियाओं में भाग लेना चाहिए जिससे उनकी झिझक दूर हो सके।

प्रश्न :

  1. किशोरावस्था में किशोरों की भावनाएँ किस प्रकार प्रभावित होती हैं?
  2. किशोरों की ऊर्जा को उचित दिशा में कैसे लगाना चाहिए ?
  3. किशोर अपनी चिंता और दबाव को किस प्रकार दूर कर सकते हैं ?
  4. ‘प्रतिस्पर्धा’ तथा ‘संवेदनशील’ शब्दों के अर्थ लिखिए।
  5. किशोर क्या सहन नहीं करते ?
  6. गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।

उत्तर :

  1. विभिन्न प्रकार के शारीरिक और सामाजिक परिवर्तन किशोरावस्था में आते हैं और इन्हीं के कारण उनकी भावनाएँ बहुत तीव्रता से प्रभावित होती हैं।
  2. किशोरों की सृजनात्मक कार्यों में लगाने के साथ-साथ उपयोगी कार्यों की तरफ़ दिशा दिखानी चाहिए और उन्हें बाज़ार से फल-सब्ज़ियाँ लेने भेजना, बिजली-पानी का बिल अदा करने आदि कार्यों में लगाकर उनकी ऊर्जा को उचित दिशा में उन्मुख करना चाहिए।
  3. किशोर योजनाबद्ध और व्यवस्थित तरीके से पढ़कर, खेलकूद में भाग लेकर, सैर, व्यायाम और संगीत, सामाजिक गतिविधियों आदि को सम्मिलित करके अपनी चिंता और दबाव को दूर कर सकते हैं।
  4. ‘प्रतिस्पर्धा ‘ – होड़, ‘संवेदनशील’ – भावुक।
  5. किशोर किसी बात पर उन्हें बार-बार टोकना, सदा उपदेश देते रहना, सहन नहीं करते तथा किसी बात में बुरा लगने पर शीघ्र ही क्रोध में आ जाते हैं।
  6. किशोरावस्था।

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23. जब एक उपभोक्ता अपने घर पर बैठे इंटरनेट के माध्यम से विभिन्न वस्तुओं की खरीददारी करता है तो उसे ऑन लाइन खरीददारी कहा जाता है। इस तरह की खरीददारी आज अत्यंत लोकप्रिय हो गई है। दुकानों, शोरूमों आदि के खुलने और बंद होने का समय होता है किंतु ऑनलाइन खरीददारी का कोई विशेष समय नहीं है। आप जब चाहें इंटरनेट के माध्यम से खरीददारी कर सकते हैं। आप फर्नीचर, किताबें, सौंदर्य प्रसाधन, वस्त्र, खिलौने, जूते, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आदि कुछ भी ऑनलाइन खरीद सकते हैं।

यद्यपि यह बहुत ही सुविधाजनक व लाभदायक है तथापि इसमें कई जोखिम भी समाविष्ट हैं। अतः ऑनलाइन खरीददारी करते समय सावधानी बरतनी चाहिए। सबसे पहले इस बात का यान रखें कि जिस वेबसाइट से आप खरीददारी करने जा रहे हैं वह वास्तविक है अथवा वस्तुओं की कीमतों का तुलनात्मक अध्ययन करके ही खरीददारी करें। बिक्री के नियम एवं शर्तों को पढ़ने के बाद उसका प्रिंट लेना समझदारी होगी। यदि आप क्रेडिट कार्ड के माध्यम से भुगतान करते हैं तो भुगतान के बाद तुरंत जाँच लें कि आपने जो कीमत चुकाई है वह सही है या नहीं।

यदि आप उससे कोई भी परिवर्तन पाते हैं तो तत्काल संबंधित अधिकारियों से संपर्क स्थापित करके उन्हें सूचित करें। वैसे ऐसी साइटों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जिसमें ऑर्डर की गई वस्तु की प्राप्ति होने पर नकद भुगतान करने ही सुविधा हो एवं खरीदी गई वस्तु नापसंद होने पर वापस करने का प्रावधान हो।

प्रश्न :

  1. ऑनलाइन खरीददारी किसे कहा जाता है ?
  2. आप इंटरनेट के माध्यम से ऑनलाइन क्या-क्या खरीददारी कर सकते हो ?
  3. क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने के पश्चात यदि कोई अनियमितता पायी जाती है तो हमें क्या करना चाहिए ?
  4. ‘समाविष्ट’ और ‘प्राथमिकता’ शब्दों के अर्थ लिखिए।
  5. किस साइट से ऑनलाइन खरीद करनी चाहिए ?
  6. ‘प्रतिस्पर्धा ‘ शब्द का समानार्थक लिखिए।

उत्तर :

  1. जब कोई उपभोक्ता बिना बाज़ार गए अपने घर बैठे-बैठे इंटरनेट के माध्यम से तरह-तरह की वस्तुओं की खरीददारी करता है तो उसे ऑनलाइन खरीददारी कहा जाता है।
  2. हम इंटरनेट के माध्यम से फर्नीचर, वस्त्र, खिलौने, जूते, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, किताबें, सौंदर्य प्रसाधन आदि कुछ भी ऑनलाइन खरीद सकते हैं।
  3. क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने के पश्चात यदि कोई अनियमितता पायी जाती है तो तुरंत ही संबंधित अधिकारियों को इसकी सूचना दी जानी चाहिए।
  4. समाविष्ट – सम्मिलित होना, प्राथमिकता – वरीयता।
  5. ऐसी साइटस से ऑनलाइन खरीद करनी चाहिए जिसमें ऑर्डर दी गई वस्तु की प्राप्ति होने पर भुगतान करने की सुविधा हो तथा खरीदी वस्तु पसंद नहीं आने पर वापस भी की जा सके।
  6. प्रतियोगिता।

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24. पंजाब की संस्कृति का भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान है। पंजाब की धरती पर चारों वेदों की रचना हुई। यहीं प्राचीनतम सिंधु घाटी की सभ्यता का जन्म हुआ। यह गुरुओं की पवित्र धरती है। यहाँ गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु गोविंद सिंह जी तक दस गुरुओं ने धार्मिक चेतना तथा लोक-कल्याण के अनेक सराहनीय कार्य किए हैं। गुरु तेग बहादुर जी एवं गुरु गोविंद सिंह जी के चारों साहिबज़ादों का बलिदान हमारे लिए प्रेरणादायक है और ऐसा उदाहरण संसार में अन्यत्र कहीं दिखाई नहीं देता। यहाँ अमृतसर का श्री हरमंदिर साहिब प्रमुख धार्मिक स्थल है।

इसके अतिरिक्त आनंदपुर साहिब, कीरतपुर साहिब, मुक्तसर साहिब, फतेहगढ़ साहिब के गुरुद्वारे भी प्रसिद्ध हैं। देश के स्वतंत्रता संग्राम में पंजाब के वीरों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। देश के अन्न भंडार के लिए सबसे अधिक अनाज पंजाब ही देता है। पंजाब में लोहड़ी, वैशाखी, होली, दशहरा, दीपावली आदि त्योहारों के अवसरों पर मेलों का आयोजन भी हर्षोल्लास से किया जाता है। आनंदपुर साहिब का होला मोहल्ला, मुक्तसर का माघी मेला, सरहिंद में शहीदी जोड़ मेला, फ़रीदकोट में शेख फरीद आगम पर्व, सरहिंद में रोज़ा शरीफ पर उर्स और छपार मेला जगराओं की रोशनी आदि प्रमुख हैं।

पंजाबी संस्कृति के विकास में पंजाबी साहित्य का भी महत्वपूर्ण स्थान है। मुसलमान सूफ़ी संत शेख फ़रीद, शाह हुसैन, बुल्लेशाह, गुरु नानकदेव जी, शाह मोहम्मद, गुरु अर्जनदेव जी आदि की वाणी में पंजाबी साहित्य के दर्शन होते हैं। इसके बाद दामोदर, पीलू, वारिस शाह, भाई वीर सिंह, कवि पूर्ण सिंह, धनीराम चात्रिक, शिव कुमार बटालवी, अमृता प्रीतम आदि कवियों, जसवंत सिंह, गुरदयाल सिंह और मोहन सिंह शीतल आदि उपन्यासकारों तथा अजमेर सिंह औलख, बलवंत गार्गी तथा गुरशरण सिंह आदि नाटककारों की पंजाबी साहित्य के उत्थान में सराहनीय भूमिका रही है।

प्रश्न :

  1. चारों वेदों की रचना कहाँ हुई ?
  2. पंजाब के प्रमुख ऐतिहासिक स्थल कौन-से हैं?
  3. पंजाब के प्रमुख त्योहार कौन-से हैं?
  4. देश के स्वतंत्रता संग्राम में पंजाब का क्या योगदान था ?
  5. ‘प्रेरणादायक’ और ‘हर्षोल्लास’ में संधि-विच्छेद कीजिए।
  6. किन लोगों का बलिदान हमारे लिए प्रेरणादायक है ?

उत्तर :

  1. पंजाब की धरती पर चारों वेदों की रचना हुई।
  2. अमृतसर, आनंदपुर साहिब, फतेहगढ़ साहिब, कीरतपुर साहिब, मुक्तसर साहिब आदि पंजाब के प्रमुख ऐतिहासिक स्थल हैं।
  3. लोहड़ी, वैशाखी, होली, दशहरा, दीपावली आदि पंजाब के प्रमुख त्योहार हैं।
  4. देश के स्वतंत्रता संग्राम में पंजाब के वीरों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था।
  5. प्रेरणा दायक, हर्ष + उल्लास।
  6. गुरुतेग बहादुर जी एवं गुरु गोविंद जी के चारों साहिबजादों का बलिदान प्रेरणादायक हैं।

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25. इस संसार में प्रकृति द्वारा मनुष्य को प्रदत्त सबसे अमूल्य उपहार ‘समय’ है। ढह गई इमारत को दुबारा खड़ा किया जा सकता है। बीमार व्यक्ति को इलाज द्वारा स्वस्थ किया जा सकता है; खोया हुआ धन दुबारा प्राप्त किया जा सकता है; किंतु एक बार बीता समय दुबारा नहीं पाया जा सकता। जो समय के महत्व को पहचानता है, वह उन्नति की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है। जो समय का तिरस्कार करता है, हर काम में टालमटोल करता है, समय को बरबाद करता है, समय भी उसे एक दिन बरबाद कर देता है।

समय पर किया गया हर काम सफलता में बदल जाता है जबकि समय के बीत जाने पर बहुत कोशिशों के बावजूद भी कार्य को सिद्ध नहीं किया जा सकता। समय का सदुपयोग केवल कर्मठ व्यक्ति ही कर सकता है, लापरवाह, कामचोर और आलसी नहीं। आलस्य मनुष्य की बुद्धि और समय दोनों का नाश करता है। समय के प्रति सावधान रहने वाला मनुष्य आलस्य से दूर भागता है तथा परिश्रम, लगन और सत्कर्म को गले लगाता है। विद्यार्थी जीवन में समय का अत्यधिक महत्व होता है। विद्यार्थी को अपने समय का सदुपयोग ज्ञानार्जन में करना चाहिए न कि अनावश्यक बातों, आमोद-प्रमोद या फैशन में।

प्रश्न :

  1. प्रकृति द्वारा मनुष्य को दिया गया सबसे अमूल्य उपहार क्या है?
  2. समय के प्रति सावधान रहने वाला व्यक्ति किससे दूर भागता है?
  3. विद्यार्थी को समय का सदुपयोग कैसे करना चाहिए?
  4. ‘कर्मठ’ तथा ‘तिरस्कार’ शब्दों के अर्थ लिखिए।
  5. उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
  6. गद्यांश से विशेषण शब्द छाँटकर लिखिए।

उत्तर :

  1. प्रकृति के द्वारा मनुष्य को दिया गया अमूल्य उपहार समय
  2. समय के प्रति सावधान रहने वाला व्यक्ति आलस्य से दूर भागता है।
  3. विद्यार्थी को समय का सदुपयोग ज्ञानार्जन से करना चाहिए।
  4. कर्मठ – परिश्रमी, तिरस्कार – अपमान।
  5. समय – प्रकृति का अमूल्य उपहार।
  6. कर्मठ, लापरवाह, कामचोर, आलसी, बीमार आदि विशेषण शब्द हैं।

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26. व्यवसाय या रोज़गार पर आधारित शिक्षा व्यावसायिक शिक्षा कहलाती है। भारत सरकार इस दिशा में सराहनीय भूमिका निभा रही है। इस शिक्षा को प्राप्त करके विद्यार्थी शीघ्र ही अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है। प्रतियोगिता के इस दौर में तो इस शिक्षा का महत्व और भी बढ़ जाता है व्यावसायिक शिक्षा में ऐसे कोर्स रखे जाते हैं जिनमें व्यावहारिक प्रशिक्षण अर्थात प्रेक्टिकल ट्रेनिंग पर अधिक जोर दिया जाता है। यह आत्मनिर्भरता के लिए एक बेहतर कदम है। व्यावसायिक शिक्षा के महत्व को देखते हुए भारत और राज्य सरकारों ने इसे स्कूल स्तर पर शुरू किया है। निजी संस्थाएँ भी इस क्षेत्र में सराहनीय भूमिका निभा रही हैं।

कुछ स्कूलों में तो नौवीं कक्षा से ही व्यावसायिक शिक्षा दी जाती है। परंतु बड़े पैमाने पर इसे ग्यारहवीं कक्षा से शुरू किया गया है। व्यावसायिक शिक्षा का दायरा काफ़ी विस्तृत है। विद्यार्थी अपनी पसंद और क्षमता के आधार पर विभिन्न व्यावसायिक कोर्सों में प्रवेश ले सकते हैं। कॉमर्स – क्षेत्र में कार्यालय प्रबंधन, आशुलिपि और कंप्यूटर एप्लीकेशन, बैंकिंग, लेखापरीक्षण, मार्केटिंग एंड सेल्ज़मैनशिप आदि व्यावसायिक कोर्स आते हैं। इंजीनियरिंग क्षेत्र में इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयर कंडीशनिंग एंड रेफ़रीजरेशन एवं ऑटोमोबाइल टेक्नोलॉजी आदि व्यावसायिक कोर्स आते हैं।

कृषि – क्षेत्र में डेयरी उद्योग, बागवानी तथा कुक्कुट (पोल्ट्री) उद्योग से संबंधित व्यावसायिक कोर्स किए जा सकते हैं। गृह विज्ञान क्षेत्र में स्वास्थ्य, ब्यूटी, फैशन तथा वस्त्र उद्योग आदि व्यावसायिक कोर्स आते हैं। हेल्थ एंड पैरामेडिकल क्षेत्र में मेडिकल लेबोरटरी, एक्स-रे टेक्नोलॉजी एवं हेल्थ केयर साइंस आदि व्यावसायिक कोर्स किए जा सकते हैं। आतिथ्य एवं पर्यटन क्षेत्र में फूड प्रोडक्शन, होटल मैनेजमेंट, टूरिज्म एंड ट्रैवल, बेकरी से संबंधित व्यावसायिक कोर्स किए जा सकते हैं। सूचना तकनीक के तहत आई०टी० एप्लीकेशन कोर्स किया जा सकता है। इनके अतिरिक्त पुस्तकालय प्रबंधन, जीवन बीमा, पत्रकारिता आदि व्यावसायिक कोर्स किए जा सकते हैं।

प्रश्न :

  1. व्यावसायिक शिक्षा से आपका क्या अभिप्राय है?
  2. इंजीनियरिंग क्षेत्र में कौन-कौन से व्यावसायिक कोर्स आते हैं?
  3. व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने से क्या लाभ है?
  4. कॉमर्स क्षेत्र में कौन-कौन से व्यावसायिक कोर्स आते हैं?
  5. ‘आधारित’ और ‘व्यावसायिक’ में प्रत्यय अलग करके लिखिए।
  6. उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।

उत्तर :

  1. व्यवसाय अथवा रोजगार पर आधारित शिक्षा को व्यावसायिक शिक्षा कहते हैं।
  2. इंजीनियरिंग क्षेत्र में इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयर कंडीशनिंग एंड रेफ्रीजरेशन और ऑटोमोबाइल टेक्नोलॉजी आदि व्यावसायिक कोर्स आते हैं।
  3. व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करके विद्यार्थी शीघ्र ही अपने पैरों पर खड़ा होकर कमाने लगता है।
  4. कॉमर्स क्षेत्र में कार्यालय प्रबंधन, आशुलिपि, कंप्यूटर एप्लीकेशन, बैंकिंग, लेखापरीक्षण, सेल्स, मार्केटिंग, इंश्योरेंस आदि व्यावसायिक कोर्स आते हैं।
  5. इत और इक।
  6. व्यावसायिक शिक्षा।

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27. समय वह संपत्ति है जो प्रत्येक मनुष्य को ईश्वर की ओर से मिली है। जो लोग इस धन को संचित रीति से बरतते हैं, वही शारीरिक सुख तथा आत्मिक आनंद प्राप्त करते हैं। इसी समय संपत्ति के सदुपयोग से एक जंगली मनुष्य सभ्य और देवता स्वरूप बन सकता है। उसी के द्वारा मूर्ख विद्वान, निर्धन धनवान और यज्ञ अनुभवी बन सकता है। संतोष, हर्ष या सुख मनुष्य को कदापि प्राप्त नहीं होता जब तक वह उचित रीति से समय का उपयोग नहीं करता। समय निःसंदेह एक रत्न-शील है। जो कोई उसे अपरिमित और अगणित रूप से अंधाधुंध व्यय करता है, वह दिन-दिन अकिंचन, रिक्त हस्त और दरिद्र होता है।

वह आजीवन खिन्न रहकर भाग्य को कोसता रहता है, मृत्यु भी उसे इस जंजाल और दुख से छुड़ा नहीं सकती। सच तो यह है कि समय नष्ट करना एक प्रकार की आत्म-हत्या है, अंतर केवल इतना ही है कि आत्मघात सर्वदा के लिए जीवन – जंजाल छुड़ा देती है और समय के दुरुपयोग से एक निर्दिष्ट काल तक जीवनमृत की दशा बनी रहती है। ये ही मिनट, घंटे और दिन प्रमाद और अकर्मण्यता में बीतते जाते हैं। यदि मनुष्य विचार करे, गणना करे, तो उनकी संख्या महीनों तथा वर्षों तक पहुँचती है।

यदि उसे कहा जाता है कि तेरी आयु से दस-पाँच वर्ष घटा दिए तो नि:संदेह उनके हृदय पर भारी आघात पहुँचता, परन्तु वह स्वयं निश्चेष्ट बैठे अपने अमूल्य जीवन को नष्ट कर रहा है और क्षय एवं विनाश पर कुछ भी शोक नहीं करता। यद्यपि समय की निरूपभोगिता आयु को घटाती है, परंतु यदि हानि होती है तो अधिक चिंता की बात न थी, क्योंकि संसार में सब को दीर्घायु प्राप्त नही होती; परंतु सबसे बड़ी हानि जो समय की दुरुपयोगिता और अकर्मण्यता से होती है, वह यह कि पुरुषार्थहीन और निरीह पुरुष के विचार अपवित्र और दूषित हो जाते हैं। वास्तव में बात तो यह है कि मनुष्य कुछ-न-कुछ करने के लिए बनाया गया है।

जब चित्त और मन लाभदायक कार्य में लवलीन नहीं होते, तब उनका झुकाव बुराई और पाप की ओर अवश्य हो जाता है। इस हेतु यदि मनुष्य सचमुच ही मनुष्य बनना चाहता है तो सब कामों से बढ़कर श्रेष्ठ कार्य उसके लिए यह है कि वह एक पल भी व्यर्थ न सोचे, प्रत्येक कार्य के लिए पृथक समय और प्रत्येक समय के लिए कार्य निश्चित करे।

प्रश्न :
1. किस प्रकार के व्यक्ति शारीरिक और आत्मिक सुख प्राप्त कर सकते हैं ?
2. समय का सदुपयोग न करने से क्या अहित हो सकता है ?
3. समय नष्ट करने को आत्मघात किस प्रकार माना जा सकता है ?
4. मनुष्य की सफलता का क्या रहस्य है ?
5. मनुष्य को सचमुच मनुष्य बनने के लिए क्या करना चाहिए?
6. इस गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
उत्तर :
1. जो लोग समय के महत्व को समझकर उसका नियमित रूप से पालन करते हैं, वे ही शारीरिक और आत्मिक सुख प्राप्त कर सकते हैं।
2. समय का सदुपयोग न करने से मनुष्य अपने जीवन में किसी प्रकार का भी सुख प्राप्त नहीं कर सकता। यह अज्ञान के कारण मूर्ख तथा धन के अभाव में ग़रीब रहेगा।
3. आत्मघात के द्वारा व्यक्ति अपने जीवन को समाप्त कर लेता है और समय नष्ट करके वह अमूल्य जीवन में विभिन्न प्रकार के कष्टों को इकट्ठा कर लेता है जिससे जीवन बोझ बन जाता है। उसके दुख उसे मृतक की पीड़ा से बढ़कर कष्टकारी हो जाते हैं।
4. मनुष्य के लिए समय ईश्वर द्वारा दी गई अमूल्य संपत्ति है उसके सदुपयोग से जीवन का विकास होता है। शारीरिक तथा आत्मिक सुख और आनंद की प्राप्ति होती है। इसका उपयोग बहुमूल्य पदार्थ के समान करना चाहिए। इसको खोना जीवन को खोना है। समय का दुरुपयोग करने वाला मृत्यु में भी सुख नहीं पाता। समय नष्ट करने से आयु घटती है और विचार दूषित बनता है। आलसी, पापी और शैतान की कोटि में आते हैं। मनुष्य जीवन की सार्थकता कर्मठ होने में है। प्रत्येक क्षण का सदुपयोग जीवन की सफलता का परिचायक है।
5. मनुष्य को एक पल व्यर्थ सोचे बिना, प्रत्येक कार्य के लिए पृथक समय और प्रत्येक समय के लिए कार्य निश्चित करे। तभी वह सचमुच मनुष्य बन सकता है।
6. ‘समय का सदुपयोग’।

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28. साहित्यकार बहुधा अपने देशकाल में प्रवाहित होता है। जब कोई लहर देश में उठती है, साहित्यकार के लिए उससे अविचलित रहना असंभव हो जाता है। उसकी विशाल आत्मा अपने देश बंधुओं के कष्टों से विकल हो उठती है और इस तीव्र विकलता में वह रो उठता है, पर उसके क्रंदन में भी व्यापकता होती है। वह स्वदेश होकर भी सार्वभौमिक रहता है। ‘टाम काका की कुटिया’ गुलामी की प्रथा से व्यथित हृदय की रचना है, पर आज उस प्रथा के उठ जाने पर भी उसमें व्यापकता है कि लोग उसे पढ़कर मुग्ध हो जाते हैं।

सच्चा साहित्य कभी पुराना नहीं होता। वह सदा नया बना रहता है। दर्शन और विज्ञान समय की गति के अनुसार बदलते रहते हैं। पर साहित्य तो हृदय की वस्तु है और मानव – हृदय में तबदीलियाँ नहीं होतीं। हर्ष और विस्मय, क्रोध और द्वेष, आशा और भय उपज भी हमारे मन पर उसी तरह अधिकृत हैं, जैसे आदिकवि वाल्मीकि के समय में भी और कदाचित अनंत मन पर उसी तक रहेंगे। रामायण के काल का समय अब नहीं है, महाभारत का समय भी अतीत हो गया। पर ये ग्रंथ अभी तक नए हैं। साहित्य ही सच्चा इतिहास है, क्योंकि इसमें अपने देश और काल का जैसे चित्र होता है, वैसा कोरे इतिहास में नहीं हो सकता। घटनाओं की तालिका इतिहास नहीं है और न राजाओं की लड़ाइयाँ ही इतिहास है। इतिहास जीवन के विभिन्न अंगों की प्रगति का नाम और जीवन पर साहित्य अपने देश-काल का प्रतिबिंब होता है।

प्रश्न :
1. साहित्यकार अपने साहित्य के लिए प्रेरणा कहाँ से प्राप्त करता है ?
2. साहित्य में व्यक्त समाज की पीड़ा का क्या कारण होता है ?
3. ‘साहित्य कभी पुराना नहीं होता’ इस धारणा का क्या कारण है ?
4. सच्चा इतिहास किसे माना जाना चाहिए ?
5. उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
6. समय और गति के अनुसार कौन बदलते हैं?
उत्तर :
1. प्रत्येक साहित्यकार अपने साहित्य के लिए प्रेरणा अपने समाज से प्राप्त करता है। देश में उत्पन्न किसी भी प्रकार की हलचल उसे प्रभावित करती है। लोगों के सुख-दुख उसे व्यथित करते हैं और वह उन सुख – दुखों को साहित्य के माध्यम से प्रकट करने लगता है।

2. प्रत्येक साहित्यकार अपने समाज से प्रभावित होता है और लोगों के दुखों को अनुभव करके उन्हें वाणी प्रदान करता है। साहित्यकार भावुक होता है और उसे लोगों की पीड़ा अपनी पीड़ा लगने लगती है।

3. साहित्य मानव मन और उसके व्यवहार से संबंधित है। मानव के हृदय में उत्पन्न होने वाले भाव कभी नहीं बदलते। दुख, सुख, विस्मय, क्रोध, द्वेष, आशा, निराशा, भय आदि सदा उसे समान रूप से प्रभावित करते हैं। जब वे साहित्य के माध्यम से प्रकट हो जाते हैं तो शाश्वत गुण प्राप्त कर सदा नया रूप प्राप्त किए रहते हैं।

4. साहित्यकार अपने देश की परिस्थितियों से प्रभावित होता है। उसकी वाणी में व्यापकता होती है। इसलिए वह देश का होकर भी स्वदेशीय बन जाता है। सच्चा साहित्य मानवीय अनुभूतियों का चित्रण होने के कारण कभी पुरानी नहीं होता। रामायण और महाभारत अमर रचनाएँ हैं। इतिहास और साहित्य में बड़ा अन्तर होता है। इतिहास में घटनाओं की तालिका और राजाओं के नाम और उनके कारनामे होते हैं। इसे सच्चा इतिहास नहीं कहा जा सकता है। सच्चा इतिहास तो साहित्य ही है।

5. साहित्यकार और समाज।

6. दर्शन और विज्ञान समय और गति के अनुसार बदलते हैं।

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29. शिक्षा के क्षेत्र के समान चिकित्सा के क्षेत्र में भी स्त्रियों का सहयोग वांछनीय है। हमारा स्त्री – समाज रोगों से जर्जर हो रहा है। उसकी संतान कितनी अधिक संख्या से असमय ही काल का ग्रास बन रही है, यह पुरुष से अधिक स्त्री की खोज का विषय है। जितनी सुयोग्य स्त्रियाँ इस क्षेत्र में होंगी, उतना ही अधिक समाज का लाभ होगा। स्त्री में स्वाभाविक कोमलता पुरुष की अपेक्षा अधिक होती है, साथ ही पुरुष के समान व्यवसाय बुद्धि प्रायः उसमें नहीं रहती है। अतः वह इस कार्य को अधिक सहानुभूति के साथ ही कर सकती है।

इसी कारण रोगी की परिचर्या के लिए नर्स ही रखी जाती है। यह सत्य है कि न सब पुरुष ही इस कार्य के लिए उपयुक्त होते हैं और न सब स्त्रियाँ, परंतु जिन्हें इस गुरुतम कर्तव्य के लिए रुचि और सुविधाएँ दोनों ही मिली हैं, उन स्त्रियों का इस क्षेत्र में प्रवेश करना उचित ही होगा। कुछ इनी – गिनी स्त्री – चिकित्सक भी हैं, परंतु समाज अपनी आवश्यकता के समय ही उनसे संपर्क रखता है। उसका शिक्षिकाओं से अधिक बहिष्कार है, कम नहीं। ऐसी महिलाओं में से, जिन्होंने सुयोग्य एवं संपन्न व्यक्तियों से विवाह करके बाहर के वातावरण की नीरसता को घर की सरसता में मिलाना चाहा, उन्हें प्रायः असफलता ही प्राप्त हो सकी।

उनका इस प्रकार घर की सीमा से बाहर ही कार्य करना पतियों की प्रतिष्ठा के अनुकूल सिद्ध न हो सका। इसलिए अंत में उन्हें अपनी शक्तियों को घर तक ही सीमित रखने के लिए बाध्य होना पड़ा। वे पारिवारिक जीवन में कितनी सुखी हुईं, यह कहना तो कठिन है, परन्तु उन्हें इस प्रकार खोकर स्त्री- समाज अधिक प्रसन्न न हो सका। यदि झूठी प्रतिष्ठा की भावना इस प्रकार की बाधा न डालती और वे अवकाश के समय कुछ अंश इस कर्तव्य के लिए भी रख सकतीं तो अवश्य ही समाज का अधिक कल्याण होता।

प्रश्न :
1. स्त्रियाँ चिकित्सा क्षेत्र में अधिक सफलता क्यों प्राप्त कर सकती हैं ?
2. प्रायः स्त्रियाँ चिकित्सक के रूप में इतनी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सकीं, जितना पुरुष चिकित्सक। क्यों ?
3. समाज का कल्याण कब अधिक अच्छा हो पाता है ?
4. स्त्री चिकित्सकों के पतियों को किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए ?
5. ऊपर दिए गए गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
6. ‘स्वाभाविक’ शब्द में प्रत्यय अलग करके लिखिए।
उत्तर –
1. स्त्रियाँ अपेक्षाकृत अधिक भावुक और मानसिक रूप में कोमल होती हैं। उनमें पुरुषों से अधिक कोमलता होती है। वे उतनी व्यावसायिक कभी नहीं हो सकतीं जितने पुरुष होते हैं। उनमें सहानुभूति की भावना अधिक होती है, इसलिए वे चिकित्सा के क्षेत्र में अधिक सफलता प्राप्त कर सकती हैं।

2. स्त्री चिकित्सकों के साथ समाज में प्रायः तभी संपर्क रखा जाता है जब उसे उसकी आवश्यकता होती है। साथ ही वे विवाह के पश्चात घर-बाहर के प्रति ठीक प्रकार से ताल-मेल नहीं बिठा पातीं जिस कारण परिवार में असंतुष्टि की भावना पनपने लगती है। वे घर-बाहर दोनों जगह असंतोष उत्पत्ति के कारण उतनी प्रतिष्ठित नहीं हो पातीं जितने पुरुष चिकित्सक।

3. यदि स्त्री चिकित्सक घर-बाहर से ठीक प्रकार से संतुलन बना पातीं तो समाज का अधिक कल्याण हो पाता।

4. स्त्रियों को शिक्षा के क्षेत्र के समान चिकित्सा के क्षेत्र में भी आना चाहिए। वे शरीर तथा स्वभाव दोनों से इस व्यवसाय के लिए उपयुक्त हैं। भारतीय महिलाएँ प्रायः बीमार तथा कमजोर रहती हैं। उनके बच्चे भी अकाल मृत्यु का ग्रास बन जाते हैं। इन समस्याओं की खोज स्त्रियाँ भली-भाँति कर सकती हैं। कुछ स्त्रियाँ इस व्यवसाय को अपनाना चाहती हैं पर उनके पति इस व्यवसाय को अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल समझते हैं। उन्हें विवश होकर इस व्यवसाय से विमुख होना पड़ता है। पतियों को समाज के हित के लिए निरर्थक सम्मान की भावना का त्याग करना चाहिए।

5. ‘स्त्री चिकित्सक’।
6. स्वभाव + इक (प्रत्यय)।

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निम्नलिखित गद्यांशों को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए बहुविकल्पी प्रश्नों के सही विकल्प वाले उत्तर चुनिए –

1. अहिंसा और कायरता कभी साथ नहीं चलती। मैं पूरी तरह शस्त्र – सज्जित मनुष्य के हृदय से कायर होने की कल्पना कर सकता हूँ। हथियार रखना कायरता नहीं तो डर का होना तो प्रकट करता ही है, परंतु सच्ची अहिंसा शुद्ध निर्भयता के बिना असंभव है। क्या मुझमें बहादुरों की वह अहिंसा है? केवल मेरी मृत्यु ही इसे बताएगी। अगर कोई मेरी हत्या करे और मैं मुँह से हत्यारे के लिए प्रार्थना करते हुए तथा ईश्वर का नाम जपते हुए और हृदये मंदिर में उसकी जीती-जागती उपस्थिति का भान रखते हुए मरूँ तो ही कहा जाएगा कि मझमें बहादुरों की अहिंसा थी। मेरी सारी शक्तियों के क्षीण हो जाने से अपंग बनकर मैं एक हारे हुए आदमी के रूप में नहीं मरना चाहता। किसी हत्यारे की गोली भले मेरे जीवन का अंत कर दे, मैं उसका स्वागत करूँगा।

लेकिन सबसे ज़्यादा तो मैं अंतिम श्वास तक अपना कर्तव्य पालन करते हुए ही मरना पसंद करूंगा। मुझे शहीद होने की तमन्ना नहीं है। लेकिन अगर धर्म की रक्षा का उच्चतम कर्तव्य पालन करते हुए मुझे शहादत मिल जाए तो मैं उसका पात्र माना जाऊँगा। भूतकाल में मेरे प्राण लेने के लिए मुझ पर अनेक बार आक्रमण किए गए हैं, परंतु आज तक भगवान ने मेरी रक्षा की है और प्राण लेने का प्रयत्न करने वाले अपने किए पर पछताए हैं। लेकिन अगर कोई आदमी यह मानकर मुझ पर गोली चलाए कि वह एक दुष्ट का खात्मा कर रहा है, तो वह एक सच्चे गांधी की हत्या नहीं करेगा, बल्कि उस गांधी की करेगा जो उसे दुष्ट दिखाई दिया था।

(क) अहिंसा और कायरता के बारे में क्या कहा गया है?
(i) कभी – कभी एक साथ चलती है।
(ii) हमेशा साथ चलती है।
(iii) दोनों खतरनाक होती हैं।
(iv) कभी साथ नहीं चलती।
उत्तर :
(iv) कभी साथ नहीं चलती।

(ख) सच्ची अहिंसा किसके बिना असंभव है?
(i) कायरता के बिना
(ii) शुद्ध निर्भयता के बिना
(iii) ममता के बिना
(iv) शुद्ध जड़ता के बिना
उत्तर :
(ii) शुद्ध निर्भयता के बिना

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(ग) गांधी जी किस प्रकार मरना पसंद करेंगे?
(i) कर्तव्य पालन करते हुए
(ii) शत्रु को बदले की भावना से मारते हुए
(iii) हिंसा करते हुए
(iv) सभी विकल्प
उत्तर :
(i) कर्तव्य पालन करते हुए

(घ) प्राण लेने का प्रयत्न करने वालों के साथ क्या हुआ है ?
(i) कोई फर्क नहीं पड़ा है।
(ii) आंतरिक ग्लानि नहीं हुई।
(iii) अपने किए पर पछताए हैं।
(iv) कभी झुके नहीं हैं।
उत्तर :
(iii) अपने किए पर पछताए हैं।

(ङ) किसी हत्यारे की गोली भले मेरे जीवन का अंत कर दे, मैं उसका
(i) उसका जड़ से खात्मा करूँगा।
(ii) हृदय से स्वागत करूँगा।
(iii) उसको मिट्टी में मिला दूँगा।
(iv) मैं उसकी प्रशंसा करूँगा।
उत्तर :
(ii) हृदय से स्वागत करूँगा।

