JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 सवैया और कवित्त

Jharkhand Board JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 सवैया और कवित्त Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 सवैया और कवित्त

JAC Class 10 Hindi सवैया और कवित्त Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
कवि ने ‘श्रीब्रजदूलह’ किसके लिए प्रयुक्त किया है और उन्हें संसार रूपी मंदिर का दीपक क्यों कहा है?
उत्तर :
कवि ने श्रीकृष्ण के लिए ‘श्रीब्रजदूलह’ का प्रयोग किया है। श्रीकृष्ण ब्रह्म स्वरूप हैं और सृष्टि के कण-कण में समाए हुए हैं। सारी सृष्टि उन्हीं की लीला, प्रेम, करुणा और दया का परिणाम है। वे प्रत्येक प्राणी के जीवन के आधार हैं और सभी की आत्मा में उन्हीं का वास है। इसलिए उन्हें संसार रूपी मंदिर का दीपक कहा गया है।

प्रश्न 2.
पहले सवैये में से उन पंक्तियों को छाँटकर लिखिए जिनमें अनुप्रास और रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है।
उत्तर :
(क) अनुप्रास –
(i) कटि किंकिनि के धुनि की मधुराई
(ii) साँवरे अंग लसै पट पीत।
(iii) हिये हुलसै बनमाल सुहाई।
(iv) मंद हँसी मुखचंद जुहाई।
(v) जै जग – मंदिर-दीपक सुंदर।

(ख) रूपक –
(i) मंद हँसी मुखचंद जुहाई।
(ii) जै जग-मंदिर-दीपक सुंदर।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 सवैया और कवित्त

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पंक्तियों का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए
पाँयनि नूपुर मंजु बसें, कटि किंकिनि कै धुनि की मधुराई।
साँवरे अंग लसै पट पीत, हिये हुलसै बनमाल सुहाई।
उत्तर :
कवि ने श्रीकृष्ण की अपार रूप-सुंदरता का वर्णन करते हुए कहा है कि उनके पाँव में पाजेब शोभा देती है, जो उनके चलने पर मधुर ध्वनि उत्पन्न करती है। उनकी कमर में करधनी मधुर धुन पैदा कर रही है। उनके साँवले-सलोने शरीर पर पीले रंग के वस्त्र अति शोभा देते हैं। उनकी छाती पर फूलों की सुंदर माला शोभायान है। ब्रजभाषा में रचित पंक्तियों में तत्सम शब्दावली की अधिकता है। सवैया छंद और स्वरमैत्री लयात्मकता का आधार है। अभिधा शब्द-शक्ति ने कथन को सरलता, सरसता और सहजता प्रदान की है। अनुप्रास अलंकार की स्वाभाविक शोभा प्रकट की गई है।

प्रश्न 4.
दूसरे कवित्त के आधार पर स्पष्ट करें कि ऋतुराज बसंत के बाल-रूप का वर्णन परंपरागत बसंत वर्णन से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर :
परंपरागत रूप से बसंत का वर्णन करते हुए कवि प्रायः ऋतु परिवर्तन की शोभा का वर्णन करते हैं। वे रंग-बिरंगे फूलों, चारों ओर फैली हरियाली, नायिकाओं के झूले, परंपरागत रागों, राग-रंग आदि का बखान करते हैं। वे नर-नारियों के हृदय में उत्पन्न होने वाले प्रेम और काम-भावों का वर्णन करते हैं। लेकिन इस कवित्त में कवि ने बसंत का बाल-रूप में चित्रण किया है, जो कामदेव का बालक है। सारी प्रकृति उसके साथ वैसा ही व्यवहार करती दिखाई गई है, जैसा सामान्य जीवन में नवजात बच्चों से व्यवहार किया जाता है। इससे कवि की कल्पनाशीलता और सुकुमार भाव प्रवणता का परिचय मिलता है।

प्रश्न 5.
‘प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दै’–इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
काव्य-रूढ़ि है कि सुबह-सवेरे जब कलियाँ फूलों के रूप में खिलती हैं, तो ‘चट्’ की ध्वनि करती हुई खिलती हैं। कवि ने इसी काव्य-रूढ़ि का प्रयोग करते हुए बालकरूपी बसंत को प्रातः जगाने के लिए गुलाब के फूलों की सहायता ली है। सुबह गुलाब के खिलते ही चटकने की ध्वनि उत्पन्न होती है। कवि ने इससे स्पष्ट किया है कि वे चुटकियाँ बजाकर बाल-बसंत को प्यार से जगाते हैं।

प्रश्न 6.
चाँदनी रात की सुंदरता को कवि ने किन-किन रूपों से देखा है?
उत्तर :
कवि ने चाँदनी रात की सुंदरता को स्फटिक की शिलाओं से बने सुधा मंदिर में प्रकट किया है, जो दही के समुद्र में उत्पन्न तरंगों के रूप में दिखाई देती है। वह दूध की झाग के समान सर्वत्र फैलकर अपनी सुंदरता को व्यक्त करती है। सारा आकाश उसकी आभा से जगमगाता है। चाँदनी रात में चाँदनी की तरह दमकती हुई राधा के प्रतिबिंब से ही चाँद सुंदर लगता है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 सवैया और कवित्त

प्रश्न 7.
‘प्यारी राधिका को प्रतिबिंब सो लगत चंद’- इस पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताएं कि इसमें कौन-सा अलंकार है?
उत्तर :
राधा का रूप अति सुंदर है; चाँदनी में नहाया हुआ उसका रूप अति उज्ज्वल है। चंद्रमा की शोभा और चमक-दमक उसकी अपनी नहीं है, बल्कि वह राधा के रूप को बिंबित कर रहा है। इसलिए वह इतना सुंदर है। इस पंक्ति में उपमा अलंकार है।

प्रश्न 8.
तीसरे कवित्त के आधार पर बताइए कि कवि ने चाँदनी रात की उज्ज्वलता का वर्णन करने के लिए किन-किन उपमानों का प्रयोग किया है?
उत्तर :
फटिक सिलानि, उदधि दधि, दूध को सो फेन, मोतिन की जोति, तारासी मल्लिका को मकरंद, आरसी से अंबर।

प्रश्न 9.
पठित कविताओं के आधार पर कवि देव की काव्यगत विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :
देव रीतिकालीन आचार्य कवि थे, जिनके काव्य में रीतिकालीन कविता की लगभग सभी विशेषताएँ दिखाई देती हैं। पठित कविताओं के आधार पर उनकी निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ दिखाई देती हैं –
1. शृंगारिकता – देव ने अपनी कविताओं में राधा-कृष्ण के माध्यम से अपनी शृंगारिक भावनाएँ प्रकट की हैं। उनकी प्रवृत्ति भी अन्य रीतिकालीन कवियों की तरह संयोग श्रृंगार में अधिक रमी है। राधा की रूप माधुरी ने विशेष रूप से प्रभावित किया है। चाँदनी रात में उसका रूप ऐसा निखरा हुआ है कि चंद्रमा भी उसका बिंब मात्र दिखाई देती है –

तारा सी तरुनि तामें ठाढ़ी झिलमिली होति,
मोतिन की जोति मिल्यो मल्लिका को मकरंद।
आरसी से अंबर में आभा सी उजारी लगै,
प्यारी राधिका को प्रतिबिंब सो लगत चंद।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 सवैया और कवित्त

2. भक्ति-भाव – देव चाहे शृंगारिक कवि थे, पर भारतीय संस्कारों में बँधने के कारण वे कभी नास्तिक नहीं रहे। उन्होंने अपनी कविता में बार-बार वैराग्य भावना और आस्तिकता को प्रकट किया है। वे वैष्णव थे। उन्होंने श्रीकृष्ण के प्रति अपने भक्ति-भाव को प्रकट किया है –

माथे किरीट बड़े दृग चंचल, मंद हँसी मुखचंद जुन्हाई,
जै जग-मंदिर-दीपक सुंदर, श्रीब्रजदूलह ‘देव’ सहाई॥

3. प्रकृति-चित्रण – देव ने अपनी कविताओं में प्रकृति-चित्रण अति सुंदर ढंग से किया है। उनके काव्य में प्रकृति साध्य नहीं है, बल्कि साधन है। उन्होंने प्रकृति वर्णन में ऋतु वर्णन की परंपरा का पालन किया। उनकी प्रकृति संबंधी मौलिक दृष्टि की वहाँ सराहना करनी पड़ती है, जहाँ उन्होंने बसंत का अति भावपूर्ण चित्रण किया है। उन्होंने बसंत का परंपरागत वर्णन न कर उसे कामदेव के बालक के रूप में प्रकट किया है, जिसकी सेवा में सारी प्रकृति लीन हो जाती है –

डार द्रुम पलना बिछौना नव पल्लव के,
सुमन झिंगूला सोहै तन छवि भारी दै।
पवन झूलावै, केकी-कीर बतरावै, ‘देव’,
कोकिल हलावै-हुलसावै कर तारी है।

4. कला-पक्ष-देव ने अपने काव्य को सफल अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए शब्द शक्तियों का अच्छा प्रयोग किया है। उनके अमिधा के प्रयोग में सहजता है। उन्होंने माधुर्य और प्रसाद गुण का अच्छा प्रयोग किया है। उन्हें अनुप्रास अलंकार के प्रति विशेष मोह है-
(i) पूरित पराग सों उतारो करै राई नोन
(ii) मदन महीप जू को बालक बसंत ताहि
(iii) कटि किंकिनि कै धुनि की मधुराई
(iv) मोतिन की जोति मिल्यो मल्लिका को मकरंद

इन्होंने उपमा का भी अच्छा प्रयोग किया है। ब्रजभाषा की कोमलकांत शब्दावली का इन्होंने सार्थक और सुंदर प्रयोग किया है। इनके काव्य में तत्सम शब्दावली का प्रयोग अधिक है।

रचना और अभिव्यक्ति – 

प्रश्न 10.
आप अपने घर की छत से पूर्णिमा की रात देखिए तथा उसके सौंदर्य को अपनी कलम से शब्दबद्ध कीजिए।
उत्तर :
मेरा घर यमुना-किनारे से कुछ ही दूरी पर है। इसके आसपास का क्षेत्र हरे-भरे पेड़ों, सरकंडों और झाड़ियों से भरा हुआ है। पूर्णिमा की रात को सारा आकाश तो चाँदनी से जगमगाता ही है, पर यमुना नदी का पानी भी उससे जगमगाता-सा प्रतीत होता है। जब पानी की लहरें तेजी से आगे बढ़ती हैं, तो चाँद के चमकीले टुकड़े उन पर सवार उछलते-कूदते-से प्रतीत होते हैं। अँधेरी रातों में प्राय: न दिखाई देने वाले पेड़ चाँदनी में अपना काला रूप लिए दिखाई देते हैं। वे सुंदर नहीं लगते। वे कुछ-कुछ डरावने से प्रतीत होते हैं। चाँदनी रात में यमुना में तैरती कोई-कोई नौका बहुत सुंदर लगती है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 सवैया और कवित्त

पाठेतर सक्रियता – 

प्रश्न 1.
भारतीय ऋतु चक्र में छह ऋतुएँ मानी गई हैं, वे कौन-कौन सी हैं ?
उत्तर :
गरमी, सरदी, वर्षा, बसंत, हेमंत, शिशिर।

प्रश्न 2.
‘ग्लोबल वार्मिंग’ के कारण ऋतुओं में क्या परिवर्तन आ रहे हैं ? इस समस्या से निपटने के लिए आपकी क्या भूमिका हो सकती है?
उत्तर :
विश्व भर में बड़ी तेज़ी से उद्योग स्थापित किए जा रहे हैं। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से हर देश नए-नए उद्योग स्थापित करके आर्थिक उन्नति की ओर तेज़ी से कदम बढ़ाने का प्रयत्न कर रहा है। ऊर्जा की उत्पत्ति के लिए वे जीवाश्मी ईंधन को जलाते हैं। कोयला और पेट्रोल भूमि के गर्भ से निकाल-निकालकर दिन-रात जलाया जा रहा है। इससे लोगों को सुख-सुविधाएँ तो अवश्य प्राप्त हो रही हैं, पर साथ-ही-साथ वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन गैसों की मात्रा बढ़ती जा रही है। ये दोनों गैसें वायु के तापमान को तेजी से बढ़ा रही हैं। इसे ही ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं।

इस तापमान वृद्धि का परिणाम ही है कि ध्रुवों पर जमी बर्फ की परत पिघलने लगी है। जिस ग्लेशियर से गंगा नदी निकलती है, वह तेजी से पिघलने लगा है। इसका परिणाम यह हो सकता है कि आने वाले समय में धरती के वातावरण का तापमान बढ़ने के साथ-साथ जल-स्रोतों में कमी आने लगेगी। ‘ग्लोबल वार्मिंग’ अर्थात ‘वैश्विक तापन’ पूरी पृथ्वी के लिए खतरे की घंटी है, जो हमारे भविष्य के लिए अति खतरनाक सिद्ध होगी। इससे समुद्रों का जलस्तर बढ़ने लगेगा, जिसके परिणामस्वरूप समुद्र तटों पर बसे नगर डूबने लगेंगे।

द्वीप पूरी तरह समुद्र में समा जाएँगे। ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निपटने के लिए कोई एक व्यक्ति या कोई एक देश कुछ नहीं कर सकता। इस समस्या से निपटने के लिए विश्व भर के देशों को एक साथ मिलकर प्रयत्न करना होगा। हमें ऐसी नीतियाँ बनाकर कठोरता से लागू करनी होंगी कि कोयले और पेट्रोल के दहन को नियंत्रित किया जाए। सौर ऊर्जा, जलीय ऊर्जा, पवन ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा, सागरीय ऊर्जा आदि का अधिकसे-अधिक प्रयोग किया जाए ताकि हवा में कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन गैसें न बढ़ें।

वाहनों के लिए सौर ऊर्जा या विद्युत का प्रयोग किया जाए। इस समस्या से निपटने के लिए हमारी भूमिका यह हो सकती है कि हम योजना-बद्ध तरीके से जन जागृति में सहायक बनें। जिन लोगों को इस समस्या का अभी पता नहीं है, उन्हें सचेत करें। अपने स्कूल में ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करें, जिनसे बच्चे-बच्चे को इस समस्या की जानकारी मिले। आज का बच्चा ही आने वाले कल के उद्योगपति और नेता होंगे। उचित जानकारी होने पर वे : इस समस्या पर नियंत्रण पा सकेंगे।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 सवैया और कवित्त

यह भी जानें –

कवित्त – कवित्त वार्णिक छंद है, उसके प्रत्येक चरण में 31-31 वर्ण होते हैं। प्रत्येक चरण के सोलहवें या फिर पंद्रहवें वर्ण पर यति रहती है। सामान्यतः चरण का अंतिम वर्ण गुरु होता है।

‘पाँयनि नूपुर’ के आलोक में भाव साम्य के लिए पढ़ें –

सीस मुकुट कटि काछनि, कर मुरली उर माल।
यों बानक मौं मन सदा, बसौ बिहारी लाल॥
– बिहारी

रीतिकालीन कविता की वसंत ऋतु का एक चित्रण यह भी देखिए –

कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में,
क्यारिन में कलित कलीन किलकत है।
कहै पदमाकर परागन में पौनहू में
पातन में पिक में पलासन पगंत है।
द्ववारे में दिसान में दुनी में देस देसन में
देखौ दीपदीपन में दीपत दिगंत है।
बीथिन में ब्रज में नबेलिन में बेलिन में
बनन में बागन में बगस्यौ बसंत है।
– पदमाकर

JAC Class 10 Hindi सवैया और कवित्त Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
देव की कविता में शब्द भंडार पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर :
देव शब्दों के कुशल शिल्पी हैं, जिन्होंने एक-एक शब्द को बड़ी कुशलता से तराशकर अपने शब्द भंडार को समृद्ध किया है। उनकी वर्ण-योजना में संगीतात्मकता और चित्रात्मकता विद्यमान है। भाव और वर्ण-विन्यास में संगति है। उनका एक-एक शब्द मोतियों की तरह कवित्त-सवैयों की जमीन पर सजाया गया है –

पाँयनि नूपुर मंजु बज, कटि किंकिनि कै धुनि की मधुराई।
साँवरे अंग लसै पट पीत, हिये हुलसै बनमाल सुहाई॥

कवि के पास अक्षय शब्द-भंडार है। भिन्न-भिन्न पर्याय और विशेषणों द्वारा देव ने भावों की विभिन्न छवियों को उतारा है। उन्होंने अभिधा, लक्षणा और व्यंजना तीनों का सफलतापूर्वक प्रयोग किया है –

आरसी से अंबर में आभा सी उजारी लगै,
प्यारी राधिका को प्रतिबिंब सो लगत चंद।

कवि के शब्दों में तत्सम की अधिकता है। तद्भव शब्दावली का उन्होंने सुंदर प्रयोग किया है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 सवैया और कवित्त

प्रश्न 2.
पठित पदों के आधार पर देव के चाक्षुक बिंब विधान को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
देव के काव्य में सुंदर ढंग से बिंब योजनाएँ की गई हैं। इससे श्रृंगारपरक अंश खिल उठे हैं। चाक्षुक बिंब योजना ऐसी है कि श्रोता या पाठक की आँखों के सामने कवि के मन में उभरी रूप-छवि स्पष्ट उभर आती है –

(i) साँवरे अंग लसै पट पीत, हिये हुलसै बनमाल सुहाई।
माथे किरीट बड़े दृग चंचल, मंद हँसी मुखचंद जुन्हाई।
(ii) पूरित पराग सों उतारो करै राई नोन,
कंजकली नायिका लतान सिर सारी दै।

देव के बिंब विधान में संवेदनात्मक, अलंकरण और क्रमबद्धता के अतिरिक्त भावात्मक संबंध स्थापित करने की शक्ति है।

प्रश्न 3.
देव के कवित्त और सवैया की विशेषता लिखिए।
उत्तर :
छंद में लयमान होना कविता की विशेषता है। इससे कविता की सुंदरता की रक्षा होती है। विभिन्न छंदों के प्रयोग से काव्य के भावों को गति दी जा सकती है। देव ने कवित्त और सवैया के प्रयोग से लय की उत्पत्ति की है। कवि ने श्रृंगारिक लय बनाने के लिए कवित्त छंद का अधिक प्रयोग किया है। सवैया से प्रसाद, गुण और ओज तीनों गुणों को सरलता से प्रस्तुत करने में उन्होंने सफलता पाई है।

प्रश्न 4.
पठित कविताओं को आधार बनाकर देव के सौंदर्य-निरूपण पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर :
देव प्रेम, सौंदर्य और श्रृंगार के कवि हैं। उन्होंने अपने अधिकतर साहित्य की रचना सौंदर्य और श्रृंगार के आधार पर की है। उनकी कविता में सौंदर्य और श्रृंगार का पुराना रूप दिखाई देता है। उन्होंने इस क्षेत्र में नई कल्पनाएँ नहीं की थीं। उन्होंने परंपरागत उपमानों का ही प्रयोग किया था।

उन्होंने श्रीकृष्ण की सुंदरता सामंती प्रवृत्ति के आधार पर की है।

पाँयनि नूपुर मंजु बसें, कटि किंकिनि कै धुनि की मधुराई।
साँवरे अंग लसै पट पीत, हिये हुलसै बनमाल सुहाई।

राधा अद्भुत सौंदर्य की स्वामिनी है। उसके सौंदर्य के सामने सारे नर-नारी पानी भरते हैं। चाँद भी उसकी सुंदरता का बिंब मात्र है –

आरसी से अंबर में आभा सी उजारी लगै,
प्यारी राधिका को प्रतिबिंब सो लगत चंद।।

चाँदनी के रंग वाली वह स्फटिक के महल में छिपी-सी रहती है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 सवैया और कवित्त

प्रश्न 5.
चाँदनी रात के उस रूप का वर्णन कीजिए, जिसे कवि ने अपने कवित्त में वर्णित किया है।
उत्तर :
चाँदनी रात सुंदरता की पर्याय है, जिसकी आभा ने सारे संसार को सुंदरता प्रदान की है। स्फटिक की शिलाओं से अमृत-सा उज्ज्वल भवन जगमगा उठता है और दही रूपी सागर की तरंगें अपार मात्रा में उमड़ जाती हैं। दूध की झाग-सी चाँदनी इस प्रकार सब ओर फैल जाती है कि बाहर-भीतर की दीवारें तक दिखाई नहीं देतीं। आँगन और फ़र्श चाँदनी-से नहा उठते हैं। तारे-सी सुंदर राधा चाँदनी में झिलमिलाती हुई ऐसी प्रतीत होती है, जैसे मोती की आभा में मल्लिका के पराग की सुगंध मिली हो। आईने जैसे साफ़-स्वच्छ आकाश में चाँदनी फैल जाती है। चंद्रमा की जगमगाहट राधा के प्रतिबिंब का ही रूप है।

प्रश्न 6.
देव ने मदन महीप बालक किसे और क्यों कहा है?
उत्तर :
कवि देव ने मदन महीप बालक वसंत ऋतु को कहा है। वह वसंत को कामदेव के पुत्र के रूप में देखता है, क्योंकि वसंत के आगमन पर ही सारी प्रकृति हरियाली से युक्त हो जाती है। रंग-बिरंगे फूल खिल जाते हैं। मंद-मंद सुगंधित हवाएँ बहने लगती हैं। पंक्षी चहचहाने लगते हैं। यही कारण है कि कवि देव ने वसंत को मदन महीप बालक कहा है।

प्रश्न 7.
कवि ने किस कवित्त में रासलीला का दृश्य दिखाया है और कैसे?
उत्तर :
कवि ने दूसरे कवित्त में रासलीला का दृश्य दिखाया है। प्रकृति की मनोरम छटा का सहारा लेकर कवि ने रासलीला का सुंदर शब्द-चित्र सजाया है। उन्होंने महारास की कल्पना करते हुए चाँदनी रात को देखा है। वह कल्पना करते हैं, मानो दूर आकाश में स्फटिक शिलाओं से एक सुधा-मंदिर बना हुआ है। उस आकाश का फर्श एक दम पारदर्शी है। वह दूध के झाग के समान उज्ज्वल है। तारों के समान राधा की सखियों का झिलमिलाना रास है। चंद्रमा का प्रकाश भी राधा की परछाईं के समान ही प्रतीत होता है।

प्रश्न 8.
कवि देव के काव्य का प्रमुख विषय क्या है?
उत्तर :
कवि देव के काव्य का प्रमुख विषय शृंगार है। उन्होंने राधा-कृष्ण के माध्यम से शृंगारिक भावनाओं को प्रकट किया है। उन्होंने शृगार रस के दोनों पक्षों का भली-भाँति प्रयोग किया है। संयोग शृंगार को रचने में उनका मन अधिक रमता हैं। इसके साथ-साथ उन्होंने वैराग्य तथा भक्ति-भाव का भी सफल चित्रण किया है।

प्रश्न 9.
देव की भक्ति-भावना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
देव रीतिकाल के कवियों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उनके जीवन में भक्ति का प्रवेश शीघ्र हो गया था। उन्होंने वैराग्य और भक्ति-भावना का सुंदर सहज वर्णन किया है। उन्होंने शारीरिक क्रियाओं को माया का बंधन माना है। उनके काव्य में भक्ति के साथ-साथ दार्शनिकता के दर्शन भी बार-बार होते हैं।

प्रश्न 10.
देव के काव्यशिल्प पर विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर :
देव का काव्यशिल्प उनके भावपक्ष के अनुसार ही अत्यंत समृद्ध है। उनकी भाषा में सहजता तथा सरलता है। उन्होंने ब्रजभाषा में अपनी काव्य-धारा प्रवाहित की है। उनकी ब्रजभाषा में सर्वत्र स्वच्छता, एकरूपता विद्यमान है। इसी कारण इनकी भाषा में भावों के अनुकूल चलने की अद्भुत क्षमता है। उन्होंने प्रायः ठेठ ब्रजभाषा के शब्दों का ही अधिक प्रयोग किया है। उनकी भाण की प्रकृति साफ-सुथरी और अत्यंत निखरी है। देव का भाषा पर इतना अधिकार दिखाई पड़ता है कि वह कवि के इशारे पर नाचती है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 सवैया और कवित्त

प्रश्न 11.
कवि देव ने पठित छंदों में प्रकृति का मानवीकरण किस प्रकार किया है?
उत्तर :
कवि देव ने प्रकृति को एक बालक के रूप में चित्रित किया है। उन्होंने ऋतुराज वसंत को कामदेव के पुत्र के समान माना है। इसके अतिरिक्त और भी अनेक स्थानों पर कवि ने बड़ी सहजता के साथ प्रकृति का मानवीकरण किया है; जैसे हवा बालक वसंत का पालना झुलाती है; तोते बालक से बातें करते हैं; वसंत की नज़र फूलों के पराग से उतारी गई आदि।

सप्रसंग व्याख्या, अर्थग्रहण संबंधी एवं सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर – 

सवैया –

1. पाँयनि नूपुर मंजु बसें, कटि किंकिनि कै धुनि की मधुराई।
साँवरे अंग लसै पट पीत, हिये हुलसै बनमाल सुहाई।
माथे किरीट बड़े दृग चंचल, मंद हँसी मुखचंद जुन्हाई।
जै जग-मंदिर-दीपक सुंदर, श्रीब्रजदूलह ‘देव’ सुहाई॥

शब्दार्थ : पाँयनि – पाँवों में। नूपुर – पायल, पाजेब। मंजु – सुंदर। कटि – कमर। किंकिनि – करधनि। लसै – शोभा देता है। पट – वस्त्र। पीत – पीला। हिये – छाती, हृदय। हुलसै – आनंदित होना। बनमाल – फूलों की माला। सुहाई – शोभा देती है। किरीट – मुकुट। दृग – आँखें। मंद – धीमी। मुखचंद – चंद्र के समान मुख। जुन्हाई – चाँदनी।

प्रसंग : प्रस्तुत सवैया रीतिकालीन कवि देव के द्वारा रचित है और इसे हमारी पाठ्य-पुस्तक क्षितिज (भाग-2) में संकलित किया गया है। इसमें कवि ने श्रीकृष्ण के बालरूप की अद्भुत सुंदरता का वर्णन किया है।

व्याख्या : कवि कहता है कि श्रीकृष्ण के पाँव में पाजेब है, जो उनके चलने पर अत्यंत सुंदर ध्वनि उत्पन्न करती है। उनकी कमर में करधनी है, जो मीठी धुन पैदा करती है। उनके साँवले-सलोने अंगों पर पीले रंग के वस्त्र शोभा दे रहे हैं। उनकी छाती पर फूलों की माला शोभा देती हुई मन में प्रसन्नता उत्पन्न करती है। उनके माथे पर मुकुट है और उनकी बड़ी-बड़ी आँखें हैं, जो चंचलता से भरी हैं। उनकी मंद-मंद हँसी उनके चाँद जैसे सुंदर चेहरे पर चाँदनी की तरह फैली हुई है। संसाररूपी इस मंदिर में दीपक के समान जगमगाते हुए अति सुंदर श्रीकृष्ण की जय-जयकार हो। कवि कहता है कि जीवन में सदा श्रीकृष्ण सहायता करते रहे।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. पद में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।
2. श्रीकृष्ण के पाँव में क्या है?
3. श्रीकृष्ण की कमर में बँधी किस वस्तु के कारण मधुर धुन उत्पन्न हो रही है?
4. श्रीकृष्ण के वस्त्र किस रंग के हैं?
5. उनके गले की शोभा को किसने बढ़ाया है?
6. श्रीकृष्ण की आँखों की सुंदरता को स्पष्ट कीजिए।
7. कवि को बालक कृष्ण के चेहरे पर मुस्कान कैसी प्रतीत हो रही है?
8. कवि ने किसकी जय-जयकार की है?
9. श्रीकृष्ण के माथे की शोभा किससे बढ़ी है?
उत्तर :
1. कवि ने पद में श्रीकृष्ण के बालरूप की सुंदरता को प्रस्तुत किया है। साँवले रंग के श्रीकृष्ण पीले रंग के वस्त्रों में सजे हुए अति सुंदर लगते हैं। उनके गले में माला है; पाँव में पाजेब है और कमर में करधनी शोभा दे रही है। उनके माथे पर मुकुट है और चेहरे पर चाँदनी के समान मुस्कान फैली हुई है।
2. श्रीकृष्ण के पाँव में पायल है।
3. श्रीकृष्ण की कमर में बँधी करधनी के कारण मधुर धुन उत्पन्न हो रही है।
4. श्रीकृष्ण के वस्त्र पीले रंग के हैं।
5. उनके गले की शोभा को ‘बनमाल’ अर्थात फूलों की माला ने बढ़ाया है।
6. श्रीकृष्ण की आँखें बड़ी-बड़ी और चंचलता से भरी हुई हैं।
7. कवि को श्रीकृष्ण के चेहरे पर फैली मुस्कान चाँदनी के समान प्रतीत हो रही है।
8. कवि ने श्रीकृष्ण की जय-जयकार की है।
9. श्रीकृष्ण के माथे की शोभा मुकुट के कारण बढ़ी है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 सवैया और कवित्त

सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. कवि ने किस रूपक के माध्यम से श्रीकृष्ण से अपनी दया बनाए रखने की प्रार्थना की है?
2. पद में किस भाषा का प्रयोग किया गया है?
3. कवि ने किस प्रकार के शब्दों का समन्वित प्रयोग किया है ?
4. कवि ने सामंती वैभव के आधार पर किसका सौंदर्य चित्रण किया है?
5. किस शब्द में रूपकात्मकता और प्रतीकात्मकता का प्रयोग किया है ?
6. सवैया में बिंब किस प्रकार है?
7. किस छंद का प्रयोग किया है ?
8. लयात्मकता की सृष्टि किस प्रकार हुई है?
9. किस शब्दशक्ति के प्रयोग से कवि ने कथन को सरलता-सरसता प्रदान की है?
10. किस शब्द में लाक्षणिकता विद्यमान है।
11. कवि ने किस काव्य गुण का प्रयोग किया है?
12. पद में निहित अलंकार-योजना स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
1. कवि ने श्रीकृष्ण की सुंदरता का चित्रण किया है और संसाररूपी इस मंदिर में सदा अपनी दया बनाए रखने की प्रार्थना की है।
2. ब्रजभाषा का सहज व सुंदर प्रयोग किया गया है।
3. तत्सम और तद्भव शब्दावली का समन्वित प्रयोग सराहनीय है।
4. कवि ने सामंती वैभव के आधार पर श्रीकृष्ण के रूप-सौंदर्य का चित्रण किया है।
5. ‘जग-मंदिर-दीपक’ में रूपकात्मकता और प्रतीकात्मकता विद्यमान है।
6. चाक्षुक बिंब।
7. सवैया छंद।
8. स्वरमैत्री ने लयात्मकता की सृष्टि की है।
9. अभिधा शब्द-शक्ति के प्रयोग ने कवि के कथन को सरलता-सरसता से प्रकट किया है।
10. ‘श्रीब्रजदूलह’ शब्द में लाक्षणिकता विद्यमान है।
11. माधुर्य गुण।
12. रूपक –

  • मुखचंद
  • मंद हँसी जुन्हाई
  • जग-मंदिर-दीपक

अनुप्रास –

  • हिये हुलसै
  • कटि किंकिनि
  • पट पीत
  • मंद हँसी मुखचंद जुन्हाई
  • जै जग-मंदिर
  • कवित्त

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 सवैया और कवित्त

2. डार द्रुम पलना बिछौना नव पल्लव के,
सुमन झिंगूला सोहै तन छबि भारी दै।
पवन झूलावै, केकी-कीर बतरावैं ‘देव’,
कोकिल हलावै-हुलसावै कर तारी दै॥
पूरित पराग सों उतारो करै राई नोन,
कंजकली नायिका लतान सिर सारी दै।
मदन महीप जू को बालक बसंत ताहि,
प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दै॥

शब्दार्थ : डार – डाली, टहनी, डालकर। द्रुम – पेड़। पलना – बच्चों का झूला। नव पल्लव – नए पत्ते। सुमन – फूल। झिंगूला – झबला, ढीला-ढाला – वस्त्र। तन – शरीर। छबि – शोभा। पवन – हवा। केकी – मोर। कीर – तोता। कोकिल – कोयल। हलावे – हिलाती है। हुलसावै – खुश करती है। कर – हाथ। तारी – ताली। उतारो करै राई नोन – जिस बच्चे को नज़र लगी हो उसके सिर के चारों ओर राई-नमक घुमाकर आग में जलाने का टोटका। कंजकली – कमल की कली। लतान – बेलें। सारी – साड़ी। मदन – कामदेव। महीप – राजा। प्रातहि – सुबह-सुबह। चटकारी – चुटकी।

प्रसंग : प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘क्षितिज’ (भाग-2) में संकलित ‘कवित्त’ से लिया गया है, जिसके रचयिता रीतिकालीन कवि देव हैं। कवि ने ऋतुराज बसंत को एक बालक के रूप में प्रस्तुत किया है और प्रकृति के प्रति अपने प्रेम-भाव को प्रकट किया है।

व्याख्या : कवि कहता है कि बसंत एक नन्हे बालक की तरह पेड़ की डाली पर नए-नए पत्तों के पलने रूपी बिछौने पर झूलने लगा है। फूलों का ढीला-ढाला झबला उसके शरीर पर अत्यधिक शोभा दे रहा है। बसंत के आते ही पेड़-पौधे नए-नए पत्तों और फूलों से सज-धजकर शोभा देने लगे हैं। हवा उसके पलने को झुलाती है। कवि कहता है कि मोर और तोते अपनी-अपनी आवाज़ों में उससे बातें करते हैं। कोयल उसके पलने को झुलाती है और तालियाँ बजा-बजाकर अपनी प्रसन्नता प्रकट करती है।

कमल की कलीरूपी नायिका सिर पर लतारूपी साड़ी से सिर ढाँपकर अपने पराग कणों से बालक बसंत की नज़र उतार रही है। बालक बसंत को दूसरों की बुरी नज़र से बचाने के लिए वह वैसा ही टोटका कर रही है, जैसा सामान्य नारियाँ बच्चे की नज़र उतारने के लिए उसके सिर के चारों ओर राई-नमक घुमाकर आग में डालने का टोटका करती हैं। यह बसंत कामदेव महाराज का बालक है, जिसे प्रातः होते ही गुलाब चुटकियाँ बजाकर जगाते हैं। गुलाब की कली फूल में बदलने से पहले जब चटकती है, तो बसंत को जगाने के लिए ही ऐसा करती है।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. कवित्त में निहित भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
2. बालक बसंत का बिछौना किससे बना है?
3. बसंत कैसे वस्त्र पहने हुए है?
4. बसंत के पालने को झुलाने का कार्य कौन कर रहा है?
5. कोयल क्या कर रही है?
6. कमल की कलीरूपी नायिका ने अपना सिर किससे ढाँपा और उसने क्या किया?
7. बसंत किसकी संतान है?
8. प्रातः होते ही बसंत को गुलाब किस प्रकार जगाते हैं ?
9. बसंत की नज़र किससे उतारी गई ?
उत्तर :
1. देव द्वारा रचित कवित्त में प्रकृति के मानवीकरण रूप को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। कवि के अनुसार बसंत का बालक के रूप में जन्म हुआ है, जिसकी सेवा-सुश्रुषा में सारी प्रकृति जी-जान से जुट गई है। पत्तों के बिछौने पर हवा उसे झुलाती है और फूलों ने उसे वस्त्र प्रदान किए हैं। मोर और तोते उससे बातें करते हैं, तो कोयल तालियाँ बजा-बजाकर प्रसन्न होती है। कमल की कली उसे लगी नज़र को दूर करने के लिए टोटका करती है और गुलाब के फूल चटक-चटककर उसे सुबह जगाने का कार्य करते हैं। कामदेव के बालक की सेवा में सारी प्रकृति पूरी तरह से लगी हुई है।
2. बसंतरूपी बालक का बिछौना पेड़-पौधों के नए-नए कोमल पत्तों से बना हुआ है।
3. बसंत ने फूलों से बना ढीला-ढाला झबला पहना हुआ है।
4. बसंत के पालने को झुलाने का कार्य हवा कर रही है।
5. कोयल झूले को हिलाती है और तालियाँ बजा-बजाकर अपनी प्रसन्नता को प्रकट करती है।
6. कमल की कलीरूपी नायिका ने बेल से अपने सिर को ढाँपा और पराग-कणों से बसंत को लगी नज़र का टोटका पूरा किया।
7. बसंत कामदेव की संतान है।
8. प्रातः होते ही गुलाब चटक-चटककर बसंत को जगाते हैं।
9. बसंत की नज़र फूलों के पराग से उतारी गई।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 सवैया और कवित्त

सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. कवि ने किसके जन्म के अवसर पर प्रकृति में परिवर्तन चित्रित किए हैं।
2. प्रकृति का चित्रण किस रूप में किया गया है?
3. किस भाषा की योजना की गई है?
4. पद में किस काव्य-रस की प्रधानता है?
5. किस प्रकार की शब्द-योजना की गई है?
6. बिंब योजना किस प्रकार की है?
7. पद में किस छंद का प्रयोग है?
8. लयात्मकता की सृष्टि किस कारण हुई है?
9. भाषा को कोमल बनाने के लिए किन दो शब्दों का प्रयोग किया गया है?
10. पद में कौन-सा काव्य गुण विद्यमान है?
11. पद में किन अलंकारों का प्रयोग किया गया है?
उत्तर :
1. कवि ने कामदेव के बालक बसंत के जन्म के अवसर पर सारी प्रकृति में दिखाई देने वाले परिवर्तनों को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है।
2. प्रकृति का मानवीकरण रूप में चित्रण किया गया है।
3. ब्रजभाषा के कोमल कांत शब्द अति स्वाभाविक रूप से प्रयुक्त किए हैं।
4. वात्सल्य रस।
5. तत्सम और तद्भव शब्दावली का समन्वित प्रयोग सराहनीय है।
6. चाक्षुक बिंब है। गतिशील बिंब योजना की गई है।
7. कवित्त छंद।
8. स्वरमैत्री ने लयात्मकता की सृष्टि की है।
9. डार, तारी।
10. माधुर्य गुण का प्रयोग किया गया है।
11. अनुप्रास – हलावै-हुलसावै, सिर सारी, मदन महीप, केकी कीर, बालक बसंत, पुरित पराग
रूपक – मदन महीप जू को बालक बसंत ताहि, प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दै।

