JAC Class 10 Hindi रचना सूचना-लेखन

Jharkhand Board JAC Class 10 Hindi Solutions Rachana सूचना-लेखन Questions and Answers, Notes Pdf.

JAC Board Class 10 Hindi Rachana सूचना-लेखन

किसी संस्थान में सब के सूचनार्थ जारी किए गए वे आदेश जो संस्थान की दैनिक कार्यवाही के लिए आवश्यक होते हैं, नोटिस अथवा सूचना
कहलाते हैं। सूचना कम शब्दों में औपचारिक रूप से लिखी गई संक्षिप्त जानकारी होती है। सूचना लेखन के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं –

  • सबसे पहले संस्था का नाम या शीर्षक लिखिना चाहिए।
  • फिर सूचना जारी करने की दिनांक लिखिनी चाहिए।
  • फिर सूचना लेखन का उद्देश्य लिखिना चाहिए।
  • सूचना की भाषा संक्षिप्त, स्पष्ट तथा सरल होनी चाहिए।

प्रश्न 1.
महर्षि दयानंद विद्यालय दिनांक 15 मई से 1 जुलाई, 20… तक ग्रीष्मावकाश के लिए बंद रहेगा। इस आशय की सूचना लिखिए।
उत्तर :

सूचना
महर्षि दयानंद विद्यालय, जयपुर

दिनांक 10 मई, 20…..
सभी विद्यार्थियों तथा अध्यापकों को सूचित किया जाता है कि ग्रीष्मावकाश के कारण विद्यालय 15 मई से 1 जुलाई, 20… तक बंद रहेगा। विद्यालय 2 जुलाई को प्रातः 8 बजे खुलेगा।
सर्वजीत कौर
प्राचार्य

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प्रश्न 2.
राजकीय विद्यालय, फरीदकोट के अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों को अपनी छात्रवृत्ति महाविद्यालय के लेखापाल से प्राप्त करने की सूचना लिखिए।
उत्तर :

सूचना
राजकीय विद्यालय, फरीदकोट

दिनांक 10 अगस्त, 20….
अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों की छात्रवृत्तियाँ पंजाब सरकार से प्राप्त हो गई हैं। वे विद्यालय के लेखापाल से खिड़की संख्या दो पर अपनी छात्रवृत्ति किसी भी कार्य दिवस में प्रातः 9 बजे से दोपहर 1.00 बजे तक प्राप्त कर सकते हैं।
गोविंद सिंह बेदी
प्राचार्य

प्रश्न 3.
श्री हरबंस लाल भंडारी का पंद्रह वर्षीय लड़का घर से भाग गया है। उसकी तलाश के लिए सूचना लिखिए।
उत्तर :

सूचना
गुमशुदगी की सूचना

दिनांक 25 सितंबर, 20 ….

सबको सूचित जाता है कि मेरा पुत्र जिसका नाम संदीप कुमार है दिनांक 22 सितंबर से घर से लड़कर भाग गया है। उसकी उम्र पंद्रह वर्ष, कद 5′-2″, शरीर गठीला, चेहरा गोल तथा बाएँ गाल पर चोट का निशान है। उसने काली – सफ़ेद धारियों वाली कमीज़ तथा पैंट पहनी हुई है। उसका पता देने वाले अथवा घर तक पहुँचाने वाले को समुचित पुरस्कार दिया जाएगा। यदि संदीप स्वयं इस सूचना को पढ़ता है तो वह स्वयं घर चला आए। उसकी माँ बहुत बीमार है। उसे अब कोई कुछ नहीं कहेगा।
हरबंस लाल भंडारी
512, सदर बाज़ार,
फिरोज़पुर छावनी

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प्रश्न 4.
भूकंप पीड़ितों की सहायता के लिए सूचना लिखिए।
उत्तर :

सूचना
भूकंप पीड़ितों के लिए आर्थिक सहायता

दिनांक 28 जनवरी, 20….
आम जनता को सूचित किया जाता है कि जो दानी महानुभाव / स्वयंसेवी संगठन और निजी तौर पर गुजरात के भूकंप पीड़ितों के लिए राहत कार्यों हेतु वित्तीय सहायता देने के इच्छुक हैं, वे ‘पंजाब चीफ मिनिस्टर रिलीफ फंड गुजरात’ के नाम चैक / ड्रॉफ्ट तैयार करवा के पंजाब सिविल सचिवालय, चंडीगढ़ में मुख्यमंत्री के कार्यालय में डाक द्वारा या स्वयं दे सकते हैं।
जारीकर्ता
सूचना एवं लोक संपर्क, पंजाब

प्रश्न 5.
अपने विद्यालय में वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह मनाने के लिए सूचना लिखिए।
उत्तर :

सूचना
गुरु नानक देव कन्या विद्यालय, खन्ना

दिनांक 13 मार्च, 20….

विद्यालय का वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह विद्यालय परिसर में शनिवार दिनांक 17 मार्च, 20…. को प्रातः 11.00 बजे मनाया जाएगा। मुख्य अतिथि शिक्षा आयुक्त श्रीमती सिमरण कौर होंगी। सभी विद्यार्थियों और अध्यापकों की उपस्थिति अनिवार्य है।
समारोह के बाद जलपान की व्यवस्था है।
तृप्ता सचदेव
प्रधानाचार्या

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प्रश्न 6.
अपने विद्यालय में कवि सम्मेलन के आयोजन की सूचना लिखिए।
उत्तर :

सूचना
माता प्रकाश कौर कन्या उच्च विद्यालय, फिरोज़पुर

दिनांक 15 नवंबर, 20….

सभी विद्यार्थियों को सूचित किया जाता है कि मंगलवार दिनांक 19 नवंबर, 20…. को प्रातः 11.00 बजे विद्यालय परिसर में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया है। इच्छुक विद्यार्थी प्रधानाचार्या कार्यालय में संपर्क करें।
सिमरन कौर
प्रधानाचार्या

प्रश्न 7.
अपने विद्यालय में वृक्षारोपण समारोह मनाने के लिए सूचना लिखिए।
उत्तर :

सूचना
भारतीय विद्या मंदिर, जयपुर

दिनांक 14 जुलाई, 20 ….
समस्त विद्यार्थियों तथा अध्यापकों को सूचित किया जाता है कि विद्यालय परिसर में बुधवार, दिनांक 20 जुलाई, 20…. को प्रात: 10.00 बजे वृक्षारोपण समारोह का आयोजन किया जा रहा है। इस समारोह की अध्यक्षता प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ० गोविंद खुराना करेंगे तथा विद्यालय प्रांगण में वृक्ष लगाए जाएँगे। सभी विद्यार्थियों और अध्यापकों की उपस्थिति अनिवार्य है।
के०सी० भाटी
प्रधानाचार्य

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प्रश्न 8.
अपने विद्यालय में विज्ञान प्रदर्शनी के आयोजन की सूचना लिखिए।
उत्तर :

सूचना
दयाल सिंह पब्लिक स्कूल, गांधीनगर

दिनांक 12 फरवरी, 20….
सभी विद्यार्थियों और अध्यापकों को सूचित किया जाता है कि सोमवार, दिनांक 21 फरवरी, 20….. प्रात: 10.00 बजे विद्यालय परिसर में विज्ञान प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है। सभी की उपस्थिति अनिवार्य है।
एस०के० मकवाना
प्रधानाचार्य
सूचना-लेखन

प्रश्न 9.
अपने विद्यालय में बाल दिवस मनाए जाने की सूचना लिखिए।
उत्तर :

सूचना
राजकीय उच्च विद्यालय, कानपुर

दिनांक 10 नवंबर, 20 ….

सभी विद्यार्थियों और अध्यापकों को सूचित किया जाता है कि विद्यालय परिसर में बुधवार, दिनांक 14 नवंबर, 20…. को प्रात: 10.00 बजे बाल दिसव मनाया जाएगा, जिसमें अनेक विद्वान अपने-अपने विचार प्रस्तुत करेंगे। इस समारोह में सभी की उपस्थिति अनिवार्य है।
समारोह के पश्चात जलपान का प्रबंध है।
आशीष वाजपेयी
प्राचार्य

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प्रश्न 10.
अपने विद्यालय में अध्यापक दिवस मनाने के लिए सूचना लिखिए।
उत्तर :

सूचना
आर्य कन्या विद्यालय, वाराणसी

दिनांक 01 सितंबर, 20 ….
सभी विद्यार्थियों तथा अध्यापकों को सूचित किया जाता है कि दिनांक 05 सितंबर, 20…. को प्रातः 9.00 बजे विद्यालय प्रांगण में अध्यापक दिवस मनाया जाएगा। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अध्यापक श्री विकास शुक्ला करेंगे।
इस कार्यक्रम में सभी की उपस्थिति अनिवार्य है।
देवेन्द्र मिश्रा
प्राचार्य

प्रश्न 11.
अपने विद्यालय में हिंदी दिवस मनाने के लिए सूचना लिखिए।
उत्तर :

सूचना
छबीलदास विद्यालय, गाजियाबाद

दिनांक 8 सितंबर, 20….
सभी विद्यार्थियों और अध्यापकों को सूचित किया जाता है कि दिनांक 14 सितंबर 20…. को प्रातः 10.00 बजे विद्यालय परिसर में हिंदी दिवस मनाया जाएगा। इस अवसर पर हिंदी भाषण प्रतियोगिता का आयोजन होगा। विद्यार्थी अपने-अपने विचार प्रस्तुत करेंगे।
अशोक कुमार
हिंदी विभाग अध्यक्ष

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प्रश्न 12.
नवनिर्मित क्लीनिक के उद्घाटन के लिए सूचना लिखिए।
उत्तर :

सूचना
ननकाना क्लीनिक का उद्घाटन

दिनांक 10 दिसंबर, 20….
आप सभी को सूचित किया जाता है कि भगवान की असीम कृपा से अपने सुपुत्र डॉ० ओंकार ननकाना के नव-निर्मित औषधालय ‘ननकाना क्लीनिक’ के डॉ० जी०एस० सोढी द्वारा मुहूर्त के शुभ अवसर पर आशीर्वाद देने हेतु श्री किशन चंद्र ननकाना आपको दिनांक 21 दिसंबर 20…. को कार्यक्रमानुसार सादर आमंत्रित करते हैं।

र्कायिक्रम
हवन – 10.00 बजे प्रातः
जलपान 11.30 बजे प्रातः
स्थान: निकट पुलिस चौकी, राम नगर, फाजिल्का

दर्शनाभिलाषी
कैलाश चंद्र ननकाना

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प्रश्न 13.
खेल – कूद की पुरानी सामग्री की बेचने के लिए सूचना लिखिए।
उत्तर :

सूचना
डी०ए०वी० विद्यालय, दिल्ली

दिनांक 21 अगस्त, 20….
आप सभी को सूचित किया जाता कि खेल – कूद की बहुत सारी सामग्रियों को बेहद किफायती दामों पर बेचा जाने वाला है। सभी खेल उपकरण एवं सामग्री एकदम सही हालत में है। जो कोई भी इन्हें खरीदना चाहता है, वह इस महीने की दस तारीख को विद्यालय के हॉल में दोपहर एक बजे तक आ जाए। सामग्री की कीमत उसी समय देनी होगी।
अशोक मेहता
खेल, कप्तान

प्रश्न 14.
विद्यालय में रक्तदान शिविर आयोजित किया जाने वाला है, इस हेतु एक सूचना जारी कीजिए।
उत्तर :

सूचना
नवोदय विद्यालय, पटना

दिनांक 12 नवंबर, 20….
हमारे विद्यालय में दिनांक 20 नवंबर, 20…. को एक रक्तदान शिविर लगाया जा रहा है। शहर के उपायुक्त शिविर का उद्घाटन तथा अध्यक्षता करेंगे। रक्तदान करना मानवता के लिए सबसे बड़ा दान है। जो भी रक्तदान के लिए इच्छुक हों वे निश्चित तिथि पर विद्यालय के हॉल में आ जाएँ।
विवेक झा
प्रधानाचार्य

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प्रश्न 15.
विद्यालय में साहित्यिक क्लब के सचिव के रूप में ‘प्राचीर’ पत्रिका के लिए लेख, कविता, निबंध आदि विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत करने हेतु सूचना-पट के लिए एक सूचना लगभग 30 शब्दों में लिखिए।
उत्तर :

सूचना
टैगोर विद्या मंदिर, चेन्नई

दिनांक : 25 जुलाई, 20….
विद्यालय की पत्रिका ‘प्राचीर’ में प्रकाशनार्थ हेतु लेख, कविता, निबंध आदि विद्यार्थियों से आमंत्रित किए जाते हैं। इच्छुक विद्यार्थी अपनी रचनाएँ दिनांक 12 अगस्त तक साहित्यिक क्लब के सचिव को दे दें।
वी० – रमा
सचिव, साहित्यिक क्लब
आर०के० मेनन प्राचार्य

प्रश्न 16.
विद्यालय में छुट्टी के दिनों में भी प्रातः काल में योग की अभ्यास कक्षाएँ चलने की सूचना देते हुए इच्छुक विद्यार्थियों द्वारा अपना नाम देने हेतु सूचना पट्ट के लिए यह सूचना लगभग 30 शब्दों में लिखिए।
उत्तर :

सूचना
विवेकानंद विद्या मंदिर, नागपुर

दिनांक 15 जून, 20…..
समस्त विद्यार्थियों को सूचित किया जाता है कि विद्यालय में छुट्टी के दिनों में भी प्रात: काल 6 बजे से 7 बजे तक योग की अभ्यास कक्षाएँ लगेंगी। इसमें भाग लेने के इच्छुक विद्यार्थी अपने नाम दिनांक 20 जून, 20… तक अपनी-अपनी कक्षा के अध्यापकों को दे दें।
देवेंद्र नाथ पुरोहित
प्राचार्य

JAC Class 10 Hindi रचना सूचना-लेखन

प्रश्न 17.
विद्यालय में आयोजित होने वाली वाद-विवाद प्रतियोगिता के लिए एक सूचना लगभग 30 शब्दों में साहित्यिक क्लब के सचिव की ओर से विद्यालय सूचना पट के लिए लिखिए।
उत्तर :

सूचना
भारतीय विद्या मंदिर, जयपुर

दिनांक 15 सितंबर 20…….
सभी विद्यार्थियों को सूचित किया जाता है कि दिनांक 19 सितंबर, 20….. को प्रात: 10.00 बजे विद्यालय के सभागार में साहित्यिक क्लब की ओर से ‘बाल मज़दूरी’ विषय पर वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है। इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए विद्यार्थी दिनांक 18-9-20 तक अपने नाम साहित्यिक कल्ब के सचिव को दे दें।
सुधा राजे
सचिव, साहित्यिक क्लब

प्रश्न 18.
विद्यालय में वृक्षारोपण समारोह के आयोजन के लिए आपको संयोजक बनाया गया है। पूरे विद्यालय की सहभागिता के लिए एक सूचना लगभग 30 शब्दों में तैयार कीजिए।
उत्तर :

सूचना
टैगोर विद्या मंदिर, नई दिल्ली

दिनांक : 15 जुलाई, 20…….

विद्यालय के समस्त विद्यार्थियों एवं अध्यापक गण को सूचित किया जाता है कि विद्यालय परिसर में दिनांक 21 जुलाई, 20को प्रात: 10.00 बजे वृक्षारोपण समारोह का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें सबकी सहभागिता अपेक्षित है। समारोह की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद् डॉ० एस० के० भट्ट करेंगे।
संजीव चौधरी
संयोजक, पर्यावरण क्लब

JAC Class 10 Hindi रचना सूचना-लेखन

प्रश्न 19.
विद्यालय परिसर के बाहर अनधिकृत व्यक्तियों द्वारा स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक खाद्य वस्तुएँ बेची जाती हैं और विद्यार्थी उस ओर आकृष्ट होकर उन वस्तुओं को खरीदते हैं। विद्यालय के छात्र प्रमुख के रूप में इन चीजों से दूर रहने की सलाह देते हुए एक सूचना लगभग 30 शब्दों में लिखिए।
उत्तर :

सूचना
नवोदय विद्यालय, राजेंद्र नगर

दिनांक 12 जुलाई, 20……
समस्त विद्यार्थियों को सूचित किया जाता है कि विद्यालय परिसर के बाहर ठेले वाले जो खाद्य-पदार्थ बेचते हैं, वे स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक होते हैं। इसलिए कोई भी विद्यार्थी उन वस्तुओं को नहीं खरीदें तथा कुछ खाना ही हो तो विद्यालय की कैन्टीन से खरीदें।
प्रियांश शुक्ला
छात्र प्रमुख

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 13 तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र

Jharkhand Board JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 13 तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 13 तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र

JAC Class 10 Hindi तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र Textbook Questions and Answers

मौखिक –

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए –

लघु उत्तरीय प्रश्न – 

प्रश्न 1.
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को कौन-कौन से पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है?
उत्तर :
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को राष्ट्रपति स्वर्णपदक मिला था। इसे बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म तथा कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। इसके साथ-साथ मास्को फ़िल्म फेस्टिवल में भी यह फ़िल्म पुरस्कृत हुई थी।

प्रश्न 2.
शैलेंद्र ने कितनी फ़िल्में बनाई?
उत्तर :
शैलेंद्र ने केवल एक ही फ़िल्म बनाई थी। इस फ़िल्म का नाम ‘तीसरी कसम’ है।

प्रश्न 3.
राजकपूर द्वारा निर्देशित कुछ फ़िल्मों के नाम बताइए।
उत्तर :
राजकपूर द्वारा निर्देशित कुछ प्रमुख फ़िल्में बॉबी, मेरा नाम जोकर, जागते रहो, सत्यम् शिवम् सुंदरम् हैं।

प्रश्न 4.
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म के नायक व नायिकाओं के नाम बताइए और फ़िल्म में इन्होंने किन पात्रों का अभिनय किया है?
उत्तर :
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म के नायक राजकपूर तथा नायिका वहीदा रहमान हैं। राजकपूर ने एक भोले-भाले गाड़ीवान ‘हीरामन’ का तथा वहीदा रहमान ने नौटंकी की बाई ‘हीराबाई’ की भूमिका निभाई है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 13 तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र

प्रश्न 5.
फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ का निर्माण किसने किया था?
उत्तर :
फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ का निर्माण कवि और गीतकार शैलेंद्र ने किया था।

प्रश्न 6.
राजकपूर ने ‘मेरा नाम जोकर’ के निर्माण के समय किस बात की कल्पना भी नहीं की थी?
उत्तर :
राजकपूर को ‘मेरा नाम जोकर’ फ़िल्म के एक भाग को बनाने में छह वर्ष लग गए थे। उन्होंने यह कल्पना नहीं की थी कि इस फ़िल्म के बनने में इतना अधिक समय लग जाएगा।

प्रश्न 7.
राजकपूर की किस बात पर शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया ?
उत्तर :
राजकपूर ने शैलेंद्र की फ़िल्म में काम करने के लिए मज़ाक में एडवांस माँग लिया। शैलेंद्र ने सोचा कि वे मित्र होकर भी उनसे पारिश्रमिक माँग रहे हैं। यह सोचकर उनका चेहरा मुरझा गया।

प्रश्न 8.
फ़िल्म समीक्षक राजकपूर को किस तरह का कलाकार मानते थे?
उत्तर :
फ़िल्म समीक्षक राजकपूर को आँखों से बात करने वाला कलाकार मानते थे।

लिखित (क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30) शब्दों में लिखिए –

लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को ‘सैल्यूलाइड पर लिखी कविता’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर :
सैल्यूलाइड से तात्पर्य किसी चीज्त को कैमरे की रील में भरकर चित्र पर प्रस्तुत करना होता है। फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ में कवि हृदयी शैलेंद्र की संवेदनशीलता और उनकी भावनाएँ पूरी सफलता से प्रस्तुत की गई थीं। हिंदी साहित्य की एक अत्यंत मार्मिक रचना को आधार बनाकर बनाई गई इस फ़िल्म में कविता के समान ही भावनाओं की प्रधानता है। इसी कारण ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को सैल्यूलाइड पर लिखी कविता कहा गया है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 13 तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र

प्रश्न 2.
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को खरीददार क्यों नहीं मिल रहे थे?
उत्तर :
फ़िल्मी बाज़ार में बिकाऊ कोई भी चीज़ ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में नहीं थी। इस फ़िल्म से लाभ नहीं कमाया जा सकता था। हर क्षेत्र में बेहतरीन फ़िल्म होने के बावजूद भी खरीददारों को इससे अधिक कमाई की आशा नहीं थी। यह एक भावात्मक आदर्शवादी फ़िल्म थी, जबकि फ़िल्मों से पैसा कमाने वालों के लिए भावनाओं और संवेदनाओं का कोई महत्व नहीं होता। इसी कारण इस फ़िल्म को खरीददार नहीं मिल रहे थे।

प्रश्न 3.
शैलेंद्र के अनुसार कलाकार का कर्तव्य क्या है ?
उत्तर :
शैलेंद्र के अनुसार कलाकार का कर्तव्य है कि वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करे। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि दर्शकों की रुचि की आड़ में हमें उथलेपन को उन पर थोपना नहीं चाहिए।

प्रश्न 4.
फ़िल्मों में त्रासद स्थितियों का चित्रांकन ग्लोरीफ़ाई क्यों कर दिया जाता है ?
अथवा
हमारी फिल्मों में त्रासद स्थितियों का चित्रांकन ‘ग्लोरीफाई’ क्यों कर दिया जाता है? ‘तीसरी कसम’ के शिल्पकार शैलेन्द्र के आधार पर उत्तर दीजिए।
उत्तर :
दर्शकों को अधिक भावुक बनाने के लिए ही फ़िल्मों में त्रासद स्थितियों के चित्रांकन को ग्लोरीफ़ाई किया जाता है। त्रासद स्थितियों में दुख के वीभत्स रूप को प्रस्तुत किया जाता है, ताकि दर्शक उसमें डूब जाए। ऐसा करके दर्शकों का सरलता से भावनात्मक शोषण किया जा सकता है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 13 तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र

प्रश्न 5.
‘शैलेंद्र ने राजकपूर की भावनाओं को शब्द दिए हैं’-इस कथन से आप क्या समझते हैं ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ में शैलेंद्र ने राजकपूर दवारा निभाए गए किरदार हीरामन की भावनाओं के अनुसार ही गीतों में शब्द दिए हैं। राजकपूर द्वारा गीत गाते-गाते हीराबाई से ‘मन’ के विषय में पूछना उनकी कोमल भावनाओं को ही दर्शाता है। एक नौटंकी की बाई में अपनापन खोजने वाले सरल हृदय हीरामन की जैसी भावनाएँ हो सकती थीं, उसी के अनुरूप गीतों में शब्द दिए गए हैं। इसी प्रकारं ‘सजनवा बैरी हो गए हमार’ गीत में भावप्रवणता अपनी चरम-सीमा पर है।

प्रश्न 6.
लेखक ने राजकपूर को एशिया का सबसे बड़ा शोमैन कहा है। शोमैन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
शोमैन से अभिप्राय ऐसे फ़िल्म निर्माता से है, जो बहुत अधिक लोकप्रिय हो; जिसके नाम से ही फ़िल्में बिकती हों। इसके साथ-साथ फ़िल्मों के खरीददार जिसकी फ़िल्में हाथों-हाथ खरीद लेते हों। फ़िल्म इंडस्ट्री में जिसकी कई फ़िल्में लगातार हिट हो जाती हैं, उसे शोमैन की संज्ञा दी जाती है।

प्रश्न 7.
फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ के गीत ‘रातों दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ’ पर संगीतकार जयकिशन ने आपति क्यों की?
उत्तर :
फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ के गीत ‘रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ’ में दिशाएँ दस कही गई हैं। संगीतकार जयकिशन का कहना था कि दर्शक दस दिशाओं की बात नहीं समझ सकता। गीत में दस की बजाय ‘चार दिशाएँ’ होनी चाहिए थी, इसलिए उन्हें गीत में आई ‘दस दिशाएँ’ शब्द पर आपत्ति थी।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60) शब्दों में लिखिए –

निबंधात्मक प्रश्न –

प्रश्न 1.
राजकपूर द्वारा फ़िल्म की असफलता के खतरों से आगाह करने पर भी शैलेंद्र ने यह फ़िल्म क्यों बनाई?
उत्तर :
राजकपूर और शैलेंद्र दोनों अच्छे मित्र थे। जब शैलेंद्र ने ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म बनाने के बारे में सोचा, तो राजकपूर ने उन्हें फ़िल्म की असफलता के खतरों के बारे में पहले ही बता दिया था फिर भी शैलेंद्र ने फ़िल्म बनाने का निर्णय नहीं बदला। वे एक आदर्शवादी भावुक कवि थे। उनका उद्देश्य फ़िल्म का निर्माण करके उससे धन कमाना नहीं था। उन्हें अपार संपत्ति और धन की कोई कामना नहीं थी। वे आत्म-संतुष्टि के सुख के लिए फ़िल्म बना रहे थे। उनके लिए आत्म-संतुष्टि सबसे बड़ी चीज़ थी। अतः राजकपूर द्वारा फ़िल्म की असफलता के खतरों से आगाह किए जाने पर भी शैलेंद्र ने ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म बनाई।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 13 तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र

प्रश्न 2.
‘तीसरी कसम’ में राजकपूर का महिमामय व्यक्तित्व किस तरह हीरामन की आत्मा में उतर गया है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
राजकपूर एक महान कलाकार थे। फ़िल्म के पात्र के अनुरूप अपने आपको ढाल लेना वे भली-भाँति जानते थे। जब ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म बनी थी, उस समय राजकपूर एशिया के सबसे बड़े शोमैन के रूप में स्थापित हो चुके थे। फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ में उन्हें एक सरल हृदय ग्रामीण गाड़ीवान के रूप में प्रस्तुत किया गया। उन्होंने अपने आपको उस ग्रामीण गाड़ीवान हीरामन के साथ एकाकार कर लिया। एक शुद्ध देहाती का जैसा अभिनय राजकपूर ने किया, वह अद्वितीय है।

एक गाड़ीवान की सरलता, नौटंकी की बाई में अपनापन खोजना, हीराबाई की बोली पर रीझना, उसकी भोली सूरत पर न्योछावर होना और हीराबाई की तनिक-सी उपेक्षा पर अपने अस्तित्व से जूझना जैसी हीरामन की भावनाओं को राजकपूर ने बड़े सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। फ़िल्म में राजकपूर कहीं भी अभिनय करते नहीं दिखते, अपितु ऐसा लगता है जैसे वह ही हीरामन हो। ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में राजकपूर का पूरा व्यक्तित्व ही जैसे हीरामन की आत्मा में उतर गया है।

प्रश्न 3.
लेखक ने ऐसा क्यों लिखा है कि ‘तीसरी कसम’ ने साहित्य-रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया है?
उत्तर :
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म साहित्यिक रचना पर आधारित थी। इस फ़िल्म से पहले भी साहित्यिक रचनाओं पर आधारित फ़िल्में बनती रही थीं। उन फ़िल्मों में साहित्यिक रचना की मूल कथा में कुछ काल्पनिक तत्वों का समावेश करके उसे मनोरंजक बनाया जाता था। उन फ़िल्मों का उद्देश्य दर्शकों की रुचि के अनुरूप सामग्री डालकर धन कमाना होता था, किंतु ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में ऐसा नहीं था। इस फ़िल्म में मूल साहित्यिक रचना को उसके वास्तविक रूप में प्रस्तुत किया गया। उसमें किसी प्रकार के काल्पनिक अथवा मनोरंजक तत्वों को न डालकर उसकी गरिमा को भी बनाए रखा गया। इसी कारण लेखक ने लिखा है कि ‘तीसरी कसम’ ने साहित्य-रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया है।

प्रश्न 4.
शैलेंद्र के गीतों की क्या विशेषताएँ हैं? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर :
शैलेंद्र एक कवि और सफल गीतकार थे। उनके लिखे गीतों में अनेक विशेषताएँ दिखाई देती हैं। उन्होंने कभी भी निम्न-स्तर के गीत नहीं लिखे। उनमें सस्ती लोकप्रियता पाने की ललक नहीं थी। उनके गीतों में भावनाओं का प्रवाह है। उनके गीतों की एक अन्य विशेषता सरलता है। उन्होंने अपने गीतों में कठिन शब्दों के स्थान पर सरल शब्दों का प्रयोग किया है, जिससे सामान्य दर्शक भी उसे समझ लेता है।

उनके गीतों में करुणा के साथ-साथ संघर्ष की भावना भी दिखाई देती है। शैलेंद्र के गीत मनुष्य को जीवन में दुखों से घबराकर रुकने के स्थान पर निरंतर आगे बढ़ने का संदेश देते हैं। शैलेंद्र के गीतों की एक अन्य विशेषता उसकी भावप्रवणता है। उनके गीत का एक एक शब्द भावनाओं की अभिव्यक्ति करने में पूर्णतः सक्षम है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 13 तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र

प्रश्न 5.
फ़िल्म निर्माता के रूप में शैलेंद्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
फ़िल्म निर्माता के रूप में ‘तीसरी कसम’ शैलेंद्र की पहली और अंतिम फ़िल्म थी। उन्होंने इस फ़िल्म का निर्माण पैसा कमाने के उद्देश्य से नहीं किया था। उन्होंने फ़िल्म निर्माता के रूप में यश और संपत्ति की कभी कामना नहीं की। वे एक आदर्शवादी भावुक कवि थे। उन्होंने तो आत्म-संतुष्टि के लिए फ़िल्म बनाई थी। शैलेंद्र फ़िल्म की असफलता से होने वाले खतरों से परिचित थे, फिर भी उन्होंने शुद्ध साहित्यिक फ़िल्म बनाकर साहसी फ़िल्म निर्माता का परिचय दिया। शैलेंद्र एक मानवतावादी फ़िल्म निर्माता थे।

उन्होंने फ़िल्म इंडस्ट्री में रहते हुए भी अपनी आदमियत नहीं खोई थी। शैलेंद्र की एक अन्य विशेषता फ़िल्म में दुख को भी सहज स्थिति में जीवन सापेक्ष प्रस्तुत करना था। शैलेंद्र ने तीसरी कसम फ़िल्म का निर्माण पूरी तरह साहित्यिक रचना के अनुसार करके उसके साथ शत-प्रतिशत न्याय किया है। वे चाहते तो इसमें फेरबदल करके इसे अधिक मनोरंजक बना सकते थे। उन्होंने फ़िल्म के असफल होने के डर से घबराकर अपने सिद्धांतों के साथ कोई समझौता नहीं किया। इस प्रकार वे एक आदर्श फ़िल्म निर्माता के रूप में सामने आए हैं।

प्रश्न 6.
शैलेंद्र के निजी जीवन की छाप उनकी फ़िल्म में झलकती है-कैसे? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
शैलेंद्र ने अपने जीवन में एक ही फ़िल्म का निर्माण किया, जिसका नाम ‘तीसरी कसम’ था। यह एक संवेदनात्मक और भावनापूर्ण फ़िल्म थी। शांत नदी का प्रवाह और समुद्र की गहराई उनके निजी जीवन की विशेषता थी और यही विशेषता उनकी फ़िल्म में भी दिखाई देती है। ‘तीसरी कसम’ का नायक हीरामन अत्यंत सरल हृदयी और भोला-भाला नवयुवक है; जो केवल दिल की जुबान समझता है, दिमाग की नहीं। उसके लिए मोहब्बत के सिवा किसी चीज का कोई अर्थ नहीं। ऐसा ही व्यक्तित्व शैलेंद्र का था।

वे एक भावुक एवं संवेदनशील कवि थे। हीरामन को धन की चकाचौंध से दूर रहने वाले एक देहाती के रूप में प्रस्तुत किया गया है। शैलेंद्र स्वयं भी यश और धन-लिप्सा से कोसों दूर थे। इसके साथ-साथ फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ में दुख को भी सहज स्थिति में जीवन सापेक्ष प्रस्तुत किया गया है। शैलेंद्र अपने निजी जीवन में भी दुख को सहज रूप से जी लेते थे। वे दुख से घबराकर उससे दूर नहीं भागते थे। इस प्रकार स्पष्ट है कि शैलेंद्र के निजी जीवन की छाप उनकी फ़िल्म में झलकती है।

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प्रश्न 7.
लेखक के इस कथन से कि ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म कोई सच्चा कवि हृदय ही बना सकता था, आप कहाँ तक सहमत हैं ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में भावनाओं और संवेदनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति है। फणीश्वरनाथ रेणु की साहित्यिक कृति पर आधारित – इस फ़िल्म में शैलेंद्र ने संवेदनशीलता को पूरी तीव्रता के साथ व्यक्त किया है। इस पूरी फ़िल्म में कोमल भावनाओं की प्रधानता है। ऐसी कोमल भावनाओं को एक कवि-हृदय व्यक्ति ही भली प्रकार समझ सकता है और उन्हें अच्छे ढंग से प्रस्तुत कर सकता है। कवि स्वभाव से अत्यंत संवेदनशील होते हैं; वे दिल से काम लेते हैं, दिमाग से नहीं।

‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में नायक और नायिका के मनोभावों को प्रस्तुत करने के लिए एक कवि-हदय की ही आवश्यकता थी। शैलेंद्र एक भावुक कवि और गीतकार थे। वे उन कोमल अनुभूतियों को बारीकी से समझते थे और उन्हें प्रस्तुत करने में भी सक्षम थे। उनके कवि-हृदय के कारण ही फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ का निर्माण संभव हो पाया। इस फ़िल्म में कोमल भावनाओं की प्रधानता होने के कारण ही लेखक ने कहा है कि इसे कोई सच्चा कवि हृदय ही बना सकता था। हम लेखक के कथन से पूर्णतः सहमत हैं।

(ग) निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए –

प्रश्न 1.
वह तो एक आदर्शवादी भावुक कवि था, जिसे अपार संपत्ति और यश तक की इतनी कामना नहीं थी जितनी आत्म-संतुष्टि के सुख की अभिलाषा थी।
उत्तर :
यहाँ लेखक का आशय यह है कि शैलेंद्र ने ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म का निर्माण धन-संपत्ति कमाने और यश पाने के उद्देश्य से नहीं किया था। उनका इस फ़िल्म को बनाने का कारण आत्म-संतुष्टि के सुख को पाने की इच्छा थी। शैलेंद्र एक भावुक और आदर्शवादी कवि थे। उन्हें धन और यश की कोई इच्छा नहीं थी, अपितु वे तो समाज को एक साफ़-सुथरी और अच्छी फ़िल्म देना चाहते थे। वे तो इस बात की संतुष्टि पाना चाहते थे कि उन्होंने एक अच्छी फ़िल्म बनाई।

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प्रश्न 2.
उनका यह दृढ़ मंतव्य था कि दर्शकों की रुचि की आड़ में हमें उथलेपन को उन पर नहीं थोपना चाहिए। कलाकार का यह कर्तव्य भी है कि वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करे।
उत्तर :
लेखक ने यहाँ फ़िल्म-निर्माता और कलाकार के विषय में कवि शैलेंद्र के विचारों को प्रस्तुत किया है। लेखक के अनुसार कवि एवं संगीतकार शैलेंद्र की दृढ़ मान्यता थी कि फ़िल्मों में दर्शकों की रुचि का सहारा लेकर निम्न-स्तर की सामग्री का प्रयोग नहीं होना चाहिए। फ़िल्म निर्माता को उच्च-स्तर के दर्शकों का भी ध्यान रखना चाहिए। दर्शक सभी प्रकार के होते हैं।

केवल कुछ दर्शकों को प्रसन्न करने के लिए अन्य दर्शकों पर घटिया सामग्री को नहीं थोपना चाहिए। साथ ही उनका यह भी मानना था कि कलाकार को चाहिए कि वह दर्शकों की रुचियों को साफ़-सुथरा बनाने की कोशिश करे। कलाकार का कर्तव्य है कि वह दर्शकों को निम्न रुचियों को ध्यान में रखकर अभिनय न करे, अपितु उसे दर्शकों की रुचियों को अपने अभिनय से श्रेष्ठ रूप में बदलने का प्रयास करना चाहिए।

प्रश्न 3.
व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संदेश देती है।
उत्तर :
लेखक का आशय यह है कि जीवन में आने वाले दुख मनुष्य को कभी पराजित नहीं करते, बल्कि वे तो जीवन में आगे बढ़ने का संदेश देते हैं। जो लोग दुखों से घबराकर बैठ जाते हैं, वे जीवन में कभी भी सफल नहीं हो सकते। जीवन में आने वाले दुख और पीड़ाएँ हमें अधिक मज़बूत बनाती हैं और जीवन में निरंतर आगे बढ़ने की ओर प्रेरित करती हैं। दुखों से घबराने के स्थान पर इनसे प्रेरणा लेकर निरंतर आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। जो लोग ऐसा कर पाते हैं, वही सफ़ल होते हैं।

प्रश्न 4.
दरअसल इस फ़िल्म की संवेदना किसी दो से चार बनाने वाले की समझ से परे है।
उत्तर :
लेखक का आशय यह है कि फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ एक संवेदनशील फ़िल्म थी। यह संवेदना फ़िल्मों से पैसा कमाने वाले लोगों की समझ में आने वाली नहीं थी। जिस फ़िल्म में दर्शकों के मनोरंजन के लिए पर्याप्त सामग्री होती है, उसे फ़िल्मों के खरीददार हाथों-हाथ खरीद लेते हैं। फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ में भावनाओं और संवेदनाओं की प्रधानता थी। फ़िल्मों से पैसा कमाने वालों के लिए संवेदनाओं का कोई महत्व नहीं था। इसी कारण इस फ़िल्म को कोई खरीददार नहीं मिला।

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प्रश्न 5.
उनके गीत भाव-प्रवण थे-दुरूह नहीं।
उत्तर :
लेखक का आशय यह है कि कवि एवं गीतकार शैलेंद्र के गीतों में भावप्रवणता बहुत थी, लेकिन वे कठिन नहीं थे। उनके गीतों में भावनाओं की सुंदर अभिव्यक्ति होती थी। गहरी से गहरी भावनाओं को भी बड़ी सरलता से प्रस्तुत किया जाता था। उनके गीत भावनात्मक होते हुए भी सरल थे। सामान्य से सामान्य श्रोता और दर्शक भी उनके गीतों के भाव को बड़ी आसानी से समझ लेता था। उनके गीत भावनाओं से परिपूर्ण होते हुए भी आम आदमी से जुड़े हुए थे।

भाषा-अध्ययन –

प्रश्न 1.
पाठ में आए ‘से’ के विभिन्न प्रयोगों से वाक्य की संरचना को समझिए।
(क) राजकपूर ने एक अच्छे और सच्चे मित्र की हैसियत से शैलेंद्र को फ़िल्म की असफलता के खतरों से आगह भी किया।
(ख) रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ।
(ग) फ़िल्म इंडस्ट्री में रहते हुए भी वहाँ के तौर-तरीकों से नावाकिफ़ थे।
(घ) दरअसल इस फ़िल्म की संवेदना किसी दो से चार बनाने के गणित जानने वाले की समझ से परे थी।
(ङ) शैलेंद्र राजकपूर की इस याराना दोस्ती से परिचित तो थे।
उत्तर :
विद्यार्थी स्वयं करें।

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प्रश्न 2.
इस पाठ में आए निम्नलिखित वाक्यों की संरचना पर ध्यान दीजिए
(क) ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म नहीं, सैल्यूलाइड पर लिखी कविता थी।
(ख) उन्होंने ऐसी फ़िल्म बनाई थी जिसे सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था।
(ग) फ़िल्म कब आई, कब चली गई, मालूम ही नहीं पड़ा।
(घ) खालिस देहाती भुच्च गाड़ीवान जो सिर्फ़ दिल की जुबान समझता है, दिमाग की नहीं।
उत्तर :
विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रश्न 3.
पाठ में आए निम्नलिखित मुहावरों से वाक्य बनाइए –
चेहरा मुरझाना, चक्कर खा जाना, दो से चार बनाना, आँखों से बोलना
उत्तर :
चेहरा मुरझाना – परीक्षा में पास न होने पर रमेश का चेहरा मुरझा गया।
चक्कर खा जाना – आई०ए०एस० की परीक्षा पास करने में बड़े-बड़े चक्कर खा जाते हैं।
दो से चार बनाना – दो से चार बनाना भी किसी-किसी का काम है, सबका नहीं।
आँखों से बोलना – राम की आँखें बहुत कुछ कहती हैं; वह तो आँखों से बोलता है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों के हिंदी पर्याय दीजिए –
(क) शिद्दत
(ख) याराना
(ग) बमुश्किल
(घ) खालिस
(ङ) नावाकिफ़
(च) यकीन
(छ) हावी
(ज) रेशा
उत्तर :
(क) शिद्दत – तीव्रता
(ख) याराना – मित्रता
(ग) बमुश्किल – कठिनतापूर्वक
(घ) खालिस – शुद्ध
(ङ) नावाकिफ़ – अपरिचित
(च) यकीन – विश्वास
(छ) हावी – भारी
(ज) रेशा – कण

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प्रश्न 5.
निम्नलिखित का संधिविच्छेद कीजिए –
(क) चित्रांकन
(ख) सर्वोत्कृष्ट
(ग) चर्मॉत्कर्ष
(घ) रूपांतरण
(ङ) घनानंद
उत्तर :
(क) चित्रांकन – चित्र + अंकन
(ख) सर्वोत्कृष्ट – सर्व + उत्कृष्ट
(ग) चर्मोत्कर्ष – चरम + उत्कर्ष
(घ) रूपांतरण – रूप + अंतरण
(ङ) घनानंद – घन + आनंद

प्रश्न 6.
निम्नलिखित का समास विश्रह कीजिए और समास का नाम भी लिखिए –
(क) कला-मर्मज्ञ
(ख) लोकण्रिय
(ग) राष्ट्रपति
उत्तर :
(क) कला-मर्मज्ञ – कला का मर्मझ – संबंध तत्पुरुष
(ख) लोकप्रिय – लोगों में प्रिय – अधिकरण तत्पुरुष
(ग) राष्ट्रपति – राष्ट्र का पति – संबंध तत्पुरुष

योग्यता विस्तार –

प्रश्न 1.
फणीश्वरनाथ रेणु की किस कहानी पर तीसरी कसम फ़िल्म आधारित है, जानकारी प्राप्त कीजिए और मूल रचना पढ़िए।
उत्तर :
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म फणीश्वरनाथ रेणु की रचना ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’ पर आधारित है।

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प्रश्न 2.
समाचार-पत्रों में फिल्मों की समीक्षा दी जाती है। किन्हीं तीन फ़िल्मों की समीक्षा पढ़िए और ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को देखकर इस फ़िल्म की समीक्षा स्वयं लिखने का प्रयास कीजिए।
उत्तर :
विद्यार्थी अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करें।

परियोजना कार्य –

प्रश्न 1.
फ़िल्मों के संदर्भ में आपने अकसर यह सुना होगा-‘जो बात पहले की फ़िल्मों में थी, वह अब कहाँ’। वर्तमान दौर की फ़िल्मों और पहले की फ़िल्मों में क्या समानता और अंतर है? कक्षा में चर्चा कीजिए।
उत्तर :
विद्यार्थी समूहों में विभाजित होकर चर्चा करें।

प्रश्न 2.
‘तीसरी कसम’ जैसी और भी फ़िल्में हैं जो किसी-न-किसी भाषा की साहित्यिक रचना पर बनी हैं। ऐसी फ़िल्मों की सूची निम्नांकित प्रपत्र के आधार पर तैयार करें।
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उत्तर :
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प्रश्न 3.
लोकगीत हमें अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं। तीसरी कसम’ फ़िल्म में लोकगीतों का प्रयोग किया गया है। आप भी अपने क्षेत्र के प्रचलित दो-तीन लोकगीतों को एकत्र कर परियोजना कॉपी पर लिखिए।
उत्तर :
विद्यार्थी अपने-अपने क्षेत्र के अनुसार स्वयं करें।

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निबंधात्मक प्रश्न –

प्रश्न 1.
लेखक ने शैलेंद्र को फ़िल्म-निर्माता बनने के सर्वथा अयोग्य क्यों कहा है?
उत्तर :
फ़िल्म निर्माता बनने के लिए खूब चालाकी और चतुरता की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत शैलेंद्र बिलकुल सरल-हृदयी थे। फ़िल्म निर्माता दर्शकों की रुचि के अनुसार निम्न स्तरीय सामग्री का भी उपयोग कर लेते हैं, किंतु शैलेंद्र आदर्शवादी व्यक्ति थे। वे अपने सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं करते थे। इसी कारण लेखक ने उन्हें फ़िल्म-निर्माता बनने के सर्वथा अयोग्य बताया है।

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प्रश्न 2.
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में राजकपूर के अभिनय की तुलना किस फ़िल्म से की गई है? उनका श्रेष्ठ अभिनय किस फ़िल्म में है?
उत्तर :
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में राजकपूर के अभिनय की तुलना उनकी एक अन्य फ़िल्म ‘जागते रहो.’ से की गई है। यद्यपि ‘जागते रहो’ फ़िल्म में भी उनके अभिनय को बहुत अधिक सराहा गया है, किंतु ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में उनका अभिनय सर्वश्रेष्ठ है। इस फ़िल्म में उन्होंने पात्र के साथ स्वयं को एकाकार कर लिया है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो उनका व्यक्तित्व पूरी तरह से उनके द्वारा निभाए गए पात्र हीरामन की आत्मा में उतर गया है।

प्रश्न 3.
‘तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र’ पाठ के आधार पर राजकपूर के व्यक्तित्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
राजकपूर भारतीय सिनेमा जगत के एक सुप्रसिद्ध अभिनेता तथा फ़िल्म निर्माता थे। वे एक महान कलाकार थे। उनकी कीर्ति और यश अपने देश में तो फैला ही था, विदेशों में भी उन्होंने खूब नाम कमाया था। एशिया महाद्वीप में उन्हें शोमैन के रूप में जाना जाता था।

वे जिस भी फ़िल्म में काम करते थे, उसमें अपनी भूमिका को बड़े सटीक ढंग से निभाते थे। कला के जानकार राजकपूर को एक ऐसा कलाकार मानते थे, जो आँखों से बात करता था। राजकपूर ने अनेक फ़िल्मों का निर्माण किया था, जिनमें से कुछ फ़िल्में मेरा नाम जोकर, सत्यम् शिवम् सुंदरम, मैं और मेरा दोस्त आदि थीं। फ़िल्म में वे अपनी भूमिका में खोकर शीघ्र ही एकाकार हो जाते थे।

प्रश्न 4.
आजकल हमारी फ़िल्मों की सबसे बड़ी कमज़ोरी क्या है?
उत्तर :
आजकल हमारी फ़िल्मों की सबसे बड़ी कमी है-‘लोक तत्वों का न होना’। आज हमारी फ़िल्में आम जीवन तथा उनकी जिंदगी से बहुत दूर होती जा रही हैं। आज फ़िल्मों में जो फ़िल्माया जा रहा है, वह जनता को उससे न जोड़कर मात्र मनोरंजन का साधन बन गया है। इसमें दुख को इतनी गहराई और गंभीरता से पेश कर देते हैं कि दर्शक न चाहकर भी स्वयं को उसमें डुबा दे तथा उसी में खो जाए। लेकिन यह दुख के स्वरूप को अधिक वीभत्स करता है।

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प्रश्न 5.
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में राजकपूर का अभिनय किस प्रकार का है ?
उत्तर :
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में राजकपूर का अभिनय बेजोड़ है। उन्होंने इस फ़िल्म में एक शुद्ध देहाती हीरामन नामक गाड़ीवान की भूमिका निभाई है। उनके द्वारा निभाई गई भूमिका इतनी उत्कृष्ट है कि वे कहीं भी अभिनय करते प्रतीत नहीं होते। वे अपनी भूमिका में इतने खो गए हैं कि वे हीरामन ही लगते हैं। उनका महिमामय व्यक्तित्व पूरी तरह से हीरामन में ढल गया है। उन्होंने एक सरल-हृदय गाड़ीवान की भावनाओं को बड़े ही सुंदर एवं सजीव ढंग से प्रस्तुत किया है।

लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
‘संगम’ फ़िल्म की अद्भुत सफलता से प्रभावित होकर राजकपूर ने क्या किया?
उत्तर :
‘संगम’ फ़िल्म की अद्भुत सफलता से प्रभावित होकर राजकपूर ने एक साथ चार फ़िल्मों के निर्माण की घोषणा कर दी। इन फ़िल्मों के नाम ‘मेरा नाम जोकर’, ‘अजंता’, ‘मैं और मेरा दोस्त’ तथा ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ थे। इनमें से केवल एक ही फ़िल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के एक भाग को बनाने में ही उन्हें छह वर्ष का समय लग गया था।

प्रश्न 2.
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में राजकपूर और वहीदा रहमान ने किसकी भूमिका निभाई है?
उत्तर :
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में राजकपूर ने एक शुद्ध देहाती गाड़ीवान की भूमिका निभाई है, जिसका नाम ‘हीरामन’ है। वह सरल-हृदयी है। वह भोला-भाला ग्रामीण केवल दिल की बात समझता है। उसके लिए मोहब्बत के सिवा किसी दूसरी चीज़ का कोई अर्थ नहीं है। इस फ़िल्म में वहीदा रहमान ने नौटंकी में काम करने वाली एक बाई की भूमिका निभाई है, जिसका नाम ‘हीराबाई’ है।

प्रश्न 3.
आज भी ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को क्यों याद किया जाता है?
उत्तर :
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म शैलेंद्र की पहली तथा अंतिम फ़िल्म थी। इस फ़िल्म ने अनेक पुरस्कार प्राप्त किए थे। इस फ़िल्म की पटकथा प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यासकार फणीश्वरनाथ रेणु ने तैयार की थी। फ़िल्म में छोटी-से-छोटी बारीक चीजें भी पूरी स्पष्टता के साथ दृष्टिगोचर होती हैं। यह फ़िल्म समाज के लिए मात्र मनोरंजन का साधन नहीं थी; यह फ़िल्म लोगों को एक संदेश देने में भी सफल रही।

प्रश्न 4.
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म की प्रसिद्धि के क्या कारण थे?
उत्तर :
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म की प्रसिद्धि के अनेक कारण थे। यह फ़िल्म कलात्मक दृष्टि से उच्च कोटि की फ़िल्म थी। इसके गीत, संगीत अपने आप में बेजोड़ थे। फ़िल्म के कलाकार राजकपूर और अभिनेत्री वहीदा रहमान का अपने पात्रों में कुशल प्रस्तुति देने के कारण भी यह फ़िल्म प्रसिद्धि पाने में सफल रही।

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प्रश्न 5.
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में कवि हृदय शैलेंद्र के किस रूप के दर्शन होते हैं ?
उत्तर :
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में शैलेंद्र की संवेदनशीलता के दर्शन होते हैं। लेखक ने ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को सैल्यूलाइड पर लिखी कविता की संज्ञा दी है। यह इनके भावुक होने और समाज के प्रति इनके चिंतन के भाव को मुखरित करता है। वे एक अत्यंत भावुक कवि थे। इनकी भावात्मकता इस फ़िल्म में स्पष्ट दिखाई पड़ती है।

प्रश्न 6.
“तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र’ पाठ के माध्यम से लेखक क्या संदेश देना चाहता है?
उत्तर :
इस पाठ के माध्यम से लेखक वास्तविकता का ज्ञान करवाना चाहता है कि कला फिल्में मर जाती हैं और लोगों को पता तक नहीं चलता। इसका कारण इनमें संवेदनाएँ तो होती हैं, लेकिन मनोरंजक तथ्य एवं भंगिमाएँ नहीं होती। इसी कारण दर्शक उनसे जुड़ नहीं पाते। हमें जीवन संदेश को आत्मसात् करना चाहिए, न कि मनोरंजन में ही डूबे रहना चाहिए।

प्रश्न 7.
‘तीसरी कसम’ फिल्म के मुख्य नायक कौन थे? उन्होंने इसमें क्या भूमिका निभाई है?
उत्तर :
‘तीसरी कसम’ फिल्म के मुख्य नायक राजकपूर थे। उनका अभिनय बेजोड़ था। उनके द्वारा किया गया अभिनय इतना बेजोड़ था कि वह कहीं भी अभिनय करते दिखाई नहीं देते थे। उनके अभिनय में वास्तविकता झलक रही थी। उनका व्यक्तित्व हीरामन में समाहित हो गया था। उन्होंने एक सरल-हृदय गाड़ीवान की भावनाओं को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया।

तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र Summary in Hindi

लेखक-परिचय :

जीवन – फ़िल्म-क्षेत्र पर लेखनी चलाने वाले प्रहलाद अग्रवाल का जन्म सन 1947 में मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में हुआ था। बचपन से ही इनकी रुचि फ़िल्मों की ओर रही। इन्हें किशोरावस्था में हिंदी फ़िल्मों के इतिहास और फ़िल्मकारों के जीवन व उनके अभिनय के बारे में जानने तथा उस पर चर्चा करने का शौक रहा। इन्होंने हिंदी विषय में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। वर्तमान में ये सतना के शासकीय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्राध्यापन कार्य कर रहे हैं।

रचनाएँ – प्रहलाद अग्रवाल ने अपनी रुचि के अनुरूप फ़िल्म क्षेत्र से जुड़े लोगों और फ़िल्मों के लिए ही अधिक लिखा है। इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं – सातवाँ दशक, तानाशाह, मैं खुशबू, सुपर स्टार, राजकपूरः आधी हकीकत आधा फ़साना, कवि शैलेंद्र जिंदगी की जीत में यकीन, प्यासा चिर अतृप्त गुरुदत्त, उत्ताल उमंग सुभाष घई की फ़िल्मकला, ओ रे माँझी बिमल राय का सिनेमा और महाबाज़ार के महानायक इक्कीसवीं सदी का सिनेमा।

भाषा-शैली – प्रहलाद अग्रवाल की भाषा-शैली अत्यंत सरल, सहज, सरस और प्रभावशाली है। इनकी भाषा में रोचकता और प्रवाहमयता का गुण सर्वत्र विद्यमान है। इन्होंने तत्सम व तद्भव शब्दों के साथ-साथ उर्दू-फ़ारसी के शब्दों का सुंदर चित्रण किया है। प्रस्तुत पाठ में उर्दू फ़ारसी के अनेक शब्दों के अतिरिक्त अंग्रेजी के अनेक शब्दों जैसे फेस्टिवल, जर्नलिस्ट एसोसिएशन, एडवांस, ग्लोरीफ़ाई आदि का प्रयोग भी किया गया है।

फ़िल्म क्षेत्र पर अधिक लिखने के कारण इनकी भाषा में फ़िल्मी दुनिया में प्रयोग होने वाले शब्दों की भरमार है; जैसे रिलीज़, फ़िल्म इंडस्ट्री, स्टार, पटकथा, सैल्यूलाइड, शोमैन, फ़िल्म वितरक आदि। इसके साथ-साथ इनकी भाषा में आंचलिक शब्दों का भी र खूब प्रयोग हुआ है। जैसे-भुच्च, बांचे, भाग, टप्पर गाड़ी, उकड़, फेनू-गिलासी, मनुआ-नटुआ आदि। प्रहलाद अग्रवाल की शैली वर्णनात्मक है। कहीं-कहीं उन्होंने संवादात्मक शैली का भी प्रयोग किया है, जिसमें नाटकीयता का पुट है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 13 तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र

पाठ का सार :

प्रस्तुत पाठ ‘तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र’ में लेखक ने कवि एवं गीतकार शैलेंद्र द्वारा बनाई एकमात्र फिल्म ‘तीसरी कसम’ के विषय में बताया है। तीसरी कसम’ फ़िल्म सन 1966 ई० में प्रदर्शित हुई। इसमें मुख्य भूमिका शैलेंद्र के मित्र और अभिनेता राजकपूर ने निभाई। इस फ़िल्म को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। यह फ़िल्म फणीश्वरनाथ रेणु की एक साहित्यिक रचना पर आधारित थी। इस फ़िल्म में कवि हृदय शैलेंद्र की संवेदनशीलता का स्वरूप दिखाई देता है। लेखक ने ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को सैल्यूलाइड पर लिखी कविता की संज्ञा दी है।

