JAC Class 12 History Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

Jharkhand Board JAC Class 12 History Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

1. 1857 के विद्रोह का प्रारम्भ हुआ –
(क) मेरठ से
(ग) कलकत्ता से
(ख) बरेली से
(घ) दिल्ली से
उत्तर:
(क) मेरठ से

2. 1857 के विद्रोह के प्रारम्भ की तारीख थी –
(क) 15 मई
(ख) 13 मई
(ग) 10 मई
(घ) 31 मई
उत्तर:
(ग) 10 मई

3. दिल्ली पहुँचकर सिपाहियों ने अपना नेता घोषित किया –
(क) बहादुरशाह जफर को
(ख) रानी लक्ष्मीबाई को
(ग) नाना धुन्धुपन्त को
(घ) बेगम हजरत महल को
उत्तर:
(क) बहादुरशाह जफर को

4. ‘फिरंगी’ शब्द जिस भाषा का है, वह है –
(क) अरब
(ख) फारसी
(ग) उर्दू
(घ) हिन्दी
उत्तर:
(ख) फारसी

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5. 1857 के विद्रोह के समय उत्तर प्रदेश के बड़ौत परगने संगठित करने वाला नेता था –
(क) भूरामल
(ख) शाहमल
(ग) पीरामल
(घ) लादूमल
उत्तर:
(ख) शाहमल

6. छोटा नागपुर में कोल आदिवासियों का नेता था –
(क) गोनू
(ख) सिन्धू
(ग) मोनू
(घ) भीकू
उत्तर:
(क) गोनू

7. जिस राइफल के कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी लगी होने की चर्चा थी, वह थी –
(क) 303 राइफल
(ख) एनफील्ड राइफल
(ग) एस. एल. राइफल
(घ) ए.के. 47 राइफल
उत्तर:
(ख) एनफील्ड राइफल

8. 1857 के विद्रोह के समय भारत में अंग्रेज गवर्नर जनरल था –
(ख) लॉर्ड रिपन
(क) लॉर्ड डलहौजी
(ग) लॉर्ड केनिंग
(घ) लॉर्ड वेलेजली
उत्तर:
(ग) लॉर्ड केनिंग

9. सतीप्रथा को अवैध घोषित करने वाला कानून बना थी
(क) 1828 में
(ख) 1829 में
(ग) 1835 में
(घ) 1827 में
उत्तर:
(ख) 1829 में

10. ” ये गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।” यह कहना था –
(क) लॉर्ड विलियम बैंटिक का
(ख) लॉर्ड डलहौजी का
(ग) लॉर्ड केनिंग का
(घ) लॉर्ड मुनरो का
उत्तर:
(ख) लॉर्ड डलहौजी का

11. 1857 के विद्रोह का तात्कालिक कारण था-
(क) चर्बी वाले कारतूस
(ख) वेलेजली की सहायक सन्धि
(ग) ईसाई धर्म प्रचारक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) चर्बी वाले कारतूस

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12. कानपुर में विद्रोहियों का नेतृत्व किसने किया?
(क) नाना साहिब
(ख) तांत्या टोपे
(ग) रानी लक्ष्मीबाई
(घ) वाजिद अली
उत्तर:
(क) नाना साहिब

13. जमदार कुँवर सिंह का सम्बन्ध था –
(क) बरेली से
(ख) अजमेर से
(ग) आरा से
(घ) कलकत्ता से
उत्तर:
(ग) आरा से

14. एनफील्ड राइफलों का सर्वप्रथम प्रयोग किस गवर्नर जनरल ने प्रारम्भ किया?
(क) लॉर्ड हार्डिंग
(ग) लॉर्ड डलहौजी
(ख) लॉर्ड वेलेजली
(घ) हेनरी हार्डिंग
उत्तर:
(घ) हेनरी हार्डिंग

15. किस अंग्रेज गवर्नर जनरल ने सहायक सन्धि प्रारम्भ कौ ?
(क) लॉर्ड डलहौजी
(ख) लॉर्ड केनिंग
(ग) लॉर्ड क्लाइव
(घ) लॉर्ड वेलेजली
उत्तर:
(घ) लॉर्ड वेलेजली

16. अवध के नवाब वाजिद अली शाह को गद्दी से हटाकर कहाँ निष्कासित किया गया था ?
(क) कलकत्ता
(ख) बम्बई
(ग) रंगून
(घ) जयपुर
उत्तर:
(क) कलकत्ता

17. बंगाल आर्मी की पौधशाला कहा जाता था –
(क) कानपुर को
(ख) अवध को
(ग) अहमदाबाद को
(घ) अजमेर को
उत्तर:
(ख) अवध को

18. ‘रिलीफ ऑफ लखनऊ’ का चित्रकार कौन था?
(क) फेलिस विएतो
(ख) टॉमस जोन्स बार्कर
(ग) जोजेफ
(घ) पंच
उत्तर:
(ख) टॉमस जोन्स बार्कर

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19. किस भारतीय लेखिका ने यह कविता लिखी- “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।”
(क) रानी लक्ष्मीबाई
(ख) महादेवी वर्मा
(ग) सुभद्रा कुमारी चौहान
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) सुभद्रा कुमारी चौहान

20. विद्रोह के दौरान अवध मिलिट्री पुलिस के कैप्टेन कौन थे?
(क) कैप्टेन हियसें
(ख) नाना साहिब
(ग) शाह मल
(घ) हेनरी लॉरेंस
उत्तर:
(क) कैप्टेन हियसे

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

1. ……………….. “की दोपहर बाद मेरठ छावनी में सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया।
2. फिरंगी, फारसी भाषा का शब्द है जो ……………. शब्द से निकला है।
3. फ्रांस्वा सिस्टन ………………. के देसी ईसाई इंस्पेक्टर थे।
4. 1858 के अन्त में विद्रोह विफल होने के पश्चात् नाना साहिब भागकर …………… चले गए थे।
6. मौलवी …………… 1857 के विद्रोह में अहम भूमिका निभाने वाले बहुत सारे मौलवियों में से एक थे।
7. स्थानीय स्तर पर राजा कहलाने वाले शाहमल ने एक अंग्रेज अफसर के बंगले में डेरा डाला, उसे …………… का नाम दिया गया।
8. गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि को …………… कहा जाता था।
9. लॉर्ड वेलेजली द्वारा तैयार की गई सहायक सन्धि को अवध में ……………से लागू कर दी गई थी।
10. ताल्लुकदारों के रवैये को रायबरेली के पास स्थित …………… के राजा हनवन्त सिंह ने सबसे अच्छी तरह व्यक्त किया था।
11. ………….को बंगाल आर्मी की पौधशाला की संज्ञा दी गई थी।
12. …………… के चित्रकार जोजेफ नोएल पेटन हैं।
13. लखनऊ में विद्रोह की शुरुआत …………… मई को हुई थी।
उत्तर:
1. 10 मई, 1857
2. फ्रैंक
3. सीतापुर
4. नेपाल
5. पेशवा बाजीराव द्वितीय
6. अहमदुल्ला शाह
7. न्याय भवन
8. रेजीडेंट
9.1801
10. कालाकंकर
11. अवध
12. इन मेमोरियम
13. 30

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
झाँसी में 1857 के विद्रोह का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने

प्रश्न 2.
1857 के विद्रोह के समय मुगल बादशाह कौन था?
उत्तर:
बहादुरशाह जफर

प्रश्न 3.
अवध पर कब्जे में अंग्रेजों की दिलचस्पी क्यों थी?
उत्तर:
(1) अवध की जमीन कपास तथा नील की खेती हेतु अत्यधिक उपयुक्त थी।
(2) यह उत्तरी भारत का बाजार बन सकता था।

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प्रश्न 4.
1857 के विद्रोह के संदर्भ में इंग्लैण्ड और भारत में छपी तस्वीरों से दोनों देशों के लोगों में उत्पन्न संवेदनाओं की संक्षेप में तुलना कीजिए।
उत्तर:
ब्रिटेन के लोग विद्रोहियों को कुचलने की माँग कर रहे थे ये तस्वीरें भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना जगा रही थीं।

प्रश्न 5.
1857 के विद्रोह के समय भारत में मुगल सम्राट कौन थे?
उत्तर:
बहादुरशाह जफर।

प्रश्न 6.
ब्रिटिश अधिकारियों ने 1857 के विद्रोह को किस रूप में देखा ?
उत्तर:
सैनिक विद्रोह के रूप में।

प्रश्न 7.
दिल्ली पर विद्रोहियों के कब्जे का विद्रोह पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
दिल्ली पर विद्रोहियों के कब्जे के समाचार ने गंगा घाटी की छावनियों एवं दिल्ली के पश्चिम की कुछ छावनियों में विद्रोह को तीव्रता प्रदान की।

प्रश्न 8.
1857 के विद्रोह में साहूकार व अमीर लोग विद्रोहियों के क्रोध का शिकार क्यों बने?
उत्तर:
क्योंकि विद्रोही साहूकारों व अमीर लोगों को किसानों का उत्पीड़क व अंग्रेजों का पिट्ठू मानते थे।

प्रश्न 9.
लखनऊ में ब्रिटिश राज के ढहने की खबर पर लोगों ने किसे अपना नेता घोषित किया?
उत्तर:
नवाब वाजिद अली शाह के युवा बेटे बिरजिस कद्र को।

प्रश्न 10.
गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
रेजीडेंट।

प्रश्न 11.
सहायक संधि कब तैयार की गई थी?
उत्तर:
सहायक संधि 1798 में तैयार की गई थी।

प्रश्न 12.
अवध की रियासत को किस सन् में औपचारिक रूप से ब्रिटिश साम्राज्य का अंग घोषित किया गया ?
उत्तर:
सन् 1856 में।

प्रश्न 13.
अवध के अधिग्रहण के बाद 1856 में कौनसी ब्रिटिश भू-राजस्व व्यवस्था लागू की गई थी?
उत्तर:
एकमुश्त बन्दोबस्त नामक भू-राजस्व व्यवस्था।

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प्रश्न 14.
अवध जैसे जिन इलाकों में 1852 के दौरान प्रतिरोध बेहद सघन और लम्बा चला था, वहाँ लड़ाई की बागडोर किनके हाथों में थी?
उत्तर:
ताल्लुकदारों और उनके किसानों के हाथों में।

प्रश्न 15.
विद्रोहियों के बारे में अंग्रेजों की क्या राय थी?
उत्तर:
वे विद्रोहियों को एहसान फरामोश और बर्बर मानते थे।

प्रश्न 16.
विद्रोहियों ने दिल्ली पर अधिकार कब किया?
उत्तर:
11 मई, 1857 को

प्रश्न 17.
1857 के विद्रोह का सूत्रपात कब हुआ और कहाँ से हुआ?
उत्तर:
(1) 10 मई, 1857 को
(2) मेरठ से

प्रश्न 18.
1857 के विद्रोह का नेतृत्व करने वाले चार नेताओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) बहादुर शाह जफर
(2) नाना साहिब
(3) रानी लक्ष्मी बाई
(4) कुंवर सिंह

प्रश्न 19.
उत्तर प्रदेश के बड़ौत परगने में अंग्रेजों के विरुद्ध लोगों को विद्रोह करने के लिए किसने संगठित किया? वह किस कुटुम्ब से सम्बन्धित था?
उत्तर:
(1) शाहमल ने
(2) जाट कुटुम्ब से

प्रश्न 20.
1857 के विद्रोह से पूर्व भारतीय सैनिकों को कौनसी राइफलें दी गई थीं?
उत्तर:
एनफील्ड राइफल।

प्रश्न 21.
भारतीय सैनिकों ने किस अफवाह से प्रेरित होकर एनफील्ड राइफलों के कारतूसों का प्रयोग करने से क्यों इनकार कर दिया था ?
उत्तर:
इन कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी लगी हुई थी।

प्रश्न 22.
अंग्रेजों ने 1857 के विद्रोह से पूर्व गोद लेने को अवैध घोषित कर अनेक रियासतों पर अधिकार कर लिया था। ऐसी किन्हीं तीन रियासतों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) झांसी
(2) सतारा
(3) नागपुर।

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प्रश्न 23.
अंग्रेजों ने अवध के नवाब वाजिद अली शाह को गद्दी से हटा कर कहाँ निष्कासित कर दिया था ?
उत्तर:
कलकत्ता ।

प्रश्न 24.
“देह से जान जा चुकी थी, शहर की काया बेजान थी।” इस प्रकार का शोक और विलाप किस घटना पर किया जा रहा था?
उत्तर:
अवध के नवाब वाजिद अली शाह के कलकत्ता निष्कासन पर।

प्रश्न 25.
सामान्यतः विद्रोह का सन्देश किनके द्वारा फैल रहा था?
उत्तर:
सामान्यतः विद्रोह का सन्देश आम पुरुषों, महिलाओं एवं धार्मिक लोगों के माध्यम से फैल रहा था।

प्रश्न 26.
अवध के अधिग्रहण के बाद विद्रोहियों ने किसके नेतृत्व में अंग्रेजों का प्रतिरोध किया ?
उत्तर:
बेगम हजरत महल।

प्रश्न 27.
‘ बंगाल आर्मी की पौधशाला’ किस राज्य को कहा जाता था?
उत्तर:
अवध को ।

प्रश्न 28.
आजमगढ़ घोषणा किसके द्वारा जारी की गई थी और कब?
उत्तर:
(1) बहादुरशाह जफर के द्वारा
(2). 25 अगस्त, 1857 को

प्रश्न 29.
किस राज्य में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रतिरोध सबसे लम्बा चला?
उत्तर:
अवध में।

प्रश्न 30.
1857 के विद्रोह को किस रूप में याद किया जाता है?
उत्तर:
भारत के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के रूप में।

प्रश्न 31.
‘खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसीवाली रानी थी’ यह कविता किसने लिखी?
उत्तर:
सुभद्रा कुमारी चौहान ने

प्रश्न 32.
1857 के विद्रोह का तात्कालिक कारण क्या था?
उत्तर:
सैनिकों द्वारा गाव और सुअर की चर्बी लगे कारतूसों का विरोध

प्रश्न 33.
विद्रोहियों ने अंग्रेजों के अतिरिक्त साहूकारों और अमीरों पर हमला क्यों किया?
उत्तर:
क्योंकि वे इन्हें अपना शोषणकर्ता, उत्पीड़क होने के साथ अंग्रेजों का वफादार तथा पिट्टू मानते थे।

प्रश्न 34.
मौलवी अहमदुल्ला शाह के बारे में लोगों की क्या धारणा थी?
उत्तर:
लोगों की यह राय थी कि उनके पास कई जादुई ताकतें हैं।

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प्रश्न 35.
चिनहट की लड़ाई में किसकी हार हुई ?
उत्तर:
अंग्रेज सेनापति हेनरी लारेंस की।

प्रश्न 36.
सिंहभूम कहाँ है? इसमें किसानों का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
सिंहभूम वर्तमान में झारखण्ड में है। वहाँ किसानों का नेतृत्व गोनू ने किया था।

प्रश्न 37.
सैनिकों के साजो-सामान के आधुनिकीकरण का प्रयास किसने किया और इसका क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
(1) गवर्नर जनरल हार्डिंग ने
(2) उसने एनफील्ड राइफलों का प्रयोग शुरू किया।

प्रश्न 38.
अवध को ब्रिटिश साम्राज्य में कब व किसने मिलाया ?
उत्तर:
अवध को 1856 ई. में लार्ड डलहौजी ने ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाया।

प्रश्न 39.
अवध के अधिग्रहण का वहाँ की जनता पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
अवध के अधिग्रहण से वहाँ की जनता अंग्रेजों के विरुद्ध हो गई क्योंकि बहुत से लोग बेरोजगार हो गए।

प्रश्न 40.
अवध के अधिग्रहण का वहाँ के ताल्लुकदारों पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
अंग्रेजों ने अनेक ताल्लुकदारों की जमीनें छीन लीं, उनकी सेनाएँ भंग कर दी और उनके किले नष्ट कर दिए।

प्रश्न 41.
रंग बाग का निर्माण किसने करवाया ?
उत्तर:
नवाब वाजिद अली शाह ने

प्रश्न 42.
जनता में ब्रिटिश शासन के प्रति किस बात पर क्रोध था?
उत्तर:
अंग्रेजों ने अनेक भू-स्वामियों की जमीनें छीन लीं तथा घरेलू उद्योगों को नष्ट कर दिया।

प्रश्न 43.
विद्रोहियों की उद्घोषणाएँ किस डर को व्यक्त कर रही थीं?
उत्तर:
ब्रिटिश सत्ता हिन्दू और मुसलमानों की जाति और धर्म को नष्ट करके उन्हें ईसाई बनाने पर तुली थी।

प्रश्न 44.
विद्रोह को दबाने के लिए उत्तर भारत में अंग्रेजों ने क्या कार्यवाही की ?
उत्तर:
विद्रोह को दबाने के लिए कई पूरे उत्तर भारत में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया।

प्रश्न 45.
दिल्ली पर कब्जा करने में अंग्रेजों को कब सफलता मिल पाई ?
उत्तर:
दिल्ली पर दो तरफ से हमले किए गए। अंग्रेजों को दिल्ली पर पुनः कब्जा करने में सितम्बर, 1857 में सफलता मिली।

प्रश्न 46.
अवध के विद्रोह दमन के बारे में फॉरसिथ के विचार लिखिए।
उत्तर:
अवध में फॉरसिथ का यह अनुमान था कि अवध की तीन-चौथाई वयस्क पुरुष आबादी युद्ध में लगी हुई थी।

प्रश्न 47.
1857 के विद्रोह को कुचलने के लिए अंग्रेजों द्वारा उठाए गए कोई दो कदम बताइये ।
उत्तर:
(1) सम्पूर्ण उत्तर भारत में मार्शल ला लागू कर दिया गया।
(2) ब्रिटेन से नई सैनिक टुकड़ियाँ मंगाई गई।

प्रश्न 48.
विद्रोह के दौरान अंग्रेजों ने दहशत फैलाने के लिए क्या किया?
उत्तर:
अंग्रेजों द्वारा विद्रोहियों को तोप के मुँह से बाँध कर उड़ाया गया या सरेआम फाँसी पर लटकाया गया।

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प्रश्न 49.
ब्रिटिश अखबारों तथा पत्रिकाओं ने विद्रोह के बारे में क्या लिखा?
उत्तर:
ब्रिटिश अखबारों तथा पत्रिकाओं में विद्रोही सैनिकों द्वारा की गई हिंसा को बड़े लोमहर्षक शब्दों में छापा गया।

प्रश्न 50.
लखनऊ रेजीडेन्सी की रक्षा अंग्रेजों ने कैसे की?
उत्तर:
जेम्स आट्रम तथा हेनरी हेवलॉक ने वहाँ पहुँचकर विद्रोहियों को तितर-बितर किया और कैम्पबेल ने ब्रिटिश सेना को घेरे से छुड़ाया।

प्रश्न 51.
इन मेमोरियम’ चित्र का चित्रकार कौन था?
उत्तर:
‘इन मेमोरियम’ चित्र का चित्रकार जोजेफ नोएल पेटन था।

प्रश्न 52.
फिरंगी कौन थे?
उत्तर:
पश्चिमी लोगों को फिरंगी कहा जाता था।

प्रश्न 53.
विद्रोही ब्रिटिश राज को किस नाम से पुकारते थे?
उत्तर:
फिरंगी राज।

प्रश्न 54.
विद्रोहियों द्वारा स्थापित शासन संरचना का प्राथमिक उद्देश्य क्या था?
उत्तर:
बुद्ध की जरूरतों को पूरा करना।

प्रश्न 55.
किस भविष्यवाणी से विद्रोहियों को विद्रोह करने के लिए प्रोत्साहन मिला?
उत्तर:
प्लासी युद्ध के बाद 100 वर्ष पूरा होते ही 23 जून, 1857 को ब्रिटिश शासन समाप्त हो जाने की भविष्यवाणी से।

प्रश्न 56.
लार्ड विलियम बैंटिक के किन सामाजिक सुधारों से भारतीयों में असन्तोष व्याप्त था ?
उत्तर:
लार्ड विलियम बैंटिक ने सती प्रथा को समाप्त करने तथा हिन्दू विधवा विवाह को वैधता देने हेतु कानून बनाए थे।

प्रश्न 57.
रेजीडेन्ट को किस राज्य में तैनात किया जाता था?
उत्तर:
रेजीडेन्ट को ऐसे राज्य में तैनात किया जाता था जो अंग्रेजों के प्रत्यक्ष शासन के अन्तर्गत नहीं था।

प्रश्न 58.
“ये गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।” यह कथन किसका था और किस रियासत के बारे में था?
उत्तर:
(1) यह कथन लार्ड डलहौजी का था।
(2) यह अवध की रियासत के बारे में था।

प्रश्न 59.
अंग्रेजों ने अवध के किस नवाब को क्या आरोप लगाकर गद्दी से हटाया था?
उत्तर:
अंग्रेजों ने वाजिद अली शाह को यह कहकर गद्दी से हटाया कि वह अच्छी तरह शासन नहीं चला रहे थे।

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प्रश्न 60.
ब्रिटिश प्रेस में गवर्नर जनरल लार्ड केनिंग की किस घोषणा का मजाक उड़ाया गया ?
उत्तर:
फेनिंग की घोषणा का मजाक उड़ाया गया कि नमीं और दयाभाव से सैनिकों की वफादारी प्राप्त करने में मदद मिलेगी।

प्रश्न 61.
सहायक सन्धि किसके द्वारा तैयार की गई थी?
उत्तर:
सहायक सन्धि लार्ड वेलेजली के द्वारा तैया की गई थी।

प्रश्न 62.
अवध को किसने ब्रिटिश साम्राज्य में सम्मिलित किया था?
उत्तर:
लार्ड डलहौजी ने।

प्रश्न 63.
मौलवी अहमदुल्ला शाह कौन थे ?
उत्तर:
मौलवी अहमदुल्ला शाह ने 1857 के विद्रोह के लिए लोगों को संगठित किया और चिनहट के अंग्रेजों को परास्त किया।

प्रश्न 64.
1857 के विद्रोह के लिए लोगों को संगठित करने वाले दो विद्रोही नेताओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) शाहमल
(2) मौलवी अहमदुल्ला शाह।

प्रश्न 65.
1857 के विद्रोह से पूर्व लोगों में फैली हुई दो अफवाहों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) गाय और सुअर की चर्बी लगे हुए कारतूसों का प्रचलन
(2) सैनिकों के आटे में गाय और सुअर की हड्डियों का चूरा मिलाना।

प्रश्न 66.
रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु कब व कैसे हुई ?
उत्तर:
अंग्रेजों से लड़ते हुए जून, 1858 में रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु हुई।

प्रश्न 67.
अवध के ताल्लुकदारों में व्याप्त असन्तोष के दो कारण बताइये।
उत्तर:
(1) तालुकदारों को उनकी जमीनों से बेदखल करना
(2) उनकी सेनाओं को भंग करना।

प्रश्न 68.
1857 की क्रान्ति एक सैनिक विद्रोह था अथवा स्वतन्त्रता संग्राम? अपने उत्तर की पुष्टि में तर्क दीजिए।
उत्तर:
1857 ई. की क्रान्ति स्पष्ट रूप से एक स्वतन्त्रता संग्राम था क्योंकि इस क्रान्ति में प्रत्येक धर्म, जाति और समूह के लोगों ने भाग लिया था।

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प्रश्न 69.
अवध में लार्ड वेलेजली द्वारा सहायक सन्धि कब लागू की गई ?
उत्तर:
1801 ई. में।

प्रश्न 70.
लखनऊ रेजीडेन्सी के घेरे में विद्रोहियों द्वारा लखनऊ का कौनसा कमिश्नर मारा गया?
उत्तर:
सर हेनरी लारेन्स।

प्रश्न 71.
किन अंग्रेज अधिकारियों ने लखनऊ रेजीडेन्सी का घेरा डालने वाले विद्रोहियों को परास्त कर दिया ?
उत्तर:
जेम्स औट्रम, हेनरी हेवलाक तथा कैम्पबेल ने।

प्रश्न 72.
किसकी भारतीय सैनिकों के प्रति दया और सहानुभूति दिखाए जाने की नीति का अंग्रेजी समाचारपत्रों में मजाक उड़ाया गया ?
उत्तर:
भारत के गवर्नर जनरल कैनिंग की।

लघुत्तरात्मक प्रश्न 

प्रश्न 1.
मेरठ छावनी के विद्रोही सिपाहियों ने मुगल सम्राद् बहादुरशाह को क्या सन्देश पहुँचाया?
उत्तर:
दिल्ली के लाल किले के फाटक पर पहुँचकर मेरठ छावनी के विद्रोही सैनिकों ने मुगल सम्राट् बहादुरशाह को यह सन्देश पहुँचाया कि “हम मेरठ के सभी अंग्रेज पुरुषों को मारकर आए हैं क्योंकि वे हमें गाय और सूअर की चर्बी में लिपटे कारतूसों को दाँतों से खींचने के लिए मजबूर कर रहे थे। इससे हिन्दू और मुसलमानों, दोनों का धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। आप हमें अपना आशीर्वाद दे एवं हमारा नेतृत्व करें।”

प्रश्न 2.
मेरठ से विद्रोही सैनिकों का जत्था दिल्ली के लाल किले के फाटक पर कब पहुँचा? बहादुर शाह से मुलाकात का विद्रोह पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
मेरठ से विद्रोही सैनिकों का जत्था दिल्ली के लाल किले के फाटक पर 11 मई, 1857 को पहुंचा। किले में घुसे इन सैनिकों ने माँग की कि सम्राट् बहादुरशाह उन्हें अपना आशीर्वाद प्रदान करें। विद्रोही सैनिकों से घिरे बहादुरशाह के पास उनकी बात मानने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प न था। इस तरह इस विद्रोह ने एक वैधता | प्राप्त कर ली क्योंकि अब इसे मुगल बादशाह के नाम पर चलाया जा सकता था।

प्रश्न 3.
‘ब्रिटिश शासन’ ताश के किले की तरह बिखर गया। यह कथन किसने व क्यों कहा?
उत्तर:
मेरठ छावनी से प्रारम्भ भारतीय सैनिकों का विद्रोह मई-जून 1857 में तीव्र गति से देश भर में फैला। अंग्रेजों के पास विद्रोहियों की कार्यवाहियों का कोई जवाब नहीं था। उन्हें केवल अपनी जान व घर-बार बचाने की चिन्ता थी। इसी स्थिति के सन्दर्भ में एक अंग्रेज अधिकारी ने लिखा है कि “ब्रिटिश शासन ताश के किले की तरह बिखर गया।”

प्रश्न 4.
कला और साहित्य ने 1857 की स्मृति को जीवित रखने में किस प्रकार योगदान दिया ?
उत्तर:
(1) क्रान्तिकारी नेताओं को ऐसे नायकों के रूप में चित्रित किया जाता था जो देश को बुद्ध-स्थल की ओर ले जा रहे हैं। उन्हें लोगों को दमनकारी ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उत्तेजित करते हुए चित्रित किया जाता था।
(2) झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य का गौरवगान करने वाली कविताएँ लिखी गई सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।” अमर हो गई।

प्रश्न 5.
“ये गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।” अवध के विषय में लार्ड डलहौजी के उक्त विचारों की सत्यता का परीक्षण कीजिये।
उत्तर:
अंग्रेज अवध पर अधिकार करने के लिए लालायित थे क्योंकि वहाँ की जमीन नील और कपास की खेती के लिए उपयोगी थी और इस प्रदेश को उत्तरी भारत के एक बड़े बाजार के रूप में विकसित किया जा सकता था अतः 1856 में डलहौजी ने अवध के नवाब पर कुशासन का आरोप लगाकर उसे अपदस्थ कर दिया और अवध पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार अवध के विषय में कहा गया उपर्युक्त कथन सत्य सिद्ध हुआ।

प्रश्न 6.
दिल्ली उर्दू अखबार ने 14 जून, 1857 की अपनी रिपोर्ट में क्या लिखा?
उत्तर:
शहर में आम लोगों के लिए साग-सब्जी मिलना बन्द हो गया है। चंद बड़े लोगों को ही बाग- बगीचों से सब्जियाँ मिल पाती हैं। गरीब, मध्यम वर्ग उनको देखकर होंठों पर जीभ फिराकर रह जाता है। पानी भरने वालों ने पानी भरना बन्द कर दिया है तथा कुलीन लोग खुद घड़ों में पानी भरकर लाते हैं तब जाकर घर में खाना बनता है। शहर की आबोहवा खराब हो रही है। गन्दगी और बीमारियों के कारण महामारी फैल सकती है।

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प्रश्न 7.
सिस्टन की भेंट किससे हुई तथा दोनों में क्या वार्तालाप हुआ? लिखिए।
उत्तर:
सहारनपुर में सिस्टम की भेंट बिजनौर के मुस्लिम तहसीलदार से हुई। तहसीलदार ने उसे क्रान्तिकारी समझा और उससे अवध के बारे में बातचीत की। तहसीलदार ” क्या खबर है अवध की? काम कैसा चल रहा है?” सिस्टन” अगर हमें अवध में काम मिलता है, तो जनाब ए आली को भी पता लग जाएगा।” तहसीलदार ” भरोसा रखो, इस बार हम कामयाब होंगे। मामला काबिल हाथों में है।” यह तहसीलदार बिजनौर के विद्रोहियों का सबसे बड़ा नेता था।

प्रश्न 8.
कालाकांकर के राजा हनवन्तसिंह ने अंग्रेज अफसर से अपनी पीड़ा किन शब्दों में व्यक्त की? लिखिए।
उत्तर:
“साहिब आपके मुल्क के लोग हमारे देश में आए और उन्होंने हमारे राजाओं को खदेड़ दिया। एक ही झटके में आपने मेरे पुरखों की जमीन मेरे से छीन ली। मैं चुप रहा। फिर अचानक आपका बुरा वक्त शुरू हो गया। यहाँ के लोग आपके खिलाफ खड़े हो गए। तब आप मेरे पास आए, जिसे आपने बर्बाद किया था। मैंने आपकी जान बचाई है। लेकिन अब मैं अपने सिपाहियों को लेकर लखनऊ जा रहा हूँ, ताकि आपको देश से खदेड़ सकूँ।”

प्रश्न 9.
आजमगढ़ घोषणा किसके द्वारा किन वर्गों के लिए जारी की गई? धार्मिक नेताओं के लिए इसमें क्या कहा गया?
उत्तर:
आजमगढ़ घोषणा 25 अगस्त, 1857 को मुगल सम्राट बहादुरशाह द्वारा जमींदारों, व्यापारियों, सरकारी कर्मचारियों, कारीगरों और धार्मिक नेताओं के लिए जारी की गई। पण्डित और फकीर क्रमश: हिन्दू और मुस्लिम धर्मों के अभिभावक हैं। यूरोपीय दोनों धर्मों के शत्रु हैं और फिलहाल धर्म के कारण ही अंग्रेजों के खिलाफ एक युद्ध छिड़ा हुआ है। इसलिए पण्डितों और फकीरों का फर्ज है कि वे खुद को हमारे सामने पेश करें और इस पवित्र युद्ध में अपनी भूमिका निभाएँ।

प्रश्न 10.
इस स्रोत के आधार पर बताइये कि सिपाहियों ने क्यों विद्रोह में भाग लिया?
उत्तर:
(i) सिपाहियों को चर्बी लगे कारतूस चलाने को दिए गए, जिन्हें मुँह से काटकर खोलना पड़ता था । इससे उनका धर्म भ्रष्ट हो सकता था।
(ii) मना करने पर अनेक सिपाहियों को दण्डित किया गया, उन्हें जेल में बन्द कर दिया गया।
(iii) हम अपनी आस्था की रक्षा के लिए अंग्रेजों से लड़े। हम दो साल तक इसलिए लड़े, ताकि हमारी आस्था और मजहब दूषित न हो। अगर एक हिन्दू या मुसलमान का धर्म ही नष्ट हो गया, तो दुनिया में बचेगा ही क्या?

प्रश्न 11.
ग्रामीण अवध क्षेत्र से रिपोर्ट भेजने वाले अफसर ने अपनी रिपोर्ट में क्या लिखा?
उत्तर:
ग्रामीण अवध क्षेत्र से रिपोर्ट भेजने वाले अफसर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा- ” अवध के लोग उत्तर से जोड़ने वाली संचार लाइन पर जोर बना रहे हैं। ये लोग गाँव वाले हैं तथा यूरोपीय लोगों की पकड़ से बाहर हैं। पल में बिखर जाते हैं और पल में फिर जुट जाते हैं। शासकीय अधिकारियों का कहना है कि इन गाँव वालों की संख्या बहुत बड़ी है और उनके पास बाकायदा बंदूकें हैं।”

प्रश्न 12.
सहायक सन्धि ने अवध के नवाब को किस प्रकार असहाय बना दिया था?
उत्तर:
सहायक सन्धि के कारण अवध का नवाब वाजिद अली शाह अपनी सैनिक शक्ति से वंचित हो गया फलस्वरूप वह अपनी रियासत में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए दिन-प्रतिदिन अंग्रेजों पर निर्भर होता जा रहा था नवाब का विद्रोही मुखियाओं एवं ताल्लुकदारों पर भी कोई नियन्त्रण न रहा था।

प्रश्न 13.
अंग्रेजों द्वारा अवध के अधिग्रहण का स्थानीय जनता पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
अंग्रेजों द्वारा अवध के अधिग्रहण के कारण स्थानीय जनता ब्रिटिश शासन के विरुद्ध हो गई क्योंकि नवाब को हटाने से दरबार और उसकी संस्कृति नष्ट हो गई। संगीतकारों, नर्तकों, कवियों, बावचियों, नौकरों, सरकारी कर्मचारियों एवं अनेक लोगों की रोजी-रोटी समाप्त हो गयी थी।

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प्रश्न 14.
बहादुर शाह जफर कौन थे? संक्षेप में बताइए ।
उत्तर:
बहादुरशाह जफर द्वितीय अन्तिम मुगल सम्राट् था। अंग्रेज अधिकारियों ने कहा था कि बहादुरशाह जफर के उपरान्त उसके उत्तराधिकारियों को दिल्ली के लाल किले में नहीं रहने दिया जायेगा। इसी कारण से बहादुरशाह अंग्रेजों के विरुद्ध हो गये। विद्रोहियों ने जब बहादुरशाह से अपना प्रधान सेनापति बनने को कहा तो कुछ संकोच के साथ वह इस पर राजी हो गये। यद्यपि बहादुरशाह उस समय तक अत्यधिक वृद्ध हो चुके थे तो भी उन्होंने विद्रोहियों का नेतृत्व किया। बहादुरशाह ने सैनिकों द्वारा आरम्भ किये गये इस विद्रोह को युद्ध का रूप प्रदान कर दिया। किन्तु बहादुरशाह की यह योजना सफल नहीं हो सकी तथा उनको गिरफ्तार करके रंगून भेज दिया गया।

प्रश्न 15.
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
रानी लक्ष्मीबाई 1857 ई. के स्वतन्त्रता संग्राम की अग्रणी महिला क्रान्तिकारी थी। उनके पति को अंग्रेजों ने पुत्र गोद लेने की आज्ञा प्रदान नहीं की थी। लक्ष्मीबाई अपने पति की मृत्यु के उपरान्त झाँसी की शासिका बर्नी । इन्होंने कई युद्धों में अंग्रेजों को परास्त किया। 1858 ई. में अंग्रेज सेनापति हयूरोज ने झाँसी पर आक्रमण किया। तांत्या टोपे के साथ मिलकर इन्होंने बड़ी वीरता के साथ अपने किले की रक्षा की किन्तु वह पराजित हुई फिर भी अंग्रेजों को वाँछित सफलता प्राप्त नहीं हुई रानी ने वीरतापूर्वक शत्रुओं का सामना किया किन्तु रानी के कुछ अधिकारी अंग्रेजों से मिल गये। अतः रानी लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुई।

प्रश्न 16.
1857 की क्रान्ति के परिणामों पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
(1) भारत से ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन हमेशा के लिए समाप्त हो गया और उसके स्थान पर 1858 से महारानी विक्टोरिया की घोषणा के साथ भारत में ब्रिटिश ताज का शासन प्रारम्भ हो गया।
(2) अंग्रेजों की दमनात्मक नीति से भारतवासियों में तीव्र आक्रोश उत्पन्न हुआ।
(3) भारत की जनता में राष्ट्रीयता की भावना जगाने में इस क्रान्ति का सबसे बड़ा योगदान रहा। इसके फलस्वरूप भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन शुरू हुआ।

प्रश्न 17.
मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर ने विद्रोहियों का नेतृत्व करना क्यों स्वीकार कर लिया था?
उत्तर:
10 मई, 1857 को सैनिकों ने मेरठ में विद्रोह कर दिया। विद्रोही सैनिक 11 मई को दिल्ली पहुँच गए। उन्होंने मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को बताया कि अंग्रेज उन्हें गाय और सुअर की चर्बी लगे हुए कारतूस दाँतों से खींचने के लिए बाध्य कर रहे थे जिससे हिन्दू और मुसलमान दोनों का धर्म भ्रष्ट हो सकता था। इस समय बहुत से सैनिक लाल किले में प्रविष्ट हो गए। इन परिस्थितियों में मुगल- सम्राट को विद्रोहियों का नेतृत्व करना स्वीकार करना पड़ा।

प्रश्न 18.
विभिन्न सैनिक छावनियों के सैनिकों के बीच अच्छा संचार बना हुआ था।” स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
जब सातवीं अवध हरेग्युलर केवेलरी ने मई, 1857 के प्रारम्भ में नये कारतूसों का प्रयोग करने से इनकार कर दिया, तो उन्होंने 48वीं नेटिव इन्फेन्ट्री को लिखा कि “हमने अपने धर्म की रक्षा के लिए यह निर्णय लिया है और 48वीं नेटिव इन्फेन्ट्री के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं।” इस प्रकार विभिन्न सैनिक छावनियों में सम्पर्क बना ‘हुआ था तथा सैनिक या उनके सन्देशवाहक एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रहे थे। सभी लोगं विद्रोह को सफल बनाने के लिए प्रयत्नशील थे।

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प्रश्न 19.
1857 के विद्रोह सुनियोजित थे।” स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
41वीं नेटिव इन्फेन्ट्री ने अवध मिलिट्री पुलिस से अनुरोध किया कि अवध मिलिट्री पुलिस को या तो कैप्टेन हियरों का वध कर देना चाहिए या उसे गिरफ्तार करके उनके हवाले कर देना चाहिए। जब अवध मिलिट्टी पुलिस ने इन दोनों बातों को अस्वीकार कर दिया, तो इस मामले पर विचार करने के लिए हर रेजीमेन्ट के देशी अधिकारियों की एक पंचायत बुलाई गई। ये पंचायतें रात को कानपुर सिपाही लाइनों में जुटती थीं और सैनिक सामूहिक रूप से निर्णय लेते थे।

प्रश्न 20.
“अनेक स्थानों पर विद्रोह का सन्देश आम पुरुषों और महिलाओं के द्वारा तथा धार्मिक लोगों के द्वारा फैल रहा था।” व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
मेरठ में हाथी पर सवार एक फकीर विद्रोह का सन्देश फैला रहा था तथा उससे भारतीय सैनिक बार- बार मिलने जाते थे। लखनऊ में अवध पर अधिकार के बाद अनेक धार्मिक नेता ब्रिटिश शासन को समाप्त करने का अलख जगा रहे थे। कुछ स्थानों पर स्थानीय नेता लोगों को विद्रोह के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। शाहमल ने उत्तरप्रदेश में बड़ौत परगने के गाँव वालों को तथा छोटा नागपुर स्थित सिंहभूम के एक किसान गोनू ने वहाँ के आदिवासियों को संगठित किया।

प्रश्न 21.
नाना साहेब कौन थे? संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
नाना साहेब 1857 के विद्रोह के एक प्रमुख सेनापति थे। नाना साहेब एक वीर मराठा तथा पेशवा बाजीराव के दत्तक पुत्र थे। उन्होंने स्वयं को जून, 1857 में कानपुर में पेशवा घोषित कर दिया किन्तु अंग्रेजों ने उन्हें पेशवा मानने से मना कर दिया। नाना साहेब ने प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में अंग्रेजों का वीरता के साथ मुकाबला किया। कानपुर में क्रान्तिकारियों का नेतृत्व भी नाना साहेब ने किया तथा कर्नल नील से जबरदस्त संघर्ष किया। कर्नल नील अवध (वर्तमान उत्तर प्रदेश) से क्रान्तिकारियों का पूर्ण रूप से दमन करना चाहता था अतः कर्नल नील तथा नाना साहेब में भीषण युद्ध हुआ। दुर्भाग्य से युद्ध में नाना साहेब पराजित हो गये तथा वह वहाँ से भागकर नेपाल चले गये।

प्रश्न 22.
1857 की क्रान्ति के दौरान राजनीतिक असन्तोष के क्या कारण थे?
उत्तर:
1857 की क्रान्ति के दौरान राजनीतिक असन्तोष के निम्नलिखित कारण थे –
(1) मुगल बादशाह का अपमान-अंग्रेजों के भारत आगमन के पश्चात् मुगल साम्राज्य पतन की ओर अग्रसर था। अन्तिम मुगल बादशाह बहादुर शाह का शासन केवल लाल किले तक ही सीमित था।

(2) नाना साहिब व रानी लक्ष्मीबाई से अनुचित व्यवहार – लार्ड डलहौजी ने दत्तक प्रथा पर रोक लगाकर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र को शासक मानने से इन्कार कर दिया तथा झाँसी को हड़पने की नीति अपनाई जिससे रानी झाँसी अंग्रेजों के विरुद्ध हो गयी। नाना साहिब पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र थे अंग्रेजों ने उनकी पेंशन बन्द कर दी।

(3) अवध का अनुचित विलय- लार्ड डलहौजी ने अवध के नवाब वाजिद अली शाह पर कुशासन का आरोप लगाकर उन्हें हटा दिया तथा 1856 ई. में अवध का अंग्रेजी राज्य में विलय कर लिया।

(4) डलहौजी की हड़प नीति- डलहौजी ने अपनी साम्राज्यवादी हड़प नीति के तहत अनेक रियासतों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया फलस्वरूप उन रियासतों के शासक अंग्रेजों के विरुद्ध हो गये।

प्रश्न 23.
1857 ई. के विद्रोह के धार्मिक कारण कौन-कौनसे थे?
उत्तर:
1857 के विद्रोह के अनेक कारण उत्तरदायी थे। इसमें से धार्मिक कारण निम्न थे –
(1) 1813 में ईसाई मिशनरियों को भारत में कार्य करने की इजाजत दे दी।
(2) ये मिशनरियाँ भारतीयों को लालच देकर ईसाई बना रही थीं।
(3) लॉर्ड विलियम बैंटिक ने सती प्रथा सहित अनेक समाज सुधार किये जिसे भारतीयों ने अपने धर्म के विरुद्ध समझा।
(4) अनेक हिन्दू सिपाहियों को समुद्र मार्ग से बाहर भेजा गया। उस समय हिन्दू समुद्र की यात्रा करना अपवित्र मानते थे।
इन्हीं सब घटनाओं ने 1857 ई. के विद्रोह की नींव रखी।

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प्रश्न 24.
कानपुर और झांसी में किन नेताओं ने विद्रोहियों का नेतृत्व करना स्वीकार किया था?
उत्तर:
कानपुर में सैनिकों और शहर के लोगों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय के उत्तराधिकारी नाना साहिब को विद्रोह का नेतृत्व सम्भालने के लिए बाध्य किया। झांसी में भी रानी लक्ष्मी बाई को जनता के दबाव में विद्रोह की बागडोर सम्भालनी पड़ी। कुछ ऐसी ही स्थिति बिहार में आरा के स्थानीय जमींदार कुँवर सिंह की भी लखनऊ में ब्रिटिश राज की समाप्ति की सूचना पर लोगों ने नवाब वाजिद अली शाह के युवा पुत्र बिरजिस कद्र को अपना नेता घोषित कर दिया था।

प्रश्न 25.
सहायक सन्धि क्या थी और इसे किसने लागू किया था?
उत्तर:
सन् 1798 में लॉर्ड वेलेजली ने देशी शासकों पर कम्पनी का नियंत्रण स्थापित करने हेतु सहायक संधि की। इसकी शर्तें निम्न प्रकार थीं—
(1) देशी शासक को अपने खर्चे पर एक अंग्रेजी सेना अपने राज्य में रखनी होगी।
(2) बिना अंग्रेजों की अनुमति के वह देशी शासक किसी अन्य राज्य से न तो संधि करेगा और न ही युद्ध करेगा।
(3) बदले में अंग्रेज उस शासक को आन्तरिक एवं बाहरी चुनौतियों से रक्षा करेंगे।

प्रश्न 26.
1857 ई. की क्रान्ति में शाहमल के कार्यों का मूल्यांकन कीजिये।
अथवा
शाहमल कौन था और उसने 1857 के विद्रोह में क्या भूमिका निभाई?
उत्तर:
शाहमल उत्तर प्रदेश के बड़ौत परगने के एक बड़े गाँव के रहने वाले एक जाट परिवार में पैदा हुए थे। शाहमल ने चौरासी देस के मुखियाओं और काश्तकारों को संगठित किया तथा लोगों को विद्रोह करने हेतु प्रेरित किया। शाहमल के आदमियों ने सरकारी इमारतों पर हमला करके उन्हें नष्ट किया। लोग शाहमल को राजा के नाम से पुकारते थे। जुलाई, 1857 में शाहमल वीरगति को प्राप्त हो गए।

प्रश्न 27.
मौलवी अहमदुल्ला शाह कौन थे और उनके बारे में लोगों में क्या विश्वास था?
उत्तर:
हैदराबाद में शिक्षा प्राप्त करने के बाद कम उम्र में ही मौलवी अहमदुल्ला शाह उपदेशक बन गये थे। 1856 में उन्हें अंग्रेजों के विरुद्ध जिहाद (धर्मयुद्ध) का प्रचार करते हुए और लोगों को विद्रोह के लिए तैयार करते हुए देखा गया। जनता का मानना था कि मौलवी में जादुई ताकतें हैं, जिससे अंग्रेज उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं। 22वीं नेटिव इन्फैंट्री ने उन्हें अपना नेता चुन लिया। उन्होंने चिनहट की लड़ाई में हेनरी लारेंस की टुकड़ी को पराजित किया।

प्रश्न 28.
किन अफवाहों के द्वारा लोगों को विद्रोह करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा था?
उत्तर:
(1) सिपाहियों में यह अफवाह फैली हुई थी कि उनकी राइफलों में प्रयुक्त किए जाने वाले कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी लगी थी। इनका प्रयोग करने से उनकी जाति तथा धर्म के भ्रष्ट होने की सम्भावना थी।

(2) यह अफवाह भी जोरों पर थी कि अंग्रेजों ने बाजार में मिलने वाले आटे में गाय और सुअर की हड्डियों का चूरा मिलवा दिया है इसका उद्देश्य हिन्दुओं और मुसलमानों की जाति तथा धर्म को नष्ट करना था।

प्रश्न 29.
भारतीय लोग अफवाहों में विश्वास क्यों कर रहे थे?
अथवा
“अफवाहें तभी फैलती हैं, जब वे प्रभावशाली होती हैं, जब लोगों में बहुत ज्यादा भय और सन्देह फैल जाए।” 1857 के विद्रोह के संदर्भ में यह कथन कहाँ तक सत्य था?
उत्तर:
(1) लार्ड विलियम बैंटिक द्वारा सती प्रथा को समाप्त करने तथा हिन्दू विधवा विवाह को वैधता प्रदान करने वाले कानून बनाये गए थे। इनसे भारतीयों में असन्तोष
था।
(2) लार्ड डलहौजी द्वारा अवध, शांसी तथा सतारा जैसी रियासतों पर अधिकार करने से भारतीय नरेशों और जनता में आक्रोश व्याप्त था वहाँ अंग्रेजों द्वारा अपने ढंग की शासन व्यवस्था, अपने कानून, भू-राजस्व वसूली की अपनी व्यवस्था लागू किये जाने से भी भारतीयों में असन्तोष था ।

प्रश्न 30.
“देह से जान जा चुकी थी।” व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
जब 1856 में अवध के नवाब वाजिद अली शाह को गद्दी से हटाकर कलकत्ता निष्कासित कर दिया तो अवध के लोगों में दुःख और शोक की लहर दौड़ गई। एक लेखक ने लिखा था कि “देह से जान जा चुकी गया, थी। शहर की कला बेजान थी। कोई सड़क, बाजार और घर ऐसा न था, जहाँ से जान-ए-आलम (नवाब वाजिद अली शाह) से बिछुड़ने पर विलाप का शोर न गूँज रहा हो।”

प्रश्न 31.
अवध के नवाब वाजिद अली शाह के कलकत्ता निष्कासन से लोगों को दुःख और अपमान का एहसास क्यों हुआ?
उत्तर:
(1) अवध का नवाब वाजिद अली शाह अवध की जनता में बड़ा लोकप्रिय था। लोग उसे दिल से चाहते थे। अतः नवाब के निष्कासन पर लोगों को प्रबल आघात पहुँचा।
(2) नवाब को अपदस्थ किये जाने से दरबार और उसकी संस्कृति भी समाप्त हो गई थी।
(3) नवाब के निष्कासन से अनेक संगीतकारों, नर्तकों, कवियों, कारीगरों, बावर्चियों, नौकरों, सरकारी कर्मचारियों और बहुत सारे लोगों की रोजी-रोटी जाती रही।

प्रश्न 32.
“ताल्लुकदारों की सत्ता छिनने के परिणामस्वरूप पूरी सामाजिक व्यवस्था भंग हो गई।” विवेचना कीजिये।
उत्तर:
जनता की दृष्टि में बहुत से ताल्लुकदार दयालु संरक्षक की भाँति आचरण करते थे। वे संकटपूर्ण परिस्थितियों में किसानों की सहायता भी करते थे। अब इस बात की कोई गारन्टी नहीं थी कि कठिन समय में या फसल खराब होने पर सरकार राजस्व माँग में कोई कमी करेगी। न ही किसानों को इस बात की आशा थी कि तीज-त्यौहारों पर उन्हें कोई ऋण और सहायता मिल जायेगी जो पहले ताल्लुकदारों से मिल जाती थी।

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प्रश्न 33.
1857 के जन-विद्रोह से पहले अवध के सैनिकों में असन्तोष के क्या कारण थे?
उत्तर:
(1) सैनिक कम वेतन और समय पर अवकाश न मिलने के कारण असन्तुष्ट थे।
(2) सैनिक अधिकारी सैनिकों के साथ अपमानजनक व्यवहार करते थे।
(3) गाय और सुअर की चर्बी लगे हुए कारतूसों के कारण भी सैनिकों में असन्तोष था ।
(4) बंगाल आर्मी के सैनिकों में बहुत सारे सैनिक अवध के गाँवों से भर्ती होकर आए थे उनके ग्रामीणों से अच्छे सम्बन्ध थे। अतः जब सैनिक अपने अधिकारियों के विरुद्ध हथियार उठाते थे, तो ग्रामीण लोग उनका साथ देते थे।

प्रश्न 34.
बीसवीं सदी के राष्ट्रवादी आन्दोलन को 1857 के घटनाक्रम से क्या प्रेरणा मिल रही थी ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
1857 का विद्रोह प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम था जिसमें देश के सभी वर्गों के लोगों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध मिलकर संघर्ष किया था। कलाकारों और साहित्यकारों ने 1857 के विद्रोह के नेताओं को ऐसे नायकों के रूप में प्रस्तुत किया जो देश को रणस्थल की ओर ले जा रहे थे। बहादुरशाह, नाना साहिब, रानी लक्ष्मी बाई, कुंवर सिंह आदि ने अपने पराक्रमपूर्ण कार्यों, त्याग और बलिदान से भारतीयों में राष्ट्रीयता का प्रसार किया और राष्ट्रीय आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार की।

प्रश्न 35.
ब्रिटिश भू-राजस्व व्यवस्था का ताल्लुकदारों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
एकमुश्त बन्दोबस्त के द्वारा ताल्लुकदारों को बेदखल किया जाने लगा। आँकड़ों से पता चलता है कि अंग्रेजों के आने से पहले ताल्लुकदारों के पास अवध के 67% गाँव थे एकमुश्त बन्दोबस्त लागू होने के बाद यह संख्या घटकर 38 प्रतिशत रह गई दक्षिण अवध के ताल्लुकदारों पर सबसे बुरी मार पड़ी। कुछ के आधे से अधिक गाँव उनके हाथ से निकल गए। इस प्रकार ब्रिटिश भू-राजस्व व्यवस्था ने ताल्लुकदारों की प्रतिष्ठा तथा सत्ता को प्रबल आघात पहुँचाया।

प्रश्न 36.
एकमुश्त बन्दोबस्त से न तो ताल्लुकदार खुश थे और न ही कृषक वर्ग खुश था, क्यों? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
एकमुश्त बन्दोबस्त लागू करने की योजना के पीछे अंग्रेजों की यह सोच थी कि वे ताल्लुकदारों को हटाकर जमीन का मालिकाना हक असली मालिकों यानी किसानों को सौंप देंगे। इससे किसानों के शोषण में कमी आयेगी तथा राजस्व वसूली में भी वृद्धि होगी और ताल्लुकदारों की शक्ति में कमी आयेगी लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं हो पाया। ताल्लुकदार बेदखल किए गए और राजस्व वसूली में भी इजाफा हुआ लेकिन किसानों के बोझ में कमी नहीं आई।

प्रश्न 37.
विद्रोही किस वैकल्पिक सत्ता की तलाश कर रहे थे?
उत्तर:
ब्रिटिश शासन ध्वस्त हो जाने के बाद विद्रोही नेता अठारहवीं सदी की पूर्व व्यवस्था को पुनर्स्थापित करना चाहते थे। इन नेताओं ने पुरानी दरबारी संस्कृति का सहारा लिया। विभिन्न पदों पर नियुक्तियाँ की गई भू-राजस्व वसूली और सैनिकों के वेतन भुगतान का प्रबन्ध किया गया। लूटपाट बन्द करने के हुक्मनामे जारी किए गए तथा इसके साथ ही अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध जारी रखने की योजनाएँ भी बनाई गई। सेना की कमान श्रृंखला तय की गई।

प्रश्न 38.
1857 के विद्रोह के पूर्व अंग्रेज अफसरों और सैनिकों के सम्बन्धों की विवेचना कीजिये।
उत्तर:
(1) 1820 के दशक में गोरे अफसरों के अपने सैनिकों और मातहतों के साथ दोस्ताना सम्बन्ध थे। वे उनके साथ मौज-मस्ती करते थे, मल्लयुद्ध करते थे तथा तलवारबाजी करते थे।
(2) 1840 के दशक में अफसरों और सैनिकों के सम्बन्धों में काफी बदलाव आ गया था। अफसर सिपाहियों को कमतर नस्ल का मानने लगे थे। वे उनकी भावनाओं की जरा भी कद्र नहीं करते थे सैनिकों के साथ गाली- गलौज और शारीरिक हिंसा साधारण बात हो गई।

प्रश्न 39.
विद्रोहियों द्वारा परस्पर सम्पर्क करने के लिए संचार के कौन-से माध्यम थे?
उत्तर:
(1) विभिन्न छावनियों के सैनिक या उनके संदेशवाहक विद्रोह का संदेश देने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रहे थे (2) 41वीं नेटिव इन्फेन्ट्री ने अंग्रेजों पर आक्रमण करने के लिए अवध मिलिट्री पुलिस से सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया। (3) सामूहिक रूप से निर्णय लेने के लिए देशी अफसरों की पंचायतें आयोजित की जा रही थीं। सैनिक एक साथ बैठकर अपने भविष्य के बारे में निर्णय लेते थे।

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प्रश्न 40.
अंग्रेज अवध पर अधिकार करने के लिए क्यों लालायित थे?
उत्तर:
(1) अंग्रेजों की मान्यता थी कि अवध की भूमि नील और कपास की खेती के लिए बहुत लाभदायक थी और इस प्रदेश को उत्तरी भारत के एक बड़े बाजार के रूप में विकसित किया जा सकता था
(2) अंग्रेज मराठा- भूमि, दोआब, कर्नाटक, पंजाब, बंगाल आदि पर अपना आधिपत्य स्थापित कर चुके थे। अवध पर अधिकार करके अंग्रेज क्षेत्रीय विस्तार की आकांक्षा पूरी करना चाहते थे।

प्रश्न 41.
20वीं शताब्दी में भारतीय राष्ट्रवादी आन्दोलन ने किससे प्रेरणा ली?
उत्तर:
20वीं शताब्दी में भारतीय राष्ट्रवादी आन्दोलन ने 1857 के घटनाक्रम से प्रेरणा ली। इस विद्रोह के आस- पास राष्ट्रवादी कल्पना का एक विस्तृत दृश्य जगत बुन दिया गया था तथा इसको प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के रूप में याद किया जाता था, जिसमें प्रत्येक वर्ग ने साम्राज्यवादी शासन के विरुद्ध मिल-जुलकर संघर्ष किया था।

प्रश्न 42.
इतिहास लेखन की तरह कला और साहित्य ने भी 1857 की स्मृति को जीवित रखने में योगदान दिया? रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण देते हुए स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इतिहास लेखन की तरह कला और साहित्य ने भी 1857 की स्मृति को जीवित रखने में योगदान दिया। साहित्य एवं चित्रों में 1857 के विद्रोह के नेताओं को एक ऐसे नायकों के रूप में प्रस्तुत किया जाता था जो देश को युद्ध स्थल की ओर ले जा रहे थे। उन्हें जनता को अत्याचारी साम्राज्यवादी शासन के विरुद्ध उत्तेजित करते हुए चित्रित किया जाता था। एक हाथ में घोड़े की रास एवं दूसरे हाथ में तलवार लिए हुए अपनी मातृभूमि की मुक्ति के लिए संघर्ष करने वाली रानी लक्ष्मीबाई की वीरता का गौरव गान करते हुए कविताएँ लिखी गयीं। देश के विभिन्न हिस्सों में बच्चे सुभद्रा कुमारी चौहान की इन पंक्तियों को पढ़ते हुए बड़े हो रहे थे ” खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।”

प्रश्न 43.
1857 के विद्रोही उत्पीड़न के किन प्रतीकों के विरुद्ध थे?
उत्तर:

  • विद्रोही अंग्रेजों द्वारा देशी रियासतों पर अधिकार करने के लिए उनकी निन्दा करते थे
  • ब्रिटिश भू-राजस्व व्यवस्था ने बड़े-छोटे भू-स्वामियों को जमीन से बेदखल कर दिया था और विदेशी व्यापार ने दस्तकारों तथा बुनकरों को बर्बाद कर दिया था।
  • अंग्रेजों ने स्थापित सुन्दर जीवन शैली को नष्ट कर दिया था।
  • अंग्रेज हिन्दुओं और मुसलमानों की जाति तथा धर्म को नष्ट करने के लिए प्रयत्नशील थे।
  • सूदखोर भी सामान्य जनता का शोषण करते थे।

प्रश्न 44.
अंग्रेजों ने विद्रोहियों के दमन के लिए क्या उपाय किये?
उत्तर:

  • सम्पूर्ण उत्तर भारत में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। यह घोषित किया गया कि विद्रोह की केवल एक ही सजा हो सकती है सजा-ए-मौत’
  • ब्रिटेन से नई सैनिक टुकड़ियाँ मंगाई गई
  • अंग्रेजों ने जमींदारों तथा किसानों की एकता को भंग करने हेतु जमींदारों को आश्वस्त किया कि उन्हें उनकी जागीरें लौटा दी जायेंगी।
  • स्वामिभक्त जमींदारों को पुरस्कृत किया गया तथा विद्रोही जमींदारों को उनकी जमीनों से बेदखल कर दिया गया।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
1857 के विद्रोह को नेतृत्व प्रदान करने वाले नेताओं तथा अनुयायियों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
1857 के विद्रोह को नेतृत्व प्रदान करने वाले नेता और अनुयायी 1857 के विद्रोह को नेतृत्व प्रदान करने वाले नेताओं और अनुयायियों का वर्णन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है-

(1) मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर 10 मई 1857 को भारतीय सैनिकों ने मेरठ में विद्रोह कर दिया। विद्रोही सैनिक 11 मई को दिल्ली पहुँच गए। उन्होंने मुगल- सम्राट बहादुरशाह जफर को बताया कि अंग्रेज उन्हें गाय और सुअर की चर्बी लगे हुए कारतूसों को दाँतों से खींचने के लिए बाध्य कर रहे थे, जिससे हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों का धर्म भ्रष्ट हो सकता था। इस समय बहुत से सैनिक लालकिले में प्रविष्ट हो गये और उन्होंने मुगल- सम्राट से उन्हें नेतृत्व प्रदान करने की प्रार्थना की। इन परिस्थितियों में मुगल सम्राट बहादुरशाह को विद्रोहियों का नेतृत्व करने के लिए बाध्य होना पड़ा। बहादुरशाह के पास अन्य कोई विकल्प नहीं था।

(2) नाना साहिब कानपुर में सैनिकों और शहर के लोगों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय के उत्तराधिकारी नाना साहिब से विद्रोह का नेतृत्व करने का अनुरोध किया जिसे उन्हें स्वीकार करना पड़ा। नाना साहिब के पास भी विद्रोह का नेतृत्व संभालने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं था।

(3) झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई 1857 के विद्रोह की गुंज झाँसी में भी सुनाई दी। सैनिकों और आम जनता ने झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई से विद्रोह का नेतृत्व सँभालने की प्रार्थना की रानी लक्ष्मीबाई को सैनिकों और आम जनता के दबाव में विद्रोह का नेतृत्व सँभालना पड़ा।

(4) कुँवर सिंह बिहार के लोगों ने भी 1857 के विद्रोह में भाग लिया। आरा (बिहार) के लोगों ने वहाँ के जमींदार कुँवर सिंह से विद्रोह का नेतृत्व सँभालने की गुजारिश की। उन्हें भी विवश होकर विद्रोह का नेतृत्व संभालना पड़ा।

(5) बिरजिस कद्र लखनऊ में ब्रिटिश राज की समाप्ति की सूचना पर लखनऊ के लोगों ने अवध के नवाब वाजिद अली शाह के युवा पुत्र विरजिस कद्र को अपना नेता घोषित कर दिया।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

(6) अन्य नेता-मेरठ में हाथी पर सवार एक फकीर ने विद्रोह के सन्देश का प्रसार किया। शाहमल ने उत्तर प्रदेश में बढ़ौत परगने के गाँव वालों को संगठित किया और अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया छोटा नागपुर स्थित सिंहभूम के एक आदिवासी किसान गोनू ने वहाँ के कोल आदिवासियों को नेतृत्व प्रदान किया हैदराबाद में शिक्षा प्राप्त मौलवी अहमदुल्ला शाह ने गाँव-गाँव में जाकर लोगों को अंग्रेजों के विरुद्ध संगठित किया। 1857 में उन्होंने चिनहट की लड़ाई में हेनरी लारेन्स की सैनिक टुकड़ियों को परास्त किया।

प्रश्न 2.
1857 के जनविद्रोह का आरम्भ किस प्रकार हुआ? इसके विस्तार को भी बतलाइए।
उत्तर:
1857 के जनविद्रोह का आरम्भ- 1857 के जनविद्रोह का आरम्भ 10 मई, 1857 को दोपहर पश्चात् मेरठ छावनी से हुआ था। यहाँ इस विद्रोह की शुरुआत भारतीय सैनिकों की पैदल सेना ने की। शीघ्र ही यह विद्रोह घुड़सवार सेना एवं शहर तक फैल गया। शहर और आस-पास क गाँवों के लोग सैनिकों के साथ जुड़ गए सैनिकों ने हथियार एवं गोला बारूद से भरे हुए शस्त्रागार पर अधिकार कर लिया।

विद्रोह का विस्तार- 1857 के विद्रोह का विस्तार देशव्यापी होता चला गया। विद्रोही सैनिक 11 मई, 1857 को प्रातः लाल किले के फाटक पर पहुँचे। रमजान का महीना था मुगल बादशाह बहादुरशाह नमाज पढ़कर एवं सहरी खाकर उठे ही थे कि उन्हें फाटक पर शोरगुल सुनाई दिया। बाहर खड़े सैनिकों ने उन्हें बताया कि वे मेरठ के सभी अंग्रेज पुरुषों को मारकर आए हैं क्योंकि वे हमें गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूस दाँतों से खोलने के लिए मजबूर कर रहे थे।

इससे हिन्दू और मुसलमान दोनों का धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। तब तक विद्रोही सैनिकों का एक और दल दिल्ली में प्रवेश कर चुका था। दिल्ली शहर की आम जनता भी उनके साथ जुड़ने लगी। अनेकों अंग्रेज मारे गये। दिल्ली के अमीर लोगों पर भी हमले हुए और लूटपाट हुई। विद्रोही सैनिकों से घिरे बहादुरशाह के पास उनकी बात मानने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं था। इस तरह विद्रोह ने एक नेतृत्व प्राप्त कर लिया क्योंकि अब उसे मुगल बादशाह बहादुर शाह के नाम पर चलाया जा सकता था। 12 व 13 मई 1857 को उत्तर भारत में शान्ति रही परन्तु जैसे ही यह खबर फैली कि दिल्ली पर विद्रोहियों का अधिकार हो चुका है तथा इस विद्रोह को मुगल बादशाह बहादुरशाह ने समर्थन दे दिया, परिस्थितियों में तेजी से बदलाव आया।

गंगा घाटी एवं दिल्ली के पश्चिम की कुछ छावनियों में विद्रोह के स्वर तीव्र होने लगे। विद्रोह में आम जनता के सम्मिलित होने से हमलों में विस्तार आता गया। लखनऊ, कानपुर एवं बरेली जैसे बड़े शहरों में साहूकार एवं धनिक वर्ग के लोगों पर भी विद्रोहियों ने हमले प्रारम्भ कर दिये। अधिकांश स्थानों पर धनिक वर्ग के घर-बार लूटकर ध्वस्त कर दिए गए। इन छिटपुट विद्रोहों ने शीघ्र ही चौतरफा विद्रोह का रूप धारण कर लिया।

ब्रिटिश शासन की सत्ता की खुलेआम अवहेलना होने लगी। 1857 के विद्रोह का विस्तार अवध (लखनऊ) में भी हुआ। यहाँ विद्रोह का सबसे भयंकर रूप देखने को मिला। अंग्रेजों ने यहाँ के नवाब वाजिद अली शाह को शासन से हटा दिया था। यहाँ विद्रोह का नेतृत्व नवाब के. युवा पुत्र बिरजिस कद्र ने किया था कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व नाना साहब ने झांसी में रानी लक्ष्मीबाई ने तथा बिहार के आरा में स्थानीय जमींदार कुंवर सिंह ने इस विद्रोह का नेतृत्व किया। इस प्रकार 1857 का जन विद्रोह का विस्तार होता चला गया।

प्रश्न 3.
1857 के विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों ने क्या-क्या कार्यवाहियों की?
उत्तर:
1857 के विद्रोह के दमन के लिए अंग्रेजों ने निम्नलिखित उपाय किये –
(1) नये कानूनों को लागू करना मई-जून, 1857 में पारित किए गए कानूनों के जरिए पूरे उत्तर भारत में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। फौजी अफसरों के अलावा आम अंग्रेजों को भी ऐसे हिन्दुस्तानियों पर मुकदमा चलाने और उनको दण्डित करने का अधिकार दे दिया गया, जिन पर विद्रोह में शामिल होने का शक था।

(2) दिल्ली पर नियंत्रण के लिए दोतरफा आक्रमण – नए विशेष कानूनों और ब्रिटेन से मंगाई गई सैनिक टुकड़ियों से लैस अंग्रेज सरकार ने विद्रोह को ‘कुचलने का काम शुरू कर दिया विद्रोहियों की तरह अंग्रेज भी दिल्ली के महत्व को जानते थे इसलिए उन्होंने दिल्ली पर दो तरफ से हमला किया। एक कलकत्ते की ओर से और दूसरा पंजाब की ओर से। दिल्ली पर नियंत्रण की मुहिम सितम्बर के आखिर में जाकर पूरी हुई। इसका एक कारण था कि पूरे उत्तर भारत के विद्रोही राजधानी को बचाने के लिए दिल्ली में एकत्र हो गए थे।

(3) गंगा के मैदान में विद्रोहियों का दमनगंगा के मैदान में भी अंग्रेजों को धीरे-धीरे बढ़त हासिल हुई, क्योंकि उन्हें गाँव-दर-गाँव को जीतना था। आम देहाती जनता और आसपास के लोग उनके खिलाफ थे जैसे ही अंग्रेजों ने अपनी उपद्रव विरोधी कार्यवाही शुरू की, वैसे ही उन्हें एहसास हो गया कि वे जिनसे जूझ रहे हैं, उनके पीछे बेहिसाब जनसमर्थन मौजूद है।

(4) विद्रोहियों की एकता को तोड़ने के प्रयास-विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों ने अपनी सैनिक ताकत का भयानक पैमाने पर इस्तेमाल किया। साथ ही उत्तर प्रदेश के भू-स्वामियों और काश्तकारों के विरोध की धार कम करने के लिए अंग्रेजों ने उनकी एकता को तोड़ने के प्रयास भी किए। इसके लिए उन्होंने बड़े जमींदारों को यह आश्वासन दिया कि उनकी जागीरें लौटा दी जायेंगी। विद्रोह का रास्ता अपनाने वाले जागीरदारों की जागीरें जब्त युवा पुत्र बिरजिस कद्र ने किया था कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व नाना साहब ने झांसी में रानी लक्ष्मीबाई ने तथा बिहार के आरा में स्थानीय जमींदार कुंवर सिंह ने इस विद्रोह का नेतृत्व किया। इस प्रकार 1857 का जन विद्रोह का विस्तार होता चला गया।

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प्रश्न 3.
1857 के विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों ने क्या-क्या कार्यवाहियों की?
उत्तर:
1857 के विद्रोह के दमन के लिए अंग्रेजों ने निम्नलिखित उपाय किये
(1) नये कानूनों को लागू करना मई-जून, 1857 में पारित किए गए कानूनों के जरिए पूरे उत्तर भारत में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। फौजी अफसरों के अलावा आम अंग्रेजों को भी ऐसे हिन्दुस्तानियों पर मुकदमा चलाने और उनको दण्डित करने का अधिकार दे दिया गया, जिन पर विद्रोह में शामिल होने का शक था।

(2) दिल्ली पर नियंत्रण के लिए दोतरफा आक्रमण – नए विशेष कानूनों और ब्रिटेन से मंगाई गई सैनिक टुकड़ियों से लैस अंग्रेज सरकार ने विद्रोह को ‘कुचलने का काम शुरू कर दिया विद्रोहियों की तरह अंग्रेज भी दिल्ली के महत्व को जानते थे इसलिए उन्होंने दिल्ली पर दो तरफ से हमला किया। एक कलकत्ते की ओर से और दूसरा पंजाब की ओर से। दिल्ली पर नियंत्रण की मुहिम सितम्बर के आखिर में जाकर पूरी हुई। इसका एक कारण था कि पूरे उत्तर भारत के विद्रोही राजधानी को बचाने के लिए दिल्ली में एकत्र हो गए थे।

(3) गंगा के मैदान में विद्रोहियों का दमनगंगा के मैदान में भी अंग्रेजों को धीरे-धीरे बढ़त हासिल हुई, क्योंकि उन्हें गाँव-दर-गाँव को जीतना था। आम देहाती जनता और आसपास के लोग उनके खिलाफ थे जैसे ही अंग्रेजों ने अपनी उपद्रव विरोधी कार्यवाही शुरू की, वैसे ही उन्हें एहसास हो गया कि वे जिनसे जूझ रहे हैं, उनके पीछे बेहिसाब जनसमर्थन मौजूद है।