3. फटिक सिलानि सौं सुधार्यो सुधा मंदिर,
उदधि दधि को सो अधिकाइ उमगे अमंद।
बाहर ते भीतर लौं भीति न दिखैए ‘देव’,
दूध को सो फेन फैल्यो आँगन फरसबंद।
तारा सी तरुनि तामें ठाढ़ी झिलमिली होति,
मोतिन की जोति मिल्यो मल्लिका को मकरंद।
आरसी से अंबर में आभा सी उजारी लगै,
प्यारी राधिका को प्रतिबिंब सो लगत चंद॥

शब्दार्थ : फटिक – स्फटिक। सिलानि – शिलाएँ, चट्टानें। सुधा – अमृत। उदधि – समुद्र। दधि – दही। अमंद – जो कम न हो, बहुत अधिक। उमगे – उमड़ना। फेन – झाग। आँगन – अहाता। फरस बंद – फ़र्श के रूप में बना हुआ ऊँचा स्थान। तरुनि – युवती। तामें – उसमें। ठाढ़ी – खड़ी। भीति – दीवार। मल्लिका – बेले की जाति का एक सफ़ेद फूल। मकरंद – पराग, फूलों का रस। आरसी – दर्पण, आईना। अंबर – आकाश। प्रतिबिंब – परछाईं। लगत – लगता है।

प्रसंग : प्रस्तुत पद रीतिकालीन कवि देव के द्वारा रचित है, जो हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘क्षितिज’ (भाग-2) में संकलित है। इसमें कवि ने चाँदनी रात की आभा को अति सुंदर ढंग से प्रकट किया है। कवि ने इसके माध्यम से राधा के रूप-सौंदर्य को प्रस्तुत करने की चेष्टा की है।

व्याख्या : कवि कहता है कि अमृत की धवलता और उज्ज्वलता वाले भवन को स्फटिक की शिलाओं से इस प्रकार बनाया गया है कि उसमें दही के समुद्र की तरंगों-सा अपार आनंद उमड़ रहा है। भवन बाहर से भीतर तक चाँदनी उज्ज्वलता से इस प्रकार भरा हुआ है कि उसकी दीवारें भी दिखाई नहीं दे रहीं। दूध के झाग जैसी उज्ज्वलता सारे आँगन और फ़र्श के रूप में बने ऊँचे स्थान पर फैली हुई है। इस भवन में तारे की तरह झिलमिलाती युवती राधा ऐसी प्रतीत हो रही है, जैसे मोतियों की आभा और जूही की सुगंध हो। राधा की रूप छवि ऐसी ही है। आईने जैसे साफ़-स्वच्छ आकाश में राधा का गोरा रंग ऐसे फैला हुआ है कि इसी के कारण चंद्रमा राधा का प्रतिबिंब-सा लगता है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 सवैया और कवित्त

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. पद में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।
2. कवि की कल्पना में सुधा मंदिर की रचना किससे की गई है?
3. भवन में किसकी तरंगों-सा अपार आनंद उमड़ रहा है?
4. भवन में बाहर से भीतर तक दीवारें क्यों नहीं दिखाई देतीं?
5. आँगन और फ़र्श पर चाँदनी किस प्रकार फैली हुई है?
6. युवती कैसी प्रतीत हो रही है ?
7. राधा में किसकी ज्योति और सुगंध मिली हुई है?
8. आकाश कैसा प्रतीत हो रहा है?
9. चंद्रमा कैसा प्रतीत होता है?
उत्तर :
1. महाकवि देव ने चाँदनी रात की आभा के माध्यम से राधा की अपार सुंदरता को प्रस्तुत किया है। उसकी सुंदरता से ही चाँद ने सुंदरता प्राप्त की है। चाँदनी का प्रभाव अति व्यापक है, जिसने सारे भवन को उज्ज्वलता प्रदान कर दी है।
2. कवि की कल्पना में सुधा मंदिर की रचना स्फटिक की शिलाओं से की गई है।
3. भवन में दही के समुद्र-सी तरंगों का अपार आनंद उमड़ रहा है।
4. भवन स्फटिक का बना है और चाँदनी की उज्ज्वलता का प्रसार ऐसा है कि बाहर से भीतर तक की दीवारें दिखाई नहीं देती।
5. आँगन और फ़र्श पर दूध की झाग-सी उज्ज्वलता चाँदनी के रूप में फैली हुई है।
6. युवती तारे-सी दिखाई दे रही है।
7. राधा में मोतियों की चमक और मल्लिका (जूही) की सुंगध मिली हुई है।
8. चाँदनी रात में आकाश आईने के समान साफ़-स्वच्छ और उज्ज्वलता से भरा हुआ दिखाई दे रहा है।
9. चंद्रमा राधा की उज्ज्वलता और सुंदरता से प्रतिबिंबित होता हुआ दिखाई दे रहा है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 सवैया और कवित्त

सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. कवि ने किसके माध्यम से राधा की सुंदरता की प्रशंसा की है?
2. किस छंद का प्रयोग किया गया है?
3. कौन-सा काव्य-गुण प्रयोग किया गया है?
4. कवि ने किस भाषा में अपने भाव व्यक्त किए हैं ?
5. किस प्रकार के शब्दों की अधिकता है?
6. कौन-सा काव्य-रस प्रधान है?
7. पद में किन अलंकारों का प्रयोग किया गया है?
उत्तर :
1. कवि ने चाँदनी के माध्यम से राधा की सुंदरता का अद्भुत वर्णन किया है।
2. कवित्त छंद ने लयात्मकता की सृष्टि की है।
3. माधुर्य गुण विद्यमान है।
4. ब्रजभाषा।
5. तत्सम शब्दावली की अधिकता है।
6. शृंगार रस विद्यमान है।
7. रूपक –
उदधि दहि

अनुप्रास –

  • सिलानि सौं सुधार्यो सुधा
  • फेन फैल्यो
  • तारा सी तरुनि तामें
  • मिल्यो मल्लिका को मकरंद

उत्प्रेक्षा –
फटिक सिलानि सौं सुधार्यो सुधा मंदिर

व्यतिरेक –
प्यारी राधिका को प्रतिबिंब सो लगत चंद

उपमा –

  • दूध को सो फेन फैल्यो आँगन फरसबंद,
  • तारा-सी तरुनि तामें ठाढ़ी झिलमिली होति,
  • आरसी से अंबर में
  • आभा सी उजारी लगै

सवैया और कवित्त Summary in Hindi

कवि-परिचय :

देव रीतिकाल के कवि थे। इनका पूरा नाम देवदत्त द्विवेदी था। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा में सन 1673 में हुआ था। यह देवसरिया ब्राह्मण थे। इन्होंने स्वयं अपने बारे में लिखा है-‘योसरिया कवि देव को, नगर इटावौ वास’। इन्हें अपने जीवनकाल में आश्रय के लिए अनेक आश्रयदाताओं के पास भटकना पड़ा। ये कुछ समय के लिए औरंगज़ेब के पुत्र आजमशाह के दरबार में भी रहे थे, पर इन्हें जितना संतोष और सुख भोगीलाल नामक आश्रयदाता से प्राप्त हुआ, उतना किसी और से नहीं मिल सका। इनका देहांत सन 1767 में हुआ था।

रचनाएँ-देव के द्वारा रचित ग्रंथों की निश्चित संख्या अभी तक ज्ञात नहीं है। कुछ विद्वानों ने इनके ग्रंथों की संख्या 52 मानी है, तो किसी ने 72 तक स्वीकार की है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इनकी संख्या 25 मानी है। इनके ग्रंथों की संख्या की अनिश्चितता का कारण यह है कि ये अपनी पुरानी रचनाओं में ही थोड़ा-बहुत हेर-फेर करके नया ग्रंथ तैयार कर देते थे।

इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं-भावविलास, रसविलास, काव्यरसायन, भवानीविलास, अष्टयाम, प्रेम तरंग, सुखसागर-तरंग, देव चरित्र, देव माया प्रपंच, शिवाष्टक, शब्द रसायन, देव शतक, प्रेम चंद्रिका आदि। साहित्यिक विशेषताएँ-देव की कविता का प्रमुख विषय शृंगार था। इन्होंने प्रायः राधा-कृष्ण के माध्यम से शृंगारिक भावनाओं को प्रकट किया है। इन्होंने संयोग श्रृंगार की रचना अधिक की है। वियोग श्रृंगार में इन्होंने विभिन्न भाव दशाओं का वर्णन किया है। देव ने वैराग्य और भक्ति-भावना का सुंदर वर्णन किया है।

ये शरीर और शारीरिक क्रियाओं को माया का बंधन मानते थे। इस संसार में कोई भी मौत से बच नहीं सकता, इसलिए इसकी क्षणभंगुरता देखकर इनके हृदय में इसके प्रति ग्लानि उत्पन्न होती है। देव ने आचार्य-कर्म को पूरा किया था और ‘शब्द रसायन’ के द्वारा काव्य की विभिन्न विशेषताओं का चित्रण किया था। इनके काव्य में दार्शनिकता के बार-बार दर्शन होते हैं।

ये ब्रह्म को एक और सर्वव्यापक मानते हैं। उसका न तो आरंभ है और न ही अंत; वह निर्गुण भी है और सगुण भी; वह अनंत, नित्य, सत्य और शाश्वत है। उसका वर्णन वेद भी नहीं कर सकते –

पै अपने ही गुन बंधे, माया को उपजाइ।
ज्यों मकरी अपने गुननि, उरझि-उरझि मुरझाई॥

देव के काव्य में प्रकृति का सुंदर चित्रण है। इनकी कविता में दरबारी संस्कृति का अधिक चित्रण हुआ है। इनकी कविता में दरबारों, आश्रयदाताओं की प्रशंसा भी की गई है। इन्होंने प्रेम और सौंदर्य के सहज चित्र खींचे हैं। देव ने अपनी कविता ब्रजभाषा में रची थी। इन्हें अनुप्रास अलंकार के प्रति विशेष मोह था। इन्होंने शब्द-शक्तियों का अच्छा प्रयोग किया है। छंद-योजना में लय और तुक का उन्होंने विशेष ध्यान रखा है। इनकी कविता में तत्सम शब्दावली का अधिक प्रयोग किया गया है। देव वास्तव में बहुत अच्छे भाषा शिल्पी थे।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 सवैया और कवित्त

कवित्त-सवैयों का सार :

देव के द्वारा रचित कवित्त-सवैयों में जहाँ एक ओर रूप-सुंदरता का अलंकारिक चित्रण किया गया है, वहीं दूसरी ओर प्रेम और प्रकृति के प्रति मनोरम भाव अभिव्यक्त किए गए हैं। पहले सवैये में श्रीकृष्ण के सौंदर्य का चित्रण किया गया है। इसमें उनका लौकिक रूप नहीं, बल्कि सामंती वैभव दिखाया गया है। उनके पाँवों में नूपुर मधुर ध्वनि उत्पन्न करते हैं और कमर में बँधी करधनी मीठी धुन-सी पैदा करती है। उनके साँवले रंग पर पीले वस्त्र और गले में फूलों की माला शोभा देती है।

उनके माथे पर सुंदर मुकुट है और चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान चाँदनी के समान बिखरी हुई है। इस संसाररूपी मंदिर में उनकी शोभा दीपक के समान फैली हुई है। दूसरे कवित्त में बसंत को बालक के रूप में दिखाकर प्रकृति के साथ उसका संबंध जोड़ा गया है। बालकरूपी बसंत पेड़ों के नए-नए पत्तों के पलने पर झूलता है और तरह- : तरह के फूल उनके शरीर पर ढीले-ढाले वस्त्रों के रूप में सजे हुए हैं। हवा उन्हें झुलाती है, तो मोर और तोते उससे बातें करते हैं। कोयल उसे बहलाती है।

कमल की कलीरूपी नायिका उसकी नज़र उतारती है। कामदेव के बालक बसंत को सुबह-सवेरे गुलाब चुटकी दे-देकर जगाते है। तीसरे कवित्त में पूर्णिमा की रात में चाँद तारों से भरे आकाश की शोभा का वर्णन किया गया है। चाँदनी रात की शोभा को दर्शाने के लिए कवि ने दूध में फेन जैसे पारदर्शी बिंबों का प्रयोग किया है। चाँदनी बाहर से भीतर तक सर्वत्र फैली है। तारे की तरह झिलमिलाती । राधा अनूठी दिखाई देती है। उसके शरीर का अंग-प्रत्यंग अद्भुत छटा से युक्त है। चाँदनी जैसे रंग वाली राधा चाँदनी रात में स्फटिक के महल में छिपी-सी रहती है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

Jharkhand Board JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

JAC Class 10 Hindi राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
परशुराम के क्रोध करने पर लक्ष्मण ने धनुष के टूट जाने के लिए कौन-कौन से तर्क दिए ?
उत्तर :
सीता स्वयंवर के अवसर पर श्रीराम ने शिवजी के धनुष को तोड़ दिया था, जिस कारण परशुराम अत्यंत क्रोधित हो गए थे। तब लक्ष्मण ने धनुष के टूट जाने का कारण बताते हुए कहा था कि वह धनुष नहीं, बल्कि धनुही थी। यह बहुत पुराना था और राम के द्वारा हते ही टूट गया था। इसमें राम का कोई दोष नहीं है।

प्रश्न 2.
परशुराम के क्रोध करने पर राम और लक्ष्मण की जो प्रतिक्रियाएँ हुई उनके आधार पर दोनों के स्वभाव की विशेषताएँ अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर :
राम और लक्ष्मण दोनों एक ही पिता की संतान थे। उन्होंने एक ही गुरु से शिक्षा पाई थी और एक-से वातावरण में रहे थे लेकिन फिर भी दोनों के स्वभाव में बहुत अंतर था। राम स्वभाव से शांत थे, पर लक्ष्मण उग्र स्वभाव के थे। धनुष टूट जाने पर राम ने शांत भाव से परशुराम से कहा था कि धनुष तोड़ने वाला कोई उनका दास ही होगा। लेकिन लक्ष्मण ने उन्हें मनचाही जली-कटी सुनाई थी।

राम ने परशुराम के क्रोध को शांत करने का प्रयास किया, तो लक्ष्मण ने अपनी व्यंग्यपूर्ण वाणी से उन्हें उकसाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। परशुराम के क्रोध करने पर राम शांत भाव से बैठे थे, पर लक्ष्मण उन पर व्यंग्य करते हुए उन्हें उकसाते रहे। राम ऋषि-मुनियों का आदर-सम्मान करने वाले थे, पर लक्ष्मण का स्वभाव ऐसा नहीं था। लक्ष्मण की वाणी परशुरामरूपी यज्ञ की अग्नि में आहुति के समान थी, तो राम की वाणी शीतल जल के समान उस अग्नि को शांत करने वाली थी।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

प्रश्न 3.
लक्ष्मण और परशुराम के संवाद का जो अंश आपको सबसे अच्छा लगा उसे अपने शब्दों में संवाद शैली में लिखिए।
उत्तर :
लक्ष्मण (मुसकराते हुए) – मुनियों में श्रेष्ठ मुनिवर ! क्या आप स्वयं को बहुत बड़ा योद्धा समझते हैं? बार-बार मुझे अपनी कुल्हाड़ी क्यों दिखाते हैं ? क्यों आप अपनी फॅक से पहाड़ उड़ाने की कोशिश करना चाहते हैं?
परशुराम (गुस्से में भरकर) – लक्ष्मण! अपने शब्दों को रोक लो। अन्यथा यह फरसा रक्त चखने के लिए व्यग्र है।
लक्ष्मण (व्यंग्य भाव से) – मुनिवर ! मैं कुम्हड़े का फूल नाहीं हूँ, जो आपकी तर्जनी देख सूख जाऊँगा।
मैंने तो आपके फरसे और धनुष – बाण को देखकर समझा था कि आप कोई क्षत्रिय है। इसलिए अभिमानपूर्वक मैंने आपसे कुछ कह दिया था।
परशुराम (गुस्से से लाल होते हुए) – हे दुःसाहसी। मैंने कई बार पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन किया है।
लक्ष्मण (डरने का अभिनय करते हुए) – अरे ! आप तो ब्राह्मण हैं। आपके गले में यज्ञोपवीत भी है। मुझसे गलती हो गई। मुझे क्षमा करें। हमारे वंश में देवता, ब्राह्मण, भक्त और गौ के प्रति कभी वीरता नहीं दिखाई जाती।
परशुराम (गुस्से से पूछते हुए) – मूर्ख! मेरे फरसे को धार तुम्हारा मस्तक काटने के लिए व्याकुल है। संभल जा, अन्यथा युद्ध के लिए तैयार रह।

लक्ष्मण-ब्राहमण देवता! यदि आप मुझे मारेंगे, तो भी मैं आपके पैरों में ही पड़ेगा। मुनिवर! आपकी बात ही अनूठी है।
आपका एक-एक वचन ही करोड़ों वनों के समान है। बताइए कि फिर आपने व्यर्थ ही ये धनुष-बाण और फरसा क्यों धारण कर रखा है? आपको इन सबकी क्या जरूरत है? मैंने आपके इन अस्त्र-शस्त्रों को देखकर आपसे जो उल्टा-सीधा कह दिया है, कृपया उसके लिए मुझे क्षमा करें।

परशराम ने अपने विषय में सभा में क्या-क्या कहा, निम्न पद्यांश के आधार पर लिखिए? बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्वबिदित क्षत्रियकुल द्रोही॥ भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही। सहसबाहुभुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा।। मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर। गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर॥

परशुराम ने अपने विषय में कहा कि वे बाल ब्रह्मचारी हैं; स्वभाव के अति क्रोधी हैं। सारा संसार जानता है कि वे क्षत्रिय वंश के नाशक हैं। उन्होंने पृथ्वी से क्षत्रिय राजाओं को समाप्त कर देने की प्रतिज्ञा कर रखी है। न जाने उन्होंने कितनी बार अपने बाहुबल से पृथ्वी के क्षत्रिय राजाओं का वध कर उनके राज्य ब्राहमणों को सौंप दिए हैं। वे सहस्रबाहु जैसे अपार बलशाली की भुजाओं को काट देने वाले पराक्रमी वीर हैं।

उन्होंने अपने फरसे से लक्ष्मण को डराने के लिए कहा कि अरे राजा के बालक ! तू मेरे द्वारा मारा जाएगा। क्यों अपने माता-पिता को चिंता में डालता है? वे मानते थे कि उनका फ़रसा बड़ा भयानक है, जो गर्भ में ही बच्चों का नाश कर देने वाला है। गुस्सा आने पर वे छोटे-बड़े में कोई अंतर नहीं करते; वे किसी का भी वध कर देते हैं।

प्रश्न 5.
लक्ष्मण ने वीर योद्धा की क्या-क्या विशेषताएँ बताई?
अथवा
लक्ष्मण ने शूरवीरों के क्या गुण बताए हैं?
उत्तर :
लक्ष्मण ने बीर योद्धा की विशेषताओं के बारे में कहा कि वे व्यर्थं अपनी वीरता की डोंमें नहीं हाँकते बल्कि युद्ध-भूमि में युद्ध करते हैं; अपने अस्त्र-शस्त्रों से वीरता के जौहर दिखाते हैं। शत्रु को सामने पाकर जो अपने प्रताप की बातें करते हैं, वे कायर होते हैं।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

प्रश्न 6.
साहस और शक्ति के साथ विनम्रता हो तो बेहतर है। इस कथन पर अपने विचार लिखिए।
उत्तर :
विनम्रता सदा साहसियों और शक्तिशालियों को ही शोभा देती है। कमजोर और कायर व्यक्ति का विनम्न होना उसका गुण नहीं होता बल्कि उसकी मजबूरी होती है। वह किसी का क्या बिगाड़ सकता है? लेकिन कोई शक्तिशाली व्यक्ति अपनी शक्ति का दुरुपयोग न करके जब दोन-दुखियों के प्रति विनम्नता का भाव प्रकट करता है, तो सारे समाज में सम्मान प्राप्त करता है। तुलसीदास ने कहा भी है-‘परम धर्म श्रुति विदित अहिंसा’ तथा ‘पर पीड़ा सम नहि अधमाई’। साहस और धैर्य मन में उत्पन्न होने वाले वे भाव हैं, जो शक्ति को पाकर विपरीत स्थितियों में मानव को विचलित होने से रोक लेते हैं।

साहस और धैर्य ‘असमय के सखा’ हैं, जिन्हें शक्ति की सहायता से बनाकर रखा जाना चाहिए पर उसके साथ विनम्रता का बना रहना आवश्यक है। बिनम्न व्यक्ति ही किसी के साथ होने : वाले अन्याय के विरोध में खड़ा हो सकने का साहस करता है। भगवान विष्णु को जब भृगु ने ठोकर मारी थी और उन्होंने साहस व शक्ति होने के बावजूद विनम्नता का प्रदर्शन किया था, तभी उन्हें देवों में से सबसे बड़ा मान लिया गया था।

समाज में सदा से माना गया है कि अशक्त और असहाय की याचनापूर्ण करुण दृष्टि से जिसका हृदय नहीं पसीजा, भूखे व्यक्ति को अपने खाली पेट पर हाथ फिराते देखकर जिसने अपने सामने रखा भोजन उसे नहीं दे दिया, अपने पड़ोसी के घर में लगी आग को देखकर उसे बुझाने के लिए वह उसमें कूद नहीं पड़ा-बह मनुष्य न होकर पशु है, क्योंकि साहस और शक्ति होते हुए अन्याय का प्रतिकार न करना कायरता है। साहस और शक्ति के साथ विनम्रता मानव का सदा हित करती है। गुरु नानक देव ने कहा भी है –

जो प्राणी ममता तजे, लोभ, मोह, अहंकार
कह नानक आपन तरे, औरन लेत उबार।

साहस और शक्ति अनेक प्राणियों में होती है, पर विनम्रता के अभाव के कारण वे कभी भी समाज में प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त कर पाते। जब हमारे हृदय में विनम्रता का भाव होता है, तभी हम स्वयं को भुलाकर दूसरों के कष्टों को कम करने की बात सोचते हैं। सच्ची मनुष्यता इसी बात में छिपी हुई है कि मनुष्य साहस और शक्ति होने के साथ विनम्रता को हमेशा महत्त्व दें।

भगवान शिव इसलिए पूजनीय है कि उन्होंने साहस और शक्ति से संपन्न होते हुए विनम्रता का परिचय दिया था। उन्होंने विषपान कर देवताओं और दानवों की रक्षा की थी। भर्तृहरि ने राक्षस और मनुष्य का अंतर विनम्रता के आधार पर ही किया है। जो विनम्र है, वही महापुरुष है और जो अपने साहस व शक्ति को स्वार्थ के लिए प्रयोग करता है, वहीं राक्षस है। तभी तो मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है –

यही पशु प्रवृत्ति है कि आप-आप ही चरे।
मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

वास्तव में साहस और शक्ति के साथ विनम्नता ही मानव को मानव बनाती है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

प्रश्न 7.
भाव स्पष्ट कीजिए –
(क) बिहसि लखनु बोले मदु बानी। अहो मुनीसु महाभट मानी।
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठा। चहत उड़ावन फँकि पहात ॥
(ख) इहाँ कुम्हड़बतिआ कोड नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं।।
देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।
(ग) गाधिसू नु कर हृदय हसि मुनिहि हरियरे सूझ।
अयमय खाँड़ न जखमय अजहुँ न बूझ अबूझ।।
उत्तर :
(क) इन पंक्तियों में लक्ष्मण ने परशुराम के अभिमानपूर्ण स्वभाव पर व्यंग्य किया है। वे कहते हैं कि वीर वह होता है, जो वीरता का प्रदर्शन करे न कि व्यर्थ में डींगें हाँके। जब परशुराम ने यह कहा कि उन्होंने अपनी भुजाओं के बल से कई बार पृथ्वी के क्षत्रिय राजाओं को मिटाकर उनके राज्य ब्राह्मणों को दे दिए थे और उन्होंने सहस्त्रबाहु की भुजाओं को काट डाला था, तब लक्ष्मण ने मुसकराकर कहा कि मुनीश्वर !

आप स्वयं को बहुत बड़ा योद्धा समझते हैं और बार-बार कुल्हाड़ी दिखाकर डराना चाहते हैं। आप फूंक मारकर पहाड़ उड़ाने का कार्य करना चाहते हैं। भाब है कि राम और लक्ष्मण ऐसे क्षत्रिय बीर नहीं थे, जो सरलता और सहजता से परशुराम से हार जाते।

(ख) कवि ने यहाँ परशुराम के झूठे अभिमान को काव्य रूनि के माध्यम से स्पष्ट किया है। समाज में पुरानी उक्ति है कि कुम्हड़े के छोटे कच्चे फल की ओर तर्जनी का संकेत करने से बह मर जाता है। लक्ष्मण कुम्हड़े के कच्चे फल जैसे कमजोर नहीं थे, जो परशुराम की धमकी मात्र से भयभीत हो जाते। लक्ष्मण ने यदि उनसे अभिमानपूर्वक कुछ कहा था तो वह उनके अस्त्र-शास्त्र और फरसे को देखकर कहा था।

विश्वामित्र ने परशुराम की अभिमानपूर्वक प्रकट कहीं जाने वाली उनकी वीरता संबंधी बातों को सुनकर मन-ही-मन कहा था कि मुनि को हरा-ही-हरा सूझ रहा है। वे सामान्य क्षत्रियों को युद्ध में हराते रहे हैं, इसलिए उन्हें लगने लगा है कि वे राम-लक्ष्मण को भी युद्ध में आसानी से हरा देंगे। पर वे यह नहीं समझ पा रहे, कि ये दोनों साधारण क्षत्रिय नहीं हैं। ये गन्ने से बनी खाँड के समान नहीं, बल्कि फौलाद के बने खाँडे के समान हैं। मुनि व्यर्थ में बेसमझ बने हुए हैं और इनके प्रभाव को नहीं समझ पा रहे।

प्रश्न 8.
पाठ के आधार पर तुलसी के भाषा सौंदर्य पर दस पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर :
“तुलसीदास ने अवधी भाषा के लोकप्रिय और परिनिष्ठित रूप को साहित्यिक रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने व्याकरण के नियमों का पूर्ण रूप से निर्वाह किया है। उनकी भाषा में कहीं भी शिथिलता दिखाई नहीं देती। उनको वाक्य-रचना पूर्ण रूप से निर्दोष है। उन्होंने शब्द प्रयोग में उदार नीति का परिचय दिया है, जिसमें तत्सम तद्भव शब्दावली के साथ देशी शब्दों का भी प्रयोग दिखाई देता है। लोक प्रचलित मुहावरों और लोकोक्तियों के कारण उनकी भाषा सजीव, प्रवाहपूर्ण और प्रभावशाली बन गई है।

गोस्वामी जी ने प्रसंगानुकूल भाषा का प्रयोग किया है। रस की अनुकूलता के अतिरिक्त उन्होंने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि किस स्थान पर किस शब्द का प्रयोग किया जाए। उनकी भाषा सर्वत्र भावों और विचारों की सफल अभिव्यक्ति में समर्थ दिखाई देती है। गुण के सहारे रस की अभिव्यक्ति करने में उन्होंने सफलता पाई है। उनकी भाषा की वर्ण मैत्री दर्शनीय है। उन्होंने नाद सौंदर्य का पूरा ध्यान रखा है। बास्तब में भाषा पर जैसा अधिकार तुलसीदास का है, वैसा किसी और हिंदी कवि का नहीं है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

प्रश्न 9.
इस पूरे प्रसंग में व्यंग्य का अनूठा सौंदर्य है। उदाहरण के साथ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
तुलसीदास हिंदी के श्रेष्ठतम भक्त कवियों में से एक हैं, जिन्होंने गंभीरतम दार्शनिक काव्य लिखने के साथ-साथ व्यंग्य का अनूठा सौंदर्य प्रस्तुत किया है। इस प्रसंग में उन्होंने लक्ष्मण के माध्यम से मुनि परशुराम की करनी और कथनी पर कटाक्ष करते हुए व्यंग्य को सहज सुंदर अभिव्यक्ति की है। लक्ष्मण ने शिवजी के धनुष को धनुही कहकर परशुराम के अहं को चुनौती दी थी। उन्होंने व्यंग्य भरी वाणी में कहा –

(i) बिहसि लखनु बोले मदु बानी। अहो मुनीसु महाभट मानी।
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूंकि पहारू॥

(ii) इहाँ कुम्हड़बतिआ कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं॥

लक्ष्मण ने व्यंग्य करते हुए परशुराम से कहा कि वे जो चाहते हैं, वह कह देना चाहिए। उन्हें क्रोध रोककर असह्य दुख नहीं सहना : चाहिए। परशुराम तो मानो काल को हाँक लगाकर बार-बार बुलाते थे। भला इस संसार में ऐसा कौन था, जो उनके शील को नहीं जानता था। वे संसार में प्रसिद्ध थे। लक्ष्मण कहते हैं कि वे अपने माता-पिता के ऋण से मुक्त हो चुके थे; अब उन्हें अपने गुरु के ऋण से : भी मुक्त हो जाना चाहिए।

सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गये व्याज बड़ बाढ़ा।
अब आनिअ व्यवहरिआ बोली। तुरत देऊँ मैं थैली खोली।।

वास्तव में तुलसीदास ने परशुराम के स्वभाव और उनके कश्चन के ढंग पर व्यंग्य कर अनूठे सौंदर्य की प्रस्तुति की है।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार पहचानकर लिखिए –
(क) बालकु बोलि बधौं नहि तोही।
(ख) कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा।
(ग) तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लाबा। बार-बार मोहि लागि बोलाया।
(घ) लखन उतर आहुति सरिस भूगुबरकोपु कृसानु। बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु।।
उत्तर :
(क) अनुप्रास
(ख) उपमा, अनुप्रास
(ग) उत्प्रेक्षा, पुनरुक्ति प्रकाश, अनुप्रास
(घ) उपमा, रूपक

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

रचना और अभिव्यक्ति –

प्रश्न 11.
“सामाजिक जीवन में क्रोध की जरत बराबर पड़ती है। यदि क्रोध न हो तो मनुष्य दुसरे के द्वारा पहुँचाए जाने वाले बहुत से कष्टों की चिर-निवृत्ति का उपाय ही न कर सके।”
आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी का यह कथन इस बात की पुष्टि करता है कि क्रोध हमेशा नकारात्मक भाव लिए नहीं होता बल्कि कभी-कभी सकारात्मक भी होता है। इसके पक्ष या विपक्ष में अपना मत प्रकट कीजिए।
उत्तर :
पक्ष में – वास्तव में हमारे सामाजिक जीवन में क्रोध की अत्यधिक जरूरत पड़ती है। यदि मनुष्य क्रोध को पूरी तरह से त्याग दे. तो दूसरों के द्वारा दिए जाने वाले कष्टों को वह अपने मन से कभी दूर न कर पाए और सदा के लिए घुट-घुट कर कष्ट उठाता रहे। सामाजिक जीवन सुखों-दुखों से मिलकर बनता है। हमें प्राय: दुख अपनों से ही नहीं बल्कि बाहर वालों से मिलते हैं। उस पीड़ा को तभी दूर किया जा सकता है, जब हम अपने मन में छिपे भावों को क्रोध प्रकट करके निकालते हैं।

जो व्यक्ति कभी क्रोध नहीं करता और जीवन में सकारात्मकता हूँढना चाहता है, लोग उसे कमजोर और कायर मानने लगते हैं। छोटे बच्चे भी क्रोध को रोकर या दुख प्रकर कर व्यक्त करते हैं। बिना दुखा के क्रोध उत्पन्न हो नहीं होता। क्रोध में सदा बदले की भावना छिपी हुई नहीं होती, बल्कि इसमें स्वरक्षा की भावना भी मिली होती है। यदि कोई हमें दो-चार टेढ़ी बातें कह जाए, तो उस दुख से बचने के लिए आवश्यक है कि क्रोध करके उसे बतला दिया जाए कि उसका स्थान कौन-सा है और कहाँ है? क्रोध दूसरों में भय को उत्पन्न करता है। जिस पर क्रोध प्रकट किया जाता है, यदि वह डर जाता है तो नम्र होकर पश्चात्ताप करने लगता है। इससे क्षमा का अवसर सामने आता है।

विपक्ष में – क्रोध एक मनोविकार है, जो दुख के कारण उत्पन्न होता है। प्रायः लोग अपनों पर अधिक क्रोध करते हैं। एक शिशु अपनी माता की आकृति से परिचित हो जाने के बाद जान जाता है कि उसे भोजन उसी से प्राप्त होगा। तब भूखा होने पर वह उसे देखते ही रोने लगता है और अपने क्रोध का आभास दे देता है। क्रोध चिड़चिड़ाहट को उत्पन्न करता है।

प्रायः क्रोध करने वाला उस तरफ़ देखता है, जिधर वह क्रोध करता है। क्रोध से क्रोध ही उत्पन्न होता है। क्रोध न करने वाला व्यक्ति अपनी बुद्धि या विवेक पर नियंत्रण रखता है, जिस कारण वह अनेक अनर्थों से बच जाता है। महात्मा बुद्ध, गुरु नानक देव, महात्मा गांधी आदि जैसे महापुरुषों ने अपने क्रोध पर विजय पाकर संसार भर में अपना नाम अमर कर लिया। क्रोध से बचकर हम अपना आत्मिक बल बढ़ा सकते हैं और आंतरिक शक्तियों को अनुकूल कार्यों की ओर लगा सकते हैं।

बाल्मीकि ने क्रोध पर विजय प्राप्त कर आदिकवि होने का यश प्राप्त कर लिया था। क्रोध पर नियंत्रण पाकर वैर से बचा जा सकता है। अतः जहाँ तक संभव हो सके, मनुष्य को क्रोध से बचकर जीवन जीना चाहिए।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

प्रश्न 12.
संकलित अंश में राम का व्यवहार विनयपूर्ण और संयत है, लक्ष्मण लगातार व्यंग्य बाणों का उपयोग करते हैं और परशुराम का व्यवहार क्रोध से भरा हुआ है। आप अपने आपको इस परिस्थिति में रखकर लिखें कि आपका व्यवहार कैसा होता?
उत्तर :
परशुराम के समान किए जाने वाले क्रोध से तो सामने वाले के हृदय में भी क्रोध का भाव ही भरेगा, जिससे क्लेश-भाव बढ़ेगा और समस्या बढ़ जाएगी। लक्ष्मण के समान व्यंग्य-बाणों का लगातार उपयोग भी सामने वाले व्यक्ति को भड़काएगा, जिससे उसका गुस्सा बढ़ेगा। विनय का भाव और संयत व्यवहार किसी क्रोधी व्यक्ति के क्रोध को भी शांत कर देने की क्षमता रखता है। इसलिए ऐसी परिस्थिति में श्रीराम के समान विनयपूर्वक और संयत व्यवहार करूँगा।

प्रश्न 13.
अपने किसी परिचित या मित्र के स्वभाव की विशेषताएं लिखिए।
उत्तर :
मेरे एक परिचित हैं-डॉ. सिंगला। उनका नर्सिंग होम मेरे घर से कुछ ही दूरी पर है। उनका घर भी नर्सिंग होम का ही एक हिस्सा है, जो उनके रोगियों के लिए बहुत उपयुक्त है। किसी भी आपातकाल में वे उनके पास मिनट में पहुँच सकते हैं। मेरे परिचित बहुत साफ-सुधरे रहते हैं। साफ़-सफाई उनके हर काम में दिखाई देती है।

चमचमाते फर्श, साफ-सुथरी दीवारें चुस्त कर्मचारी उनके नर्सिंग होम की पहचान है, जिसमें डॉ. सिंगला के स्वभाव की पहचान साफ़ झलकती है। वे मृदुभाषी हैं। उनके रोगियों का आधा रोग तो उनसे बातचीत करके ही दूर हो जाता है। उन्हें पेड़-पौधे लगाने का शौक है। रंग-बिरंगे फूल, झाड़ियाँ और बेलें उनके घर में महकती रहती हैं। अपने व्यस्त समय में से वे कुछ घड़ियाँ इनके लिए निकाल लेते हैं।

वे बहुत मिलनसार हैं। नगर के बहुत कम लोग ही ऐसे होंगे, जो उन्हें जानते-पहचानते न हों। वे अनेक सामाजिक संस्थाओं से जुड़कर समाज-सेवा के कार्यों में सहयोग दे रहे हैं। वे सभी के सुख-दुख में सहायता करने के लिए सदा तैयार रहते हैं। उनका व्यक्तित्व उन्हें जानने-पहचानने वाले सभी लोगों को एक उत्साह-सा प्रदान करता है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