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2. तानाशाह जनमानस के जागरण को कोई महत्व नहीं देता। उसका निर्माण ऊपर से चलता है, किंतु यह लादा हुआ भार – स्वरूप निर्माण हो जाता है। सच्चा राष्ट्र-निर्माण वह है, जो जनमानस की तैयारी पर आधारित रहता है। योजनाएँ शासन और सत्ता बनाएँ, उन्हें कार्यरूप में परिणत भी करें, किंतु साथ ही उन्हें चिर स्थायी बनाए रखने एवं पूर्णतया उद्देश्य पूर्ति के लिए यह आवश्यक है कि जनमानस उन योजनाओं के लिए तैयार हो। स्पष्ट शब्दों में हम कह सकते हैं कि सत्ता राष्ट्र-निर्माण रूपी फ़सल के लिए हल चलाने वाले किसान का कार्य तो कर सकती है, किंतु उसे भूमि जनमानस को ही बनानी पड़ेगी।

अन्यथा फ़सल या तो हवाई होगी या फिर गमलों की फ़सल होगी। जैसा आजकल ‘अधिक अन्न उपजाओ’ आंदोलन के कर्णधार भारत के मंत्रिगण कराया करते हैं। इस फ़सल को किस-किस बुभुक्षित के सामने रखेगी शासन सत्ता? यह प्रश्न मस्तिष्क में चक्कर ही काटा करता है। इस विवेचन से हमने राष्ट्र-निर्माण में जनमानस की तैयारी का महत्व पहचान लिया है। यह जनमानस किस प्रकार तैयार होता है ? इस प्रश्न का उत्तर आपको समाचार पत्र देगा।

निर्माण – काल में यदि समाचार – पत्र सत्समालोचना से उतरकर ध्वंसात्मक हो गया तो निश्चित रूप से वह कर्तव्यच्युत हो जाता है, किंतु सत्समालोचना निर्माण के लिए उतनी ही आवश्यक है, जितना निर्माण का समर्थन। जनमानस को तैयार करने के लिए समाचार-पत्र किस नीति को अपनाएँ ? यह प्रश्न अपने में एक विवाद लिए हुए है; क्योंकि भिन्न-भिन्न समाचार-पत्र भिन्न-भिन्न नीतियों को उद्देश्य बनाकर प्रकाशित होते हैं। यहाँ तक कि राष्ट्र-निर्माण की योजनाएँ भी उनके मस्तिष्क में भिन्न-भिन्न होती हैं।

(क) सच्चा राष्ट्र-निर्माण किसे कहा गया है?
(i) जो जनमानस की तैयारी पर आधारित रहता है।
(ii) जो केवल योजना – निर्माण पर आधारित रहता है।
(iii) जो केवल शासन की तानाशाही पर आधारित रहता है।
(iv) जो आकस्मिक तैयारी पर आधारित रहता है।
उत्तर :
(i) जो जनमानस की तैयारी पर आधारित रहता है।

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(ख) किस बात का भी ध्यान रखना आवश्यक है?
(i) जनमानस केवल व्यय करने के लिए तैयार हो।
(ii) सरकार की सख्ती से तैयारी हो।
(iii) जनमानस उन सभी योजनाओं के लिए मन से तैयार हो।
(iv) योजनाओं के लिए केवल कामगारों की पूर्ण तैयारी हो।
उत्तर :
(iii) जनमानस उन सभी योजनाओं के लिए मन से तैयार हो।

(ग) शासन और सत्ता को लेखक ने क्या हिदायत दी है?
(i) शासन और सत्ता योजनाएँ बनाएँ।
(ii) योजनाओं को कार्यरूप में परिणत भी करें।
(iii) योजनाओं को चिर – स्थायी बनाए।
(iv) ये सभी विकल्प।
उत्तर :
(iv) ये सभी विकल्प।

(घ) राष्ट्र-निर्माण में जनमानस की आवश्यकता पर लेखक क्या कहते हैं?
(i) सत्ता राष्ट्र-निर्माण रूपी फ़सल के लिए किसान का कार्य तो कर सकती है।
(ii) राष्ट्र-निर्माण रूपी फ़सल के लिए भूमि जनमानस को ही बनाना होगा।
(iii) भूमि का निर्माण आधुनिक यंत्रों से करना होगा।
(iv) (i) व (ii) विकल्प
उत्तर :
(iv) (i) व (ii) विकल्प

(ङ) जनमानस तैयार करने का साधन क्या है ?
(i) आलोचना
(ii) समाचार – पत्र
(iii) सरकार
(iv) संविधान
उत्तर :
(ii) समाचार – पत्र

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3. काव्य- कला गतिशील कला है; किंतु चित्रण – कला स्थायी कला है। काव्य में शब्दों की सहायता से क्रियाओं और घटनाओं का वर्णन किया जा सकता है। कविता का प्रवाह समय द्वारा बँधा हुआ नहीं है। समय और कविता दोनों ही प्रगतिशील हैं; इसलिए कविता समय के साथ परिवर्तित होने वाली क्रियाओं, घटनाओं और परिस्थितियों का वर्णन समुचित रूप से कर सकती है। चित्रण – कला स्थायी होने के कारण समय के केवल एक पल को पदार्थों के केवल एक रूप को अंकित कर सकती है। चित्रण – कला में केवल पदार्थों का चित्रण हो सकता है।

कविता में परिवर्तनशील परिस्थितियों, घटनाओं और क्रियाओं का वर्णन हो सकता है, इसलिए कहा जा सकता है कि कविता का क्षेत्र चित्रकला से विस्तृत है। कविता द्वारा व्यक्त किए हुए एक-एक भाव और कभी-कभी कविता के एक शब्द के लिए अलग चित्र उपस्थित किए जा सकते हैं। किंतु पदार्थों का अस्तित्व समय से परे तो है नहीं, उनका भी रूप समय के साथ बदलता रहता है और ये बदलते हुए रूप बहुत अंशों में समय का प्रभाव प्रकट करते हैं। इसी प्रकार क्रिया और गति, बिना पदार्थों के आधार के संभव नहीं। इस भाँति किसी अंश में कविता पदार्थों का सहारा लेती है और चित्रण – कला प्रगतिवान समय द्वारा प्रभावित होती है, पर यह सब गौण रूप से होता है।

हमने लिखा है कि पदार्थों का चित्रण चित्रकला का काम है, कविता का नहीं। इस पर कुछ लोग आपत्ति कर सकते हैं कि काव्य-कला के माध्यम से अधिक शब्द सर्वशक्तिमान हैं, उनसे जो काम चाहे लिया जा सकता है; पदार्थों के वर्णन में वे उतने ही काम के हो सकते हैं जितने क्रियाओं के, पर यह अस्वीकार करते हुए भी कि शब्द बहुत कुछ करने में समर्थ हैं, यह नहीं माना जा सकता कि वे पदार्थों का चित्रण उसी सुंदरता से कर सकते हैं जिस सुंदरता से चित्र।

(क) काव्य में क्रियाओं और घटनाओं का वर्णन किसकी सहायता से किया जा सकता है?
(i) शब्दों की सहायता से
(ii) संगीत की सहायता से
(iii) कल्पना की सहायता से
(iv) ये सभी विकल्प
उत्तर :
(i) शब्दों की सहायता से

(ख) चित्रण – कला स्थायी होने के कारण पदार्थों के केवल –
(i) एक रूप को तथा समय के एक पल को ही चित्रित कर सकती है।
(ii) परिवर्तनशील परिस्थितियों, घटनाओं और क्रियाओं का वर्णन नहीं कर सकती है।
(iii) प्रभाव उत्पन्न कर सकती है।
(iv) ये सभी विकल्प
उत्तर :
(iv) ये सभी विकल्प

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(ग) पदार्थों का चित्रण किस कला का काम है?
(i) काव्यकला का
(ii) वास्तुकला का
(iii) चित्रकला
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(iii) चित्रकला

(घ) काव्य-कला के माध्यम से शब्दों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
(i) अधिक सर्वशक्तिमान होते हैं।
(ii) वे क्रियाओं के समान पदार्थों के वर्णन भी प्रभवी ढंग से कर सकते हैं।
(iii) शब्द चित्रकला के समान पदार्थों का चित्रण कर सकते हैं।
(iv) इनमें से सभी विकल्प
उत्तर :
(iv) इनमें से सभी विकल्प

(ङ) चित्र को देखकर मन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
(i) हम चित्र को भूल जाते हैं।
(ii) हम चित्रित पदार्थों को अपनी आँखों के सामने देखने लगते हैं।
(iii) हम काल्पनिक पदार्थों को अपने आँखों के सामने देखने लगते हैं।
(iv) (i) व (ii) विकल्प
उत्तर :
(iv) (i) व (ii) विकल्प

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4. हमारे बाल्यकाल के संस्कार ही जीवन का ध्येय निर्धारित करते हैं, अतः यदि वैभव में हमारी संतान ऐसे व्यक्तियों की छाया में ज्ञान प्राप्त करेगी, जिनमें चरित्र तथा सिद्धांत की विशेषता नहीं है, जिनमें संस्कारजनित अनेक दोष हैं, तो फिर विद्यार्थियों के चरित्र पर भी उसी की छाप पड़ेगी और भविष्य में उनके ध्येय भी उसी के अनुसार स्वार्थमय तथा अस्थिर होंगे। शिक्षा एक ऐसा कर्तव्य नहीं है जो किसी पुस्तक को प्रथम पृष्ठ से अंतिम पृष्ठ तक पढ़ने से ही पूर्ण हो जाता हो, वरन् वह ऐसा कर्तव्य है जिसकी परिधि सारे जीवन को घेरे हुए है और पुस्तकें ऐसे साँचे हैं जिनमें ढालकर उसे सुडौल बनाया जा सकता है।

यह वास्तव में आश्चर्य का विषय है कि हम अपने साधारण कार्यों के लिए करने वालों में जो योग्यता देखते हैं, वैसी योग्यता भी शिक्षकों में नहीं ढूँढ़ते। जो हमारी बालिकाओं, भविष्य की माताओं का निर्माण करेंगे उनके प्रति हमारी उदासीनता को अक्षम्य ही कहना चाहिए। देश-विशेष, समाज – विशेष तथा संस्कृति – विशेष के अनुसार किसी के मानसिक विकास के साधन और सुविधाएँ उपस्थित करते हुए उसे विस्तृत संसार का ऐसा ज्ञान करा देना ही शिक्षा है, जिससे वह अपने जीवन में सामंजस्य का अनुभव कर सके और उसे अपने क्षेत्र – विशेष के साथ ही बाहर भी उपयोगी बना सके। यह महत्वपूर्ण कार्य ऐसा नहीं है जिसे किसी विशिष्ट संस्कृति से अनभिज्ञ चंचल चित्त और शिथिल चरित्र वाले व्यक्ति सुचारु रूप से संपादित कर सकें।

परंतु प्रश्न यह है कि इस महान उत्तरदायित्व के योग्य व्यक्ति कहाँ से लाए जाएँ ? पढ़ी-लिखी महिलाओं की संख्या उँगलियों पर गिनने योग्य है और उनमें भी भारतीय संस्कृति के अनुसार शिक्षिताएँ बहुत कम हैं, जो हैं उनके जीवन के ध्येयों में इस कर्तव्य की छाया का प्रवेश भी निषिद्ध समझा जाता है। कुछ शिक्षिकावर्ग को उच्छृंखलता समझी जाने वाली स्वतंत्रता के कारण और कुछ अपने संकीर्ण दृष्टिकोण के कारण अन्य महिलाएँ अध्यापन कार्य तथा उसे जीवन का लक्ष्य बनाने वालियों को अवज्ञा और अनादर की दृष्टि से देखने लगी हैं।

अतः जीवन के आदि से अंत तक कभी किसी के अवकाश के क्षण में उनका ध्यान इस आवश्यकता की ओर नहीं जाता, जिसकी पूर्ति पर उनकी संतान का भविष्य निर्भर है। अपने सामाजिक दायित्वों को समझा जाना चाहिए। यह समाज में आज सबसे बड़ी कमी है।

(क) संस्कारजनित दोषों से युक्त व्यक्तियों से ज्ञान प्राप्त करने पर विद्यार्थियों के चरित्र पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
(i) विद्यार्थियों के चरित्र पर भी उसी की छाप पड़ती है।
(ii) उनके ध्येय भी उसी के अनुसार स्वार्थमय तथा अस्थिर होते हैं।
(iii) उनके ध्येय निश्चित स्वार्थयुक्त और स्थिर रहते हैं।
(iv) (i) व (ii) विकल्प
उत्तर :
(iv) (i) व (ii) विकल्प

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(ख) शिक्षा को कैसा कर्तव्य बताया गया है ?
(i) शिक्षा की परिधि में सभी प्रकार के जीवन संबंधित क्षेत्र आ जाते हैं।
(ii) शिक्षा सबको प्रभावित नहीं करती है।
(iii) शिक्षा का क्षेत्र सीमित होता है।
(iv) शिक्षा की बुनियादी ज़रूरत नहीं है।
उत्तर :
(i) शिक्षा की परिधि में सभी प्रकार के जीवन संबंधित क्षेत्र आ जाते हैं।

(ग) लेखक ने किसे आश्चर्य किसे कहा है?
(i) अपने साधारण कार्य करवाने के लिए भी हम लोगों में योग्यता खोजते हैं।
(ii) भविष्य की माताओं का निर्माण करने वाली शिक्षिकाओं के प्रति उदासीन हो जाते हैं।
(iii) भविष्य के बालकों को तैयार करने वाली माताओं के प्रति नतमस्तक हो जाते हैं।
(iv) (i) तथा (ii) विकल्प।
उत्तर :
(iv) (i) तथा (ii) विकल्प।

(घ) शिक्षा वास्तव में क्या है?
(i) विस्तृत संसार का ज्ञान करा देना ही शिक्षा है।
(ii) जो मानव की ज़रूरतों की सीमित विकास करती है।
(iii) जो स्वयं को आवश्यक साधन के रूप में नहीं मानती।
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर :
(i) विस्तृत संसार का ज्ञान करा देना ही शिक्षा है।

(ङ) गद्यांश का शीर्षक लिखिए-
(i) आश्चर्य का विषय
(ii) व्यक्तियों की छाया
(iii) जीवन का ध्येय
(iv) उत्तरदायित्व
उत्तर :
(iii) जीवन का ध्येय

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5. हमें स्थिर बुद्धि वाला बनना चाहिए परंतु स्थिर बुद्धि वाले मनुष्य के लक्षण क्या हैं? स्थिर बुद्धि वाला पुरुष सभी इच्छाओं को त्याग देता है और हमेशा संतुष्ट रहता है। उसका मन दुख में विचलित अथवा व्याकुल नहीं होता। सुखों की उसे कोई कामना भी नहीं होती। अनुकूल और प्रतिकूल दोनों परिस्थितियों में वह समान रहता है। ऐसे कर्मयोगी की बुद्धि स्थिर अर्थात अटल हो जाती है। इंद्रियों को वश में करने का अभ्यास मनुष्य को बार-बार करना चाहिए।

जो मनुष्य सांसारिक विषय-वस्तुओं के बारे में सोचता है, उसे विषयों से लगाव हो जाता है। तब उसे इन विषयों या भोग-विलास की वस्तुओं को प्राप्त करने की इच्छा होती है। फिर उसमें ‘लोभ’ पैदा हो जाता है। लोभ के बाधा पड़ने पर उसे क्रोध आ जाता है। क्रोध से मूढ़ता या अज्ञानता उत्पन्न होती है। मूढ़ता से स्मृति यानी विचारों को याद रखने की शक्ति समाप्त हो जाती है। स्मृति नष्ट होने पर विवेक नष्ट हो जाता है। ऐसे मनुष्य का हर प्रकार से पतन होता है।

(क) स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति की क्या विशेषता है?
(i) वह सभी इच्छाओं को सर्वोपरि रखता है।
(iii) वह अपनी इच्छाओं को त्याग देता है।
(ii) वह हमेशा संतुष्ट रहता है।
(iv) (ii) तथा (iii)
उत्तर :
(iv) (ii) तथा (iii)

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(ख) स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति के लिए कौन-सा कथन अनुचित है?
(i) उसका मन दुख में विचलित होता है।
(ii) उसका मन दुख में व्याकुल नहीं होता।
(iii) उसे सुखों की प्राप्ति की कोई इच्छा नहीं होती।
(iv) अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में समान रहता है।
उत्तर :
(i) उसका मन दुख में विचलित होता है।

(ग) स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति को क्या कहा गया है?
(i) राजयोगी
(ii) कर्मयोगी
(iii) ध्यानयोगी
(iv) तंत्रयोगी
उत्तर :
(ii) कर्मयोगी

(घ) मनुष्य को कौन-सा अभ्यास बार-बार करना चाहिए?
(i) दूसरे प्राणियों को वश में करने का
(ii) इंद्रियों को काबू से बाहर करने का
(iii) इच्छाओं को दमन करने का
(iv) इंद्रियों को वश में करने का
उत्तर :
(iv) इंद्रियों को वश में करने का

(ङ) मनुष्य को लोभ कब पैदा होता है?
(i) सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति की इच्छा होने पर
(ii) प्राकृतिक वस्तुओं के सौंदर्य को देखकर
(iii) केवल धन के भंडार को देखकर
(iv) अनमोल वस्तुओं की कीमतें देखकर
उत्तर :
(i) सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति की इच्छा होने पर

JAC Class 9 Hindi अपठित बोध अपठित गद्यांश

6. जितनी अनिच्छा से हम सलाह को स्वीकार करते हैं उतनी अनिच्छा से किसी अन्य को नहीं। सलाह देने वाले के बारे में हम सोचते हैं कि वह हमारी समझ को अपमान की दृष्टि से देख रहा है अथवा हमें बच्चा या बुद्धू मानकर व्यवहार कर रहा है। हम उसे एक अव्यक्त सेंसर मानते हैं और ऐसे अवसरों पर हमारी भलाई के लिए जो उत्साह दिखाया जाता है, उसे हम एक पूर्व धारणा या धृष्टता मानते हैं। इसकी सच्चाई यह है कि जो सलाह देने का बहाना करता है, वह इसी कारण से हमारे ऊपर अपनी श्रेष्ठता स्थापित करता है।

इसके अतिरिक्त कोई और कारण नहीं हो सकता किंतु अपने से हमारी तुलना करते हुए, वह हमारे आचरण अथवा समझदारी में कोई दोष देखता है। इन कारणों से, सलाह को स्वीकार्य बनाने से कठिन कोई कला नहीं है और वास्तव में प्राचीन और आधुनिक दोनों युग के लेखकों ने इस कला में जितनी दक्षता प्राप्त की है, उसी आधार पर स्वयं को एक-दूसरे से अधिक विशिष्ट प्रमाणित किया है। इस कटु पक्ष को रोचक बनाने के कितने उपाय काम में लाए गए हैं? कुछ सर्वोत्तम शब्दों में अपनी शिक्षा हम तक पहुँचाते हैं, कुछ अत्यंत सुसंगत ढंग से, कुछ वाकचातुर्य से और अन्य छोटे मुहावरों में। पर मैं सोचता हूँ कि सलाह देने के विभिन्न उपायों में जो सबसे अधिक प्रसन्नता देता है, वह गलत है, वह चाहे किसी भी रूप में आए। यदि हम इस रूप में शिक्षा देने या सलाह देने की बात सोचते हैं तो वह अन्य सबसे बेहतर है क्योंकि सबसे कम झटका लगता है।

(क) गद्यांश का उचित शीर्षक है –
(i) शिक्षा
(ii) समझदारी
(iii) सलाह
(iv) भलाई
उत्तर :
(iii) सलाह

JAC Class 9 Hindi अपठित बोध अपठित गद्यांश

(ख) ‘इच्छा’ शब्द का विपरीतार्थक शब्द है –
(i) मन
(ii) दिल
(iii) भक्ति
(iv) अनिच्छा
उत्तर :
(iv) अनिच्छा

(ग) सलाह देने वाले के बारे में हम क्या सोचते हैं?
(i) वह समझ को सम्मान की नज़र से देख रहा है।
(ii) वह समझ को अपमान की नज़र से देख रहा है।
(iii) वह समझ को कूटनीतिक नज़र से देख रहा है।
(iv) इनमें से सभी विकल्प। लग जाते हैं?
उत्तर :
(ii) वह समझ को अपमान की नज़र से देख रहा है।

(घ) भलाई के लिए दिखाए गए उत्साह को हम क्या मानने
(i) पूर्व धारणा
(ii) धृष्टता
(iii) अग्रिम समझ
(iv) विकल्प (i) तथा (ii)
उत्तर :
(iv) विकल्प (i) तथा (ii)

(ङ) सलाह को स्वीकार करना कैसी कला है?
(i) आसान कला है।
(ii) कठिन कला है।
(iii) चमत्कारिक कला है।
(iv) दैनिक कला है।
उत्तर :
(ii) कठिन कला है।

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7. यदि मनुष्य की आयु सौ वर्ष की मानी जाती है, तो इतने वर्षों तक वह स्वस्थ रहकर जिए, तभी इस दीर्घ आयु की सार्थकता है। ‘पहला सुख नीरोगी काया’ कहावत का अनुभव प्रत्येक व्यक्ति को आगे-पीछे होता ही है। फिर भी हम स्वास्थ्य को बनाए रखने में पूर्णत: जागरूक नहीं रहते। कदाचित हमारे पास तत्संबंधी पर्याप्त जानकारी का अभाव और अभ्यास की लगन का अभाव होता है। शरीर को सशक्त, सुगठित एवं नीरोगी रखने के लिए प्राणायाम बहुत लाभप्रद है।

प्राणायाम का शाब्दिक अर्थ है- ‘प्राण’ और ‘आयाम’ अर्थात ‘विस्तार’। वास्तव में प्राण स्थूल पृथ्वी पर प्रत्येक वस्तु का संचालन करता हुआ दिखाई देता है और विश्व में विचार रूप से स्थित है। दूसरे शब्दों में, प्राण का संबंध मन से, मन का संबंध बुद्धि से और बुद्धि का संबंध आत्मा से और आत्मा का संबंध परमात्मा से है। इस प्रकार प्राणायाम का उद्देश्य शरीर में व्याप्त प्राणशक्ति को उत्प्रेरित संचारित, नियमित और संतुलित करना है। यही कारण है कि प्राणायाम को योग विज्ञान का एक अमोघ साधन माना गया है।

मनु के अनुसार जिस प्रकार अग्नि में सोना आदि धातुएँ गलाने से उनका मैल दूर होता है, उसी प्रकार प्राणायाम करने से शरीर की इंद्रियों का मैल दूर होता है। जिस प्रकार शरीर की शुद्धि के लिए स्नान की आवश्यकता है, ठीक उसी प्रकार मन की शुद्धि के लिए प्राणायाम की आवश्यकता है। प्राणायाम से शरीर स्वस्थ और नीरोगी रहता है। इससे दीर्घ आयु प्राप्त होती है, स्मरण शक्ति बढ़ती है और मानसिक रोग दूर होते हैं।

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक है-
(i) दीर्घ आयु की सार्थकता
(ii) प्राणशक्ति
(iii) प्राणायाम
(iv) स्वास्थ्य और मनुष्य
उत्तर :
(iii) प्राणायाम

(ख) कहावत के अनुसार मनुष्य का पहला सुख क्या है?
(i) नीरोगी मन
(ii) नीरोगी काया
(iii) चंचल मन
(iv) स्वस्थ मस्तिष्क
उत्तर :
(ii) नीरोगी काया

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(ग) प्राणायाम क्यों बहुत लाभप्रद है?
(i) शरीर को सशक्त बनाता है।
(ii) शरीर सुगठित बनाता है।
(iii) नीरोगी रहने में सहायक होता है।
(iv) ये सभी विकल्प
उत्तर :
(iv) ये सभी विकल्प

(घ) स्थूल पृथ्वी पर कौन संचालन करता है?
(i) आयाम
(ii) प्राण
(iii) वायु
(iv) जल
उत्तर :
(ii) प्राण

(ङ) प्राणायाम का उद्देश्य है-
(i) प्राण शक्ति को उत्प्रेरित करना
(ii) प्राण शक्ति को नियमित करना
(iii) प्राण शक्ति को संतुलित करना
(iv) ये सभी विकल्प
उत्तर :
(iv) ये सभी विकल्प

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8. महात्माओं और विद्वानों का सबसे बड़ा लक्षण है-आवाज़ को ध्यान से सुनना। यह आवाज़ कुछ भी हो सकती है। कौओं की कर्कश आवाज़ से लेकर नदियों की छलछल तक। मार्टिन लूथर किंग के भाषण से लेकर किसी पागल के बड़बड़ाने तक। अमूमन ऐसा होता नहीं। यह सच है कि हम सुनना चाहते ही नहीं। बस बोलना चाहते हैं। हमें लगता है कि इससे लोग हमें बेहतर तरीके से समझेंगे। हालाँकि ऐसा होता नहीं। हमें पता ही नहीं चलता और अधिक बोलने की कला हमें अनसुना करने की कला में पारंगत कर देती है।

एक मनोवैज्ञानिक ने अपने अध्ययन में पाया कि जिन घरों के अभिभावक ज़्यादा बोलते हैं, वहाँ बच्चों में सही-गलत से जुड़ा स्वाभाविक ज्ञान कम विकसित हो पाता है, क्योंकि जितनी अनिच्छा ज़्यादा बोलना बातों को विरोधाभासी तरीके से सामने रखता है और सामने वाला बस शब्दों के जाल में फँसकर रह जाता है। बात औपचारिक हो या अनौपचारिक, दोनों स्थितियों में हम दूसरे की न सुन, बस हावी होने की कोशिश करते हैं।

खुद ज़्यादा बोलने और दूसरों को अनसुना करने से ज़ाहिर होता है कि हम अपने बारे में ज़्यादा सोचते हैं और दूसरों के बारे में कम। ज़्यादा बोलने वालों के दुश्मनों की भी संख्या ज़्यादा होती है। अगर आप नए दुश्मन बनाना चाहते हैं, तो अपने दोस्तों से ज़्यादा बोलें और अगर आप नए दोस्त बनाना चाहते हैं, तो दुश्मनों से कम बोलें। अमेरिका के सर्वाधिक चर्चित राष्ट्रपति रूजवेल्ट अपने माली तक के साथ कुछ समय बिताते और इस दौरान उसकी बातें ज़्यादा सुनने की कोशिश करते। वह कहते थे कि लोगों को अनसुना करना अपनी लोकप्रियता के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। इसका लाभ यह मिला कि ज़्यादातर अमेरिकी नागरिक उनके सुख में सुखी होते, और दुख में दुखी।

(क) गद्यांश का उचित शीर्षक है –
(i) बोलने की कला
(iii) आवाज़
(ii) स्वाभाविक ज्ञान
(iv) दोस्ती दुश्मनी
उत्तर :
(iii) आवाज़
(ख) अधिक बोलने की कला हमें किस कला में पारंगत कर देती है?
(i) अनसुना करने की कला
(iii) प्रशंसा करने की कला
(ii) चाटुकारिता करने की कला
(iv) लीपापोती करने की कला
उत्तर :
(i) अनसुना करने की कला में

(ग) जिन घरों के अभिभावक ज्यादा बोलते हैं, वहाँ बच्चों में क्या असर पड़ता है?
(i) सही-गलत का स्वाभाविक ज्ञान कम विकसित होता है।
(ii) सांसारिक ज्ञान अधिक विकसित होता है।
(iii) पारिवारिक ज्ञान अधूरा रह जाता है।
(iv) अधूरा ज्ञान अधिक विकसित होता है।
उत्तर :
(i) सही-गलत का स्वाभाविक ज्ञान कम विकसित होता है।

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(घ) ज़्यादा बोलने से क्या होता है?
(i) बातों को सामान्य रूप से सामने रखता है।
(ii) बातों को विरोधाभाषी तरीके से सामने रखता है।
(iii) बातों को रोचक तरीके से प्रकट करता है।
(iv) बातों को सारहीन करके सामने रखता है।
उत्तर :
(ii) बातों को विरोधाभाषी तरीके से सामने रखता है।

(ङ) नए दोस्त बनाने के लिए क्या करना ज़रूरी है?
(i) दुश्मनों से कम बोलना चाहिए।
(ii) पुराने मित्रों से अधिक बोलना चाहिए।
(iii) दुश्मनों से काम पड़ने पर बोलना चाहिए।
(iv) अनजान लोगों से कभी-कभार बोलना चाहिए।
उत्तर :
(i) दुश्मनों से कम बोलना चाहिए।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

Jharkhand Board JAC Class 12 History Important Questions Chapter 5 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

1. इनबतूता का जन्म हुआ था-
(अ) भारत
(ब) ओमान
(स) तुर्की
(द) तैंजियर
उत्तर:
(द) तैंजियर

2. इलबतूता अनेक देशों की यात्रा करने के बाद स्वदेश वापस पहुँचा-
(अ) 1333 ई.
(ब) 1432 ई.
(स) 1354 ई.
(द) 1454 ई.
उत्तर:
(स) 1354 ई.

3. ‘रिहला’ का लेखक कौन था?
(अ) अल-बिरुनी
(ब) हसननिजामी
(स) फिरदौसी
(द) इलबतूता
उत्तर:
(द) इलबतूता

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4. फ्रांस्वा बर्नियर कहाँ का निवासी था?
(अ) ब्रिटेन
(ब) फ्रांस
(स) जर्मनी
(द) इटली
उत्तर:
(ब) फ्रांस

5. फ्रांस्वा बर्नियर भारत आया था-
(अ) सोलहवीं सदी
(ब) पन्द्रहवीं सदी
(स) सत्रहवीं सदी
(द) अठारहर्वीं सदी
उत्तर:
(स) सत्रहवीं सदी

6. इन्नबतूता के पाठक किससे पूरी तरह से अपरिचित थे-
(अ) खजूर
(ब) नारियल
(स) केला
(द) अंगूर
उत्तर:
(ब) नारियल

7. इबबतूता ने किस शहर को भारत में सबसे बड़ा बताया है-
(अ) आगरा
(ब) इलाहाबाद
(स) जौनपुर
(द) दिल्ली
उत्तर:
(द) दिल्ली

8. इलबतूता भारत की कौनसी प्रणाली की कार्यकुशलता को देखकर आशचर्यचकित हो गया था-
(अ) जल-निकास प्रणाली
(ब) डाक प्रणाली
(स) गुप्तचर प्रणाली
(द) सुरक्ष प्रणाली
उत्तर:
(ब) डाक प्रणाली

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9. ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ नामक ग्रन्थ का रचयिता था-
(अ) मनूची
(ब) सर टॉमस रो
(स) बर्नियर
(द) विलियम हॉकिंस
उत्तर:
(स) बर्नियर

10. किताब-उल-हिन्द के लेखक कौन हैं?
(अ) इब्नबतूता
(ब) बर्नियर
(स) अल-बिरुनी
(द) अब्दुर रज्जाक
उत्तर:
(स) अल-बिरुनी

11. ख्वारिज्म में अल-बिरुनी का जन्म हुआ-
(अ) 1071 ई.
(ब) 933 ई.
(स) 1023 ई.
(द) 973 ई.
उत्तर:
(द) 973 ई.

