JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 7 राष्ट्रवाद

Jharkhand Board JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 7 राष्ट्रवाद Important Questions and Answers.

JAC Board Class 11 Political Science Important Questions Chapter 7 राष्ट्रवाद

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. निम्नलिखित में जो राष्ट्रवाद का अवगुण है, वह है।
(अ) देशभक्ति
(ब) लोगों को स्वतंत्रता की प्रेरणा देना
(स) उग्र-राष्ट्रवाद
(द) राष्ट्रीय एकता
उत्तर:
(स) उग्र-राष्ट्रवाद

2. निम्नलिखित में कौनसा राष्ट्रवाद का गुण
(अ) उग्र-राष्ट्रवादी भावना
(ब) साम्राज्यवाद की प्रेरणा देना
(स) राष्ट्रीय एकता की भावना
(द) पृथकतावादी आंदोलनों को प्रेरित करना
उत्तर:
(स) राष्ट्रीय एकता की भावना

3. निम्नलिखित में आत्म-निर्णय की अवधारणा का गुण है
(अ) लोगों को राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए प्रेरित करना
(ब) सीमा विवादों का कारण होना
(स) पृथकतावादी आंदोलनों को प्रेरित करना
(द) शरणार्थी की समस्या का कारण
उत्तर:
(अ) लोगों को राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए प्रेरित करना

4. क्यूबेकवासियों द्वारा किस राष्ट्र में पृथकवादी आंदोलन चलाया जा रहा है
(अ) उत्तरी स्पेन में
(ब) कनाडा में
(स) इराक में
(द) श्रीलंका में
उत्तर:
(ब) कनाडा में

5. श्रीलंका में निम्नलिखित में से किस समूह द्वारा पृथकतावादी आंदोलन चलाया जा रहा है-
(अ) कुर्दों द्वारा
(ब) बास्कवासियों द्वारा
(स) क्यूबेकवासियों द्वारा
(द) उक्त सभी
उत्तर:
(द) उक्त सभी

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6. निम्नांकित में से राष्ट्रीयता का तत्त्व है
(अ) भौगोलिक एकता
(ब) भाषा, संस्कृति तथा परम्पराएँ
(स) नस्ल अथवा प्रजाति की एकता
(द) तमिलों द्वारा
उत्तर:
(द) तमिलों द्वारा

7. ” राष्ट्रवाद हमारी अंतिम आध्यात्मिक मंजिल नहीं हो सकती। मेरी शरण स्थली तो मानवता है। मैं हीरों की कीमत पर शीशा नहीं खरीदूँगा तथा जब तक मैं जीवित हूँ, देशभक्ति को मानवता पर कदापि विजयी नहीं होने
दूँगा ।” उक्त कथन है
(अ) रवीन्द्रनाथ का
(ब) पण्डित नेहरू का
(स) महात्मा गाँधी का
(द) जे. एस. मिल का
उत्तर:
(अ) रवीन्द्रनाथ का

8. निम्न में से भारत में राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वाला प्रमुख कारक है-
(अ) विदेशी प्रभुत्व
(ब) पाश्चात्य विचार तथा शिक्षा
(स) सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आन्दोलन
(द) उक्त सभी
उत्तर:
(द) उक्त सभी

9. नेशनेलिटी शब्द किस लैटिन भाषी शब्द से उत्पन्न हुआ है?
(अ) नेट्स
(ब) नेलि
(स) नेसट्
(द) नेशन
उत्तर:
(अ) नेट्स

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10. राष्ट्र निर्माण के लिए साझे राजनैतिक आदर्श हैं।
(अ) लोकतंत्र
(ब) धर्मनिरपेक्षता
(स) उदारवाद
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. 20वीं सदी में नए राष्ट्रों के लोगों ने एक नई राजनीतिक पहचान अर्जित की, जो ……………………. की सदस्यता पर आधारित थी।
उत्तर:
राष्ट्र-राज्य

2. दुनिया में ……………… आज भी एक प्रभावी शक्ति है।
उत्तर:
राष्ट्रवाद

3. भविष्य के बारे में साझा नजरिया, अपना भू क्षेत्र और साझी ऐतिहासिक पहचान तथा स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व बनाने की सामूहिक चाहत ………………. को बाकी समूहों से अलग करती है।
उत्तर:
राष्ट्र

4. बाकी सामाजिक समूहों से अलग राष्ट्र के लोग …………………….. का अधिकार मांगते हैं।
उत्तर:
आत्मनिर्णय

5. आज दुनिया की सारी राज्य सत्ताएँ इस …………………… में फँसी हैं कि आत्मनिर्णय के आंदोलनों से कैसे निपटा जाये।
उत्तर:
दुविधा।

निम्नलिखित में से सत्य/असत्य कथन छाँटिये

1. भारतीय संविधान में धार्मिक, भाषायी और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों की संरक्षा के लिए विस्तृत प्रावधान हैं।
उत्तर:
सत्य

2. राष्ट्रों की सीमाओं के पुनर्संयोजन की प्रक्रिया वर्तमान में खत्म हो गई है।
उत्तर:
असत्य

3. राष्ट्रवाद ने जहाँ एक ओर वृहत्तर राष्ट्र-राज्यों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया, वहाँ यह बड़े-बड़े साम्राज्यों के पतन में भी हिस्सेदार रहा है।
उत्तर:
सत्य

4. भारत का औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र होने का संघर्ष राष्ट्रवादी संघर्ष नहीं था।
उत्तर:
असत्य

5. बहुत सारे राष्ट्रों की पहचान एक खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी है।
उत्तर:
सत्य

निम्नलिखित स्तंभों के सही जोड़े बनाइये

1. गणतंत्र दिवस की परेड(अ) राष्ट्र और कल्पनाओं के सहारे एक सूत्र में बँधा एक काल्पनिक समुदाय
2. इराक में कुर्दों का आंदोलन,(ब) जवाहरलाल नेहरू
3. अपने सदस्यों के सामूहिक विश्वास, आकांक्षाओं(स) जवाहरलाल नेहरू यहूदियों का दावा काल्पनिक समुदाय और कल्पनाओं के सहारे एक सूत्र में बँधा एक
4. ‘डिस्कवरी ऑफ इण्डिया’ नामक पुस्तक(द) भारतीय राष्ट्रवाद का बेजोड़ प्रतीक
5. उनका मूल गृह-स्थल फिलिस्तीन उनका स्वर्ग है(य) एक पृथकतावादी आंदोलन.

उत्तर:

1. गणतंत्र दिवस की परेड(द) भारतीय राष्ट्रवाद का बेजोड़ प्रतीक
2. इराक में कुर्दों का आंदोलन,(य) एक पृथकतावादी आंदोलन.
3. अपने सदस्यों के सामूहिक विश्वास, आकांक्षाओं(अ) राष्ट्र और कल्पनाओं के सहारे एक सूत्र में बँधा एक काल्पनिक समुदाय
4. ‘डिस्कवरी ऑफ इण्डिया’ नामक पुस्तक(ब) जवाहरलाल नेहरू
5. उनका मूल गृह-स्थल फिलिस्तीन उनका स्वर्ग है(स) जवाहरलाल नेहरू यहूदियों का दावा काल्पनिक समुदाय और कल्पनाओं के सहारे एक सूत्र में बँधा एक

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
दिल्ली में गणतंत्र दिवस की परेड भारतीय राष्ट्रवाद का बेजोड़ प्रतीक क्यों है?
उत्तर:
क्योंकि गणतंत्र दिवस की परेड सत्ता और शक्ति के साथ विविधता की भावना को भी प्रदर्शित करती है।

प्रश्न 2.
राष्ट्रवाद के किन्हीं चार प्रतीकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. राष्ट्रगान
  2. राष्ट्रीय ध्वज
  3. राष्ट्रीय नागरिकता
  4. स्वतन्त्रता दिवस।

प्रश्न 3.
19वीं सदी में यूरोप में राष्ट्रवाद ने कौनसी प्रमुख भूमिका निभायी?
उत्तर:
19वीं सदी में यूरोप में राष्ट्रवाद ने छोटी-छोटी रियासतों के एकीकरण से वृहत्तर राष्ट्र-राज्यों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।

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प्रश्न 4.
20वीं सदी में यूरोप में राष्ट्रवाद की क्या भूमिका रही?
उत्तर:
यूरोप में 20वीं सदी में राष्ट्रवाद आस्ट्रियाई – हंगरियाई, ब्रिटिश, फ्रांसीसी, डच और पुर्तगाली साम्राज्य के पतन का हिस्सेदार रहा।

प्रश्न 5.
20वीं सदी में भारत तथा अन्य पूर्व उपनिवेशों के औपनिवेशिक शासन से मुक्त होने के राष्ट्रवादी संघर्ष किस आकांक्षा से प्रेरित थे?
उत्तर:
ये संघर्ष विदेशी नियंत्रण से स्वतंत्र राष्ट्र-राज्य स्थापित करने की आकांक्षा से प्रेरित थे।

प्रश्न 6.
वर्तमान विश्व के किन्हीं दो पृथकतावादी आंदोलनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
आज विश्व में

  1. इराक के कुर्दों तथा
  2. श्रीलंका के तमिलों द्वारा पृथकतावादी आंदोलन चलाए जा रहे हैं।

प्रश्न 7.
राष्ट्र निर्माण के किन्हीं दो तत्त्वों के नाम लिखिये।
उत्तर:

  1. साझे विश्वास तथा
  2. साझा इतिहास

प्रश्न 8.
बास्क राष्ट्रवादी आंदोलन के नेता क्या चाहते हैं?
उत्तर:
बास्क राष्ट्रवादी आंदोलन के नेता यह चाहते हैं कि बास्क स्पेन से अलग होकर एक स्वतंत्र देश बन जाये।

प्रश्न 9.
आत्मनिर्णय के अपने दावे में कोई राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से क्या मांग करता है?
उत्तर:
आत्मनिर्णय के अपने दावे में कोई राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से यह मांग करता है कि उसके पृथक् राज्य के दर्जे को मान्यता और स्वीकार्यता दी जाये।

प्रश्न 10.
‘एक संस्कृति और एक राज्य’ की अवधारणा से क्या आशय है?
उत्तर:
एक संस्कृति – एक राज्य’ की अवधारणा से यह आशय है कि अलग-अलग सांस्कृतिक समुदायों को अलग-अलग राज्य मिले।

प्रश्न 11.
‘एक संस्कृति एक राज्य’ की अवधारणा को 19वीं सदी में मान्यता देने के कोई दो परिणाम लिखिये।
उत्तर:

  1. इससे राज्यों की सीमाओं में बदलाव किये गये।
  2. इससे सीमाओं के एक ओर से दूसरी ओर बहुत बड़ी जनसंख्या का विस्थापन हुआ।

प्रश्न 12.
राष्ट्रीयता के विकास में बाधक तत्वों में से किन्हीं दो का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
अशिक्षा, साम्प्रदायिकता की भावना।

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प्रश्न 13.
ऐसे दो राष्ट्रों के उदाहरण दीजिए जिनमें अपनी कोई सामान्य भाषा नहीं है।
उत्तर:
कनाडा, भारत।

प्रश्न 14.
कनाडा में मुख्यतः कौनसी भाषाएँ बोली जाती हैं?
उत्तर:
अंग्रेजी, फ्रांसीसी।

प्रश्न 15.
विभिन्न राष्ट्र अपनी गृहभूमि को क्या नाम देते हैं?
उत्तर:
मातृभूमि या पितृभूमि या पवित्र भूमि।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रेरित करने वाले दो कारकों का उल्लेख कीजिये । उत्तर-राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रेरित करने वाले दो कारक ये हैंरहे हैं।
1. संयुक्त विश्वास: संयुक्त या साझे विश्वास से ही राष्ट्र का निर्माण होता है तथा इसी के चलते उसका अस्तित्व बना रहता है।

2. इतिहास; राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रेरित करने वाला दूसरा कारक इतिहास है। एक राष्ट्र की स्थायी पहचान का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने के लिए ही संयुक्त स्मृतियों, ऐतिहासिक अभिलेखों की रचना द्वारा इतिहास बोध निर्मित किया जाता है।

प्रश्न 2.
वर्तमान विश्व के किन्हीं चार पृथकतावादी आन्दोलनों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
आज विश्व में

  1. कनाडा के क्यूबेकवासियों
  2. उत्तरी स्पेन के बास्कवासियों
  3. इराक के कुर्दों तथा
  4. श्रीलंका के तमिलों द्वारा पृथकतावादी आन्दोलन चलाये जा रहे हैं।

प्रश्न 3.
राष्ट्र परिवार से किस रूप में भिन्न है?
उत्तर:
परिवार प्रत्यक्ष सम्बन्धों पर आधारित होता है जिसका प्रत्येक सदस्य दूसरे सदस्यों के व्यक्तित्व और चरित्र के बारे में व्यक्तिगत जानकारी रखता है, जबकि राष्ट्र प्रत्यक्ष सम्बन्धों पर आधारित नहीं होता है।

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प्रश्न 4.
बास्क राष्ट्रवादी आन्दोलन के नेता अपने स्वतंत्र देश की मांग के समर्थन में क्या तर्क देते हैं?
उत्तर:
बास्क राष्ट्रवादी आन्दोलन के नेता अपने लिए स्वतंत्र देश की माँग के समर्थन में यह तर्क देते हैं कि

  1. उनकी संस्कृति तथा भाषा स्पेनी संस्कृति और भाषा से भिन्न है।
  2. बास्क क्षेत्र की पहाड़ी भू-संरचना उसे शेष स्पेन से भौगोलिक तौर पर अलग करती है।
  3. उनकी विशिष्ट न्यायिक, प्रशासनिक और वित्तीय प्रणालियाँ हैं।

प्रश्न 5.
राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार के अन्तर्गत कोई समूह क्या अधिकार चाहता है?
उत्तर:
राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार के अन्तर्गत कोई समूह शेष सामाजिक समूहों से अलग अपना राष्ट्र तथा अपना शासन अपने आप करने और भविष्य को तय करने का अधिकार चाहता है।

प्रश्न 6.
राज्यों के भीतर अल्पसंख्यक समुदायों की समस्या का समाधान क्या है?
उत्तर:
राज्यों के भीतर अल्पसंख्यक समुदायों की समस्या का समाधान नए राज्यों के गठन में नहीं है, वर्तमान राज्यों को अधिक से अधिक लोकतांत्रिक और समतामूलक बनाने में है।

प्रश्न 7.
राष्ट्र और राष्ट्रीयता के बीच क्या अन्तर है?
उत्तर:
राष्ट्र और राष्ट्रीयता के बीच अन्तर केवल राजनीतिक संगठन और स्वतंत्र राज्य सम्बन्धी है। राष्ट्रीयता में सांस्कृतिक एकता तो होती है लेकिन संगठन तथा स्वतंत्र राज्य नहीं होता है। जब राष्ट्रीयता अपने आपको स्वतंत्र होने की इच्छा रखने वाली राजनीतिक संस्था के रूप में संगठित कर लेती है तो वह राष्ट्र बन जाती है।

प्रश्न 8.
पिछली दो शताब्दियों में राष्ट्रवाद ने इतिहास रचने में क्या योगदान दिया है?
उत्तर:
पिछली दो शताब्दियों में राष्ट्रवाद ने इतिहास रचने में निम्न योगदान दिया है।

  1. इसने जनता को जोड़ा है तो विभाजित भी किया है।
  2. इसने अत्याचारी शासन से मुक्ति दिलाने में मदद की है तो इसके साथ यह विरोध, कटुता और युद्धों का कारण भी रहा है।
  3. राष्ट्रवादी संघर्षों ने राष्ट्रों और साम्राज्यों की सीमाओं के निर्धारण – पुनर्निर्धारण में योगदान किया है। आज दुनिया का एक बड़ा भाग विभिन्न राष्ट्र-राज्यों में बंटा हुआ है।

प्रश्न 9.
राष्ट्रवाद के दो प्रमुख चरणों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
राष्ट्रवाद के दो प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं।

  1. 19वीं सदी यूरोप में राष्ट्रवाद ने छोटी-छोटी रियासतों के एकीकरण से वृहत्तर राष्ट्र राज्यों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। आज के जर्मनी और इटली का गठन इसी का परिणाम है।
  2. 20वीं सदी में राष्ट्रवाद बड़े-बड़े साम्राज्यों के पतन में भी हिस्सेदार रहा है। यूरोप में 20वीं सदी के आरम्भ में आस्ट्रियाई-हंगेरियाई और रूसी साम्राज्य तथा एशिया और अफ्रीका में ब्रिटिश, फ्रांसीसी और डच साम्राज्य के विघटन के मूल में राष्ट्रवाद ही था।

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प्रश्न 10.
अगर हम धर्म के आधार पर अपनी राष्ट्रवादी पहचान स्थापित कर दें तो इसका क्या दुष्परिणाम हो सकता है?
उत्तर:
अगर हम धार्मिक विभिन्नताओं की अवहेलना कर एक समान धर्म के आधार पर अपनी पहचान स्थापित कर दें तो हम बहुत ही वर्चस्ववादी और दमनकारी समाज का निर्माण कर सकते हैं।

प्रश्न 11.
‘एक संस्कृति और एक राज्य की धारणा के विकास का सकारात्मक पहलू क्या था ?
उत्तर:
‘एक संस्कृति और एक राज्य’ की धारणा के विकास का सकारात्मक पहलू यह था कि उन बहुत सारे राष्ट्रवादी समूहों को राजनीतिक मान्यता प्रदान की गई जो स्वयं को एक अलग राष्ट्र के रूप में देखते थे और अपने भविष्य को तय करने तथा अपना शासन स्वयं चलाना चाहते थे।

प्रश्न 12.
19वीं सदी में राष्ट्र निर्माण हेतु ‘एक संस्कृति – एक राज्य’ की मान्यता के क्या दुष्परिणाम हुए?
उत्तर:
19वीं सदी में राष्ट्र निर्माण हेतु ‘एक संस्कृति: एक राज्य’ की मान्यता के परिणामस्वरूप बहुत से छोटे एवं नव स्वतंत्र राज्यों का गठन हुआ। इसके कारण राज्यों की सीमाओं में बदलाव हुए तथा एक ओर से दूसरी ओर बहुत बड़ी जनसंख्या का विस्थापन हुआ। परिणामस्वरूप लाखों लोग अपने घरों से उजड़ गये। बहुत सारे लोग साम्प्रदायिक हिंसा के भी शिकार हुए।

प्रश्न 13.
आज दुनिया की सारी राज्य सत्ताएँ किस दुविधा में फँसी हैं?
उत्तर:
आज दुनिया की सारी राज्य सत्ताएँ अपने भू-क्षेत्रों में राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार की माँग करने वाले अल्पसंख्यक समूहों के आन्दोलनों से निपटने की इस दुविधा में फँसी हैं कि इन आन्दोलनों से कैसे निपटा जाये?

प्रश्न 14.
एक राष्ट्र के भू-क्षेत्र में राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार की माँग करने वाले अल्पसंख्यक समूहों की समस्या का समाधान क्या है?
उत्तर:
एक राष्ट्र के भू-क्षेत्र में राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार की माँग करने वाले अल्पसंख्यक समूहों की समस्या का समाधान नये राज्यों के गठन में नहीं है बल्कि वर्तमान राज्यों को अधिक लोकतांत्रिक और समतामूलक बनाने में है तथा यह सुनिश्चित करने में है कि अलग-अलग संस्कृतियों और नस्लीय पहचानों के लोग देश में अन्य नागरिकों के साथ सह-अस्तित्वपूर्वक रह सकें।

प्रश्न 15.
राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार की अब क्या पुनर्व्याख्या की जाती है?
उत्तर:
राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार की अब यह पुनर्व्याख्या की जाती है कि राज्य के भीतर किसी राष्ट्रीयता के लिए कुछ लोकतांत्रिक अधिकारों को स्वीकृति प्रदान की जाये। प्रत्येक देश अल्पसंख्यकों की माँगों के सम्बन्ध में अत्यन्त उदारता एवं दक्षता का परिचय दे।

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प्रश्न 16.
” पिछली दो शताब्दियों के दौरान राष्ट्रवाद एक ऐसे सम्मोहक राजनीतिक सिद्धान्त के रूप में उभरा है जिसने इतिहास रचने में योगदान दिया है।” इस कथन पर एक टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
पिछली दो शताब्दियों के दौरान राष्ट्रवाद ने निम्न रूपों में इतिहास रचने में योगदान दिया है

  1. इसने उत्कट निष्ठाओं के साथ-साथ गहरे विद्वेषों को भी प्रेरित किया है।
  2. इसने जनता को जोड़ा है तो विभाजित भी किया है।
  3. इंसने अत्याचारी शासन से मुक्ति दिलाने में मदद की तो इसके साथ यह विरोध, कटुता और युद्धों का कारण भी रहा है।
  4. साम्राज्यों और राष्ट्रों के ध्वस्त होने का भी यह कारण रहा है।
  5. आज विश्व का एक बड़ा भाग विभिन्न राष्ट्र – राज्यों में विभाजित है और मौजूदा राष्ट्रों के अन्तर्गत अभी भी अलगाववादी राष्ट्रवादी संघर्ष जारी हैं।

प्रश्न 17.
राज्य व राष्ट्र में तीन अन्तर लिखिये।
उत्तर:
राज्य व राष्ट्र में तीन प्रमुख अन्तर निम्नलिखित हैं।

  1. आवश्यक तत्व सम्बन्धी अन्तर: एक राज्य में आवश्यक रूप से चार तत्वों – जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार और संप्रभुता का होना आवश्यक है, लेकिन एक राष्ट्र में राज्य के ये आवश्यक तत्व लागू नहीं होते हैं। उसमें चार से कम तत्व हो सकते हैं और अधिक तत्व भी हो सकते हैं।
  2. निश्चित भू-भाग सम्बन्धी अन्तर- प्रत्येक राज्य का एक निश्चित भू-भाग होता है, लेकिन एक राष्ट्र के लिए निश्चित भू-भाग होना आवश्यक नहीं है।
  3. संप्रभुता सम्बन्धी अन्तर- राज्य के लिए संप्रभुता का होना आवश्यक है, लेकिन राष्ट्र के लिए संप्रभुता की आवश्यकता नहीं होती।

प्रश्न 18.
राष्ट्रवाद की प्रक्रिया के प्रमुख चरणों को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
राष्ट्रवाद की प्रक्रिया के प्रमुख चरण-राष्ट्रवाद की प्रक्रिया के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं।

  1. छोटी-छोटी रियासतों के एकीकरण और सुदृढ़ीकरण से वृहत्तर राज्यों की स्थापना का चरण: 19वीं शताब्दी के यूरोप में राष्ट्रवाद ने छोटी-छोटी रियासतों के एकीकरण से वृहत्तर राष्ट्र-राज्यों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। जर्मनी और इटली का गठन एकीकरण और सुदृढ़ीकरण की इसी प्रक्रिया के तहत हुआ था।
  2. स्थानीय निष्ठाएँ और बोलियों का राष्ट्रीय निष्ठाओं के रूप में विकास; राज्य की सीमाओं के सृदृढ़ीकरण के साथ-साथ स्थानीय निष्ठाएँ और बोलियाँ भी उत्तरोत्तर राष्ट्रीय निष्ठाओं एवं सर्वमान्य जनभाषाओं के रूप में विकसित हुईं।
  3. नई राजनीतिक पहचान: नए राष्ट्र के लोगों ने नई राजनीतिक पहचान अर्जित की, जो राष्ट्र-राज्य की सदस्यता पर आधारित थी। पिछली शताब्दी में हमने अपने देश को सुदृढ़ीकरण की ऐसी ही प्रक्रिया से गुजरते देखा है।
  4. बड़े-बड़े साम्राज्यों के पतन में हिस्सेदार; यूरोप में 20वीं सदी में आस्ट्रियाई – हंगेरियाई, रूसी, ब्रिटिश, फ्रांसीसी, डच और पुर्तगाली साम्राज्य के विघटन के मूल में राष्ट्रवाद ही था।
  5. सीमाओं के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया: राष्ट्रों की सीमाओं की पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया अभी जारी है। 1960 से ही राष्ट्र-राज्य कुछ समूहों या अंचलों द्वारा उठाई गई राष्ट्रवादी मांगों का सामना करते आ रहे हैं। इन मांगों में पृथक् राज्य की मांग भी शामिल है। आज दुनिया के अनेक भागों में ऐसे राष्ट्रवादी संघर्ष जारी हैं।

प्रश्न 19.
राष्ट्र से क्या आशय है?
उत्तर:
राष्ट्र से अभिप्राय-राष्ट्र बहुत हद तक एक काल्पनिक समुदाय होता है, जो अपने सदस्यों के सामूहिक विश्वास, आकांक्षाओं और कल्पनाओं के सहारे एक सूत्र में बंधा होता है। यह कुछ खास मान्यताओं पर आधारित होता है जिन्हें लोग उस समग्र समुदाय के लिए गढ़ते हैं, जिससे वे अपनी पहचान कायम करते हैं।

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प्रश्न 20.
राष्ट्रवाद के लिए एक समान भाषा या जातीय परम्परा जैसी सांस्कृतिक पहिचान का आधार लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा क्यों हो सकता है?
उत्तर:
यद्यपि एक ही भाषा बोलना आपसी संवाद को काफी आसान बना देता है। इसी प्रकार समान धर्म होने पर बहुत सारे विश्वास और सामाजिक रीतिरिवाज साझे हो जाते हैं। लेकिन यह उन मूल्यों के लिए खतरा भी उत्पन्न कर सकता है जिन्हें हम लोकतंत्र में महत्त्वपूर्ण मानते हैं। इसके निम्नलिखित दो कारण हैं

1. विश्व के सभी बड़े धर्म अंदरूनी तौर से विविधता से भरे हुए हैं। एक ही धर्म के अन्दर बने विभिन्न पंथ हैं और धार्मिक ग्रंथों तथा नियमों की उनकी व्याख्याएँ भी काफी अलग-अलग हैं। अगर हम उन पंथिक विभिन्नताओं की अवहेलना कर एक समान धर्म के आधार पर एक पहचान स्थापित कर देंगे तो इससे एक वर्चस्ववादी और दमनकारी समाज का निर्माण होगा जो लोकतंत्र के मूल आदर्शों के विपरीत होगा।

2. विश्व के अधिकतर समाज सांस्कृतिक रूप से विविधता से भरे हैं। एक ही भू-क्षेत्र में विभिन्न धर्म और भाषाओं के लोग साथ-साथ रहते हैं। किसी राज्य की सदस्यता की शर्त के रूप में किसी खास धार्मिक या भाषायी पहचान को आरोपित कर देने से कुछ समूह निश्चित रूप से शामिल होने से रह जायेंगे। इससे इन समूहों की या तो धार्मिक स्वतंत्रता बाधित होगी या राष्ट्रीय भाषा न बोलने वाले समूहों की हानि होगी। दोनों ही स्थितियों में ‘समान बर्ताव और सबके लिए स्वतंत्रता’ के आदर्श में भारी कटौती होगी, जिसे हम लोकतंत्र के लिए अमूल्य मानते हैं।

प्रश्न 21.
राष्ट्रीय आत्म निर्णय के अधिकार से क्या आशय है?
उत्तर:
राष्ट्रीय आत्मनिर्णय: जब कोई सामाजिक समूह शेष सामाजिक समूहों से अलग राष्ट्र चाहता है । वह अपना शासन अपने आप करने और अपने भविष्य को तय करने का अधिकार चाहता है तो उसके इस अधिकार को ही आत्म-निर्णय का अधिकार कहते हैं। इसके दावे में राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से यह मांग करता है कि उसके पृथक् राजनीतिक इकाई या राज्य के दर्जे को मान्यता और स्वीकार्यता दी जाये। प्राय: राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार की मांग उन लोगों की ओर से की जाती है जो एक लम्बे समय से किसी निश्चित भू-भाग पर साथ-साथ रहते आए हों और जिनमें साझी पहचान का बोध हो। कुछ मामलों में आत्म-निर्णय के ऐसे दावे एक स्वतंत्र राज्य बनाने की इच्छा से जुड़े होते हैं। कुछ दावों का सम्बन्ध किसी समूह की संस्कृति की संरक्षा से होता है।

प्रश्न 22.
राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रेरित करने वाले कारकों को संक्षेप में स्पष्ट कीजिये।
अथवा
राष्ट्रवाद के प्रमुख तत्वों को स्पष्ट करो।
उत्तर:
राष्ट्रवाद के प्रमुख तत्व या उसे प्रेरित करने वाले कारक: राष्ट्रवाद के प्रमुख तत्व तथा राष्ट्रवाद को प्रेरित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं।

  1. साझे विश्वास: राष्ट्र विश्वास के जरिये बनता है। एक राष्ट्र का अस्तित्व तभी कायम रह सकता है जब उसके सदस्यों को यह विश्वास हो कि वे एक-दूसरे के साथ हैं।
  2. इतिहास: जो लोग अपने को एक राष्ट्र मानते हैं, उनके भीतर अपने बारे में स्थायी पहचान की भावना होती है। वे देश की स्थायी पहचान का खाका प्रस्तुत करने के लिए साझा स्मृतियों, किंवदन्तियों और ऐतिहासिक अभिलेखों के जरिए इतिहास बोध निर्मित करते हैं।
  3. भू-क्षेत्र: किसी खास भू-क्षेत्र पर लम्बे समय तक साथ-साथ रहना और उससे जुड़ी साझी अतीत की यादें लोगों को एक सामूहिक पहचान का बोध देती हैं। इसलिए जो लोग स्वयं को एक राष्ट्र के रूप में देखते हैं, वे एक गृहभूमि की बात करते हैं। जिसे वे मातृभूमि, पितृभूमि या पवित्र भूमि कहते हैं।
  4. साझे राजनीतिक आदर्श-राष्ट्र के सदस्यों की इस बारे में एक साझा दृष्टि होती है कि वे किस तरह का राज्य बनाना चाहते हैं। साझे राजनीतिक आदर्श, जैसे लोकतन्त्र, धर्मनिरपेक्षता, उदारवाद आदि राष्ट्र के रूप में उनकी राजनीतिक पहचान को बताते हैं।
  5. साझी राजनीतिक पहचान: राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रेरित करने वाला एक अन्य कारण ‘साझी राजनीतिक पहचान’ अर्थात् ‘एक मूल्य- समूह के प्रति निष्ठा’ का होना आवश्यक है। इस मूल्य समूह को देश के संविधान में भी दर्ज किया जाता है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
बास्क में राष्ट्रीय आत्म-निर्णय की मांग को स्पष्ट कीजिये। क्या बास्क राष्ट्रवादियों की अलग राष्ट्र की मांग जायज है? आपकी दृष्टि में इसका क्या समाधान हो सकता है?
उत्तर:
बास्क में राष्ट्रीय आत्म-निर्णय की मांग: बास्क स्पेन का एक पहाड़ी और समृद्ध क्षेत्र है। इस क्षेत्र को स्पेनी सरकार ने स्पेन राज्य संघ के अन्तर्गत ‘स्वायत्त’ क्षेत्र का दर्जा दे रखा है, लेकिन बास्क राष्ट्रवादी आन्दोलन के नेतागण इस स्वायत्तता से संतुष्ट नहीं हैं। वे चाहते हैं कि बास्क स्पेन से अलग होकर एक स्वतंत्र देश बन जाए। बास्क राष्ट्रवादियों के तर्क। बास्क राष्ट्रवादी अपनी मांग के समर्थन में निम्न तर्क देते हैं।

  1. उनकी संस्कृति स्पेनी संस्कृति से बहुत भिन्न है।
  2. उनकी अपनी भाषा है, जो स्पेनी भाषा से बिल्कुल नहीं मिलती है।
  3. बास्क क्षेत्र की पहाड़ी भू-संरचना उसे शेष स्पेन से भौगोलिक तौर पर अलग करती है।
  4. रोमन काल से अब तक बास्क क्षेत्र ने स्पेनी शासकों के समक्ष अपनी स्वायत्तता का कभी समर्पण नहीं किया। उसकी न्यायिक, प्रशासनिक एवं वित्तीय प्रणालियाँ उसकी अपनी विशिष्ट व्यवस्था के जरिए संचालित होती थीं।

आधुनिक बास्क आंदोलन के कारण

  1. 19वीं सदी के अंत में स्पेनी शासकों ने बास्क क्षेत्र की विशिष्ट राजनीतिक प्रशासनिक व्यवस्था को समाप्त करने की कोशिश की।
  2. 20वीं सदी में तानाशाह फ्रैंको ने इस स्वायत्तता में और कटौती कर दी। उसके बास्क भाषा को सार्वजनिक स्थानों, यहाँ तक कि घर में भी बोलने पर पाबंदी लगा दी।
  3. यद्यपि वर्तमान स्पेनी शासन ने इन दमनकारी कदमों को वापस ले लिया है, तथापि बास्क आंदोलनकारियों का स्पेनी शासन के प्रति संदेह और क्षेत्र में बाहरी लोगों के प्रवेश का भय बरकरार है।

समस्या का संभव समाधान: दमन किये जाने या दमन किये जाने के भय के बने रहने के कारण पैदा हुई बास्क राष्ट्रवादियों की अलग राष्ट्र की मांग जायज है। लेकिन यदि स्पेन का शासन बास्क लोगों के अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान की कद्र करते हुए उनमें भरोसा पैदा करने में समर्थ हो जाते हैं तो वे बास्क के लोगों की स्पेन के प्रति निष्ठा स्वतः ही प्राप्त कर लेंगे। अंतः निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि बास्क के लोगों की समस्या का समाधान नए राज्य के गठन में नहीं है बल्कि वर्तमान स्पेन राज्य को अधिक लोकतांत्रिक और समतामूलक बनाने में है तथा यह सुनिश्चित करने में है कि अलग-अलग सांस्कृतिक और नस्लीय पहचानों के लोग देश में समान नागरिक और साथियों की तरह सह-अस्तित्वपूर्वक रह सकें।

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 7 राष्ट्रवाद

प्रश्न 2.
राज्य और राष्ट्र में क्या अन्तर है?
उत्तर:
राज्य और राष्ट्र में अन्तर यद्यपि सामान्य बोलचाल में राज्य और राष्ट्र शब्दों को एक-दूसरे के लिए प्रयुक्त किया जाता है तथा दोनों को समानार्थी समझा जाता है। लेकिन दोनों शब्द समानार्थी नहीं हैं, दोनों में स्पष्ट अन्तर है। दोनों के अन्तर को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है।
1. राज्य के लिए चार तत्त्वों का होना आवश्यक है:
प्रत्येक राज्य के चार आवश्यक तत्त्व होते हैं। ये हैं- जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार और संप्रभुता। लेकिन राष्ट्र के लिए इन चारों तत्त्वों का होना आवश्यक नहीं है। एक राष्ट्र के 10 तत्त्व हो सकते हैं; दूसरे के केवल चार हो सकते हैं और किसी अन्य के केवल तीन भी हो सकते हैं। राष्ट्र के तत्त्व बदल भी सकते हैं। इस प्रकार राज्य के आवश्यक तत्त्व राष्ट्र के लिये लागू नहीं होते।

2. राज्य के लिए एकता की भावना अनिवार्य नहीं हैं:
एक राज्य के लोग एक निश्चित भू-भाग में निवास करते हैं, उनमें एकता और एकत्व ( oneness) की भावना का होना आवश्यक नहीं है। लेकिन एक राष्ट्र के सदस्यों में एकता की भावना का होना आवश्यक है। यदि किसी समूह के लोग साथ-साथ रहते हैं लेकिन उनमें एकत्व की कोई भावना नहीं है जो अन्य लोगों से उसे अलग करती हो, तो वह समूह राष्ट्र नहीं कहला सकता।

3. राज्य का भू-भाग निश्चित होता है:
प्रत्येक राज्य का एक निश्चित भू-भाग होता है, लेकिन राष्ट्र का निश्चित भू-भाग नहीं होता। एक राष्ट्र में एक या एक से अधिक राज्य हो सकते हैं और एक राज्य में दो या अधिक राष्ट्र हो सकते हैं। यद्यपि वर्तमान में एक राष्ट्र एक राज्य का विचार प्रचलित है और एक राष्ट्र अपने प्रयासों से देर-सवेर स्वतंत्रता प्राप्त कर लेता है।

4. राज्य के पास संप्रभुता होती है: राज्य के लिए संप्रभुता का होना आवश्यक है, लेकिन राष्ट्र के लिए संप्रभुता की आवश्यकता नहीं होती। जब कोई समूह राजनैतिक चेतना प्राप्त कर लेता है और अपनी स्वतंत्रता के लिये प्रयत्न करना प्रारंभ कर देता है, वह समूह स्वयं में एक राष्ट्र की रचना करता है; लेकिन जब तक लोगों को संप्रभुता प्राप्त नहीं होगी, वे राज्य का निर्माण नहीं कर सकते हैं।

5. राष्ट्र अधिक स्थायी है- राष्ट्र राज्य की तुलना में अधिक स्थायी है। जब एक समाज अपनी संप्रभुता को खो देता है, तब राज्य समाप्त हो जाता है, लेकिन उसके सदस्यों की एकता की भावना उसकी राष्ट्र के रूप में पहचान बनाए रखती है। शक्ति के द्वारा पारम्परिक एकता की भावना को समाप्त नहीं किया जा सकता।

6. राष्ट्र की अपेक्षा राज्य भौतिक है- राष्ट्र एक एकता की भावना है लेकिन राज्य वह है जब उसके चारों तत्व एक साथ हों। इनमें भूमि, जनसंख्या और सरकार तीनों तत्व भौतिक हैं।

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 7 राष्ट्रवाद

प्रश्न 3.
राष्ट्रवाद को परिभाषित कीजिये। इसके गुण तथा दोषों की व्याख्या कीजिये।
अथवा
राष्ट्रवाद के पक्ष व विपक्ष में तर्क दीजिये।
उत्तर:
राष्ट्र से आशय: राष्ट्र बहुत हद तक एक ‘काल्पनिक समुदाय’ होता है, जो अपने सदस्यों के सामूहिक विश्वास, आकांक्षाओं और कल्पनाओं के सहारे एक सूत्र में बंधा होता है। यह कुछ खास मान्यताओं पर आधारित होता है जिन्हें लोग समग्र समुदाय के लिए गढ़ते हैं जिससे वे अपनी पहचान कायम रखते हैं।

राष्ट्रवाद का अर्थ: इस प्रकार सामान्य बोलचाल में राष्ट्रवाद का अर्थ है। राष्ट्र प्रेम, राष्ट्रभक्ति, राष्ट्र के लिए बलिदान की भावना, राष्ट्र के प्रति स्वाभिमान की भावना तथा राष्ट्रीय झंडे, राष्ट्रीय प्रतीकों तथा राष्ट्रीय पर्वों, जैसे- स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस आदि के प्रति आदर प्रदर्शित करना है।

राष्ट्रवाद को दो प्रमुख प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. सकारात्मक राष्ट्रवाद: जब लोग अपने राष्ट्र से प्रेम करते हैं तथा इसके विकास तथा बेहतरी के लिए प्रयास करते हैं तो इसे सकारात्मक राष्ट्रवाद कहा जाता है।
  2. नकारात्मक राष्ट्रवाद: जब हम केवल अपने राष्ट्र से ही प्रेम करते हैं और दूसरे राष्ट्रों से घृणा करते हैं, उनका शोषण करते हुए अपने राष्ट्र का विकास करना चाहते हैं तो उसे नकारात्मक या उग्र राष्ट्रवाद कहते हैं। नकारात्मक राष्ट्रवाद के संघर्ष, युद्ध, लोगों की स्वतंत्रताओं में कटौती आदि बुरे परिणाम होते हैं।

राष्ट्रवाद के गुण
अथवा
राष्ट्रवाद के पक्ष में तर्क

राष्ट्रवाद के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं।
1. राष्ट्रवाद लोगों में विश्वास तथा नया जोश जगाता है: राष्ट्रवाद लोगों में परस्पर विश्वास पैदा करता है। यह राष्ट्र-राज्य की बेहतरी के लिए खड़ा होता है और नागरिकों को अपने राष्ट्र को शक्तिशाली और महान बनाने के लिए उसके प्रति भक्ति रखने तथा सभी प्रकार के त्याग करने की प्रेरणा देता है । वे देशभक्ति, राष्ट्रीय एकता तथा अनुशासन की नवीन भावना में अपने अधिकारों और स्वतंत्रताओं को भी भूल जाते हैं। इटली और जर्मनी के एकीकरण में यही घटित हुआ है।

2. देशभक्ति:
राष्ट्रवाद देश भक्ति के लिए लोगों को प्रेरित करता है और उन्हें अपने समाज, देश तथा राष्ट्र के लिए सभी प्रकार के त्याग करने के लिए तैयार करता है। यह राष्ट्रवाद ही है, जब एक राष्ट्र की टीम दूसरे राष्ट्र से मैच जीतती है तो उससे उन्हें गर्व होता है।

3. यह राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए लोगों को प्रेरित करता है:
राष्ट्रवाद विदेशी प्रभुत्व से लोगों को राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने को प्रेरित करता है। 18वीं सदी में भारत में राष्ट्रीयता की चेतना न होने से वह ब्रिटिश प्रभुत्व के अधीन हो गया। लेकिन भारतीयों में जब राष्ट्रवाद की चेतना का उदय हुआ तथा उसका विस्तार हुआ तो उन्होंने स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय आंदोलन प्रारंभ कर दिया और भारत की स्वतंत्रता तक वह चलता रहा। इसी प्रकार एशिया, अफ्रीका और दक्षिणी अमेरिका के अन्य देशों में भी राष्ट्रवाद ने विदेशी शासन से स्वतंत्रता प्रदान करने में केन्द्रीय भूमिका निबाही

4. यह राष्ट्र के चहुंमुखी विकास हेतु लोगों को कठिन परिश्रम के लिए प्रेरित करता है:
एक समाज जो राष्ट्रवाद की भावना से प्रेरित है लम्बे समय तक अविकसित तथा पिछड़ा हुआ नहीं रह सकता। लोग अपने राष्ट्र के चहुंमुखी विकास पर गौरवान्वित होते हैं और जब वे यह देखते हैं कि उनका राष्ट्र शिक्षा, स्वास्थ्य तथा आर्थिक विकास की दृष्टि से पिछड़ा हुआ है, तो उन्हें ग्लानि होती है। वे विश्व में अपने राष्ट्र को उन्नति के उच्च शिखर पर लाने के लिए कठिन परिश्रम करते हैं।

5. नए राज्यों का उदय:
बड़े राज्यों को दो या अधिक नये राष्ट्रों में विभाजित कर नये राष्ट्र-राज्यों के निर्माण के लिए राष्ट्रवाद उत्तरदायी रहा है। राष्ट्रवाद के कारण नये राज्यों के लोग अपनी नई राजनीतिक पहचान प्राप्त करते हैं। उदाहरण के लिए आस्ट्रियाई हंगेरियाई साम्राज्य को विभाजित कर दो नए राष्ट्र-राज्य आस्ट्रिया और हंगरी का निर्माण राष्ट्रवाद की भावना के तहत ही हुआ।

6. राष्ट्रीय एकता, शक्ति और सुदृढ़ीकरण: राष्ट्रवाद लोगों को अपने छोटे-छोटे मतभेदों तथा विवादों को भूलकर राष्ट्र की एकता के लिए एक हो जाने के लिए प्रेरित करता है। राष्ट्रीय एकता राष्ट्र को शक्तिशाली बनाती है और राष्ट्र सुदृढ़ तथा ताकतवर बनता है। इस प्रकार राष्ट्रवाद लोगों को एकता में बांध देता है और विशेष रूप से संकटकाल में तथा विदेशी आक्रमण के विरुद्ध लोगों को एक चट्टान की तरह एकजुट होकर प्रतिरोध करने को प्रेरित करता है।

7. राजनीतिक स्थायित्व: राष्ट्रवाद राजनैतिक स्थायित्व भी लाता है। राष्ट्रवाद के प्रभाव के अन्तर्गत शक्तिशाली राष्ट्रीय एकता बनी रहती है जो कि सरकार को शक्तिशाली बनाती है। लोग राजनीतिक व्यवस्था को ध्वस्त करने का प्रयास नहीं करते क्योंकि सरकारों को बार-बार अपदस्थ करना तथा शासन व्यवस्था का निरन्तर बदलाव राष्ट्र को बदनाम करेगा।