शैलेंद्र एक भावुक कवि थे। यद्यपि राजकूपर ने उन्हें फ़िल्म की असफलता के खतरों से पहले ही आगाह कर दिया था, फिर भी उन्होंने फ़िल्म बनाने का निर्णय नहीं छोड़ा। उनका फ़िल्म बनाने का उद्देश्य धन और यश न होकर आत्म-संतुष्टि के सुख की अभिलाषा थी। ‘तीसरी कसम’ में फ़िल्म में लोकप्रिय सितारे, संगीत और गीत होने के बावजूद इसे कोई खरीददार नहीं मिल पाया। इसका कारण यह था कि इस फ़िल्म में पेश की गई संवेदना और करुणा फ़िल्मों से पैसा कमाने वाले खरीददारों की समझ से परे थी।

परिणामस्वरूप यह फ़िल्म कब आई और कब चली गई, किसी को पता ही नहीं चला। लेखक कहता है कि शैलेंद्र फ़िल्म इंडस्ट्री के तौर-तरीकों को भली-भाँति जानते थे, फिर भी उन्होंने अपनी मनुष्यता को नहीं खोया था। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि दर्शकों की रुचि का सहारा लेकर निर्माताओं को फ़िल्मों में निम्न-स्तरीय सामग्री पेश नहीं करनी चाहिए। वे चाहते किया गया है। तत किया।

थे कि कलाकार भी दर्शकों की रुचियों का परिष्कार करें। ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में संवेदनशीलता अपनी चरम-सीमा पर है। कहीं-कहीं तो नायिका आँखों से बोलती प्रतीत होती है। इसके अतिरिक्त फ़िल्म में मस्ती में डूबते और झूमते गाड़ीवान, नौटंकी की बाई में अपनापन खोजते गाड़ीवान और अभावों की जिंदगी जीने वाले लोगों के सुनहरी सपनों का सुंदर चित्रण किया गया है। लेखक के अनुसार हमारी फ़िल्मों में सबसे बड़ी कमजोरी लोक-तत्व का अभाव है। तीसरी कसम’ फ़िल्म में लोक तत्वों को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

इस फ़िल्म में दुख को भी सहज स्थिति में जीवन-सापेक्ष प्रस्तुत किया गया है। लेखक कहता है कि शैलेंद्र के गीत भी अपनी अलग विशेषताओं के कारण प्रसिदध रहे हैं। उनके गीतों में भावप्रवणता, सरलता और करुणा के साथ-साथ संघर्ष का स्वर भी : दिखाई देता है। ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म के तो सभी गीत भावप्रवणता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

लेखक कहता है कि ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में राजकपूर का अभिनय बेजोड़ है। उन्होंने इस फ़िल्म में एक शुद्ध देहाती हीरामन नामक गाड़ीवान की भूमिका निभाई है। उनके द्वारा निभाई गई भूमिका इतनी उत्कृष्ट है कि वे कहीं भी अभिनय करते प्रतीत नहीं होते। अपितु वे हीरामन ही बन गए हैं। उनका महिमामय व्यक्तित्व पूरी तरह से हीरामन में ढल गया है। उन्होंने एक सरल-हृदय गाड़ीवान की भावनाओं को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म की पटकथा फणीश्वरनाथ रेणु ने तैयार की थी। उनकी मूल रचना का छोटे से छोटा भाग और उसकी बारीकियाँ इस फ़िल्म में बड़ी सफलता से प्रस्तुत की गई हैं।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 13 तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र

कठिन शब्दों के अर्थ :

गहन – गहरा, अंतराल – के बाद, अभिनीत – अभिनय किया गया, सर्वोत्कृष्ट – सबसे अच्छा, अत्यंत – बहुत अधिक, सैल्यूलाइड – कैमरे की रील में उतार चित्र पर प्रस्तुत करना, सार्थकता – सफलता के साथ, कलात्मकता – कला से परिपूर्ण, संवेदनशीलता – भावुकता, तारीफ़ प्रशंसा, फेस्टिवल – उत्सव, शिद्दत – तीव्रता, अनन्य – परम, अत्यधिक, तन्मयता – तल्लीनता, पारिश्रमिक – मेहनताना, उम्मीद – आशा, याराना मस्ती – दोस्ताना अंदाज़, सर्वथा – बिलकुल, पूरी तरह, आगाह – सचेत, भावुक – संवेदनशील, भावनाओं में बहने वाला, आत्म-संतुष्टि – अपनी तुष्टि, अभिलाषा – चाह, इच्छा,

बमुश्किल – बहुत कठिनाई से, वितरक – प्रसारित करने वाले लोग, नामजद – विख्यात, प्रसिद्ध, बेहद – बहुत अधिक, दरअसल – वास्तव में, नावाकिफ़ – अनजान, आदमियत – मानवता, मनुष्यता, इकरार – सहमति, मंतव्य – मान्यता, उथलापन – सतही, नीचा, भावप्रवण – भावनाओं से भरा हुआ, दुरूह – कठिन, एकमात्र – अकेली मोड़कर पैर के तलवों के सहारे बैठना, सूक्ष्मता – बारीकी, स्पंदित – संचालित करना, गतिमान, लालायित – इच्छुक, टप्पर-गाड़ी – अर्धगोलाकार छप्पर युक्त बैलगाड़ी,

हुजूम – भीड़, प्रतिरूप – छाया, रूपांतरण – किसी एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित करना, लोक तत्व – लोक संबंधी, त्रासद – दुखद, ग्लोरीफ़ाई – गुणगान, महिमामंडित करना, वीभत्स – भयावह, व्यथा – पीड़ा-दुख, जीवन, सापेक्ष – जीवन के प्रति, धन-लिप्सा – धन की अत्यधिक चाह, तहत – द्वारा, प्रक्रिया – प्रणाली, अद्वितीय – जिसके समान दूसरा न हो, बाँचै – पढ़ना, भाग – भाग्य, समीक्षक – समीक्षा करने वाला, कला-मर्मज्ञ – कला की परख करने वाला, चर्मोत्कर्ष – ऊँचाई के शिखर पर, खालिस – शुद्ध, देहाती – ग्रामीण, सिर्फ़ – केवल, भुच्च – निरा, बिलकुल, मुकाम – पड़ाव, किंवदंती – कहावत, तनिक सी – थोड़ी-सी

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 8 कन्यादान

Jharkhand Board JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 8 कन्यादान Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 8 कन्यादान

JAC Class 10 Hindi कन्यादान Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
आपके विचार से माँ ने ऐसा क्यों कहा कि लड़की होना पर लड़की जैसी मत दिखाई देना?
उत्तर :
माँ के इन शब्दों में लाक्षणिकता का गुण विद्यमान है। नारी में कोमलता, सुंदरता, शालीनता, सहनशक्ति, माधुर्य, ममता आदि गुण होते हैं। ये गुण ही परिवार को बनाने के लिए आवश्यक होते हैं। इसलिए माँ ने कहा है कि उसका लड़की होना आवश्यक है। उसमें आज की सामाजिक स्थितियों का सामना करने का साहस होना चाहिए। उसमें सहजता, सजगता और सचेतता के गुण होने चाहिए। उसे दब्बू और डरपोक नहीं होना चाहिए। इसलिए उसे लड़की जैसी दिखाई नहीं देना चाहिए ताकि कोई सरलता से उसे डरा-धमका न सके।

प्रश्न 2.
‘आग रोटियाँ सेंकने के लिए है
जलने के लिए नहीं’
(क) इन पंक्तियों में समाज में स्त्री की किस स्थिति की ओर संकेत किया गया है?
(ख) माँ ने बेटी को सचेत करना क्यों जरूरी समझा?
उत्तर :
(क) कवि ने इन पंक्तियों में समाज में विवाहिता स्त्री की स्थिति की ओर संकेत किया है। वर्तमान समय में हमारे भारतीय समाज में दहेज-प्रथा की आग बहुओं को बहुत तेजी से जला रही है। लोग दहेज के नाम पर पुत्रवधू के पिता के घर को खाली करके भी चैन नहीं पाते। वे खुले मुँह से धन माँगते हैं और धन न मिलने पर बहू से बुरा व्यवहार करते हैं; उसे मारते-पीटते हैं और अनेक बार लोभ में आकर उसे आग में धकेल देते हैं। कवि ने समाज में नारी की इसी स्थिति की ओर संकेत किया है, जो निश्चित रूप से अति दुखदायी और शोचनीय है।

(ख) माँ ने बेटी को सचेत करना इसलिए ज़रूरी समझा क्योंकि उसे डर था कि कहीं वह भी अन्य बहुओं की तरह किसी की आग में अपना जीवन न खो दे। उसे किसी भी अवस्था में कमजोर नहीं बनना चाहिए। उसे कष्ट देने वालों के सामने उठ कर खड़ा हो जाना चाहिए। कोमलता नारी का शाश्वत गुण है, पर आज की परिस्थितियों में उसे कठोरता का पाठ अवश्य पढ़ लेना चाहिए ताकि किसी प्रकार की कठिनाई आने की स्थिति में उसका सामना कर सके।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 8 कन्यादान

प्रश्न 3.
‘पाठिका थी वह धुंधले प्रकाश की
कुछ तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों की’
इन पंक्तियों को पढ़कर लड़की की जो छवि आपके सामने उभर कर आ रही है, उसे शब्दबद्ध कीजिए।
उत्तर :
अपने माता-पिता के संस्कारों में बँधी भोली-भाली लड़की उसी रास्ते पर चलना चाहती है, जो उसे बचपन से लेकर युवावस्था तक दिखाया गया है। उसने माता-पिता की छत्रछाया में रहते हुए जीवन के दुखों का सामना नहीं किया। वह नहीं जानती कि आज का समाज कितना बदल गया है। उसे दूसरों के द्वारा दी गई पीड़ाओं का कोई अहसास नहीं है। वह तो अज्ञान और अपनी छोटी से धुंधले प्रकाश में जीवन की कुछ तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों को पढ़ने वाली पाठिका है।

प्रश्न 4.
माँ को अपनी बेटी अंतिम पूजी’ क्यों लग रही थी?
अथवा
‘कन्यादान’ कविता में बेटी को ‘अंतिम पूँजी’ क्यों कहा गया है?
उत्तर :
माँ को अपनी बेटी अंतिम पूँजी लग रही थी, क्योंकि वह अपने जीवन के सारे सुख-दुख उसी के साथ बाँटती थी। वही उसके सबसे निकट थी; वही उसकी साथी थी।

प्रश्न 5.
माँ ने बेटी को क्या-क्या सीख दी?
उत्तर :
माँ ने बेटी को सीख दी कि वह केवल सुंदरता पर न रीझे, बलिक अपने आस-पास के वातावरण के प्रति भी सचेत रहे। जिस पानी में झाँकने पर उसे अपनी परछाई दिखाई देवी है, उसकी गहराई को भी वह भली-भाति जाने लै। कही वही उसके लिए जानलेवा सिद्ध न हो जाए। वह उस आग की तपन का भी ध्यान रखे, जो रोटी पकाने के काम आती है। कहीं रोसा ने ही कि बही उसको जला डाले। उसे लड़की लगना चाहिए, पर लड़की जैसा कमलोर नहीं दिखना वाहिए। उसे दुनिका की पूरी समझ होनी चाहिए।

रचना और अभिव्यक्ति –

प्रश्न 6.
आपकी दृष्टि में कन्या के साथ दान की बात करना कहाँ तक उचित है?
अथवा
‘कन्या’ के साथ दान के औचित्य पर अपने विचार लिखिए।
उत्तर :
युगों से नारी को हमारे समाज में हेय समझा जाता रहा है। पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों को ही श्रेष्ठ माना जाता है। विवाह के पश्चात लड़की ही लड़के के साथ रहने के लिए जाती है। विवाह के समय लड़की के माता-पिता के द्वारा कन्या का दान किया परंपरा पूरी तरह से गलत है। आज के युग में लड़के या लड़की में कोई अंतर नहीं है। दोनों की शिक्षा बराबर होती है; दोनों एक-समान काम करते हैं; बराबर कमाते हैं, तो फिर कन्या के दान की बात ही क्यों? ऐसा कहना पूरी तरह से ग़लत है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 8 कन्यादान

पाठेतर सक्रियता –

प्रश्न 1.
‘स्त्री को सौंदर्य का प्रतिमान बना दिया जाना ही उसका बंधन बन जाता है’ इस विषय पर कक्षा में चर्चा कीजिए।
उत्तर :
अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से कीजिए।
यहाँ अफगानी कवयित्री मीना किश्वर कमाल की कविता की कुछ पंक्तियाँ दी जा रही हैं। क्या आपको कन्यादान कविता से इसका कोई संबंध दिखाई देता है ?

मैं लौटूंगी नहीं

मैं एक जगी हुई स्त्री हूँ
मैंने अपनी राह देख ली है
अब मैं लौटूंगी नहीं
मैंने ज्ञान के बंद दरवाजे खोल दिए हैं
सोने के गहने तोड़कर फेंक दिए हैं
भाइयो! मैं अब वह नहीं हूँ जो पहले थी
मैं एक जगी हुई स्त्री हूँ
मैंने अपनी राह देख ली है।
अब मैं लौटूंगी नहीं
उत्तर :
इस कविता का ‘कन्यादान’ कविता से सीधा संबंध तो नहीं है, पर स्त्री की जागरूकता और सजगता की दृष्टि से साम्य अवश्य है। इस कविता में कवियित्री कहती है कि एक युगों से चली आने वाली सामाजिक रूढियों को तोड़कर उसने घर से बाहर कदम निकालने सीख लिए हैं। वह उन कष्टों और पीड़ाओं से अब परिचित है, जिसे उसने स्वयं झेला है। उसने ज्ञान के बंद दरवाजे खोल दिए हैं।

शृंगार के लिए पहने गहने उतार दिए हैं। वह जाग चुकी है। उसने अपने देश को आजाद कराने की राह देख ली है। वह अपना सबकुछ छोड़कर आज़ादी की राह पर आगे बढ़ गई है। वह वापस अपने घर नहीं लौटना चाहती। वह आज़ादी प्राप्त करने के लिए अड़ी हुई हैं। इस पंक्ति से स्त्री का क्रोध और मानसिक दृढ़ता का मनोभाव प्रकट हुआ है। उसने ज्ञान की प्राप्ति से ही ऐसा करना सीखा है।

JAC Class 10 Hindi कन्यादान Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘कन्यादान’ कविता में माँ ने बेटी को किन परंपराओं से हटकर जीवन जीने की शिक्षा दी है?
अथवा
विवाह के समय माँ ने अपनी बेटी को क्या शिक्षा दी? ‘कन्यादान’ कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर :
माँ ने बेटी को शिक्षा दी कि वह केवल शारीरिक सुंदरता, सुंदर कपड़ों और गहनों की ओर ही ध्यान न दे। उसे चाहिए कि वह समाज में आए परिवर्तन को खुली आँखों से देखे और अपने भीतर हिम्मत और साहस को बटोरे। उसके हृदय का साहस और अधिकारों के प्रति जागरूकता ही उसके जीवन को नई दिशा देंगे। इसी से उसके जीवन की रक्षा होगी।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 8 कन्यादान

प्रश्न 2.
कवि ने कविता के माध्यम से माँ की किस विशेषता को वाणी प्रदान की है?
उत्तर :
कवि ने कविता के माध्यम से माँ के संचित अनुभवों की पीड़ा को प्रस्तुत किया है। माँ ने अपने जीवन में जिन कष्टों को पाया था, उनके कारणों को समझा था। वह नहीं चाहती थी कि उसकी बेटी को कभी कोई कष्ट हो।

प्रश्न 3.
माँ के मन में यह विचार क्यों आया कि पुत्री ही उसकी अंतिम पूँजी है ?
उत्तर :
विवाह के समय जब कन्यादान की प्रथा का निर्वाह हुआ, तो माँ को लगा कि उसकी अंतिम पूँजी उससे दूर जा रही है। माँ-बेटी में बहुत मधुर संबंध होता है। यह रिश्ता माँ को एक पूँजी के समान लगता है। यही रिश्ता बेटी की विदाई के साथ उससे दूर हो जाएगा। माँ के दुख-सुख को बाँटने वाली बेटी पर माँ का पहले-सा अधिकार न रहेगा। इसी कारण माँ ने कन्यादान को अंतिम पूँजी के समान कहा है।

प्रश्न 4.
किसके दुख को प्रामाणिक कहा गया है और क्यों?
अथवा
‘कन्यादान’ कविता में किसके दुख की बात की गई है और क्यों ?
उत्तर :
माँ के दुख को प्रमाणिक कहा गया है। माँ जानती है कि बेटी के विवाह के पश्चात वह अकेली रह जाएगी। उसके दुख-सुख बाँटने वाली दूर चली जाएगी। माँ का यह दुख प्रमाणिक है। इसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। यह स्वाभाविक दुख है। माँ सदा बेटी के विवाह के पश्चात स्वयं को अकेला महसूस करती है।

प्रश्न 5.
माँ ने बेटी को स्वयं पर मोहित न होने की सीख क्यों दी?
अथवा
‘कन्यादान’ कविता के आधार पर लिखिए कि माँ ने बेटी को क्या-क्या सीख दी?
उत्तर :
विवाह के पश्चात सामान्यतः लड़कियाँ साज-शृंगार की ओर अधिक ध्यान देती हैं। वे अपना अधिकांश समय ऐसे ही सजने-संवरने में लगा देती हैं। अतः माँ ने बेटी को ऐसा न करने की सीख दी, ताकि वह ससुराल में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करे। अपने लिए आदर: सम्मान बटोरे। सौंदर्य सदा नहीं रहता, उस पर क्या मोहित होना! अपने गुणों को विकसित करें। ससुराल पक्ष में अपना एक सम्मान योग्य स्थान बनाने का प्रयास करें।

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प्रश्न 6.
उत्तर
कन्यादान कविता में माँ ने वस्त्र और आभूषणों को स्त्री जीवन का बंधन क्यों कहा?
उत्तर :
लड़की की माँ एक परिपक्व महिला है। अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर ही उसने आभूषणों को स्त्री जीवन का बंधन कहा है। पुरुष जानता है कि स्त्री को आभूषणों-गहनों से बहुत प्यार होता है। ऐसे में इनका प्रयोग वह मनमानी करने के लिए करता है। स्त्री को गहनों की चकाचौंध में उलझाकर उसका मानसिक शोषण करता है। स्त्री को यह समझ नहीं आता कि ये गहने उसकी आजादी का हनन करते हैं; उसे जबरन बंधन में बाँध देते हैं।

प्रश्न 7.
माँ ने बेटी को सचेत करना क्यों आवश्यक समझा?
उत्तर :
माँ ने सीख देकर अपनी बेटी को सचेत किया है, क्योंकि लड़की भोली, सरल तथा नासमझ है। उसे संसार की कुटिलता का आभास नहीं है; दुनियादारी की समझ नहीं है। फिर आज की सामाजिक परिस्थितियाँ भी कुछ ऐसी हैं कि दहेज या अन्य किसी भी छोटी-सी बात पर लड़की का ससुराल में मानसिक-शारीरिक शोषण होता है। बेटी के साथ किसी भी तरह की अनहोनी न हो, इसी आशंका से माँ ने कन्यादान के बाद विदा करते हुए बेटी को सचेत करना आवश्यक समझा।

प्रश्न 8.
‘कन्यादान’ कविता की माँ परंपरागत माँ से कैसे भिन्न है ?
उत्तर :
‘कन्यादान’ कविता की माँ परंपरागत माँ से अलग है, क्योंकि उसने बेटी को जो सीख दी है, वह परंपराओं से अलग है। वैसे तो माँ ने बेटी को अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वाह करने की सलाह दी है, परंतु साथ ही उसे अपने आत्म-सम्मान के प्रति भी सचेत किया है। लीक से हटकर माँ ने आज के संदर्भ में जो समाज की वास्तविकता है, उसी के अनुरूप अपनी बेटी को सीख दी है। माँ अपनी बेटी के सुखद वैवाहिक जीवन के साथ-साथ उसकी सुरक्षा के प्रति भी आशंकित है। अतः माँ ने उसे कुछ अलग तरीके से समझाया है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 8 कन्यादान

प्रश्न 9.
‘कन्यादान’ कविता का मूल उद्देश्य या भाव क्या है?
उत्तर :
यह कविता आधुनिक समाज का दर्पण है। एक ओर माँ-बेटी के घनिष्ठ संबंध की चर्चा हुई है, तो दूसरी ओर हमें यहाँ समाज की वर्तमान स्थिति का दर्शन हुआ है। इस कविता का संबंध नारी-जागृति से भी है। कवि ने स्त्री की कमजोरियों पर प्रकाश डाला है। आज भी भारत में पुरुष-प्रधान समाज विद्यमान है। कवि ने यह बताते हुए नारी को अपने शोषण के प्रति सचेत रहने को कहा है। दहेज – प्रथा जैसी समस्या पर भी कवि ने नारी को जागृत करने का प्रयास किया है। नारी अपने सभी गुणों तथा शक्तियों के साथ शोषण का डटकर सामना करने का साहस भी रखे। यही इस कविता का मूल भाव है।

प्रश्न 10.
‘कन्यादान’ कविता में किसे दुख बाँटना नहीं आता था और क्यों?
उत्तर :
‘कन्यादान’ कविता में लड़की को दुख बाँटना नहीं आता था, क्योंकि उसने जीवन में अभी तक दुख नहीं देखे थे। दुखों व कष्टों की पीड़ा से वह अनजान थी, इसलिए उसे दुख बाँटना नहीं आता था।

प्रश्न 11.
माँ की सीख में समाज की कौन-सी कुरीतियों की ओर संकेत किया गया है?
उत्तर :
माँ की सीख में समाज में व्याप्त दहेज़ प्रथा व परिवार में होने वाले नारी शोषण की ओर संकेत किया गया है। यह कविता इन कुरीतियां से युक्त वर्तमान सामाजिक ढाँचे को प्रस्तुत करती है।

प्रश्न 12.
‘कन्यादान’ कविता में वस्त्र और आभूषणों को शाब्दिक-भ्रम क्यों कहा गया है?
उत्तर :
कन्यादान कविता में माँ ने वस्त्र और आभूषणों को शाब्दिक भ्रम कहा है क्योंकि ये नारी जवीन को भ्रम में डालने का काम करते हैं। ये शाब्दिक धोखे हैं जो स्त्री जीवन को बाँध देने के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 8 कन्यादान

प्रश्न 13.
‘बेटी, अभी सयानी नहीं थी’- में माँ की चिंता क्यों है ? ‘कन्यादान’ कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर :
‘बेटी, अभी सयानी नहीं थी’ में माँ अपनी बेटी को लेकर चिंतित थी। माँ ने बेटी को सचेत करना इसलिए ज़रूरी समझा क्योंकि उसे डर था कि कहीं वह भी अन्य बहुओं की तरह किसी की आग में अपना जीवन न खो दे। उसे किसी भी अवस्था में कमजोर नहीं बनना चाहिए। उसे कष्ट देने वालों के सामने उठ कर खड़ा हो जाना चाहिए। कोमलता नारी का शाश्वत गुण है लेकिन आज की परिस्थितियों में उसे कठोरता का पाठ अवश्य पढ़ लेना चाहिए ताकि किसी प्रकार की कठिनाई आने की स्थिति में उसका सामना कर सके।

पिठित काव्यांश पर आधारित बहुविकल्पी प्रश्न –

दिए गए काव्यांशों को पढ़कर पूछे गए बहुविकल्पी प्रश्नों के उचित विकल्प चुनकर लिखिए –

कितना प्रामाणिक था उसका दुख
लड़की को दान में देते वक्त
जैसे वही उसकी अंतिम पूँजी हो
लड़की अभी सयानी नहीं थी
अभी इतनी भोली सरल थी
कि उसे सुख का आभास तो होता था
लेकिन दुख बाँचना नहीं आता था
पाठिका थी वह धुंधले प्रकाश की
कुछ तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों की।

(क) कवि ऋतुराज ने किसके दुखों को प्रामाणिक माना है?
(i) सहेलो के
(ii) माँ के
(iii) पत्नी के
(iv) पुत्री के
उत्तर :
(ii) माँ के

(ख) माँ को अपनी पुत्री कैसी पूँजी लगती है?
(i) अंतिम
(ii) अति सुखद
(iii) बातूनी
(iv) दुखदायी
उत्तर :
(i) अंतिम

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 8 कन्यादान

(ग) पुत्री स्वभाव से कैसी थी?
(i) चालाक
(ii) बुद्धिमान
(iii) कठोर
(iv) भोली-भाली
उत्तर :
(iv) भोली-भाली

(घ) पुत्री को क्या पढ़ना नहीं आता था?
(i) सुखों को
(ii) दुखों को
(iii) पत्रों को
(iv) ये सभी
उत्तर :
(ii) दुखों को

(ङ) पाठिका किसे कहा गया है?
(i) माँ को
(ii) पत्नी को
(iii) पुत्री को
(iv) पाठक को
उत्तर :
(iii) पुत्री को

काव्यबोध संबंधी बहुविकल्पी प्रश्न –

काव्य पाठ पर आधारित बहुविकल्पी प्रश्नों के उत्तर वाले विकल्प चुनिए –
(क) ‘बेटी अभी सयानी नहीं थी’-से कवि का क्या तार्य है?
(i) उसकी उम्र अभी कम थी।
(ii) उसको सांसारिक समझ नहीं थी।
(iii) उसकी आयु विवाह के योग्य नहीं थी।
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर :
(ii) उसको सांसारिक समझ नहीं थी।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 8 कन्यादान

(ख) किसके प्रति नारी का आकर्षण स्वाभाविक होता है?
(i) पुष्पों
(ii) चाँद
(iii) वस्त्र और आभूषणों
(iv) नौकर-चाकरों
उत्तर :
(iii) वस्त्र और आभूषणों

(ग) ‘लड़की होने से क्या तार्य है?
(i) भोलापन, गकोमलता, समर्पण और सादगी
(ii) चालाकी, कठोरता, समर्पण और सादगी
(iii) भोलापन, कठोरता, समर्पण और सादगी
(iv) भोलापन, चतुरता, समर्पण और सादगी
उत्तर :
(i) भोलापन, कोमलता, समर्पण और सादगी

सप्रसंग व्याख्या, अर्थग्रहण संबंधी एवं सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर

कितना प्रामाणिक था उसका दुख
लड़की को दान में देते वक्त ।
जैसे वही उसकी अंतिम पूंजी हो
लड़की अभी सयानी नहीं थी
अभी इतनी भोली सरल थी
कि उसे सुख का आभास तो होता था
लेकिन दुख बांचना नहीं आता था
पाठिका थी वह धुंधले प्रकाश की
कुछ तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों की।

शब्दार्थ : वक्त – समय। अंतिम पूँजी – आखिरी संपत्ति। सयानी – समझदार। बांचना – पढ़ना।

प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक क्षितिज (भाग-2) में संकलित कविता ‘कन्यादान’ से लिया गया है, जिसके रचयिता ऋतुराज हैं। वर्तमान समय में जीवन-मूल्य बदल गए हैं। माँ अपनी बेटी के लिए केवल भावुकता को महत्वपूर्ण नहीं मानती बल्कि अपने संचित अनुभवों की पीड़ा का ज्ञान भी उसे देना चाहती है। वह उसे भावी जीवन का यथार्थ पाठ पढ़ाना चाहती है।

व्याख्या : कवि कहता है कि माँ ने अपना जीवन जीते हुए जिन दुखों को भोगा था; सहा था, कन्यादान के समय अपनी बेटी को वह सब समझाना और उसे इसकी जानकारी देना उसके लिए बहुत अधिक आवश्यक था। उसकी बेटी ही उसकी अंतिम संपत्ति थी। जीवन के सारे सुख-दुख वह अपनी बेटी के साथ ही बाँटती थी। चाहे वह बेटी का विवाह कर रही थी, पर अभी उसकी बेटी अधिक समझदार नहीं थी; उसने दुनियादारी को नहीं समझा था।

वह अभी बहुत भोली और सीधी-सादी थी। वह दुखों की उपस्थिति को महसूस तो करती थी, लेकिन अभी उसे दुखों को भली-भाँति समझना और पढ़ना नहीं आता था। ऐसा लगता था कि अभी वह धुंधले प्रकाश में जीवन रूपी कविता की कुछ तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों को पढ़ना ही जानती थी, पर उनके अर्थ समझना उसे नहीं आता था अर्थात वह दुनियादारी की ऊँच-नीच को अभी भली-भाँति नहीं समझती थी। उसमें इतनी समझदारी नहीं आई थी कि वह दुनिया के भेदभावों को समझ कर स्वयं निर्णय कर सके।

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अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोतर –

1. अवतरण में निहित भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
2. माँ के दुख को कवि ने क्या माना है?
3. अंतिम पूँजी कौन और क्यों थी?
4. ‘लड़की का दान’ से क्या तात्यर्य है?
5. विवाह के समय लड़की कैसी थी?
6. लड़की को किसका आभास था?
7. लड़की को क्या करना नहीं आता था?
8. ‘तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों’ से क्या तात्पर्य है?
9. पाठिका किसे कहा गया है?
उत्तर :
1. कवि ने कविता के द्वारा बदल चुकी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था की ओर संकेत किया है। माँ के पास अब बेटी के विवाह के समय उसके प्रति कोरी भावुकता और प्रेम का भाव नहीं होता, बल्कि वह अपनी बेटी को शिक्षा देते समय जीवनभर के इकट्ठे अपने अनुभवों की पीड़ा को प्रामाणिक रूप से प्रकट करती है ताकि वह उन अनुभवों से शिक्षा ले और अपने जीवन को सही ढंग से जिए। वह जीवन में कभी कष्ट न उठाए।2. कवि ने माँ के दुखों को प्रामाणिक माना है, क्योंकि उसने अपने जीवन में उन्हें सहा है।
3. माँ की अंतिम पूँजी बेटी थी, क्योंकि वह अपने जीवन के हर सुख-दुख उसके साथ बाँटती है। बेटी ही माँ के सबसे निकट और उसके दुखसुख की साथी होती है।
4. ‘लड़की का दान’ से तात्पर्य लड़की के विवाह से है। युगों से चली आने वाली परंपरा में विवाह के समय कन्यादान का प्रचलन है।
5. विवाह के समय लड़की भोली-भाली और सीधी-सादी थी।
6. लड़की को सुख का आभास था, क्योंकि माता-पिता ने उसे केवल सुख ही प्रदान किए थे। उन्होंने अपनी बेटी को दुखों का अनुभव होने ही नहीं दिया था।
7. लड़की को दुखों की भयानकता को समझना नहीं आता था।
8. ‘तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों’ से कवि का तात्पर्य उस सामान्य ज्ञान से है, जो विवाह से पहले लड़की को परिवार में रहते हुए प्राप्त होता है, जिसमें दुखों की मात्रा या तो होती ही नहीं या वे बहुत कम होते हैं।
9. पाठिका उस लड़की को कहा गया है, जो जीवन के सामान्य ज्ञान को अभी प्राप्त कर रही थी।

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सदिय-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. अवतरण के भाव को स्पष्ट कीजिए।
2. किस बोली का प्रयोग किया गया है?
3. कवि ने किस प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया है?
4. कवि के कथन को किस शब्द-शक्ति के प्रयोग ने गहनता-गंभीरता प्रदान की है?
5. कौन-सा काव्य-गुण विद्यमान है?
6. किस काव्य-रस का प्रयोग किया गया है?
7. भावों को स्पष्ट करने के लिए किनका प्रयोग किया गया है?
8. किस छंद का प्रयोग है?
9. दो तद्भव शब्द लिखिए।
10. दो तत्सम शब्द लिखिए।
11. अवतरण से अलंकार चुनकर लिखिए।
12. ‘धुंधला प्रकाश’ प्रतीक को स्पष्ट करें।
उत्तर :
1. कवि ने माँ के द्वारा बेटी को परंपराओं से हटकर शिक्षा देने की ओर संकेत किया है, जिससे आधुनिक समाज व्यवस्था में आए परिवर्तनों का बोध होता है।
2. खड़ी बोली का प्रयोग है।
3. सामान्य बोलचाल के शब्दों का प्रयोग किया गया है।
4. लाक्षणिकता के प्रयोग ने कवि के कथन को गहनता-गंभीरता प्रदान की है।
5. प्रसाद गुण विद्यमान है।
6. शांत रस है।
7. प्रतीकात्मकता का प्रयोग किया गया है।
8. अतुकांत छंद है।
9. दान, सयानी।
10. प्रामाणिक, प्रकाश
11. अनुप्रास-दान में देते वक्त उत्प्रेक्षा-जैसे वही उसकी अंतिम पूँजी हो।
12. अस्पष्ट सुख।

2. माँ ने कहा पानी में झाँककर
अपने चेहरे पर मत रीझना
आग रोटियां सेंकने के लिए है
जलने के लिए नहीं
वस्त्र और आभूषण शाब्दिक भ्रमों की तरह
बंधन हैं स्त्री जीवन के
माँ ने कहा लड़की होना
पर लड़की जैसी दिखाई मत देना।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 8 कन्यादान

शब्दार्थ : रीझना – आकृष्ट होना। आभूषण – गहने। भ्रमों – धोखों।

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक क्षितिज (भाग-2) में संकलित कविता ‘कन्यादान’ से ली गई हैं, जिसके रचयिता ऋतुराज हैं। कवि ने आधुनिक युग में समाज में आए परिवर्तनों के आधार पर विवाह के समय माँ की ओर से बेटी को शिक्षा दी है; उसे सचेत किया है। आज के बदलते समाज में कोरे आदर्शों की कमजोरी का कोई महत्व शेष नहीं बचा है।

व्याख्या : कवि के अनुसार माँ कन्यादान के समय अपनी लड़की को समझाते हुए कहती है कि पानी में झाँककर अपने चेहरे की सुंदरता की ओर केवल निहारते न रहना। केवल अपनी सुंदरता और बनाव-श्रृंगार की ओर ध्यान देना तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं है, बल्कि परछाई दिखाने वाले उस पानी की गहराई के बारे में जान लेना आवश्यक है। जो पानी परछाई दिखाता है और सुंदरता के प्रति तुम्हें आकर्षित करता है, वह डूबने पर मृत्यु का कारण भी बन सकता है; उससे सावधान रहना।

आग केवल रोटियाँ सेंकने के लिए होती है। वह जलने और जलकर मर जाने के लिए नहीं होती, इसलिए उसका शिकार न बनना। नारी जीवन को भ्रम में डालने वाले तरह-तरह के वस्त्र और गहने हैं। ये शाब्दिक धोखे हैं, जो स्त्री को जीवन में बाँध देने के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं। माँ ने अपनी लड़की को समझाते हुए कहा कि तुम लड़की बने रहना, पर कभी भी लड़की की तरह दिखाई न देना; सजग और सचेत रहना। समाज में व्याप्त परिवर्तनों को भली-भाँति समझना। यह संसार निर्मम है, इसलिए उसे भली-भाँति समझना।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. अवतरण में निहित भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
2. कवि ने ‘आग’ और ‘पानी’ का क्या प्रतीक स्पष्ट किया है ?
3. नारी-जीवन में वस्त्र और आभूषण क्या हैं ?
4. माँ ने अपनी लड़की को क्या समझाया?
5. लड़की की माँ लड़की से क्या उम्मीद रखती है?
6. ‘लड़की होने से क्या तात्पर्य है?
7. आग के विषय में बताते हुए माँ के हृदय में क्या हो रहा था ?
8. माँ ने चेहरे पर रीझने के लिए क्यों मना किया?
उत्तर :
1. माँ ने लड़की को अपने व्यवहार के प्रति सजग रहने की शिक्षा दी है और उससे कहा है कि वह लड़की की तरह रहे, पर लड़की की तरह कमज़ोर और असहाय न बने।
2. ‘आग’ और ‘पानी’ जीवन के प्रतीक हैं, पर यह केवल जीवन देने वाले नहीं हैं बल्कि जीवन लेने वाले भी हैं।
3. नारी-जीवन में वस्त्र और आभूषण शाब्दिक भ्रमों की तरह बंधन हैं।
4. माँ ने अपनी लड़की को समझाया कि उसे लड़की की तरह होना तो चाहिए, पर उसका व्यवहार कमज़ोर नहीं होना चाहिए। उसे लड़की की तरह दिखाई नहीं देना चाहिए।
5. लड़की की माँ लड़की से उम्मीद रखती है कि वह विवाह के बाद घर-गृहस्थी के सारे काम तो करे पर शोषण का शिकार न बने। वह किसी भी अवस्था में अपनी स्वतंत्रता न खोए।
6. लडकी होने से तात्पर्य भोलेपन, सरलता, कोमलता, समर्पण आदि के भावों को बनाए रखना है।
7. आग के विषय में बताते हुए माँ के हृदय में बेचैनी और पीड़ा के भाव थे कि वह भी कहीं ससुराल की ओर से दी जाने वाली पीड़ा का शिकार न बन जाए। कहीं उसे भी दहेज के लालची आग में न झोंक दें।
8. ससुराल वालों से झूठी प्रशंसा को पाकर कहीं बेटी शोषण का शिकार न बन जाए। अपनी सुंदरता की प्रशंसा सुनकर भ्रमित न हो जाए।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 8 कन्यादान

सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. कवि ने नारी को किनके प्रति सचेत किया है ?
2. किस शब्द-शक्ति का प्रयोग किया गया है?
3. किस बोली का प्रयोग है?
4. शब्दावली किस प्रकार की है?
5. किस छंद का प्रयोग है?
6. काव्य-रस कौन-सा है?
7. सांकेतिकता का एक उदाहरण दीजिए।
8. दो तद्भव शब्द लिखिए।
9. दो तत्सम शब्द लिखिए।
10. अवतरण से अलंकार चुनकर लिखिए।
उत्तर :
1. कवि ने समाज के आधुनिक रूप के प्रति नारी को सचेत किया है कि उसे समाज के व्यवहार के प्रति सदा सजग रहना चाहिए।
2. लाक्षणिकता का प्रयोग किया गया है।
3. खड़ी बोली।
4. सामान्य शब्दावली का प्रयोग किया गया है।
5. छंद रहित अभिव्यक्ति है।
6. शांत रस है।
7. माँ ने कहा पानी में झाँक कर अपने चेहरे पर मत रीझना।
8. चेहरे, लड़की
9. आभूषण, भ्रम
10. विरोधाभास – माँ ने कहा लड़की होना पर लड़की जैसी दिखाई मत देना।
उपमा – वस्त्र और आभूषण शाब्दिक भ्रमों की तरह बंधन हैं स्त्री-जीवन के।

कन्यादान Summary in Hindi

कवि-परिचय :

आधुनिक युगबोध और यथार्थ के कवि ऋतुराज की नई कविता के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान है। इनका जन्म सन 1940 में राजस्थान के भरतपुर में हुआ था। इन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से अंग्रेजी विषय में एम०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। इन्होंने अध्ययन-अध्यापन को ही आजीविका का साधन बनाया था। चालीस वर्ष तक अंग्रेजी साहित्य पढ़ने-पढ़ाने के बाद अब ये सेवा-निवृत्त होकर जयपुर में रहते हैं।

इन्होंने हिंदी कविता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया है और अब तक इनकी आठ रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। उनमें से प्रमुख हैं – एक मरणधर्मा और अन्य, पुल पर पानी, सुरत निरत, लीला मुखारविंद। साहित्य सेवा के लिए इन्हें सोमदत्त परिमल सम्मान, मीरा पुरस्कार, पहल सम्मान और बिहारी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

साहित्यिक विशेषताएँ – ऋतुराज ने अपनी कविता में आज के मानव की दशा को प्रस्तुत करने की चेष्टा की है। इनकी कविता आधुनिकता, सामाजिक दायित्व, स्वाभिमान और विश्व-बंधुत्व की प्राप्ति से आलोकित है। इन्होंने न तो किसी को धूल बनाने की कोशिश की है और न ही हवा में ऊपर उठाने की। कवि अत्यंत सहज भाव से अन्याय, दमन, शोषण और रूढ़िग्रस्त जर्जर संस्कारों से जूझना चाहता है।

कहीं-कहीं कवि की विद्रोह- भावना व्यक्त हुई है। कवि ने आज के मानव के संघर्ष को कविता में स्थान दिया है। वह नई मर्यादाओं की स्थापना के लिए आगे बढ़ने में विश्वास रखता है। उसने उन लोगों को अपनी कविता का आधार बनाया है, जिन्हें समाज में अधिक महत्व प्राप्त नहीं हुआ।

ऋतुराज ने बड़ी-बड़ी दार्शनिक बातों को कहने की जगह दैनिक जीवन के अनुभव का यथार्थ प्रकट किया है। वे अपने आस-पास रोजमर्रा में घटित होने वाले सामाजिक शोषण और विडंबनाओं पर दृष्टि डालते हैं। इन्होंने परंपराओं से हटकर नए मूल्यों की स्थापना करने का प्रयत्न किया है। इनकी कविताओं में कोरी भावुकता नहीं है, बल्कि ये यथार्थ का दर्शन करने में सक्षम हैं –

माँ ने कहा पानी में झाँककर
अपने चेहरे पर मत रीझना
आग रोटियाँ सेंकने के लिए है
जलने के लिए नहीं
वस्त्र और आभूषण शाब्दिक भ्रमों की तरह
बंधन हैं स्त्री जीवन के

कवि ने कृत्रिम भाषा का प्रयोग नहीं किया है। इनकी भाषा अपने वातावरण और लोक जीवन से जुड़ी हुई है। इन्होंने बिंबों का सजीव चित्रण किया है। इनकी भाषा में तत्सम और तद्भव शब्दावली का सहज समन्वित प्रयोग दिखाई देता है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 8 कन्यादान

कविता का सार :

कवि ने ‘कन्यादान कविता में माँ-बेटी के आपसी संबंधों की घनिष्ठता को प्रतिपादित करते हुए नए सामाजिक मूल्यों को परिभाषित करने का प्रयत्न किया है। माँ अपनी युवा होती बेटी के लिए पहले कुछ और सोचती थी, पर सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन के कारण अब कुछ और सोचती है। पहले उसके मन में कुछ अलग तरह के डर के भाव छिपे हुए थे, पर अब उनकी दिशा और मात्रा बदल गई है।

इसलिए वह अपनी बेटी को परंपरागत उपदेश नहीं देना चाहती। उसके आदर्शों में भी परिवर्तन आ गया है। बेटी ही माँ की अंतिम पूँजी होती है, क्योंकि वह उसके दुख-सुख की साथी होती है। बेटी अभी पूरी तरह से बड़ी नहीं हुई। वह भोली-भाली और सरल है। उसे सुखों का आभास तो होता है, पर उसे जीवन के दुखों की ठीक से पहचान नहीं है। वह धुंधले प्रकाश में कुछ तुक और लयबद्ध पंक्तियों को पढ़ने का प्रयास मात्र करती है। माँ ने उसे समझाते हुए कहा कि उसे जीवन में संभलकर रहना पड़ेगा।

वह अपनी बेटी को पानी में झाँककर अपने ही चेहरे पर न रीझने और आग से बचकर रहने की सलाह देती है। आग रोटियाँ सेंकने के लिए होती है, न कि जलने के लिए। वस्त्रों और आभूषणों का लालच उसे जीवन के बंधन में डालने का कार्य करता है। माँ ने कहा कि उसे लड़की की तरह दिखाई नहीं देना चाहिए। उसे सजग, सचेत और दृढ होना चाहिए। जीवन की हर स्थिति का निर्भयतापूर्वक डटकर सामना करना आना चाहिए।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 2 सपनों के-से दिन

Jharkhand Board JAC Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 2 सपनों के-से दिन Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 2 सपनों के-से दिन

JAC Class 10 Hindi सपनों के-से दिन Textbook Questions and Answers

बोध-प्रश्न –

प्रश्न 1.
कोई भी भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती-पाठ के किस अंश से यह सिद्ध होता है?
उत्तर :
लेखक के अनुसार कोई भी भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं डाल सकती। लेखक बचपन में जहाँ रहता था, वहाँ पर अधिकतर घर राजस्थान या हरियाणा से आकर बसे हुए लोगों के थे। वहाँ पर उन लोगों के व्यापार तथा दुकानदारी थी। उन लोगों की भाषा और रहन-सहन स्थानीय लोगों से भिन्न था। उनकी बोली बहुत कम समझ में आती थी। कुछ शब्द तो ऐसे थे, जिन्हें सुनकर हँसी आती थी। परंतु खेल के समय उन लोगों की भाषा में कोई अंतर नहीं आता था। वे सब एक-दूसरे की भाषा को अच्छी तरह समझ लेते थे। इसलिए लेखक ने कहा है कि भाषा आपसी व्यवहार में कोई बाधा नहीं बनती।

प्रश्न 2.
पीटी साहब की ‘शाबाश’ फ़ौज के तमगों-सी क्यों लगती थी? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
पीटी मास्टर प्रीतम चंद बहुत सख्त स्वभाव और अनुशासन में रहने वाले व्यक्ति थे। वे छोटी-से-छोटी गलती पर भी बच्चों को बुरी
तरह मारते थे। बच्चों ने उन्हें कभी भी हँसते या मुस्कुराते हुए नहीं देखा था। वे उनसे बहुत डरते थे कि पता नहीं कब ‘खाल खींचने’ वाला मुहावरा प्रत्यक्ष हो जाए। बच्चों को स्काउटिंग की परेड का अभ्यास करवाते समय यदि कोई गलती नहीं होती थी, तो वे बच्चों को ‘शाबाश’ कहते थे। बच्चों को वह शाबाश फ़ौज के तमगों जैसी लगती थी। बच्चों को लगता कि उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण कार्य अच्छे : ढंग से संपन्न किया है, जिस कारण पीटी साहब से शाबाश रूपी तमगा मिला है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 2 सपनों के-से दिन

प्रश्न 3.
नयी श्रेणी में जाने और नयी कॉपियों और पुरानी किताबों से आती विशेष गंध से लेखक का बालमन क्यों उदास हो उठता था?
उत्तर :
लेखक को नई श्रेणी में जाने का कोई उत्साह नहीं होता था। उसे नई कॉपियों और पुरानी किताबों में से एक अजीब-सी गंध आती थी। वह उस गंध को कभी नहीं समझ सका लेकिन वह गंध उसे उदास कर देती थी। इसके पीछे कारण हो सकता है कि नई श्रेणी की पढ़ाई मास्टरों से पड़ने वाली मार का भय उसके मन में गहरी जड़ें जमा चुका था, इसलिए नई कक्षा में जाने पर लेखक को खुशी नहीं होती थी। पाठ को अच्छी तरह समझ न आने पर मास्टरों से चमड़ी उधेड़ने वाले मुहावरों को प्रत्यक्ष होते हुए देखना ही उसे अंदर तक उदास कर देता था।

प्रश्न 4.
स्काउट परेड करते समय लेखक अपने को महत्वपूर्ण ‘आदमी’ फ़ौजी जवान क्यों समझने लगता था?
उत्तर :
लेखक को अपने स्कूल में यदि कुछ अच्छा लगता था तो वह था-स्काउट परेड। स्काउट परेड के लिए धोबी से धुली खाकी वर्दी और पॉलिश किए जूते पहनने को मिलते थे। परेड करते समय मास्टर प्रीतम चंद विह्सल बजाते हुए लेफ्ट-राइट, राइट टर्न या लेफ्ट टर्न या अबाउट टर्न कहते थे। उस समय छोटे बूटों की एड़ियों पर दाएँ-बाएँ या एकदम पीछे मुड़कर बूटों की ठक-ठक से आगे बढ़ते जाना उन्हें अच्छा लगता था। उस समय वे स्वयं को विद्यार्थी नहीं फ़ौजी जवान समझते थे।

प्रश्न 5.
हेडमास्टर शर्मा जी ने पीटी साहब को क्यों मुअत्तल कर दिया?
उत्तर :
पीटी उन्हें मास्टर प्रीतम चंद चौथी कक्षा को फ़ारसी भाषा पढ़ाते थे। बच्चों के लिए फ़ारसी भाषा अंग्रेज़ी से भी कठिन थी। फ़ारसी पढ़ाते हुए उन्हें अभी एक सप्ताह हुआ था कि उन्होंने चौथी कक्षा के छात्रों को एक शब्द-रूप याद करके लाने और अगले दिन सुनाने का आदेश दिया। शब्द-रूप बहुत कठिन था। मार के डर से बच्चे सारा दिन शब्द-रूप याद करते रहे, परंतु वह उन्हें याद नहीं हुआ। अगले दिन कोई भी बच्चा शब्द-रूप नहीं सुना पाया। पीटी साहब ने अपने सख्त स्वभाव के अनुरूप बच्चों को झुककर टाँगों में से बाँहें निकालकर कान पकड़ने की सजा सुनाई। कमजोर बच्चे तीन-चार मिनट में ही थकने लगे। हेडमास्टर शर्मा जी ने जब यह दृश्य देखा, तो उन्हें सहन नहीं हुआ। उन्होंने पीटी साहब को बच्चों के साथ बुरा व्यवहार करने पर मुअत्तल कर दिया।

प्रश्न 6.
लेखक के अनुसार उन्हें स्कूल खुशी से भागे जाने की जगह न लगने पर भी कब और क्यों उन्हें स्कूल जाना अच्छा लगने लगा?
अथवा
स्कूल किस प्रकार की स्थिति में अच्छा लगने लगता है और क्यों?
उत्तर :
लेखक को स्कूल कभी भी ऐसी जगह नहीं लगता था, जहाँ खुशी से जाया जाए। स्कूल जाना उसके लिए एक सज़ा के समान था। परंतु एक-दो अवसर ऐसे होते थे, जब उसे स्कूल जाना अच्छा लगता था। पीटी मास्टर जब स्कूल में स्काउटिंग की परेड का अभ्यास करवाते थे, उस समय वे बच्चों के हाथों में नीली-पीली झंडियाँ पकड़ा देते थे। मास्टर जी के वन, टू, थ्री कहने पर बच्चे झंडियों को ऊपर नीचे, दाएँ-बाएँ करते थे। उस समय हवा में लहराती हुई झंडियाँ बच्चों को अच्छी लगती थीं। उन्हें पहनने के लिए खाकी वर्दी और पॉलिश किए जूते मिलते थे। गले में दोरंगा रूमाल पहनने को मिलता था। उस समय स्कूल के सभी बच्चे खुशी-खुशी स्कूल जाते थे।

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प्रश्न 7.
लेखक अपने छात्र जीवन में स्कूल से छुट्टियों में मिले काम को पूरा करने के लिए क्या-क्या योजनाएँ बनाया करता था और उसे पूरा न कर पाने की स्थिति में किसकी भाँति बहादुर बनने की कल्पना किया करता था?
उत्तर :
लेखक के छात्र जीवन में अप्रैल से स्कूल आरंभ होते थे। डेढ़ महीना स्कूल जाने के बाद उन्हें डेढ़-दो महीने की छुट्टियाँ होती थीं। पहला एक महीना वे खेल-कूद में व्यतीत करते थे या फिर अपनी माँ के साथ ननिहाल जाते थे। यदि ननिहाल नहीं जाते, तो घर के पास तालाब में नहाते और पास के टीले की रेत से खेलते थे। रेत से खेलना और तालाब में नहाने का क्रम अनगिनत बार चलता था।

जब छुट्टियों का एक महीना शेष बचता था, तो स्कूल से मिले काम की याद आने लगती थी। हिसाब वाले मास्टर दो सौ से कम सवाल नहीं देते थे। वे दस सवाल हर रोज़ करने की योजना बनाते। इस प्रकार दो सौ सवाल बीस दिन में पूरे हो जाएंगे, ऐसा सोचकर फिर खेल में लग जाते थे। इस प्रकार पंद्रह दिन निकल जाते थे। फिर वे पंद्रह सवाल प्रतिदिन करने की सोचते थे। लेखक के कई साथियों को छुट्टियों में स्कूल का काम करने की अपेक्षा मास्टर के हाथों से मार खाना सस्ता सौदा लगता था। लेखक के साथियों में ‘ओमा’ नाम का एक साथी था, जो बहुत बहादुर था। लेखक भी काम करने की अपेक्षा ‘ओमा’ की तरह बहादुर बनकर मार खाने के लिए तैयार हो जाता था।

प्रश्न 8.
पाठ में वर्णित घटनाओं के आधार पर पीटी सर की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
पाठ में वर्णित घटनाओं के आधार पर पीटी सर की चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं –
1. व्यक्तित्व – मास्टर प्रीतम चंद देखने में दुबले-पतले लगते थे, परंतु उनका शरीर गठीला था। उनका कद छोटा था। चेहरे पर माता के दाग थे। उनकी आँखें बाज़ जैसी तेज़ थीं। वे खाकी वर्दी और फ़ौजियों वाले भारी-भरकम बूट पहनते थे। बूटों की ऊँची एड़ियों – के नीचे खुरियाँ लगी रहती थीं। पंजों के नीचे मोटे सिरों वाले कील लगे हुए थे। उनका पूरा व्यक्तित्व बच्चों को भयभीत करने वाला था।

2. अनुशासन पसंद – मास्टर प्रीतम चंद अनुशासन में रहना पसंद करते थे। उन्हें अनुशासनहीनता पसंद नहीं थी। स्कूल में प्रार्थना के समय सभी लड़के कद के अनुसार कतारों में सीधे खड़े होते थे। यदि कोई लड़का हिलता हुआ दिखाई दे जाता था, तो मास्टर प्रीतम चंद उस लड़के को वहीं बुरी तरह मारने लगते थे।

3. कठोर स्वभाव – मास्टर प्रीतम चंद का स्वभाव बहुत कठोर था। बच्चे उनसे बहत डरते थे। बच्चों ने उन्हें कभी हँसते या मुस्कुराते हुए नहीं देखा था। स्काउटिंग की परेड का अभ्यास करवाते समय यदि कोई गलती नहीं होती, तो वे बच्चों को ‘शाबाश’ कहते थे। बच्चों के लिए वह ‘शाबास’ किसी फ़ौजी तमगे से कम नहीं होती थी। पीटी साहब के मुंह से निकली ‘शाबाश’ सारा साल कॉपियों पर मास्टरों से मिलने वाली ‘गुडों’ से ऊपर होती थी।

4. भावना रहित – मास्टर प्रीतम चंद में मानवीय भावनाएँ बिलकुल नहीं थीं। वे छोटे-छोटे बच्चों को छोटी-से-छोटी गलती पर बड़ी-से-बड़ी सजा देने में झिझकते नहीं थे। एक बार मास्टर प्रीतम चंद ने चौथी कक्षा के बच्चों को शब्द-रूप याद करके न आने पर उन्हें झुककर टाँगों के पीछे से बाँहें निकालकर कान पकड़ने की सजा दी। कमजोर और छोटे बच्चे तीन-चार मिनट में ही जलन और थकान के कारण गिर पड़े, परंतु मास्टर जी पर इसका कोई प्रभाव नहीं हुआ। अपने इसी अमानवीय व्यवहार के कारण उन्हें हेडमास्टर शर्मा जी ने नौकरी से निकाल दिया था।

5. पक्षी प्रेम – मास्टर प्रीतम चंद को छोटे-छोटे बच्चों के साथ कोई दया या प्रेम नहीं था, परंतु उन्हें पक्षियों से प्रेम था। उन्होंने दो तोते पाले हुए थे। वे उन तोतों को बादाम की गिरियाँ खिलाते और उनसे मीठी-मीठी बातें करते थे। पीटी साहब का पक्षियों से मीठी-मीठी बातें करना बच्चों को एक चमत्कार लगता था। जो अध्यापक स्कूल में बच्चों को निर्दयता से मारे और घर में पक्षियों के साथ अच्छा व्यवहार करे, यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। पीटी साहब को अपने कठोर और अमानवीय स्वभाव के कारण ही स्कूल से मुअत्तल किया गया था। उन्हें अपनी गलती पर कोई पछतावा नहीं था।

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प्रश्न 9.
विद्यार्थियों को अनुशासन में रखने के लिए पाठ में अपनाई गई युक्तियों और वर्तमान में स्वीकृत मान्यताओं के संबंध में अपने विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर :
लेखक के अनुसार उनके साथ विद्यार्थी जीवन में बहुत कठोर और अमानवीय व्यवहार किया जाता था। उनके मन में अध्यापकों की मार का इतना डर बैठ गया था कि उन्हें नई कक्षा में जाने की कोई खुशी नहीं होती थी। स्कूल उन्हें एक जेल के समान लगता था, जहाँ वे कैद की सजा काटने के लिए जाते थे। अधिकतर बच्चे स्कूल जाने की अपेक्षा माँ-बाप के साथ उनके काम में हाथ बँटाना अधिक उचित मानते थे।