12. अल-बिरुनी किसके साथ भारत आया?
(अ) मोहम्मद गौरी
(ब) मोहम्मद बिन कासिम
(स) महमूद गजनवी
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(स) महमूद गजनवी

13. मोहम्मद तुगलक के कहने पर इबबतूता किस देश की यात्रा पर गया?
(अ) अफगानिस्तान
(ब) रूस
(स) नेपाल
(द) चीन
उत्तर:
(द) चीन

14. बर्नियर पेशे से क्या थे?
(अ) तोपची
(ब) चिकित्सक
(स) सुनार
(द) वैज्ञानिक
उत्तर:
(ब) चिकित्सक

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15. इब्नबतूता ने अपना यात्रा-वृत्तान्त किस भाषा में लिखा?
(अ) अरबी
(ब) फारसी
(स) हित्रू
(द) उर्दू
उत्तर:
(अ) अरबी

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए :
1. यूक्लिड यूनानी ……………..
2. ख्वारिज्म ……………… में स्थित है।
3. सुल्तान महमूद ने ख्वारिज्म पर आक्रमण ……………. ई. में किया।
4. इनबतूता ……………. में स्थलमार्ग से …………. पहुँचा।
5. भारत में पुर्तगालियों का आगमन लगभग ……………….. ई. में हुआ।
6. बर्नियर ने अपनी प्रमुख कृति को फ्रांस के शासक ……………. को समर्पित किया था।
उत्तर:
1. गणितज्ञ
2 . उज्बेकिस्तान
3.1017
4. मध्य एशिया, सिन्ध
5. 1500
6. लुई

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
फ्रांस्वा बर्नियर कौन था?
उत्तर:
फ्रांस्वा बर्नियर एक चिकित्सक, राजनीतिक, दार्शानिक और इतिहासकार था।

प्रश्न 2.
अल-बिरुनी का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
अल-बिरुनी का जन्म ख्वारिज्म में सन् 973 में हुआ था।

प्रश्न 3.
15 वीं सदी में भारत की यात्रा करने वाले फारस के दूत का क्या नाम था?
उत्तर:
अब्दुर रज्जाक।

प्रश्न 4.
दसवीं शताब्दी से सत्रहवीं सदी तक भारत की यात्रा करने वाले तीन विदेशी यात्रियों के नाम लिखिए।
(1) अल बिरूनी
(2) इब्नबतूता
(3) फ्रांस्वा
उत्तर:
बर्नियर।

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प्रश्न 5.
‘किताब-उल-हिन्द’ का रचयिता कौन था? यह ग्रन्थ किस भाषा में लिखा गया है?
उत्तर:
(1) अल-विरुनी
(2) अरबी भाषा।

प्रश्न 6.
अल-विरुनी द्वारा जिन दो ग्रन्थों का संस्कृत में अनुवाद किया गया, उनके नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) पतंजलि का व्याकरण
(2) यूक्लिड के कार्य।

प्रश्न 7.
इब्नबतूता कहाँ का निवासी था?
उत्तर:
इब्नबतूता मोरक्को का निवासी था।

प्रश्न 8.
इब्नबतूता के भारत पहुँचने पर किस सुल्तान ने किस पद पर नियुक्त किया था?
उत्तर:
(1) मुहम्मद बिन तुगलक ने
(2) दिल्ली के काजी (न्यायाधीश) के पद पर

प्रश्न 9.
इब्नबतूता भारत कब पहुँचा और किस मार्ग से पहुंचा?
उत्तर:
इब्नबतूता 1333 ई. में स्थल मार्ग से सिन्ध पहुँचा।

प्रश्न 10.
इब्नबतूता ने अपना यात्रा वृखन्त किस भाषा में लिखा? यह यात्रा वृत्तान्त किस नाम से प्रसिद्ध है?
उत्तर:
(1) अरबी भाषा में
(2) रिहला।

प्रश्न 11.
अब्दुरक समरवन्दी ने भारत में किस भाग की यात्रा की थी और कब?
उत्तर:
1440 के दशक में अब्दुररज्जाक ने दक्षिण भारत की यात्रा की।

प्रश्न 12.
फ्रांस्वा बर्नियर भारत में कितने वर्ष रहा था ?
उत्तर:
फ्रांस्वा बर्नियर 12 वर्ष (1656-1668 ई.) तक भारत में रहा।

प्रश्न 13.
भारतीय समाज को समझने में अल-बिरुनी को कौनसी बाधाओं का सामना करना पड़ा ?
उत्तर:
(1) संस्कृत भाषा की कठिनाई
(2) धार्मिक अवस्था, प्रथाओं में भिन्नता
(3) अभिमान

प्रश्न 14.
इब्नबतूता ने कौनसी दो वानस्पतिक उपजों का रोचक वर्णन किया है, जिनसे उसके पाठक पूरी तरह से अपरिचित थे?
उत्तर:
(1) नारियल
(2) पान।

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प्रश्न 15.
इब्नबतूता के अनुसार भारत के दो बड़े शहर कौन से थे?
उत्तर:
(1) दिल्ली
(2) दौलताबाद।

प्रश्न 16.
इब्नबतूता ने भारत की किस प्रणाली की कुशलता का उल्लेख किया है?
उत्तर:
डाक प्रणाली का

प्रश्न 17.
अब्दुररज्जाक ने किस शहर के मन्दिर के शिल्प और कारीगरी को अद्भुत बताया था ?
उत्तर:
मंगलौर शहर से 9 मील के भीतर स्थित मन्दिर

प्रश्न 18.
ऐसे तीन विदेशी यात्रियों के नाम लिखिए जिन्होंने अल बिरूनी और इब्नबतूता के पदचिन्हों का अनुसरण किया।
उत्तर:
(1) अब्दुर रज्जाक
(2) महमूद वली बल्छी
(3) शेख अली हाजिन।

प्रश्न 19.
पेलसर्ट ने भारत की किस सामाजिक समस्या की ओर ध्यान आकृष्ट किया?
उत्तर:
भारत की व्यापक तथा दुःखद गरीबी की समस्या।

प्रश्न 20.
बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच एक प्रमुख मूल भिन्नता बताइये।
उत्तर:
भारत में निजी भू-स्वामित्व का अभाव।

प्रश्न 21.
अल-विरुनी ने अपनी पुस्तक ‘किताब-उल- हिन्द’ किस भाषा में लिखी?
उत्तर:
अरबी में।

प्रश्न 22.
इब्नबतूता का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर:
तैंजियर में।

प्रश्न 23.
शरिया का क्या अर्थ है?
उत्तर:
इस्लामी कानून।

प्रश्न 24.
इब्नबतूता ने भारत के लिए कब प्रस्थान
उत्तर:
1332-33 ई. में।

प्रश्न 25.
इब्नबतूता अपने देश वापस कब पहुँचा ?
उत्तर:
1354 ई. में

प्रश्न 26.
1600 ई. के बाद भारत आने वाले दो यूरोपीय यात्रियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) ज्यॉँ-बैप्टिस्ट तैर्नियर
(2) मनूकी।

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प्रश्न 27.
बर्नियर का यात्रा वृत्तान्त कहाँ और कब प्रकाशित हुआ?
उत्तर:
फ्रांस में 1670-71 में

प्रश्न 28.
जाति व्यवस्था के सम्बन्ध में ब्राह्मणवादी व्याख्या को मानने के बावजूद अल बिरूनी ने किस मान्यता को अस्वीकार किया ?
उत्तर:
अपवित्रता की मान्यता।

प्रश्न 29.
अल बिरूनी ने भारत में प्रचलित वर्ण- व्यवस्था के अन्तर्गत किन चार प्रमुख वर्णों का उल्लेख किया है?
उत्तर:
(1) ब्राह्मण
(2) क्षत्रिय
(3) वैश्य
(4) शूद्र।

प्रश्न 30.
जातिव्यवस्था के विषय में अल-विरुनी का विवरण किन ग्रन्थों पर आधारित था?
उत्तर:
संस्कृत ग्रन्थों पर।

प्रश्न 31.
इब्नबतूता के अनुसार दिल्ली शहर में कितने दरवाजे थे? इनमें से सबसे विशाल दरवाजा कौनसा था ?
उत्तर:
(1) 28 दरवाजे
(2) बदायूँ दरवाजा।

प्रश्न 32.
अब्दुररज्जाक ने किसे ‘विचित्र देश’ बताया था?
उत्तर:
कालीकट बन्दरगाह पर बसे हुए लोगों को।

प्रश्न 33.
बर्नियर द्वारा रचित ग्रन्थ ‘ट्रेवल्स इन द मुगल एम्पायर’ की अपनी किन विशेषताओं के लिए विख्यात है?
अथवा
‘ट्रेवल्स इन द मुगल एम्पायर’ क्या है?
उत्तर:
(1) गहन चिन्तन
(2) गहन प्रेक्षण
(3) आलोचनात्मक अन्तर्दृष्टि

प्रश्न 34.
बर्नियर के अनुसार सत्रहवीं शताब्दी में भारत में जनसंख्या का कितने प्रतिशत भाग नगरों में रहता था?
उत्तर:
लगभग पन्द्रह प्रतिशत।

प्रश्न 35.
इब्नबतूता के अनुसार सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक अमीरों की गतिविधियों की जानकारी प्राप्त करने के लिए किन्हें नियुक्त करता था?
उत्तर:
दासियों को।

प्रश्न 36.
अल बिरूनी द्वारा अपनी कृतियों में जिस विशिष्ट शैली का प्रयोग किया गया, उसे स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
आरम्भ में एक प्रश्न, फिर संस्कृत परम्पराओं पर आधारित वर्णन।

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प्रश्न 37.
वर्नियर के विवरणों ने किन दो पश्चिमी विचारकों को प्रभावित किया?
उत्तर:
(1) मॉन्टेस्क्यू
(2) कार्ल मार्क्स।

प्रश्न 38.
वर्नियर ने मुगलकालीन नगरों को क्या कहा है?
अथवा
बर्नियर भारतीय नगरों को किस रूप में देखता है?
उत्तर:
बर्नियर ने मुगलकालीन नगरों को ‘शिविर नगर कहा है।

प्रश्न 39.
बर्नियर ने मुगलकालीन नगरों को शिविर नगर क्यों कहा है?
उत्तर:
क्योंकि ये नगर राजकीय शिविर पर निर्भर थे।

प्रश्न 40.
मुगलकालीन भारत में कौन-कौन से प्रकार के नगर अस्तित्व में थे?
उत्तर:
मुगलकालीन भारत में उत्पादन केन्द्र, व्यापारिक नगर, बन्दरगाह नगर, धार्मिक केन्द्र तीर्थ स्थान आदि नगर अस्तित्व में थे।

प्रश्न 41.
इब्नबतूता के अनुसार भारत में कितने प्रकार की डाक व्यवस्था प्रचलित थी?
उत्तर:
दो प्रकार की डाक व्यवस्था –
(1) अश्व डाक व्यवस्था (उलुक) तथा
(2) पैदल डाक व्यवस्था (दावा)।

प्रश्न 42.
इब्नबतूता के अनुसार ‘ताराबबाद’ क्या था?
उत्तर:
दौलताबाद में पुरुष और महिला गायकों के लिए एक बाजार था, जिसे ‘तारावबाद’ कहते थे।

प्रश्न 43.
इब्नबतूता के अनुसार भारत का सबसे बड़ा शहर कौनसा था ?
उत्तर:
इब्नबतूता के अनुसार दिल्ली भारत का सबसे बड़ा शहर था।

प्रश्न 44.
अल-विरुनी के अनुसार भारत में वर्ण- व्यवस्था का उद्भव किस प्रकार से हुआ?
उत्तर:
अल बिरुनी के अनुसार ब्राह्मण ब्रह्मन् के सिर से, क्षत्रिय कन्धों और हाथों से वैश्य जंघाओं से तथा शूद्र चरणों से उत्पन्न हुए।

प्रश्न 45.
अल बिरुनी किन भाषाओं का ज्ञाता था?
उत्तर:
अल बिरूनी संस्कृत, सीरियाई, फारसी, हिब्रू नामक भाषाओं का ज्ञाता था।

प्रश्न 46.
अल बिरुनी तथा इब्नबतूता किन देशों से और कब भारत आए ?
उत्तर:
अल बिरुनी 11वीं शताब्दी में उज्बेकिस्तान तथा इब्नबतूता 14वीं शताब्दी में मोरक्को से भारत आए थे।

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प्रश्न 47.
अल बिरूनी ने अपनी पुस्तक ‘किताब- उल-हिन्द’ में किन विषयों का विवेचन किया है?
अथवा
‘किताब-उल-हिन्द’ पर सक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
अथवा
‘किताब-उल-हिन्द’ क्या है?
उत्तर:
धर्म और दर्शन, त्यौहारों, खगोल विज्ञान, कीमिया, रीति-रिवाजों तथा प्रथाओं, सामाजिक जीवन, माप- तौल, मूर्तिकला, कानून तथा मापतन्त्र विज्ञान ।

प्रश्न 48.
इब्नबतूता के अनुसार किन देशों में किस भारतीय माल की अत्यधिक मांग थी?
उत्तर:
मध्य एशिया तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत के सूती कपड़े, महीन मलमल, रेशम, जरी तथा सदन की अत्यधिक मांग थी।

प्रश्न 49.
किस डच यात्री ने भारतीय उपमहाद्वीप की यात्रा की थी और कब?
उत्तर:
(1) पेलसर्ट
(2) सत्रहवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में

प्रश्न 50.
फ्रांस्वा बर्नियर के अनुसार भारत में किस स्थिति के लोग नहीं थे?
उत्तर;
फ्रांस्वा बर्नियर के अनुसार भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं थे।

प्रश्न 51.
बर्नियर ने भारत के किस नगर अल्पवयस्क विधवा को सती होते हुए देखा था? उसे किनकी सहायता से चिता स्थल की ओर ले जाया गया?
उत्तर:
(1) लाहौर में
(2) तीन या चार ब्राह्मणाँ तथा एक वृद्ध महिला की सहायता से।

प्रश्न 52.
बर्नियर के अनुसार कौनसे शिल्प भारत में प्रचलित थे?
उत्तर:
गलीचे बनाना, जरी कसीदाकारी कढ़ाई, सोने और चाँदी के वस्त्रों, रेशमी तथा सूती वस्त्रों का निर्माण।

प्रश्न 53.
अल बिरूनी के अनुसार फारस में समाज किन चार वर्गों में विभाजित था?
उत्तर:

  • घुड़सवार और शासक वर्ग
  • भिक्षु, आनुष्ठानिक पुरोहित तथा चिकित्सक
  • खगोलशास्वी तथा अन्य वैज्ञानिक
  • कृषक तथा शिल्पकार।

प्रश्न 54.
दुआ बरबोसा कौन था?
उत्तर:
दुआर्ते बरबोसा एक प्रसिद्ध यूरोपीय लेखक था जिसने दक्षिण भारत में व्यापार और समाज का एक विस्तृत विवरण लिखा ।

प्रश्न 55.
यूरोप के दो यात्रियों के नाम लिखिए जिन्होंने भारतीय कृषकों की गरीबी का वर्णन किया है।
उत्तर:
(1) पेलसर्ट
(2) बर्नियर

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प्रश्न 56.
इब्नबतूता भारतीय डाक प्रणाली की कार्यकुशलता देखकर क्यों चकित हुआ? उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
डाक व्यवस्था की कार्यकुशलता के कारण व्यापारियों के लिए न केवल लम्बी दूरी तक सूचना और उधार भेजना सम्भव हुआ, बल्कि अल्प सूचना पर माल भेजना भी सम्भव हो गया।

प्रश्न 57.
इब्नबतूता ने मोरक्को जाने से पूर्व किन देशों की यात्रा की थी?
उत्तर:
उत्तरी अफ्रीका, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया कुछ भागों, भारतीय उपमहाद्वीप तथा चीन

प्रश्न 58.
1400 से 1800 के बीच भारत की यात्रा करने वाले विदेशी यात्रियों के नाम लिखिए जिन्होंने फारसी में अपने यात्रा-वृत्तान्त लिखे।
उत्तर:
अब्दुररजाक समरकंदी, महमूद वली बल्खी, शेख अली हाजिन

प्रश्न 59.
इब्नबतूता के अनुसार भारत की डाक- प्रणाली क्यों लाभप्रद थी?
उत्तर:
डाक प्रणाली से व्यापारियों के लिए लम्बी दूरी तक सूचना भेजना, उधार भेजना और अल्प सूचना पर माल भेजना सम्भव हो गया।

प्रश्न 60.
पेलसर्ट कौन था?
उत्तर:
पेलसर्ट एक डच यात्री था जिसने सत्रहवीं शताब्दी में भारत की यात्रा की थी।

प्रश्न 61.
बर्नियर के अनुसार मुगल साम्राज्य के स्वरूप की दो त्रुटियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) मुगल साइट भिखारियों’ और ‘क्रूर लोगों’ का राजा था
(2) इसके शहर विनष्ट तथा खराब हवा से दूषित थे।

प्रश्न 62.
बर्नियर ने किस जटिल सामाजिक सच्चाई का उल्लेख किया है?
उत्तर:
(1) सम्पूर्ण विश्व से बड़ी मात्रा में बहुमूल्य धातुओं का भारत में आना
(2) भारत में एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय का अस्तित्व।

प्रश्न 63.
बर्नियर ने भारत की कृषि की किन दो विशेषताओं का उल्लेख किया है?
उत्तर:
(1) देश के विस्तृत भू-भाग का अधिकांश भाग अत्यधिक उपजाऊ था
(2) भूमि पर खेती अच्छी होती थी।

प्रश्न 64.
बर्नियर ने मुगलकालीन नगरों को किसकी संज्ञा दी है और क्यों?
उत्तर:
(1) शिविर नगर
(2) क्योंकि ये नगर अपने अस्तित्व के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर थे।

प्रश्न 65.
बर्नियर के अनुसार पश्चिमी भारत में व्यापारियों के समूह क्या कहलाते थे? उनके मुखिया को क्या कहते घे?
उत्तर:
(1) पश्चिमी भारत में व्यापारियों के समूह महाजन कहलाते थे।
(2) उनके मुखिया सेठ कहलाते थे।

प्रश्न 66.
बर्नियर के अनुसार अन्य शहरी समूहों में व्यावसायिक वर्ग में कौन-कौन लोग सम्मिलित थे?
उत्तर:

  1. चिकित्सक
  2. अध्यापक
  3. अधिवक्ता
  4. चित्रकार
  5. वास्तुविद
  6. संगीतकार
  7. सुलेखक।

प्रश्न 67.
इब्नबतूता के अनुसार दासों की सेवाओं को विशेष रूप से किस कार्य में उपयोग किया जाता था?
उत्तर:
दास पालकी या डोले में पुरुषों और महिलाओं को ले जाने का कार्य करते थे।

प्रश्न 68.
इब्नबतूता के अनुसार अधिकांश दासियाँ अ किस प्रकार प्राप्त की जाती थीं?
उत्तर:
अधिकांश दासियों को आक्रमणों और अभियानों के दौरान बलपूर्वक प्राप्त किया जाता था

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प्रश्न 69.
विदेशी यात्री अब्दुरज्जाक ने कालीकट बन्दरगाह पर बसे हुए लोगों को क्या बताया था?
उत्तर:
अब्दुरम्नांक ने कालीकट बन्दरगाह पर बसे हुए लोगों को एक विचित्र देश’ बताया था।

प्रश्न 70.
“कृषकों को इतना निचोड़ा जाता है कि पेट भरने के लिए उनके पास सूखी रोटी भी मुश्किल से बचती है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन पेलसर्ट नामक एक डच यात्री का

प्रश्न 71.
बर्नियर ने भारत में पाई जाने वाली सती प्रथा का विवरण क्यों दिया?
उत्तर:
क्योंकि महिलाओं से किया जाने वाला बर्ताव प्रायः पश्चिमी तथा पूर्वी समाजों के बीच भिन्नता का प्रतीक माना जाता था।

प्रश्न 72.
मुहम्मद बिन तुगलक के दूत के रूप में किस विदेशी यात्री को मंगोल शासक के पास चीन जाने का आदेश दिया गया और कब दिया गया?
उत्तर:
(1) इब्नबतूता को
(2) 1342 ई. में

प्रश्न 73.
अल बिरूनी ने संस्कृत भाषा की किन विशेषताओं का उल्लेख किया।
उत्तर:
(1) शब्दों तथा विभक्तियों दोनों में संस्कृति की पहुँच विस्तृत है।
(2) एक ही वस्तु के लिए कई शब्द प्रयुक्त होते हैं।

प्रश्न 74.
बर्नियर ने अपने वृतान्त में भारत को किसके रूप में दिखाया है?
उत्तर:
बर्नियर ने भारत को यूरोप के प्रतिलोम के रूप में अथवा फिर यूरोप का विपरीत जैसा दिखाया है।

प्रश्न 75.
दासों को सामान्यतः किस कार्य के लिए प्रयुक्त किया जाता था?
उत्तर:
दासों को सामान्यतः घरेलू श्रम के लिए ही प्रयुक्त किया जाता था।

प्रश्न 76.
बर्नियर ने सती प्रथा के बारे में क्या लिखा है?
उत्तर:
कुछ महिलाएँ प्रसन्नतापूर्वक मृत्यु को गले लगा लेती थीं, अन्यों को मरने के लिए बाध्य किया जाता था।

प्रश्न 77.
बर्नियर के अनुसार ‘शिविर नगर’ क्या थे?
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार ‘शिविर नगर’ वे थे जो अपने अस्तित्व और बने रहने के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर थे।

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प्रश्न 78.
बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच मूल भिन्नता क्या थी?
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच मूल भिन्नता भारत में निजी भू-स्वामित्व का अभाव था।

प्रश्न 79.
किस सुल्तान ने नसीरुद्दीन नामक धर्मोपदेशक से प्रसन्न होकर उसे एक लाख के तथा दो सौ दाम दिये ?
उत्तर:
मुहम्मद बिन तुगलक ने।

प्रश्न 80.
इब्नबतूता ने भारत की किन बातों का विशेष रूप से वर्णन किया है?
उत्तर:
इब्नबतूता ने डाक व्यवस्था, पान तथा नारियल का विशेष रूप से वर्णन अपने ग्रन्थ ‘रिहला’ में किया है।

प्रश्न 81.
इब्नबतूता ने भारत के किस शहर को सबसे बड़ा कहा है?
उत्तर:
दिल्ली।

प्रश्न 82.
बर्नियर के ग्रन्थ का क्या नाम है?
उत्तर:
ट्रेवल्स इन द मुगल एम्पावर।

प्रश्न 83.
ताराबबाद किसे कहा जाता है?
उत्तर:
दौलताबाद में पुरुष तथा महिला गायकों के लिए बाजार होता था; जिसे तारावबाद कहा जाता था।

प्रश्न 84.
बर्नियर ने मुगल सेना के साथ कहाँ की न यात्रा की थी?
उत्तर:
कश्मीर

प्रश्न 85.
बर्नियर जब भारत आया उस समय यूरोप में कौनसा युग गतिमान था?
उत्तर:
बर्नियर भारत में सत्रहवीं शताब्दी में आया था, कि उस समय लगभग सम्पूर्ण यूरोप में पुनर्जागरण का काल था।

प्रश्न 86.
किस यात्री ने सुल्तान मुहम्मद तुगलक को भेंट में देने के लिए घोड़े, अँट तथा दास खरीदे ?
उत्तर:
मोरक्को निवासी इब्नबतूता ने।

प्रश्न 87.
यह तर्क किसने दिया कि भारत में ही उपनिवेशवाद से पहले अधिशेष का अधिग्रहण राज्य द्वारा होता था?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स।

लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
लगभग दसवीं सदी से सत्रहवीं सदी तक के काल में लोगों के यात्राएँ करने के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
लगभग दसवीं सदी से सत्रहवीं सदी तक के काल में महिलाओं और पुरुषों के यात्राएं करने के निम्नलिखित उद्देश्य थे –

  1. कार्य की तलाश में
  2. आपदाओं से बचाव के लिए
  3. व्यापारियों सैनिकों, पुरोहितों और तीर्थयात्राओं के रूप में
  4. साहस की भावना से प्रेरित होकर।

प्रश्न 2.
विदेशी यात्रियों की कौनसी बात उनके यात्रा-वृत्तान्तों को अधिक रोचक बनाती है?
उत्तर:
पूर्ण रूप से भिन्न सामाजिक तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आने के कारण ये विदेशी यात्री दैनिक गतिविधियों तथा प्रथाओं के प्रति अधिक सावधान रहते थे। देशज लेखकों के लिए ये सभी विषय सामान्य थे, जो वृत्तान्तों में उल्लिखित करने योग्य नहीं थे दृष्टिकोण में यही भिन्नता ही उनके यात्रा वृत्तान्तों को अधिक रोचक बनाती है।

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प्रश्न 3.
अल-बिरुनी के यात्रा-वृत्तान्त लिखने के उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:
अल- विरुनी के यात्रा-वृत्तान्त लिखने के निम्नलिखित उद्देश्य थे –
(1) उन लोगों की सहायता करना जो हिन्दुओं से धार्मिक विषयों पर चर्चा करना चाहते थे।
(2) ऐसे लोगों के लिए सूचना का हिन्दुओं के साथ सम्बद्ध होना चाहते थे।

प्रश्न 4.
अल-विरुनी ग्रन्थों का अनुवाद करने में क्यों सक्षम था? स्पष्ट कीजिए उसके द्वारा अनुवादित ग्रन्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
अल बिरूनी कई भाषाओं में दक्ष था जिनमें सीरियाई, फारसी, हिब्रू तथा संस्कृत शामिल हैं। इसलिए वह भाषाओं की तुलना तथा ग्रन्थों का अनुवाद करने में सक्षम रहा। उसने अनेक संस्कृत ग्रन्थों का अरबी में अनुवाद किया। संग्रह करना जो उसने पतंजलि के व्याकरण ग्रन्थ का भी अरबी भाषा में अनुवाद किया। उसने अपने ब्राह्मण मित्रों के लिए यूनानी गणित यूक्लिड के कार्यों का संस्कृत में अनुवाद किया।

प्रश्न 5.
किताब-उल-हिन्द’ के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
अल बिरूनी ने अरबी भाषा में अपनी पुस्तक ‘किताब-उल-हिन्द’ लिखी। इसकी भाषा सरल और स्पष्ट है। यह एक विस्तृत ग्रन्थ है जो अस्सी अध्यायों में विभाजित है। इस ग्रन्थ में भारतीय धर्म और दर्शन त्योहारों, खगोल- विज्ञान, कीमिया, रीति-रिवाजों तथा प्रथाओं, सामाजिक- जीवन, भार-तौल तथा मापन विधियों, मूर्तिकला, कानून, मापतन्त्र विज्ञान आदि विषयों का विवेचन किया गया है।

प्रश्न 6.
इब्नबतूता अकेला ही विश्व यात्रा पर क्यों निकल पड़ा? उस समय उसकी क्या आयु थी? वह अपने घर वापस कब पहुँचा ?
उत्तर:
इब्नबतूता के वृत्तान्त से ज्ञात होता है कि वह अपने जन्म स्थान जियर से अकेला ही अपनी यात्रा पर निकल पड़ा। उसके मन में लम्बे समय से प्रसिद्ध पुण्य स्थानों को देखने की तीव्र इच्छा थी इसलिए उसने किसी कारणों में शामिल होने की प्रतीक्षा नहीं की और अकेला ही घर से निकल पड़ा। उस समय इब्नबतूता की आयु बाईस वर्ष थी। वह 1354 में अपने घर वापस पहुँच गया।

प्रश्न 7.
अल बिरूनी को भारत का यात्रा-वृत्तान्त लिखने में किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?
उत्तर:
(1) अल बिरूनी के अनुसार पहली कठिनाई भाषा थी। उसके अनुसार संस्कृत, अरबी और फारसी से इतनी भिन्न थी कि विचारों और सिद्धान्तों को एक ही भाषा से दूसरी में अनुवादित करना सरल नहीं था।
(2) दूसरी कठिनाई धार्मिक अवस्था और प्रथाओं में भिन्नता थी उसे इन्हें समझने के लिए वेदों, पुराणों आदि की सहायता लेनी पड़ी।
(3) अल-बिरुनी के अनुसार तौसरी कठिनाई भारतीयों का जातीय अभिमान था।

प्रश्न 8.
अपनी श्रेणी के अन्य यात्रियों से इब्नबतूता किन बातों में अलग था?
उत्तर:
इब्नबतूता पुस्तकों के स्थान पर यात्राओं से प्राप्त अनुभव को अपनी जानकारी का अधिक महत्त्वपूर्ण स्त्रोत मानता था। उसे यात्राएँ करने का बड़ा शौक था और उसने नये-नये देशों तथा लोगों के विषय में जानने के लिए | दूर-दूर के क्षेत्रों तक की यात्रा की 1332-33 ई. में भारत के लिए प्रस्थान करने से पूर्व वह मक्का, सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान तथा पूर्वी अफ्रीका के कई तटीय व्यापारिक बन्दरगाहों की यात्राएँ कर चुका था।

प्रश्न 9.
इब्नबतूता के तत्कालीन सुल्तान मुहम्मद- बिन तुगलक के साथ सम्बन्धों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1333 में इब्नबतूता दिल्ली पहुंचा। मुहम्मद- बिन तुगलक इब्नबतूता की विद्वता से बझ प्रभावित हुआ और उसे दिल्ली का काली अथवा न्यायाधीश नियुक्त किया। उसने इस पद पर कई वर्षों तक कार्य किया। कुछ कारणों से सुल्तान इब्नबतूता से नाराज हो गया और उसे कारागार में कैद कर दिया गया। परन्तु कुछ समय बाद सुल्तान की नाराजगी दूर हो गई और उसने 1342 में इब्नबतूता को अपने दूत के रूप में चीन के शासक के पास भेजा।

प्रश्न 10.
“इब्नबतूता एक हठीला यात्री था।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
इब्नबतूता अपनी सुन का पक्का था उसे यात्राएँ करने का बहुत शौक था। वह लम्बी यात्राओं के दौरान होने वाली कठिनाइयों से हतोत्साहित नहीं होता था। उसने उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका में अपने निवास स्थान मोरक्को जाने से पूर्व कई वर्ष उत्तरी अफ्रीका, पश्चिमी एशिया, मध्य एशिया के भागों, भारतीय उपमहाद्वीप तथा चीन की यात्रा की थी। उसके वापिस लौटने पर मोरक्को के शासक ने उसकी कहानियों को दर्ज करने के निर्देश दिए।

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प्रश्न 11.
“बर्नियर द्वारा प्रस्तुत ग्रामीण समाज का चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बर्नियर द्वारा प्रस्तुत ग्रामीण समाज का चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी में ग्रामीण समाज में चारित्रिक रूप से बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था। एक ओर बड़े जमींदार थे और दूसरी ओर ‘अस्पृश्य’ भूमि विहीन श्रमिक इन दोनों के बीच में बड़ा किसान था जो किराए के श्रम का प्रयोग करता था और माल उत्पादन में जुटा रहता था कुछ छोटे किसान भी थे, जो बड़ी कठिनाई से गुजरे योग्य उत्पादन कर पाते थे।

प्रश्न 12.
बर्नियर ने शहरी समूहों में किन व्यावसायिक वर्गों का उल्लेख किया है?
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार शहरी समूहों में चिकित्सक (हकीम अथवा वैद्य), अध्यापक (पंडित या मुल्ला), अधिवक्ता (वकील), चित्रकार, वास्तुविद्, संगीतकार, सुलेखक आदि व्यावसायिक वर्ग थे। कई लोग राजकीय संरक्षण पर आश्रित थे तथा कई अन्य लोग संरक्षकों या भीड़-भाड़ वाले बाजार में सामान्य लोगों की सेवा द्वारा अपना जीवनयापन करते थे।

प्रश्न 13.
इब्नबतूता के विवरण के अनुसार दासों में काफी विभेद था। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इब्नबतूता के विवरण से ज्ञात होता है कि दाखों में काफी विभेद था। सुल्तान की सेवा में कार्यरत कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं। इब्नबतूता सुल्तान की बहिन की शादी के अवसर पर उनके प्रदर्शन से बड़ा आनन्दित हुआ। सुल्तान अपने अमीरों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए दासियों को भी नियुक्त करता था। अधिकतर दासों का प्रयोग घरेलू श्रम के लिए किया जाता था घरेलू श्रम करने वाले दासों, दासियों की कीमत बहुत कम होती थी।

प्रश्न 14.
इब्नबतूता के अनुसार सुल्तान किस प्रकार अमीरों पर दासियों द्वारा नजर रखता था?
उत्तर:
इब्नबतूता के अनुसार सुल्तान की यह आदत थी कि हर बड़े या छोटे अमीर के साथ एक दास को रखता जो उनकी मुखबिरी करता था। वह इन अमीरों के घरों में महिला सफाई कर्मचारियों की भी नियुक्ति करता था। दासियों के पास जो भी सूचनाएँ होती थीं, वे इन महिला सफाई कर्मचारियों को दे देती थीं। अधिकांश दासियों को हमलों और अभियानों के दौरान बलपूर्वक प्राप्त किया जाता था।

प्रश्न 15.
अल बिरूनी के प्रारम्भिक जीवन का वर्णन कीजिए।
अथवा
अल-विरुनी के विषय में आप क्या जानते हैं ? उत्तर- अल बिरूनी का जन्म आधुनिक उज्बेकिस्तान में स्थित ख्वारिज्म में सन् 973 में हुआ था। अल बिरुनी ने उच्च कोटि की शिक्षा प्राप्त की। वह सीरियाई, फारसी, हिब्रू, संस्कृत आदि कई भाषाओं का ज्ञाता था। 1017 ई. में महमूद गजनवी ने ख्वारिज्म पर आक्रमण किया और अल बिरूनी सहित यहाँ के कई विद्वानों को अपने साथ अपनी राजधानी गजनी ले गया। उसने अपना शेष जीवन गजनी में ही बिताया। 70 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 16.
गजनी में रहते हुए अल बिरूनी की भारत के प्रति रुचि कैसे विकसित हुई?
उत्तर:
आठवीं शताब्दी से ही संस्कृत में रचित खगोल- विज्ञान, गणित और चिकित्सा सम्बन्धी कार्यों का अरबी भाषा में अनुवाद होने लगा था। पंजाब के गजनवी साम्राज्य का भाग बन जाने के पश्चात् स्थानीय लोगों से हुए सम्पर्को से आपसी विश्वास और समझ का वातावरण बना। अल- विरुनी ने ब्राह्मण पुरोहितों तथा विद्वानों के साथ कई वर्ष व्यतीत किए और संस्कृत, धर्म तथा दर्शन का ज्ञान प्राप्त किया जिससे अल बिरुनी की भारत के प्रति रुचि विकसित हुई।

प्रश्न 17.
‘हिन्दू’, ‘हिन्दुस्तान’ तथा ‘हिन्दवी’ शब्दों का प्रचलन किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
‘हिन्दू’ शब्द लगभग छठी पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में प्रयुक्त होने वाले एक प्राचीन फारसी शब्द से निकला था, जिसका प्रयोग सिन्धु नदी (Indus) के पूर्व के क्षेत्र के लिए होता था। अरबी लोगों ने इस फारसी शब्द का प्रयोग करना जारी रखा। इस क्षेत्र को ‘अल-हिन्द’ तथा यहाँ के निवासियों को ‘हिन्दी’ कहा। कालान्तर में तुर्की ने सिन्धु से पूर्व में रहने वाले लोगों को ‘हिन्दू’, उनके निवास क्षेत्र को ‘हिन्दुस्तान’ तथा उनकी भाषा को ‘हिन्दवी’ की संज्ञा दी।

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प्रश्न 18.
अल बिरुनी के लेखन कार्य की विशेषताओं का विवेचन कीजिए।
उत्तर:

  1. अल बिरुनी ने लेखन में अरबी भाषा का प्रयोग किया था।
  2. अल बिरूनी ने सम्भवतः अपने ग्रन्थ उपमहाद्वीप के सीमान्त क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए लिखे थे।
  3. वह संस्कृत, पालि तथा प्राकृत ग्रन्थों के अरबी भाषा में हुए अनुवादों से परिचित था।
  4. इन ग्रन्थों की लेखन सामग्री शैली के विषय में अल बिरूनी का दृष्टिकोण आलोचनात्मक था वह उनमें सुधार करना चाहता था।

प्रश्न 19.
“इब्नबतूता की यात्राएँ कठिन तथा जोखिम भरी हुई थीं।” उदाहरण देते हुए स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इब्नबतूता के अनुसार चौदहवीं शताब्दी में यात्रा करना अधिक कठिन, जोखिम भरा कार्य और असुरक्षित था इब्नबतूता को कई बार डाकुओं के समूहों के आक्रमणों का सामना करना पड़ा था। फिर भी राजमार्ग असुरक्षित थे। जब वह मुल्तान से दिल्ली की यात्रा कर रहा था, डाकुओं ने उसके कारवाँ पर आक्रमण किया जिसके फलस्वरूप उसके कई साथी यात्री मारे गए। जो यात्री बच गए थे, वे भी बुरी तरह से घायल हो गए थे। इनमें इब्नबतूता भी सम्मिलित था।

प्रश्न 20.
इब्नबतूता के श्रुतलेखों को लिखने के लिए नियुक्त किए गए इब्नजुजाई ने अपनी प्रस्तावना में क्या वर्णन किया है?
उत्तर:
इब्नजुजाई ने अपनी प्रस्तावना में लिखा है कि राजा ने इब्नबतूता को निर्देश दिया कि वह अपनी यात्रा में देखे गए शहरों का तथा रोचक घटनाओं का वृतान्त लिखवाएँ। इसके साथ ही वह विभिन्न देशों के जिन शासकों से मिले, उनके महान साहित्यकारों के तथा उनके धर्मनिष्ठ सन्तों के विषय में भी बताएँ। इस आदेश के अनुसार इब्नबतूता ने इन सभी विषयों पर एक कथानक लिखवाया। इसके अतिरिक्त इब्नबतूता ने कई प्रकार के असाधारण विवरण भी दिए।

प्रश्न 21.
अल बिरूनी और इब्नबतूता के पदचिन्हों का अनुसरण करने वाले यात्रियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1400 से 1800 के बीच भारत आने वाले अनेक यात्रियों ने अल बिरूनी और इब्नबतूता के पदचिन्हों का अनुसरण किया। इनमें अब्दुररज्जाक समरकंदी, महमूद वली बल्खी तथा शेख अली हानि उल्लेखनीय हैं। अब्दुरस्ज्जाक ने 1440 के दशक में दक्षिण भारत की यात्रा की तथा महमूद वली बल्खी ने 1620 के दशक में व्यापक रूप से यात्राएं की थीं। शेख अली हाजिन ने 1740 के दशक में उत्तर भारत की यात्रा की थी।

प्रश्न 22.
बर्नियर ने भारत में जो देखा, उसकी तुलना यूरोप से की। इसका मूल्यांकन कीजिए।
अथवा
बर्नियर द्वारा दी गई पूर्व और पश्चिम की तुलना का वर्णन कीजिए।
अथवा
“बर्नियर प्रायः भारत में जो देखता था, उसकी तुलना यूरोपीय स्थिति से ही करता था।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बर्नियर प्राय: भारत में जो देखता था, उसकी तुलना यूरोपीय स्थिति से करता था वह यूरोप की सर्वश्रेष्ठता प्रतिपादित करना चाहता था यूरोपीय स्थितियों के मुकाबले में वह भारत की स्थितियों को दयनीय दर्शाना चाहता था। यही कारण है कि लगभग प्रत्येक दृष्टान्त में बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया। यद्यपि उसका आकलन हम्मेसटीक नहीं था, फिर भी जब उसके कार्य प्रकाशित हुए). (बर्नियर के वृत्तांत अत्यधिक प्रसिद्ध हुए।