राष्ट्रवाद के अवगुण
अथवा
राष्ट्रवाद के विपक्ष में तर्क

राष्ट्रवाद के प्रमुख अवगुण निम्नलिखित हैं:
1. राष्ट्रवाद जल्दी ही उग्र राष्ट्रवाद में बदल जाता है:
राष्ट्रवाद दूसरे राष्ट्रों के प्रति गहरे घृणा के भाव को प्रेरित करता है और इस कारण यह जल्दी ही उग्र राष्ट्रवाद में बदल जाता है और लोग अन्य राष्ट्रों व वहाँ के लोगों को अपना दुश्मन मानना शुरू कर देते हैं। वे अपने राष्ट्र को विश्व का सबसे अधिक शक्तिशाली तथा विकसित राष्ट्र बनाने के लिए प्रयास प्रारंभ कर देते हैं। इस प्रकार राष्ट्रों के बीच जल्दी ही एक प्रजाति का भाव उदित हो जाता है जो कि बहुत हानिकारक है क्योंकि प्रत्येक राष्ट्र इसे प्राप्त करने के लिए उचित और अनुचित सभी उपलब्ध साधनों को अपनाने लग जाता है। प्रत्येक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को निरुत्साहित करता है तथा उसे निम्नस्तरीय बताने का प्रयास करता है।

2. राष्ट्रवाद बड़े राष्ट्रों को छोटे राष्ट्रों में तोड़ने के लिए प्रेरित करता है:
राष्ट्रवाद राष्ट्रीय आत्मनिर्णय के विचार के आधार पर कुछ बड़े राज्यों के लोगों को छोटे-छोटे राज्यों में परिवर्तित कराने की मांग उठाने की प्रेरणा देता है। -भाषा- भाषियों तथा भिन्न-भिन्न अधिकतर समाज सांस्कृतिक रूप से विविधता से भरे हैं। प्रत्येक समाज में विभिन्न धर्मों, क्षेत्रीय संस्कृतियों व उप-संस्कृतियों के लोग रहते हैं। वे क्षेत्र जो एक राष्ट्र के अन्तर्गत अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं, उनमें जल्दी ही एक पृथक् राष्ट्र के विकास के भाव विकसित हो जाते हैं और एक पृथक् स्वतंत्र राज्य की स्थापना हेतु आन्दोलन प्रारंभ कर देते हैं। आस्ट्रियाई – हंगेरियाई साम्राज्य इसी आधार पर दो राज्य – राष्ट्रों- आस्ट्रिया और हंगरी में विभाजित हो गया।

3. राष्ट्रीय एकता पर दुष्प्रभाव:
यदि किसी राज्य में जनसंख्या दो या अधिक राष्ट्रों की निवास करती है, उसमें राष्ट्रीय एकता को बनाए रखना तथा सुदृढ़ बनाना बहुत कठिन होता है। लोगों के मध्य राष्ट्रवाद की चेतना उन्हें एक पृथक् राज्य के लिए विभाजित तथा संघर्षरत रखती है। कभी-कभी धर्म या भाषा के छोटे आधारों पर ही वे पृथक् राष्ट्र होने का दावा करते हैं और एक पृथक् राज्य की मांग करते हैं। एक राज्य में दो या अधिक राष्ट्रों के लोगों के बीच एकत्व की भावना नहीं पाई जाती।

4. व्यक्ति के अधिकारों और स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध:
राष्ट्रवाद प्रायः लोगों की स्वतंत्रताओं और उनके अधिकारों को भी प्रतिबंधित कर देता है। प्रजातांत्रिक सरकारों में शासक दल और शासक राष्ट्रवाद की भावनाओं को उभारकर लोगों की स्वतंत्रताओं और अधिकारों में कटौती करने का प्रयास करता है। लोग राष्ट्र के आदर और उसकी महानता के लिए अपनी स्वतंत्रताओं और अधिकारों की परवाह नहीं करते हैं और तानाशाह या महत्त्वाकांक्षी शासक इन भावनाओं का दुरुपयोग करते हैं।

5. राष्ट्रवाद साम्राज्यवाद को बढ़ावा देता है: राष्ट्रवाद जल्दी ही उग्र राष्ट्रवाद में परिवर्तित होकर साम्राज्यवाद को बढ़ावा देता है।

6. राष्ट्रवाद पृथकतावादी आंदोलनों को प्रेरित करता है:
राष्ट्रवाद भारत तथा विश्व के अन्य राष्ट्रों में पृथकतावादी आंदोलनों को भी प्रेरित करता है। आजकल विश्व में राष्ट्रीय आत्मनिर्णय के अधिकार की मांग के तहत कनाडा में क्यूबेकवासियों, स्पेन में बास्कवासियों, तुर्की और इराक में कुर्दों तथा श्रीलंका में तमिलों द्वारा पृथक् राष्ट्र हेतु पृथकतावादी आन्दोलन चला रखा है। वे मुख्य राष्ट्र से पृथक् होकर अपना एक स्वतन्त्र राज्य की स्थापना करना चाहते हैं। ऐसे पृथकतावादी आंदोलन राज्यों को छोटे-छोटे राज्यों में परिवर्तित कर देंगे।

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 7 राष्ट्रवाद

प्रश्न 4.
बहुलवादी समाज़ में राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रवाद की समस्याओं की विवेचना कीजिये तथा उनके समाधान के उपाय बताइये।
उत्तर:
बहुलवाद या बहुलवादी समाज; प्रायः सभी राज्य या समाज इन दिनों बहुलवादी समाज हैं। एक बहुलवादी समाज वह समाज है जिसमें विभिन्न धर्मों, पंथों, भाषा-भाषी, विभिन्न संस्कृतियों या उपसंस्कृतियों, विभिन्न वंशों व जातियों के लोग रहते हों तथा उनकी रीति-रिवाज और परम्पराएँ भी भिन्न-भिन्न हों। यदि किसी राज्य के लोगों की एक जाति है, वे एक ही धर्म का पालन करते हैं; एक भाषा बोलते हैं, उनकी एक ही सांस्कृतिक पहचान है तथा उनकी परम्पराएँ तथा रीतिरिवाज समान हैं, तो वह समाज या राज्य बहुलवादी नहीं है। इस प्रकार बहुलवादी समाज के आधारभूत तत्त्व हैं। जाति, भाषा, धर्म, संस्कृति आदि के आधार पर लोगों में विविधता।

भारतीय समाज एक बहुलवादी समाज है। यहाँ लोग अनेक धर्मों, जैसे हिन्दू, इस्लाम, ईसाई, सिक्ख, जैन, बुद्ध आदि – में विश्वास करते हैं। लोग विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं। 21 भाषाएँ यहाँ संवैधानिक मान्यता प्राप्त हैं। यहाँ भिन्न-भिन्न परम्पराएँ तथा रीति-रिवाज हैं तथा लोगों की भिन्न-भिन्न क्षेत्रीय संस्कृतियाँ भी हैं। इसी प्रकार स्विट्जरलैंड एक बहुलवादी समाज है। स्विट्जरलैंड में तीन भाषा-भाषी लोग फ्रेंच, जर्मन तथ इटालियन रहते हैं।

बहुलवादी समाज में राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रवाद की भावना को बनाए रखने एवं विकसित करने में आने वाली समस्याएँ:
बहुलवादी समाज में राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रवाद की भावना को बनाए रखना तथा उसको सुदृढ़ करते रहना आसान काम नहीं है। बहुलवादी समाज में लोग धर्म, भाषा या क्षेत्र के छोटे-छोटे मुद्दों या मामलों पर विभाजित रहते हैं।

उदाहरण के लिए भारत इसी समस्या के कारण स्वतंत्रता के 63 वर्ष बाद भी एक राष्ट्र-भाषा को नहीं अपना पाया है। अभी भी अंग्रेजी राष्ट्रीय भाषा का महत्त्वपूर्ण स्थान बनाए हुए है क्योंकि यहाँ भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोली जाती हैं। यद्यपि देवनागरी लिपि में हिन्दी भाषा को संवैधानिक रूप से सरकारी कामकाज की भाषा स्वीकार किया गया हैं, लेकिन अभी तक इसे कार्यालयी स्थान नहीं मिला है। यहाँ साम्प्रदायिक, जातिगत, क्षेत्रीय आदि विविधताओं के कारण इनके आधारों पर संघर्ष होते रहते हैं, जिससे राष्ट्रीय एकता, सुदृढ़ता बाधित होती है और राष्ट्रवाद की भावना कमजोर होती है।

बहुलवादी समाज में राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रवाद के सुदृढ़ीकरण के उपाय: एक बहुलवादी समाज में राष्ट्रवाद की भावना तथा राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने के लिए निम्नलिखित उपाय करने आवश्यक हैं।

  1. बहुलवादी राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने के लिए अल्पसंख्यक समूहों और उनके सदस्यों की भाषा, संस्कृति एवं धर्म के लिए संवैधानिक संरक्षा के अधिकार प्रदान किये जाने चाहिए।
  2. इन समूहों को विधायी संस्थाओं और अन्य राजकीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का अधिकार दिया जाना चाहिए। इन अधिकारों को इस आधार पर न्यायोचित ठहराया जा सकता है कि ये अधिकार इन समूहों के सदस्यों के लिए कानून द्वारा समान व्यवहार और सुरक्षा के साथ ही समूह की सांस्कृतिक पहचान के लिए भी सुरक्षा का प्रावधान करते हैं।
  3. इनं समूहों को राष्ट्रीय समुदाय के एक अंग के रूप में भी मान्यता दी जानी चाहिए। इसका अभिप्राय यह है कि राष्ट्रीय पहचान को समावेशी रीति से परिभाषित करना होगा जो राष्ट्र-राज्य के सभी सदस्यों की महत्ता और अद्वितीय योगदान को मान्यता दे सके।
  4. यदि कुछ अल्पसंख्यकों को सरकारी नौकरियों, प्रतिनिधिपरक निकायों का शैक्षिक सुविधाओं में उचित भाग नहीं मिल पाता है तो उन्हें इन क्षेत्रों में उचित भाग दिलाने हेतु सरकार को कुछ विशिष्ट उपाय, जैसे  कुछ विशिष्ट सुविधाएँ प्रदान करना, आरक्षण की नीति लागू करना आदि किये जाने चाहिए। भारत में इसी दृष्टि से अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों तथा स्त्रियों के लिए आरक्षण के प्रावधान किये गये हैं।

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 7 राष्ट्रवाद

प्रश्न 5.
राष्ट्रवाद पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर की समालोचना को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
राष्ट्रवाद पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर की समालोचना: रवीन्द्रनाथ ठाकुर भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरोधी थे और भारत की स्वाधीनता के अधिकार का दावा करते थे। वे महसूस करते थे कि उपनिवेशों के ब्रितानी प्रशासन में ‘मानवीय संबंधों की गरिमा बरकरार रखने’ की गुंजाइश नहीं है। यद्यपि ब्रितानी सभ्यता में इस विचार को स्थान दिया गया है और औपनिवेशिक शासन इस विचार का पालन नहीं कर पा रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर ब्रिटिश दासता से भारत की स्वतंत्रता के प्रमुख सेनानी थे; लेकिन वे संकीर्ण राष्ट्रवाद के विरोधी थे। संकीर्ण राष्ट्रवाद के स्थान पर वे ‘मानवता’ पर बल देते थे। अर्थात् वे मानवतावादी राष्ट्रवादी थे।

वे मानव-मानव में कोई भेद नहीं करते थे। इसलिए स्वतंत्र भारत में प्रत्येक मानव को समान महत्त्व मिलना चाहिए। वे राष्ट्रवाद की क्षेत्रीय संकीर्णता, भाषायी संकीर्णता, धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठकर ‘बहुलवादी समाज और मानवता’ को अपनाने पर बल देते थे। उनकी अंतिम आध्यात्मिक मंजिल राष्ट्रवाद न होकर मानवता थी। उनका कहना था कि ” जब तक मैं जीवित हूँ देशभक्ति को मानवता पर कदापि विजयी नहीं होने दूँगा।” इसका आशय यह है कि राष्ट्रवाद जब तक मानवता को साथ लेकर चलता है, तब तक ही उसका स्वागत करना चाहिए।

यदि राष्ट्रवाद की भावना के तहत मानवता का हनन होता है अर्थात् देशभक्ति की भावना के तहत व्यक्तियों का बलिदान देकर राष्ट्रवाद को बढ़ाया जाता है, तो यह राष्ट्रवाद मानवता विरोधी है। व्यक्ति के अधिकारों, स्वतंत्रताओं को राष्ट्रवाद के लिए बलिदान देने वाले राष्ट्रवाद के वे विरोधी थे। वे देश के स्वाधीनता आन्दोलन में मौजूद संकीर्ण राष्ट्रवाद के कटु आलोचक थे। उन्हें भय था कि तथाकथित भारतीय परम्परा के पक्ष में पश्चिमी सभ्यता को खारिज करने का विचार यहीं तक नहीं रुकेगा।

आगे चलकर यह अपने देश में मौजूद ईसाई, यहूदी, पारसी और इस्लाम समेत तमाम विदेशी प्रभावों के खिलाफ आसानी से आक्रामक भी हो सकता है। उनकी यह आशंका सत्य सिद्ध हुई और इसी के चलते भारत, भारत और पाकिस्तान दो भागों में विभाजित हो गया। अतः स्पष्ट है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर बहुलवादी राष्ट्रवाद, मानवता को साथ लेकर चलने वाले राष्ट्रवाद के समर्थक थे, न कि संकीर्ण राष्ट्रवाद के।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 विकास

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Jharkhand Board JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 विकास Textbook Exercise Questions and Answers.

Jharkhand Board Class 11 Political Science विकास Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
आप विकास से क्या समझते हैं? क्या विकास की प्रचलित परिभाषा से समाज के सभी वर्गों को लाभ होता है?
उत्तर:
विकास से आशय: ‘विकास’ शब्द अपने व्यापकतम अर्थ में उन्नति, प्रगति, कल्याण और बेहतर जीवन की अभिलाषा के विचारों का वाहक है। लेकिन ‘विकास’ शब्द का प्रयोग व्यवहार में व्यापक अर्थ में नहीं किया है, बल्कि इसका प्रयोग प्रायः ‘आर्थिक विकास की दर में वृद्धि और समाज का आधुनिकीकरण’ जैसे संकीर्ण अर्थों में किया गया है। इसे प्राय: पहले से निर्धारित लक्ष्यों या बांध, उद्योग, अस्पताल जैसी परियोजनाओं को पूरा करने से जोड़कर देखा जाता है।

विकास का प्रभाव:
प्रचलित अर्थ में विकास का अर्थ आर्थिक विकास और आधुनिकीकरण से लिया गया है। विकास की इस प्रचलित परिभाषा में विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक नहीं पहुँचा। इस प्रक्रिया में समाज के कुछ हिस्से लाभान्वित हुए जबकि बाकी लोगों को अपने घर, जमीन, जीवन शैली को बिना किसी भरपाई के खोना पड़ा। उदाहरण के लिए बड़े बांधों के निर्माण, औद्योगिक गतिविधियों और खनन कार्यों की वजह से बड़ी संख्या में लोगों का उनके घरों और क्षेत्रों से विस्थापन हुआ।

विस्थापन का परिणाम आजीविका खोने और दरिद्रता में वृद्धि के रूप में सामने आया। अगर ग्रामीण खेतिहर समुदाय अपने परम्परागत पेशे और क्षेत्र से विस्थापित होते हैं, तो वे समाज के हाशिये पर चले जाते हैं। बाद में वे शहरी और ग्रामीण गरीबों की विशाल आबादी में शामिल हो जाते हैं। लम्बी अवधि में अर्जित परम्परागत कौशल नष्ट हो जाते हैं। संस्कृति का भी विनाश होता है, क्योंकि जब लोग नई जगह पर जाते हैं, तो वे अपनी पूरी सामुदायिक जीवन-पद्धति खो बैठते हैं। ऐसे विस्थापनों ने अनेक देशों में संघर्षों को जन्म दिया है।

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प्रश्न 2.
जिस तरह का विकास अधिकतर देशों में अपनाया जा रहा है उससे पड़ने वाले सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों की चर्चा कीजिये।
उत्तर:
अधिकतर देशों में आर्थिक उन्नति और समाज के आधुनिकीकरण के रूप में पश्चिमी देशों के स्तर पर पहुँचने का प्रयास विकास के अन्तर्गत किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में विकासशील देशों ने औद्योगीकरण, कृषि और शिक्षा के आधुनिकीकरण एवं विस्तार के जरिए तेज आर्थिक उन्नति का लक्ष्य निर्धारित किया। यह विश्वास किया गया कि विकास की यह प्रक्रिया समाज को अधिक आधुनिक और प्रगतिशील बनाएगी तथा उसे उन्नति के पथ पर ले जाएगी। विकास के प्रभाव विकास की इस प्रक्रिया से निम्नलिखित सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव पड़े।

(अ) सामाजिक प्रभाव: विकास के इस मॉडल को अपनाने के कारण बहुत बड़ी सामाजिक कीमत चुकानी पड़ी है। यथा

  1. विस्थापन, दरिद्वत्ता में वृद्धि और आजीविका का खोना-बांधों के निर्माण, औद्योगिक गतिविधियों और खनन कार्यों की वजह से बड़ी संख्या में लोगों का उनके घरों और क्षेत्रों से विस्थापन हुआ जिसका परिणाम आजीविका खोने और दरिद्रता में वृद्धि के रूप में सामने आया।
  2. परम्परागत कौशल और संस्कृति का नष्ट होना: ग्रामीण खेतिहर समुदाय अपने परम्परागत पेशे और क्षेत्र से विस्थापित होकर समाज के हाशिये पर चले जाते हैं तथा वे गरीबों की विशाल आबादी में शामिल हो जाते हैं । इससे उनके परम्परागत कौशल नष्ट हो जाते हैं और संस्कृति का भी विनाश होता है तथा वे नई जगह पर जाकर अपनी पूरी सामुदायिक जीवन पद्धति खो बैठते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि विकास की इस प्रक्रिया से समाज के कुछ हिस्से ही लाभान्वित हुए हैं जबकि शेष लोगों को अपने घर, जमीन, जीवन-शैली को बिना किसी भरपाई के खोना पड़ा है। लाखों की संख्या में लोग बेरोजगार हुए हैं। ग्रामीण लोग अपने पारम्परिक व्यवसाय को भूलते जा रहे हैं तथा विद्यमान संस्कृतियों का विनाश होता जा रहा है।
  3. संघर्षों का जन्म: ऐसे विस्थापनों ने अनेक देशों में संघर्षों को जन्म दिया है।
  4. विकास के लाभ और कीमत का असमान वितरण: विकास के अधिकांश फायदों को ताकतवर लोगों ने हथिया लिया और इसकी अधिकांश कीमत अति दरिद्रों तथा आबादी के असुरक्षित हिस्सों ने चुकाई। यथा

(ब) पर्यावरण पर प्रभाव: विकास की वजह से अनेक देशों में पर्यावरण को बहुत ज्यादा नुकसान पहुँचा है।

  1. विशाल जंगली भू-भाग विकास के कारण बांधों में डूब रहा है और इससे पारिस्थितिकी का संतुलन बिगड़ रहा है।
  2. तटीय वनों के नष्ट होने और समुद्रतट के निकट वाणिज्यिक उद्यमों के स्थापित होने के कारण दक्षिणी और दक्षिणी पूर्वी – एशिया के तटों पर समुद्री तूफानों ने अत्यधिक नुकसान किया है।
  3. वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की वजह से आर्कटिक और अंटार्कटिक ध्रुवों पर बर्फ पिघल रही है। इससे तटीय इलाकों के समुद्र में डूब जाने का खतरा पैदा हो रहा है।
  4. विकास के प्रभावस्वरूप वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, जिसके कारण अनेक बीमारियाँ बढ़ रही हैं।
  5. ऊर्जा के उत्तरोत्तर बढ़ते उपयोग से ऊर्जा के स्रोत खत्म होते जा रहे हैं।

प्रश्न 3.
विकास की प्रक्रिया ने किन नए अधिकारों के दावों को जन्म दिया है?
उत्तर:
विकास के अधिकांश लाभों को ताकतवर लोगों ने हथिया लिया है और इसकी कीमत अति दरिद्रों और आबादी के असुरक्षित हिस्से को चुकानी पड़ी है। इसलिए विकास की प्रक्रिया ने अनेक नये अधिकारों के दावों को जन्म दिया है। यथा

  1. लोकतंत्र में लोगों को यह अधिकार मिलना चाहिए कि उनके जीवन को प्रभावित करने वाले निर्णयों में उनसे सलाह ली जाये।
  2. लोगों को आजीविका का अधिकार दिया जाना चाहिए ताकि वे लोग, जिनकी आजीविका के स्रोत को विकास के कारण खतरा पैदा होने पर, आजीविका के अधिकार का दावा सरकार से कर सकें।
  3. समुदाय को नैसर्गिक संसाधनों के उपयोग के परम्परागत अधिकार मिलने चाहिए। यह दावा विशेषकर आदिवासी और आदिम समूहों द्वारा किया जा रहा है, जिनका सामुदायिक जीवन और पर्यावरण के साथ सम्बन्ध विशेष प्रकार का होता है।
  4. पूरी मानवता के साझे नैसर्गिक संसाधनों की व्यवस्थाओं का काम जनसमूह के विभिन्न तबकों की प्रतिस्पर्द्धात्मक मांगों को पूरा करने के साथ-साथ वर्तमान और भविष्य की दावेदारियों के बीच संतुलन भी कायम करना आवश्यक है।

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प्रश्न 4.
विकास के बारे में निर्णय सामान्य हित को बढ़ावा देने के लिए किए जाएँ, यह सुनिश्चित करने में अन्य प्रकार की सरकार की अपेक्षा लोकतांत्रिक व्यवस्था के क्या लाभ हैं?
उत्तर:
विकास के बारे में निर्णय सामान्य हित को बढ़ावा देने के लिए करने के लिए अन्य प्रकार की सरकार की अपेक्षा लोकतांत्रिक सरकार के निम्नलिखित अधिक लाभ हैं।
1. लोकतंत्र में संसाधनों को लेकर विरोध या बेहतर जीवन के बारे में विभिन्न विचारों के द्वन्द्व का हल विचार- विमर्श और सभी के अधिकारों के प्रति सम्मान के जरिए होता है, जबकि अन्य प्रकार की सरकारों में ये विचार ऊपर से थोपे जाते हैं।

2. लोकतांत्रिक देशों में निर्णय प्रक्रिया में हिस्सा लेने के अधिकार पर जोर दिया जाता है। अगर बेहतर जीवन हासिल करने में समाज का हर व्यक्ति साझीदार है, तो विकास की योजनाएँ बनाने और उसके क्रियान्वयन के तरीके ढूँढ़ने में भी हर व्यक्ति को शामिल करने की आवश्यकता है और लोकतंत्र में ही यह व्यवस्था संभव है।

3. लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्णय प्रक्रिया में स्थानीय लोगों के शामिल रहने से समुदायों को नुकसान पहुँचा सकने वाली परियोजनाओं को रद्द करना संभव होता है। इसके साथ ही योजना बनाने और नीतियों के निर्धारण में स्थानीय लोगों की संलग्नता से लोगों के लिए अपनी जरूरतों के मुताबिक संसाधनों के उपयोग की भी गुंजाइश रहती है।

4. लोकतांत्रिक व्यवस्था में विकास की विकेन्द्रित पद्धति आसानी से क्रियान्वित की जा सकती है। इससे परम्परागत और आधुनिक स्रोतों से मिलने वाली तमाम तरह की तकनीकों के रचनात्मक तरीकों के इस्तेमताल को संभव बनाती है।

प्रश्न 5.
विकास से होने वाली सामाजिक और पर्यावरणीय क्षति के प्रति सरकार को जवाबदेह बनाने में लोकप्रिय संघर्ष और आन्दोलन कितने सफल रहे हैं?
उत्तर:
विकास से होने वाली सामाजिक और पर्यावरणीय क्षति के प्रति सरकार को उत्तरदायी बनवाने में लोकप्रिय संघर्षों और आन्दोलनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। यथा-
1. पर्यावरण संरक्षण के प्रति सरकार को जिम्मेदार, जवाबदेह और जागरूक बनाना:
इस प्रकार के संघर्ष और आन्दोलन सरकार को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जिम्मेदार, जवाबदेह तथा जागरूक बनाते हैं। वे उन तथ्यों और आंकड़ों को लोगों के समक्ष लाते हैं, जिन्हें सरकार छुपाने का प्रयास करती है। उदाहरण के लिए नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने बांधों से लोगों की जमीन डूबने और उसके कारण उनकी आजीविका छिनने से लगभग दस लाख लोगों के विस्थापन की समस्या को सरकार के समक्ष उजागर किया तथा इस तथ्य को भी स्पष्ट किया कि विशाल जंगली भू-भाग भी इस बांध में डूब जायेगा, इससे पारिस्थितिकीय संतुलन बिगड़ेगा। इस प्रकार ये आन्दोलन विकास से होने वाली सामाजिक और पर्यावरणीय क्षति के प्रति सरकार को जागरूक करता है तथा उनके लिए सरकार को उत्तरदायी ठहराता है।

2. जन चेतना को जाग्रत करना: ऐसे संघर्ष व आन्दोलन जन चेतना को भी जागृत करते हैं और लोग संबंधित परियोजना के औचित्य पर सरकार से प्रश्न करते हैं। एक बहुत बड़े जनसमुदाय के आन्दोलन में शामिल होने के कारण सरकार प्रभावित लोगों की समस्याओं को सुनने व उनका समाधान करने को बाध्य होती है।

 विकास JAC Class 11 Political Science Notes

→ विकास पद का अर्थ
व्यापक अर्थ – विकास शब्द अपने व्यापकतम अर्थ में उन्नति, प्रगति, कल्याण और बेहतर जीवन की अभिलाषा के विचारों का वाहक है।

→ संकीर्ण अर्थ:
विकास शब्द का प्रयोग प्रायः आर्थिक विकास की दर में वृद्धि और समाज का आधुनिकीकरण जैसे संकीर्ण अर्थों में भी होता है। साधारण बोलचाल में विकास को प्राय: पहले से निर्धारित लक्ष्यों या बांध, उद्योग, अस्पताल जैसी परियोजनाओं को पूरा करने से जोड़कर देखा जाता है । इस अर्थ में विकास की प्रक्रिया में समाज के कुछ हिस्से लाभान्वित होते हैं जबकि शेष लोगों को अपने घर, जमीन, जीवन शैली को बिना किसी भरपाई के खोना पड़ता है।

→ विकास की चुनौतियाँ:
विकास की अवधारण ने 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में महत्त्वपूर्ण सफलता हासिल की। उस समय एशिया और अफ्रीका के बहुत से देशों ने राजनीतिक आजादी हासिल की थी। इनके निवासियों का जीवन स्तर निम्न था। चिकित्सा, शिक्षा और अन्य सुविधाएँ कम थीं। इन्हें अक्सर ‘अविकसित’ या ‘विकासशील’ देश कहां जाता था। इन्हें अपने देश की गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी, निरक्षरता और शिक्षा व चिकित्सा आदि बुनियादी सुविधाओं के अभाव की समस्याओं का समाधान करना था जिसे उनकी बहुसंख्यक आबादी भुगत रही थी। स्वतंत्रता के बाद इन देशों ने अपने संसाधनों का उपयोग अपने राष्ट्रीय हित में सर्वश्रेष्ठ तरीके से कर इन चुनौतियों से निपटने हेतु विकास परियोजनाएँ शुरू कीं।

आरंभिक वर्षों में अविकसित या विकासशील देशों द्वारा प्रयुक्त विकास की अवधारणा – आरंभिक वर्षों में विकास की अवधारणा में जोर आर्थिक उन्नति और समाज के आधुनिकीकरण के रूप में पश्चिमी देशों के स्तर तक पहुँचने पर था। विकासशील देशों ने औद्योगीकरण, कृषि और शिक्षा के आधुनिकीकरण एवं विस्तार के जरिए तेज आर्थिक उन्नति का लक्ष्य निर्धारित किया गया था । अनेक देशों ने विकास की महत्त्वाकांक्षी योजनाओं का सूत्रपात किया। ऐसा प्राय: विकसित देशों की मदद और कर्ज के जरिए किया गया।

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→ भारत और अन्य देशों में अपनाया गया विकास का मॉडल:
स्वतंत्रता के बाद भारत में विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं की एक श्रृंखला बनी। इनमें भाखड़ा नागल बांध, देश के विभिन्न हिस्सों में इस्पात संयंत्रों की स्थापना, खनन, उर्वरक उत्पादन और कृषित तकनीकों में सुधार जैसी अनेक वृहद् परियोजनाएँ शामिल थीं। विकास का जो मॉडल भारत और अन्य देशों द्वारा अपनाया गया, उसकी विगत वर्षों में बहुत अधिक आलोचना हुई है।

→ भारत में अपनाए गए विकास के मॉडल के उद्देश्य – इसके प्रमुख उद्देश्य थे

  • देश की सम्पदा में वृद्धि करना
  • बढ़ती सम्पन्नता असमानता को कम करने में सहायक
  • समाज को अधिक आधुनिक और प्रगतिशील बनाना तथा
  • सम्पूर्ण समाज की उन्नति करना।

→ विकास के मॉडल की आलोचनाएँ- विकास का उक्त मॉडल अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल नहीं रहा। इसकी निम्न प्रमुख आलोचनाएँ हुईं:  आर्थिक हानि

  • मंहगा विकास अधिक वित्तीय लागत – दीर्घकालिक कर्ज में वृद्धि।
  • गरीबी और रोगों में कमी नहीं आई।

→ सामाजिक हानि:

  • बड़ी संख्या में विस्थापन आजीविका का छिनना, दरिद्रता में वृद्धि, परम्परागत कौशल का नष्ट होना तथा सांस्कृतिक विनाश।
  • ऐसे विस्थापनों ने अनेक देशों में संघर्षों को जन्म दिया।
  • विशाल बांधों में विशाल जंगली भू-भाग बांध में डूब जायेंगे जिससे पारिस्थितिकीय संतुलन बिगड़ेगा। नर्मदा नदी पर बनी सरदार सरोवर योजना के तहत बनने वाले बाँधों के निर्माण के खिलाफ चलने वाला आंदोलन; इन्हीं तथ्यों को रेखांकित करता है।

→ पर्यावरण की हानि: विकास के कारण वनों का कटाव, वायु प्रदूषण का बढ़ना, वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन से ताप का बढ़ना तथा ध्रुवों की बर्फ अधिक पिघलने से तटीय इलाकों के डूबने का खतरा। इसका वंचितों पर तात्कालिक और तीखा प्रभाव पड़ेगा। ऊर्जा के स्रोतों की कमी आयेगी।

→ नकारात्मक मॉडल: विकास का यह मॉडल ऊर्जा के उत्तरोतर बढ़ते उपयोग पर निर्भर है और विश्व में प्रयुक्त ऊर्जा का अधिकांश भाग कोयला या पैट्रोलियम से आता है, जिनको पुनः प्राप्त करना संभव नहीं है। इन संसाधनों की परिमित प्रकृति को देखते हुए यह मॉडल नकारात्मक है।

→ विकास का मूल्यांकन:

  • सकारात्मक प्रभाव: विकास के कारण कुछ देशों ने अपनी आर्थिक उन्नति की दर बढ़ाने, यहाँ तक कि गरीबी घटाने में भी कुछ सफलता हासिल की है।
  • नकारात्मक प्रभाव:
    • असमानताओं में विशेष कमी नहीं आयी है।
    • गरीबी लगातार एक समस्या बनी हुई है।
    • अमीर और गरीब के बीच की दूरी बढ़ती गयी है।
    • विकास का लाभ सबको समान रूप से नहीं मिला है।

विकास की संकीर्ण अवधारणा के मॉडल की असफलता को देखते हुए विकास की व्यापक अवधारणा को अपनाने की आवश्यकता महसूस की गई। व्यापक अर्थ में अब विकास ऐसी प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है, जो सभी लोगों के जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि करे। विकास को मापने के वैकल्पिक तरीके: मानव विकास प्रतिवेदन तथा मानव विकास सूचकांक – इस अवधारणा के अनुसार विकास को ऐसी प्रक्रिया होना चाहिए, जो अधिकाधिक लोगों को उनके जीवन में अर्थपूर्ण तरीके से विकल्पों को चुनने की अनुमति दे। इसकी पूर्व शर्त है। बुनियादी जरूरतों की पूर्ति। इनकी पूर्ति के बिना किसी व्यक्ति के लिए गरिमामय जीवन गुजारना और अपनी इच्छाओं की पूर्ति करना असंभव है।

→ विकास की वैकल्पिक अवधारणा: आवश्यकता क्यों?

  • परम्परागत विकास से मानव और पर्यावरण दोनों के लिहाज से भारी कीमत चुकानी पड़ी है।
  • विकास के फायदे का वितरण भी लोगों में असमान रूप से हुआ।
  • विकास की कीमत अतिदरिद्रों व आबादी के असुरक्षित हिस्सों को अधिक चुकानी पड़ी है।
  • अधिकतर देशों में विकास की ‘ऊपर से नीचे’ की रणनीतियाँ अपनायी गईं अर्थात् इससे सम्बन्धित नीतियों का निर्णय राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही के उच्चतर स्तरों पर लिया गया तथा आम नागरिकों से सलाह नहीं ली गयी या विकास से प्रभावित होने वाले लोगों को इसमें शामिल नहीं किया गया। न तो सदियों से हासिल उनके अनुभवों और ज्ञान का उपयोग किया गया और न उनके हितों का ध्यान रखा गया। इस तरह परम्परागत विकास परियोजनाओं से लाभ उठाने वाले सत्ताधारी तबकों द्वारा तैयार व लागू किया गया। फलतः न्यायपूर्ण और टिकाऊ विकास हेतु विकास की वैकल्पिक अवधारणा की आवश्यकता महसूस की गयी।

→ विशेषताएँ: विकास की वैकल्पिक अवधारणा की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं। अधिकारों के दावे – विकास की वैकल्पिक अवधारणा ने अनेक नए अधिकारों के दावों को जन्म दिया है। ये हैं।

  • लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाले निर्णयों में सरकार उनसे सलाह ले।
  • लोगों को जीविका का अधिकार है और विकास के द्वारा यदि सरकार उनकी आजीविका के स्रोत को खतरा पैदा करती है, तो वे लोग सरकार से आजीविका का दावा कर सकते हैं।
  • समुदाय को नैसर्गिक संसाधनों के उपयोग का परम्परागत अधिकार मिलना चाहिए। यह विशेष रूप से आदिवासी और आदिम समुदायों पर लागू होता है।
  • जनसमूह के विभिन्न तबकों की प्रतिस्पर्द्धात्मक माँगों को पूरा करने के साथ-साथ वर्तमान और भविष्य की दावेदारियों के बीच भी संतुलन कायम करना आवश्यक है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 विकास

→ लोकतांत्रिक सहभागिता:

  • अगर बेहतर जीवन हासिल करने में समाज का हर व्यक्ति साझीदार है तो विकास की योजनाएँ बनाने और उसके क्रियान्वयन तरीके ढूँढ़ने में भी हरेक व्यक्ति को शामिल करने की जरूरत है।
  • भागीदारी सुनिश्चित करने का एक प्रस्तावित रास्ता स्थानीय विकास योजनाओं के बारे में निर्णय स्थानीय निर्णयकारी संस्थाओं को लेने देना है।
  • विकास की विकेन्द्रीकृत पद्धति परम्परागत और आधुनिक स्रोतों से मिलने वाली समस्त तकनीकों के रचनात्मक तरीके से इस्तेमाल को संभव बनाती है।

→ विकास और जीवन शैली- विकास का वैकल्पिक मॉडल विकास की मंहगी, पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली और प्रौद्योगिकी से संचालित सोच से दूर होने की कोशिश करता है। विकास को लोगों के जीवन की उस गुणवत्ता से नापा जाना चाहिए, जो उनकी प्रसन्नता, सुख-शांति और बुनियादी जरूरतों के पूरा होने में झलकती है। इस हेतु निम्न प्रयास किये जाने चाहिए

  • प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित रखने और ऊर्जा के फिर से प्राप्त हो सकने वाले स्रोतों का यथासंभव उपयोग करने के प्रयास किये जाने चाहिए। जैसे – वर्षा जल संचयन, सौर व जैव गैस संयंत्र, लघु पन बिजली परियोजना आदि।
  • इन गतिविधियों को स्थानीय स्तर पर लागू करना तथा लोगों की अधिक संलग्नता आवश्यकता होगी।
  • छोटे-छोटे बाँध बनाए जाएँ: इससे विस्थापन कम होगा तथा लागत कम आयेगी तथा स्थानीय आबादी के लिए हितकर होंगे।
  • स्वतंत्रता और सृजनशीलता भरा जीवन स्तर: लोग विकास लक्ष्यों को तय करने में सक्रिय भागीदार हों। इससे अधिकार, स्वतंत्रता तथा न्याय का भी विस्तार होगा।

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 10 विकास 

Jharkhand Board JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 10 विकास Important Questions and Answers.

JAC Board Class 11 Political Science Important Questions Chapter 10 विकास

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. विकास का व्यापकतम अर्थ है।
(अ) समाज का आधुनिकीरण
(ब) समाज का पश्चिमीकरण
(स) आर्थिक विकास की दर में वृद्धि
(द) सभी लोगों के जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि करना।
उत्तर:
(द) सभी लोगों के जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि करना।

2. विकास की कीमत जो पर्यावरण को चुकानी पड़ी है।
(अ) वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन
(ब) बड़ी संख्या में लोगों का उनके घरों से विस्थापन
(स) संस्कृति का विनाश
(द) गरीबी में वृद्धि
उत्तर:
(अ) वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन

3. सरदार सरोवर परियोजना के तहत बनने वाले बांधों के निर्माण के खिलाफ आंदोलन चल रहा है।
(अ) चिपको आंदोलन
(ब) नर्मदा बचाओ आन्दोलन
(स) गंगा बचाओ आंदोलन
(द) यमुना बचाओ आंदोलन
उत्तर:
(ब) नर्मदा बचाओ आन्दोलन

4. किसी देश के अविकसित होने का सूचक नहीं है।
(अ) लोग भोजन के अभाव में भूख से मरते हैं।
(ब) लोग आश्रय के अभाव में ठंड से मरते हैं।
(स) अभाव और वंचनाओं की मुक्ति।
(द) बच्चे विद्यालय जाने के बजाय काम कर रहे हैं।
उत्तर:
(स) अभाव और वंचनाओं की मुक्ति।

5. विकास का मॉडल सर्वाधिक निर्भर है।
(अ) वायु पर
(ब) नदियों पर
(स) ऊर्जा पर
(द) वर्षा पर
उत्तर:
(स) ऊर्जा पर

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6. ‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ सम्बन्धित है।
(अ) टिहरी बाँध परियोजना से
(ब) सरदार सरोवर से
(स) मनेरी झाली परियोजना से
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(ब) सरदार सरोवर से

7. निम्न में से विस्थापन का परिणाम नहीं होता है।
(अ) संस्कृति का विनाश
(ब) दरिद्रता में वृद्धि
(स) आजीविका का खोना
(द) जीवन – स्तर का उन्नत होना
उत्तर:
(द) जीवन – स्तर का उन्नत होना

8. औद्योगीकरण व्याख्या करता है।
(अ) विकास के व्यापक अर्थ की
(ब) विकास के संकीर्ण अर्थ की
(स) विकास के वास्तविक अर्थ की
(द) विकास के गलत अर्थ की
उत्तर:
(ब) विकास के संकीर्ण अर्थ की

9. अधिकांश निवासियों के निम्न जीवन स्तर वाला देश कहा जायेगा।
(अ) विकसित
(ब) अतिविकसित
(स) विकासशील
(द) अविकसित
उत्तर:
(द) अविकसित

10. विकास के कारण निम्न में से किसे नुकसान नहीं पहुँचा है।
(अ) पर्यावरण को
(ब) विस्थापितों को
(स) धनी वर्ग को
(द) वन्य जीवों को
उत्तर:
(द) वन्य जीवों को

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. विकास शब्द अपने व्यापकतम अर्थ में उन्नति, प्रगति, कल्याण और बेहतर जीवन की अभिलाषा के विचारों का ………………… है।
उत्तर:
वाहक

2. 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में एशिया और अफ्रीका के नव स्वतंत्रता प्राप्त देशों को अक्सर अविकसित या ………………….. देश कहा जाता था।
उत्तर:
विकासशील

3. आरंभिक वर्षों में विकास की अवधारणा में जोर आर्थिक उन्नति और समाज को आधुनिकीकरण के रूप में …………………. देशों के स्तर पर पहुँचने का था।
उत्तर:
पश्चिमी

4. विकास की वजह से अनेक देशों में ………………… को बहुत ज्यादा नुकसान पहुँचा है।
उत्तर:
पर्यावरण

5. विगत वर्षों में दुनिया में अमीर और गरीब के बीच की दूरी …………………. ही गई है।
उत्तर:
बढ़ती।

निम्नलिखित में से सत्य / असत्य कथन छाँटिये

1. विकास को अब व्यापक अर्थ में ऐसी प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है, जो सभी लोगों के जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि करे।
उत्तर:
सत्य

2. पर्यावरणवाद की जड़ें औद्योगीकरण के खिलाफ 19वीं सदी में विकसित हुए विद्रोह में देखी जा सकती हैं।
उत्तर:
सत्य

3. जिन लोगों के जीवन पर विकास योजनाओं का तत्काल असर पड़ता है, प्रायः उनसे पूर्ण सलाह ली जाती है तथा उनके हितों का ध्यान रखा जाता है।
उत्तर:
असत्य

4. संसाधनों के अविवेकशील उपयोग का अमीरों पर तात्कालिक और तीखा प्रभाव पड़ता है।
उत्तर:
असत्य

5. विकास का काम समाज के व्यापक नजरिये के अनुसार ही होता है।
उत्तर:
असत्य

निम्नलिखित स्तंभों के सही जोड़े बनाइये

1. अविकसित या विकासशील देश(अ) विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं की एक श्रृंखला
2. भारत(ब) बड़ी संख्या में लोगों का अपने घरों व क्षेत्रों से विस्थापन
3. बड़े बाँधों का निर्माण तथा औद्योगिक गतिविधियाँ(स) ओगोनी लोगों के अस्तित्व के लिए आंदोलन
4. केन सारो वीवा(द) संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम
5. मानव विकास प्रतिवेदन(य) एशियाई व अफ्रीका के नव-स्वतंत्र देश

उत्तर:

1. अविकसित या विकासशील देश(य) एशियाई व अफ्रीका के नव-स्वतंत्र देश
2. भारत(अ) विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं की एक श्रृंखला
3. बड़े बाँधों का निर्माण तथा औद्योगिक गतिविधियाँ(ब) बड़ी संख्या में लोगों का अपने घरों व क्षेत्रों से विस्थापन
4. केन सारो वीवा(स) ओगोनी लोगों के अस्तित्व के लिए आंदोलन
5. मानव विकास प्रतिवेदन(द) संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
विकास किसे कहते हैं?
उत्तर:
विकास को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है, जो सभी लोगों के जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि करे।

प्रश्न 2.
अविकसित या विकासशील देशों से क्या आशय है?
उत्तर:
20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में एशिया- अफ्रीका के नव स्वतंत्र देशों को अक्सर अविकसित या विकासशील देश कहा जाता है। क्योंकि यहाँ के लोगों का जीवनस्तर निम्न तथा शिक्षा, चिकित्सा व अन्य सुविधाओं का अभाव है।

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प्रश्न 3.
विकासशील देशों के किस बोध ने उन्हें विकास परियोजनाएँ शुरू करने की प्रेरणा दी?
उत्तर:
अपने संसाधनों का उपयोग राष्ट्रीय हित में करने के बोध ने विकासशील देशों को विकास परियोजनाएँ शुरू करने की प्रेरणा दी।

प्रश्न 4.
आरंभिक वर्षों में विकास की अवधारणा में किस बात पर जोर दिया गया?
उत्तर:
आरंभिक वर्षों में विकास की अवधारणा में जोर आर्थिक उन्नति और समाज के आधुनिकीकरण के रूप में पश्चिमी देशों के स्तर तक पहुँचने पर था।

प्रश्न 5.
विकास के कोई दो नकारात्मक प्रभाव बताइये।
उत्तर:

  1. विकासशील जगत में गरीबी एक समस्या बनकर उभरी
  2. दुनिया में अमीर और गरीब के बीच की दूरी बढ़ी है।

प्रश्न 6.
पर्यावरण संगठन क्या प्रयास करते हैं?
उत्तर:
पर्यावरण संगठन पर्यावरण को बिगड़ने से बचाने के उद्देश्यों की रोशनी में सरकार की औद्योगिक एवं विकास नीतियों को बदलने के लिए दबाव डालने का प्रयास करते हैं।

प्रश्न 7.
विकास की कीमत किन लोगों को चुकानी पड़ती है?
उत्तर:
विकास की कीमत अति दरिद्रों और आबादी के असुरक्षित हिस्से को चुकानी पड़ती है।

प्रश्न 8.
विकास के प्रारंभिक मॉडल का कोई एक दोष बताइए।
उत्तर:
विकास का प्रारंभिक मॉडल पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाला है।

प्रश्न 9.
विकासशील देशों ने अपना विकास कार्य आरम्भ कैसे किया?
उत्तर:
विकासशील देशों ने अपना विकास कार्य विकसित देशों की मदद और कर्ज के जरिये प्रारम्भ किया।