प्रश्न 14.
दूसरों की क्षमताओं को कम नहीं समझना चाहिए-इस शीर्षक को ध्यान में रखते हुए एक कहानी लिखिए।
उत्तर :
घने जंगल में एक खरगोश उछलता-कूदता भागा जा रहा था। वह बड़ा प्रसन्न था और मन-ही-मन सोच रहा था कि उस से तेज़ कोई भी नहीं भाग सकता।
बिना ध्यान भागते हुए वह धीरे-धीरे चलते एक कछुए से टकरा गया। उसके पाँव पर हल्की-सी चोट लगी और वह रुक गया। वह कछुए से बोला-“अरे, तुम्हें चलना तो आता नहीं, पर फिर भी मेरे रास्ते में रुकावट बनते हो।”
कछुआ बोला – “भगवान ने चलने की जितनी क्षमता मुझे दी है, मेरे लिए बही काफी है। मेरा इतनी गति से ही काम चल जाता है।”
खरगोश ने व्यंग्य से कहा – ‘नहीं, नहीं! तुम तो बहुत तेज भागते हो; यहाँ तक कि मुझे भी दौड़ में हरा सकते हो। दौड़ लगाओगे मेरे साथ?
कछुए ने कहा-“नहीं भाई। मैं तुम्हारे सामने क्या हूँ? तुमसे दौड़ कैसे लगा सकता है?”
खरगोश ने उसे उकसाते हुए कहा – “अरे, हिम्मत तो कर। हम दोनों एक ही रास्ते पर जा रहे हैं। चल देखते हैं कि बड़े पीपल के पास वाले तालाब तक पहले कौन पहुँचता है। यदि तू जीत गया तो मैं कभी तुम्हें ‘सुस्त’ नहीं कहूँगा।”
कछुए ने धीमे स्वर में कहा – “अच्छा, मैं कोशिश करता हूँ।”
यह सुनते ही खरगोश तेजी से तालाब की दिशा में भागा। बिना पीछे देखे वह लगातार भागता हो गया। कछुए का कहीं कोई अता-पता नहीं था। खरगोश एक छायादार पेड़ के नीचे बैठ गया। उसने सोचा कि कछुआ शाम से पहले उस तक नहीं पहुँच पाएगा। यदि वह छाया में कुछ देर सुस्ता ले, तो फिर और तेज़ भाग सकेगा। बैठे-बैठे उसे नींद आ गई। जब उसकी आँख खुली, तो हल्का-हल्का अंधेरा होने वाला था। वह तेज गति से तालाब की ओर भागा। पर जब वह तालाब के किनारे पहुँचा, तो कछुआ वहाँ पहले से ही पहुँचकर उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। उसे देख कछुआ धीरे से मुस्कराया। खरगोश खिसियाकर बोला – “अरे, तुम पहुँच गए! मेरी जरा आँख लग गई थी।”
कछुआ बोला – “कोई बात नहीं। ऐसा हो जाता है, पर याद रखना कि तुम्हें दूसरों की क्षमताओं को कम नहीं समझना चाहिए। ईश्वर ने सबको अलग-अलग गुण दिए हैं।”

प्रश्न 15.
उन घटनाओं को याद करके लिखिए जब आपने अन्याय का प्रतिकार किया हो।
उत्तर :
पहली घटना – पिछले वर्ष से मैं अपने स्कूल की हॉकी टीम में खेल रहा था। परसों जब शाम को मैं अभ्यास के लिए खेल के मैदान में पहुँचा, तो खेल-कूद के इंचार्ज के निकट एक अनजान लड़का हॉकी लिए खड़ा था। मुझे देखते ही उन्होंने कहा कि तुम्हारी जगह टीम में आज से यह लड़का खेलेगा। यह मेरा भतीजा है और इसने आज ही इस स्कूल में दाखिला लिया है। मैंने कहा कि एक साल से मैं इस टीम का नियमित सदस्य हूँ और मेरा खेल भी अच्छा है। उन्होंने मुझे गुस्से से देखा और कहा कि निर्णय का अधिकार उनका है कि कौन खेलेगा और कौन नहीं।

मैं चुपचाप वहाँ से चला आया। मैं स्कूल के प्राचार्य के पर गाया और उनसे बात की। उन्होंने मुझे समझाया और कहा कि वे स्कूल में इंचार्ज से बात करके मुझे बताएँगे। मैं नहीं जानता कि प्राचार्य महोदय की सर से क्या बात हुई, पर सातवें पीरियड में स्कूल का चपरासी एक नोटिस लाया कि शाम को मुझे खेलने के लिए पहले की तरह ही पहुँचना है। दुसरी घटना- मेरे घर के बाहर कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे।

मैं उन्हें खेलता हुआ देख रहा था। जैसे ही एक लड़के ने बॉल को हिट किया, तो वह उछलकर खिड़की से टकराई और शीशा टूट गया। बच्चों ने शीशा टूटता देखा और वहाँ से भागे। एक छोटा लड़का वहाँ खड़ा था। वह खेल नहीं रहा था, बस खेल देख रहा था। मेरा बड़ा भाई साइकिल पर कहीं बाहर से आ रहा था। उसने लड़कों को भागते और खिड़को के टूटे शीशे को देखा। उसने झपटकर उस छोटे लड़के को पकड़ लिया। इससे पहले कि वह उस पर हाथ उठा पाता, मैंने उसे ऐसा करने से रोका क्योंकि शीशा तोड़ने में लड़के का कोई हाथ नहीं था।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

प्रश्न 16.
अवधी भाषा आज किन-किन क्षेत्रों में बोली जाती है?
उत्तर :
पूर्वी हिंदी की अवधी भाषा जिन-जिन क्षेत्रों में बोली जाती है, वे हैं-उन्नाव, लखनऊ, राय बरेली, फतेहपुर, लखीमपुर खीरी, सीतापुर, बहराइच, बाराबंकी, गोंडा, फैजाबाद, सुल्तानपुर, इलाहाबाद, जौनापुर, मिर्जापुर आदि।

पाठेतर सक्रियता –

1. तुलसी की रचनाएँ पुस्तकालय से लेकर पढ़ें।
2. दोहा और चौपाई के वाचन का एक पारंपरिक ढंग है। लय सहित इनके वाचन का अभ्यास कीजिए।
3. कभी आपको पारंपरिक रामलीला अथवा रामकथा की नाट्य प्रस्तुति देखने का अवसर मिला होगा। उस अनुभव को अपने शब्दों में लिखिए।
4. इस प्रसंग की नाट्य प्रस्तुति करें।
5. कोही, कुलिस, खोरि, उरिन, नेवारे-इन शब्दों के बारे में शब्दकोश में दी गई विभिन्न जानकारियाँ प्राप्त कीजिए। उत्तर :
अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से कीजिए।

यह भी जानें –

दोहा : दोहा एक लोकप्रिय मात्रिक छंद है जिसकी पहली और तीसरी पंक्ति में 13-13 मात्राएँ होती है और दूसरी और चौथी पंक्ति में 11-11 मात्राएँ।

चौपाई : मात्रिक छंद चौपाई चार पंक्तियों का होता है और इसकी प्रत्येक पंक्ति में 16 मात्राएँ होती हैं।
तुलसी से पहले सूफी कवियों ने भी अवधी भाषा में दोहा-चौपाई-छंद का प्रयोग किया है जिसमें मलिक मुहम्मद जायसी का पद्मावत उल्लेखनीय है।

परशुराम और सहस्रबाहु की कथा

पाठ में ‘सहसबाहु सम सो रिपु मोरा’ का उल्लेख आया है। परशुराम और सहसबाहु के बैर की अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। महाभारत के अनुसार यह कथा इस प्रकार है –
परशुराम ऋषि जमदग्नि के पुत्र थे। एक बार राजा कार्तवीर्य सहसबाहु शिकार खेलते हुए जमदग्नि के आश्रम में आए। जमदग्नि के पास कामधेनु गाय थी, जो विशेष गाय थी। कहते हैं कि वह सभी कामनाएं पूरी करती थी। कार्तवीर्य सहसबाहु ने ऋषि जमदग्नि से कामधेनु गाय को प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की। ऋषि द्वारा मना किए जाने पर सहसबाहु ने कामधेनु गाय को बलपूर्वक छीन लिया।

इस पर क्रोधित होकर परशुराम ने सहसबाहु का वध कर दिया। इस कार्य की ऋषि जमदग्नि ने घोर निंदा की थी और परशुराम को प्रायश्चित करने के लिए कहा था। क्रोध में भर कर सहसबाहु के पुत्रों ने ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी थी। इस पर पुनः क्रोधित होकर परशुराम ने पृथ्वी को क्षत्रिय बिहीन करने की प्रतिज्ञा की।

JAC Class 10 Hindi राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
श्रीराम ने परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए क्या किया था?
उत्तर :
सीता स्वयंवर के समय श्रीराम ने शिवजी के धनुष को तोड़ दिया था, जिस कारण परशुराम क्रोध से भर उठे थे। उनके क्रोध को शांत करने के लिए राम ने उनसे विनम्र स्वर में कहा था कि ‘हे नाथ! शिवजी के धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई दास होगा। यदि आप कोई आज्ञा देना चाहते हैं, तो मुझे दीजिए।’ उनकी वाणी में सहजता और मिठास थी। वे किसी भी प्रकार से परशुराम के गुस्से को बढ़ाने वाले शब्द नहीं बोले थे।

प्रश्न 2.
परशुराम ने राम को क्या उत्तर दिया था ?
उत्तर :
परशुराम ने राम से कहा था कि सेवक वह होता है जो सेवा करे, न कि शत्रुता की राह पर चले। शत्रु का काम करने वाले से लड़ाई ही करनी चाहिए। जिसने शिवजी के धनुष को तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान उनका शत्रु है। उसे राज समाज से अलग हो जाना चाहिए। ऐसा न करने पर राज सभा में उपस्थित सभी राजा उनके द्वारा मार दिए जाएंगे।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

प्रश्न 3.
परशुराम को लक्ष्मण की किस बात पर अधिक गुस्सा आया?
अथवा
यम लक्ष्मण के किन तकों ने परशुराम के क्रोध की आग को भड़काया?
उत्तर :
लक्ष्मण ने शिवजी के धनुष को धनुही कहा था। लक्ष्मण के अनुसार शिव-धनुष इतना कमजोर था कि उस जैसे अनुहियों को वे अपने बचपन में खेल-खेल में ही तोड़ दिया करते थे। वैसे भी पुराने और जर्जर धनुषों को तोड़ देने से न कोई लाभ होता है और न हानि। : शिवजी के धनुष के इस अपमान से परशुराम का क्रोध बढ़ गया था।

प्रश्न 4.
लक्ष्मण ने परशुराम से यह क्यों कहा था कि उन्हें गाली देना शोभा नहीं देता?
उत्तर :
गाली असभ्य, मूर्ख और शक्तिहीन लोग दिया करते हैं। परशुराम वीर, धैर्यवान और क्षोभरहित थे। यदि उन्हें क्रोध आया था, तो वे अपने अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग से उसे प्रकट कर सकते थे न कि गाली देकर; क्योंकि शुरवीर युद्ध-भूमि में अपनी बीरता दिखाते हैं। इसलिए लक्ष्मण ने परशुराम से कहा था कि उन्हें गाली देना शोभा नहीं देता।

प्रश्न 5.
परशुराम को ‘नाथ’ कहकर किसने और क्या संबोधित किया था?
उत्तर :
परशुराम को श्रीराम ने ‘नाथ’ कहकर संबोधित किया था। उन्होंने बड़े ही विनयशीलता के साथ कहा था कि शिव-धनुष तोड़ने वाला आपका कोई दास ही होगा। आपका क्या आदेश है, आप मुझसे कह सकते हैं।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

प्रश्न 6.
सेवक धर्म के बारे में परशुराम ने श्रीराम से क्या कहा था?
उत्तर :
जब श्रीराम ने परशुराम से कहा कि शिव-धनुष तोड़ने वाला उनका कोई सेवक अथवा दास ही होगा, तो परशुराम ने कहा कि सेवक वह होता है जो सेवा का कार्य करे। लड़ाई अथवा उदंडता करने वाला सेवक नहीं कहलाता। ऐसे व्यक्ति से शत्रुता करनी चाहिए।

प्रश्न 7.
शिव धनुष तोड़ने वाले के विषय में परशराम ने क्या-क्या कहा?
अथवा
स्वयंवर स्थल पर शिवधनुष तोड़ने वाले को परशुराम ने किस प्रकार धमकाया ?
उत्तर :
परशुराम भरी सभा में श्रीराम के सम्मुख घोषणा करते हुए कहते हैं कि जिस किसी ने भी उनके आराध्य भगवान शिव का धनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान उनका शत्रु है। वह जो कोई भी हो स्वयं मेरे सामने आ जाए। यदि वह सामने नहीं आएगा, तो इस सभा में उपस्थित सभी राजा मारे जाएँगे।

प्रश्न 8.
भरी सभा में लक्षण के सम्मुख परशुराम अपनी वीरता का बखान किस प्रकार करते हैं?
अथवा
कि परशुराम ने अपनी किन विशेषताओं के उल्लेख के द्वारा लक्ष्मण को डराने का प्रयास किया?
उत्तर :
लक्ष्मण द्वारा भड़काने पर परशुराम अत्यंत क्रोध में आ गए। क्रोधावेश में वे अपने बाहुबल एवं बीरता का परिचय देते हुए कहते हैं कि वे बाल ब्रह्मचारी हैं। उनका स्वभाव अत्यंत क्रोधी है। वे विश्वभर में क्षत्रिय कुल के शत्रु के रूप में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने अपनी वीरता एवं बाहुबल से कई बार पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन कर दिया और बार-बार ब्राहमणों को जीता राज्य दान में दे दिया। सहसबाहु की भुजाओं को भी उन्होंने अपने फरसे से ही काटा था।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

प्रश्न 9.
परशुराम ने लक्ष्मण को अपने फरसे का किस प्रकार डर दिखाया?
उत्तर :
परशुराम ने लक्ष्मण को अपने क्रोध तथा फरसे से डराते हुए कहा कि राजा के बेटे! तू अपने माता-पिता को चिंता में क्यों डाल रहा है। मेरे हाथ में जो फरसा है, वह बड़ा ही भयानक है। यह छोटे-बड़े किसी में भेद नहीं करता। यह इतना भयानक है कि गर्भ में पलने वाले बच्चों का भी नाश कर देता है।

प्रश्न 10.
लक्ष्मण के अनुसार रषकुल के लोग किन-किन पर दया करते थे?
उत्तर :
उल्लर लक्ष्मण ने परशुराम से कहा कि रघुकुल में देवता, ब्राह्मण, भगवान के भक्त और गौ पर सदा दया की जाती है। इन पर कभी कोई अत्याचार अथवा बार नहीं करता। इन्हें मारने से उन्हें पाप लगता है तथा उनके कुल की अपकीर्ति होती है। यदि कोई गलती से उन्हें मार दे, तो क्षमा मांगनी पड़ती है।

प्रश्न 11.
‘गाधिसू नु कर हृदय हसि मुनिहि हरियो सूझ’ पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
उक्त पंक्ति में मुनि विश्वामित्र मन-ही-मन हँसते हुए कहते हैं कि परशुराम को चारों ओर हरा-ही-हरा दिखाई दे रहा है। दूसरे अर्थों में कहा जाए तो वे राम-लक्ष्मण को साधारण शन्निय समझ रहे है।

प्रश्न 12.
परशुराम की स्वभावगत विशेषताएँ क्या हैं? पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तर :
परशुराम ने अपने विषय में कहा कि वे बाल-ब्रह्मचारी हैं। वे स्वभाव के अति क्रोधी हैं। सारा संसार जानता है कि वे क्षत्रिय वंश के नाशक हैं। उन्होंने पृथ्वी से क्षत्रिय राजाओं को समाप्त कर देने की प्रतिज्ञा कर रखी है। न जाने उन्होंने कितनी बार अपने बाहुबल से पृथ्वी के क्षत्रिय राजाओं का वध कर उनके राज्य ब्राहमणों को सौंप दिए हैं। वे सहस्रबाहु जैसे अपार बलशाली की भुजाओं को काट देने वाले पराक्रमी वीर हैं।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

प्रश्न 13.
‘गाधिसूनु’ किसे कहा गया है? वे मुनि की किस बात पर मन ही मन मुस्कुरा रहे थे?
उत्तर :
‘गाधिसूनु’ विश्वामित्र जी के लिए कहा गया है। वे मुनि परशुराम की बातों पर मन ही मन हंसते हैं कि परशुराम जी को चारों ओर हरा ही हरा दिखाई दे रहा है। दूसरे अर्थों में कहा जाए तो वे राम-लक्ष्मण को साधारण क्षत्रिय समझ रहे हैं।

पठित काव्यांश पर आधारित बहुविकल्पी प्रश्न – 

दिए गए काव्यांशों को पढ़कर पूछे गए बहुविकल्पी प्रश्नों के उचित विकल्प चुनकर लिखिए –

1. नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।
आयेसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।
सेवकु सो जो करें सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।।
सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।

(क) श्रीराम ने परशुराम के लिए किस शब्द का संबोधन किया?
(i) नाथ
(ii) भजनहारी
(iii) दास
(iv) समु
उत्तर :
(i) नाथ

(ख) भंजनिहारा का अर्थ है –
(i) सेवक
(ii) मित्र
(iii) शत्रु
(iv) टुकड़े करने वाला
उत्तर :
(iv) टुकड़े करने वाला

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

(ग) धनुष था
(i) शिव-धनुष
(ii) ब्रह्म-धनुष
(iii) राम-धनुष
(iv) विष्णु परशु
उत्तर :
(i) शिव-धनुष

(घ) परशुराम शिव-धनुष तोड़ने वाले को किसके समान अपना शत्रु मानते हैं?
(i) सहस्राबाहु के समान
(ii) दसानन के समान
(iii) दशरथ के समान
(iv) बाणासुर के समान
उत्तर :
(i) सहस्राबाहु के समान

(ङ) किसने शिव-धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई?
(i) रावण
(ii) लक्ष्मण
(ii) राम
(iv) परशुराम
उत्तर :
(ii) गम

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

2. बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महाभट मानी।
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारूरू। चहत उड़ावन कि पहारू॥
इहाँ कुम्हड़ बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाही।
देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना॥

(क) लखनु कौन है?
(i) लक्ष्मण
(iii) परशुराम
(iv) विश्वामित्र
उत्तर :
(i) लक्ष्मण

(ख) परशुराम किस प्रकार लक्ष्मण को डरा रहे हैं?
(i) हाल दिखाकर
(ii) अजगव दिखाकर
(iii) फरसा दिखाकर
(iv) धनुष-बाण दिखाकर
उत्तर :
(iii) फरसा दिखाकर

(ग) ‘कुम्हड़ बतिया’ का यहाँ क्या भाव है?
(i) बहुत वीर
(ii) बहुत नाजुक
(iii) बहुत कठोर
(iv) बहुत शंकालु
उत्तर :
(ii) बहुत नाजुक

(घ) कुम्हड़ बतिया किसको देखकर मर जाती है?
(i) फरसा
(ii) धूप
(iii) अँगूठा
(iv) तरजनी
उत्तर :
(iv) तरजनी

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

(ङ) लक्ष्मण की मृदु वाणी सुनकर परशुराम कैसी प्रतिक्रिया कर रहे हैं?
(i) परशुराम क्रोध कर रहे हैं।
(ii) परशुराम के क्रोध को शांत कर रही है।
(iii) (i) और (ii) दोनों विकल्प
(iv) कोई नहीं
उत्तर :
(i) परशुराम क्रोध कर रहे हैं।

काव्यबोध संबंधी बहुविकल्पी प्रश्न –

काव्य पाठ पर आधारित बहुविकल्पी प्रश्नों के उत्तर वाले विकल्प चुनिए –

(क) ‘राम-लक्ष्मण’ का संवाद किससे हुआ?
(i) अयोध्यावासियों से
(ii) बालकों से
(iii) परशुराम से
(iv) लंकावासियों से
उत्तर :
(iii) परशुराम से

(ख) राम-लक्ष्मण परशुराम संवाद में किस भाषा का प्रयोग किया गया है?
(i) ब्रजभाषा
(ii) मैथिली भाषा
(iii) अवधी भाषा
(iv) मगही भाषा
उत्तर :
(ii) अवधी भाषा

(ग) तुलसीदास जी ने प्रस्तुत पद में किन छंदों का प्रयोग किया है?
(a) दोहा-चौपाई
(ii) रोला
(ii) सोरठा
(iv) हरिगीतिका
उत्तर :
(i) दोहा-चौपाई

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

(घ) तुलसीदास ने ‘भृगुकुल केतु’ शब्द किसके लिए प्रयुक्त किया है।
(i) विश्वामित्र
(ii) लक्ष्मण
(ii) परशुराम
(iv) वशिष्ठ
उत्तर :
(iii) परशुराम

(अ) ‘अपमय खाँड न अखमय’ में अपमय’ का क्या अर्थ है?
(d) गन्ना
(ii) कुठार
(iii) लोहे से बना
(iv) खाँड से बना
उत्तर :
(iii) लोहे से बना

सप्रसंग व्याख्या, अर्थगता संबंधो एवं सौंयँ-सरहुना संबंधी प्रश्नोत्तर – 

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

1. नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयेसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरिकरनी करि करिअ लराई।
सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।
सुनि मुनिबचन लखन मुसकाने। बोले परसुधरहि अवमाने।
बहु धनुही तोरी लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाई॥
येहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥
रे नृपबालक कालबस बोलत तोहि न संभार।
धनही सम तिपुरारिधनु बिदित सकल संसार।

शब्दार्थ : नाथ – स्वामी। संभुधनु – शिवजी का धनुष। भंजनिहारा – तोड़ने वाला। आयेसु – आज्ञा। रिसाइ – क्रोध करना। कोही – क्रोधी। सो – वह। सेवकाई – सेवा। अरि – शत्रु। जेहि – जिसने। रिपु – शत्रु। बिलगाउ – अलग होना। लरिकाई – बचपन में। अवमाने – अपमान करना। रिस – गुस्सा करना। भृगुकुलकेतू – ब्राह्मण कुल के केतु, परशुराम। सम – समान। तिपुरारि – भगवान, शिव।

प्रसंग : प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य-पुस्तक क्षितिज (भाग-2) में संकलित ‘राम-लक्ष्मण-परशुराम संबाद’ से लिया गया है। मूल रूप से यह गोस्वामी तुलसीदास के द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ के बालकांड में निहित है। गुरु विश्वामित्र के साथ राम और लक्ष्मण सीता स्वयंवर के अवसर पर राजा जनक की सभा में गए थे। राम ने वहाँ शिवजी के धनुष को तोड़ दिया था। परशुराम ने क्रोध में भरकर इसका विरोध किया था। तब राम ने उन्हें शांत करने का प्रयत्न किया था।

व्याख्या : श्रीराम ने परशुराम को संबोधित करते हुए कहा कि ‘हे नाथ! भगवान शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही होगा। क्या आज्ञा है, आप मुझसे क्यों नहीं कहते?’ यह सुनकर क्रोधी मुनि गुस्से में भरकर बोले-“सेवक वह होता है, जो सेवा का काम करे। शत्रु का काम करने वाले से लड़ाई ही करनी चाहिए। हे राम! जिसने भगवान शिव के धनुष को तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान ही मेरा शत्रु है। वह इस समाज को छोड़कर अलग हो जाए, नहीं तो इस सभा में उपस्थित सभी राजा मारे जाएंगे।”

मुनि के वचन सुनकर लक्ष्मण मुस्कुराए और परशुराम का अपमान करते हुए बोले-‘हे स्वामी! अपने बचपन में हमने बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली थी। किंतु आपने ऐसा क्रोध कभी नहीं किया। आपको इसी धनुष पर इतनी ममता किस कारण से है?” यह सुनकर भृगु वंश की ध्वजा के रूप में परशुराम गुस्से में भरकर कहने लगे-“अरे राजपुत्र! अमराज के वश में होने के कारण तुझे बोलने में कुछ होश नहीं है। सारे संसार में प्रसिद्ध भगवान शिव का धनुष क्या धनुही के समान है? तुम्हारे द्वारा शिवजी के धनुष को धनुही कहना तुम्हारा दुस्साहस है।”

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर :

1. पद में निहित भावों को स्पष्ट कीजिए।
2. परशुराम को ‘नाथ’ कहकर किसने अपनी बात कही थी?
3. परशुराम का स्वभाव कैसा था?
4. शिव धनुष तोड़ने वाले को परशुराम ने किसके समान शत्रु माना था?
5. परशुराम ने क्या चेतावनी दी थी?
6. परशुराम के वचनों को सुनकर लक्ष्मण के चेहरे पर कैसे भाव प्रकट हुए?
7. लक्ष्मण ने शिव धनुष को क्या कहा था?
8. लक्ष्मण की किस बात को सुनकर परशुराम को अधिक क्रोध आया था?
9. परशुराम के अनुसार लक्ष्मण किसके बस में होकर बोल रहा था?
10. परशुराम ने राम के वचनों का उत्तर कैसे दिया?
उत्तर :
1. रामचरितमानस के बालकांड से लिए गए इस पद के अनुसार राम ने सौता स्वयंवर के समय शिव के धनुष को तोड़ दिया था, जिस कारण परशुराम क्रोध से भर उठे। राम ने उन्हें मीठे शब्दों से शांत करना चाहा, लेकिन लक्ष्मण ने व्यंग्य भरे शब्दों से उनके क्रोध को भड़का दिया और उनसे जानना चाहा कि यह साधारण-सा धनुष उन्हें क्यों प्रिय है।
2. परशुराम को राम ने ‘नाथ’ कहकर अपनी बात कही थी।
3. परशुराम का स्वभाव अभिमान और क्रोध से भरा हुआ था।
4. परशुराम ने शिव धनुष तोड़ने वाले को सहस्त्रबाहु के समान अपना शत्रु माना था।
5. परशुराम ने चेतावनी दी थी कि यदि शिव का धनुष तोड़ने वाले को सभा से अलग नहीं किया गया, तो वे सभा में उपस्थित सभी राजाओं का वध कर देंगे।
6. परशुराम द्वारा सभी राजाओं का वध कर देने की बात सुनकर लक्ष्मण के चेहरे पर व्यंग्यपूर्ण मुसकराहट का भाव प्रकट हो गया।
7. लक्ष्मण ने शिवधनुष को धनुही कहा था।
8. जब लक्ष्मण ने कहा कि उन्होंने अपने लड़कपन में बैसी अनेक धनुहियाँ खेल-खेल में तोड़ दी थी, तो यह सुनकर परशुराम को अधिक क्रोध आया।
9. परशुराम के अनुसार लक्ष्मण काल अर्थात मृत्यु के बस में होकर बिना सोचे-समझे बोल रहा था।
10. परशुराम ने राम के विनयपूर्वक कहे गए शाब्दों का उत्तर क्रोध में भरकर दिया। उन्होंने कहा कि तुम कैसे सेवक हो ? सेवक तो वह होता है, जो सेवा करता है। जो शत्रु जैसा व्यवहार करता है, उससे लड़ाई ही की जानी चाहिए।

सौदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. कवि ने किस प्रकार पद में नाटकीयता उत्पन्न की है?
2. किस तत्त्व ने पद को स्वाभाविकता का गुण प्रदान किया है?
3. पद में किस काव्य-गुण की प्रधानता है?
4. कवि ने किस छंद का प्रयोग किया है?
5. कथन को संगीतात्मकता का गुण कैसे प्राप्त हुआ है?
6. कवि ने किस भाषा का प्रयोग किया है?
7. किस काव्य-रस का प्रयोग किया गया है?
8. पद में से शिव और परशुराम के दो-दो पर्यायवाची छाँटिए।
9. पद में प्रयुक्त अनुप्रास अलंकार के उदाहरण चुनकर लिखिए।
उत्तर :
1. तुलसीदास ने परशुराम के क्रोधपूर्ण स्वभाव और लक्ष्मण की निर्भयता को आधार बनाकर पद में नाटकीयता उत्पन्न की है।
2. संवादात्मकता ने कथन को स्वाभाविकता का गुण प्रदान किया है।
3. ओज गुण प्रधान है।
4. दोहा-चौपाई छंद का प्रयोग है।
5. स्वरमैत्री ने कवि को संगीतात्मकता का गुण प्रदान किया है।
6. अवधी भाषा।
7. वीर रस का प्रयोग है।
8. शिव – संभु, त्रिपुरारि।
परशुराम – परसुधरहि, भृगुकुलकेतू।
9. अनुप्रास –
आयेसु काह कहिअ किन,
सेवकु सो जो करै सेवकाई.
अरिकरनी करि करिअ,
सहसबाहु सम सो, सकल संसार
जिलगाउ विहाइ।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

2. लखन कहा हसि हमरे जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।।
का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें॥
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू॥
बोले चितै परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा॥
बालकु बोलि बधौं नहि तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही॥
बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्वबिदित क्षत्रियकुल द्रोही॥
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही॥
सहसबाहुभुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा॥
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीपकिसोर।
गर्भह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर॥

शब्दार्थं : छति – हानि। लाभु – लाभ। नयन – नया। भोरे – धोखे। दोसू – दोष। रोसू – क्रोध। सठ – दुष्ट। सुभाउ – स्वभाव। जड़ – मूर्ख। मोही – मुझे। बिस्व – संसार, विश्व। विदित – विख्यात। महिदेव – ब्राह्मण। बिलोकु – देखकर। महीपकुमार – राजकुमार। अर्भक – बच्चा। दलन – नाश।

प्रसंग : प्रस्तुत पद गोस्वामी तुलसीदास के द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ के बालकांड से लिया गया है। ‘सीता स्वयंवर’ के समय श्रीराम ने शिव का धनुष तोड़ दिया था, जिस कारण परशुराम क्रोध में भर गए। लक्ष्मण के द्वारा व्यंग्य करने पर परशुराम का गुस्सा भड़क गया, पर उनके गुस्से का लक्ष्मण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था।

व्याख्या : लक्ष्मण ने हंसकर कहा कि ‘हे देव ! सुनिए ! हमारे लिए तो सभी धनुष एक-से ही हैं। पुराने धनुष को तोड़ने में क्या लाभ और क्या हानि! श्री रामचंद्र ने इसे नया समझ कर धोखे से देखा था। फिर यह छुते ही टूट गया। इसमें रघुकुल के स्वामी श्रीराम का कोई दोष नहीं है। हे मुनि! आप बिना किसी कारण के क्रोध क्यों करते हैं?’ परशुराम ने अपने फ़रसे की ओर देखकर कहा-“अरे दुष्ट! तूने मेरा स्वभाव नहीं सुना? मैं तुम्हें बालक समझकर नहीं मार रहा हूँ। अरे मूर्ख ! क्या तू मुझे निरा मुनि हो समझता है।

मैं बालब्रह्मचारी और अत्यंत क्रोधी स्वभाव का हूँ। मैं क्षत्रिय कुल का शत्रु विश्व भर में प्रसिद्ध हूँ। आपनी भुजाओं के बल से मैंने पृथ्वी को राजाओं से रहित कर दिया और कई बार उसे ब्राह्मणों को दे डाला। हे राजकुमार! सहस्रबाहु की भुजाओं को काट देने वाले मेरे इस फरसे को देख ! अरे राजा के बालक! तू अपने माता-पिता को चिंता के वश में न कर। मेरा फरसा बड़ा भयानक है। यह गर्भ के बच्चों का भी नाश करने वाला है। यह छोटे-बड़े किसी की भी परवाह नहीं करता।”

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. पद में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।
2. लक्ष्मण सभी धनुषों को कैसा मानते थे?
3. लक्ष्मण के अनुसार राम ने धनुष को किस धोखे से छू लिया था?
4. लक्ष्मण के अनुसार धनुष तोड़ने में राम का कोई दोष क्यों नहीं था?
5. परशुराम लक्ष्मण का वध क्यों नहीं कर रहे थे?
6. परशुराम विश्व भर में अपने किन गुणों के कारण विख्यात थे?
7. परशुराम ने अपनी भुजाओं के बल से क्या किया था?
8. परशुराम ने क्रोध में लक्ष्मण को कौन-सा अस्त्र दिखाया था?
9. परशुराम का फ़रसा क्या कर सकने की योग्यता रखता था?
10. पद के अनुसार परशुराम के परिचय को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
1. गोस्वामी तुलसीदास ने लक्ष्मण के व्यंग्य-भावों तथा परशुराम के गुस्से को प्रकट करते हुए स्पष्ट किया है कि परशुराम को अपने बल-पराक्रम पर घमंड था, पर लक्ष्मण उनके बल से कदापि प्रभावित नहीं थे। वे उनसे डरते नहीं थे।
2. लक्ष्मण सभी धनुषों को एक-सा मानते थे। उनकी दृष्टि में उनमें कोई अंतर नहीं था।
3. लक्ष्मण के अनुसार राम ने शिवजी के धनुष को नया धनुष समझकर छू लिया था।
4. लक्ष्मण के अनुसार धनुष को तोड़ने में राम का कोई दोष नहीं था। धनुष पुराना था और राम के छूते ही वह टूट गया था।
5. परशुराम लक्ष्मण पर अत्यंत क्रोधित थे, पर वे उसे बालक समझकर उसका बध नहीं कर रहे थे।
6. विश्व भर में परशुराम अपने क्रोध और ब्रह्मचर्य के कारण प्रसिद्ध थे। वे क्षत्रिय वंश को अपना शत्रु मानते थे और उसे कई बार नष्ट करने के कारण विख्यात थे।
7. परशुराम ने अपनी भुजाओं के बल से पृथ्वी को अनेक बार क्षत्रियों से रहित करके उनका राज्य ब्राह्मणों को दान में दे दिया था।
8. परशुराम ने क्रोध में भरकर लक्ष्मण को अपना फरसा दिखाया था, जिसने सहस्रबाहु की भुजाओं को काट दिया था।
9. परशुराम का फ़रसा माँ के गर्भ में विद्यमान बच्चों को भी नष्ट कर देने की योग्यता रखता था।
10. परशुराम बाल ब्रह्मचारी, महाक्रोधी, क्षत्रियों के दुश्मन और अपार बलशाली ब्राह्मण थे। उन्होंने क्षत्रिय राजाओं का नाश किया था।

सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. पद की भाषा कौन-सी है?
2. कवि ने किस छंद का प्रयोग किया है?
3. गेयता के गुण का आधार क्या है?
4. किस काव्य-रस की प्रधानता है?
5. इस पद को किस मूल ग्रंथ से लिया गया है?
6. किस काव्य-गुण का प्रयोग किया गया है?
7. पद से दो तद्भव शब्द छाँटकर लिखिए।
8. लक्ष्मण की शब्दावली में किन भावों की प्रमुखता है?
9. पद से दो तत्सम शब्द छाँटकर लिखिए।
10. प्रयुक्त अलंकारों को छाँटकर लिखिए।
उत्तर :
1. पद की भाषा अवधी है।
2. दोहा-चौपाई छंद।
3. स्वरमैत्री।
4. बीर रस।
5. रामचरितमानस (बालकांड)।
6. ओज गुण।
7. धनुष, केवल
8. व्यंग्य, क्रोध
10. अनुप्रास –

  • हसि हमरे
  • नहि तोही
  • जून धनु, मुनि बिनु
  • काज करिअ कता
  • सठ सुनहि सुभाउ
  • बालकु बोलि बधौं
  • बाल ब्रह्मचारी
  • बिपुल बार
  • जड़ जानहि
  • भुजबल भूमि भूप

अतिशयोक्ति –

  • छुअत टूट

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

3. बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महाभट मानी॥
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूंकि पहा ॥
इहाँ कुम्हड़बतिआ कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं॥
देखि कुठारू सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सही रिस रोकी॥
सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरे कुल इन्ह पर न सुराई।
बधे पापु अपकीरति हारें। मारतहू पा परिअ तुम्हारें।
कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। व्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा।।
जो बिलोकि अनुचित कहे. छमहु महामुनि धीर।
सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गंभीर।।

शब्दार्थ : बिहसि – हँस कर। मृदु बानी – कोमल वाणी। महाभट – महायोद्धा। मानी – समझते हैं। कुठारु – कुल्हाड़ी। कुम्हड़बतिआ – बहुत कमजोर, निर्बल व्यक्ति, काशीफल या कुम्हड़े का बहुत छोटा फल। तरजनी – अँगूठे के पास की उँगली। सरासन – धनुष। जनेउ – यज्ञोपवीत। बिलोकी – देखकर। रिस – गुस्सा। सुर – देवता। महिसुर – ब्राह्मण। हरिजन – भागवान के भक्त। अपकीरति – अपयश। मारतहू — आप मारें तो भी। पा – पैर। कोटि – करोड़ों। कुलिस – बज। बिलोकि – देखकर। गिरा – वाणी।

प्रसंग : प्रस्तुत पद तुलसीदास के द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ के बालकांड से लिया गया है। सीना-स्वयंबर के समय श्रीराम ने शिवजी के धनुष को तोड़ दिया था, जिस कारण परशुराम क्रोधित हो गए थे। लक्ष्मण ने उन पर व्यंग्य किया था, जिससे परशुराम का गुस्सा भड़क उठा था।

व्याख्या : लक्ष्मण ने हँस कर कोमल वाणी में कहा-“अहो ! मुनीश्वर तो अपने आप को बड़ा वीर योद्धा समझते हैं। मुझे देखकर ये बार-बार अपनी कुल्हाड़ी दिखाते हैं। ये तो फैंक से पहाड़ उड़ा देना चाहते हैं। यहाँ कोई काशीफल या कुम्हड़े के फूल से बना छोटा-सा फल नहीं है, जो आपके अंगूठे के साथ वाली उँगली को देखकर ही मर जाए। मैंने जो कुछ कहा है, वह आपके कुल्हाड़े और धनुष-बाण को देखकर ही अभिमान सहित कहा है। भृगुवंशी समझकर और आपका यज्ञोपवीत देखकर आप जो कुछ कहते हैं, उसे मैं अपना गुस्सा रोककर सह लेता हूँ।

देवता, ब्राह्मण, भगवान के भक्त और गौ-इन पर हमारे कुल में अपनी वीरता का प्रदर्शन नहीं किया जाता, क्योंकि इन्हें मारने से पाप लगता है और इनसे हार जाने पर अपकीर्ति होती है। इसलिए यदि आप मारे, तो भी आपके पैर ही पड़ना चाहिए। आपका एक-एक वचन ही करोड़ों वजों के समान है। धनुष-बाण और कुल्हाड़ा तो आप व्यर्थ ही धारण करते हैं। आपके इस धनुष-बाण और कुल्हाड़े को देखकर मैंने कुछ अनुचिता कहा हो, तो हे धौर महामुनि। आप क्षमा कीजिए।” यह सुनकर भृगु वंशमणि परशुराम क्रोध के साथ गंभीर वाणी में बोले।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर।