प्रश्न 23.
बर्नियर द्वारा मुगल सेना के कश्मीर कूच का वर्णन कीजिए। वह अपने साथ कौनसी वस्तुएँ ले गया था? उससे क्या अपेक्षा की जाती थी?
उत्तर:
बर्नियर मुगल सेना के कश्मीर कूच के सम्बन्ध में लिखता है कि इस देश की प्रथा के अनुसार उससे दो अच्छे तुर्कमान घोड़े देखने की अपेक्षा की जाती थी। वह अपने साथ एक शक्तिशाली पारसी ऊँट तथा चालक, अपने घोड़ों के लिए एक साईस, एक खानसामा तथा एक सेवक भी रखता था। उसे एक तम्बू एक दरी, एक छोटा बिस्तर, एक तकिया, एक विछौना, चमड़े के मेजपोश कुछ अंगोछे, झोले, जाल आदि वस्तुएँ दी गई थीं उसने चावल, मीठी रोटी, नींबू, चीनी आदि वस्तुएँ अपने साथ रखी थीं।

प्रश्न 24.
संस्कृत भाषा के विषय में अल बिरूनी के विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
अल बिरूनी के अनुसार संस्कृत भाषा को सीखना एक कठिन कार्य है क्योंकि अरबी भाषा की भाँति ही, शब्दों तथा विभक्तियों, दोनों में ही संस्कृत भाषा की पहुँच बहुत विस्तृत है। इसमें एक ही वस्तु के लिए कई शब्द, मूल तथा व्युत्पन्न दोनों प्रयुक्त होते हैं। इसमें एक ही शब्द का प्रयोग कई वस्तुओं के लिए होता है, जिन्हें अच्छी तरह से समझने के लिए विभिन्न विशेषक संकेत पदों के माध्यम से एक-दूसरे से पृथक किया जाना आवश्यक है।

प्रश्न 25.
अल बिरूनी द्वारा वर्णित फारस के चार सामाजिक वर्गों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
अल बिरूनी के अनुसार प्राचीन फारस में समाज चार वर्गों में विभाजित था ये चार वर्ग थे –
(1) घुड़सवार और शासक वर्ग
(2) भिक्षु, आनुष्ठानिक पुरोहित
(3) चिकित्सक, खगोलशास्त्री तथा अन्य वैज्ञानिक और
(4) कृषक तथा शिल्पकार अल बिरुनी यह दर्शाना चाहता था कि ये सामाजिक वर्ग केवल भारत तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि ये अन्य देशों में भी थे।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 26.
“ जाति-व्यवस्था के सम्बन्ध में ब्राह्मणवादी व्याख्या को स्वीकार करने के बावजूद, अल बिरूनी ने अपवित्रता की मान्यता को अस्वीकार कर दिया।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अल बिरूनी ने लिखा है कि प्रत्येक वह वस्तु जो अपवित्र हो जाती है, अपनी पवित्रता की मूल स्थिति को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करती है और सफल होती है। सूर्य वायु को स्वच्छ करता है और समुद्र में नमक पानी को गंदा होने से बचाता है अल बिरुनी जोर देकर कहता है कि यदि ऐसा नहीं होता, तो पृथ्वी पर जीवन असम्भव हो जाता। उसके अनुसार जाति-व्यवस्था में शामिल अपवित्रता की अवधारणा प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी।

प्रश्न 27.
” जाति व्यवस्था के विषय में अल-बिरुनी का विवरण संस्कृत ग्रन्थों पर आधारित था।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जाति व्यवस्था के विषय में अल बिरुनी का विवरण संस्कृत ग्रन्थों के अध्ययन से पूर्ण रूप से प्रभावित था। इन ग्रन्थों में ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से जाति-व्यवस्था को संचालित करने वाले नियमों का प्रतिपादन किया गया था परन्तु वास्तविक जीवन में यह व्यवस्था इतनी कठोर नहीं थी। उदाहरणार्थ, अन्त्यजों (जाति-व्यवस्था से परे रहने वाले लोग) से प्रायः यह अपेक्षा की जाती थी कि वे किसानों और जमींदारों के लिए सस्ता श्रम प्रदान करें ये आर्थिक तन्त्र में सम्मिलित थे।

प्रश्न 28.
अल बिरूनी द्वारा उल्लिखित भारत की वर्ण-व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  1. ब्राह्मण-ब्राह्मणों की जाति सबसे ऊँची थी। ब्राह्मण ब्रह्मन् के सिर से उत्पन्न हुए थे। इन्हें सबसे उत्तम माना जाता था।
  2. क्षत्रिय ब्राह्मणों के बाद दूसरी जाति क्षत्रियों की थी जिनका जन्म ब्रह्मन् के कन्धों और हाथों से हुआ • था। उनका दर्जा ब्राह्मणों से अधिक नीचा नहीं था।
  3. वैश्य क्षत्रियों के बाद वैश्य आते हैं। इनका जन्म ब्रह्मन् की जंघाओं से हुआ था।
  4. शूद्र इनका उद्भव ब्रह्मन् के चरणों से हुआ था।

प्रश्न 29.
“इब्नबतूता में अनजाने को जानने की लालसा कूट-कूटकर भरी हुई थी।” स्पष्ट कीजिए । अपरिचित को रेखांकित करने का उसका क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
इब्नबतूता ने भारत में व्यापक यात्राएँ कीं और अपरिचित को जानने का भरसक प्रयास किया। उसके वृत्तान्तों में धर्मनिष्ठ लोगों, क्रूर और दयालु शासकों, सामान्य पुरुषों तथा महिलाओं और उनके जीवन की कहानियाँ शामिल थीं। इब्नबतूता को इन कहानियों में जो भी कुछ अपरिचित लगा था, उसे उसने विशेष रूप से रेखांकित किया ताकि श्रोता अथवा पाठक सुदूर देशों के वृत्तान्तों से पूर्ण रूप से प्रभावित हो सकें।

प्रश्न 30.
इब्नबतूता ने नारियल का वर्णन किस प्रकार किया है?.
उत्तर:
इब्नबतूता के अनुसार नारियल के वृक्ष स्वरूप में सबसे अनोखे और प्रकृति में सबसे आश्चर्यजनक वृक्षों में से हैं। ये बिल्कुल खजूर के वृक्ष जैसे दिखते हैं। इनमें केवल एक अन्तर है कि नारियल से काष्ठफल प्राप्त होता तथा दूसरे से खजूर नारियल मानव सिर से मेल खाता हैं क्योंकि इसमें भी दो आँखें तथा एक मुख है और अन्दर का भाग हरा होने पर मस्तिष्क जैसा दिखता है। इससे जुड़ा रेशा बालों जैसा दिखाई देता है वे इससे रस्सी बनाते हैं।

प्रश्न 31.
इब्नबतूता द्वारा पान का वर्णन किस प्रकार किया गया है? उसने पान का वर्णन क्यों किया? पान का किस प्रकार प्रयोग किया जाता था?
उत्तर:
इब्नबतूत ने पान का वर्णन इसलिए किया क्योंकि इससे उसके पाठक पूरी तरह से अपरिचित थे। इब्नबतूता के अनुसार पान का कोई फल नहीं होता और इसे केवल इसकी पत्तियों के लिए ही उगाया जाता था पान को अंगूर लता की तरह ही उगाया जाता था। पान के प्रयोग करने की विधि यह थी कि इसे खाने से पहले सुपारी ली जाती थी। इसके छोटे- छोटे टुकड़ों को मुंह में रखकर चबाया जाता था। इसके पश्चात् पान की पत्तियों के साथ इन्हें चबाया जाता था।

प्रश्न 32.
इब्नबतूता ने भारतीय शहरों के सम्बन्ध में जो लिखा है, उस पर प्रकाश डालिए।
अथवा
इब्नबतूता ने भारतीय शहरों का किस प्रकार वर्णन किया है?
उत्तर:
इब्नबतूता के अनुसार भारतीय शहर पनी आबादी वाले तथा समृद्ध थे, परन्तु ये कभी-कभी युद्धों तथा अभियानों में विनष्ट हो जाते थे। अधिकांश शहरों में भीड़-भीड़ वाली सड़कें तथा चमक-दमक वाले और रंगीन बाजार थे जो विविध प्रकार की वस्तुओं से भरे रहते थे। दिल्ली एक बड़ा शहर था जिसकी आबादी बहुत अधिक थी तथा यह भारत में सबसे बड़ा शहर था। दौलताबाद (महाराष्ट्र में ) भी कम नहीं था और आकार में दिल्ली को चुनौती देता था।

प्रश्न 33.
इब्नबतूता के अनुसार भारतीय शहरों के बाजारों की क्या विशेषताएँ थीं?
उत्तर:
इब्नबतूता के अनुसार भारतीय शहरों के बाजार चमक-दमक वाले तथा रंगीन थे जहाँ विविध प्रकार की वस्तुएँ उपलब्ध रहती थीं ये बाजार केवल आर्थिक विनिमय के स्थान ही नहीं थे बल्कि ये सामाजिक तथा आर्थिक गतिविधियों के केन्द्र भी थे। अधिकांश बाजारों में एक मस्जिद तथा एक मन्दिर होता था और उनमें से कम से कम कुछ में तो नर्तकों, संगीतकारों एवं गायकों के सार्वजनिक प्रदर्शन के स्थान भी निर्धारित थे।

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प्रश्न 34.
इब्नबतूता द्वारा उल्लिखित दिल्ली ( देहली) शहर की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दिल्ली बड़े क्षेत्र में फैला पनी जनसंख्या वाला शहर था। शहर के चारों ओर बनी प्राचीर अतुलनीय थी। इसके अन्दर रात्रि के पहरेदार तथा द्वारपालों के कक्ष थे। प्राचीरों के अन्दर अनेक भंडार गृह बने हुए थे इस शहर के अट्ठाईस द्वार थे जिन्हें ‘दरवाजा’ कहा जाता है। इनमें से ‘बदायूँ दरवाजा’ सबसे विशाल था मांडवी दरवाजे के भीतर एक अनाज मंडी थी तथा गुल दरवाजे की बगल में एक फलों का बगीचा था।

प्रश्न 35.
इब्नबतूता के वृत्तान्त से भारतीय कृषि, व्यापार और वाणिज्य के बारे में क्या जानकारी मिलती है?
उत्तर:
इब्नबतूता के अनुसार भारतीय कृषि के अत्यधिक उत्पादनकारी होने का कारण भूमि का उपजाऊपन था। इस वजह से किसान वर्ष में दो फसलें उगाते थे। भारतीय उपमहाद्वीप व्यापार तथा वाणिज्य के अन्तर एशियाई तन्त्रों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ था भारतीय माल की मध्य तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया, दोनों में बहुत मांग थी, जिससे शिल्पकार तथा व्यापारी बहुत लाभ कमाते थे भारतीय सूती कपड़े, महीन मलमल, रेशम, जी तथा साटन की बहुत अधिक माँग थीं।

प्रश्न 36.
इब्नबतूता ने दौलताबाद के संगीत बाजार का क्या वृत्तान्त दिया है? अपने वर्णन में इब्नबतूता ने इन गतिविधियों को उजागर क्यों किया?
उत्तर:
इब्नबतूता के अनुसार दौलताबाद में पुरुष और महिला गायकों के लिए एक बाजार था जिसे ‘ताराववाद’ कहते थे। यहाँ अनेक दुकानें थीं जिन्हें कालीनों से सजाया गया था। दुकान के मध्य में एक झूला था, जिस पर गायिका बैठती थी। बाजार के मध्य में एक विशाल गुम्बद खड़ा था, जिसमें कालीन बिछाए गए थे। इस बाजार में इबादत के लिए मस्जिदें बनी हुई थीं।

प्रश्न 37.
अपने वर्णन में इब्नबतूता ने इन गतिविधियों का उल्लेख क्यों किया?
उत्तर:
हमारे विचार में इब्नबतूता ने अपने विवरण में इन गतिविधियों का वर्णन इसलिए किया था क्योंकि इस प्रकार के संगीत के बाजारों से उसके पाठक अपरिचित थे। अतः उसने इन गतिविधियों का वर्णन किया ताकि उसके पाठक इन वृत्तान्तों से प्रभावित हो सकें।

प्रश्न 38.
अब्दुररज्जाक ने अपने यात्रा-वृत्तान्त में दक्षिण भारत का किस प्रकार वर्णन किया है?
उत्तर:
1440 के दशक में लिखा गया अब्दुरज्जाक का यात्रा-वृत्तान्त संवेगों और अवबोधनों का एक रोचक मिश्रण है। उसने केरल में कालीकट (आधुनिक कोलीकोड) बन्दरगाह पर जो देखा, उसे प्रशंसनीय नहीं माना। उसने लिखा है कि “यहाँ ऐसे लोग बसे हुए थे, जिनकी कल्पना उसने कभी भी नहीं की थी।” इन लोगों को उसने एक ‘विचित्र देश’ बताया।

प्रश्न 39.
अब्दुररज्जाक द्वारा वर्णित मंगलौर के मन्दिर का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
अब्दुररज्याक ने लिखा है कि मंगलौर से 9 मील के भीतर ही उसने एक ऐसा पूजा स्थल देखा जो सम्पूर्ण विश्व में अतुलनीय है। यह वर्गाकार था तथा चार द्वार मंडपों के साथ काँसे से ढका हुआ था प्रवेश-द्वार के द्वार-मंडप में सोने की बनी एक मूर्ति थी जो मानव- आकृति जैसी तथा आदमकद थी इसकी दोनों आँखों में काले रंग के माणिक इतनी चतुराई से लगाए गए थे कि ऐसा लगता था मानो वह देख सकती हों। यह शिल्प और कारीगरी अद्भुत थी।

प्रश्न 40.
इब्नबतूता ने भारत की डाक व्यवस्था को संचार की एक अनूठी प्रणाली क्यों बताया है?
अथवा
मध्यकालीन भारत में डाक प्रणाली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
इब्नबतूता भारत की डाक प्रणाली की कार्यकुशलता देखकर बड़ा आश्चर्यचकित हुआ। इससे व्यापारियों के लिए न केवल लम्बी दूरी तक सूचना और उधार भेजना सम्भव हुआ बल्कि अल्प सूचना पर माल भेजना भी सम्भव हो गया। डाक प्रणाली इतनी कुशल थी कि जहाँ सिन्ध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे, वहीं गुप्तचरों की सूचनाएँ सुल्तान तक इस डाक- व्यवस्था के द्वारा केवल पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं।

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प्रश्न 41.
सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दियों में भारत में आने वाले तीन यूरोपीय यात्रियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. सोलहवीं शताब्दी में दुआर्ते बरबोसा नामक यूरोपीय यात्री ने दक्षिण भारत में व्यापार और समाज का एक विस्तृत विवरण लिखा।
  2. सत्रहवीं शताब्दी में ज्यों वैप्टिस्ट तैवर्नियर नामक एक फ्रांसीसी जौहरी ने भारत की कम से कम 6 बार यात्रा की वह भारत की व्यापारिक स्थितियों से बड़ा प्रभावित था।
  3. सत्रहवीं शताब्दी में इतालवी चिकित्सक मनूकी भारत आए और यहीं बस गए।

प्रश्न 42.
फ्रांस्वा बर्नियर का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
फ्रांस्वा बर्नियर फ्रांस का निवासी था। यह एक चिकित्सक, राजनीतिक दार्शनिक तथा एक इतिहासकार था। यह मुगल साम्राज्य में अवसरों की तलाश में भारत आया था। वह 1656 से 1668 ई. तक भारत में बारह वर्ष तक रहा और मुगल दरबार से घनिष्ठ सम्बन्ध बनाए रखे। प्रारम्भ में उसने मुगल सम्राट शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह के चिकित्सक के रूप में कार्य किया तथा बाद में एक मुगल अमीर दानिशमन्द खान के साथ कार्य किया।

प्रश्न 43.
डच यात्री पेलसर्ट ने भारत में व्याप्त व्यापक गरीबी का किस प्रकार वर्णन किया है?
उत्तर:
पेलसर्ट नामक एक हच यात्री भारत के लोगों में व्याप्त गरीबी को देखकर बड़ा आश्चर्यचकित था। उसने लिखा है कि “लोग इतनी अधिक और दुःखद गरीबी में रहते थे कि उनके जीवन को मात्र नितान्त अभाव के घर और कठोर कष्ट दुर्भाग्य के आवास के रूप में चित्रित किया जा सकता है।” पेलसर्ट के अनुसार, “कृषकों को इतना अधिक निचोड़ा जाता था कि पेट भरने के लिए उनके पास सूखी रोटी भी कठिनाई से बचती थी।”

प्रश्न 44.
“बर्नियर का उद्देश्य यूरोप की श्रेष्ठता को दर्शाना तथा भारतीय स्थितियों को दयनीय बताना था।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बर्नियर निरन्तर मुगलकालीन भारत की तुलना तत्कालीन यूरोप से करता रहा और प्रायः यूरोप की श्रेष्ठता को दर्शाता रहा। वह यूरोपीय प्रथाओं, रीति-रिवाज और प्रशासनिक व्यवस्था को श्रेष्ठ दर्शाना चाहता था तथा भारतीय परिस्थितियों को दयनीय बताना चाहता था। उसने भारत को यूरोप के प्रतिलोम के रूप में दिखाया है। उसने भारत में जो भिताएँ अनुभव की उन्हें भी पदानुक्रम के अनुसार क्रमबद्ध किया ताकि भारत पश्चिमी संसार को निम्न कोटि का लगे।

प्रश्न 45.
भूस्वामित्व के सम्बन्ध में वर्नियर के विचारों को संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
अथवा
बर्नियर के अनुसार भूमि स्वामित्व के प्रश्न पर भारत और यूरोप के बीच क्या भिन्नता थी? राजकीय भूस्वामित्व राज्य तथा उसके निवासियों के लिए क्यों हानिकारक था?
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच मूल भिन्नताओं में से एक भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव था। बर्नियर निजी स्वामित्व का समर्थक था। उसके अनुसार भूमि पर राजकीय स्वामित्व राज्य तथा उसके निवासियों, दोनों के लिए हानिकारक था उसने यह महसूस किया कि मुगल साम्राज्य में सम्राट सम्पूर्ण भूमि का स्वामी था जो इसे अपने अमीरों में बांटता था और इसके अर्थव्यवस्था तथा समाज के लिए विनाशकारी परिणाम होते थे।

प्रश्न 46.
बर्नियर के अनुसार राजकीय भूस्वामित्व राज्य के निवासियों के लिए क्यों विनाशकारी था?
उत्तर:
अनियर के अनुसार राजकीय भूस्वामित्व के कारण, भूधारक अपने बच्चों को भूमि नहीं दे सकते थे। इसलिए वे उत्पादन के स्तर को बनाए रखने और उसमें वृद्धि के लिए प्रयास नहीं करते थे। निजी भूस्वामित्व के अभाव ने बेहतर भूधारकों को पनपने से रोका। इसी वजह से कृषि का विनाश हुआ, किसानों को अत्यधिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा तथा समाज के सभी वर्गों के जीवन स्तर में लगातार पतन की स्थिति उत्पन्न हुई।

प्रश्न 47.
बर्नियर द्वारा वर्णित भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों के कृषकों की दशा का वृत्तान्त प्रस्तुत कीजिये।
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार भारत के कई ग्रामीण अंचल रेतीली भूमियाँ या बंजर पर्वत थे। यहाँ की खेती अच्छी नहीं थी और इन क्षेत्रों की आबादी भी कम थी। यहाँ श्रमिकों के अभाव में कृषि योग्य भूमि का एक बड़ा भाग कृषि विहीन रह जाता था। कई श्रमिक गवर्नरों द्वारा किये गए अत्याचारों के फलस्वरूप मर जाते थे। गरीबों को न केवल जीवन निर्वहन के साधनों से वंचित कर दिया जाता था, बल्कि उनके बच्चों को दास बना लिया जाता था।

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प्रश्न 48.
“बर्नियर भारतीय समाज को दरिद्र लोगों के जनसमूह से बना वर्णित करता है।” स्पष्ट कीजिए। उत्तर बर्नियर के अनुसार भारतीय समाज दरिद्र लोगों के समरूप जनसमूह से बना था। यह वर्ग एक अत्यन्त अमीर तथा शक्तिशाली शासक वर्ग के द्वारा अधीन बनाया जाता था। शासक वर्ग के लोग अल्पसंख्यक होते थे गरीबों में सबसे गरीब तथा अमीरों में सबसे अमीर व्यक्ति के बीच नाममात्र को भी कोई सामाजिक समूह या वर्ग नहीं था बर्नियर दृढ़तापूर्वक कहता है कि “भारत में मध्या की स्थिति के लोग नहीं हैं।”

प्रश्न 49.
बर्नियर ने मुगल साम्राज्य को जिस रूप में देखा, उसका वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार मुगल साम्राज्य का राजा भिखारियों तथा क्रूर लोगों का राजा था मुगल साम्राज्य के शहर और नगर विनष्ट तथा ‘खराब वायु’ से दूषित थे और इसके खेत ‘शाड़ीदार’ तथा ‘घातक दलदल’ से परिपूर्ण।। इसका केवल एक ही कारण था-राजकीय भूस्वामित्व।

प्रश्न 50.
बर्नियर ने मुगल साम्राज्य को भूमि का एकमात्र स्वामी बताया है। क्या इसकी पुष्टि मुगल साक्ष्यों धे से होती है?
उत्तर:
एक भी सरकारी मुगल दस्तावेज यह नहीं दर्शाता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था। उदाहरण के लिए अकबर के काल के सरकारी इतिहासकार अबुल फजल ने भूमि राजस्व को ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ बताया है जो राजा द्वारा अपनी प्रजा को सुरक्षा प्रदान करने के बदले की गई माँग लगती है, न कि अपने स्वामित्व वाली भूमि पर लगान कुछ यूरोपीय यात्री ऐसी मांगों को लगान मानते थे परन्तु वास्तव में यह न तो लगान था, न ही भूमिकर, बल्कि उपज पर लगने वाला कर था।

प्रश्न 51.
“बर्नियर द्वारा प्रस्तुत भारतीय ग्रामीण समाज का चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बर्नियर द्वारा प्रस्तुत भारतीय ग्रामीण समाज का चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था सोलहवीं तथा सहव शताब्दी में ग्रामीण समाज में चारित्रिक रूप से बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था। एक ओर बड़े जमींदार थे, जो भूमि पर उच्चाधिकारों का उपभोग करते थे तथा दूसरी ओर अस्पृश्य भूमिहीन श्रमिक (बलाहार) थे। इन दोनों के बीच में बड़ा किसान था तथा साथ ही कुछ छोटे किसान भी थे, जो बड़ी कठिनाई से अपने गुजारे लायक उत्पादन कर पाते थे।

प्रश्न 52.
बर्नियर ने अपने वृत्तान्त में किस अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई का उल्लेख किया है?
उत्तर:
बर्नियर लिखता है कि शिल्पकारों को अपने उत्पादों की वृद्धि के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जाता था क्योंकि समस्त लाभ राज्य द्वारा ही प्राप्त कर लिया जाता था। इसलिए उत्पादन सर्वत्र पतनोन्मुख था। इसके साथ ही बनियर ने यह भी स्वीकार किया है कि सम्पूर्ण विश्व से बड़ी मात्रा में बहुमूल्य धातुएँ भारत में आती थीं क्योंकि उत्पादों का सोने और चांदी के बदले निर्यात होता था बर्नियर ने एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय के अस्तित्व का भी उल्लेख किया है।

प्रश्न 53.
बर्नियर ने यूरोपीय राजाओं को मुगल ढाँचे का अनुसरण करने पर क्या चेतावनी दी है? उसने सर्वनाश के दृश्य का चित्रण किस प्रकार किया है?
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार यूरोपीय राज्य इस प्रकार अच्छी तरह से जुते और बसे हुए इतनी अच्छी प्रकार से निर्मित तथा इतने समृद्ध नहीं रह जायेंगे, जैसा कि लोग उन्हें देखते हैं वे शीघ्र ही रेगिस्तान तथा निर्जन स्थानों के, भिखारियों तथा क्रूर लोगों के राजा बनकर रह जायेंगे जैसे | कि मुगल शासक हम उन महान शहरों और नगरों को खराब वायु के कारण न रहने योग्य अवस्था में पाएँगे। विनाश की स्थिति में टीले और झाड़ियाँ अथवा पातक दलदल से भरे खेत ही रह जायेंगे।

प्रश्न 54.
बर्नियर ने अपने वृत्तान्त में भारतीय कृषि तथा शिल्प उत्पादन की उन्नत स्थिति का किस प्रकार वर्णन किया है?
उत्तर:
बर्नियर ने लिखा है कि देश का अधिकांश भू- भाग अत्यधिक उपजाऊ है। उदाहरण के लिए बंगाल राज्य चावल, मकई, रेशम कपास तथा नील के उत्पादन में से आगे है। यहाँ के शिल्पकार आलसी होते हुए भी गलीचों, जरी, कसीदाकारी कढ़ाई, सोने और चाँदी के स्वों तथा विभिन्न प्रकार के रेशमी एवं सूती वस्त्रों निर्माण का कार्य करने में संलग्न रहते हैं विश्व के सभी भागों में संचलन के बाद सोना और चाँदी कुछ सीमा तक खो जाता है।

प्रश्न 55.
बर्नियर द्वारा उल्लिखित राजकीय कारखानों की कार्यप्रणाली का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार कई स्थानों पर बड़े कक्ष दिखाई देते थे, जिन्हें कारखाना अथवा शिल्पकारों की कार्यशाला कहते थे एक कक्ष में कसीदाकार एक मास्टर के निरीक्षण में कार्यरत रहते थे। एक अन्य कक्ष में सुनार कार्यरत थे। तीसरे कक्ष में चित्रकार तथा चौधे में प्रलाक्षा रस का रोगन लगाने वाले कार्यरत थे।

पाँचवें कक्ष में बढ़ई, खरादी, दर्जी तथा जूते बनाने वाले तथा हठे कक्ष में रेशम, जरी तथा बारीक मलमल का काम करने वाले कार्यरत थे। प्रश्न 56. बर्नियर के अनुसार ‘मुगलकालीन शहर’ ‘शिविर नगर’ थे। स्पष्ट कीजिए। जाता था। शासक वर्ग के लोग अल्पसंख्यक होते थे गरीबों में सबसे गरीब तथा अमीरों में सबसे अमीर व्यक्ति के बीच नाममात्र को भी कोई सामाजिक समूह या नहीं था। बर्नियर दृढ़तापूर्वक कहता है कि “भारत में की स्थिति के लोग नहीं हैं।”

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प्रश्न 49.
बर्नियर ने मुगल साम्राज्य को जिस रूप देखा, उसका वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार मुगल साम्राज्य का राज भिखारियों तथा क्रूर लोगों का राजा था मुगल साम्राज्य के शहर और नगर विनष्ट तथा ‘खराब वायु’ से दूषित और इसके खेत ‘शाड़ीदार’ तथा ‘घातक दलदल से परिपूर्ण थे। इसका केवल एक ही कारण था राजकीय भूस्वामित्व।

प्रश्न 50.
बर्नियर ने मुगल साम्राज्य को भूमि का एकमात्र स्वामी बताया है। क्या इसकी पुष्टि मुगल साक्ष्यों से होती है?
उत्तर:
एक भी सरकारी मुगल दस्तावेज यह नहीं दर्शाता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था। उदाहरण के लिए अकबर के काल के सरकारी इतिहासकार अबुल फजल ने भूमि राजस्व को ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ बताया है जो राजा द्वारा अपनी प्रजा को सुरक्षा प्रदान करने के बदले की गई माँग लगती है, न कि अपने स्वामित्व वाली भूमि पर लगान कुछ यूरोपीय यात्री ऐसी माँगों को लगान मानते थे परन्तु वास्तव में यह न तो लगान था, न ही भूमिकर, बल्कि उपज पर लगने वाला कर था।

प्रश्न 51.
” बर्नियर द्वारा प्रस्तुत भारतीय ग्रामीण समाज का चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बर्नियर द्वारा प्रस्तुत भारतीय ग्रामीण समाज का चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी में ग्रामीण समाज में चारित्रिक रूप से बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था। एक ओर बड़े जमींदार थे, जो भूमि पर उच्चाधिकारों का उपभोग करते थे तथा दूसरी ओर अस्पृश्य भूमिहीन श्रमिक (बलाहार) थे। इन दोनों के बीच में बड़ा किसान था तथा साथ ही कुछ छोटे किसान भी थे, जो बड़ी कठिनाई से अपने गुजारे लायक उत्पादन कर पाते थे।

प्रश्न 52.
बर्नियर ने अपने वृत्तान्त में किस अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई का उल्लेख किया है?
उत्तर:
बर्नियर लिखता है कि शिल्पकारों को अपने उत्पादों की वृद्धि के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जाता था क्योंकि समस्त लाभ राज्य द्वारा ही प्राप्त कर लिया जाता था। इसलिए उत्पादन सर्वत्र पतनोन्मुख था। इसके साथ ही बनियर ने यह भी स्वीकार किया है कि सम्पूर्ण विश्व से बड़ी मात्रा में बहुमूल्य धातुएँ भारत में आती थीं क्योंकि उत्पादों का सोने और चांदी के बदले निर्यात होता था बर्नियर ने एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय के अस्तित्व का भी उल्लेख किया है।

प्रश्न 53.
बर्नियर ने यूरोपीय राजाओं को मुगल ढाँचे का अनुसरण करने पर क्या चेतावनी दी है? उसने सर्वनाश के दृश्य का चित्रण किस प्रकार किया है?
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार यूरोपीय राज्य इस प्रकार अच्छी तरह से जुते और बसे हुए इतनी अच्छी प्रकार से निर्मित तथा इतने समृद्ध नहीं रह जायेंगे, जैसा कि लोग उन्हें देखते हैं वे शीघ्र ही रेगिस्तान तथा निर्जन स्थानों के, भिखारियों तथा क्रूर लोगों के राजा बनकर रह जायेंगे जैसे कि मुगल शासक हम उन महान शहरों और नगरों को खराब बायु के कारण न रहने योग्य अवस्था में पाएँगे। विनाश की स्थिति में टीले और झाड़ियाँ अथवा पातक दलदल से भरे खेत ही रह जायेंगे।

प्रश्न 54.
बर्नियर ने अपने वृत्तान्त में भारतीय कृषि तथा शिल्प उत्पादन की उन्नत स्थिति का किस प्रकार वर्णन किया है?
उत्तर:
बर्नियर ने लिखा है कि देश का अधिकांश भू- भाग अत्यधिक उपजाऊ है। उदाहरण के लिए बंगाल राज्य चावल, मकई, रेशम कपास तथा नील के उत्पादन में मिल से आगे है। यहाँ के शिल्पकार आलसी होते हुए भी गलीचों, जरी कसीदाकारी कढ़ाई, सोने और चांदी के यस्व तथा विभिन्न प्रकार के रेशमी एवं सूती वस्त्रों के निर्माण का कार्य करने में संलग्न रहते हैं। विश्व के सभी भागों में संचलन के बाद सोना और चाँदी भारत में आकर कुछ सीमा तक खो जाता है।

प्रश्न 55.
बर्नियर द्वारा उल्लिखित राजकीय कारखानों की कार्यप्रणाली का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार कई स्थानों पर बड़े कक्ष दिखाई देते थे, जिन्हें कारखाना अथवा शिल्पकारों की कार्यशाला कहते थे। एक कक्ष में कसीदाकार एक मास्टर के निरीक्षण में कार्यरत रहते थे। एक अन्य कक्ष में सुनार कार्यरत थे। तीसरे कक्ष में चित्रकार तथा पौधे में प्रलाक्षा रस का रोगन लगाने वाले कार्यरत थे। पाँचवें कक्ष में बढ़ई, खरादी, दर्जी तथा जूते बनाने वाले तथा हठे कक्ष में रेशम, जरी तथा बारीक मलमल का काम करने वाले कार्यरत थे।

प्रश्न 56.
बर्नियर के अनुसार ‘मुगलकालीन शहर’ “शिविर नगर’ थे स्पष्ट कीजिए।
अथवा
बर्नियर के वृत्तान्त से उभरने वाले शहरी केन्द्रों के चित्र पर चर्चा कीजिये। बर्नियर भारतीय शहरों को किस रूप में देखता है?
उत्तर:
बनिंवर ने ‘मुगलकालीन शहरों’ को ‘शिविर नगर’ कहा है। शिविर नगरों से उसका अभिप्राय उन नगरों से था, जो अपने अस्तित्व और बने रहने के लिए राजकीय शिविरों पर निर्भर थे। उसका विचार था कि ये नगर राजकीय दरबार के आगमन के साथ अस्तित्व में आते थे तथा दरबार के कहीं और चले जाने के बाद ये तेजी से विलुप्त हो जाते थे। उसके अनुसार इन नगरों की सामाजिक और आर्थिक नींव व्यावहारिक नहीं होती थी और ये राजकीय संरक्षण पर आश्रित रहते थे।

प्रश्न 57.
बर्नियर के अनुसार “मुगलकालीन व्यापारी प्रायः सुदृढ़ सामुदायिक अथवा बन्धुत्व के सम्बन्धों से जुड़े होते थे।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार मुगलकाल में व्यापार प्रायः सुदृद् सामुदायिक अथवा वन्धुत्व के सम्बन्धों में जुड़े होते थे और अपनी जाति तथा व्यावसायिक संस्थाओं के माध्यम से संगठित रहते थे। पश्चिमी भारत में ऐसे समूहों को ‘महाजन’ कहा जाता था और उनका मुखिया ‘सेठ’ कहलाता था। अहमदाबाद जैसे शहरी केन्द्रों में सभी महाजनों का सामूहिक प्रतिनिधित्व व्यापारिक समुदाय के मुखिया द्वारा होता था, जिसे ‘नगर सेठ’ कहा जाता था।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 58.
इब्नबतूता ने तत्कालीन दास-दासियों की स्थिति का क्या विवरण प्रस्तुत किया है?
अथवा
इब्नबतूता द्वारा दास प्रथा के सम्बन्ध में दिए गए साक्ष्यों का विवेचन कीजिये।
उत्तर:
इब्नबतूता के अनुसार पुरुष तथा महिला दास बाजारों में खुले आम बेचे जाते थे और नियमित रूप से भेंट में दिए जाते थे। दासों का प्रायः घरेलू श्रम के लिए ही प्रयोग किया जाता था। ये लोग और महिलाओं को ले जाते थे पालकी या डोले में पुरुषों घरेलू श्रम में लगे हुए दासों का मूल्य बहुत कम होता था इसलिए अधिकांश परिवार कम से कम एक या दो दासों को रख पाने में समर्थ थे। सुल्तान की सेवा में लगी हुई कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं।