(4) विद्रोहियों की एकता को तोड़ने के प्रयास-विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों ने अपनी सैनिक ताकत का भयानक पैमाने पर इस्तेमाल किया। साथ ही उत्तर प्रदेश के भू-स्वामियों और काश्तकारों के विरोध की धार कम करने के लिए अंग्रेजों ने उनकी एकता को तोड़ने के प्रयास भी किए। इसके लिए उन्होंने बड़े जमींदारों को यह आश्वासन दिया कि उनकी जागीरें लौटा दी जायेंगी। विद्रोह का रास्ता अपनाने वाले जागीरदारों की जागीरें जब्त कर ली गई। जो अंग्रेजों के वफादार थे, उन्हें पुरस्कृत किया गया। बहुत सारे जमींदार या तो अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते मारे गए या भागकर नेपाल चले गए, जहाँ और भूख स्पे दम तोड़ दिया।

(5) दहशत का प्रदर्शन आम जनता में दहशत फैलाने के लिए अंग्रेजों ने विद्रोहियों को खुलेआम फाँसी पर लटकाया या तोपों के मुँह से बाँधकर उड़ाया, जिससे लोग विद्रोह करने से डरें।

प्रश्न 4.
1857 ई. में फैली अफवाहों पर लोग क्यों विश्वास कर रहे थे? विस्तारपूर्वक बताइए।
उत्तर:
1857 ई. में फैली अफवाहों पर लोग निम्न कारणों से विश्वास कर रहे थे –
(1) ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार का सुधारात्मक कार्य यदि 1857 की अफवाहों को 1820 के दशक से अंग्रेजों द्वारा अपनायी जा रही नीतियों के सन्दर्भ में देखा जाए तो इनका अर्थ आसानी से समझा जा सकता है। उस समय गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक के नेतृत्व में ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार पश्चिमी शिक्षा, पश्चिमी विचार एवं पश्चिमी संस्थानों के माध्यम से भारतीय समाज में आवश्यक सुधार करने हेतु विशेष प्रकार की नीतियाँ लागू कर रही थी।

(2) सती प्रथा का निषेध-गवर्नर जनरल लार्ड विलियम वैटिक ने 1829 ई. में सती प्रथा को समाप्त करने के लिए एक कानून का निर्माण किया जिसमें सती प्रथा को अवैध ठहराया गया। इसके अतिरिक्त हिन्दू विधवा विवाह को वैधता प्रदान करने के लिए कानून बनाए गए थे।

(3) डलहौजी की हड़प नीति- लार्ड डलहौजी ने भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को विस्तार प्रदान करने के लिए शासकीय कमजोरी एवं दत्तकता को अवैध घोषित कर देने के बहाने अवध, झाँसी व सतारा जैसी अनेक रियासतों को अपने नियन्त्रण में ले लिया था। जैसे ही कोई भारतीय रियासत अंग्रेजों के अधिकार में आती, वहाँ पर अंग्रेज अधिकारी अपने ढंग की शासन पद्धति, अपने कानून, भूमि विवाद निपटाने की पद्धति एवं भू-राजस्व वसूली की अपनी व्यवस्था लागू कर देते थे। उत्तर भारत के लोगों पर इन कार्यवाहियों का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा।

(4) ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के अंग्रेज अधिकारियों ने ईसाई धर्म का प्रसार करने हेतु ईसाई धर्म प्रचारकों को प्रोत्साहित किया। भारत के निर्धन वर्ग के लोग ईसाई धर्म को स्वीकार कर रहे थे क्योंकि उन्हें अंग्रेजों द्वारा अनेक सुविधाएँ प्राप्त हो रही थीं, इस प्रकार नवीन सुधारक नीतियों एवं ईसाई धर्म प्रचारको की गतिविधियों से इस सोच को बल मिल रहा था कि अंग्रेजों द्वारा भारतीयों की सभ्यता व संस्कृति को नष्ट किया जा रहा है, ऐसे अनिश्चित वातावरण में अफवाहें रातों रात फैलने लगती थीं।

प्रश्न 5.
“ये गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।” डलहौजी की इस टिप्पणी को विस्तार से समझाइए।
उत्तर:
अपनी हड़प नीति के लिए कुख्यात लॉर्ड डलहौजी ने 1851 में अवध की रियासत के विषय में कहा था कि ये गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।” 1856 में अर्थात् इस टिप्पणी के पाँच वर्ष बाद अवध पर कुशासन का आरोप लगाकर ब्रिटिश राज्य में मिला लिया गया तथा अवध के नवाब को वहाँ से निर्वासित कर कलकत्ता भेज दिया गया। रियासतों पर अनैतिक रूप से कब्जे की शुरुआत 1798 ई. में आरम्भ हुई थी, जब निजाम को जबरदस्ती लॉर्ड वेलेजली ने सहायक सन्धि पर हस्ताक्षर करने को विवश कर दिया। इसके कुछ समय उपरान्त अर्थात् 1801 ई. में अवध पर सहायक सन्धि थोप दी गयी थी।

इस सहायक सन्धि में शर्त यह थी कि नवाब अपनी सेना समाप्त कर देगा, रियासत में अंग्रेज रेजीडेण्टों की नियुक्ति की जायेगी तथा दरबार में एक ब्रिटिश रेजीडेण्ट रखा जायेगा। इसके अतिरिक्त नवाव ब्रिटिश रेजीडेण्ट की सलाह पर अपने कार्य करेगा। विशेषकर अन्य राज्यों के साथ सम्बन्धों में रेजीडेण्ट की स्वीकृति लेनी अनिवार्य होगी। अपनी सैनिक शक्ति से वंचित हो जाने के उपरान्त नवाब अपनी रियासत में कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए अंग्रेजों पर निर्भर होता जा रहा था। नवाब का अब विद्रोही मुखियाओं तथा ताल्लुकदारों पर कोई विशेष नियन्त्रण नहीं रहा।

धीरे-धीरे अवध पर कब्जा करने में अंग्रेजों की रुचि बढ़ती जा रही थी। उन्हें लगता था कि वहाँ की जमीन नील तथा कपास की कृषि के लिये सर्वोत्तम है तथा इस क्षेत्र को एक बड़े बाजार के रूप में विकसित किया जा सकता है। 1850 के दशक के आरम्भ तक अंग्रेज भारत के अधिकांश भागों पर कब्जा कर चुके थे मराठा प्रदेश, दोआब, कर्नाटक, पंजाब, सिंध तथा बंगाल इत्यादि सभी अंग्रेजों के हाथ में आ चुके थे। इस समय मात्र अवध ही एक बड़ा प्रान्त था जहाँ ब्रिटिश शासन स्थापित नहीं हो सकता था। अतः अंग्रेजों ने असंगत आरोप लगाकर अवध को अपने कब्जे में ले लिया।

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प्रश्न 6.
“अफवाहों और भविष्यवाणियों ने 1857 के विद्रोह को प्रोत्साहित किया।” विवेचना कीजिये।
उत्तर:
1857 के विद्रोह को फैलाने में अफवाहों और भविष्यवाणियों का भी भरपूर योगदान रहा और इन अफवाहों ने लोगों को विद्रोह करने के लिए उत्प्रेरित किया। यथा-
(1) चर्बी वाले कारतूस मेरठ से दिल्ली आने | वाले विद्रोही सैनिकों ने मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को बताया कि उन्हें जो कारतूस चलाने को दिए गए, उनमें गाय और सुअर की चर्बी का लेप लगा था। अगर वे इन कारतूसों को से लगाएंगे तो उनका धर्म नष्ट हो जाएगा। सिपाहियों का इशारा एनफील्ड राइफल की ओर f था। अंग्रेजों के लाख समझाने पर भी सिपाहियों की यह भ्रान्ति खत्म नहीं हुई और यह अफवाह जंगल की आग की तरह उत्तर भारत की समस्त छावनियों में फैल गई।

(2) अफवाह का स्त्रोत- राइफल इंस्ट्रक्शन डिपो के कमांडेण्ट कैप्टन राइट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि, “दमदम स्थित शस्वागार में काम करने वाले ‘नीची जाति’ के एक खलासी ने जनवरी, 1857 के तीसरे हफ्ते में एक ब्राह्मण सिपाही से पानी पिलाने को कहा था। ब्राह्मण सिपाही ने यह कहकर पानी पिलाने से इनकार कर दिया कि ‘नीची जाति’ के छूने से लोटा अपवित्र हो जाएगा।” इस पर खलासी ने जवाब दिया कि, ” (वैसे भी) जल्दी ही तुम्हारी जाति भ्रष्ट होने वाली है, क्योंकि अब तुम्हें गाय और सुअर की चर्बी लगे कारतूस मिलेंगे, जिन्हें तुम्हें मुँह से खींचना पड़ेगा।” इस अफवाह ने सैनिकों को क्रोधित कर दिया।

(3) आटे में हड्डियों का चूरा-1857 की शुरुआत में यह अफवाह भी जोरों पर फैली कि अंग्रेज सरकार ने हिन्दुओं और मुसलमानों की जाति और धर्म को नष्ट करने के लिए एक भयानक साजिश रची है। इस मकसद को प्राप्त करने के लिए उन्होंने बाजार में मिलने वाले आटे में गाय और सुअर की हड्डियों को पिसवाकर मिलवा दिया है। चारों ओर शक व भय फैल गया कि अंग्रेज हिन्दुस्तानियों को ईसाई बनाना चाहते हैं। शहरों और छावनियों में सिपाहियों ने आटे को छूने से भी मना कर दिया। इस अफवाह ने भी लोगों को विद्रोह के लिए उत्प्रेरित किया।

(4) 100 वर्ष पूरे होने पर अंग्रेजी राज के समाप्त होने की भविष्यवाणी- किसी बड़ी कार्यवाही के आह्वान को इस भविष्यवाणी से और बल मिला कि प्लासी के युद्ध (23 जून, 1757) के सौ साल पूरे होते ही 23 जून, 1857 को अंग्रेजी राज खत्म हो जायेगा। इस भविष्यवाणी से विद्रोह को प्रेरणा मिली।

(5) चपातियाँ बाँटना-उत्तर भारत के विभिन्न भागों से गाँव-गाँव में चपातियाँ बैटने की खबरें आ रही थीं। बताते हैं कि रात में एक आदमी आकर गाँव के चौकीदार को एक चपाती देता था तथा पाँच और चपाती बनाकर अगले गाँवों में पहुंचाने का निर्देश दे जाता था। यह सिलसिला यूँ ही चलता जाता था। जनता इसे किसी आने वाली उथल-पुथल का संकेत मान रही थी।

प्रश्न 7.
1857 के विद्रोह के पूर्व फैलने वाली अफवाहें और भविष्यवाणियाँ जनता के भय, उनकी आशंकाओं और विश्वासों को व्यक्त कर रही थीं।” विवेचना कीजिये।
अथवा
“अफवाहें तभी फैलती हैं, जब वे प्रभावशाली साबित होती हैं, जब लोगों में बहुत ज्यादा भय और | सन्देह फैल जाए।” 1857 के विद्रोह के संदर्भ में यह कथन कहाँ तक सत्य था?
अथवा
1857 के विद्रोह के राजनीतिक, सामाजिक व धार्मिक कारणों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
1857 के विद्रोह के पूर्व फैलने वाली अफवाहें और भविष्यवाणियाँ लोगों के भय, आशंकाओं, उनके विश्वासों और प्रतिबद्धताओं को उजागर कर रही थीं। अफवाहें तभी फैलती हैं जब लोगों के मस्तिष्क में गहरे दबे डर और सन्देह की अनुगूँज सुनाई देती है। 1857 में फैली अफवाहों पर लोग निम्न कारणों से विश्वास कर रहे थे –

(1) पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार यदि 1857 की अफवाहों को 1820 के दशक से अंग्रेजों द्वारा अपनाई जा रही नीतियों के सन्दर्भ में देखा जाए तो इनका अर्थ आसानी म से समझा जा सकता है। गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक के नेतृत्व में ब्रिटिश सरकार पश्चिमी शिक्षा, पश्चिमी विचार और पश्चिमी संस्थानों के द्वारा भारतीय समाज को सुधारने के लिए खास नीतियाँ लागू कर रही थी। भारतीय समाज के कुछ लोगों की सहायता से उन्होंने अंग्रेजी माध्यम के स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्थापित किए थे जिनमें पश्चिमी विज्ञान और उदार कलाओं (Liberal Arts) के बारे में पढ़ाया जाता था।

(2) सामाजिक सुधार विलियम बैंटिक ने 1829 न में सतीप्रथा को बन्द करने के लिए एक कानून बनाया, क जिसमें सतीप्रथा को अवैध घोषित करते हुए दण्डनीय , अपराध कहा गया। इसके अतिरिक्त हिन्दू विधवा विवाह को वैध ठहराते हुए उसे कानूनी मान्यता दे दी गई। अंग्रेजों द्वारा सामाजिक कार्यों में हस्तक्षेप करने से भारतीयों में
न असन्तोष उत्पन्न हुआ।

(3) डलहौजी की हड़प नीति-डलहौजी ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को बढ़ावा देने के लिए शासकीय कमजोरी तथा दत्तकता को अवैध घोषित कर देने के बहानों के द्वार अवध, झाँसी, सतारा, नागपुर जैसी बहुत सी रियासतों क अपने कब्जे में ले लिया था। जैसे ही कोई रियासत अंग्रेजों के अधिकार में आती थी, वहाँ पर अंग्रेज अपने ढंग की शासन पद्धति, अपने कानून, भूमि विवाद निपटाने के अपने तरीके और भू-राजस्व वसूली की अपनी व्यवस्था लागू क देते थे।

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उत्तर भारत के लोगों पर इन कार्यवाहियों का गहरा असर पड़ा। जनता पर नई नीतियों व कार्यवाहियों का प्रभाव- इन कार्यवाहियों से लोगों को लगने लगा कि अब तक जिन चीजों की वे कद्र करते थे, जिनको पवित्र मानते थे चाहे वे राजे-रजवाड़े हों या सामाजिक, धार्मिक रीति- रिवाज हों या भूमि स्वामित्व, लगान अदायगी की प्रणाली हो, इन सबको नष्ट करके उन पर एक ऐसी व्यवस्था लादी जा रही थी जो ज्यादा हृदयहीन, परायी और दमनकारी थी।

(4) ईसाई धर्म का प्रचार- अंग्रेज अफसरों ने ईसाई धर्म को बढ़ावा देने के लिए पादरियों को प्रोत्साहित किया। इससे भी भारतीयों में असन्तोष व्याप्त था।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित क्रान्तिकारियों के विषय में संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए-
1. रानी लक्ष्मीबाई
2. नाना साहेब
3. बहादुरशाह द्वितीय।
उत्तर:
1. रानी लक्ष्मीबाई लक्ष्मीबाई 1857 ई. के स्वतन्त्रता संग्राम की अग्रणी महिला क्रान्तिकारी थीं। वह झाँसी की रानी थी। उनके पति को अंग्रेजों ने पुत्र गोद लेने की आज्ञा प्रदान नहीं की थी। लक्ष्मीबाई अपने पति की मृत्यु के उपरान्त झाँसी की शासिका बनीं। इन्होंने कई युद्धों में अंग्रेजों को परास्त किया। 1858 ई. में अंग्रेज सेनापति ह्यूरोज ने झाँसी पर आक्रमण किया। ताँत्या टोपे के साथ मिलकर इन्होंने बड़ी वीरता के साथ अपने किले की रक्षा की किन्तु वह पराजित हुई।

2. नाना साहेब नाना साहेब 1857 के विद्रोह के एक प्रमुख सेनापति थे। नाना साहेब एक वीर मराठा तथा पेशवा बाजीराव के दसक पुत्र थे। उन्होंने स्वयं को जून, 1857 मँ कानपुर में पेशवा घोषित कर दिया। किन्तु अंग्रेजों ने उन्हें पेशवा मानने से इन्कार कर दिया। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों ने नाना साहेब की 80,000 पाउण्ड की पेंशन भी बन्द कर दी। इससे नाना साहेब अंग्रेजों से अत्यधिक क्रुद्ध हो गये। नाना साहेब ने प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में अंग्रेजों का वीरता के साथ मुकाबला किया। कानपुर में क्रान्तिकारियों का नेतृत्व भी नाना साहेब ने किया तथा कर्नल नील से जबरदस्त संघर्ष किया।

3. बहादुरशाह द्वितीय बहादुरशाह जफर द्वितीय 7 अन्तिम मुगल सम्राट् था अंग्रेज अधिकारियों ने कहा था कि बहादुरशाह जफर के उपरान्त उसके उत्तराधिकारियों को दिल्ली लाल किले में रहने नहीं दिया जाएगा। इसी कारण बहादुरशाह अंग्रेजों के विरुद्ध हो गए। विद्रोहियों ने जब बहादुरशाह से अपना प्रधान सेनापति बनने को कहा तो कुछ संकोच के साथ वह इस पर राजी हो गये। बहादुरशाह ने सैनिकों द्वारा आरम्भ किये गये इस विद्रोह को युद्ध का रूप प्रदान कर दिया। बहादुरशाह ने भारत की सभी रियासतों, जमींदारों तथा सरदारों को पत्र लिखकर एकजुट होने तथा संगठित होने का अनुरोध किया। किन्तु बहादुरशाह की यह योजना सफल नहीं हो सकी तथा उनको गिरफ्तार करके रंगून भेज दिया गया।

प्रश्न 9.
1857 के विद्रोह ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रोत्साहित किया।” विवेचना कीजिये।
उत्तर:
1857 के विद्रोह द्वारा भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रोत्साहित करना 1857 के विद्रोह ने बीसवीं शताब्दी के भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रोत्साहित किया। इस विद्रोह के इर्द- गिर्द राष्ट्रवादी कल्पना का एक विस्तृत ताना-बाना बुन दिया
गया था।

(1) प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम 1857 के विद्रोह को प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की संज्ञा दी जाती है। इस व्यापक विद्रोह में देश के हर वर्ग के लोगों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध मिलकर लड़ाई लड़ी थी। इसमें हिन्दुओं और मुसलमानों ने कन्धा से कन्धा मिलाकर अंग्रेजों का प्रतिरोध किया था। उनका प्रमुख उद्देश्य अंग्रेजी शासन को समाप्त कर उनके चंगुल से भारत को स्वतन्त्र कराना था।

(2) कला और साहित्य के माध्यम से राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार – अनेक कलाकारों एवं साहित्यकारों ने भी अपनी कलाकृतियों एवं रचनाओं द्वारा भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार किया। उन्होंने 1857 के विद्रोह के नेताओं को ऐसे नायकों के रूप में प्रस्तुत किया जो देश को रणस्थल की ओर ले जा रहे थे। उन्हें लोगों को दमनकारी ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उत्तेजित करते हुए चित्रित किया जाता था। इन विद्रोही नायक-नायिकाओं की प्रशंसा में अनेक कविताएँ लिखी गई।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर, नाना साहिब, कुंवर सिंह, बेगम हजरत महल आदि के पराक्रमपूर्ण कार्यों, साहस, त्याग और बलिदान ने भारतीयों को अत्यधिक प्रभावित किया और वे उनके लिए प्रेरणा के स्रोत बन गए। एक हाथ में घोड़े की रास और दूसरे हाथ में तलवार थामे अपनी मातृभूमि की स्वतन्त्रता के लिए लड़ाई लड़ने वाली रानी लक्ष्मीबाई की शूरवीरता का गौरवगान करते हुए कविताएँ लिखी गई।

रानी झांसी को एक ऐसे मर्दाना योद्धा के रूप में चित्रित किया जाता था जो शत्रु दल का पीछा करते हुए और ब्रिटिश सैनिकों का वध करते हुए आगे बढ़ रही थी। सुभद्राकुमारी चौहान द्वारा रचित ‘खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी’ नामक कविता सम्पूर्ण देश में लोकप्रिय थी। इस प्रकार भारतीय राष्ट्रवादी चित्र हमारी राष्ट्रवादी कल्पना को निर्धारित करने में सहायता दे रहे थे। इस प्रकार 1857 ई. के विद्रोह ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लोगों में राष्ट्रीय भावना का प्रसार किया। इसने बीसवीं शताब्दी के राष्ट्रीय आन्दोलन के लिए एक पृष्ठभूमि तैयार कर दी।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

Jharkhand Board JAC Class 12 History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

1. इस्तमरारी बन्दोबस्त सबसे पहले लागू किया गया –
(क) बंगाल में
(ख) मद्रास में
(ग) बम्बई में
(घ) उत्तरप्रदेश में
उत्तर:
(क) बंगाल में

2. इस्तमरारी बन्दोबस्त लागू किया गया –
(क) 1794 में
(ख) 1792 में
(ग) 1793 में
(घ) 1795 में
उत्तर:
(ख) 1792 में

3. ‘राजा’ शब्द का प्रयोग किया जाता था–
(क) शक्तिशाली जमींदारों के लिए
(ख) ताल्लुकदारों के लिए
(ग) जोतदारों के लिए
(प) रैयतदारों के लिए
उत्तर:
(क) शक्तिशाली जमींदारों के लिए

4. बर्दवान में जमींदारी की नीलामी की गई थी, वर्ष
(क) 1798 में
(ख) 1797 में
(ग) 1897 में
(घ) 1795 में
उत्तर:
(ख) 1797 में

5. बंगाल में किस गवर्नर जनरल ने इस्तमरारी बन्दोवस्त लागू किया.
(क) लार्ड डलहौजी ने
(ख) विलियम बैंटिक ने
(ग) लार्ड कार्नवालिस ने
(घ) लार्ड एलिनवरो ने
उत्तर:
(ग) लार्ड कार्नवालिस ने

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6. रैयत शब्द का प्रयोग अंग्रेजों ने किया –
(क) किसानों के लिए
(ख) जमींदारों के लिए
(ग) ताल्लुकदारों के लिए
(घ) राजाओं के लिए
उत्तर:
(क) किसानों के लिए

7. धनी किसानों के लिए जिस शब्द का प्रयोग होता था, वह था –
(क) फौजदार
(ख) जोतदार
(ग) ताल्लुकदार
(घ) फरमाबरदार
उत्तर:
(ख) जोतदार

8. जमींदार द्वारा राजस्व वसूलने वाला अधिकारी कहलाता थ –
(क) दामुला
(ख) अमला
(ग) आमूला
(घ) अमली
उत्तर:
(ख) अमला

9. घोर आर्थिक मंदी जिस सन् में आई, वह था –
(क) 1950
(ख) 1929
(ग) 1930
(घ) 1932
उत्तर:
(ख) 1929

10. बाहरी लोग को संथाल लोग क्या कहते थे?
(क) परदेशी
(ख) अंग्रेजी बाबू
(ग) दिकू
(घ) इनमें
उत्तर:
(ग) दिकू

11. संथालों का नेतृत्व किसने किया?
(क) सोदी
(ख) कान्हू
(ग) ‘क’ तथा ‘ख’ दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) ‘क’ तथा ‘ख’ दोनों

12. बुकानन कौन था?
(क) ब्रिटिश एजेन्ट
(ग) यात्री
(ख) अंग्रेज अधिकारी
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) ब्रिटिश एजेन्ट

13. अमेरिका में गृह युद्ध कब आरम्भ हुआ?
(क) 1760 में
(ग) 1840 में
(ख) 1761 में
(घ) 1861 में
उत्तर:
(घ) 1861 में

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14. रेलों का युग प्रारम्भ होने से पहले कौनसा कस्बा दक्कन से आने वाली कपास के लिए संग्रह केन्द्र था ?
(क) मिर्जापुर
(ग) मद्रास
(ख) बम्बई
(घ) जयपुर
उत्तर:
(क) मिर्जापुर

15. दक्कन दंगा आयोग की रिपोर्ट ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत की गई –
(क) 1870 में
(ख) 1875 में
(ग) 1878 में
(घ) 1980 में
उत्तर:
(ग) 1878 में

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:

1. ………………. “शब्द का प्रयोग अक्सर शक्तिशाली जमींदारों के लिए किया जाता था।
2. इस्तमरारी बंदोबस्त ……………… ने राजस्व की राशि निश्चित करने के लिए लागू की थी।
3. अमेरिकी स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान ……………… ब्रिटिश सेना का कमाण्डर था।
4. 1793 में बंगाल में इस्तमरारी बंदोबस्त लागू करते समय वहाँ का …………… कार्नवालिस था
5. …………… शब्द का प्रयोग अंग्रेजों के विवरणों में किसानों के लिए किया जाता था।
6. …………… का शाब्दिक अर्थ है वह व्यक्ति जिसके पास लाठी या डंडा हो।
उत्तर:
1 राजा
2. ईस्ट इण्डिया कम्पनी
3. कार्नवालिस
4. गवर्नर जनरल
5. रैयत
6. लाठियाल

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
बंगाल में इस्तमरारी बन्दोबस्त कब लागू हुआ?
उत्तर:
सन् 1793

प्रश्न 2.
अंग्रेजी विवरणों के अनुसार ‘रैयत’ शब्द का प्रयोग किनके लिए किया जाता था ?
उत्तर:
किसानों के लिए।

प्रश्न 3.
राजस्व इकट्ठा करने के समय जमींदार का जो अधिकारी गाँव में आता था, उसे क्या कहा जाता था ?
उत्तर:
अमला।

प्रश्न 4.
बंगाल के धनी किसानों के वर्ग को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
जोतदार

प्रश्न 5.
जोतदारों की जमीन का काफी बड़ा भाग किनके द्वारा जोता जाता था ?
उत्तर:
बटाईदारों द्वारा

प्रश्न 6.
जब राजस्व का भुगतान न किये जाने पर जमींदार की जमींदारी को नीलाम किया जाता था तो प्रायः उन जमीनों को कौन खरीद लेते थे?
उत्तर:
जोतदार

प्रश्न 7.
1930 के दशक में अंततः जमींदारों का भट्ठा क्यों बैठ गया?
उत्तर:
1930 के दशक की घोर मंदी के कारण।

प्रश्न 8.
पहाड़िया जीवन का प्रतीक क्या था?
उत्तर:
कुदाल।

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प्रश्न 9.
संथालों की शक्ति का प्रतीक क्या था?
उत्तर:
हल

प्रश्न 10.
पहाड़िया लोग किस प्रकार की खेती करते थे?
उत्तर:
म खेती।

प्रश्न 11.
संधाल लोग किस प्रकार की खेती करते थे?
उत्तर:
स्थायी खेती।

प्रश्न 12.
1875 में पुणे के सूपा गाँव में हुआ किसानों का आन्दोलन किनके विरोध में था?
उत्तर:
साहूकारों और अनाज के व्यापारियों के विरोध

प्रश्न 13.
साहूकार कौन होता था?
उत्तर:
साहूकार पैसा उधार देता था और व्यापार भी करता था।

प्रश्न 14.
दक्षिण के गाँवों में रैयतों ने किस सन् में बगावत की?
उत्तर:
सन् 1875 में।

प्रश्न 15.
इस्तमरारी बन्दोबस्त किन-किन के मध्य लागू किया गया ?
उत्तर:
ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा बंगाल के जमींदारों के मध्य ।

प्रश्न 16.
1857 के गदर में बंगाल के किस राजा ने अंग्रेजों की मदद की थी ?
उत्तर:
बंगाल के बर्दवान के राजा मेहताबचन्द ने।

प्रश्न 17.
1930 की आर्थिक मंदी का जमींदारों पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
इसके फलस्वरूप जमींदारों की दशा दयनीय हो गई।

प्रश्न 18.
रेलों का युग शुरू होने से पहले कपास का परिवहन कैसे होता था?
उत्तर:
नौकाओं, बैलगाड़ियों तथा जानवरों के द्वारा।

प्रश्न 19.
भारत में सर्वप्रथम औपनिवेशिक शासन कहाँ स्थापित हुआ?
उत्तर:
बंगाल में।

प्रश्न 20.
गाँवों में किनकी शक्ति जमींदारों की ताकत की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होती थी?
उत्तर:
जोतदारों की।

प्रश्न 21.
बंगाल के किस क्षेत्र में जोतदार सबसे अधिक शक्तिशाली थे?
उत्तर:
उत्तरी बंगाल में।

प्रश्न 22.
बंगाल में जोतदार किन अन्य नामों से पुकारे जाते थे?
उत्तर:
‘हवलदार’, ‘गांटीदार’ तथा ‘मंडल’ के नामों

प्रश्न 23.
‘पाँचवीं रिपोर्ट’ ब्रिटिश संसद में कब प्रस्तुत की गई थी?
उत्तर:
1813 ई. में ।

प्रश्न 24.
अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने वाले संथालों का नेता कौन था?
उत्तर:
सिधू मांझी ।

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प्रश्न 25.
संथालों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कब किया?
उत्तर:
1855-56 में।

प्रश्न 26.
मैनचेस्टर काटन कम्पनी कब और कहाँ स्थापित की गई ?
उत्तर:
1859 ई. में इंग्लैण्ड में

प्रश्न 27.
रेलों के विकास से पूर्व दक्कन से आने वाली कपास के लिए कौनसा शहर संग्रह केन्द्र था?
उत्तर:
मिर्जापुर।

प्रश्न 28.
ऋणदाता लोग देहात के किस प्रथागत मानक का उल्लंघन कर किसानों का शोषण कर रहे थे?
उत्तर;
ऋणदाता मूलधन से अधिक ब्याज वसूल कर रहे थे।

प्रश्न 29.
दक्कन दंगा आयोग की रिपोर्ट ब्रिटिश संसद में कब प्रस्तुत की गई ?
उत्तर:
सन् 1878 ई. में।

प्रश्न 30.
रेग्यूलेटिंग एक्ट कब पारित किया गया ?
उत्तर:
1773 ई. में ।

प्रश्न 31.
ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने बंगाल की दीवानी कब प्राप्त की?
उत्तर:
सन् 1765 ई. में

प्रश्न 32.
रेग्यूलेटिंग एक्ट क्या था ?
उत्तर:
ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कार्यकलापों को विनियमित करने वाला अधिनियम।

प्रश्न 33.
सन् 1862 तक ब्रिटेन में जितना भी कपास का आयात होता था, उसका कितना भाग अकेले भारत से जाता था?
उत्तर:
90 प्रतिशत।

प्रश्न 34.
अमेरिका में गृह युद्ध का सूत्रपात कब हुआ?
उत्तर:
सन् 1861 ई. में ।

प्रश्न 35.
जोतदारों की स्थिति क्या थी? वे जमींदारों से किस प्रकार प्रभावशाली होते थे?
उत्तर:
जोतदार बंगाल के धनी किसान थे। उनका ग्रामवासियों पर नियन्त्रण था और वे रैयत को अपने पक्ष में रखते थे।

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प्रश्न 36.
गाँवों में जोतदार के शक्तिशाली होने के कारण लिखिए।
अथवा
गाँवों में जोतदारों की शक्ति जमींदारों की शक्ति से अधिक क्यों थी ? कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:
(1) जोतदार गाँवों में ही रहते थे, ग्रामवासियों पर नियंत्रण रखते थे।
(2) वे रैयत को अपने पक्ष में एकजुट रखते थे।

प्रश्न 37.
जोतदार जमींदारों का किस प्रकार प्रतिरोध करते थे? दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
(1) जोतदार जमींदारों द्वारा गाँव की लगान बढ़ाने का विरोध करते थे
(2) वे जमींदार को राजस्व भुगतान में देरी करा देते थे।

प्रश्न 38.
पाँचवीं रिपोर्ट से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पाँचवीं रिपोर्ट भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रशासन तथा क्रियाकलापों के विषय में तैयार की गई थी।

प्रश्न 39.
जमींदार किस प्रकार अपनी जमींदारियाँ बचा लेते थे? दो उदाहरण दीजिये ।
उत्तर:
(1) फर्जी बिक्री द्वारा
(2) अपनी जमींदारियों का कुछ हिस्सा महिलाओं को प्रदान करके।

प्रश्न 40.
1832 ई. तक किस भूमि को संथालों की भूमि के रूप में सीमांकित किया गया?
उत्तर:
दामिन-इ-कोह के रूप में सीमांकित भूमि को संथालों की भूमि घोषित किया गया।

प्रश्न 41.
दक्कन दंगा रिपोर्ट क्या थी ? इसके अनुसार रैयत विद्रोह का क्या कारण था ?
उत्तर:
दक्कन दंगा रिपोर्ट दक्कन के दंगों से सम्बन्धित रिपोर्ट थी रैयत विद्रोह का कारण ऋणदाताओं, साहूकारों न्पों की शोषण नीति थी।

प्रश्न 42.
झूम खेती किस बात पर निर्भर करती थी?
उत्तर:
झुम खेती नई जमीनें खोजने और भूमि की से प्राकृतिक उर्वरता का उपयोग करने की क्षमता पर निर्भर करती थी।

प्रश्न 43.
इस्तमरारी बन्दोबस्त कब एवं किस क्षेत्र में न्य लागू किया गया ?
उत्तर:
इस्तमरारी बन्दोबस्त 1793 में बंगाल में लागू किया गया।

प्रश्न 44.
कुदाल और हल किन लोगों के जीवन का प्रतीक माना जाता था?
उत्तर:
कुदाल’ पहाड़िया लोगों के जीवन का तथा ‘हल’ संथालों के जीवन का प्रतीक माना जाता था।

प्रश्न 45.
1860 के दशक से पूर्व ब्रिटेन में कपास न का आयात कहाँ से किया जाता था?
उत्तर:
1860 के दशक से पूर्व ब्रिटेन में कपास के समस्त आयात का 75% अमेरिका से किया जाता था।

प्रश्न 46.
रैयतवाड़ी क्या थी? इसे कहाँ लागू किया गया?
अथवा
बम्बई दक्कन में ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू की गई राजस्व प्रणाली का नाम बताइये।
उत्तर:
रैयतवाड़ी राजस्व की प्रणाली थी, जो कम्पनी सरकार तथा रैयत (किसानों) के बीच बम्बई दक्कन में लागू की गई थी।

प्रश्न 47.
दक्कन में किसानों का विद्रोह कब व कहाँ से शुरू हुआ?
उत्तर:
दक्कन में किसानों का विद्रोह 1875 में (आधुनिक पुणे जिले में) से शुरू हुआ।

प्रश्न 48.
‘दामिन-इ-कोह’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
1832 में संथालों को स्थाई रूप से बसाने के लिए ‘दामिन-इ-कोह’ नामक एक भू-भाग निश्चित किया गया।

प्रश्न 49.
बुकानन कौन था?
उत्तर:
फ्रांसिस बुकानन एक चिकित्सक था जो भारत आया तथा 1794 से 1815 तक बंगाल चिकित्सा सेवा में कार्य किया।

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प्रश्न 50.
पहाड़िया लोग कौन थे? वे अपना निर्वाह कैसे करते थे?
उत्तर:
पहाड़िया लोग राजमहल की पहाड़ियों में रहते थे तथा जंगलों की उपज से अपना जीवन निर्वाह करते थे।

प्रश्न 51.
संथाल कौन थे?
उत्तर:
संथाल लोग राजमहल की पहाड़ियों में बसे हुए थे। वे हलों द्वारा स्थायी कृषि करते थे।

प्रश्न 52.
संथालों द्वारा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध किये गए विद्रोह के कारणों पर प्रकाश डालिए।
अथवा
संथालों को विद्रोह पर क्यों उतरना पड़ा? दो कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) अंग्रेजों ने संथालों की भूमि पर भारी कर लगा दिया।
(2) साहूकार लोग बहुत ऊँची दर पर ब्याज लगा रहे

प्रश्न 53.
1875 में साहूकारों के विरुद्ध रैयत द्वारा विद्रोह करने के अन्तर्गत किए गए दो कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) रैयत ने साहूकारों के बहीखाते जला दिए और ऋणबंध नष्ट कर दिये। (2) उन्होंने साहूकारों की अनाज की दुकानें लूट लीं।

प्रश्न 54.
रैयतवाड़ी प्रणाली की एक विशेषता बताइये।
उत्तर:
रैयतवाड़ी प्रणाली के राजस्व की राशि सीधे रैयत के साथ तय की जाती थी।

प्रश्न 55.
बम्बई दक्कन में अंग्रेजों के विरुद्ध किसानों के विद्रोह के दो कारण लिखिए।
उत्तर:
(1) किसानों से बहुत अधिक राजस्व वसूल किया जाता था
(2) उन्हें ब्याज की ऊँची दरों पर साहूकारों से ऋण लेना पड़ता था।

प्रश्न 56.
ब्रिटिश काल में दक्कन में दंगा होने का मुख्य कारण बताइये।
उत्तर:
ऋणदाता ऋण चुकाने के बाद रैयत को उसकी रसीद नहीं देते थे बंधपत्रों में जाली आँकड़े भर लेते थे।

प्रश्न 57.
किन दो कारणों से भारतीय दस्तकार बेकार हो गए?
उत्तर:
(1) ब्रिटेन से तैयार माल मंगाना और कच्चा माल ब्रिटेन भेजना
(2) कपास के उत्पादन में कमी।

प्रश्न 58.
किन दो कारणों से भारतीय किसान दरिद्र हो गए?
उत्तर:
(1) किसानों पर भारी भूमि कर लगाना
(2) साहूकारों, व्यापारियों द्वारा किसानों का शोषण

प्रश्न 59.
अंग्रेजों ने भारत के विभिन्न भागों में भू- राजस्व सम्बन्धी कौन-कौन सी तीन प्रणालियाँ प्रचलित क?
उत्तर:
(1) इस्तमरारी बन्दोबस्त
(2) रैयतवाड़ी बन्दोबस्त
(3) महलवाड़ी बन्दोबस्त।

प्रश्न 60.
ब्रिटिश सरकार ने संथालों को किस क्षेत्र में बसने की अनुमति प्रदान की थी?
उत्तर:
ब्रिटिश सरकार ने संथालों को राजमहल की तलहटी में बसने की अनुमति प्रदान की थी।

प्रश्न 61.
जमीन के किस क्षेत्र को संथालों की भूमि घोषित किया गया?
उत्तर:
‘दामिन-इ-कोह’ को संथालों की भूमि घोषित किया गया।

प्रश्न 62.
पहाड़िया लोगों का क्या व्यवसाय था ?
उत्तर:
पहाड़िया लोग झूम खेती करते थे।

प्रश्न 63.
संथाल लोग कौनसी फसलें उगाते थे?
उत्तर:
संथाल लोग चावल, कपास, सरसों, तम्बाकू आदि की फसलें उगाते थे।

प्रश्न 64.
1875 में रैयत द्वारा साहूकारों के विरुद्ध विद्रोह करने के दो कारणों का उल्लेख कीजिये ।
उत्तर:
(1) ऋणदाता वर्ग अत्यन्त संवेदनहीन हो गया था।
(2) ऋणदाता ऋण चुकाए जाने के बाद रैयत को उसकी रसीद नहीं देते थे।

प्रश्न 65.
ऋणदाता लोग गांवों में प्रचलित मानकों और रूढ़ि-रिवाजों का किस प्रकार उल्लंघन कर रहे थे ?
उत्तर:
ऋणदाता लोग रैयत से मूलधन से भी अधिक ब्याज वसूल कर रहे थे।

प्रश्न 66.
साहूकार रैयत को ऋण देने से क्यों इन्कार कर रहे थे? दो कारण लिखिए।
उत्तर:
(1) भारतीय कपास की मांग घटती जा रही थी
(2) कपास की कीमतों में गिरावट आ रही थी।

प्रश्न 67.
पहाड़िया और संधाल लोग किन उपकरणों से खेती करते थे?
उत्तर:
पहाड़िया लोग कुदाल से तथा संथाल लोग हल से खेती करते थे।

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प्रश्न 68.
संथाल लोगों का बंगाल में कब आगमन हुआ?
उत्तर:
संथाल लोगों का 1780 के दशक में बंगाल में आगमन हुआ।

प्रश्न 69.
संथाल लोग अंग्रेजों को आदर्श निवासी क्यों लगे ?
उत्तर:
क्योंकि उन्हें जंगलों का सफाया करने तथा भूमि को पूरी शक्ति के साथ जोतने में कोई संकोच नहीं था।

प्रश्न 70.
रैयत ऋणदाताओं को कुटिल तथा धोखेबाज क्यों समझते थे?
उत्तर:
(1) ऋणदाता खातों में धोखाधड़ी करते थे।
(2) वे कानून को घुमाकर अपने पक्ष में कर लेते थे।

प्रश्न 71.
रैयत द्वारा साहूकारों के विरुद्ध अंग्रेजों को दिए गए प्रार्थना-पत्र में उल्लिखित दो शिकायतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) रैयत द्वारा कड़ी शर्तों पर बंधपत्र लिखना
(2) साहूकारों द्वारा रैयत की उपज ले जाना और बदले में रसीद न देना।

प्रश्न 72.
पहाड़ी लोग कौन थे?
उत्तर:
राजमहल की पहाड़ियों के आस-पास रहने वाले लोग पहाड़ी कहलाते थे। वे जंगल की उपन से अपना जीवन निर्वाह करते थे।

प्रश्न 73.
प्राय: ‘राजा’ शब्द का प्रयोग किसके लिए किया जाता था?
उत्तर:
शक्तिशाली जमींदारों के लिए।

प्रश्न 74.
रैयत व शिकमी रैयत में क्या सम्बन्ध था?
उत्तर:
रैयत जमींदारों के लिए जमीन जोतते थे एवं कुछ जमीन अन्य रैयतों को लगाने पर दे देते थे जिन्हें शिकमी रैयत कहा जाता था।

प्रश्न 75.
अमेरिका में गृहयुद्ध के समय ब्रिटेन को भारत से कपास का कितना निर्यात होता था?
उत्तर:
90 प्रतिशत।

प्रश्न 76.
ताल्लुकदार का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
ताल्लुकदार का शाब्दिक अर्थ है वह व्यक्ति जिसके साथ ताल्लुक यानी सम्बन्ध हो। आगे चलकर ताल्लुक का अर्थ क्षेत्रीय इकाई हो गया।

प्रश्न 77.
‘पाँचवीं रिपोर्ट’ किसके द्वारा तैयार की गई थी?
उत्तर:
प्रवर समिति।

लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
“संथालों और पहाड़ियों के बीच लड़ाई हल और कुदाल के बीच लड़ाई थी।” सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
पहाड़िया लोग झूम खेती करते थे और अपनी कुदाल से जमीन खुरच कर दालें तथा ज्वार बाजरा उगाते थे। दूसरी ओर संथाल लोग जंगलों को साफ करके हलों से जमीन जोतते थे तथा चावल, कपास आदि की खेती करते थे। इससे पहाड़िया लोगों को राजमहल की पहाड़ियों में पीछे हटना पड़ा। एक ओर कुदाल पहाड़िया लोगों के जीवन का प्रतीक था, तो दूसरी ओर हल संथालों के जीवन का प्रतीक था और दोनों के बीच लड़ाई हल और कुदाल के बीच लड़ाई थी।

प्रश्न 2.
‘इस्तमरारी बन्दोबस्त’ क्या था?
अथवा
स्थायी बन्दोबस्त से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
1793 ई. में बंगाल के गवर्नर जनरल ने बंगाल में ‘इस्तमरारी बन्दोबस्त’ लागू किया। इस बन्दोवस्त के अन्तर्गत ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने राजस्व की राशि निश्चित कर दी थी जो प्रत्येक जमींदार को चुकानी पड़ती थी। जो जमींदार अपनी निश्चित राशि नहीं चुका पाते थे, उनसे राजस्व वसूल करने के लिए उनकी जमींदारियां नीलाम कर दी जाती थीं। यह बन्दोबस्त ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा जमींदारों के बीच हुआ था।

प्रश्न 3.
फ्रांसिस बुकानन के बारे में आप क्या जानते हँ?
उत्तर:
फ्रांसिस बुकानन एक चिकित्सक था जो बंगाल चिकित्सा सेवा में 1794 से 1815 तक कार्यरत रहा। कुछ समय के लिए वह लार्ड वेलेजली का शल्य चिकित्सक (सर्जन) भी रहा। कलकता में उसने एक चिड़ियाघर की ‘स्थापना की जो कलकत्ता अलीपुर चिड़ियाघर के नाम से मशहूर हुआ। बंगाल सरकार के अनुरोध पर उसने ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकार क्षेत्र में आने वाली भूमि का विस्तृत सर्वेक्षण कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।

प्रश्न 4.
भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैण्ड ने पहाड़िया लोगों से शान्ति स्थापना हेतु कौनसी नीति अपनाई?
उत्तर:
भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैण्ड ने शान्ति स्थापना हेतु पहाड़िया मुखियाओं के साथ एक समझौता किया, जिसमें मुखियाओं को एक वार्षिक भत्ता दिया जाना था तथा बदले में मुखियाओं को अपने लोगों के चाल-चलन को ठीक रखने की जिम्मेदारी लेनी थी। उनसे यह भी आशा की गई थी कि वे अपनी बस्तियों में व्यवस्था बनाए रखेंगे और अपने लोगों को अनुशासन में रखेंगे। परन्तु बहुत से मुखियाओं ने भत्ता लेने से मना दिया।

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प्रश्न 5.
बुकानन द्वारा वर्णित गंजुरिया पहाड़ की यात्रा का विवरण प्रस्तुत कीजिये।
उत्तर:
बुकानन के अनुसार गंजुरिया में अभी जुताई की गई है जिससे पता चलता है कि इसे कितने शानदार इलाके में बदला जा सकता है इसकी सुन्दरता और समृद्धि विश्व के किसी भी क्षेत्र जैसी विकसित की जा सकती है। यहाँ की जमीन अलबत्ता चट्टानी है लेकिन बहुत ही ज्यादा बढ़िया है। उसने उतनी बढ़िया सरसों और तम्बाकू कहीं नहीं देखी। संथालों ने वहाँ कृषि क्षेत्र की सीमा काफी बढ़ा ली थी, वे यहाँ 1800 के आसपास आये थे।

प्रश्न 6.
संथालों के बारे में बुकानन के विचारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बुकानन ने संथालों के क्षेत्र में भ्रमण किया और उनके बारे में ये विचार व्यक्त किये कि ” नयी जमीनें साफ करने में वे बहुत होशियार होते हैं, लेकिन नीचता से रहते हैं। उनकी झोंपड़ियों में कोई बाड़ नहीं होती और दीवारें सीधी खड़ी की गई छोटी-छोटी लकड़ियों की बनी होती हैं जिन पर भीतर की ओर लेप ( पलस्तर) लगा होता है। झोंपड़ियाँ छोटी और मैली-कुचैली होती हैं, उनकी छत सपाट होती है, उनमें उभार बहुत कम होता है।”

प्रश्न 7.
कड़वा के पास की चट्टानों के बारे में बुकानन ने क्या लिखा?
उत्तर:
कडुया के पास की चट्टानों के बारे में बुकानन ने लिखा कि, “लगभग एक मील चलने के बाद मैं एक शिलाफलक पर आ गया, जिसका कोई यह एक छोटा दानेदार ग्रेनाइट है जिसमें लाल-लाल फेल्डस्पार, क्वार्ट्ज और काला अबरक लगा है …… । वहाँ से आधा मील से अधिक की दूरी पर मैं एक अन्य चट्टान पर आया वह भी स्तरहीन थी और उसमें बारीक दानों वाला ग्रेनाइट था जिसमें पीला सा फेल्डस्पार, सफेद-सा क्वार्ट्ज और काला अबरक था।”

प्रश्न 8.
जमींदार को किसानों से राजस्व एकत्रित करने में किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ता था?
उत्तर:
जमींदार को किसानों से राजस्व एकत्रित करने में निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ता था –
(1) कभी-कभी खराब फसल होने पर किसानों के लिए राजस्व का भुगतान करना कठिन हो जाता था।
(2) उपज की नीची कीमतों के कारण भी किसानों के लिए राजस्व का भुगतान करना कठिन हो जाता था।
(3) कभी-कभी किसान जानबूझकर स्वयं भी भुगतान में देरी कर देते थे।

प्रश्न 9.
एक राजस्व सम्पदा क्या थी? सूर्यास्त विधि क्या थी?
उत्तर:
ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में एक जमींदार के नीचे अनेक गाँव होते थे। ईस्ट इंडिया कम्पनी के अनुसार एक जमींदारी के भीतर आने वाले गाँव मिलकर एक राजस्व सम्पदा का रूप ले लेते थे। जमींदारों को ईस्ट इण्डिया कम्पनी को एक निश्चित तारीख को सूर्यास्त तक राजस्व जमा कराना अनिवार्य था। राजस्व जमा न होने की दशा में उसकी जमींदारी नीलाम की जा सकती थी। इसे ही सूर्यास्त विधि कहा जाता था।

प्रश्न 10.
1832 के दशक में किसानों को ऋण क्यों लेने पड़े?
उत्तर:
1832 के दशक के पश्चात् कृषि उत्पादों में तेजी से गिरावट आयी जिससे किसानों की आय में और भी तेजी से गिरावट आ गयी। इसके अतिरिक्त 1832-34 के वर्षों में ग्रामीण क्षेत्र अकाल की चपेट में आ गये जिससे जन-धन की भारी हानि हुई किसानों के पास इस संकट का सामना करने के लिए खाद्यान्न नहीं था। राजस्व की बकाया राशियाँ बढ़ती गयीं परिणामस्वरूप किसानों को ऋण लेने पड़े।

प्रश्न 11.
वनों की कटाई और स्थायी कृषि के बारे बुकानन के विचार लिखिए।
उत्तर:
राजमहल की पहाड़ियों के एक गाँव से गुजरते हुए बुकानन ने लिखा, “इस प्रदेश का दृश्य बहुत बढ़िया है। यहाँ खेती विशेष रूप से, घुमावदार संकरी घाटियों में धान की फसल, बिखरे हुए पेड़ों के साथ साफ की गई जमीन और चट्टानी पहाड़ियाँ सभी अपने आप में पूर्ण हैं, कमी है तो बस इस क्षेत्र में प्रगति की और विस्तृत तथा उन्नत खेती की, जिनके लिए यह प्रदेश अत्यन्त संवेदनशील है। यहाँ टसर और लाख के लिए बागान लगाए जा सकते हैं।”

प्रश्न 12.
16 मई, 1875 को पूना के जिला मजिस्ट्रेट ने अपने पत्र में आयुक्त को क्या लिखित सूचना दी?
उत्तर:
16 मई, 1875 को पूना के जिला मजिस्ट्रेट ने पुलिस आयुक्त को लिखा कि, “शनिवार 15 मई को सूपा आने पर मुझे इस उपद्रव का पता चला। एक साहूकार का घर पूरी तरह जला दिया गया लगभग एक दर्जन मकानों को तोड़ दिया गया और उनमें घुसकर वहाँ के सारे सामान को आग लगा दी गई। खाते पत्र बाँड, अनाज, देहाती कपड़ा सड़कों पर लाकर जला दिया गया, जहाँ राख के ढेर अब भी देखे जा सकते हैं।”

प्रश्न 13.
भाड़ा-पत्र क्या था ?
उत्तर:
जब किसान ऋणदाता का कर्ज चुकाने में असमर्थ हो जाता था तो उसके पास अपना सर्वस्व जमीन, गाड़ियाँ, पशुधन देने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं था; लेकिन जीवनयापन हेतु खेती करना जरूरी था इसलिए उसने ऋणदाता से जमीन, पशु या गाड़ी फिर किराये पर ले ली; इसके लिए उसे एक भाड़ा पत्र ( किरायानामा) लिखना पड़ता था, जिसमें साफ तौर पर यह लिखा होता था कि ये पशु और गाड़ियाँ उसकी अपनी नहीं हैं।

प्रश्न 14.
इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए राजकीय प्रतिवेदनों के प्रयोग में क्या-क्या सावधानियाँ बरतनी न चाहिए?
उत्तर:
राजकीय प्रतिवेदन सरकार की दृष्टि से तैयार किये जाते हैं जो पूरी तरह विश्वसनीय नहीं होते हैं अतः इन्हें सावधानीपूर्वक पढ़ा जाना चाहिए। इनका प्रयोग करने में से पहले समाचार पत्रों, गैर-राजकीय वृत्तान्तों, वैधानिक र अभिलेखों एवं मौखिक स्रोतों से संकलित साक्ष्य के साथ उनका मिलान करके उनकी विश्वसनीयता का सत्यापन करना आवश्यक है।

प्रश्न 15.
बर्दवान के राजा की सम्पदा क्यों नीलाम की गई?
उत्तर:
1797 में बर्दवान के राजा की कई सम्पदाएँ नीलाम की गई। बर्दवान के राजा पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के राजस्व की बड़ी रकम बकाया हो गई थी इसलिए उसकी सम्पदा नीलाम की गई खरीददारों में जिसने सबसे ऊँची बोली लगाई, उसको जमींदारी बेच दी गई। लेकिन यह खरीददारी फर्जी थी क्योंकि बोली लगाने वालों में 95% लोग राजा के एजेन्ट ही थे वैसे जमींदारी खुले तौर पर बेच दी गई थी लेकिन उन जमींदारियों का नियन्त्रण राजा के हाथ में ही रहा।

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प्रश्न 16.
सरकारी राजस्व जमा करने में जमींदारों के समक्ष कौन-कौनसी समस्याएँ आ रही थीं?
उत्तर:
1. राजस्व की माँग बहुत ऊँची थी।
2. यह ऊँची माँग 1790 के दशक में लागू की गई थी जब कृषि की उपज की कीमतें बहुत नीची थीं जिससे किसानों के लिए लगान चुकाना मुश्किल था।
3. राजस्व असमान था। फसल चाहे अच्छी हो या खराब, राजस्व का सही समय पर भुगतान करना जरूरी था।
4. यदि राजस्व निश्चित तिथि की शाम तक जमा नहीं हो पाता था तो जमींदारी नीलाम की जा सकती थी।

प्रश्न 17.
जमींदारों पर नियन्त्रण रखने के लिए कम्पनी सरकार ने क्या नीति अपनाई थी?
उत्तर:
1. जमींदारों की सैनिक टुकड़ियों को भंग कर दिया गया।
2. सीमा शुल्क समाप्त कर दिया गया और उनकी कचहरियों को कम्पनी द्वारा नियुक्त कलेक्टर की देखरेख में रख दिया गया।
3. जमींदारों से स्थानीय न्याय और स्थानीय पुलिस की व्यवस्था करने की शक्ति छीन ली गई।
4. जमींदार के अधिकार को पूरी तरह सीमित एवं प्रतिबंधित कर दिया गया। कलेक्टर के कार्यालय की शक्ति बढ़ गई।

प्रश्न 18.
जमींदार अपनी जमींदारी में राजस्व कैसे वसूल करता था?
उत्तर:
एक जमींदार की जमींदारी में अनेक गाँव होते थे। कम्पनी सारे गाँवों को मिलाकर उसे एक सम्पदा मानकर उस पर राजस्व की माँग लागू करती थी। उसके बाद जमींदार यह निर्धारित करता था कि उसे किन-किन गाँवों से कितना-कितना राजस्व वसूल करना है। राजस्व वसूल करने के लिए उसने अमला नामक एक अधिकारी नियुक्त कर रखा था। फिर जमींदार निर्धारित राजस्व को कम्पनी सरकार के खजाने में जमा करवाता था।

प्रश्न 19.
गाँवों से राजस्व वसूलने में जमींदार को क्या-क्या कठिनाइयाँ आती थीं?
उत्तर:
1. किसानों की आमदनी कम होने के कारण लगान वसूलने में कठिनाई आती थी।
2. फसल खराब होने पर राजस्व वसूली में परेशानी आती थी।
3. फसल की कीमतें नीची थीं।
4. किसान जान-बूझकर भी लगान जमा कराने में देरी करते थे।
5. जमींदार बाकीदारों पर मुकदमा तो चला सकता था, मगर न्यायिक प्रक्रिया लम्बी होने से उसे उस मुकदमे से राजस्व वसूली में कोई लाभ नहीं मिल पाता था।

प्रश्न 20.
बुकानन के अनुसार दिनाजपुर के जोतदार किस प्रकार जमींदारों का प्रतिरोध करते थे?
उत्तर:
बुकानन के अनुसार जोतदार बड़ी-बड़ी जमीनों को जोतते थे। वे बहुत हठीले और जिद्दी थे वे राजस्व के रूप में थोड़ी सी राशि देते थे और हर किस्त में कुछ-न- कुछ बकाया रकम रह जाती थी। जमींदारों द्वारा उन्हें कचहरी में बुलाये जाने पर वे उनकी शिकायत करने के लिए फौजदारी धाना या मुन्सिफ की कचहरी में पहुँच जाते थे और अपने अपमानित किये जाने की शिकायत करते थे वे रैयत को जमींदारों को राजस्व न देने के लिए भड़काते रहते थे।

प्रश्न 21.
पाँचवीं रिपोर्ट क्या थी? इसमें किसके बारे में बताया गया था?
उत्तर:
सन् 1813 में ब्रिटिश संसद में एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, जिनमें से एक रिपोर्ट पाँचवीं रिपोर्ट कहलाती थी। इस रिपोर्ट में भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रशासन और क्रियाकलापों का वर्णन था। इस रिपोर्ट में जमींदारों और रैयतों (किसानों) की अर्जियाँ तथा अलग-अलग जिलों के कलेक्टरों की रिपोर्ट, राजस्व विवरणियों से सम्बन्धित सांख्यिकीय तालिकाएँ और अधिकारियों द्वारा बंगाल तथा मद्रास (वर्तमान चेन्नई) के राजस्व तथा न्यायिक प्रशासन पर लिखी हुई टिप्पणियाँ शामिल थीं।

प्रश्न 22.
जमींदारों की भू-सम्पदाओं की नीलामी व्यवस्था के दोषों को संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
जमींदारों की भू-सम्पदाओं की नीलामी व्यवस्था के निम्न दोष थे –
(1) भू-सम्पदाओं की नीलामी में अनेक खरीददार होते थे और ऊंची बोली लगाने वाले को बेच दी जाती थी नीलामी में अधिकतर बिक्री फर्जी होती थी।
(2) भू-सम्पदाओं की नीलामी में अधिकांश खरीददार जमींदारों के ही नौकर या एजेंट होते थे जो जमींदार की ओर से नीलामी में भाग लेते थे। इस प्रकार जमींदारी की जमीनें खुले तौर पर बेच दी जाती थीं पर उनकी जमींदारी का नियन्त्रण उन्हीं के हाथों में रहता था।

प्रश्न 23.
औपनिवेशिक बंगाल में जमींदार अपने क्षेत्र से राजस्व वसूली किस प्रकार करते थे?
उत्तर:
औपनिवेशिक बंगाल में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने राजस्व वसूली हेतु जमींदारों को क्षेत्र दे रखे थे। एक जमींदार की जमींदारी में अनेक गाँव होते थे जिनकी संख्या 400 तक होती थी ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक जमींदारी के समस्त गाँवों को मिलाकर उसे एक सम्पदा मानकर उस पर राजस्व की माँग लागू करती थी राजस्व वसूल करने के लिए जमींदार एक अधिकारी नियुक्त करते थे। यही अधिकारी प्रत्येक गाँव से राजस्व वसूल करके जमींदार को देते थे तत्पश्चात् जमींदार एकत्रित राशि को कम्पनी सरकार के आदेशानुसार उसके खजाने में जमा करवाता था।

प्रश्न 24.
ब्रिटेन के उद्योगपतियों ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापारिक एकाधिकार का विरोध क्यों किया?
उत्तर:
(1) ब्रिटेन में ऐसे अन्य व्यापारिक समूह थे, जो भारत तथा चीन के साथ ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापारिक एकाधिकार का विरोध करते थे। ये समूह चाहते थे कि जिस शाही फरमान द्वारा कम्पनी को यह एकाधिकार मिला था, उसे रद्द किया जाये ब्रिटेन के उद्योगपति व निजी व्यापारी भी भारत से व्यापार करना चाहते थे।

(2) कई राजनीतिक समूहों का भी यह कहना था कि बंगाल पर मिली विजय का लाभ केवल ईस्ट इण्डिया कम्पनी को ही मिल रहा है, सम्पूर्ण ब्रिटिश राष्ट्र को नहीं।

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प्रश्न 25.
भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन को नियंत्रित करने के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा क्या कार्यवाही की गई?
उत्तर:
(1) कम्पनी शासन को विनियमित और नियंत्रित करने के लिए अठारहवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में अनेक अधिनियम पारित किये गये।
(2) कम्पनी को बाध्य किया गया कि वह भारत प्रशासन के विषय में नियमित रूप से अपनी रिपोर्ट भेजा करे।
(3) कम्पनी के कामकाज की जाँच करने के लिए कई समितियाँ नियुक्त की गयीं। एक प्रवर समिति द्वारा पाँचवीं रिपोर्ट तैयार की गई।

प्रश्न 26.
पहाड़ी लोगों को पहाड़िया क्यों कहा जाता था? इनके जीवन पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।
अथवा
पहाड़िया लोगों के जीवन की प्रमुख विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:
पहाड़ी लोग पश्चिमी बंगाल में राजमहल की पहाड़ियों एवं उसके आसपास के क्षेत्र में निवास करते थे, इसलिए इन्हें पहाड़िया कहा जाता था। इनकी आजीविका जंगल की उपज पर आधारित थी। ये जंगलों से महुआ के फूल, रेशम के कोये तथा राल और काठकोयले के लिए लकड़ी प्राप्त करते थे। वे जंगलों में झाड़ियों व घास- फूस को आग लगाकर जमीन साफ कर ‘झूम’ खेती करते थे तथा कुदाल से जमीन खुरचकर दालें तथा ज्वार- बाजरा उगाते थे।

प्रश्न 27.
कार्नवालिस ने इस्तमरारी बन्दोबस्त व्यवस्था क्यों लागू की?
उत्तर:
बंगाल के गवर्नर चार्ल्स कॉर्नवालिस ने इस्तमरारी बन्दोबस्त व्यवस्था 1793 ई. में लागू की थी। उस समय बंगाल की कृषि की स्थिति अच्छी नहीं थी सरकार को प्रतिवर्ष भूमि के ठेके देने पड़ते थे अतः कार्नवालिस ने दीर्घ अध्ययन के उपरान्त बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में इस्तमरारी बन्दोबस्त व्यवस्था लागू कर दी। इस व्यवस्था के अनुसार ठेकेदार ही भूमि के स्वामी होते थे तथा वे कम्पनी को निश्चित कर देते थे। इससे कम्पनी की आय निश्चित हो गयी।

प्रश्न 28.
कार्नवालिस की इस्तमरारी बंदोबस्त व्यवस्था के सकारात्मक परिणाम बताइए।
उत्तर:
कार्नवालिस की इस्तमरारी बंदोबस्त व्यवस्था के सकारात्मक परिणाम निम्नलिखित थे –
(1) कम्पनी की आय निश्चित बनाने में आसानी हुई।
(2) जमींदार ही स्थायी रूप से भूमि का स्वामी मान लिया गया अतः उसने अपनी भूमि उपजाऊ बनाने का प्रयास किया।
(3) कम्पनी के कर्मचारियों की संख्या सीमित हो गयी तथा राजस्व वसूलने के लिए अधिक धन तथा बल की आवश्यकता नहीं रही।
(4) इस्तमरारी बन्दोबस्त का सबसे बड़ा लाभ बंगाल के जमींदारों को हुआ। अब उन्हें सरकार को किसी प्रकार को भेंट नहीं देनी पड़ती थी।

प्रश्न 29.
कार्नवालिस की इस्तमरारी व्यवस्था के नकारात्मक परिणाम बताइए।
उत्तर:
कार्नवालिस की इस्तमरारी व्यवस्था के नकारात्मक परिणाम अग्रलिखित हैं –
(1) आरम्भ में अनेक जमींदार किसानों से लगान नहीं वसूल सके, जिसके परिणामस्वरूप उनकी जमींदारी बिक गयी।
(2) भूमि की माप तथा भू-राजस्व का निर्धारण सही ढंग से नहीं हो पाया था।
(3) आशाओं के विपरीत जमींदारों ने अपनी जमीन के सुधार पर कोई ध्यान नहीं दिया।

प्रश्न 30.
‘झूम’ खेती से आप क्या समझते हैं तथा यह किसके द्वारा की जाती थी?
उत्तर:
‘झूम’ खेती पहाड़िया लोगों द्वारा की जाती थी। ये लोग जंगल की झाड़ियाँ काटकर और घास-फूस में आग लगाकर जमीन साफ करके खेती करते थे। ये लोग कुदाल से जमीन को थोड़ा खुरचकर अपने खाने के लिए विभिन्न प्रकार की दालें तथा ज्वार, बाजरा उत्पन्न कर लेते थे। कुछ वर्षों तक उस साफ की गई जमीन पर खेती करते थे और फिर कुछ वर्षों के लिए उसे परती छोड़कर नये इलाके में चले जाते थे।

प्रश्न 31.
पहाड़िया लोगों द्वारा मैदानों में बसे हुए किसानों पर आक्रमण क्यों किये जाते थे?
उत्तर:
(1) पहाड़िया लोगों द्वारा ये आक्रमण अधिकतर अपने आप को अभाव या अकाल के वर्षों में जीवित रखने के लिए किये जाते थे।
(2) पहाड़िया लोग इन आक्रमणों के माध्यम से मैदानों में बसे हुए लोगों के सामने अपनी सत्ता का प्रदर्शन करना चाहते थे।
(3) ऐसे आक्रमण बाहरी लोगों के साथ अपने राजनीतिक सम्बन्ध बनाने के लिए भी किये जाते थे, मैदानों में रहने वाले जमींदारों को पहाड़ी मुखियाओं को नियमित रूप से खिराज देना पड़ता था।

प्रश्न 32.
ब्रिटिश सरकार पहाड़िया लोगों का दमन क्यों कर देना चाहती थी?
उत्तर:
(1) अंग्रेजों ने जंगलों की कटाई-सफाई के काम को प्रोत्साहन दिया और जमींदारों तथा जोतदारों ने परती भूमि को धान के खेतों में बदल दिया।
(2) अंग्रेजों ने स्थायी कृषि के विस्तार पर बल दिया क्योंकि उससे राजस्व के स्रोतों में वृद्धि हो सकती थी तथा नियत के लिए फसल पैदा हो सकती थी ।
(3) अंग्रेज जंगलों को उजाड़ मानते थे तथा पहाड़िया लोगों को असभ्य, बर्बर तथा उपद्रवी मानते थे।

प्रश्न 33.
बम्बई दक्कन में राजस्व की नई प्रणाली क्यों लागू की गई ?
उत्तर:
(1) 1810 के बाद उपज की कीमतों में वृद्धि होने से बंगाल के जमींदारों की आमदनी में बढ़ोतरी हुई, लेकिन कम्पनी की आमदनी में वृद्धि नहीं हुई, क्योंकि इस्तमरारी बन्दोबस्त के अनुसार कम्पनी बढ़ी हुई आमदनी में अपना दावा नहीं कर सकती थी।

(2) अपने वित्तीय साधनों में बढ़ोतरी की इच्छा से कम्पनी ने भू-राजस्व को अधिक से अधिक बढ़ाने के तरीकों पर विचार किया, इसलिए उन्नीसवीं शताब्दी में कम्पनी शासन में शामिल किये गये प्रदेशों में नए राजस्व बन्दोबस्त किए गए।

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प्रश्न 34.
“रैयतवाड़ी बन्दोबस्त’ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
अथवा
रैयतवाड़ी बन्दोबस्त से आप क्या समझते हैं ? इसकी विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
बम्बई दक्कन में 1820 के दशक में एक नई राजस्व प्रणाली लागू की गई, जिसे ‘रैयतवाड़ी बन्दोबस्त’ कहते हैं। इस प्रणाली के अन्तर्गत राजस्व की राशि सीधे रैयत (किसान) के साथ तय की जाती थी। भिन्न-भिन्न प्रकार की भूमि से होने वाली औसत आय का अनुमान लगा लिया जाता था और सरकार के हिस्से के रूप उसका एक अनुपात निर्धारित कर दिया जाता था। हर तीस वर्ष के बाद जमीनों का फिर से सर्वेक्षण किया जाता था और राजस्व की दर तदनुसार बढ़ा दी जाती थी।

प्रश्न 35.
ईस्ट इण्डिया कम्पनी को अपनी नई राजस्व नीति से क्या अपेक्षाएँ थीं?
उत्तर:
ईस्ट इण्डिया कम्पनी को अपनी राजस्व नीति से निम्न अपेक्षाएँ थीं –
(1) कम्पनी को यह आशा थी कि इस नीति से उन समस्याओं का समाधान हो जाएगा जो बंगाल की विजय के समय से ही उनके समक्ष उपस्थित हो रही थीं।
(2) अधिकारियों को यह अपेक्षा थी कि इससे छोटे किसानों एवं धनी भू-स्वामियों का एक ऐसा वर्ग उत्पन्न हो जाएगा जिनके पास कृषि में सुधार करने के लिए पूँजी तथा उद्यम दोनों होंगे।
(3) कम्पनी को यह आशा थी कि ब्रिटिश शासन से पालन-पोषण एवं प्रोत्साहन प्राप्त कर यह वर्ग कम्पनी के प्रति स्वामि भक्त बना रहेगा।

प्रश्न 36.
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के काल में जमींदारों की असफलता के कारण लिखिए।
उत्तर:
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के काल में जमींदारों की असफलता के निम्नलिखित कारण हैं-
राजस्व की प्रारम्भिक माँगें बहुत ऊँची थी, ऐसा इसलिए किया गया कि आगे कृषि की कीमतों में वृद्धि होने पर राजस्व नहीं बढ़ाया जा सकता। इस हानि को पूरा करने के लिए ऊंची दरें रखी गयी इसका यह कारण बताया गया कि जैसे ही कृषि का उत्पादन बढ़ेगा वैसे ही जमींदारों का बोझ कम हो जाएगा। राजस्व असमान था फसल अच्छी हो या खराब राजस्व का भुगतान सही समय पर करना जरूरी था इस्तमरारी बन्दोबस्त ने प्रारम्भ में जमींदारों की शक्ति को रैयत से राजस्व इकट्ठा करने और अपनी जमींदारी का प्रबन्धन करने तक ही सीमित कर दिया था।

प्रश्न 37.
बम्बई दक्कन में 1820 के दशक में लागू किए गए रैयतवाड़ी बन्दोबस्त के किसानों पर क्या प्रभाव पड़े?
उत्तर:
(1) रैयतवाड़ी बन्दोबस्त के अन्तर्गत माँगा गया राजस्य बहुत अधिक था। परिणामस्वरूप बहुत से स्थानों पर किसान अपने गाँव छोड़ कर नए क्षेत्रों में चले गए।
(2) राजस्व अधिकारी किसानों से कठोरतापूर्वक राजस्व वसूल करते थे। राजस्व न देने वाले किसानों की फसलें जब्त कर ली जाती थीं और सम्पूर्ण गाँव पर जुर्माना किया जाता था।
(3) 1832-34 के वर्षों में देहाती इलाके अकाल की चपेट में आ गए जिसके परिणामस्वरूप दक्कन में आधी मानव जनसंख्या और एक-तिहाई पशुधन मौत के मुँह में
चला गया।

प्रश्न 38.
1820 के दशक में लागू किये गये राजस्व के बारे में 1840 के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने क्या अनुभव किया? लिखिए।
उत्तर:
1840 के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने 1820 में लागू किये गये राजस्व के बारे में यह अनुभव किया कि –
(1) सभी जगह किसान कर्ज के बोझ से दबे हैं।
(2) 1820 के दशक में लागू किए गए राजस्व सम्बन्धी बन्दोबस्त कठोरतापूर्ण थे।
(3) राजस्व की माँग बहुत ज्यादा थी
(4) राजस्व संकलन की व्यवस्था कठोर एवं लचकहीन थी
(5) इसके बाद उन्होंने राजस्व सम्बन्धी माँग कुछ हल्की की जिससे कृषि को प्रोत्साहन मिल सके।