वर्तमान समय में स्कूल के अध्यापक बच्चों को कठोर शारीरिक दंड नहीं देते। यदि कोई अध्यापक ऐसा करता है, तो उस पर कानूनी कार्यवाही की जा सकती है। वर्तमान में अध्यापकों को बच्चों के मनोविज्ञान को समझने का प्रशिक्षण दिया जाता है। पढ़ाई में कमजोर बच्चों के साथ किस तरह का व्यवहार करना चाहिए, उन्हें प्रशिक्षण के समय सिखाया जाता है।

यदि कोई शरारती बच्चा हो, जो प्यार से समझाने से भी नहीं समझता, उस पर माँ-बाप के कहने पर ही सख्ती की जाती है या उसे बाल मनोचिकित्सक से परामर्श करने का सुझाव दिया जाता है। वर्तमान समय में बच्चों को आने वाले कल का निर्माता समझा जाता है। इसलिए उनके मन में स्कूल के प्रति भय को निकालने के लिए स्कूल का वातावरण खुशहाल बनाया जाता है जिससे बच्चों का शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास हो सके।

प्रश्न 10.
बचपन की यादें मन को गुदगुदाने वाली होती हैं विशेषकर स्कूली दिनों कीं। अपने अब तक के स्कूली जीवन की खट्टी-मीठी यादों को लिखिए।
उत्तर :
बचपन की यादें कभी किसी को नहीं भूलतीं। उन दिनों मैं प्राइमरी स्कूल में पढ़ता था। घर से स्कूल के रास्ते में एक बड़ी-सी कोठी थी। उसमें बाहरी दीवार के पास फलों के अनेक पेड़ उगे थे। मैं अपने मित्रों के साथ बाहर से पत्थर फेंककर फलों को प्रायः तोड़ने की कोशिश करता था। कभी-कभी कोई फल टूटकर बाहर भी आ गिरता था और हम उस कच्चे-पक्के फल को पाकर इतने प्रसन्न हुआ करते थे, जैसे हमें कोई खजाना मिल गया हो।

हमारे घर के पास एक जोहड़ था। हम हर रोज़ उसके किनारे बैठकर उसमें तैरते-उछलते मेंढकों को घंटों देखा करते थे। वे कभी पानी में डुबकी लगाते थे, तो कभी किनारे पर आ जाते थे। जब वे गले की झिल्ली फुलाकर टर्र-टरी किया करते थे, तो हमें बड़ा मज़ा आता था।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 2 सपनों के-से दिन

प्रश्न 11.
प्रायः अभिभावक बच्चों को खेल-कूद में ज्यादा रुचि लेने पर रोकते हैं और समय बरबाद न करने की नसीहत देते हैं। बताइए –
(क) खेल आपके लिए क्यों जरूरी हैं?
(ख) आप कौन से ऐसे नियम-कायदों को अपनाएँगे जिससे अभिभावकों को आपके खेल पर आपत्ति न हो?
उत्तर :
(क) जीवन में खेल का बहुत महत्व है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए खेल परम आवश्यक है। स्वस्थ शरीर वाला व्यक्ति संसार के सभी सुखों को प्राप्त करता है। खेल-कूद से शरीर ही स्वस्थ नहीं रहता अपितु उसका बौद्धिक विकास भी होता है। इससे मनुष्य को मानसिक थकावट नहीं होती; शरीर में स्फूर्ति आती है; शिथिलता और आलस्य दूर भागता है। खेलने से बच्चों में एकता की भावना का विकास होता है। उनमें मिल-जुलकर रहने की आदत का विकास होता है। दूसरे बच्चों के साथ खेलने से बच्चे अकेलेपन का शिकार नहीं होते। खेल से बच्चों में नेतृत्व, अनुशासन, धैर्य, सहनशीलता, मेल-जोल, सहयोग आदि के गुण स्वतः ही विकसित हो जाते हैं। इसलिए बच्चों के लिए खेल ज़रूरी है।

(ख) खेल से बच्चों का शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास होता है। परंतु अधिक खेलना बच्चों के भविष्य के लिए खतरनाक है। इसलिए बच्चों के लिए कुछ ऐसे नियम बनाने चाहिए, जिससे उनके खेलने और पढ़ाई में संतुलन बना रहे। बच्चों को खेलने का समय निर्धारित करना चाहिए। खेलने से पहले उन्हें अपना स्कूल का कार्य समाप्त कर लेना चाहिए। इससे अभिभावकों को भी उनके खेलने से परेशानी नहीं होगी। खेलने के बाद कुछ शारीरिक थकावट अवश्य होती है, परंतु कुछ देर आराम करने के बाद शरीर और दिमाग ताजगी से भर जाते हैं।

उस समय स्कूल से मिले अन्य कार्य पूरे किए जा सकते हैं तथा माता-पिता के कार्य में उनकी सहायता की जा सकती है। बच्चों को ऐसे खेल खेलने चाहिए जिनमें चोट लगने का डर न हो। उन्हें सड़क के बीच में नहीं खेलना चाहिए। खेल ऐसे न हों, जिनसे उन्हें या दूसरों को कोई नुकसान पहुँचे। खेलने के लिए खुले स्थान का चुनाव करना चाहिए, जो घर से अधिक दूर न हो। यदि बच्चे अपने बनाए नियमों का उचित ढंग से पालन करें, तो अभिभावक भी उनको खेलने से मना नहीं करेंगे। अभिभावकों को भी पता होता है कि खेलने से बच्चों में शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक गुणों का विकास होता है।

JAC Class 10 Hindi सपनों के-से दिन Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
लेखक के साथ खेलने वाले बच्चों की हालत कैसी होती थी?
उत्तर :
लेखक के साथ खेलने वाले सभी बच्चों का हाल एक जैसा होता था। बच्चों के पैर नंगे होते थे। उन्होंने फटी-मैली कच्छी पहनी होती थी। उनके कुर्ते बिना बटनों के होते थे। कई बच्चों के कुर्ते फटे हुए भी होते थे। अधिकतर बच्चों को खेलते समय चोट लग जाती थी। चोट लगने पर घर पहुँचकर माँ, बहन या पिताजी से बहुत मार पड़ती थी। किसी को भी चोट में से बहते खून को देखकर तरस नहीं आता था।

प्रश्न 2.
लेखक के समय में अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने में दिलचस्पी क्यों नहीं लेते थे?
उत्तर :
लेखक के समय में बच्चों या अभिभावकों को स्कूल में कोई खास दिलचस्पी नहीं होती थी। जिन बच्चों की पढ़ाई में रचचि नहीं होती थी, वह अपना बस्ता किसी तालाब में फेंक आते और फिर कभी स्कूल नहीं जाते थे। अभिभावक भी बच्चों को अपने साथ अपने काम में लगा लेते थे। उनके अनुसार पढ़-लिखकर उन्होंने कौन-सा तहसीलदार बनना था। उनकी यही सोच बच्चों को स्कूल से दूर रखती थी।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 2 सपनों के-से दिन

प्रश्न 3.
“बचपन में घास अधिक हरी और फूलों की सुगंध अधिक मनमोहक लगती है”-लेखक ने ऐसा क्यों कहा?
उत्तर :
बचपन में बच्चे हर प्रकार के भेदभाव, समस्याओं तथा छल-कपट से दूर होते हैं। उनकी अपनी अलग दुनिया होती है, जिसमें वे मस्त रहते हैं। वे इस बात से बेखबर होते हैं कि उनके आस-पास के संसार में क्या हो रहा है। वे अपने दुख में दुखी और अपनी खुशी में खुश होते हैं, इसलिए उनके लिए अपने आस-पास का वातावरण अधिक खुशगवार और सुहावना होता है। उन्हें पतझड़ में भी बहार दिखाई देती है। बचपन में बच्चे अल्हड़ और अलमस्त होते हैं, इसलिए उन्हें घास अधिक हरी और फूलों की सुगंध अधिक मनमोहक लगती है।

प्रश्न 4.
लेखक को बचपन में स्कूल जाते समय किन-किन चीज़ों की महक आज भी याद है?
उत्तर :
लेखक को अपने बचपन के दिन और स्कूल आज भी अच्छी तरह याद हैं। कुछ चीज़ों की महक उसे आज भी अच्छी तरह से याद है। उनके स्कूल के अंदर जाने के रास्ते के दोनों ओर अलियार के बड़े ढंग से कटे-छाँटे झाड़ उगे हुए थे। उनमें से आने वाली नीम के पत्तों जैसी महक लेखक आज भी आँख बंद करके अनुभव कर सकता है। स्कूल की क्यारियों में कई तरह के फूल लगे होते थे। उन फूलों को वे चपरासी की नज़र बचाकर तोड़ लेते थे। उन फूलों की तेज़ गंध को भी लेखक आँख बंद करके अनुभव कर सकता है।

प्रश्न 5.
लेखक बचपन में अपनी छुट्टियों को किस प्रकार व्यतीत करता था?
अथवा
तालाब में तैरने का आनंद लेखक कैसे लेता था?
उत्तर :
लेखक अपनी छुट्टियाँ खेलने-कूदने में व्यतीत करता था। छुट्टियाँ होते ही वह अपनी माँ के साथ नाना के घर चला जाता था। वहाँ का तालाब भी उनके घर के पास वाले तालाब जितना ही बड़ा था। दोपहर तक तालाब पर नहाते थे, फिर घर आकर नानी से कुछ भी माँगकर खा लेते थे। जिस साल लेखक नाना के घर नहीं जाता था, उस साल अपने घर के पास बने तालाब में मित्रों के साथ नहाता था। तालाब में नहाकर वे पास के टीले की रेत में खेलते थे। उस टीले की गरम रेत को अपने शरीर पर लगाते थे। फिर रेत को धोने के लिए तालाब में छलाँग लगाते थे। ऐसा दिन में कितनी बार करते थे, यह उन्हें याद नहीं था। ऐसे ही उनकी छुट्टियाँ खेल-कूद में बीत जाती थीं।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 2 सपनों के-से दिन

प्रश्न 6.
पाठ में वर्णित ‘ओमा’ का व्यक्तित्व कैसा था?
अथवा
ओमा का लड़ाई करने का क्या ढंग था?
उत्तर :
लेखक के साथियों में ‘ओमा’ उनका नेता था। ओमा बहुत बहादुर था। वह किसी से नहीं डरता था। उस जैसा लड़का उनके समूह में नहीं था। ओमा’ की सूरत सबसे भिन्न थी। उसका सिर बहुत बड़ा था, ऐसा लगता था जैसे बड़ा मटका हो। उसका कद छोटा था, इसलिए छोटे कद पर बड़ा सिर अजीब लगता था। उसका सिर जितना बड़ा था, चेहरा उतना ही छोटा था। उसकी बातें, गालियाँ और मारपीट का ढंग अलग ही था। वह अपने हाथ-पैरों से नहीं लड़ता था। वह अपने सिर से लड़ने वाले की छाती पर वार करता था। उससे दुगुने शरीर वाले लड़के भी उसके वार को सहन नहीं कर सकते थे। उसके सिर की चोट पड़ते ही लड़के दर्द से चिल्लाने लगते थे। उसके सिर की टक्कर को लड़के ‘रेल-बम्बा’ कहकर बुलाते थे।

प्रश्न 7.
हेडमास्टर शर्मा जी का स्वभाव कैसा था?
उत्तर :
हेडमास्टर शर्मा जी का स्वभाव सरल था। वह कभी किसी की पिटाई नहीं करते थे। वह पाँचवीं कक्षा से लेकर आठवीं कक्षा तक के छात्रों को अंग्रेज़ी पढ़ाते थे। वह उस समय के मास्टरों से भिन्न थे। वे बच्चों की चमड़ी उधेड़ने में विश्वास नहीं करते थे। यदि उन्हें किसी बच्चे पर क्रोध आ भी जाता तो वे जल्दी आँखें सकपकाने लगते थे। अपने हाथ से इस प्रकार थप्पड़ लगाते थे, जैसे हाथ में नमकीन पापड़ी पकड़ ली हो। बच्चों को उनके पीरियड में पढ़ना सबसे अधिक अच्छा लगता था।

प्रश्न 8.
लेखक के परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने पर किस प्रकार उसकी पढ़ाई पूरी हुई थी?
उत्तर :
लेखक के परिवार की आर्थिक स्थिति कमज़ोर थी। उस समय एक-दो रुपये में सारी किताबें आ जाया करती थीं, परंतु यह उस समय में बड़ी रकम समझी जाती थी, जिससे घर का गुजारा अच्छी तरह हो सकता था। इसलिए उन दिनों अमीर परिवारों के बच्चे स्कूल जाया करते थे। लेखक अपने दो परिवारों में पहला लड़का था, जो स्कूल जाने लगा था। उसके परिवार की स्थिति देखते हुए हेडमास्टर शर्मा जी एक अमीर बच्चे की किताबें लाकर उसको दे देते थे। कॉपियों, पेंसिलों, होल्डर या स्याही-दवात पर साल भर में मुश्किल से एक या दो रुपये खर्च होता था। यदि हेडमास्टर शर्मा जी उसकी मदद नहीं करते, तो उसकी तीसरी-चौथी कक्षा में ही पढ़ाई छूट जाती।

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प्रश्न 9.
आज का बचपन लेखक के बचपन से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर :
आज का बचपन लेखक के बचपन से बहुत भिन्न है। आजकल के बच्चों के पास पहले के बच्चों की तरह न खेलने का समय है आज और न ही खुला स्थान है। बच्चों को बचपन से ही बड़े होकर डॉक्टर, इंजीनियर या कुछ और बनने के लिए उकसाया जाता है, जिससे बच्चे महत्वाकांक्षी बन जाते हैं। वे भी अपना भविष्य बनाने के लिए खेल-कूद को बेकार समझने लगते हैं। आज के बच्चे लेखक के मस्त, अल्हड़ या ब समाप्त होती जा रही है। बच्चों के सार्वभौमिक विकास के लिए उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ खेलने के लिए भी प्रेरित करना चाहिए, जिससे वे बड़े होकर एक अच्छा नागरिक बन देश और समाज के निर्माण में अपना योगदान दे सकें।

प्रश्न 10.
ननिहाल जाने पर लेखक को क्या सुख मिलता था?
उत्तर :
छुट्टियों में लेखक अपनी माँ के साथ ननिहाल चला जाता था। वहाँ नानी उसे खूब दूध, दही, मक्खन खिलाती थी। वह उसे बहुत प्यार करती थी। वहाँ वह तालाब में खब नहाता और बाद में नानी से जो मन में आता, माँगकर खाता था।

प्रश्न 11.
फ़ौज में भर्ती करने के लिए अफ़सरों के साथ नौटंकी वाले क्यों आते थे?
उत्तर :
लेखक जहाँ रहता था, वहाँ के लोगों को अंग्रेज़ ‘जबरन’ फ़ौज में भर्ती नहीं कर पा रहे थे। इसलिए लोगों को फ़ौज में भर्ती होने का लालच देने के लिए वे नौटंकी वालों के साथ आते और रात को गाँव में खुले मैदान में शामियाने लगाकर नौटंकी वालों से फ़ौज के सुख-आराम, बहादुरी आदि के दृश्यों का मंचन करवाते थे। इसके साथ ही कुछ मसखरे गाने भी गाते थे, जिनसे आकर्षित होकर कई नौजवान फ़ौज में भर्ती होने के लिए तैयार हो जाते थे।

प्रश्न 12.
स्कूल की पिटाई का डर भुलाने के लिए लेखक क्या सोचा करता था ?
उत्तर :
स्कूल की पिटाई का डर भुलाने के लिए लेखक उन बहादुर लड़कों के समान यह सोचा करता था कि छुट्टियों का काम करने की बजाय मास्टरों की पिटाई अधिक सस्ता सौदा है। ऐसे में उसे ओमा याद आ जाता था, जो उन जैसे सब लड़कों का नेता था।

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प्रश्न 13.
हेडमास्टर साहब का विद्यार्थियों के साथ कैसा व्यवहार था?
उत्तर :
हेडमास्टर शर्मा जी का अपने विद्यार्थियों के साथ व्यवहार अत्यंत मृदुल था। वे पाँचवीं और आठवीं कक्षा को अंग्रेजी पढ़ाते थे। वे कभी भी किसी विद्यार्थी को डाँटते नहीं थे। जब कभी उन्हें गुस्सा आता, तो वे बहुत जल्दी-जल्दी अपनी आँखें झपकाते हुए उल्टी उँगलियों से एक हल्की-सी चपत लगा देते थे। यह चपत विद्यार्थियों को भाई भीखे की नमकीन पापड़ी जैसी मज़ेदार लगती थी।

सपनों के-से दिन Summary in Hindi

पाठ का सार :

‘सपनों के-से दिन’ पाठ के लेखक ‘गुरदयाल सिंह’ हैं। इस पाठ के माध्यम से लेखक ने अपने स्कूल के दिनों का वर्णन किया है। बच्चों को स्कूल की पढ़ाई से अधिक साथियों के साथ खेलना अच्छा लगता है। स्कूल उन्हें जेल के समान प्रतीत होता है। लेखक बचपन में जिन बच्चों के साथ खेलता था, उन सभी की पारिवारिक स्थिति लगभग एक जैसी थी। प्राय: सभी बच्चे मैली कच्छी और टूटे बटनों वाला कुर्ता पहने हुए होते थे। खेलते हुए प्रायः घुटने, पैर और पिंडलियों पर चोट लग जाती थी। चोट लगने पर घर में किसी को तरस नहीं आता था।

चोट देखकर माँ, बहन या पिता के हाथ से जोरदार पिटाई होती थी। पिटाई होने के बावजूद बच्चे फिर अगले दिन खेलने के लिए तैयार हो जाते थे। लेखक और उसके साथियों में से अधिकतर बच्चों को स्कूल जाना अच्छा नहीं लगता था। उन दिनों यदि बच्चों को स्कूल जाना अच्छा नहीं लगता था, तो माँ-बाप भी उनके साथ जबरदस्ती । नहीं करते थे। वे भी बच्चों को अपने साथ काम में लगा लेते थे।

थोड़ा-सा बड़े होने पर वे बच्चों को बहीखाते का हिसाब-किताब सिखा देना आवश्यक समझते थे। बचपन में बच्चों को सबकुछ अच्छा लगता था, केवल उन्हें स्कूल जाना अच्छा नहीं लगता था। लेखक को अपने स्कूल जाने का रास्ता याद था, जिसके दोनों ओर काँटेदार झाड़ियाँ थीं। उनके पत्तों की महक नीम जैसी थी, जिसे लेखक आज भी अपनी साँसों में अनुभव करता है। स्कूल की क्यारियों में कई तरह के फूल लगे हुए थे, जिन्हें वे लोग चपरासी की नज़र बचाकर तोड़ लेते थे।

उन फूलों की खुशबू आज भी याद है। नई कक्षा में जाना अच्छा लगता था, परंतु साथ में डर भी लगता था कि मास्टरों से पहले से अधिक मार पड़ेगी। उन दिनों स्कूल में डेढ़ महीना पढ़ाई होने के बाद डेढ़-दो महीने की छुट्टियाँ होती थीं। छुट्टियों के शुरू के दो-तीन सप्ताह खेलने में बीत जाते थे। वे अपनी माँ के साथ नाना के घर जाकर छुट्टियों का भरपूर आनंद लेते थे। यदि किसी कारण नाना के घर नहीं जाते थे, तो घर के पास बने तालाब में सारा दिन खेलते थे।

तालाब में नहाकर गीले बदन ही पास में पड़ी रेत में खेलते और फिर से तालाब में कूद जाते। ऐसा वे एक बार नहीं, न जाने कितनी बार करते थे। उनमें कोई भी अच्छा तैराक नहीं था। यदि कोई बच्चा गहरे पानी में चला जाता था, तो दूसरे बच्चे उसे भैंस के सींग या पूँछ पकड़कर बाहर आने की सलाह देते थे। इसी तरह छुट्टियों का एक महीना बीत जाता था। एक महीना शेष रहने पर स्कूल से मिले काम की याद आने लगती थी। हिसाब के अध्यापक दो सौ सवाल करके लाने के लिए कहते थे। बच्चे अपने मन में हिसाब लगाते थे कि यदि दस सवाल भी प्रतिदिन किए जाएँ, तो बीस दिन में काम समाप्त हो जाएगा। इसलिए दस दिन और खेला जा सकता है।

दस की बजाय पंद्रह दिन खेल में निकल जाते थे। पंद्रह सवाल प्रतिदिन करने की सोचकर एक-दो दिन और खेल में निकल जाते थे। ऐसे ही हिसाब लगाते लगाते छुट्टियाँ कम होती जाती थीं और स्कूल जाने का भय सताने लगता था। कुछ सहपाठियों को छुट्टियों में काम करने की अपेक्षा स्कूल में मास्टर के हाथ से मार खाना अधिक सस्ता सौदा लगता था। लेखक जो पिटाई से डरता था, वह भी उनकी संगत में रहकर उनकी तरह सोचने लगता था। उनका नेता ‘ओमा’ था। ‘ओमा’ की सभी बातें अलग ढंग की थीं।

लड़ाई में उसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता था। लेखक का स्कूल बहुत छोटा था। उसमें केवल नौ कमरे थे। दाईं ओर से पहला कमरा मुख्याध्यापक श्री मदनमोहन शर्मा का था। पीटी मास्टर प्रीतम चंद की पिटाई के डर से सभी बच्चे प्रार्थना में सीधे कतारों में खड़े रहते थे। यदि कोई बच्चा उसे पीटी मास्टर बुरी तरह पीटते थे। मास्टर प्रीतम चंद से विपरीत स्वभाव वाले हेडमास्टर शर्मा थे। वे कभी किसी बच्चे को नहीं मारते थे। वे पाँचवीं कक्षा से आठवीं कक्षा तक के छात्रों को अंग्रेजी पढ़ाते थे। लेखक को अपना स्कूल कभी पसंद नहीं आया।

पहली कक्षा से लेकर चौथी कक्षा तक अधिकतर बच्चे स्कूल रोते हुए जाते थे। उन्हें स्कूल स्काउटिंग का अभ्यास करते समय अच्छा लगता था। पीटी मास्टर अभ्यास करवाते समय नीली-पीली झंडियाँ बच्चों के हाथों में दे देते थे। अभ्यास के समय वे खाकी वर्दी के साथ गले में दो रंगा रूमाल पहनते थे। जब कभी अभ्यास करते हुए पीटी मास्टर के मुँह से ‘शाबाश’ का शब्द सुनने को मिल जाता, तो उस समय ऐसा लगता जैसे फौज में मिलने वाले सभी तमगे उन्हें मिल गए हों।

लेखक के परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए हेडमास्टर शर्मा एक अमीर परिवार के लड़के की किताबें लाकर उसे दे देते थे। अपने स्कूल के हेडमास्टर के कारण ही लेखक अपनी शुरू की पढ़ाई पूरी कर सका। लेखक अपने परिवार का पहला लड़का था, जो स्कूल जाने लगा था। लेखक को नई कक्षा में जाने पर कभी कोई खुशी अनुभव नहीं होती थी। उसे किताबों और कॉपियों में से अजीब-सी गंध आती थी, जिससे उसका मन उदास हो जाता था। इसका कारण उसे आज भी समझ में नहीं आता।

इसके पीछे मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते थे; जैसे-आगे की पढ़ाई का कठिन होना या नए मास्टरों से मार का भय। यह भय मन के अंदर गहरी जड़ें जमा चुका था। इसलिए लेखक को नई कक्षा में जाने का कोई उत्साह नहीं होता था। उसे स्कूल उस समय अच्छा लगता था, जब मास्टर प्रीतम चंद उनसे परेड करवाते थे। फ़ौजी वर्दी पहनकर वे स्वयं को महत्वपूर्ण व्यक्ति समझने लगते थे। दूसरे विश्व युद्ध के समय अंग्रेजों ने 1923 में नाभा रियासत के राजा को तमिलनाडु के कोडाएकेनाल में गिरफ्तार कर लिया था। उनका बेटा बाहर पढ़ता था, इसलिए रियासत में अंग्रेज़ी शासन की चलती थी।

उस समय अंग्रेजी फौज़ में भर्ती करने के लिए कुछ अफसर नौटंकी वालों को अपने साथ लेकर गाँव-गाँव जाते थे वे ग्रामीण लोगों को नौटंकी वालों के माध्यम से फौज़ में भर्ती होने के लाभ दिखाते थे, जिससे लालच में आकर अनेक लोग फौज़ में भर्ती हो जाते थे। लेखक को भी स्काउटिंग की परेड में जब धुली वर्दी और पॉलिश किए बूट मिलते थे, तो वह स्वयं को फौजी से कम नहीं समझता था। बच्चों ने कभी मास्टर प्रीतम चंद को हँसते या मुस्कुराते हुए नहीं देखा था। उनका व्यक्तित्व और फौज़ी पहनावा बच्चों को भयभीत करने वाला था। बच्चे उनसे डरते ही नहीं थे अपितु नफ़रत भी करते थे। मास्टर प्रीतम चंद चौथी कक्षा के बच्चों को फ़ारसी पढ़ाते थे। एक दिन उन्होंने सभी बच्चों को शब्द-रूप याद करने के लिए कहा।

अगले दिन उन्होंने सब बच्चों से शब्द-रूप सुने, परंतु किसी भी बच्चे को पूरी तरह शब्द-रूप याद नहीं थे। मास्टर जी ने सभी बच्चों को टाँगों के पीछे से बाँहें निकालकर कान पकड़ने और पीठ ऊँची करने के लिए कहा। कमजोर बच्चे सहन नहीं कर सके; तीन चार मिनट बाद वे गिरने लगे थे। जब लेखक की बारी आई, उसी समय हेडमास्टर शर्मा जी उधर से निकले। उन्होंने पीटी सर को बच्चों से इतना बुरा व्यवहार करते देखा, तो उन्हें सहन नहीं हुआ। उन्होंने उन्हें बहुत डाँटा और उनकी शिकायत डायरेक्टर को लिखकर भेज दी।

जब तक ऊपर से आदेश नहीं आ जाते थे, तब तक पीटी सर स्कूल में नहीं आ सकते थे। लेकिन बच्चों के मन में फ़ारसी की घंटी बजते ही दहशत बैठ जाती थी। वह उस समय दूर होती थी, जब कक्षा में शर्मा जी या नौहरिया सर फ़ारसी पढ़ाने नहीं आ जाते थे। पीटी मास्टर कई दिनों तक स्कूल नहीं आए। वे बाजार में एक दुकान के ऊपर बने किराए के चौबारे में रहते थे। उन्होंने दो तोते पाले हुए थे। उन्हें नौकरी से निकाले जाने की कोई चिंता नहीं थी। वे अपने तोतों को बादाम खिलाते और उनसे मीठी-मीठी बातें करने में अपना दिन व्यतीत करते थे। बच्चों को यह एक चमत्कार लगता था कि जो मास्टर स्कूल में बच्चों को बुरी तरह मारता था, वह अपने तोतों के साथ कैसे मीठी बातें कर लेता था।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 2 सपनों के-से दिन

कठिन शब्दों के अर्थ :

लहू – खून, गुस्सैल – गुस्से वाले, ट्रेनिंग – प्रशिक्षण, लंडे – हिसाब-किताब लिखने की पंजाबी लिपि, बहियाँ – खाता, जिसमें हिसाब-किताब लिखा जाता है, – अनुभव, खेडण – खेलने के, सुगंध – खुशबू, बास – महक, फ़र्क – अंतर, चपड़ासी – चपरासी, ननिहाल – नाना का घर, दुम – पूँछ, दाढ़स – धीरज, गंदला – गंदा, कतार – पंक्ति, खाल खींचना – बुरी तरह मारना,

चपत – थप्पड़, तमगा – मेडल, डिसिप्लिन – अनुशासन, सतिगुर – सतगुरु, परमात्मा, धनाढ्य – अमीर, हरफनमौला – पारंगत, विद्वान, हर शिक्षा में निपुण, लेफ्ट-राइट – बायाँ-दायाँ, विह्सल – सीटी, टर्न – मुड़ना, रियासत – राज्य, जंग – लड़ाई, देहांत – स्वर्गवास, जबरन – ज़बरदस्ती, बलपूर्वक, अठे – यहाँ, उठै – वहाँ, लीतर – टूटे हुए पुराने जूते, बर्बरता – हैवानियत, बहुत बुरा व्यवहार, मुअत्तल – निलंबित, महकमाए तालीम – शिक्षा विभाग, मंजूरी – अनुमति बहाल करना – फिर से नौकरी पर रखना

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 छाया मत छूना

Jharkhand Board JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 छाया मत छूना Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 छाया मत छूना

JAC Class 10 Hindi छाया मत छूना Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
कवि ने कठिन यथार्थ के पूजन की बात क्यों कही है?
उत्तर :
मनुष्य का जीवन कल्पनाओं के आधार पर नहीं टिकता। वह जीवन के कठोर धरातल पर स्थित होकर आगे गति करता है। पुरानी सुख भरी यादों से वर्तमान दुखी हो जाता है; मन में पलायनवाद के भाव उत्पन्न हो जाते हैं। उसे कठिन यथार्थ से आमना-सामना करके ही आगे बढ़ने की चेष्टा करनी चाहिए। इसलिए कवि ने जीवन की कठोर वास्तविकता को स्वीकार करने की बात कही है।

प्रश्न 2.
भाव स्पष्ट कीजिए –
प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्णा है,
हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्णा है।
उत्तर :
कवि ने माना है कि हर मनुष्य अपने जीवन में धन-दौलत और सुखों की प्राप्ति करना चाहता है, पर सबके लिए ऐसा हो पाना संभव नहीं होता। वह उसके लिए मृगतृष्णा के समान ही सिद्ध होकर रह जाता है। उसे केवल सुखों के प्राप्त हो जाने का झूठा आभास होता है। वह उसे प्राप्त नहीं कर पाता। इस कारण उसका हृदय पीड़ा से भर जाता है। हर चाँदनी रात के पीछे जिस तरह अमावस्या की अंधेरी रात छिपी रहती है, उसी प्रकार हर सुख के बाद दुख का भाव भी निश्चित रूप से छिपा रहता है।

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प्रश्न 3.
‘छाया’ शब्द यहाँ किस संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है ? कवि ने उसे छूने के लिए मना क्यों किया है ?
उत्तर :
‘छाया’ शब्द में लाक्षणिकता विद्यमान है, जो भ्रम और दुविधा की स्थिति को प्रकट करता है। यह सुखों के भावों को प्रकट करता है, जो मनुष्य के जीवन में सदा नहीं रहते। सुख-दुख मानव-जीवन के अंग हैं। जब दुख का भाव जीवन में आता है, तब मनुष्य बार-बार उन सुखों को याद करता है जिन्हें उसने कभी प्राप्त किया था। दुख की घड़ियों में सुखद समय की स्मृतियों में डूबने से उसके दुख दोगुने हो जाते हैं। इसलिए कवि ने उसे छूने के लिए मना किया है।

प्रश्न 4.
कविता में विशेषण के प्रयोग से शब्दों के अर्थ में विशेष प्रभाव पड़ता है, जैसे कठिन यथार्थ। कविता में आए ऐसे अन्य उदाहरण छाँटकर लिखिए और यह भी लिखिए कि इससे शब्दों के अर्थ में क्या विशिष्टता पैदा हुई?
उत्तर :
कवि ने छायावादी काव्यधारा से प्रभावित होकर अपनी कविता में विशेषणों का विशेष प्रयोग किया है, जैसे
(i) सुरंग सुधियाँ – यादों की विविधता और मोहक सुंदरता की विशिष्टता।
(ii) छवियों की चित्र-गंध – सुंदर रूपों में मादक गंध की विशिष्टता।
(iii) तन-सुगंध – सुगंध के साकार रूप की विशिष्टता।
(iv) जीवित-क्षण – समय की सकारात्मकता की विशिष्टता।
(v) शरण-बिंब – जीवन में आधार बनने की विशिष्टता।
(vi) यथार्थ कठिन – जीवन की कठोर वास्तविकता की विशिष्टता।
(vii) दुविधा-हत साहस – साहस होते हुए भी दुविधाग्रस्त रहने की विशिष्टता।
(viii) शरद्-रात – रात में शरद् ऋतु की ठंडक की विशिष्टता।
(ix) रस-बसंत – बसंत ऋतु में मधुर रस के अहसास की विशिष्टता।

प्रश्न 5.
‘मृगतृष्णा’ किसे कहते हैं ? कविता में इसका प्रयोग किस अर्थ में हुआ है?
अथवा
प्रभुता की कामना को मृगतृष्णा क्यों कहा गया है? ‘छाया मत छूना’ कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर :
‘मृगतृष्णा’ का शाब्दिक अर्थ है-‘धोखा’ या ‘भ्रम’। जो न होकर भी होने को प्रकट करता है, वही मृगतृष्णा है। कवि ने कविता में सुख-संपदाओं की प्राप्ति से होने वाले मानसिक सुख के लिए ‘मृगतृष्णा’ शब्द का प्रयोग किया है। किसी व्यक्ति के पास चाहे अपार भौतिक सुख हो, पर उनसे मानसिक सुख और शांति की प्राप्ति होना संभव नहीं होता; भले ही उसकी संपन्नता को देखकर लोग उसे सुखी मानते रहे।

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प्रश्न 6.
‘बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि ले’ – यह भाव कविता की किस पंक्ति से झलकता है?
उत्तर :
कवि ने ‘बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि ले’ के लिए अपनी कविता में जिस पंक्ति का प्रयोग किया है, वह है
‘जो न मिला भूल उसे कर तू भविष्य वरण’

प्रश्न 7.
कविता में व्यक्त दुख के कारणों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
हर व्यक्ति का जीवन सुख और दुखों के मेल से बना है। सुख के बाद दुख आते हैं, तो दुखों के बाद सुख। हमें सुख आनंद का अहसास करवाते हैं, तो दुख पीड़ा देते हैं। हम पीड़ा से मुक्ति पाने की चेष्टा करते हैं और सुख की घड़ियों को बार-बार याद करने लगते हैं, जिससे पीड़ा कम होने की अपेक्षा बढ़ जाती है; वह दोगुनी हो जाती है। हम धन-दौलत प्राप्त कर अपना जीवन सुखमय बनाने की कोशिश करते हैं, पर धन की प्राप्ति से सभी सुख प्राप्त नहीं होते। सुख का आधार मन की शांति है। हमें मन की शांति के लिए : प्रयत्नशील होना चाहिए। जो बातें बीत चुकी हों, उन्हें भुला देना चाहिए और सुखद भविष्य के लिए प्रयासरत हो जाना चाहिए। दुख के कारण पुरानी सुखद बातों को मन-ही-मन दोहराते नहीं रहना चाहिए।

रचना और अभिव्यक्ति –

प्रश्न 8.
‘जीवन में है सुरंग सुधियाँ सुहावनी’ से कवि का अभिप्राय जीवन की मधुर स्मृतियों से है। आपने अपने जीवन की कौन-कौन सी स्मृतियाँ सँजो रखी हैं?
उत्तर :
प्रत्येक व्यक्ति के मन में अनेक मधुर स्मृतियाँ छिपी रहती हैं, जो समय-समय पर प्रकट होती हैं। जब वे याद आती हैं, तब अनायास ही होंठों पर मुस्कान बिखर जाती है। जब मैं छोटा था, तब मेरी बुआ जी मेरे जन्मदिन पर एक साथ दस उपहार लेकर आई थीं। मैंने हैरान होकर उनसे पूछा था कि वे एक साथ इतने उपहार क्यों ले आई हैं? उन्होंने मुस्कराकर कहा था कि वे पिछले दस वर्ष से विदेश में थीं और मेरे जन्मदिन पर वे मुझे उपहार नहीं दे पाई थीं। इसलिए पिछले दस वर्षों के दस उपहार मुझे एक साथ दे रही हैं।

उपहार भी एक से बढ़कर एक थे। मैं खुशी से झूम उठा। आज भी मुझे वह घटना ऐसी लगती है, जैसे उसे घटित हुए कुछ ही देर हुई हो। मैं इस घटना को कभी नहीं भूल सकता। एक बार मैं पैदल स्कूल जा रहा था। एक नन्हा-सा पिल्ला मेरे पीछे-पीछे चलने लगा। मुझे उसका अपने पीछे आना अच्छा लगा। जब मैं स्कूल पहुँच गया, तो स्कूल के चौकीदार ने उसे भगा दिया।

छुट्टी के बाद जैसे ही मैं बाहर निकला, वैसे ही न जाने कहाँ से वह भागता हुआ आया और फिर मेरे पीछे-पीछे मेरे घर तक आया। यह क्रम अगले दिन भी चला। इसके बाद महीना भर मेरा और उसका स्कूल जाना-आना एक साथ हुआ। इसके बाद मुझे नहीं पता कि अचानक वह पिल्ला कहाँ चला गया। मैंने उसे ढूँढ़ने की कोशिश की, पर फिर वह मुझे कहीं दिखाई नहीं दिया। इस घटना को अनेक वर्ष बीत चुके हैं, पर मुझे उसकी मधुर स्मृति कभी नहीं भूलती।

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प्रश्न 9.
“क्या हुआ जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर?’ कवि का मानना है कि समय बीत जाने पर भी उपलब्धि मनुष्य को आनंद देती है। क्या आप ऐसा मानते हैं ? तर्क सहित लिखिए।
उत्तर
समय का विशेष महत्व है। इसके बीत जाने पर हमें प्रायः दुख ही उठाना पड़ता है। समय कभी किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। यह लगातार आगे भागता जाता है। यदि हम इसके एक-एक क्षण को व्यर्थ गँवा देते हैं, तो हमारा कल्याण संभव नहीं हो सकता। कहा भी तो जाता है –

‘अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत’

प्राय: माना जाता है कि धन सबसे कीमती वस्तु है, पर यदि ध्यान से सोचा जाए तो समय धन से भी अधिक उपयोगी और मूल्यवान है। धन से हर वस्तु खरीदी जा सकती है, पर समय नहीं खरीदा जा सकता। यह घड़ी की टिक-टिक के साथ भागता जाता है। यदि किसी बीमार व्यक्ति को समय पर उपचार न मिले, तो उसका जीवन नहीं बचाया जा सकता। यदि समय पर विद्यार्थी पढ़ाई न करें, तो वे परीक्षा में पास नहीं हो सकते। यदि किसान समय पर अपने खेत की सिंचाई न करे, तो उसे उपज प्राप्त नहीं हो सकती।

रेलगाड़ी, बस, वायुयान आदि किसी के लिए प्रतीक्षा नहीं करते। समय चूक जाने पर वे अपने गंतव्य की ओर चले जाते हैं। यदि किसी उपलब्धि की हमें समय के बाद प्राप्ति हो भी जाती है, तो उसका कोई उपयोग नहीं रहता। फ़सल के सूख जाने के बाद वर्षा हो भी जाए तो उसका क्या लाभ? हमें चाहिए कि हम हर कार्य उचित समय पर ही करें, ताकि इससे समय की उपलब्धि की उपादेयता बनी रहे।

पाठेतर सक्रियता –

प्रश्न 1.
आप गर्मी की चिलचिलाती धूप में कभी सफ़र करें तो दूर सड़क पर आपको पानी जैसा दिखाई देगा पर पास पहुँचने पर वहाँ कुछ नहीं होता। अपने जीवन में भी कभी-कभी हम सोचते कुछ हैं, दिखता कुछ है लेकिन वास्तविकता कुछ और होती है। आपके जीवन में घटे ऐसे किसी अनुभव को अपने प्रिय मित्र को पत्र लिखकर अभिव्यक्त कीजिए।
उत्तर :
48, दुग्गल कॉलोनी,
कानपुर
15 सितंबर, 20……
प्रिय अंकुश,
मुझे तुम्हारा पत्र बहुत पहले प्राप्त हो गया था, पर मैं समय पर उसका उत्तर नहीं दे पाया। मुझे इस बात का खेद है। वास्तव में पिछले दिनों मेरे साथ कुछ ऐसा घटित हुआ, जिसकी मुझे कभी उम्मीद नहीं थी।

तुम्हें याद होगा कि मैंने अपने एक मित्र से तुम्हारा परिचय करवाया था, जब तुम पिछली छुट्टियों में घर आए थे। उसका नाम कपिल था। वह मेरी ही कक्षा में पढ़ता था और प्रायः मेरे घर आया करता था। वह होस्टल में रहता था। उसके माता-पिता किसी दूर के गाँव मम्मी-पापा उसे अपने बेटे के समान ही प्यार करते थे। यदि मेरे लिए वे बाजार से कुछ लाते थे, तो उसके लिए लाना नहीं भूलते थे।

कहते थे कि कितना होनहार बच्चा है! होशियार है, मीठा बोलता है, भोला-भाला है। पिछले सप्ताह उसने अपने गाँव के कुछ लोगों के साथ मिलकर हमारे घर में चोरी कर ली। हमारा लगभग पाँच लाख रुपये का नुकसान हो गया है। उसे हमारे घर की एक-एक चीज़ पता थी। लगभग हर रोज़ वह हमारे घर आता था। अगले महीने रीमा दीदी की शादी है, इसलिए घर में उसके दहेज का नया सामान था; नकदी थी।

वह सब चोरी चला गया। हमें तो विश्वास ही नहीं हुआ, जब पुलिस ने उसे उसके गाँव से पकड़कर हमारे सामने खड़ा कर दिया। उसने अपना अपराध कबूल कर लिया है, पर न तो उसके साथी पुलिस की पकड़ में आए हैं और न ही हमारा सामान बरामद हुआ। शायद हमारा सामान हमें वापस मिल जाए। उसकी शक्ल कितनी भोली थी, पर वह मन का कितना काला निकला! सच है कि हम लोगों के बारे में सोचते कुछ हैं, वे निकलते कुछ हैं। अच्छा, बाकी बातें अगली बार।
अंकल-आंटी को मेरी ओर से नमस्ते कहना।
तुम्हारा मित्र
अनुज

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 छाया मत छूना

प्रश्न 2.
कवि गिरिजाकुमार माथुर की ‘पंद्रह अगस्त’ कविता खोजकर पढ़िए और उस पर चर्चा कीजिए।
उत्तर :
अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं कीजिए।

यह भी जानें –

प्रसिद्ध गीत ‘We shall overcome’ का हिंदी अनुवाद ‘हम होंगे कामयाब’ शीर्षक से कवि गिरिजाकुमार माथुर ने किया है।

सप्रसंग व्याख्या, अर्थग्रहण संबंधी एवं सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. छाया मत छूना
मन, होगा दुख दूना।
जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी
छवियों की चित्र-गंध फैली सनभावनी;
तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी,
कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी।
भूली-सी एक छुअन बनता हर जीवित क्षण

शब्दार्थ : छाया – भ्रम, दुविधा, पुरानी सुखद बातें। दूना – दोगुना। सुरंग – रंग-बिरंगी। सुधियाँ – यादें। सुहावनी – सुंदर। छवियों की चित्रगंध – चित्र की स्मृति के साथ उसके आस-पास की गंध का अनुभव। मनभावनी – मन को अच्छी लगने वाली। तन-सुगंध – शरीर की सुगंध। शेष – बाकी, पीछे। यामिनी – तारों भरी चाँदनी रात। कुंतल – लंबे बाल। छुअन – स्पर्श।

प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण हमारी पाठ्य–पुस्तक क्षितिज (भाग-2) में संकलित कविता छाया मत छूना से लिया गया है, जिसके रचयिता गिरिजाकुमार माथुर हैं। कवि ने पुरानी सुखद बातों को बार-बार याद करने को उचित नहीं माना, क्योंकि ऐसा करने से जीवन में आए दुख दोगुने हो जाते हैं।

व्याख्या : कवि कहता है कि हे मेरे मन! तू पुरानी सुख भरी यादों को बार-बार अपने मन में मत ला; उन्हें याद मत कर। ऐसा करने से मन में छिपा दुख बढ़कर दोगुना हो जाएगा। हम मनुष्यों के जीवन में न जाने कितनी सुख भरी यादें होती हैं। वे सुखद रंग-बिरंगी छवियों की झलक और उनके आस-पास मधुर यादों की गंध सदा मन को मोहती हैं। वे सदा अच्छी लगती हैं।

जब सुखद समय बीत जाता है, तब केवल शरीर की मादक-मोहक सुगंध ही यादों में शेष रह जाती है। जब तारों से भरी सुखद चाँदनी रात बीत जाती है, तब यादें शेष रह जाती हैं। लंबे सुंदर बालों में लगे फूलों की याद ही चाँदनी के समान मन में छाई रहती हैं। सुख भरे समय में भूल से किया गया एक स्पर्श भी जीवित क्षण के समान सुंदर और मादक प्रतीत होता है। उसे भुलाने की बात मन में कभी नहीं आती। वही सुखद पल जीवन के लिए सुखदायी बनकर मन में छिपा रहता है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 छाया मत छूना

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. अवतरण में निहित भावार्थ को स्पष्ट कीजिए।
2. ‘छाया मत छूना’ का तात्पर्य स्पष्ट कीजिए।
3. जीवन में किसकी पोहक यादें फैली थी?
4. ‘चित्र-गंध’ क्या है?
5. यामिनी बीतने का क्या अर्थ है ?
6. ‘कुंतल के फूल’ क्या हैं ?
7. ‘चाँदनी’ किसकी प्रतीक है?
8. ‘हर जीवित क्षण’ क्या है?
9. ‘शेष रही’ में निहित भाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
1. कवि ने सुख और दुख को जीवन का आवश्यक हिस्सा माना है। मनुष्य को जीवन में दुख आने की स्थिति में सुखों को याद नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे दुख कम नहीं होते बल्कि दोगुने हो जाते हैं।
2. ‘छाया मत छूना’ से तात्पर्य पुरानी सुखद बातों को याद न करने से है।
3. जीवन में सुखों की मोहक यादें फैली थीं।
4. मधुर यादों के साथ उसके आस-पास फैली गंध का अनुभव।
5. सुख के क्षणों का व्यतीत हो जाना।
6. ‘कुंतल के फूल’ प्रतीकात्मक शब्द हैं; जो सुखद घड़ियों को प्रकट करते हैं।
7. ‘चाँदनी’ प्रेम भरे क्षणों को व्यक्त करने वाला प्रतीकात्मक शब्द है। यह सुख की घड़ियों को प्रकट करता है।
8. ‘हर जीवित क्षण’ सख का अहसास करवाने वाला मधुर पल है।
9. प्रेमरूपी सुगंध का बना रहना ही ‘शेष रही’ को प्रकट करता है।

बोर्ड परीक्षा में पूछे गए प्रश्नोत्तर –

(क) ‘छाया मत छूना’-कवि ने ऐसा क्यों कहा?
(ख) ‘छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी’ का क्या तात्पर्य है?
(ग) ‘कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी’ में कवि को कौन सी यादें कचोटती हैं?
उत्तर :
(क) ‘छाया मत छूना’ से कवि का तात्पर्य पुरानी सुखद यादों और बातों को याद न करने से है।
(ख) जीवन में सुखों की मोहक यादें फैली थी, जिसकी मधुर यादों के साथ उसके आस-पास फैली गंध अत्यंत मनभावनी लगती है।
(ग) ‘कुंतल के फूल’ प्रतीकात्मक शब्द है; जो सुखद घड़ियों को प्रकट करता है। यहाँ कवि को सुख का अहसास करवाने वाले मधुर पलों की यादें कचौटती हैं।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 छाया मत छूना

सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. भाव स्पष्ट कीजिए।
2. कवि के भावों को गहनता-गंभीरता किसने प्रदान की है?
3. किस बोली का प्रयोग किया गया है?
4. किस प्रकार की शब्दावली की अधिकता है?
5. किस बिंब का प्रयोग है?
6. कौन-सा काव्य-रस विदयमान है?
7. किस छंद ने लयात्मकता की सृष्टि की है?
8. किस काव्य-गुण का प्रयोग हुआ है ?
9. किस शब्द-शक्ति का प्रयोग है?
10. दो तत्सम शब्द लिखिए।
11. दो तद्भव शब्द लिखिए।
12. यह कविता किस काव्य-धारा से संबंधित है?
13. प्रयुक्त अलंकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
1. कवि ने सुख की घड़ियों में मन पर पड़ने वाले आनंद के भावों का प्रभाव प्रस्तुत किया है। उसका मानना है कि सुख के भावों को दुख की घड़ियों में याद करने से दुख बढ़ता है; घटता नहीं है।
2. प्रतीकात्मकता के प्रयोग ने कवि के भावों को गहनता-गंभीरता प्रदान की है।
3. खड़ी बोली का प्रयोग है।
4. तत्सम शब्दावली का अधिक प्रयोग किया गया है।
5. मानस बिंब का प्रयोग है।
6. वियोग श्रृंगार रस है।
7. तुकांत छंद ने लयात्मकता की सृष्टि की है।
8. प्रसाद गुण विद्यमान है।
9. लक्षणा शब्द-शक्ति है।
10. कुंतल, चित्रगंध।
11. फूल, मन।
12. छायावाद
13. अनुप्रास –
दुख दूना, सुरंग सुधियां सुहावनी

उपमा –
भूली-सी एक छुअन बनता हर जीवित क्षण।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 छाया मत छूना

2. छाया मत छूना
मन, होगा दुख दूना।
यश है या न वैभव है, मान है न सरमाया;
जितना ही दौड़ा तू उतना ही भरमाया।
प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्णा है,
हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्णा है।
जो है यथार्थ कठिन उसका तू कर पूजन-
छाया मत छूना
मन, होगा दुख दूना।

शब्दार्थ : वैभव – संपदा, धन-दौलत, संपत्ति। सरमाया – पूँजी। प्रभुता का शरणे बिंब – बड़प्पन का अहसास। भरमाया – भ्रम में पड़ना। मृगतृष्णा – भ्रम, धोखा। चंद्रिका – चाँदनी। कृष्णा – काली, अमावस्या। यथार्थ – वास्तविक। कठिन – मुश्किल। पूजन – पूजा।

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक क्षितिज (भाग-2) में संकलित कविता ‘छाया मत छूना’ से ली गई हैं, जिसके रचयिता श्री गिरिजाकुमार माथुर हैं। कवि का मानना है कि जीवन में दुख और सुख तो आते रहते हैं, पर दुख की घड़ियों में सुखों को याद नहीं करना चाहिए।

व्याख्या : कवि कहता है कि हे मेरे मन! जीवन में आने वाले दुखों के समय छायारूपी सुख को मत छूना, क्योंकि इससे दुख कम नहीं होता बल्कि वह दोगुना बढ़ जाता है। मेरे जीवन में न तो शान-शौकत है और न ही धन-दौलत; न तो मान-सम्मान है और न ही किसी प्रकार की पूँजी। श्रेष्ठता और प्रभुता की प्राप्ति की इच्छा केवल धोखे के पीछे भागना है। जो नहीं है, उसे प्राप्त करने की इच्छा है। हर सुख के पीछे दुख छिपा होता है। ठीक उसी प्रकार जैसे चाँदनी रात के पीछे अमावस्या की अंधेरी रात छिपी रहती है। हे मेरे मन! जो अति कठिन सच्चाई है; वास्तविकता है, तू उसकी पूजा कर। उसे प्राप्त करने का प्रयत्न कर।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. अवतरण में निहित भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
2. दुख क्यों दोगुना लगने लगता है?
3. कवि ने किन अभावों को प्रकट किया है?
4. ‘भरमाया’ में निहित अर्थ स्पष्ट कीजिए।
5. ‘मृगतृष्णा’ क्या है?
6. ‘चंद्रिका’ में छिपा प्रतीकार्थ स्पष्ट कीजिए।
7. ‘कृष्णा’ शब्द से कवि किसकी ओर संकेत करता है?
8. ‘यथार्थ कठिन’ क्या है?
9. ‘पूजन’ में निहित अर्थ को प्रकट कीजिए।
10. छाया से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
1. कवि ने कहा है कि दुख की घड़ियों में बीते समय के सुखों को याद करने से दुख कम नहीं होते बल्कि बढ़ जाते हैं। हर व्यक्ति सुख पाना चाहता है; धन-दौलत प्राप्त करना चाहता है। पर जितना हम सुखों के पीछे भागते हैं, वे उतने ही मृगतृष्णा सिद्ध होते हैं। हमें उनकी प्राप्ति सरलता से नहीं होती। हर सुख के पीछे दुख दो अवश्य छिपा रहता है। हमें जीवन की कठोर सच्चाइयों को ही मन में रखना चाहिए।
2. जब जीवन में दुख की घड़ियाँ आने पर हम पिछले सुखों के बारे में सोचने लगते हैं, तब दुख दोगुना लगने लगता है।
3. कवि ने मान-सम्मान, धन-दौलत और सुखों की पूँजी के अभाव को प्रकट किया है।
4. ‘भरमाया’ का अर्थ है-‘भ्रम में पड़ना’। सुखों को प्राप्त करने के लिए हम जितनी अधिक भाग-दौड़ करते हैं, ये उतना ही अधिक हमें भ्रम में डालते जाते हैं। इससे हमारी परेशानियाँ बढ़ती हैं।
5. ‘मृगतृष्णा’ का अर्थ है-‘भ्रम’ या ‘धोखा’। जो न होकर भी होने का आभास करवाता है, वही मृगतृष्णा है। जीवन में प्रभुता को पाने की इच्छा के लिए कवि ने इस शब्द का प्रयोग किया है।
6. ‘चंद्रिका’ का शाब्दिक अर्थ चाँदनी है, पर कवि ने इसे सुखों के रूप में प्रयुक्त किया है। हर व्यक्ति अपने जीवन में सुखरूपी चाँदनी को प्राप्त करना चाहता है।
7. ‘कृष्णा’ शब्द से कवि ने दुखरूपी अमावस्या का बोध करवाया है। कवि कहता है कि हर व्यक्ति के जीवन में दुखों का आना-जाना लगा रहता है।
8. ‘यथार्थ कठिन’ जीवन की वह सच्चाई है, जिसे हर व्यक्ति को झेलनी पडती है। कठोर परिश्रम करना और जीवन को सखी बनाने की चेष्टा इससे ही संबंधित है।
9. ‘पूजन’ प्रतीक शब्द है, जो कठोर परिश्रम में स्वयं को लगा देने के लिए प्रयुक्त किया है। यह निष्ठा और लगन का भी प्रतीक है। इसके पीछे आस्था का भाव छिपा हुआ है।
10. छाया से तात्पर्य पुरानी सुखद यादों को स्मरण करना है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 छाया मत छूना

सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. भाव व्यक्त कीजिए।
2. किस बोली से भावों को अभिव्यक्त किया गया है?
3. किस प्रकार की शब्द-योजना की प्रधानता है?
4. भावों की गहनता का आधार क्या है?
5. किसने कथन को गंभीरता प्रदान की है?
6. किस छंद ने लयात्मकता की सृष्टि की है?
7. कौन-सा काव्य-गुण विद्यमान है?
8. दो तत्सम और दो तद्भव शब्द चुनकर लिखिए।
9. इसमें कौन-सी शैली प्रयुक्त की गई है?
10. अलंकारों का उल्लेख कीजिए।
11. प्रतीक छाँटकर लिखिए।
उत्तर :
1. कवि ने स्वीकार किया है कि जीवन में सुख-दुख आते रहते हैं। किसी के भी जीवन में केवल सुख नहीं रहते, बल्कि हर सुख के पीछे दुख निश्चित रूप से लगा रहता है।
2. खड़ी बोली।
3. तत्सम शब्दावली का सहज-स्वाभाविक प्रयोग किया गया है।
4. प्रतीकात्मकता।
5. लाक्षणिकता का प्रयोग किया गया है, जिससे कथन में गंभीरता उत्पन्न हुई है।
6. तुकांत छंद ने लयात्मकता की सृष्टि की है।
7. प्रसाद गुण विद्यमान है।
8. तत्सम –
प्रभुता, मृगतृष्णा

तद्भव –
छाया, दुख

9. छायावादी।

10. अनुप्रास –
होगा दुख दूना
जो है यथार्थ कठिन उसका तू कर पूजन

11. (i) रात कृष्णा –
दुख-दीनता

(ii) छाया –
पुरानी यादें और भविष्य की कामनाएँ

(ii) चंद्रिका –
सुख-वैभव

(iv) मृगतृष्णा –
धोखा/मन का भटकाव

(v) दौड़ना –
सांसारिक तृष्णाएँ

(vi) कृष्णा –
निराशा/पीड़ा

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 छाया मत छूना

3. छाया मत छूना
मन, होगा दुख दूना।
दुविधा-हत साहस है, दिखता है पंथ नहीं,
देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत महीं।
दुख है न चांद खिला शरद-गा आने पर,
क्या हुआ जो खिल पूल रस-बसंत्त जाने पर?
जो न मिला भूल उसे कर तू भखिष्य वरण,
छाया मत छूना
मन, होगा दुख दूना।

शब्दार्थ : दुविधा-हत साहस – साहस होते हुए भी दुविधा-ग्रस्त रहना। पंथ – रास्ता। शरद-रात – सर्दियों की रात। भविष्य वरण – आने वाले समय के सुखों का चुनाव।

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक क्षितिज (भाग-2) में संकलित कविता ‘छाया मत छूना’ से ली गई हैं, जिसके रचयिता श्री गिरिजाकुमार, माथुर हैं। कवि ने प्रेरणा दी है कि पुराने सुखों की याद में हर पल डूबे रहना उचित नहीं है। इससे जीवन में दुखों की छाया बढ़ती है। परिश्रम करते हुए भविष्य को सँवारने की चेष्टा करना ही सदा अच्छा होता है।

व्याख्या : कवि कहता है कि हे मेरे मन ! दुख और निराशा की घड़ियों में बीते हुए सुखों को याद मत कर। ऐसा करने से वर्तमान के दुख बढ़ जाते हैं। हम अपने जीवन में अकारण ही निराशा के भावों से भरे रहते हैं। साहस होते हुए भी दुविधा से ग्रस्त रहते हैं। हमें अपने जीवन की राह दिखाई नहीं देती। भौतिक धन-दौलत से हम शारीरिक सुख-उपभोग तो प्राप्त कर लेते हैं, पर हमारे मन में व्याप्त दुखों का अंत नहीं होता। हमारे मन में दुख के भाव इतने अधिक हैं कि सुखों के आने का पता ही नहीं चलता।

शरद् ऋतु के साफ़-स्वच्छ आकाश में रात के समय चाँदरूपी सुख की चाँदनी दिखाई ही नहीं देती। मन की निराशा उसे प्रकट नहीं होने देती। बसंत ऋतु बीत जाने पर यदि फूल खिला भी, तो उसका क्या लाभ। भाव है कि किसी सुख के बीत जाने पर यदि उसका आभास हुआ भी, तो उसका कोई लाभ नहीं है। हे मन! तुम्हें जो जीवन में अभी तक नहीं मिला उसे भविष्य में प्राप्त कर; परिश्रम कर और सुख-दुख से दूर होकर मनचाहा प्राप्त कर। तू दुख की घड़ियों में सुख के क्षणों को याद मत कर।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. अवतरण में निहित भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
2. ‘दुविधा हत साहस’ क्या है?
3. ‘पंथ’ में निहित अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
4. सुख-सुविधाएँ प्राप्त होने पर भी हमें किसके अंत का पता नहीं होता?
5. ‘न चाँद खिला’ से क्या तात्पर्य है?
6. ‘क्या हुआ जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
7. ‘भविष्य वरण’ का क्या अर्थ है ?
8. देह का सुख किससे प्राप्त करने की ओर संकेत किया गया है?
9. ‘फूल का खिलना’ किस बात का बोध कराता है ?
उत्तर :
1. कवि ने स्पष्ट किया है कि जब मन में उत्साह की कमी हो; वह दुख और पीड़ा के भावों से भरा हुआ हो, तब उसे अपने जीवन की राह साफ़-साफ़ दिखाई नहीं देती। मन के कष्टों को भुलाकर मनुष्य को भविष्य के सुखों की ओर बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।
2. ‘दुविधा हत साहस’ से तात्पर्य है-‘साहस होते हुए भी दुविधाग्रस्त रहना’।
3. ‘पंथ’ से तात्पर्य हमारे जीवन के उन उद्देश्यों से है, जिन्हें दुविधाग्रस्त होने के कारण हम प्राप्त कर सकने में सक्षम नहीं हो पाते।
4. सुख-सुविधाएँ प्राप्त होने पर भी हमें मन में व्याप्त दुखों के अंत का पता नहीं होता।
5. ‘न चाँद खिला’ प्रतीकात्मक प्रयोग है, जिसका तात्पर्य सुखों के प्राप्त न होने से है; जिस कारण मन में सुख का भाव उत्पन्न नहीं होता।
6. ‘क्या हुआ जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर’ से कवि का तात्पर्य है कि उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि फूल कब खिला। फिर भले ही रंग-बसंत’ अर्थात समय बीत गया हो।
7. ‘भविष्य वरण’ का अर्थ आने वाले समय की ओर बढ़कर नए उद्देश्यों और लक्ष्यों की प्राप्ति करना है; उनका चुनाव करना है।
8. देह का सुख मन के सुख से प्राप्त करने की ओर संकेत किया गया है। धन-वैभव से देह के लिए बाहरी सुख बटोरे जा सकते हैं, पर वास्तविक सुख तभी प्राप्त होते हैं जब मन पूर्ण रूप से संतुष्ट हो; उसमें सुख का भाव छिपा हो।
9. ‘फूल का खिलना’ सुखों की प्राप्ति को प्रकट करता है। इससे जीवन में प्राप्त होने वाले आनंद का बोध होता है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 छाया मत छूना

सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. भाव स्पष्ट कीजिए।
2. भावों की गंभीरता का आधार क्या है?
3. कवि ने अपने कथन को गहनता किस प्रकार दी है?
4. किस बोली का प्रयोग है?
5. किस प्रकार की शब्दावली का प्रयोग अधिकता से किया गया है?
6. किस काव्य गुण का प्रयोग है?
7. कौन-सा छंद लयात्मकता का आधार बना है?
8. प्रश्न-शैली ने कथन को क्या प्रदान किया है?
9. दो तत्सम और दो तद्भव शब्द लिखिए।
10. प्रतीक छाँटकर लिखिए।
11. हिंदी की किस काव्यधारा से संबंधित है?
12. प्रयुक्त अलंकार चुनकर लिखिए।
उत्तर :
1. कवि ने सुख भरे भविष्य के लिए परिश्रम करने की प्रेरणा दी है तथा दुख की घड़ियों में सुखद पलों को याद न करने का परामर्श दिया है।
2. प्रतीकात्मकता।
3. लाक्षणिकता का प्रयोग भावों में गहनता का आधार बना है।
4. खड़ी बोली का प्रयोग है।
5. तत्सम शब्दावली का अधिकता से प्रयोग किया गया है।
6. प्रसाद गुण विद्यमान है।
7. तुकांत छंद ने लयात्मकता की सृष्टि की है।
8. प्रश्न-शैली ने भावों को सामर्थ्य प्रदान किया है।
9. तत्सम –
दुविधा, वरण

तद्भव –
मन, फूल

10. चाँद, शरद-रात, फूल, बसंत, छाया।
11. छायावाद
12. अनुप्रास –
दुख दूना, खिला फूल, मिला धूल।

प्रश्न –
क्या हुआ जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर?