प्रश्न 10.
भारत में विकास का क्या मॉडल चुना गया?
उत्तर:
भारत में विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं में विविध क्षेत्रों में बड़ी परियोजनाओं का मॉडल चुना गया।

प्रश्न 11.
आर्कटिक और अंटार्कटिक ध्रुवों पर बर्फ क्यों पिघल रही है?
उत्तर:
वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से।

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प्रश्न 12.
आर्कटिक और अंटार्कटिक ध्रुवों पर बर्फ के पिघलने का क्या परिणाम हो सकता है?
उत्तर:
इन ध्रुवों पर बर्फ के पिघलने से समुद्र तटीय क्षेत्र डूब सकते हैं।

प्रश्न 13.
विकास की रणनीतियों का चयन किनके द्वारा किया जाता है?
उत्तर:
राजनीतिक नेता तथा उच्च पदासीन नौकरशाहों के द्वारा।

प्रश्न 14.
विकास के कोई दो पक्ष लिखिए।
उत्तर:

  1. आर्थिक विकास
  2. सामाजिक विकास।

प्रश्न 15
बड़ी परियोजनाओं के फलस्वरूप किस वर्ग के लोग विस्थापित होते हैं?
उत्तर:
बड़ी परियोजनाओं के फलस्वरूप प्रायः गरीब, आदिवासी व दलित लोग विस्थापित होते हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
विकासशील देश किसे कहा जाता है?
अथवा
अविकसित या विकासशील देश किन देशों को कहा गया और क्यों ?
उत्तर:
1950 और 1960 के दशक में एशिया और अफ्रीका के बहुत से देशों ने राजनीतिक आजादी हासिल की थी। औपनिवेशिक शासन में इनके संसाधनों का उपयोग उपनिवेशवादियों के फायदे के लिए किये जाने के कारण अधिकतर देश निर्धन बना दिये गए थे। उनके निवासियों का जीवन स्तर निम्न था। शिक्षा, चिकित्सा और अन्य सुविधाएँ कम थीं। इसीलिए इन देशों को प्रायः ‘अविकसित’ या ‘विकासशील’ कहा जाता था।

प्रश्न 2.
औपनिवेशिक शासन के अधीन राष्ट्र पिछड़े हुए क्यों रह गये?
उत्तर:
औपनिवेशिक शासन के दौरान शासक राष्ट्रों ने शासित राष्ट्रों के संसाधनों का उपयोग अपने लाभ के लिए किया तथा उन्होंने शासित राष्ट्रों के हितों की कोई परवाह नहीं की। इस कारण औनिवेशिक शासन के अधीन शासित राष्ट्र पिछड़े हुए रह गये।

प्रश्न 3.
नव स्वतंत्र हुए अविकसित या विकासशील देशों की सबसे महत्त्व चुनौती क्या थी?
उत्तर:
नव स्वतंत्र हुए एशिया व अफ्रीका के अविकसित या विकासशील देशों के सामने सबसे महत्त्वपूर्ण चुनौती गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी, निरक्षरता और बुनियादी सुविधाओं के अभाव की निहायत जरूरी समस्याओं का समाधान करना था जिसे उनकी बहुसंख्यक आबादी भुगत रही थी।

प्रश्न 4.
अविकसित या विकासशील देशों को विकास परियोजनाएँ बनाने की प्रेरणा किससे मिली?
उत्तर:
अविकसित या विकासशील देशों के नेताओं का मानना था कि वे पिछड़े इसलिए हैं कि औपनिवेशिक शासन में उनके संसाधनों का उपयोग उनके फायदे के लिए नहीं उपनिवेशवादियों के फायदे के लिए होता था । स्वतंत्रता के द्वारा वे अपने संसाधनों का उपयोग अपने राष्ट्रीय हित में सर्वश्रेष्ठ तरीके से करके पिछड़ेपन को दूर कर सकते हैं। इस बोध ने इन देशों को विकास परियोजनाएँ शुरू करने की प्रेरणा दी।

प्रश्न 5.
विकासशील देशों ने विकास का कौनसा मॉडल अपनाया?
उत्तर:
विकासशील देशों ने औद्योगीकरण, कृषि और शिक्षा के आधुनिकीकरण एवं विस्तार के जरिए तेज आर्थिक उन्नति का लक्ष्य निर्धारित किया था। उनका मानना था कि इस तरह के सामाजिक और आर्थिक बदलाव को शुरू करने में केवल राज्य सत्ता ही सक्षम माध्यम है। विकसित देशों की मदद और कर्ज के जरिये अनेक देशों ने विकास की महत्वाकांक्षी योजनाओं का सूत्रपात किया।

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प्रश्न 6.
लोगों के विस्थापित होने से संस्कृति का विनाश कैसे होता है?
उत्तर:
जब लोग विस्थापित किये जाते हैं तो वे अपनी पूरी सामुदायिक जीवन-पद्धति खो बैठते हैं। लम्बी अवधि में उनकी जीवन-पद्धति बदल जाती है। इस प्रकार लोगों के विस्थापित होने से संस्कृति का विनाश होता है।

प्रश्न 7.
पारिस्थितिकीय संकट क्या है?
उत्तर:
हमारे चारों ओर पारिस्थितिकी का निर्माण करने वाले घटक, जैसे- जल, वायु, वन, वन्यजीव आदि का विनाश जब मानवजनित या अन्य किसी कारण से होता है, तो यह विनाश होना ही पारिस्थितिकीय संकट कहलाता है।

प्रश्न 8.
भारत में विकास परियोजनाओं के क्या लक्ष्य रखे गये थे?
उत्तर:
भारत में विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत जो अनेक वृहद् परियोजनाएँ लागू की गईं, उनके निम्नलिखित लक्ष्य रखे गये थे

  1. यह बहुआयामी रणनीति आर्थिक रूप से प्रभावकारी होगी तथा देश की सम्पदा में महत्त्वपूर्ण वृद्धि होगी।
  2. सम्पन्नता की वृद्धि धीरे-धीरे रिसकर समाज के सबसे गरीब तबके तक रिसकर पहुँचेगी और असमानता को कम करने में सहायक होगी।
  3. विकास की प्रक्रिया समाज को अधिक आधुनिक और प्रगतिशील बनायेगी और उसे उन्नति के पथ पर ले जाएगी।

प्रश्न 9.
विकास के परिप्रेक्ष्य में क्या महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
विकास के परिप्रेक्ष्य में निम्न बातों को देखना महत्त्वपूर्ण है।

  1. विकास के क्रम में लोगों के अधिकारों का सम्मान होना चाहिए।
  2. विकास के लाभ का उचित वितरण होना चाहिए।
  3. विकास की प्राथमिकताओं के बारे में निर्णय सहमति से लिये जाएं।

प्रश्न 10.
नर्मदा पर सरदार सरोवर परियोजना के तहत बनने वाले बड़े बांधों के समर्थकों के क्या तर्क हैं? उत्तर- बड़े बांधों के समर्थकों के तर्क ये हैं।

  1. बड़े बाँधों से बिजली पैदा होगी।
  2. इससे काफी बड़े क्षेत्र में जमीन की सिंचाई में मदद मिलेगी।
  3. इससे सौराष्ट्र व कच्छ के रेगिस्तानी क्षेत्र को पेयजल भी उपलब्ध होगा।

प्रश्न 11.
नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर परियोजना के तहत बनने वाले बड़े बाँधों के विरोध में नर्मदा बचाओ आन्दोलन के नेताओं के क्या तर्क हैं?
उत्तर:
नर्मदा बचाओ आन्दोलन के नेता बड़े बांधों के विरोध में निम्न तर्क देते हैं।

  1. इन बांधों के बनने से अपनी जमीन के डूबने और उसके कारण अपनी आजीविका के छिनने से दस लाख से अधिक लोगों के विस्थापन की समस्या पैदा हो गई है।
  2. इन बांधों से विशाल जंगली भू-भाग बांध में डूब जायेगा जिससे पारिस्थितिकीय संतुलन बिगड़ेगा।

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प्रश्न 12.
विकास के मॉडल की प्रमुख आलोचनाओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा
विकास की ‘ऊपर से नीचे’ की रणनीति के महत्त्वपूर्ण प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
विकास के मॉडल की आलोचनाएँ या विकास की ‘ऊपर से नीचे की रणनीति के महत्त्वपूर्ण

  1. महँगा विकास: विकास का यह मॉडल विकासशील देशों के लिए काफी मँहगा साबित हुआ है। इसमें वित्तीय लागत बहुत अधिक रही और अनेक देश दीर्घकालीन कर्ज से दब गए। विकास की उपलब्धि लिए गए कर्ज के अनुरूप नहीं रही।
  2. विस्थापन जनित सामाजिक समस्याओं का उदय-बड़े बांधों के निर्माण, औद्योगिक गतिविधियों और खनन कार्यों की वजह से बड़ी संख्या में लोगों का उनके घरों और क्षेत्रों से विस्थापन हुआ। विस्थापन का परिणाम आजीविका खोने और दरिद्रता में वृद्धि के रूप में सामने आया। इससे परम्परागत कौशल नष्ट हुआ तथा संस्कृति का भी विनाश हुआ। ऐसे विस्थापनों ने अनेक देशों में संघर्षों को जन्म दिया है।
  3. धीमी गति: विकास की गति धीमी रही। दरिद्रता, बेकारी, अज्ञानता या शिक्षा की कमी, रोगों का फैलना जैसी समस्यायें आज भी एशिया और अफ्रीका के देशों में विद्यमान हैं।
  4. पर्यावरण पर दुष्प्रभाव: विकास की वजह से अनेक देशों में पर्यावरण को बहुत अधिक नुकसान पहुँचा है। वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन, वायु प्रदूषण में वृद्धि, ऊर्जा का उत्तरोत्तर बढ़ता उपयोग आदि ने अनेक समस्यायें पैदा की हैं।

प्रश्न 13.
वर्तमान में विकास की व्यापक अवधारणा को अपनाने की क्यों आवश्यकता महसूस की गई है?
उत्तर:
वर्तमान में निम्नलिखित कारणों से विकास की व्यापक अवधारणा को अपनाने की आवश्यकता महसूस की गई है।

  1. विकास के संकीर्ण अवधारणा वाले मॉडल का आर्थिक उन्नति पर अत्यधिक ध्यान होने से अनेक प्रकार की समस्यायें बढ़ीं, जैसे गरीब और अमीर की खाई में वृद्धि हुई, पर्यावरण पर दुष्प्रभाव पड़ा, अनेक लोगों को विस्थापनजनित अनेक सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
  2. विकास के संकीर्ण अवधारणा वाले मॉडल को अपनाने से आर्थिक उन्नति भी हमेशा सन्तोषजनक नहीं रही है।
  3. असमानताओं में गंभीर कमी नहीं आई है।
  4. गरीबी लगातार एक समस्या बनी हुई है।

उक्त कारणों से विकास को अब व्यापक अर्थ में एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है जो सभी लोगों के जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि करे।

प्रश्न 14.
विकास को मापने के किसी एक वैकल्पिक तरीके को स्पष्ट कीजिये।
अथवा
‘मानव विकास प्रतिवेदन’ और ‘मानव विकास सूचकांक’ को समझाइये।
उत्तर:
मानव विकास प्रतिवेदन: विकास को मापने के लिए अब ‘आर्थिक उन्नति के सूचकांक की दर’ के स्थान पर वैकल्पिक तरीके खोजे जा रहे हैं। इसी तरह का एक प्रयास ‘मानव विकास प्रतिवेदन’ है, जिसे संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यू.एन.डी.पी.) वार्षिक तौर पर प्रकाशित करता है। इस प्रतिवेदन में साक्षरता और शैक्षिक स्तर, आयु संभाविता और मातृ- मृत्यु दर जैसे विभिन्न सामाजिक संकेतकों के आधार पर देशों का दर्जा निर्धारित किया जाता है। इस उपाय को मानव विकास सूचकांक कहा गया है। इस अवधारणा के अनुसार विकास को ऐसी प्रक्रिया होना चाहिए, जो अधिकाधिक लोगों को उनके जीवन में अर्थपूर्ण तरीके से विकल्पों को चुनने की अनुमति दे तथा सभी लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करे।

प्रश्न 15.
विस्थापन क्या है? इसका क्या परिणाम होता है?
उत्तर:
विस्थापन से आशय: बड़े बांधों के निर्माण, औद्योगिक गतिविधियों, खनन कार्य आदि के कारण जब लोगों को अपना घर व क्षेत्र छोड़ना पड़ता है, तो यह उनका विस्थापन कहलाता है। आता है। विस्थापन के परिणाम – विस्थापन के प्रमुख परिणाम निम्नलिखित हैं।

  1. विस्थापन का परिणाम विस्थापित लोगों की आजीविका खोने और उनकी दरिद्रता में वृद्धि के रूप में सामने
  2. विस्थापन के कारण लोगों का परम्परागत कौशल नष्ट हो जाता है क्योंकि विस्थापन के कारण ग्रामीण खेतिहर समुदाय अपने परम्परागत पेशे और क्षेत्र से विस्थापित होकर शहरी और ग्रामीण गरीबों की विशाल आबादी का हिस्सा बन जाते हैं और लंबी अवधि में अर्जित उनका परम्परागत कौशल नष्ट हो जाता है।
  3. विस्थापन के कारण उनकी संस्कृति का भी विनाश होता है क्योंकि जब लोग नई जगह पर जाते हैं तो वे अपनी पूरी सामुदायिक जीवन-पद्धति खो बैठते हैं।
  4. ऐसे विस्थापनों ने अनेक देशों में संघर्षों को जन्म दिया है।

प्रश्न 16.
विकास के संकुचित अर्थ पर आधारित विकास के मॉडल की सीमाओं का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
विकास के संकुचित अर्थ पर आधारित विकास के मॉडल की सीमाएँ – विकास के संकुचित अर्थ पर आधारित विकास के मॉडल की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं।

  1. इस मॉडल से मानव और पर्यावरण दोनों के लिहाज से भारी कीमत चुकानी पड़ी है।
  2. विकास नीतियों के कारण जो कीमत चुकानी पड़ी है उसका और विकास के फायदों का वितरण लोगों के. बीच असमान रूप से हुआ है।
  3. अधिकतर देशों में विकास की ‘ऊपर से नीचे’ की रणनीतियाँ अपनायी गयी हैं अर्थात् नीतियों के निर्धारण और उनके क्रियान्वयन के सभी फैसले राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही के उच्चतर स्तरों पर होते हैं।
  4. जिन लोगों के जीवन पर विकास योजनाओं का तत्काल प्रभाव पड़ता है, उनसे सलाह नहीं ली जाती है।
  5. न तो सदियों से हासिल लोगों के अनुभवों और ज्ञान व कौशल का उपयोग किया जाता है और न ही उनके हितों का ध्यान रखा जाता है।

प्रश्न 17.
स्वतंत्रता के बाद भारत ने विकास का क्या मॉडल चुना?
उत्तर:
स्वतंत्रता के बाद भारत ने विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं की एक श्रृंखला बनायी। इनमें निम्न प्रयास किये गये

  1. इन योजनाओं में भाखड़ा नांगल बांध, देश के विभिन्न हिस्सों में इस्पात संयंत्रों की स्थापना, खनन, उर्वरक उत्पादन, कृषि तकनीकों में सुधार जैसी अनेक परियोजनाएँ चलायी गईं।
  2. इन पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा देश की सम्पदा में वृद्धि और लोगों की दशा सुधारने के प्रयत्न किये गये।
  3. विज्ञान तथा तकनीकी को प्रोत्साहित करने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जैसे नये शैक्षणिक संस्थान स्थापित किये गये। इन सबके माध्यम से समाज की प्रगति की उम्मीद की गई।

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प्रश्न 18.
विकास की विकेन्द्रित पद्धति के क्या लाभ होते हैं?
उत्तर:
विकास की विकेन्द्रित पद्धति के लाभ;

  1. विकास की विकेन्द्रित पद्धति के अन्तर्गत लोगों को अत्यधिक प्रभावित करने वाले मसलों पर लोगों से परामर्श किया जाता है। इससे समुदाय को हानि पहुँचा सकने वाली परियोजनाओं को रद्द करना संभव होता है।
  2. योजना बनाने और नीतियों के निर्धारण में लोगों के लिए अपनी जरूरतों के मुताबिक संसाधनों के उपयोग की भी गुंजाइश बनती है। जैसे सड़क कहाँ बने, बसों या मेट्रों का मार्ग कौनसा हो, मैदान व विद्यालय कहाँ पर हो आदि।
  3. विकास की विकेन्द्रित पद्धति में लोगों के पीढ़ियों से संग्रहित ज्ञान व अनुभवों की अनदेखी नहीं होती है, बल्कि यह परम्परागत और आधुनिक स्रोतों से मिलने वाली तमाम तरह की तकनीकों के रचनात्मक तरीके से इस्तेमाल को संभव बनाती है।

प्रश्न 19.
विकास से होने वाली हानि को कम करने के लिए क्या किया जा सकता है?
उत्तर:
विकास से होने वाली हानि को कम करने के लिए निम्न प्रयास किये जा सकते हैं।

  1. प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित रखने और ऊर्जा के फिर से प्राप्त हो सकने वाले स्रोतों का यथासंभव उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। वर्षा जल संचयन, सौर एवं जैव गैस संयंत्र, लघु पनबिजली परियोजना, जैव कचरे से खाद बनाने हेतु कंपोस्ट – गड्ढे बनाना आदि इस दिशा में संभव प्रयासों के कुछ उदाहरण हैं। इन गतिविधियों को स्थानीय स्तर पर लागू करें क्योंकि इनके लिए जन सहभागिता की अधिक आवश्यकता होगी।
  2. बड़े बांधों के स्थान पर छोटे बांध बनाए जाएं, जिनमें कम निवेश की आवश्यकता होती है और विस्थापन भी मामूली होता है। ऐसे छोटे बांध स्थानीय जनसंख्या के लिए अधिक लाभकारी हो सकते हैं।
  3. विकास लक्ष्यों को तय करने में लोकतांत्रिक तरीका अपनाया जाये तथा जनता की इन्हें तय करने में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाये।

प्रश्न 20.
पर्यावरणवाद से आप क्या समझते हैं? समझाइये।
उत्तर:
पर्यावरणवाद: पर्यावरणविदों द्वारा पर्यावरण को बचाने के लिए वे जो तर्क दिये जा रहे हैं, उन्हें सम्मिलित रूप से पर्यावरणवाद कहा जाता है।
पर्यावरणविदों के तर्क: पर्यावरणविदों का कहना है कि मानव को पारिस्थितिकी के सुर में सुर मिलाते हुए जीना सीखना चाहिए और पर्यावरण में अपने तात्कालिक हितों के लिए छेड़छाड़ बंद करनी चाहिए। उनका मानना है कि पृथ्वी का जिस सीमा तक उपभोग हो रहा है और प्राकृतिक साधनों को जिस तरह नष्ट किया जा रहा है, उससे हम आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल उजाड़ धरती, जहरीली नदियाँ और प्रदूषित हवा ही छोड़कर जायेंगे।

  1. पर्यावरण आन्दोलन: पर्यावरणवाद या पर्यावरण आन्दोलन की जड़ें औद्योगीकरण के खिलाफ 19वीं सदी में विकसित हुए विद्रोह में देखी जा सकती हैं।
  2. पर्यावरण आन्दोलन के संगठन: वर्तमान में पर्यावरण आन्दोलन एक विश्वव्यापी मामला बन गया है। विश्व भर में इसके हजारों गैर सरकारी संगठन तथा ‘ग्रीन पार्टियाँ’ इसके गवाह हैं। कुछ पर्यावरण संगठनों में ग्रीन पीस और वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड शामिल हैं।
  3. पर्यावरण संगठनों के कार्य: ये पर्यावरण समूह पर्यावरण उद्देश्यों की रोशनी में सरकार की औद्योगिक एवं विकास नीतियों को बदलने के लिए दबाव डालने का प्रयास करते हैं।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
विकास की अवधारणा से आप क्या समझते हैं? समझाइये।
उत्तर:
विकास की अवधारणा से आशय: औद्योगिक क्रांति तथा औद्योगीकरण के बाद से विकास के विचार ने महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। अधिकांश यूरोपीय राष्ट्रों ने विकास प्रक्रिया प्रारंभ की तथा 20वीं शताब्दी में ‘विकसित इटली राष्ट्रों’ का दर्जा प्राप्त किया। इस प्रकार 20वीं सदी में अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, रूस, इजरायल, जापान, तथा कनाडा आदि को विकसित राष्ट्र माना गया। भारत सहित एशिया और अफ्रीका के अनेक राष्ट्र जो द्वितीय महायुद्ध के बाद औपनिवेशिक दासता से स्वतंत्र हुए थे, उन्हें अविकसित या विकासशील राष्ट्र कहा गया।

इनमें अधिकतर देश कंगाल बना दिये गए थे और उनके निवासियों का जीवन स्तर निम्न था । शिक्षा, चिकित्सा और अन्य सुविधाएँ कम थीं। इस प्रकार ये देश गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी, निरक्षरता, अशिक्षा, कमजोर स्वास्थ्य आदि बुनियादी सुविधाओं के अभाव की गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे थे। इन राष्ट्रों ने अपने संसाधनों का उपयोग अपने राष्ट्रीय हित में सर्वश्रेष्ठ तरीके से करने की दृष्टि से विकास परियोजनाएँ बनाना प्रारंभ कर दिया। इस प्रकार विकास की कोई एक सार्वजनिक परिभाषा नहीं दी जा सकती है।

व्यापक अर्थ में विकास की अवधारणा: व्यापकतम अर्थ में विकास उन्नति, प्रगति, कल्याण और बेहतर जीवन की अभिलाषा के विचारों का वाहक है।
संकीर्ण अर्थ में विकास की अवधारणा: विकास शब्द का प्रयोग प्रायः आर्थिक विकास की दर में वृद्धि और समाज का आधुनिकीकरण जैसे संकीर्ण अर्थों में भी होता रहता है। विकास की अवधारणा विगत वर्षों में काफी बदली है।

(अ) प्रारंभिक वर्षों में अपनायी गयी विकास की अवधारणा: प्रारंभिक वर्षों में विकास की जो अवधारणा अपनायी गई उससे आशय रहा है। आर्थिक उन्नति और समाज का आधुनिकीकरणं। इस अर्थ में विकास सामान्यतः एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य है। परम्परागत समाज का आधुनिक समाज में रूपान्तरण। साथ ही इसका सम्बन्ध आर्थिक उन्नति से है क्योंकि आर्थिक विकास ही विकास की वह प्रथम शर्त है जिससे समाज में बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है। इसके अन्तर्गत शैक्षिक विकास, नागरिक स्वतंत्रताएँ तथा राजनीतिक भागीदारी भी सन्निहित हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र हुए एशिया और अफ्रीका के देशों ने विकास की इस अवधारणा को अपनाते हुए विकास का जो मॉडल अपनाया, वह विकास सम्बन्धी उद्देश्यों को पूरा करने में पूर्णतः सफल नहीं रहा। इसकी सीमाओं को देखते हुए अब विकास की व्यापक अवधारणा को अपनाने की आवश्यकता महसूस की गई है।

(ब) विकास की व्यापक अवधारणा- विकास को अब व्यापक अर्थ में एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है, जो सभी लोगों के जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि करे। विकास की व्यापक अवधारणा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. इसमें मानव विकास प्रतिवेदन तथा मानव विकास सूचकांक के द्वारा विकास का मापन किया जाता है। इसके अन्तर्गत साक्षरता और शैक्षिक स्तर, आयु संभाविता और मातृ- मृत्यु दर जैसे विभिन्न सामाजिक संकेतकों के आधार पर देशों का दर्जा निर्धारित किया जाता है।
  2. इस अवधारणा के अन्तर्गत विकास एक ऐसी प्रक्रिया है, जो अधिकाधिक लोगों को उनके जीवन में अर्थपूर्ण तरीके से विकल्पों को चुनने की अनुमति देती है।
  3. इसकी पूर्ण शर्त है। बुनियादी जरूरतों की पूर्ति । इनकी पूर्ति के वगैर किसी व्यक्ति के लिए गरिमामय जीवन गुजारना और अपनी इच्छाओं की पूर्ति करना असंभव है।
  4. इस प्रक्रिया में विकास से प्रभावित लोगों के अनेक अधिकारों की मांग की गई हैं।
  5. इसमें विकास सम्बन्धी निर्णय लेने और उसके क्रियान्वयन में जनता की सहभागिता पर विशेष बल दिया गया है।
  6. यह एक स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षित रखने और ऊर्जा के फिर से प्राप्त हो सकने वाले स्रोतों के यथासंभव उपयोग करने के प्रयासों पर बल देती है।

प्रश्न 2.
एशिया और अफ्रीका के नव स्वतंत्र राष्ट्रों ने विकास के जिस मॉडल को अपनाया उसे स्पष्ट कीजिए। उसकी सीमाओं का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
एशिया व अफ्रीका के नव-स्वतंत्र राष्ट्रों के विकास का मॉडल
1950 और 1960 के दशक में, जब अधिकतर एशियाई व अफ्रीकी देशों ने औपनिवेशिक शासन से आजादी हासिल की तब उनके सामने प्रमुख चुनौती गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी, निरक्षरता और बुनियादी सुविधाओं के अभाव की समस्याओं का समाधान करना था जिसे उनकी बहुसंख्यक आबादी भुगत रही थी। इन समस्याओं से निजात पाने के लिए इन देशों ने अपने संसाधनों का उपयोग अपने राष्ट्रीय हित में सर्वश्रेष्ठ तरीके से करने के लिए विकास परियोजनाएँ क्रियान्वित कीं।

एशिया: अफ्रीकी देशों का विकास का मॉडल एशिया तथा अफ्रीका के नव-स्वतंत्र राष्ट्रों ने विकास के मॉडल में आर्थिक उन्नति और समाज के आधुनिकीकरण पर बल दिया। विकासशील देशों ने औद्योगीकरण, कृषि और शिक्षा के आधुनिकीकरण और विस्तार के माध्यम से तेज आर्थिक उन्नति का लक्ष्य निर्धारित किया था। दूसरे, इस मॉडल में राज्य सत्ता या सरकार के माध्यम से सामाजिक तथा आर्थिक बदलाव के लिए विकास की महत्वाकांक्षीय योजनाओं का सूत्रपात किया गया। तीसरे, विकास की महत्वाकांक्षी योजनाएँ विकसित देशों की मदद और कर्ज के माध्यम से चालू की गईं। लक्ष्य – विकास की इन योजनाओं के प्रमुख लक्ष्य थे

  1. बहुआयामी विकास की रणनीति आर्थिक रूप से प्रभावकारी होगी और देश की सम्पदा में वृद्धि होगी।
  2. सम्पदा में वृद्धि से आने वाली सम्पन्नता धीरे-धीरे समाज के गरीब तबके तक पहुँच जायेगी और असमानता को कम करने में सहायक होगी।
  3. यह विश्वास किया गया कि विकास की प्रक्रिया समाज को अधिक आधुनिक और प्रगतिशील बनाएगी और उसे उन्नति के पथ पर ले जाएगी। विकास के मॉडल की आलोचनाएँ (सीमाएँ ) विकास का जो मॉडल भारत तथा अन्य एशिया- अफ्रीका के राष्ट्रों द्वारा अपनाया गया उसकी निम्नलिखित प्रमुख आलोचनाएँ की गई हैं।

1. अत्यधिक महंगा विकास:
विकासशील देशों में जिस तरीके से विकास मॉडल को अपनाया गया है, वह इनके लिए काफी मंहगा साबित हुआ है। इसमें वित्तीय लागत बहुत अधिक रही और अनेक देश दीर्घकालीन कर्ज से दब गए। अफ्रीका अभी तक अमीर देशों से लिए गए भारी कर्ज तले कराह रहा है। विकास के रूप में उपलब्धि, लिए गए कर्ज के अनुरूप नहीं रही।

2. मानव और समाज को हानि:
विकास के इस मॉडल के कारण बहुत बड़ी मानवीय व सामाजिक कीमत भी चुकानी पड़ी है। इस विकास के अन्तर्गत हुए बड़े बांधों के निर्माण, औद्योगिक गतिविधियों और खनन कार्यों की वजह से बड़ी संख्या में लोगों का उनके घरों और क्षेत्रों से विस्थापन हुआ। विस्थापन का परिणाम आजीविका खोने और गरीबी में वृद्धि के रूप में सामने आया। विस्थापित ग्रामीण लोग गरीबों की विशाल आबादी में शामिल हो गए और लम्बी अवधि में अर्जित ‘परम्परागत कौशल नष्ट होते गए। विस्थापन से संस्कृति का भी विनाश हुआ क्योंकि विस्थापित लोग नई जगह पर जाकर रहने लग गए और वहाँ जाकर अपनी सामुदायिक जीवन-पद्धति को खो बैठे। ऐसे विस्थापनों ने अनेक देशों में संघर्षों को भी जन्म दिया है।

3. पर्यावरण को हानि:
विकास की वजह से अनेक देशों में पर्यावरण को भी काफी ज्यादा नुकसान पहुँचा है। विकास के कारण तटीय वनों के नष्ट होने से और समुद्रतट के निकट वाणिज्यिक उद्यमों के स्थापित होने के कारण दक्षिणी और दक्षिणी – पूर्वी एशिया के तटों पर सुनामी ने कहर ढाया। विकास के कारण ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की वजह से आर्कटिक और अंटार्कटिक ध्रुवों पर बर्फ पिघल रही है जिससे समुद्र जल की सतह उठ रही है। इससे तटीय क्षेत्रों के डूब जाने का खतरा पैदा हो रहा है।

विकास के कारण वायु प्रदूषण बढ़ रहा है जिसके कारण अनेक रोगों का विस्तार हो रहा है:
विकास के कारण संसाधनों का अविवेकपूर्ण उपयोग किया गया जिसका वंचितों पर तात्कालिक और अधिक तीखा प्रभाव पड़ा। जलावन, जड़ी-बूटी और आहार आदि के रूप में जंगल के संसाधनों का अपने गुजारे के लिए विविध प्रकार से उपयोग करने वाले गरीबों पर जंगलों के नष्ट होने का बुरा असर पड़ा।
विकास के इस मॉडल में ऊर्जा के लिए कोयला और पैट्रोलियम के उपयोग पर बल दिया गया। इनके स्रोतों का पुनः प्राप्त करना संभव नहीं है। इनके समाप्त हो जाने पर आगामी पीढ़ियाँ प्रभावित होंगी।

4. विकास के लाभ का असमान वितरण:
विकास की नीतियों के कारण जो कीमत चुकानी पड़ी है उसका; और विकास के लाभों का वितरण भी लोगों के बीच असमान रूप से हुआ है। इसके कारण असमानता में कमी नहीं आई है तथा गरीब और अमीर की खाई और बढ़ गई है।

5. ऊपर से नीचे की रणनीतियाँ:
अधिकतर देशों में विकास की ‘ऊपर से नीचे’ की रणनीतियाँ अपनाई गई हैं अर्थात् विकास की प्राथमिकताओं व रणनीतियों का चयन और परियोजनाओं के वास्तविक क्रियान्वयन के सभी फैसले आम तौर पर राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही के उच्चतर स्तरों पर होते हैं। जिन लोगों के जीवन पर विकास योजनाओं का तत्काल असर होता है, उनसे तनिक भी सलाह नहीं ली जाती है। इससे न तो सदियों से हासिल उनके अनुभवों और ज्ञान का उपयोग हो पाता है और न उनके हितों का ध्यान रखा जाता है।

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प्रश्न 3.
विकास की व्यापक अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
विकास की व्यापक अवधारणा: विकास की आर्थिक उन्नति और समाज के आधुनिकीकरण के अर्थ से सम्बद्ध संकुचित अवधारणा की आलोचनाओं व सीमाओं को देखते हुए अब इस बात को उत्तरोत्तर स्वीकृति मिल रही है कि विकास की व्यापक अवधारणा को अपनाया जाये।

विकास की व्यापक अवधारणा से आशय: इस अवधारणा के अन्तर्गत विकास को व्यापक अर्थ में एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है, जो सभी लोगों के जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि करे और अधिकाधिक लोगों को उनके जीवन में अर्थपूर्ण तरीके से विकल्पों को चुनने की अनुमति दे।

विकास की व्यापक अवधारणा को मापने के वैकल्पिक तरीके: मानव विकास सूचकांक अब विकास को केवल आर्थिक उन्नति के सूचकांक की दर के जरिये मापना अपर्याप्त माना जा रहा है और इसके मापने के वैकल्पिक तरीके खोजे जा रहे हैं। इसी तरह का एक प्रयास ‘मानव विकास प्रतिवेदन’ है, जिसे संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यू.एन.डी.पी.) वार्षिक तौर पर प्रकाशित करता है। इस प्रतिवेदन में साक्षरता और शैक्षिक स्तर, आयु संभाविता और मातृ-मृत्यु दर जैसे विभिन्न सामाजिक संकेतकों के आधार पर देश का दर्जा निर्धारित किया जाता है। इस उपाय को मानव विकास सूचकांक कहा गया।

बुनियादी आवश्यकता पर आधारित दृष्टिकोण: विकास की पूर्व शर्त है कि आहार, शिक्षा, स्वास्थ्य; आश्रय कपड़ा ‘जैसी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति हो। बुनियादी जरूरतों की पूर्ति के बगैर किसी व्यक्ति के लिए गरिमामय जीवन गुजारना और अपनी इच्छाओं की पूर्ति करना असंभव है। अभाव अथवा वंचनाओं से मुक्ति ही किसी व्यक्ति की पसंदगी और इच्छाओं की पूर्ति की कुंजी है।

न्यायपूर्ण और टिकाऊ विकास हेतु वैकल्पिक तरीकों पर बल: विकास के पुरातन मॉडल तथा संकीर्ण अवधारणा की सीमाओं तथा ‘ऊपर से नीचे’ की अपनायी गयी रणनीतियों के कारण विकास, परियोजनाओं से लाभ उठाने वाले सत्ताधारी तबकों द्वारा तैयार और लागू की जाने वाली प्रक्रिया बन गया है। इस स्थिति ने न्यायपूर्ण और टिकाऊ विकास के बारे में वैकल्पिक तरीके से सोचने और उसे आगे बढ़ाने की आवश्यकता को रेखांकित किया है। यथा

1. अधिकारों के दावे: विकास की संकीर्ण अवधारणा के अन्तर्गत विकास के अधिकांश लाभों को तो ताकतवर लोगों ने हथिया लिया है और विकास की कीमत अति दरिद्र और आबादी के असुरक्षित हिस्से को चुकानी पड़ी है। चाहे यह कीमत पारिस्थितिकी तंत्र में हानि के कारण से हो या विस्थापन और आजीविका खोने के कारण। इस स्थिति से निजात पाने के लिए विकास की वैकल्पिक व्यापक अवधारणा के अन्तर्गत नए अधिकारों के दावों को जन्म दिया है। ये दावे निम्नलिखित हैं।

  1. लोकतंत्र में लोगों को यह अधिकार है कि उनके जीवन को प्रभावित करने वाले निर्णयों में उनसे सलाह ली जाए।
  2. लोगों को आजीविका का अधिकार है जिसका दावा वे सरकार से अपनी आजीविका के स्रोत पर खतरा पैदा होने पर कर सकते हैं।
  3. आदिवासी और आदिम समुदाय, जिनका सामुदायिक जीवन और पर्यावरण के साथ सम्बन्ध विशेष प्रकार का होता है, को नैसर्गिक संसाधनों पर अधिकार होना चाहिए। यह समुदाय संसाधनों के उपयोग के परम्परागत अधिकारों का दावा कर सकते हैं।
  4. लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का यह कर्तव्य है कि वे जनसमूह के विभिन्न तबकों की प्रतिस्पर्द्धात्मक मांगों को पूरा करने के साथ-साथ वर्तमान और भविष्य की दावेदारियों के बीच संतुलन कायम करें।

2. लोकतांत्रिक सहभागिता:
लोकतंत्र में संसाधनों को लेकर विरोध या बेहतर जीवन के बारे में विभिन्न विचारों के द्वन्द्व का हल विचार-विमर्श और सभी के अधिकारों के प्रति सम्मान के जरिए होता है। इन्हें ऊपर से थोपा नहीं जा सकता। इस दृष्टि से यदि बेहतर जीवन हासिल करने में समाज का हर व्यक्ति साझीदार है, तो विकास की योजनाएँ बनाने और उसके कार्यान्वयन के तरीके ढूँढ़ने में भी हरेक व्यक्ति को शामिल करने की आवश्यकता है। इसके दो लाभ हैं प्रथमतः, आपको योजना बनाते समय विशेष जरूरतों का ज्ञान होगा और दूसरे, निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी से सभी तबके अधिकार सम्पन्न बनेंगे। निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी सुनिश्चित करने का एक प्रस्तावित रास्ता विकास योजनाओं के बारे में निर्णय स्थानीय निर्णयकारी संस्थाओं को लेने देना है।

इससे निम्नलिखित दो बांतें सुनिश्चित होंगी:

  1. अत्यधिक प्रभावित करने वाले मसलों पर लोगों से परामर्श होगा और समुदाय को हानि पहुँचा सकने वाली परियोजनाओं को रद्द करना संभव होगा।
  2. योजना बनाने और नीतियों के निर्धारण में संलग्नता से लोगों के लिए अपनी जरूरतों के मुताबिक संसाधनों के उपयोग की भी संभावना बनती है। सड़क कहाँ बने, स्थानीय बसों या मेट्रो का मार्ग कौनसा हो, मैदान या विद्यालय कहाँ पर हो। किसी गाँव को चेक डैम की जरूरत है या इंटरनेट कैफे की, इस तरह के निर्णय उन्हीं लोगों द्वारा लिए जाने चाहिए। इस प्रकार विकास की विकेन्द्रित पद्धति परम्परागत और आधुनिक स्रोतों से मिलने वाली तमाम तरह की तकनीकों के रचनात्मक तरीके के प्रयोग को संभव बनाती है।

3. विकास और जीवन शैली:
विकास का वैकल्पिक मॉडल विकास की मंहगी, पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली प्रौद्योगिकी से संचालित सोच से दूर होने की कोशिश करता है। इसका मानना है कि विकास को लोगों के जीवन की गुणवत्ता से नापा जाना चाहिए, जो उनकी प्रसन्नता, सुख-शांति और बुनियादी जरूरतों के पूरा होने में झलकती है। इस हेतु निम्नलिखित प्रयास किये जाने चाहिए

  1. एक स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित रखने और ऊर्जा के फिर से प्राप्त हो सकने वाले स्रोतों का यथासंभव उपयोग करने के प्रयास किए जाने चाहिए। वर्षा जल संचयन, सौर एवं जैव गैस संयंत्र, लघु पन बिजली परियोजना, जैव कचरे से खाद बनाने हेतु कंपोस्ट – गड्ढे बनाना आदि इस दिशा में संभव प्रयासों के कुछ उदाहरण हैं। इन गतिविधियों को स्थानीय स्तर पर लागू करना और इसलिए लोगों की अधिक संलग्नता आवश्यक होगी।
  2. बड़े सुधार को प्रभावी बनाने के लिए बड़ी परियोजनाएँ ही एकमात्र तरीका नहीं हैं। उदाहरण के लिए-बड़े बांधों के स्थान पर छोटे बांध बनाए जा सकते हैं, जिनमें बहुत कम निवेश की जरूरत होती है तथा विस्थापन बहुत कम होता है। ऐसे छोटे बांध आबादी के लिए भी अधिक फायदेमंद हो सकते हैं।
  3. हमें अपने जीवन स्तर को बदलकर उन साधनों की आवश्यकताओं को भी कम करने की जरूरत है, जिनका नवीकरण नहीं हो सकता।

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 9 शांति 

Jharkhand Board JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter  9 शांति Important Questions and Answers.