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प्रश्न 39.
ब्रिटेन के सूती वस्त्र निर्माता कपास की आपूर्ति हेतु वैकल्पिक स्रोत क्यों और कैसे खोज रहे थे?
उत्तर:
1860 के दशक से पूर्व ब्रिटेन में कच्चे माल के रूप में आयात की जाने वाली समस्त कपास का तीन- चौथाई भाग अमेरिका से आता था। अमेरिकी कपास पर निर्भरता के कारण ब्रिटेन के वस्त्र निर्माता अधिक परेशान थे। वे सोचते थे कि यदि कभी यह स्रोत बन्द हो गया तो हमें कपास कहाँ से मिलेगी ? अतः वे कपास के अन्य स्रोतों की खोज में जुटे। 1857 में ब्रिटेन में कपास आपूर्ति संघ की स्थापना की गई तथा 1859 में मैनचेस्टर कॉटन कम्पनी की स्थापना की गई।

प्रश्न 40.
1865 में अमेरिकी गृह युद्ध की समाप्ति का महाराष्ट्र के निर्यात व्यापारियों तथा साहूकारों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
1865 में अमेरिकी गृहयुद्ध समाप्त होने पर वहाँ कपास का उत्पादन पुनः होने से भारतीय कपास की माँग घटने लगी। इस पर महाराष्ट्र के निर्यातकों और साहूकारों ने दीर्घावधि ऋण देने से किसानों को मना कर दिया। उन्होंने यह देख लिया था कि भारतीय कपास की मांग पटती जा रही है तथा कपास की कीमतों में भी गिरावट आ रही है। अब उन्हें यह अनुभव होने लगा था कि अब किसानों में उनका ऋण चुकाने की क्षमता नहीं रही है।

प्रश्न 41.
ब्रिटेन के सूती वस्त्र निर्माता भारत से कपास का आयात क्यों करना चाहते थे?
उत्तर:
ब्रिटेन के सूती वस्त्र निर्माताओं ने भारत को एक ऐसा देश समझा जो अमेरिकी कपास के आयात का स्थान ले सकता था और अमेरिका कपास की आपूर्ति बन्द – होने पर लंकाशायर की कपास की माँग पूरी कर सकता था भारत की भूमि तथा जलवायु दोनों ही कपास की खेती के लिए अनुकूल थीं तथा यहाँ सस्तां श्रम भी उपलब्ध था। 1861 में जब अमेरिका से आने वाली कपास के आयात में भारी गिरावट आ गई, तो भारत से कपास का आयात करने का निश्चय किया गया।

प्रश्न 42.
संथालों को ‘अगुआ बाशिंदे’ किसलिए कहा गया?
उत्तर:
सन् 1800 के लगभग संथाल राजमहल की पहाड़ियों के निचले हिस्से में जंगलों को साफ कर स्थायी नी रूप से बस गये। एक ओर पहाड़िया लोग जंगल काटने के लिए हल को हाथ लगाने के लिए तैयार नहीं थे और न उपद्रवी व्यवहार कर रहे थे, दूसरी ओर संथाल अंग्रेजों को न्छ अगुआ बाशिन्दे प्रतीत हुए क्योंकि उन्हें जंगलों का सफाया करने में कोई संकोच नहीं था और वे भूमि को पूरी शक्ति की लगा कर जोतते थे।

प्रश्न 43.
ब्रिटिश कलाकार विलियम होजेज के ल्ल बारे में आप क्या जानते हो?
उत्तर:
विलियम होजेज एक ब्रिटिश कलाकार था पर जिसने कैप्टन कुक के साथ प्रशान्त महासागर की यात्रा की। न क्लीवलैंड के निमन्त्रण पर होजेज 1782 ई. में उसके साथ या जंगल भू-सम्पदाओं के भ्रमण पर गया था। वहाँ होजेज न्य ने ऐसी तस्वीरें बनाई जो ताम्रपट्टी में अम्ल की सहायता र्ति से चित्र के रूप में कटाई करके छापी जाती हैं जिन्हें एक्वाटिंट के नाम से जाना जाता था उस समय के अनेक चित्रकारों की तरह होजेज ने भी बड़े सुन्दर रमणीय दृश्यों की खोज की थी। वह उस समय के चित्रोपम दृश्यों के खोजी कलाकार स्वच्छंदतावाद की विचारधारा से प्रेरित थे।

प्रश्न 44.
डेविड रिकार्डों के बारे में आप क्या जानते हो? संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
डेविड रिकार्डों 1820 के दशक तक इंग्लैण्ड में एक जाने-माने अर्थशास्त्री के रूप में जाने जाते थे। रिकार्डों के मतानुसार, भू-स्वामी को उस समय लागू ‘औसत लगानों को प्राप्त करने का ही हक होना चाहिए। जब भूमि से ‘औसत लगान’ से अधिक प्राप्त होने लगे तो भूस्वामी को अधिशेष आय होगी जिस पर सरकार को कर लगाने की आवश्यकता होगी। यदि कर नहीं लगाया गया तो किसान किरायाजीवी में बदल जायेंगे और उनकी अधिशेष आय का भूमि के सुधार में उत्पादन रीति से निवेश नहीं होगा।

प्रश्न 45.
दक्कन दंगा आयोग की स्थापना क्यों की गई और इसने अपनी रिपोर्ट में किसे दोषी ठहराया?
उत्तर:
जब विद्रोह दक्कन में तेजी से फैला तो भारत सरकार ने 1857 के विद्रोह से सबक लेकर बम्बई की सरकार पर दबाव डाला कि वह दंगों के कारणों की छानबीन करने के लिए एक आयोग बैठाये इस प्रकार दक्कन दंगा आयोग की स्थापना की गई। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बढ़े हुए राजस्व की माँग को दोषी न मानकर सारा दोष ऋणदाताओं और साहूकारों का बताया।

प्रश्न 46.
अपनी जमींदारी को छिनने से बचाने के लिए जमींदारों ने कौन-से तरीके अपनाये?
उत्तर:
(1) जमींदारी का कुछ हिस्सा किसी महिला सम्बन्धी को दे दिया जाता था क्योंकि महिलाओं की सम्पत्ति को छीना नहीं जाता था।
(2) जमींदार की नीलाम की जाने वाली जमीन को जमींदार के एजेन्ट ही खरीद लेते थे।
(3) जमींदार कभी भी राजस्व की पूरी माँग अदा नहीं करता था।
(4) नीलामी में कोई जमीन खरीदने वाले बाहरी व्यक्ति को उस जमीन का कब्जा ही नहीं मिल पाता था अथवा पुराने जमींदार के लठियाल नये खरीददार को मार- पीट कर भगा देते थे।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 47.
“पहाड़िया लोगों का जीवन घनिष्ठ रूप से जंगलों से जुड़ा हुआ था।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिकारियों, झूम खेती करने वालों, खाद्य बटोरने वालों, काठकोयला बनाने वालों तथा रेशम के कीड़े पालने वालों के रूप में पहाड़िया लोगों का जीवन घनिष्ठ रूप से एक्वाटिंट के नाम से जाना जाता था उस समय के अनेक चित्रकारों की तरह होजेज ने भी बड़े सुन्दर रमणीय दृश्यों की खोज की थी। वह उस समय के चित्रोपम दृश्यों के खोजी कलाकार स्वच्छंदतावाद की विचारधारा से प्रेरित थे।

प्रश्न 44.
डेविड रिकार्डों के बारे में आप क्या जानते हो? संक्षेप में बताइए ।
उत्तर:
डेविड रिकार्डों 1820 के दशक तक इंग्लैण्ड में एक जाने-माने अर्थशास्त्री के रूप में जाने जाते थे। रिकार्डों के मतानुसार, भू-स्वामी को उस समय लागू ‘औसत लगानों को प्राप्त करने का ही हक होना चाहिए। जब भूमि से ‘औसत लगान’ से अधिक प्राप्त होने लगे तो भूस्वामी को अधिशेष आय होगी जिस पर सरकार को कर लगाने की आवश्यकता होगी। यदि कर नहीं लगाया गया तो किसान किरायाजीवी में बदल जायेंगे और उनकी अधिशेष आय का भूमि के सुधार में उत्पादन रीति से निवेश नहीं होगा।

प्रश्न 45.
दक्कन दंगा आयोग की स्थापना क्यों की गई और इसने अपनी रिपोर्ट में किसे दोषी ठहराया?
उत्तर:
जब विद्रोह दक्कन में तेजी से फैला तो भारत सरकार ने 1857 के विद्रोह से सबक लेकर बम्बई की सरकार पर दबाव डाला कि वह दंगों के कारणों की छानबीन करने के लिए एक आयोग बैठाये इस प्रकार दक्कन दंगा आयोग की स्थापना की गई। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बढ़े हुए राजस्व की माँग को दोषी न मानकर सारा दोष ऋणदाताओं और साहूकारों का बताया।

प्रश्न 46.
अपनी जमींदारी को छिनने से बचाने के लिए जमींदारों ने कौन-से तरीके अपनाये?
उत्तर:
(1) जमींदारी का कुछ हिस्सा किसी महिला सम्बन्धी को दे दिया जाता था क्योंकि महिलाओं की सम्पत्ति को छीना नहीं जाता था।
(2) जमींदार की नीलाम की जाने वाली जमीन को जमींदार के एजेन्ट ही खरीद लेते थे।
(3) जमींदार कभी भी राजस्व की पूरी माँग अदा नहीं करता था।
(4) नीलामी में कोई जमीन खरीदने वाले बाहरी व्यक्ति को उस जमीन का कब्जा ही नहीं मिल पाता था अथवा पुराने जमींदार के लठियाल नये खरीददार को मार- पीट कर भगा देते थे।

प्रश्न 47.
“पहाड़िया लोगों का जीवन घनिष्ठ रूप से जंगलों से जुड़ा हुआ था।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिकारियों, झूम खेती करने वालों, खाद्य बटोरने वालों, काठकोयला बनाने वालों तथा रेशम के कीड़े पालने वालों के रूप में पहाड़िया लोगों का जीवन घनिष्ठ रूप से एक्वाटिंट के नाम से जाना जाता था। उस समय के अनेक चित्रकारों की तरह होजेज ने भी बड़े सुन्दर रमणीय दृश्यों की खोज की थी। वह उस समय के चित्रोपम दृश्यों के खोजी कलाकार स्वच्छंदतावाद की विचारधारा से प्रेरित थे।

प्रश्न 44.
डेविड रिकार्डों के बारे में आप क्या जानते हो? संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
डेविड रिकार्डों 1820 के दशक तक इंग्लैण्ड में एक जाने-माने अर्थशास्त्री के रूप में जाने जाते थे। रिकार्डों के मतानुसार, भू-स्वामी को उस समय लागू ‘औसत लगानों’ को प्राप्त करने का ही हक होना चाहिए। जब भूमि से ‘औसत लगान’ से अधिक प्राप्त होने लगे तो भूस्वामी को अधिशेष आय होगी जिस पर सरकार को कर लगाने की आवश्यकता होगी। यदि कर नहीं लगाया गया तो किसान किरायाजीवी में बदल जायेंगे और उनकी अधिशेष आय का भूमि के सुधार में उत्पादन रीति से निवेश नहीं होगा।

प्रश्न 45.
दक्कन दंगा आयोग की स्थापना क्यों की गई और इसने अपनी रिपोर्ट में किसे दोषी ठहराया?
उत्तर:
जब विद्रोह दक्कन में तेजी से फैला तो भारत सरकार ने 1857 के विद्रोह से सबक लेकर बम्बई की सरकार पर दबाव डाला कि वह दंगों के कारणों की छानबीन करने के लिए एक आयोग बैठाये। इस प्रकार दक्कन दंगा आयोग की स्थापना की गई। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बड़े हुए राजस्व की माँग को दोषी न मानकर सारा दोष ऋणदाताओं और साहूकारों का बताया।

प्रश्न 46.
अपनी जमींदारी को छिनने से बचाने के लिए जमींदारों ने कौन-से तरीके अपनाये?
उत्तर:
(1) जमींदारी का कुछ हिस्सा किसी महिला सम्बन्धी को दे दिया जाता था क्योंकि महिलाओं की सम्पत्ति को छीना नहीं जाता था।
(2) जमींदार की नीलाम की जाने वाली जमीन को जमींदार के एजेन्ट ही खरीद लेते थे।
(3) जमींदार कभी भी राजस्व की पूरी माँग अदा नहीं करता था।
(4) नीलामी में कोई जमीन खरीदने वाले बाहरी व्यक्ति को उस जमीन का कब्जा ही नहीं मिल पाता था अथवा पुराने जमींदार के लठियाल नये खरीददार को मार- पीट कर भगा देते थे।

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प्रश्न 47.
” पहाड़िया लोगों का जीवन घनिष्ठ रूप से जंगलों से जुड़ा हुआ था। ” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिकारियों, झूम खेती करने वालों, खाद्य बटोरने वालों, काठकोयला बनाने वालों तथा रेशम के कीड़े पालने वालों के रूप में पहाड़िया लोगों का जीवन घनिष्ठ रूप से जंगलों से जुड़ा हुआ था। वे इमली के पेड़ों के बीच बनी अपनी झोंपड़ियों में रहते थे और आम के पेड़ों की छाँह में आराम करते थे। वे प्रदेश को अपनी निजी भूमि मानते थे और बाहरी लोगों के प्रवेश का प्रतिरोध करते थे।

प्रश्न 48.
पहाड़ियों के प्रति अंग्रेजों का क्या दृष्टिकोण था?
उत्तर:
अंग्रेज पहाड़ियों को असभ्य, बर्बर, उपद्रवी तथा क्रूर समझते थे और उन पर शासन करना एक कठिन कार्य मानते थे इसलिए उन्होंने यह विचार किया कि जंगलों का सफाया करके, वहाँ स्थायी कृषि की स्थापना की जाए तथा जंगली लोगों को पालतू एवं सभ्य बनाया जाए। अत: अंग्रेजों ने पहाड़िया लोगों को खेती का व्यवसाय अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया।

प्रश्न 49.
पहाड़िया लोग संथाल लोगों को अपना शत्रु क्यों मानते थे?
उत्तर:
संथाल लोग राजमहल के जंगलों को नष्ट करते हुए, इमारती लकड़ी को काटते हुए, जमीन जोतते हुए और चावल तथा कपास का उत्पादन करते हुए राजमहल की पहाड़ियों में बड़ी संख्या में बस गए। उन्होंने निचली पहाड़ियों पर अधिकार कर लिया। इससे पहाड़िया लोगों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया और उन्होंने संथालों का प्रतिरोध करना शुरू कर दिया।

प्रश्न 50.
अंग्रेजों ने राजमहल की पहाड़ियों में संथालों को बसाने का निश्चय क्यों किया?
उत्तर:
अंग्रेज संचालों को आदर्श निवासी मानते थे क्योंकि वे जंगलों को नष्ट करने के समर्थक थे तथा जमीन को पूरी शक्ति लगाकर जोतते थे अतः उन्होंने 1832 तक राजमहल के एक काफी बड़े क्षेत्र को ‘दामिन-इ-कोह’ के रूप में सीमांकित कर दिया और इसे संथालों की भूमि घोषित कर दिया। अतः यहाँ संथाल बड़ी संख्या में बस गए और कई प्रकार की वाणिज्यिक खेती करने लगे तथा व्यापारियों साहूकारों के साथ लेन-देन करने लगे।

प्रश्न 51.
संथालों द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने के क्या कारण थे?
उत्तर:
(1) संथालों को यह ज्ञात हो गया कि उन्होंने जिस भूमि पर खेती करना शुरू किया था, वह उनके हाथों से निकलती जा रही थी
(2) संथालों ने जिस जमीन पर खेती शुरू की थी, उस पर सरकार ने भारी कर लगा दिया था
(3) साहूकारों ने बहुत ऊँची दर पर ब्याज लगा दिया था और कर्ज अदा न किए जाने पर संथालों की जमीन पर कब्जा कर लेते थे
(4) जमींदार लोग दामिन क्षेत्र पर अपने नियंत्रण का दावा कर रहे थे।

प्रश्न 52.
बम्बई दक्कन में किसानों के विद्रोह के कारणों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
(1) अम्बई (मुम्बई) में लागू की गई रैयतवाड़ी प्रणाली के अन्तर्गत किसानों से माँगा गया राजस्व बहुत अधिक था। राजस्व अदा न करने वाले किसानों की फसलें जब्त कर ली जाती थीं।
(2) कालान्तर में साहूकारों ने ऋण देना बन्द कर दिया।
(3) ऋणदाता संवेदनहीन थे तथा ब्याज मूलधन से भी अधिक वसूल करते थे।
(4) ऋणदाता ऋण चुकायी गई राशि की रसीद नहीं देते थे तथा बंधपत्रों में जाली आँकड़े भर देते थे और किसानों की उपज को नीची कीमतों पर लेते थे।

प्रश्न 53.
1861 में अमेरिका में छिड़ने वाले गृहयुद्ध का भारतीय किसानों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
1861 में अमेरिका में गृह बुद्ध छिड़ने पर अमेरिका से आने वाली कच्ची कपास के आयात में भारी गिरावट आ गई। इस स्थिति में दक्कन के गाँवों के रैयतों (किसानों) को विपुल धनराशि ऋण के रूप में मिलने लगी। परन्तु इस अवसर पर केवल धनी किसानों को लाभ हुआ तथा अधिकांश किसान ऋण के भार से दब गए। व्यापारियों और साहूकारों ने ऋण देने से इन्कार कर दिया। दूसरी ओर राजस्व की माँग बढ़ा दी गई। ऋणदाता खातों में धोखाधड़ी करने लगे और कानून की अवहेलना करने लगे।

प्रश्न 54.
रैयत ऋणदाता को कुटिल और धोखेबाज क्यों समझने लगे थे?
उत्तर:
ऋणदाता ऋण चुकाए जाने के बाद रैयत को उसकी रसीद नहीं देते थे तथा बंधपत्रों में जाली आँकड़े भर लेते थे। वे कानून को घुमाकर अपने पक्ष में कर लेते थे और रैयत से हर तीसरे वर्ष एक नया बंधपत्र भरवाते थे। वे किसानों की फसलों को नीची कीमतों पर ले लेते थे तथा अवसर पाकर किसानों की धन सम्पत्ति पर ही अधिकार कर लेते थे। भिन्न-भिन्न प्रकार के दस्तावेजों और बंधपत्रों से किसान असंतुष्ट थे।

निबन्धात्मक प्रश्न –

प्रश्न 1.
“गाँवों में जोतदारों की स्थिति अत्यन्त मजबूत थी और जमींदारों की शक्ति की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली थी।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गाँवों में जोतदारों की सुदृढ़ स्थिति अठारहवीं शताब्दी के अन्त में बंगाल के गाँवों में जोतदारों की स्थिति अत्यन्त मजबूत थी तथा जमींदारों की शक्ति की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली थी।
(1) बड़ी-बड़ी जमीनों के स्वामी- जोतदार गाँवों में रहते थे तथा वे बड़ी-बड़ी जमीनों के स्वामी थे। ये धन-सम्पन्न किसान थे। इन जोतदारों ने जमीन के बड़े-बड़े रकों पर अधिकार कर रखा था। ये रकबे (क्षेत्र) कभी- कभी तो कई हजार एकड़ में फैले होते थे। स्थानीय व्यापारियों और साहूकारों के व्यवसाय पर भी उनका नियंत्रण था और इस प्रकार वे उस क्षेत्र के दरिद्र किसानों पर अपनी शक्ति का प्रयोग करते थे। उनकी जमीन का काफी बड़ा भाग बटाईदारों के माध्यम से जोता जाता था। ये बटाईदार स्वयं अपने हल-बैल लाकर खेती करते थे और फसल के बाद उपज का आधा हिस्सा जोतदारों को दे देते थे।

(2) गाँवों में जोतदारों की शक्ति-गाँवों में जोतदारों की शक्ति जमींदारों की शक्ति की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होती थी। जोतदार गाँवों में ही रहते थे तथा गाँवों में रहने वाले किसानों पर उनका सीधा नियंत्रण था। जमींदारों द्वारा लगान बढ़ाने के लिए किए जाने वाले प्रयासों का वे घोर प्रतिरोध करते थे तथा लगान वसूली में बाधा डालते थे जो रैयत उन पर निर्भर रहते थे, उन्हें वे अपने पक्ष में एकजुट रखते थे तथा जमींदार के राजस्व के भुगतान में जानबूझ कर देरी करा देते थे।

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(3) जोतदारों द्वारा जमींदारी को खरीदना राजस्व अदा न करने पर जब जमींदारी नीलाम होती थी, तो प्रायः जोतदार ही उन जमीनों को खरीद लेते थे।

(4) उत्तरी बंगाल में जोतदारों का सबसे अधिक शक्तिशाली होना- उत्तरी बंगाल में जोतदार सबसे अधिक शक्तिशाली थे। कुछ स्थानों पर जोतदारों को ‘हवलदार’ कहा जाता था और कुछ अन्य स्थानों पर वे ‘गांटीदार’ म अथवा ‘मंडल’ कहलाते थे। जोतदारों के उदय होने के २ फलस्वरूप जमींदारों के अधिकारों का कमजोर पड़ना अनिवार्य था।

(5) रैयत को राजस्व न देने के लिए भड़काना-जोतदार अपने राजस्व के रूप में कुछ थोड़े से रुपये दे देते थे और लगभग हर किस्त में कुछ न कुछ बकाया राशि रह जाती थी। जमींदार की रकम के कारण यदि अधिकारी उन्हें न्यायालय में बुलाते थे, तो वे तुरन्त उनकी शिकायत करने के लिए फौजदारी थाना अथवा मुन्सिफ की कचहरी में पहुँच क जाते थे तथा जमींदार के कारिन्दों द्वारा उन्हें अपमानित किए जाने की बात कहते थे। जोतदार रैयत को राजस्व न देने के लिए भी भड़काते रहते थे।

प्रश्न 2.
पहाड़िया लोग कौन थे? ब्रिटिश सरकार की उनका दमन करने के लिए क्यों प्रयत्नशील थी?
अथवा
पहाड़िया लोग कौन थे? बाहरी लोगों के आगमन पर उनकी क्या प्रतिक्रिया थी?
उत्तर:
पहाड़िया लोगों का परिचय –
(1) झूम खेती करना – पहाड़िया लोग जंगल ‍ शाड़ियों को काटकर और पास फेंस को जलाकर जमीन साफ करते थे। ये लोग अपने भोजन के लिए अनेक प्रका की दालें तथा ज्वार बाजरा उगा लेते थे।

(2) जंगलों से प्राप्त उत्पादों का उपयोग करना- पहाड़िया लोग खाने के लिए जंगलों से महुआ के फूल इकट्ठे करते थे तथा बेचने के लिए रेशम के कोया और राला तथा काठकोयला बनाने के लिए लकड़ियाँ इकट्ठी करते थे पेड़ों के नीचे उगे हुए घास-फूंस पशुओं के लिए चरागा का काम देती थी।

(3) पहाड़ियों के जीवन का जंगल से घनिष्ठ रूपा से जुड़ना पहाड़िया लोग शिकारियों, झूम खेती करने बालों, खाद्य पदार्थ इकट्ठा करने वालों, काठकोयला बनाने वालों तथा रेशम के कीड़े पालने वालों के रूप में अपना जीवन निर्वाह करते थे। उनका जीवन जंगल से मनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ था। वे इमली के पेड़ों के नीचे अपनी झोंपड़ियों में रहते थे तथा आम के वृक्षों की छाँह में विश्राम करते थे।

(4) पहाड़िया लोगों के मुखिया पहाड़िया लोगों के मुखिया अपने समूह में एकता बनाए रखते थे तथा आपसी लड़ाई-झगड़ों को निपटा देते थे। अन्य जनजातियों तथा मैदानी लोगों के साथ लड़ाई छिड़ने पर वे अपनी जन- जाति का नेतृत्व करते थे।

(5) मैदानी भागों पर आक्रमण करना पहाड़िया लोग मैदानी भागों में बसे हुए किसानों पर आक्रमण करते थे ये आक्रमण प्रायः अभाव या अकाल के वर्षों में जीवित रखने के लिए किए जाते थे। इन आक्रमणों के माध्यम से वे अपनी शक्ति का प्रदर्शन भी करना चाहते थे।

(6) अंग्रेजों द्वारा पहाड़िया लोगों का दमन करना- अंग्रेज लोग जंगलों की कटाई-सफाई कर स्थायी कृषि का विस्तार करना चाहते थे वे जंगलों को उजाड़ मानते थे तथा पहाड़िया लोगों को असभ्य, बर्बर, क्रूर तथा उपद्रवी मानते थे। 1770 के दशक में अंग्रेजों ने पहाड़ियों का क्रूरतापूर्वक दमन किया। इसके बाद पहाड़िया लोग पहाड़ों के भीतरी भागों में चले गए। बाद में संथालों ने उन्हें पराजित कर दिया और उन्हें पहाड़ियों के भीतर चले जाने के लिए बाध्य कर दिया।

प्रश्न 3.
ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी काल में बंगाल में जोतदारों के उदय को विस्तार से समझाइए।
उत्तर:
ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी काल में बंगाल में जोतदारों के उदय के विस्तार को अग्र बिन्दुओं के अन्तर्गत समझा जा सकता है-
(1) 18वीं शताब्दी में बंगाल में उदित होने वाले धनी किसानों को जोतदार कहा गया। इन्होंने गाँवों में अपनी स्थिति मजबूत कर ली थी।
(2) 19वीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों तक आते- आते जोतदारों ने जमीन के बड़े-बड़े टुकड़े प्राप्त कर लिए थे जो 1000 एकड़ में फैले हुए थे।
(3) जोतदारों का गाँवों के स्थानीय व्यापार एवं साहूकारों के कारोबार पर भी नियन्त्रण था। वे अपने क्षेत्र के निर्धन किसानों पर भी अपनी शक्ति का अधिक प्रयोग करते थे।
(4) जोतदारों की भूमि का एक बड़ा भाग बटाईदारों के माध्यम से जोता जाता था जो स्वयं अपना हल लाते थे, खेतों में मेहनत करते थे एवं फसल उत्पन्न होने के पश्चात् उपज का आधा भाग जोतदारों को प्रदान करते थे।
(5) गाँवों में जोतदारों की शक्ति जमींदारों की शक्ति से अधिक प्रभावशाली थी। जमींदार शहर में रहते थे जबकि जोतदार गाँवों में रहा करते थे फलस्वरूप जोतदारों का गाँव के अधिकांश निर्धन लोगों पर सीधा नियन्त्रण रहता था।
(6) जोतदारों का जमींदारों से संघर्ष चलता रहता था। इसके निम्न कारण हैं-
(i) जमींदारों द्वारा लगान बढ़ाने पर जोतदार विरोध करते थे।
(ii) जोतदार जमींदार के अधिकारियों को अपना कर्तव्य पालन करने से रोकते थे।
(iii) जो लोग जोतदारों पर निर्भर रहते थे उन्हें वे अपने पक्ष में एकजुट रखते थे।
(iv) जोतदार जमींदारों को परेशान करने की नीयत से किसानों द्वारा जमींदारों को दिए जाने वाले राजस्व के भुगतान में जानबूझकर देरी करने के लिए उकसाते थे।
(v) जब जमींदारों की भू-सम्पदाएँ नीलाम होती थीं तो जोतदार उनकी जमीन को खरीद लेते थे जो जमींदारों को अच्छा नहीं लगता था।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि बंगाल में जोतदार शक्तिशाली बनकर उभरे। उनके उदय से जमींदारों के अधिकारों का कमजोर पड़ना स्वाभाविक था।

प्रश्न 4.
संथाल विद्रोह कब व क्यों हुआ? इस पर एक लघु निबन्ध लिखिए।
अथवा
संथाल कौन थे? उनके विद्रोह के कारणों का विश्लेषण कीजिये।
उत्तर:
संथालों का परिचय
(1) संथालों का राजमहल की पहाड़ियों में बसना संथाल लोग 1800 के आस-पास राजमहल की पहाड़ियों में बस गए थे ब्रिटिश अधिकारियों ने संथालों को राजमहल की पहाड़ियों में बसकर स्थायी खेती करने के लिए राजी कर लिया। इस प्रकार 1800 के आसपास संचाल जंगलों को साफ कर इमारती लकड़ी को काटते हुए पहाड़ियों की तलहटी में जमीन साफ कर धान और कपास की स्थायी कृषि करने लगे। इन्होंने पहाड़िया लोगों को राजमहल की पहाड़ियों के भीतरी भाग में जाने के लिए मजबूर कर दिया।

(2) दामिन-इ-कोह का निर्माण सन् 1832 के आसपास ब्रिटिश कम्पनी ने एक बड़े भू-भाग को संथालों के लिए सीमांकित कर दिया जो ‘दामिन-इ-कोह’ कहलाया। इसे संथाल भूमि घोषित कर दिया गया।

(3) संथालों की संख्या वृद्धि – दामिन-इ-कोह के सीमांकन के बाद संथालों की बस्तियाँ तेजी से बढ़ीं। सन् 1838 में गाँवों की संख्या 40 थी जो 1851 तक 1,473 गाँवों में बदल गई और जनसंख्या जो पहले 3,000 थी, बढ़कर 82,000 से भी अधिक हो गई। खेती का विस्तार होने से कम्पनी के राजस्व में भी वृद्धि होने लगी। संथाल विद्रोह कब और क्यों? सन् 1855-56 में संथालों ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। सिधू मांझी उनका नेता था।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

इस विद्रोह के प्रमुख कारण अग्रलिखित थे –
(1) कम्पनी सरकार द्वारा भारी कर लगाना- कम्पनी सरकार ने प्रारम्भ में संथालों को जो भूमि दी थी, उस पर कोई राजस्व नहीं था; लेकिन जैसे ही संथालों ने कृषि में विकास किया, कम्पनी सरकार ने उन पर भारी कर लगा दिया।
(2) ऊँची ब्याज दर साहूकारों द्वारा ऊँची दर पर ब्याज लगाया गया तथा कर्ज अदा न कर पाने पर उनकी जमीन पर कब्जा कर लिया गया।
(3) जमींदारों का अपने नियंत्रण का दावा- जिस जमीन को साफ कर संथाल लोग खेती कर रहे थे, उस पर अब जमींदारों ने अपने नियंत्रण का दावा करना शुरू कर दिया ।
(4) संथालों की मानसिकता में बदलाव — संथालों ने 1850 के दशक तक यह महसूस किया कि उनका अधिकार जमीन पर से खत्म होता जा रहा है। उन्हें अपने *लिए एक ऐसे आदर्श संसार का निर्माण करना है, जहाँ उनका अपना शासन हो जमींदारों, साहूकारों और औपनिवेशिक राज के विरुद्ध विद्रोह करने का समय अब आ गया है।

प्रश्न 5.
ईस्ट इण्डिया कम्पनी की भू-राजस्व नीतियों का जमींदारों द्वारा किस प्रकार प्रतिरोध किया गया?
अथवा
ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों का जमींदारों ने कौन- कौनसी नई रणनीतियाँ बनाकर प्रतिरोध किया और उसका क्या परिणाम निकला?
उत्तर:
ग्रामीण क्षेत्रों में जोतदारों की स्थिति उभर रही श्री लेकिन जमींदारों की सत्ता पूर्णतः समाप्त नहीं हुई थी। राजस्व की अत्यधिक मांग और अपनी भू-सम्पदा को ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा नीलाम करने की समस्या से निपटने के लिए जमींदारों ने कुछ रणनीतियाँ बनाई –
(1) जमींदारों द्वारा अपनी भू-सम्पदा का स्त्रियों को हस्तान्तरण – ईस्ट इण्डिया कम्पनी महिलाओं के हिस्सों की नीलामी नहीं करती थी इसलिए जमींदार अपनी जमींदारी को नीलामी से बचाने के लिए अपनी भू-सम्पदा के कुछ भागों को अपने परिवार की स्वियों के नाम हस्तान्तरित कर देते थे।

(2) नकली नीलामी जमींदारों ने अपने एजेंटों को नीलामी के दौरान खड़ा करके नीलामी की प्रक्रिया में जोड़-तोड़ किया। वे जानबूझकर कम्पनी के अधिकारियों को परेशान करने के लिए राजस्व का भुगतान नहीं करते थे जिससे भुगतान न की गई बकाया राशि बढ़ जाती थी। जब भू-सम्पदा का हिस्सा नीलाम किया जाता था तो जमींदार के व्यक्ति ही अन्य खरीददारों के मुकाबले ऊँची बोली लगाकर सम्पत्ति को खरीद लेते थे।

(3) अन्य तरीके जमींदार लोग भू-सम्पदा को परिवारजनों के नाम स्थानान्तरित करने या फर्जी बिक्री दिखाकर अपनी भू-सम्पदा को छिनने से बचने के साथ- साथ कुछ अन्य तरीके भी अपनाते थे। यदि कम्पनी के किसी अधिकारी की जिद के कारण किसी जमींदार की भू-सम्पदा को किसी बाहर का व्यक्ति खरीद लेता था तो उसे कब्जा प्राप्त नहीं हो पाता था कभी-कभी पुराने किसान नये जमींदार को लोगों की जमीन में घुसने नहीं देते थे।
परिणाम- 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में कृषि उत्पादों में मंदी की स्थिति समाप्त हो गई। इसलिए जो जमींदार 1790 ई. के दशक की परेशानियों को झेलने में सफल हो
गए, उन्होंने अपनी सत्ता को सुदृढ़ बना लिया। राजस्व के भुगतान सम्बन्धी नियमों को लचीला बनाने के फलस्वरूप गाँवों पर जमींदारों की पकड़ और मजबूत हो गयी। परन्तु 1930 की मंदी के कारण जमींदारों को नुकसान उठाना पड़ा और ग्रामीण क्षेत्रों में जोतदारों ने अपनी स्थिति और अधिक मजबूत कर ली।

प्रश्न 6.
1820 के दशक में बम्बई दक्कन में रैयतवाड़ी बन्दोबस्त क्यों लागू किया गया? इसके किसानों पर क्या प्रभाव पड़े?
उत्तर:
बम्बई दक्कन में रैयतवाड़ी बन्दोबस्त लागू करने के कारण 1820 के दशक में बम्बई दक्कन में रैयतवाड़ी बन्दोबस्त लागू किये जाने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे –
(1) भू-राजस्व को अधिक से अधिक बढ़ाना- 1810 के बाद कृषि के मूल्य बढ़ गए, जिससे उपज के मूल्य में वृद्धि हुई और बंगाल के जमींदारों की आमदनी में वृद्धि हुई। परन्तु इस्तमरारी बन्दोबस्त के कारण ब्रिटिश सरकार इस बढ़ी हुई आय में अपने हिस्से का कोई दावा नहीं कर सकती थी। अतः उसने अपने भू-राजस्व को अधिक से अधिक बढ़ाने के लिए नवीन राजस्व प्रणालियाँ लागू करने का निश्चय कर लिया।

(2) डेविड रिकार्डों के विचारों से प्रभावित होना- ब्रिटिश अधिकारी इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डेविड रिकार्डों के विचारों से प्रभावित थे रिकार्डों के विचारों के अनुसार भू-स्वामी को उस समय लागू ‘ औसत लगानों को प्राप्त करने का ही अधिकार होना चाहिए। ब्रिटिश अधिकारियों ने महसूस किया कि बंगाल में जमींदार लोग किराया जीवियों के रूप में बदल गए थे क्योंकि उन्होंने अपनी जमीनें पट्टे पर दे दीं और किराये की आमदनी पर निर्भर रहने लगे। इसलिए ब्रिटिश अधिकारियों ने एक नवीन राजस्व प्रणाली अपनाने का निश्चय किया।

रैयतवाड़ी बन्दोबस्त लागू करना 1820 के दशक में बम्बई दक्कन में रैयतवाड़ी बन्दोबस्त लागू किया गया। इस प्रणाली के अन्तर्गत राजस्व की राशि सीधे रैयत के साथ तय की जाती थी। भिन्न-भिन्न प्रकार की भूमि से होने वाली औसत आय का अनुमान लगा लिया जाता था। रैयत की राजस्व अदा करने की क्षमता का आकलन कर लिया जाता था और सरकार के हिस्से के रूप में उसका एक अनुपात निर्धारित कर दिया जाता था। हर 30 वर्ष के बाद जमीनों का पुन: सर्वेक्षण किया जाता था और राजस्व की दर तदनुसार बढ़ा दी जाती थी।

रैयतवाड़ी बन्दोबस्त के किसानों पर प्रभाव रैयतवाड़ी बन्दोबस्त के किसानों पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े –
(1) राजस्व का अधिक होना सरकार की राजस्व की माँग इतनी अधिक थी कि बहुत से स्थानों पर किसान अपने गाँव छोड़ कर नये क्षेत्रों में चले गए।
(2) ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा कठोरतापूर्वक लगान वसूल करना इस स्थिति में भी ब्रिटिश अधिकारी कठोरतापूर्वक राजस्व वसूल करते थे और राजस्व न देने वाले किसानों की फसलों को जब्त कर लेते थे तथा सम्पूर्ण गाँव पर जुर्माना ठोक देते थे।
(3) भीषण अकाल- 1832-34 के वर्षों में देहाती इलाके अकाल की चपेट में आ गए जिससे दक्कन की आधी मानव जनसंख्या और एक-तिहाई पशुधन मौत के मुँह में चला गया।
(4) ऋणदाताओं से ऋण लेना किसानों को अपने जीवन निर्वाह के लिए ऋणदाताओं से रुपया उधार लेना पड़ा। कर्ज बढ़ता गया, उधार की राशियाँ बकाया रहती गई और ऋणदाताओं पर किसानों की निर्भरता बढ़ती गई।

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प्रश्न 7.
फ्रांसिस बुकानन कौन था? इसके दिए गए विवरण का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
उत्तर:
फ्रांसिस बुकानन एक चिकित्सक था जो बंगाल चिकित्सा सेवा में 1794 से 1815 ई. तक कार्यरत रहा। कुछ समय के लिए वह भारत के गवर्नर जनरल लार्ड वेलेजली का शल्य चिकित्सक भी रहा। कलकत्ता में रहने के दौरान उसने कलकत्ता में एक चिड़ियाघर की स्थापना की, जो कलकत्ता अलीपुर चिड़ियाघर कहलाया। बंगाल सरकार के अनुरोध पर उसने ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकार में आने वाली भूमि का विस्तृत सर्वेक्षण कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। उसके अनुसार राजस्व की वृद्धि हेतु जंगलों को कृषि भूमि में बदलना अनिवार्य था। 1815 में वह बीमार होने के पश्चात् वह इंग्लैण्ड वापस चले गए। फ्रांसिस बुकानन द्वारा दिया गया विवरण बुकानन की यात्राएं व सर्वेक्षण ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए विकास और प्रगति का आधार थे।

इनके विवरण को निम्न बिन्दुओं के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जा सकता है –
(1) बुकानन द्वारा दिया गया विवरण संथालों के बारे में, राजमहल के पहाड़िया लोगों के बारे में और अनेक अन्य बातों के विषय में विस्तृत जानकारी का स्रोत है। परन्तु उसके विवरण को पूर्णतया मान्य भी नहीं किया जा सकता था क्योंकि वह कम्पनी का कर्मचारी था।

(2) फ्रांसिस बुकानन ने विशाल वनों से परिदृश्यों और वहाँ से सरकार को सम्भवतः राजस्व देने वाले स्रोतों का सर्वेक्षण किया, खोज यात्राएँ आयोजित कीं और जानकारी इकट्ठी करने के लिए कम्पनी के माध्यम से भू-वैज्ञानिकों, भूगोलवेत्ताओं, वनस्पति वैज्ञानिकों, चिकित्सकों का सहयोग व सेवाओं का उपयोग किया।

(3) बुकानन अन्वेषण शक्ति रखने वाला असाधारण शक्ति का व्यक्ति था। उसने वाणिज्यिक दृष्टिकोण से मूल्यवान पत्थरों और खनिजों का प्रयास किया। उसने नमक बनाने और कच्चा लोहा निकालने की स्थानीय पद्धति का निरीक्षण भी किया।

(4) किसी भू-दृश्य का वर्णन करते हुए उसने उस भूमि को और उपजाऊ बनाने का अथवा वहाँ कौनसी फसलें बोयी जा सकती हैं इत्यादि का भी विवरण दिया है।

(5) प्रगति के सम्बन्ध में बुकानन का आकलन आधुनिक पाश्चात्य विचारधारा द्वारा निर्धारित होता था। वह वनवासियों की जीवनशैली का आलोचक था।

प्रश्न 8.
दक्कन विद्रोह के कारणों की विवेचना कीजिये।
उत्तर:
उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान भारत के विभिन्न प्रान्तों के किसानों ने साहूकारों और अनाज के व्यापारियों के विरुद्ध अनेक विद्रोह किए। ऐसा ही एक विद्रोह सन् 1875 में किसानों द्वारा दक्कन में किया गया, जिसे दक्कन विद्रोह कहा जाता है। यह विद्रोह पूना तथा अहमदनगर एवं उसके आसपास के क्षेत्रों में फैला था।
दक्कन विद्रोह के कारण किसानों द्वारा दक्कन में विद्रोह करने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे –
1. कम्पनी द्वारा राजस्व बढ़ाना- दक्कन में 1820 के दशक में रैयतवाड़ी नामक नयी राजस्व व्यवस्था लागू की गई और इसमें राजस्व की माँग ऊंची रखी गई। कम्पनी द्वारा 30 वर्ष पश्चात् अगले बन्दोबस्त में राजस्व 50 से 100 प्रतिशत तक बढ़ा दिया गया। किसान इस बढ़े हुए राजस्व को चुकाने की स्थिति में नहीं थे।

2. राजस्व की जबरन वसूली – जिला कलेक्टर अपनी कार्यकुशलता प्रदर्शित करने हेतु राजस्व की जबरन वसूली करते थे। फसल खराब होने पर भी कोई छूट नहीं मिलती थी।

3. कीमतों में गिरावट 1832 के बाद कृषि उत्पादों की कीमतों में तेजी से गिरावट आई। परिणामस्वरूप किसानों की आय में और गिरावट आई। 1832-34 के अकाल ने उनकी रही-सही कमर तोड़ दी।

4. साहूकारों की मनमानी ब्याज दर – राजस्व चुकाने तथा अपने दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसानों को ऋणदाताओं पर निर्भर रहना पड़ता था। साहूकार तथा ऋणदाता मूलधन पर मनमाना ब्याज लगाते थे तथा किसान से खाली कागज पर अंगूठा लगवाते थे ।

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5. ऋण के स्रोत का सूख जाना – 1865 में अमेरिका में गृहयुद्ध की समाप्ति के बाद वहाँ कपास का उत्पादन पुनः चालू हो गया और ब्रिटेन में भारतीय कपास की माँग में गिरावट आती चली गई। इससे कपास की कीमतों में गिरावट आ गई। व्यापारी और साहूकारों ने किसानों से अपने पुराने ऋण वापस माँगना शुरू कर दिया। दूसरी तरफ सरकार ने राजस्व की माँग बढ़ा दी। फलतः रैयत पर दोहरा दबाव पड़ा जिसे पूरा करने के लिए वह ऋणदाताओं की शरण में गये, लेकिन इस बार उन्होंने ऋण देने से इनकार कर दिया।

6. अन्याय का अनुभव – ऋणदाता द्वारा ऋण देने से इनकार किये जाने पर रैयत समुदाय को बहुत गुस्सा आया। वे इस बात से नाराज थे कि ऋणदाता वर्ग इतना संवेदनहीन हो गया है कि वह उनकी हालत पर कोई तरस नहीं खा रहा है। तरह-तरह के दस्तावेज और बंधपत्र इस नयी अत्याचारपूर्ण प्रणाली के प्रतीक बन गये थे। इन सब कारणों से दक्कन की रैयत ने ऋणदाताओं, व्यापारियों व साहूकारों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

विद्रोह का स्वरूप – दक्कन का यह आन्दोलन पूना जिले के सूपा नामक स्थान से जो कि एक विपणन केन्द्र था, से 12 मई, 1875 को प्रारम्भ हुआ। आसपास गाँवों के किसानों ने एकत्र होकर साहूकारों से उनके बहीखातों और ऋणबन्ध पत्रों की माँग करते हुए हमला कर दिया। बहीखाते जला दिए गये, अनाज लूट लिया गया और साहूकारों के घरों में आग लगा दी गई।

प्रश्न 9.
दक्कन विद्रोह के परिणामों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
दक्कन विद्रोह के परिणाम दक्कन विद्रोह के परिणाम विद्रोह के दमन और दक्कन दंगा आयोग की स्थापना के रूप में हुए यथा –
(1) विद्रोह का दमन जब विद्रोह तेजी से फैलने लगा तो ब्रिटिश अधिकारियों की आँखों के सामने 1857 गदर का दृश्य नाचने लगा। विद्रोही किसानों के गाँवों में पुलिस थाने स्थापित किए गए शीघ्र ही सेना भी बुला ली गई। विद्रोहियों को गिरफ्तार करके उन्हें दंडित भी किया गया, लेकिन विद्रोह को दबाने में कई महीने लग गये। (2) दक्कन दंगा आयोग व उसकी रिपोर्ट दंगा फैलने पर प्रारम्भ में बम्बई की सरकार ने इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया लेकिन भारत सरकार के दबाव पड़ने पर उसने दंगे के कारणों की छानबीन करने हेतु एक जाँच आयोग की स्थापना की जिसने पीड़ित जिलों में जाँच-पड़ताल करवाई, साहूकारों और चश्मदीद गवाहों के बयान लिए तथा जिला कलेक्टरों की रिपोटों का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट 1878 में ब्रिटिश संसद में पेश की। जाँच आयोग को यह निर्देश था कि वह यह पता लगाए कि क्या सरकारी राजस्व की माँग विद्रोह का कारण थी? आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि विद्रोह का कारण साहूकारों और ऋणदाताओं के प्रति किसानों का क्रोध था। सरकारी राजस्व की माँग इसके लिए जिम्मेदार नहीं थी। लेकिन यह रिपोर्ट एकपक्षीय थी क्योंकि औपनिवेशिक सरकार कभी भी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं थी, जबकि राजस्व की भारी माँग के कारण ही किसानों को साहूकारों से ऋण उनकी शर्तों पर लेना पड़ा।

प्रश्न 10.
रैयत (किसान) ऋणदाताओं के प्रति किन कारणों से क्रुद्ध थी? सविस्तार वर्णन कीजिए।
अथवा
रैयत ऋणदाताओं को कुटिल और धोखेबाज क्यों समझ रही थी? इस पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जब भारतीय कपास की माँग ब्रिटेन में कम हो गई तब ऋणदाताओं ने किसानों को ऋण देने से मना कर दिया। उन्हें यह लगने लगा कि अब किसानों में ऋण चुकाने की क्षमता नहीं है।
(1) अन्याय का अनुभव-जब ऋणदाताओं ने ऋण देने से मना किया तो किसानों में उसके प्रति बहुत क्रोध उत्पन्न हुआ, उन्हें इस बात का दुःख नहीं था कि वे कर्ज में डूबते जा रहे हैं अपितु इस बात का दुःख था कि साहूकार इतना संवेदनहीन कैसे हो गया है कि उनकी हालत पर दया भी नहीं कर रहा है। साहूकारों ने देहात के प्रथागत मानकों का उल्लंघन करना प्रारम्भ कर दिया। जो मानक किसान और साहूकार के सम्बन्धों को विनियमित करते थे, साहूकार उन्हें तोड़ रहा था।

(2) साहूकारों द्वारा खातों में धोखाधड़ी-साहूकारों द्वारा किसानों के साथ धोखाधड़ी की जाने लगी। किसानों से दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करा लिए जाते थे या अंगूठा लगवा लिया जाता था, पर किसान को यह पता नहीं चल पाता था कि ये किस पर हस्ताक्षर कर रहे हैं या अंगूठा लगा रहे हैं अतः किसान को ऋणदाता की मनमानी का शिकार होना पड़ता था।

(3) परिसीमन कानून और ऋणदाता की चालाकी=रैयत द्वारा साहूकारों की शिकायतें मिलने पर 1859 में अंग्रेजों ने एक परिसीमन कानून पारित किया, जिसके अनुसार ऋणदाता और रैयत के बीच हस्ताक्षरित ऋणपत्र केवल तीन वर्षों के लिए ही मान्य होगा। इसका उद्देश्य व्याज को संचित होने से रोकना था।

(4) किसान की मजबूरी यह जानते हुए कि उनके साथ धोखा या अन्याय हो रहा है फिर भी किसान अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए साहूकारों के चंगुल में फँसने को मजबूर था, क्योंकि किसान को ऋण चाहिये था और वह बिना दस्तावेज भरे मिलता नहीं था। समय के साथ, किसान यह समझने लगे कि उनके जीवन में जो दुःख तकलीफ है, वह सब बंधपत्रों और दस्तावेजों की इस नयी व्यवस्था के कारण ही है। उन्हें उन खण्डों के बारे में कुछ भी पता नहीं होता जो ऋणदाता बंधपत्रों में लिख देते थे। इस तरह रैयत साहूकारों द्वारा की गई चालबाजियों के कारण उनसे क्रुद्ध थी और अन्ततः उसने 1875 में इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठायी और दक्कन में दंगा शुरू हुआ।

प्रश्न 11.
पाँचवीं रिपोर्ट क्या थी? इसके बारे में विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
सन् 1813 में ब्रिटिश संसद में एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। उसी रिपोर्ट का एक भाग पाँचवीं रिपोर्ट कहलाया। यह भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रशासन तथा क्रियाकलापों के विषय में तैयार की गई थी। इस रिपोर्ट में 1002 पृष्ठ थे तथा इसके परिशिष्ट के रूप में 800 से अधिक पृष्ठ थे। पाँचवीं रिपोर्ट की पृष्ठभूमि पाँचवीं रिपोर्ट के निर्माण की पृष्ठभूमि को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है –

1. ईस्ट इण्डिया कम्पनी के एकाधिकार का विरोध- जब कम्पनी ने प्लासी के युद्ध (1757 ई.) के बाद बंगाल में अपनी सत्ता स्थापित की, तभी से इंग्लैण्ड में उसके क्रियाकलापों पर बारीकी से नजर रखी जा रही थी। ब्रिटेन में ऐसे बहुत से व्यापारिक समूह थे जो कम्पनी के भारत और चीन के साथ व्यापारिक एकाधिकार का विरोध कर रहे थे। उनकी माँग थी कि उस फरमान को रद्द किया जाए, जिसके अन्तर्गत कम्पनी को एकाधिकार दिया गया था। कई राजनीतिक समूहों का कहना था कि बंगाल पर मिली विजय का फायदा केवल ईस्ट इण्डिया कम्पनी को ही मिल रहा है, सम्पूर्ण ब्रिटिश राष्ट्र को नहीं।

2. कम्पनी कुशासन पर बहस ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कुशासन एवं अव्यवस्थित प्रशासन के विषय में प्राप्त सूचनाओं पर ब्रिटिश संसद में गरमागरम बहस छिड़ गई और कम्पनी के अधिकारियों के भ्रष्ट आचरण तथा लोभ- लालच की घटनाओं को ब्रिटेन के समाचार पत्रों में खूब उछाला गया।

3. ब्रिटिश संसद द्वारा पारित अधिनियम-ब्रिटेन की संसद ने भारत में कम्पनी शासन को विनियमित और नियंत्रित करने के लिए अठारहवीं शताब्दी के अन्तिम दशकों में कई अधिनियम पारित किए।

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4. समितियों की नियुक्ति-कम्पनी के प्रशासन की जाँच के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा कई समितियाँ नियुक्त की गई, जो जाँच उपरान्त अपनी रिपोर्ट भेजती थीं ऐसी ही एक प्रवर समिति द्वारा कम्पनी प्रशासन पर तैयार रिपोर्ट ब्रिटिश संसद में भेजी गई जो पाँचवीं रिपोर्ट कहलाती है। पाँचवीं रिपोर्ट के गुण-पाँचवीं रिपोर्ट में उपलब्ध साक्ष्य बहुमूल्य हैं। 18वीं शताब्दी के अन्तिम दशकों में ग्रामीण बंगाल में क्या हुआ, इसके बारे में हमारी अवधारणा लगभग डेढ़ शताब्दी तक इस पाँचवीं रिपोर्ट के आधार पर ही बनती सुधरती रही।

पाँचवीं रिपोर्ट का दोषपाँचवीं रिपोर्ट में परम्परागत जमींदारी के पतन का वर्णन बहुत बढ़ा-चढ़ाकर लिखा गया और जिस पैमाने पर जमींदार लोग अपनी जमीनें खोते जा रहे थे, उसके बारे में भी बढ़ा-चढ़ाकर कहा गया है। जब जमींदारियाँ नीलाम होती थीं तो जमींदार नए-नए हथकण्डे अपनाकर अपनी जमींदारी बचा लेते थे और बहुत कम मामलों में विस्थापित होते थे।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण

Jharkhand Board JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण

बहुचयनात्मक प्रश्न

1. भारत में नई आर्थिक नीति शुरू हुई।
(अ) 1990 में
(ब) 1991 में
(स) 1992 में
(द) 1993 में
उत्तर:
(ब) 1991 में

2. एक अवधारणा के रूप में वैश्वीकरण का प्रवाह है।
(अ) विश्व के एक हिस्से से विचारों का दूसरे हिस्सों में पहुँचना
(ब) पूँजी का एक से ज्यादा जगहों पर जाना
(स) वस्तुओं का कई-कई देशों में पहुँचना
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी

3. निम्न में से कौनसा वैश्वीकरण का कारण नहीं है।
(अ) किसी देश की पारंपरिक वेशभूषा
(ब) प्रौद्योगिकी
(स) विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव
(द) संचार के साधनों की तरक्की
उत्तर:
(अ) किसी देश की पारंपरिक वेशभूषा

4. वैश्वीकरण के फलस्वरूप राज्य की शक्ति में वृद्धि हुई है।
(अ) कानून-व्यवस्था के सम्बन्ध में
(ब) राष्ट्रीय सुरक्षा के सम्बन्ध में
(स) नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटाने के सम्बन्ध में
(द) आर्थिक कार्यों के सम्बन्ध में
उत्तर:
(स) नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटाने के सम्बन्ध में

5. वैश्वीकरण के कारण जिस सीमा तक वस्तुओं का प्रवाह बढ़ा है उस सीमा तक प्रवाह नहीं बढ़ा है।
(अ) पूँजी का
(ब) व्यापार का
(स) लोगों की आवाजाही का
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(स) लोगों की आवाजाही का

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6. आर्थिक वैश्वीकरण का दुष्परिणाम है।
(अ) व्यापार में वृद्धि
(ब) पूँजी के प्रवाह में वृद्धि
(स) जनमत के विभाजन में वृद्धि
(द) विचारों के प्रवाह में वृद्धि
उत्तर:
(स) जनमत के विभाजन में वृद्धि

7. भारत में नई आर्थिक नीति के संचालक हैं।
(अ) डॉ. मनमोहन सिंह
(ब) यशवन्त सिन्हा
(स) वी. पी. सिंह
(द) इन्दिरा गांधी
उत्तर:
(अ) डॉ. मनमोहन सिंह

8. टेलीग्राफ, टेलीफोन और माइक्रोचिप के नवीनतम आविष्कारों ने विश्व के विभिन्न भागों के बीच किसकी क्रांति कर दिखाई है?
(अ) विचार की
(ब) संचार की
(स) पूँजी की
(द) वस्तु की
उत्तर:
(ब) संचार की

9. वैश्वीकरण के किस प्रभाव ने पूरे विश्व के जनमत को गहराई से बाँट दिया है?
(अ) आर्थिक
(ब) सामाजिक
(स) राजनीतिक
(द) व्यावहारिक
उत्तर:
(अ) आर्थिक

10. वैश्वीकरण के किस प्रभाव को देखते हुए इस बात का भय है कि यह प्रक्रिया विश्व की संस्कृति को खतरा पहुँचाएगी?
(अ) राजनीतिक
(ब) आर्थिक
(स) सांस्थानिक
(द) सांस्कृतिक
उत्तर:
(द) सांस्कृतिक

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:

1…………………….. वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं के समर्थकों का तर्क है कि इससे समृद्धि बढ़ती है।
उत्तर:
आर्थिक

2. कुछ अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक वैश्वीकरण को विश्व का ……………………. कहा है।
उत्तर:
पुनः उपनिवेशीकरण

3. वैश्वीकरण एक ………………………….. धारणा है।
उत्तर:
बहुआयामी

4. वैश्वीकरण से हर संस्कृति अलग और विशिष्ट हो रही है, इस प्रक्रिया को ……………….. कहते हैं।
उत्तर:
सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण

5. औपनिवेशिक दौर में भारत आधारभूत वस्तुओं और कच्चे माल का ……………………….. तथा बने-बनाये सामानों का ………………… देश था।
उत्तर:
निर्यातक, आयातक

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वैश्वीकरण का बुनियादी अर्थ क्या है?
उत्तर:
वैश्वीकरण का बुनियादी अर्थ है – विचार, पूँजी, वस्तु और सेवाओं का विश्वव्यापी प्रवाह।

प्रश्न 2.
वर्ल्ड सोशल फोरम (W.S.F.) क्या है?
उत्तर:
वर्ल्ड सोशल फोरम वैश्वीकरण का विरोध करने वाले पर्यावरणविदों, मजदूरों, युवकों और महिला कार्यकर्ताओं का एक विश्वव्यापी मंच है।

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प्रश्न 3.
वैश्वीकरण की नीति में अभी भी सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन कौन-सा है?
उत्तर:
प्रौद्योगिकी।

प्रश्न 4.
‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ की पहली बैठक कब और कहाँ हुई?
उत्तर:
वर्ल्ड सोशल फोरम की पहली बैठक 2001 में ब्राजील में हुई।

प्रश्न 5.
वर्ल्ड सोशल फोरम की चौथी बैठक कब और कहाँ हुई?
उत्तर:
वर्ल्ड सोशल फोरम की चौथी बैठक 2004 में मुम्बई में हुई।

प्रश्न 6.
जनार्दन काल सेंटर में काम करते हुए हजारों किलोमीटर दूर बसे अपने ग्राहकों से बात करता है, यह वैश्वीकरण का कौनसा पक्ष है?
उत्तर:
इसमें जनार्दन सेवाओं के वैश्वीकरण में हिस्सेदारी कर रहा है।

प्रश्न 7.
कोमिन्टर्न का सम्बन्ध किस एशियाई देश से था?
उत्तर:
कोमिन्टर्न का सम्बन्ध साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद के शिकार हुए चीन से था।

प्रश्न 8.
वैश्वीकरण के विभिन्न प्रवाहों की निरंतरता से क्या पैदा हुआ है?
उत्तर:
वैश्वीकरण के विभिन्न प्रवाहों की निरन्तरता से ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव पैदा हुआ है।

प्रश्न 9.
राष्ट्रवाद की आधारशिला किस प्रौद्योगिकी ने रखी?
उत्तर:
छपाई (मुद्रण) की तकनीक ने।

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प्रश्न 10.
किन आविष्कारों ने विश्व के विभिन्न भागों के बीच संचार क्रांति कर दिखाई है?
उत्तर:
टेलीग्राफ, टेलीफोन और माइक्रोचिप के नवीनतम आविष्कारों ने।

प्रश्न 11.
विचार, पूँजी, वस्तु और लोगों की विश्व के विभिन्न भागों में आवाजाही की आसानी किसके कारण संभव हुई है?
उत्तर:
प्रौद्योगिकी में हुई तरक्की के कारण।

प्रश्न 12.
कोई ऐसी दो घटनाओं के नाम लिखिये जो राष्ट्रीय सीमाओं का जोर नहीं मानतीं।
उत्तर:

  1. बर्ड फ्लू
  2. सुनामी किसी एक राष्ट्र की हदों में सिमटे नहीं रहते।

प्रश्न 13.
वैश्वीकरण की प्रक्रिया में विश्व में कल्याणकारी राज्य की धारणा की जगह किस धारणा ने ले ली है?
उत्तर:
न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य की धारणा ने।

प्रश्न 14.
वैश्वीकरण की प्रक्रिया के तहत राज्य अब किन कामों तक ही अपने को सीमित रखता है?
उत्तर:
राज्य अब कानून और व्यवस्था को बनाए रखने तथा अपने नागरिकों की सुरक्षा करने तक ही अपने को. सीमित रखता है।

प्रश्न 15.
भूमंडलीकरण का क्या अर्थ है?
उत्तर:
यातायात और संचार के साधनों ने दुनिया के देशों को एक-दूसरे से जोड़कर विश्व ग्राम में बदल दिया है। इसी को भूमंडलीकरण कहते हैं।

प्रश्न 16.
वैश्वीकरण के दौर में अब आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रमुख निर्धारक कौन है?
उत्तर:
वैश्वीकरण के दौर में अब बाजार आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रमुख निर्धारक है।

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प्रश्न 17.
वैश्वीकरण के जिम्मेदार कोई दो कारण बताइये।
उत्तर:
वैश्वीकरण के जिम्मेदार दो कारण ये हैं।

  1. प्रौद्योगिकी में तरक्की
  2. विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव।

प्रश्न 18.
वैश्वीकरण के कारण किस क्षेत्र में राज्य की शक्ति में वृद्धि हुई है?
उत्तर:
अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के बूते अब राज्य अपने नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकते हैं

प्रश्न 19.
वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभावों को देखते हुए किस भय को बल मिला है?
उत्तर:
वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभावों को देखते हुए इस भय को बल मिला है कि यह प्रक्रिया विश्व की संस्कृतियों को खतरा पहुँचायेगी ।

प्रश्न 20.
विश्व – संस्कृति के नाम पर क्या हो रहा है?
उत्तर:
विश्व – संस्कृति के नाम पर शेष विश्व पर पश्चिमी संस्कृति लादी जा रही है।

प्रश्न 21.
वैश्वीकरण का एक सकारात्मक प्रभाव लिखिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण का एक सकारात्मक प्रभाव यह है कि इससे हमारी पसंद-नापसंद का दायरा बढ़ता है।

प्रश्न 22.
औपनिवेशिक दौर में भारत किस प्रकार का देश था?
उत्तर:
पनिवेशिक दौर में भारत आधारभूत वस्तुओं और कच्चे माल का निर्यातक तथा बने-बनाए सामानों का आयातक देश था।

प्रश्न 23.
स्वतंत्रता के बाद भारत ने आर्थिक दृष्टि से कौनसी नीति अपनाई?
उत्तर:
स्वतंत्रता के बाद भारत ने संरक्षणवाद की नीति अपनाई।

प्रश्न 24.
संरक्षणवाद की नीति क्या है?
उत्तर;
संरक्षणवाद की नीति वैश्वीकरण का विरोध करती है तथा देशी उद्योगों एवं वस्तुओं को प्रतिस्पर्द्धा से बचाने हेतु चुंगी तथा तटकर का पक्ष लेती है।

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प्रश्न 25.
मैक्डोनाल्डीकरण से क्या आशय है?
उत्तर:
मैक्डोनाल्डीकरण का तात्पर्य है कि संसार की विभिन्न संस्कृतियाँ अब अपने आप को प्रभुत्वशाली अमेरिकी ढर्रे पर ढालने लगी हैं।

प्रश्न 26.
साम्राज्यवाद से क्या आशय है?
उत्तर:
जब कोई देश अपनी सीमा से बाहर के क्षेत्र के लोगों के आर्थिक तथा राजनीतिक जीवन पर अपना आधिपत्य स्थापित कर ले, उसे साम्राज्यवाद कहते हैं।

प्रश्न 27.
‘संरक्षणवाद’ की नीति से भारत को क्या दिक्कतें पैदा हुईं।
उत्तर:
संरक्षणवाद की नीति के कारण प्रथमतः भारत स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास के क्षेत्र में ध्यान नहीं दे पाया। दूसरे, भारत की आर्थिक वृद्धि दर धीमी रही।

प्रश्न 28.
1991 में भारत ने आर्थिक सुधारों की योजना क्यों शुरू की?
उत्तर:

  1. वित्तीय संकट से उबरने तथा
  2. आर्थिक वृद्धि की ऊँची दर हासिल करने के लिए 1991 में भारत आर्थिक सुधारों की योजना शुरू की।

प्रश्न 29.
आर्थिक सुधारों की योजना की दो विशेषताएँ लिखिये।
उत्तर:

  1. इसके अन्तर्गत विभिन्न क्षेत्रों पर से आयात प्रतिबंध हटाये गए।
  2. व्यापार और विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया गया।

प्रश्न 30.
वामपंथी आलोचक वैश्वीकरण के विरोध में क्या तर्क देते हैं?
उत्तर:
वामपंथी आलोचकों का कहना है कि वैश्वीकरण विश्वव्यापी पूँजीवाद की एक खास अवस्था है जो धनी और निर्धनों के बीच की खाई को और बढ़ायेगा।

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प्रश्न 31.
दक्षिणपंथी आलोचक वैश्वीकरण के विरोध में क्या तर्क देते हैं?
उत्तर:
दक्षिणपंथी आलोचकों का कहना है कि इससे राज्य कमजोर हो रहा है; परम्परागत संस्कृति की हानि होगी।

प्रश्न 32. वैश्वीकरण के विरोधी आंदोलनों का स्वरूप क्या है?
उत्तर:
वैश्वीकरण विरोधी बहुत से आंदोलन वैश्वीकरण के विरोधी नहीं बल्कि वैश्वीकरण के साम्राज्यवादी समर्थक कार्यक्रम के विरोधी हैंहोगी ।

प्रश्न 33.
1999 में सिएटल में विश्व व्यापार संगठन की मंत्री स्तरीय बैठक में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन क्यों हुए?
उत्तर:
ये विरोध-प्रदर्शन आर्थिक रूप से ताकतवर देशों द्वारा व्यापार के अनुचित तौर-तरीकों के अपनाने के विरोधमें हुए।

प्रश्न 34.
सिएटल (1999) के विरोध प्रदर्शनकारियों का क्या तर्क था?
उत्तर:
सिएटल (1999) के विरोध प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि उदीयमान वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में विकासशील देशों के हितों को समुचित महत्त्व नहीं दिया गया है।

प्रश्न 35.
नव-उदारवादी वैश्वीकरण के विरोध का एक विश्वव्यापी मंच कौनसा है?
उत्तर:
नव-उदारवादी वैश्वीकरण के विरोध का एक विश्वव्यापी मंच ‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ (WSF) है।

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प्रश्न 36.
वर्ल्ड सोशल फोरम’ में कौन लोग सम्मिलित हैं?
उत्तर:
‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ में मानवाधिकार कार्यकर्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर, युवा और महिला कार्यकर्ता एकजुट -उदारवादी वैश्वीकरण का विरोध करते हैं।

प्रश्न 37.
भारत में वैश्वीकरण का विरोध करने वाले किन्हीं दो क्षेत्रों का नाम बताइये।
उत्तर:

  1. वामपंथी राजनैतिक दल
  2. इन्डियन सोशल फोरम
  3. औद्योगिक श्रमिक और किसान संगठन।

प्रश्न 38.
भारत में दक्षिणपंथी खेमों से वैश्वीकरण का विरोध किस संदर्भ में किया जा रहा है?
उत्तर:
भारत में दक्षिणपंथी खेमा वैश्वीकरण के विभिन्न सांस्कृतिक प्रभावों का विरोध कर रहा है।

प्रश्न 39.
बहुराष्ट्रीय निगम से क्या आशय है?
उत्तर:
बहुराष्ट्रीय निगम वह कम्पनी है जो एक से अधिक देशों में अपनी आर्थिक व व्यापारिक गतिविधियाँ चलाती है।

प्रश्न 40.
सांस्कृतिक समरूपता से क्या आशय है?
उत्तर:
सांस्कृतिक समरूपता का आशय हैथोपना। विश्व संस्कृति के नाम पर पश्चिमी संस्कृति को विकासशील देशों में थोपना।

प्रश्न 41.
सामाजिक सुरक्षा कवच से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को वैश्वीकरण के प्रभाव से बचाने का सांस्थानिक उपाय को सामाजिक सुरक्षा कवच कहा गया है।

प्रश्न 42.
बहुराष्ट्रीय निगम से आप क्या समझते हो?
उत्तर:
वह कंपनियाँ जो एक से अधिक दिशाओं में आर्थिक गतिविधियाँ चलाती हैं।

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प्रश्न 43.
क्या साम्राज्यवाद ही वैश्वीकरण है?
उत्तर:
नहीं, साम्राज्यवाद में एक देश अपनी सीमा के बाहर के देश पर आर्थिक और राजनीतिक कब्जा करता है जबकि वैश्वीकरण में इस प्रकार का हस्तक्षेप नहीं होता है।

प्रश्न 44.
कल और आज के वैश्वीकरण में आप क्या अंतर देखते हैं?
उत्तर:
पहले दो देशों के बीच वस्तु तथा कच्चे माल का आवागमन होता था और आज के युग में व्यक्ति, विचार, पूँजी, तकनीक तथा कच्चे माल का आवागमन होता है। वस्तु,

प्रश्न 45.
दो महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं के नाम बताइए।
उत्तर:

  1. अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष
  2. विश्व व्यापार संगठन।

प्रश्न 46.
वैश्वीकरण के लिए अपरिहार्य कारक क्या है?
उत्तर:
प्रौद्योगिकी

प्रश्न 47.
भारत वैश्वीकरण को किन तरीकों से प्रभावित कर रहा है? कोई दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  1. भारत विदेशी भूमि पर भारतीय संस्कृति तथा रीति-रिवाजों को बढ़ावा दे रहा है।
  2. भारत में उपलब्ध सस्ते श्रम ने विश्व को अपनी ओर आकर्षित किया है।

प्रश्न 48.
आर्थिक वैश्वीकरण का सरकारों पर क्या प्रभाव पड़ा है?
उत्तर:
आर्थिक वैश्वीकरण के कारण सरकारें कुछ जिम्मेदारियों से अपना हाथ पीछे कर रही हैं।

प्रश्न 49.
वैश्वीकरण के मध्यमार्गी समर्थकों का वैश्वीकरण के संदर्भ में क्या कहना है?
उत्तर:
वैश्वीकरण के मध्यमार्गी समर्थकों का कहना है कि वैश्वीकरण ने चुनौतियाँ पेश की हैं और लोगों को इसका सामना सजग और सचेत रूप में करना चाहिए।

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प्रश्न 50.
सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप हर संस्कृति अलग और विशिष्ट होती जा रही है। इस प्रक्रिया को सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण कहते हैं।

लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ क्या है?
उत्तर:
वर्ल्ड सोशल फोरम (WSF) – नव-उदारवादी वैश्वीकरण के विरोध का एक विश्वव्यापी मंच ‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ है। इस मंच के तहत मानवाधिकार कार्यकर्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर, युवा और महिला कार्यकर्ता एकजुट होकर नव-उदारवादी वैश्वीकरण का विरोध करते हैं।

प्रश्न 2.
वैश्वीकरण के विरोध में वामपंथी क्या तर्क देते हैं?
उत्तर:
वैश्वीकरण के विरोध में वामपंथी आलोचकों का तर्क है कि मौजूदा वैश्वीकरण विश्वव्यापी पूँजीवाद की एक खास अवस्था है जो धनिकों को और ज्यादा धनी ( तथा इनकी संख्या में कमी) और गरीब को और ज्यादा गरीब बनाती है।

प्रश्न 3.
दक्षिणपंथी आलोचक वैश्वीकरण के विरोध में क्या तर्क देते हैं?
उत्तर:
वैश्वीकरण के दक्षिणपंथी आलोचकों को

  1. राजनीतिक अर्थों में राज्य के कमजोर होने की चिंता है।
  2. आर्थिक क्षेत्र में वे चाहते हैं कि कम से कम कुछ क्षेत्रों में आर्थिक आत्मनिर्भरता और संरक्षणवाद का दौर फिर कायम हो और
  3. सांस्कृतिक संदर्भ में इनकी चिंता है कि इससे परंपरागत संस्कृति की हानि होग ।