JAC Class 10 Hindi छाया मत छूना Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘छाया मत छूना’ कविता के आधार पर गिरिजाकुमार माथुर की मानसिक सबलता पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर :
गिरिजाकुमार माथुर छायावादी काव्यधारा से प्रभावित थे और उनकी कविता में प्रेम-सौंदर्य और कल्पना की अधिकता है, पर कवि ने ‘छाया मत छूना’ कविता में कल्पना की उड़ान से बहुत दूर होकर अपनी मानसिक सबलता का परिचय दिया है। उनके अनुसार कोरी कल्पनाएँ जीवन में किसी काम की नहीं होती। इनसे सुखों की अनुभूति होती है, लेकिन जीवन का वास्तविक सुख प्राप्त नहीं होता।

जीवन में सुख दुख आते हैं, लेकिन दुख की घड़ियों में हम सुखों को याद करके अपनी पीड़ा को बढ़ा लेते हैं। जीवन में केवल मधुर सपने नहीं हैं, इसमें कठोरता भी बसती है। हमें पुरानी बातों को भुलाकर मज़बूत कदमों से भविष्य की ओर बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए। क्या हुआ जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर? जो न मिला भूल उसे कर तू भविष्य वरण। जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम अपने लक्ष्य की ओर दृष्टि जमाए रखें और आगे बढ़ते जाएँ, न कि पिछले सुखों को याद कर आँसू बहाते रहे।

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प्रश्न 2.
‘छाया मत छूना’ में कवि ‘छाया’ किसे कहता है और क्यों?
उत्तर :
कवि ने अतीत के सुखों को छाया कहा है। अतीत में प्राप्त सुख हमारे वर्तमान को सुखमय नहीं बना सकते। वर्तमान जीवन में उनका कोई अस्तित्व नहीं। अतीत की छाया वर्तमान से मेल नहीं खाती, न ही यथार्थ में बदल सकती है। अतीत का सुख हमें असमंजस में लाकर खड़ा कर देता है। अत: अतीत की सुखरूपी छाया से दूर रहना ही उचित है।

प्रश्न 3.
‘तन सुगंध शेष रही बीत गई यामिनी’ पंक्ति को स्पष्ट करें।
उत्तर :
‘तन सुगंध शेष रही बीत गई यामिनी’ पंक्ति का संबंध कवि के जीवन की उन सुखद रातों से है, जो अब अतीत बन गई हैं। अब बस उनकी याद (सुगंध) ही शेष रह गई है। यह कैसी त्रासदी है कि पहले की सुखद रातें अब उसके लिए दुखद प्रतीत होती हैं, क्योंकि वर्तमान में प्रिया उसके साथ नहीं है।

प्रश्न 4.
कवि ने यश, वैभव, मान आदि को किसके समान बताया है ?
उत्तर :
मानव उसी तरह जीवनभर यश, वैभव, मान के पीछे भागता है, जैसे रेगिस्तान में हिरण जल के आभास में चमकती रेत के पीछे दौड़ता है। जीवन में यश, वैभव को कवि ने मृगतृष्णा के समान कहा है। जैसे हिरण की प्यास नहीं बुझती, उसी तरह मनुष्य भी अर्जित यश, वैभव, मान से संतुष्ट नहीं होता। उसकी लालसा कभी नहीं मिटती।

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प्रश्न 5.
कवि ने ‘छाया मत छूना’ कविता में कठिन यथार्थ के पूजन की बात क्यों की है ?
उत्तर :
कवि के अनुसार अतीत की सुखद स्मृति हमारे वर्तमान को दुखद बनाती है। यह सच्चाई है कि जीवन में सुख-दुख आते-जाते हैं। कठिन परिस्थितियों का सामना करना व उनको स्वीकार करना यथार्थ को अपनाना है। सच्चाई से बचा नहीं जा सकता, इसलिए उसका पूजन करना ही मनुष्य के लिए लाभप्रद है। विचलित हुए बिना कष्टों का सामना करना या कठिनाइयों से सामंजस्य स्थापित करना ही यथार्थ पूजन है। कठिनाइयों का सामना करें, पलायन नहीं।

प्रश्न 6.
कैसे व्यक्ति को पंथ दिखाई नहीं देता?
उत्तर :
ऐसा व्यक्ति जो उचित-अनुचित या सही-गलत में अंतर नहीं कर सकता; जिसका मन दुविधाग्रस्त रहता है, उसे लक्ष्य की ओर जाने वाला मार्ग नहीं दिखता। उसे सफलता-असफलता की आशंका घेरे रहती है। ऐसा व्यक्ति न तो शारीरिक रूप से सुखी होता है, न ही मानसिक रूप से। ऐसा व्यक्ति उन क्षणों को भी सुखपूर्वक नहीं भोग सकता, जो उसे वर्तमान में प्राप्त हैं।

प्रश्न 7.
कवि हमें क्या भूल जाने की सलाह दे रहा है?
उत्तर :
कवि हमें समझाना चाहता है कि जो जीवन में हमें प्राप्त न हो सका, उसका शोक करने के स्थान पर उसे भूल जाना ही हितकर है। उसके चिंतन में घुलना अनुचित है। ऐसा करने वाला स्वयं को दुख ही देता है। अपने वर्तमान तथा भविष्य को व्यर्थ चिंता कर खराब न करें। जो नहीं मिला न सही, जो है उसे महत्व प्रदान करें; कम-से-कम उसे तो हाथों से न जाने दें।

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प्रश्न 8.
‘छाया मत छूना’ कविता का संदेश क्या है?
अथवा
‘छाया मत छूना’ कविता में कवि क्या कहना चाहता है?
अथवा
कवि अपने मन को ‘छाया मत छूना’ कहकर क्या समझाना चाहता है?
उत्तर :
कवि ने अपनी इस कविता द्वारा संदेश दिया है कि अतीत के सुखों की याद को अपने वर्तमान पर हावी न होने दें। जीवन में यथार्थ का सामना करें। अतीत के आधार पर जीवन संचालित नहीं हो सकता। वर्तमान को ही सुखद भविष्य का आधार माने। दुख के समय निराश हुए बिना उत्साह बनाए रखना चाहिए। संघर्ष ही जीवन का यथार्थ पक्ष है। सुखद स्मृतियों को याद कर वर्तमान को और अधिक दुखद न बनाएँ।

प्रश्न 9.
‘हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्णा’ के माध्यम से कवि हमें क्या समझाना चाहता है ?
उत्तर :
कवि के अनुसार जीवन में उसी प्रकार सुख और दुख आते-जाते हैं, जिस तरह से चाँदनी रात के बाद अमावस्या और फिर अमावस्या के बाद चाँदनी रात आती है। इसी तरह दुख-सुख का पहिया हम सबके जीवन में निरंतर चलता रहता है। जीवन की इस सच्चाई को जानकर हमें उसी परिस्थिति के अनुरूप जीवन व्यतीत करना चाहिए और हताश हुए बिना आगे बढ़ते रहना चाहिए।

प्रश्न 10.
कवि ने “छाया मत छूना’ कविता में किस ऋतु का उदाहरण देकर क्या स्पष्ट करना चाहा है –
उत्तर :
कवि गिरिजाकुमार माथुर ने ‘छाया मत छूना’ कविता में बसंत ऋतु तथा शरद ऋतु का वर्णन किया है। कवि ने बसंत ऋतु के समय में फूल का तथा शरद ऋतु के समय में चंद्रमा का अभाव दिखाया है। कवि द्वारा दोनों उदाहरण देने का एक ही अभिप्राय है कि यदि सुख की प्राप्ति ठीक समय पर नहीं होती, तो व्यक्ति को बहुत दुख होता है।

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प्रश्न 11.
कविता में ‘सुरंग सुधियाँ’ शब्द से क्या अभिप्राय है?
उत्तर :
कवि ने सुरंग सुधियों को अति सुंदर तथा मन को आकर्षक लगने वाली बताया है। ये मनभावन होती हैं। प्रत्येक व्यक्ति के मन में न जाने कितनी यादें एवं सुख के क्षण छिपे रहते हैं। उनकी याद एक सुखद गंध की तरह महकती रहती है। मानव को ये यादें किसी जीवित क्षण के समान ही प्रतीत होती हैं।

पिठित काव्यांश पर आधारित बहुविकल्पी प्रश्न –

दिए गए काव्यांशों को पढ़कर पूछे गए बहुविकल्पी प्रश्नों के उचित विकल्प चुनकर लिखिए –

1. छाया मत छूना
मन, होगा दुख दूना।
दुविधा-हत साहस हे, दिखता है पंथ नहीं,
देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत नहीं।
दुख है न चांद खिला शरद-रात आने पर,
क्या हुआ जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर,
जो न मिला भूल उसे कर तू भविष्य वरण,
छाया मत छूना
मन, होगा दुख दूना।

(क) दुख के समय में किन यादों से मन और दुखी हो जाता है?
(i) बुरी यादों से
(ii) सुखभरी यादों से
(iii) कड़वी यादों से
(iv) बचपन की यादों से
उत्तर :
(ii) सुखभरी यादों से

(ख) कवि का जीवन कैसा है?
(i) शान-शौकत से भरा
(ii) सुखमय
(iii) धन से परिपूर्ण
(iv) मान-सम्मान से हीन
उत्तर :
(iv) मान-सम्मान से हीन

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 छाया मत छूना

(ग) प्रभुता की इच्छा क्या है?
(i) लक्ष्य को प्राप्त करना
(ii) मृगतृष्णा
(iii) वास्तविकता को जानना
(iv) धोखे में रहना
उत्तर :
(ii) मृगतृष्णा

(घ) ‘हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्णा है’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
(i) हर सुख के पीछे दुख छिपा होता है।
(ii) दुख के बाद सुख आता है।
(iii) निराशा में आशा का होना।
(iv) बचपन के बाद यौवन का आना
उत्तर :
(i) हर सुख के पीछे दुख छिपा होता है।

(ङ) कवि किसकी पूजा के लिए प्रेरित करता है?
(i) मन की
(ii) तन की
(iii) वास्तविकता की
(iv) सुख की
उत्तर :
(iii) वास्तविकता की

काव्यबोध संबंधी बहुविकल्पी प्रश्न – 

काव्य पाठ पर आधारित बहुविकल्पी प्रश्नों के उत्तर वाले विकल्प चुनिए –

(क) ‘छाया’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
(i) परछाईं
(ii) भविष्य
(iii) आशा
(iv) सुखद यादें
उत्तर :
(iv) सुखद यादें

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 छाया मत छूना

(ख) ‘चाँदनी’ किसका प्रतीक है?
(i) प्रेम भरे क्षणों का
(ii) घृणा का
(iii) प्रकाश का
(iv) अंधकार का
उत्तर :
(i) प्रेम भरे क्षणों का

(ग) ‘यामिनी बीतने’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
(i) दुख का समय व्यतीत हो जाना
(ii) सुख के क्षणों का व्यतीत हो जाना
(iii) अंधकार का मिट जाना
(iv) सुबह होना
उत्तर :
(ii) सुख के क्षणों का व्यतीत हो जाना

(घ) कवि को क्या नहीं दिखाई देता?
(i) साहस
(ii) दुविधा
(iii) पंथ
(iv) चाँदनी
उत्तर :
(iii) पंथ

छाया मत छूना Summary in Hindi

कवि-परिचय :

गिरिजाकुमार माथुर आधुनिक युग के प्रतिभा-संपन्न रचनाकार थे। ये प्रमुख रूप से प्रयोगवादी कवि माने जाते हैं, लेकिन इनकी कविताएँ मात्र प्रयोग के लिए न होकर जीवन की यथार्थ अनुभूति के चित्रण के लिए हैं। कोमलता एवं मधुरता के प्रति आकर्षक होने के कारण माथुर जी की कविता में छायावादी शैली का सौंदर्य भी प्राप्त होता है। माथुर जी का जन्म मध्यप्रदेश राज्य के गुना नामक स्थान पर सन 1918 ई० में हुआ था। इनके पिता ब्रज भाषा के प्रसिद्ध कवि थे। परिवार का स्तर साधारण था।

यही कारण है कि इनकी कविताओं एवं नाटकों में प्रायः सामान्य स्तर के जीवन का ही चित्रण रहता है। इनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर हुई। इन्होंने एम०ए०, एल०एल०बी० तक शिक्षा प्राप्त की। माथुर जी ने झाँसी में रहकर आकाशवाणी में भी कार्य किया। वे दूरदर्शन से भी संबंधित रहे। सन 1994 ई० में इनका निधन हो गया। माथुर जी में कविता लिखने की प्रतिभा जन्मजात थी।

पहले यह प्रतिभा कविता पढ़ने की अत्यधिक रुचि के रूप में प्रकट हुई। बाद में इन्होंने केवल 13 वर्ष की आयु में ही कविता लिखनी आरंभ कर दी। इनकी प्रमुख रचनाएँ मंजीर, नाश और निर्माण, धूप के दान, भीतरी नदी की यात्रा, शिलापंख चमकीले हैं। ‘पृथ्वी-कल्प’ इनका प्रतीकात्मक नाट्य-काव्य, जन्म कैद नाटक तथा नई कविता सीमाएँ और संभावनाएँ इनके द्वारा लिखित आलोचनात्मक रचनाएँ हैं।

माथुर जी ने रेडियो फ़ीचर, गीति नाट्य और प्रतीकात्मक नाटकों की भी रचना की है। माथुर जी एक भावुक कलाकार हैं। इनकी रचनाओं में व्यक्तिगत अनुभूतियों की बहुलता है। सरसता, मधुरता, सौंदर्य और प्रेम के प्रति आकर्षण इनकी कविताओं की अन्य प्रमुख विशेषताएँ हैं। इनकी कुछ कविताओं में यथार्थपरक दृष्टि का भी उन्मेष है। जीवन के कटु और मधुर रूप का भी चित्रण है।

इनकी कविता पर छायावाद का स्पष्ट प्रभाव है। इन्होंने रोमांस और संताप के भावों को अपनी कविता में स्थान दिया है। इन्होंने संवेदना और पीड़ा के भावों को महत्वपूर्ण माना है। इनमें प्रकृति के प्रति विशेष लगाव-सा है। मानवीकरण करते हुए इन्होंने प्रकृति से संबंधित अनेक चित्र बनाए हैं कंटकित बेरी करौंदे, महकते हैं झाब झोरे। सुन्न हैं, सागौन वन के, कान जैसे पात चौड़े॥

दूह, टीले टौरियों पर, धूप-सूखी घास भूरी। हाड़ टूटे देह कुबड़ी, चुप पड़ी है गैल बूढ़ी॥ कवि ने अपनी कविता में स्थान-स्थान पर आँचलिक शब्दावली का सहज-स्वाभाविक प्रयोग किया है। इन्होंने विषय की मौलिकता को बनाए रखने के लिए विशेष वातावरण की सृष्टि की है। इन्होंने मुक्त छंद में ध्वनि साम्य के प्रयोग के कारण तुक के बिना भी कविता में संगीतात्मकता को उत्पन्न किया है।

उनकी कविताओं में भाषा के दो रंग विद्यमान हैं। जहाँ रोमानी कविताओं में ये छोटी-छोटी ध्वनि वाले शब्दों का प्रयोग करते हैं, वहाँ क्लासिक स्वभाव वाली कविताओं में लंबी और गंभीर ध्वनि वाले शब्दों को महत्व देते हैं। इनकी भाषा प्रयोगवादी कविता के लिए अनुकूल है। इन्होंने नए प्रतीकों, बिंबों और उपमानों का प्रयोग किया है। इन्होंने देशी-विदेशी शब्दों का भी खुलकर प्रयोग किया है हाँडियाँ, मचिया, कठौते, लट्ठ, गूदड़, बैल, बक्खर।

राख, गोबर, चरी, औंगन, लेज, रस्सी, हल, कुल्हाड़ी। सूत की मोटी फताई, चका, हंसिया और गाड़ी। कवि की भाषा सहज और सरल है। उसमें सरसता विद्यमान है। कवि ने जहाँ भी अलंकारों का प्रयोग किया है, वे अति स्वाभाविक है। वर्णनात्मक शैली से इन्हें विशेष लगाव है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 छाया मत छूना

कविता का सार :

छाया मत छूना कविता मानव-जीवन के संदर्भो से जुड़ी हुई है। हमारे जीवन में सुख आते हैं, तो दुख भी अपने रंग दिखाते हैं। मनुष्य को सुख अच्छे लगते हैं, तो दुख परेशान करने वाले। व्यक्ति पुराने सुखों को याद करके वर्तमान के दुखों को और अधिक बढ़ा लेते हैं। कवि की दृष्टि में ऐसा करना उचित नहीं है। इससे दुखों की मात्रा बढ़ जाती है। सुख हमें सदा अच्छे लगते हैं। उनके द्वारा मिली प्रसन्नताएँ मन पर देर तक छायी रहती हैं।

प्रेम भरे क्षण भुलाने की कोशिश करने पर भी भूलते नहीं हैं। लेकिन मनुष्य सुखों के पीछे जितना अधिक भागता है, उतना ही अधिक भ्रम के जाल में उलझता जाता है। हर सुख के बाद दुख अवश्य आता है। हर चाँदनी के बाद अमावस्या भी छिपी होती है। मनुष्य को जीवन की वास्तविकता को समझना चाहिए; उसे स्वीकार करना चाहिए। मनुष्य के मन में छिपा साहस का भाव जब छिप जाता है, तो उसे जीवन की राह दिखाई नहीं देती। मानव मन में छिपे दुखों की सीमा का तो पता ही नहीं है। हर व्यक्ति को जीवन में सबकुछ नहीं मिलता।

जो हमें वर्तमान में प्राप्त हो गया है, हमें इसी में संतुष्ट होना चाहिए। जो अभी प्राप्त नहीं हुआ, उसे भविष्य में प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन पुरानी यादों से स्वयं को चिपकाए रखने का कोई लाभ नहीं है। उनसे दुख बढ़ते हैं, घटते नहीं।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 6 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

Jharkhand Board JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 6 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 6 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

JAC Class 10 Hindi यह दंतुरहित मुस्कान और फसल Textbook Questions and Answers

1. यह दंतुरित मुसकान

प्रश्न 1.
बच्चे की दंतुरित मुसकान का कवि के मन पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
बच्चे की दंतुरित मुसकान का कवि के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। वह उसके सुंदर और मोहक मुख पर छाई मनोहारी मुसकान देखकर प्रसन्नता से भर उठा। उसे ऐसा लगा कि धूल-धूसरित वह चेहरा किसी तालाब में खिले सुंदर कमल के फूल के समान है, जो उसकी झोंपड़ी में आ गया है। कवि उसे एकटक देखता रह गया। उसकी मुसकान ने उसे अपनी पत्नी के प्रति कृतज्ञात प्रकट कर देने के लिए विवश कर दिया।

प्रश्न 2.
बच्चे की मुसकान और एक बड़े व्यक्ति की मुसकान में क्या अंतर है?
उत्तर :
बच्चे की मुसकान में बनावटीपन नहीं होता; वह सहज और स्वाभाविक होती है। लेकिन किसी बड़े व्यक्ति की मुसकान बनावटी हो सकती है। वह समय और स्थिति के अनुसार बदलती रहती है। बच्चे की मुसकान में निश्छलता रहती है, पर बड़े व्यक्ति की मुसकान में हर समय स्वाभाविकता नहीं होती।

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प्रश्न 3.
कवि ने बच्चे की मुसकान के सौंदर्य को किन-किन बिंबों के माध्यम से व्यक्त किया है ?
उत्तर :
कवि ने बच्चे की मुसकान से चाक्षुक और मानस बिंबों की सुंदर सृष्टि की है। छोटे-छोटे दाँतों से युक्त उसकी मुसकान किसी मृतक को पुन: जीवन देने की क्षमता रखती है। उसके धूल-धूसरित शरीर के अंग कमल के सुंदर फूल के समान प्रतीत होते हैं। पत्थर भी मानो उसके स्पर्श को पाकर जल का रूप पा गए होंगे। चाहे कोई कितना भी कठोर क्यों न रहा हो; बाँस या बबूल के समान ही उसका रूप क्यों न हो, पर वे सब उसे छूकर शेफालिका के फूलों के समान कोमल हो गए होंगे।

प्रश्न 4.
भाव स्पष्ट कीजिए –
(क) छोड़कर तालाब मेरी झोपड़ी में खिल रहे जलजात।
(ख) छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल बाँस था कि बबूल?
उत्तर :
(क) कवि को ऐसा लगा कि उस छोटे बच्चे की अपार सुंदरता ईश्वरीय वरदान के समान है। धूल-धूसरित अंग-प्रत्यंगों वाला वह बालक जैसे तालाब में खिले कमल के समान मोहक और मनोरम था, जो उसकी झोंपड़ी में आकर बस गया था।
(ख) उस छोटे दंतुरित बच्चे का ऐसा मनोरम रूप है कि चाहे कोई कितना भी कठोर क्यों न रहा हो, पर उसे देख मन-ही-मन प्रसन्नता से भर उठता है। चाहे वह बाँस के समान हो या काँटों भरे कीकर के समान; उसकी सुदंरता से प्रभावित होकर वह मुसकराने के लिए विवश हो जाता है।

रचना और अभिव्यक्ति –

प्रश्न 5.
मुसकान और क्रोध भिन्न-भिन्न भाव हैं। इनकी उपस्थिति से बने वातावरण की भिन्नता का चित्रण कीजिए।
उत्तर :
मुसकान और क्रोध दोनों मानव-मन में उत्पन्न होने वाले भाव हैं। मुसकान एक सुखद मनोभाव है, तो क्रोध एक मनोविकार है। मुसकान में व्यक्ति अपने हृदय के सुखद भावों को प्रकट करता है; क्रोध में वह अतृप्ति, क्लेश और पीड़ा के भावों को प्रकट करता है। मुसकान सदा सुखदायी होती है, जबकि क्रोध दुखदायी। क्रोध उन सभी को दुख देता है, जो-जो उसकी समीपता को प्राप्त करते हैं। मुसकान से किसी के भी हृदय को जीता जा सकता है, पर क्रोध से अपनों को भी पलभर में दुश्मन बनाया जा सकता है।

प्रश्न 6.
‘दंतुरित मुसकान’ से बच्चे की उम्र का अनुमान लगाइए और तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर :
बच्चे की उम्र लगभग आठ-नौ महीने से लेकर एक वर्ष के बीच होनी चाहिए। उसके मुँह में छोटे-छोटे दाँत हैं, जो सामान्यतः इसी आयु में निकलते हैं। वह कवि को पहचानता नहीं, पर उसके हृदय में उत्सुकता का भाव है। वह उसे बुलाना चाहता है, पर अनजान होने के कारण बुलाता नहीं बल्कि कनखियों से उसकी ओर देखता है। प्रायः ऐसी क्रियाएँ इस उम्र के बच्चे ही करते हैं।

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प्रश्न 7.
बच्चे से कवि की मुलाकात का जो शब्द-चित्र उपस्थित हुआ है उसे अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर :
वह बच्चा अत्यंत सुंदर है। वह छोटा-सा है; एक साल से भी छोटा होगा। उसका चेहरा कमल के फूल के समान मोहक है। वह मिट्टी में खेलता है; कच्चे आँगन में इधर-उधर रेंगता है। उसके सारे शरीर पर धूल लगी हुई है। कवि लंबे समय के बाद घर लौटा है। बच्चे के बारे में उसे अपनी पत्नी से पता लगा है। वह भाव-विभोर है और एकटक उस बच्चे की ओर निहार रहा है।

वह उसकी मोहक ‘दंतुरित मुसकान’ पर मंत्र-मुग्ध है। बच्चा उसे पहचानना चाहता है, पर पहचान नहीं पाता। उसने कवि को पहली बार देखा है, इसलिए वह कनखियों से अतिथि को देखकर मुस्कराता है। कवि को लगता है कि इस बच्चे की मुसकान पत्थर को भी पिघला देने की क्षमता रखती है। कठोर-से-कठोर व्यक्ति भी इसकी मोहक मुसकान पर स्वयं को न्योछावर कर सकता है।

पाठेतर सक्रियता –

प्रश्न 1.
आप जब भी किसी बच्चे से पहली बार मिलें तो उसके हाव-भाव, व्यवहार आदि को सूक्ष्मता से देखिए और उस अनुभव को कविता या अनुच्छेद के रूप में लिखिए।
उत्तर :
कल मैं अपनी सहेली के घर गई थी। वह मेरी कक्षा में ही पढ़ती है। जब मैं उसके साथ उसके घर के आँगन में बैठी थी, तो मैंने देखा कि लगभग डेढ़-दो वर्ष की एक छोटी-सी लड़की दरवाज़े की ओट में खड़ी होकर एकटक मुझे देख रही थी। उसने अपने एक हाथ की उँगली मुँह में डाल रखी थी और दूसरे हाथ से दरवाज़ा थाम रखा था। मैंने इशारे से उसे बुलाया, पर वह वहीं खड़ी रही। मेरी सहेली ने बताया कि वह उसकी भतीजी है, जो दो दिन पहले ही दिल्ली से आई है। उसका नाम सलोनी था। मैंने उसे नाम से पुकारा।

वह मुस्कराई अवश्य, पर वहाँ से आगे नहीं बढ़ी। मैं अपनी जगह से उठकर जैसे ही उसकी तरफ़ बढ़ी, वह झट से भीतर भाग गई। मैं वापस अपनी जगह पर आकर बैठ गई। कुछ देर बाद मैंने फिर उधर देखा, तो वह वहीं खड़ी थी। मेरी सहेली ने उसे बुलाया, तो वह हमारे पास आ गई। मैंने उसे पुचकारा; उसका नाम पूछा। वह चुप रही; बस धीरे-धीरे मुस्काती रही।

मैंने उससे पूछा कि क्या उसे गाना आता है, तो उसने हाँ में सिर हिलाया और फिर धीरे से पूछा कि क्या वह गाना सुनाए? मेरे हाँ कहने के बाद उसने गाना शुरू किया और एक के बाद एक न जाने कितनी देर तक वह आधे-अधूरे गाने गाती रही; ठुमकती रही। उसकी झिझक दूर हो गई थी। जब मैं चलने लगी, तो वह मेरी उँगली थाम कर मेरे साथ चलने को तैयार थी। कुछ देर पहले मुझसे शर्माने और झिझकने वाली सलोनी अब मेरे साथ थी। उसके चेहरे पर झिझक के भाव नहीं थे; उसके व्यवहार में भय नहीं था। वह बहुत मीठा और अच्छा बोलती थी।

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प्रश्न 2.
एन० सी० ई० आर० टी० द्वारा नागार्जुन पर बनाई गई फ़िल्में देखिए।
उत्तर :
विद्यार्थी अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता लें।

2. फसल

प्रश्न 1.
कवि के अनुसार फसल क्या है?
उत्तर :
कवि के अनुसार फसल मनुष्य की लगन और शारीरिक परिश्रम के साथ-साथ प्रकृति के जादुई सहयोग का परिणाम है। जब मनुष्य और प्रकृति मिलकर कार्य करते हैं, तभी फसल होती है। यह लाखों करोड़ों हाथों के स्पर्श की महिमा और गरिमा है।

प्रश्न 2.
कविता में फसल उपजाने के लिए आवश्यक तत्वों की बात कही गई है। वे आवश्यक तत्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
कविता में फसल उपजाने के लिए जिन आवश्यक तत्वों की बात कही है, वे हैं-‘नदियों के पानी का जादू, करोड़ों हाथों का परिश्रम, मिट्टी के अद्भुत गुण, सूर्य की किरणें और हवा।

प्रश्न 3.
फसल को ‘हाथों के स्पर्श की गरिमा’ और ‘महिमा’ कहकर कवि क्या व्यक्त करना चाहता है?
उत्तर :
कवि ने लाखों-करोड़ों लोगों के द्वारा किए जाने वाले परिश्रम और उनकी एकनिष्ठ लगन को ‘हाथों के स्पर्श की गरिमा और ‘महिमा’ कहा है। कवि कहता है कि फसल उत्पन्न करना किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है; न जाने कितने दिन-रात मेहनत करके वे इसे उगाने का गौरव प्राप्त करते हैं।

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प्रश्न 4.
भाव स्पष्ट कीजिए –
(क) रूपांतर है सूरज की किरणों का सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का!
उत्तर :
कवि कहता है कि फसल केवल मनुष्य के परिश्रम का परिणाम नहीं है। प्रकृति भी इसमें सम्मिलित है। सूर्य की किरणें इसे प्रकाश देती हैं; अपनी ऊष्मा और ऊर्जा प्रदान करती हैं, जिससे फसलें उत्पन्न होती हैं। फसल प्रकृति से अपना भोजन प्राप्त करती हैं और बढ़ती हैं। हवा उन्हें थिरकन प्रदान करती है, तभी उसमें बीज बनता है और दानों के रूप में हमें प्राप्त होता है।

रचमा और अभिव्यक्ति –

प्रश्न 5.
कवि ने फसल को हज़ार-हज़ार खेतों की मिट्टी का गुण-धर्म कहा है –
(क) मिट्टी के गुण-धर्म को आप किस तरह परिभाषित करेंगे?
(ख) वर्तमान जीवन शैली मिट्टी के गुण-धर्म को किस-किस तरह प्रभावित करती है?
(ग) मिट्टी द्वारा अपना गुण-धर्म छोड़ने की स्थिति में क्या किसी भी प्रकार के जीवन की कल्पना की जा सकती है? (घ) मिट्टी के गुण-धर्म को पोषित करने में हमारी क्या भूमिका हो सकती है?
उत्तर :
(क) मिट्टी का गुण-धर्म इसकी उपजाऊ-शक्ति है, जो इसमें मिले अनेक तत्वों के कारण होती है। उन तत्वों की उपस्थिति के कारण ही मिट्टी भिन्न-भिन्न रंगों को प्राप्त करती है; हल्की-हल्की गंध प्राप्त करती है। वे तत्व ही फसल को बढ़ने में सहायता देते हैं।

(ख) वर्तमान जीवन-शैली मिट्टी को प्रदूषित कर रही है। जाने-अनजाने तरह-तरह के रासायनिक पदार्थ इसमें मिलाए जाते हैं, जिस कारण इसके गुण बदल जाते हैं। उद्योग-धंधे और प्रदूषित जल इसे बिगाड़ रहे हैं । तरह-तरह के कीटनाशक इसे खराब कर रहे हैं। इनके प्रयोग से भले ही हमें फसल कुछ अधिक प्राप्त हो जाती है, पर इससे मिट्टी की प्रकृति बदल रही है।

(ग) मिट्टी के अपने स्वाभाविक गुण-धर्म को छोड़ देने से जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। यदि मिट्टी फसल उगाने का गुण-धर्म त्याग दे, तो हमारा जीवन असंभव-सा हो जाएगा क्योंकि सभी प्राणियों का जीवन फसल पर ही निर्भर करता है।

(घ) मिट्टी के गुण-धर्म को पोषित करने में हमारी भूमिका अति महत्वपूर्ण हो सकती है। हम इसे प्रदूषित होने से बचा सकते हैं। इसमें मिलाए जाने वाले रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, खरपतवार नाशियों के स्थान पर हम प्राकृतिक पदार्थों का प्रयोग कर सकते हैं। इसमें मिलने वाले औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थों की रोकथाम कर सकते हैं।

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पाठेतर सक्रियता –

प्रश्न 1.
इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया के माध्यमों द्वारा आपने किसानों की स्थिति के बारे में बहुत कुछ सुना, देखा और पढ़ा होगा। एक सुदृढ़ कृषि-व्यवस्था के लिए आप अपने सुझाव देते हुए अखबार के संपादक को पत्र लिखिए।
उत्तर :
सेवा में,
प्रमुख संपादक,
दैनिक भास्कर,
लखनऊ।

विषय : सुदृढ़ कृषि-व्यवस्था हेतु सुझाव

मान्यवर,
मैं आपके समाचार-पत्र के माध्यम से सुदृढ़ कृषि-व्यवस्था हेतु कुछ सुझाव देना चाहता हूँ, जो किसानों के लिए निश्चित रूप से महत्वपूर्ण सिद्ध होंगे। हमारा देश कृषि-प्रधान देश है। इसकी लगभग 80% जनता गाँवों में रहती है और पूरी तरह से कृषि पर आश्रित है।

सुदृढ़ कृषि-व्यवस्था के लिए खेती योग्य अधिकतर भूमि पर हमें फसल उगाने की योजनाएँ बनानी चाहिए। परंपरागत पद्धति को त्यागकर वैज्ञानिक आधार पर खेती करनी चाहिए। हमें समझना होगा कि हर खेत की मिट्टी एक-सी फसल उगाने योग्य नहीं होती। इसलिए कृषि-संस्थानों से मिट्टी की परख करवाकर हमें जान लेना चाहिए कि वह किस प्रकार की फसल के लिए अधिक उपयोगी है।

यदि उसमें किसी विशेष तत्व की कमी है, तो उसे रासायनिक पदार्थों के प्रयोग से पूरा करना चाहिए। हमें फसल के लिए उन्नत और संकरण से प्राप्त बीज ही बोने चाहिए, जो कृषि-संस्थानों से प्राप्त हो जाते हैं। समय-समय पर मान्यता प्राप्त खरपतवार नाशियों और कीटनाशियों का प्रयोग करना चाहिए। सिंचाई के लिए परंपरागत तरीके छोड़कर स्पिंरकरज़ का प्रयोग करना चाहिए। इससे सारे खेत की सिंचाई एक समान होती है। उर्वरकों के साथ-साथ कंपोस्ट और वर्मीकंपोस्ट का प्रयोग करना चाहिए। इससे फसल की प्राप्ति अच्छी होती है।

सुदृढ़ कृषि-व्यवस्था के अंतर्गत फूलों की खेती की ओर भी ध्यान देना चाहिए। वर्षभर में केवल दो फसलों पर निर्भर न रहकर तीन-चार अंतराफसलें प्राप्त करनी चाहिए। कीटनाशियों के उचित प्रयोग से भी हम अपनी फसलों को नष्ट होने से बचा सकते हैं। आशा है कि आप अपने प्रतिष्ठित समाचार-पत्र में इन सुझावों को अवश्य स्थान देंगे।
भवदीय,
राकेश भारद्वाज

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प्रश्न 2.
फसलों के उत्पादन में महिलाओं के योगदान को हमारी अर्थव्यवस्था में महत्व क्यों नहीं दिया जाता है ? इस बारे में कक्षा में चर्चा कीजिए।
उत्तर :
विद्यार्थी अध्यापक-अध्यापिका की सहायता से करें।

JAC Class 10 Hindi यह दंतुरहित मुस्कान और फसल Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
कवि ने स्वयं को प्रवासी क्यों कहा है ?
उत्तर :
नागार्जुन प्रायः घूमते रहते थे। वे फक्कड़ और घुमक्कड़ थे। राजनीति और घुमक्कड़ी के शौक के कारण प्रायः अपने घर से दूर रहते थे इसलिए उन्होंने स्वयं को प्रवासी कहा है। साहित्य जगत में भी उन्हें ‘यात्री’ के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 2.
‘दंतुरित मुसकान’ क्या-क्या कर सकती थी ?
उत्तर :
‘दंतुरित मुसकान’ किसी कठोर-से-कठोर व्यक्ति के हृदय को भी कोमलता से भर सकती थी। वह किसी मृतक को जीवित कर सकती थी। उसकी सुंदरता से प्रभावित होकर पत्थर भी पिघलकर पानी बन सकता था।

प्रश्न 3.
कवि ने फसल के द्वारा किन-किन में आपसी सहयोग का भाव व्यक्त किया है?
उत्तर :
कवि ने फसल के द्वारा मनुष्य के शारीरिक बल, परिश्रम तथा प्रकृति में छिपी अथाह ऊर्जा के आपसी सहयोंग का भाव व्यक्त किया है। जब ममुष्य की मेहन्त और प्रकृति का सहयोग आपस में मिल जाते हैं, तो फसल उत्पन्न होती है।

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प्रश्न 4.
कवि ने मुसकान के लिए दंतुरित विशेषण का प्रयोग क्यों किया है ?
उत्तर :
मुसकान अपने-आप में ही सभी को आकर्षित कर लेती है, परंतु एक नन्हे से बालक के छोटे-छोटे दाँतों से युक्त मुसकान उसे और भी विशिष्ट बना देती है।

प्रश्न 5.
‘छोड़कर तालाब मेरी झोपड़ी में खिल रहे जलजात’ का आशय स्पष्ट करो।
उत्तर :
धूल-मिट्टी से सने बालक के शरीर को देखकर कवि को लगता है कि जैसे कोई कमल सरोवर को छोड़कर उसके घर में आकर खिल गया है। अपने नन्हें से बच्चे को देख कवि अति प्रसन्न है।

प्रश्न 6.
पाषाण का पिघलना और जल बनना से कवि का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर :
पत्थर या पाषाण पिघलने का अर्थ है-‘ऐसा व्यक्ति जो कोमल भावनाओं से दूर है, इस सुंदर बालक का कोमल स्पर्श पाकर भावुक बन जाता है।’ कवि के अनुसार बालक की मुसकान से कठोर हृदय भी पिघलकर जल बन जाता है।

प्रश्न 7.
‘दंतुरित मुसकान’ कविता में किस भाव की अभिव्यक्ति है?
उत्तर :
इस कविता में एक ऐसे पिता के मन के भावों की अभिव्यक्ति है, जिसने काफ़ी समय के बाद अपने पुत्र को देखा है। ये भाव अपने शिशु को देखकर पिता के हृदय में स्नेह से परिपूर्ण होकर जागते हैं। शिशु की छोटी-से-छोटी भाव-भंगिमा भी पिता को अभिभूत कर देती है। वात्सल्स तथा स्नेहमयी अभिव्यक्ति इस कविता का मुख्य भाव है।

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प्रश्न 8.
कवि और शिशु के बीच माध्यम कौन है?
उत्तर :
कवि तथा शिशु के बीच माध्यम है-‘शिशु की माँ’। जो दोनों के बीच एक कड़ी का काम करती है। दोनों को एक-दूसरे के साथ
पिता-पुत्र के संबंध में बाँधती है।

प्रश्न 9.
कवि शिशु की माँ तथा शिशु को धन्य क्यों कहता है ?
उत्तर :
कवि जब अपने शिशु को काफी समय के बाद देखता है, तो उसे बड़ी प्रसन्नता होती है। कवि की अनुपस्थिति में शिशु की माँ ने ही उसका पालन-पोषण किया। उसके कारण ही शिशु की दंतुरित मुसकान को देखने का कवि को सौभाग्य मिला। यदि माँ न होती, तो शिशु का अस्तित्व ही न होता और यदि ये दोनों न होते, तो कवि को यह खुशी देखने को न मिलती। इसी कारण कवि ने माँ तथा शिशु दोनों को धन्य कहा है।

प्रश्न 10.
‘उँगलियाँ माँ की कराती रही हैं मधुपर्क’ में मधुपर्क से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर :
नन्हें शिशु के समुचित विकास के लिए माँ पाँच पौष्टिक पदार्थों को मिलाकर अपनी उँगलियों से उसे चटाती है। मधुपर्क जिन पाँच वस्तुओं के मिश्रण से बनता है, वे हैं-दूध, दही, शहद, घी और जल। मधुपर्क की पौष्टिकता के साथ-साथ माँ की उँगलियों में जो स्नेहरूपी अमृत है, वह भी महत्वपूर्ण है।

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प्रश्न 11.
कवि ने ‘फसल’ के निर्माण में किसान के परिश्रम को अधिक महत्वपूर्ण क्यों कहा है?
उत्तर :
फसल के निर्माण में प्रकृति और किसान दोनों का ही योगदान होता है। मनुष्य को प्रकृति के अनुसार चलकर अधिक उत्पादन मिल सकता है। फिर भी कृषक का अथक परिश्रम अधिक महत्वपूर्ण है। किसान बीज बोता है; जुताई-सिंचाई करता है; धैर्य के साथ फसल की सेवा करता है। समय के अनुसार उसमें खाद डालता है। जानवरों से उसकी रक्षा करता है। इसी कारण किसान फसल निर्माण की प्रक्रिया में अधिक महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 12
हजार-हजार खेतों की मिट्टी के गुण-धर्म से कवि का क्या आशय है?
उत्तर :
फसल मिट्टी में ही उगती है। तरह-तरह की फसल के लिए मिट्टी के मुण भी अलग-अलग होते हैं। हर तरह की फसल एक 4 ही खेत में नहीं उगाई जा सकती। मिट्टी के खनिज तत्व अलग-अलग होते हैं। मिट्टी या खेत की उपजाऊ-शक्ति भी एक-सी नहीं होती। खेतों की उर्वरा शक्ति के अनुसार ही उनमें बीज बोए जाते हैं और तरह-तरह की फसल उगाई जाती है।

प्रश्न 13.
फसल कविता दवारा कवि हमें क्या संदेश देना च –
उत्तर :
कवि का मानना है कि फसल मानव और प्रकृति के सहयोग से लहलहाती है। प्रकृति के अनेक तत्वों का सहयोग ही किसान के परिश्रम को फसल के रूप में उत्पन्न करता है। एक-दूसरे के अभाव में फसल कदापि तैयार नहीं हो सकती। मानव तथा प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 6 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

प्रश्न 14.
प्रकृति के कौन-कौन से तत्व फसल के लिए अपना योगदान देते हैं?
उत्तर :
खेतों की मिट्टी, उसमें समाहित खनिज तत्व, पानी, सूरज की किरणें, हवाएँ तथा प्रकृति के सहयोग से प्राप्त विभिन्न प्रकार के बीज ये सभी तत्व प्रकृति हमें प्रदान करती हैं, ताकि हमें तरह-तरह की फसल मिल सके।

प्रश्न 15.
कवि ने फसल को जादू क्यों कहा है?
उत्तर :
कवि के अनुसार फसल एक जादू है। एक बीज में से जो अंकुर फूटकर बाहर निकलता है; जिसे मिट्टी, नदियों का पानी, सूर्य की ऊर्जा, हवा तथा किसान का सहयोग प्राप्त है, वह ईश्वर का जादू है। हर बीज अलग-अलग तरह का तथा अलग तरह की फसल पैदा करने में सक्षम है। यह एक चमत्कार से कम नहीं है।

पठित धनाश पर आधारित बहुविकल्पी प्रश्न – 

दिए गए काव्यांशों को पढ़कर पूछे गए बहुविकल्पी प्रश्नों के उचित विकल्प चुनकर लिखिए –

1. तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
मृतक में भी डाल देगी जान
धूलि-धूसर तुम्हारे ये गात….
छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात
परस पाकर तुम्हारा ही प्राण,
पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण
छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल
बाँस था कि बबूल?
तुम मुझे पाए नहीं पहचान?