JAC Board Class 11 Political Science Important Questions Chapter 9 शांति

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. आधुनिक युग की सबसे बड़ी माँग है।
(अ) परमाणु शस्त्रीकरण को बढ़ावा देकर शक्ति संतुलन स्थापित करना।
(ब) आतंकवाद को बढ़ावा देना।
(स) विश्व शांति की स्थापना करना।
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(स) विश्व शांति की स्थापना करना।

2. विश्व शांति के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधा है।
(अ) निःशस्त्रीकरण
(ब) आतंकवाद
(स) अन्तर्राष्ट्रीय कानून
(द) अन्तर्राष्ट्रीय संगठन
उत्तर:
(ब) आतंकवाद

3. विश्व शांति के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने का उपाय है।
(अ) अन्तर्राष्ट्रीय संगठन
(ब) युद्ध
(स) साम्प्रदायिकता
(द) शस्त्रीकरण
उत्तर:
(अ) अन्तर्राष्ट्रीय संगठन

4. निम्न में से कौनसा शांति का तत्व नहीं है।
(अ) अहिंसा
(ब) करुणा
(स) सहयोग
(द) बंधुत्व की भावना का अभाव
उत्तर:
(द) बंधुत्व की भावना का अभाव

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 9 शांति

5. निम्न में से कौनसा विचारक युद्ध को महिमा मंडित करने वाला था?
(अ) महात्मा गांधी
(ब) मार्टिन लूथर किंग
(स) फ्रेडरिक नीत्शे
(द) गौतम बुद्ध
उत्तर:
(स) फ्रेडरिक नीत्शे

6. भारत में प्रमुख शांतिवादी विचारक रहे हैं।
(अ) सुभाष चंद्र बोस
(ब) महात्मा गाँधी
(स) भगतसिंह
(द) चन्द्रशेखर आजाद
उत्तर:
(ब) महात्मा गाँधी

7. हिरोशिमा और नागासाकी पर अणु बम गिराये।
(अ) अमेरिका ने
(ब) जर्मनी ने
(स) फ्रांस ने
(द) इंग्लैण्ड ने
उत्तर:
(अ) अमेरिका ने

8. जातिभेद हिंसा का उदाहरण है।
(अ) युद्धजनित हिंसा
(ब) विचारजनित हिंसा
(स) संरचनात्मक हिंसा
(द) आतंकवाद
उत्तर:
(स) संरचनात्मक हिंसा

9. युद्ध जनित विनाश को और अधिक भीषण बनाने में योगदान है-
(अ) उन्नत तकनीक का
(ब) हिंसक विचारों का
(स) हथियारों का
(द) उपर्युक्त सभी का
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी का

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10. निम्न में से वर्तमान में जिस प्रकार की अशांति सर्वाधिक आम हो गई है, वह
(अ) साम्प्रदायिक हिंसा
(ब) पड़ोसी देशों में युद्ध
(स) विश्व युद्ध
(द) आतंकवाद
उत्तर:
(द) आतंकवाद

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. ………………… की अनुपस्थिति की भारी कीमत चुकाने के बाद मानवता ने इसका महत्त्व पहचाना है।
उत्तर:
शांति

2. शांति की परिभाषा अवसर ………………….. की अनुपस्थिति के रूप में की जाती है।
उत्तर:
युद्ध

3. न्यायपूर्ण और टिकाऊ शांति अप्रकट शिकायतों और ………………….. के कारणों को साफ-साफ व्यक्त करने और बातचीत द्वारा हल करके ही प्राप्त की जा सकती है।
उत्तर:
संघर्ष

4. चूंकि युद्ध का आरंभ लोगों के दिमाग में होता है, इसलिए शांति के बचाव भी लोगों के ……………….. में ही रचे जाने चाहिए।
उत्तर:
दिमाग

5. शांतिवादी का मकसद लड़ाकुओं की क्षमता को कम करके आंकना नहीं, …………………. के अहिंसक स्वरूप पर बल देना है।
उत्तर:
प्रतिरोध

निम्नलिखित में सत्य / असत्य कथन छाँटिये

1. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गाँधीजी द्वारा सत्याग्रह का प्रयोग प्रतिरोध के अहिंसक स्वरूप का एक प्रमुख उदाहरण है।
उत्तर:
सत्य

2. जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे शांति को महिमामंडित करने वाला विचारक था।
उत्तर:
असत्य

3. हिंसा प्राय: समाज की मूल संरचना में ही रची-बसी है।
उत्तर:
सत्य

4. शांति एक बार में हमेशा के लिए हासिल की जा सकती है।
उत्तर:
असत्य

5. गाँधीजी के अनुसार अहिंसा अतिशय सक्रिय शक्ति है, जिसमें कायरता और कमजोरी का कोई स्थान नहीं है।
उत्तर:
सत्य

निम्नलिखित स्तंभों के सही जोड़े बनाइये

1. फ्रेडरिक नीत्शे(अ) इटली के समाज – सिद्धान्तकार
2. विल्फ्रेडो पैरेटो(ब) शीतयुद्ध
3. क्यूबाई मिसाइल संकट(स) नस्लवाद और साम्प्रदायिकता
4. संरचनात्मक हिंसा का उदाहरण(द) शांति कायम करने का एक तरीका
5. विभिन्न देशों के बीच विकासमान सामाजिक(य) एक जर्मन दार्शनिक

उत्तर:

1. फ्रेडरिक नीत्शे(य) एक जर्मन दार्शनिक
2. विल्फ्रेडो पैरेटो(अ) इटली के समाज – सिद्धान्तकार
3. क्यूबाई मिसाइल संकट(ब) शीतयुद्ध
4. संरचनात्मक हिंसा का उदाहरण(स) नस्लवाद और साम्प्रदायिकता
5. विभिन्न देशों के बीच विकासमान सामाजिक(द) शांति कायम करने का एक तरीका

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
शांतिवाद क्या है?
उत्तर:
शांतिवाद विवादों से सुलझाने के औजार के बतौर युद्ध या हिंसा के बजाय शांति का उपदेश देता है।

प्रश्न 2.
जर्मन दार्शनिक नीत्शे का क्या मानना था?
उत्तर:
जर्मन दार्शनिक नीत्शे का मानना था कि सिर्फ संघर्ष ही सभ्यता की उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है, इसलिए युद्धं श्रेष्ठ है।

प्रश्न 3.
शांति लगातार बहुमूल्य क्यों बनी हुई है?
उत्तर:
शांति लगातार बहुमूल्य बनी हुई है क्योंकि शांति की अनुपस्थिति में मानवता ने भारी कीमत चुकाई है।

प्रश्न 4.
शांति को परिभाषित कीजिये अथवा शांति क्या है?
उत्तर:
शांति एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यापकतम अर्थों में मानव-कल्याण की स्थापना हेतु आवश्यक नैतिक व भौतिक संसाधनों के सक्रिय क्रियाकलाप शामिल होते हैं। हिंसा ।

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प्रश्न 5.
संरचनात्मक हिंसा के किन्हीं दो रूपों के नाम लिखिये।
उत्तर:
संरचनात्मक हिंसा के दो रूप ये हैं।

  1. जाति-भेद आधारित हिंसा व शोषण
  2. वर्ग-भेद आधारित

प्रश्न 6.
रंगभेदी हिंसा का कोई एक उदाहरण दीजिये।
उत्तर:
दक्षिणी अफ्रीका की गोरी सरकार की 1992 तक अपनी बहुसंख्यक अश्वेत आबादी के साथ दोयम दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार।

प्रश्न 7.
न्यायपूर्ण और टिकाऊ शांति कैसे प्राप्त की जा सकती है?
उत्तर:
न्यायपूर्ण और टिकाऊ शांति अप्रकट शिकायतों और संघर्षों के कारणों को साफ-साफ व्यक्त करने और बातचीत द्वारा हल करने के जरिये ही प्राप्त की जा सकती है।

प्रश्न 8.
शांतिवादियों का मकसद ( उद्देश्य ) क्या है?
उत्तर:
शांतिवादियों का उद्देश्य है। प्रतिरोध के अहिंसक स्वरूप पर बल देना। वैसे संघर्षों का एक प्रमुख तरीका सविनय नागरिक अवज्ञा है।

प्रश्न 9.
शांतिवादी उत्पीड़न से लड़ने के लिए किसकी वकालत करते हैं?
उत्तर:
शांतिवादी उत्पीड़न से लड़ने के लिए सत्य और प्रेम को बढ़ावा देने की वकालत करते हैं।

प्रश्न 10.
गांधीजी के अहिंसा सम्बन्धी विचार को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
गांधीजी के लिए अहिंसा का अर्थ कल्याण और अच्छाई का सकारात्मक और सक्रिय क्रियाकलाप है। इसमें किसी को चोट न पहुँचाने का विचार भी शामिल है।

प्रश्न 11.
शांति के मार्ग में आने वाली दो बाधायें लिखिये।
उत्तर:
आतंकवाद, शस्त्रीकरण।

प्रश्न 12.
शांति स्थापना के कोई दो उपाय लिखिये।
उत्तर:
युद्धों को रोकना, संरचनात्मक हिंसा के रूपों को खत्म करना।

प्रश्न 13.
द्वितीय विश्व युद्ध का अन्त किस घटना के साथ हुआ?
उत्तर:
द्वितीय विश्व युद्ध का अन्त अमरीका द्वारा जापान के दो नगरों हिरोशिमा और नागासाकी पर अणुबम गिराने के साथ हुआ।

प्रश्न 14.
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् किन दो देशों ने सैन्य बल नहीं रखने का निर्णय लिया?
उत्तर:
जापान, कोस्टारिका।

प्रश्न 15.
विश्व में परमाणविक हथियार से मुक्त क्षेत्र कितने हैं?
उत्तर:
छ: क्षेत्र

प्रश्न 16.
क्यूबाई मिसाइल संकट कब हुआ था और इसका प्रमुख कारण क्या था?
उत्तर:
क्यूबाई मिसाइल संकट 1962 में हुआ था। इसका कारण अमरीकी जासूसी विमानों द्वारा क्यूबा में सोवियत संघ की आणविक मिसाइलों को खोजना था।

प्रश्न 17.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कौनसी दो महाशक्तियाँ उभरीं?
अथवा
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् कि दो महाशक्तियों में प्रतिस्पर्द्धा का दौर चला?
उत्तर:
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद:

  1. संयुक्त राज्य अमेरिका
  2. सोवियत संघ नामक दो महाशक्तियाँ उभरी और उनके बीच प्रतिस्पर्द्धा का दौर चला।

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प्रश्न 18.
आज जीवन किस कारण अत्यधिक असुरक्षित है?
उत्तर:
आतंकवादी गतिविधियों के बढ़ने के कारण।

प्रश्न 19.
संरचनात्मक हिंसा को समाप्त करने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर:
न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक समाज की रचना।

प्रश्न 20.
शांति की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर:
मानव कल्याण की स्थापना के लिए।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
हिंसा की समाप्ति और शांति की स्थापना के कोई दो उपाय सुझाइए।
उत्तर:
हिंसा की समाप्ति और शांति की स्थापना के लिये ये दो उपाय किये जाने चाहिए

  1. सर्वप्रथम लोगों के सोचने-समझने के तरीकों में बदलाव लाना चाहिए। इसके लिए करुणा, हैं।
  2. समाज में संरचनात्मक हिंसा के रूपों को समाप्त कर सह अस्तित्व वाले समाज का निर्माण किया जाये।

प्रश्न 2.
शांति के बारे में नकारात्मक सोच वाले दो विचारकों के विचारों को संक्षेप में बताइये।
उत्तर:

  1. नीत्शे का मानना था कि सिर्फ संघर्ष ही सभ्यता की उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।
  2. विल्फ्रेडो पैरेटो का दावा था कि अधिकतर समाजों में शासक वर्ग का निर्माण सक्षम और अपने लक्ष्यों को पाने के लिए शक्ति का प्रयोग करने के लिए तैयार लोगों से होता है।

प्रश्न 3.
आज लोग शांति का गुणगान क्यों करते हैं?
उत्तर:
आज लोग शांति का गुणगान निम्न कारणों से करते हैं।

  1. वे इसे अच्छा विचार मानते हैं।
  2. शांति की अनुपस्थिति की भारी कीमत चुकाने के बाद मानवता ने इसका महत्व पहचाना है।
  3. आज जीवन अतीत के किसी भी समय से कहीं अधिक असुरक्षित है क्योंकि हर जगह के लोग आतंकवाद के बढ़ते खतरों का सामना कर रहे हैं।

प्रश्न 4.
संरचनात्मक हिंसा के कोई पाँच उदाहरण लिखिये।
उत्तर:
संरचनात्मक हिंसा से उत्पन्न कुछ प्रमुख उदाहरण ये हैं।

  1. जातिभेद
  2. वर्गभेद
  3. पितृसत्ता
  4. उपनिवेशवाद
  5. नस्लवाद
  6. साम्प्रदायिकता।

प्रश्न 5.
परम्परागत जाति-व्यवस्था के दुष्परिणाम को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
परम्परागत जाति-व्यवस्था कुछ खास समूह के लोगों को अस्पृश्य मानकर बरताव करती थी। छुआछूत के प्रचलन ने उन्हें सामाजिक बहिष्कार और अत्यधिक वंचना का शिकार बना रखा था।

प्रश्न 6.
वर्ग-व्यवस्था से उत्पन्न हिंसा को समझाइये
उत्तर:
वर्ग आधारित सामाजिक व्यवस्था ने भी असमानता और उत्पीड़न को जन्म दिया है। विकासशील देशों की अधिकांश कामकाजी जनसंख्या असंगठित क्षेत्र से सम्बद्ध है, जिसमें मजदूरी और काम की दशा बहुत खराब है।

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प्रश्न 7.
पितृ सत्ता की अभिव्यक्ति किस प्रकार की हिंसाओं में होती है?
उत्तर:
पितृ सत्ता से स्त्रियों को अधीन बनाने तथा उनके साथ भेदभाव के रूप सामने आते हैं। इसकी अभिव्यक्ति कन्या भ्रूण हत्या, लड़कियों को अपर्याप्त पोषण, बाल-विवाह, अशिक्षा, पत्नी को पीटना, दहेज- अपराध, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न और बलात्कार में होती है।

प्रश्न 8.
रंगभेद से जनित हिंसा को एक उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
रंगभेद में एक समूचे नस्लगत समूह या समुदाय का दमन करना शामिल रहता है। उदाहरण के लिए दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार ने 1992 तक अपनी बहुसंख्यक अश्वेत जनसंख्या के साथ दोयम दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार किया।

प्रश्न 9.
न्यायपूर्ण और टिकाऊ शांति कैसे प्राप्त की जा सकती है?
उत्तर:
न्यायपूर्ण और टिकाऊ शांति अप्रकट शिकायतों और संघर्ष के कारणों को साफ-साफ व्यक्त करने और बातचीत द्वारा हल करने के जरिये प्राप्त की जा सकती है। इसमें हर तबके के लोगों के बीच अत्यधिक सम्पर्क को प्रोत्साहित भी किया जाना चाहिए।

प्रश्न 10.
लोगों के दिमाग में शांति के विचार कैसे लाये जा सकते हैं?
उत्तर:
लोगों के दिमाग में शांति के विचार लाने के लिए करुणा जैसे अनेक पुरातन आध्यात्मिक सिद्धान्त और ध्यान जैसे अभ्यास बिल्कुल उपयुक्त हैं। आधुनिक नीरोगकारी तकनीक और मनोविश्लेषण जैसी चिकित्सा पद्धतियाँ भी यह काम कर सकती हैं।

प्रश्न 11.
शांति कैसे समाज की उपज हो सकती है?
उत्तर:
न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक समाज की रचना संरचनात्मक हिंसा को निर्मूल करने के लिए अनिवार्य है और शांति, ऐसे ही समाज की उपज हो सकती है।

प्रश्न 12.
क्या विश्व शांति बनाए रखने के लिए हिंसा जरूरी है?
उत्तर:
नहीं, विश्व शांति बनाए रखने के लिए हिंसा जरूरी नहीं है, बिना हिंसा के भी शांति स्थापित की जा सकती है। अन्तर्राष्ट्रीय कानून ने सभी राज्यों को अन्य राज्यों के आक्रमण के विरुद्ध आत्मरक्षा का अधिकार दिया है। यह आत्मरक्षा प्रत्येक देश अन्य देश के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाकर, परस्पर सामाजिक-आर्थिक सहयोग द्वारा कर सकता है।

प्रश्न 13.
शांति को बेकार या महत्वहीन बताने वाले विचारों को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:

  1. जर्मन दार्शनिक विचारक फ्रेडरिक नीत्शे ने शांति को महत्त्व नहीं दिया क्योंकि उसका मानना था कि सिर्फ संघर्ष ही सभ्यता की उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
  2. अनेक विचारकों ने शांति को बेकार बताया है और संघर्ष की प्रशंसा व्यक्तिगत बहादुरी और सामाजिक जीवन्तता के वाहक के तौर पर की है।
  3. विल्फ्रेडो पेरेटो का दावा था कि अधिकतर समाजों में शासक वर्ग का निर्माण सक्षम और अपने लक्ष्यों को पाने के लिए ताकत का इस्तेमाल करने के लिए तैयार लोगों से होता है।

प्रश्न 14.
क्या हिंसा कभी शांति को प्रोत्साहित कर सकती है?
उत्तर:
हिंसा कभी भी शांति को प्रोत्साहित नहीं कर सकती। कई बार यह तर्क दिया जाता है कि तानाशाहों या लोगों को उत्पीड़न करने वाले शासकों को हटाने के लिए हिंसा का प्रयोग उचित है। लेकिन व्यवहार में अच्छे उद्देश्य की पूर्ति के लिए भी हिंसा का प्रयोग हानिकारक होता है क्योंकि हिंसा से जन और धन की हानि होती है। इसके अतिरिक्त एक बार शुरू होने के पश्चात् हिंसा में वृद्धि हो सकती है और उस पर नियंत्रण करना कठिन हो जाता है। अतः हिंसा के परिणाम सदा बुरे होते हैं।

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प्रश्न 15.
” हिंसा प्राय: समाज की मूल संरचना में रची-बसी है।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक संस्थाएँ और प्रथाएँ जैसे जाति प्रथा, वर्ग-भेद, पितृसत्ता, लिंगभेद आदि असमानता को बढ़ाते हैं। इन आधारों पर उच्च वर्ग अन्य वर्गों से भेदभाव पूर्ण व्यवहार करते हैं। शोषित वर्ग द्वारा चुनौती या विरोध करने पर हिंसा पैदा होती है। इस प्रकार हिंसा प्राय: समाज की मूल संरचना में रची-बसी होती है क्योंकि लगभग प्रत्येक समाज में इस प्रकार के भेदभाव व असमानताएँ पाई जाती हैं।

प्रश्न 16.
आज की दुनिया में शांति इतनी कमजोर क्यों है?
उत्तर:
आज की दुनिया में शांति पर खतरे का सायां निरन्तर छाया हुआ है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं।

  1. आतंकवाद: आज विश्व में जीवन अतीत के किसी भी समय से कहीं अधिक असुरक्षित है क्योंकि हर जगह के लोग आतंकवाद के बढ़ते खतरों का सामना कर रहे हैं और इस खतरे का साया हमेशा मौजूद है।
  2. आक्रामक राष्ट्रों या महाशक्ति का स्वार्थपूर्ण आचरण: आधुनिक काल में दबंग राष्ट्रों ने अपनी संप्रभुता का प्रभावपूर्ण प्रदर्शन किया है और क्षेत्रीय सत्ता संरचना तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था को भी अपनी प्राथमिकताओं और धारणाओं के आधार पर बदलना चाहा है। इसके लिए उन्होंने सीधी सैनिक कार्यवाही का भी सहारा लिया है और विदेशी क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया है। ऐसे आचरण का ज्वलंत उदाहरण अफगानिस्तान और इराक में अमेरिका का ताजा हस्तक्षेप है। इससे उभरे युद्ध में बहुत-सी जानें गई हैं।
  3. नस्ल – संहार; वैश्विक समुदाय नस्ल संहार अर्थात् किसी समूचे जन- समूह के व्यवस्थित संहार का मूक दर्शक बना रहता है। यह खासकर रवांडा में साफ तौर पर दिखा।

प्रश्न 17.
क्या वर्तमान में शांति एक चुका हुआ सिद्धान्त है?
उत्तर:
यद्यपि आतंकवाद, ताकतवर आक्रामक शब्दों के स्वार्थपूर्ण आचरण, आधुनिक हथियारों एवं उन्नत तकनीक का दक्ष और निर्मम प्रयोग, नस्ल संहार आदि की घटनाओं के कारण ऐसा लगता है कि वर्तमान में शांति एक चुका हुआ सिद्धान्त हो चुका है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि शांति एक चुका हुआ सिद्धान्त है। शांति आज भी विश्व में महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त बना हुआ है। इसे निम्न उदाहरणों से स्पष्ट किया जा सकता है।

  • दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जापान और कोस्टारिका जैसे देशों ने सैन्यबल नहीं रखने का फैसला किया हुआ है।
  • विश्व के अनेक हिस्सों में परमाणविक हथियार से मुक्त क्षेत्र बने हैं, जहाँ आणविक हथियारों को विकसित और तैनात करने पर एक अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त समझौते के तहत पाबंदी लगी है। आज इस तरह के छः क्षेत्र हैं जिनमें ऐसा हुआ है। ये हैं
    1. दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र,
    2. लैटिन अमेरिका और कैरेबियन क्षेत्र,
    3. दक्षिण – पूर्व एशिया,
    4. अफ्रीका,
    5. दक्षिण प्रशांत क्षेत्र और
    6. मंगोलिया।
  • सोवियत संघ के विघटन से अति शक्तिशाली देशों के बीच सैनिक व परमाणविक प्रतिद्वन्द्विता पर पूर्ण विराम लग गया है और अन्तर्राष्ट्रीय शांति के लिए प्रमुख खतरा समाप्त हो गया है।
  • समकालीन युग में एक शांति आंदोलन जारी है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से राजनैतिक और भौगोलिक अवरोधों के बावजूद दुनिया में बड़े पैमाने पर इसने अनुयायी पैदा किए हैं। इस आंदोलन को विभिन्न तबके के लोगों ने बढ़ावा दिया है तथा इसका लगातार विस्तार हो रहा है। इसने शांति अध्ययन नामक ज्ञान की एक नई शाखा का सृजन किया है।

प्रश्न 18.
शांति आंदोलन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
शांति आंदोलन: वर्तमान काल में शांति को बढ़ावा देने के लक्ष्य को लेकर होने वाली अनेक लोकप्रिय पहलकदमियों को प्राय: शांति आंदोलन कहा जाता है। दोनों विश्वयुद्ध के कारण हुए विध्वंस ने इस आंदोलन को प्रेरित किया और तभी से यह जोर पकड़ता गया है। राजनैतिक और भौगोलिक अवरोधों के बावजूद दुनिया में बड़े पैमाने पर इसने अनुयायी पैदा किए हैं।

इसके अनुयायी: शांति आंदोलन को विभिन्न तबके के लोगों ने बढ़ावा दिया है। इन लोगों में लेखक, वैज्ञानिक, शिक्षक, पत्रकार, पुजारी, राजनेता और मजदूर सभी शामिल हैं। विस्तार: इसका लगातार विस्तार हुआ है। महिला सशक्तीकरण, पर्यावरण सुरक्षा जैसे अन्य आंदोलनों के समर्थकों से पारस्परिक फायदेमंद जुड़ाव होने से यह और सघन हुआ है। इस आंदोलन ने शांति अध्ययन नामक ज्ञान की एक नई शाखा का भी सृजन किया है तथा इण्टरनेट जैसे माध्यम का इसने कारगर इस्तेमाल भी किया है।

प्रश्न 19.
शांतिवाद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
शांतिवाद: शांतिवाद विवादों को सुलझाने के औजार के बतौर युद्ध यां हिंसा के बजाय शांति का उपदेश देता है। इसमें विचारों की अनेक छवियाँ शामिल हैं। इसके दायरे में कूटनीति को अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का समाधान करने में प्राथमिकता देने से लेकर किसी भी हालत में हिंसा और ताकत के इस्तेमाल के पूर्ण निषेध तक आते हैं शांतिवाद सिद्धान्तों पर भी आधारित हो सकता है और व्यावहारिकता पर भी। यथा

  1. सैद्धान्तिक शांतिवाद: सैद्धान्तिक शान्तिवाद का जन्म इस विश्वास से होता है कि युद्ध, सुविचारित घातक हथियार, हिंसा या किसी भी प्रकार की जोर-जबरदस्ती नैतिक रूप से गलत है।
  2. व्यावहारिक शांतिवाद: व्यावहारिक शांतिवाद ऐसे किसी चरम सिद्धान्त का अनुसरण नहीं करता है। यह मानता है कि विवादों के समाधान में युद्ध से बेहतर तरीके भी हैं या फिर यह समझता है कि युद्ध पर लागत ज्यादा आती है और फायदे कम होते हैं।

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प्रश्न 20.
अहिंसा के बारे में गांधीजी के विचारों पर एक टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
अहिंसा के बारे में गांधीजी के विचार:
1. नकारात्मक अर्थ:
नकारात्मक अर्थ में गांधीजी के लिए अहिंसा का अर्थ शारीरिक चोट, मानसिक चोट या आजीविका की क्षति से बाज आना भर नहीं है। इसका अर्थ किसी को नुकसान पहुँचाने के विचार तक को छोड़ देना है। गांधीजी का मानना था कि “यदि मैंने किसी की हानि पहुँचाने में किसी किसी अन्य की सहायता की अथवा किसी हानिकर कार्य से लाभान्वित हुआ तो मैं हिंसा का दोषी होऊंगा।” इ अर्थ में हिंसा के बारे में उनके विचार संरचनात्मक हिंसा को समाप्त करने के पक्ष में थे।

2. सकारात्मक अर्थ:
सकारात्मक अर्थ में अहिंसा के सम्बन्ध में गांधीजी का कहना है कि अहिंसा को सजग संवेदना के माहौल की अपेक्षा होती है। उनके लिए अहिंसा का अर्थ कल्याण और अच्छाई का सकारात्मक और सक्रिय क्रियाकलाप है। अहिंसा में कायरता और कमजोरी को कोई स्थान नहीं है।

प्रश्न 21.
शांतिवादी किसी न्यायपूर्ण संघर्ष में भी हिंसा के इस्तेमाल के खिलाफ नैतिक रूप से क्यों खड़े होते हैं?
उत्तर:
शांतिवादियों का मत है कि अच्छे मकसद से भी हिंसा का सहारा लेना आत्मघाती हो जाता है क्योंकि इस प्रक्रिया में अतिवादी हिंसक आंदोलन प्रायः संस्थागत रूप धारण करता है और राजनीतिक व्यवस्था का पूर्ण अंग बन जाता है। उदाहरण के लिए नेशनल लिबरेशन फ्रंट ने हिंसात्मक साधनों का प्रयोग कर अल्जीरिया के स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया।

उसने अपने देश को फ्रांसीसी उपनिवेशवादियों के बोझ से 1962 में मुक्त तो कराया, लेकिन उसका शासन जल्दी ही निरंकुशवाद में परिणत हो गया। इसकी प्रतिक्रिया वहाँ इस्लामी रूढ़िवाद के उभार के रूप में हुई। इसीलिए शांतिवादी किसी न्यायपूर्ण संघर्ष में भी हिंसा के प्रयोग का विरोध करते हैं । वे उत्पीड़न से लड़ने के लिए उत्पीड़नकारियों का दिल-दिमाग जीतने के लिए प्रेम और सत्य को बढ़ावा देने की वकालत करते हैं।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
शांति को परिभाषित कीजिए। इसके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
शांति का अर्थ: शांति आज विश्व का लोकप्रिय विचार है। इसकी कुछ प्रमुख परिभाषाएँ इस प्रकार दी गई
1. शांति की परिभाषा अक्सर युद्ध की अनुपस्थिति के रूप में की जाती है।
यह परिभाषा सरल है, लेकिन भ्रामक भी है। सामान्य रूप से हम युद्ध को देशों के बीच हथियारबंद संघर्ष समझते हैं। बोस्निया में इस तरह का संघर्ष नहीं था; लेकिन इससे शांति का उल्लंघन तो हुआ ही था। इससे यह स्पष्ट होता है कि यद्यपि प्रत्येक युद्ध शांति को भंग करता है, लेकिन शांति का हर अभाव केवल युद्ध के कारण ही हो यह आवश्यक नहीं। युद्ध न होने पर भी शांति हो, यह आवश्यक नहीं है।

2. शांति को युद्ध, दंगा, नरसंहार, कत्ल या सामान्य शारीरिक प्रहार समेत सभी प्रकार के हिंसक संघर्ष के अभाव के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।
यह परिभाषा पहली परिभाषा की तुलना में अधिक विस्तृत है लेकिन संरचनात्मक हिंसा के रूपों की इसमें उपेक्षा की गई है। जबकि संरचनात्मक हिंसा के चलते भी समाज में शांति स्थापित नहीं हो पाती है। संरचनात्मक भेदभावों के रूप हैं जातिभेद, वर्गभेद, पितृसत्ता, उपनिवेशवाद, नस्लवाद और साम्प्रदायिकता। इन संरचनात्मक हिंसाओं का शिकार व्यक्ति जिन मनोवैज्ञानिक और भौतिक नुकसानों से गुजरता है, वे उसके भीतर शिकायतों को पैदा करते हैं। ये शिकायतें पीढ़ियों तक कायम रहती हैं। ऐसे समूह कभी – कभी किसी घटना या टिप्पणी से भी उत्तेजित होकर संघर्षों के ताज़ा दौर की शुरुआत कर सकते हैं। अतः न्यायपूर्ण और टिकाऊ शांति अप्रकट शिकायतों और संघर्ष के कारणों को साफ-साफ व्यक्त करने और बातचीत द्वारा हल करने के जरिये ही प्राप्त की जा सकती है।

3. शांति को संतुष्ट लोगों के समरस सहअस्तित्व के रूप में समझा जा सकता है। संतुष्ट लोगों के समरस सहअस्तित्वपूर्ण न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक समाज की रचना संरचनात्मक हिंसा को समाप्त करके ही की जा सकती है शांति ऐसे ही समाज की उपज हो सकती है।

4. शांति एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें व्यापकतम अर्थों में मानव कल्याण की स्थापना के लिए जरूरी नैतिक और भौतिक संसाधनों के सक्रिय क्रियाकलाप शामिल होते हैं- चूंकि शांति एक बार में हमेशा के लिए हासिल नहीं की जा सकती। यह कोई अन्तिम स्थिति नहीं बल्कि एक प्रक्रिया है।

शांति का महत्त्व: शांति के महत्त्व को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है।
1. जीवन की सुरक्षा संभव:
राज्य का पहला और प्रमुख कार्य है लोगों के जीवन की रक्षा करना। लोगों के जीवन की रक्षा केवल शांतिपूर्ण वातावरण में ही संभव है। यदि किसी समाज में शांति का वातावरण नहीं होगा तो उसके सदस्य निरन्तर रूप से जीवन की असुरक्षा से भयभीत रहेंगे। जहाँ शक्ति का शासन है, शक्ति ही कानून है, वहाँ न तो शांति हो सकती है और न जीवन की सुरक्षा।

2. व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास संभव:
प्रत्येक व्यक्ति अपनी जीविका हेतु कोई न कोई कार्य करता है। व्यक्ति अपने जीविका उत्पादन के विभिन्न कार्यों को तभी कुशलता के साथ सम्पन्न कर सकते हैं जब समाज में शान्ति
हो। जब हिंसा, उपद्रवों का वातावरण होता है तो लोग घर के अन्दर ही रहना पसंद करते हैं और वे स्वतंत्रतापूर्वक, निर्भय होकर, ठीक प्रकार से अपनी जीविका पूर्ति के कर्तव्यों को नहीं कर पाते हैं। इसलिए समाज के विकास के लिए, व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के लिए, समाज के उपयोगी कार्यों को करने के लिए समाज में शांति का होना आवश्यक है।

3. विविध प्रकार की सांसारिक गतिविधियों के कुशल संचालन के लिए आवश्यक:
समस्त व्यापारिक गतिविधियों, औद्योगीकरण, कृषिगत गतिविधियाँ आदि सभी केवल शांतिमय वातावरण में ही संचालित हो सकती हैं। जहाँ कानून-व्यवस्था का अभाव हो, अशान्ति का वातावरण हो या हिंसा का वातावरण हो, ये सभी गतिविधियाँ अवरुद्ध हो जाती हैं।

4. समृद्धि का पूरक:
शांति और समृद्धि परस्पर पूरक हैं। जहाँ शांति नहीं है, वहाँ समृद्धि नहीं आ सकती। अशान्ति के वातावरण में विकास के सभी कार्य पिछड़ जाते हैं। सरकारी मशीनरी को अपना सारा ध्यान शांति एवं व्यवस्था की स्थापना में लगा देना पड़ता है। एक देश जिसे निरन्तर साम्प्रदायिक दंगों, हिंसक संघर्षों, जातीय संघर्षों तथा सामाजिक वैमनस्य का सामना करना पड़ता है, वह विकास की आशा नहीं कर सकता क्योंकि सरकार की आय का अधिकांश भाग शांति व्यवस्था की स्थापना में ही खर्च हो जाता है। अतः स्पष्ट है कि शांति समृद्धि और विकास लाती है।

5. विदेशी व्यापार में वृद्धि: विदेशी व्यापार शांति के समय में ही फलता-फूलता है। यदि दो राष्ट्र हथियारों की प्रतियोगिता या शीत युद्ध में रत हैं, उनके बीच पारस्परिक व्यापार रुक जाता है। भारत और पाकिस्तान के बीच अधिकांश व्यापार इसीलिए अवरुद्ध है क्योंकि दोनों के बीच शांति के सम्बन्ध नहीं हैं। विदेशी व्यापार मित्रवत सम्बन्धों में ही विकसित होता है और मित्रवत सम्बन्ध परस्पर शांति के सम्बन्धों में ही संभव है।

6. मानवता का विकास: जब युद्ध होता है, तब मानवता पीड़ित होती है और शांतिकाल में विकसित होती है। मानवता का विकास शांति को बढ़ावा देता है। समस्त वैज्ञानिक और तकनीकी आविष्कार, खोजें, जीवन की सुविधाएँ शांतिमय वातावरण और परस्पर सहयोग के कारण ही संभव हुई हैं। इसीलिए यह कहा जा सकता है कि शांति हमारी इसी पीढ़ी के लिए ही आवश्यक नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए भी आवश्यक है।

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 9 शांति

प्रश्न 2.
संरचनात्मक हिंसा क्या है? संरचनात्मक हिंसा के विभिन्न रूपों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संरचनात्मक हिंसा का अर्थ-हिंसा प्रायः समाज की मूल संरचना में ही रची-बसी है। जब हिंसा सामाजिक संस्थाओं से समाज में निहित रीति-रिवाजों से, समाज द्वारा मान्य संस्थाओं से प्रकट होती है, तो उसे संरचनात्मक हिंसा कहते हैं। उदाहरण के लिए, भारत में जाति प्रथा के तहत जाति आधारित असमानताएँ समाज में मान्य तथा स्वीकृत होती हैं और उच्च जातियाँ तथाकथित निम्न जातियों को दबाती हैं, तो यह स्थिति हिंसा को जन्म देती है। जब एक उच्च जाति के लोग निम्न जाति के लोगों पर आक्रमण करते हैं, उनके घरों को जलाते हैं, उन्हें उत्पीड़ित करते हैं, तो यह संरचनात्मक हिंसा का स्पष्ट उदाहरण है।

जब एक स्त्री द्वितीय स्तर की नागरिक समझी जाती है और उसे समाज में पुरुष के साथ समानता का दर्जा नहीं दिया जाता है तथा उसका शोषण तथा उत्पीड़न किया जाता है, तो यह भी एक संरचनात्मक हिंसा है। इस प्रकार वह हिंसा जो समाज की संरचना के कारण प्रकट होती है, संरचनात्मक हिंसा कहलाती है। संरचनात्मक हिंसा के रूप: संरचनात्मक हिंसा के अनेक रूप हैं। इनका विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है।

1. भारत में परम्परागत जाति व्यवस्था:
भारत में परम्परागत जाति व्यवस्था कुछ खास समूह के लोगों को अस्पृश्य मानकर बरताव करती थी। आजाद भारत के संविधान द्वारा गैर-कानूनी करार दिये जाने तक छुआछूत के प्रचलन ने उन्हें सामाजिक बहिष्कार और अत्यधिक वंचना का शिकार बना रखा था । भयावह रीति-रिवाजों के इन जख्मों से उबरने के लिए देश अभी तक संघर्ष कर रहा है।

2. वर्ग व्यवस्था:
विश्व में हर समाज में वर्ग-व्यवस्था विद्यमान है और वर्गों के आधार पर समाज में स्तरीकरण पाया जाता है। वर्ग-व्यवस्था ने भी काफी असमानता और उत्पीड़न को जन्म दिया है। विकासशील देशों की कामकाजी आबादी असंगठित क्षेत्र से सम्बद्ध है, जिसमें मेहनताना और काम की दशा बहुत खराब है। विकसित देशों में भी निम्न वर्गीय लोगों की अच्छी-खासी आबादी मौजूद है। कुछ वर्ग गरीबी के कारण झुग्गी-झोंपड़ियों या गंदी बस्तियों
में रहते हैं और बेरोजगारी, अशिक्षा, भूख और बीमारी का सामना करते रहते हैं। वर्गों के बीच ऐसी असमानता समाज की समरसता और शांति को भंग कर देती है।

3. पितृसत्ता आधारित भेदभाव:
प्रायः सभी पितृसत्तात्मक परिवार व्यवस्था में सबसे बड़ा पुरुष सदस्य परिवार का मुखिया होता है। पितृसत्ता पर आधारित ऐसे सामाजिक संगठन की परिणति स्त्रियों को व्यवस्थित रूप से अधीन बनाने और उनके साथ भेदभाव करने में होती है। इसकी अभिव्यक्ति कन्या भ्रूण हत्या, लड़कियों को अपर्याप्त पोषण और शिक्षा न देना, बाल-विवाह, पत्नी को पीटना, दहेज से सम्बंधित अपराध, कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न, बलात्कार और घर की इज्जत के नाम पर हत्या में होती है। भारत में निम्न लिंगानुपात पितृसत्तात्मक विध्वंस का मर्मस्पर्शी सूचक है। हम उस स्थिति में समाज में शांति की आशा कैसे कर सकते हैं जब संसार की लगभग आधी आबादी भेदभाव, उत्पीड़न तथा समान अधिकारों से वंचित हो।

4. उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद:
साम्राज्यवाद और उपानिवेशवाद भी संरचनात्मक हिंसा का एक रूप है। द्वितीय महायुद्ध तक उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद ने विदेशी शासन के रूप में लोगों पर प्रत्यक्ष और लम्बे समय तक गुलामी थोप दी थी । यद्यपि वर्तमान में यह लगभग असंभव है लेकिन इजरायली प्रभुत्व के खिलाफ चालू फिलिस्तीनी संघर्ष दिखाता है कि इसका अस्तित्व पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इसके अलावा, यूरोपीय उपनिवेशवादी देशों के पूर्ववर्ती उपनिवेशों को अभी भी बहुआयामी शोषण के उन प्रभावों से पूरी तरह उबरना शेष है, जिसे उन्होंने औपनिवेशिक काल में झेला।

5. रंगभेद और साम्प्रदायिकता:
रंगभेद और साम्प्रदायिकता में एक समूचे नस्लगत समूह या समुदाय पर लांछन लगाना और उनका दमन करना शामिल रहता है। कई बार इसका उपयोग मानव विरोधी कुकृत्यों को जायज ठहराने में किया जाता रहा है। 1865 तक अमेरिका में अश्वेत लोगों को गुलाम बनाने की प्रथा, हिटलर के समय जर्मनी में यहूदियों को कत्लेआम तथा दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार की 1992 तक अपनी बहुसंख्यक अश्वेत आबादी के साथ दोयम दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार करने वाली रंगभेद की नीति इसके उदाहरण हैं।

पश्चिमी देशों में नस्ली भेदभाव गोपनीय तौर पर अभी भी जारी है। अब इसका प्रयोग प्रायः एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विभिन्न देशों के आप्रवासियों के खिलाफ होता है। साम्प्रदायिकता को नस्लवाद का दक्षिण एशियाई प्रतिरूप माना जा सकता है जहाँ शिकार अल्पसंख्यक धार्मिक समूह होते हैं। हिंसा का शिकार व्यक्ति जिन मनोवैज्ञानिक और भौतिक नुकसानों से गुजरता है वे उसके भीतर शिकायतें पैदा करती हैं। ये शिकायतें पीढ़ियों तक कायम रहती हैं।

ऐसे समूह कभी: कभी किसी घटना या टिप्पणी से भी उत्तेजित होकर संघर्षों के ताजा दौर की शुरुआत कर सकते हैं। दक्षिण एशिया में विभिन्न समुदायों द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ लम्बे समय से मन में रखी पुरानी शिकायतों के उदाहरण हमारे पास हैं, जैसे 1947 में भारत के विभाजन के दौरान भड़की हिंसा से उपजी शिकायतें।

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 9 शांति

प्रश्न 3.
हिंसा को कैसे समाप्त किया जा सकता है? क्या हिंसा कभी शांति को प्रोत्साहित कर सकती है?
उत्तर;
हिंसा की समाप्ति: शांति को प्रोत्साहित करने के लिए यह आवश्यक है कि समाजों से हिंसा को समाप्त किया जाये । हिंसा की समाप्ति के लिए निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिए-
1. लोगों के सोचने के तरीके में बदलाव:
एक शांतिपूर्ण दुनिया की ओर बदलाव के लिए लोगों के सोचने के तरीके में बदलाव जरूरी है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनिसेफ) के संविधान ने उचित ही टिप्पणी की है कि “चूंकि युद्ध का आरंभ लोगों के दिमाग में होता है, इसलिए शांति के बचाव भी लोगों के दिमाग में ही रचे जाने चाहिए।”

गौतम बुद्ध ने भी कहा है कि “सभी दुष्कर्म मन के कारण उपजते हैं। यदि मन रूपान्तरित हो जाए तो क्या दुष्कर्म बने रह सकते हैं?” इस तरह के प्रयास के लिए करुणा जैसे अनेक पुरातन आध्यात्मिक सिद्धान्त और ध्यान जैसे अभ्यास बिल्कुल उपयुक्त हैं। आधुनिक नीरोगकारी तकनीक और मनोविश्लेषण जैसी चिकित्सा पद्धतियाँ भी यह काम कर सकती हैं।

2. संरचनात्मक हिंसा की समाप्ति:
हिंसा का आरंभ महज किसी व्यक्ति के दिमाग में नहीं होता; इसकी जड़ें कतिपय सामाजिक संरचनाओं में भी निहित होती हैं। इसलिए हिंसा की समाप्ति के लिए यह आवश्यक है कि सामाजिक संरचनाओं में निहित हिंसा के कारणों को समाप्त किया जाये। इसके लिए सामाजिक भेदभावों, सामाजिक असमानताओं, जाति आधारित उत्पीड़न तथा दबाव, प्रजातिगत भेदभाव को समाप्त करने के प्रयास किये जाने चाहिए ताकि समाज में सामाजिक समानता, आर्थिक और राजनीतिक समानता, लैंगिक समानता, विभिन्न धर्मों व समुदायों के बीच सौहार्द्र कायम किया जा सके। न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक समाज की रचना संरचनात्मक हिंसा को निर्मूल करने के लिए आवश्यक है। शांति, जिसे संतुष्ट लोगों के समरस सह-अस्तित्व के रूप में समझा जाता है, ऐसे ही समाज की उपज हो सकती है।

3. हिंसा की समाप्ति तथा शांति की स्थापना स्थायी नहीं ह:
शांति एक बार में हमेशा के लिए हासिल नहीं की जा सकती। शांति कोई अंतिम स्थिति नहीं बल्कि ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें व्यापकतम अर्थों में मानव कल्याण की स्थापना के लिए जरूरी नैतिक और भौतिक संसाधनों के सक्रिय क्रियाकलाप शामिल होते हैं हिंसा से शांति की स्थापना नहीं की जा सकती कुछ लोगों का विचार है कि शक्ति का प्रयोग करके, हिंसा के द्वारा हिंसा को समाप्त किया जा सकता है।

उनका कहना है कि यदि आप शांति चाहते हैं तो हमें युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए। वे इस आधार पर अपने विचारों के समर्थन में तर्क देते हैं कि राज्य कानून तोड़ने वालों तथा अपराधियों को दंडित करने के लिए तथा हिंसा को समाप्त करने के लिए समाज में राज्य सर्वाधिक भौतिक शक्ति का प्रयोग करता है।

यह तर्क दिया जाता है कि तानाशाहों और उत्पीड़क शासकों को हिंसा और शक्ति के द्वारा जबरन हटाकर भी जनता को निरन्तर नुकसान होने से रोका जा सकता है। या फिर उत्पीड़ित लोगों के मुक्ति संघर्षों को हिंसा के कुछ इस्तेमाल के बावजूद न्यायपूर्ण ठहराया जा सकता है। लेकिन उक्त विचार कुछ विचारकों के ही हैं, सभी के नहीं। अधिकांश विद्वान और विचारकों का मत है कि हिंसा के द्वारा शांति की स्थापना नहीं की जा सकती। हिंसा के द्वारा हिंसा की समाप्ति हमेशा अल्प अवधि के लिए ही होती है। हिंसा के द्वारा शांति की स्थापना नहीं की जा सकती, इस कथन के समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं।

1. राज्य का आधार शक्ति नहीं, इच्छा है:
टी. एच. ग्रीन ने लिखा है कि राज्य का आधार लोगों की इच्छा है। अतः राज्य हिंसा और शक्ति पर आधारित नहीं है। राज्य शक्ति का उपयोग केवल कुछ अपराधियों तथा कानून तोड़ने वालों के विरुद्ध करता है, न कि जनता के विरुद्ध। जब आम जनता सरकार के विरुद्ध हो जाती है, तो उसकी सेना भी हथियार डाल देती है। क्रांतियाँ इसकी उदाहरण हैं।

2. हिंसा के द्वारा हिंसा की समाप्ति अल्प होती है:
जब हिंसा के द्वारा हिंसा को समाप्त किया जाता है, तो यह थोड़े समय के लिए हो सकती है, स्थायी नहीं। जब शत्रु या विपक्षी यह देखता है कि वह इस समय कमजोर है, वह झुक जाता है और हमेशा इस अवसर की तलाश में रहता है कि इसका बदला ले सके। जिस व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा का प्रयोग किया जाता है, वह हिंसा उसके मस्तिष्क में उससे बदला लेने की भावना पैदा कर देती है। इस प्रकार हिंसा द्वारा हिंसा की समाप्ति या शांति की स्थापना अल्पकालिक होती है।

3. हिंसा की प्रवृत्ति नियंत्रण से बाहर हो जाने की है:
चाहे हिंसा का मकसद कितना ही अच्छा क्यों न रहा हो, लेकिन अपनी नियंत्रण से बाहर हो जाने की प्रवृत्ति के कारण यह आत्मघाती होती है। एक बार शुरू हो जाने पर इसकी प्रवृत्ति नियंत्रण से बाहर हो जाने की होती है और इसके कारण यह अपने पीछे मौत और बर्बादी की एक श्रृंखला छोड़ जाती है। इससे स्पष्ट होता है कि हिंसा हिंसा को बढ़ाती है, न कि कम करती है।

4. हिंसा हृदय परिवर्तन के द्वारा समाप्त की जानी चाहिए:
शांतिवादियों का मकसद लड़ाकुओं की हिंसा को कम करके आंकना नहीं, प्रतिरोध के अहिंसक स्वरूप पर बल देना है। वैसे संघर्षों का एक प्रमुख तरीका सविनय अवज्ञा है और उत्पीड़न की संरचना की नींव हिलाने में इसका सफलतापूर्वक इस्तेमाल होता रहा है। भारतीय स्वतंत्रता आदोलन के दौरान गांधीजी द्वारा सत्याग्रह का प्रयोग इसका प्रमुख उदाहरण है। नागरिक अवज्ञा के दबाव में अन्यायपूर्ण संरचनाएँ भी रास्ता दे सकती हैं। कभी-कभार वे अपनी विसंगतियों के बोझ से ध्वस्त भी हो सकती हैं।

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 8 धर्मनिरपेक्षता 

Jharkhand Board JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 8 धर्मनिरपेक्षता Important Questions and Answers.