प्रश्न 4.
सांस्कृतिक विभिन्नीकरण को परिभाषित कीजिए।
अथवा
सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण की प्रक्रिया से क्या आशय है?
उत्तर:
सांस्कृतिक विभिन्नीकरण:
वैश्वीकरण से हर संस्कृति कहीं ज्यादा अलग और विशिष्ट होती जा रही है। इस प्रक्रिया को सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण कहते हैं। इसका आशय यह है कि सांस्कृतिक मेलजोल का प्रभाव एकतरफा नहीं होता है, बल्कि दुतरफा होता है।

प्रश्न 5.
विश्व सामाजिक मंच एक मुक्त आकाश का द्योतक है। स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण में विश्व सामाजिक मंच एक मुक्त आकाश के समान होगा। जिस प्रकार मुक्त आकाश सम्पूर्ण पक्षियों के लिए खुला होता है, ठीक उसी प्रकार विश्व को एक सामाजिक मंच मान लिया जाये तो सभी जगह उदारीकरण की अर्थव्यवस्था आ जायेगी जो सभी के लिए खुली होगी।

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प्रश्न 6.
उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये कि वैश्वीकरण में परम्परागत सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़े बिना संस्कृति का परिष्कार होता है।
उत्तर:
बाहरी संस्कृति के प्रभावों से कभी-कभी परम्परागत सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़े बिना संस्कृति का परिष्कार होता है। उदाहरण के लिए, नीली जीन्स भी हथकरघा पर बुने खादी के कुर्ते के साथ खूब चलती है। जीन्स के ऊपर कुर्ता पहने अमरीकियों को देखना अब संभव है।

प्रश्न 7.
स्पष्ट कीजिये कि कभी-कभी बाहरी प्रभावों से हमारी पसंद-नापसंद का दायरा बढ़ता है।
उत्तर:
कभी-कभी बाहरी प्रभावों से हमारी पसंद-नापसंद का दायरा बढ़ता है। उदाहरण के लिए बर्गर, मसाला- डोसा का विकल्प नहीं है, इसलिए बर्गर से मसाला डोसा को कोई खतरा नहीं है। इससे इतना मात्र हुआ है कि हमारे भोजन की पसंद में एक और चीज शामिल हो गयी ह ।

प्रश्न 8.
वैश्वीकरण की प्रक्रिया में लोगों की आवाजाही वस्तुओं और पूँजी के प्रवाह के समान क्यों नहीं बढ़ी है?
उत्तर:
वैश्वीकरण की प्रक्रिया में लोगों की आवाजाही वस्तुओं और पूँजी के प्रवाह के समान नहीं बढ़ी है। क्योंकि विकसित देश अपनी वीजा नीति के जरिये अपनी राष्ट्रीय सीमाओं को अभेद्य बनाए रखते हैं ताकि दूसरे देशों के नागरिक आकर कहीं उनके नागरिकों के नौकरी-धंधे न हथिया लें।

प्रश्न 9.
वैश्वीकरण की चार विशेषताएँ लिखिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण की चार विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. वैश्वीकरण के कारण वित्तीय क्रियाकलापों में तेजी आती है।
  2. वैश्वीकरण में अन्तर्राष्ट्रीय बाजार का प्रादुर्भाव होता है।
  3. वैश्वीकरण में बहुराष्ट्रीय निगमों का अधिक विकास होता है।
  4. वैश्वीकरण में भौगोलिक और राजनैतिक गतिरोध कम हो जाता है।

प्रश्न 10.
जनार्दन के एक काल सेंटर में काम करने तथा विदेशी ग्राहकों को सेवा प्रदान करने, रामधारी का अपनी बेटी के लिए चीनी – साइकिल खरीदने तथा सारिका के नौकरी करने में वैश्वीकरण के कौन-कौनसे पहलू दिखते हैं?
उत्तर:
उक्त तीनों उदाहरणों में वैश्वीकरण का कोई न कोई पहलू दिखता है। यथा।

  1. जनार्दन सेवाओं में वैश्वीकरण में हिस्सेदारी कर रहा है.
  2. रामधारी जन्मदिन के लिए चीनी – साइकिल के रूप में जो उपहार खरीद रहा है उससे हमें विश्व के एक भाग से दूसरे भाग में वस्तुओं की आवाजाही का पता लगता है।
  3. सारिका के सामने जीवन-मूल्यों के बीच दुविधा की स्थिति है। यह दुविधा अन्ततः उन अवसरों के कारण पैदा हुई है जो उसके परिवार की महिलाओं कों पहले उपलब्ध नहीं थे, लेकिन आज वे एक सच्चाई हैं और जिन्हें व्यापक स्वीकृति मिल रही है।

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प्रश्न 11.
वैश्वीकरण की अवधारणा से आप क्या समझते हैं? व्याख्या कीजि।
अथवा
वैश्वीकरण की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण की अवधारणा – एक अवधारणा के रूप में वैश्वीकरण की बुनियादी बात है। प्रवाह प्रवाह कई तरह के हो सकते हैं, जैसे- विचार – प्रवाह, पूँजी – प्रवाह, वस्तु – प्रवाह, व्यापार – प्रवाह, आवाजाही का प्रवाह आदि। विश्व के एक हिस्से के विचारों का दूसरे हिस्सों में पहुँचना विचार प्रवाह है। पूँजी का एक से ज्यादा देशों में जाना पूँजी प्रवाह है; वस्तुओं का कई देशों में पहुँचना वस्तु प्रवाह है और उनका व्यापार तथा बेहतर आजीविका की तलाश में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लोगों की आवाजाही क्रमशः व्यापार प्रवाह तथा लोगों की आवाजाही का प्रवाह है। इन सब प्रवाहों की निरन्तरता से ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव पैदा हुआ है और फिर यह जुड़ाव निरन्तर बना रहता है। इस सबका मिला-जुला रूप ही वैश्वीकरण की अवधारणा है।

प्रश्न 12.
वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधारणा है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधारणा है। वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधारणा है क्योंकि इसके राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव हैं। यथा।

  1. आर्थिक आयाम: वैश्वीकरण के कारण व्यापार में खुलापन आता है, व्यापार में वृद्धि होती है, पूँजी निवेश बढ़ता है, वस्तुओं तथा सेवाओं की आवाजाही एक देश से दूसरे देश में बढ़ती है।
  2. राजनैतिक आयाम: वैश्वीकरण के कारण दुनिया में लोककल्याणकारी राज्य की धारणा अब पुरानी पड़ गई है और इसकी जगह न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य की धारणा ने ले ली है।
  3. सांस्कृतिक आयाम: वैश्वीकरण से हमारी पसंद-नापसंद का निर्धारण होता है। हम जो कुछ खाते-पीते- पहनते हैं अथवा सोचते हैं। सब पर इसका असर नजर आता है। अतः स्पष्ट है कि वैश्वीकरण एक बहुआयामी धारणा है।

प्रश्न 13.
आपकी राय में वैश्वीकरण के क्या कारण हैं? किन्हीं चार की विवेचना कीजिये।
अथवा
वैश्वीकरण के चार कारणों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
वैश्वीकरण के कारकों की व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
हमारी राय में वैश्वीकरण के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैंअथवा

  1. प्रौद्योगिकी और वैश्वीकरण: विचार, पूंजी, वस्तु और लोगों की विश्व के विभिन्न भागों में आवाजाही की आसानी प्रौद्योगिकी में हुई तरक्की के कारण संभव हुई है। इसी प्रकार हमारे सोचने के तरीके पर भी प्रौद्योगिकी का प्रभाव पड़ा है।
  2. विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव: विश्व के विभिन्न भागों के लोग अब इस बात को लेकर सजग हैं कि विश्व के एक भाग में घटने वाली घटना का प्रभाव विश्व के दूसरे भाग में भी पड़ेगा। इससे वैश्वीकरण को बढ़ावा मिला।
  3. आर्थिक प्रवाह में तीव्रता: न्यूनतम हस्तक्षेप की राज्य की अवधारणा, पूँजीवादी व्यवस्था के वर्चस्व तथा बहुराष्ट्रीय निगमों की बढ़ती भूमिका ने वैश्वीकरण को बढ़ावा दिया है।
  4. साम्यवादी गुट का पतन: साम्यवादी गुट के पतन के बाद पूँजीवाद का वर्चस्व स्थापित हुआ जिसने वैश्वीकरण को गति दी।

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प्रश्न 14.
वैश्वीकरण ने विश्व की राज व्यवस्थाओं को प्रभावित किया है।
अथवा
आपके मतानुसार कोई चार प्रभावों की विवेचना कीजिए। वैश्वीकरण के राजनीतिक प्रभाव क्या हैं?
अथवा
वैश्वीकरण के राजनीतिक प्रभावों को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण के राजनीतिक प्रभाव: वैश्वीकरण के राजनीतिक प्रभावों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया गया, राज्य की क्षमता में कमी- वैश्वीकरण के कारण राज्य की क्षमता यानी सरकारों को जो करना है, उसे करने की ताकत में कमी आती है। यथा

(अ) पूरी दुनिया ने वैश्वीकरण के दौर में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को त्याग कर न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य की अवधारणा को अपना लिया है।

(ब) वैश्वीकरण के चलते राज्य अब आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का ही निर्धारण करता है।

(स) बहुराष्ट्रीय निगमों की भूमिका बढ़ी है। इससे सरकारों के अपने दम पर फैसला करने की क्षमता में कमी आयी है। राज्य की ताकत में वृद्धि – कुछ मायनों में वैश्वीकरण के फलस्वरूप राज्य की ताकत में वृद्धि हुई है।

(द) अब राज्यों के हाथ में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी मौजूद है जिसके बूते राज्य अपने नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकते हैं।

प्रश्न 15.
आर्थिक वैश्वीकरण की प्रक्रिया से क्या आशय है?
उत्तर:
र्थिक वैश्वीकरण की प्रक्रिया – आर्थिक वैश्वीकरण की प्रक्रिया से आशय है। विश्व में वस्तुओं, पूँजी, श्रम तथा विचारों के प्रवाह का व्यापक होना।

  1. वैश्वीकरण के चलते पूरी दुनिया में वस्तुओं के व्यापार का इजाफा हुआ है क्योंकि आयात प्रतिबंधों को कम किया गया है।
  2. वैश्वीकरण के चलते दुनियाभर में पूँजी की आवाजाही पर अब अपेक्षाकृत कम प्रतिबंध हैं इसलिए विदेशी निवेश बढ़ रहा है।
  3. वैश्वीकरण के चलते अब विचारों के सामने राष्ट्र की सीमाओं की बाधा नहीं रही, उनका प्रवाह अबाध हो उठा है। इंटरनेट और कंप्यूटर से जुड़ी सेवाओं का विस्तार इसका एक उदाहरण है।
  4. वैश्वीकरण के चलते एक देश से दूसरे देश में लोगों की आवाजाही भी बढ़ी है। एक देश के लोग अब दूसरे देश में जाकर नौकरी कर रहे हैं।

प्रश्न 16.
आर्थिक वैश्वीकरण के विरोध में तर्क दीजिये।
उत्तर:
आर्थिक वैश्वीकरण के विरोध में तर्क-आर्थिक वैश्वीकरण के विरोध में निम्न प्रमुख तर्क दिये जाते हैं।

  1. जनमत का विभाजन: आर्थिक वैश्वीकरण के कारण पूरे विश्व में जनमत बड़ी गहराई से बंट गया है।
  2. सरकारों द्वारा सामाजिक न्याय की उपेक्षा- आर्थिक वैश्वीकरण के कारण सरकारें कुछ जिम्मेदारियों से अपना हाथ खींच रही हैं और इससे सामाजिक न्याय से सरोकार रखने वाले लोग चिंतित हैं क्योंकि इससे नौकरी और जनकल्याण के लिए सरकार पर आश्रित रहने वाले लोग बदहाल हो जायेंगे।
  3. विश्व का पुनः उपनिवेशीकरण: आर्थिक वैश्वीकरण विश्व का पुनः उपनिवेशीकरण है।
  4. गरीब देशों के लिए अहितकर: वैश्वीकरण से गरीब देशों के गरीब लोग आर्थिक रूप से बर्बादी की कगार पर पहुँच जाएंगे।

प्रश्न 17.
आर्थिक वैश्वीकरण के समर्थन में तीन तर्क दीजिये।
उत्तर:
आर्थिक वैश्वीकरण के समर्थन में तर्क-आर्थिक वैश्वीकरण के समर्थन में अग्रलिखित तर्क दिये जाते संजीव पास बुक्स

  1. समृद्धि का बढ़ना: आर्थिक वैश्वीकरण से समृद्धि बढ़ती है और खुलेपन के कारण ज्यादा से ज्यादा जनसंख्या की खुशहाली बढ़ती है।
  2. व्यापार में वृद्धि: आर्थिक वैश्वीकरण से व्यापार में वृद्धि होती है। इससे पूरी दुनिया को फायदा होता है।
  3. पारस्परिक जुड़ाव का बढ़ना: आर्थिक वैश्वीकरण से लोगों में पारस्परिक जुड़ाव बढ़ रहा है। पारस्परिक निर्भरता की रफ्तार अब तेज हो चली है। वैश्वीकरण के फलस्वरूप विश्व के विभिन्न भागों में सरकार, व्यवसाय तथा लोगों के बीच जुड़ाव बढ़ रहा है।

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प्रश्न 18.
वैश्वीकरण की प्रक्रिया किस रूप में विश्व की संस्कृतियों को खतरा पहुँचायेगी?
उत्तर:
वैश्वीकरण सांस्कृतिक समरूपता लेकर आता है। सांस्कृतिक समरूपता में विश्व संस्कृति के नाम पर शेष विश्व पर पश्चिमी संस्कृति को लादा जा रहा है। राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभुत्वशाली संस्कृति कम ताकतवर समाजों पर अपनी छाप छोड़ती है और संसार वैसा ही दीखता है जैसा ताकतवर संस्कृति इसे बनाना चाहती है। यही कारण है कि बर्गर या नीली जीन्स की लोकप्रियता का नजदीकी रिश्ता अमरीकी जीवनशैली के गहरे प्रभाव से है। विभिन्न संस्कृतियाँ वैश्वीकरण की सांस्कृतिक समरूपता के तहत अब अपने को प्रभुत्वशाली अमरीकी ढर्रे पर ढालने लगी हैं। इससे पूरे विश्व की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर धीरे – धीरे खत्म हो रही है और यह समूची मानवता के लिए भी खतरनाक है।

प्रश्न 19.
आपके अनुसार क्या भविष्य में वैश्वीकरण जारी रहेगा? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हाँ, वैश्वीकरण भविष्य में भी जारी रहेगा। इसके निम्न कारक हैं।

  1. प्रत्येक व्यक्ति तथा देश एक दूसरे पर निर्भर है।
  2. कोई भी व्यक्ति स्वयं अपनी आवश्यकता को पूरी नहीं कर सकता है।
  3. क्षेत्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का निर्माण और आपसी निर्भरता के कारण।
  4. भविष्य में विश्व सहयोग बढेगा तथा विकसित देश दूसरे देशों के शोषण के बजाय सहयोग करेंगे।

प्रश्न 20.
वैश्वीकरण की दिशा में भारत द्वारा उठाये गये किन्हीं चार कदमों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
भारत के वैश्वीकरण की दिशा में बढ़ते कदम: भारत ने वैश्वीकरण की दिशा में निम्नलिखित प्रमुख कदम उठाये हैं।

  1. उद्योग नीति में सुधार: सन् 1991 से भारत सरकार ने नई औद्योगिक नीति के अन्तर्गत कुछ उद्योगों को छोड़कर सभी उद्योगों को लाइसेंस मुक्त कर दिया है।
  2. विदेशी निवेश को बढ़ावा: भारत में विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के अवसरों का पता लगाने के प्रयास तेज करने पर बल दिया गया है। उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों में 51 प्रतिशत तक विदेशी पूँजी निवेश को तथा अनिवासी भारतीयों द्वारा भारत में निवेश करने को प्रोत्साहन दिया जाएगा।
  3. विदेशी प्रौद्योगिकी समझौते: भारत सरकार ने औद्योगिक विकास और प्रतिस्पर्धा की दृष्टि से विदेशों से प्रौद्योगिकी समझौते करने पर विशेष बल दिया है।
  4. विनिमय दर: 1992-93 से भारतीय रुपये को विदेशी मुद्रा में पूर्ण परिवर्तनीय बना दिया गया है।

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प्रश्न 21.
वैश्वीकरण के प्रतिरोध के प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए।
अथवा
वैश्वीकरण का प्रतिरोध क्यों हो रहा है? प्रमुख कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वैश्वीकरण का प्रतिरोध निम्न कारणों से हो रहा है।

  1. वैश्वीकरण विश्वव्यापी पूँजीवाद की खास अवस्था है जो धनिकों को और ज्यादा धनी और गरीबों को और ज्यादा गरीब बनाती है।
  2. राजनीतिक अर्थ में वैश्वीकरण में राज्य के कमजोर होने की चिंता है। इससे गरीबों के हितों की रक्षा करने की राज्य की क्षमता में कमी आती है।
  3. सांस्कृतिक स्तर पर परम्परागत संस्कृति की हानि हो रही है। लोग अपने सदियों पुराने जीवन-मूल्य तथा तौर-तरीकों से हाथ धो बैठेंगे।
  4. यह साम्राज्यवाद का नया रूप है। इसके चलते विकासशील देशों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की एकाधिकारवादी प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
  5. वैश्वीकरण की प्रक्रिया का लाभ अधिकांश जनता तक नहीं पहुँचता है। इससे तृतीय विश्व के देशों में गरीबी व आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है।

प्रश्न 22.
वैश्वीकरण के कारण विकासशील देशों में राज्यों की बदलती भूमिका का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण के कारण विकासशील देशों में राज्यों की भूमिका में परिवर्तन आया है। यथा।

  1. वैश्वीकरण के कारण राज्यों की आत्मनिर्भरता की नीतियाँ समाप्त होती जा रही हैं; क्योंकि वर्तमान वैश्वीकरण के युग में कोई भी विकासशील देश आत्मनिर्भर नहीं हो सकता।
  2. वैश्वीकरण के युग में पूँजी निवेश के कारण विकासशील देशों ने भी अपने बाजार विश्व के लिए खोल दिये हैं।
  3. वैश्वीकरण के कारण अंब प्रत्येक देश आर्थिक नीति को बनाते समय विश्व में होने वाले आर्थिक घटनाक्रम तथा विश्व संगठनों जैसे विश्व बैंक व विश्व व्यापार संगठन के प्रभाव में रहता है।
  4. राज्यों द्वारा बनाई जाने वाली निजीकरण की नीतियाँ, कर्मचारियों की छंटनी, सरकारी अनुदानों में कमी तथा कृषि से संबंधित नीतियों पर वैश्वीकरण का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है।

प्रश्न 23.
भारतीय राजनीति का दक्षिणपंथी खेमा वैश्वीकरण का विरोध क्यों कर रहा है?
उत्तर:
भारतीय राजनीति का दक्षिणपंथी खेमा वैश्वीकरण का विरोध कर रहा है क्योंकि इस खेमे के अनुसार केबल नेटवर्क के जरिए उपलब्ध कराए जा रहे विदेशी टी.वी. चैनलों के कारण स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राएँ वैलेन्टाइन डे मना रहे हैं तथा पश्चिमी पोशाकों की तरफ उनकी अभिरूची बढ़ रही है।

प्रश्न 24.
1999 में सिएटल में विश्व व्यापार संगठन की मंत्री स्तरीय बैठक में क्या घटनाएँ हुई थीं?
उत्तर:
1999 में सिएटल में विश्व व्यापार संगठन की मंत्री – स्तरीय बैठक में वैश्वीकरण के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ। ये विरोध आर्थिक रूप से ताकतवर देशों द्वारा व्यापार के अनुचित तौर-तरीकों के अपनाने के विरोध में ये प्रदर्शन हुए थे। विरोधियों के अनुसार उदीयमान वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में विकासशील देशों के हितों को समुचित महत्त्व नहीं दिया गया था।

प्रश्न 25.
आजादी हासिल करने के बाद भारत ने क्या फैसला किया? इन फैसलों की वजह से कौनसी दिक्कतें पैदा हुई?
उत्तर:
औपनिवेशिक दौर में ब्रिटेन के साम्राज्यवादी नीति के परिणामस्वरूप भारत आधारभूत वस्तुओं और कच्चे माल का निर्यातक देश था तथा बने बनाए सामानों का आयातक देश था। आजादी हासिल करने के बाद ब्रिटेन के साथ अपने अनुभवों से सबक लेते हुए भारत ने फैसला किया कि दूसरे पर निर्भर रहने के बजाय खुद सामान बनाया जाए तथा दूसरे देशों को निर्यात की अनुमति नहीं होगी ताकि हमारे अपने उत्पादक चीजों का बनाना सीख सकें। इस ‘संरक्षणवाद’ से कुछ नयी दिक्कतें पैदा हुईं। कुछ क्षेत्रों में तरक्की हुई तो कुछ जरूरी क्षेत्रों जैसे स्वास्थ्य, आवास और प्राथमिक शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया गया जितने के वे हकदार थे। भारत में आर्थिक वृद्धि की दर धीमी रही।

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प्रश्न 26.
क्या हम कह सकते हैं कि वैश्वीकरण केवल एक आर्थिक आयाम है?
उत्तर:
नहीं, वैश्वीकरण केवल एक आर्थिक आयाम नहीं है बल्कि यह राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों वाली बहुआयामी अवधारणा है। वैश्वीकरण विचारों, पूँजी, वस्तुओं और लोगों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया है।

प्रश्न 27.
” वैश्वीकरण एक बहुआयामी धारणा है।” कथन के पक्ष में अपना तर्क दीजिए।
उत्तर:
वैश्वीकरण का अर्थ अन्य देशों के साथ अन्योन्याश्रितता के आधार पर अर्थव्यवस्था के एकीकरण से है। यह राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति वाली अवधारणा है तथा इसमें विचारों, पूँजीगत वस्तुओं और लोगों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया होती है।

प्रश्न 28.
एक उग्रवादी समूह ने एक बयान जारी किया जिसमें कॉलेज की छात्राओं को पश्चिमी कपड़े पहने की धमकी दी गई थी। इस कथन का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
यह कथन वैश्वीकरण की सांस्कृतिक निहितार्थों को दर्शाता है, जो कि समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के सिकुड़ने का नेतृत्व करने के लिए पश्चिमी संस्कृति को थोपने के बारे में एक रक्षा समूह के डर के रूप में है।

प्रश्न 29.
भारत पर वैश्वीकरण के प्रभावों के विषय में दो भिन्न विचारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत पर वैश्वीकरण के प्रभावों पर दो विचार निम्न है।

  1. वैश्वीकरण अपनाने से भारत की आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।
  2. वैश्वीकरण के बारे में इसके आलोचकों का विचार है कि भारत द्वारा वैश्वीकरण की योजनाएँ लागू करने से देश के श्रम बाजार पर बुरा प्रभाव पड़ेगा और बेरोजगारी बढ़ेगी।

प्रश्न 30.
यह कहना कहाँ तक सही है कि वैश्वीकरण राज्य की सम्प्रभुता का हनन करता है। उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ऊपर दिया गया कथन सही है क्योंकि वैश्वीकरण से राज्य की संप्रभुता प्रभावित होना हैं। राज्यों को वैश्विक मुद्दों पर अंतर्राष्ट्रीय नियमों का पालन करना होता है। उदाहरण के लिए वैश्विक बाजार की भूमिका में वृद्धि, समुन्नत प्रौद्योगिकी, पर्यावरण संबंधी अंतर्राष्ट्रीय कानून कुछ हद तक राज्यों की संप्रभुता को प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 31.
नव-उपनिवेशवाद क्या है?
उत्तर:
समय तथा युग के साथ-साथ उपनिवेशवाद का रूप भी बदल गया है। नव उपनिवेशवाद परंपरागत उपनिवेशवाद का एक नया रूप है। ‘नव उपनिवेशवाद’ का लक्ष्य सैनिक तथा राजनीतिक प्रभुत्व के स्थान पर आर्थिक प्रभुत्व की स्थापना करना है। एक समृद्ध तथा शक्तिशाली देश, कमजोर देश को आर्थिक सहायता देकर उस देश की नीतियाँ तथा राजनीतिक गतिविधियों पर नियंत्रण करता है और उन नीतियों तथा गतिविधियों को अपने लाभ की ओर प्रभावकारी बनाता है।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण

प्रश्न 32.
कल और आज के वैश्वीकरण में अंतर के कुछ तर्क दीजिए।
उत्तर:
कल और आज के वैश्वीकरण में बहुत अंतर है। इसको हम निम्न तर्क द्वारा देख सकते हैं।

  1. आज न केवल वस्तुएँ बल्कि लोग भी बड़ी संख्या में एक देश से दूसरे देश में जा रहे हैं।
  2. पहले पूर्व के देशों को ही अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रमुखता प्राप्त थी किन्तु आज विपरीत स्थिति है। पश्चिम की वस्तुओं को भी उतना ही सम्मान मिलता है।
  3. कई कंपनियाँ विकासशील देशों के उत्पाद पर अपना लेबल लगाकर पूरे विश्व बाजार में विकसित देशों के उत्पाद के रूप में बेच रही है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वैश्वीकरण को परिभाषित कीजिये इसके अंग तथा सिद्धान्तों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण का अर्थ एवं परिभाषा; वैश्वीकरण विचार, पूँजी, वस्तु और लोगों की वैश्विक आवाजाही से जुड़ी वह परिघटना है, जिसमें इन प्रवाहों का धरातल सम्पूर्ण विश्व है और इन प्रवाहों की गति तीव्र तथा निरन्तरता लिए हुए है जो अन्ततः ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव पैदा कर रही है। गाय ब्रायंबंटी के शब्दों में, “वैश्वीकरण की प्रक्रिया केवल विश्व व्यापार की खुली व्यवस्था, संचार के आधुनिकतम तरीकों के विकास, वित्तीय बाजार के अन्तर्राष्ट्रीयकरण, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बढ़ते महत्त्व, जनसंख्या के देशान्तरगमन तथा विशेषतः लोगों, वस्तुओं, पूँजी तथा विचारों के गतिशील होने से ही संबंधित नहीं है बल्कि संक्रामक रोगों तथा प्रदूषण का प्रसार भी इसमें शामिल है।

  • वैश्वीकरण के अंग- विद्वानों के मतानुसार वैश्वीकरण के प्रमुख अंग निम्नलिखित हैं।
    1. व्यापार या वस्तुओं का विभिन्न देशों में निर्बाध प्रवाह,
    2. विभिन्न देशों में पूँजी का स्वतन्त्र प्रवाह,
    3. तकनीक तथा विचार का बेरोकटोक प्रवाह तथा
    4. विभिन्न देशों में श्रम प्रवाह।
  • वैश्वीकरण के लिए निर्देशक सिद्धान्त: वैश्वीकरण के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं।
    1. राजकोषीय अनुशासन।
    2. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को खुला रखना।
    3. संस्थागत एवं रचनात्मक सुधार।
    4. बाजार की शक्तियों द्वारा आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं को निर्धारित करना।
    5. निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन देना।
    6. व्यापार का उदारीकरण करना।
    7. कर प्रणाली में सुधार करना।
    8. पारदर्शिता लाना।
    9. अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के निर्देशों का पालन करना।
    10. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग।

प्रश्न 2.
“वैश्वीकरण एक बहुआयामी धारणा है। “इस कथन की विवेचना कीजिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधारणा के रूप में: वैश्वीकरण एक बहुआयामी धारणा है; इसके राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आयाम हैं। यथा।

  • वैश्वीकरण का राजनैतिक आयाम: वैश्वीकरण के प्रमुख राजनीतिक आयाम इस प्रकार हैं।
    1. वैश्वीकरण के कारण राज्य अब मुख्य कार्यों, जैसे: कानून-व्यवस्था तथा नागरिक सुरक्षा तक ही अपने को सीमित रखता है। इससे आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में राज्य की शक्तियाँ कम हुई हैं।
    2. वैश्वीकरण के चलते अब राज्यों के हाथों में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी मौजूद है जिसके बूते राज्य अपने नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकते हैं। इससे राज्य की क्षमता बढ़ी है।
  • वैश्वीकरण का आर्थिक आयाम: आर्थिक वैश्वीकरण की प्रक्रिया में दुनिया के विभिन्न देशों के बीच आर्थिक प्रवाह तेज हो जाता है। इसके चलते दुनिया में वस्तुओं के व्यापार में वृद्धि हुई है, पूँजी के निवेश की बाधाएँ हटी हैं, विचारों का प्रवाह अबाध हुआ है।
  • वैश्वीकरण के सांस्कृतिक आयाम: वैश्वीकरण में राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभुत्वशाली संस्कृति कम ताकतवर समाजों पर अपनी छाप छोड़ती हैं और संसार वैसा ही दीखता है जैसा ताकतवर संस्कृति इसे बनाना चाहती है। इससे विश्व की सांस्कृतिक धरोहरें खत्म हो रही हैं। दूसरी तरफ, हमारी पसंद-नापसंद का दायरा बढ़ रहा है, और प्रभुत्वशाली संस्कृति के सांस्कृतिक प्रभावों के अन्तर्गत ही परम्परागत सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़े बिना स्थानीय संस्कृति का परिष्कार भी हो रहा है।

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प्रश्न 3.
वैश्वीकरण के कारण तथा इसके राजनैतिक प्रभावों का विवेचन कीजिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण के कारण: वैश्वीकरण के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं।
1. प्रौद्योगिकी: प्रौद्योगिकी में हुई प्रगति के कारण ही विचार, पूंजी, वस्तु और लोगों की विश्व के विभिन्न भागों में आवाजाही में आसानी हुई है।
2. विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव: विश्वव्यापी प्रवाहों की निरन्तरता से लोगों में विश्वव्यापी पारस्परिक पैदा हुआ और इस जुड़ाव ने वैश्वीकरण की प्रक्रिया को तीव्र कर दिया है।
वैश्वीकरण के राजनैतिक प्रभाव: वैश्वीकरण के राजनैतिक प्रभाव का विवेचन निम्नलिखित तीन बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है।

  • वैश्वीकरण ने कुछ क्षेत्रों में राज्य की शक्ति को कमजोर किया है- यथा-
    1. वैश्वीकरण के कारण पूरी दुनिया में अब राज्य कुछेक मुख्य कामों, जैसे कानून व्यवस्था को बनाये रखना तथा अपने नागरिकों की सुरक्षा करना आदि तक ही अपने को सीमित रखता है।
    2. वैश्वीकरण की प्रक्रिया के कारण राज्य की जगह अब बाजार आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रमुख निर्धारक है।
    3. बहुराष्ट्रीय निगमों का बढ़ता प्रभाव: वैश्वीकरण के चलते पूरे विश्व में बहुराष्ट्रीय निगमों की भूमिका बढ़ी है। इससे सरकारों के अपने दम पर फैसला करने की क्षमता में कमी आती हैं।
  • कुछ क्षेत्रों में राज्य की शक्ति पर वैश्वीकरण का कोई प्रभाव नहीं राजनीतिक समुदाय के आधार के रूप में राज्य की प्रधानता को वैश्वीकरण से कोई चुनौती नहीं मिली है।
  • वैश्वीकरण ने राज्य की शक्ति में वृद्धि भी की है। वैश्वीकरण के फलस्वरूप अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के बूते राज्य अपने नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकता है। इस सूचना के दम पर राज्य ज्यादा कारगर ढंग से काम कर सकते हैं।

प्रश्न 4.
वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभाव पर एक निबंध लिखिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभाव: वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभाव निम्नलिखित हैं।

I. वैश्वीकरण के नकारात्मक सांस्कृतिक प्रभाव:
वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभावों को देखते हुए इस भय मिला है कि यह प्रक्रिया विश्व की संस्कृतियों को खतरा पहुँचायेगी; क्योंकि वैश्वीकरण सांस्कृतिक समरूपता लाता है जिसमें विश्व संस्कृति के नाम पर पश्चिमी संस्कृति लादी जा रही है। इस कारण विभिन्न संस्कृतियाँ अब अपने को प्रभुत्वशाली अमेरिकी ढर्रे पर ढालने लगी हैं। इससे पूरे विश्व में विभिन्न संस्कृतियों की समृद्ध धरोहर धीरे धीरे खत्म होती जा रही है। यह स्थिति समूची मानवता के लिए खतरनाक है।

II. वैश्वीकरण के सकारात्मक सांस्कृतिक प्रभाव- वैश्वीकरण के कुछ सकारात्मक सांस्कृतिक प्रभाव भी पड़े हैं। जैसे
1. बाहरी संस्कृति के प्रभावों से हमारी पसंद-नापसंद का दायरा बढ़ता है; जैसे—बर्गर के साथ-साथ मसाला- डोसा भी अब हमारे खाने में शामिल हो गया है।
2. इसके प्रभावस्वरूप कभी-कभी संस्कृति का परिष्कार भी होता है, जैसे- नीली जीन्स के साथ खादी का कुर्ता पहनना।
3. वैश्वीकरण से हर संस्कृति कहीं ज्यादा अलग और विशिष्ट होती जा रही है। प्रश्न 5. वैश्वीकरण के पक्ष तथा विपक्ष में तर्क दीजिये।
उत्तर:

  • वैश्वीकरण के पक्ष में तर्कवैश्वीकरण के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये गये हैं।
    1. वैश्वीकरण से लोगों में विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव बढ़ा है।
    2. वैश्वीकरण के कारण पूँजी की गतिशीलता बढ़ी है। इससे प्रत्यक्ष विदेशी पूँजी निवेश बढ़ा है तथा विकासशील देशों की अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं पर निर्भरता कम हुई है।
    3. वैश्वीकरण की प्रक्रिया द्वारा विकासशील देशों को उन्नत तकनीक का लाभ मिल सकता है।
    4. वैश्वीकरण ने विश्वव्यापी सूचना क्रांति को जन्म दिया है। इससे सामाजिक गतिशीलता बढ़ी है।
    5. वैश्वीकरण के कारण रोजगार की गतिशीलता में भारी वृद्धि हुई है।
  • वैश्वीकरण के विपक्ष में तर्क: वैश्वीकरण के विपक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं।
    1. वैश्वीकरण की व्यवस्था धनिकों को ज्यादा धनी और गरीब को और ज्यादा गरीब बनाती है। इससे आर्थिक असमानता को बढ़ावा मिला है तथा तीसरी दुनिया के देशों में गरीबी बढ़ती जा रही है।
    2. वैश्वीकरण से राज्य की गरीबों के हित की रक्षा करने की उसकी क्षमता में कमी आती है।
    3. वैश्वीकरण से परम्परागत संस्कृति की हानि होगी और लोग अपने सदियों पुराने जीवन-मूल्य तथा तौर- तरीकों से हाथ धो बैठेंगे।
    4. वैश्वीकरण के चलते विकासशील देशों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की एकाधिकारवादी प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
    5. वैश्वीकरण की प्रक्रिया प्रभुतासम्पन्न राष्ट्रों द्वारा विकासशील देशों के बाजारों को हस्तगत करने के लिए कमजोर राष्ट्रों पर जबरन थोपी जा रही है।

प्रश्न 6.
वैश्वीकरण विरोधी आन्दोलन पर एक निबन्ध लिखिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण विरोधी आंदोलन: वैश्वीकरण की पूरी दुनिया में आलोचना हो रही है। वैश्वीकरण के विरोध में आंदोलन किये जा रहे हैं। वैश्वीकरण विरोधी आन्दोलनों को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है।
1. किसी खास कार्यक्रम का विरोध:
वैश्वीकरण – विरोधी बहुत से आन्दोलन वैश्वीकरण की धारणा के विरोधी नहीं हैं; बल्कि वे वैश्वीकरण के किसी खास कार्यक्रम के विरोधी हैं जिसे वे साम्राज्यवाद का एक रूप मानते हैं।

2. बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन:
वैश्वीकरण के प्रति विरोध के प्रदर्शन मुख्यतः आर्थिक रूप से ताकतवर देशों द्वारा व्यापार के अनुचित तौर-तरीकों के अपनाने के विरोध में हुए थे। उनका तर्क था कि उदीयमान वैश्विक आर्थिक- व्यवस्था में विकासशील देशों के हितों को समुचित महत्त्व नहीं दिया गया है।

3. वर्ल्ड सोशल फोरम (WSF ):
नव-उदारवादी वैश्वीकरण के विरोध का एक विश्व व्यापी मंच ‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ (WSF) है। इस मंच के तहत मानवाधिकार कार्यकर्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर, युवा और महिला कार्यकर्ता एकजुट होकर नव-उदारवादी वैश्वीकरण का विरोध करते हैं ।

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प्रश्न 7.
भारत सरकार द्वारा वैश्वीकरण की दिशा में क्या-क्या कदम उठाये गये हैं तथा उसके क्या प्रभाव पड़े हैं? समझाइये
उत्तर:

  • भारत द्वारा वैश्वीकरण की दिशा में उठाये गये कदम सन् 1991 के बाद से आर्थिक सुधारों को अपनाते हुए भारत ने वैश्वीकरण की दिशा में निम्नलिखित प्रमुख कदम उठाये हैं।
    1. 1990 के दशक में उदारीकरण वैश्वीकरण की नीति के तहत औद्योगिक लाइसेंस युग को समाप्त कर दिया गया, सार्वजनिक क्षेत्र में कटौती की गई, व्यापारिक गतिविधियों पर सरकार का एकाधिकार समाप्त कर दिया गया तथा निजीकरण सम्बन्धी कार्यक्रमों की पहल की गई।
    2. 1990 के दशक के दौरान ही विभिन्न क्षेत्रों पर आयात बाधायें हटायी गईं। इन क्षेत्रों में व्यापार और विदेशी निवेश भी शामिल थे।
    3. भारतीय शुल्क दरों में तेजी से कमी की गई। भारत में वैश्वीकरण के सकारात्मक परिणाम
  • वैश्वीकरण के भारत में निम्नलिखित सकारात्मक परिणाम परिलक्षित हो रहे हैं।
    1. वैश्वीकरण को अपनाने से भारत में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) दर तथा विकास दर में तेजी से वृद्धि हुई है।
    2. उदारीकरण के बाद GDP विकास में जो उछाल आया, उसने भारत की वैश्विक स्थिति में सुधार ला दिया।
    3. वैश्वीकरण के प्रभावस्वरूप भारत में गरीबी में जीवन-यापन कर रहे लोगों का अनुपात धीरे-धीरे घट रहा है। भारत में वैश्वीकरण के नकारात्मक प्रभाव
  • आर्थिक सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर कुछेक प्रतिकूल प्रभाव भी डाले हैं, यथा।
    1. वैश्वीकरण के कारण कृषि में सब्सिडी को कम किये जाने से अनाज की कीमतों में वृद्धि हुई है तथा कृषि क्षेत्र में आधारिक संरचना में कमी आई है।
    2. वैश्वीकरण के प्रभावस्वरूप बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारतीय बाजार को धीरे-धीरे हड़प रही हैं।
    3. अपनी विनिवेश नीति के तहत सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने से सरकार को बहुत नुकसान उठाना पड़

प्रश्न 8.
वैश्वीकरण के प्रतिरोध को लेकर भारत के अनुभव क्या हैं?
उत्तर:
भारत में भी वैश्वीकरण का प्रतिरोध हुआ है और कई आंदोलन हुए हैं। सामाजिक आंदोलनों के द्वारा हमें आस-पड़ोस की दुनिया और समाज को समझने में सहायता मिलती है। इस आंदोलनों के माध्यम से हम अपनी समस्याओं का हल तलाश सकते हैं। भारत में वैश्वीकरण का विरोध कई माध्यमों द्वारा हो रहा है।

  1. वामपंथी राजनीतिक दलों ने आर्थिक वैश्वीकरण के खिलाफ आवाज उठाई है तो दूसरी तरफ मानवाधिकार- कार्यकर्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर, युवा और महिला कार्यकर्ता इंडियन सोशल फोरम के मंचों के माध्यम से नव-उदारवादी वैश्वीकरण के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।
  2. औद्योगिक श्रमिक और किसानों के संगठनों ने बहुराष्ट्रीय निगमों के प्रवेश का विरोध किया है।
  3. कुछ औषधीय वनस्पतियों जैसे ‘नीम’ को अमरीकी और यूरोपीय कंपनी ने पेटेन्ट कराने का प्रयास किया इसका भी कड़ा विरोध हुआ है।
  4. वैश्वीकरण का विरोध राजनीति के दक्षिण पंथी खेमा भी कर रहा है। यह खेमा विभिन्न सांस्कृतिक प्रभावों का विरोध कर रहा है जैसे- केवल नेटवर्क के द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे विदेशी टी.वी. चैनलों से लेकर वैलेन्टाईन- डे मनाने तथा स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं की पश्चिमी पोशाकों के लिए बढ़ी अभिरुचि का विरोध भी शामिल है।

प्रश्न 9.
वैश्वीकरण की व्याख्या कीजिए। वैश्वीकरण को बढ़ावा देने में प्रौद्योगिकी का क्या योगदान रहा है?
उत्तर:
अवधारणा के रूप में वैश्वीकरण मौलिक रूप से प्रवाह से संबंधित है। ये प्रवाह कई तरह के हो सकते हैं। दुनिया के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाने वाले विचार, दो या दो से अधिक स्थानों के बीच पूँजी का टकराव, सीमाओं के पार होने वाली वस्तुओं और दुनिया के विभिन्न भागों में बेहतर आजीविका की तलाश में घूम रहे लोग ‘विश्वव्यापी अन्तर्सम्बन्ध’ एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है जो इन निरंतर प्रवाह के परिणामस्वरूप बना और टिका हुआ है। जबकि वैश्वीकरण का कोई एक कारण नहीं है अपितु प्रौद्योगिकी इसका एक अपरिहार्य वजह है । इसमें कोई संदेह नहीं है कि हाल के वर्षों में टेलीग्राफ, टेलीफोन और माइक्रोचिप के आविष्कार ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों के बीच संचार में क्रांति लाई है। जब शुरू में मुद्रण हुआ तो यह राष्ट्रवाद के निर्माण का आधार बना। इसलिए आज हमें यह भी उम्मीद करनी चाहिए कि प्रौद्योगिकी हमारे व्यक्तिगत ही नहीं बल्कि हमारे सामाजिक जीवन के बारे में सोचती है। दुनिया के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में अधिक आसानीपूर्वक आने जाने के लिए विचारों, पूँजी, वस्तुओं और लोगों की क्षमता को तकनीकी विकास द्वारा बड़े पैमाने पर संभव बनाया गया है। इन प्रवाहों की गति भिन्न हो सकती है।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण

प्रश्न 10.
वैश्वीकरण की प्रक्रिया को आलोचक कैसे देखते हैं?
उत्तर:
वैश्वीकरण ने कुछ सकारात्मक आलोचनाओं को भी इसके सकारात्मक प्रभावों के बावजूद आमंत्रित किया है। इसके महत्त्वपूर्ण तर्कों को इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है।
1. आर्थिक:
(अ) विदेशी लेनदारों को शक्तिशाली बनाने के लिए बड़े पैमाने पर उपभोग के सामान पर सब्सिडी में कमी।
(ब) इसने अमीर और गरीब राष्ट्रों के बीच असमानता बढ़ा दी है, अमीर राष्ट्र और अधिक अमीर और गरीब राष्ट्र और अधिक गरीब हुए हैं।
(स) राज्यों ने भी विकसित और विकासशील राष्ट्रों के बीच असमानताएँ पैदा की हैं।

2. राजनीतिक:
(अ) राज्य के कल्याण कार्यों को कम कर दिया गया है।
(ब) राज्यों की संप्रभुता प्रभावित हुई है ।
(स) राज्य अपने लिए निर्णय लेने में कमजोर हुए हैं।

3. सांस्कृतिक:
(अ) लोग अपने पुराने मूल्यों और परंपराओं को खो रहे हैं।
(ब) दुनिया कम शक्तिशाली समाज पर अपना प्रभुत्व जमा रही है।
(स) यह संपूर्ण विश्व की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सिकोड़ता है।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

Jharkhand Board JAC Class 12 History Important Questions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Important Questions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

1. 1857 के विद्रोह से पूर्व दिल्ली के कोतवाल थे-
(क) गंगाधर नेहरू
(ख) अरुण नेहरू
(ग) मोतीलाल नेहरू
(घ) जवाहरलाल नेहरू
उत्तर:
(क) गंगाधर नेहरू

2. अखिल भारतीय जनगणना का प्रयास भारत में प्रथम बार हुआ-
(क) 1772 में
(ख) 1872 में
(ग) 1786 में
(घ) 1881 में
उत्तर:
(ख) 1872 में

3. शाहजहाँनाबाद को बसाया था-
(क) अकबर ने
(ख) औरंगजेब ने
(ग) शाहजहाँ ने
(घ) हुमायूँ ने
उत्तर:
(ग) शाहजहाँ ने

4. ब्रिटिश काल में पहला हिल स्टेशन बना-
(क) शिमला
(ख) दार्जिलिंग
(ग) नैनीताल
(घ) मनाली
उत्तर:
(क) शिमला

5. आगरा, दिल्ली तथा लाहौर की एक सामान्य विशेषता थी-
(क) तीनों शहर मिली-जुली संस्कृति के लिए जाने जाते थे।
(ख) तीनों शहर सूफी सन्तों तथा भक्तों को खूब प्रिय थे।
(ग) तीनों शहर सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में मुगल शासन के महत्त्वपूर्ण केन्द्र थे।
(घ) तीनों शहर मुस्लिम आबादी वाले थे।
उत्तर:
(ग) तीनों शहर सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में मुगल शासन के महत्त्वपूर्ण केन्द्र थे।

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6. भारत में रेलवे की शुरुआत हुई
(क) 1856 में
(ग) 1855 में
(ख) 1853 में
(घ) 1851 में
उत्तर:
(ख) 1853 में

7. कलकत्ता के स्थान पर दिल्ली को राजधानी बनाया गया-
(क) 1911 में
(ख) 1916 में
(ग) 1908 में
(घ) 1899 में
उत्तर:
(क) 1911 में

8. प्लासी का युद्ध लड़ा गया था-
(क) 1755 में
(ख) 1757 में
(ग) 1765 में
(घ) 1857 में
उत्तर:
(ख) 1757 में

9. दक्षिण भारत के दो शहरों मदुराई और कांचीपुरम की मुख्य विशेषता थी-
(क) ये दोनों नगर हमलावरों से सुरक्षित थे।
(ख) इनमें मुख्य केन्द्र मन्दिर तथा महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र होते थे।
(ग) इनमें विश्व के प्रमुख धर्मों के त्यौहार मनाए जाते थे।
(घ) समाज के लोग इन शहरों में साहित्यिक चर्चा किया करते थे।
उत्तर:
(ख) इनमें मुख्य केन्द्र मन्दिर तथा महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र होते थे।

10. औपनिवेशिक शहरों में प्राय: निम्न तीन शहर शामिल किए जाते थे-
(क) दिल्ली, बम्बई, कलकत्ता
(ख) दिल्ली, मद्रास, कलकत्ता
(ग) मद्रास, कलकत्ता, बम्बई
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) मद्रास, कलकत्ता, बम्बई

11. मद्रास, कलकत्ता एवं बम्बई तीनों शहरों की एक सामान्य विशेषता थी-
(क) तीनों व्यापारिक राजधानी थे
(ख) तीनों मूलतः मत्स्य ग्रहण एवं बुनाई के गाँव थे
(ग) तीनों शहरों को अंग्रेजों ने बसाया था
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) तीनों मूलतः मत्स्य ग्रहण एवं बुनाई के गाँव थे

12. मिर्जा गालिब थे-
(क) चित्रकार
(ग) कवि
(ख) शायर
(घ) फिल्मकार
उत्तर:
(ख) शायर

13. निम्न में से किस शहर का सम्बन्ध राइटर्स बिल्डिंग से है?
(क) बम्बई
(ग) कलकत्ता
(ख) दिल्ली
(घ) मद्रास
उत्तर:
(ग) कलकत्ता

14. कासल क्या था?
(क) एक दुर्ग
(ग) एक बस्ती
(ख) एक शहर
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) एक दुर्ग

15.
विनोदिनी दासी कौन थीं?
(क) चित्रकार
(ख) रंगकर्मी
(ग) वास्तुकार
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ख) रंगकर्मी

16. फोर्ट सेंट जार्ज कहाँ स्थित है?
(क) मद्रास
(ख) दिल्ली
(ग) कलकत्ता
(घ) बम्बई
उत्तर:
(क) मद्रास

17. किस भारतीय शहर का सम्बन्ध फोर्ट विलियम से है?
(क) दिल्ली
(ग) मद्रास
(ख) कलकत्ता
(घ) जयपुर
उत्तर:
(ख) कलकत्ता

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18. नवशास्त्रीय स्थापत्य शैली का उदाहरण है-
(क) टाउन हॉल
(ख) लाल किला
(ग) विक्टोरिया टर्मिनल
(च) ताजमहल
उत्तर:
(क) टाउन हॉल

19. सात टापुओं का शहर है-
(क) बम्बई
(ग) मद्रास
(ख) कलकत्ता
(घ) दिल्ली
उत्तर:
(क) बम्बई

20. लॉटरी कमेटी का सम्बन्ध है-
(क) पुरातत्त्व व्यवस्था से
(ख) सैनिक व्यवस्था से
(ग) प्रशासनिक व्यवस्था से
(घ) नगर नियोजन से
उत्तर:
(घ) नगर नियोजन से

21. गारेर मठ क्या था?
(क) एक मैदान
(ग) एक बस्ती
(ख) एक शहर
(घ) एक पक्षी
उत्तर:
(क) एक मैदान

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

1. 1853 में बम्बई से ………………….. “तक रेलवे लाइन बिछाई गई।
2. 1896 में बम्बई के ………………….. -होटल में पहली बार फिल्म दिखाई गई।
3. कलकत्ता की जगह दिल्ली को ………………….. में राजधानी बनाया गया।
4. 1857 में बम्बई में पहली स्पिनिंग और ………………….. मिल की स्थापना की गई।
5. ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा ………………… में कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई।
6. एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना ………………….. में ………………….. की गई।
7. ………………… में बम्बई को ब्रिटेन के राजा ने कम्पनी को दे दिया।
8. ग्रामीण अंचल में एक छोटे नगर को ………………. कहा जाता है।
9. ………………….. कहा का तात्पर्य एक छोटे स्थायी बाजार है।
10. पुर्तगालियों ने 1510 में ……………… तथा डचों ने 1605 में ………………. में आधार स्थापित कर लिए थे।
11. मद्रास, बम्बई और कलकत्ता का आधुनिक नाम क्रमश: …………………. , …………………… और …………………. है।
12. प्लासी का युद्ध ……………. में हुआ था।
13. सर्वे ऑफ इण्डिया का गठन ……………. ने किया गया था।
14. कपडों जबकि …………… अपने स्टील उत्पादन के लिए प्रसिद्ध था।
15 ……………… की स्थापना गुरखा युद्ध के दौरान की गई थी।
उत्तरमाला –
1. ठाणे
2. वाटसन्स
3. 1911
4 बीविंग
5. 1773
6. सर विलियम जोन्स, 1784
7. 1661
8. कस्बा
9. गंज
10. पणजी, मछलीपट्टनम
11. चेन्नई, मुम्बई और कोलकाता
12. 1757
13. 1878
14. कानपुर, जमशेदपुर
15. शिमला।

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
प्लासी का युद्ध कब और किसके बीच हुआ?
उत्तर:
1757 ई. में प्लासी का युद्ध अंग्रेजों और बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के बीच हुआ।

प्रश्न 2.
गेटवे ऑफ इण्डिया कब और कहाँ बनाया गया?
उत्तर:
गेटवे ऑफ इण्डिया 1911 में बम्बई में बनाया

प्रश्न 3.
औपनिवेशिक भारत में स्थापित दो हिल स्टेशनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) शिमला
(2) माउंट आबू

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प्रश्न 4.
ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा अपनी बस्तियों की किलेबन्दी करने का प्रमुख उद्देश्य क्या था? उत्तर- यूरोपीय कम्पनियों के बीच प्रतिस्पर्द्धा के कारण सुरक्षा बनाये रखना।

प्रश्न 5.
अखिल भारतीय जनगणना का प्रथम प्रयास किस वर्ष में किया गया था?
उत्तर:
सन् 1872 ई. में

प्रश्न 6.
भारत के मद्रास, कलकत्ता और बम्बई तीनों शहर मूलत: किस प्रकार के गाँव थे?
उत्तर:
ये तीनों शहर मत्स्य ग्रहण और बुनाई के गाँव थे।

प्रश्न 7.
इंग्लिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के एजेन्ट मद्रास में किस सन् में बस गये?
उत्तर:
सन् 1639 में।

प्रश्न 8.
इंग्लिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने मद्रास, कलकत्ता और बम्बई में किस प्रकार के कार्यालय स्थापित किये?
उत्तर:
व्यापारिक और प्रशासनिक कार्यालय।

प्रश्न 9.
भारत में मुगलकाल में शाही प्रशासन और सत्ता के तीन महत्त्वपूर्ण केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) आगरा
(2) दिल्ली और
(3) लाहौर।

प्रश्न 10.
दक्षिण भारत के ऐसे दो नगरों के नाम लिखिए जिनमें मुख्य केन्द्र मन्दिर होता था।
उत्तर:
मदुरई और कांचीपुरम

प्रश्न 11.
18वीं सदी के अन्त तक स्थल आधारित साम्राज्यों का स्थान कैसे साम्राज्यों ने ले लिया?
उत्तर:
जल आधारित यूरोपीय साम्राज्यों ने।

प्रश्न 12.
भारत में रेलवे की शुरुआत कब हुई?
उत्तर:
1853 में भारत में रेलवे की शुरुआत हुई। प्रश्न 13, 19वीं सदी के मध्य तक भारत में कौनसे दो औद्योगिक शहर थे?
उत्तर:
(1) कानपुर,
(2) जमशेदपुर।

प्रश्न 14.
कलकत्ता में किन लोगों ने बाजारों के आस-पास ब्लैक टाउन में परम्परागत ढंग से दालानी मकान बनवाए?
उत्तर:
अमीर भारतीय एजेन्टों और बिचौलियों ने।

प्रश्न 15.
कलकत्ता में मजदूर वर्ग के लोग कहाँ रहते में।
उत्तर:
शहर के विभिन्न इलाकों की कच्ची झोंपड़ियों

प्रश्न 16.
1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों के लिए किस नाम से नए शहरी इलाके विकसित किये गये?
उत्तर:
सिविल लाइन्स’ के नाम से

प्रश्न 17.
सिविल लाइन्स में किनको बसाया गया?
उत्तर:
केवल गोरों को।

प्रश्न 18.
पहला हिल स्टेशन कब और कौनसा बनाया गया?
उत्तर:
पहला हिल स्टेशन 1815-16 में शिमला में स्थापित किया गया।

प्रश्न 19.
ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने कलकत्ता और बम्बई में अपने व्यापारिक केन्द्र कब स्थापित किये?
उत्तर:
(1) 1661 में बम्बई में
(2) 1690 में कलकत्ता में।

प्रश्न 20.
1800 ई. तक जनसंख्या की दृष्टि से कौनसे भारतीय शहर विशालतम शहर बन गए थे?
उत्तर:
(1) मद्रास
(2) कलकत्ता
(3) बम्बई।

प्रश्न 21.
भारत में दशकीय जनगणना कब से एक नियमित व्यवस्था बन गई थी?
उत्तर:
पहला हिल-स्टेशन 1815-16 में शिमला में स्थापित किया गया।

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प्रश्न 22.
1900 से 1940 के मध्य 40 वर्षों की अवधि में भारतीय शहरी आबादी में कितनी वृद्धि हुई?
उत्तर:
दस प्रतिशत से बढ़कर लगभग 13 प्रतिशत हो गई।

प्रश्न 23
19वीं शताब्दी में भारत में कौनसे रेलवे नगर अस्तित्व में आए?
उत्तर;
जमालपुर, वाल्टेयर तथा बरेली।

प्रश्न 24.
अंग्रेजों ने अपनी किन बस्तियों की किलेबन्दी की थी?
उत्तर:
बम्बई, मद्रास और कलकत्ता की।

प्रश्न 25.
औपनिवेशिक काल के दो औद्योगिक शहरों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) कानपुर
(2) जमशेदपुर।

प्रश्न 26.
चमड़े की चीजों तथा ऊनी और सूती वस्त्रों के निर्माण के लिए कौनसा औद्योगिक नगर प्रसिद्ध था?
उत्तर:
कानपुर। था?

प्रश्न 27.
जमशेदपुर किसके उत्पादन के लिए प्रसिद्ध
उत्तर:
स्टील उत्पादन के लिए।

प्रश्न 28.
राइटर्स बिल्डिंग कहाँ पर स्थित थी?
उत्तर:
कलकत्ता में।

प्रश्न 29.
इंग्लिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के एजेंट कलकत्ता में किस वर्ष बसे?
उत्तर:
1690 ई. में।

प्रश्न 30.
अंग्रेजों द्वारा स्थापित दो हिल स्टेशनों के नाम बताइये ये कब स्थापित किये गए?
उत्तर:
1818 में माउण्ट आबू तथा 1835 में दार्जिलिंग।

प्रश्न 31.
सेनेटोरियम के रूप में किनका विकास किया गया था?
उत्तर:
हिल स्टेशनों का।

प्रश्न 32.
कौनसा हिल स्टेशन भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ (प्रधान सेनापति) का भी अधिकृत वास बन गया था?
उत्तर:
शिमला।

प्रश्न 33.
भारत के नये शहरों में यातायात के कौनसे साधन थे?
उत्तर:
घोड़ागाड़ी, ट्राम तथा बस।

प्रश्न 34.
भारतीय शहरों में किस नये वर्ग का प्रादुर्भाव हुआ?
उत्तर:
मध्य वर्ग’ का ।

प्रश्न 35.
भारतीय शहरों में किन लोगों की माँग बढ़ रही थी?
उत्तर:
वकीलों, डॉक्टरों, शिक्षकों, क्लकों, इंजीनियरों, लेखाकारों की।

प्रश्न 36.
आमार कथा (मेरी कहानी) की रचना किसने की थी?
उत्तर:
विनोदिनी दास ने

प्रश्न 37.
मद्रास में ‘व्हाइट टाउन’ का केन्द्र कौन
उत्तर:
फोर्ट सेंट जार्ज।

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प्रश्न 38.
कलकत्ता को किन तीन गाँवों को मिलाकर बनाया गया था?
उत्तर:
(1) सुतानाती
(2) कोलकाता
(3) गोविन्दपुर।

प्रश्न 39.
कलकत्ता का किला क्या कहलाता था?
उत्तर:
फोर्ट विलियम।

प्रश्न 40.
‘स्वास्थ्यकर नगर’ और ‘अस्वास्थ्यकर नगर’ कौनसे होते थे?
उत्तर:
व्हाइट टाउन’ स्वास्थ्यकर तथा ‘ब्लैक टाउन’ अस्वास्थ्यकर कहलाते थे।

प्रश्न 41.
लार्ड वेलेजली भारत के गवर्नर जनरल कब बने?
उत्तर:
1798 ई. में।

प्रश्न 42.
लार्ड वेलेजली ने कलकत्ता में अपने लिए रहने के लिए जो महल बनवाया, वह क्या कहलाता था?
उत्तर:
गवर्नमेंट हाउस

प्रश्न 43.
ग्रामीण क्षेत्रों के लोग किस प्रकार जीवन- यापन करते थे?
उत्तर:
खेती, जंगलों में संग्रहण तथा पशुपालन द्वारा।

प्रश्न 44.
ग्रामीण क्षेत्रों से कस्बों तथा शहरों को अलग दिखाने वाली एक विशेषता बताइए।
उत्तर:
कस्बों तथा शहरों की किलेबन्दी की जाती थी, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों की नहीं। –

प्रश्न 45.
जनगणना के आँकड़ों का एक महत्त्व बताइए। उत्तर- जनगणना शहरीकरण के इतिहास का अध्ययन करने का बहुमूल्य स्रोत है।

प्रश्न 46.
आरम्भ में अधिकांश लोग जनगणना को सन्देह की दृष्टि से क्यों देखते थे?
उत्तर:
क्योंकि लोगों का मानना था कि सरकार नए कर लागू करने के लिए जाँच करवा रही है।

प्रश्न 47.
बगीचा पर’ का सम्बन्ध किस औपनिवेशिक शहर से था?
उत्तर:
कलकत्ता।

प्रश्न 48.
प्रारम्भ में बम्बई कितने टापुओं का इलाका था?
उत्तर:
सात टापुओं का।

प्रश्न 49.
बम्बई में नव-शास्त्रीय (नव क्लासिकल शैली) में निर्मित दो इमारतों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) बम्बई का टाउन हाल
(2) एल्फिंस्टन सर्कल।

प्रश्न 50.
बम्बई में नव-गॉथिक शैली में निर्मित चार इमारतों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) बम्बई सचिवालय
(2) बम्बई विश्वविद्यालय
(3) उच्च न्यायालय
(4) बम्बई टर्मिनस रेलवे स्टेशन।

प्रश्न 51.
नव-गॉथिक शैली में निर्मित सर्वोत्कृष्ट इमारत कौनसी थी जो बम्बई में निर्मित थी?
उत्तर:
विक्टोरिया टर्मिनस रेलवे स्टेशन

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प्रश्न 52.
मद्रास में इण्डो सारसेनिक स्थापत्य शैली में निर्मित भवन का नाम लिखिए।
उत्तर:
मद्रास ला कोर्टस।

प्रश्न 53.
बम्बई में निर्मित ‘गेटवे ऑफ इण्डिया’ किस शैली का प्रतीक है?
उत्तर:
गुजराती शैली का।

प्रश्न 54.
राजा जार्ज पंचम और उनकी पत्नी मेरी के स्वागत के लिए कौनसी इमारत बनाई गई थी और कब?
उत्तर:
(1) गेटवे ऑफ इण्डिया
(2) 1911 में।

प्रश्न 55.
भारत में सबसे पहली रेल किन शहरों के बीच चलाई गई और कब?
उत्तर:
(1) बम्बई से ठाणे तक
(2) 1853 में।

प्रश्न 56.
बम्बई, मद्रास और कलकत्ता विश्वविद्यालयों की स्थापना कब की गई?
उत्तर:
1857 में।

प्रश्न 57.
अंग्रेजों ने कलकत्ता की जगह दिल्ली को कब राजधानी बनाया?
उत्तर;
1911 में

प्रश्न 58.
फोर्ट विलियम पर टिप्पणी लिखिए। उत्तर- फोर्ट विलियम कलकत्ता का एक प्रसिद्ध दुर्ग था। इसका निर्माण ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने करवाया था।

प्रश्न 59
6वीं तथा 17वीं सदी में मुगलों द्वारा बनाए गए शहर किन बातों के लिए प्रसिद्ध थे? उत्तर-ये शहर जनसंख्या के केन्द्रीकरण, अपने विशाल भवनों तथा शाही शोभा व समृद्धि के लिए प्रसिद्ध थे।

प्रश्न 60.
मुगल राजधानियों दिल्ली और आगरे के राजनीतिक प्रभुत्व की समाप्ति के बाद किन क्षेत्रीय राजधानियों का महत्त्व बढ़ गया था?
उत्तर- लखनऊ, हैदराबाद, सारंगपट्म, पूना, नागपुर, बड़ौदा, तंजौर

प्रश्न 61.
पेठ और पुरम में क्या अन्तर है?
उत्तर:
पेठ तमिल शब्द है जिसका अर्थ होता है बस्ती जबकि पुरम शब्द गाँव के लिए प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 62.
अंग्रेजों ने अपनी व्यापारिक गतिविधियों का केन्द्र सर्वप्रथम किसे बनाया था?
उत्तर:
सूरत।

प्रश्न 63.
कलकत्ता में अंग्रेजों की सत्ता की प्रतीक इमारत कौनसी थी?
उत्तर:
गवर्नमेंट हाऊस।

प्रश्न 64.
लॉटरी कमेटी का सम्बन्ध किस औपनिवेशिक शहर से था?
उत्तर:
कलकत्ता।

प्रश्न 65.
बम्बई सचिवालय का डिजाइन किसने बनाया था?
उत्तर:
एच. एस. टी. क्लेयर विलकिन्स ने।

प्रश्न 66.
मद्रास, कलकत्ता और बम्बई में कौनसे इलाके ब्रिटिश आबादी के रूप में जाने जाते थे?
उत्तर:
मद्रास, कलकत्ता और बम्बई में क्रमश: फोर्ट सेंट जार्ज, फोर्ट विलियम और फोर्ट इलाके ब्रिटिश आबादी के रूप में प्रसिद्ध थे।

प्रश्न 67.
आजकल बम्बई, मद्रास तथा कलकत्ता किन नामों से पुकारे जाते हैं?
उत्तर:
आजकल बम्बई, मद्रास तथा कलकत्ता क्रमशः मुम्बई, चेन्नई तथा कोलकाता नाम से पुकारे जाते हैं।

प्रश्न 68.
पुर्तगालियों तथा डचों ने कब और कहाँ अपने व्यापारिक केन्द्रों की स्थापना की?
उत्तर:
पुर्तगालियों ने 1510 में पणजी में तथा डचों ने 1605 में मछलीपट्नम में अपने व्यापारिक केन्द्र स्थापित किये।

प्रश्न 69.
अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों ने कब और कहाँ व्यापारिक केन्द्र स्थापित किये?
उत्तर:
अंग्रेजों ने 1639 में मद्रास में तथा फ्रांसीसियों ने 1673 में पांडिचेरी में अपने व्यापारिक केन्द्रों की स्थापना की।

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प्रश्न 70.
भारत के एक आधुनिक औद्योगिक देश न बनने का क्या कारण था?
उत्तर:
इंग्लैण्ड की पक्षपातपूर्ण औपनिवेशिक नीति के कारण।

प्रश्न 71.
‘राइटर्स बिल्डिंग’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
राइटर्स बिल्डिंग कम्पनी का एक मुख्य प्रशासकीय कार्यालय था क्लर्क ‘राइटर्स’ कहलाते थे।

प्रश्न 72.
‘दि मार्बल पैलेस’ के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
किसी शहरी सम्भ्रान्त वर्ग के एक भारतीय परिवार ने कलकत्ता में दि मार्बल पैलेस नामक एक अत्यंत भव्य इमारत बनवाई थी।

प्रश्न 73.
अंग्रेजों के लिए ‘सिविल लाइन्स’ में किन इमारतों का निर्माण किया गया?
उत्तर:
चौड़ी सड़कों, बड़े बगीचों में बने बंगलों, बैरकों, परेड मैदानों, चर्च आदि का निर्माण किया गया।

प्रश्न 74.
चितपुर बाजार कहाँ स्थित था?
उत्तर:
चितपुर बाजार कलकत्ता में ब्लैक टाउन और व्हाइट टाउन की सीमा पर स्थित था।

प्रश्न 75.
ब्लैक टाउन में भारतीयों द्वारा बनवाये गए मन्दिर को अंग्रेज क्या कहते थे?
उत्तर:
ब्लैक पगौडा।

प्रश्न 76.
‘व्हाइट टाउन’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जिस शहरी इलाके में अंग्रेज (गोरे लोग ) रहते थे, वह ‘व्हाइट टाउन’ कहलाता था।

प्रश्न 77.
‘ब्लैक टाउन’ किसे कहते थे?
उत्तर:
जिस शहरी इलाके में भारतीय (काले लोग ) रहते थे, वह ‘ब्लैक टाउन’ कहलाता था।

प्रश्न 78.
प्रसिद्ध उद्योगपति जमशेदजी टाटा ने बम्बई में किस शैली में किस होटल का निर्माण करवाया था?
उत्तर:
गुजराती शैली में ताजमहल होटल का।

प्रश्न 79.
कस्बा और गंज में क्या अन्तर था?
उत्तर:
कस्बा ग्रामीण अंचल में एक छोटे नगर को तथा गंज एक छोटे स्थानीय बाजार को कहा जाता था।

प्रश्न 80.
अंग्रेजों की नजर में ‘ब्लैक टाउन’ कैसे थे?
उत्तर:
अंग्रेजों की नजर में ‘ब्लैक टाउन’ अराजकता तथा हो-हल्ला के केन्द्र व गन्दगी और बीमारियों के स्त्रोत थे।

प्रश्न 81.
अंग्रेजों द्वारा हिल स्टेशनों की स्थापना किस उद्देश्य से की गई थी?
अथवा
अंग्रेजी शासन काल में पहाड़ी शहरों (हिल स्टेशनों) का विकास क्यों किया गया?
उत्तर:
हिल स्टेशन अंग्रेज सैनिकों को ठहराने, सीमाओं की चौकसी करने और शत्रु के विरुद्ध आक्रमण करने के लिए महत्त्वपूर्ण स्थान थे।

प्रश्न 82.
किस गवर्नर जनरल ने अपनी काउंसिल कहाँ स्थानान्तरित की थी और कब?
उत्तर:
1864 में गवर्नर जनरल जान लारेन्स ने अपनी काउंसिल शिमला में स्थानान्तरित की थी।

प्रश्न 83.
मद्रास के नये ‘ब्लैक टाउन’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
नये ‘ब्लैक टाउन’ में भारतीय लोग रहते थे। यहाँ आड़ी-टेढ़ी संकरी गलियों में अलग-अलग जातियों के मोहल्ले थे।

प्रश्न 84.
लार्ड वेलेजली ने शहर में मूलभूत सुविधाएँ प्रदान करने के लिए सरकार की जिम्मेदारियों का उल्लेख किसमें किया था?
उत्तर:
1803 में ‘कलकत्ता मिनट्स’ में

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प्रश्न 85.
अंग्रेज ‘बस्ती’ का प्रयोग किस रूप में ‘करते थे?
उत्तर:
गरीबों की कच्ची झोंपड़ियों के रूप में।

प्रश्न 86.
बम्बई अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का केन्द्र क्यों था?
उत्तर:
एक प्रमुख बन्दरगाह होने के नाते।

प्रश्न 87.
19वीं शताब्दी के अन्त तक भारत का आधा निर्यात तथा आयात किस शहर से होता था?
उत्तर:
बम्बई से

प्रश्न 88.
अम्बई से व्यापार की एक महत्त्वपूर्ण वस्तु कौनसी थी?
उत्तर:
अफीम

प्रश्न 89.
व्यापार की उन्नति के कारण कौनसा भारतीय शहर ‘भारत का सरताज शहर’ कहलाता था?
उत्तर:
बम्बई।

प्रश्न 90.
एशियाटिक सोसायटी ऑफ बाम्बे’ का कार्यालय कहाँ है?
उत्तर:
बम्बई के टाउनहाल में।

प्रश्न 91.
बम्बई की उस इमारत का नाम लिखिए जो ग्रीको-रोमन स्थापत्य शैली से प्रभावित है।
उत्तर:
एल्फिंस्टन सर्कल।

प्रश्न 92.
औपनिवेशिक शहरों में इमारतें बनाने के लिए कौनसी स्थापत्य शैलियों का प्रयोग किया गया?
उत्तर:
(1) नवशास्त्रीय
(2) नव-गॉथिक शैली
(3) इण्डो-सारसेनिक शैली।

प्रश्न 93.
नव-गॉथिक स्थापत्य शैली की विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:
ऊँची उठी हुई छलें, नोकदार मेहराबें, बारीक साज-सज्जा

प्रश्न 94.
इण्डो-सारसेनिक स्थापत्य शैली क्या थी?
उत्तर;
इण्डो-सारसेनिक स्थापत्य शैली में भारतीय और यूरोपीय दोनों शैलियों के तत्त्व थे।

प्रश्न 95.
चॉल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
बम्बई में जगह की कमी एवं भीड़भाड़ के कारण एक विशेष प्रकार की इमारतें बनायी गयीं जिन्हें चॉल कहा गया।