1. पद में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।
2. परशुराम बार-बार अपना कुल्हाड़ा किसे दिखा रहे थे?
3. कवि के द्वारा प्रयुक्त काव्य रूढ़ि और समाज में चली आने वाली मान्यता को स्पष्ट कीजिए।
4. लक्ष्मण ने परशुराम से अभिमानपूर्वक बात क्यों की थी?
5. लक्ष्मण ने अपना गुस्सा रोककर परशुराम से बात क्यों की थी?
6. रघुकुल के लोग किन-किन पर वीरता का प्रदर्शन नहीं करते थे?
7. सूर्यवंशी जिन पर दया करते थे, उन्हें क्यों नहीं मारना चाहते थे?
8. लक्ष्मण ने परशुराम को मारने की अपेक्षा क्या करने की बात कही थी?
9. लक्ष्मण ने मुनि को अनुचित शब्द कहने के बाद उनसे क्या माँगा?
10. लक्ष्मण के क्रोध-भाव को प्रतिपादित कीजिए।
उत्तर :
1. लक्ष्मण ने परशुराम के द्वारा अभिमानपूर्वक कहे गए शब्दों पर व्यंग्य किया और उन्हें बताया कि उनके वंश में ब्राह्मणों पर शस्त्र नहीं उठाया जाता: भले ही वे बुरा व्यवहार क्यों न करें।
2. परशुराम लक्ष्मण को डराने के लिए उन्हें बार-बार अपना कुल्हाड़ा दिखा रहे थे।
3. युगों से समाज में एक मान्यता चली आ रही है कि काशीफल की बेल पर खिलने वाले फूल या छोटे फल की ओर तर्जनी से इशारा किया जाए, तो वह सूख कर गिर जाता है। छोटी आयु के लक्ष्मण की ओर परशुराम बार-बार ऊँगली उठाकर उन्हें डराने का प्रयत्न कर रहे थे। इसलिए लक्ष्मण ने उनसे कहा था कि वे काशीफल की बेल पर लगे फूल या फल की तरह कमजोर नहीं हैं, जो उनकी उठी उँगली से नष्ट हो जाएंगे।
4. लक्ष्मण ने परशुराम के कुल्हाड़े और धनुष-बाण देखकर उन्हें क्षत्रिय समझ लिया था और इसी कारण से उनसे अभिमानपूर्वक बात की थी।
5. लक्ष्मण जान गए थे कि परशुराम भृगुवंशी हैं। उनके गले में यज्ञोपवीत भी था। इसलिए उन्होंने अपना गुस्सा रोककर परशुराम से बात की थी।
6. रघुकुल के लोग देवता, ब्राह्मण, भगवान के भक्त और गाय पर बोरता का प्रदर्शन नहीं करते थे।
7. सूर्यवंशी जिन पर दया करते थे, उन्हें कभी मारना नहीं चाहते थे क्योंकि उन्हें मारने से पाप लगता था और उनसे हार जाने पर अपयश मिलता था।
8. लक्ष्मण ने परशुराम को मारने की अपेक्षा उनके पाँव में पड़ने और क्षमा माँगने की बात कही थी।
9. लक्ष्मण ने मुनि को अनुचित शब्द कहने के बाद उनसे क्षमा माँगी थी।
10. लक्ष्मण अति क्रोधी स्वभाव का था। वह परशुराम के बड़बोलेपन को झेलने वाला नहीं था। वह निर्भीक, साहसी और वीर था।

सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. कवि के द्वारा किस भाषा का प्रयोग किया गया है?
2. किस काव्य-रस की प्रधानता है?
3. किस काव्य-गुण का प्रयोग किया गया है?
4. किन छंदों का प्रयोग किया गया है?
5. किस प्रयोग ने संगीतात्मकता की सृष्टि की है?
6. किस शब्द-शक्ति का प्रयोग किया गया है?
7. काव्यांश में प्रयुक्त दो तत्सम शब्दों को छाँटकर लिखिए।
8. लक्ष्मण की भाषा में किसकी प्रधानता है?
9. काव्यांश में प्रयुक्त अलंकार छाँटकर लिखिए।
उत्तर :
1. अवधी भाषा का प्रयोग किया गया है।
2. वीर रस का प्रयोग है।
3. ओज गुण विद्यमान है।
4. दोहा-चौपाई छंद।
5. स्वरमैत्री के प्रयोग ने संगीतात्मकता की सृष्टि की है।
6. व्यंजना शब्द-शक्ति विद्यमान है।
7. मृद. कुल
8. व्यंग्य, बाक्वीरता।
9. अनुप्रास
मुनीस् महाभट मानी,
कछु कहा; कछु कहहु, कोटि कुलिस,
सुर, महिसुर: सुनि सरोष,
धरहु धनु
गिरा गंभीर पुनरुक्ति-प्रकाश
पुनि-पुनि उपमा
कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

4. कौसिक सुनहु मंद येहु बालकु। कुटिलु कालबस निज कुल्ल घालकु॥
भानुबंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुसु अबुधु असंकू॥
कालकवलु होइहि छन माहीं। कहाँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं ॥
तुम्ह हटकहु जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा।
लखन कहेउ मुनि सुजसु तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बस्नै पारा।।
अपने मुहु तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भांति बहु बरनी।।
नहि संतोषु त पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू॥
बीरबती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा।
सूर समर करनी करहि कहि न जनावहिं आए।
विद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथाहिं प्रतापु॥

शब्दार्थ : कौसिक – विश्वामित्र। भानु बंस – सूर्यवंशी। राकेस – चंद्र। निपट – बिलकुल। निरंकुसु – उदंड। अवधु – मूर्ख। कालकवलु – काल का ग्रास। खोरि – दोष। मोहि – मेरा। हटकहु – मना करो, रोको। उबारा – बचाना। रोषु – क्रोध। बरनी – वर्णन। दुसह – असह्य। सूर – शूरवीर। समर = बुद्ध। रन – युद्ध। रिपु – शत्रु।

प्रसंग : प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य-पुस्तक क्षितिज (भाग-2) में संकलित ‘राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद’ से लिया गया है. मूल रूप से यह तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ के बालकांड में निहित है। सीता स्वयंवर के समय राम ने शिवजी के धनुष को तोड़ दिया था, जिस कारण परशुराम क्रोध से भर गए थे। लक्ष्मण ने उन पर व्यंग्य किया था, जिस कारण उनका क्रोध और अधिक बढ़ गया था।

व्याख्या : परशुराम ने राम और लक्ष्मण के गुरु विश्वामित्र को संबोधित करते हुए कहा कि ‘हे विश्वामित्र! सुनो! यह बालक बड़ा कुबुद्धिपूर्ण और कुटिल है। काल के वश होकर यह अपने कुल का घातक बन रहा है। यह सूर्यवंशरूपी चंद्रमा का कलंक है। यह बिलकुल उदंड, मूर्ख और निडर है। अभी क्षण भर बाद यह मौत के देवता काल का ग्रास बन जाएगा। मैं पुकार कर कहे देता हूँ कि इसके मर जाने के बाद फिर मुझे दोष नहीं देना। यदि तुम इसे बचाना चाहते हो, तो इसे हमारा प्रताप, बल और क्रोध बतलाकर ऐसा करने से रोक दो?’ लक्ष्मण ने तब कहा-‘हे मुनि! आपका सुयश आपके रहते और कौन वर्णन कर सकता है ? आपने पहले ही अनेक बार अपने मुँह से अपनी करनी का कई तरह से वर्णन किया है।

यदि इतने पर भी आपको संतोष न हुआ हो, तो फिर कुछ कह डालिए। क्रोध रोककर असह्य दुख मत सहो। आप वीरता का व्रत धारण करने वाले, धैर्यवान और ओभ रहित हैं। गाली देते हुए आप शोभा नहीं देते। शूरवीर तो युद्ध में अपनी शूरवीरता का कार्य करते हैं। वे बातें कहकर अपनी वीरता को प्रकट नहीं करते। शत्रु को युद्ध में पाकर कायर ही अपने प्रताप की डींगें हाँका करते हैं।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. पद में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।
2. परशुराम ने लक्ष्मण को बचाने के लिए किसे संबोधित किया ?
3. परशुराम के अनुसार लक्ष्मण की विशेषताएँ कौन-कौन सी थी ?
4. परशुराम ने विश्वामित्र से अपने कौन-कौन से गुण लक्ष्मण को बताने के लिए कहा था?
5. लक्ष्मण ने परशुराम को क्या सुझाव दिया?
6. परशुराम राजसभा में क्या बता चुके थे ?
7. परशुराम क्या रोककर अधिक दख सह रहे थे?
8. लक्ष्मण ने परशुराम को किन-किन विशेषताओं का स्वामी माना था?
9. शूरवीर अपनी वीरता का परिचय किस प्रकार देता है?
10. लक्ष्मण की किस बात पर परशुराम नाराज थे?
उत्तर :
1. परशुराम ने विश्वामित्र को सुझाव दिया था कि वे लक्ष्मण को उनके गुण बताकर व्यर्थ बोलने और उकसाने से रोके, ताकि परशुराम उसका वध न करे। लेकिन लक्ष्मण ने उन्हें वीरता का पालन करने की शिक्षा दे दी थी।
2. परशुराम ने लक्ष्मण को बचाने के लिए ऋषि विश्वामित्र को संबोधित किया।
3. परशुराम के अनुसार लक्ष्मण मूर्ख, कुबुद्धिपूर्ण और कुटिल था। वह सूर्यवंशरूपी चंद्रमा का कलंक था। यह उदंड, मुर्ख और निडर था।
4. परशुराम ने विश्वामित्र से अपने बारे में लक्ष्मण को यह बताने के लिए कहा था कि वे बड़े प्रतापी, अति बलशाली और अत्यंत क्रोधी हैं।
5. लक्ष्मण ने परशुराम को सुझाव दिया कि उन्हें अपना सुयश अपने मुँह से स्वयं प्रकट करना चाहिए, क्योंकि उनके स्वयं वहाँ रहते हुए उनके सुयश को ठीक-ठीक ढंग से कोई और नहीं प्रकट कर सकता।
6. राजसभा में परशुराम अनेक बार अपनी विशेषताएँ बता चुके थे।
7. परशुराम अपने क्रोध को रोककर अधिक दुख सह रहे थे।
8. लक्ष्मण ने परशुराम को वीरता का व्रत धारण करने वाला, धैर्यवान और क्षोभरहित माना था।
9. शूरवीर युद्ध में लड़कर अपनी शूरवीरता को प्रदर्शित करता है, न कि अपनी वीरता की डींगें हाँककर।
10. लक्ष्मण को स्पष्टवादिता, स्वभाव और उग्रता के कारण परशुराम नाराज थे।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. तुलसीदास ने लक्ष्मण और परशुराम के स्वभाव के किन गुणों/ अवगुणों को प्रकट किया है?
2. कवि ने किस भाषा का प्रयोग किया है?
3. किस प्रकार के छंदों का प्रयोग किया गया है?
4. किस काव्य-रस का प्रयोग किया गया है?
5. किस काव्य-गुण की प्रधानता है?
6. किस शब्द-शक्ति का अधिकता से प्रयोग किया गया है?
7. संवादों से कथन को कौन-सा गुण प्राप्त हुआ है?
8. ‘बीरबती’ शब्द में कैसा भाव छिपा हुआ है?
9. परशुराम की वाणी में कौन-सा भाव प्रमुख है ?
10. काव्यांश में प्रयुक्त अलंकार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
1. तुलसीदास ने लक्ष्मण की स्पष्टवादिता और साहस तथा परशुराम को डींगें हाँकने के स्वभाव को प्रकट किया है।
2. अवधी भाषा का प्रयोग किया गया है।
3. दोहा-चौपाई का प्रयोग है।
4. वीर रस।
5. ओज गुण विद्यमान है।
6. लक्षणा शब्द-शक्ति का अधिक प्रयोग किया गया है।
7. नाटकीयता का गुण
8. व्यंग्यात्मकता
9. प्रचंड क्रोध
10. अनुप्रास –
पुकारि खोर, बहु बरनी,
दुसह दुख, कुटिल कालबस, कछु कहहू,
करनी करहिं कहि, कायर कथाहिं।

मानवीकरण –
कालकवतु होइहि छन माही

रूपक –
भानु बंस राकेस कलंकू

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

5. तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा।।
सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि परेड कर बोरा ॥
अब जनि दे दोसु मोहि लोमू। कटुबादी बालक बाजोगू॥
बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब येहु मनिहार भा साँचा॥
कौसिक कहा छमिल अपराधू। बाल दोष गुन गहन साधू
खार कुठार मैं अकरुन कोही। आगे अपराधी गुरुद्रोही
उतर देत छोड़ों बिनु मारे। केवल कौसिक सील तुम्हारे
न त येहि काटि कुठार कठोरे। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोर।।
गाधि सून कह हृदय हसि मुनिहि हरियो सझा
अयमय खाँड़ न ऊखमय अबाई न बूझ अबूम।

शब्दार्थ : मोहि लागि- मेरे लिए। परसु – फ़रसा। कर – हाथ। बधजोगू – वध के योग्य। कटुबादी – कड़वा बोलने वाला। बिलोकि – देखकर। बाँचा – बचाया। मरनिहार – मरने को। साँचा – सचमुच। कौसिक – विश्वामित्र। खर कुठार – तीखी धार का कुठार। गाधिसून – विश्वामित्र। हरियो – हरा ही हरा।

प्रसंग : प्रस्तुत पद गोस्वामी तुलसीदास के द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ के बालकांड से लिया गया है। सौता-स्वयंवर के अवसर पर परशुराम और लक्ष्मण के बीच शिव-धनुष के भंग होने के कारण विवाद हुआ था।

व्याख्या : लक्ष्मण ने कहा कि ‘हे मुनिवर परशुराम ! आप तो मानो काल को बार-बार हाँक लगाकर उसे मेरे लिए बुलाते हैं लक्ष्मण के कठोर वचन सुनते ही परशुराम ने अपने फ़रसे को सुधार कर हाथ में ले लिया और कहा कि “अब लोग मुझे दोष न दें। यह कड़वा बोलने वाला बालक मारे जाने के ही योग्य है। बालक समझकर मैंने इसे बहुत देर तक बचाया, लेकिन अब यह सचमुच मरने को आ गया है। तब गुरु विश्वामित्र ने कहा-“अपराध क्षमा कीजिए मुनिवर ! बालकों के दोष और गुण को साधु लोग नहीं गिनते।”

परशुराम बोले-“मेरा तीखी धार का फरसा, मैं दयारहित और क्रोधी हूँ। मेरे सामने यह गुरुद्रोही और अपराधी उत्तर दे रहा है। इतने पर ही मैं इसे बिना मारे छोड़ रहा हूँ। हे ऋषिवर! मैं इसे केवल आपके शोल और प्रेम के कारण बिना मारे छोड़ रहा हूँ। नहीं तो इसे इस कठोर फरसे से काटकर थोड़े से परिश्रम से ही गुरु के ऋण से मुक्त हो जाता।” विश्वामित्र ने मन-ही-मन हैसकर कहा-“मुनि को हरा-ही-हरा सूझ रहा है। अन्य सभी जगह पर विजयी होने के कारण ये राम और लक्ष्मण को भी साधारण क्षत्रिय ही समझ रहे हैं। पर वे लोहे से बनी हुई खाँड (खाँडा-खड्ग) हैं; गन्ने की खाँड नहीं, जो मुँह में डालते ही गल जाती है। मुनि अब भी बेसमझ बने हुए हैं और इनके प्रभाव को समझ नहीं पा रहे।”

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. पद में निहित भाव को स्पष्ट कीजिए।
2. लक्ष्मण के किस कथन से उनकी निडरता का परिचय मिलता है?
3. लक्ष्मण के कड़वे शब्दों को सुनकर परशुराम ने क्या किया?
4. परशुराम ने सभा से किस कार्य का दोष उन्हें न देने के लिए कहा?
5. विश्वामित्र ने परशुराम को क्या कहकर समझाया ?
6. परशुराम ने लक्ष्मण को गुरु-द्रोही क्यों कहा था?
7. परशुराम ने अपने किन गुणों का उल्लेख किया ?
8. विश्वामित्र के किस गुण के कारण परशुराम लक्ष्मण को मारे बिना छोड़ रहे थे?
9. विश्वामित्र ने अपने आप से क्या कहा था?
10. परशुराम क्यों क्रोधित हो गए?
उत्तर :
1. लक्ष्मण को अपना अपमान करते देखकर परशुराम ने फरसे को सुधार कर हाथ में ले लिया, पर गुरु विश्वामित्र के समझाने पर वे मान गए। लेकिन परशुराम ने अपनी बीरता की डींग हाँकने की आदत का फिर से परिचय दे दिया, जिसे सुनकर विश्वामित्र मन-ही-मन मुसकरा सोचने लगे कि ये नहीं समझते कि राम-लक्ष्मण सामान्य क्षत्रिय नहीं हैं।
2. ‘तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लाबा, बार-बार मोहि लागि बोलाबा’- इन पंक्तियों से लक्ष्मण की निडरता का परिचय मिलता है।
3. लक्ष्मण के कड़वे शब्दों को सुनकर परशुराम ने अपने भयानक फरसे को सुधार कर हाथ में ले लिया।
4. क्रोधित परशुराम ने सभा से बालक लक्ष्मण के वध का दोष न देने के लिए कहा।
5. विश्वामिन ने परशुराम को यह कहकर समझाया कि साधु बालकों के गुण और दोष को नहीं गिनते।
6. परशुराम को भगवान शिव ने बह धनुष संभाल कर रखने के लिए दिया था, जिसे सीता स्वयंवर के समय राम ने भंग कर दिया था। परशुराम ने इसे अपना और भगवान शिव का अपमान मानकर राजसभा में उपस्थित क्षत्रियों को बुरा-भला कहा। लक्ष्मण ने क्रोधभरी और व्यंग्यात्मक बातों से इसका विरोध किया था, जिस कारण परशुराम ने लक्ष्मण को गुरुद्रोही कहा।
7. परशुराम ने अपने गुणों को बताते हुए कहा था कि वे दया से रहित और क्रोधी स्वभाव के हैं।
8. विश्वामित्र के शील और प्रेमपूर्ण स्वभाव के कारण परशुराम अभी तक लक्ष्मण को बिना मारे छोड़ रहा था।
9. विश्वामित्र ने अपने आप से कहा था कि परशुराम को हरा-ही-हरा सूझ रहा है। अब तक वे साधारण क्षत्रियों पर बिना हारे विजय प्राप्त करते आए थे और अब उन्हें ऐसा लगने लगा था कि वे सभी क्षत्रियों को युद्ध में हरा सकते हैं। ये राम-लक्ष्मण गन्ने से बनी खाँड नहीं हैं, बल्कि फ़ौलाद के खाँडे हैं। जिन्हें हराना इनके लिए संभव नहीं। मुनि इनके प्रभाव को समझ नहीं पा रहे।
10. लक्ष्मण द्वारा बार बार भड़काए जाने व व्यंग्य भरे वाक्य बोलने के कारण परशुराम क्रोधित हो गए।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. तुलसीदास ने किस-किसके स्वभाव का सटीक वर्णन किया है?
2. नाटकीयता की सृष्टि किस कारण हुई है?
3. कवि ने किस भाषा का प्रयोग किया है?
4. किस काव्य-गुण की अधिकता दिखाई देती है?
5. किस काव्य-रस का प्रयोग किया गया है?
6. अवतरण में लयात्मकता की सृष्टि किस कारण हुई है?
7. किस छंद का प्रयोग किया गया है?
8. दो तत्सम शब्द लिखिए।
9. इस काव्यांश में प्रयुक्त अलंकार लिखिए।
उत्तर :
1. तुलसीदास ने लक्ष्मण के तेज स्वभाव, विश्वामित्र के विवेक और परशुराम के अहंकार का सटीक वर्णन किया है।
2. संवादात्मकता ने कथन को नाटकीयता का गुण प्रदान किया है।
3. अवधी भाषा का प्रयोग है।
4. ओज गुण विद्यमान है।
5. बीर रस।
6. स्वरमैत्री और छंद युक्त होने के कारण रचना में लयात्मकता विद्यमान है।
7. दोहा-चौपाई छंद का प्रयोग किया गया है।
8. दोष, श्रम
9. हरा-ही-हरा सूझना।

उत्प्रेक्षा –
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा

पुनरुक्तिप्रकाश –
बार-बार

रूपकातिशयोक्ति –
अयमय जाँड़ न ऊखमय

अनुप्रास –

  • कौसिक कहा, केवल कौसिक, काटि कुठार कठोरें,
  • गुन गनहि,
  • हृदय हसि मुनिहि हरियरे,
  • परसु
  • सुधारि बरेउ कर घोरा-
  • देई दोसू,
  • कटुबादी बालकु बधजोग, बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

6. कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा।।
माता पितहि उरिन भये नीकें। गुररिनु रहा सोचु बड़ जी के॥
सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गये ब्याज बड़ बाढ़ा।
अब आनिअ व्यवहरिआ बोली। तुरत देऊँ मैं थैली खोली।
सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा॥
भृगुबर परसु देखाबहु मोही। बिन बिचारि बचौं नृपद्रोही।
मिले ने कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विजदेवता बरहि के बाड़े॥
अनुचित कहि सबु लोगु पुकारे। रघुपति सबनहि लखनु नेवारे।
लखन उतर आहुति सरिस भृगबरकोपु कृसानु।
बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु।

शब्दार्थ : कहेउ – कहा। विदित – जानता। उरिन – ऋण से मुक्त। व्यवहारिआ – हिसाब करने वाला। कटु – कड़वा। मोही – मुझे। बिन – ब्राह्मण। नृपद्रोही – राजाओं के शत्रु। सुभट – अच्छे बलवान वीर। रन – युद्ध। द्विज – ब्राह्मण। सयनहि – संकेत से; इशारे से। नेवारे – रोक दिया। सरिस – समान। कोपु – क्रोध। कृसानु – आग। रघुकुलभानु – रघुकुल के सूर्य।

प्रसंग : प्रस्तुत पद गोस्वामी तुलसीदास के द्वारा रचित महाकाव्य ‘ रामचरितमानस’ के ‘बालकांड” से लिया गया है। सीता स्वयंवर के समय शिवजी के धनुष टूट जाने पर लक्ष्मण और परशुराम में विवाद हुआ था, जिसे राम ने अधिक बढ़ने से पहले ही रोक दिया था।

व्याख्या : लक्ष्मण ने कहा-‘हे मुनि! आपके शोल को कौन नहीं जानता? वह संसार भर में प्रसिद्ध है। आप माता-पिता के ऋण से तो भली-भाँति मुक्त हो चुके हैं। अब आप पर गुरु का ऋण रह गया है, जिसका आपके मन पर बड़ा बोझ है। आपको उसकी चिंता सता रही है।

वह ऋण मानो हमारे ही माथे निकाला था। बहुत दिन बीत गए। इसमें व्याज भी बहुत बढ़ गया होगा। अब किसी हिसाब-किताब करने वाले को बुला लाइए, तो मैं तुरंत थैली खोलकर उधार चुका हूँ।” लक्ष्मण के कड़वे वचन सुनकर परशुराम ने अपना फ़रसा संभाला। सारी सभा हाय ! हाय ! करके पुकार उठी। लक्ष्मण ने कहा-‘”हे भृगु श्रेष्ठ! आप मुझे फरसा दिखा रहे हैं? पर हे राजाओं के शत्रु! मैं आपको ब्राह्मण समझकर अब तक बचा रहा है।

लगता है कि आपको कभी रणधीर, बलवान वोर नहीं मिले। हे ब्राह्मण देवता! आप घर ही में बड़े हैं।” यह सुनते ही सभी लोग पुकार उठे कि ‘यह अनुचित है ! अनुचित है!’ तब रघुकुलपति श्रीराम ने संकेत से लक्ष्मण को रोक दिया। आहुति के समान लक्ष्मण के उत्तर से परशुराम को क्रोधरूपी आग को बढ़ते देखकर रघुकुल के सूर्य श्रीराम ने जल के समान शीतल वचन कहे।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. लक्ष्मण ने परशुराम पर क्या व्यंग्य किया?
2. लक्ष्मण ने परशुराम के शील के संबंध में क्या कहा?
3. ‘माता पितहि उरिन भये नीके’ पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
4. परशुराम की चिंता अभी शेष क्यों थी?
5. यहाँ किस गुरु-ऋण की बात हो रही है? उसे चुकाने के लिए लक्ष्मण ने परशुराम को क्या उपाय सुझाया?
6. लक्ष्मण के व्यवहार का राजसभा पर क्या प्रभाव पड़ा?
7. लक्ष्मण परशुराम को क्यों बना रहे थे?
8. राम ने लक्ष्मण को बोलने से किस प्रकार रोका था?
9. लक्ष्मण के शब्द परशुराम के लिए कैसे थे?
10. इस अवतरण के आधार पर राम के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
11. इस अवतरणा के आधार पर लक्ष्मण के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
12. नृपदोही किसे कहा गया है और क्यों?
13. सभा में उपस्थित लोगों ने लक्ष्मण की कठोर और व्यंग्यपूर्ण बातों को सुनकर क्या प्रतिक्रिया दी?
उत्तर :
1. लक्ष्मण ने परशुराम से व्याय शैली में बात करते हुए कहा कि वे अपने माता-पिता के ऋण से मुक्त हो ही चुके हैं, अब गुरु-ऋण का जो हिसाब-किताब उनके मत्थे डाला गया है उसे भी चुका दें। वे व्यर्थ में अपने सिर पर बोझ क्यों लादे हुए हैं? आज तक उन्हें शक्तिशाली रणवीर मिले ही नहीं थे और इसलिए वे स्वयं को बहादुर मान रहे हैं।
2. लक्ष्मण ने परशुराम से कहा कि सारा संसार उनके शील को भली-भाँति जानता है।
3. इस पंक्ति का आशय है कि परशुराम अपने माता-पिता के ऋण से मुक्त हो चुके हैं।
4. परशुराम की चिंता अभी यह सोचकर शेष थी कि वे अपने गुरु के ऋण को किस प्रकार चुकाएँगे।
5. यहाँ लक्ष्मण ने परशुराम को अपने गुरु का ऋण चुकाने के लिए कहा है। लक्ष्मण के अनुसार परशुराम ने अपने गुरु से जो शस्त्र विद्या सौखी है, वे उस ऋण को उतार दें। इसके बाद लक्ष्मण ने ऋण चुकाने के लिए ब्याज गणना हेतु किसी हिसाब-किताब करने वाले को बुलाने के लिए कहा।
6. लक्ष्मण के व्यवहार से सारी राजसभा हाय! हाय! करने लगी और कहने लगी कि लक्ष्मण का परशुराम के प्रति व्यवहार अनुचित है।
7. लक्ष्मण परशुराम को अब तक इसलिए बचा रहे थे, क्योंकि परशुराम ब्राह्मण थे और सूर्यवंशी ब्राह्मणों पर अस्त्र-शस्त्र नहीं उठाते थे। राम ने संकत के द्वारा नबमण को बोलने से रोका था।
9. लक्ष्मण के शब्द परशुराम के लिए क्रोधरूपी आग में आहुति के समान थे, जिस कारण उनका गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा था।
10. राम शांत, नम, विनयी, कोमल, मर्यादित और समझदार व्यक्तित्व के स्वामी थे। वे अपने कोमल शब्दों से बिगड़ी हुई स्थिति को नियंत्रित करने में समर्थ थे।
11. लक्ष्मण उग्र, क्रोधी और व्यंग्य करने वाले व्यक्तित्व के स्वामी थे। वे बोलते समय विवेकपूर्ण व्यवहार नहीं करते थे।
12. परशुराम को नपदोही कहा गया है, क्योंकि उन्होंने अनेक बार पृथ्वी से क्षत्रियों को समाप्त कर दिया था।
13. सभा में उपस्थित लोगों ने लक्ष्मण को कहार और व्यंग्यपूर्ण बातों को सुनकर अपना रोष और विरोध प्रकट किया।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

सौंदर्य-सराहना संबंधी प्रश्नोत्तर –

1. कवि ने किम भाषा का प्रयोग किया है?
2. किस प्रकार की शब्दावली का प्रयोग किया गया है?
3. कवि ने किन छंदों का प्रयोग किया है?
4. किस काव्य-रस का प्रयोग है?
5. किस काव्य-गुण की प्रधानता है?
6. कवि ने लयायकना की सृष्टि कैसे की है?
7. लक्ष्मणा के शब्दों में कौन-सी शब्द-शक्ति विद्यमान है?
8. कोई दो नद्भव शब्द छाँटकर लिखिए।
9. संवादों के कारण कौन-सी भाव विशेषता आ गई है?
10. ‘द्विजदेवता’ में कौन-सा भाव व्यक्त हुआ है?
11. दो तत्सम शब्द छाँटकर लिखिए।
12. इस काव्यांश में प्रयुक्त अलंकार लिखिए।
उत्तर :
1. अवधी भाषा का सहज-सुंदर प्रयोग किया गया है।
2. तत्सम और तद्भव शब्दावली का स्वाभाविक-समन्वित प्रयोग किया गया है।
3. दोहा-चौपाई छंद का प्रयोग है।
4. बौर रस का प्रयोग है।
5. ओज गुण विद्यमान है।
6. स्वरमैत्री ने लयात्मकता की सृष्टि की है।
7. व्यंजना शब्द शक्ति विद्यमान है, जिसने लक्ष्मण के शब्दों को विशेष अर्थ प्रदान किया है।
8. थैली, दिन
9. नाटकीयता।
10. व्यंग्य, वक्रोक्ति।
11. आहुति, कटु।
12. बीप्सा –
हाय-हाय वक्रोक्ति
कहेउ लखन मुनि सील तुम्हारा। को नहि जान बिदिन संसारा॥
माता पितहि उरिन भये नौकें …………… थैली खोली।

उपमा –
लखन उत्तर आहुति सरिस
जल-सम बचन
भगुबरकोपु कृसानु

अनुप्रास –

व्याज बड़ बाढ़ा, बिन बिचारि बचौं
सब सभा
थैली खोली
कुठार सुधारा

राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद Summary in Hindi

कवि-परिचय :

तुलसीदास राममार्गीं शाखा के प्रतिनिधि कवि, हिंदी सहित्य के गौरव तथा भारतीय संस्कृति के रक्षक माने जाते हैं। इनकी रचनाएँ भारतीय धर्म एवं आस्था की प्रतीक बन गई हैं। तुलसीदास का जन्म सन 1532 ई० में उत्तर प्रदेश के बाँदा ज़िले के राजापुर ग्राम में हुआ था। कुछ विद्वान उनका जन्मस्थान सोरों (ज़िला एटा) भी मानते हैं। वे जाति से सरयूपारी ब्राह्मण थे। उनके पिता का नाम आत्माराम दूबे और माता का नाम हुलसी था।

तुलसीदास का बचपन बड़ी कठिनाइयों में व्यतीत हुआ। इनके पिता ने इन्हें मूल नक्षत्र में पैदा होने के कारण त्याग दिया था। बाद में नरहरि बाबा ने इनका पालन-पोषण किया। उनकी कृपा से तुलसीदास ने पुराण, वेद, इतिहास एवं दर्शन का खूब अध्ययन किया।

कहते हैं कि तुलसीदास यौवनकाल में अपनी पली पर विशेष अनुरक्त थे। लेकिन पल्नी की फटकार ने इनकी जीवन-दिशा को बदल दिया। इन्होंने अपना जीवन राम के चरणों में अर्पित कर दिया। भगवान राम के प्रति इनके मन में अगाध श्रद्धा थी। इन्होंने अपनी रचनाओं के द्वारा राम-काव्य को उत्कर्ष प्रदान किया।

सन 1623 ई० में काशी में इनका देहांत हो गया। इनके निधन के विषय में निम्नलिखित दोहा प्रचलित है-

संबत् सोलह सौ असी, असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तग्यो शरीर॥

तुलसीदास ने अपना सारा जीवन राम की आराधना में लगा दिया। इनके द्वारा रचित बारह रचनाएँ हैं, जिनमें रामचरितमानस तथा विनय-पत्रिका
विशेष उल्लेखनीय हैं। रामचरितमानस प्रबंधकाव्य का आदर्श प्रस्तुत करता है, तो विनय-पत्रिका मुक्तक-शौली में रचा गया उत्कृष्ट गीति-काव्य है।

इसके अतिरिक्त तुलसीदास ने हनुमान-चालीसा, दोहावली, कवितावली, गीतावली आदि की रचना भी की। तुलसीदास के काव्य की सबसे बड़ी विशेषता समन्वय की भावना है। इनके काव्य को समन्वय की विराट चेष्टा कहा गया हैं। अपने समन्वयवादी दृष्टिकोण के कारण ही तुलसीदास लोकनायक के आसन पर आसीन हुए। लोकसंग्रह का भाव तुलसी की भक्ति का अभिन्न अंग था। इसलिए इनकी भक्ति कृष्णभक्त कवियों के समान एकांगी न होकर सवांगपूर्ण हैं।

तुलसीदास का भाव-जगत पर पूर्ण अधिकार था। वे अपनी रचनाओं में; विशेषकर ‘मानस’ में; मार्मिक स्थलों के चयन में विशेष सफल रहे हैं। तुलसीदास ने श्रृंगार-रस का चित्रण मर्यदा के भीतर रहकर किया है। वात्सल्य-रस के चित्रण में भी इन्हें पूर्ण सफलता मिली है।तुलसी-काव्य में शांत-रस एवं करुण-रस की प्रधानता रही है। अन्य रसों का भी प्रसंगानुकूल वर्णन मिलता है। तुलसीदास ने धर्म का स्वस्थ रूप सामने रखकर अपने काव्य की रचना की हैं।

विनय-पत्रिका में तुलसीदास की दास्य भाव की भक्ति का आदर्श निहित है। भाषा, अर्थ-गौरव एवं पांडित्य तीनों दृष्टियों से विनय-पत्रिका अपना विशिष्ट स्थान रखती है। तुलसी की विनय की अभिव्यक्ति उनके भक्त-हृदय की परिचायक है –

ऐसो को उदार जग माहीं।
बिना सेवा जो द्रबै-दीन पर, राम सरस कोऊ नाहीं।

तुलसीदास ने अपने पात्रों में आदर्श को प्रतिष्ठा दिखाकर उनके चरित्र को अनुकरण का विषय बना दिया है। इन्होंने पात्रों के माध्यम से अनेक आदर्श हमारे सामने रखे। सामाजिक मर्यादाओं के प्रकाश में इन्होंने धर्म को नवीन रूप प्रदान किया। इन्होंने मानस में व्यक्ति-धर्म, समाज-धर्म तथा साष्ट्र-धर्म की स्थापना की। राम के चरित में विविध आदर्शो की स्थापना की। रमम एक आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श मित्र, आदर्श शत्रु तथा आदर्श राजा के रूप में हमारे सामने आते हैं।

तुलसीदास ने तस्कालीन समय में प्रचलित अवधी तथा ब्रज-दोनों भाषाओं को अपनाया है। रामचरितमानस में अवधी भाषा का प्रयोग हैं, जबकि कवितावली तथा विनय-पत्रिका में ब्रज भाषा का प्रयोग हुआ है। तुलसीदास ने सभी काव्य-शैलियों को अपनाया है जिनमें छप्पय, कवित्त, सवैया पद्धति विशेष उल्लेखनीय हैं। तुलसीदास ने अलंकारों का भी समुचित प्रयोग किया है। उनके काव्य में रूपक, निदर्शना, उपमा, व्यतिरेक, अप्रस्तुत प्रशंसा आदि अनेक अलंकारों का प्रयोग है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

काविता का सार :

रामचरितमानस के बालकांड से लिए गए ‘राम-लक्ष्मण-परशुराम संबाद’ में सोता-स्वयंवर के समय राम के द्वारा शिव कें धनुष-भंग करने के बाद मुने पष्युराम के क्रोध और राम-लक्मूण से उनके संवादों का वर्णन किया गया है। परशुराम को जब यह समाचार मिला कि शिब-धनुष खंडंडित कर दिया गया है, तो वे बहुत क्रोधित हुए। उनके क्रोध को देख्रकर राम ने विनयपूर्वक मुनि से कहा कि शिवजी के धनुष को तोड़ने बाला कोई उनका दास ही होगा। मुनि ने गुस्से में भरकर कहा कि सेवक वह होता है, जो सेवा का कान करे।

जिसने शिवजी के धनुष को तोड़ा है, बह सहसजाहु की तरह उनका शत्तु है। यदि उसने स्वयं को यहाँ उपस्थित राज समाज से अलग नहीं किया, तो सभी राजा मारे आाएंग। यह सुनकर लक्ष्मण ने कहा कि उन्हौंने लड़कपन में अनेक धनुहियाँ सोड़ दी थीं, पर तब तो उन्होंने ऐसा गुस्सा नहीं किया था। यह सुलकर युनि ने क्रोध में लक्षण को दुलकारते हुए पूला कि क्या उन्हें शिव-धनुष एक धनुहि के समान प्रतीत होता है ? लक्षण ने हैंपते हुए कहा कि धनुष तो सरे एक-से ही होते हैं।

पुराने धनुष को तोड़ने से क्या लाभ और क्या ह्नानि ? त्रीराम ने तो उस युराने धनुप को बह छुआ ही था कि वह टूट गया। गुस्से में भरकर परशुणाम ने कहा कि वे उसे बालक समझकर नहीं मार रहे। वे केबल भुनि ही नहीं है, बलिक बाल-ब्रहमचारी और अल्यंत क्रोधी हैं। से क्षत्रिय कुल के शत्रु के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनका फ़रसा बड़ा भयातक है। लक्षण ने हाँसते हुए युनि का मज़ाक उड़ाया और कहा कि कमजोर तो वे भी नहीं हैं। वे उन्हें व्राहमण समझकर व अज्ञोपवीत देखकर अपने क्रांध को रोक उन्हें सहारते हैं, क्योंकि उनके कुल सें ब्राहुमण, भक्त और गो पर बीरता नहीं दिखाई जाती। इन्हें मारने से पाप लगता है और इससे हार जाने पर अपयश मिलता है।

वैसे आपका एक-एक शन्द ही करोड़ों वज्रों के समान है। आपको किसी अस्न-शख्र को धारण करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह सुन परखुराम ने गुरु चिरबमित्र से कहा कि लधमण बड़ा कुदुद्धि और दुए हैं। यह सूर्यंश का कलंक है, जिसे वे क्षणभर बाद अपने कुल्हाड़े से काट डालेंगे। यदि वे उसे इचाना चहते है, तो उसे समझा-बुझा कर ऐसा बोलने से रोकें। बिश्वाभित्र तो नहीं सोले, पर लक्ष्मण ने कहा कि यदि परगुराम को अपने यारे में और कुछ भी कहना है, तो वे कह लें 1 वैसे वे अपना यश पहले ही काफ़ी बसान कर चुके हैं।

क्रोध को रोकार व्यर्थ दुख नहीं उठाना चाहिए। वैसे गाली देना उन्हें शोभा नहीं देता। शूरखीर तो अपना वल युद्ध-भुम में दिखाते हैं, वे ब्यर्ध में डींग चर्ति हैंका करते। यह सुन परशुराम ने गुस्से से भरकर अपना परशु सुधार कर हाथ में ले लिया। सब विश्वामित्र ने उनसे कहा कि वे उसके प्रपराध को क्षमा कर दें। बालकों के दोष और गुण को साधु नहीं गिनते।

तब परशुराम ने अहसान जताते हुए कहा कि वे विखायित्र के शील के कारण लक्क्रण को बिना मारे छोड़ रहे हैं, नहीं तो अपने फ़रसे से उसे काटकर अपने गुरु के और जो गुरु का ऋण शेष बचा है, उसे भी पूरी कर लें। यह सुनते ही परशुरान ने अपना कुल्हाड़ा संभाल लिया। सारी सभा में हाहाकार संच गया। लक्ष्सण की वाणी ने परशुरम की क्रोधरूपी अरिन में आहुति का काम किया। तब श्रीराम ने जल के समान शांत करने वाले झा्द कहे।

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5

Jharkhand Board JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5 Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 9th Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5

Page-184

Question 1.
In the figure, A, B and C are three points on a circle with centre O such that ∠BOC = 30° and ∠AOB = 60°. If D is a point on the circle other than the arc ABC, find ∠ADC.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5 - 1
Answer:
Here, ∠AOC = ∠AOB + ∠BOC
∠AOC = 60° + 30°
⇒ ∠AOC = 90°
We know that angle subtended by an arc at centre is double the angle subtended by it at any point on the remaining part of the circle.
∠ADC = \(\frac{1}{2}\) ∠AOC = \(\frac{1}{2}\) × 90° = 45°

Page-185

Question 2.
A chord of a circle is equal to the radius of the circle. Find the angle subtended by the chord at a point on the minor arc and also at a point on the nugor arc.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5 - 2
Answer:
Given: Chord AB is equal to the radius of the circle.
In ∆OAB, OA = OB = AB = radius of the circle.
Thus, AOAB is an equilateral triangle.
∠AOB = 60°
also, ∠ACB = \(\frac{1}{2}\) ∠AOB = \(\frac{1}{2}\) × 60° = 30°
ACBD is a cyclic quadrilateral,
∠ACB + ∠ADB = 180° (Opposite angles of cyclic quadrilateral)
⇒ ∠ADB = 180° – 30° = 150°
Thus, angle subtend by the chord at a point on the minor arc and also at a point on the major arc are 150° and 30° respectively.