JAC Board Class 11 Political Science Important Questions Chapter 8 धर्मनिरपेक्षता

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. निम्नलिखित में कौनसी बात धर्म निरपेक्षता के विचार से संगत है।
(अ) किसी धर्म को राज्य के धर्म के रूप में मान्यता देना।
(ब) राज्य द्वारा किसी खास धर्म के साथ गठजोड़ बनाना।
(स) सरकार द्वारा धार्मिक संस्थाओं की प्रबन्धन समितियों की नियुक्ति करना।
(द) किसी धार्मिक समूह पर दूसरे धार्मिक समूह का वर्चस्व न होना।
उत्तर:
(द) किसी धार्मिक समूह पर दूसरे धार्मिक समूह का वर्चस्व न होना।

2. निम्न में से कौनसी विशेषता पाश्चात्य धर्म निरपेक्षता की नहीं है।
(अ) राज्य द्वारा समर्थित धार्मिक सुधारों की अनुमति।
(ब) धर्म और राज्य का एक-दूसरे के मामले में हस्तक्षेप न करने की अटल नीति।
(स) विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच समानता पर बल देना।
(द) एक धर्म के भिन्न पंथों के बीच समानता पर बल देना।
उत्तर:
(अ) राज्य द्वारा समर्थित धार्मिक सुधारों की अनुमति।

3. निम्न में से कौनसी विशेषता भारतीय धर्म निरपेक्षता की है
(अ) धर्म और राज्य का एक-दूसरे के मामले में हस्तक्षेप न करने की अटल नीति ।
(ब) राज्य धार्मिक सुधारों हेतु दखल नहीं दे सकता।
(स) व्यक्ति और उसके अधिकारों को ही महत्त्व देना।
(द) अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर ध्यान देना।
उत्तर:
(द) अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर ध्यान देना।

4. निम्न में से कौनसी भारतीय धर्म निरपेक्षता की आलोचना नहीं है।
(अ) धर्म-विरोधी
(स) सभी धर्मों को राज्य द्वारा समान संरक्षण
(ब) पश्चिम से आयातित
(द) अल्पसंख्यकवाद।
उत्तर:
(स) सभी धर्मों को राज्य द्वारा समान संरक्षण

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 8 धर्मनिरपेक्षता

5. धर्म निरपेक्षता की संकल्पना के लिये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
(अ) व्यक्तिगत समानता
(स) अंतः धार्मिक समानता
(ब) अंतर – धार्मिक समानता
(द) अन्तर- धार्मिक व अंत: धार्मिक समानता
उत्तर:
(द) अन्तर- धार्मिक व अंत: धार्मिक समानता

6. धर्म निरपेक्षता विरोध करती है।
(अ) स्वतंत्रता का
(ब) समानता का
(स) धार्मिक वर्चस्व का
(द) राज्य सत्ता का
उत्तर:
(स) धार्मिक वर्चस्व का

7. धर्म निरपेक्षता के यूरोपीय मॉडल में धर्म है।
(अ) एक निजी मामला
(स) चर्च का मामला
(ब) सरकार का मामला
(द) न्यायालय का मामला
उत्तर:
(अ) एक निजी मामला

8. भारतीय धर्म निरपेक्षता राज्य को अनुमति देती है।
(अ) धार्मिक भेदभाव की
(स) धार्मिक सुधार की
(ब) धार्मिक आयोजनों की
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(स) धार्मिक सुधार की

9. धर्म निरपेक्षता बढ़ावा देती हैं।
(अ) धर्मों में समानता को
(ब) धर्मतांत्रिक राज्य को
(स) अस्पृश्यता को
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) धर्मों में समानता को

10. धर्म निरपेक्ष राज्य सत्ता के लिये जरूरी है।
(अ) धर्म में हस्तक्षेप
(स) धर्म का विरोध
(ब) एक राज्य धर्म
(द) धर्म से सम्बन्ध विच्छेद
उत्तर:
(द) धर्म से सम्बन्ध विच्छेद

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 8 धर्मनिरपेक्षता

11. धर्मनिरपेक्ष राज्यों में निम्न में से कौनसा शामिल नहीं होना चाहिए।
(अ) धार्मिक स्वतंत्रता
(ब) धार्मिक भेदभाव
(सं) अन्तर – धार्मिक समानता
(द) अंत: धार्मिक समानता
उत्तर:
(ब) धार्मिक भेदभाव

12. सभी धर्म निरपेक्ष राज्यों में कौनसी बात सामान्य है।
(अ) वे धर्मतांत्रिक हैं।
(ब) वे किसी खास धर्म की स्थापना करते हैं।
(स) वे न तो धर्मतांत्रिक हैं और न किसी खास धर्म की स्थापना करते हैं।
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(स) वे न तो धर्मतांत्रिक हैं और न किसी खास धर्म की स्थापना करते हैं।

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. भारत में धर्मनिरपेक्षता का विचार ………………… वाद विवादों और परिचर्चाओं में सदैव मौजूद रहा है।
उत्तर:
सार्वजनिक

2. पड़ौसी देश, पाकिस्तान और बांग्लादेश में ……………….. की स्थिति ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
उत्तर:
धार्मिक अल्पसंख्यकों

3. धर्मनिरपेक्षता का सिद्धान्त …………………. वर्चस्व का विरोध करता है।
उत्तर:
अंतर – धार्मिक

4. धर्मनिरपेक्षता का सिद्धान्त …………………. वर्चस्व का भी विरोध करता है।
उत्तर:
अंतः धार्मिक

5. धर्म और राज्य सत्ता के बीच संबंध विच्छेद ……………………. राज्यसत्ता के लिए जरूरी है।
उत्तर:
धर्मनिरपेक्ष

6. भारतीय धर्मनिरपेक्षता में राज्य समर्थित ………………… सुधार की गुंजाइश भी है और अनुकूलता भी।
उत्तर:
धार्मिक

निम्नलिखित में से सत्य / असत्य कथन छाँटिये

1. भारतीय धर्मनिरपेक्षता का संबंध व्यक्तियों की धार्मिक आजादी से ही नहीं है, अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक आजादी से भी है।
उत्तर:
सत्यं

2. भारतीय धर्मनिरपेक्षता में राज्य समर्थित धार्मिक सुधार की गुंजाइश नहीं है।
उत्तर:
असत्य

3. भारतीय धर्मनिरपेक्षता ने अन्तः धार्मिक और अंतर- धार्मिक वर्चस्व पर एक साथ ध्यान केन्द्रित नहीं किया है।
उत्तर:
असत्य

4. भारतीय धर्मनिरपेक्षता धर्म से सैद्धान्तिक दूरी कायम रखने के सिद्धान्त पर चलती है जो हस्तक्षेप की गुंजाइश भी बनाती है।
उत्तर:
सत्य

5. धर्मनिरपेक्षता के अमेरिकी मॉडल में धर्म और राज्य सत्ता के संबंध विच्छेद को पारस्परिक निषेध के रूप में समझा जाता है।
उत्तर:
सत्य

निम्नलिखित स्तंभों के सही जोड़े बनाइये

1. पाकिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों(अ) धर्मनिरपेक्षता का उत्पीड़न
2. अन्तर धार्मिक वर्चस्व एवं अंतः धार्मिक वर्चस्व दोनों(ब) धर्म के अन्दर वर्चस्ववाद का विरोध करना
3. देश के कुछ हिस्सों में हिन्दू महिलाओं का मंदिरों(स) धर्मनिरपेक्षता का यूरोपीय मॉडल में प्रवेश वर्जित
4. धर्म और राज्यसत्ता के संबंध विच्छेद को परस्पर निषेध के रूप में समझना(द) भारतीय धर्मनिरपेक्षता का मॉडल
5. वह धर्मनिरेपक्षता जो धर्म और राज्य के बीच पूर्ण(य) धर्मों के बीच वर्चस्ववाद

उत्तर:

1. पाकिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों(य) धर्मों के बीच वर्चस्ववाद
2. अन्तर धार्मिक वर्चस्व एवं अंतः धार्मिक वर्चस्व दोनों(अ) धर्मनिरपेक्षता का उत्पीड़न
3. देश के कुछ हिस्सों में हिन्दू महिलाओं का मंदिरों(ब) धर्म के अन्दर वर्चस्ववाद का विरोध करना
4. धर्म और राज्यसत्ता के संबंध विच्छेद को परस्पर निषेध के रूप में समझना(स) धर्मनिरपेक्षता का यूरोपीय मॉडल में प्रवेश वर्जित
5. वह धर्मनिरेपक्षता जो धर्म और राज्य के बीच पूर्ण(द) भारतीय धर्मनिरपेक्षता का मॉडल


अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
धर्मतांत्रिक राज्य किसे कहा जाता है?
उत्तर;
धर्मतांत्रिक राज्य उस राज्य को कहते हैं जो किसी धर्म विशेष को राज्य का धर्म घोषित कर उसे संरक्षण प्रदान करता है।

प्रश्न 2.
धार्मिक भेदभाव रोकने का कोई एक रास्ता बताइये।
उत्तर:
हमें आपसी जागरूकता के साथ एक साथ मिलकर काम करना चाहिए।

प्रश्न 3.
धर्म निरपेक्षता कैसा समाज बनाना चाहती है?
उत्तर:
धर्म निरपेक्षता अंतर- धार्मिक तथा अंतः धार्मिक दोनों प्रकार के वर्चस्वों से रहित समाज बनाना चाहती है।

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 8 धर्मनिरपेक्षता

प्रश्न 4.
किसी धार्मिक समूह के वर्चस्व को रोकने के लिए राष्ट्र को किस बात से बचना चाहिए?
उत्तर:
राष्ट्र को किसी भी धर्म के साथ किसी भी प्रकार के गठजोड़ से बचना चाहिए।

प्रश्न 5.
धर्म निरपेक्षता किस बात को बढ़ावा देती है?
उत्तर:
धर्म निरपेक्षता धार्मिक स्वतंत्रता और समानता को बढ़ावा देती है

प्रश्न 6.
भारत में धर्म निरपेक्षता का विकास किस बात को ध्यान में रखकर हुआ है?
उत्तर:
शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को ध्यान में रखकर।

प्रश्न 7.
भारतीय धर्मनिरपेक्षता में राज्य धर्म से कैसा सम्बन्ध रखता है?
उत्तर:
इसमें राज्य धर्म के सैद्धान्तिक दूरी रखते हुए उसमें हस्तक्षेप की गुंजाइश रखता है।

प्रश्न 8.
सभी धर्म निरपेक्ष राज्यों में कौनसी चीज सामान्य है?
उत्तर:
सभी धर्मनिरपेक्ष राज्य न तो धर्मतांत्रिक हैं और न किसी खास धर्म की स्थापना करते हैं।

प्रश्न 9.
“हजारों कश्मीरी पंडितों को घाटी में अपना घर छोड़ने के लिए विवश किया गया। वे दो दशक के बाद भी अपने घर नहीं लौट सके हैं।” यह कथन क्या दर्शाता है?
उत्तर:
यह कथन अन्तर: धार्मिक वर्चस्व और एक धार्मिक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय के उत्पीड़न को दर्शाता है।

प्रश्न 10.
धर्म निरपेक्षता के दो पहलू कौनसे हैं?
उत्तर:
धर्म निरपेक्षता के दो पहलू हैं।

  1. अन्तर- धार्मिक वर्चस्व का विरोध और
  2. अंतः धार्मिक वर्चस्व का विरोध।

प्रश्न 11.
अन्तर- धार्मिक वर्चस्व से क्या आशय है?
उत्तर:
अन्तर- धार्मिक वर्चस्व का आशय है। नागरिकों के एक धार्मिक समूह द्वारा दूसरे समूह को बुनियादी आजादी से वंचित करना।

प्रश्न 12.
अंत: धार्मिक वर्चस्व से क्या आशय है?
उत्तर:
अंतः धार्मिक वर्चस्व से आशय है धर्म के अन्दर छिपा वर्चस्व

प्रश्न 13.
धर्मतांत्रिक राष्ट्र किस बात के लिए कुख्यात रहे हैं?
उत्तर:
धर्मतांत्रिक राष्ट्र अपनी श्रेणीबद्धता, उत्पीड़न और दूसरे धार्मिक समूह के सदस्यों को धार्मिक स्वतंत्रता न देने के लिए कुख्यात रहे हैं।

प्रश्न 14.
किन्हीं दो धर्मतांत्रिक राष्ट्रों के उदाहरण दीजिये।
उत्तर:

  1. मध्यकालीन यूरोप में पोप की राज्य सत्ता और
  2. आधुनिक काल में अफगानिस्तान में तालिबानी राज्य सत्ता धर्मतांत्रिक राष्ट्रों के उदाहरण हैं।

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 8 धर्मनिरपेक्षता

प्रश्न 15.
आधुनिक काल में विद्यमान ऐसा राज्य कौनसा है जो धर्मतांत्रिक न होते हुए भी किसी खास धर्म के साथ गठजोड़ बनाये हुए है? थी।
उत्तर:
पाकिस्तान यद्यपि धर्मतांत्रिक राष्ट्र नहीं है, लेकिन सुन्नी इस्लाम उसका आधिकारिक राज्य धर्म है।

प्रश्न 16.
20वीं सदी में तुर्की में किस शासक ने धर्म निरपेक्षता पर अमल किया?
उत्तर:
मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने।

प्रश्न 17.
मुस्तफा कमाल अतातुर्क की धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप कैसा था?
उत्तर:
मुस्तफा कमाल अतातुर्क की धर्मनिरपेक्षता धर्म में सक्रिय हस्तक्षेप के जरिए उसके दमन की हिमायत करती

प्रश्न 18.
जवाहर लाल नेहरू की धर्म निरपेक्षता का स्वरूप कैसा था?
उत्तर:
नेहरू की धर्म निरपेक्षता थी। सभी धर्मों को राज्य द्वारा समान संरक्षण।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में धर्म निरपेक्षता की स्थिति को लेकर कौनसे मामले काफी पेचीदा हैं?
उत्तर:

  1. एक ओर तो यहाँ प्रायः हर राजनेता धर्म निरपेक्षता की शपथ लेता है, हर राजनीतिक दल धर्म निरपेक्ष होने की घोषणा करता है।
  2. दूसरी ओर, तमाम तरह की चिंताएँ और संदेह धर्म निरपेक्षता को घेरे रहते हैं। पुरोहितों, धार्मिक राष्ट्रवादियों, कुछ राजनीतिज्ञों तथा शिक्षाविदों द्वारा धर्म निरपेक्षता का विरोध किया जाता है।

प्रश्न 2.
धर्म निरपेक्षता क्या है?
उत्तर:
धर्म निरपेक्षता एक ऐसा नियामक सिद्धान्त है जो अन्तर- धार्मिक और अंतः धार्मिक, दोनों तरह के वर्चस्वों से रहित समाज बनाना चाहता है। यह धर्मों के अन्दर आजादी तथा विभिन्न धर्मों के बीच और उनके अन्दर समानता को बढ़ावा देता है।

प्रश्न 3.
धर्मों के बीच वर्चस्ववाद से क्या आशय है?
अन्तर:
धार्मिक वर्चस्व को स्पष्ट कीजिये।
अथवा
उत्तर:
धर्मों के बीच वर्चस्ववाद अर्थात् अन्तर- धार्मिक वर्चस्व का आशय यह है कि किसी देश या समाज में बहुसंख्यक धर्मावलम्बी अल्पसंख्यक धर्मावलम्बियों या किसी एक अल्पसंख्यक धर्मावलम्बियों को उनकी धार्मिक पहचान के कारण उत्पीड़ित करते हैं। दूसरे शब्दों में, नागरिकों के एक धार्मिक समूह को दुनिया की स्वतंत्रता से वंचित किया जाता है।

प्रश्न 4.
धर्म के अन्दर वर्चस्व ( अन्तः धार्मिक वर्चस्व ) से क्या आशय है?
उत्तर:
किसी देश में जब एक धर्म कई धार्मिक सम्प्रदायों में विभाजित हो जाता है और वे धार्मिक सम्प्रदाय परस्पर अपने से भिन्न मत रखने वाले सम्प्रदाय के सदस्यों के उत्पीड़न में लगे रहते हैं, तो यह अन्तः धार्मिक वर्चस्ववाद कहा जाता है।

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 8 धर्मनिरपेक्षता

प्रश्न 5.
धार्मिक भेदभाव रोकने के कोई तीन व्यक्तिगत रास्ते बताइये।
उत्तर:

  1. हम आपसी जागरूकता के लिए मिलकर काम करें।
  2. हम शिक्षा के द्वारा लोगों की सोच बदलने का प्रयास करें।
  3. हम साझेदारी और पारस्परिक सहायता के व्यक्तिगत उदाहरण द्वारा विभिन्न सम्प्रदायों के संदेहों को दूर करें।

प्रश्न 6.
एक राष्ट्र को किसी धार्मिक समूह के वर्चस्व को कैसे रोकना चाहिए?
उत्तर:
एक राष्ट्र को किसी धार्मिक समूह के वर्चस्व को रोकने हेतु निम्न प्रयास करने चाहिए

  1. प्रथमत: संगठित धर्म और राज्य सत्ता के बीच सम्बन्ध विच्छेद होना चाहिए।
  2. दूसरे, उसे किसी भी धर्म के साथ किसी भी तरह के औपचारिक कानूनी गठजोड़ से परहेज करना होगा।
  3. तीसरे, उसे शांति, धार्मिक स्वतंत्रता, धार्मिक उत्पीड़न, भेदभाव और वर्जना से आजादी, अन्तर- धार्मिक तथा अन्तः धार्मिक समानता के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए।

प्रश्न 7.
धर्म निरपेक्षता की यूरोपीय या अमेरिकी मॉडल की दो विशेषताएँ लिखिये।
उत्तर:
धर्मनिरपेक्षता की यूरोपीय या अमेरिकी मॉडल की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. राज्यसत्ता धर्म के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी और धर्म राज्यसत्ता के मामलों में दखल नहीं देगा। दोनों के अपने अलग-अलग क्षेत्र व सीमाएँ हैं।
  2. राज्य किसी धार्मिक संस्था को मदद नहीं देगा।

प्रश्न 8.
धर्म निरपेक्षता के भारतीय मॉडल की दो विशेषताएँ लिखिये।
उत्तर:
धर्मनिरपेक्षता के भारतीय मॉडल की विशेषताएँ :

  1. भारतीय धर्म निरपेक्षता का सम्बन्ध व्यक्तियों की धार्मिक आजादी से ही नहीं, अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक आजादी से भी है।
  2. भारतीय धर्म निरपेक्षता में राज्य समर्थित धार्मिक सुधार की गुंजाइश भी है।

प्रश्न 9.
भारतीय राज्य धार्मिक सुधारों की पहल करते हुए और धर्म से पूरी तरह सम्बन्ध विच्छेद किये बिना किस आधार पर धर्म निरपेक्ष होने का दावा करता है?
उत्तर:
धार्मिक सुधारों की पहल करते हुए और धर्म से पूरी तरह सम्बन्ध विच्छेद किये बिना भी भारतीय राज्य का धर्म निरपेक्ष चरित्र वस्तुतः इसी वजह से बरकरार है कि वह न तो धर्मतांत्रिक है और न ही किसी धर्म को राजधर्म मानता है। इसके परे, इसने धार्मिक समानता के लिए अत्यन्त परिष्कृत नीति अपनाई है।

प्रश्न 10.
क्या भारतीय धर्मनिरपेक्षता अल्पसंख्यकवादी है? स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
नहीं, भारतीय धर्मनिरपेक्षता अल्पसंख्यकवादी नहीं है क्योंकि भारत में अल्पसंख्यकों को जो विशेषाधिकार दिये गये हैं, वे उनके धर्म की सुरक्षा तथा बहुसंख्यक धार्मिक समूहों के वर्चस्व को रोकने के लिए दिये गये हैं, न कि उनके वर्चस्व को स्थापित करने के लिए।

प्रश्न 11.
धर्म निरपेक्षता धर्म विरोधी नहीं है। स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
धर्म निरपेक्षता धर्म विरोधी नहीं है- हमारे अधिकांश दुःख-दर्द मानव निर्मित हैं, इसलिए उनका अन्त हो सकता है। लेकिन हमारे कुछ कष्ट मानव निर्मित नहीं हैं। धर्म, कला और दर्शन ऐसे दुःख-दर्दों के सटीक प्रत्युत्तर हैं। धर्म निरपेक्षता इस तथ्य को स्वीकार करती है और इसीलिए धर्म निरपेक्षता धर्म विरोधी नहीं है।

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प्रश्न 12.
धर्म निरपेक्ष होने के लिए किसी राज्य सत्ता को क्या-क्या करना होगा?
उत्तर:
धर्म निरपेक्ष होने के लिए किसी राज्य सत्ता को निम्नलिखित बातों को अपनाना होगाv

  1. धर्म निरपेक्ष होने के लिए राज्य सत्ता को धर्मतांत्रिक होने से इनकार करना होगा अर्थात् संगठित धर्म और राज्यसत्ता के बीच सम्बन्ध विच्छेद होना चाहिए।
  2. उसे किसी भी धर्म के साथ किसी भी तरह के औपचारिक कानूनी गठजोड़ से परहेज करना होगा।
  3. धर्म निरपेक्ष राज्य को ऐसे सिद्धान्तों और लक्ष्यों के लिए अवश्य प्रतिबद्ध होना चाहिए जो अंशत: ही सही, गैर-धार्मिक स्रोतों से निकलते हैं। ऐसे लक्ष्यों में शांति; धार्मिक स्वतंत्रता; धार्मिक उत्पीड़न, भेदभाव और वर्ज़ना से आजादी; और साथ ही अन्तर- धार्मिक व अंत: धार्मिक समानता शामिल रहनी चाहिए।

प्रश्न 13.
धर्म निरपेक्षता के यूरोपीय मॉडल की विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
धर्म निरपेक्षता का यूरोपीय मॉडल- धर्म निरपेक्षता के यूरोपीय मॉडल की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित

  1. राज्य सत्ता धर्म के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी और धर्म राज्यसत्ता के मामलों में दखल नहीं देगा। दोनों के अपने अलग-अलग क्षेत्र हैं और अलग-अलग सीमाएँ हैं।
  2. राज्य किसी धार्मिक संस्था को मदद नहीं देगा। वह धार्मिक समुदायों द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थाओं को वित्तीय सहयोग नहीं देगा।
  3. जब तक धार्मिक समुदायों की गतिविधियाँ देश के कानून द्वारा निर्मित व्यापक सीमा के अन्दर होती हैं, वह इन गतिविधियों में व्यवधान पैदा नहीं कर सकता।
  4. पश्चिमी धर्म निरपेक्षता स्वतंत्रता और समानता की व्यक्तिवादी ढंग से व्याख्या करती है। यह व्यक्तियों की स्वतंत्रता और समानता के अधिकारों की बात करती है। इसमें समुदाय आधारित अधिकारों अथवा अल्पसंख्यक अधिकारों की कोई गुंजाइश नहीं है।
  5. इसमें राज्य समर्थित धार्मिक सुधार के लिए कोई जगह नहीं है।

प्रश्न 14.
भारतीय राज्य धर्म और राज्य के बीच पूरी तरह सम्बन्ध विच्छेद किये बिना अपनी धर्म निरपेक्षता का दावा किस आधार पर करती है? भारतीय धर्म निरपेक्षता में धर्म और राज्यसत्ता के मध्य सम्बन्धों के स्वरूप को स्पष्ट कीजिए।
अथवा.
धर्म निरपेक्षता के भारतीय मॉडल को समझाइये।
अथवा
भारतीय धर्म निरपेक्षता की विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:
भारतीय धर्म निरपेक्षता का स्वरूप: भारतीय राज्य का धर्म निरपेक्ष चरित्र वस्तुतः इसी वजह से बरकरार है कि वह न तो धर्मतांत्रिक है और न किसी धर्म को राजधर्म मानता है। इस सिद्धान्त को मानते हुए इसने विभिन्न धर्मों व पंथों के बीच समानता हासिल करने के लिए परिष्कृत नीति अपनायी है। इसी नीति के चलते वह अमेरिका शैली में धर्म से विलग भी हो सकता है या जरूरत पड़ने पर उसके साथ सम्बन्ध भी बना सकता है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. धर्म के साथ निषेधात्मक सम्बन्ध: भारतीय राज्य धार्मिक अत्याचार का विरोध करने हेतु धर्म के साथ निषेधात्मक सम्बन्ध भी बना सकता है। यह बात अस्पृश्यता पर प्रतिबंध जैसी कार्यवाहियों में झलकती है।
  2. धर्म के साथ जुड़ाव के सम्बन्ध: भारतीय राज्य धर्म के साथ जुड़ाव की सकारात्मक विधि भी चुन सकता है। इसीलिए संविधान तमाम धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपनी खुद की शिक्षण संस्थाएँ खोलने और चलाने का अधिकार देता है जिन्हें राज्य सत्ता की ओर से सहायता भी मिल सकती है।
  3. शांति, स्वतंत्रता और समानता पर बल: भारतीय राज्य शांति, स्वतंत्रता और समानता के मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए वह धर्म के साथ निषेधात्मक सम्बन्ध बनाने या जुड़ाव के सम्बन्ध बनाने की कोई भी रणनीति अपना सकता है।
  4. सैद्धान्तिक हस्तक्षेप की अनुमति: भारतीय धर्म निरपेक्षता तमाम धर्मों में सैद्धान्तिक हस्तक्षेप की अनुमति देती है। ऐसा हस्तक्षेप हर धर्म के कुछ खास पहलुओं के प्रति असम्मान प्रदर्शित करता है। जैसे धर्म के स्तर पर मान्य जातिगत विभाजन को अस्वीकार करना।

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प्रश्न 15.
धर्म निरपेक्ष राज्य की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
धर्म निरपेक्ष राज्य की विशेषताएँ। धर्म निरपेक्ष राज्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. धर्म निरपेक्ष राज्य में राज्य सत्ता और धर्म में पृथकता होती है। दोनों के अपने अलग-अलग कार्यक्षेत्र होते हैं।
  2. धर्म निरपेक्ष राज्य किसी विशेष धर्म को न तो राजकीय धर्म मानता है और न किसी विशेष धर्म को संरक्षण प्रदान करता है।
  3. धर्म निरपेक्ष राज्य में सभी धर्मों को कानून के समक्ष समान समझा जाता है। किसी धर्म का दूसरे धर्म पर वर्चस्व स्थापित नहीं होता और न ही राज्य दूसरे धर्मों की तुलना में किसी विशेष धर्म को प्राथमिकता देता है।
  4. धर्म निरपेक्ष राज्य के लोग धार्मिक स्वतंत्रता का उपभोग करते हैं। किसी व्यक्ति पर किसी विशेष धर्म को लादा नहीं जाता। प्रत्येक व्यक्ति को यह स्वतंत्रता दी जाती है कि वह किसी भी धर्म को माने और पूजा की कोई भी विधि अपना सकता है।
  5. सामान्यतः राज्य तब तक लोगों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता जब तक कि किसी धार्मिक समुदाय की गतिविधि या धार्मिक संस्थाएँ कानून के विरुद्ध कार्य न करें तथा शांति व्यवस्था की समस्या खड़ी न करें।
  6. राज्य समाज में व्याप्त विविध धर्मों के बीच कोई भेदभाव नहीं करता है।
  7. राज्य धर्म के आधार पर सरकारी सेवाओं में अवसरों को प्रदान करने तथा अधिकार प्रदान करने के सम्बन्ध में व्यक्तियों के बीच कोई भेदभावपूर्ण कानून नहीं बना सकता है।
  8. धर्म निरपेक्ष राज्य में व्यक्ति को एक नागरिक होने के नाते अधिकार प्रदान किये जाते हैं, न कि किसी धार्मिक समुदाय का सदस्य होने के नाते।

प्रश्न 16.
भारत में राजपत्रित अवकाशों की सूची को ध्यान से पढ़ें। क्या यह भारत में धर्म निरपेक्षता का उदाहरण प्रस्तुत करती है? तर्क प्रस्तुत करें।
उत्तर:

  1. भारत में उपर्युक्त राजपत्रित अवकाशों की सूची में सभी धर्मों – हिन्दू, इस्लाम, ईसाई, सिक्ख, जैन तथा बौद्ध धर्मों के प्रमुख त्यौहारों को छुट्टी प्रदान कर प्रत्येक धर्मावलम्बी को अपना त्यौहार स्वतंत्रतापूर्वक मनाने का समान अवसर दिया गया है।
  2. दूसरे, सभी धर्मों के त्यौहारों पर सभी धर्मावलम्बियों को छुट्टी प्रदान की गई है ताकि सभी लोग एक-दूसरे के त्यौहारों में शरीक हो सकें। इस प्रकार सभी धर्मावलम्बियों को समान महत्त्व दिया गया है। यह भारतीय धर्म निरपेक्षता का स्पष्ट उदाहरण है।

प्रश्न 17.
धर्म निरपेक्षता के बारे में नेहरू के विचारों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
धर्म निरपेक्षता के बारे में नेहरू के विचार – नेहरू स्वयं किसी धर्म का अनुसरण नहीं करते थे। लेकिन उनके लिए धर्म निरपेक्षता का मतलब धर्म के प्रति विद्वेष नहीं था। उनके लिए धर्म निरपेक्षता का अर्थ था।

  1. सभी धर्मों को राज्य द्वारा समान संरक्षण।
  2. वे ऐसा धर्म निरपेक्ष राष्ट्र चाहते थे जो सभी धर्मों की हिफाजत करे, अन्य धर्मों की कीमत पर किसी एक धर्म की तरफदारी न करे और खुद किसी धर्म को राज्य धर्म के बतौर स्वीकार न करे।
  3. वे धर्म और राज्य के बीच पूर्ण सम्बन्ध विच्छेद के पक्ष में भी नहीं थे। उनके विचार के अनुसार, समाज में सुधार के लिए धर्मनिरपेक्ष राज्य सत्ता धर्म के मामले में हस्तक्षेप कर सकती है।
  4. उनके लिए धर्म निरपेक्षता का मतलब था तमाम किस्म की साम्प्रदायिकता का पूर्ण विरोध।
  5. उनके लिए धर्म निरपेक्षता सिद्धान्त का मामला भर नहीं था, वह भारत की एकता और अखंडता की एकमात्र गांरटी भी था। इसलिए बहुसंख्यक समुदाय की साम्प्रदायिकता की आलोचना में वे खास तौर पर कठोरता बरतते थे क्योंकि इससे राष्ट्रीय एकता पर खतरा उत्पन्न होता था।

प्रश्न 18.
धर्मों के बीच वर्चस्ववाद को दर्शाने वाले कोई तीन उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
धर्मों के बीच वर्चस्ववाद को दर्शाने वाले तीन उदाहरण निम्नलिखित हैं।

  1. 1984 में दिल्ली और देश के बाकी हिस्सों में लगभग चार हजार सिख मारे गये। पीड़ितों के परिवारजनों का मानना है कि दोषियों को आज तक सजा नहीं मिली है।
  2. हजारों कश्मीरी पंडितों को घाटी में अपना घर छोड़ने के लिए विवश किया गया। वे दो दशकों के बाद भी अपने घर नहीं लौट सके हैं।
  3. सन् 2002 में गुजरात में लगभग 2000 मुसलमान मारे गए। इन परिवारों के जीवित बचे हुए बहुत से सदस्य अभी भी अपने गाँव वापस नहीं जा सके हैं, जहाँ से वे उजाड़ दिए गए थे।
    इन सभी उदाहरणों में हर मामले में किसी एक धार्मिक समुदाय को लक्ष्य किया गया है और उसके लोगों को उनकी धार्मिक पहचान के कारण सताया गया है; उन्हें बुनियादी आजादी से वंचित किया गया है।

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प्रश्न 19.
अंतः धार्मिक वर्चस्व को सोदाहरण समझाइये। धर्म के अन्दर वर्चस्व को स्पष्ट कीजिये।
अथवा
उत्तर:

  1. एक ही धर्म के अन्दर एक वर्ग – विशेष का बोलबाला ( वर्चस्व ) होने की स्थिति अन्तः धार्मिक वर्चस्व की स्थिति कहलाती है।
  2. जब कोई धर्म एक संगठन में बदलता है तो आम तौर पर इसका सर्वाधिक रूढ़िवादी हिस्सा इस पर हावी हो जाता है जो किसी किस्म की असहमति बर्दाश्त नहीं करता। अमेरिका के कुछ हिस्सों में धार्मिक रूढ़िवाद बड़ी समस्या बन गया है जो देश के अन्दर भी शांति के लिए खतरा पैदा कर रहा है और बाहर भी । हिन्दू धर्म में कुछ तबके भेदभाव से स्थायी तौर पर पीड़ित रहे हैं। मसलन, दलितों को हिन्दू मंदिरों में प्रवेश से हमेशा रोका जाता है। देश के कुछ हिस्सों में हिन्दू महिलाओं का भी मंदिरों में प्रवेश वर्जित है।
  3. कई धर्म संप्रदायों में टूट जाते हैं और निरन्तर आपसी हिंसा और भिन्न मत रखने वाले अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न में लगे रहते हैं। उपर्युक्त तीनों ही उदाहरण धर्म के अन्दर वर्चस्व के हैं।

प्रश्न 20.
अल्पसंख्यकवाद से क्या आशय है? क्या भारत में अल्पसंख्यक अधिकारों को विशेषाधिकारों के रूप में देखा जाना चाहिए?
उत्तर:
अल्पसंख्यकवाद: भारतीय धर्मनिरपेक्षता की एक आलोचना अल्पसंख्यकवाद कहकर की जाती है। इसका आशय यह है कि भारतीय राज्य सत्ता अल्पसंख्यक अधिकारों की पैरवी करती है और उन्हें विशेष सुविधाएँ प्रदान करती है। इस प्रकार भारतीय धर्म निरपेक्षता धर्म के आधार पर भेदभाव करती है। लेकिन यह आलोचना त्रुटिपरक है। क्योंकि अपने महत्त्वपूर्ण हितों की पूर्ति किसी व्यक्ति का प्राथमिक अधिकार होता है और जो बात व्यक्तियों के लिए सही . है, वह समुदायों के लिए भी सही होगी।

इस आधार पर अल्पसंख्यकों के सर्वाधिक मौलिक हितों की क्षति नहीं होनी चाहिए और संवैधानिक कानून द्वारा उसकी हिफाजत की जानी चाहिए। भारतीय संविधान में ठीक इसी तरीके से इस पर विचार किया गया है। जिस हद तक अल्पसंख्यकों के अधिकार उनके मौलिक हितों की रक्षा करते हैं, उस हद तक वे न्यायसंगत हैं। अल्पसंख्यकों को जो विशेष अधिकार दिये जा रहे हैं, उसका उद्देश्य उन्हें समान अवसर प्रदान करने की विधान है, न कि उन्हें विशेष अधिकार देना। उनके लिए यह वैसे ही सम्मान और गरिमा से भरा बरताव है जो दूसरों के साथ किया जा रहा है। इसका मतलब यही है कि अल्पसंख्यक अधिकारों को विशेष सुविधा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय धर्म निरपेक्षता और पाश्चात्य धर्म निरपेक्षता में अन्तर स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
भारतीय धर्म निरपेक्षता और पश्चिमी धर्म निरपेक्षता में अन्तर – यद्यपि सभी धर्म निरपेक्ष राज्यों में कुछ विशेषताएँ कॉमन होती हैं जैसे-

  1. राज्य धर्म पर आधारित नहीं है।
  2. राज्य किसी विशेष धर्म को न तो अंगीकर करता है और न उसे स्थापित करता है तथा
  3. राज्य और धर्म में पृथकता होती है।

लेकिन राज्य धर्म से किस सीमा तक दूरी रखता है, यह प्रत्येक धर्म निरपेक्ष राज्य में भिन्न-भिन्न होता है। भारतीय धर्म निरपेक्ष मॉडल और अमेरिकी मॉडल पर आधारित पाश्चात्य धर्म निरपेक्ष मॉडल में प्रमुख अन्तर निम्नलिखित हैं।

1. धर्म और राज्य सत्ता की पृथकता:
पाश्चात्य धर्म निरपेक्षता के अन्तर्गत राज्य और धर्म के बीच पूर्ण पृथकता है। इस विच्छेद को पारस्पिक निषेध के रूप में समझा जाता है। इसका अर्थ है- राज्य सत्ता धर्म के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी और धर्म राज्य सत्ता के मामलों में दखल नहीं देगा। दोनों के अपने अलग-अलग कार्य व क्षेत्र हैं। राज्य सत्ता की कोई नीति पूर्णतः धार्मिक तर्क के आधार पर निर्मित नहीं हो सकती। लेकिन भारत में इस तरह की पूर्ण और पारस्परिक पृथकता नहीं है।

भारतीय राज्य सैद्धान्तिक दूरी की नीति का पालन करता है। इसी आधार पर राज्य ने हिन्दुओं में स्त्रियों और दलितों के शोषण का विरोध किया है। इसने भारतीय मुसलमानों अथवा ईसाइयों के अन्दर महिलाओं के प्रति भेदभाव तथा बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों के अधिकारों पर उत्पन्न किये जा सकने वाले खतरों का समान रूप से विरोध किया है।

2. धार्मिक संस्थाओं को सहायता:
पाश्चात्य, धर्म निरपेक्षता के अन्तर्गत, राज्य धार्मिक संस्थाओं को मदद नहीं दे सकता, वह धार्मिक समुदायों द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थाओं को वित्तीय सहयोग नहीं दे सकता। वे अपने कार्यों की व्यवस्था स्वयं के व्यक्तिगत प्रयासों से ही करते हैं। इसी के साथ-साथ राज्य धार्मिक संस्थाओं के कार्यों में तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकता, जब तक कि वे कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं के अन्तर्गत कार्य करती हैं।

लेकिन भारत में राज्य धार्मिक संस्थाओं को आर्थिक मदद देता है। वह धार्मिक समुदायों और अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं को आर्थिक सहयोग दे सकता है । यह उनके कार्यों में हस्तक्षेप कर सकता है और उनसे कुछ निश्चित नियमों तथा विनियमों को पालन करने के लिए कह सकता है।

3. धर्म की स्वतंत्रता:
पाश्चात्य धर्म निरपेक्षता स्वतंत्रता और समानता की व्यक्तिवादी ढंग से व्याख्या करती है। इसका अभिप्राय है कि राज्य केवल व्यक्तियों, नागरिकों के धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को ही मान्यता देता है। यह अल्पसंख्यक समुदायों के धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को मान्यता नहीं देता।

लेकिन भारत में राज्य न केवल व्यक्तियों, नागरिकों के धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को मान्यता देता है, बल्कि अल्पसंख्यक समुदायों के धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को भी मान्यता देता है। धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपनी स्वयं की संस्कृति और शैक्षिक संस्थाएँ कायम रखने का अधिकार है तथा वे शांतिपूर्ण ढंग से अपने धर्म का प्रचार भी कर सकती हैं।

4. राज्य समर्थित धार्मिक सुधार:
पाश्चात्य धर्म निरपेक्षता में राज्य समर्थित धार्मिक सुधार के लिए कोई गुंजाइश नहीं है क्योंकि यह राज्यसत्ता और धर्मसत्ता के बीच अटल विभाजन में विश्वास करती है। इसलिए राज्य धर्म के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। लेकिन भारतीय धर्मनिरपेक्षता राज्य समर्थित धार्मिक सुधारों की वकालत करती है तथा सैद्धान्तिक दूरी के सिद्धान्त को अपनाती है। इसीलिए भारतीय संविधान ने अस्पृश्यता पर प्रतिबंध लगाया है। भारतीय राज्य ने बाल विवाह के उन्मूलन और अन्तर्जातीय विवाह पर हिन्दू धर्म के द्वारा लगाए गए निषेध को खत्म करने हेतु कानून बनाए हैं।

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प्रश्न 2.
धर्म निरपेक्षवाद से क्या आशय है? इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:
धर्म निरपेक्षवाद का अर्थ: सामान्य अर्थ में धर्म निरपेक्षवाद एक ऐसा वातावरण है जहाँ कानून की दृष्टि में सभी धर्म समान हैं अर्थात् कानून सभी धर्मों के साथ समान रूप से व्यवहार करता है; लोग धार्मिक स्वतंत्रता का उपभोग करते हैं तथा जहाँ राज्य के प्रशासन और मानव जीवन के ऊपर किसी धर्म का वर्चस्व नहीं है। राज्य सत्ता और धर्म को अलग-अलग रखा जाता है और प्रशासन धार्मिक नियमों के अनुसार नहीं चलता बल्कि वह सरकार द्वारा पारित कानूनों के अनुसार चलता है। एक समाज जिसमें ऐसा वातावरण पाया जाता है, उसे धर्म निरपेक्ष समाज कहा जाता है और एक राज्य जिसमें ऐसा वातावरण पाया जाता है उसे धर्म निरपेक्ष राज्य कहा जाता है। धर्म निरपेक्षवाद की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं।

1. डोनाल्ड स्मिथ के शब्दों में, “धर्म निरपेक्ष राज्य वह राज्य है जिसके अन्तर्गत धर्म-विषयक, व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहती है, जो व्यक्ति के साथ व्यवहार करते समय धर्म को बीच में नहीं लाता है, जो संवैधानिक रूप से किसी धर्म से सम्बन्धित नहीं है और न किसी धर्म की उन्नति का प्रयत्न करता है और न ही किसी धर्म के मामले में हस्तक्षेप करता है। ”

2. श्री लक्ष्मीकांत मैत्र के अनुसार, ” धर्म निरपेक्ष राज्य से अभिप्राय यह है कि ऐसा राज्य धर्म या धार्मिक समुदाय के आधार पर किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई भेदभाव नहीं करता है। इसका अभिप्राय यह है कि राज्य की ओर से . किसी विशिष्ट धर्म को मान्यता प्राप्त नहीं होगी।” उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि धर्म निरपेक्ष राज्य से अभिप्राय एक ऐसे राज्य से है जिसका अपना कोई धर्म नहीं होता और जो धर्म के आधार पर व्यक्तियों में कोई भेदभाव नहीं करता। इसका अर्थ एक अधर्मी या धर्म विरोधी या नास्तिक राज्य से नहीं है बल्कि एक ऐसे राज्य से है जो धार्मिक मामलों में तटस्थ रहता है क्योंकि यह धर्म को व्यक्ति की निजी वस्तु मानता है।

धर्म निरपेक्षवाद की विशेषताएँ: धर्म निरपेक्षवाद की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।
1. धर्मों के बीच वर्चस्ववाद का विरोध;
धर्म निरपेक्षता को सर्वप्रमुख रूप से ऐसा सिद्धान्त समझा जाना चाहिए जो विभिन्न धर्मों के बीच किसी भी धर्म के वर्चस्ववाद का विरोध करता है अर्थात् यह अन्तर- धार्मिक वर्चस्व का विरोध करता है। यह समाज में विद्यमान विभिन्न धर्मों के बीच समानता पर बल देता है तथा सभी धर्मों की आजादी को बढ़ावा देता है। दूसरे शब्दों में

  • सभी धर्म समान स्तर पर आधारित हैं और समाज में उनके साथ समानता का व्यवहार किया जाता है।
  • दूसरे धर्मों पर किसी एक धर्म के वर्चस्व का यह विरोध करता है तथा वे एक-दूसरे को समान आदर देते हैं।
  • धर्म के आधार पर किसी व्यक्ति का दूसरों पर वर्चस्व नहीं होना चाहिए।

2. धर्म के अन्दर वर्चस्व का विरोध:
धर्म निरपेक्षता का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष है। धर्म के अन्दर छुपे वर्चस्व का विरोध करना अर्थात् अन्तः धार्मिक वर्चस्व का विरोध करना। जब कोई धर्म एक संगठन में बदलता है तो आम तौर पर इसका सर्वाधिक रूढ़िवादी हिस्सा इस पर हावी हो जाता है जो किसी किस्म की असहमति बर्दाश्त नहीं करता। अमेरिका के कुछ हिस्सों में धार्मिक रूढ़िवाद बड़ी समस्या बन गया है जो देश के अन्दर भी शांति के लिए खतरा पैदा कर रहा है. और बाहर भी।

हिन्दू धर्म में कुछ तबके भेदभाव से स्थायी रूप से पीड़ित रहे हैं। मसलन, दलितों को हिन्दू मन्दिरों में प्रवेश से रोका जाता रहा है। कई धर्म सम्प्रदायों में टूट जाते हैं और निरन्तर आपसी हिंसा तथा भिन्न मत रखने वाले अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न में लगे रहते हैं। ये स्थितियाँ धर्म के अन्दर वर्चस्ववाद की हैं। धर्म निरपेक्षवाद धर्म के अन्दर वर्चस्ववाद के सभी रूपों का विरोध करता है।

3. धर्म निरपेक्ष राज्य: धर्म निरपेक्षतावाद धर्म निरपेक्ष समाज के साथ-साथ धर्म निरपेक्ष राज्य का समर्थन करता है। धर्म निरपेक्ष राज्य की प्रमुख विशेषताएँ ये हैं।

  • राज्य सत्ता किसी खास धर्म के प्रमुखों द्वारा संचालित नहीं होनी चाहिए।
  • धार्मिक संस्थाओं और राज्य सत्ता की संस्थाओं के बीच सम्बन्ध विच्छेद अवश्य होना चाहिए।
  • राज्य सत्ता को किसी भी धर्म के साथ किसी भी तरह के औपचारिक कानूनी गठजोड़ से दूर रहना आवश्यक है।
  • राज्य सत्ता को शांति, धार्मिक स्वतंत्रता, धार्मिक उत्पीड़न, भेदभाव और वर्जना से आजादी, अन्तर-1 – धार्मिक समानता और अन्तः धार्मिक समानता के लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए।

4. अन्य विशेषताएँ: धर्म निरपेक्षवाद की निम्न अन्य प्रमुख विशेषताएँ बतायी जा सकती हैं।

  • राज्य को व्यक्तियों के धार्मिक मामलों में तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक कि उसकी गतिविधियाँ कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं के बाहर न हों, शांति व्यवस्था व देश की एकता व अखंडता के लिए खतरा न हों।
  • समाज में सभी व्यक्तियों को किसी भी धर्म को अपनाने, उसके प्रति विश्वास रखने तथा इच्छानुसार पूजा-पाठ करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