(क) प्रस्तुत काव्यांश में कवि किसे संबोधित कर रहा है?
(i) बालक को
(ii) वृद्ध को
(iii) स्त्री को
(iv) युवक को
उत्तर :
(i) बालक को

(ख) बच्चे का अंग-प्रत्यंग कैसा है?
(i) स्वच्छ
(ii) कठोर
(iii) धूल-मिट्टी से सना
(iv) काला
उत्तर :
(iii) धूल-मिट्टी से सना

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(ग) बच्चे की मुसकान किसका संदेश देती है?
(i) मृत्यु का
(ii) जीवन का
(iii) दुख का
(iv) चिंताओं का
उत्तर :
(ii) जीवन का

(घ) कवि के अनुसार कठिन पाषाण किस प्रकार पिघला होगा?
(i) तप कर
(ii) बच्चे के स्पर्श से
(ii) बच्चे के प्राणों का स्पर्श पाकर
(iv) जल कर
उत्तर :
(iii) बच्चे के प्राणों का स्पर्श पाकर

(ङ) बच्चे के स्पर्श से कौन-से फूल झड़ने लगेंगे?
(i) बबूल के
(ii) गुलाब के
(iii) गुलमोहर के
(iv) शेफालिका के
उत्तर :
(iv) शेफालिका के

2. हजार-हज़ार खेतों की मिट्टी का गुण धर्म फसल क्या है?
और तो कुछ नहीं है वह नदियों के पानी का जादू है वह हाथों के स्पर्श की महिमा है
भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण धर्म है रूपांतर है सूरज की किरणों का
सिमटा हुआ संकोच है हवा का थिरकन का!
(क) फसल में कितने खेतों की मिट्टियों के गुण-धर्म मौजूद हैं?
(i) दो खेतों की
(ii) सैकड़ों खेतों की
(iii) हज़ारों खेतों की
(iv) लाखों खेतों की
उत्तर :
(iii) हज़ारों खेतों की

(ख) फसल किसका जादू है?
(i) अनाज का
(ii) झरनों के पानी का
(iii) झीलों के पानी का
(iv) नदियों के पानी का
उत्तर :
(iv) नदियों के पानी का

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(ग) फसल किसके स्पर्श की महिमा है?
(i) परिश्रमी हाथों के स्पर्श की
(ii) पानी के स्पर्श की
(iii) बच्चे के स्पर्श की
(iv) मिट्टी के स्पर्श की
उत्तर :
(i) परिश्रमी हाथों के स्पर्श की

(घ) कवि ने मिट्टी की किन विशेषताओं को प्रकट किया है?
(i) खुशबू की
(ii) काले, भूरे और संदले रंगों की
(iii) उपजाऊपन की
(iv) नमी की
उत्तर :
(ii) काले, भूरे और संदले रंगों की

(ङ) फसल किसका रूपांतर है?
(i) परिश्रम का
(ii) पानी का
(iii) सूर्य की किरणों का
(iv) अनाज का
उत्तर :
(iii) सूर्य की किरणों का

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काव्यबोध संबंधी बहुविकल्पी प्रश्न –

काव्य पाठ पर आधारित बहुविकल्पी प्रश्नों के उत्तर वाले विकल्प चुनिए –

(क) कवि और बच्चे के बीच का माध्यम कौन है?
(i) कवि की माँ
(ii) बच्चे की माँ
(iii) मुसकान
(iv) बच्चे का भोलापन
उत्तर :
(ii) बच्चे की माँ

(ख) ‘मधुपर्क’ किसका प्रतीक है?
(i) बच्चे की मुसकान का
(ii) माँ के प्यार का
(iii) कमल की सुंदरता का
(iv) पालन-पोषण का
उत्तर :
(ii) माँ के प्यार का

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(ग) कवि के अनुसार फसल क्या है?
(i) परिश्रम का फल
(ii) अनाज का ढेर
(iii) जादू
(iv) खेत-खलिहान
उत्तर :
(iii) जादू

(घ) फसल को थिरकना कौन सिखाता है?
(i) हवा
(ii) किसान
(iii) मिट्टी
(iv) पानी
उत्तर :
(i) हवा

यह दंतुरहित मुस्कान और फसल Summary in Hindi

कवि-परिचय : वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ जो ‘नागार्जुन’ के नाम से विख्यात हुए, हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध प्रगतिशील कवि एवं कथाकार हैं। आधनिक कबीर के रूप में विख्यात नागार्जन घुमंत व्यक्ति थे। इनका जन्म 1911 में बिहार के दरभंगा जिले के सतलखा गाँव में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय संस्कृत पाठशाला में हुई थी। बाद में ये संस्कृत अध्ययन के लिए बनारस और कोलकाता भी गए। सन 1936 में नागार्जुन अध्ययन के लिए श्रीलंका गए और वहीं बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गए। वर्ष 1938 में वे स्वदेश वापस आ गए।

नागार्जुन अपने घुमक्कड़पन और फक्कड़पन के लिए प्रसिद्ध रहे। शिक्षा-प्राप्ति के दौरान उनकी भेंट मैथिली के प्रकांड पंडित सीताराम झा से हुई और उन्होंने उनसे भाषा, छंद, अलंकार आदि का विशेष ज्ञान प्राप्त किया। बनारस में रहते हुए नागार्जुन संस्कृत के साथ-साथ मैथिली में भी साहित्य-रचना करने लगे। बीस वर्ष की अवस्था में नागार्जुन का विवाह हुआ। लेकिन अध्ययन, घुमक्कड़ी और राजनीति में रुचि होने के कारण ये परिवार की देख-रेख नहीं कर सके। नागार्जुन के चार पुत्र और दो पुत्रियाँ थीं।

मैथिल समाज में उन्हें समुचित आदर नहीं मिला; क्योंकि एक तो वे समुद्र पार की यात्रा कर आए थे, दूसरे संन्यास भ्रष्ट थे और तीसरे बौद्ध होने के कारण उनकी खान-पान की पवित्रता नष्ट हो गई थी। वर्ष 1941 में नागार्जुन पुनः घर लौटे। लगभग पाँच दशक तक इन्होंने अनेक हिंदी साहित्य को समृद्ध करने के बाद 5 नवंबर, 1998 को नागार्जुन का देहांत हुआ। साहित्य-रचना-नागार्जुन ने वर्ष 1935 में हिंदी मासिक ‘दीपक’ में काम किया तथा वर्ष 1942-43 में ‘विश्व बंधु’ साप्ताहिक का संपादन किया।

ये अपनी मातृभाषा मैथिली में ‘यात्री’ उपनाम से रचना करते थे। इनके कविता-संग्रह ‘चित्रा’ से मैथिली में नवीन भाव बौद्ध का प्रारंभ माना जाता है। संस्कृत में चाणक्य उपनाम से इन्होंने अनेक कविताएँ लिखीं। वर्ष 1930 से विधिवत लेखन करते हुए नागार्जुन ने हिंदी को महत्वपूर्ण रचनाएँ दीं…’ सतरंगे पंखों वाली’, ‘प्यासी पथराई आँखें’, ‘युगधारा’, ‘तालाब की मछलियाँ’, ‘हज़ार-हजार बाहों वाली’, ‘तुमने कहा था’, ‘पुरानी जूतियों का कोरस’, ‘आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने’, ‘रत्नगर्भा’, ‘ऐसे भी हम क्या, ऐसे भी तुम क्या’, ‘पका है कटहल’, ‘मैं मिलटरी का बूढ़ा घोड़ा’ तथा ‘भस्मांकुर’।

नागार्जुन के उपन्यासों में ‘बलचनमा’, ‘रतिनाथ की चाची’, ‘कुंभीपाक’, ‘उग्रतारा’, ‘जमनिया का बाबा’ तथा ‘उग्रतारा’ प्रमुख है। नागार्जुन का संपूर्ण साहित्य सात खंडों में प्रकाशित हो चुका है। सन 1956 में प्रकाशित ‘युगधारा’ में कवि ने अपना परिचय निम्न शब्दों में दिया है –

‘पैदा हुआ था मैं दीन-हीन अपठित किसी कृषक-कुल में
आ रहा हूँ पीता अभाव का आसव ठेठ बचपन से।’

काव्य-सौंदर्य – नागार्जुन की कविता राष्ट्रीय-चेतना की कविता है, जिसमें राष्ट्रीय आंदोलनों की धड़कन सुनाई पड़ती है। व्यंग्यात्मकता उनकी कविता का अभिन्न अंग है। ‘प्यासी पथराई आँखें’, ‘हिम कसमों का चंचरीक’ तथा ‘फाहियान के वंशधर’ आदि कविताएँ राष्ट्रीय भावों से ओत-प्रोत हैं। मातृभूमि के प्रति उनका प्रेम निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त हुआ – है

‘भारत माता के गालों पर कसकर पड़ा तमाचा है।
राम राज्य में अब की रावन नंगा होकर नाचा है।’
तथा
‘खेत हमारे, भूमि हमारी, सारा देश हमारा है।
इसीलिए तो हमको इसका, चप्पा-चप्पा प्यारा है।’

नागार्जुन अपनी कविता में वामपंथी विचारधारा को लेकर आए। वे प्रगतिशील जनवादी कवि थे। उन्होंने जनता के सुख-दुख; उसके संघर्ष और कष्ट; उसकी आस्था और जिजीविषा को अपने काव्य में व्यक्त किया है। सामाजिक अन्याय, शोषण, जड़ता, अंधविश्वास, ढोंग, पाखंड आदि के विरोध में नागार्जुन ने बहुत लिखा। नागार्जुन ने ‘पोस्टर कविता’ के रूप में व्यंग्यात्मक राजनीतिक कविताएँ वर्ष 1965 के आपातकाल में लिखीं। राजनीतिक आंदोलनों के कारण ये अनेक बार जेल भी गए। नागार्जुन की कविताओं में गहन राजनीतिक समझ दिखाई देती है।

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं पर इन्होंने अनेक रचनाएँ लिखी हैं। मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़े होने पर भी इनके काव्य में वैचारिक कट्टरता नहीं है। कवि का ग्रामीण संस्कार भी इनकी कविताओं में व्यक्त हुआ है। नागार्जुन घुमक्कड़ थे, इसलिए देश-विदेश के अनेक सुंदर स्थानों के शब्द-चित्र इनकी कविताओं में हैं। प्रकृति से जुड़ी इनकी कविताएँ बहुत प्रसिद्ध हैं। ‘बादल को घिरते देखा है’ तथा ‘घन कुरंग’ जैसी कविताएँ बहुत सुंदर हैं। नागार्जुन के काव्य-विषय जीवन से लिए गए हैं, इसलिए रिक्शा खींचते गरीब के पाँवों में फटी बिवाइयाँ भी वहाँ हैं; फटी बनियान और टपकता कटहल भी उनका काव्य विषय बना है।

काव्य-भाषा – नागार्जुन की काव्य-भाषा भावों का अनुसरण करती है। तत्सम शब्दावली के साथ तद्भव और देशी-विदेशी शब्द आवश्यकतानुसार प्रयुक्त हुए हैं। मुहावरों का सटीक प्रयोग इनके काव्य की विशेषता है; यथा –

वतन बेचकर पंडित नेहरू फूले नहीं समाते हैं।
बापू के भी ताऊ निकले, तीनों बंदर ताऊ के।
गिरगट के अंडे सेता हूँ, मैं देख रहा।
सत्तर चूहे खाकर रीझा वृद्ध बिलौटा अब जन मन पर।

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नागार्जुन की कविता बिंबात्मक है। हिरण की तरह उछलते-कूदते बादल का बिंब देखिए –

‘नभ में चौकड़ियाँ भरे भले
शिशु घन-कुरंग
खिलवाड़ देर तक करें भले
शिशु घन कुरंग।’

नागार्जुन ने मधुर गीत भी लिखे हैं और मुक्त छंद में काव्य-रचना भी की है। इन्होंने प्रणय, प्रकृति, राजनीति और देश-प्रेम पर कविताएँ लिखी। हैं। इनकी कविताओं का स्वर मानवतावादी है। प्रसिद्ध आलोचक रामविलास शर्मा के शब्दों में-“इनकी कविताएँ दिल पर चोट करने वाली हैं; कर्तव्य की याद दिलाने वाली हैं और राह दिखाने वाली भी हैं।” नागार्जुन मित्रों के लिए नागा बाबा थे। समाज, राजनीति, धर्म तथा साहित्य में एक साथ संघर्ष करने वाला हिंदी का यह कवि अद्भुत था, क्योंकि कवि के विवेक पर यह किसी तरह का बंधन स्वीकार नहीं करता था।

नागार्जुन मानते थे कि पार्टी देश और समाज से बड़ी नहीं होती, इसलिए वामपंथियों ने इन्हें अंततः ठुकरा दिया। वर्ष 1962 में इन्होंने ० चीन विरोधी कविताएँ लिखीं और वर्ष 1965 में आपातकाल विरोधी कविताएँ लिखीं। इन्होंने जय प्रकाश आंदोलन का भी खुलकर साथ दिया था। नागार्जुन कोमल भावनाओं के कवि भी थे। जब संन्यासी जीवन काटकर बरसों बाद गृहस्थ बने, पत्नी की उम्र ढल चुकी थी। उसकी पीड़ा पर कविता लिखी ‘प्रत्यावर्तन’ अर्थात लौटना। इसमें पत्नी की दशा पर लिखा –

‘हृदय में पीड़ा दृगों में लिए पानी।
देखते पथ काट दी सारी जवानी।’

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1. यह दंतुरित मुसकान

कविता का सार :

कवि किसी ऐसे छोटे बच्चे की मुसकान को देखकर अपार प्रसन्न है, जिसके मुंह में अभी छोटे-छोटे दाँत निकले हैं। कवि को उसकी मुसकान जीवन का संदेश प्रतीत होती है। उस मुसकान के सामने कठोर-से-कठोर मन भी पिघल सकता है। उसकी मुसकान तो किसी मृतक में भी नई जान फूंक सकती है। धूल-मिट्टी से सना हुआ नन्हा-सा बच्चा ऐसा प्रतीत होता है, जैसे कमल का सुंदर-कोमल फूल तालाब छोड़कर झोंपड़ी में खिल उठा हो। उसे छूकर पत्थर भी जल बन जाता है; उसे छूकर शेफालिका के फूल झड़ने लगते हैं। नन्हा-सा बच्चा कवि को नहीं पहचान पाया, इसलिए एकटक उसकी तरफ देखता रहा। कवि मानता है कि उस बच्चे की मोहिनी छवि और उसके संदर दांतों को वह उसकी मां के कारण देख पाया था। वह मां धन्य है और बच्चे की मुसकान भी धन्य है। वह स्वयं इधर-उधर जाने वाला प्रवासी । था, इसलिए उसकी पहचान नन्हे बच्चे के साथ नहीं हो सकी। जब उसकी माँ कहती, तब वह कनखियों से कवि की ओर देखता और उसकी छोटे-छोटे दाँतों से सजी मसकान कवि के मन को मोह लेती।

सप्रसंग व्याख्या, अर्थग्रहण संबंधी एवं सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

जात
1. तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
मृतक में भी डाल देगी जान
धूलि-धूसर तुम्हारे ये गात….
छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात
परस पाकर तुम्हारा ही प्राण,
पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण
छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल
बाँस था कि बबूल?
तुम मुझे पाए नहीं पहचान?
देखते ही रहोगे अनिमेष! थक गए हो?
आँख लूँ मैं फेर?
क्या हुआ यदि हो सके परिचित न पहली बार?

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शब्दार्थ : दंतुरित – बच्चों के नए-नए दाँत। मृतक – मरा हुआ। धूलि-धूसर – धूल-मिट्टी। गात – शरीर के अंग-प्रत्यंग। जलजात – कमल का फूल। परस – स्पर्श। पाषाण – चट्टान, पत्थर। अनिमेष – बिना पलक झपकाए लगातार देखना।

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक क्षितिज (भाग-2) में संकलित कविता ‘यह दंतुरित मुसकान’ से ली गई हैं। इसके रचयिता कवि नागार्जुन हैं ! घुमक्कड़ स्वभाव का होने के कारण कवि जगह-जगह घूमता रहता था। उसने जब अपने छोटे-से बच्चे के मुँह में छोटे-छोटे दाँत देखे तो उसे अपार प्रसन्नता हुई। उसने अपने भावों को अनेक बिंबों के माध्यम से प्रकट किया।

व्याख्या : कवि छोटे-से बच्चे को संबोधित करता हुआ कहता है कि तुम्हारे छोटे-छोटे दाँतों से सजे मुँह की मुसकान इतनी आकर्षक है कि वह मृतकों में भी जान डालने की क्षमता रखती है। वह जीवन का संदेश देती है। तुम्हारे शरीर का अंग-प्रत्यंग धूल-मिट्टी से सना हुआ है। मुझे ऐसा लगता है कि तुम तालाब को छोड़कर मेरी निर्धन की झोपड़ी में खिलने वाले कमल हो।

वह तालाब भी पहले पत्थर होगा, पर तुम्हारे प्राणों का स्पर्श पाकर वह पिघल गया होगा और जल बन गया होगा। चाहे वह बाँस हो या बबूल, पर तुम से छूकर उससे भी शेफालिका के कोमल फूल झड़ने लगते हैं। कवि उस बच्चे से पूछता है कि क्या उसने उसे पहचाना है या नहीं। क्या तुम बिना पलकें झपकाए हैरानी से लगातार मेरी ओर देखते ही रहोगे? क्या तुम थक गए हो? कवि कहता है कि यदि वह उसे पहले पहचान नहीं पाया तो भी कोई बात नहीं। भाव है कि वह अभी बहुत छोटा है, पर वह बहुत भोला-भाला और सुंदर है।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. पंक्तियों में निहित भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
2. ‘दंतुरित मुसकान’ किसकी है?
3. बच्चे का शरीर किससे सना हुआ है ?
4. कवि की झोंपड़ी में बच्चा किसे प्रतिबिंबित कर रहा है?
5. बच्चे के शरीर के स्पर्श मात्र से कौन-से फूल झड़ने लगे थे?
6. कवि की दृष्टि में जीवन का संदेश कौन देता है?
7. बच्चा कवि की ओर किस प्रकार देख रहा था?
8. ‘बाँस था कि बबूल’ की प्रतीकात्मकता स्पष्ट कीजिए।
9. कवि को कौन नहीं पहचान पाया था?
उत्तर :
1. कवि अपने बच्चे को काफ़ी लंबे समय के बाद मिला और उसके छोटे-छोटे दाँतों को देखकर अति प्रसन्न हो उठा है। उसे यह प्रतीत हुआ कि उसकी मुसकान में अपार सुंदरता छिपी हुई है।
2. ‘दंतुरित मुसकान’ कवि के नन्हे-से बच्चे की है।
3. बच्चे का सारा शरीर धूल-मिट्टी से सना हुआ है।
4. कवि की झोपड़ी में नन्हा-सा बच्चा कमल के फूल को प्रतिबिंबित कर रहा है।
5. बच्चे के शरीर के स्पर्श मात्र से शेफालिका के फूल झड़ने लगे थे।
6. कवि की दृष्टि में जीवन का संदेश बच्चे का सौंदर्य देता है।
7. बच्चा कवि की ओर बिना पलकें झपकाए लगातार देखता रहा था।
8. ‘बाँस था कि बबूल’ में कठोर और विपरीत स्थितियों का भाव छिपा है। कठिनाइयों की स्थिति में भी वह अपनी सुंदरता और भोलेपन से सबके मन को हर रहा था।
9. कवि को नन्हा-सा बच्चा नहीं पहचान पाया था।

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सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. कवि ने किसके दाँतों की सराहना की और उसे भोला-भाला माना है?
2. किस बोली का प्रयोग किया गया है?
3. किस प्रकार के शब्दों का समन्वित प्रयोग किया है ?
4. छंद कौन-सा है?
5. किस शैली ने नाटकीयता उत्पन्न की है?
6. कौन-सा काव्य-गुण विद्यमान है?
7. काव्य-रस का नाम लिखिए।
8. किस शब्द-शक्ति के प्रयोग से कथन को सरलता-सरसता प्राप्त हुई है ?
9. ‘जलजात’ शब्द की विशिष्टता क्या है?
10. पंक्तियों में आए ‘दो तत्सम और दो तद्भव’ शब्द छाँटकर लिखिए।
11. ‘दंतुरित मुसकान’ में कौन-सा बिंब है?
12. पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार छाँटकर लिखिए।
उत्तर :
1. कवि ने छोटे-से बच्चे के दाँतों की सुंदरता की सराहना करते हुए उसे भोला और सीधा माना है।
2. खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।
3. तत्सम और तद्भव शब्दावली का समन्वित प्रयोग किया गया है।
4. अतुकांत छंद है।
5. प्रश्न-शैली ने नाटकीयता की सृष्टि की है।
6. प्रसाद गुण विद्यमान है।
7. वात्सल्य रस।
8. अभिधात्मकता ने कवि के कथन को सरलता, सरसता और सहजता प्रदान की है।
9. प्रतीकात्मकता विद्यमान है।
10. तत्सम –

  • मृतक, पाषाण तद्भव
  • तालाब, फूल

11. चाक्षुक बिंब।
12. अतिशयोक्ति –

  • तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
  • मृतक में भी डाल देगी जान उत्प्रेक्षा
  • छोड़कर तालाब मेरी झोपड़ी में खिल उठे जलजात।
  • पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण।
  • छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल। अनुप्रास
  • ‘परस पाकर’, ‘धूलि-धूसर’

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2. यदि तुम्हारी माँ न माध्यम बनी होती आज
मैं न सकता देख
मैं न पाता जान
तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
धन्य तुम, माँ भी तुम्हारी धन्य!
चिर प्रवासी मैं इतर, मैं अन्य!
इस अतिथि से प्रिय तुम्हारा क्या रहा संपर्क
उँगलियों माँ की कराती रही हैं मधुपर्क
देखते तुम इधर कनखी मार
और होती जब कि आँखें चार
तब तुम्हारी दंतुरित मुसकान
मुझे लगली बड़ी ही छविमान!

शब्दार्थ : चिर प्रवासी – लंबे समय तक बाहर रहने वाला। इतर – दूसरा ! मधुपर्क – दही, घी, शहद, जल और दूध का मिश्रण, जो देवता और अतिथि के सामने रखा जाता है। इसे पंचामृत भी कहते हैं। बच्चे को जीवन देने वाला आत्मीयता की मिठास से युक्त माँ का प्यार। कनखी – तिरछी निगाह से देखना। अतिथि – मेहमान। संपर्क – संबंध: छविमान – सुंदर।

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक क्षितिज (भाग-2) से ली गई हैं। ये पंक्तियाँ नागार्जुन के द्वारा रचित कविता ‘यह दंतुरित मुसकान’ में निहित हैं। कवि लंबे समय तक कहीं बाहर रहने के पश्चात वापस अपने घर लौटा था और उसने अपने बच्चे के छोटे-छोटे दाँतों की सुंदर चमक से शोभायमान मुसकान को देखा था। इससे उसे अपार प्रसन्नता हुई थी।

व्याख्या : कवि कहता है कि हे सुंदर दाँतों वाले बच्चे ! यदि तुम्हारी माँ तुम्हारे और मेरे बीच माध्यम न बनी होती, तो मैं कभी भी तुम्हें और तुम्हारी सुंदर मुसकान को देख न पाता और न ही तुम्हें जान पाता। तुम धन्य हो और तुम्हारो माँ भी धन्य है। मैं तुम दोनों का आभारी हूँ। मैं लंबे समय से बाहर था, इसलिए मैं तुम्हारे लिए कोई दूसरा हूँ। मेरे प्यारे बच्चे ! मैं तुम्हारे लिए मेहमान की तरह हूँ, इसलिए तुम्हारा मेरे साथ कोई संबंध नहीं रहा; तुम्हारे लिए मैं अनजाना-सा हूँ।

मेरी अनुपस्थिति में तुम्हारी माँ ही आत्मीयतापूर्वक तुम्हारा पालन-पोषण करती रही। तुम्हें अपना प्यार प्रदान करती रही। वही तुम्हारा पंचामृत से पालन-पोषण करती रही। तुम मुझे देखकर हैरान से थे और मेरी ओर कनखियों से देख रहे थे। जब कभी अचानक तुम्हारी और मेरी दृष्टि मिल जाती थी, तो मुझे तुम्हारे मुँह में तुम्हारे चमकते हुए सुंदर दाँतों से युक्त मुसकान दिखाई दे जाती है। सच ही मुझे तुम्हारी दूधिया दाँतों से सजी मुसकान बहुत सुंदर लगती है। मैं तुम्हारी मुसकान पर मुग्ध हूँ।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. पंक्तियों में निहित भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
2. बच्चे की दंतुरित मुसकान और कवि के बीच कौन माध्यम बना था?
3. किस अवस्था में कवि अपने बच्चे को नहीं देख पाता?
4. कवि ने किसे-किसे धन्य माना है और क्यों?
5. कवि ने स्वयं को क्या माना है?
6. माँ अपने बच्चे का पालन-पोषण क्या खिलाकर करती रही थी?
7. ‘मधुपर्क’ में निहित प्रतीकात्मकता स्पष्ट कीजिए।
8. कवि को छविमान क्या लगती है?
9. नन्हा बच्चा बाहर से आए कवि की ओर किस प्रकार देख रहा था ?
उत्तर :
1. कवि ने अपने बच्चे की सुंदर दाँतों को देखा था और उसकी मुसकान पर मुग्ध हो उठा था। वह अपनी पत्नी के प्रति आभारी था कि उसकी अनुपस्थिति में उसने बहुत अच्छे तरीके से बच्चे का प्रेमपूर्वक पालन-पोषण किया था।
2. बच्चे की ‘दंतुरित मुसकान’ और कवि के बीच कवि की पत्नी माध्यम थी, जिसने कवि को बच्चे की मधुर मुसकान से परिचित करवाया था।
3. यदि कवि की पत्नी बच्चे की मधुर मुसकान से उसका परिचय न करवाती तो वह उसके विषय में न जान पाता और उसे न देख सकता, क्योंकि वह बहुत लंबे समय के बाद वापस अपने घर लौटा था।
4. कवि ने अपने बच्चे और अपनी पत्नी को धन्य माना है, क्योंकि उनके कारण ही उसे अपार प्रसन्नता की प्राप्ति हुई थी। वह स्वयं को उनसे मिलकर धन्य मानता है।
5. कवि ने स्वयं को ‘चिर प्रवासी’ माना है। वह लंबे समय के बाद वापस घर लौटा था।
6. माँ अपने बच्चे का पालन-पोषण दही, घी, शहद और दूध के मिश्रण से बने पंचामृत से करती रही थी।
7. मधुपर्क में प्रतीकात्मकता छिपी हुई है। इसमें बच्चे को जीवन देने वाला आत्मीयता की मिठास से युक्त माँ का प्यार छिपा हुआ है।
8. कवि को बच्चे की ‘दंतुरित मुसकान’ बहुत छविमान लगती है।
9. नन्हा बच्चा बाहर से आए कवि की ओर आश्चर्य और उत्सुकता के कारण कनखियों से देखता है। वह उसकी ओर सीधा नहीं देखता।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 6 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. भाव स्पष्ट कीजिए।
2. किस शब्द-शक्ति के प्रयोग से सरलता-सरसता प्रकट हुई है?
3. किस काव्य-गुण का प्रयोग हुआ है?
4. काव्य-रस का नाम लिखिए।
5. किस बोली का प्रयोग किया है?
6. किस प्रकार के शब्दों का समन्वित प्रयोग किया है?
7. छंद का नाम लिखिए।
8. किन मुहावरों का सहज प्रयोग है?
9. दो तद्भव और दो तत्सम शब्द लिखिए।
10. प्रयुक्त अलंकार लिखिए।
11. कौन-सा बिंब प्रधान है?
उत्तर :
1. कवि ने अपने नन्हें से बच्चे की मधुर मुसकान के आकर्षण का सहज सुंदर वर्णन किया है और अपनी पत्नी की कर्तव्यनिष्ठा का उल्लेख किया है, जिसने उसकी अनुपस्थिति में अपने पुत्र का प्रेमपूर्वक पालन-पोषण किया था।
2. अमिधा शब्द-शक्ति का प्रयोग किया गया है, जिससे कवि का कथन सरलता-सरसता से प्रकट हुआ है।
3. प्रसाद गुण विद्यमान है।
4. वात्सल्य रस।
5. खड़ी बोली का प्रयोग है।
6. तत्सम तद्भव शब्दावली का समन्वित प्रयोग किया गया है।
7. अतुकांत छंद है।
8. आँखें चार होना, कनखी मारना जैसे मुहावरों का सहज-स्वाभाविक प्रयोग किया गया है।
9. तद्भव
– माँ, मुसकान तत्सम
– प्रवासी, संपर्क
10. अनुप्रास-माँ न माध्यम; माँ को कराती रही मधुपर्क
11. चाक्षुक बिंब।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 6 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

2. फसल

किविता का सार :

फसलें हमारे जीवन की आधार हैं। ‘फसल’ शब्द सुनते ही हमारी आँखों के सामने खेतीं में लहलहाती फसलें आ जाती हैं। फसल को पैदा करने के लिए न जाने कितने तत्व और कितने हाथों का परिश्रम लगता है। फसल प्रकृति और मनुष्य के आपसी सहयोग से ही संभव होती है। न जाने कितनी नदियों का पानी और लाखों-करोड़ों हाथों का परिश्रम इसे उत्पन्न करता है। खेतों की उपजाऊ मिट्टी इसे शक्ति देती है; सूर्य की किरणें इसे जीवन देती हैं और हवा इसे धिरकना सिखाती है। फसल अनेक दुश्य-अदृश्य शक्तियों के मिले-जुले बल के कारण उत्पन्न होती है।

सप्रसंग व्याख्या, अर्थग्रहण संबंधी एवं सौंदर्य सराहना से बंधी प्रश्नोत्तर –

1. एक के नहीं,
दो के नहीं,
ढेर सारी नदियों के पानी का जादू:
एक के नहीं,
दो के नहीं,
लाख-लाख कोटि-कोटि हाथों के स्पर्श की गरिमा :
एक की नहीं,
दो की नहीं,
हजार-हज़ार खेतों की मिट्टी का गुण धर्म :
फसल क्या है?
और तो कुछ नहीं है वह
नदियों के पानी का जादू है वह
हाथों के स्पर्श की महिमा है
भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण धर्म है
रूपांतर है सूरज की किरणों का
सिमटा हुआ संकोच है हवा का थिरकन का!

शब्दार्थ : ढेर – बहुत-सी। कोटि – करोड़ों। स्पर्श – छूना। गरिमा – गौरव। गुण धर्म – विशेषताएँ। संदली – चंदन की। रूपांतर – परिवर्तन।
सिमटा – इकट्ठा। प्रसंग प्रस्तुत कविता ‘फसल’ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘क्षितिज’ (भाग-2) में संकलित है, जिसके रचयिता नागार्जुन हैं। कवि ने स्पष्ट किया है कि फसल उत्पन्न करने के लिए मनुष्य और प्रकृति मिलकर एक-दूसरे का सहयोग करते हैं।

व्याख्या : कवि कहता है कि फसल को उत्पन्न करने के लिए एक-दो नहीं बल्कि अनेक नदियों से प्राप्त होने वाला पानी अपना जादुई प्रभाव दिखाता है। उसी पानी के कारण यह पनपती है; बढ़ती है। इसे उगाने के लिए किसी एक या दो व्यक्ति के नहीं, बल्कि लाखों-करोड़ों हाथों के द्वारा छूने की गरिमा छिपी हुई है। यह लाखों-करोड़ों इनसानों के परिश्रम का परिणाम है। इसमें एक-दो खेतों की मिट्टी नहीं प्रयुक्त हुई। इसमें हजारों खेतों की उपजाऊ मिट्टी की विशेषताएँ छिपी हुई हैं। मिट्टी का गुण-धर्म इसमें छिपा हुआ है।

फसल क्या है ? यह तो नदियों के द्वारा लाए गए पानी का जादू है, जिसने इसे उपजाने में सहायता दी। इसमें न जाने कितने लोगों के हाथों का परिश्रम छिपा है। यह उन हाथों की महिमा का परिणाम है। भूरी-काली-संदली मिट्टी की विशेषताएँ इसमें विद्यमान हैं। यह सूर्य की किरणों का फसल के रूप में पनी किरणों से उसे बढ़ाया है। जीवन दिया है। हवा ने इसे थिरकने और इधर-उधर डोलने का गुण प्रदान किया है। भाव यह है कि फसल प्रकृति और मनुष्य के सामूहिक प्रयत्नों का परिणाम है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 6 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. कविता में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।
2. नदियों का पानी फसल के लिए क्या करता है?
3. फसल किनके स्पर्श की गरिमा है?
4. किसकी मिट्टी का गुण-धर्म फसल में विद्यमान है?
5. मिट्टी की किन विशेषताओं को कवि फसल के माध्यम से प्रकट किया है ?
6. मिट्टी के लिए ‘संदली’ शब्द का प्रयोग क्यों किया जाता है?
7. हवा फसल को क्या सिखाती है?
8. फसल किसका रूपांतर है?
9. कवि ने कौन-सा काव्य लिखकर नाटकीयता की सृष्टि की है?
उत्तर :
1. कविता का भावार्थ है कि फसल केवल मनुष्य उत्पन्न नहीं करता। यह प्रकृति और मनुष्य के द्वारा मिल-जुलकर किए जाने वाले सहयोग का परिणाम है।
2. नदियों का पानी फसल के लिए जादू का काम करता है, वही इसे बढ़ाता है, जीवन देता है।
3. फसल लाखों-करोड़ों मनुष्यों के स्पर्श की गरिमा है।
4. हज़ारों खेतों की मिट्टी का गुण-धर्म फसल में विद्यमान है।
5. मिट्टी के काले-भूरे और चंदन जैसे रंग की विशेषताओं को कवि ने फ़सल के माध्यम से प्रकट किया है।
6. ‘संदल’ का अर्थ है-‘चंदन’। मिट्टी में सदा सोंधी-सोंधी सी गंध होती है। मिट्टी की इसी विशेषता को प्रकट करने के लिए कवि ने ‘संदली’ शब्द का प्रयोग किया है।
7. हवा फसल को थिरकना सिखाती है।
8. फसल अनाज के रूप में सूर्य के प्रकाश का रूपांतरण है।
9. कवि ने ‘फसल क्या है?’ लिखकर नाटकीयता की सृष्टि की है।

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सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. भाव स्पष्ट कीजिए।
2. किस बोली का प्रयोग किया गया है ?
3. किस प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया है ?
4. किस शब्द-शक्ति का प्रयोग है ?
5. छंद का नाम लिखिए।
6. किस शैली ने नाटकीयता की सृष्टि की है?
7. काव्य-गुण का नाम लिखिए।
8. कौन-सा रस विद्यमान है?
9. पंक्तियों में प्रयुक्त दो तत्सम और दो तद्भव शब्द लिखिए।
10. लाक्षणिक भाषा का एक प्रयोग लिखिए।
11. कविता में प्रयुक्त अलंकार छाँटकर लिखिए।
उत्तर :
1. कवि ने फसलों के उत्पन्न होने का आधार केवल मनुष्य को न मानकर मनुष्य और प्रकृति के मिले-जुले सहयोग को माना है।
2. खड़ी बोली का सहज-स्वाभाविक प्रयोग किया गया है।
3. तत्सम और तद्भव शब्दावली का सहज-सुंदर प्रयोग किया गया है।
4. अभिधा शब्द-शक्ति ने कवि के कथन को सरलता-सरसता प्रदान की है।
5. अतुकांत छंद का प्रयोग है।
6. प्रश्न शैली ने नाटकीयता की सृष्टि की है।
7. प्रसाद गुण।
8. शांत रस विद्यमान है।
9. तत्सम –
स्पर्श, गरिमा

तद्भव –
हाथ, मिट्टी

10. नदियों के पानी का जादू है वह।
11. पुनरुक्ति प्रकाश –

  • लाख-लाख,
  • कोटि-कोटि,
  • हज़ार-हज़ार

प्रश्न –
फसल क्या है?

अनुप्रास –

  • सूरज की किरणों का
  • सिमटा हुआ संकोच है

JAC Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 1 हरिहर काका

Jharkhand Board JAC Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 1 हरिहर काका Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 1 हरिहर काका

JAC Class 10 Hindi हरिहर काका Textbook Questions and Answers

बोध-प्रश्न –

प्रश्न 1.
कथावाचक और हरिहर काका के बीच क्या संबंध है और इसके क्या कारण हैं ?
अथवा
हरिहर काका के प्रति लेखक की आसक्ति के क्या कारण थे?
उत्तर :
कथावाचक और हरिहर काका के मध्य स्नेह का संबंध है। यद्यपि हरिहर काका के प्रति स्नेह के कई वैचारिक और व्यावहारिक कारण हैं, लेकिन उनमें से दो कारण प्रमुख हैं। पहला कारण यह था कि हरिहर काका कथावाचक के पड़ोसी थे। दूसरा कारण यह था कि हरिहर काका ने कथावाचक को बहुत प्यार-दुलार दिया था। हरिहर काका उसे बचपन में अपने कंधे पर बैठाकर गाँव भर में घुमाया करते थे। हरिहर काका नि:संतान थे, इसलिए वे एक पिता की तरह कथावाचक की देखभाल करते थे। जब लेखक बड़ा हुआ, तो उसकी पहली मित्रता हरिहर काका के साथ हुई थी। हरिहर काका ने उसकी मित्रता स्वीकार करते हुए, उससे अपने मन की सारी बात की थी। वे उससे कुछ नहीं छिपाते थे। यही कारण था कि हरिहर काका और कथावाचक में उम्र का अंतर होते हुए भी बहुत गहरा संबंध था।

प्रश्न 2.
हरिहर काका को महंत और अपने भाई एक ही श्रेणी के क्यों लगते हैं?
उत्तर :
हरिहर काका को महंत और अपने भाई एक ही श्रेणी के लगते हैं, क्योंकि दोनों में ही स्वार्थ और हिंसावृत्ति की भावना विद्यमान थी। हरिहर काका के पास पंद्रह बीघे जमीन थी। उनके कोई संतान नहीं थी, इसलिए महंत और हरिहर काका के भाई उनके खेत अपने नाम लिखवाना चाहते थे। हरिहर काका अपने जीवित रहते ऐसा नहीं करना चाहते थे, इसलिए महंत और उनके भाई अपने-अपने ढंग से खेत हथियाने के लिए उन पर अत्याचार करने लगे।

दूसरों को मोह-माया से दूर रहने तथा अपना अगला जन्म सुधारने का उपदेश देने वाला महंत हरिहर काका के खेतों को अपने नाम करवाने के लिए उन्हें मारने के लिए तैयार हो जाता है। दूसरी ओर खून के रिश्ते अर्थात उनके सगे भाई भी खेतों को लेकर उनके खून के प्यासे हो जाते हैं। यही कारण था कि हरिहर काका को दोनों गुट एक ही श्रेणी के लगते हैं।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 1 हरिहर काका

प्रश्न 3.
ठाकुरबारी के प्रति गाँव वालों के मन में अपार श्रद्धा के जो भाव हैं उनसे उनकी किस मनोवृत्ति का पता चलता है?
उत्तर :
कथावाचक के गाँव में तीन स्थान प्रमुख थे-तालाब, पुराना बरगद का वृक्ष और ठाकुरबारी। ठाकुरबारी में सुबह-शाम ठाकुर जी की पूजा होती थी। गाँव के लोगों में ठाकुर जी के प्रति अगाध श्रद्धा थी। वे लोग अपने हर कार्य की छोटी-बड़ी सफलता का श्रेय ठाकुर जी को देते थे। जिसको जैसी सफलता मिलती थी, वह ठाकुर जी को वैसा ही चढ़ावा चढ़ाता था। यह चढ़ावा रुपये, जेवर और अनाज के रूप में होता था। यदि किसी को अपने कार्य में बहुत अधिक सफलता मिलती थी, तो वह अपनी जमीन का छोटा-सा भाग ठाकुर जी के नाम लिख देता था। इस प्रकार ठाकुर जी के प्रति लोगों के अंधविश्वास का पता चलता है। लोगों के इस विश्वास के कारण ही गाँव के विकास की अपेक्षा ठाकुर जी का विकास हज़ार गुणा हो गया था।

प्रश्न 4.
अनपढ़ होते हुए भी हरिहर काका दुनिया की बेहतर समझ रखते हैं ? कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
अथवा
“हरिहर काका एक सीधे सादे और भोले किसान की अपेक्षा चतुर हो चले थे’ कथन के संदर्भ में 60-70 शब्दों में विचार व्यक्त करें।
उत्तर :
हरिहर काका कथावाचक के पड़ोस में रहते थे। वे बहुत समझदार व्यक्ति थे। उनके तीन भाई थे। तीनों भाइयों का अपना परिवार था। हरिहर काका ने दो शादियाँ की थीं, लेकिन दोनों पत्नियों से उनकी एक भी संतान नहीं थी। दोनों पलियाँ भी जल्दी स्वर्ग सिधार गई थीं। लोगों ने उन्हें तीसरी शादी के लिए कहा, लेकिन उन्होंने अपनी बढ़ती उम्र और धार्मिक संस्कारों के कारण इनकार कर दिया था। इस प्रकार तीनों भाइयों का उनके हिस्से के खेतों पर अधिकार था। आरंभ में हरिहर काका की घर में उचित देखभा ने भी काका की देखभाल की जिम्मेदारी अपनी पत्नियों पर डाल दी थी। बाद में उनकी पत्नियों ने हरिहर काका की देखभाल में अनदेखी आरंभ कर दी।

हरिहर काका को बहुत दुख हुआ। उनके दुखी और कोमल हृदय का लाभ ठाकुरबारी के महंत ने उठाना आरंभ कर दिया। उन्होंने काका को अपना अगला जन्म सुधारने के लिए अपने खेत ठाकुरबारी के नाम लिखने के लिए कहा। उधर भाइयों को जब इस बात की भनक लगी, तो उन्होंने भी काका पर दबाव डालना आरंभ कर दिया। हरिहर काका स्वभाव से सीधे व्यक्ति थे, परंतु उन्हें दुनिया का बहुत ज्ञान था। वे जानते थे कि भाइयों व महंत द्वारा उसकी आवभगत करना केवल स्वार्थ और लालच पर आधारित है।

वे अपने जीवित रहते हुए अपने खेत किसी के भी नाम नहीं करना चाहते थे। उन्होंने ऐसे बहुत-से लोगों को देखा था, जिन्होंने जीवित रहते अपना सबकुछ अपने उत्तराधिकारियों के नाम लिख दिया और बाद में उन्हें पछताना पड़ा। इसलिए वे जीवित रहते अपने खेत किसी के भी नाम नहीं लिखना चाहते थे। इससे लगता है कि अनपढ़ होते हुए भी उन्हें दुनिया का बेहतर ज्ञान था।

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प्रश्न 5.
अथवा
महंत ने हरिहर काका से ज़मीन नसीयत होते न देख क्या उपाय सोचा?
उत्तर :
हरिहर को ज़बरदस्ती उठाकर ले जाने वाले ठाकुरबारी के महंत के आदमी थे। महंत हरिहर काका के खेत अपने नाम लिखवाना चाहते थे। जब उन्होंने देखा कि हरिहर काका सीधे ढंग से उनके नाम खेत नहीं लिखना चाहते, तो उन्होंने हरिहर काका को घर से उठवा लिया। महंत ने हरिहर काका को ठाकुरबारी के एक कमरे में बंद कर दिया था और उन्हें मारा-पीटा गया। उनसे कोरे कागज़ों पर ज़बरदस्ती अंगूठे का निशान लगवा लिया गया। बाद में उनके हाथों-पैरों को कपड़े से बाँध दिया और मुँह में कपड़ा लूंसकर कमरे में बंद कर दिया।

प्रश्न 6.
हरिहर काका के मामले में गाँव वालों की क्या राय थी और उसके क्या कारण थे?
उत्तर :
हरिहर काका को लेकर गाँव वाले दो गुटों में बँट गए थे। एक गुट महंत के पक्ष में था और दूसरा गुट उनके भाइयों के पक्ष में था। महंत के पक्ष के लोग धार्मिक संस्कारों के लोग थे। उनकी राय थी कि हरिहर काका को अपनी ज़मीन ठाकुरबारी के नाम लिख देनी चाहिए। इससे उनकी कीर्ति अचल बनी रहेगी। यह वे लोग थे, जिनका पेट ठाकुर जी को लगाए भोग अर्थात हलवा-पूड़ी से भरता था; उन्हें सारा दिन कुछ करने की ज़रूरत नहीं थी। दूसरे गुट में गाँव के सामाजिक विचारों वाले लोग अर्थात किसान थे। ऐसे लोगों की स्थिति हरिहर काका जैसी थी। वे खून के रिश्तों में विश्वास रखते थे। उनके अनुसार व्यक्ति का गुजारा अपने परिवार से ही होता है। इस प्रकार हरिहर काका के मामले को लेकर गाँव वाले अपनी-अपनी राय दे रहे थे।

प्रश्न 7.
कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि लेखक ने यह क्यों कहा, “अज्ञान की स्थिति में ही मनुष्य मृत्यु से डरते हैं। ज्ञान होने के बाद तो आदमी आवश्यकता पड़ने पर मृत्यु को वरण करने के लिए तैयार हो जाता है।”
उत्तर :
हरिहर काका के तीन भाई थे। तीन भाइयों का भरपूर परिवार था। हरिहर काका ने दो शादियाँ की, लेकिन उनके संतान नहीं हुई। दोनों पत्नियों के मरने के बाद हरिहर काका ने अपना सारा समय भजन-कीर्तन और भाइयों के परिवार में बिताना आरंभ कर दिया। शुरू-शुरू में उनका बहुत आदर-सत्कार होता था। लेकिन बाद में उन्हें रूखा-सूखा खाने को देते थे या फिर वह भी देना भूल जाते थे। जिस दिन हरिहर काका ने अपने खेतों पर अधिकार जमाया, उसी दिन से तीनों भाई और महंत उनका भरपूर ख्याल रखने लगे।

हरिहर काका अनपढ़ होते हुए भी समझ गए थे कि यह सारा आदर-सत्कार उनके खेतों के कारण है। इसलिए उन्होंने अपने जीवित रहते अपने खेत किसी एक के नाम करने से मना कर दिया। उसी दिन से भाई और महंत उनके दुश्मन हो गए। हरिहर काका उन लोगों से भयमुक्त हो गए थे, क्योंकि वे अपनी कीमत जान चुके थे। इसलिए वे अपने खेतों का उत्तराधिकारी किसी को नहीं बनाना चाहते थे। जब तक खेत उनके पास हैं, तब तक सभी उनके इर्द-गिर्द घूम रहे हैं, बाद में उन्हें पूछने वाला कोई नहीं है-इस सत्य को उन्होंने जान लिया था। इसलिए वे अपने भाइयों द्वारा मारने की धमकी देने से भी नहीं डरे अर्थात उन्होंने जीवित रहते मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली थी।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 1 हरिहर काका

प्रश्न 8.
समाज में रिश्तों की क्या अहमियत है ? इस विषय पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर :
आज का समाज भौतिकवाद की ओर अग्रसर हो रहा है जिससे मानवीय रिश्तों का महत्व कम होता जा रहा है। सभी रिश्तों में स्वार्थ दिखाई देता है। आजकल घरों में बड़े आदमी को कोई नहीं पूछता; वे घर में सजावटी वस्तु बनकर रह गए हैं। सभी लोग आज की भागती-दौडती जिंदगी के साथ कदम मिलाने के लिए भाग रहे हैं, जिससे किसी के पास भी एक-दूसरे का सुख-दुख जानने का समय नहीं रहा है। भौतिकवादी और दिखावापसंद जीवन ने घर के बुजुर्गों और बच्चों को एक-दूसरे से दूर कर दिया है। इससे आज की पीढ़ी मानवीय रिश्तों को समझने में नाकाम हो गई है। समाज में रिश्तों की अहमियत में कमी आने से मनुष्य ने अपना स्वाभाविक स्वरूप खो दिया है।

प्रश्न 9.
यदि आपके आसपास हरिहर काका जैसी हालत में कोई हो तो आप उसकी किस प्रकार मदद करेंगे?
उत्तर :
यदि हमारे घर के आस-पास हरिहर काका जैसी स्थिति वाले बुजुर्ग होंगे, तो हम उनकी पूरी मदद करेंगे। पहले उनके इस फैसले का समर्थन करेंगे कि जीवित रहते अपने खेतों को किसी और के नाम नहीं लिखेंगे। आज के भौतिकवाद की ओर बढ़ते समाज में बुजुर्गों की स्थिति घर में पहले जैसी नहीं रह गई है, इसलिए सरकार और कई अन्य सामाजिक संस्थाओं ने ऐसे वृद्धाश्रम खोल दिए हैं, जहाँ घर में उपेक्षित लोग वहाँ आराम से रह सकें। ऐसे ही वृद्धाश्रम में हम उनके रहने का उचित प्रबंध करेंगे, जहाँ वे अपनी उम्र के दूसरे
लोगों के बीच अपने को सुरक्षित अनुभव करेंगे।

प्रश्न 10.
हरिहर काका के गाँव में यदि मीडिया की पहुँच होती तो उनकी क्या स्थिति होती? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर :
हरिहर काका का जिस प्रकार से धर्म और खून के रिश्तों से विश्वास उठ चुका था, उससे वे मानसिक रूप से बीमार हो गए थे। वे बिलकुल चुप रहते थे। किसी की भी बात का कोई उत्तर नहीं देते थे। यदि हरिहर काका के गाँव में मीडिया की पहुँच होती, तो उनकी स्थिति भिन्न होती। मीडिया उनकी स्थिति तथा उनके साथ हुए दुर्व्यवहार की बात को दुनिया के सामने लाती। धर्म के नाम पर संपत्ति इकट्ठा करने वाले महंत का असली चेहरा लोगों के सामने आता।

खून के रिश्ते किस प्रकार निजी स्वार्थ के कारण अपने घर के सदस्य की जान के प्यासे हो जाते हैं-इस बात से दुनिया को अवगत करवाती। हरिहर काका को मीडिया उचित न्याय दिलवाती। उन्हें स्वतंत्र रूप से जीने की व्यवस्था उपलब्ध करवाने में मदद करती। जिस प्रकार के दबाव में वे जी रहे थे, वैसी स्थिति मीडिया की सहायता मिलने के बाद नहीं होती।

JAC Class 10 Hindi हरिहर काका Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘हरिहर काका’ कहानी का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
‘हरिहर काका’ कहानी के कथाकार मिथिलेश्वर हैं। हरिहर काका कथाकार के पड़ोस में रहते थे। कथाकार ने हरिहर काका के माध्यम से हमारे पारिवारिक जीवन तथा हमारे आस्था के प्रतीक धर्मस्थालों पर व्याप्त होती जा रही स्वार्थ लिप्सा को उजागर किया है। हरिहर काका संयुक्त परिवार में रहते थे। वे चार भाई थे। तीन भाइयों का भरपूर परिवार था। उनके कोई संतान नहीं थी, इसलिए उनकी जायदाद के हकदार उनके परिवार के सदस्य थे।

परंतु घर में कुछ इस प्रकार की घटनाएं घटती हैं, जिसका लाभ ठाकुरबारी के महंत उठाना चाहता है। महंत हरिहर काका को लोक-परलोक सुधारने के लिए अपनी जमीन ठाकुर जी के नाम लिखने के लिए कहता है। यह बात भाइयों को पता चलती है। वे भी हरिहर खून के रिश्तों का दिखावा करके काका से जायदाद उनके नाम करने को कहते हैं। इस खींचतान में हरिहर काका के सामने धर्म और परिवार दोनों का असली चेहरा आता है। उन्हें धर्म का नाम लेकर लोगों को फँसाने वाले महंत और अपने परिवार से घृणा हो जाती है।

यह नफ़रत उन्हें कभी न खत्म होने वाली चुप्पी साध लेने को मजबूर कर देती है। इस कहानी के माध्यम से कथाकार ने घर और धर्म का असली चेहरा लोगों के सामने रखा है। घर एक ऐसा स्थान होता है, जहाँ लोग अपने सुख-दुख, खुशी-गम आपस में बाँटते हैं। धर्मस्थल वे स्थान होते हैं, लोगों में अपनेपन और सहृदयता के संस्कार देते हैं। परंतु स्वार्थलिप्सा और हिंसावृत्ति के चलते घर और धर्मस्थल दोनों ही अराजकता, अनाचार और अन्याय पथ पर अग्रसर हैं। इसी उद्देश्य को कथाकार ने हरिहर काका के माध्यम से स्पष्ट किया है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 1 हरिहर काका

प्रश्न 2.
कहानी के आधार पर ‘हरिहर काका’ का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर :
‘हरिहर काका’ कहानी के लेखक मिथिलेश्वर हैं। इस कहानी के मुख्य पात्र हरिहर काका हैं। हरिहर काका का चित्रांकन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है –
1. परिचय – ‘हरिहर काका’ लेखक के पड़ोस में रहते थे। वे एक संयुक्त परिवार के सदस्य थे। उनके तीन भाई थे। तीनों भाइयों का भरपूर परिवार था। हरिहर काका ने दो शादियाँ की थीं, परंतु उनकी एक भी संतान नहीं हुई। उनके परिवार के पास साठ बीघे खेत थे।

2. धार्मिक विचारों वाले – हरिहर काका धार्मिक विचारों वाले थे। वे अपना कृषि से बचा समय गाँव की ठाकुरबारी में व्यतीत करते थे। वहाँ वे भजन-कीर्तन में ध्यान लगाते थे।

3. संस्कारशील – हरिहर काका संस्कारों को मानने वाले व्यक्ति थे। दोनों पत्नियों के मरने के बाद लोगों ने उन्हें तीसरी शादी करने के लिए कहा परंतु उन्होंने अपनी बढ़ती उम्र तथा धार्मिक संस्कारों के कारण शादी से इनकार कर दिया।

4. सहनशील – हरिहर काका सहनशील व्यक्ति थे। उनको अपने परिवार में उचित सम्मान नहीं मिलता था। लेकिन वे अपने परिवार की बेरुखी चुपचाप सहन करते हैं।

5. ममतालु – हरिहर काका का स्वभाव दूसरों पर प्यार लुटाने वाला था। उन्होंने लेखक को बचपन में एक पिता की तरह दुलार दिया था। वे अपने भाइयों और उनके परिवार से भी बहुत प्यार करते थे, इसलिए उन सबकी बेरुखी चुपचाप सहन कर लेते थे।

6. जागरूक विचारों वाले – हरिहर काका अनपढ़ व्यक्ति थे, परंतु अपने अधिकारों के प्रति सचेत थे। जब उन्हें घर में उचित सम्मान मिलना बंद हो गया, तब उन्होंने अपने खेतों पर अधिकार जमाना आरंभ कर दिया। वे अपने जीवित रहते किसी को भी अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाना चाहते थे। उन्होंने बहुत दुनिया देखी थी। उनके अनुसार यदि जीवित रहते अपनी जायदाद दूसरों के नाम लिख दो, तो बाद में उन्हें कोई नहीं पूछता। इससे पता चलता है कि हरिहर काका जागरूक विचारों वाले थे। हरिहर काका अनपढ़ थे, परंतु उन्हें दुनियादारी का पूरा ज्ञान था। वे सहनशील, ममतालु और धार्मिक विचारों के व्यक्ति थे।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 1 हरिहर काका

प्रश्न 3.
ठाकुरबारी का गाँव में मुख्य काम क्या था?
उत्तर
ठाकुरबारी का मुख्य काम गाँव के लोगों में ठाकुर जी के प्रति भक्ति-भावना पैदा करना था। जो लोग धर्म के मार्ग से विमुख हो गए थे, उन्हें सही मार्ग पर लाना भी ठाकुरबारी का प्रमुख कार्य था। गाँव में जब भी बाढ़ या सूखा पड़ता था, उस समय ठाकुरबारी के आँगन में तंबू लगाकर सुबह-शाम ज़ोर-ज़ोर से भजन-कीर्तन शुरू हो जाता था। घरों में सभी शुभ कार्य ठाकुरबारी के महंत द्वारा आरंभ किए जाते थे।

प्रश्न 4.
ठाकुरबारी के महंत और पुजारी की नियुक्ति कौन करता था?
उत्तर
ठाकुरबारी के स्वरूप का विकास होने पर धार्मिक लोगों ने मिलकर समिति बना ली थी। यह समिति हर तीन साल बाद महंत और पुजारी की नियुक्ति करती थी।

प्रश्न 5.
हरिहर काका के परिवार में कौन-कौन थे? उनकी आर्थिक स्थिति कैसी थी?
उत्तर
हरिहर काका का परिवार संयुक्त परिवार था। वे चार भाई थे। हरिहर काका ने दो शादियाँ की, परंतु उनकी संतान नहीं थी। दोनों पत्नियों के मरने के उपरांत वे अपने भाइयों के साथ रहने लगे थे। तीनों भाइयों के भरे-पूरे परिवार थे। दो भाइयों ने अपने लड़कों की शादियाँ भी कर दी थीं। उन लड़कों में से एक लड़का शहर में क्लर्की का काम करता था। हरिहर काका के परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी थी। उनके परिवार के पास साठ बीघे जमीन थी। सभी भाइयों के हिस्से में पंद्रह बीघे खेत थे।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 1 हरिहर काका

प्रश्न 6.
किस घटना ने हरिहर काका को क्रोधित किया?
उत्तर
हरिहर काका अपनी दोनों पत्नियों के मरने के उपरांत भाइयों के पास रहने लगे थे। भाइयों ने भी अपने परिवार की औरतों को हरिहर काका की उचित देखभाल करने के लिए कह दिया था। कुछ दिन तक उनकी उचित देखभाल हुई, लेकिन बाद में घर में उनको अनदेखा किया जाने लगा। खाने में भी रूखा-सूखा भोजन दिया जाता था। बीमार पड़ने पर कोई उन्हें पूछने भी नहीं आता था।

एक दिन उनके शहर में रहने वाले भतीजे के साथ उसका मित्र आया। उस मित्र की मेहमानबाजी में घर में अच्छा खाना बना था। उस दिन हरिहर काका अच्छा खाना खाने की सोच रहे थे। लेकिन उन्हें देर तक कोई पूछने भी नहीं आया। हरिहर काका स्वयं रसोई में जाकर खाना माँगने लगे। उनके खाना माँगने पर घर की बहू ने उन्हें प्रतिदिन की तरह थाली में रूखा-सूखा खाना रखकर दे दिया। यह देखकर हरिहर काका को क्रोध आ गया और उन्होंने खाने की थाली घर के आँगन में फेंक दी।

प्रश्न 7.
हरिहर काका की अपने परिवार के साथ हुई लड़ाई का लाभ कौन उठाना चाहता था और उसने हरिहर काका को क्या समझाया?
उत्तर
हरिहर काका की अपने परिवार के साथ हुई लड़ाई का लाभ महंत उठाना चाहते थे। हरिहर काका के पास पंद्रह बीघे ज़मीन थी। उस जमीन को महंत ठाकुरबारी की ज़मीन के साथ मिलाना चाहते थे। इसलिए वे हरिहर काका को बहला-फुसलाकर ठाकुरबारी में ले गए। उन्होंने हरिहर काका को मोह-माया के बंधन से दूर रहने का उपदेश दिया। वे हरिहर काका को अपने खेत ठाकुर जी के नाम लिखने की सलाह दी और कहा कि ऐसा करने से हरिहर काका के लोक-परलोक दोनों सुधर जाएँगे। इस जन्म में उन्हें संतान सुख नहीं मिला, परंतु वे अपना खेत ईश्वर के नाम लिख देंगे तो अगले जन्म में उन्हें ईश्वर सभी प्रकार के सुखों से भर देगा। इस प्रकार की बातें करके महंत हरिहर काका को अपने जाल में फँसाने में लगे थे।

प्रश्न 8.
“जिनका धन वह रहे उपास, खाने वाले करें विलास।” कथावाचक ने यह शब्द किसके लिए और क्यों कहे हैं?
उत्तर :
कथावाचक ने यह शब्द हरिहर काका तथा उनकी सुरक्षा के लिए आए पुलिसकर्मियों के लिए कहे थे। हरिहर काका के खेतों को लेकर गाँव में चर्चाओं का वातावरण गर्म था। महंत और उनके तीनों भाई खेतों को अपने नाम करवाना चाहते थे। इसलिए दोनों ही उन पर अत्याचार करने लगे थे। काका को उन लोगों से बचाने के लिए पुलिस वालों ने उनकी सुरक्षा का प्रबंध कर दिया था। हरिहर काका अपने भाइयों और महंत का बिनौना रूप देखकर सकते में थे। उन्होंने चुष्पी धारण कर ली थी।

वे किसी से कुछ नहीं कहते थे। अब वे भाइयों से अलग हो चुके थे। उन्होंने अपने कार्यों के लिए एक नौकर रख लिया था। अब उन्हें खाने की इच्छा नहीं रह गई थी। जब वे खाना चाहते थे, तब उन्हें खाने के लिए मिलता ही नहीं था। खाने के नाम पर ही सब झगड़ा हुआ था। अब उनके खर्चे पर पुलिस वाले, नौकर आदि खाकर आनंद मना रहे हैं। इसलिए कथाकार ने ये शब्द हरिहर काका के न खा सकने तथा अन्य लोगों द्वारा उनके पैसे पर मौज़ उड़ाने को लेकर कहे हैं।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 1 हरिहर काका

प्रश्न 9.
हरिहर काका के साथ उनके सगे भाइयों का व्यवहार क्यों बदल गया?
उत्तर :
हरिहर काका के परिवार के पास साठ बीघे खेत थे। वे चार भाई थे। तीन भाइयों का भरपूर परिवार था। हरिहर काका निःसंतान थे। इसलिए उनके खेतों की देखभाल और उसका लाभ उनके भाइयों को मिलता था। इसके बदले में उनकी उचित देखभाल होती थी, परंतु थोड़े दिनों बाद वे परिवार में फालतू वस्तु बनकर रह गए थे। इस पर उन्होंने अपने हिस्से के खेतों पर अधिकार जमाना आरंभ कर दिया। उनके तीनों भाइयों का व्यवहार बदल गया। पहले तो प्यार और आदर का दिखावा करके उन्हें अपने खेत उन लोगों के नाम लिखने के लिए कहा।

हरिहर काका ने दुनिया देखी थी; वे समझ गए थे कि यदि जीवित रहते खेत उन लोगों के नाम लिख दिए तो वे लोग उन्हें पूछने तक नहीं आएँगे। उनकी इस सोच ने उनके भाइयों को क्रूर और अत्याचारी बना दिया। वे तीनों उन्हें सताने लगे। वे उनसे मारपीट करते थे तथा उन्हें जान से मार देने की धमकी देते थे। खेतों के लिए भाइयों का बदला व्यवहार देखकर समाज के हर रिश्ते से हरिहर काका का विश्वास उठ गया था।