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5

Question 3.
In Fig, ∠PQR = 100°, where P, Q and R are points on a circle with centre O. Find ∠OPR.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5 - 3
Answer:
Reflex ∠POR = 2 × ∠PQR = 2 × 100° = 200°
∴ ∠POR = 360° – 200° = 160°
In ∆OPR,
OP = OR (radii of the circle)
∠OPR = ∠ORP
(Angles opposite to equal sides)
Now,
∠OPR + ∠ORP +∠POR = 180°
(Sum of the angles in a triangle)
⇒ ∠OPR + ∠OPR + 160° = 180°
⇒ 2∠OPR= 180°- 160°
⇒ ∠OPR =10°

Question 4.
In Fig, ∠ABC = 69°, ∠ ACB = 31°, find ∠BDC.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5 - 14
Answer:
∠BAC = ∠BDC (Angles in the same segment of the circle)
In ∆ABC,
∠BAC + ∠ABC+ ∠ACB =180° (Sum of the angles of a triangle)
⇒ ∠BAC + 69°+ 31° = 180°
⇒ ∠BAC = 180°- 100°
⇒ ∠BAC = 80°
Thus, ∠BDC = 80°

Question 5.
In Fig, A, B, C and D are four points on a circle. AC and BD intersect at a point E such that ∠BEC = 130° and ∠ECD = 20°. Find ∠ BAC.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5 - 5
Answer:
∠BAC = ∠CDE
(Angles in the segment of the circle)
In ∆CDE,
∠CEB = ∠CDE + ∠DCE (Exterior angles of the triangle)
=> 130° = ∠CDE + 20°
⇒ ∠CDE =110°
Thus, ∠BAC = 110°

Question 6.
ABCD is a cyclic quadrilateral whose diagonals intersect at a point E. If ∠DBC = 70°, ∠BAC is 30°, find ∠BCD. Further, if AB = BC, find ∠ECD.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5 - 6
Answer:
For chord CD,
∠CBD = ∠CAD (Angles in same segment)
∴ ∠CAD = 70°
∠BAD = ∠BAC + ∠CAD
= 30° + 70° = 100°
∠BCD + ∠BAD = 180° (Opposite angles of a cyclic quadrilateral)
⇒ ∠BCD + 100° = 180°
⇒ ∠BCD = 80°
In ∆ABC, AB = BC (given)
∠BCA = ∠CAB (Angles opposite to equal sides of a triangle)
∴ ∠BCA = 30°
Also, ∠BCD = 80°
∴ ∠BCA + ∠ACD = 80°
⇒ 30° + ∠ACD = 80°
∠ACD = 50°
i.e. ∠ECD = 50°

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5

Question 7.
If diagonals of a cyclic quadrilateral are diameters of the circle through the vertices of the quadrilateral, prove that it is a rectangle.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5 - 7
Answer:
Given: ABCD is a cyclic quadrilateral, whose diagonals AC and BD are diameters of the circle passing through A, B, C and D.
To prove: ABCD is a rectangle
Proof: In AAOD and ACOB AO = CO (Radii of a circle)
OD = OB (Radii of a circle)
∠AOD = ∠COB (Vertically opposite angles)
∴ ∆AOD ≅ ∆COB (By SAS axiom)
∴ ∠AOD S ∠OCB (By CPCT )
∴ AD || BC Similarly AB || CD Hence quadrilateral ABCD is a parallelogram.
∠ABC = ∠BCD = ∠CDA = ∠DAB = 90°
(Angles in the semi-circle)
Thus, ABCD is a parallelogram with each internal angle as 90°. So, ABCD is a rectangle.

Question 8.
If the non-parallel sides of a trapezium are equal, prove that it is cyclic.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5 - 8
Answer:
Given: ABCD is a trapezium where non-parallel sides AD and BC are equal.
Construction: DM and CN are perpendiculars drawn on AB from D and C respectively.
To prove: ABCD is cyclic trapezium.
Proof: In ∆DAM and ∆CBN,
AD = BC (Given)
∠AMD = ∠BNC = 90° (By construction) DM = CN (Distance between the parallel lines)
∆DAM ≅ ∆CBN by RHS congruence criterion.
Now, ∠A = ∠B by CPCT
Also, ∠B + ∠C = 180° (sum of the co-interior angles)
⇒ ∠A + ∠C = 180°

In trapezium ABCD,
∠A + ∠B + ∠C + ∠D = 360°
=> 180° + ∠B + ∠D = 360°
⇒ ∠B + ∠D = 360° – 180°
= 180°
Thus, ABCD is a cyclic trapezium as sum of the pair of opposite angles is 180°.

Page-186

Question 9.
Two circles intersect at two points B and C. Through B, two line segments ABD and PBQ are drawn to intersect the circles at A, D and P, Q respectively (see Fig). Prove that ∠ACP = ∠QCD.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5 - 9
Answer:
Chords AP and DQ are joined.
For chord AP,
∠PBA = ∠ACP
(Angles in the same segment) …(i)
For chord DQ,
∠DBQ = ∠QCD
(Angles in same segment) …(ii)
ABD and PBQ are line segments intersecting at B.
∠PBA = ∠DBQ
(Vertically opposite angles) …(iii)
By the equations (i), (ii) and (iii),
∠ACP = ∠QCD

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5

Question 10.
If circles are drawn taking two sides of a triangle as diameters, prove that the point of intersection of these circles lie on the third side.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5 - 10
Answer:
Given: Two circles are drawn on the sides AB and AC of the triangle ΔABC as diameters. The circles intersected at D.
Construction: AD is joined.
To prove: D lies on BC. We have to prove that BDC is a straight line.
Proof: ∠ADB = ∠ADC = 90° (Angle in the semi circle)
Now, ∠ADB + ∠ADC = 90° + 90° = 180°
⇒ BDC is straight line.
Thus, D lies on the side BC.

Question 11.
ABC and ADC are two right triangles with common hypotenuse AC. Prove that ∠CAD = ∠CBD.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5 - 11
Answer:
Given: AC is the common hypotenuse.
∠ABC = ∠ADC = 90°.
To prove: ∠CAD = ∠CBD
Proof: Since, ∠ABC and ∠ADC are 90°.
These angles are in the semi circle. Thus, both the triangles are lying in the semi circle and AC is the diameter of the circle.
⇒ Points A, B, C and D are concyclic.
Thus, CD is the chord.
⇒ ∠CAD = ∠CBD (Angles in the same segment of the circle)

Question 12.
Prove that a cyclic parallelogram is a rectangle.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.5 - 12
Answer:
Given: ABCD is a cyclic parallelogram.
To prove: ABCD is rectangle.
Proof: ∠1 + ∠2 = 180° (Opposite angles of a cyclic parallelogram)
also, opposite angles of a parallelogram are equal.
Thus,
∠1 = ∠2
⇒ ∠1 + ∠1 = 180°
⇒ ∠1 = 90°
One of the interior angles of the parallelogram is right angle. Thus, ABCD is a rectangle.

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 गोदोहनम्

Jharkhand Board JAC Class 9 Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 गोदोहनम् Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 9th Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 गोदोहनम्

JAC Class 9th Sanskrit गोदोहनम् Textbook Questions and Answers

1. एकपदेन उत्तरं लिखत – (एक शब्द में उत्तर लिखिए-)
(क) मल्लिका पूजार्थ सखीभिः सह कुत्र गच्छति स्म? (मल्लिका पूजा के लिए सखियों के साथ कहाँ गई थी?)
उत्तरम् :
काशीविश्वनाथमन्दिरम्। (काशी विश्वनाथ मंदिर में)

(ख) उमायाः पितामहेन कति सेटकमितं दुग्धम् अपेक्ष्यते स्म? (उमा के दादाजी द्वारा कितने लीटर दूध की अपेक्षा की गई थी?) उत्तरम् :
त्रिंशत-सेटकमितम्। (तीसलीटर)

(ग) कुम्भकारः घटान् किमर्थं रचयति? (कुम्हार घड़े किसलिए बनाता है?)
उत्तरम् :
जीविकाहेतोः (आजीविका के लिए)।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

(घ) कानि चन्दनस्य जिह्वालोलुपतां वर्धन्ते स्म? (चन्दन के रसना लोभ को कौन बढ़ा रहे थे?)
उत्तरम् :
मोदकानि (लड्)।

(ङ) नन्दिन्याः पादप्रहारैः कः रक्तरञ्जितः अभवत्? (नन्दिनी की लातों से कौन खून से लथपथ हो गया?)
उत्तरम् :
चन्दनः (चन्दन)।

2. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत-(पूरे वाक्य में उत्तर लिखो-)
(क) मल्लिका चन्दनश्च मासपर्यन्त धेनो कथम् अकुरुताम्? (मल्लिका और चन्दन ने गाय का क्या किया?)
उत्तरम् :
तौ दुग्धदोहनं विहाय मासपर्यन्तं धेनोः सेवाम् एव अकुरुताम्। (उन दोनों ने दूध दोहना त्यागकर महीने भर तक गाय की सेवा की।

(ख) कालः कस्य रसं पिबति? (समय किसका रस पीता है?)
उत्तरम् :
क्षिप्रमक्रियमाणस्य कर्मणः, आदानस्य, प्रदानस्य च रसं काल: पिवति। (शीघ्र ही कार्य न करने वाले, लेन-देन न करने वाले कर्म का रस समय पी जाता है।)

(ग) घटमूल्यार्थं यदा मल्लिका स्वाभूषणं दातुं प्रयतते तदा कुम्भकारः किं वदति? (मल्लिका जब घड़ों के मूल्य के लिए अपने आभूषण देना चाहती है तो कुम्हार क्या कहता है?)
उत्तरम् :
कुम्भकारोऽवदत्-पुत्रिके नाहं पापकर्म करोमि। कथमपि नेच्छामि त्वां आभूषणविहीनां कर्तुम्। (कुम्हार ने कहा- पुत्री मैं यह पापकर्म नहीं करूँगा किसी प्रकार भी मैं तुम्हें आभूषण रहित नहीं करूँगा।)

(घ) मल्लिकया किं दृष्ट्वा धेनोः ताडनस्य वास्तविकं कारणं ज्ञातम्? (मल्लिका क्या देखकर गाय के प्रहार का वास्तविक कारण जान गई।)
उत्तरम् :
चन्दनं रक्तरंजितं दृष्ट्वा धेनोः ताडनस्य वास्तविकं कारणम् ज्ञातम्। (चन्दन को लहूलुहान देखकर गाय के लात मारने का वास्तविक कारण जान गई।)

(ङ) मासपर्यन्तं धेनो: अदोहनस्य किं कारणमासीत? (महीने भर तक गाय को न दोहने का क्या कारण था?)
उत्तरम् :
प्रतिदिनं दोहनं कृत्वा दुग्धं स्थायपानः चेत् यत् सुरक्षितं न तिष्ठति। अतः अदोहनं कृतम्। (प्रतिदिन दोहन करके रखते हैं तो सुरक्षित नहीं रहता। अतः दूध नहीं दुहा गया।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

3. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-(रेखांकित पदों को आधार बनाकर प्रश्न निर्माण कीजिए-)
(क) मल्लिका सखीभिः सह धर्मयात्रायै गच्छति स्म।
उत्तरम् :
मल्लिकाः काभिः सह धर्मयात्रायै गच्छतिस्म?

(ख) चन्दनः दुग्धदोहनं कृत्वा एव स्व प्रातराशस्य प्रबन्धम् अकरोत।
उत्तरम् :
चन्दनः दुग्ध दोहनं कृत्वा एव कस्य प्रबन्धम् अकरोत?

(ग) मोदकानि पूजा निमित्तानि रचितानि आसन्।
उत्तरम् :
कानि पूजा निमित्तानि रचितानि आसन्?

(घ) मल्लिका स्वपतिं चतुरतमं मन्यते।
उत्तरम् :
मल्लिका स्वपतिं कीदृशं मन्यते?

(ङ) नन्दिनी पादाभ्याम् ताडयित्वा चन्दनं रक्तरंजितं करोति?
उत्तरम् :
का पादाभ्याम् ताडयित्वा चन्दनं रक्तरंजितं करोति।

4. मञ्जूषायाः सहायतया भावार्थे रिक्तस्थानानि पूरयत-(मंजूषा की सहायता से भावार्थ में रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-)
[गृह व्यवस्थायै, उत्पादयेत्, समर्थकः, धर्मयात्रायाः मंगल कामनाम् कल्याण कारिणः।]
यदा चन्दनः स्वपत्न्या काशी विश्वनाथं प्रति…….विषये जानाति तदा सः क्रोधितः न भवति यत् तस्य पत्नी तं………. कथयित्वा सखीभिः सह भ्रमणाय गच्छति अपि तु तस्याः यात्रायाः कृते………कुर्वन् कथयति यत् तव मार्गाः शिवाः अर्थात्…..भवन्तु। मार्गे काचिदपि वाधा तव कृते समस्यां न……..। एतेन सिध्यति यत् चन्दनः नारी स्वतन्त्रतायाः.. आसीत्।
उत्तरम् :
यदा चन्दनः स्वपत्न्या काशी विश्वनाथं प्रति धर्मयात्रायैः विषये जानाति तदा सः क्रोधितः न भवति यत् तस्य पत्नी तं गृहव्यवस्थायै कथयित्वा सखीभिः सह भ्रमणाय गच्छति अपि तु तस्याः यात्रायाः कृते मंगल कामनाम् कुर्वन् कथयति यत् तव मार्गाः शिवाः अर्थात् कल्याणकारिणः भवन्तु। मार्गे काचिदपि बाधा तव कृते समस्यां न उत्पादयेत्। एतेन सिध्यति यत्। चन्दनः नारी स्वतन्त्रतायाः समर्थकः आसीत्।

5. घटनाक्रमानुसारं लिखत-(घटनाक्रम के अनुसार लिखिए-)
(क) सा सखीभिः सह तीर्थयात्रायै काशीविश्वनाथमन्दिरं प्रति गच्छति।
(ख) उभौ नन्दिन्याः सर्वविधपरिचर्यां कुरुतः।
(ग) उमा मासान्ते उत्सवार्थं दुग्धस्य आवश्यकताविषये चन्दनं सूचयति ।
(घ) मल्लिका पूजार्थं मोदकानि रचयति।
(ङ) उत्सवदिने यदा दोग्धुं प्रयत्नं करोति तदा नन्दिनी पादेन प्रहरति।
(च) कार्याणि समये करणीयानि इति चन्दनः नन्दिन्याः पादप्रहारेण अवगच्छति।
(छ) चन्दनः उत्सवसमये अधिकं दुग्धं प्राप्तुं मासपर्यन्तं दोहनं न करोति।
(ज) चन्दनस्य पत्नी तीर्थयात्रां समाप्य गृहं प्रत्यागच्छति।
उत्तरम् :
(क) मल्लिका पूजार्थं मोदकानि रचयति।
(ख) सा सखीभिः सह तीर्थयात्रायै काशीविश्वनाथ मन्दिरं प्रति गच्छति।
(ग) उमा मासान्ते उत्सवार्थं दुग्धस्य आवश्यकता विषये चन्दनं सूचयति।
(घ) चन्दन: उत्सवसमये अधिकं दुग्धं प्राप्तुम् मासपर्यन्तं दोहनं न करोति।
(ङ) चन्दनस्य पत्नी तीर्थयात्रा समाप्य गृहं प्रत्यागच्छति।
(च) उभौ नन्दिन्याः सर्वविध परिचर्यां कुरुतः।
(छ) उत्सव दिवसे यदा दोग्धुं दोग्धु प्रयत्नं करोति तदा नन्दिनी पादेन प्रहरति ।
(ज) कार्याणि समये करणीयानि इति चन्दनः नन्दिन्याः पादप्रहारेण अवगच्छति।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

6. अधोलिखितानि वाक्यानि कः कं प्रति कथयति इति प्रदत्त स्थाने लिखत-
(निम्न वाक्यों को कौन किससे कहता है, यह दिये हुए स्थान पर लिखिए-)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम् 1

7. पाठस्य आधारेण प्रदत्तपदानां सन्धि/सन्धिविच्छेद वा कुरुत –
(पाठ के आधार पर दिये हुए शब्दों की सन्धि/सन्धि विच्छेद कीजिए-)
उत्तरम्
(क) शिवास्ते – शिवाः + ते
(ख) मनःहरः – मनोहरः
(ग) सप्ताहान्ते – सप्ताह + अन्ते
(घ) नेच्छामि – न + इच्छामि
(ङ) अत्युत्तमः – अति + उत्तमः

8. पाठधारेण अधोलिखित पदानां प्रकृति-प्रत्ययं च संयोज्य/विभज्य वा लिखत –
उत्तरम् :
(क) करणीयम् – कृ + अनीयर् .
(ख) वि + क्री + ल्यप् – विक्रीय
(ग) पठितम् – पठ् + क्त
(घ) ताडय् + क्तवा – ताडयित्वा
(ङ) दोग्धुम् – दुह् + तुमुन्

JAC Class 9th Sanskrit गोदोहनम् Important Questions and Answers

प्रश्न: 1.
‘गोदोहनम्’ इति पाठस्य रचयिता कः? (‘गोदोहनम्’ पाठ का रचयिता कौन है?)
उत्तरम् :
कृष्णचन्द्र त्रिपाठी महोदयः ‘गोदोहनम्’ पाठस्य रचयिता अस्ति। (कृष्णचन्द्र त्रिपाठी महोदय ‘गोदोहनम्’ पाठ के रचयिता हैं।)

प्रश्न: 2.
‘गोदोहनम्’ पाठः कस्मात् पुस्तकात् सङ्कलितः? (‘गोदोहनम्’ पाठ किस पुस्तक से संकलित है?)
उत्तरम् :
‘गोदोहनम्’ पाठः ‘चतुर्दूहम्’ इति एकांकि संग्रहात् सङ्कलितः। (‘गोदोहनम्’ पाठ ‘चतुर्दूहम्’ एकांकी संग्रह से संकलित है।)

प्रश्न: 3.
‘गोदोहनम्’ इति पाठस्य नायकः कः? (‘गोदोहनम्’ पाठ का नायक कौन है?)
उत्तरम् :
‘गोदोहनम्’ पाठस्य नायकः चन्दनः अस्ति। (‘गोदोहनम्’ पाठ का नायक चन्दन है।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

प्रश्न: 4.
का एषा मल्लिका? (यह मल्लिका कौन है?)
उत्तरम् :
एषा मल्लिका ‘गोदोहनम्’ इति एकाङ्कस्य नायिका अस्ति। (यह मल्लिका ‘गोदोहनम्’ एकांकी की नायिका है।)

प्रश्न: 5.
मल्लिका मोदकानि रचयन्ती किं करोति? (मल्लिका लड्डु बनाती हुई क्या कहती है?)
उत्तरम् :
मल्लिका मोदकानि रचयन्ती मन्दस्वरेण शिवस्तुतिं करोति। (मल्लिका लड्डु बनाती हुई मन्दस्वर से शिवस्तुति करती है।)

प्रश्न: 6.
कीदृशः चन्दनः स्वगृहं प्रविशति? (कैसा चन्दन घर में प्रवेश करता है?)
उत्तरम् :
मोदकगन्धमनुभवन् प्रसन्नमना चन्दनः स्वगृहं प्रविशति। (लड्ड की सुगन्ध का अनुभव करता हुआ चन्दन अपने घर में प्रवेश करता है।)

प्रश्नः 7.
मोदकानि अवलोक्य चन्दनः किं करोति? (लड्डुओं को देखकर चन्दन क्या करता है?)
उत्तरम् :
मोदकानि अवलोक्य ‘आस्वादयामि तावत्’ इति उक्त्वा मोदकं ग्रहीतुम् इच्छति। (लड्डुओं को देखकर ‘तो चख लूँ’ कहकर लड्ड लेना चाहता है।)

प्रश्न: 8.
मल्लिकया मोदकानि केन प्रयोजनेन निर्माणितानि? (मल्लिका ने लड्ड किस प्रयोजन से बनाये थे?)
उत्तरम् :
मल्लिकया मोदकानि पूजानिमित्तानि निर्मितानि आसन्। (मल्लिका ने लड्ड पूजा के निमित्त बनाये थे।)

प्रश्न: 9.
मल्लिका कुत्र गच्छति स्म? (मल्लिका कहाँ जा रही थी?)
उत्तरम् :
मल्लिका सखिभिः सह गंगास्नानं कर्तुं काशी विश्वनाथस्य यात्रां सम्पादयितुं गच्छति स्म। (मल्लिका सखियों के साथ गंगा स्नान के लिये काशी विश्वनाथ की यात्रा पर जा रही थी।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

प्रश्न: 10.
मल्लिकया सह चन्दनस्य गमनं कस्मान्नोचितमासीत्? (मल्लिका के साथ चन्दन का जाना किसलिए उचित नहीं था?)
उत्तरम् :
मल्लिका स्वसखिभिः सह गच्छति स्म अतः तया सह तस्यागमनस्य औचित्यं नासीत्। (मल्लिका अपनी सहेलियों के साथ जा रही थी अत: उसके साथ चन्दन का जाना उचित नहीं था।)

प्रश्न: 11.
यात्रां गच्छन्ती मल्लिका चन्दनं कस्मिन् कार्ये नियुक्तवती? (यात्रा पर जाती मल्लिका ने चन्दन को किस कार्य में नियुक्त किया?).
उत्तरम् :
सा नियुक्तवती यत् त्वं तावत् गृह व्यवस्थां धेनो दुग्धदोहन व्यवस्थां च परिपालय। (उसने नियुक्त किया कि तुम तब तक घर की व्यवस्था और गाय के दूध दोहने के कार्य का पालन करो।)

प्रश्न: 12
धर्मयात्रा प्रस्थाने चन्दनेन मल्लिकायै का कामना कृता? (तीर्थयात्रा पर प्रस्थान करने पर चन्दन ने मल्लिका के लिए क्या कामना की?)
उत्तरम् :
धर्मयात्रा प्रस्थाने चन्दनः मल्लिकायै अकामयत् यत् शिवास्ते सन्तु पन्थानः। (धर्मयात्रा पर प्रस्थान करने पर चन्दन ने मल्लिका के लिए कामना की कि तुम्हारे मार्ग मंगलमय हों।)

प्रश्न: 13.
ग्रामप्रमखस्य महोत्सवाय त्रिंशत सेटकमितं दग्धस्य व्यवस्था केन करणीया आसीत? (ग्राम प्रमुख के महोत्सव के लिए तीस लीटर दूध की व्यवस्था किसको करनी थी?)
उत्तरम् :
ग्रामप्रमुखस्य महोत्सवाय त्रिंशत सेटकमितं दुग्धस्य व्यवस्था चन्दनेन करणीया आसीत्। (ग्राम प्रमुख के महोत्सव के लिए तीस लीटर दूध की व्यवस्था चन्दन को करनी थी।)

प्रश्न: 14.
चन्दनः स्त्रीवेष धृत्वा दुग्धपात्रहस्तः नन्दिन्या समीपं कस्मात् आगच्छत्? (चन्दन स्त्रीवेष धारण कर दूध पात्र हाथ में लेकर नन्दिनी के समीप किसलिए गया।)
उत्तरम् :
नित्यमेव मल्लिका एव दुग्धं दोग्धि अतः सा तं मल्लिका इति ज्ञात्वा दुग्धं दद्यात्। (रोजाना मल्लिका ही दूध निकालती थी अतः वह उसे मल्लिका जानकर दूध दे दे।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

प्रश्न: 15.
मल्लिका कस्याः मातलानी आसीत? (मल्लिका किसकी मामी लगती थी?)
उत्तरम् :
मल्लिका उमायाः मातलानी आसीत्। (मल्लिका उमा की मामी लगती थी।)

प्रश्न: 16.
उमायाः गृहे किमदुग्धमपेक्षते स्म? (उमा के घर पर कितने दूध की अपेक्षा की जा रही थी?)
उत्तरम् :
उमायाः गृहे त्रिंशत सेटकपरिमितं दुग्धमपेक्षते स्मः? (उमा के घर पर तीस लीटर दूध की अपेक्षा थी।)

प्रश्नः 17.
चन्दनेन त्रिंशत सेटकमित दुग्धस्य व्यवस्था कथं चिन्तिता? (चन्दन ने तीस लीटर दूध की व्यवस्था कैसे सोची?)
उत्तरम् :
प्रतिदिनं दोहनं न कृत्वा उत्सव दिवसे एव समग्र दुग्धं धोक्ष्यावः। (प्रतिदिन दोहन न करके उत्सव के दिन ही पूरा दूध दोहन करके।)

प्रश्न: 18.
मल्लिकाचन्दनौ नन्दिनी कथं तोषितः? (मल्लिका और चन्दन नन्दिनी को कैसे सन्तुष्ट करते हैं?)
उत्तरम् :
मल्लिकाचन्दनौ नन्दिनी नीराजनेरापि तोषयतः। (मल्लिका और चन्दन उसे नीराजन से भी सन्तुष्ट करते हैं।)

प्रश्न: 19.
कुम्भकारः कस्य हेतोः घटान् रचयति? (कुम्हार किस प्रयोजन से घड़े बनाता है?)
उत्तरम् :
कुम्भकारः जीविकाहेतोः घटान् रचयति। (कुम्हार आजीविका हेतु घड़े बनाता है।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

प्रश्न: 20.
जीवनमिदम कीदशमक्तंभकारेण देवेशेन? (यह जीवन देवेश कम्भकार ने कैसा बताया है?)
उत्तरम् :
जीवनमिदं क्षणभङ्करं यथा एष मृत्तिकायाः घटः। (यह जीवन क्षणभंगुर है, जैसे यह मिट्टी का घड़ा।)

प्रश्न: 21.
घटानां मूल्यं देवेशेन कुंभकारेण किं कथितम्? (घड़ों का मूल्य देवेश कुंभकार ने क्या कहा?)
उत्तरम् :
घटानां मूल्यं पञ्चशतोत्तर रुप्यकाणि देवेशेन उक्तम्। (घड़ों का मूल्य पाँच सौ से ऊपर रुपये देवेश ने बताये।)

प्रश्न: 22.
गोदोहनात् पूर्वम् चन्दनः गां प्रति कथम् आचरति? (गाय दोहने से पूर्व चन्दन गाय के प्रति कैसा व्यवहार करता है?)
उत्तरम् :
चन्दनः धेनुं प्रणम्य मङ्गलाचरण विधाय मल्लिकाम् आह्वयति। (चन्दन गाय को प्रणाम करके, मंगलाचरण करके मल्लिका को आवाज लगाता है।)

प्रश्न: 23.
यदा चन्दनः धेनोः समीपं गत्वा दोग्धुमिच्छति तदा धेनुः किं करोति? (जब चन्दन गाय के समीप जाकर दोहता है तब गाय क्या करती है?)
उत्तरम् :
यदा चन्दनः धेनोः समीपं गत्वा दोग्धुमिच्छति तदा सा पृष्ठपादेन प्रहरति। (जब चन्दन गाय के पास जाकर दोहने का प्रयत्न करता है तो गाय पीछे के पैरों से लात मारती है।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

प्रश्न: 24.
चन्दनः कथं चीत्करोति? (चन्दन चीत्कार क्यों करता है?)
उत्तरम् :
धेनोः पादप्रहारेण ताडितः चन्दनः रक्तरञ्जितः सन् चीत्करोति। (गाय के प्रहार से ताडित हुआ रक्तरंजित चन्दन चीखता है।)

प्रश्न: 25.
धेनुः दोहनाम् अनुमति कथं न ददाति? (गाय दोहने की अनुमति क्यों नहीं देती?)
उत्तरम् :
तस्याः दुग्धं शुष्कं जातम्। (उसका दूध सूख गया था।)

रेखांकितानि पदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-(रेखांकित शब्दों को आधार पर प्रश्ननिर्माण कीजिए-)

प्रश्न: 1.
मल्लिका मोदकानि रचयन्ती शिवस्तुतिं करोति। (मल्लिका लड्डु बनाती हुई शिवस्तुति करती है।)
उत्तरम् :
मल्लिका कानि रचयन्ती शिवस्तुतिं करोति? (मल्लिका क्या बनाती हुई शिव स्तुति करती है?)

प्रश्न: 2.
शीघ्रमेव पूजनं सम्पादय। (शीघ्र ही पूजन करो।)
उत्तरम् :
शीघ्रमेव किं सम्पादय? (शीघ्र ही क्या करो।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

प्रश्न: 3.
अहं श्वः प्रातः काशीविश्वनाथमन्दिरं प्रति गमिष्यामि। (मैं कल प्रातः काशीविश्वनाथ मन्दिर की ओर जाऊँगी।)
उत्तरम् :
अह श्वः प्रातः कं प्रति गमिष्यामि? (मैं कल किसकी ओर जाऊँगी?)

प्रश्न: 4.
वयं सप्ताहान्ते प्रत्यागमिष्यामः। (हम सप्ताह के अन्त में लौटेंगे।)
उत्तरम् :
वयं कदा प्रत्यागमिष्यामः? (हम कब लौटेंगे?)

प्रश्नः 5.
मल्लिका त धर्मयात्रायै गता। (मल्लिका तो तीर्थयात्रा पर गई।)
उत्तरम् :
मल्लिका कस्यै गता? (मल्लिका किसके लिए गई?)

प्रश्नः 6.
स: नन्दिन्याः समीपं गच्छति। (वह नन्दिनी के समीप जाता है।)
उत्तरम् :
सः कस्याः समीपं गच्छति? (वह किसके समीप जाता है?)

प्रश्नः 7.
तत्र त्रिंशत सेटकमितं दुग्धमपेक्षते। (वहाँ तीस लीटर दूध की अपेक्षा है।)
उत्तरम् :
तत्र कियत् दुग्धम् अपेक्षते? (वहाँ कितना दूध अपेक्षित है।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

प्रश्नः 8.
एषा व्यवस्था भवद्भिः करणीया? (यह व्यवस्था आपको करनी है।)
उत्तरम् :
एषा व्यवस्था कैः करणीया? (यह व्यवस्था किसको करनी है?)

प्रश्न: 9.
प्रसन्नः सः धेनोः बहुसेवां करोति। (प्रसन्न वह गाय की बहुत सेवा करता है।)
उत्तरम् :
प्रसन्न सः कस्याः बहुसेवां करोति? (प्रसन्न वह किसकी बहुत सेवा करता है?)

प्रश्न: 10.
मासान्ते दुग्धस्य आवश्यकता भवति। (महीने के अन्त में दूध की जरूरत है।)
उत्तरम् :
दुग्धस्य आवश्यकता कदा भवति? (दूध की जरूरत कब है?)

प्रश्न: 11.
क्रमेण सप्त दिनानि व्यतीतानि। (क्रमशः सात दिन बीत गये।)।
उत्तरम् :
क्रमेण कति दिनानि व्यतीतानि? (क्रमशः कितने दिन बीत गये?)

प्रश्न: 12.
सप्ताहान्ते मल्लिका प्रत्यागच्छति। (सप्ताह के अन्त में मल्लिका लौट आती है।)
उत्तरम् :
सप्ताहान्ते का प्रत्यागच्छति? (सप्ताह के अन्त में कौन लौट आती है।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

प्रश्न: 13.
द्वावेव धेनोः सेवायाम् निरतौ भवतः। (दोनों गाय की सेवा में संलग्न हो जाते हैं।)
उत्तरम् :
द्वावेव कस्याः सेवायाम् निरतौ भवतः? (दोनों किसकी सेवा में संलग्न हो जाते हैं ?)

प्रश्न: 14.
कदाचित् विषाणयोः तैलं लेपयतः। (कभी सींगों पर तेल लगाते हैं।)
उत्तरम् :
कदाचित् कयोः तैलं लेपयतः? (कभी किसको तेल का लेप करते हैं?)

प्रश्न: 15.
रात्रौ नीराजनेन तोषयतः। (रात को दीपक जलाकर सन्तुष्ट करते हैं।)
उत्तरम् :
रात्रौ केन तोषयतः? (रात को किससे सन्तुष्ट करते हैं?)

प्रश्न: 16.
घटरचनायां लीनः गायति। (घड़ा बनाने में तल्लीन गाता है।)
उत्तरम् :
कस्यां लीनः गायति? (किसमें तल्लीन गाता है?)

प्रश्न: 17.
जीवनं मृत्तिका घट इव भङ्गुरः। (जीवन घड़े की तरह भंगुर है।)
उत्तरम् :
जीवन क इव भगुरः? (जीवन किसकी तरह भंगुर है?)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

प्रश्न: 18.
पञ्चदश घटान् इच्छामि। (पन्द्रह घड़े चाहता हूँ।)
उत्तरम् :
कति घटान् इच्छानि? (कितने घड़े चाहता हूँ?)

प्रश्न: 19.
विक्रणाय एव एतेघटा:? (ये घड़े बेचने के लिए ही हैं।)
उत्तरम् :
कस्मै एक एते घटाः? (ये घड़े किसके लिए हैं ?)