प्रश्न 59.
“भारतीय महिलाओं का जीवन सती प्रथा के अलावा कई और चीजों के चारों ओर घूमता था। ” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
महिलाओं का जीवन सती प्रथा के अलावा कई और चीजों के चारों ओर घूमता भी था उनका श्रम कृषि तथा कृषि के अलावा होने वाले उत्पादन, दोनों में महत्त्वपूर्ण था। व्यापारिक घरानों की महिलाएँ व्यापारिक गतिविधियों में भाग लेती थीं। वे कभी-कभी वाणिज्यिक विवादों को न्यायालय के सामने भी ले जाती थीं। अतः यह सम्भव नहीं लगता है कि महिलाओं को उनके घरों के विशेष स्थानों तक परिसीमित कर रखा जाता था।

प्रश्न 60.
‘बर्नियर द्वारा किया गया भारत का चित्रण द्वि-विपरीतता के नमूने पर आधारित है।” स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
बर्नियर द्वारा किया गया भारत का चित्रण द्वि-विपरीतता के नमूने पर आधारित है। उसने भारत को यूरोप के प्रतिलोम के रूप में दिखाया है या फिर यूरोप के विपरीत देश के रूप में दर्शाया है। उसने जो भिन्नताएँ महसूस कीं, उन्हें भी पदानुक्रम के अनुसार क्रमबद्ध किया जिससे भारत यूरोपीय देशों को निम्न कोटि का प्रतीत हो।

प्रश्न 61.
बर्नियर ने सती प्रथा का विस्तृत विवरण देना क्यों उचित समझा ?
उत्तर:
बर्नियर भारत में प्रचलित उन सभी प्रथाओं का वर्णन करना चाहता था जिससे भारत यूरोपीय देशों की तुलना में एक निम्न कोटि का देश प्रतीत होता हो उस समय सभी समकालीन यूरोपीय यात्रियों तथा लेखकों के लिए महिलाओं से किया जाने वाला व्यवहार प्रायः पश्चिमी तथा पूर्वी देशों के बीच भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक माना जाता था इसलिए बर्नियर ने सती प्रथा का वर्णन करना उचित समझा।

प्रश्न 62.
बर्नियर ने लाहौर में एक अल्पवयस्क विधवा के सती होने का किस प्रकार विवरण दिया है?
उत्तर:
लाहौर में बर्नियर ने एक अत्यन्त सुन्दर अल्पवयस्क विधवा को सती होते हुए देखा। यह बालिका बुरी तरह से रो रही थी परन्तु उसे कुछ ब्राह्मण लोगों तथा एक वृद्ध महिला की सहायता से उस अनिच्छुक पीड़िता को बलपूर्वक सती-स्थल की ओर ले जाया गया। उसे लकड़ियों पर बिठाया गया, उसके हाथ और पैर बांध दिए गए ताकि वह भाग न जाए और इस स्थिति में उस निर्दोष विधवा को जीवित जला दिया गया।

प्रश्न 63.
बर्नियर के विवरणों ने फ्रांसीसी दार्शनिक मान्टेस्क्यू को किस प्रकार प्रभावित किया?
उत्तर:
बर्नियर के विवरणों से प्रभावित होकर फ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने वर्नियर के वृतान्त का प्रयोग प्राच्य निरंकुशवाद के सिद्धान्त को विकसित करने में किया। इस सिद्धान्त के अनुसार एशिया (प्राच्य अथवा पूर्व) में शासक अपनी प्रजा के ऊपर अपने प्रभुत्व का उपभोग करते थे, जिसे दासता तथा गरीबी की स्थितियों में रखा जाता था। इस तर्क का आधार यह था कि सम्पूर्ण भूमि पर राजा का स्वामित्व होता था।

प्रश्न 64.
बर्नियर के विवरणों से कार्ल मार्क्स किस प्रकार प्रभावित हुआ?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स ने लिखा कि भारत ( तथा अन्य एशियाई देशों में ) उपनिवेशवाद से पहले अधिशेष का अधिग्रहण राज्य द्वारा होता था। इससे एक ऐसे समाज का उद्भव हुआ जो बड़ी संख्या में स्वतन्त्र तथा आन्तरिक रूप से समतावादी ग्रामीण समुदायों से बना था। इन ग्रामीण समुदायों पर राजकीय दरबार का नियंत्रण होता था और जब तक अधिशेष की आपूर्ति बिना किसी बाधा के जारी रहती थी इनकी स्वायत्तता का सम्मान किया जाता था।

प्रश्न 65.
इब्नबतूता भारत की डाक प्रणाली को देखकर चकित क्यों हो गया?
उत्तर:
इब्नबतूता भारत की डांक प्रणाली को देखकर चकित हो गया क्योंकि भारत की डाक प्रणाली इतनी कुशल थी कि जहाँ सिन्ध से दिल्ली यात्रा में पचास दिन लगाते थे, वहीं सुल्तान तक गुप्तचरों की खबर मात्र पाँच दिनों में ही पहुँच जाती थी। इसके अतिरिक्त इससे व्यापारियों के लिए न केवल लम्बी दूरी तक सूचना भेजी जा सकती श्री बल्कि अल्प सूचना पर माल भी भेजा जा सकता था।

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प्रश्न 66.
‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ नामक ग्रन्थ में बर्नियर भारत को पश्चिमी जगत की तुलना में अल्प- विकसित व निम्न श्रेणी का दर्शाना चाहता था। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर में बनिंबर की भारतीय उपमहाद्वीप की यात्राओं का वर्णन है। यह ग्रन्थ वर्नियर की गहन आलोचनात्मक चिन्तन दृष्टि का उदाहरण है, लेकिन बर्नियर का यह दृष्टिकोण पूर्वाग्रह से प्रेरित हैं तथा एकपक्षीय है। बर्नियर ने मुगलकालीन इतिहास को भारत की भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में न रखकर एक वैश्विक ढाँचे में ढालने का प्रयास किया। वह यूरोप के परिप्रेक्ष्य में मुगलकालीन इतिहास की तुलना निरन्तर करने का प्रयास करता रहा। बर्नियर के अनुसार यूरोप की प्रशासनिक व्यवस्था, यूरोप की सामाजिक- आर्थिक स्थिति भारत से कहीं बेहतर है। बास्तव में उसका भारत चित्रण पूरी तरह प्रतिकूलता पर आधारित है।

प्रश्न 67.
इब्नबतूता ने भारतीय शहरों में क्या विशेषताएं देखीं? संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
इब्नबतूता ने भारतीय शहरों को उन्नत अवस्था में पाया। उसके अनुसार जो लोग जीवन को समग्रता से जीने की आकांक्षा रखते हैं, जिनके पास कला-कौशल, दृढ़ इच्छा-शक्ति और पर्याप्त साधन हैं, उनके लिए आगे बढ़ने हेतु भारत के शहरों में व्यापक अवसर मौजूद थे। भारतीय शहरों की आबादी धनी थी व शहरों में समृद्धि झलकती थी। परन्तु युद्ध आदि की विभीषिका का दुष्परिणाम शहरों को कभी-कभी भुगतना पड़ता था।

इब्नबतूता के अनुसार शहर के बाजार चहल-पहल तथा चमक-दमक से भरपूर विभिन्न प्रकार की व्यापारिक वस्तुओं से भरे रहते थे। भारत में दिल्ली एक विपुल आबादी वाला सबसे बड़ा शहर था महाराष्ट्र में स्थित दौलताबाद भी दिल्ली से किसी प्रकार कमतर नहीं था। बाजारों में केवल व्यापारिक गतिविधियाँ ही नहीं अन्य धार्मिक तथा सामाजिक गतिविधियाँ भी होती थीं। इब्नबतूता का यह वर्णन भारतीय शहरों की विकसित समृद्धि का व्यापक उदाहरण है।

प्रश्न 68.
अब्दुर रज्जाक द्वारा लिखित यात्रा वृत्तान्त संवेगों और अवबोधनों का एक रोचक मिश्रण है, कैसे?
उत्तर:
1440 के दशक में लिखा गया अब्दुर रजाक का यात्रा वृत्तान्त उसके शब्दों में, “यहाँ ऐसे लोग बसे हुए थे जिनकी कल्पना मैंने कभी नहीं की।” 1440 के दशक में अब्दुर रजाक केरल के कालीकट बन्दरगाह पर पहुँचा। इन लोगों को देखकर उसके मुँह से ‘विचित्र देश का सम्बोधन निकला। लेकिन कालान्तर में अपनी पुनः भारत यात्रा के दौरान वह मंगलौर आया और यहाँ पश्चिमी पाट को पार कर उसने एक मन्दिर देखा, जिसे देखकर वह बहुत अधिक प्रभावित हुआ। मन्दिर की स्थापत्य कला को देखकर वह मन्त्रमुग्ध रह गया और ‘विचित्र देश’ की छवि उसके मस्तिष्क से निकल गई।

प्रश्न 69.
पेलसर्ट नामक डच यात्री की भारत यात्रा का वर्णन संक्षेप में कीजिए।
उत्तर:
पेलसर्ट नामक एक डच यात्री ने सत्रहवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में भारतीय उपमहाद्वीप की यात्रा की थी। बर्नियर की ही तरह वह भी लोगों में व्यापक गरीबी देखकर अचम्भित था “लोग इतनी अधिक तथा दुःखद गरीबी में रहते हैं कि इनके जीवन को मात्र नितान्त अभाव के पर तथा कठोर कष्ट दुर्भाग्य के आभास के रूप में चित्रित अथवा ठीक प्रकार से वर्णित किया जा सकता है।” राज्य को उत्तरदायी ठहराते हुए वह कहता है: ‘कृषकों को इतना अधिक निचोड़ा जाता है कि पेट भरने के लिए उनके पास सूखी रोटी भी मुश्किल से बचती है।”

प्रश्न 70.
भारतीय महिलाओं की मध्यकालीन सामाजिक स्थिति के बारे में यूरोपीय लेखकों के विचार क्या थे?
उत्तर:
विभिन्न यूरोपीय यात्री जो भारत आये उन्होंने सामाजिक परिस्थितियों के अन्तर्गत मध्यकालीन भारतीय महिलाओं की स्थिति पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। इन विचारकों ने पाया कि भारतीय महिलाओं से किया जाने वाला व्यवहार पश्चिमी समाजों से सर्वथा भिन्न था। बर्नियर ने इस सन्दर्भ में भारत की क्रूरतम अमानवीय सती प्रथा का उदाहरण दिया है जो भारत के अतिरिक्त विश्व के किसी भी देश में नहीं थी।

पस्तु सती प्रथा के अतिरिक्त यूरोपीय लेखकों ने महिलाओं के सामाजिक जीवन के अन्य पक्षों पर भी अपना ध्यान केन्द्रित किया है। वे केवल घरों की चारदीवारी तक ही सीमित नहीं रहती थीं। कृषि तथा कृषि से सम्बन्धित कार्यों जैसे पशुपालन में उनके श्रम का महत्त्व था। व्यापारिक परिवारों की महिलाएँ व्यापारिक गतिविधियों में भागीदारी रखती थीं। कुछ महिलाएँ प्रशासनिक कार्यों में भी भाग लेती थीं।

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निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत के 10वीं से 17वीं सदी तक के इतिहास के पुनर्निर्माण में विदेशी यात्रियों के विवरणों का क्या योगदान है ? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
विदेशी यात्रियों के वृत्तान्त निश्चित रूप से इतिहास के निर्माण में सहायक होते हैं। यही स्थिति हम 10वीं से 17वीं शताब्दी के मध्य भी देखते हैं। इस काल में अनगिनत यात्री भारत आए तथा अपनी समझ के अनुसार भारत का विवरण प्रस्तुत किया। इस तथ्य को हम निम्न विन्दुओं के माध्यम से समझ सकते हैं-
(1) अधिकांश यात्री भिन्न-भिन्न देशों, भिन्न-भिन्न आर्थिक तथा सामाजिक परिदृश्य से आए थे।

(2) स्थानीय लेखक भारत की तत्कालीन परिस्थितियों का विवरण करने में रुचि नहीं रखते थे; जबकि इन विदेशी लेखकों ने भारत की तत्कालीन आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों पर विशेष विवरण दिए हैं।

(3) 10वीं शताब्दी के आस-पास भारतीय विद्वान विदेशों के साथ सम्बन्ध बनाने तथा उनके विषय में जानने .में अधिक रूचि नहीं रखते थे। इसके फलस्वरूप ये तुलनात्मक अध्ययन करने में असमर्थ थे।

(4) विदेशी यात्रियों ने अपने विवरण में उन तथ्यों को अधिक महत्त्व दिया है; जो उन्हें विचित्र जान पड़ते थे। इससे उनके विवरण में रोचकता आ जाती है।

(5) विदेशी यात्रियों के विवरण तत्कालीन राजदरबार के क्रियाकलापों, धार्मिक विश्वास तथा स्थापना की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालते हैं। इससे इतिहास निर्माण में अत्यधिक सहायता प्राप्त होती है। उपर्युक्त बिन्दुओं को हम पृथक्-पृथक् यारियों के विवरण के साथ समझ सकते हैं।

ये विवरण निम्नलिखित –
1. अल बिरूनी का विवरण अल-विरुनी का विवरण निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है –

  • अल-विरुनी ने अपनी रचनाओं में भारत में व्याप्त जाति-व्यवस्था तथा वर्ण व्यवस्था का वर्णन किया है।
  • अल बिरूनी ने भारतीय समाज की रूढ़िवादिता को भी अपनी किताबों में दर्शाया है।
  • अल बिरूनी ने भारत के ज्योतिष, खगोल विज्ञान तथा गणित की विस्तारपूर्वक चर्चा की है।

2. इब्नबतूता का विवरण इससे सम्बन्धित मुख्य बिन्दु निम्न प्रकार है –

  • इब्नबतूता ने भारतीय डाक प्रणाली की प्रशंसा की है तथा उससे हमें परिचित भी कराया।
  • इब्नबतूता की रचनाओं द्वारा हमें यह पता चलता है कि उस समय भारत में नारियल तथा पान की खेती का व्यापक प्रचलन था।
  • इब्नबतूता ने दासों का भी विस्तारपूर्वक विवरण दिया है; जिससे यह ज्ञात होता है कि तत्कालीन समाज तथा राजनैतिक व्यवस्था में दासों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
  • इब्नबतूता की रचनाओं में भारतीय बाजारों तथा व्यापारियों की सम्पन्नता का उल्लेख भी मिलता है। जिससे यह पता चलता है कि तत्कालीन भारत आर्थिक रूप से समृद्ध था।

3. बर्नियर का विवरण बर्नियर द्वारा रचित ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ में दिया गया विवरण निम्न बिन्दुओं द्वारा किया जा सकता है-

  • बर्नियर के अनुसार भारतीयों को निजी भू-स्वामित्व का अधिकार प्राप्त नहीं है।
  • बर्नियर की रचनाओं में सती प्रथा का विवरण मिलता है।
  • बर्नियर ने मुगल सेना के साथ कश्मीर यात्रा की थी तथा उस यात्रा का विस्तृत विवरण दिया है। उस विवरण से यह ज्ञात होता है कि उस समय यात्रा में किन सामानों की आवश्यकता होती थी। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि समकालीन यात्रियों के विवरण इतिहास को समझने तथा उसका निर्माण करने में अत्यधिक सहायक होते हैं।

प्रश्न 2.
अल बिरूनी के प्रारम्भिक जीवन का वर्णन करते हुए ‘किताब-उल-हिन्द’ की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
अल बिरूनी का प्रारम्भिक जीवन अल बिरूनी का जन्म आधुनिक उज्बेकिस्तान में स्थिता ख्वारिज्म में सन् 973 में हुआ था। ख्वारिज्म शिक्षा का एक प्रसिद्ध केन्द्र था। अल बिरूनी ने उस समय उपलब्ध सबसे अच्छी शिक्षा प्राप्त की। वह एक उच्च कोटि का विद्वान था तथा सीरियाई फारसी, हिब्रू और संस्कृत भाषाओं का ज्ञाता था। यद्यपि वह यूनानी भाषा का जानकार नहीं था, फिर भी वह प्लेटो तथा अन्य यूनानी दार्शनिकों की रचनाओं से परिचित था जिनका उसने अरबी अनुवादों के माध्यम से अध्ययन किया था। 1017 ई. में महमूद गजनवी ने ख्वारिज्म पर आक्रमण किया और यहाँ से कई विद्वानों तथा कवियों को अपने साथ अपनी राजधानी गजनी ले गया।

अल बिरुनी भी उनमें से एक था। वह एक बन्धक के रूप में गजनी आया था, परन्तु धीरे-धीरे उसकी गजनी शहर में रुचि बढ़ने लगी। उसने अपना शेष जीवन गजनी में ही बिताया। 70 वर्ष की आयु में गजनी में अल बिरुनी की मृत्यु हो गयी। भारत के प्रति रुचि बढ़ना-गजनी में रहते हुए अल- बिरनी की भारत के प्रति रुचि बढ़ने लगी। पंजाब को गलनी साम्राज्य में सम्मिलित करने के बाद स्थानीय लोगों से सम्पर्कों से आपसी विश्वास तथा समझ का वातावरण बना। अल-विरुनी ने ब्राह्मण पुरोहितों तथा विद्वानों के साथ कई वर्ष व्यतीत किए और संस्कृत, धर्म तथा दर्शन का ज्ञान प्राप्त किया।

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‘किताब-उल-हिन्द’ की विशेषताएं –
(1) विविध विषयों का विवेचन-किताब-उल- हिन्द अरबी में लिखी गई अल बिरूनी की प्रसिद्ध रचना है इसकी भाषा सरल और स्पष्ट है। यह एक विस्तृत ग्रन्थ है जिसमें धर्म और दर्शन, त्यौहारों, खगोल विज्ञान, कीमिया, रीति-रिवाजों तथा प्रथाओं, सामाजिक-जीवन, भार तौल, मापन विधियों, मूर्तिकला, कानून, मापतन्त्र विज्ञान आदि विषयों का विस्तृत विवेचन किया गया है। यह ग्रन्थ अस्सी अध्यायों में विभाजित है।

(2) विशिष्ट शैली अल-बिहनी ने प्रत्येक अध्याय में एक विशिष्ट शैली का प्रयोग किया है, जिसमें आरम्भ में एक प्रश्न होता था, फिर संस्कृतवादी परम्पराओं पर आधारित वर्णन था और अन्त में अन्य संस्कृतियों के साथ तुलना की गई थी। यह लगभग एक ज्यामितीय संरचना है।

(3) स्पष्टता तथा पूर्वानुमेयता यह ग्रन्थ अपनी स्पष्टता तथा पूर्वानुमेयता के लिए प्रसिद्ध है।

(4) भारतीय ग्रन्थों के अरबी भाषा में अनुवादों से परिचित अल बिरूनी ने सम्भवतः अपनी रचनाएँ भारतीय उपमहाद्वीप के सीमान्त क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए लिखी थीं। अल बिरुनी संस्कृत, पालि तथा प्राकृत ग्रन्थों के अरबी भाषा में अनुवादों तथा रूपान्तरणों से परिचित था।

(5) समालोचनात्मक दृष्टिकोण- इन ग्रन्थों की लेखन सामग्री तथा शैली के विषय में अल-बिरुनी का दृष्टिकोण समालोचनात्मक था और निश्चित रूप से वह उनमें सुधार करना चाहता था।

प्रश्न 3.
इब्नबतूता के प्रारम्भिक जीवन एवं उसकी यात्राओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इब्नबतूता का प्रारम्भिक जीवन इब्नबतूता मोरक्को का निवासी था उसका जन्म 1304 में तैंजियर नामक नगर के एक सम्मानित एवं शिक्षित परिवार में हुआ था। उसका परिवार इस्लामी कानून अथवा शरिया पर अपनी विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध था अपने परिवार की परम्परा के अनुसार इब्नबतूता ने कम आयु में ही साहित्यिक तथा शास्वारूढ़ शिक्षा प्राप्त की। उसका यात्रा वृत्तान्त ‘रिला’ के नाम से प्रसिद्ध है।

(1) इब्नबतूता की यात्राएँ – अन्य विदेशी यात्रियों के विपरीत, इब्नबतूता पुस्तकों के स्थान पर यात्राओं से प्राप्त अनुभव को ज्ञान का अधिक महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था। इब्नबतूता को यात्राएँ करने का बहुत शौक था इसलिए वह नए-नए देशों तथा लोगों के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए दूर-दूर के प्रदेशों तक में गया। 1332-33 ई. में भारत के लिए प्रस्थान करने से पहले वह मक्का की तीर्थ यात्राएँ और सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान तथा पूर्वी अफ्रीका के अनेक तटीय व्यापारिक बन्दरगाहों की यात्राएँ कर चुका था।

(2) भारत की यात्रा – मध्य एशिया के मार्ग से होते हुए इब्नबतूता 1333 ई. में स्थल मार्ग से सिन्ध पहुँचा। उसने दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के बारे में सुन रखा था कि वह कला और साहित्य का उदार संरक्षक है अतः उसकी ख्याति से आकर्षित हो इब्नबतूता ने मुल्तान और कच्छ होते हुए दिल्ली को ओर प्रस्थान किया। मुहम्मद बिन तुगलक इब्नबतूता की विद्वता से बड़ा प्रभावित हुआ और उसे दिल्ली का काजी अथवा न्यायाधीश नियुक्त किया। वह इस पद पर कई वर्ष तक रहा।

(3) चीन के राजदूत के रूप में इब्नबतूता की नियुक्ति 1342 ई. में इब्नबतूता को मंगोल शासक के पास सुल्तान के दूत के रूप में चीन जाने का आदेश दिया गया। उसने दिल्ली से चीन के लिए प्रस्थान किया और मध्य भारत के रास्ते मालाबार तट की ओर बढ़ा। मालाबार से वह मालद्वीप गया तथा वहाँ वह अठारह महीनों तक काजी के पद पर रहा। अन्ततः उसने लंका जाने का निश्चय किया। बाद में वह एक बार पुनः मालाबार तट तथा मालद्वीप गया। चीन जाने के अपने कार्य को पुनः शुरू करने से भा पहले वह बंगाल तथा असम भी गया।

प्रश्न 4.
लगभग 1500 ई. के बाद भारत की यात्रा करने वाले यूरोपीय लेखकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
लगभग 1500 ई. के बाद भारत की यात्रा करने वाले यूरोपीय लेखक लगभग 1500 ई. में भारत में पुर्तगालियों के आगमन के बाद उनमें से अनेक लोगों ने भारतीय सामाजिक रीति- रिवाजों तथा धार्मिक प्रथाओं के विषय में विस्तृत वृत्तान्त लिखे। जेसुइट राबट नोबिली भी एक ऐसा ही लेखक था जिसने भारतीय ग्रन्थों का यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद भी किया।

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(1) दुआतें बरबोसा- दुआर्ते बरबोसा यूरोप का एक प्रसिद्ध लेखक था जिसने दक्षिण भारत में व्यापार और समाज का एक विस्तृत विवरण लिखा 1600 ई. के बाद भारत में आने वाले डच अंग्रेज और फ्रांसीसी यात्रियों की संख्या बढ़ने लगी थी।

(2) फ्रांसिस्को पेलसर्ट-फ्रांसिस्को पेलसर्ट एक डच यात्री था जिसने सत्रहवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में उपमहाद्वीप की यात्रा की थी। वह यहाँ के लोगों में व्यापक गरीबी देखकर आश्चर्यचकित था। उसने कृषकों की अत्यन्त दयनीय दशा को मार्मिक चित्रण किया है।

(3) ज्यों-बैप्टिस्ट तैवर्नियर ज्यों-बैप्टिस्ट तैवर्नियर एक फ्रांसीसी जौहरी था जिसने कम से कम छः बार भारत की यात्रा की यह विशेष रूप से भारत की व्यापारिक स्थितियों से बहुत प्रभावित था। उसने भारत की तुलना ईरान और ओटोमन साम्राज्य से की।

(4) मनूकी मनूकी एक इतालवी चिकित्सक था। वह कभी भी यूरोप वापस नहीं गया और भारत में ही बस गया।

(5) फ्रांस्वा बर्नियर-फ्रांस का निवासी फ्रांस्वा बनियर एक चिकित्सक, राजनीतिक दार्शनिक तथा एक इतिहासकार था। वह अन्य लोगों की भांति मुगल साम्राज्य में अवसरों की तलाश में आया था। वह 1656 से 1668 तक भारत में बारह वर्ष तक रहा और मुगल दरबार से निकटता से जुड़ा रहा-पहले सम्राट शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह के चिकित्सक के रूप में तथा बाद में मुगल दरबार के एक आर्मीनियाई अमीर दानिशमंद खान के साथ एक बुद्धिजीवी तथा वैज्ञानिक के रूप में।

प्रश्न 5.
अल बिरुनी के यात्रा-वृत्तान्त का आलोचनात्मक वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अल बिरूनी का यात्रा वृत्तान्त अल बिरूनी एक उच्च कोटि का विद्वान था। वह भारत में कई वर्षों तक रहा। उसने ब्राह्मण पुरोहितों तथा विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताये और संस्कृत, धर्म तथा दर्शन का ज्ञान प्राप्त किया। अल बिरुनी की लेखन शैली की विशेषताएँ-अल- बिरुनी की लेखन शैली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित किया।

  1. अल बिरूनी ने लेखन में अरबी भाषा का प्रयोग
  2. उसने सम्भवतः अपनी कृतियाँ उपमहाद्वीप के सीमान्त क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए लिखी थीं।
  3. वह संस्कृत, पालि तथा प्राकृत ग्रन्थों के अरबी भाषा में अनुवादों तथा रूपान्तरणों से परिचित था।
  4. इन ग्रन्थों की लेखन सामग्री शैली के विषय में उसका दृष्टिकोण आलोचनात्मक था और निश्चित रूप से वह उनमें सुधार करना चाहता था।

अल बिरूनी द्वारा अपवित्रता की मान्यता को स्वीकार करना-यद्यपि अल बिरुनी जाति-व्यवस्था के सम्बन्ध में ब्राह्मणवादी व्याख्या को मानता था, फिर भी उसने अपवित्रता की मान्यता को अस्वीकार कर दिया। उसने लिखा कि प्रत्येक यह वस्तु जो अपवित्र हो जाती है, अपनी पवित्रता की मूल स्थिति को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करती है और सफल होती है। उसका कहना था कि जाति व्यवस्था में संलग्न अपवित्रता की अवधारणा प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी। भारत में प्रचलित वर्ण-व्यवस्था का विवरण अल- बिरूनी ने भारत में प्रचलित वर्ण व्यवस्था का उल्लेख अग्र प्रकार से किया है –

  • ब्राह्मण-ब्राह्मणों की जाति सबसे ऊँची थी। हिन्दू ग्रन्थों के अनुसार ब्राह्मण ब्रह्मन् के सिर से उत्पन्न हुए थे। हिन्दू ब्राह्मणों को मानव जाति में सबसे उत्तम मानते हैं।
  • क्षत्रिय अल-विरुनी के अनुसार ऐसी मान्यता थी कि क्षत्रिय ब्रह्मन् के कंधों और हाथों से उत्पन्न हुए थे। उनका दर्जा ब्राह्मणों से अधिक नीचा नहीं है।
  • वैश्य क्षत्रियों के बाद वैश्य आते हैं। वैश्य ब्रह्मन् की जंघाओं से उत्पन्न हुए थे।
  • शूद्र इनका जन्म ब्रह्मन् के चरणों से हुआ था।

अल बिरुनी के अनुसार अन्तिम दो वर्णों में अधिक अन्तर नहीं है। परन्तु इन वर्गों के बीच भिन्नता होने पर भी ये शहरों और गाँवों में मिल-जुलकर रहते हैं। जाति व्यवस्था के बारे में अल बिरूनी का विवरण संस्कृत ग्रन्थों पर आधारित होना जाति व्यवस्था के बारे में अल बिरुनी का विवरण संस्कृत ग्रन्थों के अध्ययन से पूर्णतया प्रभावित था। इन ग्रन्थों में ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से जाति व्यवस्था का संचालन करने वाले नियमों का प्रतिपादन किया गया था। परन्तु वास्तविक जीवन में यह व्यवस्था इतनी कठोर नहीं थी।

प्रश्न 6.
इब्नबतूता द्वारा किए गए दिल्ली तथा दौलताबाद के वर्णन प्रस्तुत कीजिए।
अथवा
इब्नबतूता द्वारा वर्णित दिल्ली का संक्षिप्त विवरण दीजिये।
अथवा
दिल्ली के विशेष संदर्भ में भारतीय नगरों के बारे में इब्नबतूता के वृत्तान्तों की व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
1. इब्नबतूता द्वारा किया गया दिल्ली का वर्णन –
(1) दिल्ली की बनावट इनवतृत के अनुसार दिल्ली बड़े क्षेत्र में फैला पनी जनसंख्या वाला शहर है। शहर के चारों ओर बनी प्राचीर अतुलनीय है दीवार की चौड़ाई ग्यारह हाथ (एक हाथ लगभग 20 इंच के बराबर) है और इसके भीतर रात्रि के पहरेदार तथा द्वारपालों के कक्ष हैं।

प्राचीरों के अन्दर खाद्य सामग्री, हथियार, बारूद, प्रक्षेपास्त्र तथा पेरेबन्दी में प्रयुक्त होने वाली मशीनों के संग्रह के लिए भंडार गृह बने हुए थे। प्राचीर में खिड़कियाँ बनी हैं जो शहर की ओर खुलती हैं तथा इन्हीं खिड़कियों के द्वारा प्रकाश भीतर आता है। प्राचीर का निचला भाग पत्थर से बना है तथा ऊपरी भाग ईंटों से निर्मित है।

(2) शहर के द्वार दिल्ली शहर के 28 द्वार हैं जिन्हें दरवाजा कहा जाता है और इनमें से बदायूँ दरवाजा सबसे विशाल है। मांडवी दरवाजे के भीतर एक अनाज मंडी है, गुल-दरवाजे की बगल में एक फलों का बगीचा है।

(3) कब्रगाह दिल्ली शहर में एक उत्तम कब्रगाह है, जिसमें बनी कब्रों के ऊपर गुम्बद बनाई गई है और गुम्बद विहीन कब्रों पर मेहराब बने हुए हैं। कब्रगाह में कदाकार चमेली तथा जंगली गुलाब जैसे फूल उगाए जाते हैं और फूल सभी ऋतुओं में खिले रहते हैं।

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2. इब्नबतूता द्वारा दौलताबाद का विवरण
(1) पुरुष और महिला गायकों का बाजार- इब्नबतूता के अनुसार दौलताबाद में पुरुष और महिला गायकों के लिए एक बाजार है, जिसे ‘तारामबाद’ कहते हैं यहाँ बहुत-सी दुकानें हैं और प्रत्येक दुकान में एक ऐसा दरवाजा है, जो मालिक के आवास में खुलता है। दुकानें कालीनों से सुसज्जित हैं और दुकान के मध्य में झूला है, जिस पर गायिका बैठती है।

(2) विशाल गुम्बद बाजार के मध्य में एक विशाल गुम्बद खड़ा है जिसमें कालीन बिछे हुए हैं और यह खूब सजाया गया है। इसमें प्रत्येक गुरुवार प्रातः काल की उपासना के बाद संगीतकारों के प्रमुख अपने सेवकों और दासों के साथ स्थान ग्रहण करते हैं। गायिकाएँ एक के बाद एक झुंडों में उनके समक्ष आकर सूर्यास्त का गीत गाती हैं और नृत्य करती हैं जिसके पश्चात् वे चले जाते हैं।

(3) मस्जिदें इब्नबतूता के अनुसार इस बाजार में इबादत के लिए मस्जिदें बनी हुई हैं जब भी कोई हिन्दू शासक इस बाजार से गुजरता था, वह गुम्बद में उत्तर कर आता था और गायिकाएँ उसके समक्ष गान प्रस्तुत करती थीं। यहाँ तक कि अनेक मुस्लिम शासक भी ऐसा ही करते थे।

प्रश्न 7.
इब्नबतूता द्वारा वर्णित भारत की डाक व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इब्नबतूता द्वारा वर्णित भारत की डाक व्यवस्था इब्नबतूता के अनुसार व्यापारियों को प्रोत्साहित करने के लिए राज्य विशेष उपाय करता था। लगभग सभी व्यापारिक मार्गों पर सराय तथा विश्राम गृह स्थापित किए गए थे। इब्नबतूता भारत की डाक व्यवस्था की कार्यकुशलता देखकर बड़ा चकित हुआ।

इससे व्यापारियों के लिए न केवल लम्बी दूरी तक सूचना भेजना और उधार भेजना सम्भव हुआ, बल्कि इससे अल्पसूचना पर माल भेजना भी आसान हो गया। इब्नबतूता के अनुसार डाक प्रणाली इतनी कुशल थी कि जहाँ सिन्ध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे, वहीं गुप्तचरों की सूचनाएं सुल्तान तक इस डाक व्यवस्था के द्वारा केवल पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं।

डाक व्यवस्था इब्नबतूता के अनुसार भारत में दो प्रकार की डाक व्यवस्था थी –
(1) अश्व डाक व्यवस्था तथा
(2) पैदल डाक व्यवस्था।
(1) अश्व डाक व्यवस्था अश्व डाक व्यवस्था को ‘उल्लुक’ कहा जाता था। यह हर चार मील की दूरी पर स्थापित राजकीय घोड़ों द्वारा चालित होती थी।
(2) पैदल डाक व्यवस्था पैदल डाक व्यवस्था में प्रति मील तीन चौकियाँ होती थीं, जिन्हें ‘दावा’ कहा जाता था। यह एक मील का एक तिहाई होता था। हर | तीन मील पर घनी आबादी वाला एक गाँव होता था, जिसके बाहर तीन मण्डप होते थे, जिनमें लोग कार्य शुरू करने के लिए तैयार बैठे रहते थे। उनमें से प्रत्येक के पास दो हाथ लम्बी एक छड़ी होती थी, जिसके ऊपर ताँबे की घंटियाँ लगी होती थीं।

जब सन्देशवाहक शहर से यात्रा आरम्भ करता था, तो एक हाथ में पत्र तथा दूसरे में घटियाँ वाली छड़ लिए वह यथाशक्ति तेज भागता था जब मंडप में बैठे लोग घंटियों की आवाज सुनते थे, तो तैयार हो जाते थे। जैसे ही सन्देशवाहक उनके निकट पहुँचता था, उनमें से एक पत्र ले लेता था और वह छड़ी हिलाते हुए पूरी शक्ति से दौड़ता था, जब तक वह अगले दावा तक नहीं पहुँच जाता। पत्र के अपने गन्तव्य स्थान तक पहुँचने तक यही प्रक्रिया चलती रहती थी यह पैदल डाक व्यवस्था अश्व डाक व्यवस्था से अधिक तीव्र होती थी। इसका प्रयोग प्रायः खुरासान के फलों के परिवहन के लिए होता था, जिन्हें भारत में बहुत पसन्द किया जाता था।

प्रश्न 8.
इब्नबतूता द्वारा वर्णित भारतीय यात्रा- वृत्तांत का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
इब्नबतूता का भारतीय यात्रा वृत्तांत इब्नबतूता के भारतीय यात्रा वृत्तांत का विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है –
(1) नारियल – इब्नबतूता के अनुसार नारियल एक अनोखा तथा विस्मयकारी वृक्ष था। यह खजूर के वृक्ष जैसा दिखता था। इन दोनों वृक्षों में एक ही अन्तर था-नारियल से काष्ठफल प्राप्त होता था तथा दूसरे से खजूर नारियल के वृक्ष का फल मानव सिर से मेल खाता था। लोग नारियल के रेशे से रस्सी बनाते थे।