प्रश्न 10.
आपके विचार में हरिहर काका के न रहने पर उनकी जमीन पर किसके अधिकार की संभावना है? कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
हरिहर काका के खेतों पर अधिकार जमाने के लिए महंत और उनके भाइयों ने उनसे मारपीट करके कोरे कागजों पर उनके अंगूठे के निशान ले लिए थे। दोनों ही गुट उनकी जमीन के उत्तराधिकारी बन गए थे। परंतु हरिहर काका के न रहने पर उनकी जमीन पर अधिकार करने की संभावना महंत की अधिक है, क्योंकि उनके साथ धर्म का नाम है और वे जानते हैं कि धर्म के नाम पर लोगों को कैसे उकसाया जाता है; कैसे दंगा-फसाद खड़ा किया जा सकता है? उनके साथ गाँव के अंधविश्वासी लोग अधिक हैं।

वे लोग, जो अपने हर छोटे बड़े कार्य की सफलता का श्रेय ठाकुर जी को देकर चढ़ावा चढ़ाते हैं, तो उन लोगों का समर्थन लेकर खेतों को अपने अधिकार में करना महंत के लिए आसान कार्य था। इसमें हरिहर काका के भाई कुछ भी नहीं कर सकते थे।

प्रश्न 11.
ठाकुर जी के नाम जमीन वसीयत करने की बात कहने में महंत ने हरिहर काका को क्या-क्या लालच दिए?
उत्तर :
ठाकुर जी के नाम ज़मीन वसीयत करने की बात कहते हुए महंत ने हरिहर काका से कहा कि ऐसा करने से वे समस्त मोह-माया के बंधनों से मुक्त हो जाएँगे; वे धार्मिक प्रवृत्ति के हैं, उन्हें ईश्वर में ध्यान लगाना चाहिए। इससे उन्हें बैकुंठ की प्राप्ति होगी तथा तीनों लोकों में उनकी कीर्ति जगमगा उठेगी। लोग उन्हें सदा स्मरण करते रहेंगे। तुम आराम से ठाकुरबारी में अपना शेष जीवन व्यतीत करना, जहा तुम्ह सबकुछ मिलता रहेगा।

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प्रश्न 12.
भाइयों की किन बातों से हरिहर काका का दिल पसीजा और वे घर लौट आए?
उत्तर :
हरिहर काका ठाकुरबारी से घर नहीं आना चाहते थे, क्योंकि वहाँ उन्हें सब प्रकार का आराम मिल रहा था। लेकिन जब उनके तीनों भाई उन्हें मनाने बार-बार ठाकुरबारी आने लगे; उनके पाँव पकड़कर रोने लगे; अपनी पत्नियों की गलतियों के लिए माफ़ी माँगने लगे, तो उनका दिल पसीज गया। उनके भाइयों ने अपनी पलियों को दंड देने की बात कही तथा खून के रिश्ते की दुहाई दी, तो वे पुन: वापस घर लौट आए।

प्रश्न 13.
ठाकुरबारी में हरिहर काका की सेवा के लिए क्या-क्या व्यवस्था की गई ?
उत्तर :
ठाकुरबारी में हरिहर काका की सेवा के लिए दो सेवकों ने एक साफ़-सुथरे कमरे में पलंग पर बिस्तर लगाकर उन्हें वहाँ लिटा दिया। उनके लिए विशेष प्रकार के भोजन की व्यवस्था की गई। उन्हें घी टपकते मालपुए, रस बुनिया, लड्डू, छेने की तरकारी, दही, खीर आदि खाने के लिए दी गई।

प्रश्न 14.
ठाकुरबारी की देखभाल की क्या व्यवस्था थी?
उत्तर :
ठाकुरबारी की देखभाल के लिए धार्मिक लोगों की एक समिति थी, जो ठाकुरबारी के संचालन के लिए प्रत्येक तीन वर्ष पर एक महंत और एक पुजारी की नियुक्ति करती थी। ठाकुरबारी का खर्चा चंदे, दान, चढ़ावे तथा बीस बीघे खेतों की फ़सल की आय से चलता था।

प्रश्न 15.
तीसरी शादी करने से हरिहर काका ने क्यों मनाकर दिया?
उत्तर :
हरिहर काका ने अपनी ढलती उम्र और धार्मिक संस्कारों के कारण तीसरी शादी करने से इनकार कर दिया था। औलाद के लिए उन्होंने दो शादियाँ की थीं, परंतु जब दोनों ही बिना संतान को जन्म दिए स्वर्ग सिधार गईं, तो वे विरक्त हो गए। इसके बाद तीसरी शादी का विचार छोड़कर ‘प्रभु में लीन’ हो गए।

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प्रश्न 16.
हरिहर काका ने खाने की थाली बीच आँगन में क्यों फेंक दी?
उत्तर :
एक दिन हरिहर काका के शहर में रहने वाले भतीजे के साथ उसका मित्र आया। उस मित्र की मेहमानबाजी में अच्छा खाना बना था। उस दिन हरिहर काका को अच्छा खाना मिलने की उम्मीद थी। लेकिन उन्हें देर तक कोई भी पूछने नहीं आया। हरिहर काका स्वयं रसोई में जाकर खाना माँगने लगे। उनके खाना माँगने पर घर की बहू ने उन्हें प्रतिदिन की तरह रूखा-सूखा खाना थाली में रखकर दे दिया। यह देखकर हरिहर काका को क्रोध आ गया और उन्होंने खाने की थाली घर के आँगन में फेंक दी।

प्रश्न 17.
‘हरिहर काका’ कहानी के आधार पर बताइए कि एक महंत से समाज की क्या अपेक्षा होती है। उक्त कहानी में महंतों की भूमिका पर टिप्पणी कीजिए। उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए।
उत्तर :
‘हरिहर काका’ पाठ में ठाकुर बारी के महंत किसी न किसी प्रकार से हरिहर काका की संपत्ति हड़पना चाहते हैं। वे एक धर्माधि कारी होते हुए भी धर्म की उचित शिक्षा नहीं दे रहे हैं। वे मात्र अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं। वास्तव में एक धर्माधिकारी महंत का सर्वप्रथम कर्तव्य यह है कि वह समाज को धर्मानुसार आचरण करने की शिक्षा दे। जो लोग अधर्म के मार्ग पर चल रहे हैं, उन्हें सही मार्ग पर लाए। इसके लिए उन्हें समाज में नैतिक मूल्यों के विकास का प्रयत्न करते हुए उनमें परंपरागत भारतीय संस्कार जागृत करने होंगे।

इस कार्य को सफल बनाने के लिए उन्हें अपने आचरण के द्वारा लोगों को शिक्षित करना होगा। उदाहरण के लिए एक माँ ने गुरू नानकदेव जी से प्रार्थना की कि उसका बेटा गुड़ बहुत खाता है, उसे गुड़ खाने से मना करें। गुरूजी ने उसे एक सप्ताह बाद आने के लिए कहा। वह एक सप्ताह बाद बेटे के साथ आई तो गुरूजी ने बालक के सिर पर हाथ रख कर कहा कि बेटा गुड़ मत खाना।

इस पर माँ ने गुरूजी को कहा कि इतनी सी बात के लिए उसे दुबारा क्यों बुलाया, उसी दिन कह देते। गुरूजी ने उत्तर दिया कि तब मैं स्वयं गुड़ खाता था, इसलिए गुड़ नहीं खाने का उपदेश नहीं दे सकता था। अब मैं गुड़ नहीं खाता इसलिए बालक को गुड़ नहीं खाने के लिए कह सका हूँ। धर्मानुसार आचरण करने के लिए समाज को प्रेरित करना ही महंतों का मुख्य कार्य है न कि अपना स्वार्थ सिद्ध करना।

हरिहर काका Summary in Hindi

पाठ का सार :

हरिहर काका’ कहानी के कथाकार ‘मिथिलेश्वर’ हैं। इस कहानी के माध्यम से कथाकार ने ग्रामीण पारिवारिक जीवन तथा हमारी आस्था के प्रतीक धर्मस्थलों में पाँव फैला रही स्वार्थलिप्सा को उजागर किया है। कहानी में ‘हरिहर काका’ को इसी स्वार्थलिप्सा के कारण पारिवारिक संबंधों से बेदखल किया गया। लेखक का हरिहर काका से परिचय बचपन का है। हरिहर काका उसके पड़ोस में रहते थे। उन्होंने उसे अपने बच्चे की तरह प्यार और दुलार दिया था। वे उससे अपनी कोई भी बात नहीं छिपाते थे।

परंतु पिछले कुछ दिनों की घटी घटनाओं के कारण हरिहर काका ने चुप्पी साध ली थी। वे किसी से बात नहीं करते थे। वे हर समय चुपचाप बैठे हुए कुछ-न-कुछ सोचते रहते थे। ऐसा लगता था कि उनकी यह चुप्पी उनके साथ ही खत्म होगी। लेखक का गाँव आरा शहर से चालीस किलोमीटर की दूरी पर था। गाँव में तीन स्थान प्रमुख हैं। एक तालाब, दूसरा पुराना बरगद का वृक्ष और तीसरा ठाकुर जी का विशाल मंदिर जिसे लोग ठाकुरबारी भी कहते हैं। ठाकुरबारी की स्थापना कब हुई, इसका किसी को विशेष ज्ञान नहीं था।

इस संबंध में प्रचलित है कि जब गाँव बसा था, तो उस समय एक संत इस स्थान पर झोंपड़ी बनाकर रहने लगे थे। उस संत ने इस स्थान पर ठाकुर जी की पूजा आरंभ कर दी। लोगों ने धर्म और सेवा-भावना से प्रेरित होकर चंदा इकट्ठा करके ठाकुर जी का मंदिर बनवा दिया। ग्रामीण लोगों के विश्वास ने ठाकुर जी के मंदिर और संपत्ति में विशेष योगदान दिया। वहाँ के लोग अपने प्रत्येक कार्य की सफलता का श्रेय ठाकुर जी को देते थे और अपनी जमीन का एक छोटा टुकड़ा ठाकुर जी के नाम लिख देते थे।

लोगों के इस विश्वास के कारण ठाकुर जी के नाम बीस बीघे जमीन हो गई थी। ठाकुरबारी की देखभाल महंत और एक पुजारी करते थे। इनकी नियुक्ति धार्मिक लोगों की समिति द्वारा तीन साल के लिए की जाती थी। ठाकुरबारी का काम लोगों में धर्मभावना और सेवाभावना उत्पन्न करना था। वहाँ के लोगों के सभी काम ठाकुरबारी से शुरू होते थे। लोग अपना कृषि से बचा समय ठाकुरबारी में व्यतीत करते थे। लेखक कभी-कभी ठाकुरबारी में जाता था। उसे वहाँ बैठे साधु-संत अच्छे नहीं लगते थे। लेखक को लगता था कि ये साधु-संत खाली बातें बनाकर हलवा-पूड़ी खाने का कार्य करते हैं। हरिहर काका चार भाई थे।

सबकी शादियाँ हो गई थी और सभी के पास बच्चे थे। हरिहर काका ने दो शादियाँ की थीं, परंतु उन्हें बच्चे नहीं हुए थे। उनकी दोनों पत्नियाँ भी जल्दी स्वर्ग सिधार गई थीं। हरिहर काका ने तीसरी शादी बढ़ती उम्र और धार्मिक संस्कारों के कारण नहीं की थी। वे अपने भाइयों के साथ रहने लगे थे। उनके परिवार के पास साठ बीघे जमीन थी। सभी भाइयों के हिस्से में पंद्रह-पंद्रह बीघे जमीन आई थी। तीनों भाइयों ने अपनी पत्नियों से कह रखा था कि हरिहर काका की अच्छी तरह सेवा करें; उन्हें किसी तरह का कोई कष्ट नहीं होना चाहिए। कुछ समय तक सबकुछ ठीक प्रकार से चलता रहा।

थोड़े दिनों बाद सब अपने-अपने परिवार और बच्चों में मग्न हो गए। हरिहर काका का ध्यान रखने वाला कोई नहीं रहा। कभी-कभी उन्हें बचा-खुचा खाना दिया जाता था। बीमार पड़ने पर उन्हें पानी देने वाला कोई नहीं था। उनका अपने भाइयों के परिवार से मोहभंग हो गया। एक दिन उनके भतीजे का मित्र शहर से आया। उसके लिए तरह-तरह के व्यंजन बने। हरिहर काका को विश्वास था कि आज उन्हें अच्छा खाना मिलेगा। परंतु उन्हें किसी ने कुछ नहीं दिया। माँगने पर उन्हें वही रूखा-सूखा भोजन थाली में रखकर दे दिया गया।

हरिहर काका को गुस्सा आ गया। उन्होंने वह थाली आँगन में फेंक दी और कहने लगे कि उनके हिस्से के धन पर घर के सभी लोग मज़े कर रहे हैं। जिस समय हरिहर काका बोल रहे थे, उस समय ठाकुरबारी का पुजारी उनके घर के दालान में बैठा हुआ था। उसने ठाकुरबारी के महंत को सारी बात कह सुनाई। महंत ने इस घटना का लाभ उठाते हुए

हरिहर काका को अपने जाल में फंसा लिया। महंत हरिहर काका को एकांत में ले जाकर लोक-परलोक की बातें समझाने लगे कि यदि वह अपने हिस्से की ज़मीन ठाकुरबारी को दान कर दे, तो चारों ओर उनका गुणगान होगा, ईश्वर की भी उसके ऊपर कृपा बनी रहेगी। हरिहर काका ने पिछले जन्म में कोई पाप किया होगा, जिस कारण उसे पत्नी और संतान सुख नहीं मिला।

यदि अब वह अपना तन, मन, धन ईश्वर के नाम कर देगा, तो उसे अगले जन्म में पूर्ण सुख की प्राप्ति होगी। हरिहर काका देर तक महंत की बातों पर विचार करते रहे। महंत ने उन्हें खूब अच्छा खाने को दिया और सोने के लिए एक आरामदायक कमरा दे दिया। हरिहर काका के भाइयों को जब घर में घटी घटना का पता चला, तो उन्होंने अपनी पत्नियों को बहुत फटकारा। वे तीनों काका को लेने ठाकुरबारी पहुँच गए। महंत ने हरिहर काका को एक रात के लिए अपने यहाँ रोक लिया।

इससे भाइयों को हरिहर काका की पंद्रह बीघे जमीन हाथ से निकलती दिखाई देने लगी। सुबह होते ही तीनों फिर से ठाकुरबारी पहुँच गए। हरिहर काका के पैर पकड़कर रोने लगे। हरिहर काका का दिल पसीज गया और वे उनके साथ घर आ गए। घर में सभी लोगों ने उन्हें हाथों पर लिया। उनकी बहत आवभगत हुई। अब उनकी सभी इच्छाओं का ध्यान रखा जाने लगा। हरिहर काका इस परिवर्तन का श्रेय महंत को दे रहे थे। गाँव के लोगों बताया था, परंतु फिर भी उन लोगों को सारी घटना का पता चल गया था।

हरिहर काका को लेकर गाँव में दो गुट बन गए। एक गुट का मानना था कि हरिहर काका को अपना अगला जन्म सुधारने के लिए जमीन ठाकुरबारी के नाम लिख देनी चाहिए और दूसरे गुट के लोगों का कहना था कि भाइयों के साथ खून का रिश्ता है, इसलिए ज़मीन उनको देनी चाहिए। हरिहर काका को लेकर गाँव का वातावरण तनावपूर्ण हो गया था। सभी लोग अपनी बात को ठीक बताने में लगे थे। हरिहर काका के भाइयों को भी यही आशंका होने लगी थी कि कहीं लोगों और महंत के दबाव के कारण वे अपनी जमीन ठाकुरबारी के नाम न लिख दें। हरिहर काका जीते-जी किसी को भी अपनी जमीन का स्वामी नहीं बनाना चाहते थे।

उन्हें अपने गाँव के कई बुजुर्ग याद थे, जिन्होंने अपने जीवित रहते अपनी जमीन दूसरों के नाम लिख दी और फिर उनका जीवन एक कुत्ते के जीवन के समान हो गया। हरिहर काका ने न तो महंत को इंकार किया और न ही अपने भाइयों को। वे भी इस बदलाव का असली कारण समझ गए थे। हरिहर काका को लेकर महंत चिंता में पड़ गए। उन्हें लगता था कि कहीं हाथ आई चिड़िया उड़ न जाए, इसलिए उन्होंने हरिहर काका का अपहरण करवाने का निश्चय किया। बाहर से कुछ साधु बुलाकर हरिहर काका को आधी रात के समय घर से उठवा लिया गया। उनके भाई उन्हें ढूँढ़ने लगे। उन्हें लग रहा था कि यह काम महंत का है।

वे लोग ठाकुरबारी गए। वहाँ शांति और खामोशी थी, फिर उन्हें लगा कि कहीं रुपये-पैसे के लालच में डाकू न उठाकर ले गए हों। वे यह सोच ही रहे थे कि उन्हें ठाकुरबारी में से बातचीत करने की आवाजें – आने लगीं। उन्होंने ठाकुरबारी के दरवाजे को पीटना आरंभ कर दिया। ठाकुरबारी की छत से पथराव और फायरिंग होने लगी। हरिहर काका के भाइयों ने पुलिस की सहायता लेकर ठाकुरबारी से काका को बाहर निकाला। काका की हालत बिगड़ी हुई थी। उनके अनुसार महंत उनसे जबरदस्ती जमीन के कागजों पर अंगूठा लगवाना चाहते थे। हरिहर काका के मन में महंत, पुजारी और ठाकुरबारी के प्रति नफ़रत। भर गई थी। हरिहर काका के भाई काका की रक्षा इस प्रकार करते थे, जैसे कोई अनमोल वस्तु हो। काका को यह अनुभव हो गया था।

कि भाइयों द्वारा स्नेह और आदर उनकी जायदाद के कारण है। ठाकुरबारी की घटना के पश्चात भाइयों का दबाव बढ़ने लगा था कि जायदाद उनके नाम कर दें, परंतु काका अपनी बात पर अड़े हुए थे। काका की टालने वाली बातें सुनकर तीनों भाइयों ने महंत वाला रास्ता अपनाया। हरिहर काका से मारपीट आरंभ कर दी। मार पड़ने पर हरिहर काका ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे, जिस कारण उनकी आवाजें घर से बाहर निकल गईं। लोगों ने हरिहर काका के साथ हो रही जोर-ज़बरदस्ती की बात महंत को बताई।

महंत ने पुलिस कार्यवाही करने। में तत्परता दिखाई। पुलिस ने हरिहर को भाइयों के कब्जे से बड़ी बुरी हालत में बरामद किया। हरिहर काका का धर्म से तो पहले ही मोहभंग हो गया था, लेकिन भाइयों के व्यवहार को देखकर खून के रिश्ते से भी उनका मन उचट गया था। हरिहर काका को लेकर महंत और तीनों भाइयों में खींचतान आरंभ हो गई। दोनों गुटों को एक-दूसरे से डर लगा रहता था कि हरिहर काका को कोई भी गुट अपने पक्ष में न कर ले। इसलिए उनकी सुरक्षा के लिए पुलिस का पहरा लगा दिया गया।

महंत और तीनों भाई हरिहर काका का विश्वास फिर से जीतने में लगे हुए थे। इस बीच गाँव के एक नेताजी का भी ध्यान हरिहर काका और उनकी जायदाद पर जाता है। वे हरिहर काका से स्कूल बनाने के बहाने से ज़मीन हथियाना चाहते थे, लेकिन हरिहर काका अब किसी की भी बातों में नहीं आते थे। नेताजी को खाली हाथ लौटना पड़ा। गाँववालों के पास अब उठते-बैठते एक ही चर्चा थी कि हरिहर काका अपनी जमीन किसके नाम लिखेंगे।

गाँव में खबरों का बाजार गर्म था कि हरिहर काका के मरने के बाद उनके अंतिम संस्कार को लेकर भी दोनों गुटों में झगड़ा होगा, क्योंकि दोनों के पास हरिहर काका के अंगूठा लगे कागज़ थे। हरिहर काका ने तो सबकी बातें सुननी बंद कर दी थीं। वह किसी की भी बात का कोई उत्तर नहीं देते थे। हरिहर काका ने अपने कामों के लिए एक नौकर रख लिया था। उन्हें तो धर्म के अधर्म स्वरूप ने और खून के रिश्तों की स्वार्थता ने गूंगा बना दिया था।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sanchayan Chapter 1 हरिहर काका

कठिन शब्दों के अर्थ :

यंत्रणाओं – यातनाओं, मनःस्थिति – मानसिक दशा, आसक्ति – लगाव, सयाना – बड़ा होना, मझदार – बीच में, विलीन – लुप्त होना, विकल्प – दूसरा उपाय, मन्नौती – मन्नत, ठाकुरबारी – देवस्थान, संचालन – चलाना, अखरना – बुरा लगना, नियुक्ति – लगाया गया, दवनी – अन्न निकालने की प्रक्रिया, अगउम – देवता के लिए निकाला गया अंश, घनिष्ठ – गहरा, हाज़िर – उपस्थित, प्रवचन – उपदेश, मशगूल – व्यस्त, चटोर – खाने-पीने वाले, हमाध – हवन में प्रयुक्त होने वाली सामग्री, तत्क्षण – उसी पल, अकारथ – बेकार, विलंब – देर, मुस्तैद – तैयार, निष्कर्ष – परिणाम, जून – समय, बय – उम्र, अप्रत्याशित – आकस्मिक, महटिया – टाल जाना, छल, बल, कल – वंचना, शक्ति, बुद्धि, आच्छादित – ढका हुआ।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 5 उत्साह और अट नहीं रही

Jharkhand Board JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 5 उत्साह और अट नहीं रही Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 5 उत्साह और अट नहीं रही

JAC Class 10 Hindi उत्साह और अट नहीं रही Textbook Questions and Answers

1. उत्साह

प्रश्न 1.
कवि बादल से फुहार, रिमझिम या बरसने के स्थान पर ‘गरजने’ के लिए कहता है, क्यों?
उत्तर :
निराला विद्रोही कवि थे। वे समाज में क्रांति के माध्यम से परिवर्तन लाना चाहते थे। वे क्रांति चेतना का आह्वान करने में विश्वास रखते थे, जो ओज और जोश पर निर्भर करती है। ओज और जोश के लिए ही कवि बादलों को गरजने के लिए कहता है।

प्रश्न 2.
कविता का शीर्षक उत्साह क्यों रखा भया है।
उत्तर :
यह एक आहवान गीत है, जिसमें कवि ने मत्साहपूर्ण उग में अपने प्रगतिवादी स्वर को प्रकट किया है। वह बादलों को गरज-गरजकर सारे संसार को नया जीवन प्रदान करने के लिए प्रेरित करता है, जिनके भीतर वज्रपात की शक्ति छिपी हुई है। वे संसार को नई प्रेरणा और जीवन प्रदान करने की क्षमता रखते हैं, इसलिए कवि ने बादलों के विशेष गुण के आधार पर इस कविता का शीर्षक उत्साह रखा है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 5 उत्साह और अट नहीं रही

प्रश्न 3.
कविता में बादल किन-किन अर्थों की ओर संकेत करता है?
उत्तर :
कविता में बादल ललित कल्पना और क्रांति चेतना की ओर संकेत करता है। एक तरफ़ यह पीड़ित-प्यासे लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने वाला है, वहीं दूसरी तरफ़ वह नई कल्पना और नए अंकुर के लिए विध्वंस, विप्लव और क्रांति चेतना की ओर संकेत करता है।

प्रश्न 4.
शब्दों का ऐसा प्रयोग जिससे कविता के किसी खास भाव या दृश्य में ध्वन्यात्मक प्रभाव पैदा हो, नाद-सौंदर्य कहलाता है। उत्साह कविता में ऐसे कौन-से शब्द हैं जिनमें नाद-सौंदर्य मौजूद है, छाँटकर लिखें।
उत्तर :

  1. घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ।
  2. ललित ललित, काले धुंघराले।
  3. विद्युत-छवि उर में, कवि नवजीवन वाले।
  4. विकल विकल, उन्मन थे उन्मन।

रचना और अभिव्यक्ति –

प्रश्न 5.
जैसे बादल उमड़-घुमड़कर बारिश करते हैं वैसे ही कवि के अंतर्मन में भी भावों के बादल उमड़-घुमड़कर कविता के रूप में अभिव्यक्त होते हैं। ऐसे ही कभी प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर अपने उमड़ते भावों को कविता में उतारिए।
उत्तर :
विद्यार्थी स्वयं करें।

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पाठेतर सक्रियता –

प्रश्न 1.
बादलों पर अनेक कविताएँ हैं। कुछ कविताओं का संकलन करें और उनका चित्रांकन भी कीजिए।
उत्तर :
अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं कीजिए।

2. अट नहीं रही है।

प्रश्न 1.
छायावाद की एक खास विशेषता है-अंतर्मन के भावों का बाहर की दुनिया से सामंजस्य बिठाना। कविता की किन पंक्तियों को पढ़कर यह धारणा पुष्ट होती है ? लिखिए।
उत्तर :
पत्तों से लदी डाल कहीं हरी, कहीं लाल कहीं पड़ी है उर में मंद-गंध-पुष्प-माला पाट-पाट शोभा-श्री पट नहीं कही है। कवि कहता है कि हरे पत्तों और लाल कोंपलों से भरी डालियों के बीच खिले सुगंधित फूलों की शोभा बिखरी है। ऐसा प्रतीत होता है कि उनके कंठों में सुगंधित फूलों की मालाएँ पड़ी हुई हैं। कवि के अज्ञात सत्तारूपी प्रियतम वन की शोभा के वैभव को कूट-कूटकर भर रहे हैं पर अपनी पुष्पलता के कारण उसमें समा न सकने के कारण वह चारों ओर बिखर रही है। कवि ने अपने मन के भावों को प्रकृति के माध्यम से व्यक्त किया है।

प्रश्न 2.
कवि की आँख फागुन की सुंदरता से क्यों नहीं हट रही है?
अथवा
‘अट नहीं रही है’ कविता में ‘उड़ने को नभ में तुम पर-पर कर देते हो’ के आलोक में बताइए कि फागुन लोगों के मन में किस तरह प्रभावित करता है?
उत्तर :
कवि के अज्ञात सत्तारूपी प्रियतम प्रभु फागुन की सुंदरता के कण-कण में व्याप्त हैं। उनके श्वास के द्वारा प्रकृति का कोना-कोना सुगंध से आपूरित था। वही कवि के मन में तरह-तरह की कल्पनाएँ भरते थे। उनमें विशेष आकर्षण था, जिससे कवि अपनी आँख नहीं हटाना चाहता। उसकी दृष्टि हट ही नहीं रही है।

प्रश्न 3.
प्रस्तुत कविता में कवि ने प्रकृति की व्यापकता का वर्णन किन रूपों में किया है?
उत्तर :
कवि ने प्रकृति की व्यापकता को फागुन की सुंदरता के रूप में प्रकट किया है। प्रकृति की सुंदरता और व्यापकता फागुन में समा नहीं पाती, इसलिए वह सब तरफ़ फूटी पड़ती दिखाई देती है। प्रकृति के माध्यम से परमात्मा की सर्वव्या किया है। वह परम सत्ता अपनी श्वासों से प्रकृति के कोने-कोने में सुगंध के रूप में व्याप्त है।

प्रकृति ही कवि को कल्पना की ऊँची उड़ान भरने के लिए प्रेरित करती है और उसकी रचनाओं में सर्वत्र दिखाई देती है। प्रकृति की व्यापकता ही कवि के मन में तरह-तरह की कल्पनाओं को जन्म देती है। वन का प्रत्येक पेड़-पौधा इसी सुंदरता से भरकर शोभा देता है। प्रकृति की व्यापकता नैसर्गिक सौंदर्य का मूल आधार है।

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प्रश्न 4.
फागुन में ऐसा क्या होता है जो बाकी ऋतुओं से भिन्न होता है ?
उत्तर :
फागुन का महीना मस्ती से भरा होता है, जो प्रकृति को नया रंग प्रदान कर देता है। पेड़-पौधों की शाखाएँ हरे-हरे पत्तों से लद जाती हैं। लाल-लाल कोंपलें अपार सुंदर लगती हैं। रंग-बिरंगे फूलों की बहार-सी छा जाती है। इससे वन की शोभा का वैभव पूरी तरह से प्रकट हो जाता है। प्रकृति ईश्वरीय शोभा को लेकर प्रकट हो जाती है, जो बाकी ऋतुओं से भिन्न होती है। इस ऋतु में न गरमी का प्रकोप होता है और न ही सरदी की ठिठुरन। इसमें न तो हर समय की वर्षा होती है और न ही पतझड़ से ,ठ बने वृक्ष। यह महीना अपार सुखदायी बनकर सबके मन को मोह लेता है।

प्रश्न 5.
इन कविताओं के आधार पर निराला के काव्य-शिल्प की विशिष्टताएँ लिखिए।
उत्तर :
निराला विद्रोही कवि थे, इसलिए उनके काव्य-शिल्प में भी विद्रोह की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने कला के क्षेत्र में रूढ़ियों और परंपराओं को स्वीकार नहीं किया था। उन्होंने भाषा, छंद, शैली-प्रत्येक क्षेत्र में मौलिकता और नवीनता का समावेश करने का प्रयत्न किया था। वे छायावादी कवि थे, इसलिए शिल्प की कोमलता उनकी कविता में कहीं-न-कहीं अवश्य बनी रही थी। उनकी कविताओं के शिल्प में विद्यमान प्रमुख विशेषताएँ अग्रलिखित हैं –

1. भाषागत कोमलता – उनकी भाषा में एकरसता की कमी है। उन्होंने सरल, व्यावहारिक, सुबोध, सौष्ठव प्रधान और अलंकृत भाषा का प्रयोग :
किया है। उनकी भाषा पर संस्कृत का विशेष प्रभाव है –

विकल विकल, उन्मन थे उन्मन
विश्व के निदाघ के सकल जन,
आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन!
तप्त धरा, जल से फिर

शीतल कर दो –

2. कोमलता-निराला की कविताओं में कोमलता है। उन्होंने विशिष्ट शब्दों के प्रयोग से कोमलता को उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त की है –

घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ!
ललित ललित, काले धुंघराले,
बाल कल्पना के-से पाले,
विदयुत-छबि उर में, कवि नवजीवन वाले!

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3. शब्दों की मधुर योजना – निराला ने अन्य छायावादी कवियों की तरह भाषा को भाषानुसारिणी बनाने के लिए शब्दों की मधुर योजना की है। यथा –

शिशु पाते हैं माताओं के
वक्ष-स्थल पर भूला गान,
माताएँ भी पातीं शिशु के
अधरों पर अपनी मुसकान।

4. लाक्षणिक प्रयोग – निराला की भाषा में लाक्षणिक प्रयोग भरे पड़े हैं। उन्होंने परंपरा के प्रति अपने विरोध-भाव को प्रकट करते समय भी लाक्षणिकता का प्रयोग किया था –

कठिन श्रंखला बज-बजाकर
गाता हूँ अतीत के गान
मुझ भूले पर उस अतीत का
क्या ऐसा ही होगा ध्यान?

5. संगीतात्मकता – छायावादी कवियों की तरह निराला ने भी प्रायः तुक के संगीत का प्रयोग नहीं किया था और उसके स्थान पर लय-संगीत को अपनाया था। उन्हें संगीत का अच्छा ज्ञान था। कविता में उनकी यह विशेषता स्थान-स्थान पर दिखाई देती है –

कहीं पड़ी है उर में
मंद-गंध पुष्प-माल
पाट-पाट शोभा-श्री
पट नहीं रही है।

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6. चित्रात्मकता – निराला ने शब्दों के बल पर भाव चित्र प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने बादलों का ऐसा शब्द चित्र खींचा है कि वे काले घुघराले बालों के समान आँखों के सामने झूमते-गरजते-चमकते से प्रतीत होने लगते हैं।

7. लोकगीतों जैसी भाषा – निराला ने अनेक गीतों की भाषा लोकगीतों के समान प्रयुक्त की है। कहीं-कहीं उन्होंने कजली और गज़ल भी लिखी हैं। इसमें कवि ने देशज शब्दों का खुलकर प्रयोग किया है अट नहीं रही है आभा फागुन की तन सट नहीं रही है।

8. मुक्त छंद – निराला ने मुख्य रूप से अपनी भावनाओं को मुक्त छंद में प्रकट किया है। उन्होंने छंद से मुक्त रहकर अपने काव्य की रचना की है। इनके मुक्त छंद को अनेक लोगों ने खंड छंद, केंचुआ छंद, रबड़ छंद, कंगारू छंद आदि नाम दिए हैं।

9. अलंकार योजना – कवि ने समान रूप से शब्दालंकारों और अर्थालंकारों का प्रयोग किया है। इससे इनके काव्य में सुंदरता की वृद्धि हुई है।
(i) पुनरुक्ति प्रकाश-घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ! ममा ललित ललित, काले घुघराले।
(ii) उपमा-बाल कल्पना के-से पाले।
(iii) वीप्सा-विकल विकल, उन्मन थे उन्मन
(iv) प्रश्न-क्या ऐसा ही होगा ध्यान?
(v) अनुप्रास-कहीं हरी, कहीं लाल
(vi) यमक-पर-पर कर देते हो।

वास्तव में निराला ने मौलिक-शिल्प योजना को महत्व दिया है, जिस कारण साहित्य में उनकी अपनी ही पहचान है।

रचना और अभिव्यक्ति –

प्रश्न 6.
होली के आसपास प्रकृति में जो परिवर्तन दिखाई देते हैं, उन्हें लिखिए।
उत्तर :
होली के आसपास मौसम में एकदम परिवर्तन आता है। सरदी समाप्त होने लगती है और सूर्य की तपन बढ़ने लगती है। सरदियों में जिस गर्म धूप की इच्छा होती है, वह इच्छा कम हो जाती है। पेड़-पौधों पर हरियाली छाने लगती है। वनस्पतियों पर नई-नई कोंपलें दिखाई देने लगती हैं। घास पर सुबह-सुबह दिखाई देने वाली ओस की बूंदें गायब हो जाती हैं। पक्षियों के जो झुंड सरदियों में न जाने कहाँ चले जाते हैं, वे वापस पेड़ों पर लौटकर चहचहाने लगते हैं। होली के आसपास प्रकृति की शोभा नया-सा रूप प्राप्त कर लेती है।

पाठेतर सक्रियता –

प्रश्न 1.
फागुन में गाए जाने वाले गीत जैसे होरी, फाग आदि गीतों के बारे में जानिए।
उत्तर :
अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से कीजिए। इस कविता में भी निराला फागुन के सौंदर्य में डूब गए हैं। उनमें फागुन की आभा रच गई, ऐसी आभा जिसे न शब्दों से अलग किया जा सकता है, न फागुन से।

फूटे हैं आमों में बौर – भर गये मोती के झाग,
भौर वन-वन टूटे हैं। – जनों के मन लूटे हैं।
होली मची ठौर-ठौर, – माथे अबीर से लाल,
सभी बंधन छूटे हैं। – गाल सेंदुर के देखे,
फागुन के रंग राग, – आँखें हुए हैं गुलाल,
बाग-वन फाग मचा है, – गेरू के ढेले कूटे हैं।

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प्रश्न 1.
पाठ में संकलित निराला की कविताओं के आधार पर विद्रोह के स्वर को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
निराला की कविताओं में विद्रोह का स्वर प्रधान है। कवि ने परंपराओं का विरोध करते हुए हिंदी काव्य को मुक्त छंद का प्रयोग प्रदान किया था। उसे लगा था कि ऐसा करना आवश्यक है, क्योंकि नई काव्य परंपराएँ साहित्य का विस्तार करती हैं –

शिशु पाते हैं माताओं के
वक्षःस्थल पर भूला गान
माताएँ भी पाती शिशु के
अधरों पर अपनी मुसकान।

कवि ने बादलों के माध्यम से विद्रोह के स्वर को ऊँचा उठाया है। वे समझते थे कि इसी रास्ते पर चलकर समाज का कल्याण किया जा सकता है –

विकल विकल, उन्मन थे उन्मन,
विश्व के निदाघ के सकल जन,
आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन!
तप्त धरा, जल से फिर
शीतल कर दो –

वास्तव में निराला जीवनपर्यंत कविता के माध्यम से विद्रोह और संघर्ष के स्वर को प्रकट करते रहे थे।

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प्रश्न 2.
‘अट नहीं रही’ के आधार पर बसंत ऋतु की शोभा का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
कवि ने बसंत में प्रकृति की शोभा का सुंदर उल्लेख किया है। ऐसा लगता है, जैसे इस ऋतु में प्रकृति के कण-कण में सुंदरता समा-सी जाती है। प्रकृति के कोने-कोने में अनूठी-सी सुगंध भर जाती है, जिससे कवियों की कल्पना ऊँची उड़ान लेने लगती है। चाहकर भी प्रकृति की सुंदरता से आँखें हटाने की इच्छा नहीं होती। नैसर्गिक सुंदरता के प्रति मन बँधकर रह जाता है। जगह-जगह रंग-बिरंगे और सुगंधित फूलों की शोभा दिखाई देने लगती है।

प्रश्न 3.
‘अट नहीं रही’ कविता में विद्यमान रहस्यवादिता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
निराला जी को प्रकृति के कण-कण में परमात्मा की अज्ञात सत्ता दिखाई देती है। वे उसका रहस्य जानना चाहते हैं; पर जान नहीं पाते। उन्हें यह तो प्रतीत होता है कि प्रकृति के परिवर्तन के पीछे कुछ-न-कुछ अवश्य है। वह ईश्वर ही हो सकता है, जो परिवर्तन का कारण बनता है।

कहीं साँस लेते हो,
घर-घर भर देते हो,
उड़ने को नभ में तुम
पर-पर कर देते हो,
आँख हटाता हूँ तो
हट नहीं रही है।

कवि निराला को प्रकृति के कण-कण में ईश्वरीय सत्ता की छवि के दर्शन होते हैं। उन्हें प्रकृति के आँचल में छिपे उसी परमात्मा का रूप दिखाई देता है।

प्रश्न 4.
कवि ने बादलों की सुंदरता के लिए क्या उपमान चुना है?
उत्तर :
कवि ने बादलों की सुंदरता के लिए उन्हें सुंदर काले धुंघराले बालों के समान माना है, जो बालकों की अबोध कल्पना के समान पाले गए हैं। बादलों के अंतर में छिपी बिजली चमक-चमककर उनकी शोभा को और भी अधिक आकर्षक बना देती है।

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प्रश्न 5.
बादल से मानव जीवन को क्या प्रेरणा मिलती है?
उत्तर :
कवि ने बादलों को मानव जीवन को हरा-भरा बनाने वाला मानते हुए मनुष्य को सामाजिक क्रांति के लिए प्रेरित किया है। जैसे बादल सबको समान रूप से वर्षा का जल देकर उनकी प्यास बुझाते हैं तथा धरती को अन्न उपजाने योग्य बनाकर मानव-मात्र को सुख प्रदान करते हैं, वैसे ही वह मानव को भी सामाजिक जीवन में विषमताएँ दूर कर सुख व समृद्धिपूर्ण जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है।

प्रश्न 6.
उत्साह किस प्रकार की कविता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
उत्साह एक आह्वान गीत है। इस गीत में कवि ने बादलों को संबोधित किया है और उनके माध्यम से अपने मन के भावों को प्रकट किया है। कवि ने बादलों को जीवनदाता तथा प्रेरणादायक माना है। कवि ने बादलों को बालकों की अबोध कल्पना के समान माना है।

प्रश्न 7.
निराला के काव्य में वेदना एवं करुणा की अनुभूति होती है, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
वेदना, दुख एवं करुणा की अभिव्यक्ति छायावाद की एक प्रमुख विशेषता है। निराला जी ने वेदना एवं दुख को कई प्रकार से प्रकट किया है। इसका मूल हेतु जीवन की निराशा है।

तप्त धरा, जब से फिर
शीतल कर दो
बादल, गरजो!

सामाजिक विषमताओं को देखकर कवि निराला का मन खिन्न हो जाता है। उसके मन में वेदना और निराशा के भाव भर जाते हैं।

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प्रश्न 8.
कवि निराला ने ‘उत्साह’ कविता में प्रकृति पर चेतना का आरोप किया है, सिद्ध कीजिए।
उत्तर :
निराला ने ‘उत्साह’ कविता में सर्वत्र चेतना का आरोप किया है। उन्होंने प्रकृति का मानवीकरण किया है। उनकी दृष्टि में बादल चेतना है। वे बादल से कहते हैं कि –

बादल, गरजो!
घेर घेर घोर गगन, धाराधर
ओ!
ललित ललित, काले धुंधराले
बाल कल्पना के-से पाले।

प्रश्न 9.
निराला ने अपने भावों को कैसे और किस माध्यम से प्रकट किया है?
उत्तर :
कवि ने नवजीवन और नई कविता के संदर्भो में विचार करते हुए बादलों के माध्यम से अपने मन के भावों को प्रकट किया है। वे नई चेतना एवं जागृति लाना चाहते हैं; प्रकृति का सहारा लेकर जनजागरण करना चाहते हैं।

प्रश्न 10.
कवि ने ‘उत्साह’ कविता में बादलों का कैसा रूप-सौंदर्य दिखाया है?
उत्तर :
कवि ने ‘उत्साह’ त्रित करते हुए उन्हें घना तथा प को काले बादल ऐसे लगते हैं, जैसे किसी बच्चे के काले धुंघराले बाल हों। कवि को बादलों का रूप-रंग भी बच्चों के बालों के समान दिखाई पड़ता है।

प्रश्न 11.
मनुष्य के मन पर फागुन की मस्ती का क्या प्रभाव दिखाई देता है?
उत्तर :
फागुन अपने आप में अत्यंत रंगीन तथा आकर्षक दिखाई देता है। उसकी मस्ती अनूठी है, जिससे मनुष्य का मन हर्षित
तथा प्रसन्नचित्त रहता है। इसके कारण उसके मन में खुशी का संचार होता है। उसका मन दूर नील मान में उड़ने को छ का रहता है। फागुन की सुंदरता उसे अपनी ओर इतना अधिक आकर्षित करती है कि वह चाहकर भी अपना ध्यान दूसरी ओर नहीं कर पता।

पठित काव्यांश पर आधारित बहुविकल्पी प्रश्न –

दिए गए काव्यांशों को पढ़कर पूछे गए बहुविकल्पी प्रश्नों के उचित विकल्प चुनकर लिखिए –

1. विकल विकल, उन्मन थे उन्मन
विश्व के निदाघ के सकल जन,
आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन!
तप्त धरा, जल से फिर
शीतल कर दो –
बादल, गरजो!

(क) प्रस्तुत काव्यांश में कवि ने किसका आह्वान किया है?
(i) लोगों का
(ii) विश्व का
(iii) बादलों का
(iv) दिशाओं का
उत्तर :
(iii) बादलों का

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(ख) विकल और उन्मन कौन थे?
(i) बादल-नभ
(ii) प्रकाश-तारा
(iii) धरा-जल
(iv) विश्व-जन
उत्तर :
(iv) विश्व-जन

(ग) बादल किसका प्रतीक हैं?
(i) क्रांति और नवचेतना के
(ii) भीषण गरमी के
(iii) दुखीं धरा के
(iv) शीतल नभ के
उत्तर :
(i) क्रांति के नवचेतना के

(घ) प्रस्तुत काव्यांश किस कविता से लिया गया है?
(i) फ़सल
(ii) अट नहीं रही है
(iii) बादल
(iv) उत्साह
उत्तर :
(iv) उत्साह

(ङ) कवि ने ‘निदाघ’ से किस ओर संकेत किया है?
(i) तप्त धरा
(ii) सांसारिक सुखों
(iii) सांसारिक दुखों
(iv) भीषण गरमी
उत्तर :
(iii) सांसारिक दुखों

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2. कहीं साँस लेते हो,
पत्तों से लदी डाल
घर-घर भर देते हो,
कहीं हरी, कहीं लाल,
उड़ने को नभ में तुम
कहीं पड़ी है उर में
पर-पर कर देते हो,
मंद-गंध-पुष्प-माल
आँख हटाता हूँ तो
पाट-पाट शोभा-श्री
हट नहीं रही है।
पट नहीं रही है।

(क) कविता में किस माह के सौंदर्य का चित्रण है?
(i) पौष
(ii) फागुन
(iii) चैत्र
(iv) वैशाख
उत्तर :
(ii) फागुन

(ख) पत्तों से लदी डाल पर किन रंगों की छटा बिखरी हुई है?
(i) लाल-पीली
(ii) लाल-हरी
(iii) हरी-पीली
(iv) लाल-नीली
उत्तर :
(ii) लाल-हरी

(ग) कवि का साँस लेने से क्या तात्पर्य है?
(i) जीवित होना
(ii) सुगंध फैलाना
(iii) सुगंधित पवन का चलना
(iv) पत्तों का हिलना
उत्तर :
(iii) सुगंधित पवन का चलना

(घ) कवि की आँख कहाँ से हट नहीं रही?
(i) फागुन का सुंदरता से
(ii) नीले आसमान से
(iii) तेज़ सूरज से
(iv) शीतल चाँद से
उत्तर :
(i) फागुन का सुंदरता से

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(ङ) प्रस्तुत कविता के कवि कौन हैं?
(i) प्रसाद
(ii) दिनकर
(iii) निराला
(iv) जायसी
उत्तर :
(iii) निराला

काव्यबोध संबंधी बहुविकल्पी प्रश्न –

काव्य पाठ पर आधारित बहुविकल्पी प्रश्नों के उत्तर वाले विकल्प चुनिए –

(क) बादलों को किसके समान सुंदर कहा गया है?
(i) सफ़ेद बालों के समान
(ii) भूरे बालों के समान
(iii) काले-घुघराले बालों के समान
(iv) बच्चों के समान
उत्तर :
(iii) काले-धुंघराले बालों के समान

(ख) कवि ने बादलों के माध्यम से किसका आह्वान किया है?
(i) समृद्धि का
(ii) आपदा का
(iii) सामाजिक क्रांति व नवचेतना का
(iv) वर्षा का
उत्तर :
(iii) सामाजिक क्रांति व नवचेतना का

(ग) ‘अट नहीं रही है’ कविता में पाट-पाट पर क्या बिखरा है?
(i) कण
(ii) ओस
(iii) बादल
(iv) शोभा-श्री
उत्तर :
(iv) शोभा-श्री

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(घ) कवि ने बादल को क्या कहा है?
(i) विद्युतमय
(ii) वज्रमय
(iii) कल्पनामय
(iv) (i) और (ii) दोनों
उत्तर :
(iii) कल्पनामय

सप्रसंग व्याख्या, अर्थग्रहण संबंधी एवं सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. उत्साह

बादल, गरजो!
घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ!
ललित ललित, काले घुघराले,
बाल कल्पना के-से पाले,
विद्युत-छवि उर में, कवि, नवजीवन वाले!
वज्र छिपा, नूतन कविता
फिर भर दो –
बादल, गरजो! विकल विकल, उन्मन
थे उन्मन विश्व के निदाघ के सकल जन,
आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन!
तप्त धरा, जल से फिर
शीतल कर दो –
बादल, गरजो!

शब्दार्थ : गगन – आकाश। धाराधर – मूसलाधार, लगातार। ललित – सुंदर। विद्युत-छवि – बिजली की चमक (शोभा)। उर – हृदय, भीतर। कवि – स्रष्टा। विकल – व्याकुल। उन्मन – अनमना, उदास। निदाघ – गरमी का ताप। तप्त – गर्म। धरा – पृथ्वी! अनंत – आकाश।

प्रसंग : प्रस्तुत कविता ‘उत्साह’ हमारी पाठ्य-पुस्तक क्षितिज (भाग-2) में संकलित की गई है, जिसके रचयिता सप्रसिदध छायावादी कवि श्री सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं। कवि ने अपनी कविता में बादलों का आह्वान किया है कि वे पीड़ित-प्यासे लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करें। उन्होंने बादलों को नए अंकुर के लिए विध्वंस और क्रांति चेतना को संभव करने वाला भी माना है।

व्याख्या : कवि बादलों से गरज-बरस कर सारे संसार को नया जीवन देने की प्रेरणा देते हुए कहता है कि बादलो! तुम गरजो। तुम सारे आकाश को घेरकर मूसलाधार वर्षा करो; घनघोर बरसो। हे बादलो! तुम अत्यंत सुंदर हो। तुम्हारा स्वरूप सुंदर काले घुघराले बालों के समान है तथा तुम अबोध बालकों की मधुर कल्पना के समान पाले गए हो। तुम हृदय में बिजली की शोभा धारण करते हो। तुम नवीन सृष्टि करने वाले हो।

तुम जलरूपी नया जीवन देने वाले हो और तुम्हारे भीतर वज्रपात करने की अपार शक्ति छिपी हुई है। तुम इस संसार को नवीन प्रेरणा और जीवन प्रदान कर दो। बादलो! तुम गरजो और सबमें नया जीवन भर दो। गरमी के तेज ताप के कारण धरती के सारे लोग बहुत ल्याकुल और बेचैन हैं, वे उदास हो रहे हैं। अरे बादलो! तुम सीमाहीन आकाश में पता नहीं किस ओर से आकर सब तरफ़ फैल गए हो। तुम इस गरमी के ताप से तपी हुई धरती को बरसकर शीतलता प्रदान करो। हे बादलो! तुम गरज-गरज कर बरसो और फिर धरती को शीतल करो!

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. कविता में निहित भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
2. कवि ने किसका आह्वान किया है और क्यों?
3. बादलों को किसके समान संदर माना गया है ?
4. बादल किसकी कल्पना के समान पाले गाए हैं ?
5. बादलों के हृदय में किस प्रकार की शोभा छिपी हुई है?
6. बादल मानव-जीवन और कवि को क्या प्रदान करते हैं ?
7. धरती के लोग किस कारण व्याकुल और बेचैन थे?
8. बादल कहाँ छा जाते हैं ?
9. कवि बादलों से बरसकर क्या करने को कहता है ?
उत्तर :
1. कवि ने प्यास और पीड़ित लोगों के कष्टों को दूर कर उनकी इच्छाओं-आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बादलों का आग्रह भा आहवान किया है ! साथ-ही-साथ उसने बादलों को नई कल्पना और नए अंकुर के लिए विध्वंस, विप्लव और क्रांति चेतना को संपन्न करने वाला माना है। बादल ही धरती को हरा-भरा बनाते हैं और कवि को कविता लिखने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।
2. कवि ने बादलों का आह्वान किया है, ताकि वे अपने जल से धरती तथा सारे संसार को नया जीवन प्रदान करें।
3. बादलों को काले धुंघराले बालों के समान सुंदर माना गया है।
4. बादल अबोध बालकों की कल्पना के समान पाले गए हैं।
5. बादलों के हृदय में बिजली की शोभा छिपी हुई है, जो समय-समय पर जगमगाकर प्रकट हो जाती है।
6. बादल मानव-जीवन और कवि को नवीन प्रेरणा व जीवन प्रदान करते हैं।
7. धरती के लोग गरमी के ताप के कारण व्याकुल और बेचैन थे।
8. बादल न जाने सीमाहीन आकाश के किस कोने से आकर सब ओर छा गए थे।
9. कवि बादलों से बरसकर गरमी के ताप से तपी धरती को शीतलता प्रदान करने को कहता है।

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सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. कवि ने बादलों के माध्यम से किस प्रकार प्रतीकात्मकता को प्रस्तुत किया है ?
2. किस बोली का प्रयोग किया गया है।
3. किस प्रकार की शब्दावली का अधिक से प्रयोग किया गया है?
4. किस छंद का प्रयोग किया गया है?
5. किस शब्द-शक्ति का प्रयोग है?
6. प्रयुक्त काव्य-गुण का नाम लिखिए।
7. प्रयुक्त बिंब कौन-सा है?
8. कविता में प्रयुक्त किन्हीं दो तद्भव शब्दों को लिखिए।
9. कविता में प्रयुक्त किन्हीं दो तत्सम शब्दों को लिखिए।
10. कविता हिंदी साहित्य की किस काव्यधारा से संबंधित है?
11. शैली का नाम लिखिए।
12. कविता में प्रयुक्त अलंकारों का निरूपण कीजिए।
उत्तर :
1. कवि ने बादलों के माध्यम से सामाजिक क्रांति का आहवान किया है। बादल सृजन और संहार दोनों कर सकते हैं।
2. खड़ी बोली।
3. तत्सम शब्दावली की अधिकता है।
4. अतुकांत छंद का प्रयोग किया है, पर फिर भी लयात्मकता की सृष्टि हुई है।
5. लाक्षणिकता की विशेषता विद्यमान है।
6. ओज गुण विद्यमान है।
7. गतिशील चाक्षुक बिंब का प्रयोग है।
8. बादल, काले।
9. विधुत, ललित।
10. छायावाद।
11. आहवान शैली/संबोधन शैली।
12. अनुप्रास –

  • घेर घेर घोर गगन
  • ललित ललित
  • बाल कल्पना के-से पाले

मानवीकरण –

  • बादल गरजो!
  • घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ!