प्रश्न: 20.
मल्लिका स्व आभूषणं दातुम् इच्छति। (मल्लिका अपना आभूषण देना चाहती है।)
उत्तरम् :
मल्लिका किं दातुम् इच्छति ? (मल्लिका क्या देना चाहती है?)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

योग्यताविस्तारः

‘गोदोहनम्’ एकांकी में एक ऐसे व्यक्ति का कथानक है जो धनवान् और सुखी बनने की इच्छा से अपनी गाय से एक महीने तक दूध निकालना बन्द कर देता है, ताकि महीने भर के ध को एक साथ निकालकर बेचकर धनवान् बन सके। इस प्रकार एक मास पश्चात् जब वह गाय को दुहने का प्रयास करता है तब अत्यधिक दूध का तो कहना ही क्या। उसे दूध की एक बूंद भी नहीं मिलती, एक साथ दूध के स्थान पर उसे मिलते हैं गाय के पैरों से प्रहार जिससे आहत और रक्तरजित होने पर वह जमीन पर गिर पड़ता है। इस घटना से वहाँ उपस्थित सभी यह समझ जाते हैं कि यथासमय किया हुआ कार्य ही फलदायी होता है।

उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्।
पश्यतो बकमूर्खस्य नकुलेन हताः बकाः॥

बुद्धिमान व्यक्ति उपाय पर विचार करते हुए अपाय अर्थात् उपाय से होने वाली हानि के विषय में भी सोचे हानिरहित उपाय ही कार्य सिद्ध करता है। अपाय युक्त उपाय नहीं जैसे कि अपने बच्चो को साँप द्वारा खाए जाते हुए देखकर एक बगुले ने नेवले. का प्रबन्ध साँप को खाने के लिए किया जो कि साँप को खाने के साथ-साथ सभी बगुलों को भी बच्चों सहित खा गया। अतः ऐसा उपाय सदैव हानिकारक होता है, जिसके अपाय पर विचार न किया जाए।

“अविवेकः परमापदां पदम्”

गोदोहनम् – एकाङ्की पढ़ाते समय आधुनिक परिवेश से जोड़ें तथा छात्रों को समझाएँ कि कोई भी कार्य यदि नियत समय पर न करके कई दिनों के पश्चात् एक साथ करने के लिए संगृहीत किया जाता रहता है तो उससे होने वाला लाभ-हानि में परिवर्तित हो सकता है।

अतः हमें सदैव अपने सभी कार्य यथासमय करने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। पाठ की कथा नाटकीयता के साथ ही छात्रों को यह भी बताएँ कि इस नाटक से तात्कालिक समाज का परिचय भी मिलता है कि घर की व्यवस्था स्त्री-पुरुष मिलकर ही करते थे तथा स्त्री को स्वतन्त्र निर्णय लेने का भी पूर्ण अधिकार प्राप्त था।

गोदोहनम् Summary and Translation in Hindi

पाठ-परिचय – यह नाट्यांश कृष्णचन्द्र त्रिपाठी द्वारा रचित ‘चतुर्म्यहम्’ पुस्तक से संक्षिप्त एवं सम्पादित कर उद्धृत किया गया है। इस नाटक में एक ऐसे व्यक्ति का कथानक है जो धनवान् और सुखी होने का इच्छुक है। वह महीने भर तक गाय का दूध दोहना छोड़ देता है ताकि महीने के अन्त में गाय के शरीर में सञ्चित पर्याप्त दूध एक बार में ही निकाल लिया जाये और उसे बेचट र्याप्त सम्पत्ति अर्जित करने में समर्थ हो सके।

परन्तु महीने के अन्त में जब वह दूध दोहने लगा तो उसे दूध की एक बूंद भी नहीं मिली। दूध के स्थान पर वह गाय के प्रहारों से लहूलुहान हो गया तथा समझ गया कि दैनिक कार्य यदि महीने भर तक इकट्ठा करके किये जायें तो लाभ के स्थान पर हानि ही होती है। इस घटना से यह शिक्षा मिलती है कि यथा समय किया हुआ कार्य ही फलदायी होता है।

मूलपाठः,शब्दार्थाः,सप्रसंगहिन्दी-अनुवादः, सप्रसंग संस्कृत-व्यारव्याःअवबोधन कार्यम्च

(प्रथम दृश्यम्)

1. (मल्लिका मोदकानि रचयन्ती मन्दस्वरेण शिवस्तुतिं करोति)
(ततः प्रविशति मोदकगन्धम् अनुभवन् प्रसन्नमना चन्दनः।)

चन्दनः – अहा! सुगन्धस्तु मनोहरः (विलोक्य) अये मोदकानि रच्यन्ते? (प्रसन्नः भूत्वा) आस्वादयामि तावत्। (मोदकं गृहीतुमिच्छति)
मल्लिका – (सक्रोधम्) विरम। विरम। मा स्पृश! एतानि मोदकानि।
चन्दनः – किमर्थ क्रुध्यसि! तव हस्तनिर्मितानि मोदकानि दृष्ट्वा अहं जिह्वालोलुपतां नियन्त्रयितुम् अक्षमः अस्मि, किं न जानासि त्वमिदम्?
मल्लिका – सम्यग् जानामि नाथ! परम् एतानि मोदकानि पूजानिमित्तानि सन्ति।

शब्दार्थाः – मल्लिका = मल्लिका (मल्लिका), मोदकानि = लड्डुकानि (लड्डुओं का), रचयन्ती = निर्माणं कुर्वन्ती, मन्दस्वरेण = शनैः शनै निम्न स्वरेण वा (धीरे-धीरे अथवा नीचे स्वर में), शिव = महेशस्य (शिव की), स्तुति करोति = स्तुतिं गायति (स्तुति करती है), ततः = तत्पश्चात् (तब), मोदकगन्धम् = लड्डुकानां (लड्डुओं की), गन्धम् = सुवासम् (सुगन्धि का), अनुभवन् = अनुभवं कुर्वन् (महसूस करता हुआ), प्रसन्नमना = प्रसन्नचित्तः (खुश हुआ), चन्दनः प्रविशति = चन्दनः प्रवेशं करोति (चन्दन प्रवेश करता है), अहा! = (अरे), सुगन्धस्तु = सुरभिस्तु (सुगन्ध तो), मनोहरः = मनमोहका (मन को मोहने वाली),

विलोक्य = दृष्ट्वा (देखकर), अये = अरे, मोदकानि = लड्डुकानि (लड्डू), रच्यन्ते = निर्मीयन्ते (बनाये जा रहे हैं), प्रसन्नो भूत्वा = प्रसीदितः सन् (प्रसन्न होकर), आस्वादयामि तावत् = तदा स्वादं गृह्णामि (तो चखता हूँ), मोदकं = लड्डुकम् (लड्डू को), गृहीतुम् इच्छति = ग्रहीतुमीहते (लेना चाहता है), सक्रोधम् = सकोपम् (नाराजी के साथ), विरम-विरम = तिष्ठ-तिष्ठ (ठहर-ठहर), मा स्पर्श = स्पर्श मा कुरु (छुओ मत), एतानि = इमानि (इनि), मोदकानि = लड्डुकानि (लड्डुओं को),

किमर्थम् = कस्मात् (किसलिए, कैसे), क्रुध्यसि = प्रकुपसि (क्रोध करते हो), तव = ते (तेरे), हस्त = कर (हाथ के), निर्मितानि = रचितानि (बने हुए), मोदकानि = लड्डुकानि (लड्डुओं को), दृष्ट्वा = अवलोक्य (देखकर), अहं जिह्वा-लोलुपताम् = अहं रसनायाः लिप्साम् (मैं जीभ की लिप्सा को), नियन्त्रयितुम् = संयन्तुम् (काबू करने में), अक्षमः अस्मि = असमर्थोऽस्मि (असमर्थ हूँ), किम् = असि (क्या), त्वम् = भवति (आप), न जानासि = न जानाति (नहीं जानती हो), इदम् = एतत् (यह), नाथ = स्वामिन् (स्वामी), .. सम्यग् = सुष्ठुः (अच्छी तरह), जानामि = जानती हूँ), परम् = परञ्च (लेकिन, परन्तु), एतानि मोदकानि = इमानि लड्डुकानि (ये लड्डू), पूजानिमित्तानि सन्ति = पूजनाय रचितानि (पूजा के लिए बनाये गये हैं।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

हिन्दी अनुवादः

सन्दर्भ – प्रस्तुत नाट्यांश हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्यपुस्तक के ‘गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी रचित ‘चतुर्म्यहम्’ पुस्तक से सङ्कलित है।
प्रसंग – प्रस्तुत नाट्यांश में नायिका मल्लिका को लड्डु बनाते हुए दिखाया है। जिन्हें चन्दन चखना चाहता है तथा मल्लिका ‘ये भगवान की पूजा के लिए हैं’ ऐसा कहकर रोक देती है।
हिन्दी-अनुवाद – (मल्लिका लड़ बनाती हुई मन्दस्वर से शिवजी की स्तुति करती है, न्ध का अनुभव करता हुआ. प्रसन्नचित्त चन्दन प्रवेश करता है।)
चन्दन – अहा! सुगन्ध तो मनमोहक है। (देखकर) अरे क्या लड्डू बनाये जा रहे हैं? (प्रसन्न होकर) तो चखता हूँ। (लड्डू लेना चाहता है)
मल्लिका – (क्रोधसहित) रुको, रुको! मत छुओ इन लड्डुओं को।
चन्दन – नाराज क्यों हो रही हो। तुम्हारे हाथ के बने लड्डुओं को देखकर जीभ के लालच को काबू में करने में असमर्थ हूँ, क्या तुम इसे जानती हो?
मल्लिका – अच्छी तरह जानती हूँ स्वामी ! परन्तु ये लड्ड पूजा के प्रयोजन से बनाये हैं। संस्कत-व्यारव्याः

सन्दर्भ: – प्रस्तुत नाट्यांशः अस्माकं ‘शेमुषी’ इति पाठ्य-पुस्तकस्य ‘गोदोहनम्’ इति पाठात् उद्धृतः। एषः पाठः कृष्णचन्द्र त्रिपाठी-रचितात् ‘चतुर्म्यहम्’ इति एकाङ्कि संग्रहात् सङ्कलितः। (प्रस्तुत नाट्यांश हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्य-पुस्तक के ‘गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी रचित ‘चतुर्म्यहम्’ एकाङ्की-संग्रह से संकलित है।)
प्रसङ्गः – प्रस्तुत नाट्यांशे नायिका मल्लिका मोदकानि रचयन्ती दर्शिता। चन्दनः नायकः तानि स्प्रष्टुम् इच्छति परञ्च मल्लिका ‘एतानि मोदकानि पूजा निमित्तानि सन्ति’ इत्युक्त्वा वारयति। (इस नाट्यांश में नायिका मल्लिका लड्ड बनाती दिखाई गई है। चन्दन नायक उन्हें छूना चाहता है परन्तु मल्लिका उसे “ये लड्ड पूजा के लिए बनाये हैं” ऐसा कहकर रोक देती है।)
व्याख्या – (मल्लिका लड्डकानि निर्माणं कुर्वन्ती शनैः-शनैः निम्नस्वरेण वा महेशस्य स्तुतिं गायति। तत्पश्चात् लड्डकानां सुवासस्य अनुभवं कुर्वन् प्रसन्नचित्तः चन्दनः प्रवेशं करोति।) (मल्लिका लड्ड बनाती हुई मन्द स्वर में शिवजी की आरती गाती है। तब लड्डुओं की सुगन्ध का अनुभव करता हुआ प्रसन्नचित्त चन्दन प्रवेश करता है।)
चन्दनः – सुरभिः तु मनमोहका। (दृष्ट्वा) अये! लड्डकानि निर्मीयन्ते? (प्रसीदितः सन्) तदा स्वाद गृहणामि। . (लड्डुकम् ग्रहीतुमीहते)। (सुगन्धि तो मन को मोह लेने वाली है। (देखकर) अरे ! लड्डु बनाये जा रहे हैं? (प्रसन्नचित्त होते हुए) तो चखता हूँ। (लड्ड लेना चाहता है।))
मल्लिका – (सकोपम्) तिष्ठ! तिष्ठ! स्पर्श मा कुरु इमानि लड्डूकानि। ((नाराज हुई) रुको, रुको! छुओ मत इन लड्डुओं को।)
चन्दनः – कस्मात् प्रकुपसि? ते कर-रचितानि लड्डुकानि अवलोक्य अहं रसनायाः लिप्सां संयमपितुं असमर्थो अस्मि। अपि भवती न जानानि एतत् ? (नाराज क्यों होती हो। तुम्हारे हाथ के बने लड्ड देखकर मैं जीभ की लालसा को काबू में करने में असमर्थ हूँ। क्या आप इसे नहीं जानती?)
मल्लिका – स्वामिन् ! सुष्ठु जानामि अहम्। परञ्च इमानि लड्डकानि पूजनाय रचितानि। (स्वामी! अच्छी तरह जानती हूँ मैं, परन्तु ये लड्ड पूजा के लिए बनाये गये हैं।)

अवबोधन कार्यम्

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत- (एक शब्द में उत्तर दीजिए-)
(क) मल्लिका मोदकानि रचयन्ती किं करोति? (मल्लिका लड्डू बनाती हुई क्या करती है?)
(ख) मोदकानां सुगन्धः कीदृशी आसीत् ? (लड्डुओं की सुगन्ध कैसी थी?)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(क) मोदकानि कि निमित्तानि निर्मितानि? (लड्डू किस निमित्त बनाये गये थे?)
(ख) मल्लिका किं कुर्वती आसीत् ? (मल्लिका क्या कर रही थी?)

प्रश्न 3.
यथानिर्देशम् उत्तरत-(निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(क) ‘असमर्थः’ इति पदस्य पर्यायवाचि पदं गद्यांशात् लिखत।
(‘असमर्थ पद का समानार्थी पद गद्यांश से लिखिए।)
(ख) “एतानि मोदकानि’ इति पदयोः विशेषण विशेष्य पदं निर्दिशत।
(‘एतानि मोदकानि’ इन पदों में विशेषण-विशेष्य पद बताइये।)
उत्तराणि :
(1) (क) शिव स्तुतिम् (शिव की स्तुति)।
(ख) मनोहरः (मन को हरने वाली)।

(2) (क) मोदकानि पूजा निमित्तानि निर्मितानि। (लड्डू पूजा के निमित्त बनाये गये थे।)
(ख) मल्लिका मोदकानि रचयन्ती मन्दस्वरेण शिवस्तुतिं करोति। (मल्लिका लड्डू बनाती हुई मन्द स्वर से शिव स्तुति गाती है।)

(3) (क) अक्षमः (असमर्थः) ।
(ख) विशेषणपदम्-एतानि (ये) विशेष्यम्-मोदकानि ।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

2. चन्दनः – तर्हि, शीघ्रमेव पूजनं सम्पादया प्रसादं च देहि।
मल्लिका – भो! अत्र पूजनं न भविष्यति। अहं स्वसखिभिः सह श्वः प्रातः काशीविश्वनाथमन्दिरं प्रति गमिष्यामि, तत्र गङ्गास्नानं धर्मयात्राञ्च वयं करिष्यामः।
चन्दनः – सखिभिः सह! न मया सह! (विषादं नाटयति)
मल्लिका – आम्। चम्पा, गौरी, माया, मोहिनी, कपिलाद्याः सर्वाः गच्छन्ति। अतः, मया सह तवागमनस्य औचित्यं नास्ति। वयं सप्ताहान्ते प्रत्यागमिष्यामः। तावत्, गृह व्यवस्थां, धेनोः दुग्धदोहनव्यवस्थाञ्च परिपालय।

शब्दार्था: – तर्हि = तदा (तो), शीघ्रमेव = क्षिप्रमेव (जल्दी ही), पूजनं = पूजाकार्यम् (पूजा के), सम्पादय = सम्पन्न कुरु (सम्पन्न करो), भोः = अरे (अजी), अत्र पूजनं = अत्र पूजाकार्यम् न (यहाँ फूजा कार्य नहीं), भविष्यति = सम्पाद्यते (होगा), अहं स्वसखिभि = अहं स्व सहचरीभिः (मैं अपनी सहेलियों के), सह = सार्धम् (साथ), स्वः प्रातः = आगामि-दिवसे (कल), प्रातः = प्रभाते (सुबह), काशीविश्वनाथ-मन्दिरं प्रति गमिष्यामि = काशीविश्वनाथ मन्दिरं यास्यामि (काशी विश्वनाथ मन्दिर जाऊँगी), तत्र = तत्रस्थाने (वहाँ), गङ्गा-स्नानम् = भागीरथी-अवगाहनम् (गंगा स्नान),

धर्मयात्राञ्च = तीर्थयात्रा च (और तीर्थयात्रा), वयं करिष्यामः = सम्पादयिष्यामः वयम् (हम करेंगे), सखिभिः सह = सहचरीभिः साकम् ? (सहेलियों के साथ), न मया सह! = न-मया सार्धम् (मेरे साथ नहीं), विषादं नाटयति = खेदस्य अभि नयं करोति (खेद का अभिनय करता है), आम् = (हाँ) चम्पा, गौरी, माया, मोहिनी कपिला आद्याः (चम्पा, गौरी, माया, मोहिनी, कपिला आदि), सर्वाः = सकलाः (सभी), गच्छन्ति = यानि (जा रही हैं),

अतः मया सह = मत्सार्धम् (मेरे साथ), तवागमनस्य = ते गन्तुं (तुम्हारा जाना), औचित्यं नास्ति = नोचितम् (उचित नहीं है), वयं सप्ताहन्ते = वयं सप्तदिनानि अतीत्य (हम सात दिन बाद), प्रत्यागमिष्यामः = प्रत्यायाष्यामः (लौटेंगे), तावत् गृह व्यवस्थाम् = तावत् गृहस्य व्यवस्थाम् (घर की व्यवस्था को), धेनोः दुग्ध दोहन व्यवस्थांच = गावः पयो दोग्धं च प्रबन्धम् (गाय का दूध दोहने की व्यवस्था), परिपालय = सम्पादय (प्रबन्ध या व्यवस्था करना)।

हिन्दी अनुवादः

सन्दर्भ-प्रस्तुत नाट्यांश हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्य-पुस्तक के ‘गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। प्रस्तुत पाठ कृष्ण चन्द्र त्रिपाठी रचित ‘चतुर्म्यहम्’ एकाङ्की संग्रह से संकलित है।

प्रसंग – इस नाट्यांश में मल्लिका अपनी सखियों के साथ तीर्थयात्रा पर जाने की तैयारी करते हुए घोषणा करती है। हिन्दी-अनुवाद .. चन्दन – तो शीघ्र ही पूजा सम्पन्न कर लो और प्रसाद दे दो।

मल्लिका – अरे! यहाँ पूजन नहीं होगा। मैं अपनी सहेलियों के साथ कल प्रातः काशी विश्वनाथ मन्दिर जाऊँगी वहाँ हम गंगा-स्नान और तीर्थयात्रा करेंगे। चन्दन – सखियों के साथ ! मेरे साथ नहीं ! (दुःख का अभिनय करता है।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

मल्लिका – हाँ, चम्पा, गौरी, माया, मोहिनी, कपिला आदि सभी जा रही हैं। अत: मेरे साथ तुम्हारा आना उचित नहीं है। हम सप्ताह के अन्त में लौट आयेंगे। तब तक घर की व्यवस्था को और गाय के दोहने की व्यवस्था का पालन करना। संस्कत-व्याख्याः

सन्दर्भ: – प्रस्तुतो नाट्यांशोऽस्माकं ‘शेमुषी’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘गोदोहनम्’ इति पाठात् उद्धृतः। प्रस्तुतः पाठः कृष्णचन्द्रत्रिपाठी महाभाग रचितात् ‘चतुर्म्यहम्’ इति एकाङ्कि-संग्रहात् सङ्कलितः। (प्रस्तुत नाट्यांश हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्य-पुस्तक के ‘गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। प्रस्तुत पाठ कृष्ण चन्द्र त्रिपाठी महाभाग द्वारा रचित ‘चतुर्म्यहम् ‘ एकाङ्की-संग्रह से सङ्कलित है।)

प्रसङ्ग – अस्मिन् नाट्यांशे मल्लिका स्व सखिभिः सह तीर्थयात्रां गमनाय सज्जां कुर्वन्ती घोषयति। (इस नाट्यांश में मल्लिका अपनी सखियों के साथ तीर्थयात्रा पर जाने की तैयारी करती हुई घोषणा करती है।)

व्याख्याः – चन्दन- तदा क्षिप्रमेव पूजाकार्य सम्पन्नं कुरु। नैवेद्यं यच्छ। (तो शीघ्र ही पूजा का कार्य पूरा करो। प्रसाद दे दो।)

मल्लिका – अरे! अत्र पूजाकार्यं न सम्पाद्यते। अहं सहचरीभिः सार्धं आगामि-दिवसे प्रभाते एव काशीविश्वनाथ मन्दिरं यास्यामि, तत्स्थाने भागीरथी-अवगाहनं तीर्थयात्रां च सम्पादयिष्यामः। (अरे, यहाँ पूजन नहीं किया जायेगा। मैं अपनी सहेलियों के साथ कल प्रातः काल ही काशीविश्वनाथ के मन्दिर जायेंगे, वहाँ गंगा में स्नान करेंगे तथा तीर्थयात्रा सम्पन्न करेंगे। )

चन्दनः – सहचरीभिः साकम्? न मया सार्धम्। खेदस्य अभिनयं करोति। (क्या सहेलियों के साथ? मेरे साथ नहीं? (खेद का अभिनय करता है।))

मल्लिका – आम्! चम्पा, गौरी, माया, मोहिनी कपिलाद्याः सकला: यान्ति अत: मत्सार्धं ते गन्तु नोचितम्। वयं सप्त दिनानि अतीत्य प्रत्यायास्यामः। तावत् गृहस्थ व्यवस्थां, गावः पयोदोग्धुं च प्रबन्धं सम्पादय। (हाँ, चम्पा, गौरी, माया, मोहिनी, कपिला आदि सभी जा रही हैं। अत: मेरे साथ आपको जाना उचित नहीं है। हम सात दिन व्यतीत कर आयेंगे, तब तक गृहस्थ का प्रबन्ध और गाय का दूध दोहने का प्रबन्ध करना।)

अवबोधन कार्यम

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत- (एक शब्द में उत्तर दीजिए-)
(क) मल्लिका सखिभिः सह कुत्र गमिष्यति? (मल्लिका सखियों के साथ कहाँ जायेगी?)
(ख) मल्लिका कदा प्रत्यागमिष्यति? (मल्लिका कब लौटेगी?)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(क) मल्लिका काशी गत्वा किं करिष्यति? (मल्लिका काशी जाकर क्या करेगी?)
(ख) प्रस्थानकाले मल्लिका चन्दनं किं कथयति? (चलते समय मल्लिका चन्दन से क्या कहती है?)

प्रश्न 3.
यथानिर्देशम् उत्तरत-(निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(क) ‘न मया सह’ अत्र ‘मया’ सर्वनाम पदं कस्य संज्ञापदस्य स्थाने प्रयुक्तम्?
(‘न मया सह’ यहाँ ‘मया’ सर्वनाम पद किस संज्ञा पद के स्थान पर प्रयोग किया गया है?)
(ख) ‘विषादं नाटयति’ इति वाक्ये ‘नाटयति’ क्रियापदस्य कर्ता कः?
(‘विषादं नाटयति’ वाक्य में ‘नाटयति’ क्रियापद का कर्ता कौन है?)
उत्तराणि :
(1) (क) काशीविश्वनाथमन्दिरम्। (काशी विश्वनाथ मन्दिर।)
(ख) सप्ताहान्ते (सप्ताह बाद)।
(2) (क) मल्लिका काशी गत्वा गङ्गास्नानं धर्मयात्राञ्च करिष्यति। (मल्लिका काशी जाकर गंगा स्नान और धर्म यात्रा करेगी।)
(ख) मल्लिका कथयति-वयं सप्ताहान्ते प्रत्यागमिष्यामः। तावत् गृहव्यवस्था, धेनोः दुग्धदोहन-व्यवस्था च ….. परिपालय। (मल्लिका कहती है-हम सप्ताह के अन्त में लौटेंगे, तब तक घर की व्यवस्था और गाय के
दूध दोहने की व्यवस्था का पालन करना।) (क) चन्दनेन (चन्दन)। (ख) चन्दनः।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

(द्वितीय दृश्यम्)

3. चन्दनः – अस्तु। गच्छ। सखिभिः सह धर्मयात्रया आनन्दिता च भव। अहं सर्वमपि परिपालयिष्यामि। शिवास्ते सन्तु पन्थानः।
चन्दनः – मल्लिका तु धर्मयात्रायै गता। अस्तु। दुग्धदोहनं कृत्वा ततः स्वप्रातराशस्य प्रबन्धं करिष्यामि। (स्त्रीवेषं धृत्वा, दुग्धपात्रहस्तः नन्दिन्याः समीपं गच्छति)
उमा – मातुलानि! मातुलानि!
चन्दनः – उमे! अहं तु मातुलः। तव मातुलानि तु गङ्गास्नानार्थ काशीं गता अस्ति। कथय! किं ते प्रियं करवाणि?

शब्दार्था: – अस्तु = भवतु (खैर), गच्छ = यादि (जाओ), सखिभिः सह = सहचरीभिः सार्धम् (सहेलियों के साथ), धर्मयात्रया = तीर्थयात्रा गमनेन (तीर्थयात्रा पर जाने से), आनन्दिता च भव = आत्मानम् सानन्दं कुरु (अपने को.आमन्त्रित करो), अहं सर्वमपि = अहं सकलमपि (मैं सभी को), पालयिष्यामि = सम्पादयिष्यामि (कर लूँगा), ते = तव (तेरे), पन्थान = मार्गाः (मार्ग), शिवाः = शुभाः (शुभ), सन्तु = भवन्तु (हों), मल्लिका तु धर्मयात्रायै गता = मल्लिका तु तीर्थयात्रायै गता (मल्लिका तो तीर्थयात्रा के लिए गई),

अस्तु = भवतु (खैर), दुग्धदोहनं कृत्वा = पयोदुग्ध्वा (दूध निकालकर), ततः = तदा (तब), स्वप्रातराशस्य = आत्मनः प्रभात भोजनस्य (अपने कलेवा, नास्ते का), प्रबंन्धं = व्यवस्था (प्रबध), करिष्यामि = सम्पादयिष्यामि (करूँगा), स्त्रीवेष – नारीपरिधानम् (स्त्री का वेष), धृत्वा = धारयित्वा (धारण कर), दुग्धपात्रहस्तः = पयः पात्रं करे नीत्वा (दूध का बर्तन हाथ में लेकर), नन्दिन्याः = धेनोः (गाय के), समीपम् = समक्षं (समीप), गच्छति = भगति (जाता है),

मातुलानि! = मातृ-भ्रातृ-जाये मातुः भ्रातुः जाये वा (मामीजी), उमे! अहं तु मातुलः = अहन्तु तव मातृ-भ्राता (मैं तो तेरा मामा हूँ), तवते (तेरी) मातुलानि = मातृ-भ्रातृ-जाया (मामी जी), तु गङ्गास्नानार्थं = भागीरथी-अवगाहनाय (गंगाजी स्नान करने के लिए), काशींगता अस्ति = काशी तीर्थयात्रा (काशी तीर्थ को गई है), कथय = ब्रूहि (कहा), किं ते = किं तव (तुम्हारा क्या), प्रियं करवाणि = शुभं करवै (प्रिय करूं)।

हिन्दी अनुवादः

सन्दर्भ – प्रस्तुत नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ कृष्णचन्द्र द्वारा रचित ‘चतुर्दूहम्’ एकांकी संग्रह से संकलित है।
प्रसंग – इस नाट्यांश में मल्लिका के गंगास्नान चले जाने पर चन्दन की व्यवस्था के विषय में बताया है।

हिन्दी-अनुवाद

चन्दन – (खैर, जाओ, सखियों के साथ तीर्थयात्रा से आनन्दित हो। मैं सब सम्पन्न कर लूँगा। तुम्हारी राहें शुभ अर्थात् कल्याणकारी हों।)
चन्दन – (मल्लिका तो तीर्थयात्रा के लिए गयी। खैर दूध दोहकर तब अपने कलेवे का प्रबन्ध करूँगा। (स्त्री वेष धारण कर दूध का बर्तन हाथ में लिए हुए नन्दिनी के समीप जाता है।)
उमा – (मामी जी, मामी जी।)
चन्दन – (अरी उमा! मैं तो मामा हूँ। तेरी मामी जी तो गंगा स्नान के लिए काशी गई हुई हैं। कहो मैं तुम्हारा क्या भला (इच्छित) करूँ?)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

संस्कत-व्यारव्याः

सन्दर्भः – प्रस्तुतः नाट्यांशः अस्माकम् ‘शेमुषी’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘गोदोहनम्’ इति पाठात् उद्धृतः। प्रस्तुतः पाठः कृष्णचन्द त्रिपाठी रचितात् ‘चतुर्म्यहम्’ इति एकाङ्कि-संग्रहात् सङ्कलितः। (प्रस्तुत नाट्यांश हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्यपुस्तक के ‘गोदोहनम्’ पाठ से लिया गया है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी कृत् चतुर्ग्रह एकांकी संग्रह से संकलित है।)

प्रसङ्गः – अस्मिन् नाट्यांशे मल्लिकायां तीर्थयात्रां गते चन्दनस्य व्यवस्थाया वर्णनम् अस्ति। (इस नाट्यांश में मल्लिका के यात्रा पर चले जाने पर चन्दन की व्यवस्था का वर्णन है।)

व्याख्या: –

चन्दनः – भवतु । याहि। सहचरीभिः सार्धम्, तीर्थयात्रागमनेन आत्मानम् सानन्दं कुरु। अहम् सकलम् अपि सम्पाद यिष्यामि। तव मार्गाः शुभाः भवन्त। (खैर! जाओ! सहेलियों के साथ तीर्थयात्रा से अपने को आनन्दित करो, मैं सब कुछ सम्पन्न कर लूँगा। तुम्हारे मार्ग शुभ हों।)

चन्दनः – मल्लि तु तीर्थयात्रायै याता। भवतु। पयो दुग्ध्वा आत्मनः प्रभातभोजनस्य व्यवस्थां विधास्यामि। (नारी परिधानं धारयित्वा पयः पात्रं करे नीत्वा नन्दिन्याः धेनोः समक्षं याति।) (मल्लिका तो तीर्थयात्रा के लिए गई। खैर, दूध दुहकर अपने कलेवा की व्यवस्था करूँगा। (औरत के कपड़े पहनकर दूध का बर्तन हाथ में लेकर नन्दिनी गाय के पास जाता है।))
उमा – मातृ-भ्रातु-जाये! मातुभ्रातुः जाये! (मामी जी, मामी जी!)
चन्दनः – उमे! अहं तु ते मातृ-भ्राता। ते मातृ-भ्रातु जाया तु भागीरथी अवगाहनाय काशीतीर्थं गता। ब्रूहि, किं तव शुभं करवै? (उमा, मैं तो मामा हूँ। तेरी मामी जी तो गंगास्नान के लिए काशीतीर्थ गई हुई हैं। कहो मैं तुम्हारा क्या भला करूँ।)

अवबोधन कार्यम्

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत- (एक शब्द में उत्तर दीजिए-)
(क) मल्लिका कुत्र गता? (मल्लिका कहाँ गई?)
(ख) चन्दनस्य धेनोः नाम किम् आसीत् ? (चन्दन की गाय का नाम क्या था?)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(क) चन्दनः मल्लिका प्रति किं वरं वितरति? (चन्दन मल्लिका को क्या आशीष देता है?)
(ख) चन्दनः दुग्धदोहनं कृत्वा किं करिष्यति? (चन्द दूध दोहकर क्या करेगा?)

प्रश्न 3.
यथानिर्देशम् उत्तरत-(निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(क) ‘नन्दिन्याः समीपं गच्छति’ अत्र गच्छति क्रियायाः कर्तृपदं लिखत।
(‘नन्दिन्याः समीपं गच्छति’ यहाँ गच्छति क्रिया का कर्ता लिखिए।)
(ख) ‘दूरम्’ इति पदस्य विलोमपदं नाट्यांशात् लिखत? (‘दूरम्’ पद का विलोम पद नाट्यांश से लिखिए?)
उत्तराणि :
(1) (क) धर्मयात्रायै। (धर्म यात्रा के लिए)।
(ख) नन्दिनी।

(2) (क) शिवास्ते सन्तु पन्थानः। (तुम्हारे मार्ग शुभ हों।)
(ख) स्व प्रातराशस्य प्रबन्धं करिष्यति। (अपने. कलेवा का प्रबन्ध करेगा।)

(3) (क) चन्दनः।
(ख) समीपम् (पास)।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

4. उमा – मातुल! पितामहः कथयति, मासानन्तरम् अस्मत् गृहे महोत्सवः भविष्यति। तत्र त्रिशत-सेटकमितं दुग्धम् अपेक्षते। एषा व्यवस्था भवद्भिः करणीया।
चन्दनः – (प्रसन्नमनसा) त्रिशत-सेटककपरिमितं दुग्धम्! शोभनम्। दुग्धव्यवस्था भविष्यति एव इति पितामहं प्रति त्वया वक्तव्यम्।
उमा – धन्यवादः मातुल! याम्यधुना। (सा निर्गता)

शब्दार्थाः – मातुल = मातुल! (मामाजी), पितामहः = पितुर्जनक (दादाजी), कथयति = सूचयति (कहते हैं), मासानन्तरम् = व्यतीतेमासे (एक माह पश्चात्), अस्मत् गृहे = अस्माकम् आवासे (हमारे घर), महोत्सवः = महत्पर्व (महान उत्सव), भविष्यति = प्रवर्तिष्यते (होगा), तत्र = तस्मिन् (उसमें), त्रिंशत-सेटकमितं (तीस लीटर) दुग्धम् अपेक्षते = दुग्धस्य आवश्यकता भविष्यति (दूध की आवश्यकता होगी), एषा व्यवस्था = अस्य प्रबन्धं (इसका इन्तजाम),

भवद्भिः करणीया = भवन्त कुर्मुः (आपको करना है), प्रसन्नमनसा = प्रसन्नचित्तेन (प्रसन्नचित्त से), त्रिशत-सेटककपरिमितं. दुग्धम् = त्रिंशत-सेटकपरिमितं पयः (तीस लीटर दूध), शोभनम् = सुन्दरम् (अच्छा), दुग्धव्यवस्था = पयसः प्रबन्धं (दूध की व्यवस्था), भविष्यति एव = विधास्यते एव (हो ही जायेगी), इति पितामहं प्रति = इति पितुर्जनकं (ऐसा दादाजी से), त्वया वक्तव्यम् = त्वम् कथयेत् (तुम कह देना), धन्यवाद मातुल! = धन्यो भवान् मातुल (मामाजी आप धन्य हैं), याम्यधुना = गच्छामि इदानीम् (अब जा रही हूँ), सा निर्गता = असौ निष्क्रान्ता (वह निकल गई)।

हिन्दी अनुवादः

सन्दर्भ – यह नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ कृष्णचन्द्र रचित ‘चतुर्म्यहम्’ एकांकी संग्रह से संकलित है।

प्रसंग-इस नाट्यांश में मामा चन्दन को उमा महोत्सव के लिए दूध की आवश्यकता बताते हुए कहती है।

हिन्दी अनुवादः

उमा – मामाजी, दादाजी कहते हैं कि एक महीने बाद हमारे घर में एक बड़ा उत्सव होगा। वहाँ तीस लीटर दूध की आवश्यकता होगी। यह व्यवस्था आपको करनी है।

चन्दन – (प्रसन्नचित्त) तीस लीटर दूध! बहुत अच्छा, दूध का प्रबन्ध होना ही है, ऐसा दादाजी से आपको कह देना चाहिए।

उमा – धन्यवाद मामाजी, अब जाती हूँ! (वह निकल गई) संस्कत-व्याख्याः

सन्दर्भ: – नाट्यांशोऽयम् अस्माकं ‘शेमुषी’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘गोदोहनम्’ इति पाठात् उद्धृतः। पाठोऽयम् कृष्ण चन्द्र त्रिपाठी रचितात ‘चतुर्म्यहम्’ इति एकाङ्कि संग्रहात् संकलितः। (यह नाट्यांश हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्यपुस्तक के ‘गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी रचित ‘चतुर्दूहम्’ एकाङ्की संग्रह से संकलित है।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

प्रसङ्गः – नाट्यांशे अस्मिन् मातुलम् चन्दनम् उमा महोत्सवे दुग्धस्य मात्रायाः विषये तस्य व्यवस्थायै च कथयति। (इस नाट्यांश में मामा चन्दन को उमा महोत्सव में दूध की मात्रा के विषय में और उसकी व्यवस्था के विषय में कहती है।)

व्याख्या:

मातुलः – मातुल! मम पितुर्जनकः सूचयति यत् व्यतीतेमासे अस्माकं आवासे एकं महत् पर्व प्रवतिष्यते। तस्मिन् उत्सवे त्रिंशत सेटकमितस्य पयसः आवश्यकता भविष्यति। अस्य प्रबन्धं भवन्तु एव कुर्युः। (मामाजी! मेरे दादाजी सूचित करते हैं कि एक माह पश्चात् हमारे घर पर एक बड़ा उत्सव होगा। उस उत्सव तीस लीटर दूध की आवश्यकता होगी। इसका प्रबन्ध आपको करना है।)

चन्दनः – (प्रसन्नचित्तेन) त्रिंशत सेटकमितं पयः? सुन्दरम्। पयसः प्रबन्धं विधास्यते एव इति पितुर्जनकं त्वं कथयेत्। ((प्रसन्न मन से) तीस लीटर दूध! बहुत अच्छा। दूध का प्रबन्ध कर ही दिया जायेगा ऐसा तुम दादी से कह देना।)

उमा – धन्यो भवान्, मातुल! गच्छामि इदानीम् (असौ निष्क्रान्ता) (धन्य हैं आप, मामाजी! अब मैं जाती हूँ। (वह निकल गई))

अवबोधन कार्यम्

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत- (एक शब्द में उत्तर दीजिए-)
(क) उत्सवाय दुग्धस्य व्यवस्था केन करणीया? (उत्सव के लिए दूध की व्यवस्था किसके द्वारा की जानी है?)
(ख) महोत्सवाय किमद् दुग्धम् अपेक्षितम्? (महोत्सव के लिए कितना दूध अपेक्षित है?)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(क) उमा चन्दनाय किं निवेदयति? (उमा चन्दन से क्या निवेदन करती है?)
(ख) चन्दनः दुग्धस्य विषये उमायै किं कथयति? (चन्दन दूध के विषय में उमा से क्या कहता है?)

प्रश्न 3.
यथानिर्देशम् उत्तरत-(निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(क) ‘निर्गता’ इति पदे उपसर्ग लिखत? (‘निर्गता’ पद में उपसर्ग लिखिये?)
(ख) ‘गृहे महोत्सवः भविष्यति’ अत्र भविष्यति क्रियापदस्य कर्तृपदं लिखत।
(‘गृहे महोत्सवः भविष्यति’ यहाँ भविष्यति क्रिया का कर्ता कौन है?)
उत्तराणि :
(1) (क) चन्दनेन। (चन्दन द्वारा)।
(ख) त्रिंशत-सेटका (तीस लीटर)।

(2) (क) मातुल! मासान्तरे अस्मद् गृहे महोत्सवः भविष्यति। तत्र त्रिशत्-सेटकं दुग्धम् अपेक्षित। व्यवस्था भवद्भिः एव करणीया। (मामाजी! महीनेभर बाद हमारे घर पर महोत्सव होगा, वहाँ तीस लीटर दूध की अपेक्षा है। प्रबन्ध आपको करना है।)
(ख) दुग्धस्य व्यवस्था भविष्यति एव इति पितामहं त्वया वक्तव्यम्। (दूध की व्यवस्था हो ही जायेगी, ऐसा दादाजी से तुम कह देना।)

(3) (क) निर् उपसर्ग।
(ख) ‘महोत्सवः’ इति कर्ता।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

(तृतीय दृश्यम्)

5. चन्दनः – (प्रसन्नो भूत्वा, अङ्गलिषु गणयन्) अहो! सेटक-त्रिशतकानि पयासि! अनेन हुभनं लप्स्ये।
(नन्दिनीं दृष्ट्वा) भो नन्दिनि! तव कृपया तु अहं धनिकः भविष्यामि। (प्रसन्नः सः धेनोः बहुसेवां करोति).