प्रश्न 96.
स्थापत्य शैलियों से क्या पता चलता है? उत्तर-स्थापत्य शैलियों से अपने समय के सौन्दर्यात्मक आदशों एवं उनमें निहित विविधताओं का पता चलता है।

लघुत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
18वीं शताब्दी के अन्त तक भारत में स्थल आधारित साम्राज्यों का स्थान जल आधारित शक्तिशाली यूरोपीय साम्राज्यों ने ले लिया।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
18वीं शताब्दी के अन्त तक जल आधारित शक्तिशाली यूरोपीय साम्राज्यों ने प्रमुख स्थान प्राप्त कर लिया। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार, वाणिज्यवाद तथा पूँजीवाद की शक्तियाँ अब समाज के स्वरूप को निर्धारित करने लगीं। अब मद्रास, कोलकाता तथा मुम्बई जैसे औपनिवेशिक बन्दरगाह शहर नई आर्थिक राजधानियों के रूप में प्रकट हुए। ये औपनिवेशिक प्रशासन और सत्ता के केन्द्र भी बन गए। अब नये भवनों और संस्थानों का विकास हुआ।

प्रश्न 2.
तर्क सहित सिद्ध कीजिये कि औपनिवेशिक शहरों का सामाजिक जीवन वर्तमान शहरों में भी दिखाई पड़ता है?
उत्तर;
औपनिवेशिक शहरों की भाँति वर्तमान शहरों में भी घोड़गाड़ी, ट्रामों, बसों का यातायात के साधनों के रूप में प्रयोग किया जाता है। उनहाल सार्वजनिक पार्क, रंगशाला, सिनेमाहाल आदि लोगों के मिलने-जुलने के स्थान हैं। वर्तमान शहरों में ‘मध्य वर्ग’ का काफी प्रभाव है। वर्तमान शहरों में स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, लाइब्रेरी आदि शिक्षा के केन्द्र बने हुए हैं। स्वियों में भी जागृति आई है।

प्रश्न 3.
‘चाल’ से आप क्या समझते हैं? इनकी विशेषता लिखिए।
उत्तर:
शहर में जगह की कमी और भीड़भाड़ के कारण बम्बई में एक खास तरह की इमारतें बनाई गई, जिन्हें ‘चाल’ का नाम दिया गया। ये इमारतें बहुमंजिला होती थीं, जिनमें एक-एक कमरे वाली आवासीय इकाइयाँ बनाई जाती थीं। इमारत के सारे कमरों के सामने एक खुला बरामदा या गलियारा होता था और बीच में दालान होता था। इस प्रकार की इमारतों में बहुत थोड़ी सी जगह में बहुत सारे परिवार रहते थे। सभी लोग एक-दूसरे के सुख- दुःख में भागीदार होते थे।

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प्रश्न 4.
अंग्रेजों ने भारत में भवन निर्माण के लिए यूरोपीय शैली को किस कारण चुना? तर्क सहित लिखिए।
उत्तर:
(1) इसमें एक अनजान देश में जाना- पहचाना सा भू-दृश्य रचने की और उपनिवेश में घर जैसा अनुभव करने की अंग्रेजों की चाहत दिखाई पड़ती थी।
(2) अंग्रेजों को लगता था कि यूरोपीय शैली उनकी श्रेष्ठता, अधिकार और सत्ता का प्रतीक होगी।
(3) वे सोचते थे कि यूरोपीय ढंग की दिखने वाली इमारतों से औपनिवेशिक शासकों और भारतीय प्रजा के बीच फर्क और फासला साफ दिखने लगेगा।

प्रश्न 5.
अंग्रेजों ने मद्रास (चेन्नई) के आसपास अपना वर्चस्व कैसे स्थापित किया?
उत्तर:
1611 में अंग्रेजों ने मछलीपट्नम में अपनी फैक्ट्री स्थापित की। लेकिन जल्दी ही उन्होंने मद्रास को अपना केन्द्र बनाया, जिसका पट्टा वहाँ के जा ने 1639 में उन्हें दे दिया। राजा ने उन्हें उस स्थान की किलेबन्दी करने, सिक्के ढालने तथा प्रशासन की अनुमति दे दी। यहाँ पर अंग्रेजों ने अपनी फैक्ट्री के इर्द-गिर्द एक किला बनाया, जिसका नाम फोर्ट सेंट जार्ज रखा गया 1761 में फ्रांसीसियों की हार के बाद मद्रास और सुरक्षित हो गया।

प्रश्न 6.
दक्षिण भारत की परिस्थितियाँ अंग्रेजों के लिए अधिक अनुकूल थीं, क्यों? लिखिए।
उत्तर:
दक्षिण भारत में अंग्रेजों का मुकाबला किसी ताकतवर राज्य से नहीं हुआ 1665 में तालीकोटा के युद्ध के बाद विजयनगर साम्राज्य नष्ट-भ्रष्ट हो गया और उसके स्थान पर छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो गये, जैसे- बीदर, बरार, गोलकुण्डा आदि। इन राज्यों को अंग्रेजों ने अपनी कूटनीति के द्वारा डरा-धमका कर या लालच देकर अपने अधीन कर लिया। केवल मैसूर के राज्य से ही उन्हें टक्कर लेनी पड़ी।

प्रश्न 7.
नक्शे हमें क्या बताते हैं और क्या छिपाते है?
उत्तर:
1878 में भारत में सर्वे ऑफ इण्डिया का गठन किया गया। उस समय के नक्शों से हमें काफी जानकारी उपलब्ध होती है, साथ ही हमें अंग्रेजों की भेदभावपूर्ण सोच का भी पता लग जाता है। उदाहरण के लिए, नक्शे में गरीबों की बस्तियों को चिह्नित नहीं किया गया। इसका अर्थ यह लगाया गया कि नक्शे में रिक्त स्थान अन्य योजनाओं के लिए उपलब्ध हैं। जब इन योजनाओं को शुरू किया गया तो गरीबों की बस्तियों को वहाँ से हटा दिया गया।

प्रश्न 8.
औपनिवेशिक काल में ग्रामीण इलाकों एवं कस्बों के चरित्र में अन्तर बताइए।
उत्तर:
ग्रामीण इलाकों एवं कस्बों के चरित्र में भिन्नता के मुख्य बिन्दु निम्नलिखित हैं-
(1) ग्रामीण इलाकों के लोग खेती, पशुपालन एवं जंगलों में संग्रहण द्वारा अपनी जीविका का निर्वाह करते हैं। इसके विपरीत कस्बों में शासक, व्यापारी, प्रशासक व शिल्पकार आदि रहते थे।
(2) कस्बों एवं शहरों की प्रायः किलेबन्दी की जाती थी। यह किलेबन्दी उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों से अलग करती थी।
(3) कस्बों पर ग्रामीण जनता का प्रभुत्व रहता था। वे खेती से प्राप्त होने वाले करों एवं अधिशेष के आधार पर निर्भर रहते थे।

प्रश्न 9.
मध्यकालीन दक्षिण भारत के शहरों की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) दक्षिण भारत के नगर मदुरई तथा कांचीपुरम प्रमुख केन्द्र थे।
(2) दक्षिण भारत के अनेक नगरों में बन्दरगाह होते थे।
(3) ये व्यापार के मुख्य केन्द्रों के कारण विकसित हुए थे।
(4) दक्षिण भारत के शहरों में धार्मिक उत्सव अत्यधिक धूम-धाम के साथ मनाए जाते थे।

प्रश्न 10.
कस्बा एवं गंज के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
कस्बा – कस्बा ग्रामीण अंचल में एक छोटे नगर को कहा जाता है जो सामान्यतः स्थानीय विशिष्ट वस्तुओं का केन्द्र होता है।
गंज-गंज एक छोटे स्थायी बाजार को कहा जाता है। कस्बा और गंज दोनों कपड़ा, फल, सब्जी एवं दुग्ध उत्पादों से सम्बन्ध थे। ये विशिष्ट परिवारों एवं सेना के लिए सामग्री उपलब्ध करवाते थे।

प्रश्न 11.
अमेरिका के गृहयुद्ध और स्वेज नहर के खुलने का भारत की आर्थिक गतिविधियों पर क्या प्रभाव पड़ा?
अथवा
अमेरिकी गृह युद्ध ने भारत में ‘रैयत’ समुदाय के जीवन को किस प्रकार प्रभावित किया?
उत्तर:
सन् 1861 में अमेरिका में गृहयुद्ध शुरू होने के कारण वहाँ से कपास का निर्यात बन्द हो गया। इससे भारतीय कपास की माँग बढ़ी, जिसकी खेती मुख्य रूप से दक्कन में होती थी। 1869 में स्वेज नहर को व्यापार के लिए खोल दिया गया, जिससे विश्व अर्थव्यवस्था के साथ-साथ बम्बई की अर्थव्यवस्था भी मजबूत हुई। बम्बई की सरकार और भारतीय व्यापारियों ने बम्बई को ‘भारत का सरताज शहर’ घोषित कर दिया।

प्रश्न 12.
18वीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में औपनिवेशिक सरकार ने नगरों के लिए मानचित्र तैयार करने पर ध्यान क्यों दिया ?
अथवा
औपनिवेशिक सरकार ने मानचित्र तैयार करने पर विशेष ध्यान क्यों दिया?
उत्तर:
औपनिवेशिक सरकार की मान्यता थी कि किसी शहर की बनावट और भूदृश्य को समझने के लिए मानचित्र आवश्यक होते हैं। इस जानकारी के आधार पर वे इलाके पर अधिक नियन्त्रण स्थापित कर सकते थे। शहरों के मानचित्रों से हमें उस स्थान पर पहाड़ियों, नदियों व हरियाली का पता चलता है। ये समस्त बातें रक्षा सम्बन्धी उद्देश्यों के लिए योजना तैयार करने में बड़ी उपयोगी सिद्ध होती हैं। मकानों की सघनता, सड़कों की स्थिति आदि से इलाके की व्यावसायिक सम्भावनाओं की जानकारी मिलती है।

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प्रश्न 13.
जनगणना से प्राप्त आँकड़ों का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
(1) ये आँकड़े शहरीकरण का अध्ययन करने के लिए एक बहुमूल्य स्रोत हैं।
(2) बीमारियों से होने वाली मृत्युओं की सारणियों, आयु, लिंग, जाति व व्यवसाय के अनुसार लोगों को गिनने की व्यवस्था से संख्याओं का एक विशाल भण्डार मिलता है।
(3) जनगणना के माध्यम से आबादी के बारे में सामाजिक जानकारियों को सुगम्य आँकड़ों में बदला जा सकता था।

प्रश्न 14.
औपनिवेशिक भारत में जनगणना सम्बन्धी भ्रमों का उल्लेख कीजिये ।
उत्तर:
(1) आबादी के विभिन्न वर्गों का वर्गीकरण करने के लिए अलग-अलग श्रेणियाँ बनाई गई थीं। कई बार यह वर्गीकरण अतार्किक होता था।
(2) लोग जनगणना आयुक्तों को गलत जवाब दे देते थे।
(3) प्राय: लोग स्वयं भी जनगणना के कार्य में सहायता देने से इनकार कर देते थे। ऊँची जाति के लोग अपने परिवार की स्त्रियों के बारे में जानकारी देने से संकोच करते थे बीमारियों से सम्बन्धित आँकड़ों को कठिन था।
(4) मृत्यु दर तथा एकत्रित करना बहुत

प्रश्न 15.
” अठारहवीं शताब्दी में औपनिवेशिक शहर अंग्रेजों की वाणिज्यिक संस्कृति को प्रतिबिम्बित करते थे।” व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
अठारहवीं शताब्दी में राजनीतिक सत्ता और संरक्षण भारतीय शासकों के स्थान पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापारियों के हाथों में आ गई दुभाषिए, बिचौलिए, व्यापारी और माल आपूर्तिकर्ता के रूप में काम करने वाले भारतीयों का भी इन नये शहरों में एक महत्त्वपूर्ण स्थान था। नदी या समुद्र के किनारे आर्थिक गतिविधियों से गोदियों और घाटियों का विकास हुआ। समुद्र किनारे गोदाम, वाणिज्यिक कार्यालय, बीमा एजेंसियों, यातायात डिपो और बैंकिंग संस्थानों की स्थापना हुई।

प्रश्न 16.
1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों ने शहरी इलाकों में ‘सिविल लाइन्स’ नामक इलाके क्यों विकसित किये?
उत्तर:
1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज शासकों ने अनुभव किया कि अंग्रेजों को भारतीयों (देशियों) के खतरे से दूर, अधिक सुरक्षित व पृथक् बस्तियों में रहना चाहिए। अत: उन्होंने पुराने कस्बों के चारों ओर चरागाहों और खेतों को साफ कर ‘सिविल लाइन्स’ नामक नये शहरी इलाके विकसित किये। ‘सिविल लाइन्स’ में केवल गोरे लोगों को बसाया गया। चौड़ी सड़कों, बड़े बगीचों में बने बंगलों, बैरकों, परेड मैदान, चर्च आदि से लैस छावनियाँ यूरोपीय लोगों के लिए सुरक्षित आश्रय स्थल थीं।

प्रश्न 17.
हिल स्टेशनों की अंग्रेजों के लिए क्या उपयोगिता थी?
उत्तर:
(1) हिल स्टेशन अंग्रेज सैनिकों को ठहराने, सीमाओं की चौकसी करने और शत्रु के विरुद्ध आक्रमण करने के लिए महत्त्वपूर्ण स्थान थे।
(2) हिल स्टेशनों की जलवायु अंग्रेजों के लिए स्वास्थ्यप्रद थी।
(3) यहाँ अंग्रेज सैनिक हैजा, मलेरिया आदि बीमारियों से मुक्त रह सकते थे।
(4) ये हिल स्टेशन सेनेटोरियम के रूप में भी विकसित किये गए थे। यहाँ सैनिकों को विश्राम करने एवं इलाज कराने के लिए भेजा जाता था।

प्रश्न 18.
“औपनिवेशिक शहरों में नये सामाजिक समूह बने तथा लोगों की पुरानी पहचानें महत्त्वपूर्ण नहीं रहीं।” व्याख्या कीजिये ।
अथवा
औपनिवेशिक शहरों में ‘मध्य वर्ग’ के विकास का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
अठारहवीं शताब्दी में औपनिवेशिक शहरों में समस्त वर्गों के लोग आने लगे शहरों में क्लकों, डॉक्टरों, इन्जीनियरों वकीलों, शिक्षकों तथा लेखाकारों की माँग बढ़ती जा रही थी। परिणामस्वरूप शहरों में ‘मध्य वर्ग’ का विकास हुआ। मध्य वर्ग के लोग सुशिक्षित थे तथा इनकी स्कूल, कॉलेज, लाइब्रेरी तक अच्छी पहुँच थी। वे समाज और सरकार के बारे में समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और सार्वजनिक सभाओं में अपने विचार व्यक्त कर सकते थे।

प्रश्न 19.
इतिहासकारों को जनगणना जैसे स्रोतों का प्रयोग करते समय सावधानी क्यों रखनी चाहिए?
उत्तर:
इतिहासकारों को जनगणना जैसे स्रोतों का प्रयोग करते समय सावधानी इसलिए रखनी चाहिए क्योंकि जनगणना के आँकड़े भ्रामक भी हो सकते हैं। इन आँकड़ों का प्रयोग करने से पहले हमें इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि आँकड़े किसने इकट्ठा किए हैं तथा उन्हें क्यों व कैसे इकट्ठा किया गया था।

प्रश्न 20.
अंग्रेजों ने बंगाल में अपने शासन के शुरू से ही नगर नियोजन का कार्यभार अपने हाथों में क्यों लिया?
उत्तर- अंग्रेज व्यापारी नवाब सिराजुद्दौला की सम्प्रभुता से असन्तुष्ट थे। उसने उनसे माल गोदाम के रूप में प्रयोग किये जाने वाला छोटा किला छीन लिया था। प्लासी के युद्ध में विजय के उपरान्त अंग्रेजों ने कलकत्ता में ऐसा किला बनाने का निश्चय किया जिस पर आसानी से आक्रमण न किया जा सके।

प्रश्न 21.
नवाब सिराजुद्दौला ने कलकत्ता नगर पर हमला क्यों किया?
उत्तर:
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापारी नवाब सिराजुद्दौला की सम्प्रभुता पर लगातार सवाल उठा रहे थे। वे न तो कस्टम ड्यूटी चुकाना चाहते थे और न ही उनके द्वारा तय की गई कारोबार की शर्तों पर काम करना चाहते थे। इसलिए नवाब सिराजुद्दौला ने 1756 ई. में कलकत्ता पर हमला करके अंग्रेजों द्वारा बनाए गए किले पर अपना अधिकार कर लिया।

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प्रश्न 22.
अठारहवीं शताब्दी में शहरों में स्त्रियों में आई जागरूकता का रूढ़िवादी लोग विरोध क्यों करने लगे?
उत्तर:
रूढ़िवादियों को भय था कि यदि स्त्रियाँ पढ़ लिख गई, तो वे संसार में क्रान्ति ला देंगी तथा सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था का आधार खतरे में पड़ जायेगा। कुछ महिला सुधारक भी स्त्रियों को माँ और पत्नी की परम्परागत भूमिकाओं में ही देखना चाहते थे। उनका कहना था फि स्त्रियों को पर की चारदीवारी के भीतर ही रहना चाहिए। वे परम्परागत पितृसत्तात्मक रीति-रिवाजों, कानूनों को परिवर्तित करने के प्रयासों से असन्तुष्ट थे।

प्रश्न 23.
‘नव-गॉथिक शैली’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
ऊँची उठी हुई छर्ने, नोकदार मेहराबें और बारीक साज-सज्जा ‘नव- गाँधिक शैली’ की विशेषताएँ थीं। बम्बई सचिवालय, बम्बई विश्वविद्यालय, बम्बई उच्च न्यायालय आदि भव्य इमारतें समुद्र किनारे इसी शैली में बनाई गई। यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी के घंटाघर का निर्माण प्रेमचन्द रायचन्द के धन से किया गया था। इसका नाम उनकी माँ के नाम पर राजाबाई टावर रखा गया। परन्तु नव-गॉथिक शैली का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण विक्टोरिया टर्मिनस रेलवे स्टेशन है।

प्रश्न 24.
नवशास्त्रीय या नियोक्लासिकल स्थापत्य कला पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
बड़े-बड़े स्तम्भों के पीछे रेखागणितीय संरचनाओं का निर्माण नवशास्त्रीय स्थापत्य शैली की विशेषता थी। यह शैली मूल रूप से प्राचीन रोम की भवन निर्माण शैली से निकली थी। 1833 में बम्बई का टाउन हाल इसी शैली के अनुसार बनाया गया था। 1860 के दशक में अनेक व्यावसायिक इमारतों के समूह को ‘एल्फिन्स्टन सर्कल’ कहा जाता था। बाद में इसका नाम बदलकर हार्निमान सर्कल रख दिया गया था। इसमें पहली मंजिल पर ढके हुए तोरणपथ का रचनात्मक ढंग से प्रयोग किया गया।

प्रश्न 25.
भारत में रेलवे की शुरुआत कब हुई और इसके क्या प्रभाव हुए?
अथवा
1853 में रेलवे के आरम्भ की शहरीकरण की प्रक्रिया में क्या भूमिका रही?
अथवा
1853 में रेलवे की स्थापना से किस प्रकार नगरों का भाग्य बदल गया? कोई दो परिवर्तन बताइये।
उत्तर:
(1) भारत में रेलवे की शुरुआत 1853 में हुई। अब आर्थिक गतिविधियों का केन्द्र परम्परागत शहरों से दूर जाने लगा क्योंकि ये शहर पुराने मार्गों और नदियों के निकट थे।
(2) प्रत्येक रेलवे स्टेशन कच्चे माल का संग्रह केन्द्र और आयातित माल का वितरण केन्द्र बन गया था।
(3) रेलवे नेटवर्क के विस्तार के साथ रेलवे वर्कशाप, रेलवे कालोनियों भी बनने लगीं और जमालपुर, बरेली और वाल्टेयर जैसे रेलवे नगर अस्तित्व में आए।

प्रश्न 26.
अंग्रेजों ने ब्लैक टाउनों में सफाई व्यवस्था पर ज्यादा ध्यान कब व क्यों दिया? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जब ब्लैक टाउन (काले इलाके में हैजा और प्लेग जैसी महामारियाँ फैली और हजारों लोग मौत का शिकार हुए तब अंग्रेज अफसरों को स्वच्छता व सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए ज्यादा कठोर कदम उठाने पड़े। उनको इस बात का डर था कि कहीं ये बीमारियाँ ब्लैक टाउन से ह्वाइट टाउन में भी न फैल जायें। 1960-70 के दशकों से साफ-सफाई के बारे में कड़े प्रशासकीय उपाय लागू किए गए और भारतीय शहरों में निर्माण गतिविधियों पर अंकुश लगाया गया।

प्रश्न 27.
आमार कथा (मेरी कहानी ) क्या है और किसके द्वारा लिखी गई ?
अथवा
विनोदिनी दास पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
विनोदिनी दास बंगाली रंगमंच की एक प्रसिद्ध अदाकारा थीं। ‘स्टार थियेटर’, कलकत्ता की स्थापना ( 1883 ) के पीछे उनका मुख्य हाथ था 1910 से 1913 के बीच उन्होंने ‘आमार कथा’ के नाम से किस्तों में अपनी आत्मकथा लिखी। वे एक जबरदस्त व्यक्तित्व वाली महिला थीं। उन्होंने समाज में औरतों की समस्याओं पर केन्द्रित कई भूमिकाएँ निभाई। वे अभिनेत्री, संस्था निर्मात्री और लेखिका के रूप में कई भूमिकाएँ एक साथ निभाती

प्रश्न 28.
अंग्रेजों ने जहाँ पर भी किले बनाए, उनके चारों ओर खुले मैदान क्यों छोड़े और इसके पीछे क्या दलील दी ?
उत्तर:
अंग्रेजों ने कलकत्ता में फोर्ट विलियम के इर्द- गिर्द एक विशाल जगह खाली छोड़ दी। खाली मैदान रखने का उद्देश्य यह था कि किले की ओर बढ़ने वाली शत्रु की सेना पर किले से बेरोक-टोक गोलीबारी की जा सके। जब अंग्रेजों को कलकत्ता में अपनी उपस्थिति स्थायी दिखाई देने लगी, तो वे फोर्ट से बाहर मैदान के किनारे पर भी आवासीय इमारतें बनाने लगे।

प्रश्न 29.
“कलकत्ता के लिए जो पैटर्न तैयार किया गया था, उसे बहुत सारे शहरों में दोहराया गया।” व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज विद्रोहियों के गढ़ों को अपने लिए सुरक्षित बनाने लगे। उन्होंने दिल्ली में लाल किले पर अपना कब्जा करके वहाँ अपनी सेना तैनात कर दी। उन्होंने किले के पास बनी इमारतों को साफ करके भारतीय मोहल्लों और किले के बीच काफी फासला बना दिया। इसके पीछे उन्होंने यह दलील दी कि अगर . कभी शहर के लोग फिरंगी-राज के खिलाफ खड़े हो जाएँ तो उन पर गोली चलाने के लिए खुली जगह जरूरी थी।

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प्रश्न 30.
कलकत्ता नगर नियोजन में लाटरी कमेटी के कार्यों की वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।
अथवा
‘लाटरी कमेटी’ क्या थी? इसकी कार्यप्रणाली का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1817 में कलकत्ता में एक कमेटी बनाई गई जो सरकार की मदद से नगर नियोजन का कार्य करती थी। यह कमेटी नगर सुधार के लिए धन की व्यवस्था जनता के बीच लाटरी बेचकर करती थी, इसलिए इसका नाम ‘लाटरी कमेटी’ पड़ा। लाटरी कमेटी ने एक नक्शा बनवाया, जिससे कलकत्ता शहर की एक सम्पूर्ण तस्वीर सामने आ सके। कमेटी की प्रमुख गतिविधियों में शहर के हिन्दुस्तानी आबादी वाले हिस्से में सड़क निर्माण और नदी के किनारे से अवैध कब्जे हटाना शामिल था।

प्रश्न 31.
औपनिवेशिक काल में कस्बों का स्वरूप गाँवों से भिन्न था फिर भी इनके बीच की पृथकता अनिश्चित होती थी? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- औपनिवेशिक काल में लोग ग्रामीण इलाकों में खेती, जंगलों में संग्रहण या पशुपालन द्वारा जीवन निर्वाह करते थे। इसके विपरीत कस्बों में शिल्पकार, व्यापारी, प्रशासक एवं शासक रहते थे। कस्बों पर ग्रामीण जनता का प्रभुत्व रहता था तथा वे खेती से प्राप्त करों एवं अधिशेष के आधार पर फलते-फूलते थे प्रायः कस्बों व शहरों की किलेबन्दी की जाती थी जो उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों से अलग करती थी फिर भी कस्बों एवं गाँवों के मध्य की पृथकता अनिश्चित होती थी।

किसान तीर्थयात्रा करने के लिए लम्बी दूरियाँ तय करते थे एवं कस्बों से होकर गुजरते थे। दूसरी ओर लोगों और माल का कस्बे से गाँवों की ओर गमन होता रहता था। व्यापारी और फेरीवाले कस्बों से माल गाँव ले जाकर बेचते थे इससे बाजारों का फैलाव और उपभोग की नई शैलियों का उदय होता था। इसके अतिरिक्त जब कस्बों पर आक्रमण होते थे तो लोग प्रायः ग्रामीण क्षेत्रों में शरण लेते थे।

प्रश्न 32.
अठारहवीं शताब्दी के मध्य से शहरों का रूप परिवर्तन क्यों एवं किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
अठारहवीं शताब्दी के मध्य से शहरों के रूप परिवर्तन का एक नया चरण प्रारम्भ हुआ। व्यापारिक गतिविधियों के अन्य स्थानों पर केन्द्रित होने के कारण सत्रहवीं शताब्दी में विकसित हुए शहर- सूरत, मछलीपट्टनम व ढाका पतनोन्मुख हो गए। 1757 ई. में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला एवं अंग्रेजों के मध्य हुए प्लासी के बुद्ध में अंग्रेजों की जीत हुई। मद्रास, बम्बई व कलकत्ता ये शहर औपनिवेशिक प्रशासन एवं सत्ता के केन्द्र भी बन गये। नए भवनों एवं संस्थानों का उदय हुआ एवं शहरी केन्द्रों को नए तरीके से पूर्णतः व्यवस्थित किया गया। इन शहरों में नये नये रोजगारों का सृजन हुआ, जिससे लोग इन शहरों में बसने लगे। लगभग 1800 ई. तक ये शहर जनसंख्या की दृष्टि से भारत के विशाल शहर बन गए।

प्रश्न 33.
प्रारम्भिक वर्षों में औपनिवेशिक सरकार ने मानचित्र बनाने पर विशेष ध्यान क्यों दिया?
उत्तर:
प्रारम्भिक वर्षों में औपनिवेशिक सरकार ने निम्नलिखित कारणों से मानचित्र बनाने पर विशेष ध्यान दिया-
(i) सरकार का मानना था कि किसी स्थान की बनावट एवं भूदृश्य को समझने के लिए मानचित्र आवश्यक होते हैं। इस जानकारी के आधार पर वे शहरी प्रदेश पर नियन्त्रण बनाये रख सकते थे।

(ii) जब शहरों का विस्तार होने लगा तो न केवल उनके विकास की योजना तैयार करने के लिए बल्कि शहर को विकसित करने एवं अपनी सत्ता मजबूत बनाने के लिए भी मानचित्र बनाये जाने लगे।

(ii) शहरों के मानचित्रों से हमें उसकी पहाड़ियों, नदियों एवं हरियाली का पता चलता है। यह जानकारी रक्षा सम्बन्धी उद्देश्यों के लिए योजना बनाने में बहुत काम आती

प्रश्न 34.
किन सरकारी नीतियों ने भारतीयों के भीतर उपनिवेशवाद विरोधी और राष्ट्रवादी भावनाओं को बढ़ावा दिया?
उत्तर:
उन्नीसवीं सदी में शहरों में सरकारी दखलन्दाजी और सख्त हो गई। इस आधार पर और अधिक तेजी से झुग्गी-झोंपड़ियों को हटाना शुरू किया गया। दूसरे इलाकों की अपेक्षा ब्रिटिश आबादी वाले हिस्सों को तेजी से विकसित किया जाने लगा। ‘स्वास्थ्यकर’ और ‘अस्वास्थ्यकर’ के नए विभेद के कारण ‘हाइट’ और ‘ब्लैक’ टाउन वाले नस्ली विभाजन को और बल मिला। इन सरकारी नीतियों के विरुद्ध जनता के प्रतिरोध ने भारतीयों के भीतर उपनिवेशवाद विरोधी और राष्ट्रवादी भावनाओं को बढ़ावा दिया।

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प्रश्न 35.
बम्बई स्थित होटल ताजमहल के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
बम्बई स्थित प्रसिद्ध होटल ताजमहल का निर्माण प्रसिद्ध उद्योगपति जमशेदजी टाटा ने करवाया था। यह परम्परागत गुजराती शैली में निर्मित है। यह इमारत न केवल भारतीय उद्यमशीलता का प्रतीक है अपितु अंग्रेजों के स्वामित्व एवं नियन्त्रण वाले नस्ली क्लबों और होटलों के लिए चुनौती भी थी।

प्रश्न 36.
फोर्ट सेण्ट जॉर्ज के विषय में आप क्या जानते हैं? क्या यह व्हाइट टाउन का केन्द्र बिन्दु था?
उत्तर:
मद्रास स्थित फोर्ट सेंट जॉर्ज औपनिवेशिक शासन का मुख्य केन्द्र था। यहाँ फोर्ट सेंट व्हाइट टाउन का केन्द्र था। यहाँ अधिकांशतः यूरोपीय रहते थे इसकी दीवारों तथा बुर्जों ने इसे एक खास प्रकार की घेराबन्दी का रूप दे दिया था। किले के भीतर रहने का निर्णय रंग तथा धर्म के आधार पर किया जाता था। भारतीयों के साथ कम्पनी के कर्मचारियों अथवा उनके परिवार के सदस्यों को विवाह की अनुमति नहीं थी। यूरोपीय ईसाई होने के कारण डच तथा पुर्तगालियों को वहाँ रहने की छूट थी। व्हाइट टाउन का केन्द्रबिन्दु इस किले का विकास गोरे विशेषकर अंग्रेजों की जरूरतों एवं सुविधाओं के अनुसार किया गया था।

प्रश्न 37.
लॉर्ड वेलेजली की नगर योजना के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
लॉर्ड वेलेजली 1798 ई. में बंगाल का गवर्नर जनरल बना। यह अपनी नगर योजना के लिये भी जाना जाता है। वेलेजली ने कलकत्ता में अपने लिये एक गवर्नमेण्ट
हाउस नाम का एक शानदार महल बनवाया था। यह भवन अंग्रेजी सत्ता का प्रतीक था। लॉर्ड वेलेजली कलकत्ता में आ जाने के पश्चात् यहाँ की भीड़-भाड़, अत्यधिक हरियाली, गंदे तालाब तथा साँध से परेशान हो गया। वेलेजली को इन सब तत्त्वों से चिढ़ थी तथा अंग्रेजों का यह भी विचार था कि भारत की उष्णकटिबन्धीय जलवायु बीमारियों तथा महामारियों के अधिक अनुकूल है अतः वेलेजली ने शहर को अधिक स्वास्थ्यपरक बनाने के लिए अधिक खुले स्थान रखने का निर्णय लिया। 1803 ई. में वेलेजली ने नगर नियोजन की आवश्यकता पर एक प्रशासकीय आदेश जारी किया। अतः कहा जा सकता है कि वेलेजली अपनी सहायक सन्धि के कारण जितना कुख्यात है उससे अधिक विख्यात वह स्वास्थ्यपरक नगर नियोजन के लिये है।

प्रश्न 38.
इमारतें और स्थापत्य शैलियाँ क्या बताती हैं?
उत्तर:
स्थापत्य शैलियों से अपने समय के सौन्दर्यात्मक आदर्शों और उनमें निहित विविधताओं का पता चलता है। इमारतें उन लोगों की सोच और नजर के बारे में भी बताती हैं जो उन्हें बना रहे थे इमारतों के जरिये सभी शासक अपनी ताकत को अभिव्यक्त करना चाहते थे। स्थापत्य शैलियों से केवल प्रचलित रुचियों का ही पता नहीं चलता, वे उनको बदलती भी हैं। वे नई शैलियों को लोकप्रियता प्रदान करती हैं और संस्कृति की रूपरेखा तय करती हैं।

प्रश्न 39.
‘बंगला’ भवन निर्माण शैली में किस बात का द्योतक है? इसकी रूपरेखा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अंग्रेजों ने अपनी जरूरतों के मुताबिक भवन निर्माण में भारतीय शैलियों को भी अपना लिया था। ‘बंगला’ इसका स्पष्ट उदाहरण है बंगला बम्बई और पूरे देश में सरकारी अफसरों के लिए बनाए जाने वाला भवन था। औपनिवेशिक बंगला एक बड़ी जमीन पर बना होता था। इसमें परम्परागत ढलवाँ छत होती थी और चारों तरफ बरामदा होता था। बंगले के परिसर में घरेलू नौकरों के लिए अलग से क्वार्टर होते थे।

प्रश्न 40.
पूर्व औपनिवेशिक काल के शहरी केन्द्रों की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर:
(1) ये शहर जनसंख्या के केन्द्रीकरण, अपने विशाल भवनों तथा अपनी शाही शोभा और समृद्धि के लिए प्रसिद्ध थे।
(2) मनसबदार और जागीरदार सामान्यतः इन शहरों में अपने आवास रखते थे।
(3) इन शहरी केन्द्रों में सम्राट और कुलीन वर्ग की ‘उपस्थिति के कारण, यहाँ शिल्पकार, राजकोष, सम्राट का किलेबन्द महल होता था तथा नगर एक दीवार से घिरा होता था।
(4) नगरों के भीतर उद्यान, मस्जिदें, मन्दिर, मकबरे, महाविद्यालय, बाजार तथा सराय स्थित होती थीं।

प्रश्न 41.
ब्रिटिश भारत में निर्मित भवनों में किन- किन स्थापत्य शैलियों का सम्मिश्रण देखने को मिलता है?
उत्तर:
ब्रिटिश भारत में निर्मित भवनों में ‘नव-गॉधिक शैली’, ‘नवशास्त्रीय’ तथा ‘इण्डोसारसेनिक’ स्थापत्य शैलियों का सम्मिश्रण देखने को मिलता है। ऊँची उठी हुई छलें, नोकदार मेहरावें तथा बारीक साज-सज्जा नव-गॉथिक शैली की विशेषताएँ हैं। बड़े- बड़े स्तम्भों के पीछे रेखागणितीय संरचनाओं का निर्माण नवशास्त्रीय शैली की विशेषताएँ हैं, इण्डोसारसेनिक शैली गुम्बदों, छतरियों, मेहराबों से प्रभावित थी।

प्रश्न 42.
लॉटरी कमेटी क्या थी? इसके अन्तर्गत कलकत्ता के नगर नियोजन के लिए कौन-कौनसे कदम उठाए गए?
उत्तर:
गवर्नर जनरल लार्ड वेलेजली के पश्चात् नगर नियोजन का कार्य सरकार की सहायता से लॉटरी कमेटी ने जारी रखा। लॉटरी कमेटी का यह नाम इसलिए पड़ा कि यह कमेटी नगर सुधार के लिए पैसे की व्यवस्था जनता के बीच लॉटरी बेचकर करती थी।
लॉटरी कमेटी द्वारा नगर नियोजन के लिए उठाए गए कदम –
(i) लॉटरी कमेटी ने कलकत्ता शहर का नया मानचित्र बनाया ताकि कलकत्ता को नया रूप दिया जा सके।
(ii) लॉटरी कमेटी की प्रमुख गतिविधियों में शहर में हिन्दुस्तानी जनसंख्या वाले भाग में सड़कें बनवाना एवं नदी किनारे से अवैध कब्जे हटाना सम्मिलित था।
(iii) कलकत्ता शहर के भारतीय हिस्से को साफ- सुथरा बनाने के लिए कमेटी ने बहुत सी झोंपड़ियों को साफ कर दिया एवं गरीब मजदूरों को वहाँ से बाहर निकाल दिया। उन्हें कलकत्ता के बाहरी किनारे पर निवास हेतु जगह दी गई।

प्रश्न 43.
कौन-कौनसी सरकारी नीतियों ने कलकत्ता में भारतीयों के भीतर उपनिवेशवाद विरोधी एवं राष्ट्रवादी भावनाओं को बढ़ावा दिया?
उत्तर:
19वीं शताब्दी के प्रारम्भ के साथ ही कलकत्ता शहर में सरकारी हस्तक्षेप बहुत अधिक सख्त हो चुका था। वित्त पोषण (फण्डिंग) सहित नगर नियोजन के समस्त आयामों को अंग्रेज सरकार ने अपने हाथों में ले लिया। इस आधार पर और तीव्र गति से शुग्गी-झोंपड़ियों को हटाना प्रारम्भ किया गया। दूसरे क्षेत्रों की अपेक्षा ब्रिटिश आबादी वाले हिस्सों का तेजी से विकास किया जाने लगा। स्वास्थ्यकर एवं अस्वास्थ्यकर के नये विभेद के कारण व्हाइट और ब्लैक टाउन वाले नस्ली विभाजन को और बल मिला। कलकत्ता नगर निगम में मौजूद भारतीय प्रतिनिधियों ने शहर के यूरोपीय आबादी वाले क्षेत्रों के विकास पर आवश्यकता से अधिक ध्यान दिये जाने की आलोचना की। इन सरकारी नीतियों के विरुद्ध जनता के प्रतिरोध ने कलकत्ता में भारतीयों के भीतर उपनिवेशवाद विरोधी एवं राष्ट्रवादी भावनाओं को बढ़ावा दिया।

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प्रश्न 44.
बम्बई का वाणिज्यिक शहर के रूप में किस प्रकार विकास हुआ? टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
19वीं शताब्दी के अन्त तक भारत का आधार आयात तथा निर्यात वाणिज्य शहर बम्बई से होता था। इस समय व्यापार की मुख्य वस्तु अफीम तथा नील थी। यहाँ से ईस्ट इण्डिया कम्पनी चीन को अफीम का निर्यात किया करती थी। इस व्यापार से शुद्ध भारतीय पूँजीपति वर्ग का निर्माण हुआ। पारसी, मारवाड़ी, कोंकणी, मुसलमान, गुजराती, ईरानी, आर्मेनियाई, यहूदी, बोहरे तथा बनिये इत्यादि यहाँ के मुख्य व्यापारी वर्ग से सम्बन्धित थे 1869 ई. में स्वेज नहर को व्यापार के लिये खोला गया था इससे बम्बई के व्यापारिक सम्बन्ध शेष विश्व के साथ अत्यधिक मजबूत हुए। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक बम्बई में भारतीय व्यापारी कॉटन मिल जैसे नवीन उद्योगों में अत्यधिक धन का निवेश कर रहे थे।

प्रश्न 45
औपनिवेशिक शहरों में स्त्रियों के सामाजिक जीवन में आए परिवर्तनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
औपनिवेशिक शहरों में महिलाओं के लिए नए अक्सर थे। वे पत्र-पत्रिकाओं, आत्मकथाओं तथा पुस्तकों के माध्यम से स्वयं को अभिव्यक्त कर रही थीं। सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की उपस्थिति बढ़ रही थी। वे नौकरानी, फैक्ट्री मजदूर, शिक्षिका, रंगकर्मी और फिल्म कलाकार के रूप में शहरों के नये व्यवसायों में प्रविष्ट होने लगीं। परन्तु घर से निकलकर सार्वजनिक स्थानों में जाने वाली महिलाओं का सम्मान नहीं था।

प्रश्न 46.
मद्रास का कौनसा क्षेत्र व्हाइट टाउन कां केन्द्रक बन गया था?
उत्तर:
मद्रास में स्थित फोर्ट सेन्ट जार्ज व्हाइट टाउन .का केन्द्रक बन गया था। यहाँ अधिकतर यूरोपीय लोग रहते ‘थे। किले के अन्दर रहने का निर्णय रंग और धर्म के आधार पर किया जाता था। कम्पनी के लोगों को भारतीयों के साथ विवाह करने की अनुमति नहीं थी। संख्या की दृष्टि से कम होते हुए भी यूरोपीय लोग शासक थे और मद्रास शहर का विकास शहर में रहने वाले गोरे लोगों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर किया जा रहा था।

प्रश्न 47.
मद्रास में स्थित ब्लैक टाउन का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
मद्रास में ब्लैक टाउन किले के बाहर स्थित था। यहाँ आबादी को सीधी पंक्तियों में बसाया गया था। कुछ समय बाद उत्तर की दिशा में दूर जाकर एक नवा ब्लैक टाउन बसाया गया। इसमें भारतीय बुनकरों, कारीगरों, बिचौलियों, दुभाषियों को रखा गया। इसमें भारतीय लोग रहते थे। यहाँ मंदिर और बाजार के आस-पास आवासीय मकान बनाए गए थे। शहर के बीच से गुजरने वाली आड़ी-टेड़ी संकरी गलियों में अलग-अलग जातियों के मोहल्ले थे।

प्रश्न 48.
कोलकाता में नगर नियोजन को क्यों प्रोत्साहन दिया गया?
उत्तर:
कोलकाता में 1817 में हैजा फैल गया तथा 1896 में प्लेग ने शहर को अपनी चपेट में ले लिया। इस स्थिति में अंग्रेजों ने लोलकाता में नगर नियोजन पर बल दिया। घनी आबादी के इलाकों को अस्वच्छ माना जाता था। इसलिए कामकाजी लोगों की झोंपड़ियों तथा वस्तियों को वहाँ से हटा दिया गया। मजदूरों, फेरीवालों कारागरों और बेरोजगारों को दूर वाले इलाकों में ढकेल दिया गया। आग लगने की आशंका को ध्यान में रखते हुए फँस की झोंपड़ियों को अवैध घोषित कर दिया गया।

प्रश्न 49.
मुम्बई में यूरोपीय शैली की इमारतों का निर्माण क्यों किया गया?
उत्तर:
(1) यूरोपीय शैली की इमारतों में भारत जैसे अपरिचित देश में जाना पहिचाना सा भू-दृश्य रचने की और उपनिवेश में भी पर जैसा महसूस करने की अंग्रेजों की आकांक्षा प्रकट होती थी।
(2) अंग्रेजों की मान्यता थी कि यूरोपीय शैली उनकी श्रेष्ठता, अधिकार और सत्ता का प्रतीक थी
(3) वे सोचते थे कि यूरोपीय शैली में निर्मित इमारतों से अंग्रेज शासकों और भारतीय लोगों के बीच अन्तर साफ दिखाई देगा।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
औपनिवेशिक भारत के प्रमुख बन्दरगाहों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
औपनिवेशिक भारत के प्रमुख बन्दरगाह
(1) बन्दरगाहों की किलेबन्दी-अठारहवीं शताब्दी तक भारत में मद्रास, कलकत्ता तथा बम्बई महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह बन चुके थे। यहाँ जो बस्तियों बसों, वे चीजों के संग्रह के लिए बड़ी उपयोगी सिद्ध हुई ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इन बस्तियों में अपने कारखाने अर्थात् वाणिज्यिक कार्यालय स्थापित किये। कम्पनी ने सुरक्षा के उद्देश्य से इन बस्तियों की किलाबन्दी की। मद्रास में फोर्ट सेन्ट जार्ज, कलकत्ता में फोर्ट विलियम और बम्बई में फोर्ट नामक किले बनाये गए।

(2) यूरोपीयों और भारतीयों के लिए अलग-अलग बस्तियों की व्यवस्था-यूरोपीय व्यापारी किलों के अन्दर रहते थे, जबकि भारतीय व्यापारी, कारीगर, कामगार आदि इन किलों के बाहर अलग बस्तियों में रहते थे। जिस बस्ती में यूरोपीय लोग रहते थे वह ‘व्हाइट टाउन’ (गोरा शहर ) तथा जिस बस्ती में भारतीय लोग रहते थे, वह ‘ब्लैक टाउन’ (काला शहर) के नाम से पुकारे जाते थे।

(3 ) देहाती एवं दूरस्थ इलाकों का बन्दरगाहों से जुड़ना-उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में रेलवे के विकास ने इन शहरों को शेष भारत से जोड़ दिया। परिणामस्वरूप ऐसे देहाती तथा दूरस्थ इलाके भी इन बन्दरगाहों से जुड़ गए जहाँ से कच्चा माल तथा मजदूर आते थे।

(4) कारखानों की स्थापना- कलकत्ता, बम्बई तथा मद्रास में कारखानों की स्थापना करना भी आसान था। इसका कारण यह था कि कच्चा माल निर्यात के लिए इन शहरों में आता था तथा यहाँ सस्ता श्रम उपलब्ध था। 1850 के दशक के बाद भारतीय व्यापारियों और उद्यमियों ने बम्बई में सूती कपड़े की मिलें स्थापित कीं। कलकत्ता के बाहरी इलाके में यूरोपियन लोगों ने जूट मिलों की स्थापना की। परन्तु इन शहरों की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से फैक्टरी उत्पादन पर आधारित नहीं थी।

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(5) भारत का औद्योगिक देश न बन पाना 19वीं शताब्दी में भारत में केवल कानपुर तथा जमशेदपुर ही औद्योगिक शहर थे। कानपुर में चमड़े की चीजें तथा ऊनी और सूती कपड़े बनते थे, जबकि जमशेदपुर स्टील उत्पादन के लिए प्रसिद्ध था।
भारत कभी भी एक आधुनिक औद्योगिक देश नहीं बन पाया क्योंकि ब्रिटिश सरकार की पक्षपातपूर्ण नीति ने भारत के औद्योगिक विकास को कभी प्रोत्साहन नहीं दिया। यद्यपि कलकत्ता, बम्बई तथा मद्रास बड़े शहरों के रूप में तो विख्यात हुए, परन्तु इससे औपनिवेशिक भारत की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था में कोई क्रान्तिकारी वृद्धि नहीं हुई।

प्रश्न 2.
सन् 1800 के पश्चात् हमारे देश में शहरीकरण की गति धीमी रही। इसके लिए उत्तरदायी कारणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
शहरीकरण- ग्रामीण एवं कृषि करने वाले लोगों का गाँवों से शहरों की ओर अच्छे रोजगार अथवा काम की तलाश में पलायन करना या सामान्य गमनागमन शहरीकरण कहलाता है। यह कस्बों एवं शहरों में कुल जनसंख्या के बढ़ते हुए आनुपातिक सन्तुलन को भी इंगित करता है। कुल जनसंख्या में शहरी जनसंख्या के अनुपात से शहरीकरण के विकास की गति का मापन होता है 1800 ई. के पश्चात् हमारे देश में शहरीकरण की गति धीमी रही। सम्पूर्ण उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के पहले दो दशकों तक देश की कुल जनसंख्या में शहरी जनसंख्या का अनुपात लगभग स्थिर रहा। इसमें केवल 3 प्रतिशत को ही बढ़ोत्तरी हुई। सन् 1900 से 1940 के मध्य शहरी जनसंख्या 10 प्रतिशत बढ़कर 13 प्रतिशत हो गई।

शहरीकरण की गति के स्थिर रहने के पीछे निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे-
1. छोटे कस्बों के पास आर्थिक रूप से विकसित होने के पर्याप्त अवसर नहीं थे परन्तु दूसरी तरफ कलकत्ता, बम्बई और मद्रास का विस्तार तेजी से हुआ।
2. कलकता, अम्बई व मद्रास औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के केन्द्र होने के कारण भारतीय सूती कपड़े जैसे निर्यात होने वाले उत्पादों के संग्रहण केन्द्र थे। लेकिन इंग्लैण्ड में हुई औद्योगिक क्रान्ति के बाद इस प्रवाह की दिशा परिवर्तित हो गई। भारत से अब तैयार माल की अपेक्षा कच्चे माल का निर्यात होने लगा।

3. 1853 ई. में औपनिवेशिक सरकार ने भारत में रेलवे की शुरुआत की, इसने भारतीय शहरों को पूर्ण रूप से परिवर्तित कर दिया। प्रत्येक रेलवे स्टेशन कच्चे माल के संग्रह और आयातित वस्तुओं के वितरण का केन्द्र बन गया। उदाहरण के लिए गंगा के किनारे स्थित मिर्जापुर दक्कन से आने वाली कंपास एवं सूती वस्त्रों के संग्रह का केन्द्र था जो बम्बई तक जाने वाली रेलवे लाइन के निर्माण के पश्चात् अपनी पुरानी पहचान को खोने लगा था। भारत में रेलवे नेटवर्क के विस्तार के पश्चात् रेलवे वर्कशॉप्स और रेलवे कॉलोनियों की स्थापना होना भी प्रारम्भ हो गया। फलस्वरूप जमालपुर, बरेली व वाल्टेयर जैसे रेलवे नगरों का जन्म हुआ।

प्रश्न 3.
अंग्रेजों ने हिल स्टेशनों की स्थापना क्यों की थी?
अथवा
हिल स्टेशनों की अंग्रेजों के लिए क्या उपयोगिता थी?
उत्तर:
हिल स्टेशनों की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य हिल स्टेशनों की स्थापना और बसावट का सम्बन्ध सबसे पहले ब्रिटिश सेना की जरूरतों से था। सिमला (शिमला) की स्थापना गुरखा युद्ध (1815-16) के दौरान, माउंट आबू की स्थापना अंग्रेज-मराठा युद्ध (1818) के कारण की गई तथा दार्जिलिंग को 1835 में सिक्किम के राजाओं से छीना गया। ये हिल स्टेशन फौजियों को ठहराने, सरहद की चौकसी करने और दुश्मन के खिलाफ हमला बोलने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थान थे।

हिल स्टेशनों की उपयोगिता-यूरोपियनों के लिए हिल स्टेशन अग्रलिखित कारणों से उपयोगी थे-
(1) स्वास्थ्यवर्द्धक तथा ठण्डी जलवायु-भारतीय पहाड़ों की मृदु और ठण्डी जलवायु को फायदे की चीज माना जाता था, खासतौर से अंग्रेज गर्मियों के मौसम को बीमारी पैदा करने वाला मानते थे। उन्हें गर्मियों के कारण हैजा व मलेरिया की सबसे ज्यादा आशंका रहती थी।

(2) सेना की सुरक्षा – सेना की भारी भरकम मौजूदगी के कारण ये स्थान पहाड़ियों में एक छावनी के रूप में बदल गये। हिल स्टेशनों को सेनीटोरियम के रूप में भी विकसित किया गया, जहाँ सिपाही विश्राम करने व इलाज कराने के लिए जाते थे।

(3) यूरोप की जलवायु से मिलती-जुलती जलवायु हिल स्टेशनों की जलवायु यूरोप की ठण्डी जलवायु से मिलती-जुलती थी, इसलिए नए शासकों को वहाँ की जलवायु बहुत पसन्द थी 1864 में वायसराय जॉन लारेंस ने अधिकृत रूप से अपनी काउंसिल शिमला में स्थापित कर दी और इस प्रकार गर्मी में राजधानियाँ बदलने के सिलसिले पर रोक लगा दी। शिमला भारतीय सेना के कमाण्डर इन चीफ का भी अधिकृत आवास बन गया।

(4) अंग्रेजों व यूरोपियन के लिए आदर्श स्थान -हिल स्टेशन ऐसे अंग्रेजों व यूरोपियन के लिए भी आदर्श स्थान थे। अलग-अलग मकानों के बाद एक-दूसरे से सटे विला और बागों के बीच कॉटेज बनाए जाते थे। एंग्लिकन चर्च और शैक्षणिक संस्थान आंग्ल आदर्शों का प्रतिनिधित्व करते थे। सामाजिक दावत, चाय बैठक, पिकनिक, रात्रिभोज मेले, रेस और रंगमंच जैसी घटनाओं के रूप में यूरोपियों का सामाजिक जीवन भी एक खास किस्म का था।

(5) पर्वतीय सैरगाहें रेलवे के आने से पर्वतीय सैरगाहें बहुत तरह के लोगों की पहुँच में आ गई। उच्च व मध्यम वर्गीय लोग, महाराजा, वकील और व्यापारी सैर- सपाटे के लिए वहाँ जाने लये।

(6) औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के लिए महत्त्वपूर्ण हिल स्टेशन औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्त्वपूर्ण केन्द्र थे। पास के इलाकों में चाय और काफी के बागानों की स्थापना से मैदानी इलाकों से बड़ी संख्या में मजदूर वहाँ रोजगार हेतु आने लगे ।

प्रश्न 4.
कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) शहर के नगर नियोजन पर एक लघु निबन्ध लिखिए।
अथवा
कलकत्ता नगर के विकास में अंग्रेजों की भूमिका का वर्णन कीजिये।
अथवा
औपनिवेशिक काल में कलकत्ता में नगर नियोजन के इतिहास की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिये ।
उत्तर:
कलकत्ता में नगर नियोजन का विकास क्रम कलकत्ता में नगर नियोजन के विकास क्रम को अग्रलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है-
(1) फोर्ट विलियम और मैदान का निर्माण तथा मैदान के किनारे आवासीय इमारतें बनाना- कलकत्ता को- सुतानाती, कोलकाता और गोविन्दपुर- इन तीन गाँवों को मिलाकर बनाया गया था। कम्पनी ने गोविन्दपुर गाँव की जमीन को साफ करने के लिए वहाँ के व्यापारियों और बुनकरों को हटवा दिया। फोर्ट विलियम के इर्द-गिर्द एक विशाल खाली जगह छोड़ दी गई, जिसे स्थानीय लोग मैदान या ‘गारेर मठ’ कहने लगे।

(2) गवर्नमेंट हाउस का निर्माण- 1798 में गवर्नर जनरल लार्ड वेलेजली ने कलकत्ता में अपने लिए ‘गवर्नमेंट हाउस’ के नाम से एक महल बनवाया। यह इमारत अंग्रेजी सत्ता का प्रतीक थी।

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(3) जन स्वास्थ्य की दृष्टि से नगर नियोजन की आवश्यकता पर बल वेलेजली ने हिन्दुस्तानी आबादी वाले भीड़भाड़ भरे गन्दे तालाबों और निकासी की खस्ता हालत को देखते हुए यह माना कि ऐसी अस्वास्थ्यकर बस्तियों से बीमारियाँ फैलती हैं। फलतः वेलेजली ने 1803 में नगर नियोजन की आवश्यकता पर एक प्रशासकीय आदेश जारी किया। बहुत सारे बाजारों, घाटों, कब्रिस्तानों और चर्मशोधन इकाइयों को हटा दिया गया। इस प्रकार ‘जन-स्वास्थ्य’ शहरों की सफाई और नगर नियोजन परियोजनाओं का मुख्य विचार बन गया।

(4) लॉटरी कमेटी द्वारा नगर नियोजन कार्य को गति प्रदान करना – वेलेजली के जाने के बाद नगर नियोजन का काम सरकार की मदद से लॉटरी कमेटी ने जारी रखा। लॉटरी कमेटी ने शहर का एक नक्शा बनवाया, जिससे कलकत्ता की पूरी तस्वीर सामने आ सके। इसके अतिरिक्त कमेटी ने शहर के हिन्दुस्तानी हिस्से में सड़क निर्माण कराया, नदी किनारे से ‘अवैध कब्जे हटाये तथा बहुत सारी झोंपड़ियों को साफ कर दिया और गरीब लोगों को वहाँ से हटाकर कलकत्ता के बाहरी किनारे पर जगह दी गई।

(5) महामारी की आशंका से नगर नियोजन कार्य में तीव्र गति – अगले कुछ दशकों में प्लेग, हैजा आदि महामारियों की आशंका से नगर नियोजन की अवधारणा को बल मिला। कलकत्ता को और अधिक स्वास्थ्यकर बनाने के लिए कामकाजी लोगों की झोंपड़ियों या बस्तियों को तेजी से हटाया गया और यहाँ के गरीब मजदूर वाशिंदों को पुनः दूर वाले इलाकों में ढकेल दिया गया। फूँस की झोंपड़ियों को अवैध घोषित कर दिया गया।

(6) नगर नियोजन के सारे आयामों को सरकार द्वारा अपने हाथ में लेना 19वीं सदी में और ज्यादा तेजी से झुग्गियों को हटाया गया तथा दूसरे इलाकों की कीमत पर ब्रिटिश आबादी वाले हिस्सों को तेजी से विकसित किया गया।

(7) ह्वाइट और ब्लैक टाउन वाले नस्ली विभाजन को बढ़ावा-‘ स्वास्थ्यकर’ और ‘अस्वास्थ्यकर’ के नये विभेद के सहारे ‘डाइट’ और ‘ब्लैक’ टाउन वाले नस्ली विभाजन को और बल मिला तथा शहर के यूरोपीय आबादी वाले इलाकों के विकास पर आवश्यकता से अधिक ध्यान दिया गया।

प्रश्न 5.
तर्क सहित सिद्ध कीजिए कि औपनिवेशिक शहरों का सामाजिक जीवन वर्तमान शहरों में भी दिखाई पड़ता है।
उत्तर:
औपनिवेशिक शहरों का सामाजिक जीवन वर्तमान शहरों में भी दिखाई देता है। इस बात के समर्थन में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत हैं-
(i) वर्गभेद – औपनिवेशिक शहरों में वर्गभेद स्पष्ट दिखाई देता था। एक ओर व्हाइट टाउन थे जहाँ गोरे लोग ही रह सकते थे दूसरी ओर ब्लैक टाउन में मात्र भारतीय ही रहते थे। व्हाइट टाउन में समस्त सुविधाएँ थीं, वहीं ब्लैक टाउन आवश्यक सुविधाओं एवं स्वच्छता से विहीन थे। यही स्थिति वर्तमान शहरों में देखने को मिल रही है। धनवान लोगों की कालोनियों में पर्याप्त नागरिक सुविधाएँ व स्वच्छता देखने को मिलती है।

(ii) यातायात के साधनों का विकास औपनिवेशिक शहरों में यातायात के साधनों का पर्याप्त विकास हुआ जिस कारण लोग शहर के केन्द्र से दूर जाकर भी बस सकते थे। वर्तमान शहरों में भी यही स्थिति देखने को मिलती है। लोग यातायात के साधनों के विकास के कारण शहर के केन्द्र से दूर जाकर बस रहे हैं।

(ii) मनोरंजन तथा मिलने-जुलने के नये सार्वजनिक स्थल औपनिवेशिक शहरों की तरह वर्तमान शहरों में टाउन हॉल सार्वजनिक पार्क, रंगशाला एवं सिनेमा हॉल जैसे सार्वजनिक स्थानों का निर्माण हुआ है, जिससे शहरों में लोगों को मिलने-जुलने तथा मनोरंजन के नये अवसर मिलने लगे हैं। शहरों में नये सामाजिक समूह बने हैं।

(iv) मध्यम वर्ग का विस्तार औपनिवेशिक शहरों की तरह वर्तमान में सभी वर्गों के लोग शहरों में आने लगे हैं। क्लकों, शिक्षकों, वकीलों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, एकाउण्टेन्ट्स की माँग बढ़ने लगी है परिणामस्वरूप मध्यम वर्ग बढ़ता जा रहा है। उनके पास स्कूल, कॉलेज तथा लाइब्रेरी जैसे नये शिक्षा केन्द्रों तक अच्छी पहुँच है।

(v) महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन औपनिवेशिक शहरों में महिलाओं के लिए नये अवसर थे। वर्तमान शहरों में भी महिलाओं के लिए नये अवसर मौजूद हैं। आज महिलाएँ घर की चारदीवारी से निकलकर समाचार पत्र, पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों के द्वारा स्वयं को अभिव्यक्त कर रही हैं।

(vi) मेहनतकश, गरीबों अथवा कामगारों में वृद्धि- औपनिवेशिक शहरों की तरह वर्तमान शहरों में भी ग्रामीण क्षेत्रों से लोग रोजगार की तलाश में लगातार शहरों की ओर आ रहे हैं।

प्रश्न 6.
मद्रास शहर के नगर नियोजन की विवेचना कीजिए।
अथवा
मद्रास में बसावट और पृथक्करण पर एक लघु निबन्ध लिखिए।
उत्तर:
स्थापना- अंग्रेज व्यापारियों ने 1639 में एक व्यापारिक चौकी मद्रासपट्म में स्थापित की फ्रेंच इंस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ प्रतिद्वंद्विता के कारण (1746- 63) अंग्रेजों को मद्रास की किलेबन्दी करनी पड़ी।
(1 ) फोर्ट सेंट जार्ज एवं हाइट टाउन का निर्माण- अंग्रेजों ने मद्रास में अपना किला बनाया जो ‘फोर्ट सेन्ट जार्ज’ कहलाता था। इसमें ज्यादातर यूरोपीय रहते थे। मद्रास शहर का विकास शहर में रहने वाले थोड़े से गोरों की जरूरतों और सुविधाओं के हिसाब से किया जा रहा।

(2) ब्लैक टाउन का विकास ब्लैक टाउन को किले के बाहर बसाया गया। इस आबादी को भी सीधी कतारों में बसाया गया जो कि औपनिवेशिक नगरों की खास विशेषता थी नये ब्लैक टाउन में बुनकरों, कारीगरों, बिचौलियों और दुभाषियों को बसाया गया, जो कम्पनी के व्यापार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। वहाँ मन्दिर और बाजार के आसपास रिहायशी मकान बनाए गए। आड़ी-टेढ़ी गलियों में अलग- अलग जातियों के मोहल्ले थे। चिन्ताद्रीपेठ इलाका केवल बुनकरों के लिए था। वाशरमेन पेठ में रंगसाज और धोबी रहते थे। दुबाश एजेन्ट और व्यापारी के रूप में कार्य करते थे, इसमें सम्पन्न लोग थे। ये लोग भारतीयों एवं यूरोपियनों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे।

(3) स्थानीय वाशिंदे व नौकरी-शुरू में कम्पनी में कार्य करने वालों में लगभग सारे वेल्लालार होते थे। वह एक स्थानीय ग्रामीण जाति थी। ब्राह्मण भी इसी तरह के पदों के लिए जोर लगाने लगे। तेलुगू कोमाटी समुदाय एक शक्तिशाली व्यावसायिक समूह था पेरियार और बनियार गरीब कामगार वर्ग था माइलापुर और ट्रिप्लीकेन हिन्दू धार्मिक केन्द्र थे ट्रिप्लीकेन में बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी रहती थी सानधोम और वहाँ का चर्च रोमन कैथोलिक समुदाय का केन्द्र था।

(4) यूरोपीय लोगों द्वारा गार्डन हाउसेज का निर्माण- जैसे-जैसे अंग्रेजी सत्ता मजबूत होती गई, यूरोपीय निवासी किले के बाहर जाकर गार्डन हाउसेज का निर्माण करने लगे।

(5) सम्पन्न भारतीयों द्वारा उपशेहरी इलाकों का निर्माण धीरे-धीरे सम्पन्न भारतीय भी अंग्रेजों की तरह रहने लगे थे। परिणामस्वरूप मद्रास के इर्द-गिर्द स्थित गाँवों की जगह बहुत सारे नये उपशहरी इलाकों ने ले ली।

(6) गरीब लोगों का काम के नजदीक वाले गाँवों में निवास- गरीब लोग अपने काम की जगह से नजदीक पड़ने वाले गाँवों में बस गये। बढ़ते शहरीकरण के कारण इन गाँवों के बीच वाले इलाके शहर के भीतर आ गए। इस तरह मद्रास एक अर्द्धग्रामीण-सा शहर दिखने लगा।

प्रश्न 7.
बम्बई एक आधुनिक नगर और भारत की वाणिज्यिक राजधानी कैसे बना? इस पर प्रकाश डालिए।
अथवा
बम्बई शहर के नगर नियोजन की विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
अथवा
मुम्बई का उदाहरण देते हुए स्पष्ट कीजिये कि अंग्रेजों ने नगर नियोजन के माध्यम से अपने औपनिवेशिक सपने को कैसे पूरा किया?
अथवा
बम्बई नगर नियोजन तथा भवन निर्माण के मुख्य चरणों की व्याख्या कीजिये मुख्य रूप से नवशास्त्रीय ( नियोक्लासिकल) शैली में बनी इमारतों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
प्रारम्भ में बम्बई सात टापुओं का इलाका था। जैसे-जैसे आबादी बढ़ी, इन टापुओं को एक-दूसरे से जोड़ दिया गया और इन टापुओं के जुड़ने पर एक विशाल शहर अस्तित्व में आया।

(1) औपनिवेशिक भारत की वाणिज्यिक राजधानी अम्बई औपनिवेशिक भारत की वाणिज्यिक राजधानी थी। पश्चिमी तट पर एक प्रमुख बन्दरगाह होने के नाते यह अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का केन्द्र था। 19वीं सदी के अन्त तक भारत का आधा आयात-निर्यात बम्बई से ही होता था। इस व्यापार की एक महत्त्वपूर्ण वस्तु अफीम थी। अफीम के व्यापार में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ भारतीय व्यापारी और बिचौलियों की भी प्रमुख भूमिका थी। इससे भारतीय पूँजीपति वर्ग का विकास हुआ। बाद में अमेरिकी गृहयुद्ध के कारण भारतीय कपास की बढ़ती माँग और बढ़ती कीमतों तथा स्वेज नहर के खुलने से बम्बई का वाणिज्यिक विकास हुआ और बम्बई को भारत का ‘सरताज शहर’ घोषित किया गया।

(2) विशाल इमारतें तथा उनका स्थापत्य अंग्रेजों ने अनेक भव्य और विशाल इमारतों का निर्माण कराया। इनकी स्थापत्य शैली यूरोपीय शैली पर आधारित थी। धीरे-धीरे भारतीयों ने भी यूरोपीय स्थापत्य शैली को अपना लिया। अंग्रेजों ने अनेक बंगले बनवाये।
(i) अंग्रेजों ने नव-गॉथिक शैली में इमारतों का निर्माण कराया। विक्टोरिया टर्मिनस रेलवे स्टेशन इस शैलीका बेहतरीन उदाहरण है। इसके अतिरिक्त बम्बई विश्वविद्यालय, सचिवालय और उच्च न्यायालय जैसी भव्य इमारतों का निर्माण कराया गया।
(ii) नवशास्त्रीय शैली में ‘एल्फिंस्टन सर्कल’ का निर्माण किया गया।
(iii) बीसवीं सदी के प्रारम्भ में भारतीय और यूरोपीय 4 शैली को मिलाकर एक नयी शैली का विकास हुआ जो ‘इण्डोसारसेनिक’ कहलाती थी यह शैली गुम्बदों, छतरियों, जालियों और मेहराबों से प्रभावित थी गुजराती शैली में बने गेट वे ऑफ इण्डिया तथा होटल ताज प्रमुख इमारतें हैं।

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(3) चाल – बम्बई शहर में जगह की कमी तथा भीड़-भाड़ की वजह से विशेष प्रकार की इमारतें भी बनाई गई, जिन्हें ‘चाल’ कहा जाता था। ये बहुमंजिला इमारतें होती थीं, जिनमें एक-एक कमरेवाली आवासीय इकाइयाँ बनाई जाती थीं।

प्रश्न 8.
औपनिवेशिक काल में भारत में सार्वजनिक भवनों के निर्माण के लिए कौन-कौनसी स्थापत्य शैलियों का प्रयोग किया गया?
अथवा
ब्रिटिश काल में इण्डो-सारसेनिक स्थापत्य कला की दो विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:
सार्वजनिक भवनों के लिए स्थापत्य शैलियाँ औपनिवेशिक काल में सार्वजनिक भवनों के लिए मोटे तौर पर तीन स्थापत्य शैलियों का प्रयोग किया गया।
(1) नवशास्त्रीय या नियोक्लासिकल शैली-बड़े- बड़े स्तम्भों के पीछे रेखागणितीय संरचनाओं का निर्माण इस शैली की विशेषता थी। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के लिए उसे खासतौर से अनुकूल माना जाता था। अंग्रेजों को लगता था कि जिस शैली में शाही रोम की भव्यता दिखाई देती थी, उसे शाही भारत के वैभव की अभिव्यक्ति के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है क्योंकि यह शैली मूल रूप से प्राचीन रोम की भवन निर्माण शैली से निकली थी और इसे यूरोपीय पुनर्जागरण के दौरान पुनर्जीवित, संशोधित और लोकप्रिय किया गया था।

इस स्थापत्य शैली के भूमध्यसागरीय उद्गम के कारण उसे उष्णकटिबंधीय मौसम के अनुकूल भी माना गया। 1833 में बम्बई का ‘टाउन हॉल’ इसी शैली के अनुसार बनाया गया था। 1860 में व्यावसायिक इमारतों के समूह को ‘एल्फिंस्टन सर्कल’ कहा जाता था। यह इमारत इटली की इमारतों से प्रेरित थी। इसमें पहली मंजिल पर ढँके हुए तोरण पथ का रचनात्मक ढंग से इस्तेमाल किया गया। दुकानदारों व पैदल चलने वालों को तेज धूप और बरसात से बचाने के लिए यह सुधार काफी उपयोगी था ।

(2) नव-गॉथिक शैली- एक अन्य स्थापत्य शैली जिसका काफी प्रयोग किया गया, वह थी- नव- गाँधिक शैली ऊँची उठी हुई छरों, नोकदार मेहराबें और बारीक साज-सज्जा इस शैली की खासियत थी। इस शैली की इमारतों का जन्म गिरजाघरों से हुआ था, जो मध्यकाल में यूरोप में काफी बनाए गए थे। 19वीं सदी के मध्य इंग्लैण्ड में इसे दुबारा अपनाया गया बम्बई सचिवालय, बम्बई विश्वविद्यालय और उच्च न्यायालय की इमारतें इसी शैली में बनाई गई नव-गॉथिक शैली का सबसे बेहतरीन उदाहरण ‘विक्टोरिया टर्मिनस’ है, जो ग्रेट इंडियन पेनिन्स्युलर रेलवे कम्पनी का स्टेशन और मुख्यालय हुआ करता था।

(3) इंडो-सारासेनिक शैली 20वीं सदी के प्रारम्भ में एक नयी मिश्रित स्थापत्य शैली विकसित हुई, जिसमें भारतीय और यूरोपीय, दोनों तरह की शैलियों के तत्व थे। इस शैली को ‘इंडो-सारासेनिक शैली’ का नाम दिया गया था। 1911 में बना ‘गेट वे ऑफ इण्डिया’ परम्परागत गुजराती शैली का प्रसिद्ध उदाहरण था उद्योगपति जमशेदजी टाटा ने इसी शैली में ‘ताजमहल होटल’ बनवाया था। बम्बई के ज्यादातर ‘भारतीय’ इलाकों में सजावट एवं भवन निर्माण और साज-सज्जा में इसी शैली का बोलबाला था।

प्रश्न 9.
औपनिवेशिक भारत की स्थापत्य शैलियों से किन तथ्यों के बारे में जानकारी मिलती है?
उत्तर:
औपनिवेशिक भारत की स्थापत्य शैलियों से विभिन्न तथ्यों की जानकारी
औपनिवेशिक भारत की स्थापत्य शैलियों से निम्नलिखित तथ्यों के बारे में जानकारी मिलती है-
(1) सौन्दर्यात्मक आदर्शों एवं उनमें निहित विविधताओं का बोध होना स्थापत्य शैलियों से अपने समय के सौन्दर्यात्मक आदर्शों और उनमें निहित विविधताओं का पता चलता है।

(2) भवन-निर्माताओं के दृष्टिकोण की प्रतीक ये इमारतें उन लोगों की सोच और दृष्टिकोण के बारे में भी बताती हैं, जो उन्हें बना रहे थे इमारतों के जरिये शासक अपनी ताकत का इजहार करना चाहते थे तथा इन इमारतों से उस समय की सत्ता को किस रूप में देखा जा रहा था, इसका भी ज्ञान होता है। इस प्रकार एक विशिष्ट युग की स्थापत्य शैली को देखकर हम यह समझ सकते हैं कि उस समय सत्ता को किस तरह देखा जा रहा था।