(2) पान इब्नबतूता के अनुसार पान को अंगूर लता की तरह ही उगाया जाता था। पान का कोई वृक्ष नहीं होता था और इसे केवल इसकी पत्तियों के लिए ही उगाया जाता था। इसे
खाने से पहले सुपारी ली जाती थी। इसके छोटे- छोटे टुकड़ों को मुँह में रखकर चनाया जाता था। इसके बाद पान की पत्तियों के साथ इन्हें चबाया जाता था।

(3) भारतीय शहर इब्नबतूता के अनुसार भारतीय शहर घनी आबादी वाले तथा समृद्ध थे परन्तु कभी-कभी युद्धों तथा अभियानों के दौरान नष्ट हो जाते थे। अधिकांश शहरों में भीड़-भाड़ वाली सड़कें तथा चमक-दमक वाले और रंगीन बाजार थे। ये बाजार विभिन्न प्रकार की वस्तुओं से भरे रहते थे। इब्नबतूता के अनुसार दिल्ली बहुत अधिक आबादी वाला शहर था। वह भारत में सबसे बड़ा शहर था दौलताबाद (महाराष्ट्र में भी कम नहीं था तथा आकार में दिल्ली को चुनौती देता था।’ शहरों में वस्त्र उद्योग उन्नत अवस्था में था। विदेशों में भारतीय सूती कपड़े, महीन मलमल, रेशम, जरी तथा साटन की अत्यधिक मांग थी।

(4) डाक व्यवस्था इब्नबतूता के अनुसार भारतीय डाक प्रणाली इतनी कुशल थी कि जहाँ सिन्ध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे, वहीं गुप्तचरों की सूचनाएँ सुल्तान तक इस डाक व्यवस्था के द्वारा केवल पाँच दिनों में ही पहुँच जाती थीं। इब्नबतूता के अनुसार भारत में दो प्रकार की डाक व्यवस्था थी –

  • अश्व डाक व्यवस्था तथा
  • पैदल डाक व्यवस्था।

(5) महिलाएँ दासियाँ सती तथा अमिक- इब्नबतूता के अनुसार बाजारों में दास अन्य वस्तुओं की तरह खुले आम बेचे जाते थे और नियमित रूप से भेंट स्वरूप दिए जाते थे। दासों में विभेद – इब्नबतूता के अनुसार दासों में काफी विभेद था। सुल्तान की सेवा में कार्यरत कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं।

इसके अतिरिक्त सुल्तान अपने अमीरों पर नजर रखने के लिए दासियों को भी नियुक्त करता था। घरेलू श्रम के लिए दासों का प्रयोग इब्नबतूता के अनुसार दासों का प्रायः घरेलू श्रम के लिए प्रयोग किया जाता था। ये लोग पालकी या डोले में पुरुषों और महिलाओं को ले जाते थे। घरेलू श्रम के काम में लगे हुए दासों एवं दासियों की कीमत बहुत कम होती थी। अतः अधिकांश परिवार एक-दो दास तो रखते ही थे।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 9.
विदेशी यात्रियों द्वारा वर्णित भारतीय महिलाओं, दास-दासियों एवं सती प्रथा का विवरण प्रस्तुत कीजिये।
अथवा
इब्नबतूता एवं बर्नियर द्वारा वर्णित भारतीय महिलाओं, दास-दासियों एवं सती प्रथा का विवरण प्रस्तुत कीजिये।
उत्तर:
विदेशी यात्रियों द्वारा वर्णित दास- दासियों एवं सती प्रथा का विवरण –
(1) दास-दासियाँ – इब्नबतूता के अनुसार भारतीय बाजारों में दास अन्य वस्तुओं की भाँति खुले आम बेचे जाते थे और नियमित रूप से भेंटस्वरूप दिए जाते थे। सिन्ध पहुँचने पर इब्नबतूता ने सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के लिए भेंट स्वरूप घोड़े, ऊँट तथा दास खरीदे। मुल्तान पहुँचने पर उसने गवर्नर को किशमिश तथा बादाम के साथ एक दास और घोड़ा भेंट के रूप में दिए। इब्नबतूता के अनुसार मुहम्मद बिन तुगलक ने नसीरुदीन नामक धर्मोपदेशक के प्रवचन से प्रसन्न होकर उसे एक लाख टके तथा तथा दो सौ दास दिए थे।

(2) दासों में विभेद इब्नबतूता के अनुसार दासों में काफी विभेद था। सुल्तान की सेवा में कार्यरत कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं। इब्नबतूता सुल्तान की बहन की शादी के अवसर पर उनके प्रदर्शन से खूब आनन्दित हुआ।

(3) अमीरों की गतिविधियों की जानकारी के लिए दासियों की नियुक्ति इनवता के अनुसार सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक अपने अमीरों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए दासियों को नियुक्त करता था।

(4) दासों का घरेलू श्रम के लिए प्रयोग करना- इब्नबतूता के अनुसार दासों को सामान्यतः घरेलू श्रम के लिए ही प्रयुक्त किया जाता था। ये लोग पालकी या डोले में महिलाओं को ले जाते थे। दासों का मूल्य, विशेष रूप से उन दासियों का मूल्य, जिनका प्रयोग घरेलू श्रम के लिए किया जाता था, बहुत कम होता था। इसी वजह से अधिकांश परिवार कम से कम एक या दो दास तो रखते ही थे।

(5) सती प्रथा बर्नियर के अनुसार भारत में सती प्रथा प्रचलित थी। यद्यपि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से चिता में जल कर मर जाती थीं, परन्तु अनेक विधवाओं को मरने के लिए बाध्य किया जाता है। बर्नियर ने लाहौर में एक बारह वर्षीय विधवा की बलि का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “इस बालिका को उसकी इच्छा के विरुद्ध जीवित जला दिया था। यह बालिका काँपते हुए बुरी तरह रो रही थी परन्तु तीन या चार ब्राह्मणों तथा एक बूढ़ी महिला की सहायता से उस अनिच्छुक बालिका को जबरन चिता स्थल की ओर ले जाया गया, उसे लकड़ियों पर बिठाया गया और उसके हाथ तथा पैर बाँध दिए गए ताकि वह भाग न जाए। इस प्रकार इस निर्दोष बालिका को जीवित जला दिया गया।”

प्रश्न 10.
“बर्नियर के विवरणों ने अठारहवीं शताब्दी से पश्चिमी विचारकों को प्रभावित किया।” विवेचना कीजिए।
उत्तर:
बर्नियर के विवरणों द्वारा पश्चिमी विचारकों को प्रभावित करना बर्नियर के विवरणों ने अठारहवीं शताब्दी से निम्नलिखित पश्चिमी विचारकों को प्रभावित किया –

(1) मान्टेस्क्यू-फ्रांस का प्रसिद्ध दार्शनिक मान्टेस्क्यू बर्नियर के विवरणों से बड़ा प्रभावित हुआ। उसने बर्नियर के वृत्तांत का प्रयोग प्राच्य निरंकुशवाद के सिद्धान्त को विकसित करने में किया। इस सिद्धान्त के अनुसार एशिया (प्राच्य अथवा पूर्व) में शासक अपनी प्रजा के ऊपर असीम प्रभुत्व का उपभोग करते थे तथा प्रजा को दासता तथा गरीबी की स्थितियों में रखा जाता था। इस तर्क का आधार यह था कि सम्पूर्ण भूमि पर राजा का स्वामित्व होता था तथा निजी सम्पत्ति अस्तित्व में नहीं थी। इस दृष्टिकोण के अनुसार राजा और उनके अमीर वर्ग को छोड़कर प्रत्येक व्यक्ति कठिनाई से गुजारा कर पाता था।

(2) कार्ल मार्क्स प्रसिद्ध साम्यवादी विचारक कार्ल मार्क्स भी बर्नियर के विवरणों से प्रभावित हुआ। उसने उन्नीसवीं सदी के इस विचार को एशियाई उत्पादन शैली के सिद्धान्त के रूप में और आगे बढ़ाया। उसने यह तर्क प्रस्तुत किया कि भारत तथा अन्य एशियाई देशों में उपनिवेशवाद से पहले राज्य अधिशेष का अधिग्रहण कर लेता था। इसके फलस्वरूप एक ऐसे समाज का प्रादुर्भाव हुआ जो काफी स्वायत्त तथा आन्तरिक से समताण से बना था। इन ग्रामीण समुदायों पर से ( का नियन्त्रण होता था। जब तक अधिशेष की आपूर्ति निरन्तर जारी रहती थी इनकी स्वायत्तता का सम्मान किया जाता था। यह एक निष्क्रिय प्रणाली मानी जाती थी।

ग्रामीण समाज का चित्रण सच्चाई से दूर होना- परन्तु ग्रामीण समाज का यह चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी में ग्रामीण समाज में चारित्रिक रूप से बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था। एक ओर बड़े जमींदार थे जो भूमि पर उच्चाधिकारों का उपभोग करते थे और दूसरी ओर ‘अस्पृश्य’ भूमिविहीन श्रमिक इन दोनों के बीच में बड़ा किसान था जो किराए के श्रम का प्रयोग करता था और माल उत्पादन में जुटा रहता था। इसके साथ ही कुछ छोटे किसान भी थे जो कठिनाई से ही अपने गुजारे योग्य उत्पादन कर पाते थे।

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प्रश्न 11.
फ्रांस्वा बर्नियर द्वारा की गई ‘पूर्व और पश्चिम की तुलना को उल्लेखित कीजिए।
अथवा
बर्नियर द्वारा वर्णित भारतीय यात्रा वृत्तान्त का विवेचन कीजिए।
अथवा
“बर्नियर का ग्रन्थ ‘ट्रेवल्स इन मुगल एम्पायर अपने गहन प्रेक्षण, आलोचनात्मक अन्तर्दृष्टि तथा गहन चिन्तन के लिए उल्लेखनीय है।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
(1) फ्रांस्वा बर्नियर द्वारा की गई ‘पूर्व और पश्चिम’ की तुलना बर्नियर प्राय: भारत में जो देखता था, उसकी तुलना यूरोपीय स्थिति से करता था। वह यूरोपीय रा संस्कृति की श्रेष्ठता का प्रबल समर्थक था यूरोपीय स्थितियों के मुकाबले में वह भारत की स्थितियों को दयनीय दर्शाना चाहता था। यही कारण है कि लगभग प्रत्येक दृष्टान्त में बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की अ तुलना में दयनीय बताया।

(2) भूमि स्वामित्व का प्रश्न बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच मूल भिन्नताओं में से एक भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव था। बर्नियर के अनुसार भूमि = पर राजकीय स्वामित्व राज्य तथा उसके निवासियों, दोनों के लिए हानिकारक था। उसका विचार था कि मुगल साम्राज्य में सम्राट समस्त भूमि का स्वामी था जो इसे अपने अमीरों में बांटता था। इसके अर्थव्यवस्था और समाज दोनों के लिए विनाशकारी परिणाम होते थे।

(3) किसानों की दयनीय दशा-बर्नियर के अनुसार ग्रामीण अंचलों में रहने वाले कृषकों की दशा बड़ी दयनीय थी। यहाँ की खेती अच्छी नहीं थी और श्रमिकों के अभाव में कृषि योग्य भूमि का एक बड़ा भाग भी कृषि -विहीन रह जाता था। कई श्रमिक गवर्नरों के द्वारा किए गए अत्याचारों के कारण मौत के मुंह में चले जाते थे। अपने स्वामियों की माँगों को पूरा न करने के कारण अनेक किसानों को उनके गुजारा करने के साधनों से वंचित कर दिया जाता था तथा उनके बच्चों को दास बना लिया जाता था।

(4) मुगल साम्राज्य का स्वरूप- बर्नियर के अनुसार मुगल साम्राज्य का राजा ‘भिखारियों और क्रूर लोगों का राजा था। मुगल राज्य के शहर और नगर विनष्ट तथा ‘खराब वायु’ से दूषित थे और इसके खेत ‘झाड़ीदार’ तथा ‘घातक दलदल से भरे हुए थे। इसका मात्र एक ही कारण था राजकीय भू-स्वामित्व।

(5) एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई एक ओर वर्नियर कहता है कि भारतीय शिल्पकारों के पास अपने उत्पादों के विस्तार के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं था क्योंकि समस्त लाभ राज्य के खजाने में चला जाता था। इसलिए उत्पादन सर्वत्र पतनोन्मुख था परन्तु इसके साथ ही बर्नियर यह भी स्वीकार करता है कि सम्पूर्ण विश्व से बड़ी माश में बहुमूल्य धातुएँ भारत में आती थीं क्योंकि उत्पादों का सोने और चाँदी के बदले निर्यात होता था. भारत में एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय भी था।

(6) भारतीय शहर बर्नियर के अनुसार मुगलकालीन शहर ‘शिविर नगर’ थे। शिविर नगरों से उसका अभिप्राय उन नगरों से था, जो अपने अस्तित्व और बने रहने के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर थे उसका विचार था कि ये नगर राजकीय दरबार के आगमन के साथ अस्तित्व में आते थे और इसके अन्यत्र चले जाने के बाद तेजी से विलुप्त हो जाते थे।

(7) व्यावसायिक वर्ग अन्य शहरी समूहों में व्यावसायिक वर्ग जैसे चिकित्सक (हकीम एवं वैद्य), अध्यापक (पंडित या मुल्ला), अधिवक्ता (वकील), चित्रकार, वास्तुविद् संगीतकार, सुलेखक आदि सम्मिलित थे।

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प्रश्न 12.
इब्नबतूता और अल बिरूनी के भारत यात्रा-वृत्तान्तों की तुलना कीजिए।
उत्तर:
इब्नबतूता और अल बिरूनी के भारत यात्रा वृत्तान्तों की तुलना इब्नबतूता तथा अल बिरुनी के भारत यात्रा वृत्तान्तों की तुलना निम्न प्रकार से की जा सकती है-

(1) भिन्न-भिन्न कालों से सम्बन्धित यात्रा वृत्तान्त- अल बिरुनी का या वृत्तान्त ग्यारहवीं शताब्दी के भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन से सम्बन्धित है, जबकि इब्नबतूता का यात्रा-वृत्तान्त चौदहवीं शताब्दी के भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन से सम्बन्धित है।

(2) विषय अल बिरूनी ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘किताब-उल-हिन्द’ में भारतीय धर्म और दर्शन, त्योहारों, खगोल विज्ञान, रीति-रिवाज तथा प्रथाओं, सामाजिक जीवन, 7 भार तौल तथा मापन विधियों, मूर्तिकला, कानून, मापतन्त्र विज्ञान आदि विषयों का विवेचन किया है। इब्नबतूता ने न अपनी प्रसिद्ध रचना ‘रिहला’ में भारतीय सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन, डाक व्यवस्था, भारतीय शहरों, बाजारों नारियल तथा पान, दास-दासियों, सती प्रथा, भारत की बा जलवायु लोगों के रहन-सहन, वेशभूषा, कृषि व्यापार आदि न विषयों का विवेचन किया है।

(3) भारतीय लोगों के धर्म, दर्शन और विज्ञान के के बारे में वर्णन करना अल बिरुनी संस्कृत भाषा का था। उसने यहाँ के लोगों के दर्शन, धर्म, विज्ञान और ना विचारों के ग्रन्थों का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। उसके द्वारा वर्णित भारत की जाति व्यवस्था का वर्णन उसके संस्कृत ग्रन्थों के अध्ययन से पूर्णतया प्रभावित था। परन्तु से इब्नबतूता संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं, यहाँ के क रीति-रिवाजों, दर्शन आदि से अपरिचित थे।

(4) साहित्यिक ग्रन्थों एवं यात्राओं से अर्जित अनुभव को महत्त्वपूर्ण स्रोत मानना अल बिरूनी न साहित्यिक ग्रन्थों से प्राप्त अनुभव को ज्ञान का अधिक वाय महत्त्वपूर्ण खोत मानता था, परन्तु इब्नबतूता साहित्यिक नए ग्रन्थों के स्थान पर चाशओं से अर्जित अनुभव को महत्त्वपूर्ण नगर स्त्रोत मानता था।

(5) उद्देश्य अल बिरुनी के बाश-वृत्तान्त के उद्देश्य ये –

  • उन लोगों के लिए सहायक जो हिन्दुओं से धार्मिक विषयों पर चर्चा करना चाहते थे तथा
  • ऐसे लोगों के लिए एक सूचना का संग्रह जो उनके साथ सम्बद्ध होना चाहते थे इब्नबतूता के भारत यात्रा के वृत्तान्त का उद्देश्य अपरिचित वस्तुओं, राज्यों, घटनाओं आदि से अपने देशवासियों को परिचित कराना था। वह चाहता था कि श्रोता अथवा पाठक सुदूर देशों के वृत्तान्तों से पूरी तरह से प्रभावित हो सकें। इसी कारण इब्नबतूता ने पान और नारियल डाक- व्यवस्था, भारतीय शहरों के वैभव आदि के बारे में विस्तार से लिखा।

प्रश्न 13.
एक ओर बर्नियर ने भारतीय समाज को दरिद्र लोगों के समरूप जनसमूह से निर्मित वर्णित किया है, तो दूसरी ओर उसने एक अधिक सामाजिक आर्थिक सच्चाई को भी उजागर किया है। विवेचना कीजिये।
उत्तर:
भारतीय समाज दरिद्र लोगों के जनसमूह के रूप में बर्नियर ने भारतीय समाज को दरिद्र लोगों के जनसमूह के रूप में दर्शाते हुए लिखा है कि भारत के बड़े ग्रामीण अंचलों में से कई अंचल रेतीली भूमियाँ या बंजर पर्वत है। यहाँ की खेती भी अच्छी नहीं है प्रान्तीय गवर्नरों के अत्याचारों के कारण अनेक गरीब मजदूर मर जाते हैं। जब गरीब लोग अपने भू-स्वामियों की मांगों को पूरा नहीं कर पाते, तो उन्हें न केवल जीवन निर्वहन के साधनों से वंचित कर दिया जाता है, बल्कि उनके बच्चों को दास भी बना लिया जाता है। विवश होकर बहुत से गरीब किसान गाँव छोड़कर चले जाते हैं।

(1) बहुमूल्य धातुओं का भारत में आना एक अधिक जटिल सामाजिक और आर्थिक सच्चाई को दर्शाना- दूसरी ओर बर्नियर भारत में व्याप्त एक अधिक प्रसिद्ध सामाजिक और आर्थिक सच्चाई को दर्शाते हुए लिखता है कि शिल्पकारों के पास अपने उत्पादों को उत्तम बनाने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं था, क्योंकि सारा मुनाफा राज्य को होता था फिर भी सम्पूर्ण विश्व से बड़ी मात्रा में बहुमूल्य धातुएँ भारत में आती थीं क्योंकि उत्पादों का सोने और चाँदी के बदले निर्यात होता था। इससे देश में सोना और चाँदी इकट्ठा होता था। बर्नियर के अनुसार भारत में एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय का भी अस्तित्व था जो लम्बी दूरी के विनिमय में संलग्न था।

(2) उपजाऊ भूमि और उन्नत शिल्प-बर्नियर ने लिखा है कि भारत का एक बड़ा भू-भाग अत्यन्त उपजाऊ है। बंगाल मित्र से न केवल चावल, मकई तथा जीवन की अन्य आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन में बल्कि रेशम कपास, नील आदि के उत्पादन में भी आगे है भारत के अनेक हिस्सों में खेती अच्छी होती है। यहाँ के शिल्पकार अनेक | वस्तुओं के उत्पादन में संलग्न रहते हैं। ये शिल्पकार गलीचों, जरी कसीदाकारी, कढ़ाई, सोने और चांदी के वस्त्रों तथा विभिन्न प्रकार के रेशम और सूती वस्त्रों के निर्माण का कार्य करते हैं। रेशमी तथा सूती वस्त्रों का प्रयोग केवल भारत में ही नहीं होता, अपितु ये विदेशों में भी निर्यात किये जाते हैं।

(3) भारत में सोना और चाँदी का संग्रह होना- बर्नियर ने यह भी लिखा है कि सम्पूर्ण विश्व के सभी भागों में संचलन के बाद सोना और चाँदी का भारत में आकर कुछ सीमा तक संग्रह हो जाता है।

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प्रश्न 14.
अल बिरूनी ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था की अपवित्रता की मान्यता को क्यों अस्वीकार कर दिया? क्या जाति व्यवस्था के नियमों का पालन पूर्ण कठोरता से किया जाता था? अल बिरूनी ने भारत की वर्ण व्यवस्था का वर्णन किस प्रकार किया है?
उत्तर:
यद्यपि अल – विरुनी ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था में ब्राह्मणों द्वारा निर्मित जाति व्यवस्था को स्वीकार किया और उसकी मान्यता के लिए अन्य देशों के समुदायों में इस व्यवस्था के प्रतिरूपों के उदाहरणों को भी प्रस्तुत किया, फिर भी वह अपवित्रता की मान्यता को स्वीकार न कर अल बिरुनी ने लिखा है कि, “हर वह वस्तु जो अपवित्र हो जाती है, अपनी खोई हुई पवित्रता को पुनः पाने का प्रयास करती है और सफल होती है सूर्य हवा को स्वच्छ करता है और समुद्र में नमक पानी को गन्दा होने से बचाता है।” अल-विरुनी जोर देकर कहता है कि यदि ऐसा नहीं होता तो पृथ्वी पर जीवन असम्भव हो जाता। उसके अनुसार अपवित्रता की अवधारणा प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है।

अल बिरूनी ने जाति व्यवस्था के सम्बन्ध में जो भी विवरण दिया है; वह पूर्णतया संस्कृत ग्रन्थों के अध्ययन से प्रभावित है। जिन नियमों का वर्णन इन ग्रन्थों में ब्राह्मणवादी जाति-व्यवस्था को संचालित करने हेतु किया गया है; वह वास्तविक रूप में समाज में उतनी कठोरता से लागू नहीं थी। इनमें लचीलापन था उदाहरण हेतु परित्यक्त लोग जिन्हें अंत्यज कहते थे जो इस जाति व्यवस्था में शामिल नहीं थे, आर्थिक तन्त्र में उन्हें भी शामिल किया गया था। भले ही उनसे सस्ता श्रम प्राप्त करने के लिए ऐसा किया जाता हो।
अल- विरुनी की भारत की सामाजिक व्यवस्था की जानकारी प्राचीन भारतीय संस्कृत ग्रन्थों पर आधारित थी।

इसी आधार पर अल बिरूनी ने भारत की वर्ण व्यवस्था का वर्णन निम्न प्रकार से किया है –

  • ब्राह्मण अल बिरूनी लिखता है कि ब्राह्मण सबसे सर्वोच्च वर्ण था क्योंकि हिन्दू ग्रन्थों की मान्यताओं के अनुसार इनकी उत्पत्ति आदि देव ब्रह्मा के मुख से हुई और मुख का स्थान सबसे उच्च है; इसी कारण हिन्दू जाति में से सबसे उच्च माने जाते हैं।
  • क्षत्रिय क्षत्रियों की उत्पत्ति आदि देव ब्रह्मा के कन्धों व हाथों से मानी गई है। मुख के बाद द्वितीय स्थान कन्धों व याँहों का है अतः उन्हें वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मणों से कुछ नीचे द्वितीय स्थान पर रखा गया।
  • वैश्य वैश्य वर्ण की उत्पत्ति ब्रह्मा के उदर व जंघा भाग से मानी गई इसलिए इन्हें तीसरे स्थान पर रखा गया।
  • शूद्र-शूद्र वर्ण की उत्पत्ति ब्रह्मा के चरणों से मानी गयी है, अतः वैश्य और शूद्रों के बीच अल बिरुनी अधिक अन्तर नहीं मानता था। अल बिरुनी के अनुसार, यद्यपि वर्ग-भेद तो था फिर भी सभी लोग एक साथ एक ही शहर या गांव में समरसता के साथ रहते थे।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

Jharkhand Board JAC Class 12 History Important Questions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Important Questions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

1. साँची का स्तूप किस राज्य में स्थित है –
(अ) उत्तर प्रदेश
(स) मध्य प्रदेश
(ब) बिहार
(द) गुजरात
उत्तर:
(स) मध्य प्रदेश

2. ऋग्वेद का संकलन कब किया गया?
(अ) 2500-2000 ई. पूर्व
(ब) 2000-1500 ई. पूर्व
(स) 1000-500 ई. पूर्व
(द) 1500 से 1000 ई. पूर्व
उत्तर:
(द) 1500 से 1000 ई. पूर्व

3. महावीर स्वामी से पहले कितने शिक्षक (तीर्थंकर) हो चुके थे?
(अ) 24
(स) 14
(ब) 20
(द) 23
उत्तर:
(द) 23

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4. बौद्धसंघ में सम्मिलित होने वाली प्रथम भिक्षुणी थी –
(अ) महामाया
(ब) पुन्ना
(स) महाप्रजापति गोतमी
(द) सुलक्षणी
उत्तर:
(स) महाप्रजापति गोतमी

5. जिन ग्रन्थों में बुद्ध की शिक्षाओं का संकलन किया गया है, उन्हें कहा जाता है –
(अ) बौद्धग्रन्थ
(स) महावंश
(ब) दीपवंश
(द) त्रिपिटक
उत्तर:
(द) त्रिपिटक

6. किस ग्रन्थ में बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए नियम संकलित किए गए हैं?
(अ) अभिधम्मपिटक
(ब) विनयपिटक
(स) सुत्तपिटक
(द) बुद्धचरित
उत्तर:
(ब) विनयपिटक

7. अमरावती के स्तूप की खोज सर्वप्रथम कब हुई ?
(अ) 1896
(ब) 1796
(स) 1717
(द) 1817
उत्तर:
(ब) 1796

8. साँची की खोज कब हुई?
(अ) 1818 ई.
(ब) 1718 ई.
(स) 1918 ई.
(द) 1878 ई.
उत्तर:
(अ) 1818 ई.

9. किस अंग्रेज लेखक ने साँची पर लिखे अपने महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों को सुल्तान जहाँ बेगम को समर्पित किया?
(अ) जेम्स टॉड
(ब) जॉर्ज थॉमस
(स) जॉन मार्शल
(द) जरथुस्व
उत्तर:
(स) जॉन मार्शल

10. किस दार्शनिक का सम्बन्ध चूनान से है?
(अ) सुकरात
(ख) खुंगत्सी
(स) बुद्ध
(द) कनिंघम
उत्तर:
(अ) सुकरात

11. समकालीन बौद्ध ग्रन्थों में हमें कितने सम्प्रदायों या चिन्तन परम्पराओं की जानकारी मिलती है?
(अ) 10
(स) 94
(ब) 24
(द) 64
उत्तर:
(द) 64

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12. किस देश से दीपवंश एवं महावंश जैसे क्षेत्र विशेष के बौद्ध इतिहास का सम्बन्ध है-
(अ) भारत
(स) चीन
(ब) नेपाल
(द) श्रीलंका
उत्तर:
(द) श्रीलंका

13. त्रिपिटक की रचना कब हुई थी?
(अ) बुद्ध के जन्म से पूर्व
(ब) बुद्ध के महापरिनिर्वाण प्राप्त करने के पश्चात्
(स) बुद्ध के जीवन काल में
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ब) बुद्ध के महापरिनिर्वाण प्राप्त करने के पश्चात्

14. महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का संकलन निम्नलिखित में से किसमें है?
(अ) सुत्तपिटक
(ब) विनय पिटक
(स) जातक
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) सुत्तपिटक

15. महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था –
(अ) कपिलवस्तु
(ब) लुम्बिनी
(स) सारनाथ
(द) बोधगया
उत्तर:
(ब) लुम्बिनी

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए।

1. भोपाल की नवाब शाहजहाँ बेगम की आत्मकथा ………….. है।
2. शाहजहाँ बेगम की उत्तराधिकारी ……………. थीं।
3. ………… और …………… जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा किया करते थे।
4. महात्मा बुद्ध के दर्शन से जुड़े विषय …………. पिटक में आए।
5. ज्यादातर पुराने बौद्ध ग्रन्थ …………… भाषा में हैं।
6. बौद्ध धर्म के पूर्व एशिया में फैलने के पश्चात् …………. और ………… जैसे तीर्थयात्री बौद्ध ग्रन्थों की खोज में चीन से भारत आए।
7. वे महापुरुष जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं उन्हें …………….. कहते हैं।
उत्तर:
1. ताज-उल- इकबाल
2. सुल्तान जहाँ बेगम
3. राजसूय, अश्वमेध
4. अभिधम्म
5. पालि
6. फा- शिएन, श्वैन त्सांग
7. तीर्थंकर

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
महात्मा बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश कहाँ दिया?
उत्तर:
महात्मा बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ में दिया।

प्रश्न 2.
जैन दर्शन की सबसे महत्त्वपूर्ण अवधारणा क्या है?
उत्तर:
जैन दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण संसार प्राणवान है

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प्रश्न 3.
मन्दिर स्थापत्य कला में गर्भगृह एवं शिखर से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
(1) गर्भगृह- मन्दिर का चौकोर कमरा
(2) शिखर- गर्भगृह के ऊपर ढाँचा।

प्रश्न 4.
बौद्ध संघ की संचालन पद्धति को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
बौद्ध संघ की संचालन पद्धति गणों और संघों की परम्परा पर आधारित थी। लोग बातचीत के द्वारा एकमत होते थे।

प्रश्न 5.
बुद्ध के जीवन से जुड़े बोधगया एवं सारनाथ नामक स्थानों का महत्त्व बताइये।
उत्तर:
(1) बोधगया में. बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया था।
(2) सारनाथ में बुद्ध ने प्रथम उपदेश दिया था।

प्रश्न 6.
यदि आप भोपाल की यात्रा करेंगे, तो वहाँ किस बौद्धकालीन स्तूप को देखना चाहेंगे?
उत्तर:
साँची के स्तूप को।

प्रश्न 7.
महात्मा बुद्ध का बचपन का नाम क्या था?
उत्तर:
सिद्धार्थ

प्रश्न 8.
साँची का स्तूप कहाँ स्थित है?
उत्तर:
साँची का स्तूप मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 20 मील उत्तर-पूर्व में स्थित साँची कनखेड़ा नामक एक गाँव में स्थित है।

प्रश्न 9.
थेरीगाथा बौद्ध ग्रन्थ किस पिटक का हिस्सा है?
उत्तर:
सुत्तपिटक।

प्रश्न 10.
कैलाशनाथ मन्दिर कहाँ स्थित है?
उत्तर:
महाराष्ट्र में।

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प्रश्न 11.
महावीर स्वामी का बचपन का नाम क्या
उत्तर:
वर्धमान।

प्रश्न 12.
ऐसे तीन स्थानों का उल्लेख कीजिये, जहाँ स्तूप बनाए गए थे।
उत्तर:
(1) भरहुत
(2) साँची
(3) अमरावती।

प्रश्न 13.
साँची के स्तूप को आर्थिक अनुदान देने वाले दो शासकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) शाहजहाँ बेगम
(2) सुल्तानजहाँ बेगम।

प्रश्न 14.
बुद्ध की शिक्षाएँ किन ग्रन्थों में संकलित हैं?
उत्तर:
त्रिपिटक में

प्रश्न 15.
साँची के स्तूप को किसने संरक्षण प्रदान किया?
उत्तर:
साँची के स्तूप को भोपाल के शासकों ने संरक्षण प्रदान किया जिनमें शाहजहाँ बेगम एवं सुल्तानजहाँ बेगम प्रमुख हैं।

प्रश्न 16.
“इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है।” यह कथन किस पुरातत्त्ववेत्ता का है?
उत्तर:
एच. एच. कोल।

प्रश्न 17.
ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी का काल विश्व इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ क्यों माना जाता है ?
उत्तर:
क्योंकि इस काल में ईरान में जरस्थुस्व, चीन में खुंगस्ती, यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तू एवं भारत में महावीर व बुद्ध जैसे चिन्तकों का उदय हुआ।

प्रश्न 18.
अजन्ता की गुफाएँ कहाँ स्थित हैं?
उत्तर:
महाराष्ट्र में

प्रश्न 19.
पौराणिक हिन्दू धर्म में किन दो प्रमुख देवताओं की पूजा प्रचलित थी?
उत्तर:
(1) विष्णु
(2) शिव।

प्रश्न 20.
सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाओं का निर्माण किस शासक ने करवाया था ?
उत्तर:
अशोक ने आजीविक सम्प्रदाय के सन्तों हेतु निर्माण करवाया था।

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प्रश्न 21.
धेरी का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
थेरी का अर्थ है ऐसी महिलाएँ जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया हो।

प्रश्न 22.
बौद्ध धर्म की दो शिक्षाएँ बताइये।
उत्तर:
(1) विश्व अनित्य है।
(2) यह संसार दुःखों का घर है।

प्रश्न 23.
जैन धर्म की दो शिक्षाएँ बताइये।
उत्तर:
(1) जीवों के प्रति अहिंसा
(2) कर्मवाद और पुनर्जन्म में विश्वास।

प्रश्न 24.
बौद्ध संघ में सम्मिलित होने वाली प्रथम महिला कौन थी?
उत्तर:
बुद्ध की उपमाता महाप्रजापति गोतमी।

प्रश्न 25.
जैन धर्म के महापुरुष क्या कहलाते थे?
उत्तर:
तीर्थंकर।

प्रश्न 26.
जैन धर्म के 23वें तीर्थकर कौन थे?
उत्तर:
पार्श्वनाथ

प्रश्न 27.
जैन दर्शन की सबसे महत्त्वपूर्ण अवधारणा क्या है?
उत्तर:
जैन दर्शन की सबसे महत्त्वपूर्ण अवधारणा यह है कि सम्पूर्ण विश्व प्राणवान है।

प्रश्न 28.
राजसूय एवं अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किनके द्वारा कराया जाता था ?
उत्तर:
ब्राह्मण पुरोहितों द्वारा

प्रश्न 29.
समकालीन बौद्ध ग्रन्थों में कितने सम्प्रदायों एवं चिन्तन परम्पराओं का उल्लेख मिलता है?
उत्तर:
64 सम्प्रदाय या चिन्तन परम्पराओं का।

प्रश्न 30.
कुटागारशालाओं का शाब्दिक अर्थ बताइये।
उत्तर:
नुकीली छत वाली झोंपड़ी।

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प्रश्न 31.
शिक्षक अपने दार्शनिक विचारों की चर्चा कहाँ करते थे?
उत्तर:
कुटागारशालाओं या उपवनों में।

प्रश्न 32.
महावीर स्वामी तथा बुद्ध ने किसका विरोध किया?
उत्तर:
वेदों के प्रभुत्व का।

प्रश्न 33.
चीनी यात्री फा-शिएन तथा श्वैन-त्सांग ने भारत की यात्रा क्यों की?
उत्तर:
बौद्ध ग्रन्थों की खोज के लिए।

प्रश्न 34.
प्रमुख नियतिवादी बौद्ध भिक्षु कौन थे?
उत्तर:
मक्खलि गोसाल।

प्रश्न 35.
प्रमुख भौतिकवादी बौद्ध दार्शनिक कौन थे?
उत्तर:
अजीत केसकम्बलिन।

प्रश्न 36.
महावीर स्वामी से पहले कितने तीर्थकर हो चुके थे?
उत्तर:
231

प्रश्न 37.
अमरावती के स्तूप की खोज कब हुई ?
उत्तर:
1796 ई. में

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प्रश्न 38.
विष्णु के कितने अवतारों की कल्पना की गई ?
उत्तर:
दस अवतारों की।