चन्दनः – (चिन्तयति) मासान्ते एव दुग्धस्य आवश्यकता भवति। यदि प्रतिदिनं दोहनं करोमि तर्हि दुग्ध सुरक्षितं न तिष्ठति। इदानीं किं करवाणि? भवतु नाम मासान्ते एव सम्पूर्णतया दुग्धदोहनं करोमि।
(एवं क्रमेण सप्तदिनानि व्यतीतानि। सप्ताहान्ते मल्लिका प्रत्यागच्छति)

शब्दार्थाः – पन्नो भत्वा = प्रफल्ल सन (प्रसन्न होकर), अङलिष गणयन = अली पर्वस गणनां कर्वन (अँगलियों पर गिनते हुए), सेटक-त्रिंशतकानि पयांसि = सेटक त्रिशतकम् दुग्धं (तीस लीटर दूध), अनेन तु = एतेन तु (इससे तो), बहुधनं लप्स्ये = प्रभूतं धनं प्राप्स्यामि (बहुत धन प्राप्त कर लूँगा), नन्दिनीं दृष्ट्वा = नन्दिनीत्यभिधां धेनुम् अवलोक्य (नन्दिनी नामक गाय को देखकर), भो नन्दिनि! = भोः नन्दिनि (अरी नन्दिनी), तव कृपया तु = ते अनुकम्पयातु (तेरी कृपा से तो),

अहं धनिकः भविष्यामि = अहं धनवान् भविष्यामि (मैं धनवान हो जाऊँगा), प्रसन्नः सः = प्रसीदितोऽसौ (वह खुश हुआ), धेनोः = गावः (गाय की), बहु = प्रभूतं (बहुत), सेवाम् = सपर्या (सेवा), करोति = विदधाति (करता है), चिन्तयति = विचारयति (सोचता है), मासान्ते एव = मासान्तरमेव (महीने के बाद ही), दुग्धस्य = पयसि (दूध की), आवश्यकता = अपेक्षितानि (आवश्यकता होगी), यदि प्रतिदिनम् = अहरहः (प्रत्येक दिन), दोहनं करोमि = (गां दुग्धं दोदिभ) गाय का दूध दोहता हूँ, तर्हि = तदा (तव), दुग्धम् = पयः (दूध),

सुरक्षितं न तिष्ठति = असुरक्षितो भविष्यति (सुरक्षित नहीं रहेगा), इदानीम् = अधुना (अब), किं करवाणि = किं कुर्याम् (क्या करूँ?), भवतु नाम = अस्तु (खैर), मासान्ते एव = मास काले एव (महीने भर बाद ही), सम्पूर्णतया = सम्पूर्णम् एव (सारा ही), दुग्ध दोहनं करोमि = दोहनयामि (दोहन कर लूँगा), एवं क्रमेण = अनेन प्रकारेण (इस प्रकार), सप्ताहान्ते = सप्ताहनमेक (एक सप्ताह), व्यतीतानि = व्यतीतोऽभवत् (बीत गया), सप्ताहान्ते = सप्त दिनान्तरे (सात दिन बाद), मल्लिका प्रत्यागच्छति = मल्लिका प्रत्यायाति निवर्तते वा (लौट रही है)।

हिन्दी अनुवादः

सन्दर्भ – यह नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी रचित ‘चतुर्म्यहम्’ एकांकी संग्रह से संकलित है।

प्रसंग – इस नाट्यांश में चन्दन तीस लीटर दूध की व्यवस्था के विषय में सोचता है कि गाय को रोजना दोहने की अपेक्षा महीने के अन्त में ही दोह लूँगा ताकि एक साथ तीस लीटर दूध उपलब्ध हो सके।

हिन्दी अनुवादः

चन्दन – (प्रसन्न होकर उँगलियों पर गिनते हुए) अरे! तीस लीटर दूध! उससे तो बहुत-सा धन प्राप्त कर लूँगा। (नन्दिनी को देखकर) अरी नन्दिनी ! तेरी कृपा से तो मैं धनवान हो जाऊँगा (प्रसन्न हुआ वह गाय की बहुत सेवा करता है।)
चन्दन – (सोचता है) महीने के अन्त में ही दूध की आवश्यकता होती है। यदि प्रत्येक दिन दूध निकालता हूँ तो दूध सुरक्षित नहीं रहेगा। अब क्या करूँ? अच्छा तो महीने के अन्त में ही पूरा दूध दोह लूँगा।
(इस प्रकार क्रमशः सात दिन व्यतीत हो जाते हैं, सप्ताह के अन्त में मल्लिका लौट आती है।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

संस्कत-व्याख्याः

सन्दर्भ: – नाट्यांशोऽयम् अस्माकं ‘शेमुषी’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘गोदोहनम्’ पाठात् उद्धृतः। अयं पाठः कृष्ण चन्द्र त्रिपाठी रचित ‘चतुर्म्यहम्’ एकाङ्कि-संग्रहात् सङ्कलितः अस्ति। (यह नाट्यांश हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्यपुस्तक के ‘गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ कृष्ण चन्द्र त्रिपाठी रचित ‘चतुर्दूहम्’ एकांकी संग्रह से संकलित है।)

प्रसङ्गः – नाट्यांशेऽस्मिन चन्दनः त्रिंशत सेटकमितस्य दुग्धस्य व्यवस्थाया विषये चिन्तयति। धेनुं प्रतिदिनं दोहनात तु मासान्ते दोहनवरम् येन एकदा सेटकत्रिंशतकम् दुग्धं प्राप्तं भविष्यति । (इस नाट्यांश में चन्दन तीस लीटर दूध की व्यवस्था के विषय में सोचता है। गाय को रोजाना दोहने की अपेक्षा महीने के अन्त में दोहना उचित रहेगा, जिससे एक दिन ही तीस लीटर दूध प्राप्त हो जायेगा।)

चन्दनः – (प्रफुल्लः सन्, अङ्गुली पर्वसु गणनां करोति।) अरे! त्रिंशत सेटकमितं दुग्ध! एतेन तु प्रभूतं वित्तं प्राप्स्यमि। (नन्दिनीत्याभिद्यां ध धेनुमवलोक्य) भो नन्दिनि! तेऽनुकम्पया तु अहं धनवान् भविष्यामि। प्रसीदितोऽसौ गावः प्रभूतं सपर्यां विदधाति। ((प्रसन्न होकर अँगुलियों पर गिनती करता है।) अरे तीस लीटर दूध! इससे तो बहुत धन प्राप्त होगा। (नन्दिनी नामक गाय को देखकर) अरी नन्दिनी! तेरी कृपा से तो मैं धनवान हो जाऊँगा।)

चन्दनः – (विचारयति) मासान्तरम् एव पयसि अपेक्षितानि यदि अहरहः गां दुग्धं दोह्नि तदा पयः असुरक्षितो भविष्यति अधुना किं कुर्याम्। अस्तु, मासकाले एव धोक्ष्यामि सम्पूर्ण सेटक त्रिशतकं दुग्धम्। ((सोचता है) अनेन प्रकारेण सप्ताहनमेकं व्यतीतम्। सप्त दिनान्तरे मल्लिका निवर्तते महीने बाद दूध की आवश्यकता होगी। यदि नित्य गाय का दूध दोहता हूँ तो दूध असुरक्षित होगा। अब क्या करूँ। खैर, महीने का समय बीतने पर पूरा तीस लीटर दूध एक साथ दोह लूँगा। इस प्रकार सप्ताह व्यतीत हो गया। सात दिन के बाद मल्लिका लौटती है।)

अवबोधन कार्यम्

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत- (एक शब्द में उत्तर दीजिए-)
(क) दुग्धस्य गणितं केषु करोति? (दूध का हिसाब किन पर करता है?)
(ख) दुग्धस्य आवश्यकता कदा भविष्यति? (दूध की आवश्यकता कब होगी?)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(क) चन्दनः नन्दिनी किं कथयति? (चन्दन नन्दिनी से क्या कहता है?)
(ख) दुग्धस्य विक्रयं श्रुत्वा चन्दनः आश्चर्यं किमचिन्तयत?
(दूध के विक्रय को सुनकर चन्दन ने आश्चर्य से क्या सोचा?)

प्रश्न 3.
यथानिर्देशम् उत्तरत-(निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(क) ‘भूत्वा’ इति पदे मूलधातु-निर्देशं कुरुत्। (भूत्वा’ पद में मूल धातु का निर्देश करो।)
(ख) ‘प्रत्यागच्छति’ क्रियापदस्य कर्तृपदं लिखत। (‘प्रत्यागच्छति’ क्रिया का कर्तृपद लिखो।)
उत्तराणि :
(1) (क) दुग्धस्य आवश्यकता मासान्ते भविष्यति। (दूध की आवश्यकता महीने के अंत में होगी।)।
(ख) नन्दिनि ! तव कृपया तु अहं धनिकः भविष्यामि। (नन्दिनि! तेरी कृपा से तो मैं धनवान् हो जाऊँगा।)

(2) (क) नन्दिनि! तव कृपया तु अहं धनिकः भविष्यामि। (नन्दिनि! तेरी कृपा से तो मैं धनवान् हो जाऊँगा।)
(ख) ‘अनेन तु बहुधनं लप्स्ये।’ इति अचिन्तयत्। (‘इससे तो बहुत धन मिलेगा’ यह सोचता है।)

(3) (क) भू धातुः।
(ख) मल्लिका (सा)।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

6. मल्लिका – (प्रविश्य) स्वामिन्! प्रत्यागता अहम्। आस्वादय प्रसादम्। (चन्दनः मोदकानि खादति वदति च)
चन्दनः – मल्लिके! तव यात्रा तु सम्यक् सफला जाता? काशीविश्वनाथस्य कृपया प्रियं निवेदयामि।
मल्लिका – (साश्चर्यम्) एवम्। धर्मयात्रातिरिक्तं प्रियतरं किम्?

शब्दार्थाः-प्रविश्य = प्रवेशं कृत्वा (प्रवेश करके), स्वामिन् = नाथ (स्वामी), प्रत्यागता अहम् = अहं प्रत्यावृता (मैं लौट आई), आस्वादय प्रसादम् = नैवेद्यं स्वादयतु (प्रसाद चखना), चन्दनः मोदकानि = चन्दनः लड्डकानि (चन्दन लड्डुओं को), खादति = अत्ति (खाता है), वदति च = कथयति च (और कहता है), मल्लिके! = मल्लिके! (अरी मल्लिका), तव = ते (तेरी), यात्रा = तीर्थयात्रा तु (तीर्थयात्रा तो),

सम्यक् सफला जाता = सुसम्पन्न अभवत् (अच्छी तरह पूरी हो गई), काशीविश्वनाथस्य कृपया = काशीविश्वनाथस्य अनुकम्पया (काशीविश्वनाथ की कृपा से), प्रियं निवेदयामि = एकं सुखदं वृत्तं कथयामि (एक शुभ समाचार सुनाता हूँ), साश्चर्यम् = सविस्मयम् (आश्चर्य के साथ), एवम् = इत्यम् (ऐसे), धर्मयात्रातिरिक्तं = तीर्थयात्राम् अतिरिच्य (तीर्थयात्रा से भी बढ़कर), प्रियतरं किम् = एमस्मादसि शोभनम् किम् (इनसे भी अधिक सुन्दर क्या है)।

हिन्दी अनुवादः

सन्दर्भ – प्रस्तुत नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी महोदय द्वारा रचित एकांकी संग्रह ‘चतुर्म्यहम्’ से संकलित है।
प्रसंग – इस नाट्यांश में मल्लिका यात्रा से लौट आई है तथा अपने पति के साथ संवाद करती है।
मल्लिका – (प्रवेश करके) स्वामी! मैं लौट आई हूँ। प्रसाद चखो। (चन्दन लड्डू खाता है और बोलता
चन्दन – मल्लिका! तुम्हारी यात्रा तो अच्छी तरह सफल हो गई। काशी विश्वनाथ की कृपा से प्रिय निवेदन करता हूँ।
मल्लिका – (आश्चर्य के साथ) ऐसी बात है। धर्मयात्रा के अतिरिक्त और क्या अधिक प्रिय हो सकता है?

संस्कत-व्यारव्याः

सन्दर्भ: – नाट्यांशोऽयम् अस्माकं ‘शेमुषी’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘गोदोहनम्’ इति पाठात् उद्धृतोऽस्ति । पाठोऽयं कृष्णचन्द्र त्रिपाठी-विरचितात् ‘चतुर्दूहम्’ इति एकाङ्कि-संग्रहात् सङ्कलितोऽस्ति। (यह नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘गोदोहनम्’ पाठ से लिया गया है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी-रचित ‘चतुर्म्यहम्’ एकाङ्की-संग्रह से संकलित है।)

प्रसङ्गः – नाट्यांशेऽस्मिन् मल्लिका तीर्थयात्रां समाप्य प्रत्यागच्छति स्वपतिं च संवदति। (इस नाट्वांश में मल्लिका तीर्थयात्रा समाप्त कर लौट आई है। अपने पति से संवाद करती है।

व्याख्याः-

मल्लिका – (प्रवेशं कृत्वा) नाथ! अहं प्रत्यावृता। नैवेद्यस्य स्वादयतु। (चन्दनः लड्डकानि अत्ति कथयति च।) (प्रवेश करके) स्वामी! मैं लौट आई। प्रसाद चखो। (चन्दन लड्डू खाता है और कहता है।)
चन्दन – मल्लिके! ते तीर्थयात्रा तु सुसम्पन्ना अभवत् ? काशी विश्वनाथस्य अनुकम्पया एक सुखदवृत्तं कथयामि। (अरी मल्लिका? तेरी तीर्थ यात्रा तो अच्छी तरह पूरी हो गई न? काशी विश्वनाथ जी की कृपा से एक सुखद समाचार सुनाता हूँ।)
मल्लिका – (सविस्मयम्) इत्थम्। तीर्थयात्रामतिरिच्य किं एतस्माद् अपि शोभनतरम्? (आश्चर्य के साथ) इस प्रकार तीर्थयात्रा से बढ़कर, इससे भी अधिक और क्या सुखद समाचार होगा?)

अवबोधन कार्यम्

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत- (एक शब्द में उत्तर दीजिए-)
(क) कः मोदकं खादति (कौन लड्डू खाता है?)
(ख) ‘आस्वादय प्रसादम्’ इति केनोक्तम्? (‘आस्वादय प्रसादम्’ यह किसने कहा?)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)”
(क) गृहं प्रविश्य मल्लिका चन्दनं किम कथयत्? (घर में प्रवेश करके मल्लिका ने चन्दन से क्या कहा?)
(ख) चन्दनः मल्लिकां किम् अपृच्छत् ? (चन्दन से मल्लिका ने क्या पूछा?)

प्रश्न 3.
यथानिर्देशम् उत्तरत-(निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(क) नाट्यांश ‘खादति’ क्रियायाः कर्तृपदं किम्? (नाट्यांश में ‘खादति’ क्रिया का कर्ता कौन है?)
(ख) ‘प्रियतरम्’ इत्यत्र प्रत्ययं पृथक् कृत्वा लिखत। (‘प्रियतरम्’ यहाँ प्रत्यय को अलग करके लिखिये।)
उत्तराणि :
(1) (क) चन्दनः (चन्दन)।
(ख) मल्लिकया (मल्लिका द्वारा)।

(2) (क) ‘स्वामिन्! प्रत्यागता अहम्। आस्वादय प्रसादम्। (स्वामी मैं आ गई। प्रसाद चखिये।)
(ख) ‘मल्लिके! तव यात्रा तु सम्यक् सफला जाता? इति चन्दनेन पृष्टम्। (मल्लिके! तुम्हारी यात्रा तो अच्छी तरह सफल हो गई? ऐसा चन्दन ने पूछाः।)

(3) (क) चन्दनः।
(ख) तरम्-प्रत्यय।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

7. चन्दनः – ग्रामप्रमुखस्य गृहे महोत्सवः मासान्ते भविष्यति। तत्र त्रिशत-सेटकमितं दुग्धम् अस्माभिः दातव्यम् अस्ति ।
मल्लिका – किन्तु एतावन्मात्रं दुग्धं कुतः प्राप्स्यामः।
चन्दनः – विचारय मल्लिके! प्रतिदिनं दोहनं कृत्वा दुग्धं स्थापयामः चेत् तत् सुरक्षितं न तिष्ठति। अत एव दुग्धदोहनं न क्रियते। उत्सवदिने एव समग्रं दुग्धं धोक्ष्यावः।
मल्लिका – स्वामिन्! त्वं तु चतुरतमः। अत्युत्तमः विचारः। अधुना दुग्धदोहनं विहाय केवलं नन्दिन्याः सेवाम् एव करिष्याव:। अनेन अधिकाधिकं दुग्धं मासान्ते प्राप्स्यावः।

शब्दार्थाः – मल्लिका प्रति = (मल्लिका से)! ग्रामप्रमुखस्य = ग्राम प्रधानस्य (ग्राम प्रधान के), गृहे = आवासे (घर पर), मासान्ते = मासान्तरम् (महीने भर बाद), महोत्सवः = महत्वपूर्णम् आयोजनः (महत्वपूर्ण आयोजन), भविष्यति = आयोज्यते (होगा), तत्र = तस्मिन् आयोजने (उस आयोजन में), त्रिंशत सेटकमितं = (तीस लीटर), दुग्धम् = पयः (दूध), दातव्यम् = दद्याम् (देंगे), किन्तु = परं च (परन्तु), एतावन्मात्रम् = इयन्मात्राम् (इतनी मात्रा में), दुग्धम् = पयः (दूध), कुतः = कथम् (कैसे या कहाँ से), प्राप्स्याम = लप्स्यामः (प्राप्त करेंगे),

विचारय मल्लिके! = मल्लिके त्वं चिन्तय (मल्लिका तुम सोचो), प्रतिदिनम् = नित्यम् यदिवयं (यदि हम रोजाना), दोहनं कृत्वा = दुग्धा (दोहन कर), दुग्धं = पयः (दूध को), स्थापयामः = सञ्चयं करिष्याम (इकट्ठा करेंगे), चेत् तत् = तदा तु (तब तो), सुरक्षितं न तिष्ठति = असुरक्षितं भविष्यति (असुरक्षित होगा) अत एव (अत:), दुग्ध दोहनं न क्रियते = गां दुग्धं न दुग्ध्वा (दूध न दोहकर), उत्सवदिवसे = आयोजनस्य दिवसे एव (उत्सव के दिन ही),

समग्रं दुग्धं धोक्ष्यावः = सम्पूर्णस्य पयसः दोहनं करिष्यामः (सम्पूर्ण दूध क दोह लेंगे), स्वामिन् = नाथ! (स्वामी), त्वं चतुरतमः = भवान् पटुतम (आप सबसे अधिक चतुर हैं), अत्युत्तमः विचारः = भवत् चिन्तनं तु श्रेष्ठः (आपका चिन्तन तो श्रेष्ठ है।), अधुना = इदानीम् (अब), दुग्ध दोहनम् विहाय = पयः न दुग्ध (दूध न दोहकर), नन्दियाः = धेनो (गाय की), सेवाम् = सपर्यामेव (सेवा ही), करिष्यावः = विधास्याव (करेंगे), अनेन = एवं (इससे), अधिकाधिकं दुग्धं = प्रभूततरं पयः (अधिकतम दूध), मासान्ते = मासस्य अन्ते उत्सव दिवसे (महीने के अन्त के उत्सव दिवस पर), प्राप्स्यावः = लप्स्यावः (प्राप्त कर लेंगे)।

हिन्दी-अनुवादः

सन्दर्भ – प्रस्तुत नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी महोदय द्वारा रचित एकांकी संग्रह ‘चतुर्म्यहम्’ से संकलित है।

प्रसंग – प्रस्तुत नाट्यांश में चन्दन महीने के अन्त में ग्राममुखिया के घर पर होने वाले महोत्सव के लिए तीस लीटर दूध की व्यवस्था के लिये योजना बनाता है।

चन्दन – (मल्लिका के प्रति) गाँव के मुखिया के घर पर महीने के अन्त में महान् उत्सव होगा। वहाँ तीस लीटर दूध हमें देना है। मल्लिका – किन्तु इतना दूध कहाँ से प्राप्त करेंगे?
चन्दन – सोचो मल्लिका! हर रोज दूध दुहकर रख देंगे परन्तु वह सुरक्षित नहीं रहेगा। अतः दूध का दोहन न किया जाये। उत्सव के दिन ही सारा दूध दोह लेंगे।
मल्लिका – स्वामी! तुम तो सबसे अधिक चतुर हो। बहुत उत्तम विचार है। अब दूध दोहना छोड़कर केवल नन्दिनी की सेवा ही करेंगे। इससे अधिक-से-अधिक दूध महीने के अन्त में प्राप्त कर लेंगे।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

संस्कत-व्यारव्याः

सन्दर्भ: – नाट्यांशोऽयम् अस्माकं शेमुषी’ इति पाठ्यपुस्तकस्य गोदोहनम्’ इति पाठात् उद्धृतोऽस्ति। पाठोऽयं श्रीकृष्णचन्द्र त्रिपाठी-रचितात् ‘चतुव्यूहम्’ इति एकाङ्कि-संग्रहात् सङ्कलितोऽस्ति। (यह नाट्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘गोदोहनम्’ पाठ से लिया गया है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी-रचित ‘चतुर्म्यहम्’ एकाङ्की-संग्रह से संकलित है।)

प्रसङ्गः – प्रस्तुत नाट्यांशे चन्दन: मासान्ते ग्रामप्रधानस्य गृहे प्रवृत्तमानाय उत्सवाय त्रिंशत सेटकमितं दुग्ध-प्रदानाय योजनां. रचयति। (प्रस्तुत नाट्यांश में चन्दन महीने के अन्त में ग्राम प्रधान के घर पर होने वाले महोत्सव के लिए तीस लीटर दूध देने की योजना बनाता है।

व्याख्या:

चन्दनः – (मल्लिकां प्रति) प्रिये! मासानन्तरं ग्रामप्रधानस्य आवासे महत्वपूर्णः आयोजनं आयोज्यते। तस्मिन् आयोजने वयं त्रिंशत सेटकपरिमितं पयः दद्याम। (चन्दन (मल्लिका से) प्रिये एक महीने बाद गाँव के प्रमुख के घर पर एक महान् उत्सव का आयोजन किया जा रहा है। उस आयोजन में हमें तीस लीटर दूध देना है।)
मल्लिका – परञ्च इयत् मात्रां पयः कथं लप्स्यामः? (परन्तु इतनी मात्रा में दूध कैसे प्राप्त करेंगे?)
चन्दनः – मल्लिके! त्वं चिन्तय। यदि वयं नित्यं पयः दुग्धा सञ्चयं करिष्यामः तदा तु असुरक्षितं भविष्यति। इति विचिन्त्य वयं प्रतिदिनं गां न दुग्ध्वा आयोजनस्य दिवसे एव सम्पूर्णस्य पयसः दोहनं करिष्यामः। (मल्लिका, तू सोच। यदि हम रोजाना दूध दोह कर संचय करेंगे तो दूध सुरक्षित नहीं रहेगा। यह सोचकर हम प्रतिदिन गाय का दूध न निकाल कर आयोजन के दिन ही सारा दूध दोह लेंगे।)
मल्लिकाः – नाथ! भवान् तु पटुतम। भवतो विचारः तु श्रेष्ठः। इदानीं तु पयः न दुग्ध्वा नन्दिन्याः सपर्याम् एव विधास्वावः। एवम् प्रभूततरं पयः उत्सवदिवसे लप्स्यावः। (स्वामी, आप तो बहुत चतुर हैं। आपका विचार उत्तम है। अब तो गाय का दूध न दोहकर नन्दिनी की मात्र सेवा करेंगे। इस प्रकार बहुत सारा दूध उत्सव के दिन प्राप्त हो जायेगा।)

अवबोधन कार्यम्

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत- (एक शब्द में उत्तर दीजिए-)
(क) महोत्सवः कस्य गृहे आसीत्? (महोत्सव किसके घर में था?)
(ख) चन्दनः कदा सर्व दुग्धं धोक्ष्यति? (चन्दन सारा दूध कब दोहेगा?)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(क) चन्दनेन ग्रामप्रमुखाय कियत् दुग्धं देयम् आसीत् ? (चन्दन को ग्राम मुखिया के लिए कितना दूध देना है?)
(ख) मल्लिकया चन्दनः कथं परामृष्टः? (मल्लिका ने चन्दन को क्या परामर्श दिया?)

प्रश्न 3.
यथानिर्देशम् उत्तरत-(निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(क) ‘लप्स्यावः’ इति क्रियापद स्थाने नाट्यांशे किं क्रियापदं प्रयुक्तम्?
(‘लप्स्यावः’ क्रियापद के स्थान पर नाट्यांश में कौन सा क्रियापद प्रयुक्त किया है?)
(ख). ‘चेत् तत् संरक्षितं न तिष्ठति’ अत्र ‘तत्’ सर्वनाम पदं कस्मै प्रयुक्तम् ?
(‘चेत् तत् सुरक्षितं न तिष्ठति’ यहाँ ‘तत्’ सर्वनाम का प्रयोग किसके लिए हुआ है?)
उत्तराणि :
(1) (क) ग्रामप्रमुखस्य (ग्राम-प्रधान के लिए।)
(ख) उत्सवदिवसे (उत्सव वाले दिन)।

(2) (क) चन्दनेन ग्रामप्रमुखाय त्रिंशत-सेटकमितं दुग्धं देयम् आसीत्। (चन्दन को ग्राम-प्रमुख के लिए तीस लीटर दूध देना था।)
(ख) अधुना दुग्ध दोहनं विहाय केवलं नन्दिन्याः सेवाम् एव करिष्यावः। (अब दूध दोहना छोड़कर केवल नन्दिनी की सेवा करेंगे।)

(3) (क) प्राप्स्यावः (प्राप्त करेंगे)।
(ख) दुग्धम् (दूध)।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

8. (द्वावेव धेनोः सेवायां निरतौ भवतः। अस्मिन् क्रमे घासादिकं गुडादिकं च भोजयतः। कदाचित् विषाणयोः तैलं लेपयतः तिलकं धारयतः, रात्रौ नीराजनेनापि तोषयतः)

चन्दनः – मल्लिके! आगच्छ। कुम्भकारं प्रति चलावः। दुग्धार्थ पात्रप्रबन्धोऽपि करणीयः। (द्वावेव निर्गतौ)

शब्दार्था: – द्वावेव = मल्लिका चन्दनौ उभौ एव (मल्लिका और चन्दन दोनों ही), धेनोः = गावः (गाय की), सेवायाम् = सपर्यायाम् (सेवा में), निरतौ भवतः = संलग्नौ आस्ताम् (लग गये), अस्मिन् क्रमे = एतस्मिन्नेव प्रसङ्गे (इसी प्रसंग में), घासादिकं गुडादिकं च = शष्पादिकं गुडादिकं च (घास और गुड़ आदि), भोजयतः = खादयतः (खिलाते हैं), कदाचित् = कदाचन (कभी), विषाणयोः = श्रृंगयोः (सींगों पर),

तैलं लेपयतः = स्नेहलेपनं कुरुतः (तेल आदि चिकना लेप करते हैं), तिलकं = पुण्ड्रकं (तिलक), धारयतः = (लगाते हैं), रात्रौ = निशायाम् (रात में), नीराजनेनापि = दीप प्रदानेन (दीपक जलाकर), तोषयतः = सन्तुष्टं कुरुतः (सन्तुष्ट करते हैं), मल्लिके! आगच्छत = मल्लिका आयाति (मल्लिका आओ), कुम्भकारं प्रति चलावः = कुम्भकारस्य गृहं प्रति गच्छावः (कुम्हार के घर चलते हैं), दुग्धार्थम् = दुग्धस्य कृते (दूध के लिए), पात्र-प्रबन्धोऽपि = समुचित भाजनस्य, भाण्डस्य व्यवस्थापि (समुचित पात्र की व्यवस्था भी), करणीयः = कर्त्तव्या (करनी है), द्वावेव = उभावेव (दोनों ही), निर्गतौ = निष्क्रान्तौ (निकल गये)। हिन्दी-अनुवादः

सन्दर्भ – प्रस्तुत नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘गोदोहनम् पाठ से उद्धृत है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी महोदय द्वारा रचित एकांकी संग्रह ‘चतुर्म्यहम्’ से संकलित है।

प्रसंग – प्रस्तुत नाट्यांश में चन्दन और मल्लिका को नन्दिनी गाय की पूजार्चना एवं सेवा तथा अलंकृत करते हुए बताया
हिन्दी अनुवादः (चन्दन और मल्लिका) दोनों ही गाय की सेवा में संलग्न हो जाते हैं अर्थात् जुट जाते हैं। इसी क्रम में उसे घास तथा गुड़ आदि खिलाते हैं। कभी सींगों पर तेल मलते हैं, तिलक लगाते हैं तथा रात में दीपक जलाते हुए सन्तुष्ट करते हैं।

चन्दन – मल्लिका, आओ। कुम्हार के पास चलते हैं। दूध के लिए बर्तन की व्यवस्था भी तो करनी है। (दोनों निकल जाते हैं।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

संस्कत-व्यारव्याः

सन्दर्भ: – नाट्यांशोऽयम् अस्माकं शेमुषी’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘गोदोहनम्’ इति पाठात् उद्धृतोऽस्ति। पाठोऽयं श्रीकृष्णचन्द्र त्रिपाठी-रचितात् ‘चतुर्म्यहम्’ इति एकाङ्कि-संग्रहात् सङ्कलितोऽस्ति। (यह नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘गोदोहनम्’ पाठ से लिया गया है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी-रचित ‘चतुर्म्यहम्’ एकाङ्की-संग्रह से संकलित है।)

प्रसङ्गः – प्रस्तुत नाट्यांशे मल्लिकाचन्दनौ नन्दिन्याः सपर्यां कुर्वन्तौ दर्शितौ। (प्रस्तुत नाट्यांश में मल्लिका और चन्दन नन्दिनी की सेवा करते हुए दिखाये गये हैं।)

व्याख्याः – (मल्लिका चन्दनश्च उभौ एव गावः सपर्यायां संलग्नौ आस्ताम्। एतस्मिन् एव प्रसङ्गे शास्पादिक गुडादिकं च खादयतः। कदाचन शृंगयोः स्नेह-लेपन कुरुतः कदाचित् पुण्डूक धारयत निशायां च दीप प्रदानेन सन्तुष्टं कुरुतः। ((मल्लिका और चन्दन दोनों ही गाय की सेवा में लगे हुए है।) इसी क्रम में घास आदि गुड़ आदि खिलाते हैं। कभी सींगों को चिकनाई से लेप करते हैं। कभी तिलक करते हैं तथा रात में दीपक रखकर सन्तुष्ट करते हैं।)

चन्दनः – मल्लिके! आयाहि। कुम्भकारस्य गृहं प्रति गच्छावः। पयसः कृते समुचितं भाजनस्य भाण्डस्य वा असि व्यवस्था कर्त्तव्या। (उभावेव निष्क्रान्तौ।) (मल्लिका! आओ। कुम्हार के घर की ओर चलते हैं। दूध के लिये समुचित पात्र की भी व्यवस्था करनी है। (दोनों निकलते हैं।))

अवबोधन कार्यम्

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत- (एक शब्द में उत्तर दीजिए-)
(क) द्वावेव कस्य सेवायां निरतौ भवतः? (दोनों किसकी सेवा में तल्लीन हो गये?)
(ख) धेनोः विषाणयोः किं लेपयतः? (गाय के सींगों पर क्या लेपते हैं?)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(क) कुम्भकारं प्रति तौ कस्मात् गच्छतः? (कुम्हार के पास वे दोनों क्यों जाते हैं?)
(ख) धेनुं तौ किं खादयत:? (गाय को वे दोनों क्या खिलाते हैं?)

प्रश्न 3.
यथानिर्देशम् उत्तरत-(निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-‘)
(क) ‘दिवसे’ इति पदस्य विलोमपदम् नाट्यांशात् चित्वा लिखत।
(‘दिवसे’ इस पद का विलोम पद नाट्यांश से चुनकर लिखिए।)
(ख) ‘स्नानेन’ इति पदस्य स्थाने नाट्यांशे किं. पदं प्रयुक्तम्?
(‘स्नानेन’ पद के स्थान पर किस पद का प्रयोग नाट्यांश में किया गया है।)
उत्तराणि :
(1) (क) नन्दिन्याः (नन्दिनी की)।
(ख) तैलम् (तेल)।

(2) (क) दुग्धार्थ पात्र-प्रबन्धाय कुम्भकार प्रति गच्छावः।
(दूध के पात्रों के प्रबन्ध के लिए कुम्हार के पास जाते
(ख) धेनुं तौ घासादिकं गुडं च भोजयतः। (गाय को घासादि व गुड़ आदि खिलाते हैं।)

(3) (क) रात्रौ (रात में)।
(ख) नीराजनेन (दीपक की आरती से)।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

(चतुर्थं दृश्यम्)

9. कुम्भकारः – (घटरचनायां लीन: गायति)
ज्ञात्वाऽपि जीविकाहेतोः रचयामि घटानहम्।
जीवनं भङ्गरं सर्वं यथैष मृत्तिकाघटः।।

चन्दनः – नमस्करोमि तात! पञ्चदश घटान् इच्छामि। किं दास्यसि?
देवेश – कथं न? विक्रयणाय एव एते। गृहाण घटान्। पञ्चशतोत्तर-रूप्यकाणि च देहि।

शब्दार्थाः – घटरचनायां = मृत्पात्र निर्माणे तल्लीनः (घड़ा बनाने में रत) गायति (गाता है), यथा एषः = यथा अयम् (जैसे यह), मृत्तिका घटः = मृणपात्र/मृद्घटः (मिट्टी का घड़ा), भङ्गुरः = भजनशीलः (नाशवान, फूटने वाला है), तथैव = तथा एव (वैसे ही), सर्वम् = सम्पूर्णम् (सारा), जीवनम् = जीवितम् असि (जीवन भी), क्षणिकः = (क्षणमात्र रहने वाला है), ज्ञात्वा अपि = इति ज्ञानन् असि (ऐसा जानते हुए भी), जीविका हेतो = आजीविकार्थम् (आजीविका के लिए), घटान् अहम् = कलशान् अहम् (घड़ों को मैं), रचयामि = निर्माणं करोति (रचना कर रहा हूँ),

नमस्करोति तात! = नमाम्यहं बन्धो (नमस्कार बन्धु), पञ्चदश घटान् इच्छामि = पञ्चदश कलशान् ईहे (पंद्रह घड़े चाहता हूँ), किं दास्यामि = अपि प्रदास्यामि (क्या दे दोगे?), कथं न = कस्मात् न (क्यों नहीं), विक्रयणाय एव एते = इमे घटाः विक्रेतुमेव सन्ति (ये घड़े बेचने के लिए ही हैं), गृह्मण घटान् = आत्मीय कुरु कलशान् (घड़ों को अपनाओ), पञ्चशतोत्ररुप्यकाणि च देहि = पञ्चशतोत्तर रूप्यकाणि यच्छ (पाँच सौ से अधिक रुपये दो)।

हिन्दी अनुवादः

सन्दर्भ – प्रस्तुत नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी महोदय द्वारा रचित एकांकी संग्रह ‘चतुर्म्यहम्’ से संकलित है।

प्रसंग – प्रस्तुत नाट्यांश में चन्दन गाय के शरीर में एकत्रित दूध को रखने के लिए कुम्हार के पास घड़े खरीदने जाता है तथा उनकी कीमत ज्ञात करता है।

हिन्दी अनुवाद –

कुम्भकार – (घड़ा बनाने में व्यस्त हुआ गाता है) जिस तरह यह मिट्टी का घड़ा क्षण भंगुर है उसी प्रकार यह सारा जीवन क्षणभंगुर है, इसको जानकर भी मैं घड़ों का निर्माण करता हूँ। हे तात! मैं आपको नमस्कार करना चाहता हूँ, पन्द्रह घड़े चाहता हूँ। क्या दोगे?
देवेशः – क्यों नहीं? बेचने के लिए ही तो हैं ये। घड़े ले लो और पांच सौ रुपये दो। संस्कत-व्याख्याः
सन्दर्भ: – नाट्याशोऽयम् अस्माकं शेमुषी’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘गोदोहनम्’ इति पाठात् उद्धृतोऽस्ति। पाठोऽयं श्रीकृष्णचन्द्र त्रिपाठी-रचितात् ‘चतुर्म्यहम्’ इति एकाङ्कि-संग्रहात् सङ्कलितोऽस्ति। (प्रस्तुत नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी महोदय द्वारा रचित एकांकी संग्रह ‘चतुर्दूहम्’ से संकलित है।)

प्रसङ्गः – प्रस्तुते नाट्यांशे चन्दनः धेनोः शरीरात् संकलितं दुग्धं सुरक्षितं रक्षितुं कुम्भकारस्य समीपे घटान् क्रेतुम् गच्छति तेषां मूल्यं च जानाति। (प्रस्तुत नाट्यांश में चन्दन गाय के शरीर से एकत्रित दूध को सुरक्षित रखने के लिए कुम्हार के पास घड़े खरीदने जाता है और उनका मूल्य ज्ञात करता है।)

व्याख्या:

घटनिर्माताः – (मृत्पात्र निर्माणे तल्लीनः सन् गायति।) यथा अयं मृद्घटः भञ्जनशीलः अस्ति तथा एव सम्पूर्ण
जीवन अपि क्षणिकः इति ज्ञात्वा अपि अहं आजीविकार्थं कलशानां निर्माणं करोमि। ((घड़ा 42 संस्कृत प्रभा, कक्षा )
बनाने में तल्लीन होकर गाता है। जैसे यह मिट्टी का घड़ा फूटने वाला है वैसे ही यह सम्पूर्ण जीवन भी क्षणिक है, यह जानते हुए भी मैं आजीविका के लिए कलशों (घड़ों) का निर्माण करता हूँ।)
चन्दनः – नमाम्यहं बन्धो! पञ्चदश कलशान् ईहे। अपि प्रदास्यसि? (नमस्कार बन्धु! पन्द्रह घड़े चाहिये।
क्या दोगे?) देवेशः कस्मात् न, इमे घटाः विक्रेतुम् एव सन्ति। आत्मीय कुरु कलशान्। पञ्चशतोत्तर रूप्यकाणि
यच्छ। (क्यों नहीं, ये घड़े बेचने के लिए ही तो हैं। घड़ों को अपना बनायें और पाँच सौ से
अधिक रुपये दे जाओ।) अवबोधन कार्यम् प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरत- (एक शब्द में उत्तर दीजिए-)
(क) कुम्भकारः कस्यां लीनः गायति? (कुम्हार किसमें लीन हुआ गाता है?)
(ख) कुम्भकारः कस्य हेतोः घटं रचयत? (कुम्हार किस के हेतु घड़ा बनाता है?)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(क) कुम्भकारः जीवन-रहस्यं कथं जानाति? (कुम्हार जीवन के रहस्य को कैसे जानता है?)
(ख) चन्दनः कति घटान् इच्छति? (चन्दन कितने घड़े चाहता है?)