(3) प्रचलित रुचियों की जानकारी एवं नवीन शैलियों को लोकप्रियता प्रदान करना- स्थापत्य शैलियों से प्रचलित रुचियों का तो पता लगता ही है, साथ ही संजीव पास बुक्स यह भी पता लगता है कि इन शैलियों ने उन रुचियों को बदलने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है तथा संस्कृति की रूपरेखा तय की है, जैसे बहुत सारे भारतीय भी यूरोपीय स्थापत्य शैलियों को आधुनिकता व सभ्यता का प्रतीक मानते हुए उन्हें अपनाने लगे थे तथा बहुतों ने उनके आधुनिक तत्वों को स्थानीय परम्पराओं के तत्वों में समाहित कर दिया। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त से हमें औपनिवेशिक आदर्शों से भिन्न क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय अभिरुचियों को परिभाषित करने के प्रयास दिखाई देते हैं। इस तरह स्थापत्य शैलियों को देखकर हम इस बात को भी समझ सकते हैं कि शाही और राष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय के बीच सांस्कृतिक टकराव और राजनीतिक खींचतान किस तरह शक्ल ले रही थी।

प्रश्न 10.
औपनिवेशिक शासन किस प्रकार बेहिसाब आँकड़ों और जानकारियों के संग्रह पर आधारित था?
अथवा
औपनिवेशिक शहरों के अध्ययन में सहायक तत्त्वों की विवेचना कीजिये।
उत्तर:
औपनिवेशिक शासन में संग्रहित आँकड़े व जानकारियाँ ( औपनिवेशिक शहरों के अध्ययन में सहायक तत्त्व )
औपनिवेशिक शासन बेहिसाब आँकड़ों और जानकारियों के संग्रह पर आधारित था। यथा-
(1) व्यापारिक गतिविधियों का विस्तृत ब्यौरा रखना-अंग्रेजों ने अपने व्यावसायिक मामलों को चलाने के लिए व्यापारिक गतिविधियों का विस्तृत ब्यौरा रखा था। (2) शहरों का नियमित सर्वेक्षण तथा उनके सांख्यिकीय आँकड़े एकत्रित करना – वे बढ़ते शहरों में जीवन की गति और दिशा पर नजर रखने के लिए नियमित रूप से सर्वेक्षण करते थे। वे सांख्यिकीय आँकड़े इकट्ठा करते थे और विभिन्न प्रकार की सरकारी रिपोर्ट प्रकाशित करते थे।

(3) मानचित्र तैयार करना- प्रारम्भिक वर्षों में ही औपनिवेशिक सरकार ने मानचित्र तैयार करने पर ध्यान दिया। उसका मानना था कि किसी जगह की बनावट और भू-दृश्य को समझने के लिए नक्शे जरूरी होते हैं। इस जानकारी के सहारे वे इलाके पर ज्यादा बेहतर नियंत्रण कायम कर सकते थे। जब शहर बढ़ने लगे तो न केवल उनकी विकास की योजना तैयार करने के लिए बल्कि व्यवसाय को विकसित करने और अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिए भी नक्शे बनाये जाने लगे। शहरों के नक्शों से हमें उस स्थान पर पहाड़ियों, नदियों व हरियाली का पता चलता है। ये सारी चीजें रक्षा सम्बन्धी उद्देश्यों के लिए योजना तैयार करने में बहुत काम आती हैं। इसके अतिरिक्त पाटों की जगहों, मकानों की समनता तथा गुणवत्ता तथा सड़कों की स्थिति आदि से इलाके की व्यावसायिक सम्भावनाओं का पता लगाने और कराधान की रणनीति बनाने में मदद मिलती थी।

(4) नगर निगमों की गतिविधियों से उत्पन्न रिकाईस – 19वीं सदी में शहरों के रख-रखाव के लिए पैसा इकट्ठा करने के लिए आंशिक लोक प्रतिनिधित्व से लैस नगर निगम जैसी संस्था की स्थापना की गई। नगर- निगमों की गतिविधियों से नए तरह के रिकार्ड्स पैदा हुए, जिन्हें नगरपालिका रिकार्ड रूम में सम्भाल कर रखा जाने
लगा।

(5) जनगणना आँकड़े शहरों के फैलाव पर नजर रखने के लिए नियमित रूप से लोगों की गिनती की जाती थी। 19वीं सदी के मध्य तक विभिन्न क्षेत्रों में कई जगह स्थानीय स्तर पर जनगणना की जा चुकी थी। अखिल भारतीय जनगणना का पहला प्रयास 1872 में किया गया। इसके बाद, 1881 से हर दस साल में जनगणना एक नियमित व्यवस्था बन गई। भारत में शहरीकरण का अध्ययन करने के लिए जनगणना से निकले आँकड़े एक बहुमूल्य स्रोत हैं। इस प्रकार जनगणना, नगरपालिका जैसे संस्थानों के सर्वेक्षण, मानचित्रों और अन्य रिकार्डों के सहारे औपनिवेशिक शहरों का पुराने शहरों के मुकाबले ज्यादा विस्तार से अध्ययन किया जा सकता है।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

प्रश्न 11.
औपनिवेशिक काल में भारत में जनगणना की प्रक्रिया में क्या भ्रम थे? जनगणनाओं के सावधानी से अध्ययन करने पर क्या दिलचस्प रुझान सामने आते हैं? उत्तर- औपनिवेशिक भारत में जनगणना से सम्बन्धित भ्रम यद्यपि भारत में शहरीकरण का अध्ययन करने के लिए जनगणना से निकले आँकड़े एक बहुमूल्य स्रोत हैं, तथापि इस प्रक्रिया में भी कई भ्रम थे यथा-

(1) वर्गीकरण सम्बन्धी भ्रम- जनगणना आयुक्तों ने आबादी के विभिन्न तबकों का वर्गीकरण करने के लिए अलग-अलग श्रेणियाँ बना दी थीं। कई बार यह वर्गीकरण निहायत अतार्किक होता था और लोगों की परिवर्तनशील तथा परस्पर काटती पहचानों को पूरी तरह नहीं पकड़ पाता था।

(2) स्वयं लोगों द्वारा सहयोग न करना- प्राय: लोग स्वयं भी इस प्रक्रिया में सहयोग करने से इनकार कर देते थे या जनगणना आयुक्तों को गलत जवाब दे देते थे। काफी समय तक वे जनगणना कार्यों को सन्देह की दृष्टि से देखते रहे। उन्हें लगता था कि सरकार नये टैक्स लागू करने के लिए जाँच करवा रही है।

(3) औरतों के बारे में जानकारी देने में हिचकिचाना – ऊँची जाति के लोग अपने घर की औरतों के बारे में पूरी जानकारी देने से हिचकिचाते थे। महिलाओं से अपेक्षा की जाती थी कि वे घर के भीतरी हिस्से में दुनिया से कट कर रहें। उनके बारे में सार्वजनिक जाँच को सही नहीं माना जाता था।

(4) पहचान सम्बन्धी दावों का भ्रामक होना- जनगणना अधिकारियों ने यह भी पाया कि बहुत सारे लोग ऐसी पहचानों का दावा करते थे जो ऊँची हैसियत की मानी जाती थीं। उदाहरण के लिए, शहरों में ऐसे लोग भी थे जो फेरी लगाते थे या काम न होने पर मजदूरी करने लगते थे। इस तरह के बहुत सारे लोग जनगणना कर्मचारियों के सामने स्वयं को प्रायः व्यापारी बताते थे क्योंकि उन्हें मजदूर की तुलना में व्यापारी ज्यादा सम्मानप्रद लगता था।

(5) मृत्युदर और बीमारियों से सम्बन्धित आँकड़ों को इकट्ठा करना लगभग असम्भव था मृत्यु दर और बीमारियों से सम्बन्धित आंकड़ों को इकट्ठा करना भी लगभग असम्भव था। बीमार पड़ने की जानकारी भी लोग प्रायः नहीं देते थे। बहुत बार इलाज भी गैर लाइसेंसी डॉक्टरों से करा लिया जाता था। ऐसे में बीमारी या मौत की घटनाओं का सटीक हिसाब लगाना सम्भव नहीं था। जनगणनाओं का सावधानी से अध्ययन करने पर कुछ दिलचस्प रुझान जनगणनाओं का सावधानी से अध्ययन करने पर निम्नलिखित दिलचस्प रुझान सामने आते हैं-

(1) सन् 1800 के बाद हमारे देश में शहरीकरण की रफ्तार धीमी रही। पूरी 19वीं सदी और 20वीं सदी के पहले दो दशकों तक देश की कुल आबादी में शहरी आबादी का हिस्सा बहुत मामूली तथा स्थिर रहा। यह लगभग 10 प्रतिशत रहा।
(2) 1900 से 1940 के बीच 40 सालों के दरमियान शहरी आबादी 10 प्रतिशत से बढ़कर 13 प्रतिशत हो गई थी।
(3) नए व्यावसायिक एवं प्रशासनिक केन्द्रों के रूप में बम्बई, मद्रास और कलकत्ता शहर पनपे लेकिन दूसरे तत्कालीन शहर कमजोर भी हुए।

प्रश्न 5.
” भारत छोड़ो आन्दोलन ब्रिटिश शासन के खिलाफ गाँधीजी का तीसरा बड़ा आन्दोलन था।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
क्रिप्स मिशन की विफलता के पश्चात् महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपना तीसरा बड़ा आन्दोलन छेड़ने का फैसला किया। अगस्त, 1942 ई. में शुरू किए गए इस आन्दोलन को ‘अंग्रेज भारत छोड़ो’ के नाम से जाना गया। भारत छोड़ो आन्दोलन प्रारम्भ करने के कारण-
(i) अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीति- सितम्बर, 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ हो गया। महात्मा गाँधी व जवाहरलाल नेहरू दोनों ही हिटलर व नात्सियों के आलोचक थे। तदनुरूप उन्होंने फैसला किया कि यदि अंग्रेज बुद्ध समाप्त होने के पश्चात् भारत को स्वतन्त्रता देने पर सहमत हों तो कांग्रेस उनके युद्ध प्रयासों में सहायता दे सकती है। ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इस घटनाक्रम ने अंग्रेजी साम्राज्यवादी नीति के विरुद्ध आन्दोलन प्रारम्भ करने हेतु प्रोत्साहित किया।

(ii) क्रिप्स मिशन की असफलता द्वितीय विश्व युद्ध में कांग्रेस व गाँधीजी का समर्थन प्राप्त करने के लिए तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमन्त्री विंस्टन चर्चिल ने अपने एक मन्त्री सर स्टेफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। क्रिप्स के साथ वार्ता में कांग्रेस ने इस बात पर जोर दिया कि यदि धुरी शक्तियों से भारत की रक्षा के लिए ब्रिटिश शासन कांग्रेस का समर्थन चाहता है तो वायसराय को सबसे पहले अपनी कार्यकारी परिषद् में किसी भारतीय को एक रक्षा सदस्य के रूप में नियुक्त करना चाहिए। इसी बात पर वार्ता टूट गयी। क्रिप्स मिशन की विफलता के पश्चात् गाँधीजी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन प्रारम्भ करने का फैसला किया। भारत छोड़ो आन्दोलन का प्रारम्भ-9 अगस्त, 1942 ई. को गाँधीजी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आन्दोलन प्रारम्भ हो गया।

अंग्रेजों ने इस आन्दोलन को दबाने के लिए बड़ी कठोरता से काम लिया। कांग्रेस को अवैध घोषित कर दिया गया तथा सभाओं, जुलूसों व समाचार-पत्रों पर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिए गए। इसके बावजूद देशभर के युवा कार्यकर्ता हड़तालों एवं तोड़फोड़ की कार्यवाहियों के माध्यम से आन्दोलन चलाते रहे। कांग्रेस में जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी सदस्य भूमिगत होकर अपनी गतिविधियों को चलाते रहे। आन्दोलन का अन्त-अंग्रेजों ने भारत छोड़ो आन्दोलन के प्रति कठोर रवैया अपनाया फिर भी इस विद्रोह का दमन करने में साल भर से अधिक समय लग गया।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 9 शासक और इतिवृत्त : मुगल दरबार

Jharkhand Board JAC Class 12 History Important Questions Chapter 9 शासक और इतिवृत्त : मुगल दरबार Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Important Questions Chapter 9 शासक और इतिवृत्त : मुगल दरबार

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

1. ‘मुगल’ की उत्पत्ति किस शब्द से हुई है –
(अ) महान
(स) मुसलमान
(ब) मंगोल
(द) मोगली
उत्तर:
(ब) मंगोल

2. किस मुगल सम्राट को शेरशाह से पराजित होकर ईरान भागना पड़ा?
(अ) बाबर
(ब) अकबर
(स) हुमायूँ
(द) जहाँगीर
उत्तर:
(स) हुमायूँ

3. मुगल साम्राज्य का संस्थापक था –
(अ) बाबर
(ब) हुमायूँ
(स) अकबर
(द) जहाँगीर
उत्तर:
(अ) बाबर

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 9 शासक और इतिवृत्त : मुगल दरबार

4. मुगल राजवंश का अन्तिम सम्राट कौन था?
(अ) मुअज्जम
(ब) फर्रुखसियर
(स) शाह आलम
(द) बहादुरशाह जफर द्वितीय
उत्तर:
(द) बहादुरशाह जफर द्वितीय

5. महाभारत का फारसी में अनुवाद किसके रूप में हुआ –
(अ) अकबरनामा
(ब) शाहीनामा
(स) एमनामा
(द) बाबरनामा
उत्तर:
(स) एमनामा

6. फारसी के हिन्दवी के साथ पारस्परिक सम्पर्क से किस नई भाषा का जन्म हुआ?
(ब) उर्दू
(द) संस्कृत
(अ) अरबी
(स) तुर्की
उत्तर:
(ब) उर्दू

7. नस्तलिक शैली के सबसे अच्छे सुलेखकों में से एक था –
(अ) रजा खाँ
(ब) इब्राहीम खाँ
(स) मन्सूर अली
(द) मुहम्मद हुसैन
उत्तर:
(द) मुहम्मद हुसैन

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8. एशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल की स्थापना किसके द्वारा की गई?
(अ) जॉन मार्शल
(ब) मैकाले
(स) विलियम जोन्स
(द) कनिंघम
उत्तर:
(स) विलियम जोन्स

9. एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल की स्थापना की गई –
(अ) 1784 ई.
(ब) 1794 ई.
(स) 1884 ई.
(द) 1795 ई.
उत्तर:
(अ) 1784 ई.

10. अकबर ने जजिया कर कब समाप्त कर दिया?
(अ) 1573
(ब) 1564
(द) 1579
(स) 1604
उत्तर:
(ब) 1564

11. मुगल पितृ पक्ष से निम्न में से किस तुर्की शासक के वंशज थे?
(अ) तिमूर
(ब) चंगेज खाँ
(स) मंगोल
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(अ) तिमूर

12. रज्मनामा निम्नलिखित में से किस ग्रन्थ का फारसी अनुवाद है-
(अ) रामायण
(ब) लीलावती
(स) पंचतन्त्र
(द) महाभारत
उत्तर:
(द) महाभारत

13. नस्तलिक का सम्बन्ध निम्नलिखित में से किससे है?
(अ) एक ग्रन्थ
(ब) एक कविता
(स) सुलेखन शैली
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(स) सुलेखन शैली

14. निम्न में से किस मुगल दरबारी इतिहासकार ने चित्रकारी को एक जादुई कला के रूप में वर्णित किया है?
(अ) मुहम्मद हुसैन
(ब) अबुल फजल
(स) अब्दुल हमीद लाहौरी
(द) अब्दुल हसन
उत्तर:
(ब) अबुल फजल

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15. 1560 के दशक में अकबर ने किस इमारत का निर्माण करवाया?
(अ) आगरा का किला
(ब) ताजमहल
(स) फतेहप्हपुर सीकरी
(द) सिकन्दर
उत्तर:
(अ) आगरा का किला

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए :
1. जंगल बुक …………… द्वारा लिखी गई है जिससे युवा नायक …………….. का नाम व्युत्पन्न हुआ है।
2. हुमायूँ ने सूरों को …………… में पराजित किया था।
3. अकबर का उत्तराधिकारी …………….. हुआ।
4. …………… मुगल वंश का अन्तिम मुगल शासक था।
5. अकबर, शाहजहाँ आलमगीर की कहानियों पर आधारित इतिवृत्तों के शीर्षक क्रमशः ……………. और …………. है।
6. चगताई तुर्क स्वयं को …………….. के सबसे बड़े पुत्र का वंशज मानते थे।
उत्तर:
1. रुडयार्ड किपलिंग, मोगली
2. 1555
3. जहाँगीर
4. बहादुरशाह जफर द्वितीय
5. अकबरनामा, शाहजहाँनामा, आलमगीरनामा
6. चंगेज खाँ।

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मुगल शासकों में सबसे महान कौन था?
उत्तर:
मुगल शासकों में अकबर सबसे महान था।

प्रश्न 2.
‘सिजदा तथा जमींबोसी ‘ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
‘सिजदा’ का अर्थ बादशाह के सामने दंडवत लेटना तथा ‘जमींबोसी’ का अर्थ जमीन चूमना था।

प्रश्न 3.
कौन-सा किला सफावियों और मुगलों के बीच झगड़े का कारण रहा था?
उत्तर:
कन्धार का किला।

प्रश्न 4.
बादशाहनामा के दरबारी दृश्य में अंकित शान्तिपूर्वक चिपटकर बैठे हुए शेर एवं बकरी क्या संदेश देते हैं
उत्तर:
मुगल- राज्य में सबल तथा निर्बल परस्पर सद्भाव से रहते थे।

प्रश्न 5.
मुगल दरबार में प्रचलित अभिवादन के दो तरीकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) सिजदा अथवा दण्डवत लेटना
(2) जमीं बरेसी (जमीन चूमना)।

प्रश्न 6.
फतेहपुर सीकरी का बुलन्द दरवाजा क्यों और किसने बनवाया?
उत्तर:
गुजरात में मुगल विजय की बाद में अकबर ने बुलन्द दरवाजा बनवाया।

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प्रश्न 7.
मुगलकाल में पांडुलिपि रचना का मुख्य केन्द्र क्या कहलाता था?
उत्तर:
शाही किताबखाना।

प्रश्न 8.
‘मुगल’ नाम किस शब्द से व्युत्पन्न हुआ है?
उत्तर:
मंगोल।

प्रश्न 9.
मुगल किस मूल के वंशज थे और उनकी मातृ भाषा क्या थी?
उत्तर:
(1) चगताई तुर्क
(2) तुर्की भाषा।

प्रश्न 10.
मुगल शासक अपने को तैमूरी क्यों कहते थी?
उत्तर:
क्योंकि पितृ पक्ष से वे वंशज थे। तुर्की शासक तिमूर के

प्रश्न 11.
बावर मातृपक्ष से किसका सम्बन्धी था?
उत्तर:
चंगेज खाँ का।

प्रश्न 12.
मुगल साम्राज्य का संस्थापक कौन था?
उत्तर:
जहीरुद्दीन बाबर।

प्रश्न 13.
अकबर के तीन योग्य उत्तराधिकारियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) जहाँगीर
(2) शाहजहाँ
(3) औरंगजेब।

प्रश्न 14.
अकबर, शाहजहाँ, आलमगीर (औरंगजेब ) की कहानियों पर आधारित इतिवृत्तों के शीर्षक बताइये।
उत्तर:
(1) अकबरनामा
(2) शाहजहाँनामा
(3) आलमगीरनामा।

प्रश्न 15.
संस्कृत के दो ग्रन्थों के नाम लिखिए जिनका फारसी में अनुवाद करवाया गया।
उत्तर:
(1) रामायण
(2) महाभारत

प्रश्न 16.
चुगताई तुर्क कौन थे?
उत्तर:
मुगल

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प्रश्न 17.
अकबर की पसंदीदा सुलेखन शैली कौनसी
उत्तर:
नस्तलिक।

प्रश्न 18.
अबुल फसल के अनुसार चित्रकारी का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
चित्रकारी निर्जीव वस्तुओं में भी प्राण फूंक सकती थी।

प्रश्न 19.
ईरान से मुगल दरबार में आने वाले दो प्रसिद्ध चित्रकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) मीर सैय्यद अली
(2) अब्दुस समद।

प्रश्न 20.
दो महत्त्वपूर्ण चित्रित मुगल इतिहासों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) अकबरनामा
(2) बादशाहनामा।

प्रश्न 21.
एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल की स्थापना का क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
भारतीय पांडुलिपियों का सम्पादन, प्रकाशन और अनुवाद करना।

प्रश्न 22.
अबुल फसल के अनुसार बादशाह अपनी प्रजा के किन-किन सत्वों की रक्षा करते थे?
उत्तर:
मुगल सम्राट अपनी प्रजा के निम्न सत्त्वों की रक्षा करते थे-
(1) जीवन (जन),
(2) धन (माल),
(3) सम्मान (नामस)
(4) विश्वास (दीन)।

प्रश्न 23.
इन सवों की रक्षा के बदले में बादशाह अपनी प्रजा से क्या माँग करता था?
उत्तर:
(1) आज्ञापालन
(2) संसाधनों में हिस्से की

प्रश्न 24.
जजिया क्या था?
उत्तर:
जजिया एक कर था, जो गैर-मुसलमानों पर लगाया जाता था।

प्रश्न 25.
अकबर ने फतेहपुर सीकरी से राजधानी को कहाँ स्थानान्तरित किया और कब?
उत्तर:
1585 में अकबर ने राजधानी को लाहौर स्थानान्तरित किया।

प्रश्न 26.
मुगलकाल में दरबारियों के द्वारा बादशाह के अभिवादन के उच्चतम तरीके क्या थे?
उत्तर:
(1) सिजदा अथवा दण्डवत् लेटना
(2) चार तस्लीम
(3) जर्मी बोसी (जमीन चूमना )।

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प्रश्न 27.
मुगल दरबार को किन चार अवसरों पर खूब सजाया जाता था?
उत्तर:
(1) सिंहासनारोहण की वर्षगांठ
(2) ईद
(3) शबे बरात
(4) होली। प्रश्न

प्रश्न 28.
औरंगजेब ने जयसिंह तथा जसवन्त सिंह
को किसकी पदवी प्रदान की थी?
उत्तर:
मिर्जा राजा।

प्रश्न 29.
मुगल सम्राट द्वारा दिए जाने वाले उपहारों (पुरस्कारों) का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) सम्मान का जामा (खिल्लत)
(2) सरप्या
(3) रत्नजड़ित आभूषण।

प्रश्न 30.
शाहजहाँ की कौनसी पुत्रियों को ऊंचे शाही मनसबदारों के समान वार्षिक आय होती थी?
उत्तर-
(1) जहाँआरा
(2) रोशनआरा।

प्रश्न 31.
मुगल साम्राज्य के आरम्भ से ही कौन से अभिजात अकबर की शाही सेवा में उपस्थित थे?
उत्तर:
तूरानी और ईरानी अभिजात।

प्रश्न 32.
मुगलकाल में सभी सरकारी अधिकारियों के दर्जे और पदों में दो प्रकार के संख्या-विषयक पद कौनसे होते थे?
उत्तर:
(1) जात
(2) सवार

प्रश्न 33.
केन्द्रीय सरकार के दो महत्त्वपूर्ण मंत्रियों के नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) दीवाने आला (वित्तमंत्री)
(2) सद्र- उस- सुदूर (मदद-ए-माशा अथवा अनुदान का मन्त्री)

प्रश्न 34.
मुगलकाल में प्रान्तीय शासन के तीन प्रमुख अधिकारियों के नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) दीवान
(2) बख्शी
(3) सूबेदार।

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प्रश्न 35.
मुगलकालीन परगनों के तीन अधिकारियों के नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) कानूनगो (राजस्व आलेख का रखवाला)
(2) चौधरी (राजस्व संग्रह का प्रभारी)
(3) काजी।

प्रश्न 36.
ईरानी सेना ने मुगलों के किस दुर्ग पर और कब अधिकार किया?
उत्तर:
1622 में कन्धार के दुर्ग पर

प्रश्न 37.
पहला जेसुइट शिष्टमण्डल फतेहपुर सीकरी के मुगल दरबार में कब पहुँचा?
उत्तर:
1580 ई. में

प्रश्न 38.
अकबर ने इबादतखाने का निर्माण कहाँ करवाया था?
उत्तर:
फतेहपुरी सीकरी में।

प्रश्न 39.
मुन्तखाब उत तवारीख’ की रचना किसने की थी?
उत्तर:
अब्दुल कादिर बदायूँनी ने

प्रश्न 40.
अकबर द्वारा निर्मित बुलन्द दरवाजा कहाँ स्थित है?
उत्तर:
फतेहपुर सीकरी में।

प्रश्न 41.
फतेहपुर सीकरी में शेख सलीम चिश्ती का मकबरा किस मुगल सम्राट ने बनवाया था?
उत्तर:
अकबर ने।

प्रश्न 42
आलमगीर की पदवी किसने धारण की
उत्तर:
औरंगजेब।

प्रश्न 43.
फारसी के हिन्दवी के साथ पारस्परिक सम्पर्क से किस भाषा की उत्पत्ति हुई?
उत्तर:
उर्दू।

प्रश्न 44.
‘बाबरनामा’ क्या है?
उत्तर:
‘बाबरनामा’ में बाबर के संस्मरण संकलित हैं।

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प्रश्न 45.
फारसी को मुगल दरबार की भाषा बनाने वाला सम्राट कौन था?
उत्तर:
अकबर।

प्रश्न 46.
अकबर के शासनकाल में ‘महाभारत’ का -फारसी में किस नाम से अनुवाद हुआ?
उत्तर:
‘रक्मनामा’।

प्रश्न 47.
अबुल फजल ने चित्रकारी को किसकी संज्ञा दी है?
था।
उत्तर:
‘जादुई कला’ की।

प्रश्न 48.
बिहजाद कौन था?
उत्तर:
बिहजाद मुगलकाल का एक प्रसिद्ध चित्रकार

प्रश्न 49.
अकबर ने धार्मिक क्षेत्र में कौनसी नीति अपनाई थी?
उत्तर:
सुलह-ए-कुल।

प्रश्न 50.
‘सुलह-ए-कुल’ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
पूर्ण शान्ति।

प्रश्न 51.
अकबर के पश्चात् किस मुगल सम्राट ने हिन्दुओं पर जजिया कर पुनः लगा दिया?
उत्तर:
औरंगजेब ने।

प्रश्न 52.
पीड़ित लोगों को निष्पक्षतापूर्वक न्याय दिलाने के लिए अपने महल में न्याय की जंजीर लगाने वाला मुगल सम्राट कौन था?
उत्तर:
जहाँगीर।

प्रश्न 53.
झरोखा दर्शन की प्रथा किस मुगल सम्राट ने शुरू की थी?
उत्तर:
अकबर ने

प्रश्न 54.
कोर्निश का क्या अर्थ है?
उत्तर:
कोर्निश दरबार में औपचारिक अभिवादन का एक तरीका था।

प्रश्न 55.
शाहजहाँ ने कब और किसे अपनी राजधानी बनाया?
उत्तर:
1648 में शाहजहाँ ने शाहजहाँनाबाद को अपनी राजधानी बनाया।

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प्रश्न 56.
शाहजहाँ द्वारा निर्मित तीन इमारतों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) लाल किला (दिल्ली)
(2) जामा मस्जिद (दिल्ली)
(3) ताजमहल (आगरा)।

प्रश्न 57.
हरम शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
‘पवित्र स्थान’ मुगलों का अन्तःपुर हरम कहलाता था।

प्रश्न 58.
मुगल परिवार में ‘अगाचा’ कौन होती थीं?
उत्तर:
मुगल सम्राटों की उप-पत्नियाँ।

प्रश्न 59.
‘हुमायूँनामा’ की रचना किसने की थी?
उत्तर:
गुलबदन ने।

प्रश्न 60.
अकबर की शाही सेवा में नियुक्त होने वाला प्रथम व्यक्ति कौनसा राजपूत मुखिया था?
उत्तर:
भारमल कछवाहा।

प्रश्न 61.
अकबर के साथ सर्वप्रथम किस राजपूत नरेश ने अपनी पुत्री का विवाह किया था?
उत्तर:
आम्बेर के राजा भारमल कछवाहा ने।

प्रश्न 62.
टोडरमल कौन था?
उत्तर:
टोडरमल अकबर का वित्तमन्त्री था

प्रश्न 63.
मीरबख्शी कौन था?
उत्तर:
यह सैन्य विभाग का मन्त्री था।

प्रश्न 64.
मुगलों के केन्द्रीय शासन के दो प्रमुख मन्त्रियों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
(1) दीवान-ए-आला
(2) सद्र-उस- सुदूर

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प्रश्न 65.
मुगलकाल में प्रान्त का प्रमुख क्या कहलाता
उत्तर:
सूबेदार

प्रश्न 66.
मुगल काल में प्रत्येक सूबा किनमें विभाजित
उत्तर:
सरकारों में।

प्रश्न 67.
अकबर ने कन्धार के दुर्ग पर कब अधिकार स्थापित किया था?
उत्तर:
1595 ई. में

प्रश्न 68.
ईरानियों और मुगलों के बीच विवाद का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर:
कन्धार पर अधिकार करना।

प्रश्न 69.
मुगलकाल में सिजदा के महत्व का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
‘अकबरनामा’ का लेखक अबुल फसल तथा ‘बादशाहनामा’ का लेखक अब्दुल हमीद लाहौरी था।

प्रश्न 79.
अबुल फजल के अनुसार सुलह-ए-कुल क्या था?
उत्तर:
अबुल फसल सुलह-ए-कुल के आदर्श को प्रबुद्ध शासन की आधारशिला मानता था।

प्रश्न 80.
सुलह-ए-कुल की नीति के अन्तर्गत अकबर द्वारा किए गए दो उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
अकबर ने 1563 में तीर्थयात्रा कर तथा 1564 में जजिया कर समाप्त कर दिया।

प्रश्न 81.
सुलह-ए-कुल का क्या आदर्श था?
उत्तर:
साम्राज्य के सभी धार्मिक तथा नृजातीय समूहों के लोगों के बीच शान्ति, सद्भावना और एकता बनाये रखना।

प्रश्न 82.
राज्यारोहण के बाद जहाँगीर ने पहला आदेश क्या दिया था?
उत्तर:
न्याय की जंजीर को लगाने का ताकि पीड़ित व्यक्ति जंजीर हिलाकर जहाँगीर का ध्यान आकर्षित कर सकें।

प्रश्न 83.
अकबर द्वारा बनाई गई राजधानियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) आगरा
(2) फतेहपुरी सीकरी
(3) लाहौर।

प्रश्न 84.
अकबर ने कब और किसे अपनी राजधानी बनाया?
उत्तर:
1570 के दशक में अकबर ने फतेहपुरी सीकरी को अपनी राजधानी बनाया।

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प्रश्न 85.
झरोखा दर्शन की प्रथा का क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
जन विश्वास के रूप में शाही सत्ता की स्वीकृति को और विस्तार देना।

प्रश्न 86.
दीवान-ए-आम से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
दीवान-ए-आम सार्वजनिक सभा भवन था जहाँ राज्य के प्रमुख अधिकारी अपनी रिपोर्ट और प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत करते थे।

प्रश्न 87.
‘दीवान-ए-खास’ क्या था?
उत्तर:
मुगल सम्राट दीवान-ए-खास नामक भवन में राज्य के वरिष्ठ मन्त्रियों से गोपनीय मुद्दों पर चर्चा करते थे। प्रश्न 88. मुगल सम्राट वर्ष में कौन-से तीन मुख्य त्यौहार मनाते थे?
उत्तर:
(1) सूर्य वर्ष के अनुसार सम्राट का जन्म दिन
(2) चन्द्र वर्ष के अनुसार सम्राट का जन्म दिन तथा
(3) फारसी नव वर्ष (नौ रोज)।

प्रश्न 89.
मुगल सम्राटों द्वारा अपने अमीरों को दी जाने वाली प्रमुख पदवियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रश्न 90.
(1) आसफ खाँ
(2) मिर्जा राजा।मुगल परिवार में बेगम और अगहा महिलाएँ कौन होती थीं?
उत्तर:
(1) शाही परिवारों से आने वाली महिलाएँ ‘बेगम’ कहलाती थीं।
(2) कुलीन परिवार में जन्म न लेने वाली महिलाएँ ‘अगहा’ कहलाती थीं।

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प्रश्न 91.
गुलबदन बेगम कौन थी?
उत्तर:
गुलबदन बेगम बाबर की पुत्री, हुमायूँ की बहिन तथा अकबर की बुआ थी।

प्रश्न 92.
अभिजात कौन थे?
उत्तर:
मुगल राज्य के अधिकारियों का दल अभिजात- वर्ग कहलाता था।

प्रश्न 93.
आप ‘जात’ व ‘सवार’ से क्या समझते हैं? स्पष्ट करें।
उत्तर:
‘जात’ मनसबदार के पद, वेतन का सूचक था तथा ‘सवार’ यह सूचित करता था कि उसे कितने घुड़सवार रखने थे।

प्रश्न 94.
मीरबख्शी का क्या कार्य था?
उत्तर:
वह शाही सेवा में नियुक्ति तथा पदोन्नति के सभी उम्मीदवारों को मुगल सम्राट के सामने प्रस्तुत करता था।

प्रश्न 95.
‘तैनात ए-रकांब’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
यह अभिजातों का ऐसा सुरक्षित दल था जिसे किसी भी प्रान्त या सैन्य अभियान में प्रतिनियुक्त किया जा सकता था।

प्रश्न 96.
दरबारी लेखक या वाकिया नवीस कौन थे?
उत्तर:
दरबारी लेखक दरबार में प्रस्तुत किये जाने वाले सभी प्रार्थना-पत्रों, दस्तावेजों तथा शासकीय आदेशों का आलेख तैयार करते थे।

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प्रश्न 97.
नस्तलिक शैली से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
नस्तलिक शैली एक ऐसी शैली थी जिसे लम्बे सपाट प्रवाही ढंग से लिखा जाता था।

लघुत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
जलालुद्दीन अकबर को मुगल बादशाहों में महानतम क्यों माना जाता है?
उत्तर:
जलालुद्दीन अकबर को (1556-1605) को मुगल बादशाहों में महानतम माना जाता है क्योंकि उसने न केवल मुगल साम्राज्य का विस्तार ही किया, बल्कि इसे अपने समय का विशालतम दृढ़तम तथा सबसे समृद्ध राज्य भी बना दिया। अकबर ने हिन्दूकुश पर्वत तक अपने साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। उसने ईरान के सफावियों और तूरान (मध्य एशिया) के उजबेकों की विस्तारवादी योजनाओं पर अंकुश लगाए रखा। उसने 1595 में कन्धार पर अधिकार कर लिया।

प्रश्न 2.
सुलेखन का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
सुलेखन अर्थात् हाथ से लिखने की कला अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कौशल मानी जाती थी। इसका प्रयोग भिन्न- भिन्न शैलियों में होता था ‘नस्तलिक’ अकबर की मनपसन्द शैली थी। यह एक ऐसी तरल शैली थी जिसे लम्बे सपाट प्रवाही ढंग से लिखा जाता था। इसे 5 से 10 मिलीमीटर की नोक वाले छटे हुए सरकंडे के टुकड़े से स्याही में डुबोकर लिखा जाता था।

प्रश्न 3.
मुगल पांडुलिपियों में चित्रों के समावेश का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
(1) चित्र पुस्तक के सौन्दर्य में वृद्धि करते हैं।
(2) जहाँ लिखित माध्यम से राजा और राजा की शक्ति के विषय में जो बात कही न जा सके, उन्हें चित्रों के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता था।
(3) अबुल फजल के अनुसार चित्रकला एक जादुई कला थी। उसकी राय में चित्रकला किसी निर्जीव वस्तु में भी प्राण फूँक सकती थी।

प्रश्न 4.
“अबुल फजल ने न्यायपूर्ण सम्प्रभुता को एक सामाजिक अनुबन्ध के रूप में परिभाषित किया है।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अबुल फजल के अनुसार बादशाह अपनी प्रजा के चार सत्वों की रक्षा करता है-
(1) जीवन (जन),
(2) धन (मूल्य),
(3) सम्मान (नामस),
(4) विश्वास (दीन)।
इसके बदले में वह आज्ञापालन तथा संसाधनों में हिस्से की माँग करता है। केवल न्यायपूर्ण सम्प्रभु ही शक्ति और दैवीय मार्गदर्शन के साथ इस सामाजिक अनुबन्ध का सम्मान कर पाते थे।

प्रश्न 5.
मुगल काल में न्याय के विचार को दृश्य रूप में किन प्रतीकों के माध्यम से निरूपित किया गया? इसका क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
मुगल राजतंत्र में न्याय के विचार को सर्वोत्तम सद्गुण माना गया। कलाकारों द्वारा प्रयुक्त सर्वाधिक मनपसन्द प्रतीकों में से एक था. एक-दूसरे के साथ चिपटकर शान्तिपूर्वक बैठे हुए शेर और बकरी अथवा शेर और गाय इसका उद्देश्य राज्य को एक ऐसे क्षेत्र के रूप में दर्शाना था जहाँ दुर्बल तथा सबल सभी परस्पर सद्भाव से रह सकते थे।

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प्रश्न 6.
अकबर ने फतेहपुर सीकरी को अपनी राजधानी बनाने का निश्चय क्यों किया?
उत्तर:
अकबर ने फतेहपुर सीकरी को अपनी राजधानी बनाने का निश्चय किया। इसका कारण यह था कि फतेहपुर | सीकरी अजमेर को जाने वाली सीधी सड़क पर स्थित थी,
जहाँ शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह उस समय तक एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल बन चुकी थी। मुगल बादशाहों के चिश्ती सिलसिले के सूफियों के साथ अच्छे सम्बन्ध थे।

प्रश्न 7.
राज्यारोहण के बाद जहाँगीर द्वारा दिए गए पहले आदेश का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
राज्यारोहण के बाद जहाँगीर ने जो पहला आदेश दिया, वह न्याय की जंजीर लगाने का था। इसका कारण यह था कि यदि न्याय करने वाले अधिकारी न्याय करने में देरी करें अथवा वे न्याय चाहने वाले लोगों के विषय में मिथ्याचार करें तो उत्पीड़ित व्यक्ति इस जंजीर को हिलाकर बादशाह का ध्यान आकृष्ट कर सकता था। इस जंजीर को शुद्ध सोने से बनाया गया था। यह 30 गज लम्बी थी तथा इसमें 60 पटयाँ लगी हुई थीं।

प्रश्न 8.
शाहजहाँ द्वारा किसे शाही राजधानी बनाया गया? उसका संक्षिप्त उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
1648 में शाहजहाँ ने शाहजहांनाबाद को नई शाही राजधानी बनाया। दिल्ली के प्राचीन रिहायशी नगर में शाहजहाँनाबाद एक नई और शाही आबादी थी। यहाँ लाल किला, जामा मस्जिद, चांदनी चौक के बाजार की वृक्षवीथि और अभिजात वर्ग के बड़े-बड़े घर थे। शाहजहाँनाबाद विशाल एवं भव्य मुगल राजतंत्र की औपचारिक कल्पना को व्यक्त करता था।

प्रश्न 9.
‘कोर्निश’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मुगल काल में ‘कोर्निश’ औपचारिक अभिवादन का एक ऐसा तरीका था, जिसमें दरबारी दाएँ हाथ की तलहधी को ललाट पर रखकर आगे की ओर सिर झुकाते थे। यह इस बात का प्रतीक था कि कोर्निश करने वाला व्यक्ति अपने इन्द्रिय और मन के स्थल को हाथ लगाते हुए शुककर विनम्रतापूर्वक शाही दरबार में अपने को प्रस्तुत कर रहा था।

प्रश्न 10.
मुगल अभिजात वर्गों के बीच हैसियत को निर्धारित करने वाले नियमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
दरबार में अभिजात वर्ग के किसी व्यक्ति की हैसियत इस बात से निर्धारित होती थी कि वह बादशाह के कितना पास और दूर बैठा है। किसी भी दरबारी को बादशाह द्वारा दिया गया स्थान बादशाही की दृष्टि में उसकी महत्ता का प्रतीक था। बादशाह को किए गए अभिवादन के तरीके से पदानुक्रम में उस व्यक्ति की हैसियत का पता चलता था।

प्रश्न 11.
भारत में मुगल राजवंश का अन्त कैसे हुआ?
उत्तर:
1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् मुगल राजवंश की शक्ति घट गई। अतः विशाल मुगल साम्राज्य के स्थान पर कई क्षेत्रीय शक्तियाँ उभर आई, फिर भी सांकेतिक रूप से मुगल शासक की प्रतिष्ठा बनी रही। 1857 ई. में इस वंश के अन्तिम शासक बहादुरशाह जफर द्वितीय को अंग्रेजों ने उखाड़ फेंका इस प्रकार मुगल राजवंश का अन्त हो गया।

प्रश्न 12.
मुगल बादशाहों द्वारा तैयार करवाए गए इतिवृत्तों के कोई दो उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:
मुगल बादशाहों द्वारा तैयार करवाए गए इतिवृत्तों के प्रमुख दो उद्देश्य निम्नलिखित थे.
(i) मुगल साम्राज्य के अन्तर्गत आने वाले समस्त लोगों के समक्ष मुगल राज्य को एक प्रबुद्ध राज्य के रूप में चित्रित करना।
(ii) मुगल शासन का विरोध करने वाले लोगों को यह बताना कि उनके सभी विरोधों का असफल होना निश्चित है।

प्रश्न 13.
न्याय की जंजीर किस बादशाह द्वारा लगवाई गई?
उत्तर:
न्याय की जंजीर जहाँगीर नामक बादशाह के द्वारा लगवाई गयी जो अपनी न्यायप्रियता के लिए बहुत प्रसिद्ध था जहाँगीर ने सिंहासन पर आरूढ़ होने के बाद सबसे पहला आदेश न्याय की जंजीर लगाने के सम्बन्ध में दिया। कोई भी व्यक्ति जिसे प्रशासन से न्याय न मिले, वह सीधे इस जंजीर को हिलाकर सम्बद्ध घण्टे को बजाकर न्याय की फरियाद बादशाह से कर सकता था। इस जंजीर को विशुद्ध रूप से सोने से बनाया गया था यह 30 गज लम्बी थी तथा इसमें 60 घण्टियाँ लगी हुई थीं।

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प्रश्न 14.
मुगल काल में अभिवादन का ‘चार तसलीम’ तरीका क्या था?
उत्तर:
मुगल काल में अभिवादन का ‘चार तसलीम’ तरीका दाएँ हाथ को जमीन पर रखने से शुरू होता था। इसमें तलहथी ऊपर की ओर होती थी। इसके बाद हाथ को धीरे-धीरे उठाते हुए व्यक्ति खड़ा होता था तथा तलहथी को सिर के ऊपर रखता था ऐसी तसलीम चार बार की जाती थी। तसलीम का शाब्दिक अर्थ आत्मनिवेदन है।

प्रश्न 15.
मुगल दरबार में राजनयिक दूत सम्बन्धी नयाचारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मुगल बादशाह के समक्ष प्रस्तुत होने वाले राजदूत से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह अभिवादन के मान्य रूपों में से एक या तो बहुत झुककर अथवा जमीन को चूमकर अथवा फारसी रिवाज के अनुसार छाती के सामने हाथ बाँधकर तरीके से अभिवादन करेगा। अंग्रेज राजदूत टामस रो ने यूरोपीय रिवाज के अनुसार जहाँगीर के सामने केवल झुककर अभिवादन किया और बैठने के लिए कुर्सी का आग्रह किया।

प्रश्न 16.
शब-ए-बारात’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
शब-ए-बारात हिजरी कैलेंडर के आठवें महीने अर्थात् चौदहवें सावन को पड़ने वाली पूर्ण चन्द्ररात्रि है। भारतीय उपमहाद्वीप में प्रार्थनाओं और आतिशबाजियों के खेल द्वारा इस दिन को मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस रात मुसलमानों के लिए आगे आने वाले वर्ष का भाग्य निर्धारित होता है और पाप माफ कर दिए जाते हैं।

प्रश्न 17.
सम्मान का जामा’ तथा ‘सरप्पा’ नामक पुरस्कार क्या थे?
उत्तर:
योग्य व्यक्तियों को मुगल सम्राटों द्वारा पुरस्कार दिए जाते थे। इन पुरस्कारों में ‘सम्मान का जामा’ (खिल्लत) भी शामिल था जिसे पहले कभी न कभी बादशाह द्वारा पहना गया हुआ होता था इसलिए यह समझा जाता था कि वह बादशाह के आशीर्वाद का प्रतीक था ‘सरप्पा’ (सर से पाँव तक) एक अन्य उपहार था इस उपहार के तीन हिस्से हुआ करते थे- जामा, पगड़ी और पटका।

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प्रश्न 18.
‘शाही परिवार’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘हरम’ शब्द का प्रयोग प्राय: मुगलों की घरेलू दुनिया की ओर संकेत करता है। यह शब्द फारसी से निकला है जिसका तात्पर्य है पवित्र स्थान’ मुगल परिवार (शाही) में बादशाह की पत्नियों और उपपत्नियाँ, उसके निकटस्थ और दूर के सम्बन्धी (माता, सौतेली व उपमाताएँ. बहन, पुत्री, बहू, चाची-मौसी, बच्चे आदि) व महिला परिचारिकाएँ तथा गुलाम होते थे।

प्रश्न 19.
‘जात’ और ‘सवार’ मनसबदार से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मुगल काल में सभी सरकारी अधिकारियों के दर्जे और पदों में दो तरह के संख्या-विषयक पद होते थे। ‘जात’ शाही पदानुक्रम में अधिकारी ( मनसबदार) के पद और वेतन का सूचक था और ‘सवार’ यह सूचित करता था कि उससे सेवा में कितने घुड़सवार रखना अपेक्षित था। सत्रहवीं शताब्दी में 1000 या उससे ऊपर जात वाले मनसबदार अभिजात ‘उमरा’ कहलाते थे।
हैं?

प्रश्न 20.
‘तैनात ए रकाब से आप क्या समझते
उत्तर:
भुगल दरबार में नियुक्त ‘तैनात ए रकाब ‘ अभिजातों का एक ऐसा सुरक्षित दल था, जिसे किसी भी प्रान्त या सैन्य अभियान में प्रतिनियुक्त किया जा सकता था। ये प्रतिदिन दो बार सुबह व शाम को सार्वजनिक सभा- भवन में बादशाह के प्रति आत्मनिवेदन करने के लिए उपस्थित होते थे। वे दिन-रात बादशाह और उसके घराने की सुरक्षा का दायित्व भी वहन करते थे।

प्रश्न 21.
अब्दुल कादिर बदायूँनी द्वारा ‘हरम में होम’ का वर्णन किस प्रकार किया है?
उत्तर:
‘अब्दुल कादिर बदायूँनी ने लिखा है कि युवावस्था के आरम्भ से ही, मुगल सम्राट अकबर अपनी पत्नियों अर्थात् भारत के राजाओं की पुत्रियों के सम्मान में ‘हरम में होम’ का आयोजन कर रहे थे। यह ऐसी धर्मक्रिया थी जो अग्नि पूजा (आतिश-परस्ती) से उत्पन्न हुई थी परन्तु अपने 25वें शासन वर्ष ( 1578) के नए वर्ष पर उसने सार्वजनिक रूप से सूर्य और अग्नि को दंडवत् प्रणाम किया।

प्रश्न 22.
मुगल सम्राट अपने राजवंश का इतिहास क्यों लिखवाना चाहते थे?
उत्तर:
मुगल सम्राटों की यह मान्यता थी कि उन्हें एक विशाल एवं विजातीय जनता पर शासन के लिए स्वयं ईश्वर ने नियुक्त किया है। ऐसा दृष्टिकोण सदैव महत्त्वपूर्ण बना रहा। इस दृष्टिकोण के प्रचार-प्रसार का एक तरीका राजवंशीय इतिहास लिखना लिखवाना था। अतः मुगल सम्राटों ने दरबारी इतिहासकारों को विवरण लिखने का कार्य सौंपा। इन विवरणों में मुगल सम्राटों के समय की घटनाओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया।

प्रश्न 23.
मुगल इतिवृत्त / इतिहास के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
मुगल इतिवृत्त घटनाओं का काल क्रमानुसार विवरण प्रस्तुत करते हैं। मुगलों का इतिहास लिखने के इच्छुक विद्वानों के लिए ये इतिवृत्त अनिवार्य स्रोत हैं। एक ओर तो ये इतिवृत्त मुगल साम्राज्य की संस्थाओं के बारे में तथ्यात्मक सूचनाएँ प्रदान करते थे, तो दूसरी ओर ये उन उद्देश्यों का प्रसार करते थे जिन्हें मुगल सम्राट अपने क्षेत्र में लागू करना चाहते थे। ये इतिवृत्त यह प्रकट करते हैं कि शाही विचारधाराएँ कैसे रची तथा प्रसारित की जाती थीं।

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प्रश्न 24.
खिल्लत, सरण्या, पद्म मुरस्सा आदि उपहारों से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मुगल सम्राटों द्वारा योग्य व्यक्तियों को पदवियाँ और पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया जाता था खिल्लत पुरस्कार में बादशाह अपने द्वारा पहना हुआ जामा उपहारस्वरूप देता था। इसे बादशाह के आशीर्वाद का प्रतीकं समझा जाता था सरप्पा, सिर से पाँव तक का उपहार होता था। इसमें जामा, पगड़ी और पटका शामिल होते थे। बादशाह द्वारा उपहार में दिए गए कमल की मंजरियों वाले रत्नजड़ित गहनों के सेट को पद्म मुरस्सा कहा जाता था।

प्रश्न 25.
मुगल वास्तुकला में जहाँआरा के योगदान पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
जहाँआरा मुगल बादशाह शाहजहाँ की पुत्री थी। उसने शाहजहाँ की नई राजधानी शाहजहाँनाबाद (दिल्ली) की कई वास्तुकलात्मक परियोजनाओं में भाग लिया। इनमें से आँगन एवं बाग के साथ एक दोमंजिली भव्य कारवाँ सराय थी। शाहजहाँनाबाद के मुख्य केन्द्र चाँदनी चौक की रूपरेखा भी जहाँआरा द्वारा बनाई गई थी।

प्रश्न 26.
सरकारी अधिकारियों के दर्जे जात, मनसबदार, उमरा आदि से आपका क्या तात्पर्य सवार, है?
उत्तर:
सरकारी अधिकारियों के दर्जे और पदों में दो तरह के ओहदे होते थे। यह ओहदे संख्या विषयक होते थे। शाही पदानुक्रम में जात अधिकारी जिसे मनसबदार कहा जाता था, के पद और वेतन को सूचित करता था और ‘सवार’ से यह सूचित होता था कि वह कितने घुड़सवार रख सकता था। 1000 या उससे ऊपर जात वाले मनसबदार ‘उमरा’ जो कि अमीर का बहुवचन है, कहे जाते थे।

प्रश्न 27.
मीर बख्शी कौन था? मीर बख्शी तथा उसका कार्यालय क्या कार्य करता था?
उत्तर:
मुगलकाल में मीर बख्शी सर्वोच्च वेतनदाता था। मीर बख्शी खुले दरबार में बादशाह के दायीं ओर खड़ा रहकर नियुक्ति तथा पोदन्नति पाने वाले उम्मीदवारों को प्रस्तुत करता था उसका कार्यालय उसकी मुहर एवं हस्ताक्षर के साथ-साथ बादशाह की मुहर तथा हस्ताक्षर वाले आदेश भी तैयार करता था।

प्रश्न 28.
मुगल कौन थे?
उत्तर:
‘मुगल’ शब्द की उत्पत्ति ‘मंगोल’ से हुई है। मुगल शासकों ने अपने को ‘तैमूरी’ कहा क्योंकि पितृपक्ष से वे तुर्की शासक तिमूर के वंशज थे प्रथम मुगल शासक बाबर मातृपक्ष से चंगेजखों का सम्बन्धी था। वह तुर्की भाषा बोलता था। मुगल चगताई मूल के थे तथा तुर्की उनकी मातृभाषा थी। सोलहवीं शताब्दी में यूरोपियों ने मुगल राजवंश के लिए मुगल शब्द का प्रयोग किया था उस समय से ही इस शब्द का निरन्तर प्रयोग होता रहा है।

प्रश्न 29.
” मुगल बादशाहों द्वारा तैयार करवाए गए इतिवृत्त साम्राज्य और उसके दरबार के अध्ययन के महत्त्वपूर्ण स्त्रोत हैं।” व्याख्या कीजिए।
अथवा
इतिवृत्त किस प्रकार मुगल सम्राटों के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं?
उत्तर:
मुंगल सम्राटों द्वारा तैयार करवाए गए इतिवृत्त साम्राज्य और उसके दरबार के अध्ययन के महत्त्वपूर्ण खोत हैं। ये इतिवृत्त मुगल साम्राज्य के अन्तर्गत आने वाले सभी लोगों के सामने मुगल- राज्य को एक प्रबुद्ध राज्य के रूप में दर्शाने के उद्देश्य से लिखे गए थे। इसी प्रकार उनका उद्देश्य मुगल शासन का विरोध करने वाले लोगों को यह भी बताना था कि उनके सभी विरोधों का असफल होना निश्चित है। मुगल सम्राट यह भी चाहते थे कि भावी पीढ़ियों के लिए उनके शासन के विवरण उपलब्ध रहे।

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प्रश्न 30.
“मुगल इतिवृत्तों के लेखक निरपवाद रूप से दरबारी ही रहे।” व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
मुगल इतिवृत्तों में शासक पर केन्द्रित घटनाओं, शासक के परिवार दरबार व अभिजात वर्ग, बुद्ध और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का समावेश था। अकबर, शाहजहाँ तथा आलमगीर (औरंगजेब) के शासन काल की घटनाओं पर आधारित इतिवृत्तों के शीर्षक ‘अकबरनामा’, ‘शाहजहाँनामा’ तथा ‘आलमगीरनामा’ यह संकेत देते हैं कि इनके लेखकों की दृष्टि में साम्राज्य एवं दरबार का इतिहास और बादशाह का इतिहास एक ही था।

प्रश्न 31.
अकबर ने फारसी को दरबार की मुख्य भाषा क्यों बनाया?
उत्तर:
अकबर ने सोच समझकर फारसी को दरबार की मुख्य भाषा बनाया। सम्भवतया ईरान के साथ सांस्कृतिक और बौद्धिक सम्पर्कों के साथ-साथ मुगल दरबार में पद पाने को इच्छुक ईरानी और मध्य एशियाई प्रवासियों ने अकबर को फारसी भाषा को अपनाए जाने के लिए प्रेरित किया होगा। फारसी को दरबार की भाषा का ऊंचा स्थान दिया गया तथा उन लोगों को शक्ति तथा प्रतिष्ठा प्रदान की गई, जिनका इस भाषा पर अच्छा नियंत्रण था।

प्रश्न 32.
मुगल पाण्डुलिपियों में चित्रों को किस प्रकार संलग्न किया जाता था?
उत्तर:
मुगल पांडुलिपियों की रचना में चित्रकारों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान था। किसी मुगल सम्राट के शासन की घटनाओं का विवरण देने वाले इतिहासों में लिखित पाठ के साथ ही उन घटनाओं को चित्रों के माध्यम से दृश्य रूप में भी वर्णित किया जाता था जब किसी पुस्तक में घटनाओं अथवा विषयों को दृश्य रूप में वर्णित किया जाना होता था, तो सुलेखक उसके आस-पास के पृष्ठों को खाली छोड़ देते थे। चित्रकार शब्दों में वर्णित विषय को अलग से चित्र के रूप में उतारकर वहाँ संलग्न कर देते थे।

प्रश्न 33.
मुगल पाण्डुलिपियों में चित्रों को संलग्न करने का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
पाण्डुलिपियों में चित्रों का महत्त्व-
(1) चित्र पुस्तक के सौन्दर्य में वृद्धि करते थे।
(2) राजा और उसकी शक्ति के बारे में जो बात लिखित रूप से नहीं कही जा सकती थी, उसे चित्र व्यक्त कर देते थे।
(3) अबुल फजल ने चित्रकारी को एक ‘जादुई कला’ की संज्ञा दी है उसके अनुसार चित्रकला किसी निर्जीव वस्तु को भी सजीव रूप प्रदान कर सकती है।

प्रश्न 34.
मुगल सम्राट तथा उसके दरबार का चित्रण करने वाले चित्रों की रचना को लेकर शासकों और उलमा के बीच तनाव की स्थिति क्यों बनी रहती थी?
उत्तर:
उलमा रूढ़िवादी मुसलमान वर्ग के प्रतिनिधि थे। उन्होंने कुरान के साथ-साथ हदीस में प्रतिष्ठापित मानव रूपों के चित्रण पर इस्लामी प्रतिबन्ध का आह्वान किया। हदीस में एक प्रसंग में पैगम्बर साहब को प्राकृतिक तरीके से जीवित रूपों के चित्रण की मनाही करते हुए उल्लिखित किया गया है। इसका कारण यह है कि ऐसा करने से यह लगता था कि कलाकार रचना की शक्ति को अपने हाथ में लेने का प्रयास कर रहा है। यह केवल ईश्वर का ही कार्य था।

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प्रश्न 35.
मुगल शासनकाल की पांडुलिपियों में चित्रों को किस प्रकार संलग्न किया जाता था?
उत्तर:
मुगल शासनकाल की पांडुलिपियों की रचनाओं में चित्रकारों का भी बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान था। किसी मुगल बादशाह के शासन की घटनाओं का विवरण देने वाले इतिहासों में लिखित पाठ के साथ-साथ उन घटनाओं को चित्रों के माध्यम से दृश्य रूप में दर्शाया जाता था। जब किसी पुस्तक में घटनाओं अथवा विषयों को दृश्य रूप में व्यक्त किया जाना होता था तो सुलेखक उसके आसपास के पृष्ठों को खाली छोड़ देते थे। चित्रकार शब्दों में वर्णित विषय को अलग से चित्रों में उतारकर वहाँ संलग्न कर देते थे। ये लघु चित्र होते थे जिन्हें पांडुलिपि के पृष्ठों पर आसानी से लगाया और देखा जा सकता था।

प्रश्न 36.
दैवीय प्रकाश से आप क्या समझते हैं? दरबारी इतिहासकारों ने इसकी व्याख्या कैसे की?
उत्तर:
मुगल दरबार के इतिहासकारों ने मुगल सम्राटों का महिमामण्डन करने के लिए उन्हें इस प्रकार वर्णित किया कि वे ईश्वर से सीधे दैवीय शक्ति या दैवीय प्रकाश प्राप्त करते थे। इतिहासकारों ने इसके लिए एक दंतकथा का वर्णन किया है। इस दंतकथा में वर्णन है कि मंगोल रानी अलानकुआ अपने शिविर में विश्राम करते हुए सूर्य की किरण द्वारा गर्भवती हुई। उससे उत्पन्न सन्तान दैवीय प्रकाश से युक्त थी। प्रसिद्ध ईरानी सूफी शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी के अनुसार देवीय प्रकाश से युक्त राजा अपनी प्रजा के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन का स्रोत बन जाता था। अबुल फजल ने ईश्वर से उद्भूत प्रकाश को ग्रहण करने वाली वस्तुओं में मुगल राजत्व को सबसे शीर्ष स्थान पर रखा।

प्रश्न 37.
मुगल किताबखानों में रचित पाण्डुलिपियों की रचना में किन-किन लोगों का योगदान होता था?
अथवा
पांडुलिपियों की रचना में विविध प्रकार के कार्य करने वाले लोगों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
पांडुलिपियों की रचना में विविध प्रकार के कार्य करने वाले अनेक लोग शामिल थे। कागज बनाने बालों की पांडुलिपि के पन्ने तैयार करने, सुलेखकों की पाठ की नकल तैयार करने, कोफ्तगरों की पृष्ठों को चमकाने के लिए, चित्रकारों की पाठ से दृश्यों को चित्रित करने के लिए और जिल्दसाजों की प्रत्येक पन्ने को इकट्ठा कर उसे अलंकृत आवरण में बैठाने के लिए आवश्यकता होती थी। तैयार पांडुलिपि को एक बहुमूल्य वस्तु के रूप में देखा जाता था।

प्रश्न 38.
अबुल फजल पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
अबुल फजल अकबर का एक प्रसिद्ध दरबारी इतिहासकार था। अबुलफजल का पालन-पोषण मुगल राजधानी आगरा में हुआ था। वह अरबी, फारसी, यूनानी दर्शन और सूफीवाद का प्रकाण्ड विद्वान था। वह एक प्रभावशाली विवादी तथा स्वतंत्र चिन्तक था। उसने सदैव रूढ़िवादी उलमा के विचारों का विरोध किया। अबुल फजल के इन गुणों से अकबर बढ़ प्रभावित हुआ। उसने अबुलफजल को अपने सलाहकार और अपनी नीतियों के प्रवक्ता के रूप में बहुत उपयुक्त पाया।

प्रश्न 39.
‘अकबरनामा’ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
अबुलफजल द्वारा रचित अकबरनामा तीन जिल्दों में विभाजित है जिनमें से प्रथम दो इतिहास हैं। तीसरी जिल्द ‘आइन-ए-अकबरी’ है पहली जिल्द में आदम से | लेकर अकबर के जीवन के एक खगोलीय कालचक्र तक (30 वर्ष) का मानव जाति का इतिहास है। दूसरी जिल्द अकबर के 46वें शासन वर्ष (1601 ई.) पर समाप्त होती है ‘अकबरनामा’ में राजनीतिक घटनाओं, साम्राज्य के भौगोलिक, सामाजिक, प्रशासनिक तथा सांस्कृतिक आदि पक्षों का विस्तृत विवरण मिलता है।

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प्रश्न 40.
‘बादशाहनामा’ का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
‘बादशाहनामा’ का लेखक अब्दुल हमीद लाहौरी था। ‘बादशाहनामा’ सरकारी इतिहास है। यह तीन जिल्दों में विभाजित है। प्रत्येक जिल्द दस चन्द्र वर्षों का विवरण देती है। लाहौरी ने शाहजहाँ के शासन (1627-47) के पहले दो दशकों पर पहला व दूसरा दफ्तर लिखा। इन जिल्दों में बाद में शाहजहाँ के वजीर सादुल्लाखाँ ने सुधार किया। वृद्धावस्था की कमजोरियों के कारण लाहौरी तीसरे दशक के बारे में नहीं लिख सका जिसे बाद में इतिहासकार वारिस ने लिखा।

प्रश्न 41.
औपनिवेशिक काल में ऐतिहासिक पांडुलिपियों को किस प्रकार संरक्षित किया गया?
उत्तर:
1784 ई. में सर विलियम जोन्स द्वारा स्थापित ‘एशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल ने अनेक भारतीय पांडुलिपियों के सम्पादन, प्रकाशन और अनुवाद का दायित्व अपने ऊपर ले लिया। ‘अकबरनामा’ तथा ‘बादशाहनामा’ के सम्पादित पाठान्तर सर्वप्रथम एशियाटिक सोसाइटी द्वारा उन्नीसवीं शताब्दी में प्रकाशित किए गए। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में हेनरी बेवरिज ने ‘अकबरनामा’ का अंग्रेजी में अनुवाद किया। ‘बादशाहनामा’ के केवल कुछ ही अंशों का अभी तक अंग्रेजी में अनुवाद हुआ है।

प्रश्न 42.
” मुगल सम्राटों में दैवीय प्रकाश सम्प्रेषित होता था। व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
दरबारी इतिहासकारों ने कई साक्ष्यों के आधार पर यह दर्शाया कि मुगल सम्राटों को सीधे ईश्वर से शक्ति मिली थी। अबुल फजल ने ईश्वरीय प्रकाश को ग्रहण करने वाली वस्तुओं में मुगल राजत्व को सबसे ऊँचे स्थान पर रखा। प्रसिद्ध ईरानी सूफी शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी के विचार के अनुसार यह दैवीय प्रकाश राजा में सम्प्रेषित होता था जिसके बाद राजा अपनी प्रजा के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन का स्रोत बन जाता था।

प्रश्न 43.
“सुलह-ए-कुल एकीकरण का एक स्रोत था।” विवेचना कीजिए।
अथवा
सुलहकुल का आदर्श क्या था? इसे किस प्रकार लागू किया गया?
उत्तर:
अबुल फसल ‘सुलह-ए-कुल’ (पूर्ण शान्ति ) के आदर्श को प्रबुद्ध शासन का आधार बताता है। यद्यपि ‘सुलह-ए-कुल’ में सभी धर्मों तथा मतों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता थी, किन्तु उसकी एक शर्त थी कि वे राज्य- सत्ता को क्षति नहीं पहुँचाएंगे अथवा आपस में नहीं लड़ेंगे। ईरानी तूरानी, अफगानी राजपूत, दक्खनी आदि अभिजातों को पद और पुरस्कार दिए गए। 1563 में अकबर ने तीर्थयात्रा कर तथा 1564 में जजिया कर को समाप्त कर दिया।

प्रश्न 44.
अबुल फजल ने प्रभुसत्ता को एक सामाजिक अनुबन्ध के रूप में परिभाषित क्यों किया? उत्तर- अबुल फजल ने लिखा है कि बादशाह अपनी प्रजा के चार सत्त्वों की रक्षा करता है –

  1. जीवन (जन),
  2. धन (माल),
  3. सम्मान (नामस) तथा
  4. विश्वास ( दोन )।

इसके बदले में वह आज्ञापालन तथा संसाधनों में हिस्से की माँग करता है। केवल न्यायपूर्ण सम्प्रभु ही शक्ति और दैवीय मार्गदर्शन के साथ इस अनुबन्ध का सम्मान कर पाते थे। न्याय के विचार को मुगल राजतन्त्र में सर्वोत्तम सद्गुण माना गया। न्याय के विचार को चित्रों में अनेक प्रतीकों के रूप में दर्शाया गया।

प्रश्न 45.
मुगल दरबार में अभिजात वर्ग के बीच उनकी हैसियत दर्शाने वाले नियमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दरबार में किसी अभिजात की हैसियत इस बात से निर्धारित होती थी कि वह बादशाह के कितने पास और दूर बैठा है। किसी भी दरबारी को बादशाह द्वारा दिया गया स्थान बादशाह की दृष्टि में उसकी महत्ता का द्योतक था दरबारी समाज में सामाजिक नियन्त्रण का व्यवहार दरबार में मान्य सम्बोधन, शिष्टाचार तथा बोलने के नियमों द्वारा होता था। शिष्टाचार का उल्लंघन करने वालों को तुरन्त ही दंडित किया जाता था।

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प्रश्न 46.
राजवंशीय इतिहास लेखन, इतिवृत्त से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मुगलवंशीय साम्राज्य के शासकों ने अपने उद्देश्यों के प्रचार प्रसार एवं राजवंशीय इतिहास के संकलन हेतु दरबारी इतिहासकारों को इतिवृत्तों के लेखन का कार्य सौंपा। आधुनिक इतिहासकारों ने इस शैली को इतिवृत्ति इतिहास के नाम से सम्बोधित किया। इतिवृत्तों द्वारा हमें मुगल राज्य की घटनाओं का कालक्रम के अनुसार क्रमिक विवरण प्राप्त होता है इतिवृत्त मुगल राज्य की संस्थाओं के प्रामाणिक स्त्रोत थे: जिन्हें इनके लेखकों द्वारा परिश्रम से एकत्र और वर्गीकृत किया था। इतिवृत्तों के द्वारा इस बात की जानकारी प्राप्त होती है कि शाही विचारधाराएँ कैसे प्रसारित की जाती हैं।

प्रश्न 47.
मुगल दरबार में राजनयिक दूतों से सम्बन्धित न्याचारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मुगल दरबार में बादशाह के सामने प्रस्तुत होने वाले राजदूत से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह अभिवादन के मान्य रूपों में से एक या तो बहुत झुक कर अथवा जमीन को चूम कर अथवा फारसी रिवाज के अनुसार छाती के सामने हाथ बाँध कर- तरीके से अभिवादन करेगा। जेम्स प्रथम के अंग्रेज दूत टामसरो ने यूरोपीय रिवाज के अनुसार जहाँगीर के सामने केवल झुककर अभिवादन किया और फिर बैठने के लिए कुर्सी का आग्रह कर दरबार को आश्चर्यचकित कर दिया।

प्रश्न 48.
झरोखा दर्शन की प्रथा का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मुगल काल में बादशाह अपने दिन की शुरूआत सूर्योदय के समय कुछ व्यक्तिगत धार्मिक प्रार्थनाओं से करता था। इसके बाद वह पूर्व की ओर मुँह किए एक छोटे छज्जे अर्थात् शरोखे में आता था। इसके नीचे लोगों की भारी भीड़ बादशाह की एक झलक पाने के लिए प्रतीक्षा करती थी। झरोखा दर्शन की प्रथा अकबर द्वारा शुरू की गई थी। इस प्रथा का उद्देश्य जन विश्वास के रूप में शाही सत्ता की स्वीकृति का और विस्तार करना था।

प्रश्न 49.
अबुल फजल के अनुसार बादशाह अपनी प्रजा का एक परिपूर्ण रक्षक है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अबुल फजल के अनुसार बादशाह अपनी प्रजा का परिपूर्ण रक्षक है। वह प्रजा के जीवन, धन, सम्मान तथा विश्वास की रक्षा करता है जीवन, धन, सम्मान तथा विश्वास की रक्षा के बदले वह प्रजा से आज्ञापालन और राज्य के संसाधनों में कर के रूप में उचित हिस्सेदारी की आशा करता है। न्यायपूर्ण बादशाह ही शक्ति और दैवीय मार्गदर्शन के साथ इस सामाजिक अनुबन्ध का दृढ़तापूर्वक पालन कर सकने में समर्थ थे। मुगल सम्राटों के इन न्यायपूर्ण विचारों का तत्कालीन चित्रकारों द्वारा बादशाहनामा आदि ग्रन्थों में प्रतीकात्मक रूप से सचित्र निरूपण किया गया।

प्रश्न 50.
अबुल फजल ने अकबर के दरबार का किस प्रकार वर्णन किया है?
उत्तर:
अबुल फजल के अनुसार जब भी मुगल- सम्राट अकबर दरबार लगाते थे तो एक विशाल ढोल पीटा जाता था और इसके साथ-साथ अल्लाह का गुणगान होता था। बादशाह के पुत्र, पौत्र, दरबारी आदि दरबार में उपस्थित होते थे और कोर्निश (औपचारिक अभिवादन का एक तरीका ) कर अपने स्थान पर खड़े रहते थे प्रसिद्ध विद्वान तथा विशिष्ट कलाओं में निपुण लोग आदर व्यक्त करते थे तथा न्यायिक अधिकारी अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते थे बादशाह सभी मामलों को सन्तोषजनक तरीके से निपटाते थे।

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प्रश्न 51.
शाहजहाँ के ‘रत्नजड़ित सिंहासन’ (तख्त- ए-मुरस्सा) पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
रत्नजड़ित सिंहासन की भव्य संरचना में एक छतरी थी जो द्वादशकोणीच स्तम्भों पर टिकी हुई थी। इसकी ऊँचाई सीढ़ियों से गुम्बद तक लगभग 10 फीट थी। बादशाह ने यह आदेश दिया कि 86 लाख रुपये के रत्न तथा बहुमूल्य पत्थर तथा चौदह लाख रुपये के मूल्य के एक लाख तोला सोने से इसे सुसज्जित किया जाना चाहिए। सिंहासन की साज-सज्जा में सात वर्ष लग गए। इसकी सजावट में प्रयुक्त हुए बहुमूल्य पत्थरों में रुबी था जिसका मूल्य एक लाख रुपये था।