प्रश्न 3.
धर्म निरपेक्षता के भारतीय मॉडल की प्रमुख विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
धर्म निरपेक्षता का भारतीय मॉडल: भारतीय धर्म निरपेक्षता पश्चिमी धर्म निरपेक्षता से बुनियादी रूप से भिन्न है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित
1. अन्तर-धार्मिक समानता:
भारतीय धर्म निरपेक्षता केवल धर्म और राज्य के बीच सम्बन्ध विच्छेद पर बल नहीं देती है। यह अन्तर- धार्मिक समानता पर अधिक बल देती है। भारत में पहल से ही अन्तर- धार्मिक सहिष्णुता की संस्कृति मौजूद थी। पश्चिमी आधुनिकता के आगमन ने भारतीय चिंतन में समानता की अवधारणा को सतह पर ला दिया जिसने समुदाय के अन्दर समानता पर बल देने की ओर अग्रसर किया और अन्तर सामुदायिकता के विचार को उद्घाटित किया। इस प्रकार धार्मिक विविधता,

‘अन्तर – धार्मिक सहिष्णुता’ और ‘अन्तर – सामुदायिक समानता’ ने परस्पर अन्तःक्रिया कर भारतीय धर्म निरपेक्षता की ‘अन्तर- धार्मिक समानता’ की विशिष्टता को निर्मित किया। ‘ अन्तर- धार्मिक समानता’ की प्रमुख विशेषताओं को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है।

  • राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है और न ही वह किसी विशेष धर्म को औपचारिक रूप से बढ़ावा देगा अर्थात् भारतीय राज्य न तो धर्मतांत्रिक है और न ही वह किसी धर्म को राजधर्म मानता है।
  • राज्य की दृष्टि में सभी धर्म एकसमान हैं। वह सभी धर्मों को समान संरक्षण प्रदान करता है।
  • कानून की दृष्टि में सभी धर्मों के व्यक्ति समान हैं। धर्म के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाता है।
  • सरकारी नौकरियों या पदों पर नियुक्ति के सम्बन्ध में सब नागरिकों को समान अधिकार प्रदान किए गए हैं। सरकारी नौकरियों या पदों पर नियुक्ति के सम्बन्ध में धर्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता है।

2. व्यक्तियों तथा अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार: भारतीय धर्म निरपेक्षता का सम्बन्ध व्यक्तियों की धार्मिक आजादी के साथ-साथ अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक आजादी से भी है। इस विशेषता के अन्तर्गत निम्नलिखित बातों का समावेश किया गया है।

  • हर व्यक्ति को अपने पसंद का धर्म मानने तथा अपनी पसंद के अनुसार पूजा-पाठ करने की स्वतंत्रता है। प्रत्येक व्यक्ति को धर्म में विश्वास रखने, धार्मिक कार्य करने तथा प्रचार करने का अधिकार है; लेकिन यह स्वतंत्रता कानून के दायरे में रहते हुए प्राप्त है अर्थात् जब इस स्वतंत्रता का उपभोग करते हुए कोई व्यक्ति कानून एवं व्यवस्था व नैतिकता को खतरे में डालेगा तो राज्य उसकी इस स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगा सकता है।
  • धार्मिक अल्पसंख्यकों को भीं अपनी खुद की संस्कृति और शैक्षिक संस्थाएँ कायम रखने का अधिकार है। सभी धर्मों को दान द्वारा इकट्ठे किये गए धन से संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार है। सभी धर्मों के लोगों को अपने धर्म सम्बन्धी मामलों का प्रबन्ध करने का अधिकार है और वे चल तथा अचल सम्पत्ति प्राप्त कर सकते हैं।
  • सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपनी इच्छानुसार शिक्षा संस्थाओं की स्थापना करने एवं उनका प्रबन्ध करने का अधिकार है।
  • सरकार शिक्षा संस्थाओं को अनुदान देते समय धर्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगी। किसी भी नागरिक को राज्य द्वारा या उसकी सहायता से चलाई जाने वाली शिक्षा संस्था में प्रवेश देने से धर्म के आधार पर इनकार नहीं किया जायेगा।

3. राज्य समर्थित धार्मिक सुधा: भारतीय धर्म निरपेक्षता में राज्य समर्थित धार्मिक सुधार की काफी गुंजाइश है और अनुकूलता भी। इसीलिए भारतीय संविधान ने अस्पृश्यता पर प्रतिबंध लगाया है। भारतीय राज्य ने बाल-विवाह के उन्मूलन और अन्तर्जातीय विवाह पर हिन्दू धर्म द्वारा लगाए निषेध को खत्म करने हेतु अनेक कानून बनाए हैं।

4. धर्मों में राज्यसत्ता के सैद्धान्तिक हस्तक्षेप की अनुमति: भारतीय राज्यसत्ता ने धार्मिक समानता हासिल क़रने के लिए अत्यन्त परिष्कृत नीति अपनाई है। इसी नीति के चलते व अमेरिकी शैली में धर्म से पृथक् भी हो सकती है और आवश्यकता पड़ने पर उसके साथ सम्बन्ध भी बना सकती है। यथा

  • भारतीय राज्य धार्मिक अत्याचार का विरोध करने हेतु धर्म के साथ निषेधात्मक सम्बन्ध भी बना सकता है। यह बात अस्पृश्यता पर प्रतिबन्ध जैसी कार्यवाहियों में झलकती है।
  • भारतीय राज्य धर्मों से जुड़ाव की सकारात्मक विधि भी अपना सकता है। इसीलिए, भारतीय संविधान तमाम धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपने खुद की शिक्षण संस्थाएँ खोलने और चलाने का अधिकार देता है जिन्हें राज्य सत्ता की ओर से सहायता भी मिल सकती है।

शांति, स्वतंत्रता और समानता के मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए भारतीय राज्य सत्ता ये तमाम जटिल रणनीतियाँ अपना सकती है। इस प्रकार भारतीय धर्म निरपेक्षता तमाम धर्मों में राज्य सत्ता के सैद्धान्तिक हस्तक्षेप की अनुमति देती है । ऐसा हस्तक्षेप हर धर्म के कुछ खास पहलुओं के प्रति असम्मान प्रदर्शित करता है तथा यह संगठित धर्मों के कुछ पहलुओं के प्रति एक जैसा सम्मान दर्शाने की अनुमति भी देता है ।

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 8 धर्मनिरपेक्षता

प्रश्न 4.
भारतीय धर्म निरपेक्षता की आलोचना किन आधारों पर की जाती है? विवेचना कीजिये।
उत्तर:
भारतीय धर्म निरपेक्षता की आलोचनाएँ: भारतीय धर्म निरपेक्षता की निम्नलिखित आलोचनाएँ की जाती हैं।
1. धर्म विरोधी:
भारतीय धर्म निरपेक्षता की एक प्रमुख आलोचना यह की जाती है कि यह धर्म विरोधी है। इसके समर्थन में आलोचक निम्नलिखित तर्क देते हैं।

  1. यह संस्थाबद्ध धार्मिक वर्चस्व का विरोध करती है।
  2. यह धार्मिक पहचान के लिए खतरा पैदा करती है।

लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि ‘संस्थाबद्ध धार्मिक वर्चस्व का विरोध’ धर्म विरोधी होने का पर्याय नहीं है। दूसरे यह धार्मिक स्वतंत्रता और समानता को बढ़ावा देती है। इसलिए यह धार्मिक पहचान को खतरा पैदा करने के स्थान पर उसकी हिफाजत करती है। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय धर्म निरपेक्षता की धर्म विरोधी होने की आलोचना निराधार है। हाँ, यह धार्मिक पहचान के मतांध, हिंसक, दुराग्रही और अन्य धर्मों के प्रति घृणा उत्पन्न करने वाले रूपों पर अवश्य चोट करती है।

2. पश्चिम से आयातित:
भारतीय धर्म निरपेक्षता की दूसरी आलोचना यह है कि यह ईसाइयत से जुड़ी हुई है अर्थात् पश्चिमी चीज है और इसीलिए भारतीय परिस्थितियों के लिए अनुपयुक्त है।
धर्म और राज्य का पारस्परिक निषेध जिसे पश्चिमी धर्म निरपेक्ष समाजों का आदर्श माना जाता है; भारतीय धर्म निरपेक्ष राज्य सत्ता की प्रमुख विशेषता नहीं है। भारतीय धर्म निरपेक्ष राज्य सत्ता समुदायों के बीच शांति को बढ़ावा देने के लिए धर्म से सैद्धान्तिक दूरी बनाए रखने की नीति पर चलती है और खास समुदायों की रक्षा के लिए वह उनमें हस्तक्षेप भी कर सकती है।

इस प्रकार यह धर्म निरपेक्षता न तो पूरी तरह से ईसाइयत से जुड़ी है और न शुद्ध पश्चिम से आयातित है, बल्कि यह पश्चिमी और गैर-पश्चिमी दोनों की अन्तःक्रिया से उपजी है जो भारतीय परिस्थितियों के लिए सर्वथा उपयुक्त है। अतः पश्चिम से आयातित होने की आलोचना भी निराधार है।

3. अल्पसंख्यकवाद:
भारतीय धर्म निरपेक्षता पर अल्पसंख्यकवाद का आरोप इस आधार पर मढ़ा जाता है कि यह अल्पसंख्यक अधिकारों की पैरवी करती है। लेकिन ये अल्पसंख्यक अधिकार, उनके विशेषाधिकार नहीं हैं, बल्कि उनके मौलिक हितों की रक्षा करने तक ही सीमित हैं। ये अधिकार अल्पसंख्यक धर्म वालों को वैसा ही सम्मान और गरिमा भरा बरताव प्रदान करने के लिए हैं जैसा कि दूसरों के साथ किया जा रहा है। अतः अल्पसंख्यक अधिकारों को विशेष सुविधाओं के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इस प्रकार भारतीय धर्म निरपेक्षता की अल्पसंख्यकवाद होने की आलोचना भी निराधार है।

4. अतिशय हस्तक्षेपकारी:
एक अन्य आलोचना यह की जाती है कि भारतीय धर्म निरपेक्षता उत्पीड़नकारी है और समुदायों की धार्मिक स्वतंत्रता में अतिशय हस्तक्षेप करती है। लेकिन यह भारतीय धर्म निरपेक्षता के बारे में गलत समझ है। यद्यपि यह सही है कि भारतीय धर्म निरपेक्षता धर्म और राज्य के पूर्ण सम्बन्ध विच्छेद के विचार को नहीं स्वीकार करती है और सैद्धान्तिक हस्तक्षेप को मानती है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि यह अतिशय हस्तक्षेपकारी व उत्पीड़नकारी है। यह भी सही है कि भारतीय धर्म निरपेक्षता राज्य सत्ता समर्थित धार्मिक सुधार की इजाजत देती है। लेकिन इसे उत्पीड़नकारी हस्तक्षेप के समान नहीं माना जा सकता। यह धर्म के विकास के लिए है, न कि धर्म के उत्पीड़न के लिए।

5. वोट बैंक की राजनीति:
एक आलोचना यह की जाती हैं कि भारतीय धर्म निरपेक्षता वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा देती है। अनुभवजन्य राजनीति के दावे के रूप में यह पूर्णतः असत्य भी नहीं है। लेकिन लोकतंत्र में राजनेताओं के लिए वोट पाना जरूरी है। यह उनके काम का अंग है और लोकतांत्रिक राजनीति बड़ी हद तक ऐसी ही है। लोगों के किसी समूह के पीछे लगने या उनका वोट पाने की खातिर कोई नीति बनाने का वादा करने के लिए राजनेताओं को दोष देना उचित नहीं है। यदि अल्पसंख्यकों का वोट पाने वाले धर्म निरपेक्ष राजनेता उनकी मांग पूरी करने में समर्थ होते हैं, तो यह धर्म निरपेक्षता की सफलता होगी, क्योंकि धर्म निरपेक्षता अल्पसंख्यकों के हितों की भी रक्षा करती है।

6. एक असंभव परियोजना:
भारतीय धर्म निरपेक्षता की एक अन्य आलोचना यह की जाती है कि यह एक ऐसी समस्या का हल ढूँढ़ना चाहती है जिसका समाधान है ही नहीं। यह समस्या है। गहरे धार्मिक मतभेद वाले लोग कभी भी एक साथ शांति से नहीं रह सकते। लेकिन यह आलोचना त्रुटिपरक है क्योंकि भारतीय सभ्यता का इतिहास दिखाता है कि इस तरह साथ-साथ रहना बिल्कुल संभव है। ऑटोमन साम्राज्य इसका स्पष्ट उदाहरण है। इसके प्रत्युत्तर में आलोचक यह तर्क दे सकते हैं कि आज ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि अब समानता लगातार प्रभावी सांस्कृतिक मूल्य बनती जा रही है। इसके प्रत्युत्तर में यह कहा जा सकता है कि भारतीय धर्म निरपेक्षता एक असंभव परियोजना का अनुसरण नहीं वरन् भविष्य की दुनिया को प्रतिबिंब प्रस्तुत करना है।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 14 प्राकृतिक सम्पदा

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JAC Board Class 9 Science Notes Chapter 14 प्राकृतिक सम्पदा

→ पृथ्वी पर जीवन मृदा, वायु, जल तथा सूर्य से प्राप्त ऊर्जा जैसी सम्पदाओं पर निर्भर करता है।

→ स्थल और जलाशयों के ऊपर विषम रूप में वायु के गर्म होने के कारण पवनें उत्पन्न होती हैं।

→ जलाशयों से होने वाले जल का वाष्पीकरण तथा संघनन हमें वर्षा प्रदान करता है।

→ किसी क्षेत्र में पहले से विद्यमान वायु के रूप पर होने वाली वर्षा का पैटर्न निर्भर करता है।

→ विभिन्न प्रकार के पोषक तत्व चक्रीय रूपों में पुनः उपयोग किये जाते हैं जिसके कारण जैवमण्डल के विभिन्न घटकों में एक निश्चित सन्तुलन स्थापित होता है।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 14 प्राकृतिक सम्पदा

→ वायु, जल तथा मृदा का प्रदूषण जीवन की गुणवत्ता और जैव विविधताओं को हानि पहुँचाता है।

→ हमें अपनी प्राकृतिक सम्पदाओं को सुरक्षित रखने की आवश्यकता है और उन्हें संपोषणीय रूपों में उपयोग करने की आवश्यकता है।

→ पृथ्वी की सबसे बाहरी परत को स्थलमण्डल कहते हैं।

→ पृथ्वी के 75% भाग पर जल है। इसे जलमण्डल कहते हैं।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 14 प्राकृतिक सम्पदा

→ वायु जो पूरी पृथ्वी को कम्बल के समान ढके रहती है, उसे वायुमण्डल कहते हैं।

→ जीवन को आश्रय देने वाला पृथ्वी का वायुमण्डल, स्थलमण्डल तथा जलमण्डल एक-दूसरे से मिलकर जीवन को सम्भव बनाते हैं, उसे जीवमण्डल कहते हैं।

→ सजीव जीवमण्डल के जैविक घटक को बनाते हैं तथा वायु, जल और मृदा जीवमण्डल के निर्जीव घटक हैं।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 13 हम बीमार क्यों होते हैं

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JAC Board Class 9 Science Notes Chapter 13 हम बीमार क्यों होते हैं

→ स्वास्थ्य व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक जीवन की एक समग्र समन्वयित अवस्था है।

→ किसी का स्वास्थ्य उसके भौतिक पर्यावरण तथा आर्थिक अवस्था पर निर्भर करता है।

→ रोगों की अवधि के आधार पर इसे तीव्र तथा दीर्घकालिक दो वर्गों में विभाजित कर सकते हैं।

→ रोगों के कारक संक्रामक अथवा असंक्रामक हो सकते हैं।

→ संक्रामक कारक जीवों के विभिन्न वर्ग से हो सकते हैं। ये एककोशिकीय सूक्ष्म जीव अथवा बहुकोशिकीय हो सकते हैं।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 13 हम बीमार क्यों होते हैं

→ रोग का उपचार उसके कारक रोगाणु के वर्ग के आधार पर किया जाता है।

→ संक्रामक कारक वायु, जल, शारीरिक सम्पर्क अथवा रोगवाहक द्वारा फैलते हैं।

→ रोगों का निवारण सफल उपचार की अपेक्षा अच्छा है।

→ संक्रामक रोगों का निवारण जन स्वास्थ्य स्वच्छता विधियों द्वारा किया जा सकता है जिससे संक्रामक कारक कम हो जाते हैं।

→ टीकाकरण द्वारा संक्रामक रोगों का निवारण किया जा सकता है।

→ संक्रामक रोगों के निवारण को प्रभावशाली बनाने के लिए आवश्यक है कि सार्वजनिक स्वच्छता तथा टीकाकरण की सुविधा सभी को उपलब्ध हो।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 12 ध्वनि

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JAC Board Class 9 Science Notes Chapter 12 ध्वनि

→ किसी कण की वह गति जो एक निश्चित समय के बाद बार-बार दोहराई जाती है, आवर्ती गति कहलाती है।

→ किसी कण द्वारा सरल रेखा में एक निश्चित बिन्दु के इधर-उधर आवर्ती गति हो रही हो तो यह गति काम्पनिक गति या दोलनी गति कहलाती है।

→ माध्यम में कणों के कम्पनों के अनुसार तरंगें दो प्रकार की होती हैं-

  • अनुप्रस्थ तरंगें
  • अनुदैध्र्य तरंगें।

→ ध्वनि विभिन्न वस्तुओं के कंपन करने के कारण उत्पन्न होती है तथा ध्वनि तरंगें, अनुदैध्र्य तरंगें होती हैं।

→ ध्वनि माध्यम में क्रमागत संपीडनों तथा विरलनों के रूप में संचरित होती है।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 12 ध्वनि

→ ध्वनि तरंगों में दो क्रमागत संपीडनों या दो क्रमागत विरलनों के बीच की दूरी तरंगदैर्ध्य कहलाती है। इसे λ से प्रदर्शित करते हैं।

→ तरंग द्वारा माध्यम के घनत्व के एक संपूर्ण दोलन में लिए गए समय को आवर्तकाल T कहते हैं।

→ एकांक समय में दोलनों की कुल संख्या को आवृत्ति (v) कहते हैं। v = \(\frac { 1 }{ T }\)

→ तरंग की चाल, उसकी आवृत्ति तथा तरंगदैर्ध्य के गुणनफल के बराबर होती है, अर्थात् v = v λ

→ किसी एकांक क्षेत्रफल से 1 सेकंड में गुजरने वाली ध्वनि ऊर्जा को ध्वनि की तीव्रता कहते हैं।

→ ध्वनि की चाल मुख्यतः संचरित होने वाले माध्यम की प्रकृति तथा ताप पर निर्भर करती है।

→ ध्वनि के आपतित होने की दिशा तथा परावर्तित होने की दिशा, परावर्तक सतह पर खींचे गए अभिलंब से समान कोण बनाते हैं और तीनों एक ही तल में होते हैं।

→ स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनने के लिए मूल ध्वनि एवं परावर्तित ध्वनि के बीच कम से कम 0.1 s का समय अंतराल अवश्य होना चाहिए।

→ ध्वनि के तीन अभिलक्षण होते हैं-

  • तारत्व
  • प्रबलता
  • गुणता।

→ मानव में ध्वनि की श्रव्यता की आवृत्तियों का औसत परास 20 हर्ट्ज से 20 किलो हर्ट्ज होता है।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 12 ध्वनि

→ 20 हर्ट्ज से कम आवृत्ति की ध्वनियों को अवश्रव्य ध्वनि तथा 20 किलोहर्ट्ज से अधिक आवृत्ति की ध्वनि को पराश्रव्य ध्वनि कहते हैं।

→ पराध्वनि के चिकित्सा तथा प्रौद्योगिक क्षेत्रों में अनेक उपयोग हैं।

→ सोनार एक ऐसी युक्ति है जिसका प्रयोग समुद्र की गहराई नापने, समुद्र की गहराई में किसी अदृश्य वस्तु की उपस्थिति का पता लगाने में किया जाता है।

→ सोनार में पराश्रव्य तरंगों का प्रयोग किया जाता है।

→ एकल आवृत्ति की ध्वनि को टोन कहते हैं तथा अनेक आवृत्तियों के मिश्रण से उत्पन्न ध्वनि को स्वर (Node) कहते हैं।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 11 कार्य तथा ऊर्जा

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JAC Board Class 9th Science Notes Chapter 11  कार्य तथा ऊर्जा

→ यदि किसी वस्तु पर बल लगाने पर वह बल की दिशा में विस्थापित हो जाये, तो यह बल द्वारा वस्तु पर कार्य कहा जाता है।

→ यदि बल लगाने पर वस्तु में विस्थापन न हो तो बल द्वारा किया गया कार्य शून्य होगा।

→ किसी पिण्ड पर किया गया कार्य, उस पर लगाये गये बल के परिमाण तथा बल की दिशा में उसके द्वारा तय की गई। दूरी के गुणन के बराबर होता है। कार्य धनात्मक तथा ऋणात्मक दो प्रकार का हो सकता है।

→ यदि वस्तु के विस्थापन s की दिशा, बल F की दिशा से 6 कोण बनाती है तो बल द्वारा वस्तु पर किया गया कार्य निम्नलिखित सूत्र द्वारा प्राप्त होता है-
W = Fs cosθ

JAC Class 9 Science Notes Chapter 11 कार्य तथा ऊर्जा

→ कार्य का मात्रक जूल है।

→ किसी वस्तु के कार्य करने की कुल क्षमता को उसकी ऊर्जा कहते हैं। ऊर्जा दो प्रकार की होती है- (i) गतिज ऊर्जा। (ii) स्थितिज ऊर्जा।

→ किसी गतिमान वस्तु में उसकी गति के कारण निहित ऊर्जा को गतिज ऊर्जा कहते हैं। यदि m द्रव्यमान की वस्तु v वेग से गतिमान हो तब गतिज ऊर्जा E = mv2

→ किसी गतिमान वस्तु की गतिज ऊर्जा, उसे विरामावस्था से गति की वर्तमान अवस्था तक लाने में किए गए कार्य के बराबर होती है।

→ यदि mm द्रव्यमान की वस्तु पर F बल लगाकर उसे बल की दिशा में दूरी विस्थापित करने में वस्तु का वेग u से बदलकर हो जाता है तब
\(\frac { 1 }{ 2 }\)m (v² – u² ) = F x s

→ किसी वस्तु की स्थिति विशेष के कारण उसके पास जो ऊर्जा होती है, उसे वस्तु की स्थितिज ऊर्जा कहते हैं।

→ गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा U = mgh सूत्र से दी जाती है।

→ सभी प्रकार की ऊर्जाओं का मात्रक जूल है।

→ ऊर्जा संरक्षण के नियमानुसार “ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकतं है और न ही नष्ट की जा सकती है। ऊर्जा केवल एक रूप से दूसरे रूप में रूपान्तरित होती रहती है। ऊर्जा रूपान्तरण के दौरान निकाय की कुल ऊर्जा नियत रहती है।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 11 कार्य तथा ऊर्जा

→ गुरुत्वीय त्वरण के अन्तर्गत गिरती हुई वस्तु की गतिज ऊर्जा तथा स्थितिज ऊर्जा का योग पथ के प्रत्येक बिन्दु पर नियत रहता है।

→ किसी वस्तु के कार्य करने की समय दर को उसकी शक्ति कहते हैं। इसे P से प्रदर्शित करते हैं। इसका मात्रक जूल / सेकण्ड अथवा वाट है।
P = \(\frac { W }{ t }\) जहाँ W = किया गया कार्य तथा समय है।

→ यदि कोई कर्ता (एजेंट) एक जूल प्रति सेकण्ड की दर से कार्य करता है तो उसकी शक्ति 1 वाट होती है।

→ शक्ति के अन्य मात्रक किलोवाट तथा अश्वशक्ति हैं।

  • 1 किलोवाट – 1000 वाट
  • 1 अश्वशक्ति – 746 वाट

→ ऊर्जा का व्यावसायिक मात्रक किलोवॉट घण्टा (kWh ) है जिसे सामान्य बोलचाल की भाषा में यूनिट कहते हैं।

→ 1 kW की दर से एक घंटे में व्यय हुई ऊर्जा एक किलोवाट घंटा (1 kWh ) के बराबर होती है।

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 7 संघवाद 

Jharkhand Board JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 7 संघवाद Important Questions and Answers.

JAC Board Class 11 Political Science Important Questions Chapter 7 संघवाद

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. आजादी के समय देश में अधिकांश प्रांत ऐसे थे जिन्हें अंग्रेजों ने गठित किया था
(क) सामान्य भाषा के आधार पर
(ख) सामान्य आर्थिक हित के आधार पर
(ग) सामान्य क्षेत्र के आधार पर
(घ) प्रशासनिक सुविधा के आधार पर
उत्तर:
(घ) प्रशासनिक सुविधा के आधार पर

2. इस समय भारत संघ में कुल राज्य हैं।
(क) 14
(ख) 16
(ग) 25
(घ) 28
उत्तर:
(घ) 28

3. निम्नलिखित में जो संघात्मक शासन प्रणाली की विशेषता नहीं है, वह है।
(क) शक्तियों का विभाजन
(ख) संविधान की सर्वोच्चता
(ग) इकहरी नागरिकता
(घ) न्यायपालिका की स्वतंत्रता
उत्तर:
(ग) इकहरी नागरिकता

4. भारतीय संविधान निर्माताओं को संघात्मक व्यवस्था में एक सशक्त केन्द्रीय सरकार बनाने की प्रेरणा दी।
(क) विघटनकारी प्रवृत्तियों पर अंकुश रखने के लिए
(ख) राष्ट्रीय एकता की स्थापना के लिए
(ग) विकास की चिंताओं ने
(घ) उपर्युक्त सभी ने
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी ने

5. भारत के राज्यों में राज्यपाल की नियुक्ति की जाती है।
(क) राष्ट्रपति द्वारा
(ख) मुख्यमंत्री द्वारा
(ग) लोकसभा अध्यक्ष द्वारा
(घ) गृहमंत्री द्वारा।
उत्तर:
(क) राष्ट्रपति द्वारा

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 7 संघवाद 

6. केन्द्र-राज्य सम्बन्धों से जुड़े मसलों की पड़ताल के लिए केन्द्र सरकार द्वारा 1983 में एक आयोग बनाया गया। इस आयोग को जाना जाता है।
(क) योजना आयोग के नाम से
(ख) सरकारिया आयोग के नाम से
(ग) अन्तर्राज्यीय आयोग के नाम से
(घ) लोक सेवा आयोग के नाम से
उत्तर:
(ख) सरकारिया आयोग के नाम से

7. संघीय व्यवस्था में दो या दो से अधिक राज्यों में आपसी विवाद को कहा जाता है।
(क) केन्द्र-राज्य विवाद
(ख) अन्तर्राष्ट्रीय विवाद
(ग) अन्तर्राज्यीय विवाद
(घ) आन्तरिक विवाद
उत्तर:
(ग) अन्तर्राज्यीय विवाद

8. संविधान के अनुच्छेद 370 के द्वारा भारत संघ के किस राज्य को विशिष्ट स्थिति प्रदान की गई थी।
(क) बिहार राज्य को
(ख) उत्तरांचल राज्य को
(ग) जम्मू-कश्मीर राज्य को
(घ) अरुणाचल राज्य को
उत्तर:
(ग) जम्मू-कश्मीर राज्य को

9. भारत में महाराष्ट्र में कौनसा क्षेत्र अभी भी अलग राज्य के लिए संघर्ष कर रहा है।
(क) तेलंगाना क्षेत्र
(ख) विदर्भ क्षेत्र
(ग) उत्तरांचल क्षेत्र
(घ) झारखंड क्षेत्र
उत्तर:
(ख) विदर्भ क्षेत्र

10. वर्तमान में तेलंगाना क्षेत्र एक अलग राज्य है। यह राज्य निम्न में से किस राज्य से अलग होकर बना है-
(क) महाराष्ट्र
(ख) तमिलनाडु
(ग) तेलगूदेशम
(घ) कर्नाटक
उत्तर:
(ग) तेलगूदेशम

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. सोवियत संघ के विघटन के प्रमुख कारण वहाँ शक्तियों का जमाव और अत्यधिक …………………. की प्रवृत्तियाँ थीं।
उत्तर:
केन्द्रीकरण

2. संघीय शासन व्यवस्था में केन्द्र-राज्यों के मध्य किसी टकराव को रोकने के लिए एक ………………….. की व्यवस्था होती है।
उत्तर:
स्वतंत्र न्यायपालिका

3. भारतीय संविधान द्वारा अंगीकृत संघीय व्यवस्था का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त यह है कि केन्द्र और राज्यों के बीच सम्बन्ध ……………….. पर आधारित होंगे।
उत्तर:
सहयोग

4. भारतीय संविधान द्वारा एक सशक्त ………………… की स्थापना की गई है।
उत्तर:
केन्द्रीय सरकार

5. हमारी प्रशासकीय व्यवस्था ………………… है।
उत्तर:
इकहरी

निम्नलिखित में से सत्य / असत्य कथन छाँटिये-

1. राज्यपाल की भूमिका केन्द्र और राज्यों के बीच हमेशा ही विवाद का विषय रही है।
उत्तर:
सत्य

2. हमारी संघीय व्यवस्था में नवीन राज्यों के गठन की माँग को लेकर भी तनाव रहा है।
उत्तर:
सत्य

3. दिसम्बर, 1950 में राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना की गई।
उत्तर:
असत्य

4. कृषि तथा पुलिस समवर्ती सूची के विषय हैं।
उत्तर:
असत्य

5. हमारे राष्ट्रीय नेताओं ने भारत को विविधता में एकता के रूप में परिभाषित किया है।
उत्तर:
सत्य

निम्नलिखित स्तंभों के सही जोड़े बनाइये

1. प्रतिरक्षा तथा विदेश मामले(क) राज्य सूची के विषय
2. शिक्षा तथा वन(ग) दिसम्बर, 1953 में
3. पुलिस तथा स्थानीय स्वशासन(ख) समवर्ती सूची के विषय
4. राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना(घ) 1956 में
5. भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन(च) संघ सूची के विषय

उत्तर:

1. प्रतिरक्षा तथा विदेश मामले(च) संघ सूची के विषय
2. शिक्षा तथा वन(ख) समवर्ती सूची के विषय
3. पुलिस तथा स्थानीय स्वशासन(क) राज्य सूची के विषय
4. राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना(ग) दिसम्बर, 1953 में
5. भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन(घ) 1956 में

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1
ऐसे चार राज्यों के नाम लिखिये जिनके नाम स्वतंत्रता के बाद परिवर्तित किये गये हैं। पुराने और नये दोनों नाम लिखिये।
उत्तर:
निम्नलिखित राज्यों के नाम परिवर्तित किये गए हैं।

पुराने नामनए नाम
(1) मैसूरकर्नाटक
(2) मद्रासतमिलनाडु
(3) आंध्रप्रदेशतेलगूदेशम
(4) मुंबईमहाराष्ट्र

प्रश्न 2.
ऐसे दो देशों के नाम लिखिये जिन्होंने संघात्मक शासन व्यवस्था को अपनाया है।
उत्तर:
संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत।

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प्रश्न 3.
संघात्मक शासन की दो विशेषताएँ लिखिये।
उत्तर:
शक्तियों का विभाजन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता।

प्रश्न 4.
राज्य पुनर्गठन आयाग की स्थापना कब की गई?
उत्तर:
1953 में।

प्रश्न 5.
राज्य पुनर्गठन आयोग की मुख्य सिफारिश क्या थी?
उत्तर:
राज्य पुनर्गठन आयोग ने भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की सिफारिश की।

प्रश्न 6.
राज्य सूची में कितने और किस प्रकार के विषय हैं?
उत्तर:
राज्य सूची में 66 विषय हैं। ये स्थानीय महत्त्व के विषय हैं।

प्रश्न 7.
संघ सूची में कितने तथा किस प्रकार के विषय हैं?
उत्तर:
संघ सूची में 97 विषय हैं। ये राष्ट्रीय महत्त्व के विषय हैं।

प्रश्न 8.
समवर्ती सूची किसे कहते हैं?
उत्तर:
समवर्ती सूची में वे विषय आते हैं जिन पर संघ और राज्य दोनों की सरकारें कानून बना सकते हैं। इसमें 47 विषय हैं।

प्रश्न 9.
1958 में स्थापित ‘वेस्टइण्डीज संघ’ 1962 में किस कारण भंग कर दिया गया?
उत्तर:
‘वेस्टइण्डीज संघ’ की केन्द्रीय सरकार कमजोर थी और प्रत्येक संघीय इकाई की अपनी स्वतंत्र अर्थव्यवस्था थी तथा संघीय इकाइयों में राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा थी।

प्रश्न 10.
सोवियत संघ के विघटन के दो प्रमुख कारण बताइये।
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के दो प्रमुख कारण ये थे।

  1. शक्तियों का अतिशय संघनन और केन्द्रीकरण की प्रवृत्तियाँ।
  2. उजबेकिस्तान जैसे भिन्न भाषा और संस्कृति वाले क्षेत्रों पर रूस का आधिपत्य।

प्रश्न 11.
नाइजीरिया की संघीय व्यवस्था अपने विभिन्न क्षेत्रों में एकता स्थापित करने में क्यों असफल रही है?
उत्तर:
नाइजीरिया की विभिन्न संघीय इकाइयों के बीच धार्मिक, जातीय और आर्थिक समुदाय एक-दूसरे पर विश्वास नहीं करते। इस कारण संघीय व्यवस्था भी वहाँ एकता लाने में असफल रही है।

प्रश्न 12.
संघवाद के वास्तविक कामकाज का निर्धारण किससे होता है?
उत्तर:
संघवाद के वास्तविक कामकाज का निर्धारण राजनीति, संस्कृति, विचारधारा और इतिहास की वास्तविकताओं से होता है।

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प्रश्न 13.
किस प्रकार की संस्कृति में संघवाद का कामकाज आसानी से चलता है?
उत्तर:
आपसी विश्वास, सहयोग, सम्मान और संयम की संस्कृति में संघवाद का कामकाज आसानी से चलता है।

प्रश्न 14.
भारतीय संविधान द्वारा अंगीकृत संघीय व्यवस्था का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त क्या है?
उत्तर:
भारतीय संघीय व्यवस्था का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त यह है कि भारतीय संघवाद केन्द्र और राज्यों के बीच सम्बन्ध सहयोग पर आधारित होगा।

प्रश्न 15.
किन चिंताओं ने भारत के संविधान निर्माताओं को एक सशक्त केन्द्रीय सरकार बनाने की प्रेरणा दी?
उत्तर:

  1. विघटनकारी प्रवृत्तियों पर अंकुश रख राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने तथा
  2. विकास की चिंताओं ने भारत के संविधान निर्माताओं को एक सशक्त केन्द्रीय सरकार बनाने की प्रेरणा दी।

प्रश्न 16.
राज्यपाल की भूमिका किस स्थिति में अधिक विवादास्पद हो जाती है?
उत्तर:
जब केन्द्र और राज्य में अलग-अलग दल सत्तारूढ़ होते हैं, तब राज्यपाल की भूमिका अधिक विवादास्पद हो जाती है।

प्रश्न 17.
सरकारिया आयोग की नियुक्ति कब और क्यों की गई?
उत्तर:
सरकारिया आयोग की नियुक्ति 1983 में केन्द्र राज्य सम्बन्धों की जांच-पड़ताल के लिए की गई।

प्रश्न 18.
सरकारिया आयोग ने राज्यपाल की नियुक्ति के बारे में क्या सुझाव दिए?
उत्तर:
सरकारिया आयोग ने यह सुझाव दिया कि राज्यपाल की नियुक्ति निष्पक्ष होकर की जानी चाहिए।

प्रश्न 19.
स्वायत्तता और अलगाववाद में क्या फर्क है?
उत्तर:
स्वायत्तता से आशय यह है कि संघवाद के अन्तर्गत रहते हुए और अधिक अधिकारों व शक्तियों की माँग करना; जबकि अलगाववाद से आशय है भारत संघ से अलग होकर अपने स्वतन्त्र राज्य की स्थापना करना।

प्रश्न 20.
किस प्रकार की एकता अन्ततः अलगाव को जन्म देती है?
उत्तर:
अनेकता और विविधता को समाप्त करने वाली बाध्यकारी राष्ट्रीय एकता अन्ततः ज्यादा सामाजिक संघर्ष और अलगाव को जन्म देती है।

प्रश्न 21.
सहयोगी संघवाद का आधार किस प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था हो सकती है?
उत्तर:
विभिन्नताओं और स्वायत्तता की माँगों के प्रति संवेदनशील तथा उत्तरदायी राजनीतिक व्यवस्था ही सहयोगी संघवाद का एकमात्र आधार हो सकती है।

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प्रश्न 22.
वर्तमान में भारत में कितने राज्य और संघीय क्षेत्र हैं?
उत्तर:
वर्तमान में भारत में 28 राज्य और 9 संघीय क्षेत्र हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संघवाद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
संघवाद से आशय: संघवाद वह शासन प्रणाली है जहाँ संविधान द्वारा केन्द्र और राज्य स्तर की दो राजनीतिक व्यवस्थाएँ स्थापित की जाती हैं और दोनों के बीच शासन की शक्तियों का संविधान द्वारा स्पष्ट विभाजन कर दिया जाता है। इसमें संविधान लिखित तथा सर्वोच्च होता है तथा केन्द्र-राज्यों के बीच किसी टकराव को सीमित रखने के लिए स्वतन्त्र न्यायपालिका की व्यवस्था होती है।

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान की संघीय विशेषताओं का उल्लेख करें। उत्तर- भारतीय संविधान की संघीय विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं।

  • भारत का संविधान एक लिखित तथा सर्वोच्च संविधान है।
  • संविधान तीन सूचियों
    1. संघ सूची,
    2. राज्य सूची और
    3. समवर्ती सूची – में अलग-अलग विषयों को परिगणित कर केन्द्र तथा राज्यों की सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन करता है।
  • इसमें न्यायपालिका निष्पक्ष तथा स्वतंत्र है।
  • इसमें राज्य सभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है।

प्रश्न 3.
संघात्मक संविधान की कोई पाँच विशेषताएँ बताओ
उत्तर:

  1. संघात्मक संविधान में केन्द्र तथा प्रान्तों की सरकारों के बीच शक्तियों का विभाजन होता है।
  2. इसमें संविधान कठोर, लिखित तथा सर्वोच्च होता है।
  3. इसमें न्यायपालिका निष्पक्ष तथा स्वतन्त्र होती है।
  4. इसमें दोहरी नागरिकता की व्यवस्था की जाती है।
  5. इसमें संसद का दूसरा सदन राज्यों (प्रान्तों) का प्रतिनिधित्व करता है।

प्रश्न 4.
द्विसदनीय विधायिका संघात्मक राज्यों के लिए क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
संघात्मक राज्यों के लिए द्विसदनीय विधायिका आवश्यक है। संघात्मक राज्यों के लिए द्विसदनीय विधायिका आवश्यक है क्योंकि प्रथम सदन जनता का प्रतिनिधित्व करता है और दूसरा सदन संघ की इकाइयों का प्रतिनिधित्व करता है। प्रत्येक संघात्मक शासन व्यवस्था में इसीलिए द्विसदनात्मक विधायिका का प्रावधान किया गया है अमेरिका में ‘सीनेट’ और भारत में ‘राज्यसभा’ ऐसे ही दूसरे सदन हैं।

प्रश्न 5.
राज्यों द्वारा अधिक स्वायत्तता की माँग क्यों की जाती है?
अथवा
अधिक स्वायत्तता हेतु राज्यों ने कौन-कौनसी माँगें उठायीं?
उत्तर:
यद्यपि संविधान द्वारा केन्द्र और राज्य के बीच शक्तियों का स्पष्ट बँटवारा किया गया है, लेकिन संविधान में केन्द्र को अधिक शक्तिशाली बनाया है और देश की एकता व विकास की दृष्टि से उसे राज्य के क्षेत्र में दखल का अधिकार भी दिया गया है। इस कारण भारत में निम्न कारणों से समय-समय पर राज्यों द्वारा अधिक स्वायत्तता की माँग की है।

  1. कुछ राज्यों ने शक्ति विभाजन को राज्य के पक्ष में बदलने तथा राज्यों को ज्यादा तथा महत्त्वपूर्ण अधिकार दिये जाने के लिए स्वायत्तता की माँग की।
  2. कुछ राज्यों ने आय के स्वतंत्र साधनों तथा संसाधनों पर राज्यों का अधिक नियंत्रण हेतु स्वायत्तता की माँग की।
  3. कुछ राज्यों ने राज्य प्रशासनिक – तंत्र पर केन्द्रीय नियंत्रण से नाराज होकर राज्य स्वायत्तता की माँग की।
  4. तमिलनाडु में हिन्दी के वर्चस्व के विरोध में तथा पंजाब में पंजाबी भाषा और संस्कृति को प्रोत्साहन देने के लिए भी स्वायत्तता की माँग की।

इस प्रकार समय-समय पर राज्यों ने विभिन्न कारणों से केन्द्रीय नियंत्रण के विरोध में स्वायत्तता की माँग की है।

प्रश्न 6.
गवर्नर का पद किस प्रकार केन्द्र-राज्य सम्बन्धों में तनाव का कारण बना हुआ है? कोई दो कारण बताइए
उत्तर:
राज्यपाल के पद के केन्द्र-राज्य सम्बन्धों में तनाव के दो कारण – राज्यपाल का पद केन्द्र-राज्य सम्बन्धों में अनेक कारणों से तनाव पैदा करता है। ऐसे दो कारण निम्नलिखित हैं।

  1. राज्यपाल यद्यपि राज्य का संवैधानिक पद है, लेकिन उसकी नियुक्ति केन्द्र सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और राष्ट्रपति उसे पदमुक्त भी कर सकता है। इसलिए वह राज्य में केन्द्र के अभिकर्त्ता के रूप में कार्य करते हुए राज्य के हितों की अनदेखी तक कर देता है
  2.  राज्यपाल को अनेक मामलों व अनेक अवसरों पर स्वयं: विवेक की शक्तियाँ प्राप्त हैं, जैसे राज्य में संवैधानिक शासन के असफल होने की रिपोर्ट भेजना, जब विधानसभा में किसी एक दल को बहुमत न मिला हो तो मुख्यमन्त्री की नियुक्ति करना; राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु किसी विधेयक को सुरक्षित रखना आदि। इन सभी मामलों में वह केन्द्र के निर्देशों व सलाह के अनुसार कार्य करता है और निष्पक्ष रूप से कार्य नहीं करता है तथा राज्य के हितों की अवहेलना तक कर देता है।

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प्रश्न 7.
भारत के अन्तर्राज्यीय राजनीतिक विवादों के समाधान का सर्वोत्तम साधन क्या हो सकता है? उत्तर-भारतीय संघात्मक व्यवस्था में दो या दो से अधिक राज्यों में सीमा सम्बन्धी तथा नदी जल बँटवारे सम्बन्धी राजनीतिक विवाद चले आ रहे हैं। यदि दो राज्यों के बीच के विवादों का स्वरूप कानूनी या संवैधानिक है तो ऐसे विवादों का निपटारा न्यायपालिका कर देती है, लेकिन जिन विवादों में राजनीतिक पहलू भी समाहित होते हैं; ऐसे विवादों का निपटारा केवल कानूनी आधार पर नहीं किया जा सकता। ऐसे विवादों का सर्वोत्तम समाधान केवल विचार- विमर्श और पारस्परिक विश्वास के आधार पर ही हो सकता है।

प्रश्न 8.
ऐसी दो दशाएँ बताइए जब केन्द्र सरकार राज्य-सूची के विषयों पर कानून बना सकती है? उत्तर- केन्द्र सरकार द्वारा राज्य-सूची के विषयों पर कानून बनाने की परिस्थितियाँ संविधान में सामान्यतः राज्य – सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य विधानसभाओं को ही दिया गया है लेकिन निम्नलिखित दो दशाओं में केन्द्र की विधायिका भी राज्य सूची के विषयों पर कानून बना सकती है।

  1. किसी अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में लिए गए किसी निर्णय को लागू करने या भारत और किसी विदेशी राज्य के बीच हुए किसी समझौते व सन्धि को क्रियान्वित करने के लिए भारत की संसद राज्य – सूची के किसी विषय पर कानून बना सकती है।
  2. 2. यदि राज्यसभा 2/3 बहुमत से इस आशय का प्रस्ताव पारित कर दे कि राज्य सूची का अमुक विषय राष्ट्रीय महत्त्व का है तो संघ की संसद उस विषय पर कानून बना सकती है। ऐसा प्रस्ताव केवल एक वर्ष तक वैध रहता है और राज्यसभा केवल दूसरे वर्ष के लिए उसकी अवधि बढ़ा सकती है। संसद द्वारा निर्मित किया गया ऐसा कानून भी केवल एक वर्ष के लिए ही लागू रहता है।