प्रश्न 39.
बराबर (बिहार) की गुफाओं का निर्माण किसने करवाया था ?
उत्तर:
अशोक ने।

प्रश्न 40.
अशोक ने किस सम्प्रदाय के सन्तों के लिए बराबर की गुफाओं का निर्माण करवाया था?
उत्तर:
आजीविक सम्प्रदाय के सन्तों के लिए।

प्रश्न 41.
कैलाशनाथ के मन्दिर कहाँ स्थित हैं?
उत्तर:
एलोरा (महाराष्ट्र) में।

प्रश्न 42.
कैलाशनाथ के मन्दिर का निर्माण कब करवाया गया था?
उत्तर:
आठवीं शताब्दी में।

प्रश्न 43.
यूनानी शैली से प्रभावित मूर्तियाँ किन क्षेत्रों से प्राप्त हुई हैं?
उत्तर:
तक्षशिला और पेशावर से।

प्रश्न 44.
प्रतीकों द्वारा बुद्ध की स्थिति किस प्रकार दिखाई जाती है? दो उदाहरण दीजिये।
उत्तर:
बुद्ध के ‘अध्यान की दशा’ को ‘रिक्त स्थान’ तथा ‘महापरिनिर्वाण’ को ‘स्तूप’ के द्वारा दिखाया जाता है।

प्रश्न 45.
ऐसे चार सामाजिक समूहों के नाम बताइये जिनमें से बुद्ध के अनुयायी आए।
उत्तर:
(1) राजा
(2) धनवान
(3) गृहपति तथा
(4) सामान्य जन

प्रश्न 46.
बुद्ध द्वारा गृह त्याग के क्या कारण थे?
उत्तर:
नगर का भ्रमण करते समय एक वृद्ध व्यक्ति, एक रोगी, एक लाश और संन्यासी को देख कर बुद्ध ने घर त्याग दिया।

प्रश्न 47.
लुम्बिनी एवं कुशीनगर नामक स्थानों का महत्त्व बताइये।
उत्तर:
लुम्बिनी में बुद्ध का जन्म हुआ। कुशीनगर में बुद्ध ने निर्वाण प्राप्त किया। ये बौद्ध धर्म के पवित्र स्थान हैं।

प्रश्न 48.
जैन धर्म के अनुसार कर्मफल से मुक्ति कैसे पाई जा सकती है ?
उत्तर:
त्याग और तपस्या के द्वारा।

प्रश्न 49.
आपकी दृष्टि में बौद्ध धर्म के तेजी से प्रसार के क्या कारण थे? किन्हीं दो कारणों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
(1) लोग समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असन्तुष्ट थे।
(2) बौद्ध धर्म ने जाति प्रथा का विरोध किया, सामाजिक समानता पर बल दिया।

प्रश्न 50.
हीनयान और महायान बौद्ध सम्प्रदायों में अन्तर स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
महायानी बुद्ध को देवता मान कर उनकी पूजा करते थे, परन्तु हीनयानी बुद्ध को अवतार नहीं मानते थे।

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प्रश्न 51.
साँची का स्तूप कहाँ स्थित है?
उत्तर:
साँची का स्तूप भोपाल से बीस मील दूर उत्तर- पूर्व में स्थित साँची कनखेड़ा नामक एक गाँव में स्थित है।

प्रश्न 52.
ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी में विश्व में किन प्रसिद्ध चिन्तकों का उद्भव हुआ?
उत्तर:
ईरान में जरथुस्व, चीन में खुंगत्सी, यूनान में सुकरात, प्लेटो और अरस्तू तथा भारत में महावीर और बुद्ध का उद्भव हुआ।

प्रश्न 53.
ऋग्वेद का संकलन कब किया गया?
उत्तर:
ग्वेद का संकलन 1500 से 1000 ई. पूर्व में किया गया।

प्रश्न 54.
नियतिवादियों और भौतिकवादियों में क्या अन्तर था?
उत्तर:
नियतिवादियों के अनुसार सब कुछ पूर्व निर्धारित है परन्तु भौतिकवादियों के अनुसार दान, यज्ञ या चढ़ावा निरर्थक हैं।

प्रश्न 55.
कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए क्या किया जाना आवश्यक है?
उत्तर:
कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या किया जाना आवश्यक है।

प्रश्न 56.
जैन धर्म के पाँच व्रतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) हत्या न करना
(2) चोरी न करना
(3) झूठ न बोलना
(4) ब्रह्मचर्य
(5) धन संग्रह न करना।

प्रश्न 57.
बुद्ध के संदेश भारत के बाहर किन-किन देशों में फैले ? नाम लिखिए।
अथवा
बौद्ध धर्म का प्रसार किन देशों में हुआ?
उत्तर:
बौद्ध धर्म का प्रसार सम्पूर्ण उपमहाद्वीप मध्य एशिया, चीन, कोरिया, जापान, श्रीलंका, म्यांमार, थाइलैंड तथा इंडोनेशिया में हुआ।

प्रश्न 58.
नगर का भ्रमण करते समय किन को देखकर सिद्धार्थ ने घर त्यागने का निश्चय कर लिया?
उत्तर:
एक वृद्ध व्यक्ति, एक रोगी, एक लाश और एक संन्यासी को देखकर सिद्धार्थ ने घर त्यागने का निश्चय कर लिया।

प्रश्न 59.
बौद्ध धर्म के अनुसार ‘संघ’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
युद्ध द्वारा स्थापित संघ भिक्षुओं की एक संस्था थी जो धम्म के शिक्षक बन गए।

प्रश्न 60.
संघ के भिक्षुओं की दैनिक चर्या का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) भिक्षु सादा जीवन बिताते थे।
(2) वे उपासकों से भोजन दान पाने के लिए एक कटोरा रखते थे।

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प्रश्न 61.
बौद्ध धर्म के शीघ्र प्रसार के दो कारण बताइये।
उत्तर:
(1) लोग समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असन्तुष्ट थे
(2) बौद्ध धर्म सामाजिक समानता पर बल देता था।

प्रश्न 62.
‘चैत्य’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
शवदाह के बाद शरीर के कुछ अवशेष टीलों पर सुरक्षित रख दिए जाते थे। ये टीले चैत्य कहे जाने लगे।

प्रश्न 63.
बुद्ध के जीवन से जुड़े चार स्थानों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) लुम्बिनी ( बुद्ध का जन्म स्थान)
(2) बोधगया (ज्ञान प्राप्त होना)
(3) सारनाथ (प्रथम उपदेश देना)
(4) कुशीनगर (निर्वाण प्राप्त करना)।

प्रश्न 64.
स्तूप’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
कुछ पवित्र स्थानों पर बुद्ध से जुड़े कुछ अवशेष जैसे उनकी अस्थियाँ गाड़ दी गई थीं। ये टीले स्तूप कहलाये।

प्रश्न 65.
किन लोगों के द्वारा स्तूपों को दान दिया जाता था?
उत्तर:
(1) राजाओं के द्वारा (जैसे सातवाहन वंश के राजा)
(2) शिल्पकारों तथा व्यापारियों की श्रेणियों द्वारा
(3) महिलाओं और पुरुषों के द्वारा।

प्रश्न 66.
स्तूप की संरचना के प्रमुख तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) मिट्टी का टीला (अंड)
(2) हर्मिका (उन्जे जैसा ढाँचा)
(3) यष्टि (हर्मिका से निकला मस्तूल)
(4) वेदिका (टीले के चारों ओर बनी वेदिका)।

प्रश्न 67.
महायान मत में बोधिसत्तों की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बोधिसता परम करुणामय जीव थे जो अपने सत्कार्यों से पुण्य कमाते थे और इससे दूसरों की सहायता करते थे।

प्रश्न 68.
महायान मत से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
महायान मत में बुद्ध और बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा की जाती थी।

प्रश्न 69.
हीनयान या थेरवाद’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पुरानी बौद्ध परम्परा के अनुवायी स्वयं को धेरवादी कहते थे। वे पुराने, प्रतिष्ठित शिक्षकों के बताए रास्ते पर चलते थे।

प्रश्न 70.
कैलाशनाथ मन्दिर के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
कैलाशनाथ मन्दिर एलोरा (महाराष्ट्र) में स्थित है यह सारा ढाँचा एक चट्टान को काट कर तैयार किया गया है।

प्रश्न 71.
जैन धर्म के दो सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए
उत्तर:
(1) जीवों के प्रति अहिंसा
(2) जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा निर्धारित होना।

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प्रश्न 72.
जैन विद्वानों ने किन भाषाओं में अपने ग्रन्थों की रचना की?
उत्तर:
जैन विद्वानों ने प्राकृत, संस्कृत, तमिल आदि भाषाओं में अपने ग्रन्थों की रचना की।

प्रश्न 73.
बौद्ध धर्म के दो सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
(1) विश्व अनित्य है और निरन्तर बदल रहा है।
(2) विश्व आत्माविहीन है क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं है।

प्रश्न 74.
स्तूप क्या हैं?
उत्तर:
स्तूप बुद्ध धर्म से जुड़े पवित्र टीले हैं। इनमें बुद्ध के शरीर के अवशेष अथवा उनके द्वारा प्रयोग की गई किसी वस्तु को गाड़ा गया था।

प्रश्न 75.
चैत्य क्या थे?
उत्तर:
शवदाह के पश्चात् बौद्धों के शरीर के कुछ अवशेष टीलों पर सुरक्षित रख दिए जाते थे। अन्तिम संस्कार से जुड़े इन टीलों को चैत्य कहा जाता था।

प्रश्न 76.
ऋग्वेद में किन सूक्तियों का संग्रह है?
उत्तर:
ऋग्वेद में इन्द्र, अग्नि, सोम आदि देवताओं की स्तुति से सम्बन्धित सूक्तियों का संग्रह है।

प्रश्न 77.
नियतिवादी कौन थे?
उत्तर:
नियतिवादी वे लोग थे जो विश्वास करते थे कि सुख और दुःख पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं।

प्रश्न 78.
भौतिकवादी कौन थे?
उत्तर:
भौतिकवादी लोग यह मानते थे कि दान, यज्ञ या चढ़ावा निरर्थक हैं। इस दुनिया या दूसरी दुनिया का अस्तित्व नहीं होता।

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प्रश्न 79.
‘सन्तचरित्र’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
संतचरित्र किसी संत या धार्मिक महापुरुष की जीवनी है। संतचरित्र संत की उपलब्धियों का गुणगान करते हैं।

प्रश्न 80.
विनयपिटक तथा सुत्तपिटक में किन शिक्षाओं का संग्रह था ?
उत्तर:
(1) विनयपिटक में बौद्ध मठों में रहने वाले लोगों के लिए नियमों का संग्रह था।
(2) सुत्तपिटक में महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का संग्रह था।

प्रश्न 81.
अभिधम्मपिटक’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
अभिधम्मपिटक’ नामक ग्रन्थ में बौद्ध दर्शन से सम्बन्धित सिद्धान्तों का संग्रह था।

प्रश्न 82.
श्रीलंका के इतिहास पर प्रकाश डालने वाले बौद्ध ग्रन्थों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
‘दीपवंश’ (द्वीप का इतिहास) तथा ‘महावंश’ (महान इतिहास) से श्रीलंका के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है।

प्रश्न 83.
स्तूप को संस्कृत में क्या कहा जाता है?
उत्तर:
स्तूप को संस्कृत में टीला कहा जाता है।

प्रश्न 84.
कौनसा अनूठा ग्रन्थ सुत्तपिटक का हिस्सा
उत्तर:
थेरीगाथा ग्रन्थ सुत्तपिटक का हिस्सा है।

प्रश्न 85.
बिना अलंकरण वाले प्रारम्भिक स्तूप कौन- कौनसे हैं?
उत्तर:
साँची और भरहुत स्तूप बिना अलंकरण वाले प्रारम्भिक स्तूप हैं।

प्रश्न 86.
जैन धर्म की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा क्या है?
उत्तर:
जैन धर्म के अनुसार सम्पूर्ण संसार प्राणवान है; पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन होता है। प्रश्न 87. अमरावती का स्तूप किस राज्य में है? उत्तर- अमरावती का स्तूप गुंटूर (आन्ध्र प्रदेश) में स्थित है।

प्रश्न 88.
जेम्स फर्ग्युसन ने वृक्ष और सर्प पूजा का केन्द्र किसे माना ?
उत्तर:
जेम्स फर्ग्युसन ने वृक्ष और सर्प पूजा का केन्द्र साँची को माना।

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प्रश्न 89.
वराह ने किसकी रक्षा की थी?
उत्तर:
वराह ने पृथ्वी की रक्षा की थी।

प्रश्न 90.
बौद्धों का सबसे विशाल और शानदार स्तूप कौनसा था ?
उत्तर:
बौद्धों का सबसे विशाल और शानदार स्तूप अमरावती का स्तूप है।

प्रश्न 91.
भक्ति से क्या आशय है?
उत्तर:
भक्ति एक प्रकार की आराधना है। इसमें उपासक एवं ईश्वर के मध्य के रिश्ते को प्रेम तथा समर्पण का रिश्ता माना जाता है।

लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
बौद्ध धर्म के व्यावहारिक पक्ष के बारे में सुत्तपिटक के उद्धरण पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
(1) मालिक को अपने नौकरों और कर्मचारियों की पाँच प्रकार से देखभाल करनी चाहिए उनकी क्षमता के अनुसार उन्हें काम देकर उन्हें भोजन और मजदूरी देकर, बीमार पड़ने पर उनकी परिचर्या करने, उनके साथ स्वादिष्ट भोजन बाँट कर और समय-समय पर उन्हें छुट्टी देकर।
(2) कुल के लोगों को पाँच तरह से श्रमणों और ब्राह्मणों की देखभाल करनी चाहिए अनुराग द्वारा, सदैव पुस् घर खुले रखकर तथा उनकी दिन-प्रतिदिन की आवश्यकताओं दिन की पूर्ति करके।

प्रश्न 2.
बौद्ध एवं जैन धर्म में कितनी समानता थी?
उत्तर:

  1. दोनों धर्म कर्मवाद और पुनर्जन्मवाद में विश्वास करते हैं।
  2. दोनों धर्म अहिंसा के सिद्धान्त में विश्वास करते की में हैं।
  3. दोनों धर्म अनीश्वरवादी हैं।
  4. दोनों धर्मों ने यज्ञों, बहुदेववाद और कर्मकाण्डों गी का विरोध किया।
  5. दोनों धर्म निर्वाण प्राप्त करने पर बल देते हैं।
  6. दोनों धर्म निवृत्तिमार्गी हैं और संसार त्याग पर बल देते हैं।

प्रश्न 3.
साँची का स्तूप यूरोप के लोगों को विशेषकर में रुचिकर क्यों लगता है?
उत्तर:
भोपाल से बीस मील उत्तर पूर्वी की ओर एक पहाड़ी की तलहटी में साँची का स्तूप स्थित है। इस स्तूप की पत्थर की वस्तुएँ, बुद्ध की मूर्तियाँ तथा प्राचीन तोरणद्वार आदि यूरोप के लोगों को विशेषकर रुचिकर लगते हैं जिनमें मेजर अलेक्जैंडर कनिंघम एक हैं। मेजर अलेक्जेंडर कनिंघम ने इस स्थान के चित्र बनाए। उन्होंने यहाँ के अभिलेखों को पढ़ा और गुम्बदनुमा ढाँचे के बीचों-बीच खुदाई की। उन्होंने इस खोज के निष्कर्षो को एक अंग्रेजी पुस्तक में लिखा।

प्रश्न 4.
साँची का पूर्वी तोरणद्वार भोपाल राज्य से बाहर जाने से कैसे बचा रहा?
उत्तर:
साँची के स्तूप का पूर्वी तोरणद्वार सबसे अच्छी दशा में था अतः फ्रांसीसियों ने सांची के पूर्वी तोरणद्वार को फ्रांस के संग्रहालय में प्रदर्शित करने के लिए शाहजहाँ बेगम से इसे फ्रांस ले जाने की अनुमति माँगी। अंग्रेजों ने भी इसे इंग्लैण्ड ले जाने का प्रयास किया। सौभाग्वश फ्रांसीसी और अंग्रेज दोनों ही इसकी प्रतिकृतियों से सन्तुष्ट हो गए, जो बड़ी सावधानीपूर्वक प्लास्टर से बनाई गई थीं। इस प्रकार मूल कृति भोपाल राज्य में अपने स्थान पर ही बनी रही।

प्रश्न 5.
भोपाल के शासकों ने साँची स्तूप के संरक्षण के लिए क्या उपाय किये?
उत्तर:

  1. भोपाल के शासकों शाहजहाँ बेगम तथा उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम ने साँची के स्तूप के रख-रखाव के लिए प्रचुर धन का अनुदान किया।
  2. सुल्तानजहाँ बेगम ने वहाँ पर एक संग्रहालय और अतिथिशाला बनाने के लिए अनुदान दिया।
  3. जान मार्शल द्वारा साँची के स्तूप पर लिखी गई पुस्तक के प्रकाशन में भी सुल्तानजहाँ बेगम ने अनुदान दिया।
  4. साँची के स्तूप को भोपाल राज्य में बनाए रखने में शाहजहाँ बेगम ने योगदान दिया।

प्रश्न 6.
” ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी का काल विश्व इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
इस काल में ईरान में जरथुस्त्र, चीन में खंगत्सी, यूनान में सुकरात, प्लेटो और अरस्तू तथा भारत में महावीर, गौतम बुद्ध एवं कई अन्य चिन्तकों का उदय हुआ। उन्होंने जीवन के रहस्यों को समझने का प्रयास किया। उन्होंने मानव तथा विश्व व्यवस्था के बीच सम्बन्ध को भी समझने का प्रयास किया। इसी काल में गंगा घाटी में नये राज्य और शहर उभर रहे थे और सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में कई प्रकार के परिवर्तन हो रहे थे जिन्हें ये चिन्तक समझने का प्रयास कर रहे थे।

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प्रश्न 7.
प्राचीन युग में प्रचलित यज्ञों की परम्परा का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पूर्व वैदिक काल में यज्ञों की परम्परा प्रचलित थी यज्ञों के समय ऋग्वैदिक देवताओं की स्तुति सूतों का न उच्चारण किया जाता था और लोग पशु, पुत्र, स्वास्थ्य, दीर्घ आयु आदि के लिए प्रार्थना करते थे आरम्भिक यह सामूहिक नेरूप से किए जाते थे। बाद में (लगभग 1000 ई. पूर्व से 500 ई. पूर्व) कुछ यज्ञ घरों के स्वामियों द्वारा किए जाते थे राजसूष और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा ही किया करते थे।

प्रश्न 8.
वैदिक परम्परा के अन्तर्गत तथा वैदिक र परम्परा के बाहर छठी शताब्दी ई. पूर्व में उठे प्रश्नों और विवादों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
छठी शताब्दी ई. पूर्व में लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के पश्चात् जीवन की सम्भावना और पुनर्जन्म के बारे ट में जानने के लिए उत्सुक थे क्या पुनर्जन्म अतीत के कर्मों । के कारण होता था? इस प्रकार के प्रश्नों पर खूब बाद- ही विवाद होता था। चिन्तक परम यथार्थ की प्रकृति को समझने और प्रकट करने में संलग्न थे। वैदिक परम्परा से बाहर के पण कुछ दार्शनिक यह प्रश्न उठा रहे थे कि सत्य एक होता है या अनेक। कुछ लोग यज्ञों के महत्त्व के बारे में विचार कर था रहे थे।

प्रश्न 9.
छठी शताब्दी ई. पूर्व में चिन्तकों में होने वाले वाद-विवादों तथा चर्चाओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
छठी शताब्दी ई.पूर्व में विभिन्न सम्प्रदाय के शिक्षक एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूम-घूमकर अपने दर्शन या विश्व के विषय में अपने दृष्टिकोण को लेकर एक-दूसरे से तथा सामान्य लोगों से तर्क-वितर्क करते थे। इस प्रकार की चर्चाएँ कुटागारशालाओं या ऐसे उपवनों में होती थीं जहाँ घुमक्कड़ चिन्तक ठहरा करते थे। यदि एक शिक्षक अपने प्रतिद्वन्द्वी को अपने तर्कों से सहमत कर लेता था, तो वह अपने अनुयायियों के साथ उसका शिष्य बन जाता था।

प्रश्न 10.
छठी शताब्दी ई. पूर्व में शिक्षक वैदिक धर्म के किन सिद्धान्तों पर प्रश्न उठाते थे?
उत्तर:
छठी शताब्दी ई. पूर्व में अनेक शिक्षक वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाते थे इन शिक्षकों में महावीर स्वामी तथा बुद्ध भी सम्मिलित थे। उन्होंने यह विचार भी प्रकट किया कि जीवन के दुःखों से मुक्ति का प्रयास प्रत्येक व्यक्ति स्वयं कर सकता था। यह बात ब्राह्मणवाद से बिल्कुल भिन्न थी क्योंकि ब्राह्मणवाद की यह मान्यता थी कि किसी व्यक्ति का अस्तित्व उसकी जाति और लिंग से निर्धारित होता था।

प्रश्न 11.
आत्मा की प्रकृति और सच्चे यज्ञ के बारे में उपनिषदों में क्या कहा गया है?
उत्तर:
(1) आत्मा की प्रकृति छान्दोग्य उपनिषद में आत्मा की प्रकृति के आरे में कहा गया है कि “यह आत्मा धान या यव या सरसों या बाजरे के बीज की गिरी से भी छोटी है मन के अन्दर छुपी यह आत्मा पृथ्वी से भी विशाल, क्षितिज से भी विस्तृत, स्वर्ग से भी बड़ी है। और इन सभी लोकों से भी बड़ी है।”

(2) सच्चा यज्ञ ही एक यज्ञ है। बहते यह (पवन) जो बह रहा है, निश्चय बहते यह सबको पवित्र करता है। इसलिए यह वास्तव में यज्ञ है।

प्रश्न 12.
बौद्ध धर्म की शिक्षाओं के प्रसार में चीनी और भारतीय विद्वानों के योगदान का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
जब बौद्ध धर्म पूर्वी एशिया में फैल गया तब फा-शिएन और श्वेन त्सांग जैसे चीनी यात्री बौद्ध ग्रन्थों की खोज में भारत आए ये पुस्तकें वे अपने देश ले गए, जहाँ विद्वानों ने इनका अनुवाद किया। भारत के बौद्ध शिक्षक भी अनेक देशों में गए बुद्ध की शिक्षाओं का प्रसार करने हेतु वे कई ग्रन्थ अपने साथ ले गए। कई सदियों तक ये पाण्डुलिपियाँ एशिया के विभिन्न देशों में स्थित बौद्ध- विहारों में संरक्षित थीं।

प्रश्न 13.
त्रिपिटकों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
बौद्धों के धार्मिक सिद्धान्त त्रिपिटकों में संकलित –

  1. विनयपिटक – इसमें संघ या बौद्ध मठों में रहने वाले बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों के आचरण सम्बन्धी नियमों का वर्णन है।
  2. सुत्तपिटक – इसमें महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का संग्रह है।
  3. अभिधम्मपिटक – इसमें बौद्ध दर्शन से जुड़े विषय संकलित हैं।

प्रश्न 14.
नियतिवादियों के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(1) नियतिवादियों के अनुसार सब कुछ पूर्व निर्धारित है। सुख और दुःख पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं। इन्हें संसार में बदला नहीं जा सकता। इन्हें बढ़ाया या घटाया नहीं जा सकता।
(2) बुद्धिमान लोग यह विश्वास करते हैं कि वे सद्गुणों तथा तपस्या द्वारा अपने कर्मों से मुक्ति प्राप्त कर लेंगे। मूर्ख लोग उन्हीं कार्यों को करके मुक्ति प्राप्त करने की आशा करते हैं नहीं है।

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प्रश्न 15.
भौतिकवादियों के सिद्धान्तों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
(1) संसार में दान, यज्ञ या चढ़ावा जैसी कोई चीज नहीं है।
(2) मनुष्य चार तत्वों से बना है जब वह मरता है, तब मिट्टी वाला अंश पृथ्वी में जल वाला अंश जल में, गर्मी वाला अंश आग में तथा साँस का अंश वायु में वापिस मिल जाता है और उसकी इन्द्रियाँ अंतरिक्ष का हिस्सा बन जाती हैं।
(3) दान देने का सिद्धान्त मूर्खों का सिद्धान्त है, यह खोखला झूठ है। मूर्ख हो या विद्वान् दोनों ही कट कर नष्ट हो जाते हैं। मृत्यु के बाद कुछ नहीं बचता।

प्रश्न 16.
जैन धर्म की प्रमुख शिक्षाओं का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
(1) सम्पूर्ण विश्व प्राणवान है। पत्थर चट्टान, जल आदि में भी जीवन है।
(2) जीवों के प्रति अहिंसा का पालन करना चाहिए। मनुष्यों, जानवरों, पेड़-पौधों, कीड़े-मकोड़ों को नहीं मारना चाहिए।
(3) जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा निर्धारित होता है।
(4) पाँच व्रतों का पालन करना चाहिए –

  • हत्या न करना
  • चोरी नहीं करना
  • झूठ न बोलना
  • ब्रह्मचार्य
  • धन संग्रह न करना।

प्रश्न 17.
गौतम बुद्ध की जीवनी का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
अथवा
गीतम बुद्ध पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
अथवा
गौतम बुद्ध के जीवन का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। वह शाक्य कबीले के सरदार के पुत्र थे। एक दिन नगर का भ्रमण करते समय सिद्धार्थ को एक रोगी, वृद्ध, मृतक तथा संन्यासी के दर्शन हुए जिससे उनका संसार के प्रति वैराग्य और बढ़ गया। अतः सिद्धार्थ महल त्याग कर सत्य की खोज में निकल गए। प्रारम्भ में उन्होंने 6 वर्ष तक कठोर तपस्या की। अन्त में उन्होंने एक वृक्ष के नीचे बैठकर चिन्तन करना शुरू किया और सच्चा ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद वह अपनी शिक्षाओं का प्रचार करने लगे।

प्रश्न 18.
बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
गौतम बुद्ध के उपदेशों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
(1) बौद्ध दर्शन के अनुसार विश्व अनित्य है और निरन्तर बदल रहा है। यह आत्माविहीन है क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी अथवा शाश्वत नहीं है।
(2) इस क्षणभंगुर संसार में दुःख मनुष्य के जीवन का अन्तर्निहित तत्त्व है।
(3) घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच मध्यम मार्ग का अनुसरण करते हुए मनुष्य दुनिया के दुःखों से मुक्ति पा सकता है।
(4) बुद्ध की मान्यता थी कि समाज का निर्माण मनुष्यों ने किया था, न कि ईश्वर ने

प्रश्न 19.
‘बौद्ध संघ’ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
बुद्ध ने अपने शिष्यों के लिए ‘संघ’ की स्थापना की संघ बौद्ध भिक्षुओं की एक ऐसी संस्था थी जो धम्म के शिक्षक बन गए। ये भिक्षु एक सादा जीवन बिताते थे। प्रारम्भ में केवल पुरुष ही संघ में सम्मिलित हो सकते थे, बाद में महिलाओं को भी संघ में सम्मिलित होने की अनुमति दे दी गई। कई स्वियों जो संघ में आईं, वे धम्म की उपदेशिकाएँ बन गई। संघ में सभी को समान दर्जा प्राप्त था। संघ की संचालन पद्धति गणों और संघ की परम्परा पर आधारित थी।

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प्रश्न 20.
संघ में रहने वाले भिक्षुओं का जीवन कैसा था?
उत्तर:
संघ में रहने वाले बौद्ध भिक्षु सादा जीवन बिताते थे। उनके पास जीवनयापन के लिए अत्यावश्यक वस्तुओं के अतिरिक्त कुछ नहीं होता था। वे दिन में केवल एक बार उपासकों से भोजनदान पाने के लिए एक कटोरा रखते थे। वे दान पर निर्भर थे, इसलिए उन्हें भिक्खु कहा जाता था। संघ में रहते हुए वे बौद्ध ग्रन्थों का अध्ययन करते थे।

प्रश्न 21.
महात्मा बुद्ध ने महिलाओं को भी संघ में सम्मिलित होने की अनुमति क्यों दी?
उत्तर:
प्रारम्भ में केवल पुरुष ही बौद्ध संघ में सम्मिलित हो सकते थे परन्तु कालान्तर में अपने प्रिय शिष्य आनन्द के अनुरोध पर महात्मा बुद्ध ने स्त्रियों को भी संघ में सम्मिलित होने की अनुमति प्रदान कर दी। बुद्ध की उपमाता महाप्रजापति गोतमी संघ में सम्मिलित होने वाली पहली भिक्षुणी थी। संघ में आने वाली कई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ बन गई। आगे चलकर वे घेरी बनीं, जिसका अर्थ है- निर्वाण प्राप्त करने वाली महिलाएँ।

प्रश्न 22.
बुद्ध के अनुयायी किन सामाजिक वर्गों से सम्बन्धित थे?
उत्तर:
बुद्ध के अनुयायियों में कई सामाजिक वर्गों के लोग सम्मिलित थे। इनमें राजा, धनवान, गृहपति, व्यापारी, सामान्यजन कर्मकार, दास, शिल्पी आदि शामिल थे। इनमें स्त्री और पुरुष दोनों सम्मिलित थे। एक बार बौद्ध संघ में आ जाने पर सभी को बराबर माना जाता था क्योंकि भिक्षु और भिक्षुणी बनने पर उन्हें अपनी पुरानी पहचान को त्यागना पड़ता था।

प्रश्न 23.
भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए निर्धारित नियमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(1) जब कोई भिक्षु एक नया कम्बल या गलीचा बनाएगा, तो उसे इसका प्रयोग कम से कम छः वर्षों तक करना पड़ेगा।
(2) यदि कोई भिक्षु किसी गृहस्थ के घर जाता है और उसे भोजन दिया जाता है, तो वह दो से तीन कटोरा भर ही स्वीकार कर सकता है।
(3) यदि बिहार में ठहरा हुआ भिक्षु प्रस्थान के पहले अपने बिस्तर को नहीं समेटता है, तो उसे अपराध स्वीकार करना होगा।

प्रश्न 24.
बौद्ध धर्म के तेजी से प्रसार होने के क्या कारण थे?
उत्तर:
(1) लोग समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असन्तुष्ट थे।
(2) बौद्ध धर्म ने जन्म पर आधारित वर्ण व्यवस्था का विरोध किया और सामाजिक समानता पर बल दिया।
(3) बौद्ध धर्म में अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व दिया गया। इससे स्त्री और पुरुष इस धर्म की ओर आकर्षित हुए।
(4) बौद्ध धर्म ने निर्बल लोगों के प्रति दयापूर्ण और मित्रतापूर्ण व्यवहार को महत्त्व दिया।

प्रश्न 25.
चैत्य से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अत्यन्त प्राचीनकाल से ही लोग कुछ स्थानों को पवित्र मानते थे ऐसे स्थानों पर जहाँ प्रायः विशेष वनस्पति होती थी, अनूठी चट्टानें थीं या आश्चर्यजनक प्राकृतिक सौन्दर्य था वहाँ पवित्र स्थल बन जाते थे ऐसे कुछ स्थलों पर एक छोटी-सी वेदी भी बनी रहती थी, जिन्हें कभी-कभी चैत्य कहा जाता था शवदाह के बाद शरीर के कुछ अवशेष टीलों पर सुरक्षित रख दिए जाते थे। अन्तिम संस्कार से जुड़े टीले चैत्य के रूप में जाने गए।

प्रश्न 26.
बौद्ध साहित्य में वर्णित कुछ चैत्यों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
बौद्ध साहित्य में कई चैत्यों का उल्लेख मिलता है। इसमें बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित स्थानों का भी उल्लेख है, जैसे लुम्बिनी (जहाँ बुद्ध का जन्म हुआ), बोधगया (जहाँ बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया), सारनाथ (जहाँ उन्होंने उपदेश दिया) और कुशीनगर (जहाँ बुद्ध ने निब्बान प्राप्त किया। धीरे-धीरे ये समस्त स्थान पवित्र स्थल बन गए और यहाँ अनेक चैत्य बनाए गए।

प्रश्न 27.
स्तूपों का निर्माण क्यों किया जाता था?
उत्तर:
स्तूप बनाने की परम्परा बुद्ध से पहले की रही होगी। परन्तु वह बौद्ध धर्म से जुड़ गई। चूंकि स्तूपों में ऐसे अवशेष रहते थे, जिन्हें पवित्र समझा जाता था। इसलिए समूचा स्तूप ही बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। अशोक ने बुद्ध को अवशेषों के हिस्से प्रत्येक महत्त्वपूर्ण नगर में बाँट कर उनके ऊपर स्तूप बनाने का आदेश दिया था।

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प्रश्न 28.
स्तूपों की संरचना का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
(1) स्तूप का जन्म एक गोलाई लिए हुए मिट्टी के टीले से हुआ जिसे बाद में अंड कहा गया।
(2) अंड के ऊपर एक ‘हर्मिका’ होती थी। वह छज्जे जैसा ढांचा होता था।
(3) हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था, जिसे ‘वष्टि’ कहते थे, जिस पर प्रायः एक छत्री लगी होती थी।
(4) टीले के चारों ओर एक वेदिका होती थी जो पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करती थी।

प्रश्न 29.
साँची और भरहुत के स्तूपों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
साँची और भरहुत के स्तूप बिना अलंकरण के हैं, उनमें केवल पत्थर की वेदिकाएँ तथा तोरणद्वार हैं। ये पत्थर की वेदिकाएँ किसी बाँस के या काठ के घेरे के समान थीं और चारों दिशाओं में खड़े तोरणद्वार पर खूब नक्काशी की गई थी। उपासक पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश करके टीले को दाई ओर देखते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे, मानो वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे हों। बाद में स्तूप के टीले पर भी अलंकरण और नक्काशी की जाने लगी।

प्रश्न 30.
स्तूप किन लोगों के दान से बनाए गए ?
उत्तर:
(1) स्तूपों के निर्माण के लिए कुछ दान राजाओं के द्वारा दिए गए।
(2) कुछ दान शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियों द्वारा दिए गए।
(3) साँची के एक तोरण द्वार का भाग हाथीदांत का काम करने वाले शिल्पकारों के दान से बनाया गया था
(4) स्तूपों के निर्माण के लिए बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों ने भी दान दिया।
(5) स्तूपों के निर्माण के लिए सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों के द्वारा दान दिए गए।

प्रश्न 31.
अमरावती स्तूप की खोज किस प्रकार की गई ?
उत्तर:
1796 में एक स्थानीय राजा को अचानक अमरावती के स्तूप के अवशेष मिल गये। उन्होंने उसके पत्थरों से एक मन्दिर बनवाने का निश्चय किया। कुछ वर्षों बाद कालिन मेकेंजी नामक एक अंग्रेज अधिकारी इस क्षेत्र से गुजरे। उन्हें वहाँ नई मूर्तियाँ मिलीं और उन्होंने उनका चित्रांकन किया। 1854 ई. में गुन्टूर के कमिश्नर ने अमरावती की यात्रा की। वे वहाँ से कई मूर्तियाँ और उत्कीर्ण पत्थर मद्रास ले गए। उन्होंने पश्चिमी तोरणद्वार को भी खोज निकाला।