पुनरुक्ति प्रकाश –
घेर घेर, ललित ललित, विकल-विकला

उपमा –
बाल कल्पना के-से पाले

2. अट नहीं रही है।

अट नहीं रही है
आभा फागुन की तन
सट नहीं रही है।
कहीं साँस लेते हो,
घर-घर भर देते हो,
उड़ने को नभ में तुम
पर-पर कर देते हो,
आँख हटाता हूँ तो
हट नहीं रही है।
पत्तों से लदी डाल
कहीं हरी, कहीं लाल,
कहीं पड़ी है उर में
मंद-गंध-पुष्प-माल,
पाट-पाट शोभा-श्री
पट नहीं रही है।

शब्दार्थ : अट – समाना, प्रविष्ट। आभा – चमक, सौंदर्य। नभ – आकाश। उर – हृदय। मंद – धीमी। पुष्प-माल – फूलों की माला। पाट-पाट -जगह-जगह। शोभा-श्री – सौंदर्य से भरपूर। पट – समा नहीं रही है।

प्रसंग : प्रस्तुत कविता हमारी पाठ्य-पुस्तक क्षितिज (भाग-2) में संकलित है, जिसके रचयिता छायावादी काव्यधारा के प्रमुख कवि श्री सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं। इसे मूल रूप से उनकी काव्य-रचना ‘राग-विराग’ में संकलित किया गया है। कवि ने इसमें फागुन की मादकता को प्रकट किया है, जिसकी सुंदरता और उल्लास सभी दिशाओं में फैला हुआ है।

व्याख्या : कवि कहता है कि फागुन की यह सुंदरता शरीर में किसी भी से प्रकार समा नहीं पा रही है। वह प्रकृति के कण-कण से फूट रही है। अपने रहस्यवादी भावों को प्रकट करते हुए कवि कहता है कि हे प्रिय! पता नहीं तुम कहाँ बैठकर अपनी साँस के द्वारा प्रकृति के कोने-कोने को सुगंध से भर रहे हो। तुम कल्पना के आकाश में ऊँचा उड़ने तुम्हारी के लिए मन को पंख प्रदान करते हो। तुम मन में तरह-तरह की कल्पनाओं को जन्म देते हो। सब तरफ़ तुम्हारी सुंदरता ही व्याप्त है।

वह अत्यधिक आकर्षक और सुंदर है। कवि कहता है कि मैं उसकी ओर से अपनी आँख हटाना चाहता हूँ, पर वह वहाँ से हट नहीं पा रही। इस सुंदरता में मन बँधकर रह गया है। पेड़ों की सभी डालियाँ पत्तों से पूरी तरह से लद गई हैं। कहीं तो पत्ते हरे हैं और कहीं कोंपलों में लाली छाई है। उनके बीच सुंदर-सुगंधित फूल खिल रहे हैं। ऐसा लगता है कि उनके कंठों में सुगंध से भरे फूलों की मालाएँ पड़ी हैं। हे प्रिय! तुम जगह-जगह शोभा के वैभव को कूट-कूटकर भर रहे हो पर वह अपनी पुष्पलता के कारण उसमें समा नहीं पा रही और चारों ओर बिखरी पड़ी है।

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अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. कवि में निहित भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
2. कवि ने अपनी कविता में किसे अपनी बात कहनी चाही है?
3. कवि ने किस महीने की सुंदरता का वर्णन किया है?
4. कवि के प्रिय किसे और किसके द्वारा सुगंध से आपूरित कर देते हैं ?
5. कवि को मन के पंख क्यों प्रदान किए गए हैं ?
6. चारों ओर किसका सौंदर्य व्याप्त है ?
7. कवि किसकी ओर से अपनी आँख नहीं हटा पाता और क्यों ?
8. पेड़-पौधों की डालियाँ किस प्रकार के पत्तों से लद गई हैं ?
9. वन के वैभव में कूट-कूटकर क्या भरा हुआ है ?
10. कविता के शिल्प-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
1. कवि ने फागुन महीने की अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन किया है, जिसे देखकर कवि के हृदय में अनेक कल्पनाओं का जन्म होता है। कवि के अनुसार ईश्वर की रहस्यमयी शोभा सब तरफ़ व्याप्त है।
2. कवि ने कविता में रहस्यवादी भाव प्रकट करते हुए अपने प्रियतम से अपनी बात कहनी चाही है।
3. कवि ने फागुन के महीने की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन किया है।
4. कवि के प्रिय अपनी श्वास से प्रकृति के कोने-कोने को सुगंध से आपूरित कर देते हैं।
5. कवि के मन को उसके प्रियतम द्वारा पंख इसलिए प्रदान किए गए, ताकि वह कल्पना के आकाश में स्वतंत्रतापूर्वक ऊँचा उड़ सके।
6. चारों ओर प्रकृति का सौंदर्य व्याप्त है।
7. कवि अपने चारों ओर फैले परमात्मा के सौंदर्य से आँख नहीं हटा पाता। उसका मन नैसर्गिक सौंदर्य में बँधकर रह गया है।
8. पेड़-पौधों की डालियाँ हरे-भरे पत्तों और नई-नई लाल कोंपलों से लद गई हैं।
9. वन के वैभव में शोभा और सौंदर्य कूट-कूटकर भरा हुआ है।
10. खड़ी बोली में रचित इस कविता में तत्सम और तद्भव शब्दावली का अधिक प्रयोग किया गया है। प्रसाद गुण का प्रयोग है। अतुकांत छंट है। विशेषोक्ति, असंगति, पुनरुक्ति प्रकाश, रूपक, पदमैत्री और स्वाभावोक्ति अलंकारों का सहज प्रयोग सराहनीय है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 5 उत्साह और अट नहीं रही

सिौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. कवि ने किस प्रकार की भावना को व्यक्त किया है?
2. कविता में किस सुंदर छटा को मुखरित किया गया है?
3. भाषा में कौन-सा गुण विद्यमान है?
4. किस छंद का प्रयोग किया है ?
5. किस शब्द-शक्ति ने कवि के कथन को गहनता-गंभीरता प्रदान की है?
6. काव्य-गुण लिखिए।
7. किस बोली का प्रयोग किया गया है?
8. किस प्रकार के शब्दों का अधिक प्रयोग है?
9. दो तद्भव शब्द लिखिए।
10. एक मुहावरे का उल्लेख कीजिए।
11. अलंकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
1. कवि ने रहस्यवादी भावना को प्रकट किया है। उसे सब दिशाओं में फागुन की सुंदरता और उल्लास समान रूप से फैला हुआ प्रतीत होता है।
2. प्रकृति की सुंदर छटा मुखरित हुई है।
3. भाषा में गेयता का गुण विद्यमान है।
4. अतुकांत छंद का प्रयोग है।
5. लाक्षणिकता के प्रयोग ने कवि के कथन को गहनता-गंभीरता प्रदान की है।
6. प्रसाद गुण विद्यमान है।
7. खड़ी बोली।
8. तत्सम शब्दावली की अधिकता है।
9. माँस, आँख।
10. पट जाना, अट जाना।
11. अनुप्रास –

  • नहीं रही है
  • घर-घर भर
  • पर-पर कर
  • पाट-पाट
  • शोभा-श्री

विशेषोक्ति –

  • आँख हटाता हूँ तो
  • हट नहीं रही है।

पुनरुक्ति प्रकाश –
घर-घर, पर-पर, पाट-पाट

मानवीकरण –

  • कहीं साँस लेते हो
  • घर-घर भर देते हो
  • उड़ने को नभ में तुम
  • पर-पर कर देते हो।

उत्साह और अट नहीं रही Summary in Hindi

कवि-परिचय :

हिंदी साहित्य जगत में ‘महाप्राण निराला’ नाम से प्रसिद्ध सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म सन 1899 ई० में बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषादल नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता रामसहाय त्रिपाठी उत्तर-प्रदेश के उन्नाव जिले के गाँव गढ़ाकोला के निवासी थे। वे तत्कालीन महिषादल रियासत में कोषाध्यक्ष थे। जब निराला जी तीन वर्ष के थे, तो इनकी माता का देहावसान हो गया था।

इनकी अधिकांश शिक्षा घर पर ही हुई। इन्होंने बाँग्ला, संस्कृत, अंग्रेजी, हिंदी आदि में रचित साहित्य का गहन अध्ययन किया था। पारिवारिक उत्तरदायित्वों को वहन करने के लिए इन्होंने महिषादल रियासत में नौकरी प्रारंभ की, किंतु कुछ कारणों से त्याग-पत्र देकर वहाँ से चले आए। कुछ समय तक वे रामकृष्ण मिशन कलकत्ता (कोलकाता) के पत्र ‘समन्वय’ का संपादन करते रहे।

बाद में इन्होंने ‘मतवाला’ पत्रिका का संपादन भी किया। 15 अगस्त 1961 ई० को इनका देहावसान हो गया। निराला जी अत्यंत उदार, स्वाभिमानी, अध्ययनशील, प्रकृति-प्रेमी तथा त्यागी व्यक्ति थे। वे स्वयं संगीत-प्रेमी थे। अतिथि-सत्कार करने में वे अत्यंत संतोष का अनुभव करते थे। वे विद्रोही प्रवृत्ति तथा पुरातन में नवीनता का समावेश करने वाले साहित्यकार थे।

रचनाएँ – निराला जी बहमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। इन्होंने गद्य और पद्य दोनों में लिखा। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं –

काव्य रचनाएँ-अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नए पत्ते, अपरा, अराधना, अर्चना, तुलसीदास, सरोज स्मृति, राम की शक्ति-पूजा, राग-विराग, वर्षा गीत आदि।
उपन्यास – अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरूपमा, चोटी की पकड़, काले कारनामे, चमेली आदि।
कहानी संग्रह – लिली, सखी, चतुरी चमार तथा सुकुल की बीबी।
रेखाचित्र-कुल्ली भाट और बकरिहा।
निबंध संग्रह – प्रबंध पद्य, प्रबंध प्रतिमा, चाबुक, प्रबंध परिचय एवं रवींद्र कविता कानन।
जीवनियाँ – ध्रुव, भीष्म तथा राणा प्रताप।

अनुवाद – आनंदपाठ, कपाल कुंडला, चंद्रशेखर, दुर्गेश नंदिगी, कृष्णकांत का विल, युगलांगुलीय, रजनी, देवी चौधरानी, राधा रानी, विष वृक्ष, राजसिंह, महाभारत आदि। साहित्यिक विशेषताएँ-निराला जी हिंदी की छायावादी कविता के आधार-स्तंभ माने जाते हैं, किंतु इनकी कविता में छायावाद के अतिरिक्त प्रगतिवादी तथा प्रयोगवादी कविता की विशेषताएँ भी परिलक्षित होती हैं। इनके काव्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. वैयक्तिकता – छायावादी कवियों के समान निराला के काव्य में भी वैयक्तिकता की अभिव्यक्ति है। जूही की कली, हिंदी के सुमनों के प्रति, मैं अकेला, राम की शक्ति-पूजा, विफल वासना, स्नेह निर्झर बह गया है, सरोज-स्मृति आदि अनेक कविताओं में हमें निराला की वैयक्तिक भावना की सफल अभिव्यक्ति मिलती है।

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2. निराशा, वेदना, दुखवाद एवं करुणा की विवृत्ति-छायावादी कवि वेदना एवं दुख को जीवन का सर्वस्व मानते हैं। निराला जी ने वेदना एवं दुखवाद को कई प्रकार से प्रकट किया है। इसका मूल हेतु जीवन की निराशा है –

“दिए हैं मैंने जगत को फूल फल, किया है अपनी प्रभा से चकित-चल,
यह अनश्वर था सफल पल्लवित तल, ठाट जीवन का वही जो ढह गया है।”

सामाजिक विषमताओं को देखकर कवि निराला का मन खिन्न हो जाता है। उनके मन में वेदना और निराशा के भाव भर जाते हैं।

3. प्रकृति-चित्रण-निराला ने प्रकृति पर सर्वत्र चेतना का आरोप किया है। उनकी दृष्टि में बादल, प्रपात, यमुना-सभी कुछ चेतना है। वे यमुना से पूछते हैं –

“तू किस विस्मृत की वीणा से, उठ उठ कर कातर झंकार।
उत्सुकता से उकता-उकता, खोल रही स्मृति के दृढ़ द्वार?”

4. मानवतावादी जीवन-दर्शन – निराला के काव्य में मानवतावादी जीवन-दर्शन की अभिव्यक्ति हुई है। बादल राग’ में कवि समाज की विषमता से पीड़ित होकर कहता है –

“विप्लव रव से छोटे ही हैं शोभा पाते।
अट्टालिका नहीं है रे, आतंक भवन।”

‘तोड़ती पत्थर’ तथा ‘भिक्षुक’ जैसी कविताओं में निराला जी ने मानव में छिपे हुए देवता का दर्शन किया है। यथा –

“ठहरो अहो मेरे हृदय में है अमृत, मैं सींच दूंगा
अभिमन्यु जैसे हो सकोगे तुम।”

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5. नारी का विविध एवं नवीन रूपों में चित्रण – नारी के प्रति उनके हृदय में गहरी सहानुभूति है। कहीं वह जीवन की सहचरी एवं प्रेयसी है और कहीं उन्हें वह प्रकृति में व्याप्त होकर अलौकिक भावों से अभिभूत करती हुई दिखाई देती है। कहीं वे उसके दिव्यदर्शन की झलक पाते हैं और कहीं नारी को लक्ष्य करके वे कवि प्रेमोन्माद की अस्फुट मनोवृत्ति का चित्रण करते हैं। ‘तोड़ती पत्थर’ कविता में ‘मज़दूरिनी’ के प्रति गहरी सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए निराला यह लिखना नहीं भूलते हैं कि –

“श्याम तन, भर बंधा यौवन…,
देख मुख उस दृष्टि से…,
ढुलक माथे से गिरे सीकर।”

6. सामाजिक चेतना – निराला जी चाहते हैं कि समाज का प्रत्येक प्राणी सुखी हो। निराला ने अपने प्रसिद्ध वंदना गीत ‘वीणा वादिनी वर दे’ में प्रार्थना की है कि मानव-समाज में नवीन शक्तियों का आविर्भाव हो, जिससे प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य का पालन कर सके। निराला ने अपनी पैनी दृष्टि से समाज के सच्चे रूप को देखा था और अपने गरीब जीवन को सहा था।

7. देश-प्रेम की अभिव्यक्ति – देश के सांस्कृतिक पतन की ओर निराला जी ने बड़ी ओजस्विनी भाषा में इंगित किए हैं। इनका कहना है कि देश के भाग्याकाश को विदेशी शासक के राहू ने ग्रस रखा है। वे चाहते हैं कि किस प्रकार देश का भाग्योदय हो और भारतीय जन-मन आनंद-विभोर हो उठे। भारती वंदना, जागो फिर एक बार, तुलसीदास, छत्रपति शिवाजी का पत्र आदि कविताओं में निराला जी ने देश-भक्ति के भाव प्रकट किए हैं।

8. विद्रोह का स्वर एवं स्वच्छंदता – अन्य छायावादी कवियों की अपेक्षा निराला जी कहीं अधिक विद्रोही एवं स्वच्छंदता के प्रेमी थे। वस्तुतः वे जीवनपर्यंत विद्रोह एवं संघर्ष ही करते रहे। अपनी संस्कृति का दंभ भरने वालों को ललकारते हुए निराला जी ने लिखा है-‘हज़ार वर्ष से सलाम ठोकते-ठोकते नाक में दम हो गया, अपनी संस्कृति लिए फिरते हैं। ऐसे लोग संसार की तरफ़ से आँखें बंदकर अपने ही विवर में व्याघ्र बन बैठे रहते हैं। अपनी ही दिशा में ऊँट बनकर चलते हैं।’

9. कला पक्ष-निराला जी ने अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए जिस छंद को चुना है, उसे मुक्त छंद कहा जाता है। काव्य के कला पक्ष के अंतर्गत हम मुक्तक छंद को निराला की सबसे बड़ी देन कह सकते हैं। निराला की भाषा की प्रमुख विशेषताएँ कोमलता, शब्दों की मधुर योजना, भाषा का लाक्षणिक प्रयोग, संगीतात्मकता, चित्रात्मकता, प्रकृतिजन्य प्रतीकों की प्रचुरता आदि हैं। निराला को संगीत शास्त्र का अच्छा ज्ञान था। वे स्वयं भी अच्छे गायक थे। उनकी कविता में संगीतात्मकता का सुंदर निर्वाह मिलता है।

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कविता का सार :

करते हुए निराला जी ने बादलों के माध्यम से अपने भावों को प्रकट किया है। कविता में बादल एक ओर भूखे-प्यासे और पीड़ित लोगों की इच्छाओं-आकांक्षाओं को पूरा करते दिखाए गए हैं, तो दूसरी ओर उसे नए अंकुर के लिए विध्वंस, विप्लव और क्रांति की चेतना को वाले तत्व के रूप में प्रस्तुत किया है। कवि ने जीवन को व्यापक और समग्र दृष्टि से देखते हुए अपने मन की कल्पना और क्रांति चेतना की ओर ध्यान दिया है। साहित्य की सामाजिक परिवर्तन में सदा ही महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है।

कवि बादलों से गरज-गरजकर : बरसने की बात कहता है। सुंदर और काले बादल अबोध बालकों की कल्पना के समान हैं। वे नई सृष्टि की रचना करते हैं। उनके भीतर वज्रपात की शक्ति छिपी हुई है। कवि बादलों का आह्वान करता है कि वे बरसकर गरमी के ताप से तपी हुई धरती को शीतलता प्रदान करें। अट नहीं रही है-निराला जी ने अपनी इस रहस्यवादी कविता में फागुन मास की मादकता का सुंदर चित्रण किया है। जब व्यक्ति के मन में प्रसन्नता हो, तो हर तरफ़ फागुन की सुंदरता और उल्लास भरा रूप ही दिखाई देता है।

कवि को सारी प्रकृति में सुंदरता फूटती-सी प्रतीत होतो है; उसके कोने-कोने में सुगंध प्रतीत होती है। इससे मन में तरह-तरह की लेती हैं। वनों के सभी पेड़ नए-नए पत्तों से लद गए हैं। वे पत्ते कहीं हरे हैं, तो कहीं केवल कोंपलों के रूप में लाल हैं। उनके बीच में सुगंधित फूल खिल रहे हैं। सारे वन का वैभव अति आकर्षक और मधुर है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 17 कारतूस

Jharkhand Board JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 17 कारतूस Textbook Exercise Questions and Answers.

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JAC Class 10 Hindi कारतूस Textbook Questions and Answers

मौखिक निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए –

प्रश्न 1.
कर्नल कालिंज का खेमा जंगल में क्यों लगा हुआ था?
उत्तर :
कर्नल कालिंज ने वज़ीर अली को पकड़ने के लिए जंगल में खेमा लगाया हुआ था।

प्रश्न 2.
वज़ीर अली से सिपाही क्यों तंग आ चुके थे?
उत्तर :
वज़ीर अली की तलाश में जंगल में खेमा लगाए हुए कई दिन बीत चुके थे, किंतु वजीर अली पकड़ में नहीं आ रहा था। इसी कारण सिपाही वज़ीर अली से तंग आ गए थे।

प्रश्न 3.
कर्नल ने सवार पर नज़र रखने के लिए क्यों कहा?
उत्तर :
कर्नल को सवार पर शक था। इसी कारण उसने सिपाहियों से सवार पर नज़र रखने के लिए कहा।

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प्रश्न 4.
सवार ने क्यों कहा कि वज़ीर अली की गिरफ्तारी बहुत मुश्किल है?
उत्तर :
सवार वास्तव में वज़ीर अली था। वह एक जाँबाज सिपाही था और वह जानता था कि उसे गिरफ्तार करना आसान नहीं है। इसी
कारण उसने कहा कि वज़ीर अली को गिरफ्तार करना बहुत मुश्किल है।

लिखित –

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए –

प्रश्न 1.
वज़ीर अली के अफ़साने सुनकर कर्नल को राँबिनहुड की याद क्यों आ जाती थी ?
उत्तर :
वज़ीर अली और रॉबिनहुड में काफ़ी समानता थी। वज्तीर अली भी रॉंबिनहुड के समान दिलेर और निडर था। रॉबिनहुड अमीरों को लूटकर गरीबों में धन बाँटा करता था और वज़ीर अली अपने देशवासियों को आज़ाद करवाने के लिए प्रयास कर रहा था। रॉबिनहुड की वीरता और साहस के समान वज़ीर अली की वीरता और साहस भी प्रसिद्ध था। इसी कारण वज़ीर अली के कारनामे सुनकर कर्नल को रॉंबिनहुड की याद आ जाती थी।

प्रश्न 2.
सआदत अला का सआदत अली कौन था? उसने वज़ीर अली की पैदाइश को अपनी मौत क्यों समझा ?
उत्तर :
सआदत अली अवध के नवाब आसिफ़उद्दौला का भाई था। वज़ीर अली आसिफ़उद्दौला का पुत्र था। सआदत अली अपने भाई के साथ गद्दारी करके अंग्रेजों के साथ मिल गया था। जब वज़ीर अली का जन्म हुआ था, उसे आभास हो गया कि वह अवश्य उसे मार डालेगा। इसलिए वह वज़ीर अली की पैदाइश को अपनी मौत समझता था।

प्रश्न 3.
सआदत अली को अवध के तख्त पर बिठाने के पीछे कर्नल का क्या मकसद था?
उत्तर :
सआदत अली अंग्रेजों का मित्र बन गया था। वह ऐशो-आराम से जीवन जीने वाला व्यक्ति था। कर्नल चाहता था कि वह अवध के तख्त पर ऐसे व्यक्ति को बिठाए, जो ब्रिटिश सरकार को अच्छा-खासा पैसा दे। सआदत अली ऐसा ही व्यक्ति था। उसने अपनी आधी जायदाद और दस लाख रुपये नकद ब्रिटिश सरकार को दे दिए थे। इसी कारण कर्नल ने सआदत अली को अवध के तख्त पर बिठाया था।

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प्रश्न 4.
कंपनी के वकील का कत्ल करने के बाद वजीर अली ने अपनी हिफाजत कैसे की?
उत्तर :
बनारस में कंपनी के वकील का कत्ल करने के बाद वज़ीर अली आजमगढ़ की हिफाजत चला गया। इसके बाद आजमगढ़ के शासक की मदद से वह घागरा तक पहुँच गया। वह अपने कुछ साथियों के साथ वहाँ के जंगलों में छिप गया। उन जंगलों में उसे ढूँढ़ना सरल नहीं था। इस प्रकार उसने अपनी हिफाज़त की।

प्रश्न 5.
सवार के जाने के बाद कर्नल क्यों हक्का-बक्का रह गया?
उत्तर :
सवार वास्तव में वज़ीर अली था। जब उसने ब्रिटिश सेना के खेमे में जाकर कर्नल को मूर्ख बनाया और उससे दस कारतूस भी ले गया, तो कर्नल उसकी दिलेरी को देखकर हैरान रह गया। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई व्यक्ति इतना जाँबाज़ भी हो सकता है। कर्नल – वजीर अली के इस साहस और वीरता को देखकर हक्का-बक्का रह गया था।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए –

प्रश्न 1.
लेफ़्टीनेंट को ऐसा क्यों लगा कि कंपनी के खिलाफ़ सारे हिंदुस्तान में एक लहर दौड़ गई है?
उत्तर :
लेफ़्टीनेंट ने सुना था कि वज़ीर अली अफ़गानिस्तान के शासक शाहे- ज़मा को हिंदुस्तान पर आक्रमण करने का निमंत्रण दे रहा है, ताकि वह अंग्रेज़ी शासन की जड़ें हिला सके। कर्नल ने उसे बताया कि इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वज़ीर अली अफ़गानिस्तान के शासक को दिल्ली भी बुला चुका है। साथ ही बंगाल के नवाब का भाई शमसुद्दौला भी हिंदुस्तान के अंग्रेज़ी शासन पर आक्रमण करवाना चाहता है। इस प्रकार अवध से बंगाल तक सभी अंग्रेज़ी शासन को नष्ट करने का मन बना चुके हैं। इसी कारण लेफ़्टीनेंट को लगा कि कंपनी के खिलाफ़ सारे हिंदुस्तान में एक लहर दौड़ गई है।

प्रश्न 2.
वज़़ीर अली ने कंपनी के वकील का कत्ल क्यों किया ?
उत्तर :
यहाँ कंपनी से तात्पर्य ईस्ट इंडिया कंपनी से है। कंपनी ने अवध के नवाब वज़ीर अली को उसके पद से हटाकर बनारस पहुँचा दिया। कुछ समय बाद ब्रिटिश सरकार के गवर्नर जनरल ने वज़ीर अली को कलकत्ता (कोलकाता) बुलवाया। वज़ीर अली को इस प्रकार बुलवाया जाना उचित नहीं लगा। उसने कंपनी के वकील से इसकी शिकायत की। लेकिन वकील ने शिकायत पर ध्यान न देकर उसी को भला-बुरा कह दिया। वज़ीर अली अंग्रेज़ों से नफ़रत करता था। अतः जब वकील ने ऐसा दुर्व्यवहार किया, तो गुस्से में आकर वज़ीर अली ने उसका कत्ल कर दिया।

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प्रश्न 3.
सवार ने कर्नल से कारतूस कैसे हासिल किए ?
उत्तर :
कर्नल कालिंज वज़ीर अली को पकड़ने के लिए एक लेफ़्टीनेंट और कुछ सिपाहियों के साथ जंगल में खेमा लगाए हुए था। एक दिन उसे एक सवार खेमेमे की ओर आता दिखाई दिया। उस सवार ने उससे अकेले में बातचीत करने के लिए कहा। कर्नल ने इसे स्वीकार कर लिया। तब सवार ने कहा कि वह वज़ीर अली को गिरफ़्तार कर सकता है और उसके लिए उसे कुछ कारतूस चाहिए। कर्नल ने तुरंत उसे दस कारतूस दे दिए। वास्तव में वह सवार वज़ीर अली था। इस प्रकार उसने बड़ी चालाकी से कर्नल से कारतूस हासिल किए।

प्रश्न 4.
वज़ीर अली एक जाँबाज सिपाही था, कैसे ? स्पष्ट कीजिए।
अथवा
वज़ीर अली ने कर्नल को कैसे मात दी ?
उत्तर :
वज़ीर अली का एकमात्र उद्देश्य अंग्रेज़ों को भारत से बाहर निकालना था। उसकी वीरता और साहस के कारण अंग्रेज़ भी उससे डरते थे। उसने दिलेरी दिखाते हुए अंग्रेज़ बटालियन के खेमे में पहुँचकर वहाँ से कारतूस प्राप्त किए। उसकी निडरता को देखकर कर्नल कालिंज भी हक्का-बक्का रह गया। वज़ीर अली ने शक्तिशाली ईस्ट इंडिया कंपनी से सीधे टक्कर लेने का साहस दिखाया था। कर्नल कालिंज पर उसकी बहादुरी का इतना प्रभाव पड़ा कि उसके मुँह से शब्द ही नहीं निकल रहे थे। वह अपनी जान पर खेलकर साहसिक कारनामे करता था। इससे सिद्ध होता है कि वज़ीर अली एक जाँबाज सिपाही था।

(ग) निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए –

प्रश्न 1.
मुठ्ठी भर आदमी और ये दमखम।
उत्तर :
प्रस्तुत कथन कर्नल कालिंज का है। वह वज़ीर अली की बहादुरी और साहस के विषय में कहता है कि उसके पास मुट्ठी भर लोग हैं, किंतु वह शक्तिशाली ईस्ट इंडिया कंपनी से टक्कर ले रहा है। वह कंपनी के वकील को मार चुका है और अंग्रेज़ों को हिंदुस्तान से बाहर निकालने की कोशिश में लगा हुआ है। यद्यपि उसके साथ अधिक लोग नहीं हैं, फिर भी उसका साहस कम नहीं है। वह थोड़-से लोगों के साथ ही ब्रिटिश सरकार का मुकाबला करने को तैयार है।

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प्रश्न 2.
गर्द तो ऐसे उड़ रही है जैसे कि पूरा एक काफ़िला चला आ रहा हो मगर मुझे तो एक ही सवार नज़र आता है।
उत्तर :
प्रस्तुत कथन में कर्नल कालिंज घोड़े पर सवार वज़ीर अली को अपनी ओर आता देखकर कहता है कि उड़ती हुई धूल से ऐसा प्रतीत हो रहा है, मानो अनेक लोगों का समूह उनकी ओर बढ़ रहा है। धूल अधिक उड़ रही है, किंतु घुड़सवार केवल एक दिखाई दे रहा है। वास्तव में वह धूल वज़ीर अली के घोड़े के अधिक तेज़ दौड़ने के कारण उड़ रही थी।

भाषा-अध्ययन –

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का एक-एक पर्याय लिखिए –
खिलाफ़, पाक, उम्मीद, हासिल, कामयाब, वजीफ़ा, नफ़रत, हमला, इंतज़ार, मुमकिन
उत्तर :

  • खिलाफ़ = विरुद्ध
  • पाक = पवित्र
  • उम्मीद = आशा
  • हासिल = प्राप्त
  • कामयाब = सफल
  • वजीफ़ा = छात्रवृत्ति
  • नफ़रत = घृणा
  • हमला = आक्रमण
  • इंतज़ार = प्रतीक्षा
  • मुमकिन = संभव

प्रश्न 2.
निम्नलिखित मुहावरों का अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए-
आँखों में धूल झोंकना, कूट-कूट कर भरना, काम तमाम कर देना, जान बखा देना, हक्का-बक्का रह जाना।
उत्तर :
आँखों में धूल झोंकना – पुलिस की आँखों में धूल झोंककर चोर भाग गया।
कूट-कूट कर भरना – भगतसिंह में देशभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी।
काम तमाम कर देना – भारतीय सैनिकों ने अनेक शत्रु सैनिकों का काम तमाम कर दिया।
जान बखा देना – डाकू ने राहगीरों से रुपये तो लूट लिए, लेकिन उनकी जान बखा दी।
हक्का-बक्का रह जाना – रानी लक्ष्मीबाई की वीरता को देखकर अंग्रेज़ हक्के-बक्के रह गए।

प्रश्न 3.
कारक वाक्य में संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया के साथ संबंध बताता है। निम्नलिखित वाक्यों में कारकों को रेखांकित कर उनके नाम लिखिए –
(क) जंगल की जिंदगी बड़ी खतरनाक होती है।
(ख) कंपनी के खिलाफ़ सारे हिंदुस्तान में एक लहर दौड़ गई।
(ग) वज़ीर को उसके पद से हटा दिया गया।
(घ) फ़ौज के लिए कारतूस की आवश्यकता थी।
(ङ) सिपाही घोड़े पर सवार था।
उत्तर :
(क) जंगल की जिंदगी बडी खतरनाक होती है। – संबंध कारक
(ख) कंपनी के खिलाफ़ सारे हिंदुस्तान में एक लहर दौड़ गई। – संबंध कारक, अधिकरण कारक
(ग) वज़ीर को उसके पद से हटा दिया गया। – कर्म कारक, संबंध कारक, अपादान कारक
(घ) फ़ौज के लिए कारतूस की आवश्यकता थी। – संप्रदान कारक, कर्म कारक
(ङ) सिपाही घोड़े पर सवार था। – अधिकरण कारक

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प्रश्न 4.
क्रिया का लिंग और वचन सामान्यतः कर्ता और कर्म के लिंग और वचन के अनुसार निर्धारित होता है। वाक्य में कर्ता और कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार जब क्रिया के लिंग, वचन आदि में परिवर्तन होता है तो उसे अन्विति कहते हैं।
क्रिया के लिंग, वचन में परिवर्तन तभी होता है जब कर्ता या कर्म परसर्ग रहित हों;
जैसे-स सवार कारतूस माँग रहा था। (कर्ता के कारण)
सवार ने कारतुस माँगे। (कर्म के कारण)
कर्नल ने वज़ीर अली को नहीं पहचाना। (यहाँ क्रिया कर्ता और कर्म किसी के भी कारण प्रभावित नहीं है)
अतः कर्ता और कर्म के परसर्ग सहित होने पर क्रिया कर्ता और कर्म में से किसी के भी लिंग और वचन से प्रभावित नहीं होती वह एकवचन पुल्लिंग में ही प्रयुक्त होती है। नीचे दिए गए वाक्यों में ‘ने’ लगाकर उन्हें दुबारा लिखिए –
(क) घोड़ा पानी पी रहा था।
(ख) बच्चे दशहरे का मेला देखने गए।
(ग) रॉंबिनहुड गरीबों की मदद करता था।
(घ) देशभर के लोग उसकी प्रशंसा कर रहे थे।
उत्तर :
(क) घोड़े ने पानी पीया।
(ख) बच्चों ने दशहरे का मेला देखा।
(ग) रॉबिनहुड ने गरीबों की मदद की।
(घ) देशभर के लोगों ने उसकी प्रशंसा की।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्यों में उचित विराम-चिह्न लगाइए –
(क) कर्नल ने कहा सिपाहियो इस पर नज़र रखो ये किस तरफ़ जा रहा है
(ख) सवार ने पूछा आपने इस मुकाम पर क्यों खेमा डाला है इतने लावलश्कर की क्या ज़रूरत है
(ग) खेमे के अंदर दो व्यक्ति बैठे बातें कर रहे थे चाँदनी छिटकी हुई थी और बाहर सिपाही पहरा दे रहे थे एक व्यक्ति कह रहा था दुश्मन कभी भी हमला कर सकता है
उत्तर :
(क) कर्नल ने कहा, “सिपाहियो! इस पर नज़र रखो, ये किस तरफ़ जा रहा है?”
(ख) सवार ने पूछा, “आपने इस मुकाम पर क्यों खेमा डाला है? इतने लावलश्कर की क्या ज़रूरत है?”
(ग) खेमे के अंदर दो व्यक्ति बैठे बातें कर रहे थे। चाँदनी छिटकी हुई थी और बाहर सिपाही पहरा दे रहे थे। एक व्यक्ति कह रहा था, “दुश्मन कभी भी हमला कर सकता है।”

योग्यता-विस्तार –

प्रश्न 1.
पुस्तकालय से रॉबिनहुड के साहसिक कारनामों के बारे में जानकारी हासिल कीजिए।
उत्तर :
विद्यार्थी अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करें।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 17 कारतूस

प्रश्न 2.
वृंदावनलाल वर्मा की कहानी इब्राहिम गार्दी पढ़िए और कक्षा में सुनाइए।
उत्तर :
विद्यार्थी अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करें।

परियोजना-कार्य –

प्रश्न 1.
‘कारतूस’ एकांकी का मंचन अपने विद्यालय में कीजिए।
उत्तर :
विद्यार्थी अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करें।

प्रश्न 2.
‘एकांकी’ और ‘नाटक’ में क्या अंतर है? कुछ नाटकों और एकांकियों की सूची तैयार कीजिए।
उत्तर :
विद्यार्थी अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करें।

JAC Class 10 Hindi कारतूस Important Questions and Answers

निबंधात्मक प्रश्न –

प्रश्न 1.
जंगल में किसने खेमा लगाया हुआ था और क्यों?
उत्तर :
जंगल में कर्नल कालिंज ने खेमा लगाया हुआ था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने उसे वज़ीर अली को पकड़ने का आदेश दिया था। इस आदेश को पूरा करने के लिए ही वह एक लेफ़्टीनेंट और कुछ सिपाहियों के साथ जंगल में खेमा लगाए हुए था। वह काफी समय से जंगलों में भटक रहा है, किंतु वज़ीर अली को पकड़ने में सफल नहीं हो सका।

प्रश्न 2.
शमसुद्दौला कौन था? एकांकी में उसका नाम किस संदर्भ में आया है?
उत्तर :
शमसुद्दौला बंगाल के नवाब का रिश्ते में भाई लगता था। वह अंग्रेजों से बहुत नफ़रत करता था। वह बहुत वीर एवं साहसी व्यक्ति था। उसने अफ़गानिस्तान के शासक शाहे-ज़मा को हिंदुस्तान पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया था। वह किसी भी प्रकार से अंग्रेजी हुकूमत को हिंदुस्तान से बाहर निकालना चाहता था। एकांकी में अफ़गानिस्तान के शासक को वज़ीर अली द्वारा निमंत्रण देने के संदर्भ में शमसुददौला का नाम आया है। कर्नल कालिंज लेफ्टीनेंट को बताता है कि शमसुद्दौला भी अंग्रेजी हुकूमत के लिए बहुत खतरनाक है।

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प्रश्न 3.
वज़ीर अली ने कंपनी के वकील का कत्ल क्यों किया? इसके बाद वह कहाँ भाग गया?
उत्तर :
कंपनी के वकील से वज़ीर अली ने शिकायत की थी कि उसे बार-बार कलकत्ता न बुलाया जाए। किंतु वकील ने उसे ही भला-बुरा कहा। इससे क्रोधित होकर वज़ीर अली ने उसका कत्ल कर दिया। उसके बाद वह अपने कुछ साथियों के साथ आजमगढ़ की ओर भाग गया। आजमगढ़ के शासक ने मदद करते हुए उसे आगरा तक पहुँचा । दिया। तभी से वज़ीर अली अपने साथियों के साथ वहीं के जंगलों में ही रहने लगा था।

प्रश्न 4.
वज़ीर अली के चरित्र की किन्हीं तीन चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
वज़ीर अली कौन था? उसके चरित्र की विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर :
वजीर अली की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
(i) देशभक्त-वज़ीर अली एक सच्चा देशभक्त है। वह हिंदुस्तान को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों से नफ़रत करता है। वह किसी भी प्रकार से अंग्रेजों को हिंदुस्तान से निकालकर बाहर कर देना चाहता है।
(ii) वीर एवं साहसी-वज़ीर अली अत्यंत वीर एवं साहसी है। दुश्मन भी उसकी वीरता का लोहा मानते हैं। वह सीधे दुश्मन के खेमे में जाकर उसे ललकारने में विश्वास रखता है। वह कर्नल कालिंज के खेमे में जाकर उससे कारतूस लेकर आता है।
(iii) अच्छा शासक-वज़ीर अली एक अच्छा शासक है। उसने केवल पाँच महीने अवध की बागडोर संभाली, किंतु इस दौरान उसने अपनी रियासत को अंग्रेज़ी प्रभाव से लगभग मुक्त करके उसे स्वतंत्र जीवन प्रदान किया।

प्रश्न 5.
‘कारतूस’ एकांकी की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
‘कारतूस’ हबीब तनवीर द्वारा रचित एक श्रेष्ठ एकांकी है। इसकी भाषा उर्दू-फ़ारसी मिश्रित हिंदी है। इसमें तत्सम, तद्भव एवं अंग्रेज़ी भाषाओं के शब्दों का भी समन्वय हुआ है। इसमें संवादात्मक एवं चित्रात्मक शैली है, जो पात्रों के मनोभावों को व्यक्त करने में पूर्णतः सक्षम है। इनकी शैली में नाटकीयता, रोचकता एवं प्रभावोत्कता के गुण विद्यमान हैं। मुहावरों एवं लोकोक्तियों के प्रयोग से सजीवता एवं रोचकता का समावेश हुआ है।

प्रश्न 6.
‘कारतूस’ एकांकी का मूल भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
हबीब तनवीर द्वारा लिखित एकांकी ‘कारतूस’ में उन्होंने 1799 ई० में घटित ऐतिहासिक घटना को सजीवता प्रदान की है। आरंभ में अंग्रेज़ भारतवर्ष में व्यापारी के रूप में आए, किंतु धीरे-धीरे ईस्ट इंडिया कंपनी ने हिंदुस्तान की रियासतों पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया। इसे देखते हुए भारत के देशभक्त अंग्रेज़ों को भारत से खदेड़ने के प्रयास करने लगे। अनेक हिंदुस्तानी नौजवानों ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अपना योगदान दिया। इस एकांकी में वज़ीर अली नामक पात्र के माध्यम से तत्कालीन हिंदुस्तानी जाँबाजों की वीरता का सुंदर चित्रण किया गया है।

लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
सआदत अली का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा
‘कारतूस’ पाठ में सआदत अली को किस प्रकार का व्यक्ति बताया गया है?
उत्तर :
सआदत अली ऐशो-आराम चाहने वाला व्यक्ति था। वह अंग्रेजी सरकार का पिट्ठू था, इसलिए उसने अंग्रेजी सरकार की अधीनता स्वीकार कर ली। वह एक देशद्रोही था।

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प्रश्न 2.
कर्नल लेफ्टीनेंट को वज़ीर अली के बारे में क्या बताता है?
उत्तर :
कर्नल लेफ्टीनेंट को वजीर अली के बारे में बताता है कि वह रॉबिनहुड के समान वीर एवं साहसी है। अंग्रेजों से उसे घृणा है। वह भारत को अंग्रेजों से मुक्त करना चाहता है और अंग्रेजों को भारत से निकालने के लिए निरंतर योजनाएँ बनाता रहता है।

प्रश्न 3.
सआदत अली ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने के साथ उन्हें और क्या दिया?
उत्तर :
सआदत अली ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने के साथ उन्हें अपनी आधी जायदाद तथा दस लाख रुपये दे दिए। सआदत अली का यह काम उसकी चाटुकारिता को दर्शाता है।

प्रश्न 4.
ईस्ट इंडिया कंपनी ने वज़ीर अली के साथ क्या किया?
उत्तर :
ईस्ट इंडिया कंपनी ने वज़ीर अली को अवध के नवाब पद से हटा दिया और उसके स्थान पर सआदत अली को अवध का नवाब बना दिया।

कारतूस Summary in Hindi

लेखक-परिचय :

जीवन-हबीब तनवीर का जन्म सन 1923 में छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में हुआ था। इन्होंने सन 1944 में नागपुर से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। इनकी नाट्य-क्षेत्र में विशेष रुचि थी। ये नाट्य लेखन का अध्ययन करने ब्रिटेन भी गए। बाद में दिल्ली लौटकर इन्होंने नाट्यमंच की स्थापना की। हबीब तनवीर एक नाटककार, कवि, पत्रकार, नाट्य निर्देशक तथा अभिनेता के रूप में काफ़ी प्रसिद्ध रहे। लोकनाट्य के क्षेत्र में इनका कार्य महत्वपूर्ण एवं प्रशंसनीय रहा है। हबीब तनवीर को अनेक पुरस्कारों, फेलोशिप तथा पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। रचनाएँ-हबीब तनवीर मुख्य रूप से नाटककार हैं।

इनकी प्रसिद्ध रचनाओं में आगरा बाजार, चरनदास चोर, देख रहे हैं नैन तथा हिरमा की अमर कहानी हैं। इन्होंने कई रचनाओं का हिंदी में अनुवाद भी किया है। इसके साथ-साथ हबीब तनवीर ने बसंत ऋतु का सपना, शाजापुर की शांति बाई, मिट्टी की गाड़ी तथा मुद्राराक्षस जैसे नाटकों का आधुनिक रूपांतर भी किया। भाषा-शैली-हबीब तनवीर की भाषा उर्दू-फ़ारसी मिश्रित हिंदी है। इनकी भाषा में सरलता, सरसता और सहजता सर्वत्र विद्यमान है। चित्रात्मकता, प्रभावोत्यादकता तथा रोचकता इनकी भाषा-शैली के अन्य गुण हैं।

प्रस्तुत एकांकी ‘कारतूस’ में भी इनकी उर्दू फ़ारसी मिश्रित हिंदी के दर्शन होते हैं। कहीं-कहीं तो पूरे वाक्य ही उर्दू-फ़ारसी में आ गए हैं। ऐसे स्थानों पर साधारण पाठक को थोड़ी कठिनाई अवश्य हुई है; जैसे वज़ीर अली का यह कथन-‘दीवार हमगोश दारद तन्हाई। इसके अतिरिक्त एकांकी की भाषा में सामान्य बोलचाल के शब्दों का अधिक प्रयोग हुआ है।

उदाहरणस्वरूप-‘वजीर अली कंपनी के वकील के पास गया जो बनारस में रहता था और उससे शिकायत की कि गवर्नर-जनरल उसे कलकत्ता (कोलकाता) में क्यूँ तलब करता है। वकील ने शिकायत की परवाह नहीं की उल्टा उसे बुरा-भला सुना दिया।’ हबीब तनवीर की शैली संवादात्मक है, जो पात्रों के मनोभावों को व्यक्त करने में पूर्णतः सक्षम है। इनकी शैली में नाटकीयता, चित्रात्मकता तथा स्पष्टता साफ़ दिखाई देती है।

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पाठ का सार :

‘कारतूस’ हबीब तनवीर द्वारा रचित एक श्रेष्ठ एकांकी है। इस एकांकी में उन्होंने हिंदुस्तान के सन 1799 के वातावरण को सजीव कर दिया है। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने उस समय तक हिंदुस्तान पर अपना काफ़ी अधिकार जमा लिया था। इस एकांकी में वज़ीर अली नामक पात्र के माध्यम से लेखक ने तत्कालीन हिंदुस्तानी वीरों की वीरता का सुंदर चित्रण किया है।

एकांकी का आरंभ ईस्ट इंडिया कंपनी की एक बटालियन के कर्नल कालिंज और उसके लेफ्टीनेंट की बातचीत से होता है। कर्नल एक लेफ्टीनेंट और कुछ सिपाहियों के साथ वजीर अली नामक एक वीर हिंदुस्तानी को गिरफ्तार करने के लिए गोरखपुर के जंगल में खेमा लगाए हुए है। कर्नल लेफ्टीनेंट को बताता है कि वज़ीर अली रॉबिनहुड के समान वीर एवं साहसी है।

वह अंग्रेजों से घृणा करता है और उन्हें हिंदुस्तान से बाहर निकालना चाहता है। ईस्ट इंडिया कंपनी वज़ीर अली को अवध के नवाब पद से हटाकर उसके स्थान पर सआदत अली को अवध का नवाब बना देती है। सआदत अली ऐशो-आराम पसंद करने वाला व्यक्ति है। वह अंग्रेज़ी सरकार की अंधीनता स्वीकार कर लेता है और अपनी आधी जायदाद व दस लाख रुपये ब्रिटिश सरकार को दे देता है।

कर्नल लेफ़्टीनेंट को बताता है कि वज़ीर अली बहुत खतरनाक आदमी है। वह अफ़गानिस्तान के शासक से मिलकर अंग्रेज़ी सरकार की जड़ें हिलाना चाहता है। उसने ईस्ट इंडिया कंपनी के वकील को भी मार डाला था। वह बहुत ही निडर और साहसी है। अंग्रेज़ी सरकार उसे गिरफ्तार करना चाहती है, किंतु किसी भी तरह से वह उसे पकड़ नहीं पा रही।

कर्नल बताता है कि वज़ीर अली की योजना हिंदुस्तान पर अफ़गानी हमला करवाकर अंग्रेजों की शक्ति कमज़ोर करना, अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाकर अवध का नवाब पद हासिल करना और अंग्रेजों को हिंदुस्तान से बाहर निकालना है। कर्नल कालिंज और लेफ़्टीनेंट इस प्रकार की बातें कर ही रहे थे कि तभी उन्हें दूर से किसी घुड़सवार के आने की आवाज़ सुनाई देती है। कर्नल अपने सिपाहियों को उस सवार पर नज़र रखने का आदेश देता है। थोड़ी ही देर में वह घुड़सवार कर्नल और लेफ्टीनेंट के समीप आकर खड़ा हो जाता है।

घुड़सवार कर्नल कालिंज से मिलने की इच्छा प्रकट करता है। उसे कर्नल तक पहुँचाया जाता है। घुड़सवार कर्नल से कहता है कि वह उससे अकेले में कुछ बात करना चाहता है। कर्नल सिपाही और लेफ़्टीनेंट को बाहर भेज देता है। घुड़सवार कर्नल से पूछता है कि उसने जंगल में खेमा क्यों लगाया हुआ है और वह क्या चाहता है ? कर्नल उसे बताता है कि वह वज़ीर अली को पकड़ना चाहता है। घुड़सवार कर्नल से कुछ कारतूस माँगता है और कहता है कि उसे ये कारतूस वज़ीर अली को पकड़ने के लिए चाहिए।

कर्नल उसे दस कारतूस दे देता है। कर्नल जब उससे उसका नाम पूछता है, तो वह अपना नाम वज्तीर अली बताता है। कर्नल उसका नाम सुनते ही हक्काबक्का रह जाता है। वह उसकी दिलेरी देखकर सन्नाटे में आ जाता है। वज़ीर अली कारतूस लेकर घोड़े पर सवार होकर चला जाता है। उसके जाने के बाद लेप़्टीनेंट अंदर आकर कर्नल से पूछता है कि वह कौन था, तो कर्नल के मुख से यही निकलता है-‘ एक जाँबाज़ सिपाही’।

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कठिन शब्दों के अर्थ :

खेमा – डेरा/अस्थायी पड़ाव, अंदरूनी – भीतरी, खतरनाक – भयंकर, अफ़साने (अफ़साना) – कहानियाँ, कारनामे (कारनामा) – ऐसे काम जो याद रहें, खिलाफ़ – विरुद्ध, नफ़रत – घृणा, असर – प्रभाव, हकमत – शासन, तकरीबन – लगभग, कामयाब में, उम्मीद – आशा, पैदाइश – जन्म, तख्त – सिंहासन, मसलेहत – रहस्य, ऐश-पसंद – भोग-विलास पसंद करने वाला, मुसीबत – धन-दौलत, जायदाद, हमला – आक्रमण, जाँबाज – जान की बाजी लगाने वाला, दमखम – शक्ति और दृढ़ता, जाती तौर से – व्यक्तिगत रूप से, सलाना – वार्षिक, वजीफ़ा – परवरिश के लिए दी जाने वाली राशि, मुकर्रर – तय करना,

तलब किया – याद किया, परवाह – चिंता, काम तमाम करना – मार देना, हुकमराँ – शासक, हिफाज़त – सुरक्षा, स्कीम – योजना, मुमकिन – संभव, गर्द – धूल, मसरूफ – व्यस्त, काफ़िला – एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में। जाने वाले यात्रियों का समूह, शुब्हा – संदेह, गुंजाइश – संभावना, करीब – समीप, खामोश – चुप, तन्हाई – एकांत, राजेदिल – दिल की बात, दीवार हमगोश दारद तनहाई – दीवारों के भी कान होते हैं, राज की बात तनहाई में कही जाती है, मकाम – पड़ाव, हुक्म – आदेश, लावलश्कर – सेना का बड़ा समूह और युद्ध-सामग्री, कारतूस = पीतल आदि की एक नली जिसमें बारूद भरा रहता है, हक्का-बक्का रह जाना = हैरान होना

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 4 आत्मकथ्य

Jharkhand Board JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 4 आत्मकथ्य Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 4 आत्मकथ्य

JAC Class 10 Hindi आत्मकथ्य Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
कवि आत्मकथा लिखने से क्यों बचना चाहता है ?
उत्तर :
कवि आत्मकथा लिखने से बचना चाहता है, क्योंकि उसे लगता है कि उसका जीवन साधारण-सा है। उसमें कुछ भी ऐसा नहीं जिससे लोगों को किसी प्रकार की प्रसन्नता प्राप्त हो सके। उसका जीवन अभावों से भरा हुआ है, जिन्हें वह औरों के साथ बाटना नहीं चाहता उसके जीवन में किसी के प्रति कोमल भाव अवश्य था, जो उसके निजी सुखद क्षण हैं इसे किसी को बताना नहीं चाहता।

प्रश्न 2.
आत्मकथा सुनाने के संदर्भ में अभी समय भी नहीं कवि ऐसा क्यों कहता है?
उत्तर :
कवि को लगता है कि अभी उसके जीवन में बड़ी-बड़ी उपलब्धियाँ नहीं हैं, जिन्हें दूसरों के सामने प्रकट किया जा सके। वह अपने अभावग्रस्त जीवन के कष्टों को अपने हृदय में छिपाकर रखना चाहता है। इसलिए वह कहता है- अभी समय भी नहीं ।

प्रश्न 3.
स्मृति को ‘पाथेय’ बनाने से कवि का क्या आशय है?
उत्तर :
‘पाथेय’ का शाब्दिक अर्थ है-‘सबल’ या ‘रास्ते का सहारा’। कवि के हृदय में किसी अति रूपवान के लिए गहरा प्रेमभाव था। उसके प्रति मधुर यादें थीं और वे यादें ही उसके जीवन की आधार थीं, जिन्हें वह न तो औरों के सामने प्रकट करना चाहता था और न ही ‘स्मृति रूपी सहारे’ को अपने से दूर करना चाहता था। कवि के मन में छिपी मधुर स्मृतियाँ उसके सुखों का आधार थीं।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 4 आत्मकथ्य

प्रश्न 4.
भाव स्पष्ट करें –
(क) मिला कहाँ वह सुख जिसका स्वप्न देखकर जाग गया।
आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।
(ख) जिसके अरुण कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।
उत्तर :
(क) कवि का कहना है कि उसे अपने जीवन में सुखों की प्राप्ति नहीं हुई। हर व्यक्ति की तरह वह भी अपने जीवन में सुख चाहता था। अवचेतन में छिपे सुख के भावों के कारण कवि ने भी सुख भरा सपना देखा था, पर वह सुख कभी उसे वास्तव में प्राप्त नहीं हुआ। वह सुख उसके बिलकुल पास आते-आते मुस्कुराकर दूर भाग गया।

(ख) कवि का प्रियतम अति सुंदर था। उसकी गालों पर मस्ती भरी लाली छाई हुई थी। उसकी सुंदर छाया में प्रेमभरी भोर भी अपने सुहाग की मधुरिमा प्राप्त करती थी।

प्रश्न 5.
‘उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की’-कथन के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है? उत्तर
अभाव
थे: दख थे: पीडा थी. पर फिर भी उसे कोई प्रेम करने वाला था। लेकिन कवि उस प्रेम-भाव को जग-जाहिर नहीं करना चाहता। वह उसे नितांत अपना मानता है, इसलिए वह मधुर चाँदनी की उस उज्ज्वल कहानी को दूसरों के लिए नहीं गाना चाहता।

प्रश्न 6.
‘आत्मकथ्य’ कविता की काव्यभाषा की विशेषताएँ उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर :
जयशंकर प्रसाद की कविता ‘आत्मकथ्य’ पर छायावादी काव्य-शिल्प की सीधी छाप दिखाई देती है, जिसे निम्न आधारों पर स्पष्ट किया जा सकता है –
1. भाषा की कोमलता-प्रसाद ने अपनी कविता में भाषा की कोमलता पर विशेष ध्यान दिया है। खड़ी बोली में रचित ‘आत्मकथ्य’ में कोमल शब्दों के प्रयोग की अधिकता है। ये शब्द मधुर और कर्णप्रिय हैं –

जिसके अरुण-कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।

कवि ने तत्सम शब्दों का अधिक प्रयोग किया है, जिससे शब्दों पर उनकी पकड़ का पता चलता है।

2. भाषा की लाक्षणिकता-लाक्षणिकता प्रसाद जी के काव्य की महत्वपूर्ण विशेषता है। इसके द्वारा कवि ने अपने सूक्ष्म भावों को सहजता से प्रकट किया है –

सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म-कथा?
अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।

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3. भाषा की प्रतीकात्मकता-कवि ने अपनी कविता में प्रतीकात्मकता का भी अधिक प्रयोग किया है। उन्होंने प्रकृति-जगत से अपने अधिकांश प्रतीकों का प्रयोग किया है –

मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,
मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।

‘मधुप’ मनरूपी भँवरा है, जो ‘गुनगुना’ कर भावों को प्रकट करता है। मुरझाकर गिरती ‘पत्तियाँ’ नश्वरता की प्रतीक हैं। कवि ने अपनी इस कविता में ‘अनंत-नीलिमा’, ‘गागर रीति’, ‘उज्ज्वल गाथा’, ‘चाँदनी रातों की’, ‘अनुरागिनी उषा’, ‘स्मृति पाथेय’, ‘थके पथिक’, ‘सीवन को उधेड़’, ‘कंथा’ आदि प्रतीकात्मक शब्दों का सहज-सुंदर प्रयोग किया है। -भाषा की चित्रमयता-प्रसाद की इस कविता की एक अनुपम विशेषता है-‘चित्रमयता’। कवि ने इसके द्वारा पाठक के सामने एक चित्र-सा प्रस्तुत किया है। इससे कविता में बिंब उपस्थित करने में सफलता मिली है।

5. भाषा की संगीतात्मकता – इस कविता में संगीतात्मकता का तत्व निश्चित रूप से विद्यमान है। इसका कारण यह है कि कवि को नाद, लय और छंद तीनों का अच्छा ज्ञान था। स्वरमैत्री ने संगीतात्मकता को उत्पन्न करने में सहायता प्रदान की है –

छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?
क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?

6. भाषा की आलंकारिकता – भाषा को सजाने और प्रभावपूर्ण बनाने के लिए प्रसाद ने अपनी कविता में जगह-जगह अलंकारों का सुंदर प्रयोग किया है –
(i) मधुप गुनगुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी-अनुप्रास
(ii) आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया-पुनरुक्ति प्रकाश
(iii) सीवन को उधेड़कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?-प्रश्न
(iv) अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में-मानवीकरण

7. मधुर-शब्द योजना – कवि को शब्दों की अंतरात्मा की सूक्ष्म पहचान है। जो शब्द जहाँ ठीक लगता है, कवि ने इसका वहीं प्रयोग किया है –

उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?