प्रश्न 9.
अन्तर्राज्यीय विवादों के प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
उत्तर:
अन्तर्राज्यीय विवाद: भारतीय संघीय व्यवस्था में केन्द्र-राज्य विवादों के साथ-साथ दो या दो से अधिक राज्यों में भी आपसी विवाद के अनेक उदाहरण मिलते हैं। इस प्रकार के कानूनी विवादों का तो न्यायपालिका निपटारा कर देती है, लेकिन जिन विवादों के पीछे राजनीतिक पहलू होते हैं, उनका समाधान केवल विचार-विमर्श और पारस्परिक विश्वास के आधार पर हो सकता है। मुख्य रूप से दो प्रकार के विवाद गम्भीर विवाद पैदा करते हैं। ये निम्नलिखित हैं।

1. सीमा विवाद: राज्य प्रायः
पड़ौसी राज्यों के भू-भाग पर अपना दावा पेश करते हैं। यद्यपि राज्यों की सीमाओं का निर्धारण भाषायी आधार पर किया गया है, लेकिन सीमावर्ती क्षेत्रों में एक से अधिक भाषा बोलने वाले लोग रहते हैं। अतः इस विवाद को केवल भाषाई आधार पर नहीं सुलझाया जा सकता। ऐसा ही एक विवाद महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच ‘बेलगाम’ को लेकर है। पंजाब से हरियाणा को अलग करने पर उनके बीच न केवल सीमावर्ती क्षेत्रों को लेकर बल्कि राजधानी चण्डीगढ़ को लेकर भी विवाद है। चण्डीगढ़ इन दोनों राज्यों की राजधानी है।

2. नदी-जल विवाद:
अनेक राज्यों के बीच नदियों के जल के बँटवारे को लेकर विवाद बने हुए हैं क्योंकि यह सम्बन्धित राज्यों में पीने के पानी और कृषि की समस्या से जुड़ा है। कावेरी जल विवाद एक ऐसा ही विवाद है जो तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच एक प्रमुख विवाद है। यद्यपि इसे सुलझाने के लिए एक ‘जल -विवाद न्यायाधिकरण ‘ है फिर भी ये दोनों राज्य इसे सुलझाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की शरण में गए हैं। ऐसा ही एक विवाद नर्मदा नदी के जल के बँटवारे को लेकर गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच है।

प्रश्न 10.
“भारतीय संघवाद की सबसे नायाब विशेषता यह है कि इसमें अनेक राज्यों के साथ थोड़ा अलग व्यवहार किया जाता है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारतीय संघवाद में अनेक राज्यों के साथ थोड़ा अलग व्यवहार किया जाता है। यथा
1. राज्यसभा में असमान प्रतिनिधित्व: संघात्मक शासन व्यवस्था में प्राय:
संघ की विधायिका के द्वितीय सदन में प्रत्येक राज्य को समान प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाता है। अमेरिका और स्विट्जरैण्ड के संघवाद में इस सिद्धान्त को अपनाया गया है। लेकिन भारत में प्रत्येक का आकार और जनसंख्या भिन्न-भिन्न होने के कारण राज्यों को राज्यसभा में असमान प्रतिनिधित्व दिया गया है। जहाँ छोटे से छोटे राज्यों को भी न्यूनतम प्रतिनिधित्व अवश्य प्रदान किया गया है, वहाँ इस व्यवस्था से यह भी सुनिश्चित किया गया है कि बड़े राज्यों को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिले।

2. विशिष्ट प्रावधान:
कुछ राज्यों के लिए उनकी विशिष्ट सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों के अनुरूप संविधान में कुछ विशेष अधिकारों की व्यवस्था की गई है। ऐसे अधिकतर प्रावधान पूर्वोत्तर के राज्यों (असम, नागालैण्ड, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम आदि) के लिए हैं जहाँ विशिष्ट इतिहास और संस्कृति वाली जनजातीय बहुल जनसंख्या निवास करती है। ऐसे ही कुछ विशिष्ट प्रावधान पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल तथा अन्य राज्यों के लिए भी हैं।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
“भारत राज्यों का संघ है।” इसकी संघात्मक विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान के अनुच्छेद-1 में कहा गया है कि ” भारत राज्यों का संघ (यूनियन) होगा। राज्य और उनके राज्य – क्षेत्र वे होंगे जो पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं। ” वर्तमान में राज्य की पहली अनुसूची में 28 राज्य तथा 7 राज्य – क्षेत्र विनिर्दिष्ट हैं। इन सबको मिलाकर भारत में संघात्मक शासन व्यवस्था कायम की गई है। भारत की संघात्मक शासन की विशेषताएँ या भारत के संघवाद की विशेषताएँ भारतीय संविधान में निहित संघात्मक शासन के लक्षण निम्नलिखित हैं।
1. शक्तियों का विभाजन:
प्रत्येक संघीय देश की तरह भारतीय संविधान में केन्द्र और राज्यों की सरकारों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया है। इन शक्तियों के विभाजन हेतु तीन सूचियाँ बनाई गई हैं।

  1. संघ सूची: इसमें 97 विषय रखे गये हैं,
  2. राज्य सूची: इसमें 66 विषय तथा
  3. समवर्ती सूची: इसमें 47 विषय दिये गये हैं।

संघ-सूची के विषयों पर सिर्फ केन्द्रीय विधायिका ही कानून बना सकती है। राज्य सूची के विषयों पर सामान्यतः सिर्फ प्रान्तीय विधायिका ही कानून बना सकती है और समवर्ती सूची के विषयों पर केन्द्र और प्रान्त दोनों की विधायिकाएँ कानून बना सकती हैं। अवशिष्ट विषय: अवशिष्ट विषय वे सभी विषय कहलायेंगे जिनका उल्लेख किसी भी सूची में नहीं हुआ है, जैसे—साइबर अपराध। ऐसे विषयों पर केवल केन्द्रीय विधायिका ही कानून बना सकती है।

2. लिखित संविधान:
संघीय व्यवस्था के लिए एक लिखित संविधान की आवश्यकता होती है जिसमें केन्द्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट उल्लेख किया जा सके। भारत का संविधान एक लिखित संविधान है। इसमें 395 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियाँ हैं। 2017 तक इसमें 101 संशोधन हो चुके हैं।

3. कठोर संविधान:
संघीय व्यवस्था में कठोर संविधान का होना भी बहुत आवश्यक है। भारत का संविधान भी एक कठोर संविधान है क्योंकि संविधान की महत्त्वपूर्ण धाराओं में संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों के दो- तिहाई बहुमत तथा कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमण्डलों के बहुमत की आवश्यकता होती है।

4. स्वतन्त्र न्यायपालिका:
संघात्मक व्यवस्था में संविधान की सुरक्षा के लिए तथा केन्द्र-राज्य सम्बन्धों के विवादों का निपटारा करने के लिए स्वतन्त्र न्यायपालिका का होना अति आवश्यक है। भारतीय संविधान में भी स्वतन्त्र न्यायपालिका की व्यवस्था है। न्यायपालिका के कार्य और अधिकार भारत के संविधान में दिये गये हैं और यह स्वतन्त्र रूप से कार्य करती है।

5. संविधान की सर्वोच्चता:
भारत में संविधान को सर्वोच्च रखा गया है। कोई भी कार्य संविधान के प्रतिकूल नहीं किया जा सकता। सरकार के सभी अंग संविधान के अनुसार ही शासन कार्य चलाते हैं। सरकार का कोई कार्य यदि संविधान के प्रतिकूल होता है तो न्यायपालिका उसे असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर सकती है।

6. इकहरी नागरिकता:
संघीय शासन व्यवस्था में लोगों की दोहरी पहचान और निष्ठाएँ होती हैं। इस हेतु दोहरी नागरिकता का प्रावधान किया जाता है। लेकिन भारत में इकहरी नागरिकता का ही प्रावधान किया गया है।

7. संघात्मकता के साथ:
साथ एकात्मकता के लक्षण: भारतीय संविधान द्वारा अंगीकृत संघीय व्यवस्था का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त यह है कि केन्द्र और राज्यों के बीच सम्बन्ध सहयोग पर आधारित होगा। इस प्रकार विविधता को मान्यता देने के साथ-साथ संविधान एकता पर बल देता है। राष्ट्रीय एकता और विकास की चिन्ताओं ने संविधान निर्माताओं ने संघात्मक व्यवस्था में एक सशक्त केन्द्रीय सरकार की स्थापना की है। इसलिए भारतीय संविधान में संघात्मकता के साथ-साथ एकात्मकता के भी लक्षण पाये जाते हैं। जैसे इकहरी नागरिकता, आपातकालीन प्रावधान, संविधान संशोधन में संसद की प्रमुखता, केन्द्र की प्रभावी वित्तीय शक्तियाँ तथा राज्यपाल की स्वयंविवेक की शक्तियाँ आदि।

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प्रश्न 2.
संघात्मक शासन व्यवस्था से आप क्या समझते हैं? इसके प्रमुख लक्षणों को स्पष्ट कीजिए
उत्तर:
संघात्मकं शासन व्यवस्था से आशय – संघात्मक शासन व्यवस्था से आशय ऐसी शासन व्यवस्था से है जिसमें शासन केन्द्रीय सरकार तथा इकाइयों की सरकारों के रूप में दोहरी शासन व्यवस्थाएँ होती हैं। संविधान द्वारा शासन की. शक्तियों का विभाजन केन्द्र और प्रान्तों की सरकारों में स्पष्ट रूप से कर दिया जाता है। दोनों के कार्यक्षेत्र अलग-अलग होते हैं तथा एक-दूसरे के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करते। इसमें केन्द्र और राज्यों में झगड़ों का फैसला करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की जाती है।

संघात्मक शासन व्यवस्था की विशेषताएँ: संघात्मक शासन व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।
1. सरकारों के दो प्रकार: संघवाद की पहली विशेषता यह है कि इसमें दो प्रकार की सरकारें पायी जाती हैं

  1. संघीय या केन्द्रीय सरकार और
  2. इकाइयों या प्रान्तों की सरकारें यह व्यवस्था राजनीति के दो प्रकार को व्यवस्थित करती है। एक, प्रान्तीय या क्षेत्रीय स्तर पर और दूसरी, केन्द्रीय स्तर पर। दोनों प्रकार की सरकारें संविधान द्वारा निर्धारित अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य करती हैं।

2. शक्तियों का बँटवारा: संघात्मक शासन व्यवस्था में शासन की शक्तियों का केन्द्रीय सरकार और इकाइयों की सरकारों के बीच संविधान द्वारा वितरित कर दिया जाता है। राष्ट्रीय महत्त्व की शक्तियाँ केन्द्रीय सरकार को दे दी जाती हैं और समस्त स्थानीय और क्षेत्रीय महत्त्व की शक्तियाँ इकाइयों की सरकारों को दे दी जाती हैं। दोनों सरकारें स्वतन्त्रतापूर्वक अपने-अपने क्षेत्र में कार्य करती हैं।

3. सर्वोच्च, लिखित तथा कठोर संविधान: संघात्मक शासन व्यवस्था में संविधान लिखित होता है तथा वह सर्वोच्च होता है। दोनों प्रकार की सरकारें उसके प्रावधानों का उल्लंघन नहीं कर सकतीं। इसमें संशोधन संसद साधारण बहुमत से नहीं कर सकती, बल्कि इसमें संशोधन के लिए उसे विशिष्ट बहुमत की आवश्यकता होती है।

4. स्वतन्त्र न्यायपालिका: संघात्मक शासन व्यवस्था की एक अन्य विशेषता यह है कि इसमें न्यायपालिका स्वतन्त्र होती है। उसके पास न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति होती है। इसका आशय यह है कि यदि कभी कोई सरकार कोई ऐसी विधि या नीति बनाती है जो संविधान के प्रावधानों के प्रतिकूल है तो न्यायपालिका उसे असंवैधानिक घोषित करके रद्द कर सकती है। इस प्रकार यह केन्द्रीय सरकार और इकाइयों की सरकारों, दोनों को अपने क्षेत्र में सीमित रखती है।

5. द्विसदनात्मक विधायिका: संघात्मक शासन व्यवस्था की एक विशेषता द्विसदनात्मक विधायिका का होना है। इसमें निम्न सदन जहां जनता का प्रतिनिधित्व करता है, उच्च सदन राज्यों (इकाइयों) का प्रतिनिधित्व करता है। संघीय व्यवस्था में सामान्यतः द्वितीय सदन में सभी इकाइयों का समान प्रतिनिधित्व रखा जाता है; जैसे कि अमेरिका में सीनेट में प्रत्येक राज्य दो सदस्य भेजता है।

6. दोहरी नागरिकता: संघात्मक शासन व्यवस्था में सामान्यतः दोहरी नागरिकता पाई जाती है। एक, केन्द्रीय सरकार की नागरिकता और दूसरी, इकाइयों की सरकार की नागरिकता अमेरिका में दोहरी नागरिकता दी गई है, लेकिन भारतीय संघात्मक व्यवस्था में इकहरी नागरिकता ही प्रदान की गई है।

7. दोहरी पहचान और निष्ठाएँ: संघात्मक शासन व्यवस्था में लोगों की दोहरी पहचान और निष्ठाएँ होती हैं एक, राष्ट्र के प्रति निष्ठा तथा राष्ट्रीय पहचान और दूसरी, प्रान्त या क्षेत्र के प्रति पहचान और उसके प्रति निष्ठा। यद्यपि इसमें दोहरी निष्ठाएँ होती हैं, लेकिन इनमें राष्ट्रीय निष्ठा की प्रधानता होती है। उदाहरण के लिए, एक गुजराती या बंगाली होने से अधिक महत्त्वपूर्ण एक भारतीय होना है। इसमें भारत के प्रति निष्ठा, गुज़रात या बंगाल के प्रति निष्ठा से पहले आती है।

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प्रश्न 3.
” भारत के संविधान का स्वरूप संघात्मक है परन्तु उसकी आत्मा एकात्मक है। ” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान के निर्माताओं ने देश की परिस्थितियों के अनुसार ऐसी व्यवस्था की है जिससे राष्ट्र की इकाइयों को स्वायत्तता मिली रहे और साथ ही राष्ट्र की एकता भी भंग न हो। इसी कारण भारतीय संविधान स्वरूप में संघात्मक रूप लिए हुए है; उसमें प्रमुख संघात्मक लक्षण विद्यमान हैं लेकिन देश की एकता भंग न हो इसलिए उसमें एकात्मकता के तत्त्व भी पाये जाते हैं जिनके द्वारा केन्द्रीय सरकार को शक्तिशाली बनाया गया है। यथा भारतीय संविधान के संघात्मक लक्षण

1. संविधान की सर्वोच्चता:
भारत में न तो केन्द्रीय सरकार सर्वोच्च है और न ही राज्य सरकार। यहाँ संविधान सर्वोच्च है। कोई भी सरकार संविधान के प्रतिकूल काम नहीं कर सकती। देश के सभी पदाधिकारी, जैसे- राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री आदि अपना पद ग्रहण करने से पूर्व संविधान की सर्वोच्चता को स्वीकार करते हुए उसके प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं

2. लिखित तथा कठोर संविधान:
भारत का संविधान लिखित है जो संविधान सभा द्वारा निर्मित किया गया है। इसमें संघ व राज्य सम्बन्धी अधिकारों को स्पष्ट रूप से लिखा गया है। इसके साथ-साथ भारत का संविधान कठोर है क्योंकि इसमें संशोधन साधारण बहुमत से नहीं किये जा सकते।

3. अधिकारों का विभाजन:
संविधान में केन्द्र और राज्यों की शक्तियों का तीन सूचियों के माध्यम से स्पष्ट विभाजन किया गया है। राज्य सूची के विषय इकाइयों को, संघ-सूची के विषय केन्द्रीय सरकार को और समवर्ती सूची के विषय दोनों सरकारों को दिये गये हैं। अवशिष्ट विषय केन्द्रीय सरकार को दिये गये हैं।

4. स्वतन्त्र न्यायपालिका:
भारत के संविधान में केन्द्र और राज्यों के विवादों को हल करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई है। वह केन्द्र और राज्यों के कानूनों को संविधान के प्रावधानों के प्रतिकूल होने पर असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर सकता है।

5. दोहरी शासन व्यवस्था:
भारतीय संघात्मक शासन व्यवस्था में दो प्रकार की सरकारों की व्यवस्था की गई एक, केन्द्रीय सरकार और दूसरी, राज्यों की सरकार। दोनों का गठन संविधान के अनुसार होता है।

भारतीय संविधान में एकात्मकता के लक्षण: यद्यपि भारतीय संविधान स्वरूप से संघात्मक है, लेकिन आत्मा से वह एकात्मक है, क्योंकि इसमें केन्द्रीय सरकार को सशक्त बनाने वाले अनेक प्रावधान किये गये हैं।

1. शक्तियों का विभाजन केन्द्र के पक्ष में:
संविधान द्वारा शक्तियों का जो बँटवारा किया गया है उसमें केन्द्र को अधिक शक्तिशाली बनाया गया है क्योंकि संविधान ने आर्थिक और वित्तीय शक्तियाँ केन्द्रीय सरकार के हाथ में सौंपी हैं तथा राज्य को आय के बहुत कम साधन दिये गये हैं। दूसरे, अवशिष्ट शक्तियाँ केन्द्रीय सरकार को ही सौंपी गई हैं। तीसरे, समवर्ती सूची के विषयों पर भी कानून बनाने में केन्द्रीय सरकार को प्राथमिकता दी गई है।

2. राज्य- सूची पर भी केन्द्रीय सरकार को कानून बनाने की शक्तियाँ: कुछ परिस्थितियों में केन्द्रीय सरकार राज्य-सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है। यथा

  1. यदि राज्यसभा 2/3 बहुमत से राज्य – सूची के किसी विषय को राष्ट्रीय महत्त्व का घोषित कर दे तो केन्द्रीय सरकार उस विषय पर कानून बना सकती है।
  2. संकट काल की स्थिति उत्पन्न होने पर केन्द्र को राज्य – सूची के विषयों पर कानून बनाने की शक्ति प्राप्त हो जाती है।
  3. यदि कभी दो राज्यों की विधानसभाएँ केन्द्र को राज्य सूची में से किसी विषय पर कानून बनाने की प्रार्थना करें तो इस विषय पर केन्द्र कानून बना सकता है।

3. इकहरी नागरिकता: संघीय शासन व्यवस्था वाले देशों में प्रायः दोहरी नागरिकता प्रदान की जाती है- एक, राष्ट्र की नागरिकता और दूसरी, प्रान्तीय नागरिकता। लेकिन भारत में इकहरी नागरिकता ही प्रदान की गई है। भारत में केवल राष्ट्रीय नागरिकता ही प्रदान की गई है।

4. राज्यपाल द्वारा राज्यों पर नियन्त्रण: भारत में राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख है लेकिन राज्यपालों की नियुक्ति केन्द्रीय सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह अपने कार्यों के लिए केन्द्र के प्रति ही उत्तरदायी होता है। ऐसी स्थिति में राज्यपाल केन्द्र के एजेण्ट के रूप में कार्य करता है। वह अपने स्वविवेकीय कार्यों को संवैधानिक प्रमुख के रूप में निष्पक्ष रूप से कार्य न करके केन्द्र की सलाह के अनुसार करता है। जब विधानसभा में किसी एक दल का बहुमत नहीं होता तो वह केन्द्र के इशारे पर मुख्यमन्त्री की नियुक्ति करता है। वह केन्द्र के निर्देशों के अनुरूप ही राज्य में संकटकाल की घोषणा की सलाह देता है और संकट काल में केन्द्र के निर्देशों को राज्य में लागू करता।

5. राज्यों की केन्द्र पर वित्तीय निर्भरता: सामान्य स्थितियों में भी केन्द्र सरकार की अत्यन्त प्रभावी वित्तीय शक्तियाँ और उत्तरदायित्व हैं। सबसे पहले तो आय के प्रमुख संसाधनों पर केन्द्र सरकार का नियन्त्रण है। इस प्रकार केन्द्र के पास आय के अनेक संसाधन हैं और राज्य अनुदानों और वित्तीय सहायता के लिए केन्द्र पर आश्रित हैं। दूसरे, स्वतन्त्रता के बाद भारत ने तेज आर्थिक प्रगति और विकास के लिए नियोजन को साधन के रूप में अपनाया है।

नियोजन के कारण आर्थिक फैसले लेने की ताकत केन्द्र सरकार के हाथ में सिमटती गई है। केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त योजना आयोग राज्यों के संसाधन – प्रबन्ध की निगरानी करता है। तीसरे, केन्द्र सरकार अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग कर राज्यों को अनुदान और ऋण देती है । केन्द्र सरकार पर प्रायः यह आरोप लगाया जाता है कि वह विरोधी दलों द्वारा शासित राज्यों के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया अपनाती है।

6. संसद को राज्यों का पुनर्गठन तथा उसके नामों में परिवर्तन करने का अधिकार है: किसी राज्य के अस्तित्व और उसकी भौगोलिक सीमाओं के स्थायित्व पर संसद का नियन्त्रण है। संसद किसी राज्य में से उसका राज्य-क्षेत्र अलग करके अथवा दो या अधिक राज्यों को मिलाकर नए राज्य का निर्माण कर सकती है। वह किसी राज्य की सीमाओं या नाम में परिवर्तन कर सकती है। सम्बन्धित राज्य से उसकी राय तो ले ली जाती है, परन्तु उसका मानना या न मानना राष्ट्रपति की इच्छा पर निर्भर करता है। संसद का यह अधिकार सरकार को एकात्मक बनाता है।

7. अखिल भारतीय सेवाएँ: भारत की प्रशासकीय व्यवस्था इकहरी है। अखिल भारतीय सेवाएँ पूरे देश के लिए हैं और इसमें चयनित पदाधिकारी राज्यों के प्रशासन में काम करते हैं। अतः जिलाधीश के रूप में कार्यरत भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी या पुलिस कमिश्नर के रूप में कार्यरत भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों पर केन्द्र सरकार का नियन्त्रण रहता है। राज्य न तो उनके विरुद्ध कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही कर सकता है और न ही उन्हें सेवा से हटा सकता है।

8. किसी क्षेत्र में सैनिक शासन लागू होना: संघ सरकार की शक्ति को, संविधान के दो अनुच्छेद 33 और 34, उस स्थिति में काफी बढ़ा देते हैं जब किसी क्षेत्र में सैनिक शासन लागू हो जाए। ऐसी स्थिति में संसद केन्द्र या राज्य के किसी भी अधिकारी के द्वारा शान्ति व्यवस्था बनाए रखने या उसकी बहाली के लिए किए गए किसी भी कार्य को जायज ठहरा सकती है। इसी के अन्तर्गत ‘सशस्त्र बल विशिष्ट शक्ति अधिनियम’ का निर्माण किया गया है। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि यद्यपि संविधान में संघात्मक शासन व्यवस्था को अपनाया गया है, तथापि व्यवहार में केन्द्र सरकार को अधिक शक्तियाँ प्रदान कर उसमें एकात्मकता की आत्मा बिठा दी गई है।

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प्रश्न 4.
भारत ने संघीय व्यवस्था को क्यों अपनाया? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान निर्माताओं ने भारत के लिए संघात्मक शासन व्यवस्था की स्थापना की है। यद्यपि स्वतन्त्रता से पूर्व भारत पर अंग्रेजों का शासन रहा है और संविधान निर्माता अंग्रेजों की राजनीतिक संस्थाओं से स्वाभाविक रूप से प्रभावित थे। लेकिन इंग्लैण्ड की एकात्मक शासन व्यवस्था के स्वरूप को भारत के संविधान निर्माताओं ने नहीं अपनाया और इसके स्थान पर संघात्मक शासन प्रणाली को अपनाया। इसके कुछ विशेष कारण रहे हैं।

भारत में संघात्मक शासन को अपनाने के कारण: भारत में संघात्मक शासन व्यवस्था को अपनाए जाने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे
1. भारत सरकार 1935 का एक्ट:
1935 के भारत सरकार के एक्ट में भारत में संघीय शासन का प्रावधान किया गया। कांग्रेस प्रारम्भ से ही देश में शक्तियों के विकेन्द्रीकरण की माँग करती आ रही थी। 1935 के एक्ट में प्रान्तों को स्वायत्तता प्रदान की गई थी। इसमें सभी प्रान्तों, केन्द्रीय सरकार तथा रियासतों के एक फैडरेशन की बात कही गयी लेकिन यह संघ अस्तित्व में न आ सका। इस प्रकार संविधान निर्माता पहले से ही इस व्यवस्था से परिचित थे।

2. रियासतों की समस्या:
जब भारत स्वतन्त्र हुआ, ब्रिटिश सरकार ने सभी देशी रियासतों को स्वतन्त्र कर दिया तथा यह कहा कि वे चाहे तो भारत में मिल सकती हैं, चाहे पाकिस्तान में और चाहे अपने आप को दोनों से स्वतन्त्र रख सकती हैं। भारतीय नेताओं को इन छोटी-बड़ी देशी रियासतों को मिलाना अत्यन्त कठिन दिख रहा था। उन्हें एकात्मक सरकार के ढाँचे की तुलना में संघीय ढाँचे में सम्मिलित करना भारतीय नेताओं को कहीं अधिक आसान लगा।

3. भारतीय दशाएँ:
उस समय की भारतीय दशाओं ने भी संविधान निर्माताओं को विवश कर दिया कि वे संघात्मक शासन व्यवस्था को अपनाएँ। भारत एक विशाल देश है। यहाँ के लोगों में जातीय, क्षेत्र, धर्म, भाषा, रहन-सहन, परम्परा – रीति-रिवाज, भोजन तथा वेशभूषा, संस्कृति तथा आदतों की विविधताएँ हैं। पहाड़ी लोगों की जीवन जीने की शैली, मैदानी लोगों से भिन्न है। यहाँ अनेक क्षेत्रों में जनजातीय लोग निवास करते हैं। इसी स्थिति में केवल संघीय ढाँचा ही इन सब विविधताओं को एकता में पिरो सकता था।

फलतः संविधान निर्माताओं ने देश के लिए संघात्मक शासन व्यवस्था को अपनाया। संविधान निर्माताओं को यह मान था कि भारतीय समाज में क्षेत्रीय और भाषायी विविधताओं को मान्यता देने की आवश्यकता थी। विभिन्न क्षेत्रों और भाषा-भाषी लोगों को सत्ता में सहभागिता करनी थी तथा इन क्षेत्रों के लोगों को स्वशासन का अवसर देना था। संघात्मक व्यवस्था में ही यह सब सम्भव हो सकता था।

4. भौगोलिक विविधताएँ:
भारत एक उप-महाद्वीप है और एक उप महाद्वीप में प्रशासनिक कुशलता की दृष्टि से एकात्मक शासन की तुलना में संघात्मक शासन उत्तम ठहरता है। क्योंकि भारत के विभिन्न क्षेत्र अपने क्षेत्र में क्षेत्रीय विकास की गतिविधियों के लिए कार्य की स्वतंत्रता की मांग कर रहे थे। इन विविधताओं को समेटने के लिए संघात्मक शासन ही उपयुक्त था। इस प्रकार भारत की संविधान सभा ने संघात्मक शासन व्यवस्था को अपनाया।

प्रश्न 5.
भारत के संविधान निर्माताओं ने केन्द्र को अधिक शक्तिशाली क्यों बनाया? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारतीय संघीय व्यवस्था में शक्तिशाली केन्द्र भारत में संघात्मक व्यवस्था के साथ-साथ एकात्मकता के लक्षण भी विद्यमान हैं। यद्यपि केन्द्र और राज्यों के कार्यक्षेत्र संविधान द्वारा निश्चित किये गये हैं तो भी केन्द्र सरकार राज्यों के कार्यों में हस्तक्षेप कर सकती है। संविधान में अनेक प्रावधान ऐसे हैं जो संघीय शासन व्यवस्था को एकात्मक शासन में बदल सकते हैं।

संविधान निर्माताओं ने संघीय व्यवस्था की सुरक्षा, कानून एवं व्यवस्था की स्थापना, सामान्य मुद्दों में सामञ्जस्य की स्थापना तथा संघ की इकाइयों की एकजुटता की दृष्टि से केन्द्र को अधिक शक्तिशाली बनाया है। केन्द्र को शक्तिशाली बनाने के लिए उत्तरदायी कारक निम्नलिखित कारकों ने संविधान निर्माताओं को केन्द्र को शक्तिशाली बनाने के लिए प्रेरित किया।

1. संघात्मक व्यवस्था शक्ति के विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया के तहत:
भारत में संघात्मक व्यवस्था का निर्माण शक्ति के विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया के तहत हुआ है। भारत में प्रान्तों को शक्तियाँ केन्द्र से हस्तांतरित हुई हैं और केन्द्र से शक्तियों को हस्तांतरित कर संघीय व्यवस्था का निर्माण किया गया है। इस प्रक्रिया में यह स्वाभाविक है कि केन्द्र सरकार ने अपने पास अधिक शक्तियाँ रखीं। अमेरिका में स्वतंत्र राज्यों ने अपनी संप्रभुता और शक्तियों को हस्तांतरित कर संघ सरकार का निर्माण किया। इस प्रकार केन्द्र या संघ सरकार को शक्तियाँ राज्यों से हस्तांतरित हुई हैं। इस प्रक्रिया में यह स्वाभाविक था कि राज्य अपने पास अधिक शक्ति रखें । इसलिए वहां राज्यों के पास अधिक शक्तियाँ हैं।

2. इतिहास से सबक:
भारत के संविधान निर्माता इस ऐतिहासिक तथ्य से भलीभांति परिचित थे कि भारत में जब कभी भी केन्द्र की शक्ति कमजोर हुई, देश की एकता छिन्न-भिन्न हो गई थी। केन्द्र की कमजोर सरकार के चलते, प्रान्तों ने स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित करते हुए विद्रोह कर दिया और विदेशियों को देश पर आक्रमण के लिए प्रोत्साहित किया। इस प्रकार देश की सुरक्षा तथा एकता के लिए कमजोर केन्द्र हमेशा एक खतरा है। इसलिए उन्होंने संघीय व्यवस्था में भी जानबूझकर केन्द्र को शक्तिशाली बनाया है।

3. देशी रियासतों की समस्या:
जब देश स्वतंत्र हुआ, 600 से अधिक देशी रियासतों को यह विकल्प दिया गया था कि वे चाहे तो भारत में मिल जाएँ, चाहे पाकिस्तान में और चाहे वे अपने आपको स्वतंत्र रखें। इन देशी रियासतों को भारत संघ में मिलाने के लिए दबाव डाला गया। यदि केन्द्र सरकार कमजोर रखी जाती, तो ये देशी रियासतें देश की एकता के लिए खतरा बन सकती थीं और ये रियासतें आसानी से संघ में मिलने को भी राजी नहीं होतीं । इसलिए शक्तिशाली केन्द्र के साथ वाली संघीय व्यवस्था ने ही इस पेचीदी समस्या को सुलझाया।

4. परिस्थितियों की आवश्यकता:
जब संविधान का निर्माण हो रहा था, उस समय विभाजनकारी ताकतें देश में सक्रिय थीं। जातिवाद, क्षेत्रवाद, साम्प्रदायिकता तथा भाषावाद की जड़ें मजबूत थीं तथा सक्रिय थीं। वे देश की एकता को खतरा पैदा कर रही थीं। इसलिए संविधान निर्माताओं ने लोकतंत्र और देश की एकता की सुरक्षा के लिए शक्तिशाली केन्द्र की आवश्यकता महसूस की।

5. आर्थिक तथा सामाजिक स्वतंत्रता की स्थापना हेतु;
1947 में भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिल गई थी, लेकिन आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता अभी बहुत दूर थी और आर्थिक-सामाजिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता अर्थहीन थी। संविधान निर्माता इस विचार से सहमत थे कि केन्द्र सरकार को शक्तिशाली बनाकर ही इस सामाजिक- आर्थिक स्वतंत्रता को शीघ्र प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि केवल एक शक्तिशाली केन्द्र ही पूरे देश में आर्थिक नीति का निर्माण कर उसे लागू कर सकता है।

6. विश्व में शक्तिशाली केन्द्र की प्रवृत्ति:
आधुनिक काल अन्तर्राष्ट्रीयता का काल है और प्रत्येक राज्य अन्तर्राष्ट्रीय जगत में अपना अस्तित्व चाहता है। यह कमजोर केन्द्र के चलते प्राप्त नहीं किया जा सकता। इस कारण पूरे विश्व में केन्द्र को शक्तिशाली बनाने की प्रवृत्ति व्याप्त है। भारत के संविधान निर्माताओं पर भी इस प्रवृत्ति का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था।

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 7 संघवाद 

प्रश्न 6.
भारत में केन्द्र-राज्य सम्बन्धों पर दलीय राजनीति के प्रमुख चरणों तथा इसके प्रभाव की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारत में एक संघात्मक शासन व्यवस्था है लेकिन इसकी प्रवृत्ति केन्द्रीकरण की है या कि प्रवृत्ति से यह एकात्मकता लिये हुए है। भारत में राज्य सरकारों की कार्यप्रणाली में केन्द्र द्वारा हस्तक्षेप किये जा सकने के अनेक प्रावधान स्वयं संविधान में किये गये हैं। इससे केन्द्र – राज्य सम्बन्धों पर प्रभाव पड़ा है। भारत की दलीय राजनीति ने भी केन्द्र- राज्य सम्बन्धों को प्रभावित किया है।

दलीय राजनीति और केन्द्र-राज्य सम्बन्ध – भारतीय संघवाद पर राजनीतिक प्रक्रिया की परिवर्तनशील प्रकृति का काफी प्रभाव पड़ा है। दलीय राजनीति के केन्द्र-राज्य सम्बन्धों के प्रभाव को इसके निम्न चरणों के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है।

1. दलीय राजनीति का प्रथम चरण ( स्वतंत्रता से 1966 तक ):
1950 तथा 1960 के दशक के प्रारंभिक वर्षों में जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय संघीय व्यवस्था की नींव रखी। इस दौरान केन्द्र और राज्यों में कांग्रेस का वर्चस्व था । इस काल में नए राज्यों के गठन की माँग के अलावा केन्द्र और राज्यों के बीच सम्बन्ध शांतिपूर्ण तथा सामान्य रहे। राज्यों को आशा थी कि वे केन्द्र से प्राप्त वित्तीय अनुदानों से विकास कर सकेंगे। इसके अतिरिक्त केंन्द्र द्वारा सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए बनाई गई नीतियों के कारण भी राज्यों को काफी आशा बँधी थी। इससे स्पष्ट होता है कि इस काल में केन्द्र और राज्यों में एक दलीय प्रभुत्व था तथा पं. नेहरू का शक्तिशाली व्यक्तित्व था। इस कारण शक्तियों और कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में केन्द्र और राज्यों के बीच इस काल में कोई विवाद, संघर्ष तथा मतभेद नहीं उभरे। केन्द्र-राज्य सम्बन्धों में कोई तनाव नहीं था।

2. दलीय राजनीति का द्वितीय चरण (1967 से 1988 तक ):
1967 के आम चुनावों से भारत में दलीय राजनीति का द्वितीय चरण प्रारंभ होता है। 1967 के चुनावों में केन्द्र में तो कांग्रेस दल का वर्चस्व बना रहा लेकिन अनेक राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें बनीं और कांग्रेस को विपक्ष में बैठना पड़ा। बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश तथा तमिलनाडु राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ लेकिन लगभग इन सभी राज्यों में अनेक विरोधी दलों ने मिलकर मिली-जुली सरकार का गठन किया। परिणामतः राज्यों की मिली-जुली सरकारें लम्बे समय तक नहीं चल सकीं और भारतीय राजनीति में एक नवीन समस्या सामने आई। यह समस्या दल-बदल की थी।

कांग्रेस दल केन्द्र में सत्तासीन था और उसने राज्यों की गैर-कांग्रेसी सरकारों को अपदस्थ करने में रुचि ली। इससे राज्यों को और ज्यादा शक्ति और स्वायत्तता देने की मांग बलवती हुई। इस मांग के पीछे प्रमुख कारण यह था कि केन्द्र और राज्यों में भिन्न-भिन्न दल सत्ता में थे। अतः गैर-कांग्रेसी राज्यों की सरकारों ने केन्द्र की कांग्रेसी सरकार द्वारा किए गए अवांछनीय हस्तक्षेपों का विरोध करना शुरू कर दिया। कांग्रेस के लिए भी विरोधी दलों द्वारा शासित राज्यों से संबंधों के तालमेल की बात पहले जैसी आसान नहीं रही। इस विचित्र राजनैतिक संदर्भ में संघीय व्यवस्था के अन्दर स्वायत्तता की अवधारणा को लेकर वाद-विवाद छिड़ गया।

3. दलीय राजनीति का तृतीय चरण (1989 से अब तक ):
1989 के आम चुनाव में भारतीय राजनीति में एक नया बदलाव आया। अब कांग्रेस केन्द्र से तथा अधिकांश राज्यों से सत्ता से बाहर हो गयी। इस प्रकार भारतीय राजनीति में कांग्रेस का वर्चस्व समाप्त हो गया। केन्द्र में गठबंधन की राजनीति का प्रारंभ हुआ। अनेक राज्यों में गैर-कांगेसी दलों की सरकारों के होने से केन्द्र-र राज्य सम्बन्धों में तनाव बढ़े। ये राज्य अब केन्द्र के साथ खुले संघर्ष के रूप में सामने आए और केन्द्र-राज्य सम्बन्धों की पूर्ण समीक्षा की मांग की ताकि केन्द्र उनके कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप न कर सके। इससे राज्यों का राजनीतिक कद बढ़ा, विविधता का आदर हुआ और एक मँझे हुए संघवाद की शुरुआत हुई।

प्रश्न 7.
केन्द्र-राज्य संबंधों के संदर्भ में राज्य के राज्यपाल की भूमिका तथा अनुच्छेद 356 पर एक निबन्ध लिखिये
उत्तर:
1. केन्द्र-राज्य सम्बन्धों के संदर्भ में राज्यपाल की भूमिका:
राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख है। वह केन्द्र सरकार की सलाह से राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है और राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत तक अपने पद पर बना रहता है। यद्यपि वह 5 साल के लिए नियुक्त किया जाता है लेकिन राष्ट्रपति बिना कारण बताये उसे इस अवधि से पूर्व भी पद से हटा सकता है। इस प्रकार राज्यपाल अपनी नियुक्ति के लिए और अपने पद पर बने रहने के लिए केन्द्रीय मंत्रिमंडल की प्रसन्नता पर निर्भर रहता है।

दूसरी तरफ राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है और सामान्यतः राज्य के मंत्रिमंडल की सलाह के अनुसार कार्य करता है। लेकिन इसके साथ ही वह केन्द्र सरकार का अभिकर्ता भी होता है तथा उससे यह आशा की जाती है कि वह कुछ कार्यों को अपने विवेक के अनुसार करेगा। इस स्थिति में वह राज्यमंत्रिमंडल की सलाह के अनुसार कार्य न करके सामान्यतः संघीय सरकार की इच्छाओं के अनुसार कार्य करता है। चूंकि राज्यपाल को दोहरी भूमिकाओं में कार्य करना पड़ता है, इसलिए यह पद केन्द्र-राज्य सम्बन्धों में तनाव का एक कारण बन गया है। राज्यपाल के फैसलों को अक्सर राज्य सरकार के कार्यों में केन्द्र सरकार के हस्तक्षेप के रूप में देखा जाता है। जब केन्द्र और राज्य में अलग-अलग दल सत्तारूढ़ होते हैं, तब राज्यपाल की भूमिका और अधिक विवादास्पद हो जाती है।

अनुच्छेद- 356 का दुरुपयोग सामान्यतः जिन राज्यों में केन्द्र के सत्तारूढ़ दल से भिन्न दलों की सरकारें हैं, उन राज्यों में केन्द्र ने राष्ट्रपति शासन लगाने में राज्यपाल के पद का दुरुपयोग किया है। संविधान के अनुच्छेद 356 के द्वारा राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू किया जाता है। इस प्रावधान को किसी राज्य में तब लागू किया जाता है जब ” ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई हो कि उस राज्य का शासन इस संविधान के उपबन्धों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता।” परिणामस्वरूप संघीय सरकार राज्य सरकार का अधिग्रहण कर लेती है। इस विषय पर राष्ट्रपति द्वारा जारी उद्घोषणा को संसद की स्वीकृति प्राप्त करना जरूरी होता है। राज्यपाल को यह अधिकार है कि वह राज्य सरकार को बर्खास्त करने तथा राज्य विधानसभा को निलंबित या विघटित करने की अनुशंसा कर सके। इससे अनेक विवाद पैदा हुए। यथा

(i) कुछ मामलों में राज्य सरकारों को विधायिका में बहुमत होने के बाद भी बर्खास्त कर दिया। 1959 में केरल में और 1967 के बाद अनेक राज्यों में बहुमत की परीक्षा के बिना ही सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया। कुछ मामले सर्वोच्च न्यायालय में भी गए तथा सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि राष्ट्रपति शासन लागू करने के निर्णय की संवैधानिकता की जांच-पड़ताल न्यायालय कर सकता है। 1967 के बाद जब राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं तब केन्द्र में सत्तासीन कांग्रेसी सरकार ने अनेक अवसरों पर इसका प्रयोग राज्य सरकारों को बर्खास्त करने के लिए किया।

(ii) कुछ मामलों में केन्द्र सरकार ने राज्यपाल के माध्यम से राज्य में बहुमत दल या गठबंधन को सत्तारूढ़ होने से रोका। उदाहरण के लिए, 1980 के दशक में केन्द्रीय सरकार ने आंध्रप्रदेश और जम्मू-कश्मीर की निर्वाचित सरकारों को बर्खास्त किया।

2. मुख्यमंत्री की नियुक्ति में राज्यपाल के स्वयंविवेक की भूमिका:
जब किसी राज्य में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने राज्यपाल के माध्यम से उस राज्य में मुख्यमंत्री की नियुक्ति में हस्तक्षेप किया क्योंकि राज्यपाल ने उस समय केन्द्र की सलाह के अनुसार कार्य किया न कि निष्पक्ष संवैधानिक अध्यक्ष के रूप में। इससे केन्द्र-राज्य सम्बन्धों की दृष्टि से गवर्नर का पद विवादास्पद हो गया।

3. विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु रोक लेना:
राज्य के राज्यपाल के पास यह स्वयंविवेक की शक्ति है कि वह राज्य विधानसभा द्वारा पारित किसी विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु अपने पास रोक सकता है। इस शक्ति को सामान्यतः उस विधेयक को पारित करने से रोकने या उसे पारित करने में देरी करने के लिए किया गया है, जो केन्द्र की सरकार को पसंद नहीं है। ऐसे विधेयकों को लम्बे समय तक पेंडिंग रखा जा सकता है। इस प्रकार राज्यपाल के पद की कटु आलोचनाएँ की गईं तथा यह मांग भी उठी कि राज्यपाल के पद को ही समाप्त कर दिया जाये। सरकारिया आयोग ने इस सम्बन्ध में यह सुझाव दिया कि राज्यपाल राज्य से बाहर का व्यक्ति होना चाहिए और वे अपने विवेक का प्रयोग बहुत कम करें तथा अच्छी तरह स्थापित परम्पराओं के अनुसार ही करें तथा उन्हें अपना कार्य निष्पक्षता से करना चाहिए।

JAC Class 11 Political Science Important Questions Chapter 7 संघवाद 

प्रश्न 8.
संविधान में कुछ राज्यों के लिए विशिष्ट प्रावधान किये गए हैं। उन्हें स्पष्ट कीजिए। क्या वे संघवाद के सिद्धान्त के अनुरूप हैं?
उत्तर:
कुछ राज्यों के लिए विशिष्ट प्रावधान: भारतीय संघवाद की यह अनोखी विशेषता है कि इसमें अनेक राज्यों के साथ विशिष्ट प्रावधान भी किये गये हैं। शक्ति के बँटवारे की योजना के तहत संविधान प्रदत्त शक्तियाँ सभी राज्यों को समान रूप से प्रदान की गई हैं; लेकिन कुछ राज्यों के लिए उनकी विशिष्ट सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों के अनुरूप कुछ विशिष्ट अधिकारों की व्यवस्था करता है। यथा