प्रश्न 52.
मुगल दरबार में मनाए जाने वाले विशिष्ट उत्सवों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सिंहासनारोहण की वर्षगाँठ, ईद, शब-ए-बारात तथा होली जैसे विशिष्ट अवसरों पर दरबार का वातावरण सजीव हो उठता था। सजे हुए डिब्बों में रखी सुगंधित मोमबत्तियाँ और महल की दीवारों पर लटक रहे रंग-बिरंगे बन्दनवार आने वाले लोगों को अत्यधिक प्रभावित करते थे। मुगल सम्राट वर्ष में तीन मुख्य त्यौहार मनाया करते थे-सूर्यवर्ष और चन्द्रवर्ष के अनुसार सम्राट का जन्म दिन और वसन्तागमन पर फारसी नववर्ष नौरोज

प्रश्न 53.
मुगल काल में शाही परिवारों में विवाहों के आयोजन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुगल काल में शाही परिवारों में विवाहों का आयोजन काफी खर्चीला होता था 1633 ई. में शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह का विवाह राजकुमार परवेज की पुत्री नादिरा से हुआ था। विवाह के उपहारों के प्रदर्शन की व्यवस्था दीवान-ए-आम में की गई थी। बादशाह तथा हरम की स्वियों दोपहर में इसे देखने के लिए आई। हिनाबन्दी (मेंहदी लगाना) की रस्म दीवान-ए-खास में अदा की गई। दरबार में उपस्थित लोगों के बीच पान, इलायची तथा मेवे बांटे गए।

प्रश्न 54.
शाहजहाँ के तख्त-ए-मुरस्सा के बारे में बादशाहनामा में क्या वर्णन किया गया है?
उत्तर:
आहरा महल के सार्वजनिक सभा भवन में रखे हुए शाहजहाँ के रत्नजड़ित सिंहासन के बारे में बादशाहनामा में निम्नलिखित प्रकार से वर्णन किया गया है-
सिंहासन की भव्य संरचना में एक छतरी है जो द्वादशकोणीय स्तम्भों पर टिकी हुई है। इसकी ऊँचाई सीढ़ियों से गुंबद तक पाँच क्यूबिट (लगभग 10 फुट) है। अपने राज्यारोहण के समय महामहिम ने यह आदेश दिया कि 86 लाख रुपए के रत्न तथा बहुमूल्य पत्थर और एक लाख तोला सोना जिसकी कीमत चौदह लाख रुपए है, से इसे सजाया जाना चाहिए। सिंहासन की साज-सज्जा में सात वर्ष लग गए। इसकी सजावट में प्रयुक्त हुए बहुमूल्य पत्थरों में रूबी था जिसकी कीमत एक लाख रुपए थी। इस रूबी पर महान बादशाह तिमूर साहिब-ए-किरान, मिर्जा शाहरुख, मिर्जा उलुग बेग और शाह अब्बास के साथ-साथ अकबर, जहाँगीर और स्वयं महामहिम के नाम अंकित थे।

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प्रश्न 55.
शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह के विवाह के आयोजन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बादशाहनामा में दाराशिकोह के विवाह के आयोजन का वर्णन किया गया है। शाही परिवारों में विवाहों का आयोजन अत्यन्त धूम-धाम से किया जाता था। इसमें काफी धनराशि व्यय की जाती थी। 1633 ई. में दाराशिकोह और नादिरा, जो कि राजकुमार परवेज की पुत्री थी, के विवाह की व्यवस्था राजकुमारी जहाँआरा और दिवंगत महारानी मुमताज महल की प्रमुख नौकरानी सती उननिसाखानुम द्वारा की गई दीवान-ए-आम में उपहारों के प्रदर्शन की भव्य व्यवस्था की गई थी। हिनाबन्दी दीवाने खास में की गई। दरबार में उपस्थित व्यक्तियों के बीच पान, इलायची और मेवे बांटे गए। विवाह के इस आयोजन में तत्कालीन समय में 32 लाख रु. खर्च हुए। इनमें 6 लाख रु. शाही खजाने से, 16 लाख रु. जहाँआरा तथा शेष धनराशि दुल्हन की माँ के द्वारा दिए गए थे।

प्रश्न 56
मुगल परिवार में बेगमों, अगहा एवं अगाचा स्त्रियों की स्थिति का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
मुगल परिवार में शाही परिवारों से आने वाली स्त्रियां बेगमें कहलाती थीं अगहा स्वियों ये थीं जिनका जन्म कुलीन परिवार में नहीं हुआ था। दहेज (मेहर) के रूप में विपुल धन नकद और बहुमूल्य वस्तुएँ लेने के बाद विवाह करके आई बेगमों को अपने पतियों से स्वाभाविक रूप से ‘अगहाओं’ की तुलना में अधिक ऊँचा दर्जा और सम्मान प्राप्त था। उपपत्नियों (अगाचा) की स्थिति सबसे निम्न थी। इन सभी को नकद मासिक भत्ता तथा अपने- अपने दर्जे के हिसाब से उपहार मिलते थे।

प्रश्न 57.
“राजपूत कुलों एवं मुगलों, दोनों के लिए विवाह राजनीतिक सम्बन्ध बनाने व मैत्री सम्बन्ध स्थापित करने का एक तरीका था।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
विवाह में पुत्री को पेंटस्वरूप दिए जाने के साथ प्रायः एक क्षेत्र भी उपहार में दिया जाता थे। इससे विभिन्न शासक वर्गों के बीच पदानुक्रमिक सम्बन्धों की निरन्तरता निश्चित हो जाती थी इस प्रकार के विवाह और उनके फलस्वरूप विकसित सम्बन्धों के कारण ही मुगल शासक बन्धुता के एक व्यापक तन्त्र का निर्माण कर सके। इसके फलस्वरूप उनके महत्त्वपूर्ण वर्गों से घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हुए और उन्हें एक विशाल साम्राज्य को सुरक्षित रखने में सहायता मिली।

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प्रश्न 58.
गुलबदन बेगम पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
गुलबदन बेगम बाबर की पुत्री, हुमायूँ की बहिन तथा अकबर की बुआ थी। उसने ‘हुमायूँनामा’ नामक पुस्तक लिखी जिससे हमें मुगलों की घरेलू दुनिया की एक झलक मिलती है। गुलबदन तुर्की तथा फारसी में धाराप्रवाह लिख सकती थी। गुलबदन ने जो लिखा वह मुगल बादशाहों की प्रशस्ति नहीं थी, बल्कि उसने राजाओं और राजकुमारों के बीच चलने वाले संघर्षों और तनावों का उल्लेख किया है। उसने परिवार की स्वियों द्वारा कुछ झगड़ों को सुलझाने का भी उल्लेख किया है।

प्रश्न 59.
“योग्य व्यक्तियों को पदवियाँ देना मुगल राजतन्त्र का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष था।” विवेचना कीजिए।
अथवा
मुगल सम्राटों द्वारा अभिजात वर्ग के लोगों को प्रदान की जाने वाली पदवियों एवं पुरस्कारों का वर्णन कीजिए। उत्तर- ‘आसफ खाँ’ की पदवी उच्चतम मन्त्रियों को दी जाती थी। औरंगजेब ने अपने दो उच्चपदस्थ अभिजात जयसिंह और जसवन्त सिंह को ‘मिर्जा राजा’ की पदवी प्रदान की। योग्यता के आधार पर पदवियाँ अर्जित की जा सकती थीं कुछ मनसबदार धन देकर भी पदवियाँ प्राप्त करने का प्रयास करते थे। अन्य पुरस्कारों में सम्मान का ‘जामा’ (खिल्लत) भी शामिल था ‘सरप्पा’ एक अन्य उपहार था। इस उपहार के तीन भाग हुआ करते थे
(1) जामा
(2) पगड़ी तथा
(3) पटका।

प्रश्न 60.
दरबारियों एवं राजदूतों द्वारा मुगल बादशाहों को दिए जाने वाले उपहारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कोई भी दरबारी बादशाह के पास खाली हाथ नहीं जाता था। वह या तो नज के रूप में थोड़ा धन या पेशकश के रूप में मोटी रकम बादशाह की सेवा में प्रस्तुत करता था। राजनयिक सम्बन्धों में उपहारों को सम्मान और आदर का प्रतीक माना जाता था। राजदूत प्रतिद्वन्द्वी राजनीतिक शक्तियों के बीच सन्धि और सम्बन्धों के द्वारा समझौता करवाने का महत्त्वपूर्ण कार्य करते थे। ऐसी परिस्थितियों में उपहारों की महत्त्वपूर्ण प्रतीकात्मक भूमिका होती थी।

प्रश्न 61.
‘जात’ और ‘सवार’ मनसब से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मुगलकाल में सभी सरकारी अधिकारियों के दर्जे और पर्दों में दो प्रकार के संख्या-विषयक पद होते थे-
(1) जात तथा
(2) सवार ‘जात’ शाही पदानुक्रम में अधिकारी (मनसबदार) के पद और वेतन का सूचक था। ‘सवार’ यह सूचित करता था कि उससे सेवा में कितने घुड़सवार रखना अपेक्षित था। सत्रहवीं शताब्दी में 1000 या उससे ऊपर जात वाले मनसबदार अभिजात ‘उमरा’ कहलाते थे।

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प्रश्न 62.
अभिजात वर्ग की सैनिक और असैनिक
कार्यों में क्या भूमिका थी?
उत्तर:
(1) अभिजात सैन्य अभियानों में अपनी सेनाओं के साथ भाग लेते थे।
(2) वे प्रान्तों में साम्राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों के रूप में भी कार्य करते थे।
(3) प्रत्येक सैन्य कमांडर घुड़सवारों को भर्ती करता था। उन्हें हथियारों आदि से लैस करता था और उन्हें प्रशिक्षण देता था।
(4) घुड़सवार सेना मुगल सेना का अपरिहार्य अंग थी। घुड़सवार सैनिक उत्कृष्ट श्रेणी के घोड़े रखते थे।

प्रश्न 63,
“अभिजात वर्ग के सदस्यों के लिए शाही सेवा शक्ति, धन तथा उच्चतम प्रतिष्ठा प्राप्त करने का एक माध्यम थी।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शाही सेवा में आने का इच्छुक व्यक्ति एक अभिजात के माध्यम से प्रार्थना-पत्र देता था जो बादशाह के सामने तजवीज प्रस्तुत करता था यदि प्रार्थी को सुयोग्य माना जाता था, तो उसे मनसब प्रदान किया जाता था। मीरबख्शी (उच्चतम वेतनदाता) खुले दरबार में बादशाह के दाएँ ओर खड़ा होता था तथा नियुक्ति और पदोन्नति के सभी उम्मीदवारों को प्रस्तुत करता था। उसका कार्यालय उसकी मुहर व हस्ताक्षर के साथ-साथ बादशाह की मुहर व हस्ताक्षर वाले आदेश तैयार करता था।

प्रश्न 64.
मुगलों के केन्द्रीय शासन पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
सम्राट अपने साम्राज्य का सर्वोच्च अधिकारी होता था साम्राज्य की समस्त शक्तियाँ उसी के हाथों में केन्द्रित थीं। शासन- कार्यों में सहायता व सलाह देने के लिए एक मन्त्रिपरिषद् होती थी। मीरबख्शी, दीवान-ए-आला तथा सद्र- उस सुदूर प्रमुख मन्त्री थे मीरबख्शी नियुक्ति और पदोन्नति के सभी उम्मीदवारों को प्रस्तुत करता था दीवान-ए-आला आय-व्यय का हिसाब रखता था तथा सद्र-उस-सुदूर अनुदान का मन्त्री और स्थानीय न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रभारी था।

प्रश्न 65.
“सटीक और विस्तृत आलेख तैयार करना मुगल प्रशासन के लिए मुख्य रूप से महत्त्वपूर्ण था। ” विवेचना कीजिए।
अथवा
मुगल दरबार की गतिविधियों से सम्बन्धित सूचनाएँ किस प्रकार लेखबद्ध की जाती थीं?
उत्तर:
मौरबख्शी दरबारी लेखकों (वाकिया नवीसों) के समूह का निरीक्षण करता था। ये लेखक ही दरबार में प्रस्तुत किए जाने वाले सभी अर्जियों एवं दस्तावेजों तथा सभी शासकीय आदेशों (फरमानों) का आलेख तैयार करते थे। इसके अतिरिक्त, अभिजातों और क्षेत्रीय शासकों के प्रतिनिधि (वकील), दरबार की बैठकों (पहर) की तिथि और समय के साथ ‘उच्च दरबार से समाचार’ (अखबारात- ए-दरबार-ए-मुअल्ला) शीर्षक के अन्तर्गत दरबार की सभी कार्यवाहियों का विवरण तैयार करते थे।

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प्रश्न 66.
अखबारात में मुगल दरबार से सम्बन्धित कौनसी सूचनाएँ होती थीं?
उत्तर:
अखबारात में हर प्रकार की सूचनाएँ होती थीं जैसे दरबार में उपस्थिति, पदों और पदवियों का दान, राजनयिक शिष्टमण्डलों, ग्रहण किए गए उपहारों अथवा किसी अधिकारी के स्वास्थ्य के बारे में बादशाह द्वारा की गई पूछताछ राजाओं और अभिजातों के सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन का इतिहास लिखने के लिए ये सूचनाएँ बहुत उपयोगी होती थीं।

प्रश्न 67.
मुगल काल में साम्राज्य में समाचार वृत्तान्त और महत्त्वपूर्ण शासकीय दस्तावेज भेजे जाने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुगल काल में समाचार वृत्तांत और महत्त्वपूर्ण शासकीय दस्तावेज शाही ठाक के द्वारा मुगल साम्राज्य में एक कोने से दूसरे कोने तक भेजे जाते थे। बांस के डिब्बों में लपेटकर रखे कागजों को लेकर हरकारों (कसीद अथवा पथमार) के दल दिन-रात दौड़ते रहते थे। काफी दूर स्थित प्रान्तीय राजधानियों से भी समाचार वृत्तान्त बादशाह को कुछ ही दिनों में मिल जाया करते थे। राजधानी से बाहर नियुक्त उच्च अधिकारी सूचनाएँ सन्देश वाहकों के द्वारा भेजते थे।

प्रश्न 68.
मुगलकालीन प्रान्तीय शासन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुगल साम्राज्य अनेक प्रान्तों में विभाजित था। प्रान्तीय शासन के संचालन के लिए सूबेदार, दीवान, बख्शी, सद्र आदि अधिकारी होते थे। प्रान्तीय शासन का प्रमुख गवर्नर (सूबेदार) होता था जो सीधा बादशाह को प्रतिवेदन प्रस्तुत करता था। प्रत्येक सूबा कई सरकारों में बंटा हुआ था। इन क्षेत्रों में फौजदारों को विशाल घुड़सवार सेना और तोपचियों के साथ नियुक्त किया जाता था। परगनों (उप- जिला) के प्रबन्ध के लिए कानूनगो, चौधरी तथा काजी नियुक्त किये जाते थे।

प्रश्न 69.
कन्धार सफावियों और मुगलों के बीच झगड़े की जड़ क्यों था? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
कन्धार ईरान के सफावियों एवं मुगलों के बीच झगड़े की जड़ था क्योंकि ईरान का शासक शाह अब्बास कन्धार पर अधिकार स्थापित करना चाहता था। 1613 में जहाँगीर ने शाह अब्बास के दरबार में कन्धार को मुगलों के आधिपत्य में रहने देने की वकालत करने के लिए एक राजनयिक दूत भेजा, परन्तु यह शिष्टमण्डल सफल नहीं हुआ। 1622 में एक ईरानी सेना ने कन्धार पर आक्रमण कर मुगल सेना को पराजित कर दिया और कन्धार के दुर्ग पर टि अधिकार कर लिया।

प्रश्न 70.
आटोमन साम्राज्य के साथ मुगलों के सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
आरोमन साम्राज्य के साथ मुगलों ने अपने सम्बन्ध इस बात को ध्यान में रखकर बनाए कि वे आटोमन- नियन्त्रण वाले क्षेत्रों में व्यापारियों व तीर्थयात्रियों के स्वतन्त्र आवागमन को बनाये रखवा सकें मुगल बादशाह प्राय: धर्म एवं वाणिज्य के मुद्दों को मिलाने का प्रयास करता था। वह लाल सागर के बन्दरगाह अदन और मोरवा को बहुमूल्य वस्तुओं के निर्यात को प्रोत्साहन देता था और इनकी विक्री से प्राप्त आय को उस क्षेत्र के धर्म-स्थलों व फकीरों में दान में बाँट देता था।

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प्रश्न 71.
जेसुइट धर्म प्रचारकों के साथ मुगलों के सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
अकबर ईसाई धर्म के विषय में जानने को बहुत उत्सुक था। उसके निमन्त्रण पर अनेक जेसुइट शिष्टमण्डल मुगल दरबार में आए। अकबर ने इन जेसुइट लोगों से ईसाई धर्म के विषय में वार्तालाप किया और उनसे बड़ा प्रभावित हुआ। जेसुइट लोगों को सार्वजनिक सभाओं में अकबर के सिंहासन के पास जगह दी जाती थी। वे उसके साथ अभियानों में जाते, उसके बच्चों को शिक्षा देते तथा उसके फुरसत के समय में वे प्रायः उसके साथ होते थे।

प्रश्न 72.
अकबर के धार्मिक विचारों के विकास का वर्णन कीजिए।
अथवा
अकबर की धार्मिक नीति का वर्णन कीजिये। उत्तर- 1575 में अकबर ने फतेहपुर सीकरी में इबादतखाने का निर्माण करवाया। उसने यहाँ इस्लाम, हिन्दू धर्म, ईसाई धर्म, जैन धर्म, पारसी धर्म के विद्वानों को आमन्त्रित किया। अकबर के धार्मिक विचार विभिन्न धर्मों व सम्प्रदायों के विद्वानों से प्रश्न पूछने और उनके धर्म-सिद्धान्तों के बारे में जानकारी एकत्रित करने से विकसित हुए। धीरे- धीरे वह धर्मों को समझने के रूढ़िवादी तरीकों से दूर प्रकाश और सूर्य पर केन्द्रित दैवीय उपासना की ओर बढ़ा।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
मुगल साम्राज्य के उत्कर्ष पर एक निबन्ध लिखिए।
अथवा
मुगल साम्राज्य के उत्थान व पतन का वर्णन कीजिए। उत्तर- मुगलों की उत्पत्ति ‘मुगल’ शब्द की उत्पत्ति मंगोल से हुई है। मुगलों ने स्वयं को ‘तैमूरी’ कहा क्योंकि पितृपक्ष से वे तुर्की शासक तिमूर के वंशज थे प्रथम मुगल शासक बाबर मातृपक्ष से चंगेज खाँ का सम्बन्धी था। उस समय से ही इस शब्द का निरन्तर प्रयोग होता रहा है।
मुगल साम्राज्य का उत्कर्ष
(1) जहीरुद्दीन बाबर जहीरुद्दीन बाबर मुगल- साम्राज्य का संस्थापक था उसे उसके प्रतिद्वन्द्वी उजबेकों ने उसके अपने देश फरगना से भगा दिया था। उसने सबसे पहले काबुल पर अधिकार किया। इसके बाद 1526 में अपने दल के सदस्यों की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए क्षेत्रों और संसाधनों की खोज में वह भारतीय उपमहाद्वीप में और आगे की ओर बढ़ा। 1530 में बाबर की मृत्यु हो गई।

(2) हुमायूँ बाबर की मृत्यु के बाद 1530 में हुमायूँ गद्दी पर बैठा। उसने अपने शासनकाल (1530-40.1555- 56) में साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। परन्तु वह अफगान नेता शेरशाह सूरी से पराजित हो गया। उसे विवश होकर भारत से भागना पड़ा। उसे ईरान के सफावी शासक के दरबार में शरण लेनी पड़ी 1555 में हुमायूँ ने अफगानों को पराजित कर दिया। परन्तु एक वर्ष बाद ही उसकी मृत्यु हो गई।

(3) जलालुद्दीन अकबर हुमायूँ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र जलालुद्दीन अकबर (1556-1605) गद्दी पर बैठा। वह मुगल राजवंश का सबसे महान शासक माना जाता है। अकबर ने हिन्दुकुश पर्वत तक अपने साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। उसने ईरान के सफ़ावियों और तूरान (मध्य एशिया) के उजबेकों की विस्तारवादी योजनाओं पर अंकुश लगाए रखा। 1605 में अकबर की मृत्यु हो गई।

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(4) अकबर के उत्तराधिकारी अकबर के बाद जहाँगीर (1605-27), शाहजहाँ (162858) तथा औरंगजेब (1658-1707) गद्दी पर बैठे ये तीनों ही बहुत योग्य उत्तराधिकारी सिद्ध हुए। इनके अधीन क्षेत्रीय विस्तार जारी रहा, यद्यपि इस विस्तार की गति काफी धीमी रही। उन्होंने शासन के विविध यन्त्रों को बनाए रखा और उन्हें सुदृढ़ किया।

(5) शाही संस्थाओं के ढाँचे का निर्माण इनके अन्तर्गत प्रशासन और कराधान के प्रभावशाली तरीके सम्मिलित थे। मुगलों द्वारा शुरू की गई राजनीतिक व्यवस्था सैन्य शक्ति और उपमहाद्वीप की भिन्न-भिन्न परम्पराओं को समायोजित करने की बुद्धिमत्तापूर्ण नीति पर आधारित थी।

(6) मुगल साम्राज्य का पतन 1707 में औरंगजेब की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के पश्चात् मुगलं साम्राज्य 1 का विघटन शुरू हो गया। फिर भी सांकेतिक रूप से मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठा बनी रही। 1857 में मुगल वंश के | अन्तिम शासक बहादुर शाह जफर द्वितीय को अंग्रेजों ने उखाड़ फेंका।

प्रश्न 2.
अबुल फजल के मुगल साम्राज्य में योगदान के विषय में आप क्या जानते हैं? विस्तार से समझाइए।
उत्तर:
अबुल फजल अकबर का एक अति महत्त्वपूर्ण दरबारी था। उसने अकबरनामा जैसे ग्रन्थों की रचना की थी। अबुल फजल का पालन-पोषण मुगल राजधानी आगरा हुआ था। वह अरबी तथा फारसी का अच्छा ज्ञाता था: साथ ही वह यूनानी दर्शन और सूफीवाद में भी रुचि रखता था अबुल फजल एक प्रभावशाली विचारक तथा तर्कशास्त्री था। उसने दकियानूसी उलेमाओं के विचारों का पूर्ण विरोध किया, जिसके कारण अकबर उससे अत्यधिक प्रभावित हुआ अकबर ने उसे अपने सलाहकार तथा अपनी नीतियों के प्रवक्ता के रूप में उपयुक्त पाया। अबुल फजल ने दरबारी इतिहासकार के रूप में अकबर के शासन से जुड़े विचारों को न केवल आकार दिया अपितु उनको स्पष्ट रूप से व्यक्त भी किया।

मुगल साम्राज्य में अबुल फजल का योगदान- अबुल फजल का महत्त्वपूर्ण योगदान अकबर के समय की ऐतिहासिक घटनाओं के वास्तविक विवरणों, शासकीय दस्तावेजों तथा जानकार व्यक्तियों के मौखिक प्रमाणों जैसे विभिन्न प्रकार के साक्ष्यों पर आधारित, अकबरनामा ग्रन्थ की रचना था। इस ग्रन्थ की रचना उसने 1589 ई. में आरम्भ की तथा इसे पूर्ण करने में उसे लगभग 13 वर्ष लगे। अबुल फजल का अकबरनामा तीन जिल्दों में है जिसमें प्रथम दो भाग इतिहास से सम्बन्धित हैं तथा तृतीय भाग आइन-ए-अकबरी है। प्रथम जिल्द में आदम से लेकर अकबर के जीवन के एक खगोलीय कालचक्र तक का मानव जाति का इतिहास है। द्वितीय जिल्द अकबर के 46वें शासन वर्ष पर खत्म होती है।

अकबरनामा का लेखन राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण पटनाओं का विवरण देने के उद्देश्य से किया गया। अकबर के साम्राज्य की तिथियों तथा समय के साथ होने वाले परिवर्तनों के उल्लेख के बिना ही भौगोलिक, सामाजिक, प्रशासनिक तथा सांस्कृतिक सभी पक्षों का विवरण प्रस्तुत करने के अभिन्न तरीके से भी इसका लेखन हुआ। अबुल फजल की आइन-ए-अकबरी में मुगल साम्राज्य को हिन्दुओं, जैनों, बौद्धों तथा मुसलमानों की भिन्न-भिन्न जनसंख्या वाले तथा एक मिश्रित संस्कृति वाले साम्राज्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इससे भारतीय- फारसी शैली को दरबार में संरक्षण प्राप्त हुआ।

प्रश्न 3.
मुगलकाल में फारसी भाषा के विकास का वर्णन कीजिए।
अथवा
मुगल सम्राटों ने फारसी भाषा को महत्त्व क्यों प्रदान किया?
उत्तर:
मुगलकाल में फारसी भाषा का विकास मुगलों के दरबारी इतिहास फारसी भाषा में लिखे गए थे। दिल्ली के सुल्तानों के काल में उत्तर भारतीय भाषाओं के साथ-साथ फारसी दरवार तथा साहित्यिक रचनाओं की भाषा के रूप में खूब विकसित हुई। चूंकि मुगल चग़ताई मूल के थे, अतः तुर्की उनकी मातृभाषा थी प्रथम मुगल सम्राट बाबर ने कविताएँ और अपने संस्मरण तुर्की भाषा में ही लिखे थे।
(1) फारसी को दरबार की मुख्य भाषा बनाना- मुगल सम्राट अकबर ने फारसी को दरबार की मुख्य भाषा बनाया।

सम्भवतः ईरान के साथ सांस्कृतिक और बौद्धिक सम्पर्कों के साथ-साथ मुगल दरबार में पद पाने के इच्छुक ईरानी और मध्य एशियाई प्रवासियों ने बादशाह को फारसी भाषा को अपनाए जाने के लिए प्रेरित किया होगा। फारसी को दरबार की भाषा का ऊंचा स्थान दिया गया तथा उन लोगों को “शक्ति एवं प्रतिष्ठा प्रदान की गई जिनका इस भाषा पर अच्छा नियन्त्रण था। सम्राट शाही परिवार के लोग और दरबार के विशिष्ट सदस्य फारसी भाषा बोलते थे। कुछ और आगे, यह सभी स्तरों के प्रशासन की भाषा बन गई, जिससे लेखाकारों, लिपिकों तथा अन्य अधिकारियों ने भी इसे सीख लिया।

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(2) अन्य भाषाओं को प्रभावित करना- जहाँ-जहाँ फारसी प्रत्यक्ष प्रयोग में नहीं आती थी, वहाँ भी राजस्थानी, मराठी और यहाँ तक कि तमिल में शासकीय लेखकों की भाषा को फारसी की शब्दावली और मुहावरों ने व्यापक रूप से प्रभावित किया। चूंकि सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दियों के दौरान फारसी का प्रयोग करने वाले लोग उपमहाद्वीप के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से आए थे और वे अन्य भारतीय भाषाएँ भी बोलते थे, इसलिए स्थानीय मुहावरों को शामिल करने से फारसी का भी भारतीयकरण हो गया था। फारसी के हिन्दवी के साथ पारस्परिक सम्पर्क से उर्दू के रूप में एक नई भाषा का उद्भव हुआ।

(3) फारसी में अनुवाद ‘ अकबरनामा’ और ‘बादशाहनामा’ जैसे मुगल इतिहास फारसी में लिखे गए थे, जबकि बाबर के संस्मरणों का ‘बाबरनामा’ के नाम से तुर्की से फारसी में अनुवाद किया गया था। मुगल बादशाहों ने ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ जैसे संस्कृत ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद करवाया। ‘महाभारत’ का अनुवाद ‘रज्मनामा’ (युद्धों की पुस्तक) के रूप में हुआ।

प्रश्न 4.
“मुगलकाल में मानव रूपों का चित्रण निरन्तर तनाव का कारण था।” उपर्युक्त तर्क देकर इस कथन का औचित्य निर्धारित कीजिए।
उत्तर:
मुगलकाल में मानव रूपों का चित्रण निरन्तर तनाव का कारण था। इस कथन के पक्ष में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत हैं-
(i) मुगलकाल में बादशाह, उसके दरबार एवं उसमें भाग लेने वाले लोगों का चित्रण करने वाले चित्रों की रचना को लेकर शासकों और मुसलमानों, रूढ़िवादी वर्ग के प्रतिनिधियों अर्थात् उलेमाओं के मध्य लगातार तनाव बना रहा। उलेमाओं ने कुरान के साथ-सात हदीस जिसमें पैगम्बर मुहम्मद के जीवन से एक ऐसा ही प्रसंग वर्णित है, में प्रतिष्ठित मानव रूपों के चित्रण पर इस्लामी प्रतिबन्ध का आह्वान किया।

(ii) इस प्रसंग में पैगम्बर मुहम्मद को प्राकृतिक तरीके से जीवित रूपों के चित्रण की मनाही करते हुए उल्लिखित किया गया है। क्योंकि ऐसा करने में लगता है कि कलाकार रचना की शक्ति को अपने हाथ में लेने का प्रयास कर रहा है। यह एक ऐसा कार्य था, जो केवल ईश्वर का ही था।

(iii) समय के साथ-साथ शरिया की व्याख्याओं में भी परिवर्तन आया। विभिन्न सामाजिक समूहों ने इस्लामी परम्परा के ढाँचे की अलग-अलग तरीकों से व्याख्या की। प्रायः प्रत्येक समूह ने इस परम्परा की ऐसी व्याख्या प्रतिपादित की, जो उनकी राजनीतिक आवश्यकताओं में सबसे अधिक समानता रखती थी। जिन शताब्दियों के दौरान सामान्य निर्माण हो रहा था। उस समय कई चित्रकार स्रोतों के शासकों ने नियमित रूप से कलाकारों को उनके चित्र एवं उनके राज्य के जीवन के दृश्य चित्रित करने के लिए नियुक्त किया। मुगलकालीन भारत में ईरान से कई चित्रकार आए: जैसे—मीर सैयद अली एवं अब्दुल समद।

(iv) बादशाह एवं रूढ़िवादी मुसलमान विचारधारा के प्रवक्ताओं के मध्य मानवों के दृश्य निरूपण पर मुगल दरबार में तनाव बना हुआ था। अकबर का दरबारी इतिहासकार अबुल फजल बादशाह को यह कहते हुए उद्धृत करता है” कई लोग ऐसे हैं जो चित्रकला को नापसन्द करते हैं। पर मैं ऐसे व्यक्तियों को नापसन्द करता हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि कलाकार के पास ख़ुदा को पहचानने का बेजोड़ तरीका है। क्योंकि कहीं न कहीं उसे ये महसूस होता है कि खुदा की रचना को वह जीवन नहीं दे सकता।”

(v) 17वीं शताब्दी में मुगल चित्रकारों ने बादशाहों को प्रभामण्डल के साथ चित्रित करना प्रारम्भ कर दिया। ईश्वर के प्रकाश के प्रतीक के रूप में इन प्रभामण्डलों को उन्होंने ईसा और वर्जिन मैरी के यूरोपीय चित्रों में देखा था।

प्रश्न 5.
मुगल पांडुलिपियों की रचना में चित्रकारों की भूमिका का वर्णन कीजिए। चित्रों के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए। चित्रों की रचना को लेकर तनाव क्यों बना रहा? उत्तर- मुगल पांडुलिपियों की रचना में चित्रकारों की भूमिका मुगल पांडुलिपियों की रचना में चित्रकारों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। किसी मुगल सम्राट के शासन की घटनाओं का विवरण देने वाले इतिहासों में लिखित पाठ के साथ ही उन घटनाओं को चित्रों के माध्यम से दृश्य रूप में भी वर्णित किया जाता था।
किसी
(1) चित्रों का महत्त्व –

  • सौन्दर्य में वृद्धि चित्र पुस्तक के सौन्दर्य में वृद्धि करते थे।
  • चित्रों के माध्यम से राजा की शक्ति को व्यक्त करना- लिखित माध्यम से राजा और राजा की शक्ति विषय में जो बात नहीं कही जा सकी हों, उन्हें चित्रों के माध्यम से व्यक्त कर दिया जाता था। के
  • निर्जीव वस्तुओं को सजीव बनाना इतिहासकार अबुल फजल ने चित्रकारी को एक ‘जादुई कला’ की संज्ञा दी है। उसके अनुसार चित्रकला निर्जीव वस्तुओं में भी प्राण फूंक सकती है।

(2) चित्रों की रचना को लेकर तनाव-मुगल सम्राट तथा उसके दरबार का चित्रण करने वाले चित्रों की रचना को लेकर शासकों और उलमा के बीच तनाव की स्थिति बनी रही। उलमा रूढ़िवादी मुसलमान वर्ग के प्रतिनिधि थे। उन्होंने कुरान के साथ-साथ हदीस में प्रतिष्ठापित मानव रूपों के चित्रण पर इस्लामी प्रतिबन्ध का आह्वान किया।

(3) नियमित रूप से कलाकारों को नियुक्त करना- कई एशियाई शासकों ने अपने तथा अपने राज्य के जीवन के दृश्य चित्रित करने के लिए नियमित रूप से कलाकारों को नियुक्त किया। उदाहरण के लिए, ईरान के सफावी राजाओं ने अपने दरबार की कार्यशालाओं में प्रशिक्षित एवं उत्कृष्ट कलाकारों को संरक्षण प्रदान किया। विहजाद जैसे चित्रकारों ने सफ़ावी दरबार की सांस्कृतिक प्रसिद्धि को चारों ओर फैलाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

(4) ईरानी कलाकारों का मुगलकालीन भारत में आगमन – मुगलकाल में ईरानी कलाकार भी भारत में आए। ईरान के प्रसिद्ध चित्रकार मीर सैयद अली तथा अब्दुस समद बादशाह हुमायूँ के साथ दिल्ली आए। कुछ अन्य कलाकार संरक्षण और प्रतिष्ठा के अवसरों की तलाश में भारत पहुँचे। परन्तु बादशाह और रूढ़िवादी मुस्लिम विचारधारा के प्रवक्ताओं के बीच जीवधारियों के चित्र बनाने पर मुगल दरबार में तनाव की स्थिति बनी रही।

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प्रश्न 6.
अबुल फजल चित्रकला को महत्त्वपूर्ण क्यों मानता था? उसने अकबरकालीन चित्रकला की किन विशेषताओं का वर्णन किया है?
उत्तर:
चित्रकला का महत्त्व अबुल फसल निम्नलिखित आधारों पर चित्रकला को महत्त्वपूर्ण मानता था-
(1) चित्रकला एक जादुई कला इतिहासकार अबुल फजल ने चित्रकला को एक ‘जादुई कला’ की संज्ञा दी है उसके अनुसार चित्रकला किसी भी निर्जीव वस्तु में प्राण फूँक सकती है।

(2) मुगल सम्राटों की चित्रकला में रुचि अबुल फसल के अनुसार मुगल सम्राट अकबर ने अपनी युवावस्था के प्रारम्भिक दिनों से ही चित्रकला में अपनी अभिरुचि व्यक्त की थी। वह चित्रकला को अध्ययन और मनोरंजन दोनों का ही साधन मानते थे तथा इस कला को हर सम्भव प्रोत्साहन देते थे। मुगल पांडुलिपियों में चित्रों के अंकन के लिए चित्रकारों की एक बड़ी संख्या नियुक्त की गई थी। हर सप्ताह शाही कार्यालय के अनेक निरीक्षक और लिपिक बादशाह के सामने प्रत्येक कलाकार का कार्य प्रस्तुत करते थे। इन कृतियों के अवलोकन के बाद बादशाह प्रदर्शित उत्कृष्टता के आधार पर चित्रकारों को पुरस्कृत करते थे तथा उनके मासिक वेतन में वृद्धि करते थे।

(3) अकबरकालीन चित्रकला की विशेषताएँ- अकबरकालीन चित्रकला की विशेषताएँ निम्नलिखित थीं-

  • उत्कृष्ट चित्रकारों का उपलब्ध होना चित्रकारों को प्रोत्साहन दिए जाने के परिणामस्वरूप अकबर के समय में उत्कृष्ट चित्रकार मिलने लगे थे। बिहजाद जैसे चित्रकारों की सर्वोत्तम कलाकृतियों को तो उन यूरोपीय चित्रकारों की उत्कृष्ट कलाकृतियों के समक्ष रखा जा सकता था जिन्होंने विश्व में अत्यधिक ख्याति प्राप्त कर ली थी।
  • विवरण की सूक्ष्मता, परिपूर्णता तथा प्रस्तुतीकरण की निर्भीकता विवरण की सूक्ष्मता, परिपूर्णता तथा प्रस्तुतीकरण की निर्भीकता जो अकबरकालीन चित्रों में दिखाई पड़ती थी, वह अतुलनीय थी यहाँ तक कि निर्जीव वस्तुएँ भी सजीव प्रतीत होती थीं।
  • हिन्दू चित्रकारों की दक्षता अकबर के प्रोत्साहन के परिणामस्वरूप उसके दरबार में सौ से भी अधिक चित्रकार थे, जो इस कला की साधना में लगे हुए थे। हिन्दू कलाकारों के लिए यह बात विशेष तौर पर सही थी। उनके चित्र वस्तुओं की हमारी परिकल्पना से परे थे। वस्तुतः सम्पूर्ण विश्व में कुछ लोग ही उनकी तुलना कर सकते थे।

प्रश्न 7.
सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के दौरान मुगलों की राजधानियाँ तीव्रता से स्थानान्तरित होने लगीं। | व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
राजधानी नगर मुगल साम्राज्य का केन्द्रीय स्थल होता था दरबार का आयोजन इसी केन्द्रीय स्थल राजधानी के नगर में किया जाता था मुगलों की राजधानियाँ सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में तीव्रता से एक नगर से दूसरे नगर में स्थानान्तरित होने लग। बाबर, जिसने कि मुगल साम्राज्य की स्थापना की थी, ने इब्राहीम लोदी के द्वारा स्थापित राजधानी आगरा पर अधिकार कर लिया था। अपने शासन काल के चार वर्षों में अपने दरबार भिन्न-भिन्न स्थानों पर लगाए। 1560 ई. में अकबर ने आगरा में किले का निर्माण करवाया, जिसे आस-पास की खदानों से लाए गए लाल बलुआ पत्थर से निर्मित किया गया था।

(1) फतेहपुर सीकरी – अकबर ने 1570 ई. के दशक में अपनी नई राजधानी फतेहपुर सीकरी में बनाने का निर्णय लिया। इसका कारण सम्भवतः यह माना जाता है कि अकबर प्रसिद्ध सूफी संत शेख मुईनुद्दीन चिश्ती का मुरीद था जिनकी दरगाह अजमेर में है। फतेहपुर सीकरी अजमेर जाने वाली सीधी सड़क पर स्थित था। अकबर ने फतेहपुर सीकरी में जुम्मा मस्जिद के निकट ही शेख सलीम चिश्ती के लिए संगमरमर के मकबरे का निर्माण भी करवाया। अकबर ने फतेहपुर सीकरी में ही एक विशाल मेहराबी प्रवेश द्वार: जिसे बुलन्द दरवाजा कहा जाता है, का निर्माण भी करवाया।

(2) लाहौर अकबर ने 1585 ई. में अपनी राजधानी को लाहौर स्थानान्तरित कर दिया। लाहौर में राजधानी के स्थानान्तरण का कारण उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर प्रभावशाली नियन्त्रण स्थापित करना था।

(3) शाहजहांनाबाद में राजधानी की स्थापना- शाहजहाँ के पास भवन निर्माण के लिए व्यापक धन राशि का प्रबन्ध था। शाहजहाँ ने दिल्ली के प्राचीन रिहायशी नगर में शाहजहाँनाबाद के नाम से नई राजधानी का निर्माण किया। शाहजहांनाबाद एक नई शाही आबादी के रूप में विकसित हुआ। मुख्य बात तो यह है कि शाहजहाँ की पुत्री जहाँआरा ने इस नई राजधानी की कई वास्तुकलात्मक संरचनाओं की रूपरेखा निर्मित की: जिनमें चाँदनी चौक और कारवाँ सराय नामक दोमंजिली इमारत प्रमुख थी।

प्रश्न 8.
अकबरनामा के ऐतिहासिक महत्त्व का विवेचन कीजिए।
अथवा
‘अकबरनामा’ पर एक लघु निबन्ध लिखिए।
अथवा
‘अबुल फजल’ और ‘अकबरनामा’ का परिचय दीजिए।
उत्तर:
अबुल फजल का परिचयं अबुल फसल मुगल सम्राट अकबर का दरबारी इतिहासकार था। अबुल फजल का पालन पोषण मुगल राजधानी आगरा में हुआ था वह अरबी, फारसी, यूनानी दर्शन और सूफीवाद का प्रकाण्ड विद्वान् था। वह एक प्रभावशाली तर्कशील व्यक्ति तथा स्वतन्त्र चिन्तक था। उसने आजीवन रूढ़िवादी उलमा के विचारों का विरोध किया। अबुल फसल के इन गुणों से अकबर बहुत प्रभावित हुआ। दरबारी इतिहासकार के रूप में अबुल फजल ने अकबर के शासन से जुड़े विचारों को न केवल आकार प्रदान किया, बल्कि उनको स्पष्ट रूप से व्यक्त भी किया।

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‘अकबरनामा’
‘अकबरनामा’ महत्त्वपूर्ण चित्रित मुगल इतिहासों में सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इसमें लगभग 150 पूरे अथवा दोहरे पृष्ठों पर लड़ाई, घेराबन्दी, शिकार, भवन-निर्माण, दरबारी दृश्य आदि के चित्र हैं। अबुल फजल ने 1589 में शुरू कर ‘ अकबरनामा’ पर तेरह वर्षों तक कार्य किया और इस दौरान उसने कई बार इसके प्रारूप में सुधार किया। यह इतिहास घटनाओं के वास्तविक विवरणों, शासकीय दस्तावेजों तथा जानकार व्यक्तियों के मौखिक प्रमाणों पर आधारित है।
(1) तीन जिल्दों में विभक्त’ अकबरनामा’ को तीन जिल्दों में विभाजित किया गया है, जिनमें से प्रथम दो जिल्दें इतिहास हैं। तीसरी जिल्द ‘आइन-ए-अकबरी’ है।

  • पहली जिल्द पहली जिल्द में आदम से लेकर अकबर के जीवन के एक खगोलीय कालचक्र तक (30 वर्ष) का मानव जाति का इतिहास है।
  • दूसरी जिल्द दूसरी जिल्द अकबर के 46 वें शासन वर्ष (1601 ई.) पर समाप्त होती है। 1602 में राजकुमार सलीम ने अबुल फजल की हत्या का एक षड्यन्त्र रचा जिसके अनुसार सलीम के सहापराधी बीरसिंह बुन्देला ने ‘अबुल फसल की हत्या कर दी।
  • तीसरी जिल्द-तीसरी जिल्द ‘आइन-ए-अकबरी’ है। इसमें मुगल साम्राज्य को हिन्दुओं, जैनियों, बौद्धों और मुसलमानों की भिन्न-भिन्न आबादी वाले तथा एक मिश्रित संस्कृति वाले साम्राज्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

(2) ‘अकबरनामा’ का ऐतिहासिक महत्त्व इसमें तिथियों और समय के साथ होने वाले परिवर्तनों के उल्लेख के बिना ही अकबर साम्राज्य के भौगोलिक, सामाजिक, संजीव पास बुक्स प्रशासनिक और सांस्कृतिक सभी पक्षों का विवरण प्रस्तुत किया गया है।

(3) अबुल फजल की भाषा अबुल फजल की भाषा बहुत अलंकृत थी इस भारतीय फारसी शैली को मुगल दरबार में संरक्षण प्राप्त हुआ।

प्रश्न 9.
मुगल साम्राज्य के सूचना तन्त्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुगल साम्राज्य में व्यापक सूचना तन्त्र विकसित था साम्राज्य से सम्बन्धित सभी क्रिया-कलापों का व्यापक आलेखन किया जाता था। सभी महत्त्वपूर्ण सूचनाओं को दर्ज किया जाता था। लेखन के लिए दरबारी लेखकों, जिन्हें वाकया नवीस कहा जाता था की नियुक्ति की गयी थी। मीर बख्शी इन लेखकों के कार्यों का निरीक्षण करता था। वाकया नवीस ही दरबार में प्रस्तुत की जाने वाली अर्जियों, दस्तावेजों और शासकीय आदेशों को लिपिबद्ध करते थे।

इसके अतिरिक्त अखबारात ए- दरबारी )- मुअल्ला उच्च दरबार से समाचार शीर्षक के अन्तर्गत ओभजातों और क्षेत्रीय शासकों के प्रतिनिधि दरबार की सभी कार्यवाहियों का विवरण तैयार करते थे। इन अखवारों में सभी प्रकार की सूचनाओं: जैसे- दरबार में उपस्थित लोगों का विवरण, पदों और पदवियों का दान, राजनयिक शिष्टमण्डलों से जुड़ी हुई सूचनाएँ, ग्रहण तथा दान किए गए उपहारों आदि का दिनांक और समय के साथ लेखन किया जाता था। यह सूचनाएँ राजाओं के सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन का इतिहास लिखने के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत होती हैं।

सूचनाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने के लिए पूरा साम्राज्य एक तन्त्र से जुड़ा हुआ था। समाचार वृत्तान्त और महत्त्वपूर्ण शासकीय दस्तावेज डाक के जरिए बाँस के डिब्बे में लपेटकर हरकारों के दलों द्वारा भेजे जाते थे। हरकारों के यह दल क्रमबद्ध रूप से दिन-रात दौड़ते रहते थे। इस प्रकार बादशाह को राजधानी से काफी दूर स्थित प्रान्तों के समाचार कुछ ही दिन में मिल जाते थे। प्रान्तों में राजधानी के अभिजातों के प्रतिनिधि दरवार द्वारा माँगी गई जानकारी को एकत्र कर सन्देशवाहकों के जरिए अपने अधिकारी के पास भेज दिया करते थे। विस्तृत मुगल साम्राज्य के सुचारु संचालन हेतु यह सूचना तन्त्र अति आवश्यक था।

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प्रश्न 10.
‘सुलह-ए-कुल’ के सिद्धान्त की विवेचना कीजिए। इसे किस प्रकार लागू किया गया?
उत्तर:
‘सुलह-ए-कुल’ के सिद्धान्त मुगल इतिवृत्त मुगल साम्राज्य को हिन्दुओं, जैनों, जरतुश्तियों और मुसलमानों के अनेक नृजातीय और धार्मिक समुदायों के समूह के रूप में प्रस्तुत करते हैं। शान्ति और स्थायित्व के स्त्रोत के रूप में मुगल सम्राट सभी धार्मिक और नृजातीय समूहों से ऊपर होता था वह इनके बीच मध्यस्थता करता था तथा यह सुनिश्चित करता था कि न्याय और शान्ति बनी रहे।
(1) प्रबुद्ध शासन का आधार अबुल फजल सुलाह- ए-कुल (पूर्ण शान्ति) के आदर्श को प्रबुद्ध शासन का आधार बताता है।
(2) अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता-‘सुलह-ए-कुल’ में सभी धर्मों और मतों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता थी।
(3) राज्य सत्ता को क्षति नहीं पहुँचाना-किन्तु उसकी एक शर्त थी कि वे राज्य सत्ता को क्षति नहीं पहुँचायेंगे अथवा आपस में नहीं लड़ेंगे।

सुलह-ए-कुल के आदर्श को लागू करना-
(1) अभिजात वर्ग को पद और पुरस्कार देना- सुलह-ए-कुल का आदर्श राज्य नीतियों के द्वारा लागू किया गया। मुगलों के अधीन अभिजात वर्ग में ईरानी, तूरानी, अफगानी राजपूत, दक्खनी सभी सम्मिलित थे। इन सब को पद और पुरस्कार दिए गए जो पूरी तरह से राजा के प्रति उनकी सेवा और निष्ठा पर आधारित थे।

(2) तीर्थयात्रा कर तथा जजिया समाप्त करना- 1563 में अकबर ने तीर्थयात्रा कर तथा 1564 में जजिया को समाप्त कर दिया क्योंकि ये दोनों कर धार्मिक पक्षपात पर आधारित थे।

(3) प्रशासन में सुलह-ए-कुल के नियमों का अनुपालन करवाना साम्राज्य के अधिकारियों को आदेश दिए गए कि ये प्रशासन में सुलह-ए-कुल’ के नियमों का अनुपालन करवाएं।

(4) सहिष्णुतापूर्ण धार्मिक नीति- अधिकांश मुगल बादशाहों ने सहिष्णुतापूर्ण धार्मिक नीति अपनाई। उन्होंने उपासना स्थलों के निर्माण व रख-रखाव के लिए अनुदान दिए। यहाँ तक कि युद्ध के दौरान जब मन्दिर नष्ट कर दिए जाते थे, तो बाद में सम्राटों द्वारा उनकी मरम्मत के लिए अनुदान जारी किए जाते थे। ऐसा हमें शाहजहाँ और औरंगजेब के शासन में पता चलता है, यद्यपि औरंगजेब के शासन काल में गैर-मुसलमान प्रजा पर जजिया फिर से लगा दिया गया।

प्रश्न 11.
मुगलकालीन राजधानी नगरों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुगलकालीन राजधानी नगर मुगल राजधानी नगर मुगल साम्राज्य का हृदय स्थल था। राजधानी नगर में ही दरबार लगता था। सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियों के दौरान मुगलों की राजधानी तेजी से स्थानान्तरित होने लगीं। 1560 के दशक में अकबर ने आगरा के किले का निर्माण करवाया। इसे लाल बलुआ पत्थर से बनाया गया था। यह बलुआ पत्थर आस-पास के क्षेत्रों की खदानों से लाया गया था।

(1) फतेहपुर सीकरी – 1570 के दशक में अकबर ने फतेहपुर सीकरी में एक नई राजधानी बनाने का निर्णय लिया। मुगल सम्राटों के चिश्ती सिलसिले के सूफियों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हो गए थे। अकबर ने फतेहपुर सीकरी में जुम्मा मस्जिद के बगल में ही शेख सलीम चिश्ती के लिए सफेद संगमरमर का एक मकबरा बनवाया। उसने एक विशाल मेहराबी प्रवेशद्वार अथवा बुलन्द दरवाजा भी बनवाया जिसका उद्देश्य वहाँ आने वाले लोगों को गुजरात में मुगल विजय की याद दिलाना था।

(2) लाहौर 1585 ई. में उत्तर-पश्चिमी सीमा पर प्रभावशाली नियन्त्रण स्थापित करने के लिए राजधानी को लाहौर स्थानान्तरित कर दिया गया। इस प्रकार तेरह वर्षों तक अकबर ने इस सीमा पर गहरी चौकसी बनाए रखी।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 9 शासक और इतिवृत्त : मुगल दरबार

(3) शाहजहाँ की भवन निर्माण में गहरी रुचि- शाहजहाँ की भवन निर्माण में गहरी रुचि थी। उसने विवेकपूर्ण राजकोषीय नीतियों को आगे बढ़ाया तथा भवन निर्माण की अपनी अभिरुचि की पूर्ति के लिए पर्याप्त धन इकट्ठा कर लिया। राजकीय संस्कृतियों में भवन निर्माण कार्य राजवंशीय सत्ता, धन तथा प्रतिष्ठा का सर्वाधिक ठोस प्रतीक था मुसलमान शासकों के संदर्भ में इसे धर्मनिष्ठा के एक कार्य के रूप में भी देखा जाता था।

(4) नई राजधानी शाहजहाँनाबाद की स्थापना- 1648 में शाहजहाँ के शासनकाल में दरबार, सेना व राजसी खानदान आगरा से नई निर्मित शाही राजधानी शाहजहाँनाबाद (दिल्ली) चले गए। दिल्ली के प्राचीन रिहायशी नगर में स्थित शहजहांनाबाद एक नई और शाही आबादी थी। यहाँ लालकिला, जामा मस्जिद, चाँदनी चौक के बाजार की वृक्ष-वीथि और अभिजात वर्ग के बड़े-बड़े पर थे। शाहजहाँ द्वारा स्थापित यह नया शहर विशाल एवं भव्य मुगल राजतंत्र का प्रतीक था।

प्रश्न 12.
“मुगल दरबार का केन्द्र बिन्दु राजसिंहासन अथवा तख्त था जिसने सम्प्रभु के कार्यों को भौतिक स्वरूप प्रदान किया था।” व्याख्या कीजिए।
अथवा
मुगल दरबार में अभिजात वर्गों के बीच हैसियत को निर्धारित करने वाले नियमों, अभिवादन के तरीकों एवं दरबार में मनाए जाने वाले त्यौहारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुगल दरबार बादशाह पर केन्द्रित दरबार की भौतिक व्यवस्था ने बादशाह के अस्तित्व को समाज के हृदय के रूप में दर्शाया। दीर्घकाल से भारत में राजतन्त्र का प्रतीक रही छतरी, बादशाह की चमक को सूर्य की चमक से अलग करने वाली मानी जाती थी।
(1) अभिजात वर्गों के बीच हैसियत को निर्धारित करने वाले नियम- मुगल इतिवृत्तों में मुगल अभिजात वर्गों के बीच हैसियत को निर्धारित करने वाले नियमों का वर्णन किया गया है।

दरबार में किसी दरबारी की हैसियत इस बात से निर्धारित होती थी कि वह बादशाह के कितना पास और दूर बैठा है। एक बार जब बादशाह सिंहासन पर बैठ जाता था तो किसी भी दरबारी को अपने स्थान से कहीं और जाने की अनुमति नहीं थी और न ही कोई अनुमति के बिना दरबार से बाहर जा सकता था।

(2) बादशाह को किए गए अभिवादन के तरीके से अभिजात वर्ग की हैसियत का बोध होना-मुगल दरबार में बादशाह को किए गए अभिवादन के तरीके से अभिजात- वर्ग के व्यक्ति की हैसियत का बोध होता था। जिस व्यक्ति के सामने अधिक झुक कर अभिवादन किया जाता था, उस व्यक्ति की हैसियत अधिक ऊँची मानी जाती थी। अभिवादन का उच्चतम रूप ‘सिजदा’ या दंडवत् लेटना था।

(3) राजनयिक दूतों से सम्बन्धित नयाचार- मुगल- सम्राट के सामने प्रस्तुत होने वाले राजदूत से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह अभिवादन के मान्य रूपों में से एक या तो बहुत झुककर अथवा जमीन को चूमकर अथवा फारसी रिवाज के अनुसार छाती के सामने हाथ बाँधकर तरीके से अभिवादन करेगा।

(4) झरोखा दर्शन – मुगल बादशाह अपने दिन की शुरुआत सूर्योदय के समय कुछ व्यक्तिगत धार्मिक प्रार्थनाओं से करता था। इसके बाद वह पूर्व की ओर मुँह किए एक छोटे छज्जे अर्थात् झरोखे में आता था। इसके नीचे लोगों को एक भारी भीड़ बादशाह की एक झलक पाने के लिए प्रतीक्षा करती थी। इस प्रथा का उद्देश्य जन विश्वास के रूप में शाही सत्ता की स्वीकृति का और विस्तार करना था।

(5) दीवान-ए-आम एवं दीवान-ए-खास-झरोखे में एक घंटा बिताने के बाद बादशाह सार्वजनिक सभा- भवन (दीवान-ए-आम) में आता था। वहाँ राज्य के अधिकारी रिपोर्ट तथा प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत करते थे दो घंटे बाद बादशाह दीवान-ए-खास में निजी सभाएँ करता था तथा गोपनीय मामलों पर चर्चा करता था।

(6) दरबार का जीवन्त वातावरण सिंहासनारोहण की वर्षगाँठ, ईद, शब-ए-बारात तथा होली जैसे कुछ विशिष्ट अवसरों पर दरबार का वातावरण जीवन्त हो उठता था सुसज्जित डिब्बों में रखी सुगंधित मोमबत्तियाँ और महल की दीवारों पर लटक रहे रंग-बिरंगे बंदनवार आने वाले लोगों को आश्चर्यजनक रूप से प्रभावित करते थे।

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(7) विवाह मुगल काल में शाही परिवारों में विवाहों का आयोजन काफी खर्चीला होता था। 1633 ई. में शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह का विवाह राजकुमार परवेज की पुत्री नादिरा से हुआ। विवाह के उपहारों के प्रदर्शन की व्यवस्था ‘दीवान-ए-आम’ में की गई थी। हिनाबन्दी (मेहंदी लगाना) की रस्म दीवान-ए-खास में अदा की गई। दरबार में उपस्थित लोगों के बीच पान, इलायची तथा मेवे वाटे गए। इस विवाह पर कुल 32 लाख रुपये खर्च हुए थे।

प्रश्न 13.
मुगल सम्राटों द्वारा अभिजात वर्ग को प्रदान की जाने वाली पदवियों और उपहारों का वर्णन कीजिए। दरबारियों और राजदूतों द्वारा बादशाहों को उपहार देने का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
मुगल सम्राटों द्वारा अभिजात वर्ग को प्रदान की जाने वाली पदवियाँ तथा उपहार
राज्याभिषेक के समय अथवा किसी शत्रु पर विजय के. बाद मुगल बादशाह विशाल पदवियाँ ग्रहण करते थे। जब उद्घोषक (नकीब) इन पदवियों की घोषणा करते थे, तो दरबार में आश्चर्य का वातावरण बन जाता था मुगल सिक्कों पर राजसी नयाचार के साथ सत्तारूढ़ बादशाह की पूरी पदवी होती थी।

(1) अभिजात वर्ग को पदवियाँ, पुरस्कार एवं उपहार देना योग्य व्यक्तियों को पदवियाँ देना मुगल- राजतन्त्र का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष था दरबारी पदानुक्रम में किसी व्यक्ति की उन्नति को उसके द्वारा धारण की जाने वाली पदवियों से जाना जा सकता था। ‘आसफखों की पदवी उच्चतम मन्त्रियों में से एक को दी जाती थी। औरंगजेब ने अपने दो उच्च पदस्थ अभिजातों-जयसिंह और जसवन्त सिंह को ‘मिज राजा’ की पदवी प्रदान की। योग्यता के आधार पर पदवियाँ या तो अर्जित की जा सकती थीं अथवा इन्हें प्राप्त करने के लिए धन दिया जा सकता था। मीरखान नामक एक मनसबदार ने अपने नाम में अलिफ अर्थात् ‘अ’ अक्षर लगाकर उसे अमीरखान करने के लिए औरंगजेब को एक लाख रुपये देने का प्रस्ताव किया।

( 2) ‘ सम्मान का जामा’ (खिल्लत) – अन्य पुरस्कारों में सम्मान का जामा ( खिल्लत) भी शामिल था जिसे पहले कभी-न-कभी बादशाह द्वारा पहना गया होता था। इसलिए यह समझा जाता था कि वह बादशाह के आशीर्वाद का प्रतीक है।

(3) सरप्पा (सर से पाँव तक )- बादशाह द्वारा अभिजातों को प्रदान किये जाने वाले एक अन्य उपहार

‘सरप्पा’ (सर से पाँव तक) था इस उपहार के तीन भाग हुआ करते थे-
(1) जामा
(2) पगड़ी तथा
(3) पटका।
(4) रत्नजड़ित आभूषण बादशाह द्वारा अभिजात- वर्ग के लोगों को प्रायः रत्नजड़ित आभूषण भी उपहार के रूप में दिए जाते थे। विशिष्ट परिस्थितियों में बादशाह कमल की मंजरियों वाला रत्नजड़ित गहनों का सेट (पद्ममुरस्सा) भी उपहार में प्रदान करता था।

(5) दरबारियों एवं राजदूतों द्वारा बादशाह की सेवा में उपहार प्राप्त करना कोई भी दरबारी बादशाह के पास कभी खाली हाथ नहीं जाता था। वह या तो नज़ के रूप में थोड़ा धन या पेशकश के रूप में मोटी रकम बादशाह की सेवा में प्रस्तुत करता था। राजनयिक सम्बन्धों में उपहारों को सम्मान और आदर का प्रतीक माना जाता था। राजदूत प्रतिद्वन्द्वी राजनीतिक शक्तियों के बीच सन्धि और सम्बन्धों के द्वारा समझौता करवाने के महत्त्वपूर्ण कार्य करते थे। ऐसी परिस्थितियों में उपहारों की महत्त्वपूर्ण प्रतीकात्मक भूमिका होती थी। अंग्रेज राजदूत सर टामस रो ने आसफ खाँ को एक अंगूठी भेंट की थी, परन्तु वह उसे केवल इसलिए वापस कर दी गई कि वह मात्र चार सौ रुपये मूल्य की थी।

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प्रश्न 14.
“मुगल साम्राज्य में शाही परिवार की स्त्रियों द्वारा निभाई गई भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थी। ” विवेचना कीजिए।
उत्तर:
(1) मुगल परिवार मुगल परिवार में बादशाह की पत्नियाँ और उपपत्नियाँ, उसके नजदीकी और दूर के सम्बन्धी (माता, सौतेली व उपमाताएँ, बहन, पुत्री, बहू, चाची-मौसी, बच्चे आदि) महिला परिचारिकाएँ तथा गुलाम होते थे। शासक वर्ग में बहुविवाह प्रथा व्यापक रूप से प्रचलित थी।

(2) अगहा तथा अगाचा मुगल परिवार में शाही परिवारों से आने वाली स्त्रियों (बेगमों) और अन्य स्वियों (अगहा) जिनका जन्म कुलीन परिवार में नहीं हुआ था, में अन्तर रखा जाता था। दहेज (मेहर) के रूप में विपुल नकद और बहुमूल्य वस्तुएँ लाने वाली बेगमों को अपने पतियों से स्वाभाविक रूप से ‘अगहाओं’ की तुलना में अधिक ऊंचा दर्जा और सम्मान मिलता था।

(3) वंश आधारित पारिवारिक ढाँचे का स्थायी नहीं होना – वंश आधारित पारिवारिक ढाँचा पूरी तरह स्थायी नहीं था।

(4) गुलाम- पत्नियों के अतिरिक्त मुगल परिवार में अनेक महिला तथा पुरुष गुलाम होते थे वे साधारण से साधारण कार्य से लेकर कौशल, निपुणता तथा बुद्धिमत्ता के अलग-अलग कार्य करते थे गुलाम हिजड़े (ख्वाजासर) परिवार के अन्दर और बाहर के जीवन में रक्षक, नौकर तथा व्यापार में रुचि रखने वाली महिलाओं के एजेन्ट होते थे।

(5) शाही परिवार की स्त्रियों का वित्तीय संसाधनों पर नियंत्रण – नूरजहाँ के बाद मुगल रानियों और राजकुमारियों ने महत्त्वपूर्ण वित्तीय स्रोतों पर नियंत्रण रखना शुरू कर दिया। शाहजहाँ की पुत्रियों जहाँआरा तथा रोशनआरा को ऊंचे शाही मनसबदारों के समान वार्षिक आय होती थी। इसके अतिरिक्त जहाँआरा को सूरत के बन्दरगाह नगर से राजस्व प्राप्त होता था।

(6) निर्माण कार्यों में भाग लेना मुगल परिवार की महत्त्वपूर्ण स्वियों ने इमारतों व बागों का निर्माण भी करवाया। जहाँआरा ने शाहजहाँ की नई राजधानी शाहजहांनाबाद (दिल्ली) की अनेक वास्तुकलात्मक परियोजनाओं में भाग लिया। इनमें से एक दो मंजिली भव्य इमारत कारवां सराय थी, जिसमें एक आँगन व बाग भी था। शाहजहाँनाबाद के मुख्य केन्द्र चाँदनी चौक की रूपरेखा भी जहाँआरा द्वारा बनाई गई थी।

(7) लेखन कार्य में योगदान गुलबदन बेगम एक उच्च कोटि की लेखिका थी वह बाबर की पुत्री हुमायूँ की बहिन तथा अकबर की बुआ थी वह स्वयं तुर्की तथा फारसी में धारा प्रवाह लिख सकती थी। उसने ‘हुमायूँनामा’ नामक पुस्तक लिखी जिससे हमें मुगलों की घरेलू दुनिया की एक झलक मिलती है।

प्रश्न 15.
कन्धार, आटोमन साम्राज्य तथा जैसुइट धर्म प्रचारकों के साथ मुगल सम्राटों के सम्बन्धों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
(1) कन्धार के साथ मुगल सम्राटों के सम्बन्ध-कन्धार ईरान के सफावियों और मुगलों के बीच झगड़े की जड़ था। कन्धार का किला नगर आरम्भ में हुमायूँ के आधिकार में था। 1595 में अकबर ने कन्धार पर पुनः अधिकार कर लिया था। यद्यपि ईरान के शासक शाह अब्बास ने मुगलों के साथ अपने राजनयिक सम्बन्ध बनाए रखे तथापि कन्धार पर वह अपना दावा करता रहा।

1613 में जहाँगीर ने शाह अब्बास के दरबार में कन्धार को मुगलों के आधिपत्य में रहने देने की वकालत करने के लिए एक राजनयिक दूत भेजा, परन्तु यह शिष्टमण्डल अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हुआ। 1622 में एक ईरानी सेना ने कन्धार पर घेरा डाल दिया। यद्यपि मुगल सेना ने ईरानियों का मुकाबला किया, परन्तु उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा। इस प्रकार कन्धार के किले तथा नगर पर ईरानियों का अधिकार हो गया।

(2) आटोमन साम्राज्य के साथ मुगलों के सम्बन्ध- आटोमन साम्राज्य के साथ मुगलों ने अपने सम्बन्ध इस बात को ध्यान में रखकर बनाए कि वे आटोमन नियन्त्रण वाले क्षेत्रों में व्यापारियों व तीर्थयात्रियों के स्वतंत्र आवागमन को बनाये रखवा सकें। इस क्षेत्र के साथ अपने सम्बन्धों में मुगल बादशाह, प्राय: धर्म एवं वाणिज्य के मुद्दों को मिलाने का प्रयास करता था। वह लाल सागर के बन्दरगाह अदन और मोरवा को बहुमूल्य वस्तुओं के निर्यात को प्रोत्साहन देता था और इनकी बिक्री से प्राप्त आय को उस क्षेत्र के धर्मस्थलों व फकीरों में दान में बाँट देता था।

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(3) जैसुइट धर्म प्रचारकों के साथ मुगलों के सम्बन्ध-पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्त में पुर्तगाली व्यापारियों ने तटीय नगरों में व्यापारिक केन्द्रों का जाल स्थापित किया। पुर्तगाल का सम्राट भी ‘सोसाइटी ऑफ जीसस’ (जेसुइट ) के धर्म प्रचारकों की सहायता से ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करना चाहता था। सोलहवीं शताब्दी के दौरान भारत आने वाले जेसुइट शिष्टमण्डल व्यापार और साम्राज्य निर्माण की इस प्रकिया के हिस्सा थे।

अकबर ईसाई धर्म के विषय में जानने को बहुत उत्सुक था। उसने जेसुइट पादरियों को आमन्त्रित करने के लिए एक दूत मंडल गोवा भेजा। पहला जेसुइट शिष्टमंडल फतेहपुर सीकरी के मुगल दरबार में 1580 में पहुँचा और वह वहाँ लगभग दो वर्ष रहा। इन जेसुइट लोगों ने ईसाई धर्म के विषय में अकबर से वार्तालाप किया और इसके सद्गुणों के विषय में उलमा से उनका वाद-विवाद हुआ।

लाहौर के मुगल दरबार में दो और शिष्टमण्डल 1591 और 1595 में भेजे गए। जेसुइट विवरण व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित हैं और वे मुगल सम्राट अकबर के चरित्र और सोच पर गहरा प्रकाश डालते हैं। सार्वजनिक सभाओं में जेसुइट लोगों को अकबर के सिंहासन के काफी निकट स्थान दिया जाता था। वे उसके साथ अभियानों में जाते, उसके बच्चों को शिक्षा देते तथा उसके फुरसत के समय में वे प्रायः उसके साथ होते थे। जेसुइट विवरण मुगलकाल के राज्य अधिकारियों और सामान्य जन-जीवन के विषय में फारसी इतिहासों में दी गई सूचना की पुष्टि करते हैं।

प्रश्न 16.
मुगलों के प्रान्तीय प्रशासन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुगलों का प्रान्तीय प्रशासन शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए मुगल- सम्राटों ने साम्राज्य को अनेक प्रान्तों में विभक्त कर दिया था प्रान्तीय शासन के प्रमुख अधिकारी निम्नलिखित थे-

  1. सूबेदार – प्रान्त का सर्वोच्च अधिकारी सूबेदार कहलाता था। सूबेदार की नियुक्ति सम्राट के द्वारा की जाती थी। वह सीधा मुगल सम्राट को प्रतिवेदन प्रस्तुत करता था।
  2. दीवान दीवान प्रान्तीय वित्त विभाग का अध्यक्ष होता था। वह प्रान्त की आय-व्यय की देख-रेख करता था।
  3. बख्शी सैनिकों की भर्ती, उनकी आवश्यकताओं एवं साज-सज्जा की पूर्ति, रसद की व्यवस्था उसके कार्य थे।
  4. सद्र सद्र का प्रमुख कार्य लोगों के नैतिक चरित्र की देखभाल करना, दान-पुण्य तथा इस्लाम के कानूनों के पालन की व्यवस्था करवाना था।
  5. काजी- काजी प्रान्त का प्रमुख न्यायिक अधिकारी होता था।

सरकार अथवा जिला प्रबन्ध-मुगलकाल में प्रान्तों को सरकारों अथवा जिलों में बाँटा गया था। सरकार का प्रबन्ध करने के लिए निम्नलिखित अधिकारी नियुक्त किए गए थे-
(1) फौजदार यह सरकार अथवा जिले का प्रमुख अधिकारी होता था। विद्रोहियों का दमन करना, अपने क्षेत्र में शान्ति एवं व्यवस्था बनाए रखना आदि उसके प्रमुख कार्य थे। उसके अधीन एक विशाल घुड़सवार सेना तथा तोपची होती थे।

(2) अमलगुजार यह सरकार का राजस्व अधिकारी परगने का प्रबन्ध- प्रत्येक सरकार अनेक परगनों में विभक्त था। परगनों का प्रबन्ध करने के लिए निम्नलिखित अधिकारी होते थे

  • कानूनगो ( राजस्व अभिलेख का रखवाला)
  • चौधरी (राजस्व संग्रह का प्रभारी) तथा
  • काजी (न्याय का अधिकारी)।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

Jharkhand Board JAC Class 12 History Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

1. सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दियों के कृषि इतिहास की जानकारी देने वाला प्रमुख ऐतिहासिक ग्रन्थ था –
(अ) अकबरनामा
(स) बादशाहनामा
(ब) आइन-ए-अकबरी
(द) बाबरनामा
उत्तर:
(ब) आइन-ए-अकबरी

2. बाबरनामा’ का रचयिता था –
(अ) हुमायूँ
(स) बाबर
(ब) अकबर
(द) जहाँगीर
उत्तर:
(स) बाबर

3. पंजाब में शाह नहर की मरम्मत किसके शासनकाल में करवाई गई –
(अ) बाबर
(ब) हुमायूँ
(स) अकबर
(द) शाहजहाँ
उत्तर:
(द) शाहजहाँ

4. तम्बाकू का प्रसार सर्वप्रथम भारत के किस भाग में हुआ?
(अ) उत्तर भारत
(ब) दक्षिण भारत
(स) पूर्वी भारत
(द) पूर्वोत्तर भारत
उत्तर:
(ब) दक्षिण भारत

5. किस मुगल सम्राट ने तम्बाकू के धूम्रपान पर प्रतिबन्ध लगा दिया था?
(अ) अकबर
(स) जहाँगीर
(ब) बाबर
(द) शाहजहाँ
उत्तर:
(स) जहाँगीर

6. कौनसी फसल नकदी फसल ( जिन्स-ए-कामिल) कहलाती थी –
(अ) कपास
(ब) गेहूँ
(स) जौ
(द) चना
उत्तर:
(अ) कपास

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7. अफ्रीका और स्पेन से किसकी फसल भारत पहुँची ?
(अ) गेहूँ
(ब) बाजरा
(स) मक्का
(द) चना
उत्तर:
(स) मक्का

8. सत्रहवीं शताब्दी में लिखी गई एक पुस्तक मारवाड़ में में किसकी चर्चा किसानों के रूप में की गई है?
(अ) वैश्यों
(ब) राजपूतों
(स) ब्राह्मणों
(द) योद्धाओं
उत्तर:
(ब) राजपूतों

9. गांव की पंचायत का मुखिया कहलाता था –
(अ) फौजदार
(ब) ग्राम-प्रधान
(स) चौकीदार
(द) मुकद्दम (मंडल)
उत्तर:
(द) मुकद्दम (मंडल)

10. खुदकाश्त तथा पाहिकारत कौन थे?
(अ) किसान
(ब) सैनिक
(स) जमींदार
(द) अधिकारी
उत्तर:
(अ) किसान

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11. मिरासदार कौन थे?
(अ) महाराष्ट्र प्रांत के धनी अथवा सम्पन्न कृषक
(ब) राजस्थान के धनी व्यापारी तथा कृषक
(स) राजस्थान में अधिकारियों का एक समूह
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) महाराष्ट्र प्रांत के धनी अथवा सम्पन्न कृषक

12. वह भूमि जिसे कभी खाली नहीं छोड़ा जाता था, कहलाती थी –
(अ) परौती
(ब) चचर
(स) उत्तम
(द) पोलज
उत्तर:
(द) पोलज

13. मनसबदार कौन थे?
(अ) मुगल अधिकारी
(ब) मुगल जमींदार
(स) मुगल दरबारी
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) मुगल अधिकारी

14. इटली का यात्री जोवनी कारेरी कब भारत आया ?
(अ) 1560 ई.
(ब) 1690 ई.
(स) 1590 ई.
(द) 1670 ई.
उत्तर:
(ब) 1690 ई.