इन पंक्तियों में ‘पाथेय’, ‘पथिक’, ‘पंथा’, ‘सीवन’, ‘कंथा’ आदि अत्यंत सटीक और सार्थक शब्द हैं, जो विशेष भावों को व्यक्त करते हैं।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 4 आत्मकथ्य

प्रश्न 7.
कवि ने जो सुख का स्वप्न देखा था उसे कविता में किस रूप में अभिव्यक्त किया है ?
उत्तर :
कवि ने सुख के जिस स्वप्न को देखा था उसे वह प्राप्त नहीं कर पाया। वह स्वप्न अधूरा ही रह गया, पर कवि के मन में उसकी याद गहराई से जमी हुई थी। कवि के हृदय में अपने प्रिय की सुखद छवि विद्यमान थी। उसका प्रिय भोला-भाला था, जिसके लिए कवि ने ‘सरलते’ शब्द का प्रयोग किया है। उसके लिए रस से भीगे अतीत के उन दिनों को भुला पाना कभी संभव नहीं हो पाया। वे प्यार-भरी मधुर चाँदनी रातें उसके लिए सदा याद रखने योग्य थीं। वे उसे अलौकिक आनंद प्रदान करती थीं।

प्रिय की हँसी का स्रोत उसके जीवन के कण-कण को सराबोर किए रहता था, पर वह कल्पना मात्र था। जब तक सपना आँखों के सामने छाया रहा, तब तक वह प्रसन्नता से भरा रहा; पर स्वप्न के समाप्त होते ही जीवन की वास्तविकता उसके सामने आ गई। उसकी आनंद-कल्पना अधूरी रह गई। उसका प्रिय अपार सौंदर्य का स्वामी था। उसके गालों की सौंदर्य-लालिमा के सामने उषा की लालिमा भी फीकी थी, पर अब वह दृश्य ही बदल गया है।

रचना और अभिव्यक्ति –

प्रश्न 8.
इस कविता के माध्यम से प्रसाद जी के व्यक्तित्व की जो झलक मिलती है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर :
श्री जयशंकर प्रसाद हिंदी के छायावादी काव्य के प्रवर्तक हैं। उन्होंने इस कविता में अपने व्यक्तित्व की हल्की-सी झलक दी है। वे अभावग्रस्त थे; वे धन-संपन्न नहीं थे; वे सामान्य जीवन जीते हुए यथार्थ को स्वीकार करते थे। वे अति विनम्र थे। उन्हें लगता था कि उनके जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो दूसरों को सुख दे सके इसलिए वे अपनी जीवन-कहानी औरों को नहीं सुनाना चाहते थे –

तब भी कहते हो-कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।
तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीति।

वे प्रेमी-हृदय थे। उन्हें किसी से प्रेम था, पर वे उसके प्रेम को पा नहीं सके। वे स्वभाव से ऐसे थे कि न तो अपनी पीड़ा दूसरों के सामने प्रकट करना चाहते थे और न ही किसी की हँसी उड़ाना चाहते थे। वे दूसरों को अपने छोटे-से जीवन की कहानियाँ नहीं सुनाना चाहते थे। वे अपनी पीड़ा को अपने हृदय में समेटकर रखना चाहते थे।

प्रश्न 9.
आप किन व्यक्तियों की आत्मकथा पढ़ना चाहेंगे और क्यों?
उत्तर :
महान व्यक्तियों के द्वारा लिखित आत्मकथाएँ प्रेरणा की स्रोत होती हैं। ये पाठकों का मार्गदर्शन करती हैं। इनमें लेखक अपने जीवन की विभिन्न परिस्थितियों और दशाओं का वर्णन करते हैं। वे अपने जीवन पर पड़े विभिन्न प्रभावों का उल्लेख भी करते हैं। मैं महापंडित राहुल सांकृत्यायन के द्वारा रचित आत्मकथा ‘मेरी जीवन यात्रा’ पढ़ना चाहूँगा।

इसे पढ़ने से देश-विदेश में घूमने और स्थान-स्थान के ज्ञान को प्राप्त करने की प्रेरणा मिलेगी, विभिन्न क्षेत्रों के जीवन और रीति-रिवाजों को समझने की क्षमता मिलेगी। इसके अतिरिक्त मैं हरिवंशराय बच्चन की ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ और ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ पढ़ना चाहूँगा। इनसे एक महान लेखक और कवि के जीवन को निकट से जानने का अवसर मिलेगा।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 4 आत्मकथ्य

प्रश्न 10.
कोई भी अपनी आत्मकथा लिख सकता है। उसके लिए विशिष्ट या बड़ा होना जरूरी नहीं। हरियाणा राज्य के गुड़गाँव में घरेलू सहायिका के रूप में काम करने वाली बेबी हालदार की आत्मकथा बहुतों के द्वारा सराही गई। आत्मकथात्मक शैली में अपने बारे में कुछ लिखिए।
उत्तर :
मैं अपने जीवन में कुछ ऐसा करना चाहती हूँ जिससे समाज में मेरा नाम हो; प्रतिष्ठा हो और लोग मेरे कारण मेरे परिवार को पहचाने। जीवन तो सभी प्राणी भगवान से प्राप्त करते हैं; पशु भी जीवित रहते हैं, पर उनका जीवन भी क्या जीवन है ? अनजाने-से इस दुनिया में। आते हैं और वैसे ही मर जाते हैं। मैं अपना जीवन ऐसे व्यतीत नहीं करना चाहती। मैं चाहती हूँ कि मेरी मृत्यु भी ऐसी हो, जिस पर सभी गर्व करें और युगों तक मेरा नाम प्रशंसापूर्वक लेते रहे।

मेरे कारण मेरे नगर और मेरे देश का नाम ख्याति प्राप्त करे। कल्पना चावला इस संसार में आईं और चली गईं। उनका धरती पर आना तो सामान्य था, पर यहाँ से जाना सामान्य नहीं था। आज उन्हें हमारा देश ही नहीं सारा संसार जानता है। उनके कारण उनके पैतृक शहर करनाल का नाम अब सभी की जुबान पर है। मैं भी चाहती हूँ कि अपने जीवन में मैं इतना परिश्रम करूँ कि मुझे विशेष पहचान मिले। मैं अपने माता-पिता के साथ-साथ अपने देश की कीर्ति का कारण बनूँ।

पाठेतर सक्रियता –

प्रश्न 1.
किसी भी चर्चित व्यक्ति का अपनी निजता को सार्वजनिक करना या दूसरों का उनसे ऐसी अपेक्षा करना सही है-इस विषय के पक्ष-विपक्ष में कक्षा में चर्चा करें।
उत्तर :
अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से कीजिए।

प्रश्न 2.
बिना ईमानदारी और साहस की आत्मकथा नहीं लिखी जा सकती। गांधी जी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ पढ़कर पता लगाइए कि उसकी क्या-क्या विशेषताएँ हैं ?
उत्तर :
अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से कीजिए।

यह भी जानें –

प्रगतिशील चेतना की साहित्यिक मासिक पत्रिका हंस प्रेमचंद ने सन 1930 से 1936 तक निकाली थी। पुनः सन 1956 से यह साहित्यिक पत्रिका निकल रही है और इसके संपादक राजेंद्र यादव हैं।

बनारसीदास जैन कृत अर्धकथानक हिंदी की पहली आत्मकथा मानी जाती है। इसकी रचना सन 1641 में हुई और यह पद्यात्मक है। आत्मकथ्य का एक अन्य रूप यह भी देखें –

मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।
मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!
मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ;
मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ,
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ!

– कवि बच्चन की आत्म-परिचय
कविता का अंश

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 4 आत्मकथ्य

सप्रसंग व्याख्या, अर्थग्रहण संबंधी एवं सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर – 

1. मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,
मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।
इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्य जीवन-इतिहास
यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास
तब भी कहते हो-कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।
तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीती।

शब्दार्थ : मधुप – भँवरा, मनरूपी भँवरा। घनी – अत्यधिक। अनंत नीलिमा – अंतहीन विस्तार। असंख्य – अनगिनत; जिसकी गणना न की जा सके। मलिन – मैला। उपहास – मज़ाक। दुर्बलता – कमज़ोरी। गागर रीति – खाली घड़ा, ऐसा मन जिसमें कोई भाव नहीं।

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक क्षितिज (भाग-2) में संकलित कविता ‘आत्मकथ्य’ से ली गई है। जिसके रचयिता छायावादी काव्य के प्रवर्तक श्री जयशंकर प्रसाद हैं। इसके माध्यम से कवि ने कहा है कि उनके जीवन में ऐसा कुछ भी विशेष नहीं है जो औरों को कुछ सरस दे पाए।

व्याख्या : कवि कहता है कि जीवनरूपी उपवन में उसका मनरूपी भँवरा गुनगुना कर न जाने अपनी कौन-सी कहानी कह जाता है। उस कहानी से किसी को सुख मिलता है या दुख, वह नहीं जानता। लेकिन इतना अवश्य है कि आज उपवन में कितनी अधिक पत्तियाँ मुरझाकर झड़ रही हैं। कवि का स्वर निराशा के भावों से भरा है। उसे केवल दुख और पीड़ारूपी मुरझाई पत्तियाँ ही दिखाई देती हैं। उसकी न जाने कितनी इच्छाएँ पूरी हुए बिना ही मन में घुटकर रह गईं।

उचित परिस्थितियों और वातावरण को न पाकर वे समय से पहले ही पीले-सूखे पत्तों की तरह मुरझाकर मिट गईं। जीवन के अंतहीन गंभीर विस्तार में जीवन के असंख्य इतिहास रचे जाते हैं। वे बीती हुई निराशा भरी बातें कवि की स्थिति और पीड़ा पर व्यंग्य करती हैं; उसका उपहास उड़ाती हैं और कवि चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता। वह अपने जीवन की विवशताओं के सामने असहाय है; हताश है।

उसकी पीड़ा भरी जिंदगी के बारे में जानने की इच्छा रखने वालों से वह दुख भरे स्वर में पूछता है कि उसकी पीड़ा और विवशता को देखकर भी क्या वे चाहते हैं कि कवि अपनी पीड़ा, दुर्बलता और अपने पर बीती दुखभरी कहानी को फिर से सुनाए; फिर से दोहराए ? क्या उसकी पीड़ा देखकर नहीं समझी जा सकती? जब तुम उसकी जीवनरूपी खाली गागर को देखोगे, तो क्या तुम्हें उसे देख-सुनकर सुख प्राप्त होगा? मेरे हताश और निराशा से भरे अभावपूर्ण मन में कोई ऐसा भाव नहीं है, जिसे दूसरों को सुनाया जा सके।

अर्धग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. पंक्तियों में निहित भाव स्पष्ट करें।
2. ‘मधुप’ में विद्यमान प्रतीकात्मकता लिखिए।
3. ‘पत्तियों का मुरझाना’ किसे स्पष्ट करता है?
4. ‘अनंत-नीलिमा’ और ‘असंख्य जीवन इतिहास’ क्या है?
5. कवि किससे कहता है-‘कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती’?
6. ‘रीति गागर’ क्या है?
7. व्यंग्य-उपहास कौन करते हैं ?
8. ‘तुम सुनकर सुख पाओगे’ में छिपे अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
9. कवि का जीवन कैसा था?
10. कवि अपनी कथा क्यों नहीं सुनाना चाहता था?
उत्तर :
1. कवि का जीवन दुखों और अभावों से भरा हुआ है, जिसकी व्यथा भरी कहानी वह औरों को नहीं सुनाना चाहता। किसी व्यक्ति की पीड़ा भरी कहानी को सुनकर किसी को खुशी प्राप्त नहीं होती।
2. ‘मधुप’ एक प्रतीकात्मक शब्द है। यह ‘मन’ को प्रकट करता है, जो भँवरे के समान जहाँ-तहाँ उड़कर कहीं भी पहुँच जाता है।
3. ‘पत्तियों का मुरझाना’ मन में उत्पन्न सुख और आनंद के भावों का मिट जाना है। तरह-तरह के अभावों के कारण कवि के हृदय में उत्पन्न भाव दबकर रह जाते थे।
4. ‘अनंत-नीलिमा’ जीवन का अंतहीन विस्तार है। मनुष्य अपने मन में हर समय न जाने कौन-कौन से विचार अनुभव करता है। यदि वे सुखद होते हैं, तो दुखद भी होते हैं। ‘अनंत-नीलिमा’ लाक्षणिक शब्द है, जो अपने भीतर व्यापकता के भावों को छिपाए हुए है। ‘असंख्य जीवन इतिहास’ मानव-मन में उत्पन्न वे विभिन्न विचार हैं, जो तरह-तरह की घटनाओं के घटित होने के आधार बने।
5. ‘कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती’-कवि उन लोगों से कहता है, जो उसकी पीड़ा भरी जिंदगी के विषय में जानना चाहते हैं।
6. ‘रीति सागर’ में लाक्षणिकता और प्रतीकात्मकता है, जो कवि के अभावग्रस्त जीवन की ओर संकेत करती है जिसमें कोई सुख-सुविधा नहीं है।
7. कवि के अपने ही मन की निराशा भरी बातें उस पर व्यंग्य-उपहास करती हैं।
8. कवि व्यंग्यार्थ का प्रयोग करते हुए कहता है कि क्या उसके जीवन को जानने की इच्छा रखने वाले लोग उसकी पीड़ा और व्यथा को सुनकर प्रसन्नता प्राप्त कर सकेंगे। निश्चित रूप से उन्हें उसकी पीड़ा भरी कहानी को सुनकर किसी आनंद की प्राप्ति कदापि नहीं होगी।
9. कवि का जीवन दुख और निराशा से भरा हुआ था।
10. कवि के जीवन में केवल असफलता, पीड़ा, दुख और निराशा के भाव ही थे; इसलिए वह अपनी कथा नहीं सुनाना चाहता था।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 4 आत्मकथ्य

सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तरी –

प्रश्न :
1. कवि ने किस काव्य-शैली का प्रयोग किया है?
2. किस शब्द-शक्ति का प्रयोग दिखाई देता है ?
3. कवि ने किन प्रतीकात्मक शब्दों का प्रयोग किया है?
4. कवि ने किस बोली का प्रयोग किया है ?
5. पंक्तियों में किस प्रकार के शब्दों की अधिकता है?
6. गेयात्मकता की सृष्टि किससे हुई है?
7. किस काव्य-गुण का प्रयोग किया गया है?
8. किस काव्य-रस का समावेशन हुआ है?
9. दो तत्सम शब्द छाँटकर लिखिए।
10. कविता का संबंध हिंदी के किस वाद से है?
11. अवतरण से अलंकार छाँटकर लिखिए।
उत्तर :
1. कवि ने अपने हृदय की पीड़ा और असहायता को आत्मकथात्मक शैली में प्रकट किया है और कहा है कि उसकी दुख भरी कहानी सुनने-सुनाने के योग्य नहीं है।
2. लाक्षणिकता का प्रयोग किया गया है।
3. मधुप, पत्तियाँ, अनंत-नीलिमा, जीवन-इतिहास, रीति गागर आदि में प्रतीकात्मकता विद्यमान है।
4. खड़ी बोली।
5. तत्सम शब्दावली की अधिकता है।
6. स्वरमैत्री ने गयात्मकता की सृष्टि की है।
7. प्रसाद गुण विद्यमान है।
8. करुण रस का प्रयोग है।
9. मधुप, अनंत।
10. छायावाद।
11. अनुप्रास –
कर कह जाता कौन कहानी

रूपकातिशयोक्ति –
‘मधुप गुन-गुना कर कह जाता है’ में ‘मधुप’ मनरूपी भँवरे के लिए प्रयुक्त हुआ है।
‘गागर रीती’, ‘जीवनरूपी खाली गागर’ के लिए प्रयुक्त हुआ है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 4 आत्मकथ्य

2. किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले
अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले।
रह विडंबना! अरी सरलते तेरी हँसी उड़ाऊँ मैं।
भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैं।
उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की।
अरे खिल-खिला कर हँसते होने वाली उन बातों की।

शब्दार्थ : विडंबना – निराश करना, उपहास का विषय। प्रवंचना – धोखा।

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक क्षितिज (भाग-2) में संकलित कविता ‘आत्मकथ्य’ से ली गई है। जिसके रचयिता छायावादी काव्यधारा के प्रवर्तक श्री जयशंकर प्रसाद हैं। उन्हें ‘हंस’ नामक पत्रिका के लिए आत्मकथा लिखने के लिए कहा गया था, लेकिन कवि को ऐसा प्रतीत होता है कि वे अति साधारण हैं और उनके जीवन में कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसे पढ़-सुनकर लोग वाह-वाह कर उठे। कवि ने यथार्थ के साथ-साथ अपने विनम्र भावों को प्रकट किया है।

व्याख्या : जो लोग कवि की दुखपूर्ण कथा को सुनना चाहते हैं, कवि उनसे कहता है कि उसकी कथा सुनकर कहीं वे यह न समझने लगे कि वही उसकी जीवनरूपी गागर को खाली करने वाले थे। वे सब अपने आपको समझें; स्वयं को पहचानें। वे उसके भावों के रस को प्राप्त कर अपने आप को भरने वाले थे। अरे सरल मन वालो! यह उपहास और निराशा का विषय है कि मैं तुम्हारी हँसी उड़ाऊँ। मैं अपने दवारा की गई गलतियों या दूसरों के द्वारा दिए गए धोखों को क्यों प्रकट करूँ ? आत्मकथा के नाम से मुझे अपनी या औरों की बातें जग-जाहिर नहीं करनी।

कवि कहता है कि उसके जीवन में पूर्ण रूप से पीड़ा और निराशा की कालिमा नहीं है; उसमें मधुर चाँदनी रातों की मीठी स्मृतियाँ भी हैं, पर वह उन उज्ज्वल गाथाओं को कैसे गाए और वह उन्हें क्यों प्रकट करे? वह अपने जीवन के कोमल पक्षों में सभी को भागीदार नहीं बनाना चाहता, क्योंकि वे उसकी निजी यादें हैं। वह अपनी मधुर स्मृतियों में सबकी साझेदारी नहीं चाहता। वह कभी अपनों के साथ खिलखिलाकर हँसा था; मीठी बातों में डूबा था और उसका हृदय प्रसन्नता से भर उठा था-उन क्षणों को वह औरों को क्यों बताए?

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. पंक्तियों में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।
2. कवि ने किसका रस लेने की बात कही है ?
3. कवि ने ‘खाली करने वाला’ किसे कहा है?
4. ‘अरी सरलते’ में विद्यमान विशिष्टता क्या है?
5. कवि अपनी कथनी के द्वारा क्या बताना चाहता है ?
6. ‘उज्ज्वल गाथा’ में निहित प्रतीकार्थ स्पष्ट कीजिए।
7. कवि औरों के समक्ष किस गाथा को नहीं गाना चाहता?
8. ‘उन बातों में छिपा भाव स्पष्ट कीजिए।
9. ‘विडंबना’ में छिपा अर्थ व्यक्त कीजिए।
उत्तर :
1. कवि अपने सुख-दुख की गाथा को जग-जाहिर नहीं करना चाहता। वह कहता था कि उसके पास ऐसा कुछ नहीं है, जो औरों को प्रसन्नता दे सके। कवि न तो अपनी सुख भरी बातें प्रकट करना चाहता है और न ही दूसरों की भूलें व्यक्त करना चाहता है।
2. कवि ने अपना प्रेम भरा रस लेने की बात कही है।
3. कवि ने ‘खाली करने वाला’ उन्हें कहा है, जो उसकी दुखभरी कहानी सुनने की इच्छा करते हैं।
4. ‘अरी सरलते’ में प्रेमपूर्ण संबोधन विद्यमान है, जिससे कवि ने अपनत्व का भाव प्रकट किया है।
5. कवि अपनी कथनी के द्वारा बताना चाहता है कि वह न तो औरों की आलोचना करना चाहता है और न ही सबको अपनी व्यक्तिगत बातें सुनाना चाहता है।
6. ‘उज्ज्वल गाथा’ प्रतीकात्मकता और लाक्षणिकता से परिपूर्ण है, जिसमें कवि हृदय में छिपा प्रेम और अपनत्व का भाव प्रकट होता है। कवि को इससे सुख की अनुभूति हुई थी।
7. कवि उस गाथा को औरों के समक्ष नहीं गाना चाहता, जो उसकी पूर्ण रूप से व्यक्तिगत है; जिसमें उसकी प्रेमानुभूति छिपी हुई है।
8. ‘उन बातों में गूढार्थ विद्यमान है। इनसे कवि को जीवन में सुख प्राप्त हुआ था।
9. ‘विडंबना’ का अर्थ है-‘उपहास का विषय’ या ‘निराश करना’। कवि किसी का उपहास नहीं उड़ाना चाहता। वह अपनी बात से किसी की हँसी उड़ाकर उसे व्यथित करने के बारे में सोच भी नहीं सकता।

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सौदर्य सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. कवि ने किसे व्यक्तिगत माना है?
2. पंक्तियों में किस शब्द-शक्ति का प्रयोग किया गया है?
3. कवि ने किस बोली का प्रयोग किया है?
4. किस प्रकार की शब्दावली का प्रयोग किया गया है?
5. किस काव्य-गुण का प्रयोग दिखाई देता है?
6. नाटकीयता की सृष्टि का आधार क्या है?
7. लयात्मकता का आधार क्या है?
8. कवि ने किस शैली का प्रयोग किया है ?
9. दो तत्सम शब्दों को चुनकर लिखिए।
10. प्रयुक्त अलंकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
1. कवि ने अपने सुख-दुख को व्यक्तिगत माना है और वह उन्हें सबके साथ नहीं बाँटना चाहता।
2. लाक्षणिकता का सुंदर प्रयोग किया गया है।
3. खड़ी बोली।
4. तत्सम शब्दावली की अधिकता है।
5. प्रसाद गुण विद्यमान है।
6. संबोधन शैली के प्रयोग ने नाटकीयता की सृष्टि की है।
7. स्वरमैत्री ने लयात्मकता की सृष्टि की है।
8. आत्मकथात्मक शैली।
9. प्रवंचना, उज्ज्वल।
10. मानवीकरण –
अरी सरलते तेरी हँसी उड़ाऊँ मैं।
उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों में।

अनुप्रास –
किंतु कहीं ऐसा न हो।
उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ।

3. मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।
आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।
जिसके अरुण-कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।
उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?

शब्दार्थ : स्वप्न – सपना। मुसक्या कर – मुस्कुराकर। अरुण-कपोलों – लाल गालों। मतवाली – मस्ती भरी। अनुरागिनी उषा – प्रेमभरी भोर । निज – अपना। स्मृति पाथेय – स्मृति रूपी सहारा। पथिक – मुसाफ़िर; यात्री। पंथा – रास्ता, राह। सीवन – सिलाई। कंथा – गुदड़ी, अंतर्मन।

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावादी कवि श्री जयशंकर प्रसाद के द्वारा रचित कविता ‘आत्मकथ्य’ से ली गई हैं। कवि ने अपने जीवन की कहानी किसी को न सुनाने के बारे में सोचा था, क्योंकि उसे लगता था कि उसके जीवन में कुछ भी ऐसा सुखद नहीं था, जो किसी को सुख दे सके। उसके पास केवल सुखद यादें अवश्य थीं।

व्याख्या : कवि कहता है कि उसे अपने जीवन में कभी किसी सुख की प्राप्ति नहीं हुई। सपने में जिस सुख को अनुभव कर वह नींद से जाग गया था, वह भी उसे प्राप्त नहीं हुआ। वह सुख देने वाला उसके आलिंगन में आते-आते धीरे से मुस्कुराकर उससे दूर हो गया; उसे प्राप्त नहीं हुआ। जो सपने में सुख और प्रेम का आधार बना था, वह अपार सुंदर और मोहक था। उसके लाल-गुलाबी गालों की मस्ती भरी छाया में प्रेम भरी भोर अपने सुहाग की मिठास भरी मनोहरता को लेकर प्रकट हो गई थी।

भाव यह है कि उसके गालों में प्रात:कालीन लाली और शोभा विद्यमान थी। जीवन की लंबी राह पर थककर चूर हुए कविरूपी यात्री की स्मृतियों में केवल वही एक सहारा थी। उसकी यादें ही उसकी थकान को कुछ कम करती थीं। कवि नहीं चाहता कि उसकी मधुर यादों के आधार को कोई जाने। वह पूछता है कि क्या उसके अंतर्मन रूपी गुदड़ी की सिलाई को उधेड़कर उस छिपे रहस्य को आप देखना चाहेंगे? भाव यह है कि कवि उस रहस्य को अपने भीतर सँभालकर रखना चाहता है; उसे व्यक्त नहीं करना चाहता।

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अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. पंक्तियों में निहित भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
2. कवि नींद से क्यों जाग गया था?
3. कवि किसे आलिंगन में लेने को आतुर था?
4. कवि के प्रिय का रूप कैसा था?
5. कवि ने भोर को कैसा माना है?
6. कवि को किसका सहारा प्राप्त हुआ था ?
7. कवि अपना रास्ता कैसा मानता है ?
8. ‘सीवन को उधेड़ना’ क्या है?
9. ‘कंथा’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
1. कवि को जीवन में किसी से प्रेम हुआ था, पर उसे अपने प्रेम की प्राप्ति नहीं हुई। कवि को लगता है कि उसके प्रिय की अपार सुंदरता ही उसके जीवन की प्रेरणा है और उसके स्मृतिरूपी सहारे से वह अपने जीवन की थकान को कम करने में सफल हुआ है। कवि के जीवन से परिचित होने की इच्छा रखने वालों को उसके प्रेम के विषय में जानने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वह विषय उसका पूर्णरूप से निजी था।
2. कवि उस स्वप्न को देखकर नींद से जाग गया था, जिसके सुख को उसने पाया ही नहीं था।
3. कवि स्वप्न में देखे अपने प्रिय को आलिंगन में लेने को आतुर था।
4. कवि का प्रिय अपार सुंदर था। उसके मतवाले लाल गाल ऐसे थे, जैसे प्रातः के समय पूर्व दिशा की लाली उसी से प्राप्त की गई हो।
5. कवि ने भोर को प्रेम और लाली से युक्त माना है।
6. कवि को स्वप्न में देखे अपने प्रिय की स्मृतियों का सहारा प्राप्त हुआ था।
7. कवि को अपना रास्ता कठिन प्रतीत होता है, जिस पर उसके थके हुए कदम आसानी से आगे नहीं बढ़ते।
8. ‘सीवन को उधेड़ना’ से अभिप्राय कवि के मन में छिपी पुरानी यादों को फिर से ताज़ा करना है, जिन्हें वह अपने हृदय में छिपा चुका है।
9. ‘कंथा’ का शाब्दिक अर्थ ‘गुदड़ी’ है, जिसे कवि ने अंतर्मन के लिए प्रयुक्त किया है।

सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. कवि ने पंक्तियों में किसका आभास दिया है ?
2. किस शब्द-शक्ति का प्रयोग किया गया है ?
3. किस बोली का प्रयोग है?
4. किस प्रकार की शब्दावली का अधिकता से प्रयोग किया गया है?
5. काव्य-गुण कौन-सा विद्यमान है?
6. किस शैली का प्रयोग है?
7. दो तत्सम शब्द चुनकर लिखिए।
8. पंक्तियों में से निराशा के भाव का एक उदाहरण दीजिए।
9. कविता का संबंध हिंदी-साहित्य की किस काव्यधारा से है ?
10. प्रयुक्त अलंकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
1. कवि ने अपने जीवन में किसी के प्रेम को प्राप्त करने का आभास दिया है, जिसका परिचय वह किसी को नहीं देना चाहता।
2. लाक्षणिकता विद्यमान है।
3. खड़ी बोली।
4. तत्सम शब्दावली का अधिकता से प्रयोग किया गया है।
5. प्रसाद गुण विद्यमान है।
6. आत्मकथात्मक शैली।
7. आलिंगन, अनुरागिनी।
8. मिला कहाँ वह सुख।
9. छायावाद।
10. व्यतिरेक –
जिसके अरुण-कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।
अनुरागिनी ऊषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।

पुनरुक्ति प्रकाश –

आलिंगन में आते-आते अनुप्रास
थके पथिक की पंथा की
क्यों मेरी कंथा की।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 4 आत्मकथ्य

4. छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ ?
क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ ?
सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म-कथा?
अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।

शब्दार्थ : कथाएँ – कहानियाँ। मौन – चुप। आत्मकथा – अपनी कहानी। व्यथा – पीड़ा।

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावादी काव्यधारा के प्रवर्तक श्री जयशंकर प्रसाद के द्वारा रचित कविता ‘आत्मकथ्य’ से ली गई हैं। कवि से कहा गया था कि वह अपनी आत्मकथा लिखे, ताकि सभी उससे परिचित हो सकें। लेकिन कवि को लगता है कि उसकी जीवनी में कुछ भी ऐसा विशेष नहीं है, जिससे दूसरों को सुख प्राप्त हो सके।

व्याख्या : कवि कहता है कि उसका जीवन छोटा-सा है; सुखों से रहित है, इसलिए वह उससे संबंधित बड़ी-बड़ी कहानियाँ किस प्रकार सुनाए? वह अपनी कहानी सुनाने की अपेक्षा चुप रहकर औरों की कहानियों को सुनना अधिक अच्छा मानता है। वह उनकी कहानियों से कुछ पाना चाहता है। वह पूछता है कि लोग उसकी कहानी को सुनकर क्या करेंगे? उसकी जीवन कहानी सीधी-सादी और भोली-भाली थी, जिसमें कोई भी विशेष आकर्षण नहीं था। उसे लगता है कि अभी अपनी कहानी सुनाने का अवसर भी अनुकूल नहीं है। उसकी मौन पीड़ा अभी थकी-हारी सो रही है; उसके मन में छिपी हुई है।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. पंक्तियों में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।
2. कवि ने अपने जीवन को कैसा माना है?
3. कवि के जीवन में बड़ी-बड़ी कथाएँ क्यों नहीं थीं ?
4. कवि मौन रहकर क्या सुनना चाहता है?
5. कवि ने अपनी कथा को कैसा माना है?
6. कवि की मौन व्यथा हृदय में क्या कर रही है?
7. कवि ने क्यों लिखा कि ‘अभी समय भी नहीं।
8. कवि ने प्रश्न-चिहनों के प्रयोग से शिल्प में किस विशिष्टता को प्रकट किया है ?
9. ‘मौन व्यथा’ में निहित गूढार्थ को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
1. कवि अपनी कथा को दूसरों के सामने प्रकट नहीं करना चाहता। उसे लगता है कि उसकी पीड़ा भरी कहानी किसी को सुख नहीं दे पाएगी। इसलिए उसके लिए यही अच्छा है कि वह दूसरों की कहानी को सुने और अपनी कथा को अपने मन में ही छिपाकर रखे।
2. कवि ने अपने जीवन को छोटा-सा माना है।
3. कवि स्वभाव से विनम्र है। इसलिए हिंदी साहित्य में बहुत बड़ा योगदान होने पर भी वह मानता है कि उसके जीवन में बड़ी-बड़ी कथाएँ नहीं थीं।
4. कवि मौन रहकर दूसरों की कथाएँ सुनना चाहता है।
5. कवि ने अपनी कथा को भोली और सीधी-सादी माना है।
6. कवि की मौन व्यथा उसके हृदय में थककर सो रही है। वह उसकी वाणी द्वारा औरों के सामने व्यक्त नहीं होना चाहती।
7. कवि को लगता है कि उसकी आत्मकथा को सुनने से किसी को कोई सुख प्राप्त नहीं होगा। साथ ही वह अपनी पीड़ा को दूसरों के सामने उजागर करने का यह उचित अवसर नहीं मानता।
8. कवि ने प्रश्न-चिह्नों के प्रयोग से अपनी विनम्रता को प्रकट करने में सफलता प्राप्त की है। साथ ही कवि ने इनसे अपने पाठकों या श्रोताओं की जिज्ञासा में वृद्धि की है। कवि ने अपनी नकारात्मकता को प्रकट न कर प्रश्न-चिह्नों से कथन को नाटकीयता का गुण प्रदान किया है।
9. ‘मौन व्यथा’ में गूढार्थ विद्यमान है। जब व्यक्ति अपने दुख-दर्द को सबके सामने बार-बार कहता है, तो कोई भी उसे बाँटना नहीं चाहता बल्कि बाद में उस पर कटाक्ष व व्यंग्य करता है। दुख-सुख सभी के जीवन के आवश्यक हिस्से हैं। यह जीवन का यथार्थ है। इसलिए कवि उन्हें दूसरों के सामने व्यक्त नहीं करना चाहता। वह उसे अपने भीतर ही छिपाकर रखना चाहता है। कई बार पूछे जाने पर व्यथित व्यक्ति अपने दुख को प्रकट कर देता है, पर कवि अपनी पीड़ा को ‘मौन व्यथा’ कहकर चुप हो जाता है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 4 आत्मकथ्य

सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. कवि किसका परिचय औरों को नहीं देना चाहता?
2. कवि ने किस बोली का प्रयोग किया है?
3. किस प्रकार की शब्दावली की अधिकता है?
4. किस काव्य-गुण का प्रयोग किया गया है?
5. कवि के शब्दों में उसकी कौन-सी विशेषता साफ़ रूप से झलकती है?
6. किस शब्द-शक्ति का प्रयोग है?
7. लयात्मकता की सृष्टि किस कारण हुई है?
8. अवतरण किस शैली से संबंधित है ?
9. प्रयुक्त किन्हीं दो तत्सम शब्दों को लिखिए।
10. यह किस युग की कविता है ?
11. प्रयुक्त अलंकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
1. कवि अपनी पीड़ा भरी आत्मकथा का परिचय औरों को नहीं देना चाहता।
2. खड़ी बोली।
3. तत्सम शब्दावली का अधिकता से प्रयोग किया गया है।
4. प्रसाद गुण विद्यमान है।
5. कवि की विनम्रता साफ़ रूप से दिखाई देती है।
6. अभिधा शब्द-शक्ति के प्रयोग ने कवि के कथन को सरलता-सरसता से प्रकट किया है।
7. स्वरमैत्री ने लयात्मकता की सृष्टि की है।
8. आत्मकथात्मक शैली।
9. मौन, व्यथा।
10. छायावाद।
11. अनुप्रास –
मैं मौन, मेरी मौन व्यथा
मानवीकरण –
मेरी भोली आत्मकथा, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा

JAC Class 10 Hindi आत्मकथ्य Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
आप अपना आत्मकथ्य पद्य या गद्य में लिखिए।
उत्तर :
मेरा आत्मकथ्य अभी किसी के लिए भी महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। न तो अभी मैंने यथार्थ जीवन की राह में कदम बढ़ाए हैं और न ही मैं अपनी शिक्षा पूरी कर पाया हूँ। अभी मेरी केवल पंद्रह वर्ष की आयु है। मेरा जन्म जिस परिवार में हुआ है, वह मध्यवर्गीय है। पिताजी की नौकरी से प्राप्त होने वाली आय कठिनाई से परिवार को जीवन गुजारने योग्य सुविधाएँ प्रदान करती है। मेरे माता-पिता अपना पेट काटकर हम तीन भाई-बहनों का पेट भरते हैं; हमें पढ़ाते-लिखाते हैं।

स्वयं पुराना और घिसा-पिटा कपड़ा पहनकर भी हमें नए कपड़े लेकर देने का प्रयत्न करते हैं। उन्होंने हमें अच्छे संस्कार दिए हैं और कभी किसी के सामने हाथ न फैलाने की शिक्षा दी है। पढ़ाई-लिखाई के साथ मुझे व्यायाम करने और कुश्ती लड़ने का शौक है। मैं अपने स्कूल की ओर से कई बार कुश्ती प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुका हूँ और मैंने स्कूल के लिए कई पुरस्कार जीते हैं। पढ़ाई में भी मैं अच्छा हूँ। कक्षा में पहला या दूसरा स्थान प्राप्त कर लेता हूँ, जिस कारण माता-पिता के साथ-साथ अपने अध्यापकों की आँखों का भी तारा हूँ। मेरे सहपाठियों और मेरे मोहल्ले के लड़कों को मेरे साथ खेलना और बातें करना अच्छा लगता है। ईश्वर के प्रति मेरी अटूट आस्था है।

प्रश्न 2.
श्री जयशंकर प्रसाद ने ‘आत्मकथ्य’ नामक कविता की रचना क्यों की थी?
उत्तर
नामक पत्रिका का प्रकाशन करते थे। वे उसके संपादक थे। सन 1932 में उन्होंने पत्रिका का आत्मकथा विशेषांक निकालने का निर्णय लिया। उन्होंने प्रसाद जी से आग्रह किया कि वे भी आत्मकथा लिखें। लेकिन प्रसाद जी को ऐसा करना उचित प्रतीत नहीं हुआ। वे विनम्र थे और उन्हें लगता था कि उन्होंने ऐसा कुछ विशेष नहीं किया, जिससे उन्हें लोगों की वाहवाही मिलती। उनकी आत्मकथा न लिखने की इच्छा के कारण ‘आत्मकथ्य’ की रचना हुई, जिसे ‘हंस’ पत्रिका के आत्मकथा विशेषांक में छापा गया था।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 4 आत्मकथ्य

प्रश्न 3.
कवि अपने जीवन के किस प्रसंग को जग-जाहिर नहीं करना चाहता था और क्यों?
उत्तर :
कवि किसी के प्रति अपने प्रेमभाव को जग-जाहिर नहीं करना चाहता था। वह नहीं चाहता था कि जिस प्रेम के सुख को उसने पाया नहीं और जिसका केवल सपना-भर देखा, उसे दूसरों के सामने प्रकट करे। वह प्रेम उसकी स्मृतियों का सहारा था, जो उसे जीने की प्रेरणा देता था।

प्रश्न 4.
कवि ने अपनी कथा को भोली क्यों कहा है?
उत्तर :
कवि का जीवन सीधा-सादा और विनम्रता से भरा हुआ था। उसे नहीं लगता था कि उसकी कथा में किसी को कुछ विशेष देने की क्षमता है। उससे किसी प्रकार की वाहवाही भी प्राप्त नहीं की जा सकती। इसलिए कवि ने अपनी कथा को भोली कहा है।

प्रश्न 5.
प्रसाद के काव्य में प्रकृति-प्रेम झलकता है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कवि जयशंकर प्रसाद छायावाद के आधार स्तम्भ माने जाते हैं। प्रकृति छायावादी कवियों का मन चाहा शरण स्थल रही है। प्रकृति को मानवीय रूप में देखना और उससे प्यार करना इनके काव्य का प्रमुख गुण है। प्रसाद जी ने प्रकृति को अपने काव्य की सहचरी माना है। इसी कारण उसका सजीव चित्रण भी किया है।

प्रश्न 6.
कवि ने अपने जीवन को कैसा माना है?
उत्तर :
कवि ने अपने जीवन को छोटा और सरल माना है। उसका जीवन सुखों से रहित है; उसमें सर्वत्र दुखों का वास है। प्रेम और सुख की कल्पना करना भी उसे पीड़ादायक लगता है। उसका जीवन पीड़ा की एक कहानी है। उसकी यह कहानी किसी को भी सुख प्रदान नहीं कर सकती। वह अपने जीवन को स्वयं तक सीमित रखना चाहता है।

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प्रश्न 7.
कवि ने कविता में अपना रास्ता कैसा और किस प्रकार का माना है?
उत्तर :
कवि ने अपना रास्ता अत्यंत कठिन तथा पीड़ादायक माना है। उसका रास्ता हृदय को द्रवित करने वाला है। उसे अपना रास्ता इतना अधिक कठिन प्रतीत होता है कि उस पर उसके थके कदम आसानी से नहीं बढ़ते। उसे पग-पग पर समस्याओं से जूझना पड़ता है। न चाहते हुए भी कष्टों को सहन करना पड़ता है।

प्रश्न 8.
कविता में कवि ने अपने प्रिय के विषय में क्या कहा है?
उत्तर :
कवि ने बताया है कि अतीत में उसने कभी किसी से प्रेम किया था लेकिन जिससे उसने प्रेम किया था, वह उसे प्राप्त नहीं हो सका। उसके प्रिय का अगाध सौंदर्य ही उसके जीवन की प्रेरणा थी। कवि अपने जीवन को पूर्ण रूप से व्यक्तिगत मानता है। वह अपने दुख भरे जीवन से किसी को परिचित नहीं करवाना चाहता।

प्रश्न 9.
कवि ने कविता में जीवन एवं मन को किस रूप में तथा कैसे प्रकट किया है?
उत्तर :
कवि ने कविता में जीवन को एक उपवन के रूप में प्रस्तुत किया है। इसी उपवन में मनरूपी भँवरा गुनगुनाता रहता है। किंतु वह चाहे कितनी भी गुंजार करे, उसके आस-पास अनेक पत्तियाँ मुरझाती रहती हैं।

आत्मकथ्य Summary in Hindi

कवि-परिचय :

जयशंकर प्रसाद आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रतिभावान कवि माने जाते हैं। ये छायावाद के प्रवर्तक थे। इन्होंने कहानी, नाटक, उपन्यास, आलोचना आदि हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई। इनका जन्म सन 1889 ई० में काशी के सुंघनी साहू नामक प्रसिद्ध वैश्य परिवार में हुआ था। इनके पिता देवी प्रसाद साहू काव्य-प्रेमी थे। जब उनका देहांत हुआ, तब प्रसाद की आयु केवल आठ वर्ष की थी। परिवारजन की मृत्यु, आत्म-संकट, पत्नी वियोग आदि कष्टों को झेलते हुए भी ये काव्य-साधना में लीन रहे। तपेदिक के कारण इनका देहांत 15 नवंबर 1937 में हुआ।
रचनाएँ – जयशंकर प्रसाद ने बड़ी मात्रा में साहित्य की रचना की। इन्होंने पद्य एवं गद्य दोनों क्षेत्रों में अनुपम रचनाएँ प्रस्तुत की हैं, जो निम्नलिखित हैं –
काव्य – ‘चित्राधार’, ‘कानन-कुसुम’, ‘झरना’, ‘लहर’, ‘प्रेम पथिक’, ‘आँसू’, ‘कामायनी’ आदि।
नाटक – ‘चंद्रगुप्त’, ‘स्कंदगुप्त’, ‘अजातशत्रु’, ‘जनमेजय का नागयज्ञ’, ‘ध्रुवस्वामिनी’, ‘करुणालय’, ‘कामना’, ‘कल्याणी’, ‘परिणय’, ‘प्रायश्चित्त’, ‘सज्जन’, ‘राज्यश्री’, ‘विशाख’, ‘एक घुट’ आदि।
कहानी – ‘छाया’, ‘प्रतिध्वनि’, ‘इंद्रजाल’, ‘आकाशदीप’, ‘आँधी’ आदि। उपन्यास कंकाल, तितली, इरावती (अपूर्ण)।
साहित्यिक विशेषताएँ – जयशंकर प्रसाद ने हिंदी साहित्य को एक नई दिशा दी और उसकी प्रत्येक विधा को समृद्ध किया। प्रसाद विरचित साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. स्वदेश-प्रेम – प्रसाद का स्वदेश-प्रेम सौंदर्य के अछूते चित्रों के रूप में व्यक्त हुआ है। संपूर्ण भारत उनके लिए सौंदर्य का भंडार है।
भारत के प्राकृतिक सौंदर्य पर मुग्ध होकर कवि ने उसका चित्रण किया है। ‘चंद्रगुप्त’ नाटक का अमर गीत है
‘अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।’

2. प्रकृति-चित्रण छायावादी कवियों का मनचाहा शरणस्थल प्रकृति ही रही है। प्रकृति को मानवीय रूप में देखना और उससे प्यार करना उनके काव्य में मुख्य रूप से अंकित है। प्रकृति को प्रसाद ने अपने काव्य की पृष्ठभूमि न मानकर सहचरी माना है और उसका सजीव चित्रण किया है। कोलाहल में भरी इस दुनिया से भागकर कवि प्रकृति की गोद में शरण लेना चाहता है, इसलिए वह लिखता है –

‘ले चल मुझे भुलावा देकर, मेरे नाविक धीरे-धीरे।
तज कोलाहल की अवनि रे।’

3. रहस्यवाद – छायावादी कवि रहस्यवादी हैं और प्रकृति में प्रभु के दर्शन करते हैं। प्रसाद के काव्य में रहस्यवादी तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। जिज्ञासा, प्रेम, विरह तथा मिलन की सीढ़ियों से गुजरने वाली ईश्वर-प्रेम की भावना का कवि ने वर्णन किया है। ईश्वर के अस्तित्व के विषय में जिज्ञासा व्यक्त करता हुआ कवि कहता है –

‘हे अनंत रमणीय! कौन तुम?
यह मैं कैसे कह सकता।
कैसे हो? क्या हो? इसका तो
भार विचार न सह सकता।’

प्रेम के सौंदर्य के साथ-साथ प्रसाद के काव्य में विश्व-बंधुत्व, सर्व जन हिताय तथा व्यापक मानवतावाद से ओत-प्रोत रचनाएँ भी हैं ! प्रसाद मूलत: आंतरिक अनुभूतियों के कवि हैं, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि उनका काव्य समकालीन हलचलों को अनदेखा करता है। प्रसाद की कविता मानव में ईश्वर और ईश्वर में मानव को देखती है।

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4. भाषा-शैली – प्रसाद की भाषा-शैली परिष्कृत, स्वाभाविक, तत्सम शब्दावली प्रधान एवं सरस है। छोटे-छोटे पदों में गंभीर भाव भर देना और उनमें संगीत लय का विधान करना प्रसाद की शैली की प्रमुख विशेषताएँ हैं। देश-प्रेम की रचनाओं में ओज गुण प्रधान शब्दावली, शृंगार रस प्रधान रचनाओं में माधुर्य-गुण से युक्त शब्दावली तथा सामान्यतः प्रसाद गुणयुक्त शब्दावली का प्रयोग किया गया है।

शब्द-चित्रों की सुंदर योजना प्रसाद की रचनाओं में रहती है। इनकी रचनाओं में अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। प्रसाद की कविताओं में शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रामाणिक रूप मिलता है। इनकी काव्य-भाषा कहीं पर सरल तथा कहीं पर क्लिष्ट एवं तत्सम शब्दावली प्रधान है। स्वाभाविकता एवं प्रवाह उनकी भाषा की विशेषता है। भाषा भावानुकल है, इसलिए तत्सम शब्द भी स्वाभाविक लगते हैं। उनकी रचनाओं में मुहावरे बहुत कम हैं।

5. संगीतात्मकता – संगीतात्मकता उनके काव्य का प्रमुख स्वर है ! संगीत की स्वर-लहरी पद-पद पर झलकती है। ‘कामायनी’, ‘आँस’, ‘लहर’, ‘झरना’ सभी कविताएँ गेय हैं।
वस्तुतः उनके साहित्य में सर्वतोन्मुखी प्रतिभा की झलक दिखाई देती है।

कविता का सार :

मुंशी प्रेमचंद ने अपनी पत्रिका ‘हंस’ में छापने के लिए श्री जयशंकर प्रसाद से आत्मकथा लिखने का आग्रह किया था, पर उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। उन्होंने आत्मकथा न लिखकर ‘आत्मकथ्य’ कविता लिखी थी, जो सन 1932 में ‘हंस’ में छपी। कवि ने इस कविता में जीवन के यथार्थ को प्रकट करने के साथ-साथ उन अनेक अभावों को भी लिखा था, जिन्हें उन्होंने झेला था। उनका कहना था कि उनका जीवन किसी भी सामान्य व्यक्ति के जीवन की तरह सरल और सीधा था जिसमें कुछ भी विशेष नहीं था, वह लोगों की वाहवाही लूटने और उन्हें रोचक लगने वाला नहीं था।

जीवनरूपी उपवन में मनरूपी भँवरा गुनगुना कर चाहे अपनी कहानी कहता हो, पर उसके आसपास पेड़-पौधों की न जाने कितनी पत्तियाँ मुरझाकर बिखरती रहती हैं। इस नीले आकाश के नीचे न जाने कितने जीवन-इतिहास रचे जाते हैं, पर ये व्यंग्य से भरे होने के कारण पीड़ा को प्रकट करते हैं। क्या इन्हें सुनकर सुख पाया जा सकता है? मेरा जीवन तो खाली गागर के समान व्यर्थ है, अभावग्रस्त है। इस संसार में व्यक्ति स्वार्थ भरा जीवन जीते हैं। वे दूसरों के सुखों को छीनकर स्वयं सुखी होना चाहते हैं। यह जीवन की विडंबना है।

कवि दूसरों के धोखे और अपनी पीड़ा की कहानी नहीं सुनाना चाहता। वह नहीं समझता कि उसके पास दूसरों को सुनाने के लिए मीठी बातें हैं। उसे अपने जीवन में सुख प्रदान करने वाली मीठी-अच्छी बातें दिखाई नहीं देतीं। उसे प्राप्त होने वाले सुख आधे रास्ते से ही दूर हो जाते हैं। उसकी यादें थके हुए यात्री के समान हैं, जिसमें कहीं सुखद यादें नहीं हैं। कोई भी उसके मन में छिपी दुखभरी बातों को क्यों जानना चाहेगा! उसके छोटे-से जीवन में बड़ी उपलब्धियाँ नहीं हैं।

इसलिए कवि अपनी कहानियाँ न सुनाकर केवल दूसरों की बातें सुनना चाहता है। वह चुप रहना चाहता है। कवि को अपनी आत्मकथा भोली-भाली और सीधी-सादी प्रतीत होती है। उसके हृदय में छिपी हुई पीड़ाएँ मौन-भाव से थककर सो गई थीं, जिन्हें कवि जगाना उचित नहीं समझता। वह नहीं चाहता कि कोई उसके जीवन के कष्टों को जाने।

JAC Class 12 Geography Solutions Chapter 12 भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ

Jharkhand Board JAC Class 12 Geography Solutions Chapter 12 भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 12 Geography Solutions Chapter 12 भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए

1. निम्नलिखित में से सर्वाधिक प्रदूषित नदी कौन-सी है?

(क) ब्रह्मपुत्र
(ख) सतलुज
(ग) यमुना
(घ) गोदावरी।
उत्तर:
(ग) यमुना।

2. निम्नलिखित में से कौन-सा रोग जल जन्य है?
(क) नेत्रश्लेष्मला शोध
(ख) अतिसार
(ग) श्वसन संक्रमण
(घ) श्वासनली शोथ।
उत्तर:
(ख) अतिसार।

3. निम्नलिखित में से कौन-सा अम्ल वर्षा का एक कारण है?
(क) जल प्रदूषण
(ख) भूमि प्रदूषण
(ग) शोर प्रदूषण
(घ) वायु प्रदूषण।
उत्तर:
(घ) वायु प्रदूषण।

JAC Class 12 Geography Solutions Chapter 12 भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ

4. प्रतिकर्ष और अपकर्ष कारक उत्तरदायी है
(क) प्रवास के लिए
(ख) भू-निम्नीकरण के लिए
(ग) गंदी बस्तियां
(घ) वायु प्रदूषण।
उत्तर:
(क) प्रवास के लिए।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 30 शब्दों में दोप्रश्न

प्रश्न 1.
प्रदूषण और प्रदूषक में क्या भेद है?
उत्तर:
प्रदूषण से अभिप्राय वायु, भूमि तथा जल साधनों का अवनयन तथा हानिकारक बनना है। प्रदूषक उन पदार्थों को कहते हैं जो वातावरण में प्रदूषण फैलाते हैं।

प्रश्न 2.
वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वायु प्रदूषण के मुख्य स्रोत हैं:
(क) प्राकृतिक स्त्रोत जैसे-ज्वालामुखी विस्फोट, धूल, तूफ़ान, अग्नि आदि।
(ख) मानवकृत स्रोत-जैसे कारखाने, नगर-केन्द्र, मोटर वाहन, वायुयान, उर्वरक, पीड़क जीवनाशी, ताप बिजली घर।

प्रश्न 3.
भारत में नगरीय अपशिष्ट निपटान से जुड़ी प्रमुख समस्याओं का उल्लेख करो।
उत्तर:
नगरीय अपशिष्ट (ठोस पदार्थ) पर्यावरण प्रदूषण के हानिकारक स्रोत, नगरों में प्लास्टिक, कांच, पोलीथीन, रद्दी कागज़, राख व धातुओं कचरा की मात्रा में वृद्धि हो रही है। यह अपशिष्ट घरेलू, प्रतिष्ठानों तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से प्राप्त हो रहा है। इससे बदबू, मक्खियां, बीमारियां तथा भौम जल पर प्रभाव पड़ता है। इससे टाइफाइड, गलघोंटू, दस्त, हैज़ा, बीमारियां फैलती हैं।

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प्रश्न 4.
मानव स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण के क्या प्रभाव पड़ते हैं?
उत्तर:
वायु प्रदूषण से फेफड़ों, स्नायु तन्त्र, हृदय और परिसंचरण तन्त्रों के रोग उत्पन्न होते हैं। खांसी और श्वास नली से पीड़ित लोगों की संख्या बढ़ती है। पर्यावरण में विषाक्त धुएं वाली गैसों की उत्सर्जन से मानव स्वास्थ्य के लिए घातक है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दो

प्रश्न 1.
भारत में जल प्रदूषण की प्रकृति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जलीय प्रदूषण (Water Pollution):
जब भौतिक, रासायनिक तथा जैविक तत्त्वों द्वारा जलाशयों के जल में ऐसे अनैच्छिक परिवर्तन हो जाएं जिनसे जैव समुदाय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े उसे जलीय प्रदूषण कहते हैं। जल प्रदूषण की समस्या ने दिल्ली, कोलकाता तथा मुम्बई जैसे बड़े एवं औद्योगिक नगरों में बहुत विकट रूप धारण कर लिया है। जलीय प्रदूषण केवल नदियों, तालाबों तथा झीलों के धरातलीय जल तक ही सीमित नहीं होता, अपितु यह समुद्री जल तथा भूमिगत जल में भी पाया जाता है। जलीय प्रदूषण के लिए निम्नलिखित मानवीय क्रियाएं उत्तरदायी होती हैं

  1. घरेलू मल (Domestic Sewage)
  2. औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थ (Industrial Wastes)
  3. कृषि की प्रक्रियाएं (Agricultural Activities)
  4. तापीय प्रदूषण (Thermal Pollution)

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प्रश्न 2.
भारत में गन्दी बस्तियों की समस्याओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नगरों में जनसंख्या की अधिकता के कारण अनेक समस्याओं का विकास हो गया है जिनमें गन्दी बस्तियों तथा नगरीय कूड़ा-कर्कट की अधिकता और निपटान (disposal) सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है।

गन्दी बस्तियां (Slums): नगरों में जनसंख्या अधिक और स्थान कम होने के कारण आवासीय समस्या होती है। नगरीय क्षेत्रों में बहुमंज़िलें भवनों का निर्माण इसी समस्या का प्रतिफल है। प्रायः जब निर्धन लोग रोज़गार की तलाश में अपने गांवों को छोड़कर नगरों में आकर बसने लगते हैं तो नगरों में आवास बहुत महंगा तथा कम होने के कारण वे नगर के बाहर पड़ी भूमि पर झुग्गी-झोंपड़ियां बनाकर रहना आरम्भ कर देते हैं जिससे वहां गन्दी बस्तियों का विकास होने लगता है।

इन गन्दी बस्तियों में जनसंख्या का घनत्व बहुत अधिक होता है और वहां जल तथा घरेलू मल के निकास के लिए कोई व्यवस्था नहीं होती।  इन बस्तियों में रहने वाले लोग अत्यन्त ही निम्न स्तर का जीवन व्यतीत करते हैं। यद्यपि इन गन्दी बस्तियों में रहने वाले लोगों के लिए प्रशासन अनेक सुविधाएं प्रदान करने का प्रयास करता है, तथापि ये आवासीय बस्तियां बहुत ही निम्न स्तर की होती हैं और प्रायः ये गन्दगी तथा बीमारियों के क्षेत्र ही होती हैं। भारत के लगभग सभी बड़े नगरों में ऐसी गन्दी बस्तियां (Slums) पाई जाती हैं।

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प्रश्न 3.
भू-निम्नीकरण को कम करने के उपाय सुझाइए।
अथवा
‘भू-निम्नीकरण’ पर एक नोट लिखिए।
उत्तर:
भू-निम्नीकरण प्राकृतिक और मानवीय दोनों प्रकार के कारकों से होता है। वन विनाश, अतिचराई और भूमि का अनुचित उपयोग भी अपरदन की गति को तेज़ कर देते हैं। एक अनुमान के अनुसार देश की 13 करोड़ हेक्टेयर भूमि अपरदन की समस्याओं से पीड़ित है। केवल स्थानांतरी कृषि के कारण ही तीन करोड़ हेक्टेयर भूमि अपरदन से प्रभावित है। अपरदन के अतिरिक्त, मृदा के लवणीकरण और जल भराव के निम्नलिखित कारण हैं- भूविज्ञान की दृष्टि से अनुपयुक्त क्षेत्रों में बांधों, जलाशयों, नहरों और तालाबों का निर्माण, नहरी सिंचाई का अत्यधिक उपयोग और अप्रवेश्य चट्टानों वाले क्षेत्रों में बाढ़ के पानी का रुख मोड़ना। इनके द्वारा भूमि की संभावित क्षमता घटती है।

अति सिंचाई के कारण देश के उत्तरी मैदानों में लवणीय और क्षारीय क्षेत्रों में वृद्धि हुई है। सिंचाई मृदा की संरचना को भी बदल देती है। इनके अलावा रासायनिक उर्वरक, पीड़कनाशी, कीट-नाशी और शाक-नाशी मृदा के प्राकृतिक, भौतिक रासायनिक और जैविक गुणों को नष्ट करके, मृदा को बेकार कर देते हैं। भू-निम्नीकरण को रोकने के लिए अपरदन को रोकने के उपाय किए जाएं। पहाड़ी ढलानों पर वनारोपण करके अति चराई को कम किया जाए। सिंचाई का उचित प्रयोग किया जाए। उर्वरक तथा कीटनाशकों का प्रयोग कम किया जाए।

भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ  JAC Class 12 Geography Notes

→ प्रदूषण के प्रकार (Types of Pollution):

  1. वायु प्रदूषण
  2. जल प्रदूषण
  3. भू-प्रदूषण
  4. ध्वनि प्रदूषण।

→ जल प्रदूषण (Water Pollution): जल प्रदूषण के दो स्रोत हैं प्राकृतिक, मानव जनित।

→ प्रदूषित नदियां (Polluted Rivers): गंगा तथा यमुना एवं अन्य।

→ ध्वनि प्रदूषण के स्रोत (Sources of Noise Pollution): उद्योग, मशीनें, मोटर वाहन, वायुयान।

→ गन्दी बस्तियां (Slums): मुम्बई के निकट धारावी-एशिया की सबसे बड़ी गन्दी बस्ती है।

→ भू-निम्नीकरण (Land degradation): भू-निम्नीकरण के मुख्य कारण अपरदन, लवणता, भू-क्षारता।