  1. जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए अनुच्छेद 370 का प्रावधान:
    अनुच्छेद 370 के द्वारा जम्मू-कश्मीर को अगस्त 2019 तक विशिष्ट स्थिति प्रदान की गई थी। स्वतंत्रता के बाद जम्मू-कश्मीर के महाराजा ने भारत में विलय का चयन किया, जबकि अधिकांश मुस्लिम बहुल राज्यों ने पाकिस्तान का चयन किया था। इस परिस्थिति में संविधान में अनुच्छेद 370 के तहत उसे अन्य राज्यों की तुलना में अधिक स्वायत्तता प्रदान की गई। यथा
  2. अन्य राज्यों के लिए तीन सूचियों द्वारा किया गया शक्ति विभाजन स्वतः प्रभावी होता है लेकिन जम्मू-कश्मीर राज्य में संघीय सूची और समवर्ती सूची में वर्णित शक्तियों का प्रयोग करने के लिए राज्य सरकार की सहमति लेनी पड़ती थी। इससे जम्मू-कश्मीर राज्य को ज्यादा स्वायत्तता मिल जाती थी।
  3. इसके अतिरिक्त जम्मू-कश्मीर और अन्य राज्यों में एक अन्तर यह था कि राज्य सरकार की सहमति के बिना ‘ जम्मू-कश्मीर में ‘आंतरिक अशांति’ के आधार पर आपातकाल लागू नहीं किया जा सकता था।
  4. संघ सरकार जम्मू-कश्मीर में वित्तीय आपात स्थिति लागू नहीं कर सकती थे।
  5. राज्य के नीति-निर्देशक तत्व भी यहाँ लागू नहीं होते थे।
  6. अनुच्छेद 368 के अन्तर्गत किये गये भारतीय संविधान के संशेधन भी राज्य सरकार की सहमति से ही जम्मू- कश्मीर में लागू हो सकते हैं।

लेकिन अगस्त 2019 में केन्द्र सरकार ने संविधान के अस्थायी अनुच्छेद 370 तथा 45 – A को संविधान से हटा दिया है तथा जम्मू-कश्मीर राज्य को दो संघीय क्षेत्रों

  • जम्मू-कश्मीर और
  • लद्दाख में परिवर्तित कर दिया है। इस प्रकार जम्मू-कश्मीर राज्य की यह विशिष्ट स्थिति अब समाप्त हो गई है।

2. उत्तरी-पूर्वी राज्यों के लिए अनुच्छेद 371:
अनुच्छेद 371 के तहत प्रावधान उत्तर- विशेष प्रावधानों की व्यवस्था करता है। ये राज्य हैं – असम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, त्रिपुरा, मणिपुर और -पूर्वी राज्यों के लिए मेघालय आदि। इनमें विशिष्ट इतिहास और संस्कृति वाली जनजातीय बहुल जनसंख्या निवास करती है। यहाँ के ये निवासी अपनी संस्कृति तथा इतिहास को बनाए रखना चाहते हैं।

3. कुछ अन्य राज्यों में विशिष्ट प्रावधान:
कुछ विशिष्ट प्रावधान कुछ अन्य राज्यों के लिए भी किये गये हैं। ये राज्य हैं। पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश तथा उत्तरांचल तथा अन्य राज्य आंध्रप्रदेश, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र और सिक्किम; क्योंकि इन राज्यों में कुछ पहाड़ी जनजातियाँ तथा आदिवासी निवास करते हैं। विशिष्ट प्रावधान संघवाद के सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं हैं। अनेक लोगों की मान्यता है कि संघीय व्यवस्था में शक्तियों का औपचारिक और समान विभाजन संघ के सभी राज्यों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।

अतः जब भी ऐसे विशिष्ट प्रावधानों की व्यवस्था संविधान में की जाती है तो उसका कुछ विरोध भी होता है। भारत में विशिष्ट प्रावधानों का विरोध जम्मू-कश्मीर राज्य को प्रदान किये गए अनुच्छेद 370 के प्रति है, अन्य प्रावधानों जैसे अनुच्छेद 371 आदि के प्रति नहीं है। मुखर लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में जिन परिस्थितियों में संघवाद की स्थापना की गयी है, वे परिस्थितियाँ सभी प्रान्तों में एकसमान नहीं थीं।

भारत विविधताओं से भरा देश है और इसलिए कुछ क्षेत्रों के विकास तथा उन्हें देश के अन्य क्षेत्रों के समान लाने के लिए कुछ विशिष्ट प्रावधान किये गये हैं। जिन परिस्थितियों में जम्मू-कश्मीर राज्य भारतीय संघ का भाग बनने को राजी हुआ, उस परिस्थिति में उसे विशिष्ट प्रावधान देने का वायदा किया गया था। अन्य राज्यों में आदिवासियों और पिछड़े राज्यों को उठाने तथा उनकी संस्कृति को संरक्षित रखने की दृष्टि से जो विशिष्ट प्रावधान किए गये हैं, वे संघवाद के सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं हैं।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन

Jharkhand Board JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन

Jharkhand Board Class 11 Political Science संविधान का राजनीतिक दर्शन Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
नीचे कुछ कानून दिए गए हैं। क्या इनका सम्बन्ध किसी मूल्य से है? यदि हाँ, तो वह अन्तर्निहित मूल्य क्या है? कारण बताएँ।
(क) पुत्र और पुत्री दोनों का परिवार की सम्पत्ति में हिस्सा होगा।
(ख) अलग-अलग उपभोक्ता वस्तुओं के बिक्री कर का सीमांकन अलग-अलग होगा।
(ग) किसी भी सरकारी विद्यालय में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।
(घ) बेगार अथवा बंधुआ मजदूरी नहीं करायी जा सकती।
उत्तर:
(क) ‘पुत्र और पुत्री दोनों का परिवार की सम्पत्ति में हिस्सा होगा।’ हाँ, इस कानून का सम्बन्ध समानता और सामाजिक न्याय के सामाजिक मूल्य से है। इसका कारण यह है कि संविधान में स्त्री और पुरुष दोनों को समानता का अधिकार दिया गया है। सरकार किसी कानून में लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगी। दूसरे, सामाजिक न्याय का अर्थ भी यही है कि समाज में लिंग, जाति, नस्ल, धर्म आदि के आधार पर कोई भेदभाव न हो। अतः पुत्र और पुत्री दोनों को परिवार की सम्पत्ति में समान हिस्सा दिया जाना सामाजिक न्याय के मूल्य को दर्शाता है। इस प्रकार इस कानून में समानता और सामाजिक न्याय का मूल्य अन्तर्निहित है।

(ख) ‘अलग-अलग उपभोक्ता वस्तुओं के बिक्री कर का सीमांकन अलग-अलग होगा।’ हाँ, इस कानून में भी आर्थिक न्याय का मूल्य अन्तर्निहित है। उपभोक्ता वस्तुओं को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है आवश्यक आवश्यकताओं से संबंधित उपभोक्ता वस्तुएँ और विलासिता की आवश्यकताओं से सम्बन्धित उपभोक्ता वस्तुएँ। इसके अतिरिक्त मानव के शरीर के लिए घातक उपभोक्ता वस्तुएँ भी होती हैं। हम इन्हें तीसरी श्रेणी में ले सकते हैं। ये वस्तुएँ सामान्यतः नशे से सम्बन्धित होती हैं। ऐसी स्थिति में सरकार आर्थिक – न्याय को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग श्रेणी की उपभोक्ता वस्तुओं के बिक्री कर का सीमांकन अलग-अलग करती है तथा ऐसे कानून बनाती है।

(ग) ‘किसी भी सरकारी विद्यालय में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जायेगी। हाँ, इस कानून में धार्मिक मूल्य अन्तर्निहित है और वह है। धर्मनिरपेक्षता का मूल्य/धर्मनिरपेक्षता का आदर्श मूल्य यही है कि राज्य या सरकार सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखेगी तथा किसी भी धर्म विशेष का प्रचार-प्रसार नहीं करेगी। सरकारी स्कूलों में धार्मिक शिक्षा न दिया जाना, धर्मनिरपेक्षता के मूल्य का अनुसरण है।

(घ) ‘बेगार या बंधुआ मजदूरी नहीं करायी जा सकती। हाँ, इस कानून के अन्तर्गत सामाजिक न्याय का मूल्य अन्तर्निहित है। सामाजिक न्याय का यह तकाजा है कि समाज में कसी भी वर्ग का शोषण नहीं किया जाये । यह कानून भी इसी मूल्य को लागू करता है और यह स्थापित करता है कि ‘बेगार या बंधुआ मजदूरी नहीं करायी जा सकती क्योंकि ये दोनों रूप शोषणकारी हैं।’

प्रश्न 2.
नीचे कुछ विकल्प दिये जा रहे हैं। बताएँ कि इसमें किसका इस्तेमाल निम्नलिखित कथन को पूरा करने में नहीं किया जा सकता? लोकतांत्रिक देश को संविधान की जरूरत जाएं।
(क) सरकार की शक्तियों पर अंकुश रखने के लिए होती है।
(ख) अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से सुरक्षा देने के लिए होती है।
(ग) औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता अर्जित करने के लिए होती है।
(घ) यह सुनिश्चित करने के लिए होती है कि क्षणिक आवेग में दूरगामी लक्ष्यों से कहीं विचलित न हो
(ङ) शांतिपूर्ण ढंग से सामाजिक बदलाव लाने के लिए होती है।
उत्तर:
उपर्युक्त विकल्पों में जिस कथन का इस्तेमाल इस कथन- ‘लोकतांत्रिक देश को संविधान की जरूरत- को पूरा करने के लिए नहीं किया जा सकता वह है। (ग) औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता अर्जित करने के लिए होती है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन

प्रश्न 3.
संविधान सभा की बहसों को पढ़ने और समझने के बारे में नीचे कुछ कथन दिए गए हैं। (अ) इनमें से कौनसा कथन इस बात की दलील है कि संविधान सभा की बहसें आज भी प्रासंगिक हैं? कौन-सा कथन यह तर्क प्रस्तुत करता है कि ये बहसें प्रासंगिक नहीं हैं।
(ब) इनमें से किस पक्ष का आप समर्थन करेंगे और क्यों
(क) आम जनता अपनी जीविका कमाने और जीवन की विभिन्न परेशानियों के निपटारे में व्यस्त होती है। आम जनता इन बहसों की कानून भाषा को नहीं समझ सकती।
(ख) आज की स्थितियाँ और चुनौतियाँ संविधान बनाने के वक्त की चुनौतियाँ और स्थितियों से अलग हैं। संविधान निर्माताओं के विचारों को पढ़ना और अपने नए जमाने में इस्तेमाल करना दरअसल अतीत को वर्तमान में खींच लाना है।
(ग) संसार और मौजूदा चुनौतियों को समझने की हमारी दृष्टि पूर्णतया नहीं बदली है। संविधान सभा की बहसों से हमें यह समझने के तर्क मिल सकते हैं कि कुछ संवैधानिक व्यवहार क्यों महत्त्वपूर्ण हैं। एक ऐसे समय में जब संवैधानिक व्यवहारों को चुनौती दी जा रही है, इन तर्कों को न जानना संवैधानिक व्यवहारों को नष्ट कर सकता है।
उत्तर:
(अ) इनमें से (ग) बिन्दु के अन्तर्गत दिया गया कथन इस बात की दलील है कि संविधान सभा की बहसें आज भी प्रासंगिक हैं तथा इनमें से (क) और (ख) बिन्दु के अन्तर्गत दिये गए कथन इस बात की दलील हैं कि संविधान सभा की बहसें प्रासंगिक नहीं हैं।

(ब) इनमें से मैं इस पक्ष का समर्थन करूंगा कि संसार और मौजूदा चुनौतियों को समझने की हमारी दृष्टि पूर्णतया नहीं बदली है। संविधान सभा की बहसों से हमें यह समझने के तर्क मिल सकते हैं कि कुछ संवैधानिक व्यवहार क्यों महत्त्वपूर्ण हैं। एक ऐसे समय में जब संवैधानिक व्यवहारों को चुनौती दी जा रही है, इन तर्कों को न जानना संवैधानिक व्यवहारों को नष्ट कर सकता है। इसलिए अपने संविधान के मूल में निहित राजनीतिक दर्शन को बार-बार याद करना और उसे टटोलना हमारे लिए जरूरी है और यह राजनीतिक दर्शन हमें संविधान सभा की बहसों में दिये गये तर्कों में मिलता है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित प्रसंगों के आलोक में भारतीय संविधान और पश्चिमी अवधारणा में अन्तर स्पष्ट करें।
(क) धर्मनिरपेक्षता की समझ
(ख) अनुच्छेद 370 और 371
(ग) सकारात्मक कार्य योजना या अफरमेटिव एक्शन
(घ) सार्वभौम वयस्क मताधिकार।
उत्तर:
(क) धर्मनिरपेक्षता की समझ – धर्मनिरपेक्षता की समझ के मामले में भारतीय संविधान पश्चिमी अवधारणा से अलग है। दोनों में निम्नलिखित अन्तर हैं-
1. पश्चिम में धर्मनिरपेक्षता से आशय व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता से है जबकि भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता से आशय व्यक्ति और समुदाय दोनों की धार्मिक स्वतंत्रता से है।

2. पश्चिम में धर्म और राज्य के अलगाव का अर्थ धर्म और राज्य के पारस्परिक निषेध से है जिसका अर्थ है कि धर्म और राज्य दोनों एक-दूसरे के अन्दरूनी मामलों से दूर रहेंगे। लेकिन भारत में धर्म और राज्य के अलगाव का अर्थ पारस्परिक निषेध नहीं है क्योंकि यहां धर्म से अनुमोदित ऐसे रिवाजों, जैसे छुआछूत आदि, जो व्यक्ति को उसकी मूल गरिमा और आत्मसम्मान से वंचित करते हैं; को खत्म करने के लिए राज्य को धर्म के अन्दरूनी मामलों में हस्तक्षेप करना पड़ा।

अतः यहाँ राज्य स्वतंत्रता और समता जैसे मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए धार्मिक समुदायों की मदद भी कर सकता है और उनके कार्य में हस्तक्षेप भी कर सकता है। इस प्रकार भारत में धर्म और राज्य के अलगाव का अर्थ पारस्परिक- निषेध नहीं बल्कि राज्य की धर्म से सिद्धान्तगत दूरी है।

(ख) अनुच्छेद 370 और 371 – अनुच्छेद 370 जम्मू और कश्मीर राज्य के सम्बन्ध में अस्थायी या संक्रमणकालीन व्यवस्था करता था और अनुच्छेद 371 उत्तर-पूर्व के राज्यों के लिए विशेष उपबन्धों की व्यवस्था करता है। इन दोनों अनुच्छेदों को जगह देकर भारतीय संघवाद ने ‘असमतोल संघवाद’ की अवधारणा को अपनाया है जबकि पाश्चात्य संविधानों में संघवाद की समतोल अवधारणा को अपनाया गया है। पाश्चात्य संविधानों में जहाँ सभी राज्यों को समानता का दर्जा दिया गया है तथा सभी राज्यों के अपने पृथक्-पृथक् संविधान हैं, वहां भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 का समावेश करके जम्मू-कश्मीर राज्य को शेष राज्यों की तुलना में विशेष अधिकार दिए गए थे।

लेकिन 2019 में मोदी सरकार ने 370 अनुच्छेद को हटाकर जम्मू-कश्मीर राज्य में अन्य केन्द्र प्रशासित राज्यों के समान एक केन्द्र प्रशासित राज्य बना कर इन विशेष अधिकारों को समाप्त कर दिया है। इसी प्रकार अनुच्छेद 371 का समावेश करके पूर्वी क्षेत्र के कुछ राज्यों को शेष राज्यों की तुलना में विशेष अधिकार दिये गये हैं। अनुच्छेद 371 के तहत नागालैंड व अन्य पूर्वी क्षेत्र के प्रदेशों को विशेष दर्जा दिया गया है। भारतीय संविधान के अनुसार विभिन्न प्रदेशों के साथ इस असमान बरताव में कोई बुराई नहीं है।

(ग) सकारात्मक कार्य योजना या अफरमेटिव एक्शन:
भारतीय संविधान और पाश्चात्य धारणा में सकारात्मक कार्य योजना के सम्बन्ध में बड़ा अन्तर है। अमेरिका का संविधान 1789 में लागू हुआ। वहां सकारात्मक कार्ययोजना, 1964 के नागरिक अधिकार आंदोलन के बाद प्रारंभ हुई जबकि भारतीय संविधान ने इसे लगभग दो दशक पहले ही अपना लिया था। हमारे संविधान ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आंच लाए बगैर सामाजिक न्याय के सिद्धान्त को स्वीकार किया है और जाति आधारित ‘सकारात्मक कार्य योजना’ के प्रति संवैधानिक वचनबद्धता प्रकट की है। सकारात्मक कार्य योजना के तहत भारत में उदारवादी व्यक्तिवाद को सामाजिक न्याय के सिद्धान्त तथा समूहगत अधिकार के साथ स्वीकार किया है, जबकि पाश्चात्य संविधानों में ऐसा नहीं होता है।

(घ) सार्वभौम वयस्क मताधिकार:
पाश्चात्य अवधारणा में सार्वभौम मताधिकार का अधिकार उन देशों में भी जहाँ लोकतंत्र की जड़ स्थायी रूप से जम चुकी थी, कामगार तबके और महिलाओं को काफी देर से दिया गया था जबकि भारतीय राष्ट्रवाद की धारणा में सार्वभौमिक मताधिकार का विचार राष्ट्रवाद के बीज – विचारों में एक है। इसलिए यहां भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को सार्वभौमिक मताधिकार प्रदान किया गया है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में धर्मनिरपेक्षता का कौन-सा सिद्धान्त भारत के संविधान में अपनाया गया है?
(क) राज्य का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।
(ख) राज्य का धर्म से नजदीकी रिश्ता है।
(ग) राज्य धर्मों के बीच भेदभाव कर सकता है।
(घ) राज्य धार्मिक समूहों के अधिकार को मान्यता देगा।
(ङ) राज्य को धर्म के मामलों में हस्तक्षेप करने की सीमित शक्ति होगी।
उत्तर:
भारतीय संविधान में धर्म-निरपेक्षता के निम्नलिखित सिद्धान्त अपनाए गए हैं।
(क) राज्य का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।
(घ) राज्य धार्मिक समूहों के अधिकार को मान्यता देगा।
(ङ) राज्य को धर्म के मामलों में हस्तक्षेप करने की सीमित शक्ति होगी।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित कथनों को सुमेलित करें।

(क) विधवाओं के साथ किये जाने वाले बरताव की आलोचना की आजादीआधारभूत महत्त्व की उपलब्धि
(ख) संविधान सभा में फैसलों को स्वार्थ के आधार पर नहीं बल्कि तर्कबुद्धि के आधार पर लिया जानाप्रक्रियागत उपलब्धि
(ग) व्यक्ति के जीवन में समुदाय के महत्त्व को स्वीकार करनालैंगिक न्याय की उपेक्षा
(घ) अनुच्छेद 370 और 371उदारवादी व्यक्तिवाद
(ङ) महिलाओं और बच्चों को परिवार की सम्पत्ति में असमान अधिकारक्षेत्र विशेष की जरूरतों के प्रति ध्यान देना

उत्तर:
निम्नलिखित कथनों को इस प्रकार सुमेलित किया गया है।

(क) विधवाओं के साथ किये जाने वाले बरताव की आलोचना की आजादीउदारवादी व्यक्तिवाद
(ख) संविधान सभा में फैसलों को स्वार्थ के आधार पर नहीं बल्कि तर्कबुद्धि के आधार पर लिया जानाप्रक्रियागत उपलब्धि
(ग) व्यक्ति के जीवन में समुदाय के महत्त्व को स्वीकार करनाआधारभूत महत्त्व की उपलब्धि
(घ) अनुच्छेद 370 और 371क्षेत्र विशेष की जरूरतों के प्रति ध्यान देना
(ङ) महिलाओं और बच्चों को परिवार की सम्पत्ति में असमान अधिकारलैंगिक न्याय की उपेक्षा

प्रश्न 7.
यह चर्चा एक कक्षा में चल रही थी। विभिन्न तर्कों को पढ़ें और बताएँ कि आप इनमें से किससे सहमत हैं और क्यों?
जयेश: मैं अब भी मानता हूँ कि हमारा संविधान एक उधार का दस्तावेज हैं।
सबा: क्या तुम यह कहना चाहते हो कि इसमें भारतीय कहने जैसा कुछ है ही नहीं? क्या मूल्यों और विचारों पर हम ‘भारतीय’ अथवा ‘पश्चिमी’ जैसा लेबल चिपका सकते हैं? महिलाओं और पुरुषों की समानता का ही मामला लो। इसमें ‘पश्चिमी’ कहने जैसा क्या है? और, अगर ऐसा है तो भी क्या हम इसे महज पश्चिमी होने के कारण खारिज कर दें?
जयेश: मेरे कहने का मतलब यह है कि अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई लड़ने के बाद क्या हमने उनकी संसदीय शासन की व्यवस्था नहीं अपनाई?
नेहा: तुम यह भूल जाते हो कि जब हम अंग्रेजों से लड़ रहे थे तो हम सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ थे । अब इस बात का, शासन की जो व्यवस्था हम चाहते थे उसको अपनाने से कोई लेना-देना नहीं, चाहे यह जहां से भी आई हो।
उत्तर:
इस चर्चा में जयेश का विचार है कि ‘हमारा संविधान उधार का दस्तावेज है।’ यहाँ पर आलोचना का विषय यह है कि भारतीय संविधान मौलिक नहीं है क्योंकि इसमें बहुत से अनुच्छेद तो भारतीय शासन अधिनियम, 1935 से शब्दशः लिये गये हैं और बहुत से अनुच्छेद विदेशों के संविधानों से लिये गये हैं। इसमें अपना देशी कुछ भी नहीं है। इसमें प्राचीन या मध्यकालीन भारत का कुछ भी नहीं है।

लेकिन सबा का कहना है कि कोई मूल्य या आदर्श भारतीय या पाश्चात्य नहीं हुआ करते। मूल्य तो मूल्य हैं और आदर्श तो आदर्श होते हैं। जब हम यह कहते हैं कि स्त्री और पुरुष में कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए तो यह बात पाश्चात्य और भारतीय दोनों दृष्टिकोण से ही ठीक है। हमें कोई बात केवल इस आधार पर नकारनी नहीं चाहिए कि वह पश्चिमी अवधारणा से ली गई है। लेकिन नेहा का कथन है कि जब हम ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे तो हम सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ थे, न कि शासन व्यवस्था के प्रति।

हमें कोई भी बात जो हमारे लिए उपयोगी हो, उसे अपनाने में यह नहीं देखना चाहिए कि यह कहां से लायी गयी है। इन तर्कों में हम नेहा के तर्क से सहमत हैं कि मानव की अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप जो बात जिस देश के संविधान से ली जाये उसमें कुछ भी गलत नहीं है। दूसरे देशों से ली गई बातें गलत हों, यह कहना सही नहीं है। इसके विपरीत यदि हम पुरातन भारतीय राजनीतिक संस्थाओं को लेना चाहें तो आधुनिक युग में यह जरूरी नहीं कि वे फिट बैठ सकें।

आलोचकों का यह कहना कि भारतीय संविधान में ‘भारतीयता का पुट नहीं है’ न्यायसंगत नहीं है। संविधान निर्माताओं ने भारतीय संविधान में विदेशी संविधानों से जिन संस्थाओं को ग्रहण किया है, उनको खूब सोच-विचार कर ही कि वे भारतीय परिस्थितियों के संदर्भ में उपयोगी हैं या नहीं, ग्रहण किया है तथा उन्हें ग्रहण करते समय भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढाला है। इसलिए भारतीय संविधान के निर्माण में परिवर्तन के साथ चयन की कला को भी अपनाया गया है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन

प्रश्न 8.
ऐसा क्यों कहा जाता है कि भारतीय संविधान को बनाने की प्रक्रिया प्रतिनिधिमूलक नहीं थी? क्या इस कारण हमारा संविधान प्रतिनिध्यात्मक नहीं रह जाता? अपने उत्तर में कारण बताएँ।
उत्तर:
क्या भारत का संविधान प्रतिनिध्यात्मक नहीं है? भारत के संविधान की एक आलोचना यह कह कर की जाती है कि यह प्रतिनिध्यात्मक नहीं है। क्योंकि भारतीय संविधान का निर्माण एक संविधान सभा द्वारा किया गया था जिसका गठन 1946 में किया गया था। इसके सदस्य प्रान्तीय विधानमण्डलों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुने गये थे। संविधान सभा में 389 सदस्य थे जिनमें से 292 ब्रिटिश प्रान्तों से तथा 93 देशी रियासतों से थे। चार सदस्य चीफ कमिश्नर वाले क्षेत्रों से थे।

3 जून, 1947 को भारत का विभाजन हुआ और संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या घटकर 299 रह गयी जिसमें 284 सदस्यों ने 26 नवम्बर, 1949 को संविधान पर हस्ताक्षर किये। संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव चूंकि सार्वभौम मताधिकार द्वारा नहीं हुआ था। अतः कुछ विद्वान इसे प्रतिनिधिमूलक नहीं मानते। लेकिन भारतीय संविधान की यह आलोचना कि संविधान निर्मात्री सभा प्रतिनिधि संस्था नहीं थी, त्रुटिपरक है। यद्यपि यह बात सही है कि सभा के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से नहीं हुआ था और न ही जनमत संग्रह द्वारा ही संविधान को जनता द्वारा अनुसमर्थित कराया गया था, तथापि इस आलोचना में निम्नलिखित कारणों से कोई सार नहीं है।

  1. 1946 में जिन परिस्थितियों में संविधान सभा का निर्माण हुआ, उनमें वयस्क मताधिकार के आधार पर इस प्रकार की सभा का निर्माण संभव नहीं था।
  2. यदि संविधान सभा का गठन प्रत्यक्ष निर्वाचन के आधार पर होता अथवा यदि इस संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान के प्रारूप पर जनमत संग्रह करवाया जाता, तब भी संविधान सभा का स्वरूप कम या अधिक ऐसा ही होता। क्योंकि 1952 के प्रथम आम चुनाव में संविधान सभा के अधिकांश सदस्यों ने चुनाव लड़ा तथा काफी अच्छे बहुमत से विजय प्राप्त की।
  3. तत्कालीन भारत के सबसे प्रमुख राजनैतिक दल ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ ने संविधान सभा को अधिकाधिक प्रतिनिधि स्वरूप प्रदान करने की प्रत्येक संभव और अधिकांश अंशों में सफल चेष्टा की थी।
  4. अगर हम प्रतिनिधित्व को ‘राय’ से जोड़ें तो हमारे संविधान में अप्रतिनिधित्व नहीं है। क्यों संविधान सभा में हर किस्म की राय रखी गयी । यदि हम संविधान सभा में हुई बहसों को पढ़ें तो जाहिर होगा कि सभा में बहुत से मुद्दे उठाए गए और बड़े पैमाने पर राय रखी गयी। सदस्यों ने अपने व्यक्तिगत और सामाजिक सरोकार पर आधारित मसले ही नहीं बल्कि समाज के विभिन्न तबके के सरोकारों और हितों पर आधारित मसले भी उठाये।

प्रश्न 9.
भारतीय संविधान की एक सीमा यह है कि इसमें लैंगिक: न्याय पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। आप इस आरोप की पुष्टि में कौन-से प्रमाण देंगे? यदि आज आप संविधान लिख रहे होते, तो इस कमी को दूर करने के लिए उपाय के रूप में किन प्रावधानों की सिफारिश करते?
उत्तर:
भारतीय संविधान में लैंगिक न्याय की उपेक्षा: भारतीय संविधान में कुछ सीमाएँ भी हैं। उनमें से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सीमा लैंगिक न्याय पर पर्याप्त ध्यान न देने की है। इसमें लैंगिक न्याय के कुछ महत्त्वपूर्ण मसलों खासकर परिवार से जुड़े मुद्दों पर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया है। यथा गया है

1. परिवार की सम्पत्ति में स्त्रियों और बच्चों को समान अधिकार नहीं दिये गये हैं। बेटे और बेटी में अन्तर किया।

2. मूल सामाजिक-आर्थिक अधिकार राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों में शामिल किये गये हैं जबकि उन्हें मौलिक अधिकारों में शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी सकती।
समान कार्य के लिए स्त्री तथा पुरुष दोनों को समान वेतन राज्य के द्वारा संरक्षित किया गया है। यह अधिकार नीति निर्देशक तत्त्वों में शामिल किया गया है। यह अधिकार मूल अधिकारों का भाग होना चाहिए था क्योंकि राज्य तभी समान कार्य के लिए स्त्री-पुरुष दोनों को समान वेतन दिला सकता है जबकि नीति निर्देशक तत्त्वों के लिए राज्य केवल प्रयास करेगा।

3. भारत के संविधान में पिछड़े वर्गों के लिए राज्य द्वारा आरक्षण किये जाने का प्रावधान किया गया है। भारत में स्त्रियाँ पुरुषों की तुलना में बहुत पिछड़ी हुई हैं। आर्थिक-सामाजिक, शैक्षिक सभी दृष्टियों से पिछड़ी हुई हैं। अतः स्त्रियों को आरक्षण की सुविधा प्रदान कर लैंगिक न्याय की स्थापना की जानी चाहिए। आज तक स्त्रियों को 33 प्रतिशत आरक्षण संसद व राज्य विधानमण्डल में नहीं दिलवाया जा सका है।

यदि आज हम संविधान लिख रहे होते तो लैंगिक न्याय के जो प्रावधान नीति-निर्देशक तत्त्वों में दिये गये हैं, उन्हें मूल अधिकारों की श्रेणी में सम्मिलित करते तथा परिवार से जुड़े मुद्दे जैसे। परिवार की सम्पत्ति में स्त्रियों और बच्चों को समान अधिकार दिये जाने का प्रावधान किये जाते तथा स्त्रियों को 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करते।

प्रश्न 10.
क्या आप इस कथन से सहमत हैं कि। ” एक गरीब और विकासशील देश में कुछ एक बुनियादी सामाजिक-आर्थिक अधिकार मौलिक अधिकारों की केन्द्रीय विशेषता के रूप में दर्ज करने के बजाय राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्वों वाले खंड में क्यों रख दिए गए यह स्पष्ट नहीं है।” आपकी जानकारी में सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को नीति-निर्देशक तत्त्व वाले खंड में रखने के क्या कारण रहे होंगें?
उत्तर:
नीति-निर्देशक तत्त्व:
भारतीय संविधान की एक प्रमुख विशेषता राज्य की नीति के निर्देशक तत्त्व हैं जो कि आयरलैंड के संविधान से ग्रहण किए गए हैं। भारतीय संविधान निर्माताओं ने संविधान में केवल राज्य या सरकार के अंगों व उनकी शक्तियों व संरचना का ही वर्णन नहीं किया है बल्कि इसमें नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया है तथा नीति की वह दिशा भी निश्चित की गई है जिसकी ओर बढ़ने का प्रयत्न केन्द्र तथा राज्यों की सरकारों को करना है। संविधान निर्माताओं का लक्ष्य भारत में लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना था।

इसलिए उन्होंने नीति- निर्देशक तत्त्वों में ऐसी बातों का समावेश किया, जिन्हें कार्य रूप में परिणत किये जाने पर लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना संभव हो सकती थी। ये निर्देशक तत्त्व हमारे राज्य के सम्मुख कुछ आदर्श उपस्थित करते हैं जिनके द्वारा देश के नागरिकों का सामाजिक, आर्थिक और नैतिक उत्थान हो सकता है।

नीति निर्देशक तत्त्वों की प्रकृति-नीति निर्देशक तत्त्व वाद योग्य नहीं हैं। इन तत्त्वों को किसी भी न्यायालय द्वारा बाध्यता नहीं दी जा सकती। इस प्रकार नीति निर्देशक तत्त्वों को मूल अधिकारों के समान वैधानिक शक्ति प्रदान नहीं की गई है। इसका अर्थ है कि नीति निर्देशक तत्त्वों की क्रियान्विति के लिए न्यायालय के द्वारा किसी भी प्रकार के आदेश जारी नहीं किये जा सकते। लेकिन वैधानिक महत्त्व प्राप्त न होने पर भी ये तत्त्व शासन के संचालन के आधारभूत सिद्धान्त हैं और राज्य का यह कर्त्तव्य है कि व्यवहार में सदैव ही इन तत्त्वों का पालन करे।

सामाजिक: आर्थिक अधिकारों को नीति-निर्देशक वाले खंड में रखने के कारण संविधान निर्माताओं ने नीति निर्देशक तत्त्वों को मूल अधिकारों के खंड में इसलिए नहीं रखा क्योंकि वे इन्हें वाद योग्य नहीं बनाना चाहतेथे । इसका कारण यह था कि भारत उस समय पराधीनता के चंगुल से छूटा था। उसकी आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि यदि नीति निर्देशक तत्त्वों को वाद योग्य बनाया जाता तो आर्थिक संकट उभर सकता था और उसके कारण समय-समय पर अनेक समस्यायें उठ सकती थीं।

इस स्थिति से बचने के लिए संविधान निर्माताओं ने नीति निर्देशक तत्त्वों के सम्बन्ध में राज्य को निर्देश दिया है कि वे इन्हें अपनी सामर्थ्य के अनुकूल पूरा करने का प्रयास करें। इनके सम्बन्ध में नागरिकों को यह अधिकार नहीं दिया गया है कि वे इन तत्त्वों को पूरा कराने के लिए राज्य के विरुद्ध न्यायालय में जा सकें।

संविधान का राजनीतिक दर्शन JAC Class 11 Political Science Notes

→ संविधान के दर्शन का क्या आशय है?
कानून और नैतिक मूल्यों के बीच गहरा सम्बन्ध है। इसी कारण संविधान को एक ऐसे दस्तावेज के रूप में देखना जरूरी है जिसके पीछे एक नैतिक दृष्टि काम कर रही हो। संविधान के प्रति राजनैतिक दर्शन का नजरिया अपनाने की जरूरत है। संविधान के प्रति राजनैतिक दर्शन के नजरिये में तीन बातें शामिल हैं।

  • संविधान कुछ अवधारणाओं के आधार पर बना है। जैसे अधिकार, नागरिकता, अल्पसंख्यक, लोकतंत्र आदि इन अवधारणाओं की व्याख्या हमारे लिए जरूरी है।
  • संविधान का निर्माण जिन आदर्शों की नींव पर हुआ है, उन पर हमारी गहरी पकड़ होनी चाहिए।
  • संविधान के आदर्शों और मूल्यों की सुसंगतता के पीछे क्या तर्क दिये गये हैं।

→ इस प्रकार संविधान के अन्तर्निहित नैतिक तत्त्व को जानने और उसके दावे के मूल्यांकन के लिए संविधान के प्रति राजनीतिक दर्शन का नजरिया अपनाने की जरूरत है ताकि हम अपनी शासन व्यावस्था के बुनियादी मूल्यों की अलग-अलग व्याख्याओं को एक कसौटी पर जांच सकें । संविधान के आदर्श अपने-आप में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। मूल्यों या आदर्शों की भिन्न-भिन्न व्याख्याओं की जांच हेतु संविधान के आदर्शों का प्रयोग एक कसौटी के रूप में होना चाहिए।

→ संविधान – लोकतांत्रिक बदलाव का साधन:
संविधान को अंगीकार करने का एक बड़ा कारण है-सत्ता को निरंकुश होने से रोकना। संविधान सत्ता के बुनियादी नियम प्रदान करता है और राज्य को निरंकुश होने से रोकता है। संविधान हमें गहरे सामाजिक बदलाव के लिए शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक साधन भी प्रदान करता है। औपनिवेशिक दासता में रहे लोगों के लिए संविधान राजनीतिक आत्मनिर्णय का उद्घोष है।

→ और इसका पहला वास्तविक अनुभव भी। भारतीय संविधान का निर्माण परम्परागत सामाजिक ऊँच-नीच के बंधनों को तोड़ने और स्वतंत्रता, समता और न्याय के युग में प्रवेश के लिए हुआ। इस दृष्टि से संविधान की मौजूदगी सत्तासीन लोगों की शक्ति पर अंकुश ही नहीं लगाती बल्कि जो लोग परम्परागत तौर पर सत्ता से दूर रहे हैं उनका सशक्तिकरण भी करती है। संविधान सभा की ओर मुड़कर क्यों देखें?

→ जब संवैधानिक व्यवहार: बरताव को चुनौती मिले, खतरा मंडराये या उपेक्षा हो, तब इन पर पकड़ बनाए रखने के लिए इनके (व्यवहार – बरतावों के ) मूल्य और अर्थ को समझने के लिए संविधान सभा की बहसों को मुड़कर देखने के सिवा हमारे पास कोई चारा नहीं रहता। इसलिए अपने संविधान के मूल में निहित राजनीतिक दर्शन को बार-बार याद करना और उसे टटोलना हमारे लिए जरूरी है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन

→ हमारे संविधान का राजनीतिक दर्शन क्या है?
भारतीय संविधान स्वतंत्रता, समानता, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय तथा राष्ट्रीय एकता का राजनीतिक दर्शन है। इन सबके साथ वह इस बात पर भी बल देता है कि उसके दर्शन पर शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अमल किया जाये। यथा-

→ व्यक्ति की स्वतंत्रता: भारतीय संविधान व्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध है। यह प्रतिबद्धता लगभग एक सदी तक निरंतर चली बौद्धिक और राजनैतिक गतिविधियों का परिणाम है। आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारे संविधान का अभिन्न अंग है। इसी तरह, मनमानी गिरफ्तारी के विरुद्ध हमें स्वतंत्रता प्रदान की गई है। मौलिक अधिकारों में भारतीय संविधान में व्यक्ति की स्वतंत्रता को अत्यधिक महत्त्व दिया गया है। इस दृष्टि से भारतीय संविधान एक उदारवादी संविधान है।

→ सामाजिक न्याय:
भारतीय संविधान का उदारवाद शास्त्रीय उदारवाद से भिन्न है क्योंकि यह सामाजिक न्याय से जुड़ा है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण का प्रावधान इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। विविधता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सम्मान संविधान का उदारवाद सामुदायिक जीवन-मूल्यों का पक्षधर है। भारतीय संविधान समुदायों के बीच बराबरी के रिश्ते को बढ़ावा देता है। भारत में अनेक सांस्कृतिक, भाषायी और धार्मिक समुदाय हैं। इन समुदायों के बीच बराबरी के रिश्ते को बढ़ाने के लिए समुदाय आधारित अधिकारों को मान्यता देना जरूरी हो गया। ऐसे ही अधिकारों में से एक है। धार्मिक समुदाय का अपनी शिक्षा संस्था स्थापित करने और चलाने का अधिकार।

→ धर्मनिरपेक्षता: भारतीय संविधान एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना करता है। धर्मनिरपेक्ष राज्य से आशय यह है कि राज्य न तो किसी धार्मिक संस्था की मदद करेगा और न ही उसे बाधा पहुँचायेगा। वह धर्म से एक सम्मानजनक दूरी बनाये रखेगा। इसी प्रकार राज्य नागरिकों को अधिकार प्रदान करते हुए धर्म को आधार नहीं बनायेगा। राज्य को व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए चाहे उस व्यक्ति का धर्म कोई भी हो।

→ धार्मिक समूहों के अधिकार: भारतीय संविधान सभी धार्मिक समुदायों को शिक्षा संस्थान स्थापित करने और चलाने का अधिकार प्रदान करता है। भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ व्यक्ति और समुदाय दोनों की धार्मिक स्वतंत्रता होता है।

→ राज्य का हस्तक्षेप करने का अधिकार:
धर्म और राज्य के अलगाव का अर्थ भारत में पारस्परिक निषेध ( धर्म और राज्य दोनों एक-दूसरे के अंदरूनी मामलों से दूर रहेंगे) नहीं हो सकता क्योंकि धर्म से अनुमोदित रिवाज, जैसे- छुआछूत, व्यक्ति को उसकी मूल गरिमा और आत्मसम्मान से वंचित करते हैं। राज्य के हस्तक्षेप के बिना इनके खात्मे की उम्मीद नहीं थी। इसलिए यहाँ राज्य को धर्म के अन्दरूनी मामले में हस्तक्षेप करना ही पड़ा।

से हस्तक्षेप नकारात्मक के साथ-साथ सकारात्मक भी हो सकते हैं, जैसे- राज्य धार्मिक संगठन द्वारा चलाए जा रहे शिक्षा संस्थान को धन दे सकता है। यह इस बात पर निर्भर है कि राज्य के किन कदमों से स्वतन्त्रता और समता जैसे मूल्यों को बढ़ावा मिलता है। दूरी है। अतः भारत में धर्म और राज्य के अलगाव का अर्थ पारस्परिक निषेध नहीं बल्कि राज्य की धर्म से सिद्धान्तगत, भारतीय संविधान की उपलब्धियाँ भारतीय संविधान की ये उपलब्धियाँ हैं।

  • भारतीय संविधान ने उदारवादी व्यक्तिवाद को एक शक्ल देकर उसे मजबूत किया है।
  • भारतीय संविधान ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आंच लाए बगैर सामाजिक न्याय के सिद्धान्त को स्वीकार किया
  • भारतीय संविधान ने सामुदायिक विविधता व तनाव के बावजूद समूहगत अधिकार प्रदान किये हैं।
  • सार्वभौमिक मताधिकार के प्रति वचनबद्धता भारतीय संविधान की चौथी उपलब्धि है।
  • पूर्वोत्तर से संबंधित अनुच्छेदों को जगह देकर भारतीय संविधान ने ‘असमतोल संघवाद’ जैसी महत्त्वपूर्ण अवधारणा को अपनाया है। लेकिन भारत के लोकतांत्रिक और भाषायी संघवाद ने सांस्कृतिक पहचान के दावे को एकता के दावे के साथ जोड़ने में सफलता पायी है।

→ राष्ट्रीय पहचान: संविधान में समस्त भारतीय जनता की एक राष्ट्रीय पहचान पर निरंतर जोर दिया गया है। हमारी इस राष्ट्रीय पहचान का भाषा या धर्म के आधार पर बनी अलग- अलग पहचानों से कोई विरोध नहीं हैं। भारतीय संविधान में इन दो पहचानों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई है। फिर भी, किन्हीं विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रीय पहचान को वरीयता प्रदान की गई है। फैसला

→ प्रक्रियागत उपलब्धि:

  • भारतीय संविधान का विश्वास राजनीतिक विचार-विमर्श में है।
  • सुलह और समझौते पर बल देना। संविधान सभा इस बात पर अडिग थी कि किसी महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर बहुमत के बजाय सर्वानुमति से लिया जाये।

→ आलोचना: भारतीय संविधान की प्रमुख आलोचनाएँ ये हैं;
यह संविधान अस्तव्यस्त है। भारतीय संविधान में संवैधानिक हैसियत के ऐसे बहुत से वक्तव्यों, ब्यौरों, और कायदों को एक ही दस्तावेज के अन्दर समेट लिया है, जो प्रायः कसे हुए संविधान में संविधान से बाहर होते हैं। जैसे चुनाव आयोग तथा लोक सेवा आयोग सम्बन्धी संवैधानिक प्रावधान।

→ इसमें सबकी नुमाइंदगी नहीं हो सकी है। हमारे संविधान में गैर- नुमाइंदगी इसलिए थी क्योंकि संविधान सभा के सदस्य सीमित मताधिकार से चुने गये थे, न कि सार्वभौमिक मताधिकार से। लेकिन यदि हम संविधान सभा की बहसों को पढ़ें तो स्पष्ट होता है कि सभा में बहुत से मुद्दे उठाये गए और उन पर बड़े पैमाने पर राय रखी गयी। इस दृष्टि से भारतीय संविधान में सबकी नुमाइंदगी दिखाई देती है।

→ यह संविधान भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल नहीं है। यह कहा जाता है कि भारतीय संविधान एक विदेशी दस्तावेज है। इसका हर अनुच्छेद पश्चिमी संविधानों की नकल है तथा भारतीय जनता के सांस्कृतिक भावबोध से इसका मेल नहीं बैठता। लेकिन यह आरोप गलत है। यह बात सच है कि भारतीय संविधान आधुनिक और अंशतः पश्चिमी है, लेकिन इससे यह पूरी तरह विदेशी नहीं हो जाता बल्कि यह संविधान सचेत चयन और अनुकूलन का परिणाम है न कि नकल का।

→ संविधान की सीमाएँ।

  • भारतीय संविधान में राष्ट्रीय एकता की धारणा बहुत केन्द्रीकृत है।
  • इसमें लिंगागत-न्याय के कुछ महत्त्वपूर्ण मसलों विशेषकर परिवार से जुड़े मुद्दों पर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया है।
  • कुछ बुनियादी सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को नीति-निर्देशक वाले खंड में डाल दिया गया है। लेकिन संविधान की ये सीमाएँ इतनी गंभीर नहीं हैं कि ये संविधान के दर्शन के लिए ही खतरा पैदा कर दें।

→ निष्कर्ष: भारत का संविधान एक जीवन्त दस्तावेज है। इसकी केन्द्रीय विशेषताएँ इसे जीवन्त बनाती हैं। संविधान सभा ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उत्पन्न संवैधानिक दर्शन को परिष्कार कर उसे संविधान के रूप में विधिक सांस्थानिक रूप प्रदान किया है। संविधान के दर्शन का सर्वोत्तम सार-संक्षेप संविधान की प्रस्तावना में है। इसमें समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व के उद्देश्यों के साथ-साथ यह भी कहा गया है कि जनता ने संविधान का निर्माण किया है और लोकतंत्र एक साधन है जिसके सहारे जनता वर्तमान और भविष्य को आकार देती है।