15. आइन-ए-अकबरी में कुल कितने भाग हैं?
(अ) दो
(ब) तीन
(स) चार
(द) पाँच
उत्तर:
(द) पाँच

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

1. 1526 ई. में ……………. को पानीपत के युद्ध में हराकर बाबर पहला मुगल बादशाह बना।
2. मुगल काल के भारतीय फारसी स्रोत किसान के लिए रैयत या …………… शब्द का उपयोग करते थे।
3. सामूहिक ग्रामीण समुदाय के तीन घटक …………… और …………….. थे।
4. पंचायत का सरदार एक मुखिया होता था जिसे ………………. या मण्डल कहते थे।
5. मुद्रा की फेरबदल करने वालों को …………….. कहा जाता था।
6. जोवान्नी कारेरी ………………. का मुसाफिर था जो लगभग ……………. ई. में भारत से होकर गुजरा था।
उत्तर:
1. इब्राहिम लोदी
2. मुजरियान
3. खेतिहर किसान, पंचायत, गाँव का मुखिया
4. मुकद्दम
5. सर्राफ
6. इटली, 1690

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अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जिन्स-ए-कामिल’ फसल के बारे में बताइये।
उत्तर:
‘जिन्स-ए-कामिल’ सर्वोत्तम फसलें थीं जैसे कपास और गन्ने की फसलें।

प्रश्न 2.
आइन-ए-अकबरी किसके द्वारा लिखी गई ?
उत्तर:
अबुल फ़सल।

प्रश्न 3.
सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में राज्य द्वारा जंगलों में घुसपैठ के क्या कारण थे ?
उत्तर:
(1) सेना के लिए सभी प्राप्त करना
(2) शिकार अभियान द्वारा न्याय करना।

प्रश्न 4.
सत्रहवीं शताब्दी के स्रोत भारत में कितने प्रकार के किसानों का उल्लेख करते हैं?
उत्तर:
दो प्रकार के किसानों की –
(1) खुद काश्त
(2) पाहि काश्त

प्रश्न 5.
अबुल फ़सल द्वारा रचित पुस्तक का नाम लिखिए।
उत्तर:
‘आइन-ए-अकबरी’।

प्रश्न 6.
मुगलकाल में गाँव की पंचायत के मुखिया को किस नाम से जाना जाता था?
उत्तर:
मुकद्दम या मंडल।

प्रश्न 7.
मुगलकाल के भारतीय फारसी स्रोत किसान के लिए किन शब्दों का प्रयोग करते थे?
उत्तर:
(1) रैयत
(2) मुजरियान
(3) किसान
(4) आसामी

प्रश्न 8.
खुद काश्त किसान कौन थे?
उत्तर:
खुद काश्त किसान उन्हीं गाँवों में रहते थे, जिनमें उनकी जमीनें थीं।

प्रश्न 9.
लगभग सोलहवीं सत्रहवीं शताब्दियों में कृषि के निरन्तर विस्तार होने के तीन कारक लिखिए।
उत्तर:

  • जमीन की प्रचुरता
  • मजदूरों की उपलब्धता
  • किसानों की गतिशीलता.

प्रश्न 10.
इस काल में सबसे अधिक उगाई जाने वाली तीन प्रमुख फसलों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) चावल
(2) गेहूँ
(3) ज्यार

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प्रश्न 11.
चावल, गेहूँ तथा ज्वार की फसलें सबसे अधिक उगाई जाने का क्या कारण था?
उत्तर:
इस काल में खेती का प्राथमिक उद्देश्य लोगों का पेट भरना था।

प्रश्न 12.
मौसम के किन दो मुख्य चक्रों के दौरान खेती की जाती थी?
उत्तर;
(1) खरीफ (पतझड़ में) तथा
(2) रबी (बसन्त में)।

प्रश्न 13.
16वीं – 17वीं शताब्दी के दौरान भारत में कितने प्रतिशत लोग गाँवों में रहते थे?
उत्तर:
85 प्रतिशत।

प्रश्न 14.
भारत में कपास का उत्पादन कहाँ होता था?
उत्तर:
मध्य भारत तथा दक्कनी पठार में।

प्रश्न 15.
दो नकदी फसलों के नाम बताइये।
उत्तर:
(1) तिलहन (जैसे-सरसों) तथा
(2) दलहन

प्रश्न 16.
सत्रहवीं शताब्दी में दुनिया के विभिन्न भागों से भारत में पहुंचने वाली चार फसलों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • मक्का
  • टमाटर
  • आलू
  • मिर्च

प्रश्न 17.
सामूहिक ग्रामीण समुदाय के तीन घटकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) खेतिहर किसान
(2) पंचायत
(3) गाँव का मुखिया (मुकद्दम या मंडल)।

प्रश्न 18.
1600 से 1700 के बीच भारत की जनसंख्या में कितनी वृद्धि हुई?
उत्तर:
लगभग 5 करोड़ की।

प्रश्न 19.
ग्राम की पंचायत में कौन लोग होते थे?
उत्तर:
ग्राम के बुजुर्ग।

प्रश्न 20.
ग्राम की पंचायत का मुखिया कौन होता
उत्तर:
मुकद्दम या मंडल।

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प्रश्न 21.
पंचायत के मुखिया का प्रमुख कार्य क्या
उत्तर:
गांव की आमदनी एवं खर्चे का हिसाब-किताब अपनी निगरानी में बनवाना

प्रश्न 22.
इस कार्य में मुकद्दम की कौन राजकीय कर्मचारी सहायता करता था ?
उत्तर:
पटवारी

प्रश्न 23.
पंचायतों के दो अधिकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) जुर्माना लगाना
(2) दोषी व्यक्ति को समुदाय से निष्कासित करना।

प्रश्न 24.
पंचायत के निर्णय के विरुद्ध किसान विरोध का कौनसा अधिक उम्र रास्ता अपनाते थे? उत्तर- गाँव छोड़कर भाग जाना।

प्रश्न 25
उन दो प्रान्तों के नाम लिखिए जहाँ महिलाओं को जमींदारी उत्तराधिकार में मिलती थी जिसे बेचने व गिरवी रखने के लिए वे स्वतंत्र थीं।
उत्तर:
(1) पंजाब
(2) बंगाल

प्रश्न 26.
जंगल के तीन उत्पादों का उल्लेख कीजिए, जिनकी बहुत माँग थी।
उत्तर:
(1) शहद
(2) मधुमोम
(3) लाख

प्रश्न 27.
‘मिल्कियत’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जमींदारों की विस्तृत व्यक्तिगत जमीन ‘मिल्कियत’ कहलाती थी।

प्रश्न 28.
जमींदारों की समृद्धि का क्या कारण था?
उत्तर:
जमींदारों की समृद्धि का कारण था उनकी विस्तृत व्यक्तिगत जमीन।

प्रश्न 29.
जमींदारों की शक्ति के दो स्रोत बताइये।
उत्तर:
(1) जमींदारों द्वारा राज्य की ओर से कर वसूल करना
(2) सैनिक संसाधन।

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प्रश्न 30.
भू-राजस्व के प्रबन्ध के दो चरण कौन- कौन से थे?
उत्तर:
(1) कर निर्धारण
(2) वास्तविक वसूली।

प्रश्न 31.
अमील गुजार कौन था?
उत्तर:
अमील गुजार राजस्व वसूली करने वाला अधिकारी था।

प्रश्न 32.
अकबर ने भूमि का किन चार भागों में वर्गीकरण किया?
उत्तर:

  • पोलज
  • परौती
  • चचर
  • अंजर

प्रश्न 33.
मध्यकालीन भारत में कौन-कौनसी फसलें सबसे अधिक उगाई जाती थीं?
उत्तर:
गेहूं, चावल, ज्वार इत्यादि।

प्रश्न 34.
भारत के किस भाग में सबसे पहले तम्बाकू की खेती की जाती थी?
उत्तर:
दक्षिण भारत में।

प्रश्न 35.
मुगलकाल में खेतिहर समाज की बुनियादी इकाई क्या थी?
उत्तर:
गाँव

प्रश्न 36.
मुगल राज्य किसने को ‘जिन्स-ए-कामिल’ फसलों की खेती करने के लिए प्रोत्साहन क्यों देते थे?
उत्तर:
क्योंकि इन फसलों से राज्य को अधिक कर मिलता था।

प्रश्न 37.
चीनी के उत्पादन के लिए कौनसा प्रान्त प्रसिद्ध था?
उत्तर:
बंगाल।

प्रश्न 38.
19वीं शताब्दी के कुछ अंग्रेज अधिकारियों ने गाँवों को किसकी संज्ञा दी थी?
उत्तर:
‘छोटे गणराज्य’।

प्रश्न 39.
आइन-ए-दहसाला किसने जारी किया?
उत्तर:
अकबरअकबर ने

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प्रश्न 40.
मुगल साम्राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख-रेख करने वाला कौनसा दफ्तर था?
उत्तर;
दीवान का दफ्तर।

प्रश्न 41.
अकबर के समय में वह जमीन क्या कहलाती थी, जिसे कभी खाली नहीं छोड़ा जाता था?
उत्तर:
पोलज

प्रश्न 42.
अकबर के शासन काल में वह जमीन क्या कहलाती थी, जिस पर कुछ दिनों के लिए खेती रोक दी जाती थी?
उत्तर:
परौती।

प्रश्न 43.
आइन-ए-अकबरी’ के अनुसार भू-राजस्व वसूल करने के लिए कौनसी प्रणालियाँ अपनाई जाती थीं?
उत्तर:
(1) कणाकृत
(2) बटाई
(3) खेत बटाई।

प्रश्न 44.
आइन-ए-अकबरी’ को कब पूरा किया गया?
उत्तर:
1598 ई. में

प्रश्न 45.
अकबरनामा’ की कितनी जिल्दों में रचना
की गई?
उत्तर:
तीन जिल्दों में।

प्रश्न 46.
‘अकबरनामा’ का रचयिता कौन था?
उत्तर:
अबुल फजल।

प्रश्न 47
रैयत कौन थे?
उत्तर:
मुगल काल के भारतीय फारसी खोत किसान के लिए आमतौर पर रैयत या मुजरियान शब्द का इस्तेमाल करते थे। था।

प्रश्न 48.
‘परगना’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
परगना मुगल प्रान्तों में एक प्रशासनिक प्रमंडल

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प्रश्न 49.
ग्राम पंचायत (मुगलकाल) के मुखिया के दो कार्यों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
(1) गाँव के आय-व्यय का हिसाब-किताब तैयार करवाना
(2) जाति की अवहेलना को रोकने के लिए लोगों के आवरण पर नजर रखना।

प्रश्न 50.
पाहि काश्त किसान कौन थे?
उत्तर:
पाहि कारण किसान के खेतिहर थे, जो दूसरे गाँव से ठेके पर खेती करने आते थे।

प्रश्न 51.
बाबरनामा’ के अनुसार खेतों की सिंचाई साधन कौनसे थे?
गई ?
उत्तर:
(1) रहट के द्वारा
(2) बाल्टियों से।

प्रश्न 52.
भारत में नई दुनिया से कौनसी फसलें लाई
उत्तर:
टमाटर, आलू, मिर्च, अनानास, पपीता

प्रश्न 53.
पंचायत का प्रमुख कार्य क्या था?
उत्तर:
गाँव में रहने वाले अलग-अलग समुदायों के लोगों को अपनी जाति की सीमाओं के अन्दर रखना।

प्रश्न 54.
राजस्थान की जाति पंचायतों के दो अधिकारों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:

  • दीवानी के झगड़ों का निपटारा करना
  • जमीन से जुड़े दावेदारियों के झगड़े सुलझाना।

प्रश्न 55.
पंचायत के मुखिया का चुनाव किस प्रकार किया जाता था?
उत्तर:
(1) गाँव के बुजुर्गों की आम सहमति से और
(2) उसे इसकी स्वीकृति जमींदार से लेनी होती थी।

प्रश्न 56.
खेतिहर किन ग्रामीण दस्तकारियों में संलग्न रहते थे?
उत्तर:
रंगरेजी, कपड़े पर छपाई, मिट्टी के बर्तनों को पकाना, खेती के औजार बनाना।

प्रश्न 57.
सोलहवीं तथा सत्रहवीं सदी के प्रारम्भ में कृषि इतिहास को जानने के दो स्त्रोतों का उल्लेख करो।
उत्तर:
(1) आइन-ए-अकबरी
(2) ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बहुत सारे दस्तावेज

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प्रश्न 58.
गाँव के प्रमुख दस्तकारों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
कुम्हार, लुहार, बढ़ई, नाई, सुनार

प्रश्न 59.
कौनसी दस्तकारियों के काम उत्पादन के लिए महिलाओं के श्रम पर निर्भर थे?
उत्तर:
सूत कातना, बर्तन बनाने के लिए मिट्टी साफ करना और गूंधना, कपड़ों पर कढ़ाई करना।

प्रश्न 60.
‘पेशकश का क्या अर्थ है?
उत्तर:
पेशकरा’ मुगल राज्य के द्वारा ली जाने वाली एक प्रकार की भेंट थी। था?

प्रश्न 61.
मुगल राज्य के लिए जंगल कैसा भू-भाग
उत्तर;
मुगल राज्य के अनुसार जंगल बदमाशों, विद्रोहियों आदि को शरण देने वाला अड्डा था।

प्रश्न 62.
जमींदार कौन थे?
उत्तर;
जमींदार अपनी जमीन के स्वामी होते थे उन्हें ग्रामीण समाज में उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त थी।

प्रश्न 63.
जमींदारों की उच्च स्थिति के दो कारण लिखिए।
उत्तर:
(1) उनकी जाति
(2) जमींदारों के द्वारा राज्य को दी जाने वाली कुछ विशिष्ट सेवाएँ।

प्रश्न 64.
‘जमा’ और ‘हासिल’ में भेद कीजिये।
उत्तर:
‘जमा निर्धारित रकम थी, जबकि ‘हासिल’ वास्तव में वसूल की गई रकम थी।

प्रश्न 65.
जमींदारी पुख्ता करने के दो तरीकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) नयी जमीनों को बसाकर
(2) अधिकारों के हस्तान्तरण के द्वारा।

प्रश्न 66.
अमीन कौन था?
उत्तर:
अमीन एक मुगल अधिकारी था, जिसका काम यह सुनिश्चित करना था कि राजकीय कानूनों का पालन हो रहा है।

प्रश्न 67.
मनसबदारी व्यवस्था क्या थी?
उत्तर:
मनसबदारी मुगल प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष पर एक सैनिक नौकरशाही तत्व था, जिसे मनसबदारी व्यवस्था कहते हैं।

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प्रश्न 68.
अकबर के समय का प्रसिद्ध इतिहासकार कौन था? उसके द्वारा रचित दो ग्रन्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) अकबर के समय का प्रसिद्ध इतिहासकार अबुल फजल था।
(2) अबुल फजल ने ‘अकबरनामा’ तथा आइन-ए-अकबरी’ की रचना की।

प्रश्न 69.
चंडीमंगल नामक बंगाली कविता के रचयिता कौन हैं ?
उत्तर:
सोलहवीं सदी में मुकुंदराम चक्रवर्ती ने चंडीमंगल नामक कविता लिखी थी।

प्रश्न 70.
पेशकश क्या होती थी?
उत्तर:
पेशकश मुगल राज्य के द्वारा की जाने वाली एक तरह की भेंट थी।

प्रश्न 71.
गाँवों में कौनसी पंचायतें होती थीं?
उत्तर:
(1) ग्राम पंचायत
(2) जाति पंचायत ।

प्रश्न 72.
किस प्रांत में चावल की 50 किस्में पैदा की
जाती थीं?
उत्तर:
बंगाल में।

प्रश्न 73
गाँवों में पाई जाने वाली दो सामाजिक असमानताओं का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
(1) सम्पति की व्यक्तिगत मिल्कियत होती थी।
(2) जाति और सामाजिक लिंग के नाम पर समाज में गहरी विषमताएँ थीं।

प्रश्न 74.
शाह नहर कहाँ है?
उत्तर:
पंजाब में।

प्रश्न 75.
अकबर द्वारा अमील गुजार को क्या आदेश दिए गए थे?
उत्तर:
इस बात की व्यवस्था करना कि खेतिहर नकद भुगतान करे और वहीं फसलों में भुगतान का विकल्प भी खुला रहे।

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प्रश्न 76
जमींदारी को पुख्ता करने के क्या तरीके थे?
उत्तर:
(1) नई जमीनों को बतकर
(2) अधिकारों के हस्तान्तरण के द्वारा
(3) राज्य के आदेश से
(4) जमीनों को खरीद कर

प्रश्न 77.
वाणिज्यिक खेती का प्रभाव जंगलवासियाँ के जीवन पर कैसे पढ़ता था?
उत्तर:
(1) शहद, मधु, मोम, लाक की अत्यधिक माँग होना
(2) हाथियों को पकड़ना और बेचना
(3) व्यापार के अन्तर्गत वस्तुओं की अदला-बदली।

प्रश्न 78.
जंगली (जंगलवासी) कौन थे?
उत्तर:
जिन लोगों का गुजारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानान्तरित खेती से होता था, वे जंगली (जंगलवासी) कहलाते थे।

लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
खेतिहर समाज के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
खेतिहर समाज की मूल इकाई गाँव थी जिसमें किसान रहते थे। किसान वर्ष भर भिन्न-भिन्न मौसमें में फसल की पैदावार से जुड़े समस्त कार्य करते थे। इन कार्यों में जमीन की जुताई, बीज बोना और फसल पकने पर उसे काटना आदि सम्मिलित थे। इसके अतिरिक्त वे उन वस्तुओं के उत्पादन में भी शामिल थे जो कृषि आधारित थीं, जैसे कि शक्कर, तेल इत्यादि ।

प्रश्न 2.
सत्रहवीं शताब्दी के खोत किन दो प्रकार के किसानों का उल्लेख करते हैं?
उत्तर- सत्रहवीं शताब्दी के स्रोत निम्नलिखित दो प्रकार के किसानों का उल्लेख करते हैं- (1) खुद काश्त तथा (2) पाहि कार खुद काश्त किसान उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी जमीन थी। पाहि काश्त वे किसान थे जो दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे। कुछ लोग अपनी इच्छा से भी पाहि-कारत बनते थे, जैसे दूसरे गाँव में करों की शर्तें उत्तम मिलने पर कुछ लोग अकाल या भुखमरी के बाद आर्थिक परेशानी से बाध्य होकर भी पाहि कार किसान बनते थे।

प्रश्न 3.
मुगल काल में कृषि की समृद्धि से भारत में आबादी में किस प्रकार बढ़ोतरी हुई?
उत्तर:
कृषि उत्पादन में अपनाए गए विविध और लचीले तरीकों के परिणामस्वरूप भारत में आवादी धीरे-धीरे बढ़ने लगी। आर्थिक इतिहासकारों की गणना के अनुसार समय- समय पर होने वाली भुखमरी और महामारी के बावजूद 1600 से 1700 के बीच भारत की आबादी लगभग 5 करोड़ बढ़ गई। 200 वर्षों में यह लगभग 33 प्रतिशत बढ़ोतरी थी।

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प्रश्न 4.
सोलहवीं सत्रहवीं शताब्दी का ग्रामीण समाज किन-किन रिश्तों के आधार पर निर्मित था ?
उत्तर:
सोलहवीं सत्रहवीं शताब्दी का ग्रामीण समाज छोटे किसानों एवं धनिक जमींदारों दोनों से निर्मित था। ये दोनों ही कृषि उत्पादन से जुड़े थे और फसल में हिस्सों के दावेदार थे। इससे उनके मध्य सहयोग, प्रतियोगिता एवं संघर्ष के रिश्ते निर्मित हुए कृषि से जुड़े इन समस्त रिश्तों से ग्रामीण समाज बनता था।

प्रश्न 5.
मुगल साम्राज्य के अधिकारी ग्रामीण समाज को नियन्त्रण में रखने का प्रयास क्यों करते थे?
उत्तर:
मुगल साम्राज्य अपनी आय का एक बड़ा भाग कृषि उत्पादन से प्राप्त करता था इसलिए राजस्व निर्धारित करने वाले, राजस्व की वसूली करने वाले एवं राजस्व का विवरण रखने वाले अधिकारी ग्रामीण समाज को नियन्त्रण में रखने का पूरा प्रयास करते थे। वे चाहते थे कि खेती की नियमित जुताई हो एवं राज्य को उपज से अपने हिस्से का कर समय पर मिल जाए।

प्रश्न 6.
ग्रामीण भारत के खेतिहर समाज पर संक्षेप में तीन पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर;
खेतिहर समाज की मूल इकाई गाँव थी; जिमसें किसान रहते थे। किसान वर्ष भर भिन्न-भिन्न मौसमों में फसल की पैदावार से जुड़े समस्त कार्य करते थे। इन कार्यों में जमीन की जुताई, बीज बोना एवं फसल पकने पर उसकी कटाई करना आदि कार्य सम्मिलित थे। इसके अतिरिक्त वे उन वस्तुओं के उत्पादन में भी सम्मिलित थे जो कृषि आधारित थीं जैसे कि शक्कर, तेल आदि ।

प्रश्न 7.
” सत्रहवीं सदी में दुनिया के अलग-अलग भागों से कई नई फसलें भारतीय उपमहाद्वीप पहुंचीं।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सत्रहवीं सदी में दुनिया के विभिन्न भागों से कई नई फसलें भारतीय उपमहाद्वीप पहुंचीं। उदाहरणार्थ, मक्का भारत में अफ्रीका और स्पेन से पहुँचा और सत्रहवीं सदी तक इसकी गिनती पश्चिम भारत की मुख्य फसलों में होने लगी। टमाटर, आलू और मिर्च जैसी सब्जियाँ नई दुनिया से लाई गई। इसी प्रकार अनानास तथा पपीता जैसे फल भी नई दुनिया से आए।

प्रश्न 8.
मुगल काल में गाँव की पंचायत का गठन किस प्रकार होता था?
उत्तर:
गाँव की पंचायत बुजुर्गों की सभा होती थी। प्रायः वे गाँव के महत्त्वपूर्ण लोग हुआ करते थे जिनके पास अपनी सम्पत्ति के पैतृक अधिकार होते थे। जिन गाँवों में कई जातियों के लोग रहते थे, वहाँ प्रायः पंचायत में भी विविधता पाई जाती थी यह एक ऐसा अल्पतंत्र था, जिसमें गाँव के अलग-अलग सम्प्रदायों एवं जातियों का प्रतिनिधित्व होता था। पंचायत का निर्णय गाँव में सबको मानना पड़ता था।

प्रश्न 9.
गाँव की पंचायत का जाति सम्बन्धी प्रमुख काम क्या था?
उत्तर:
गांव की पंचायत का जाति सम्बन्धी प्रमुख काम यह सुनिश्चित करना था कि गाँव में रहने वाले अलग-अलग सम्प्रदायों के लोग अपनी जाति की सीमाओं के अन्दर रहें। पूर्वी भारत में सभी विवाह मंडल की उपस्थिति में होते थे। दूसरे शब्दों में ” जाति की अवहेलना के लिए” लोगों के आचरण पर नजर रखनां गाँव की पंचायत के मुखिया की एक महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी थी।

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प्रश्न 10.
गाँव की पंचायतों को कौनसे न्याय सम्बन्धी अधिकार प्राप्त थे?
उत्तर:
गाँव की पंचायतों को दोषियों पर जुर्माना लगाने और समुदाय से निष्कासित करने जैसे दंड देने के अधिकार प्राप्त थे। समुदाय से निष्कासित करना एक कड़ा कदम था, जो एक सीमित समय के लिए लागू किया जाता था। इसके अन्तर्गत दण्डित व्यक्ति को (निर्धारित समय के लिए) गाँव छोड़ना पड़ता था। इस अवधि में वह अपनी जाति तथा व्यवसाय से हाथ धो बैठता था। इन नीतियों का उद्देश्य जातिगत परम्पराओं की अवहेलना को रोकना था।

प्रश्न 11.
सत्रहवीं सदी में गाँवों में मुद्रा के प्रचलन के बारे में फ्रांसीसी यात्री ज्याँ बैप्टिस्ट तैवर्नियर ने क्या लिखा है?
उत्तर:
सत्रहवीं सदी में भारत की यात्रा करने वाले फ्रांसीसी यात्री ज्याँ बैप्टिस्ट तैवर्नियर ने गाँवों में मुद्रा के प्रचलन के बारे में लिखा है कि, “भारत में वे गाँव बहुत ही छोटे कहे जायेंगे, जिनमें मुद्रा की फेरबदल करने वाले हाँ ये लोग सराफ कहलाते थे। एक बैंकर की भाँति सराफ हवाला भुगतान करते थे और अपनी इच्छा के अनुसार पैसे के मुकाबले रुपयों की कीमत तथा कौड़ियों के मुकाबले पैसों की कीमत बढ़ा देते थे।”

प्रश्न 12.
सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी में भारत द में जंगलों के प्रसार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी में भारत में जमीन के विशाल भाग जंगल या शादियों से घिरे हुए थे। के ऐसे प्रदेश झारखंड सहित सम्पूर्ण पूर्वी भारत, मध्य भारत, उत्तरी क्षेत्र (जिसमें भारत-नेपाल की सीमावर्ती क्षेत्र की ि तराई शामिल है), दक्षिण भारत का पश्चिमी घाट और प दक्कन के पठारों में फैले हुए थे। समसामयिक स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह भारत में जंगलों के फैलाव का औसत लगभग 40 प्रतिशत था।

प्रश्न 13.
जंगलवासियों पर कौनसे नए सांस्कृतिक प्रभाव पड़े?
उत्तर:
जंगलवासियों पर नए सांस्कृतिक प्रभाव पड़े। कुछ इतिहासकारों की यह मान्यता है कि नए बसे इलाकों के खेतिहर समुदायों ने जिस प्रकार से धीरे-धीरे इस्लाम को अपनाया, उसमें सूफी सन्तों (पीर) ने एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस प्रकार जंगली प्रदेशों में नए सांस्कृतिक प्रभावों के विस्तार से शुरूआत हुई। प्रश्न 14. जमींदार कौन थे?
उत्तर- जमींदारों की आय तो खेती से आती थी, परन्तु ये कृषि उत्पादन में सीधे भागीदारी नहीं करते थे। वे अपनी जमीन के मालिक होते थे। उन्हें ग्रामीण समाज में ऊँची स्थिति के कारण कुछ विशेष सामाजिक और आर्थिक सुविधाएँ प्राप्त थीं। जमींदारों की ऊँची स्थिति के दो कारण थे-
(1) उनकी जाति तथा
(2) उनके द्वारा राज्य को कुछ विशेष प्रकार की सेवाएं देना।

प्रश्न 15.
जमींदारों की समृद्धि का क्या कारण था?
उत्तर:
जमींदारों की विस्तृत व्यक्तिगत जमीन उनकी समृद्धि का कारण था उनकी व्यक्तिगत जमीन मिल्कियत कहलाती थी अर्थात् सम्पत्ति मिल्कियत जमीन पर जमींदार के निजी प्रयोग के लिए खेती होती थी। प्रायः इन जमीनों पर दिहाड़ी मजदूर या पराधीन मजदूर कार्य करते थे जमींदार अपनी इच्छानुसार इन जमीनों को बेच सकते थे, किसी और के नाम कर सकते थे या उन्हें गिरवी रख सकते थे।

प्रश्न 16.
जमींदारी को पुख्ता करने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जमींदारी को पुख्ता करने की प्रक्रिया धीमी थी। इसके निम्नलिखित तरीके थे—

  • नयी जमीनों को बसा कर
  • अधिकारों के हस्तान्तरण के द्वारा
  • राज्य के आदेश से
  • या फिर खरीदकर इन प्रक्रियाओं के द्वारा अपेक्षाकृत ‘निचली जातियों के लोग भी जमींदारों के दर्जे में शामिल हो सकते थे, क्योंकि इस काल में जमींदारी धड़ल्ले से खरीदी और बेची जाती थी।

प्रश्न 17.
1665 में औरंगजेब ने जमा निर्धारित करने के लिए अपने राजस्व अधिकारियों को क्या आदेश दिया?
उत्तर:
1665 में औरंगजेब ने जमा निर्धारित करने के लिए अपने राजस्व अधिकारियों को वह आदेश दिया कि वे परगनाओं के अमीनों को निर्देश दें कि वे प्रत्येक गाँव, प्रत्येक किसान (आसामीवार) के बारे में खेती की वर्तमान स्थितियों का पता करें बारीकी से उनकी जाँच करने के बाद सरकार के वित्तीय हितों व किसानों के कल्याण को ध्यान में रखते हुए जमा निर्धारित करें।

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प्रश्न 18.
मुगल काल में कृषि की समृद्धि और भारत की आबादी की बढ़ोत्तरी में क्या सम्बन्ध था?
उत्तर:
मुगलकाल में शासकों की दूरदर्शिता द्वारा किसानों के हितों एवं कृषि उत्पादन के लिए विविध तकनीकों के प्रयोग के कारण कृषि आधारित समृद्धि में व्यापक वृद्धि हुई। इसके परिणामस्वरूप आबादी धीरे-धीरे बढ़ने लगी। आर्थिक इतिहासकारों की गणना के अनुसार 1600 से 1700 के बीच समय-समय पर होने वाली भुखमरी और महावारी के उपरान्त भी भारत की आबादी लगभग 5 करोड़ बढ़ गई। 200 वर्षों में आबादी की यह बढ़ोत्तरी करीब 33 प्रतिशत थी।

प्रश्न 19
सत्रहवीं शताब्दी में दुनिया के अलग- अलग हिस्सों से कई नई फसलें भारतीय उपमहाद्वीप पहुँची।” कथन को सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
अथवा
नई फसलों जैसे मक्का, ज्वार, आलू आदि का भारत में प्रवेश कैसे हुआ?
उत्तर:
सत्रहवीं शताब्दी में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से व्यापारिक आवागमन में वृद्धि के कारण कई नई फसलें भारतीय उपमहाद्वीप पहुँचीं। उदाहरण के रूप में मक्का भारत में अफ्रीका व स्पेन से पहुँची और सत्रहवीं शताब्दी तक इसकी गिनती पश्चिम भारत की मुख्य फसलों में होने लगी। टमाटर, आलू व मिर्च जैसी सब्जियाँ नई दुनिया से लाई गई। इसी प्रकार अनन्नास एवं पपीता भी नई दुनिया से आए।

प्रश्न 20.
जजमानी व्यवस्था क्या थी?
उत्तर:
18वीं शताब्दी में बंगाल में जमींदार लोहारों, बढ़ई व सुनारों जैसे ग्रामीण दस्तकारों को उनकी सेवाओं के बदले दैनिक भत्ता तथा खाने के लिए नकदी देते थे। इस व्यवस्था को जजमानी व्यवस्था कहा जाता था। यद्यपि यह प्रथा सोलहवीं व सत्रहवीं शताब्दी में अधिक प्रचलित नहीं थी।

प्रश्न 21.
मुगलकाल में गाँवों और शहरों के मध्य व्यापार से गाँवों में नकदी लेन-देन होना प्रारम्भ हुआ, सोदाहरण कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मुगल काल में गाँवों और शहरों के मध्य व्यापार के कारण गाँवों में भी नकदी लेन-देन होने लगा। मुगलों के केन्द्रीय प्रदेशों से भी कर की गणना और वसूली नकद में दी जाती थी जो दस्तकार निर्यात के लिए उत्पादन करते थे, उन्हें उनकी मजदूरी अथवा पूर्ण भुगतान नकद में ही किया जाता था। इसी प्रकार कपास, रेशम या नील जैसी व्यापारिक फसलें उत्पन्न करने वाले किसानों का भुगतान भी नकदी में ही होता है।

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प्रश्न 22.
आइन-ए-अकबरी’ में किन मसलों पर विस्तार से चर्चा की गई है?
अथवा
‘आइन-ए-अकबरी’ पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी’ में अनेक मसलों पर विस्तार से चर्चा की गई है; जैसे दरबार, प्रशासन और सेना का गठन, राजस्व के स्रोत और अकबरी साम्राज्य के प्रान्तों का भूगोल, लोगों के साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक रिवाज अकबर की सरकार के समस्त विभागों और प्रान्तों (सूखों) के बारे में जानकारी दी गई है। ‘आइन’ में इन सूबों के बारे में जटिल और आँकड़ेबद्ध सूचनाएँ बड़ी बारीकी से दी गई हैं।

प्रश्न 23.
‘आइन’ कितने भागों (दफ्तरों) में विभक्त है? उनका सक्षिप्त उल्लेख कीजिए।
उत्तर- ‘आइन’ पाँच भागों (दफ्तरों में विभक्त है-
(1) मंजिल आबादी, शाही घर-परिवार और उसके रख- रखाव से सम्बन्ध रखती है
(2) सिपह- आबादी- सैनिक व नागरिक प्रशासन और नौकरों की व्यवस्था के बारे में है।
(3) मुल्क आबादी में साम्राज्य व प्रान्तों के वित्तीय पहलुओं तथा राजस्व की दरों के आँकड़े वर्णित हैं तथा बारह प्रान्तों का वर्णन है। चौथे और पाँचवें भाग भारत के लोगों के धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों से सम्बन्ध रखते हैं।

प्रश्न 24.
अकबर के समय भूमि का वर्गीकरण किस प्रकार किया गया था?
अथवा
चाचर और बंजर भूमि की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:

  • पोलज पोलज भूमि में एक के बाद एक हर फसल की वार्षिक खेती होती थी जिसे कभी खाली नहीं छोड़ा जाता था।
  • परीती परौती जमीन पर कुछ दिनों के लिए खेती रोक दी जाती थी ताकि वह अपनी खोई हुई उर्वरा शक्ति वापस पा सके।
  • चचर पचर जमीन तीन या चार वर्षों तक खाली रहती थी।
  • बंजर – बंजर जमीन वह थी जिस पर पाँच या उससे अधिक वर्षों से खेती नहीं की जाती थी।

प्रश्न 25.
कणकुत प्रणाली क्या थी?
उत्तर:
अकबर के समय कनकृत प्रणाली राजस्व निर्धारण की एक प्रणाली थी। हिन्दी में ‘कण’ का अर्थ है ‘अनाज’ और कुंत का अर्थ है अनुमान’। इसके अनुसार फसल को अलग-अलग पुलिन्दों में काटा जाता था-
(1) अच्छा
(2) मध्यम
(3) खराब इस प्रकार सन्देह दूर किया जाना चाहिए। प्रायः अनुमान से किया गया जमीन का आकलन भी पर्याप्त रूप से सही परिणाम देता था।

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प्रश्न 26.
भारत में सोलहवीं तथा सत्रहवीं सदी के ग्रामीण समाज की क्या स्थिति थी?
उत्तर:
सोलहवीं तथा सत्रहवीं सदी में भारत में लगभग 85 प्रतिशत लोग गाँवों में रहते थे छोटे खेतिहर तथा भूमिहर जमींदार दोनों ही कृषि उत्पादन से जुड़े हुए थे और दोनों ही फसल के हिस्सों के दावेदार थे। इससे उनके बीच सहयोग, प्रतियोगिता तथा संघर्ष के सम्बन्ध बने खेती से जुड़े इन समस्त सम्बन्धों के ताने-बाने से गाँव का समाज बनता था। मुगल-राज्य अपनी आय का बहुत बड़ा भाग कृषि उत्पादन से वसूल करता था राजस्व अधिकारी ग्रामीण समाज पर नियन्त्रण रखते थे

प्रश्न 27.
खेतिहर समाज का परिचय दीजिए। कृषि समाज की भौगोलिक विविधताओं का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
खेतिहर समाज की मूल इकाई गाँव थी, जिसमें किसान रहते थे किसान वर्ष भर फसल की पैदावार से जुड़े समस्त कार्य करते थे। इन कार्यों में जमीन की जुताई, बीज बोना और फसल पकने पर उसे काटना आदि सम्मिलित थे। इसके अतिरिक्त वे उन वस्तुओं के उत्पादन में भी शामिल थे, जो कृषि आधारित थीं जैसे शक्कर, तेल इत्यादि । परन्तु सूखी भूमि के विशाल हिस्सों से लेकर पहाड़ियों वाले क्षेत्र में उस प्रकार की खेती नहीं हो सकती थी जैसी कि अधिक उपजाऊ जमीनों पर।

प्रश्न 28.
सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी का कृषि- इतिहास लिखने के लिए ‘आइन-ए-अकबरी’ का मुख्य स्रोत के रूप में विवेचन कीजिए।
उत्तर:
सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी का कृषि इतिहास लिखने के लिए ‘आइन-ए-अकबरी’ एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। ‘आइन-ए-अकबरी’ की रचना मुगल सम्राट अकबर के दरवारी इतिहासकार अबुल फतल ने की थी खेतों की नियमित जुलाई सुनिश्चित करने के लिए राज्य के प्रतिनिधियों द्वारा करों की वसूली करने के लिए तथा राज्य व जमींदारों के बीच के सम्बन्धों के नियमन के लिए राज्य द्वारा किये गए प्रबन्धों का लेखा-जोखा ‘आइन’ में प्रस्तुत किया गया है।

प्रश्न 29.
आइन-ए-अकबरी’ के लेखन का मुख्य उद्देश्य स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी’ का मुख्य उद्देश्य अकबर के साम्राज्य की एक ऐसी रूप-रेखा प्रस्तुत करना था, जहाँ एक सुदृढ़ सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल-जोल बनाकर रखता था। अबुल फजल के अनुसार मुगल साम्राज्य के विरुद्ध कोई भी विद्रोह या किसी भी प्रकार की स्वायत्त सत्ता की दावेदारी का असफल होना निश्चित था अतः ‘आइन’ से किसानों के बारे में जो कुछ पता चलता है, वह मुगल शासक वर्ग का ही दृष्टिकोण है।

प्रश्न 30.
सोलहवीं सत्रहवीं शताब्दी के कृषि- इतिहास की जानकारी के लिए ‘आइन’ के अतिरिक्त अन्य स्रोतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(1) ‘आइन’ के अतिरिक्त सत्रहवीं व अठारहवीं सदियों के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान से उपलब्ध होने वाले वे दस्तावेज भी हैं जो सरकार की आय की विस्तृत जानकारी देते हैं।
(2) इसके अतिरिक्त ईस्ट इण्डिया कम्पनी के भी बहुत से दस्तावेज हैं जो पूर्वी भारत में कृषि सम्बन्धों की उपयोगी रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। इन सभी स्रोतों में किसानों, जमींदारों तथा राज्य के बीच होने वाले झगड़ों के विवरण मिलते हैं। इनसे किसानों के राज्य के प्रति दृष्टिकोण की जानकारी मिलती है।

प्रश्न 31.
सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी में किसान की समृद्धि का मापदंड क्या था ?
उत्तर:
सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी में उत्तर भारत के एक औसत किसान के पास शायद ही कभी एक जोड़ी बैल तथा दो हलों से अधिक कुछ होता था। अधिकांश किसानों के पास इससे भी कम था। गुजरात के वे किसान समृद्ध माने जाते थे जिनके पास 6 एकड़ के लगभग जमीन थी दूसरी ओर, बंगाल में एक औसत किसान की जमीन की ऊपरी सीमा 5 एकड़ थी वहाँ 10 एकड़ जमीन वाले किसान को धनी माना जाता था। खेती व्यक्तिगत स्वामित्व के सिद्धान्त पर आधारित थी।

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प्रश्न 32.
‘बाबरनामा’ में बाबर ने कृषि-समाज की विशेषताओं का किस प्रकार वर्णन किया है?
उत्तर:
‘बाबरनामा’ के अनुसार भारत में बस्तियाँ और गाँव, वस्तुत: शहर के शहर, एक क्षण में ही बीरान भी हो जाते थे और बस भी जाते थे। दूसरी ओर, यदि वे किसी पर बसना चाहते थे तो उन्हें पानी के रास्ते खोदने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी क्योंकि उनकी समस्त फसलें वर्षा के पानी में उगती थीं भारत की अनगिनत आबादी होने के कारण लोग उमड़ते चले आते थे । यहाँ झोंपड़ियाँ बनाई जाती थीं और अकस्मात एक गाँव या शहर तैयार हो जाता था।

प्रश्न 33.
भारत में सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी में कृषि क्षेत्र में हुए विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जमीन की प्रचुरता, मजदूरों की उपलब्धता तथा किसानों की गतिशीलता के कारण कृषि का निरन्तर विकास हुआ। चूँकि खेती का प्राथमिक उद्देश्य लोगों का पेट भरना था, इसलिए दैनिक भोजन में काम आने वाले खाद्य पदार्थों जैसे चावल, गेहूं, ज्वार इत्यादि फसलें सबसे अधिक उगाई जाती थीं। जिन प्रदेशों में प्रतिवर्ष 40 इंच या उससे अधिक वर्षा होती थी, वहाँ न्यूनाधिक चावल की खेती होती थी कम वर्षा वाले प्रदेशों में गेहूँ तथा ज्वार बाजरे की खेती होती थी।

प्रश्न 34.
भारत में सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी में सिंचाई के साधनों में हुए विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आज की भाँति सोलहवीं सत्रहवीं शताब्दी में भी मानसून को भारतीय कृषि की रीढ़ माना जाता था। परन्तु कुछ फसलों के लिए अतिरिक्त पानी की आवश्यकता थी। इसके लिए सिंचाई के कृत्रिम साधनों का सहारा लेना पड़ा। राज्य की ओर से सिंचाई कार्यों में सहायता दी जाती थी उदाहरणार्थ, उत्तर भारत में राज्य ने कई नई नहरें व नाले खुदवाये तथा कई पुरानी नहरों की मरम्मत करवाई। शाहजहाँ के शासन काल में पंजाब में ‘शाह नहर’ इसका उदाहरण है।

प्रश्न 35.
मुगलकालीन कृषि समाज में महिलाओं की स्थिति बताइए।
उत्तर:
मुगलकालीन कृषि समाज में महिलाएँ व पुरुष मिलजुलकर खेती का कार्य करते थे। पुरुष खेत जोतते थे तथा हल चलाते थे जबकि महिलाएँ बुआई, निराई व कटाई के साथ-साथ पकी हुई फसल से दाना निकालने का कार्य करती थीं। सूत कातना, वर्तन बनाने के लिए मिट्टी को साफ करना व गूंथना तथा कपड़ों पर कढ़ाई जैसे दस्तकारी के कार्य भी महिलाएँ ही करती थीं महिलाओं पर परिवार और समुदाय के पुरुषों का नियन्त्रण बना रहता था।

प्रश्न 36.
सामाजिक कारणों से जंगलवासियों के जीवन में किस प्रकार परिवर्तन आया?
उत्तर:
सामाजिक कारणों से जंगलवासियों के जीवन में परिवर्तन आया। ग्रामीण समुदाय के बड़े आदमियों की तरह जंगली कबीलों के भी सरदार होते थे। कई कबीलों के सरदार धीरे-धीरे जमींदार बन गए। कुछ तो राजा भी बन गए। 16वीं- 17वीं शताब्दी में कुछ राजाओं ने पड़ोसी कवीलों के साथ एक के बाद एक युद्ध किया और उन पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

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प्रश्न 37.
जंगलवासियों पर कौनसे नए सांस्कृतिक प्रभाव पड़े?
उत्तर:
जंगलवासियों पर नए-नए सांस्कृतिक प्रभाव पड़े कुछ इतिहासकारों की यह मान्यता है कि नए बसे क्षेत्रों के खेतिहर समुदायों ने जिस प्रकार से धीरे-धीरे इस्लाम को अपनाया, उसमें सूफी सन्तों ने एक बड़ी भूमिका निभाई थी।

प्रश्न 38.
सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दियों में भारत में खेती के विकास के लिए किसानों द्वारा अपनायी गई तकनीकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(1) किसान लकड़ी के ऐसे हल्के हल का प्रयोग करते थे जिसको एक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल लगा कर सरलता से बनाया जा सकता था।
(2) बैलों के जोड़े के सहारे खींचे जाने वाले बरमे का प्रयोग बीज बोने के लिए किया जाता था परन्तु बीजों को हाथ से छिड़क कर बोने की पद्धति अधिक प्रचलित थी।
(3) मिट्टी की गुड़ाई और निराई के लिए लकड़ी के मूठ वाले लोहे के पतले धार प्रयुक्त किए जाते थे।

प्रश्न 39.
भारत में तम्बाकू का प्रसार किस प्रकार हुआ? जहाँगीर ने तम्बाकू के धूम्रपान पर प्रतिबन्ध क्यों लगा दिया?
उत्तर:
तम्बाकू का पौधा सबसे पहले दक्षिण भारत पहुँचा और वहाँ से सरहवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में इसे उत्तर भारत लाया गया। अकबर और उसके अमीरों ने 1604 ई. में पहली बार तम्बाकू देखा सम्भवत: इसी समय से भारत में तम्बाकू का धूम्रपान (हुक्के या चिलम में) करने के व्यसन ने जोर पकड़ा। परन्तु जहाँगीर ने तम्बाकू के धूम्रपान पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इस प्रतिबन्ध का कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि इसका सत्रहवीं शताब्दी के अन्त तक सम्पूर्ण भारत में प्रचलन था।

प्रश्न 40.
मुगलकाल में मौसम के चक्रों में उगाई जाने वाली विविध फसलों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुगल काल में भारत में मौसम के दो मुख्य चक्रों के दौरान खेती की जाती थी एक खरीफ (पतझड़ में) तथा दूसरी रवी (बसन्त में) अधिकतर स्थानों पर वर्ष में कम से कम दो फसलें उगाई जाती थीं जहाँ वर्षा अथवा सिंचाई के अन्य साधन हर समय उपलब्ध थे, वहाँ यो वर्ष में तीन फसलें भी उगाई जाती थीं ‘आइन-ए- अकबरी’ के अनुसार दोनों मौसमों को मिलाकर मुगल- प्रान्त आगरा में 39 तथा दिल्ली प्रान्त में 43 फसलों की उगाई की जाती थी।

प्रश्न 41.
सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दियों में भारत ‘में ‘जिन्स-ए-कामिल’ नामक फसलें क्यों उगाई जाती थीं?
उत्तर:
सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दियों में भारत में ‘जिन्स-ए-कामिल’ (सर्वोत्तम फसलें) नामक फसलें भी उगाई जाती थीं मुगल राज्य भी किसानों को ‘जिन्स-ए- कामिल’ नामक फसलों की खेती करने के लिए प्रोत्साहन देता था क्योंकि इनसे राज्य को अधिक कर मिलता था। कपास और गने जैसी फसलें श्रेष्ठ ‘जिन्स-ए-कामिल’ श्रीं तिलहन (जैसे सरसों) तथा दलहन भी नकदी फसलों में सम्मिलित थीं।

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प्रश्न 42.
जाति और अन्य जाति जैसे भेदभावों के कारण खेतिहर किसान किन समूहों में बँटे हुए थे?
उत्तर:
खेतों की जुताई करने वालों में एक बड़ी संख्या उन लोगों की थी जो निकृष्ट समझे जाने वाले कामों में लगे थे अथवा फिर खेतों में मजदूरी करते थे कुछ जातियों के लोगों को केवल निकृष्ट समझे जाने वाले काम ही दिए जाते थे। इस प्रकार वे गरीबी का जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य थे। गाँव की आबादी का बहुत बड़ा भाग ऐसे ही समूहों का था। इनके पास संसाधन सबसे कम थे तथा ये जाति व्यवस्था के प्रतिबन्धों से बंधे हुए थे इनकी स्थिति न्यूनाधिक आधुनिक भारत के दलितों जैसी थी।

प्रश्न 43.
“समाज के निम्न वर्गों में जाति, गरीबी तथा सामाजिक हैसियत के बीच सीधा सम्बन्ध था। परन्तु ऐसा बीच के समूहों में नहीं था।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- सत्रहवीं सदी में मारवाड़ में लिखी गई एक पुस्तक में राजपूतों का उल्लेख किसानों के रूप में किया गया है। इस पुस्तक के अनुसार जाट भी किसान थे परन्तु जाति व्यवस्था में उनका स्थान राजपूतों की तुलना में नीचा था सत्रहवीं सदी में वृन्दावन (उत्तर प्रदेश) के क्षेत्र में रहने वाले गौरव समुदाय ने भी राजपूत होने का दावा किया, यद्यपि वे जमीन की जुताई के काम में लगे थे। अहीर, गुज्जर तथा माली जैसी जातियों के सामाजिक स्तर में भी वृद्धि हुई।

प्रश्न 44.
पंचायत का मुखिया कौन होता था? उसके कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
पंचायत का सरदार एक मुखिया होता था, जिसे ‘मुकदम’ चा ‘मंडल’ कहते थे। मुखिया का चुनाव गाँव के बुजुर्गों की आम सहमति से होता था। इस चुनाव के बाद उन्हें इसकी स्वीकृति जमींदार से लेनी पड़ती थी। मुखिया अपने पद पर तभी तक बना रह सकता था, जब तक गाँव के बुजुगों को उस पर भरोसा था। गाँव की आप व खर्चे का हिसाब-किताब अपनी निगरानी में बनवाना मुखिया का प्रमुख कार्य था। इस कार्य में पंचायत का पटवारी उसको सहायता करता था।

प्रश्न 45.
मुगल काल में गाँव के ‘आम खजाने’ से पंचायत के कौनसे खर्चे बलते थे?
उत्तर:
(1) मुगल काल में पंचायत का खर्चा के आम खजाने से चलता था इस खजाने से उन कर अधिकारियों की खातिरदारी का खर्चा भी किया जाता था, जो समय-समय पर गाँव का दौरा किया करते थे।
(2) इस आम खजाने का प्रयोग बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं से निपटने के लिए भी किया जाता था।
(3) इस कोष का प्रयोग ऐसे सामुदायिक कार्यों के लिए भी किया जाता था जो किसान स्वयं नहीं कर सकते थे, जैसे छोटे-मोटे बांध बनाना या नहर खोदना

प्रश्न 46.
मुगलकालीन जाति पंचायतों के कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • राजस्थान में जाति पंचायतें अलग-अलग जातियों के लोगों के बीच दीवानी के झगड़ों का निपटारा करती थीं।
  • वे जमीन से जुड़े दावेदारियों के झगड़े सुलझाती
  • वे यह निश्चित करती थीं कि विवाह जातिगत मानदंडों के अनुसार हो रहे हैं या नहीं।
  • वे यह निश्चित करती थीं कि गाँव के आयोजन में किसको किसके ऊपर प्राथमिकता दी जाएगी। कर्मकाण्डीय वर्चस्व किस क्रम में होगा।

प्रश्न 47
पंचायतों में ग्रामीण समुदाय के निम्न वर्ग के लोग उच्च जातियों तथा राज्य के अधिकारियों के विरुद्ध कौनसी शिकायतें प्रस्तुत करते थे?
उत्तर:
पश्चिमी भारत, विशेषकर राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे प्रान्तों से प्राप्त दस्तावेजों में ऐसे कई प्रार्थना-पत्र हैं, जिनमें पंचायत से ‘सी’ जातियों अथवा राज्य के अधिकारियों के विरुद्ध जबरन कर वसूली अथवा बेगार वसूली की शिकायत की गई है। इनमें किसी जाति या सम्प्रदाय विशेष के लोग अभिजात वर्ग के समूहों की उन माँगों के विरुद्ध अपना विरोध दर्शाते थे जिन्हें वे नैतिक दृष्टि से अवैध मानते थे। उनमें एक मांग बहुत अधिक कर की माँग थी।

प्रश्न 48
पंचायतों द्वारा इन शिकायतों का निपटारा किस प्रकार किया जाता था ?
उत्तर:
निचली जाति के किसानों और राज्य के अधिकारियों या स्थानीय जमींदारों के बीच झगड़ों में पंचायत के निर्णय अलग-अलग मामलों में अलग-अलग हो सकते थे। अत्यधिक कर की मांगों में पंचायत प्रायः समझौते का सुझाव देती थीं जहाँ समझौते नहीं हो पाते थे, वहाँ किसान विरोध के अधिक उम्र साधन अपनाते थे, जैसे कि गाँव छोड़ कर भाग जाना।

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प्रश्न 49.
खेतिहर लोग किन ग्रामीण दस्तकारियों में संलग्न रहते थे?
उत्तर:
खेतिहर और उसके परिवार के सदस्य विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के उत्पादन में संलग्न रहते थे जैसे-रंगरेजी, कपड़े पर छपाई, मिट्टी के बर्तनों को पकाना, खेती के औजारों को बनाना अथवा उनकी मरम्मत करना। जब किसानों को खेती के काम से अवकाश मिलता था, जैसे-बुआई और सुड़ाई के बीच या सुहाई और कटाई के बीच, उस अवधि में ये खेतिहर दस्तकारी के काम में संलग्न रहते थे।

प्रश्न 50.
ग्रामीण दस्तकार किस रूप में अपनी सेवाएँ गाँव के लोगों को देते थे? इसके बदले गाँव के लोग उन सेवाओं की अदायगी किन तरीकों से करते थे?
उत्तर:
कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई, यहाँ तक कि सुनार जैसे ग्रामीण दस्तकार अपनी सेवाएँ गाँव के लोगों को देते थे, जिसके बदले गाँव वाले उन्हें विभिन्न तरीकों से उन सेवाओं की अदायगी करते थे। प्रायः वे या तो उन्हें फसल का एक भाग दे देते थे या फिर गाँव की जमीन का एक टुकड़ा अदायगी का तरीका सम्भवतः पंचायत ही तय करती थी कुछ स्थानों पर दस्तकार तथा प्रत्येक खेतिहर परिवार आपसी बातचीत करके अदायगी का तरीका तय कर लेते थे।

प्रश्न 51.
कुछ अंग्रेज अफसरों द्वारा भारतीय गाँवों को ‘छोटे गणराज्य’ क्यों कहा गया?
अथवा
ग्रामीण समुदाय के महत्त्व का विवेचन कीजिए।
अथवा
‘छोटे गणराज्य’ के रूप में भारतीय गाँवों का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज अधिकारियों ने भारतीय गाँवों को एक ऐसे ‘छोटे गणराज्य’ की संज्ञा दी, जहाँ लोग सामूहिक स्तर पर भाई चारे के साथ संसाधनों तथा श्रम का विभाजन करते थे परन्तु ऐसा नहीं लगता कि गाँव में सामाजिक समानता थी सम्पत्ति पर व्यक्तिगत स्वामित्व होता था। इसके साथ ही जाति और लिंग के नाम पर समाज में गहरी विषमताएँ थीं कुछ शक्तिशाली लोग गाँव की समस्याओं पर निर्णय लेते थे और कमजोर वर्गों के लोगों का शोषण करते थे।

प्रश्न 52.
भूमिहर भद्रजनों में महिलाओं को प्राप्त पैतृक सम्पत्ति के अधिकार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भूमिहर भद्रजनों में महिलाओं को पैतृक सम्पत्ति का अधिकार प्राप्त था। पंजाब में महिलाएँ (विधवा महिलाएँ भी) पैतृक सम्पत्ति के विक्रेता के रूप में ग्रामीण जमीन के क्रय-विक्रय में सक्रिय भागीदारी रखती थीं हिन्दू और मुसलमान महिलाओं को जमींदारी उत्तराधिकार में मिलती थी, जिसे बेचने अथवा गिरवी रखने के लिए वे स्वतंत्र थीं। बंगाल में भी महिला जमींदार थीं। वहाँ राजशाही की जमींदारी की कर्ता-धर्ता एक स्वी थी।

प्रश्न 53.
‘जंगली’ कौन थे? मुगलकाल में जंगली शब्द का प्रयोग किन लोगों के लिए किया जाता था?
उत्तर:
समसामयिक रचनाएँ जंगल में रहने वालों के लिए ‘जंगली’ शब्द का प्रयोग करती हैं। परन्तु जंगली होने का अर्थ यह नहीं था कि वे असभ्य थे। मुगलकाल में जंगली शब्द का प्रयोग ऐसे लोगों के लिए होता था जिनका निर्वाह जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानान्तरीच खेती से होता था। ये काम मौसम के अनुसार होते थे। उदाहरण के लिए, भील बसन्त के मौसम में जंगल के उत्पाद इकट्ठा करते थे, गर्मियों में मछली पकड़ते थे तथा मानसून के महीनों में खेती करते थे।

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प्रश्न 54.
राज्य की दृष्टि में जंगल किस प्रकार का क्षेत्र था?
उत्तर:
राज्य की दृष्टि में जंगल राज्य की दृष्टि में जंगल उलटफेर वाला इलाका था अपराधियों को शरण देने वाला अड्डा राज्य के अनुसार अपराधी और विद्रोही जंगल में शरण लेते थे अपराध करने के बाद ये लोग जंगल में छिप जाते थे। बाबर के अनुसार जंगल एक ऐसा रक्षाकवच था जिसके पीछे परगना के लोग कड़े विद्रोही हो जाते थे और कर चुकाने से मुकर जाते थे।”

प्रश्न 55.
मुगल काल में बाहरी शक्तियाँ जंगलों में किसलिए प्रवेश करती थीं?
उत्तर:
(1) मुगलकाल में बाहरी शक्तियाँ जंगलों में कई तरह से प्रवेश करती थीं। उदाहरणार्थ, राज्य को सेना के लिए हाथियों को आवश्यकता होती थी इसलिए जंगलवासियों से ली जाने वाली भेंट में प्रायः हाथी भी सम्मिलित होते थे।
(2) शिकार अभियान के नाम पर मुगल सम्राट अपने साम्राज्य के भिन्न-भिन्न भागों का दौरा करते थे और लोगों की समस्याओं और शिकायतों पर उचित ध्यान देते थे।

प्रश्न 56.
मुगल-राजनीतिक विचारधारा में शिकार अभियान का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
मुगल राजनीतिक विचारधारा में गरीबों और अमीरों सहित सबको न्याय प्रदान करने के उद्देश्य से ‘शिकार अभियान’ प्रारम्भ किया गया। शिकार अभियान के नाम पर मुगल सम्राट अपने विशाल साम्राज्य के कोने-कोने का दौरा करता था। इस प्रकार वह अलग-अलग प्रदेशों के लोगों की समस्याओं और शिकायतों पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देता था और न्याय प्रदान करता था।

प्रश्न 57.
जंगलवासियों के जीवन पर बाहरी कारक के रूप में वाणिज्यिक खेती का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
जंगलवासियों के जीवन पर वाणिज्यिक खेती का काफी प्रभाव पड़ता था। शहद, मधुमोम तथा लाक जैसे जंगल के उत्पादों की बहुत माँग थी। लाक जैसी कुछ वस्तुएँ तो सत्रहवीं सदी में भारत से समुद्र पार होने वाले निर्यात की मुख्य वस्तुएँ थीं। हाथी भी पकड़े और बेचे जाते थे व्यापार के अन्तर्गत वस्तुओं की अदला-बदली भी होती थी। कुछ कवीले भारत और अफगानिस्तान के बीच होने वाले स्थलीय व्यापार में लगे हुए थे वे पंजाब के गाँवों और शहरों के बीच होने वाले व्यापार में भी भाग लेते थे।

प्रश्न 58.
सामाजिक कारणों से जंगलवासियों के जीवन में क्या परिवर्तन हुए?
उत्तर:
सामाजिक कारणों से जंगलवासियों के जीवन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। जंगली कबीलों के भी सरदार होते थे। कई जंगली कबीलों के सरदार जमींदार बन गए। कुछ तो राजा भी बन गए। ऐसे में उन्हें सेना का गठन करने की आवश्यकता हुई। अतः उन्होंने अपने ही वंश के लोगों को सेना में भर्ती किया अथवा फिर उन्होंने अपने ही भाई- बन्धुओं से सैन्य-सेच की मांग की। सिन्ध प्रदेश की कमीलाई सेनाओं में 6000 घुड़सवार और 7000 पैदल सैनिक होते थे।

प्रश्न 59.
मुगलकालीन भारत में जमींदारों की शक्ति के स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) जमींदारों को शक्ति इस बात से मिलती धी कि वे प्रायः राज्य की ओर से कर वसूल कर सकते थे। इसके बदले उन्हें वित्तीय मुआवजा मिलता था।
(2) सैनिक संसाधन उनकी शक्ति का एक और स्रोत था अधिकतर जमींदारों के पास अपने किले भी थे और अपनी सैनिक टुकड़ियाँ भी, जिनमें घुड़सवारों, तोपखाने तथा पैदल सैनिकों के जत्थे होते थे।

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प्रश्न 60.
जमींदारों की उत्पत्ति का स्रोत क्या था?
उत्तर:
समसामयिक दस्तावेजों से प्रतीत होता है कि युद्ध में विजय जमींदारों की उत्पत्ति का सम्भावित लोत रहा होगा। प्रायः जमींदारी के प्रसार का एक तरीका था शक्तिशाली सैनिक सरदारों द्वारा कमजोर लोगों को बेदखल करना। परन्तु इसकी सम्भावना कम ही दिखाई देती है कि राज्य किसी जमींदार को इतने आक्रामक रुख अपनाने की अनुमति देता हो, जब तक कि एक राज्यादेश के द्वारा इसकी पुष्टि पहले ही नहीं कर दी गई हो।

प्रश्न 61.
कृषि के विकास में जमींदारों के योगदान का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • जमींदारों ने कृषि योग्य जमीनों को बसने में नेतृत्व प्रदान किया और खेतिहरों को खेती के उपकरण व उधार देकर उन्हें वहाँ बसने में भी सहायता की।
  • जमींदारी के क्रय-विक्रय से गाँवों के मौद्रीकरण की प्रक्रिया में तेजी आई।
  • जमींदार अपनी मिल्कियत की जमीनों की फसल भी बेचते थे।
  • कुछ साक्ष्य दर्शाते हैं कि जमींदार प्रायः बाजार (हाट) स्थापित करते थे जहाँ किसान भी अपनी फसलें बेचने आते थे।

प्रश्न 62.
“किसानों से जमींदारों के सम्बन्धों में पारस्परिकता, पैतृकवाद तथा संरक्षण का पुट था।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यद्यपि जमींदार शोषण करने वाला वर्ग था, परन्तु किसानों से उनके सम्बन्धों में पारस्परिकता, पैतृकवाद तथा संरक्षण का पुट था। भक्ति सन्तों ने बड़ी निर्भीकतापूर्वक जातिगत तथा अन्य प्रकार के अत्याचारों की कटु निन्दा की, परन्तु उन्होंने जमींदारों को किसानों के शोषक या उन पर अत्याचार करने वाले के रूप में नहीं दर्शाया। सत्रहवीं सदी में हुए कृषि विद्रोहों में राज्य के विरुद्ध जमींदारों को प्राय: किसानों का समर्थन मिला।

प्रश्न 63.
मुगलकालीन भू-राजस्व प्रणाली की विवेचना कीजिए।
अथवा
अकबर के शासन में भूमि के वर्गीकरण किये जाने के बारे में अबुल फजल ने अपने ग्रन्थ ‘आइन’ में क्या वर्णन किया है?
अथवा
अकबर के समय में प्रचलित भू-राजस्व व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
अथवा
मुगलों की भू-राजस्व व्यवस्था का वर्णन कीजिये ।
अथवा
अकबर की भू-राजस्व व्यवस्था की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
अकबर ने जमीनों का वर्गीकरण किया और प्रत्येक वर्ग की जमीन के लिए अलग-अलग राजस्व निर्धारित किया। भूमि को चार वर्गों में बाँटा गया-
(i) पोलज
(ii) पोलज और परौती की तीन मध्यम
(iii) चचर
(iv) बंजर। और प्रत्येक वर्ग की तीन किस्में थीं-
(1) अच्छी
(2) किस्म
(3) खराब प्रत्येक की जमीन की उपज को जोड़ा जाता था और उसका तीसरा हिस्सा औसत उपज माना जाता था इसका एक- तिहाई भाग राजकीय शुल्क माना जाता था।

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प्रश्न 64.
अकबर के शासन काल में राजस्व की वसूली के लिए अपनाई गई प्रणालियों का ‘आइन’ में किस प्रकार वर्णन किया गया है?
उत्तर:
अकबर के शासन काल में फसल के रूप में राजस्व वसूली की पहली प्रणाली कुणकुत प्रणाली थी। इसमें फसल को तीन अलग-अलग पुलिन्दों में काटा जाता था दूसरी प्रणाली बटाई या भाओली थी, जिसमें फसल काट कर जमा कर लेते थे और फिर सभी पक्षों की सहमति से बंटवारा किया जाता था। खेत बटाई तीसरी प्रणाली थी जिसमें बीज बोने के बाद खेत बाँट लेते थे। लाँग बटाई चौथी प्रणाली थी जिसमें फसल काटने के बाद उसे आपस में बाँट लेते थे।

प्रश्न 65.
मनसबदारी व्यवस्था’ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
अथवा
मनसबदारी व्यवस्था की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
अकबर की मनसबदारी व्यवस्था की विवेचना कीजिये।
उत्तर:
मनसबदारी मुगल प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष पर एक सैनिक नौकरशाही तन्त्र था। इस पर राज्य के सैनिक व नागरिक मामलों की जिम्मेदारी थी कुछ मनसबदारों को नकदी भुगतान किया जाता था परन्तु अधिकांश मनसबदारों को साम्राज्य के भिन्न-भिन्न भागों में राजस्व के आवंटन के द्वारा भुगतान किया जाता था। सम्राट द्वारा समय-समय पर उनका स्थानान्तरण किया जाता था। प्रायः योग्य और अनुभवी व्यक्ति को ही मनसबदार के पद पर नियुक्त किया जाता था।

प्रश्न 66.
सोलहवीं तथा सत्रहवीं सदी में भारत में चाँदी का बहाव क्यों और किस प्रकार हुआ? उत्तर- सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में भारत के व्यापार में अत्यधिक उन्नति हुई। इस कारण भारत के समुद्र पार व्यापार में एक ओर भौगोलिक विविधता आई, तो दूसरी ओर अनेक नई वस्तुओं का व्यापार भी शुरू हुआ। निरन्तर बढ़ते व्यापार के साथ, भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं का भुगतान करने के लिए एशिया में भारी मात्रा में चाँदी आई। इस चाँदी का एक बड़ा भाग भारत पहुँचा। यह भारत के लिए लाभप्रद था; क्योंकि यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे।

प्रश्न 67.
सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी में भारत में चाँदी के बहाव के क्या परिणाम हुए?
उत्तर:
(1) सोलहवीं से अठारहवीं सदी के बीच भारत में धातु मुद्रा विशेषकर चाँदी के रुपयों की प्राप्ति में अच्छी स्थिरता बनी रही।
(2) अर्थव्यवस्था में मुद्रा संचार और सिक्कों की तलाई में अभूतपूर्व विस्तार हुआ तथा मुगल राज्य को नकदी कर वसूलने में आसानी हुई।
(3) इटली के यात्री जोवान्नी कारेरी के अनुसार चाँदी समस्त विश्व से होकर भारत पहुँचती थी तथा सत्रहवी शताब्दी में भारत में अत्यधिक मात्रा में नकदी और वस्तुओं का आदान-प्रदान हो रहा था।

प्रश्न 68
आइन-ए-अकबरी’ की त्रुटियों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
(1) जोड़ करने में कई गलतियाँ पाई गई हैं।
(2) ‘आइन’ के संख्यात्मक आँकड़ों में विषमताएँ हैं।
(3) जहाँ सूबों से लिए गए राजकोषीय आँकड़े बड़े विस्तार से दिए गए हैं, वहीं उन्हीं प्रदेशों से कीमतों और मजदूरी से सम्बन्धित आँकड़े इतने विस्तार के साथ नहीं दिए गए हैं।
(4) मूल्यों और मजदूरी की दरों की सूची मुगल साम्राज्य की राजधानी आगरा या उसके आस-पास के प्रदेशों से ली गई है।

प्रश्न 69.
“कुछ त्रुटियों के होते हुए भी ‘आइन- ए-अकबरी’ अपने समय के लिए एक असाधारण एवं अनूठा दस्तावेज है।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
‘आइन-ए-अकबरी’ अपने समय के लिए एक असाधारण एवं अनूठा दस्तावेज हैं। मुगल साम्राज्य के गठन और उसकी संरचना की अत्यन्त आकर्षक झलकियाँ दर्शाकर और उसके निवासियों व उत्पादों के सम्बन्ध में सांख्यिकीय आँकड़े प्रस्तुत कर, अबुल फजल मध्यकालीन इतिहासकारों से कहीं आगे निकल गए। ‘आइन’ में भारत के लोगों और मुगल साम्राज्य के बारे में विस्तृत सूचनाएँ दी गई हैं। इस प्रकार यह ग्रन्थ सत्रहवीं शताब्दी के भारत के अध्ययन के लिए संदर्भ-बिन्दु बन गया है।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

प्रश्न 70.
बटाई प्रणाली तथा लाँग बढाई पद्धतियों | का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
(1) कटाई प्रणाली में फसल काटकर जमा कर लेते थे और फिर सभी पक्षों की उपस्थिति तथा सहमति से बँटवारा कर लेते थे।
(2) लॉंग बटाई – इस प्रणाली में फसल काटने के बाद उसके ढेर बना लिए जाते थे तथा फिर उन्हें आपस में बाँट लेते थे। इसमें हर पक्ष अपना हिस्सा घर ले जाता था।

प्रश्न 71.
मुगल सम्राट शिकार अभियानों का क्यों आयोजन करते थे?
उत्तर:
मुगल सम्राट गरीबों और अमीरों सहित सबके साथ न्याय करना अपना प्रमुख कर्त्तव्य मानते थे। इसलिए ये शिकार अभियानों का आयोजन करते थे। वे शिकार आयोजन के नाम पर अपने विशाल साम्राज्य के कोने-कोने का दौरा करते थे और विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की समस्याओं और शिकायतों को सुनकर उनका निराकरण करते थे।

प्रश्न 72.
कृषि के अतिरिक्त मह