प्रश्न 32.
साँची क्यों बच गया, जबकि अमरावती नष्ट हो गया?
उत्तर:
सम्भवतः अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी। 1818 में जब साँची की खोज हुई, इसके तीन तोरणद्वार तब भी खड़े थे। चौथा तोरणद्वार वहीं पर गिरा हुआ था। उस समय भी यह सुझाव आया कि तोरणद्वारों को पेरिस या लन्दन भेज दिया जाए। परन्तु कई कारणों से साँची का स्तूप वहीं बना रहा और आज भी बना हुआ है। दूसरी ओर अमरावती का महाचैत्व अब केवल एक छोटा- सा टीला है जिसका सम्पूर्ण गौरव नष्ट हो चुका है।

प्रश्न 33.
इतिहासकार किसी मूर्तिकला की व्याख्या लिखित साक्ष्यों के साथ तुलना के द्वारा करते हैं। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत चित्र पहली बार देखने पर तो इस मूर्तिकला के अंश में फूस की झोंपड़ी तथा पेड़ों वाले ग्रामीण दृश्य का चित्रण दिखाई देता है परन्तु कला इतिहासकार इसे ‘वेसान्तर जातक’ से लिया गया एक दृश्य बताते हैं यह कहानी एक ऐसे दानी राजकुमार के बारे में है जो अपना सर्वस्व एक ब्राह्मण को सौंप कर स्वयं अपनी पत्नी तथा बच्चों के साथ वन में रहने के लिए चला गया। इस उदाहरण से स्पष्ट है कि प्राय: इतिहासकार किसी मूर्तिकला की व्याख्या लिखित साक्ष्यों के साथ तुलना के द्वारा करते हैं। (पाठ्यपुस्तक का चित्र 4.13, पेज 100)

प्रश्न 34.
“कई प्रारम्भिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव के रूप में न दिखाकर उनकी उपस्थिति प्रतीकों के माध्यम से दर्शाने का प्रयास किया।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कई प्रारम्भिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव के रूप में न दिखाकर उनकी उपस्थिति प्रतीकों के माध्यम से दर्शाने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए ‘रिक्त स्थान’ बुद्ध के ध्यान की दशा तथा ‘स्तूप’ ‘महापरिनिब्बान’ के प्रतीक बन गए। चक्र बुद्ध द्वारा सारनाथ में दिए गए पहले उपदेश का प्रतीक था। पेड़ बुद्ध के जीवन की एक पटना का प्रतीक था ऐसे प्रतीकों को समझने के लिए यह आवश्यक है कि इतिहासकार इन कलाकृतियों के निर्माताओं की परम्पराओं से परिचित हो ।

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प्रश्न 35.
साँची स्तूप के तोरणद्वार के किनारे पर एक वृक्ष पकड़कर झूलती हुई महिला की मूर्ति से किस लोक परम्परा का बोध होता है?
उत्तर:
प्रारम्भ में विद्वानों को इस मूर्ति के महत्त्व के बारे में कुछ असमंजस था। इस मूर्ति से त्याग और तपस्या के भाव प्रकट नहीं होते थे। परन्तु लोक साहित्यिक परम्पराओं के अध्ययन के द्वारा वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि यह संस्कृत भाषा में वर्णित ‘शालभंजिका’ की मूर्ति है। लोक परम्परा के अनुसार लोग यह मानते थे कि इस स्वी द्वारा हुए जाने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे और फल होने लगते थे। यह एक शुभ प्रतीक माना जाता था और इसी कारण स्तूप के अलंकरण में यह प्रयुक्त हुआ ।

प्रश्न 36.
“साँची की मूर्तियों में पाए गए कई प्रतीक या चिह्न लोक परम्पराओं से उभरे थे।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
साँची की मूर्तियों में पाए गए कई प्रतीक या चिह्न लोक परम्पराओं से उभरे थे। उदाहरण के लिए, साँची में जानवरों के कुछ सुन्दर उत्कीर्णन पाए गए हैं। इन जानवरों में हाथी, घोड़े, बन्दर और गाय-बैल सम्मिलित हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ पर लोगों को आकर्षित करने के लिए जानवरों का उत्कीर्णन किया गया था। इसके अतिरिक्त जानवरों का मनुष्यों के गुणों के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया जाता था। उदाहरणार्थ, हाथी शक्ति और ज्ञान के प्रतीक माने जाते थे।

प्रश्न 37.
चित्र 4.19 पृष्ठ 102 पर चित्रित कमलदल और हाथियों के बीच एक महिला की मूर्ति से किस लोक परम्परा के बारे में जानकारी मिलती है?
उत्तर:
इस चित्र में हाथी महिला के ऊपर जल छिड़क रहे हैं, जैसे वे उनका अभिषेक कर रहे हो कुछ इतिहासकार इस महिला को बुद्ध की माँ माया मानते हैं तो दूसरे इतिहासकार इसे एक लोकप्रिय देवी गजलक्ष्मी मानते हैं। गजलक्ष्मी सौभाग्य लाने वाली देवी थी, जिन्हें प्राय: हाथियों से सम्बन्धित किया जाता है। यह भी सम्भव है कि इन उत्कीर्णित मूर्तियों को देखने वाले उपासक इसे माया और गजलक्ष्मी दोनों से ही जोड़ते थे।

प्रश्न 38.
अजन्ता की चित्रकारी की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन काल में चित्रकारी जैसे सम्प्रेषण के अन्य माध्यमों का भी प्रयोग किया जाता था। इन चित्रों में जो सबसे अच्छी दशा में बचे हुए हैं, वे गुफाओं की दीवारों पर बने चित्र हैं। इनमें अजन्ता (महाराष्ट्र) की चित्रकारी अत्यन्त प्रसिद्ध है। अजन्ता के चित्रों में जातकों की कथाएँ चित्रित हैं। इनमें राजदरबार का जीवन, शोभायात्राएँ, काम करते हुए स्वी- पुरुष और त्यौहार मनाने के चित्र दिखाए गए हैं अजन्ता के कुछ चित्र अत्यन्त स्वाभाविक एवं सजीव लगते हैं।

प्रश्न 39.
बौद्धमत में महायान के विकास का वर्णन कीजिए।
अथवा
महायान बौद्ध धर्म के विकास का संक्षेप में वर्णन कीजिये।
उत्तर:
ईसा की प्रथम शताब्दी के पश्चात् यह विश्वास किया जाने लगा कि बुद्ध लोगों को मुक्ति दिलवा सकते थे। साथ-साथ बोधिसत्त की अवधारणा भी विकसित होने लगी। बोधिसत्तों को परम दयालु जीव माना गया जो अपने सत्कार्यों से पुण्य कमाते थे परन्तु वे इस पुण्य का प्रयोग दूसरों का कल्याण करने में करते थे। इस प्रकार बौद्धमत में बुद्ध और बोधिसत्वों की मूर्तियों की पूजा इस परम्परा का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गई। इस नई परम्परा को ‘महायान’ कहा गया।

प्रश्न 40.
पौराणिक हिन्दू धर्म के उदय का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हिन्दू धर्म में वैष्णव एवं शैव परम्पराएँ सम्मिलित हैं। वैष्णव परम्परा में विष्णु को सबसे महत्वपूर्ण देवता माना जाता है और शैव परम्परा में शैव को परमेश्वर माना जाता है। इनके अन्तर्गत एक विशेष देवता की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता था। इस प्रकार की आराधना में उपासना और ईश्वर के बीच का सम्बन्ध प्रेम और समर्पण का सम्बन्ध माना जाता था। इसे भक्ति कहते हैं।

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प्रश्न 4.
‘अवतारवाद की अवधारणा’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
वैष्णववाद में दस अवतारों की कल्पना की गई है यह माना जाता था कि पापियों के बढ़ते प्रभाव के कारण जब संसार में अराजकता, अव्यवस्था और विनाश की स्थिति आ जाती थी, तब विश्व की रक्षा के लिए भगवान अलग-अलग रूपों में अवतार लेते थे। सम्भवतः पृथक् पृथक् अवतार देश के भिन्न-भिन्न भागों में लोकप्रिय थे। इन समस्त स्थानीय देवताओं को विष्णु का रूप मान लेना एकीकृत धार्मिक परम्परा के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण तरीका था।

प्रश्न 42.
“वैष्णववाद में अनेक अवतारों के इर्द- गिर्द पूजा पद्धतियाँ विकसित हुई।” व्याख्या कीजिये।
अथवा
वैष्णववाद में अनेक अवतारों के इर्द-गिर्द पूजा – पद्धतियाँ किस प्रकार विकसित हुई? विवेचना कीजिये।
उत्तर:
वैष्णववाद में कई अवतारों को मूर्तियों के रूप में दिखाया गया है। अन्य देवताओं की मूर्तियों का भी निर्माण हुआ। शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में बनाया जाता था। परन्तु उन्हें कई बार मनुष्य के रूप में भी दिखाया गया है। ये समस्त चित्रण देवताओं से जुड़ी हुई मिश्रित अवधारणाओं पर आधारित थे। उनकी विशेषताओं और प्रतीकों को उनके शिरोवस्त्र, आभूषणों, आयुषों (हथियार और हाथ में धारण किए गए अन्य शुभ अस्त्र) और बैठने की शैली से दर्शाया जाता था।

प्रश्न 43.
प्रारम्भिक मन्दिरों की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(1) शुरू के मन्दिर एक चौकोर कमरे के रूप में थे जिन्हें गर्भगृह कहा जाता था। इनमें एक दरवाजे से उपासक मूर्ति की पूजा करने के लिए भीतर प्रविष्ट हो
सकता था।
(2) धीरे-धीरे गर्भगृह के ऊपर एक ऊँचा ढाँचा बनाया जाने लगा जिसे शिखर कहा जाता था।
(3) मन्दिर की दीवारों पर प्रायः भित्तिचित्र उत्कीर्ण किए जाते थे।
(4) बाद में मन्दिरों में विशाल सभा स्थल, ऊंची दीवारों और तोरणों का भी निर्माण किया जाने लगा।
(5) कुछ पहाड़ियों को काट कर कुछ गुफा मन्दिर भी बनाये गये।

प्रश्न 44.
उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोपीय विद्वान यूनानी शैली से प्रभावित भारतीय मूर्तियों से क्यों प्रभावित हुए?
उत्तर:
उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोपीय विद्वानों ने मूर्तियों की तुलना प्राचीन यूनान की कला परम्परा से की। वे बुद्ध और बोधिसतों की मूर्तियों की खोज से काफी उत्साहित हुए। इसका कारण यह था कि ये मूर्तियाँ यूनानी मूर्तिकला से प्रभावित थीं। ये मूर्तियाँ यूनानी मूर्तियों से काफी मिलती- जुलती थीं। चूँकि वे विद्वान यूनानी परम्परा से परिचित थे, इसलिए उन्होंने इन्हें भारतीय मूर्तिकला का सर्वश्रेष्ठ नमूना माना।

प्रश्न 45.
कृत्रिम गुफाएँ बनाने की परम्परा का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राचीनकाल में कुछ मन्दिर पहाड़ियों को काट कर खोखला कर कृत्रिम गुफाओं के रूप में बनाए गए थे। कृत्रिम गुफाएँ बनाने की परम्परा काफी प्राचीन थी। सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ई. पूर्व तीसरी सदी में अशोक के आदेश से बराबर ( बिहार ) की पहाड़ियों में आजीविक सम्प्रदाय के संतों के लिए बनाई गई थीं कृत्रिम गुफा बनाने का सबसे विकसित रूप हमें आठवीं शताब्दी के कैलाशनाथ के मन्दिर में दिखाई देता है। इसे पूरी पहाड़ी काटकर बनाया गया था।

प्रश्न 46.
पुरातत्त्ववेत्ता एच. एच. कोल प्राचीन कलाकृतियों के बारे में क्या सोच रखते थे?
उत्तर:
पुरातत्त्ववेत्ता एच. एच. कोल प्राचीन कलाकृतियों को उठा ले जाने के विरुद्ध थे। वे इस लूट को आत्मघाती मानते थे। उनका मानना था कि संग्रहालयों में मूर्तियों की प्लास्टर कलाकृतियाँ रखी जानी चाहिए जबकि असली कृतियाँ खोज के स्थान पर ही रखी जानी चाहिए।

प्रश्न 47.
जैन धर्म के अहिंसावादी स्वरूप के विषय में आप क्या जानते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हॉपकिन्स नामक विद्वान ने कहा था कि जैन धर्म कीट-पतंगों का भी पोषण करता है, पूर्णतया सत्य है। क्योंकि जैन धर्म में अहिंसा पर अत्यधिक बल दिया गया है। विश्व के अस्तित्व के लिए प्रत्येक अणु महत्त्वपूर्ण है। इसके लिए जैन दार्शनिकों ने मत दिए कि व्यक्ति को मन, कर्म तथा वचन से पूर्ण अहिंसावादी होना चाहिए। मनुष्य को जाने-अनजाने में भी प्राणियों के प्रति किसी भी हिंसावादी गतिविधि का सम्पादन नहीं करना चाहिए। इसी के फलस्वरूप अनेक जैन सन्त मुँह पर पट्टी बाँधते हैं; जिससे उनके श्वास लेते समय कोई कीटाणु उनके मुँह में न चला जाए।

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प्रश्न 48.
गौतम बुद्ध एक महान् समाज सुधारक थे। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बौद्ध धर्म का उद्भव एक क्रान्तिकारी धर्म के रूप में हुआ था। इस धर्म के प्रवर्तक मध्यमार्गी बुद्ध थे। गौतम बुद्ध की विचारधारा, उपदेश तथा कार्यप्रणाली अत्यन्त सरल थी। गौतम बुद्ध ने जातिवाद विशेषकर जन्म पर आधारित जातिवाद का घोर विरोध किया तथा जन्म के स्थान पर कर्म को व्यक्ति की पहचान बताया।

एक स्थान पर गौतम बुद्ध अपने शिष्य आनन्द से कहते हैं कि साधक की जाति क्या पूछता है कर्म पूछ गौतम बुद्ध की यह विचारधारा तत्कालीन अतिवादी तथा ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरुद्ध जनसामान्य की सबसे बड़ी आवश्यकता थी। बुद्ध ने जनता की इस आवश्यकता को समझा और ऐसी कर्मकाण्डीय ब्राह्मणवादी व्यवस्था का विरोध किया; जिसमें जनसामान्य का कोई स्थान नहीं था।

प्रश्न 49.
बौद्ध संघों की स्थापना क्यों की गयी?
उत्तर:
बौद्ध धर्म की व्यापक लोकप्रियता के कारण शिष्यों की संख्या तीव्रता से बढ़ने लगी। शिष्यों में ही कुछ ऐसे शिष्य जिनका आत्मिक विकास उच्च था; वे धम्म के शिक्षक बन गये। संघ की स्थापना धम्म के शिक्षकों के की गयी संघ में सदाचरण और नैतिकता पर बल दिया जाता था। हेतु प्रारम्भ में महिलाओं का संघ में प्रवेश वर्जित था परन्तु बाद में महात्मा बुद्ध ने महिलाओं को भी संघ में प्रवेश की अनुमति दे दी। महाप्रजापति गौतमी जो कि बुद्ध की उपमाता थीं, संघ में प्रवेश करने वाली पहली महिला थीं।

प्रश्न 50.
जैन तथा बौद्ध धर्म में क्या भिन्नताएँ हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
जैन तथा बौद्ध धर्म में अनेक समानताएँ थीं परन्तु कुछ असमानताएँ भी थीं। प्रमुख भिन्नताओं का विवरण निम्नलिखित है –

  1.  जैन धर्म आत्मवादी है परन्तु बौद्ध धर्म अनात्मवादी
  2. जैनों के साहित्य को आगम कहा जाता है; बौद्धों के साहित्य को त्रिपिटक कहा जाता है।
  3. जैन धर्म अत्यधिक अहिंसावादी है बौद्ध धर्म मध्यमार्गी है।
  4. जैन धर्म के अनुसार मोक्ष मृत्यु के पश्चात् ही सम्भव है वहीं बौद्ध धर्म के अनुसार इसी जन्म में निर्वाण सम्भव है।
  5. जैन धर्म में तीर्थंकरों की उपासना होती है परन्तु बौद्ध धर्म में बुद्ध और बोधिसत्वों की आराधना की जाती है।

प्रश्न 51.
बौद्ध मूर्तिकला की प्रतीकात्मक पद्धति क्या थी? इन प्रतीकों को समझ पाना एक दुष्कर कार्य क्यों था?
उत्तर:
बौद्ध मूर्तिकला की मूर्तियों को स्पष्ट रूप से समझ पाना एक दुष्कर कार्य इसलिए है कि इतिहासकार केवल इस बात का अनुमान ही लगा सकते हैं कि मूर्ति बनाते समय मूर्तिकार का दृष्टिकोण क्या था इतिहासकारों के ‘अनुमान के अनुसार आरम्भिक मूर्तिकारों ने महात्मा बुद्ध को मनुष्य के रूप में न दिखाकर उन्हें प्रतीकों के माध्यम से प्रकट करने का प्रयास किया है। चित्र में दिखाए गए रिक्त स्थान को इतिहासकार बुद्ध की ध्यान अवस्था के रूप में बताते हैं; क्योंकि ध्यान की महादशा में अन्तर में रिक्तता की अनुभूति होती है स्तूप को महानिर्वाण की दशा के रूप में व्याख्यायित किया है।

महानिर्वाण का अर्थ है- विराट में समा जाना चक्र को बुद्ध द्वारा सारनाथ में दिए गए पहले प्रवचन का प्रतीक माना गया है; इसके अनुसार यहीं से बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का चक्र घूमा पेड़ का अर्थ मात्र पेड़ के रूप में नहीं बल्कि वह बीज की पूर्ण परिपक्वता का प्रतीक है एक बीज जिसकी सम्भावना वृक्ष बनने की है वह अपनी पूर्णता को प्राप्त हुआ इसी प्रकार बुद्ध अपने जीवन में सम्पूर्णता को प्राप्त हुए।

प्रश्न 52.
साँची के प्रतीक लोक-परम्पराओं से जुड़े थे; संक्षिप्त विवेचना कीजिए।
उत्तर:
साँची की मूर्तियों में प्राप्त उत्कीर्णन में लोक परम्परा से जुड़े हुए बहुत से प्रतीकों का चिशंकन है। मूर्तियों को आकर्षक और सुन्दर दर्शाने हेतु विविध प्रतीकों जैसे हाथी, घोड़ा, बन्दर, गाय, बैल आदि जानवरों का उत्कीर्णन जीवन्त रूप से किया गया है। हाथी को शक्ति तथा ज्ञान का प्रतीक कहा गया है। इसी प्रकार एक स्वी तोरणद्वार के किनारे एक पेड़ पकड़कर झूल रही है। यह शालभंजिका की मूर्ति है, लोक परम्परा में शाल भंजिका को शुभ प्रतीक माना जाता है। वामदल और हाथियों के बीच एक महिला को एक अन्य मूर्ति में दिखाया गया है।

हाथी उस महिला के ऊपर जल छिड़क रहे हैं; जैसे उसका अभिषेक कर रहे हैं। इस महिला को बुद्ध की माँ माना जाता है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह महिला सौभाग्य की देवी गजलक्ष्मी है। इतिहासकारों का इस सम्बन्ध में अपना दृष्टिकोण है। सर्पों का उत्कीर्णन भी कई स्तम्भों पर पाया जाता है। इस प्रतीक को भी लोक परम्परा से जुड़ा हुआ माना जाता है। प्रारम्भिक इतिहासकार जेम्स फर्गुसन के अनुसार साँची में वृक्षों और सर्पों की पूजा की जाती थी। वे बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे, उन्होंने उत्कीर्णित मूर्तियों का अध्ययन करके अपना यह निष्कर्ष निकाला था।

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प्रश्न 53.
अतीत से प्राप्त चित्रों की क्या विशेषताएँ थीं?
उत्तर:
अजन्ता और एलोरा की गुफाओं में बने भित्ति चित्र सम्पूर्ण विश्व के आकर्षण का केन्द्र है। चित्रकारी भी मूर्तिकला की भाँति सम्प्रेषण का एक माध्यम है। जातक की कथाओं का चित्रण बहुत ही सुन्दर ढंग से अजन्ता के चित्रों में दिखाया गया है। इन कथाओं में राजदरबार का चित्रण, शोभा यात्राएं, त्यौहारों का उत्सव और कार्य करते हुए पुरुषों और महिलाओं का चित्रांकन है। यह चित्र अत्यन्त ही सुन्दर और सजीव है हर्षोल्लास, उमंग, प्रसन्नता, प्रेम की भावनाओं की अभिव्यक्ति इतनी कुशलता से और जीवन्तता से की गई है कि यह लगता है कि चित्र बोल पड़ेंगे। कलाकारों ने इन्हें त्रिविम रूप से चित्रित किया गया है; इसके लिए आभा भेद तकनीक का प्रयोग करके इन्हें सजीवता प्रदान की है।

प्रश्न 54.
हीनयान तथा महायान में मुख्य अन्तरों को समझाइए।
उत्तर:
हीनयान तथा महायान में अनेक मूलभूत अन्तर हैं। इनमें से प्रमुख अन्तरों का विवरण निम्नलिखित है –

  1. हीनयान प्राचीन, रूढ़िवादी तथा मूल मत है जबकि महायान बौद्ध मत का संशोधित तथा सरल रूप है जो चतुर्थ बौद्ध संगीति में प्रकाश में आया।
  2. हीनयानी बुद्ध की स्तुति प्रतीकों के माध्यम से करते हैं वहीं महायानी मूर्ति पूजा में विश्वास करते हैं।
  3. हीनयान मत रूढ़िवादी है जबकि महायान अत्यधिक सरल मत है।
  4. हीनयान में बुद्ध की स्तुति की जाती है; वहीं महायान में बुद्ध के साथ-साथ बोधिसत्वों की आराधना भी की जाती है।
  5. हीनयान ज्ञान को महत्त्व देता है जबकि महायान करुणा को।

प्रश्न 55.
प्राचीन भारतीय कला की पृष्ठभूमि और महत्त्व को 19वीं सदी के यूरोपीय विद्वान प्रारम्भ में क्यों नहीं समझ सके ? उनकी समस्या का निराकरण किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
प्रत्येक देश की धार्मिक आस्थाओं, धारणाओं, परम्पराओं आदि में अन्तर होते हैं उनके सोचने और समझने के ढंग और प्रतिमान अलग-अलग होते हैं। इसलिए यूरोपीय विद्वानों ने जब प्राचीन भारतीय मूर्तिकला की यह मूर्तियाँ जो कई हाथों, कई सिरों या अर्द्ध मानव के रूप में निर्मित थीं देखीं तो उन्हें यह विचित्र प्रतीत हुई। आराध्य देवों के यह रूप उनकी कल्पना से परे थे। फिर भी इन आरम्भिक यूरोपीय विद्वानों ने इन विभिन्न रूपों वाली आराध्य देवों की मूर्तियों को समझने हेतु प्रयास किए।

यूरोपीय विद्वानों ने प्राचीन यूनानी कला परम्परा की पृष्ठभूमि को आधार बनाकर इन मूर्तियों की यूनानी मूर्तियों से तुलना की तथा उन्हें समझने का प्रयास किया। लेकिन जब उन्होंने बौद्ध धर्म की कला परम्परा, बौद्ध धर्म की बुद्ध और बोधसत्व की मूर्तियाँ देखीं तो वे बहुत प्रोत्साहित हुए। इन मूर्तियों की उत्कृष्टता को देखकर हैरान रह गए, उन्हें लगा ये मूर्तियाँ यूनानी प्रतिमानों के अनुरूप हैं। इस प्रकार इस मूर्तिकला की अनजानी व अपरिचित पृष्ठभूमि और इसके अपरिचित महत्त्व को उन्होंने परिचित यूनानी मूर्तिकला के आधार पर समझने का प्रयास किया।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की शासिकाओं के योगदान का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की शासिकाओं का योगदान साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की शासिकाओं के योगदान का वर्णन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है –
(1) साँधी के स्तूप के रख-रखाव के लिए धन का अनुदान देना- भोपाल की शासिकाओं- शाहजहाँ बेगम तथा उनकी उत्तराधिकारी सुल्तान जहाँ बेगम की पुरातात्विक स्थलों के संरक्षण में बड़ी रुचि थी। उन्होंने साँची के विश्व प्रसिद्ध स्तूप के रख-रखाव के लिए प्रचुर धन का अनुदान दिया।

(2) जान मार्शल द्वारा रचित पुस्तक के प्रकाशन के लिए अनुदान देना जान मार्शल ने साँची स्तूप पर एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना की। उन्होंने सुल्तानजहाँ की पुरातात्विक स्थलों के प्रति रुचि को देखते हुए अपना प्रसिद्ध ग्रन्थ सुल्तानजहाँ बेगम को समर्पित किया। सुल्तानजहाँ बेगम ने इस ग्रन्थ के विभिन्न खण्डों के प्रकाशन हेतु धन का अनुदान दिया।

(3) संग्रहालय और अतिथिशाला का निर्माण करवाया सुल्तानजहाँ बेगम ने स्तूप स्थल पर एक संग्रहालय तथा अतिथिशाला के निर्माण के लिए प्रचुर धन का अनुदान दिया।

(4) साँची के स्तूप को भोपाल राज्य में सुरक्षित रखना – उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोपीय लोगों में साँची के स्तूप को लेकर बड़ी रुचि थी। प्रारम्भ में फ्रांसीसियों ने सबसे अच्छी दशा में बचे साँची के पूर्वी तोरणद्वार को फ्रांस के संग्रहालय में प्रदर्शित करने हेतु शाहजहाँ बेगम से फ्रांस ले जाने की अनुमति माँगी।

इसके बाद अंग्रेजों ने भी साँची के पूर्वी तोरणद्वार को इंग्लैण्ड ले जाने की अनुमति माँगी। परन्तु शाहजहाँ बेगम ने उन्हें साँची के स्तूप की प्लास्टर प्रतिकृतियाँ देकर सन्तुष्ट कर दिया। इस प्रकार शाहजहाँ बेगम के प्रयासों के परिणामस्वरूप साँची के स्तूप की मूलकृति भोपाल राज्य में अपने स्थान पर ही सुरक्षित रही। इस प्रकार यह स्तूप समूह बना रहा है तो इसके पीछे भोपाल की बेगमों के विवेकपूर्ण निर्णयों की बड़ी भूमिका रही है।

प्रश्न 2.
बौद्ध ग्रन्थ किस प्रकार तैयार और संरक्षित किए जाते थे?
उत्तर:
बौद्ध ग्रंथों को तैयार एवं संरक्षित करना बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध अन्य शिक्षकों की भाँति चर्चा और वार्तालाप करते हुए मौखिक शिक्षा देते थे। स्त्री, पुरुष और बच्चे इन प्रवचनों को सुनते थे और इन पर चर्चा करते थे। बुद्ध की शिक्षाओं को उनके जीवनकाल में लिखा नहीं गया। उनकी मृत्यु के बाद पांचवीं चौथी सदी ई. पूर्व में उनके शिष्यों ने वरिष्ठ श्रमणों की एक सभा वैशाली में आयोजित की। वहाँ पर ही उनकी शिक्षाओं का संकलन किया गया। इन संग्रहों को ‘त्रिपिटक’ कहा जाता था।

(1) त्रिपिटक त्रिपिटक का शाब्दिक अर्थ है-भिन्न प्रकार के ग्रन्थों को रखने के लिए ‘तीन टोकरियाँ’ त्रिपिटक तीन हैं-

  • विनयपिटक – इसमें संघ या बौद्ध मठों में रहने वाले बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए आचरण सम्बन्धी नियमों का संग्रह है।
  • सुत्तपिटक – इसमें बुद्ध की शिक्षाओं का संग्रह है।
  • अभिधम्मपिटक इसमें बौद्धधर्म के दार्शनिक सिद्धान्तों का विवेचन है।

प्रत्येक पिटक के अन्दर कई ग्रन्थ होते थे-बाद के युगों में बौद्ध विद्वानों ने इन ग्रन्थों पर टीकाएँ लिखीं।

(2) दीपवंश तथा महावंश-जब बौद्ध धर्म का श्रीलंका जैसे नए क्षेत्रों में प्रसार हुआ, तब दीपवंश ( द्वीप का इतिहास) तथा महावंश (महान इतिहास) जैसे क्षेत्र विशेष के बौद्ध इतिहास को लिखा गया। इनमें से कई रचनाओं में बुद्ध की जीवनी लिखी गई है। अधिकांश पुराने ग्रन्थ पालि में हैं। कालान्तर में संस्कृत में भी ग्रन्थों की रचना की गई।

(3) बौद्ध ग्रन्थों का संरक्षण जब बौद्ध धर्म का पूर्वी एशिया में प्रसार हुआ, तब फा-शिएन और श्वैन-त्सांग जैसे तीर्थयात्री बौद्धग्रन्थों की खोज में चीन से भारत आए थे। वे अनेक बौद्ध ग्रन्थ अपने देश ले गए जहाँ विद्वानों ने इनका अनुवाद किया। भारत के बौद्ध शिक्षक भी दूर-दराज के देशों में गए। बुद्ध की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करने के लिए वे अनेक ग्रन्थ भी अपने साथ ले गए। कई शताब्दियों तक ये पांडुलिपियाँ एशिया के भिन्न-भिन्न देशों में स्थित बौद्ध- विहारों में संरक्षित थीं। पालि, संस्कृत, चीनी और तिब्बती भाषाओं में लिखे इन ग्रन्थों से आधुनिक अनुवाद तैयार किए गए हैं।

प्रश्न 3.
नियतिवादियों एवं भौतिकवादियों के विचारों की विवेचना कीजिये।
उत्तर:
नियतिवादियों के विचार मक्खलिगोसाल नामक व्यक्ति नियतिवादियों के प्रमुख दार्शनिक थे। नियतिवादियों के प्रमुख विचार निम्नलिखित थे
(1) सब कुछ पूर्व निर्धारित है नियतिवादियों के अनुसार सब कुछ पूर्व निर्धारित है। सुख और दुःख पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं। स्न्नों संका में बदला नहीं जा सकता। इन्हें बढ़ाया या घटाया नहीं जा सकता। जैसे धागे का गोला फेंक देने पर लुढ़कते लुढ़कते अपनी पूरी लम्बाई तक खुलता जाता है, उसी प्रकार मूर्ख और विद्वान दोनों ही पूर्व निर्धारित मार्ग से होते हुए दुःखों का निदान करेंगे।

(2) कर्म – मुक्ति की निरर्थक आशा करना- नियतिवादियों का कहना है कि बुद्धिमान लोग यह विश्वास करते हैं कि वे अपने सद्गुणों एवं तपस्या के बल पर कर्म मुक्ति प्राप्त करेंगे। इसी प्रकार मूर्ख लोग उन्हीं कार्यों को सम्पन्न करके शनैः-शनैः कर्म मुक्ति प्राप्त करने की आशा करते हैं। परन्तु उनका यह सोचना गलत है तथा दोनों में से कोई भी कुछ नहीं कर सकता। इसलिए लोगों के भाग्य में जो कुछ लिखा है, उसे उन्हें भोगना ही पड़ेगा।

भौतिकवादियों के विचार अजीत केसकंबलिन नामक व्यक्ति भौतिकवादियों के प्रमुख दार्शनिक थे भौतिकवादियों के प्रमुख विचार निम्नलिखित है-
(1) संसार में दान, यज्ञ या चढ़ावा जैसी कोई वस्तु नहीं होती। इस दुनिया या दूसरी दुनिया जैसी किसी वस्तु का कोई अस्तित्व नहीं होता।
(2) मनुष्य चार तत्त्वों से बना होता है जब उसकी मृत्यु होती है, तब मिट्टी वाला अंश पृथ्वी में, जल वाला अंश जल में, गर्मी वाला अंश आग में तथा साँस का अंश वायु में वापस मिल जाता है और उसकी इन्द्रियाँ अन्तरिक्ष का भाग बन जाती हैं।
(3) दान देने की बात मूर्खों का सिद्धान्त है, यह सिद्धान्त असत्य है। कुछ मूर्ख एवं विद्वान दोनों ही कट कर नष्ट हो जाते हैं। मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

प्रश्न 4.
महात्मा बुद्ध की जीवनी का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
महात्मा बुद्ध की जीवनी महात्मा बुद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक और प्रवर्तक थे। बुद्ध का जन्म 563 ई. पू. में कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी नामक वन में हुआ था। इनके पिता का नाम शुद्धोधन था, जो शाक्य गणराज्य के प्रधान थे। इनकी माता का नाम महामाया (मायादेवी) था। बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था।

16 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ का विवाह यशोधरा नामक एक सुन्दर कन्या से किया गया। कुछ समय बाद उनके यहाँ पुत्र ने जन्म लिया, जिसका नाम राहुल रखा गया। परन्तु सिद्धार्थ की संसार से विरक्ति बढ़ती गई। महाभिनिष्क्रमण-नगर-दर्शन हेतु विभिन्न अवसरों पर बाहर जाते हुए सिद्धार्थ ने एक वृद्ध व्यक्ति, रोगी, मृतक एवं संन्यासी को देखा जिन्हें देखकर उन्हें संसार से विरक्ति हो गई। अन्त में 29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ अपनी पत्नी, अपने पुत्र तथा राजकीय वैभव को छोड़कर ज्ञान की खोज में निकल पड़े।

यह घटना ‘महाभिनिष्क्रमण’ के नाम से प्रसिद्ध है। ज्ञान की प्राप्ति प्रारम्भ में सिद्धार्थ ने वैशाली के ब्राह्मण विद्वान आलारकालाम तथा राजगृह के विद्वान् उद्रक रामपुत्त से ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास किया, परन्तु उनकी जिज्ञासा शान्त नहीं हुई। इसके बाद वे उरुवेल के जंगल में अपने पाँच ब्राह्मण साथियों के साथ कठोर तपस्या करने लगे, परन्तु यहाँ भी उनके हृदय को शान्ति नहीं मिली। उनका शरीर सूख सूख कर काँटा हो गया, परन्तु उन्हें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। अतः उन्होंने भोजन आदि ग्रहण करना शुरू कर दिया जिससे नाराज होकर उनके पाँचों साथी सिद्धार्थ का साथ छोड़कर वहाँ से चले गए।

अन्त में सिद्धार्थ एक पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान की अवस्था में बैठ गए। सात दिन अखण्ड समाधि में लीन रहने के बाद वैशाखी पूर्णिमा की रात को उन्हें ‘ज्ञान’ प्राप्त हुआ, उन्हें सत्य के दर्शन हुए और वे ‘बुद्ध’ कहलाने लगे। इस घटना को ‘सम्बोधि’ कहा जाता है। जिस वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ, उसे ‘बोधिवृक्ष’ कहा जाने लगा और गया ‘बोधगया’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। धर्म का प्रचार ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् बुद्ध ने सारनाथ पहुँचकर उन पाँच ब्राह्मणों को उपदेश दिया, जो उन्हें छोड़कर चले आए थे। ये पाँचों ब्राह्मण बुद्ध के अनुयायी बन गए। इस घटना को ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ कहते हैं। इसके बाद बुद्ध ने काशी, कोशल, मगध, वज्जि प्रदेश, मल्ल, वत्स आदि में अपने धर्म की शिक्षाओं का प्रचार किया।

उनके अनुयायियों की संख