प्रश्न 3. यथानिर्देशम् उत्तरत – (निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(क) ‘गायति’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदं नाट्यांशात् चित्वा लिखत।
(‘गायति’ क्रियापद का कर्त्तापद नाट्यांश से चुनकर लिखो।)
(ख) ‘यथैषः’ पदे सन्धिविच्छेदं कुरुत। (‘यथैषः’ पद में सन्धि विच्छेद करो।)
उत्तराणि :
(1) (क) घटरचनायाम् (घड़ा बनाने में)।
(ख) जीविकाहेतोः (जीविका के लिए)।

(2) (क) जीवनं भगुरं सर्वं यथैवः मृत्तिका घटः। (पूरा जीवन मिट्टी के घड़े की तरह क्षणभंगुर है।)
(ख) चन्दनः पञ्चदश घटान् इच्छति। (चन्दन पन्द्रह घड़े चाहता है।)

(3) (क) कुम्भकारः (कुम्हार)।
(ख) यथा + एषः।

10. चन्दनः – साधु। परं मूल्यं तु दुग्धं विक्रीय एव दातुं शक्यते।
देवेशः – क्षम्यतां पुत्र! मूल्यं विना तु एकमपि घटं न दास्यामि।
मल्लिका – (स्वाभूषणं दातुमिच्छति) तात! यदि अधुनैव मूल्यम् आवश्यकं तर्हि, गृहाण एतत् आभूषणम्।
देवेशः – पुत्रिके! नाहं पापकर्म करोमि। कथमपि नेच्छामि त्वाम् आभूषणविहीनां कर्तुम्। नयतु यथाभिलषितान् घटान्। दुग्धं विक्रीय एव घटमूल्यम् ददातु।
उभौ – धन्योऽसि तात! धन्योऽसि।

शब्दार्थाः – साधु = उत्तम (बहुत अच्छा), परं = परञ्च (परन्तु), मूल्यं तु = राशि तु (मूल्य तो), दुग्धं विक्रीय = पयः विक्रयणे (दूध बिकने पर ही), दातुं शक्यते = देया एव भविष्यति (दिया जा सकता है), क्षम्यतां पुत्र! = क्षमस्व वत्स (बेटा क्षमा करो), मूल्यं विना = मूल्यन्तरेण (बिना मूल्य के), एकमपि घट न दास्यामि = एकमपि कलशं न दातुं शक्नोमि (एक भी घड़ा नहीं दे सकता), स्वाभूषणं = आत्मनः अलङ्कराणि (अपने आभूषण), दातुमिच्छति = दातुमीहते (देना चाहती है), तात! यदि अधुनैव = तात! चेत् इदानीमेव (तात! यदि अभी), मूल्यम् आवश्यकम् = मूल्यं देयम् (कीमत देनी है), तर्हि = तदा (तो),

गृहाण एतद् आभूषणम् = स्वीकरोतु इदम् अलंकारम् (यह आभूषण स्वीकार कीजिए), पुत्रिके = वत्से (बेटी), नाहं पापकर्म करोमि = अहम् एवं पापकर्म कर्तु न क्षमः (मैं ऐसा पाप नहीं कर सकता), कथमपि = केनापि प्रकारेण (किसी प्रकार), त्वाम् = भवती (आपको), आभूषणविहीनाम् = अनाभूषिताम् (आभूषणरहित) कर्तुम्, नेच्छामि = विधातुं न ईहे (करना नहीं चाहता), यथाभिलषितान् घटान् = यथेच्छम् मृत्पात्राणि (इच्छानुसार घड़े) नयतु (ले जाओ), दुग्धं = पयांसि (दूध), विक्रीय एव = विक्रय एव (बेचकर ही), घटमूल्यम् ददातु = घटवित्तं ददातु (घड़े की राशि/मूल्य दे देना), धन्योऽसि = धन्यवादा) (धन्य हो), तात! धन्योऽसि = भवान् धन्य (आप धन्य हैं)।

हिन्दी अनुवादः

सन्दर्भ – प्रस्तुत नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी महोदय द्वारा रचित एकांकी संग्रह ‘चतुर्दूहम्’ से संकलित है।

प्रसंग – प्रस्तुत नाट्यांश में चन्दन देवेश कुम्भकार से घड़े खरीदने जाता है लेकिन देवेश बिना मूल्य के घड़े नहीं देता परन्तु फिर वह दूध बिकने पर मूल्य लेने को तैयार हो जाता है। दोनों कुम्हार को धन्यवाद देकर आ जाते हैं।

हिन्दी अनुवादः

चन्दन – बहुत अच्छा! परन्तु मूल्य तो मैं दूध बेचकर ही दे सकता हूँ।
देवेश – क्षमा कीजिए बेटा, बिना मूल्य के तो एक भी घड़ा नहीं दूंगा।
मल्लिका – अपने आभूषणों को देना चाहती है। तात! यदि म की अभी आवश्यकता है तो लो ये आभूषण।
देवेश – बेटी ! मैं ऐसा पाप कर्म नहीं करूँगा। किसी भी तरह . तुम्हें आभूषणरहित नहीं करना चाहता।
जितनी इच्छा है उतने घड़े ले जाओ। दूध बेचकर ही घड़ों का मूल्य दे देना। धन्य हो तुम तात! तुम धन्य हो।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

संस्कत-व्यारव्याः

सन्दर्भ: – नाट्यांशोऽयम् अस्माकं ‘शेमुषी’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘गोदोहनम्’ इति पाठात् उद्धृतोऽस्ति। पाठोऽयं कृष्णचन्द्र त्रिपाठी-रचितात् ‘चतुर्म्यहम्’ इति एकाङ्कि-संग्रहात् सङ्कलितोऽस्ति। ((यह नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘गोदोहनम्’ पाठ से लिया गया है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी-रचित ‘चतुर्दूहम्’ एकाङ्की-संग्रह से संकलित है।))

प्रसङ्गः – नाट्यांशेऽस्मिन् चन्दनः घटान् क्रेतुं देवेशं कुम्भकारं प्रति गच्छति। देवेश मूल्यं विना घटान् न ददाति परञ्चासौ दुग्धे विक्रय मूल्यं ग्रहीतं स्वीकरोति। उभौ कम्भकाराय धन्यवादं वितीर्य गहमागच्छतः। (इस नाट्यांश में चन्दन घड़े खरीदने देवेश कुम्हार के पास जाता है। देवेश बिना मूल्य घड़े नहीं देता है। परन्तु वह दूध बिकने पर मूल्य लेना स्वीकार कर लेता है। दोनों कुम्हार को धन्यवाद देकर घर आ जाते हैं।)

व्याख्याः

चन्दनः – सुष्ठु, परञ्च राशिस्तु पयो विक्रयणे एव देया एव भविष्यति। (ठीक है, परन्तु राशि तो बिकने पर ही देना सम्भव होगा।)

देवेश – क्षमस्व वत्स, मूल्यमन्तरेण तु एकम् अपि कलशं न दातुं शक्नोमि। (क्षमा कीजिए बेटा! मूल्य के बिना तो एक भी घड़ा नहीं दे सकता।)
मल्लिका – (आत्मनः अलङ्काराणि दातम ईहते) तात् चेत् इदानीम् अपि मूल्यम् देयमेव तदा स्वीकरोत् इदम् अलङ्कारम्’। (अपने आभूषण देना चाहती है।) तात! यदि अभी मूल्य देना है तो लो ये गहने।)
देवेश – वत्से! अहं एवं पातकं न कर्तुं क्षमः। केनाप प्रकारेण भवतीम् अहम् अनाभूषितां विद्यातुम् ईहे। यथेच्छम् मृत् पात्राणि नयत। पयांसि विक्रीय एव वित्तं यच्छतु। (बेटी, मैं ऐसा पाप नहीं करना चाहता। किसी प्रकार भी मैं आपको आभूषणरहित नहीं करना चाहता। इच्छानुसार जितने चाहो उतने घड़े ले जाओ। दूध बिकने पर ही राशि दे देना।)
द्वावेव – धन्यवादा. भवान् धन्यस्त्वम्। (धन्यवाद, आप धन्य हैं।)

अवबोधन कार्यम्

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत- (एक शब्द में उत्तर दीजिए-)
(क) मल्लिका घटमूल्याय किदातुम् इच्छति? (मल्लिका घड़ों के मूल्य के लिए क्या देना चाहती है?)
(ख) कुम्भकारस्य किं नाम आसीत् ? (कुम्हार का क्या नाम था?)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(क) चन्दनः घटमूल्यं प्रदातुं किं कथयति? (चन्दन घड़ों के मूल्य देने के लिए क्या कहता है?)
(ख) मल्लिका यदा आभूषणं ददाति तदा देवेशः किं कथयति?
(मल्लिका जब आभूषण देती है तब देवेश क्या कहता है?)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

प्रश्न 3.
यथानिर्देशम् उत्तरत-(निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(क) ‘धन्योऽसि’ इति पदस्य सन्धि-विच्छेदं कुरुत। (‘धन्योऽसि’ पद का सन्धि-विच्छेद कीजिए।)
(ख) ‘पापकर्म’ इत्यनयो पदयो विशेषण पदं चिन्नुत? (‘पापकर्म’ इन पदों में विशेषण पद चुनिए।)
उत्तराणि :
(1) (क) आभूषणम् (आभूषण)।
(ख) देवेशः।

(2) (क) ‘घटमूल्यं तु दुग्धं विक्रीय एव दास्यामि’ इति कथयति। (घड़ों का मूल्य तो दूध बेचकर ही दूंगा।)
(ख) नाहं पापकर्म करोमि। न त्वाम् आभूषणविहीनां कर्तुम् इच्छामि। (मैं पाप नहीं करता। तुम्हें आभूषण विहीन नहीं करना चाहता।)

(3) (क) धन्यः + असि।
(ख) ‘पाप’ इति विशेषण पदम्।

(पञ्चमं दृश्यम्)

11. (मासानन्तरं सन्ध्याकालः। एकत्र रिक्ताः नूतनघटाः सन्ति। दुग्धक्रेतारः अन्ये च ग्रामवासिनः अपरत्र आसीनाः)
चन्दनः – (धेनुं प्रणम्य, मङ्गलाचरणं विधाय, मल्लिकाम् आह्वयति) मल्लिके! सत्वरम् आगच्छ।
मल्लिका – आयामि नाथ! दोहनम् आरभस्व तावत्।
चन्दनः – (यदा धेनोः समीपं गत्वा दोग्धुम् इच्छति, तदा धेनुः पृष्ठपादेन प्रहरति। चन्दनश्च पात्रेण सह पतति) नन्दिनि! दुग्धं देहि। किं जातं ते? (पुनः प्रयास करोति) (नन्दिनी च पुनः पुनः पादप्रहारेण ताडयित्वा चन्दनं रक्तरञ्जितं करोति) हा! हतोऽस्मि। (चीत्कारं कुर्वन् पतति) (सर्वे आश्चर्येण चन्दनम् अन्योन्यं च पश्यन्ति)

शब्दार्थाः – मासानन्तरम् = मास पश्चात् (महीने भर बाद), सन्ध्याकाल = सायं समय (साँझ का समय), एकत्र = एकस्मिन्नेव स्थाने (एक जगह), नूतन घटा सन्ति = नवीनाः घटाः स्थिताः सन्ति (नये घड़े रखे हुए हैं), दुग्ध क्रेतारः = पयस: ग्राहकाः (दूध लेने वाले), अन्ये च ग्रामवासिनः = अन्ये च ग्राम्याः (और दूसरे ग्रामीण), अपरत्र आसीनाः = अपर स्थाने उपविष्टम् (दूसरे स्थान पर बैठे हैं), धेनुं = गाव (गाय को), प्रणम्य = नत्वा/अभिवाद्य (प्रणाम करके),

मङ्गलाचरणं विधाय = स्वस्तिवाचनं कृत्वा (मंगलाचरण करके), मल्लिकाम् आह्वति = मल्लिकाम् आकारयति (मल्लिका को बुलाता है), आयामि नाथ = आगच्छामि स्वामिन् (आई स्वामी), दोहनम् आरभस्व तावत् = दुग्धं दोग्धुम् प्रारम्भं कुरु (दूध दोहना आरम्भ करो तब तक), यदि = तावत् (जैसे ही/जब), धेनोः समीपम् = गाव समया (गाय के समीप), गत्वा = प्राप्य (पहुँचकर), दोग्धुम् इच्छति = दोहनं वाञ्छति (दोहना चाहता है), तदा धेनुः = तावत् गौ (तब तक गाय), पृष्ठपादेन = पश्चपादेन (पीछे के पैर से), प्रहरति = प्रहारं करोति (प्रहार करती है),

चन्दनः च पात्रेण सह पतति = चन्दन: च पात्रेन सहितं धरायां लुण्ठति (और चन्दन बर्तन के साथ गिर जाता है।), दुग्धं देहि = पयः यच्छ (दूध दो), किं जातं ते = तुभ्यं किम् अभवत् तुझे क्या हो गया), पुनः प्रयासं करोति = पुनरपि प्रयतते (फिर से प्रयत्न करता है), नन्दिनी च (और नन्दिनी) पुनःपुनः = मुहुर्मुहुः (बार-बार), पादप्रहारेण = पादाघातेन (लात से), ताडयित्वा = ताडयति (मारती है), चन्दनं रक्तरञ्जितं च करोति = चन्दनं शोणितेन रक्तं करोति (चन्दन को रक्तरंजित करती है), चीत्कारं कुर्वन् पतति = क्रन्दनं कुर्वन् लुण्ठति (चीखता हुआ लुढ़क जाता है।), सर्वे आश्चर्येण = सर्वे सविस्मयम् (सभी आश्चर्य के साथ), चन्दनम् अन्योऽन्यं च = चन्दनम् परस्परं च (चन्दन को और आपस में एक-दूसरे को), पश्यन्ति = अवलोकयन्ति (देखते हैं)।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

हिन्दी अनुवादः

सन्दर्भ – प्रस्तुत नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी महोदय द्वारा रचित एकांकी संग्रह ‘चतुर्म्यहम्’ से संकलित है।

प्रसंग प्रस्तुत नाट्यांश में चन्दन जैसे ही तीस दिन से रुकी हुई गाय का दूध निकालने बैठता है वैसे ही गाय दूध के बजाय पाद प्रहार करने लगती है तथा चन्दन को लहूलुहान कर देती है।

हिन्दी अनुवाद – (महीने भर पश्चात् सन्ध्या का समय खाली नये घड़े इकट्ठे रखे हैं। दूध खरीदने वाले तथा दूसरे
ग्रामवासी दूसरी ओर बैठे हैं।

चन्दन – (गाय को प्रणाम करके, मंगलाचरण करके मल्लिका को बुलाता है। मल्लिका जल्दी आ जाओ।
मल्लिका – आ रही हूँ। स्वामी! तब तक दूध दोहना आरम्भ कीजिये।
चन्दन – (जब गाय के समीप जाकर दोहना चाहता है, तब गाय पीछे के पैरों से प्रहार करती है अर्थात लात मारती है। चन्दन पात्र समेत गिर जाता है। नन्दिनी दूध दे। तुझे क्या हो गया? (फिर से प्रयास करता है) (नन्दिनी बार-बार पाद प्रहार से प्रताड़ित कर चन्दन को लहू-लुहान कर देती है।) अरे मारा गया (चीखता हुआ गिर जाता है।) सभी अचम्भे से चन्दन को तथा आपस में देखते हैं।

संस्कत-व्याख्याः

सन्दर्भ: – नाट्यांशोऽयम् अस्माकं ‘शेमुषी’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘गोदोहनम्’ इति पाठात् उद्धृतोऽस्ति। पाठोऽयं कृष्णचन्द्र त्रिपाठी-रचितात् ‘चतुव्यूहम्’ इति एकाङ्कि-संग्रहात् सङ्कलितोऽस्ति। (प्रस्तुत नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी महोदय द्वारा रचित एकांकी संग्रह ‘चतुर्म्यहम्’ से संकलित है।)

प्रसङ्गः – प्रस्तुत नाट्यांशे चन्दनः यावत् त्रिंशत दिवसात् निरुद्धां गां दोग्धुं गच्छति तावत् धेनुः पाद-प्रहारैः चन्दनं रक्त रञ्जितं करोति। (प्रस्तुत नाट्यांश में चन्दन जब तक तीस दिन से रुकी हुई गाय को दोहने के लिए जाता है वैसे ही गाय लातों से उसे लहूलुहान कर देती है।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

व्याख्या: –

(मास पश्चात् सायं समयः एकस्मिन्नेव स्थाने नवीना घटाः स्थिताः सन्ति। पयस: ग्राहकाः अन्ये च ग्राम्याः अपर स्थाने उपविष्टाः सन्ति। ((महीने के पश्चात्, सायंकाल, एक स्थान पर नये घड़े रखे हुए हैं। दूध के ग्राहक और दूसरे ग्रामीण दूसरे स्थान पर बैठे हैं।))

चन्दनः – (गां नत्वा, स्वस्तिवाचनं कृत्वा मल्लिकाम् आकारयति) मल्लिके शीघ्रम् आयाहि। ((गाय को प्रणाम कर मंगलाचरण करके मल्लिका को बुलाता है। मल्लिका जल्दी आओ।)
मल्लिका – आगच्छामि स्वामिन्। दुग्धं दोग्धुम् प्रारंभं कुरु। (आ रही हूँ स्वामी। दूध दोहना आरम्भ करो।)
चन्दनः – (यावत् गां समया प्राप्य दोहनम् वाञ्छति तावत् गौ पश्चपादेन प्रहारं करोति। चन्दनः भाण्डेन सहितं धरायां लुंठति नन्दिनि! पयः यच्छ। तुभ्यं किम् अभवत्? (पुनरसि प्रयतते। नन्दिनी च मुहर्मुहुः पादाघातेन ताडयति, चन्दनः शोणितेन रक्तः भवति।) अरे! अहं प्रिये? क्रन्दनं कुर्वन् लुण्ठति। सर्वे सविस्मयं चन्दनं परस्परं चावलोकयन्ति। ((जैसे ही गाय के पास पहुँचकर दोहना चाहता है वैसे ही गाय पीछे के पैर से लात मारती है। चन्दन पात्र सहित धरती पर लुढ़क जाता है) नन्दिनी, दूध दो। तुम्हें क्या हो गया? (फिर प्रयत्न करता है और नन्दिनी बार-बार लात मारती है, चन्दन खून से लाल हो जाता है।) अरे मैं मर गया (अरे मैं मर रहा हूँ) चिल्लाते हुए धरती पर लुढ़क जाता है। सभी अचम्भे से चन्दन को तथा एक-दूसरे को (आपस में) देखते हैं।))

अवबोधन कार्यम्

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत – (एक शब्द में उत्तर दीजिए-) .
(क) धेनुः चन्दनं केन प्रहरति? (गाय चन्दन पर किससे प्रहार करती है?)
(ख) चन्दनस्य समीपे के तिष्ठन्ति? (चन्दन के पास कौन खड़े हैं?)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(क) मल्लिका चन्दनस्य आह्वानं कथम् उत्तरति? (मल्लिका चन्दन के आह्वान का उत्तर कैसे देती है?)
(ख) चन्दनस्य गृहे एकत्र के सन्ति? (चन्दन के घर में एक जगह क्या है?)

प्रश्न 3.
यथानिर्देशम् उत्तरत-(निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(क) ‘किं जातं ते?’ अत्र ‘ते’ इति सर्वनाम पदं कस्मै प्रयुक्तम्?
नाम पद किसके लिए प्रयोग किया गया है।)
(ख) नाट्यांशे ‘पतति’ क्रियापदस्य कर्तृपदं अन्विष्य लिखत।
(नाट्यांश में ‘पतति’ क्रियापद का कर्ता ढूँढ़कर लिखिये।)
उत्तराणि :
(1) (क) पृष्ठपादेन (पीछे के पैर से)।
(ख) दुग्ध क्रेतारः। (दूध खरीदने वाले।)

(2) (क) सा उत्तरति-आयामि नाथ! दोहनम् आरभस्व तावत्। (वह उत्तर देती है-आ रही हूँ स्वामी। दूध दोहना आरम्भ तो करो।)
(ख) देवेशस्य गृहे एकत्र रिक्ता नूतन घटाः सन्ति। (चन्दन के घर में एक जगह खाली नये घड़े रखे हैं।)

(3) (क) ‘धेनवे’ (गाय के लिए)।
(ख) चन्दनः।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

12. मल्लिका – (चीत्कारं श्रुत्वा, झटिति प्रविश्य) नाथ! किं जातम्? कथं त्वं रक्तरजित:?
चन्दनः – धेनुः दोग्धुम् अनुमतिम् एव न ददाति। दोहनप्रक्रियाम् आरभमाणम् एव ताडयति माम्।
(मल्लिका धेनुं स्नेहेन वात्सल्येन च आकार्य दोग्धुं प्रयतते। किन्तु, धेनुः दुग्धहीना एव इति अवगच्छति।)
मल्लिका – (चन्दनं प्रति) नाथ! अत्यनुचितं कृतम् आवाभ्याम् यत्, मासपर्यन्तं धेनोः दोहनं कृतम्। सा पीडम् अनुभवति। अत एव ताडयति।
चन्दनः – देवि! मयापि ज्ञातं यत्, अस्माभिः सर्वथा अनुचितमेव कृतं यत्, पूर्णमासपर्यन्तं दोहनं न कृतम्। अत एव, दुग्धं शुष्कं जातम्। सत्यमेव उक्तम्

शब्दार्थाः – चीत्कारं = क्रन्दनम् (चीख को), श्रुत्वा = आकर्ण्य (सुनकर), झटिति प्रविश्य = शीघ्रमेव प्रवेशं कृत्वा (शीघ्र ही प्रवेश करके), नाथ! किं जातम् = स्वामिन् ! किम् अभवत् ? (स्वामी क्या हो गया?), कथं त्वं रक्तरन्जितः = भवान् शोणितेन शोणः कथं जाता (आप खून से लथपथ कैसे हो गये।), धेनुः = गौ (गाय), दोग्धुम् = पयप्रदानस्य (दोहनाय) (दूध देने की), अनुमतिमेव = स्वीकृतिमेव (स्वीकृति ही) न ददाति (नहीं देती है), दोहन प्रक्रियाम् = यदा अहं दोहन आरभे (जैसे ही मैंने दूध दोहना आरम्भ किया),

ताडयति माम् = तथा सा माम् अताडयत (मुझे मारा), मल्लिका धेनुं स्नेहेन = मल्लिका गाव अति स्नेहेन (मल्लिका गाय को अत्यन्त स्नेह से), वात्सल्येन च = वत्सलतया च (और वात्सल्य के साथ), आकार्य = संबोध्य (संबोधन करके), दोग्धुं प्रयतते = दोहनाय प्रयासं करोति (दोहने का प्रयत्न करती है), किन्तु = परञ्च (परन्तु), धेनु = गौ (गाय), दुग्ध हीना एव = पयोविहीना एव (बिना दूध है),

इति अवगच्छति = इति सा जानाति (ऐसा यह जान जाती है), चन्दनं प्रति (चन्दन से) नाथ! = स्वामिन्! (स्वामी) आवाम्, अत्यनुचितं कृतम् = अत्यम् असमीचीनमेव कृतम् (हम दोनों ने अनुचित ही किया), यत् (कि) मासपर्यन्तं = मासावधौ (महीने भर), धेनोः दोहनं न कृतम् = आवां धेनुं न दुग्धवन्तौ (हमने गाय को नहीं दुहा), सा पीडम् अनुभवति = अतः पादाघातैः आघातयति (पैरों से आघात करती है), देवि! मयापि ज्ञातं यत् = देवि! अहमपि ज्ञातवान् यत् (हे देवि! मैं भी जान गया कि),

अस्माभिः सर्वथा अनुचितमेव कृतं यत् = वयं पूर्णतः असमीचीनमेव कृतवन्तः (हमने पूरी तरह अनुचित ही किया है), यत् पूर्णमासपर्यन्तं दोहनं न कृतम् = सम्पूर्ण मासकाले आवां धेनुं न दुग्धवन्तौ (कि पूरे महीने भी हमने गाय को नहीं दुहा), अत एव दुग्धं शुष्क जातम् = अत एव पयः शुष्को भवत् (इसलिए दूध सूख गया), सत्यमेव उक्तम् = समुचितमेव कथितम् (ठीक ही कहा गया है)। हिन्दी अनुवादः

सन्दर्भ – प्रस्तुत नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ ष्णचन्द्र त्रिपाठी महोदय द्वारा रचित एकांकी संग्रह ‘चतुर्म्यहम्’ से संकलित है।

प्रसंग – यहाँ चन्दन गाय को दोहने का प्रयत्न करता है परन्तु गाय उसे अनुमति नहीं देती है। मल्लिका इसका कारण जानती है तथा कहती है “महीनेभर दोहन रुक गया। अत: गाय का दूध सूख गया है। इसी कारण से यह अस्वीकार कर रही

हिन्दी अनुवादः

मल्लिका – चीख को सुनकर शीघ्र प्रवेश करके) स्वामी! क्या हुआ? तुम लहू-लुहान कैसे हो? चन्दन गाय दोहने की आज्ञा ही नहीं दे रही है। दूध निकालने की प्रक्रिया जैसे ही आरम्भ करता हूँ वह मुझे मारने लगती है। (मल्लिका गाय को प्यार से और बच्चे का सा प्यार करके बुलाकर दोहन का प्रयत्न करती है परन्तु गाय दूधरहित है, यह जान जाती है।

मल्लिका – (चन्दन से) स्वामी! हमने बड़ा अनुचित किया है कि महीनेभर बाद गाय को दुहा है। वह पीड़ा का अनुभव करती है। इसीलिए मारती है। चन्दन – देवी! मैंने भी जान लिया कि हमने सब प्रकार से अनुचित ही किया है, पूरे महीने तक दूध दोहन नहीं किया, इसलिए दूध सूख गया। सच ही कहा है।

संस्कत-व्याख्याः

सन्दर्भः – नाट्यांशोऽयम् अस्माकं ‘शेमुषी’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘गोदोहनम्’ इति पाठात् उद्धृतोऽस्ति। पाठोऽयं कृष्णचन्द्र त्रिपाठी-रचितात् ‘चतुर्म्यहम्’ इति एकाङ्कि-संग्रहात् सङ्कलितोऽस्ति। (यह नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘गोदोहनम्’ पाठ से लिया गया है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी-रचित ‘चतुर्म्यहम्’ एकाङ्की-संग्रह से संकलित है।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

प्रसङ्गः – अत्र चन्दनः गां दोग्धुं प्रयतते परञ्च धेनुः तु अनुमतिमेव न ददाति। मल्लिका अस्य कारणं जानाति कथयति च यन्मास पर्यन्तं दोहनम् अवरुद्धम् अतः धेनोः दुग्धं शुष्कं जातम् तेनैव कारणेन सा अस्वीकरोति। (यहाँ चन्दन गाय को दोहने का प्रयत्न करता है परन्तु गाय उसे अनुमति नहीं देती है। मल्लिका इसका कारण जानती है और कहती है कि महीने भर दोहन रुक गया। अतः गाय का दूध सूख गया है। इसी कारण से वह अस्वीकार करती है।)

व्याख्याः

मल्लिका – (क्रन्दनं आकर्ण्य शीघ्रमेव प्रवेशं कृत्वा) स्वामिन्! किमभवत् ? भवान् शोणितेन शोणः कथं जातः? (चीख को सुनकर शीघ्र ही प्रवेश करके।) स्वामी! क्या हुआ? आप खून से लाल कैसे हो गये?)
चन्दनः – गौः एषः पयः प्रदानस्य स्वीकृतिमेव न ददाति। यथा अहं दोग्धुम् आरम्भे तथा एव समाम् अताडयत्। (मल्लिका गामति स्नेहेन वत्सलतया च संबोध्य दोहनाय प्रयासं करोति। परञ्च गौ तु पयोविहीना इति सा जानाति) (यह गाय दूध देने की इजाजत ही नहीं देती है। जैसे ही मैं दूध दोहना आरंभ करता हूँ वैसे ही उसने मुझे मारा। (मल्लिका गाय को अति प्रेम से तथा वात्सल्य के साथ बुलाकर दोहने का प्रयास करती है। परन्तु गाय तो दूधरहित है, इसे वह जानती है।)

मल्लिका – चन्दनं कथयति! स्वामिन आवाम अमीचीनमेव कतवन्तौ. यतः मासावधौ आवाम धेनं न दग्धवन्तौ। सा पीडिताभवेत्। अत एव पादाघातैः आघातपति। (चन्दन से कहती है, नाथ! हम दोनों ने बहुत अनुचित किया क्योंकि महीने भर हमने गाय को नहीं दुहा। वह पीड़ित रही। इसलिए लातों से मारती है।)

चन्दनः – देवि! अहम् अपि ज्ञातवान् यत् वयं पूर्णतः असमीचीनमेव कृतवन्त। सम्पूर्णे मासकाले आवां धेनुं न दुग्धवन्तौ अतएव पयः शुष्कोऽभवत्। समुचितमेव कथितम्। (देवि! मैं भी जान गया कि हम दोनों ने सर्वथा अनुचित ही किया है। पूरे महीने भर हमने गाय को नहीं दुहा, इसलिए दूध सूख गया। सच ही कहा है-)

अवबोधन कार्यम्

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत- (एक शब्द में उत्तर दीजिए-)
(क) रक्तरञ्जितः कोऽभवत्? (रक्तरंजित कौन हो गया?)
(ख) मल्लिका धेनुं कथं दोग्धुं प्रयतते? (मल्लिका गाय को कैसे दोहने का यत्न करती है?)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(क) चन्दनः स्वस्य त्रुटि कथं स्वीकरोति? (चन्दन अपनी गलती कैसे स्वीकार करता है?)
(ख) धेनुः कीदृशं व्यवहारं करोति? (गाय कैसा व्यवहार करती है?)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

प्रश्न 3.
यथानिर्देशम् उत्तरत-(निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(क) ‘उचितम्’ इति पदस्य विलोमार्थकं पदं नाट्यांशात् चित्वा लिखत।
(‘उचितम्’ पद का विलोम पद नाट्यांश से चुनकर लिखिए।)
(ख) ‘अनुमतिं न ददाति’ अत्र ददाति क्रियापदस्य कर्तृपदं नाट्यांशात् अन्विष्य लिखत।
(‘अनुमति न ददाति’ यहाँ ददाति क्रियापद का कर्ता नाट्यांश से ढूँढ़कर लिखिए।)
उत्तराणि :
(1) (क) चन्दनः।
(ख) स्नेहेन वात्सल्येन च (प्यार एवं वात्सल्य से)।

(2) (क) मयापि ज्ञातं यत् अस्माभिः सर्वथा अनुचितमेव कृतम् यत् पूर्ण मास पर्यन्तं दोहनं न कृतम्। (मुझे पता चल गया कि हमने भी गलती की है कि पूरे महीने दूध नहीं दोहा।)
(ख) दोहन प्रक्रियाम् आरम्भमाणम् एव ताडयति। (दोहन प्रक्रिया आरम्भ करते ही मारती है।)

(3) (क) अनुचितम्।
(ख) धेनुः (नन्दिनी) गाय।

13. कार्यमद्यतनीयं यत् तदद्यैव विधीयताम्।
विपरीते गतिर्यस्य स कष्टं लभते ध्रुवम्।।
मल्लिका – आम् भर्तः! सत्यमेव। मयापि पठितं यत्
सुविचार्यविधातव्यकार्यकल्याणकाक्षिणा।
यः करोत्यविचार्यैतत् स विषीदति मानवः।।
किन्तु प्रत्यक्षतया अद्य एव अनुभूतम् एतत्।

सर्वे – दिनस्य कार्य तस्मिन्नेव दिने कर्तव्यम्। यः एवं न करोति सः कष्टं लभते ध्रुवम्।
(जवनिका पतनम्) (सर्वे मिलित्वा गायन्ति।)
आदानस्य प्रदानस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः।
क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम्।।

शब्दार्थाः – अद्यतनीयं = अद्यदिवसपर्यन्तम् करणीयम् (आज का काम) यत कार्य (जो कार्य है), तत् अद्य एवं विधीयताम् = तद् अद्य एव सम्पादनीयम् (वह आज ही सम्पन्न कर देना चाहिए), विपरीते गतिर्यस्य = यः विरुद्ध कार्य करोति अर्थात अद्य करणीय कार्य अद्य न कृत्वा आगामिनं दिवसं नयति (जो विरुद्ध कार्य करता है अर्थात् आज जो कार्य करना है उसे अगले दिन को ले जाता है), सः ध्रुवं कष्टं लभते = स: निश्चितम् एव कष्टं प्राप्नोति (वह अवश्य ही कष्ट पाता है।), आम् भर्त = ओम् स्वामिन् (हाँ स्वामी), सत्यमेव = ऋतमेव (सच ही है),

मया अपि पठितं यत् = अहमपि एवं पठितवान् यत (मैंने भी ऐसा पढ़ा है कि-), कल्याणकाक्षिणा = ये जनाः स्वस्य भद्रम् इच्छन्ति (जो लोग अपना कल्याण चाहते हैं) (तैः = उनके द्वारा), सुविचार्य = सम्यक् विचिन्त्य एव (अच्छी तरह सोच-विचार कर ही), कार्य विधातव्यम् = कर्त्तव्यम् (कार्य करना चाहिए), यः = यः जनः (जो व्यक्ति), अविचार्य = अविवेकेण (बिना सोचे-विचारे), करोति = सम्पादयति (करता है), सः मानवः निसीदति = सः मनुष्यः दुःखं लभते (वह मनुष्य दुःख पाता है), किन्तु = परञ्च (किन्तु/परन्तु), प्रत्यक्षत यातु = सम्मुखे तु (प्रत्यक्ष तो),

एतत् = इदम् (यह), अद्यैव (आज ही), अनुभूतम् = दृष्टम्। (देखा है या अनुभव किया है), दिनस्य कार्यम् = यस्य दिवसस्य कार्यमस्ति (जिस दिन का काम हो), तस्मिन् दिने एव = मानवेन तस्मिन्नेव दिवसे करणीयम् (मनुष्य को उसी दिन कर लेना चाहिए), यः एवं न करोति = यः जनः अनेन प्रकारेण न करोति (जो व्यक्ति इस प्रकार से नहीं करता), सः ध्रुवं कष्ट लभते = स: निश्चप्रचमेव पीडाम् अनुभवति (वह निश्चित ही कष्ट पाता है।), जवनिकापातम् = आवरणम् पतति (पर्दा गिरता है), सर्वे मिलित्वा गायन्ति = सर्वे समवेत स्वरेण गायन्ति (सभी समवेत स्वरों में गाते हैं),

य: मनुष्य (जो मनुष्य) आदानस्य = ग्रहणस्य (ग्रहण करने), प्रदानस्य = दानस्य (दान के), कर्तव्यस्य कर्मणः = करणीयस्य कार्यस्य (करने योग्य कार्य को), क्षिप्रम् एव = शीघ्रमेव (जल्दी ही), क्रियमाणस्य = कर्ता भवति (करने वाला होता है अर्थात क्रियमाण कार्य को तत्काल करता है)), तद् रसम् = तस्य फलं . (उसका परिणाम), कालः पिबति = समय: आचमनि भुक्ते वा (काल पी जाता है)।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

हिन्दी अनुवादः

सन्दर्भ – यह नाट्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘गोदोहनम्’ पाठ से लिया गया है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी-रचित ‘चतुर्म्यहम्’ एकाङ्की-संग्रह से संकलित है।

प्रसंग – प्रस्तुत नाट्यांश चन्दन तथा मल्लिका अपने किए हुए पर पश्चाताप करते हुए शिक्षा प्रदान करते हैं कि कोई भी कार्य समय पर ही अवश्य करना चाहिए।
हिन्दी-अनुवाद – आज तक का जो कार्य है उसे आज ही कर लेना चाहिए। इससे उल्टा होने पर तो वह निश्चित
रूप से कष्ट ही पाता है।
मल्लिका – हाँ स्वामी ! सच ही तो है। मैंने भी पढ़ा है कि।
(अपना) भला चाहने वाले व्यक्ति को अच्छी तरह विचार करके ही कार्य करना चाहिए। जो मनुष्य यह बिना विचार करता है वह दुखी होता है।” परन्तु प्रत्यक्ष तो मैंने आज ही अनुभव किया है। सर्वे (सभी) दिन का काम उसी दिन कर लेना चाहिए। जो ऐसा नहीं करता है वह निश्चित ही दुख पाता है।
(पर्दा गिरता है) (सभी मिलकर गाते हैं। शीघ्र ही जो आदान-प्रदान (लेन-देन) और करने योग्य कर्मों को नहीं करता है, उसके रस को
समय पीता है। (अतः वह नीरस हो जाता है, सूख जाता है, गाय के दूध की तरह।)

संस्कत-व्याख्याः

सन्दर्भ: – नाट्यांशोऽयम् अस्माकं ‘शेमुषी’ इति पाठ्यपुस्तकस्य गोदोहनम्’ इति पाठात् उद्धृतोऽस्ति। पाठोऽयं श्रीकृष्णचन्द्र -रचितात् ‘चतुर्म्यहम्’ इति एकाङ्कि-संग्रहात् सङ्कलितोऽस्ति। (प्रस्तुत नाट्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘गोदोहनम्’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ कृष्णचन्द्र त्रिपाठी महोदय द्वारा रचित एकांकी संग्रह ‘चतुर्म्यहम्’ से संकलित है।)

प्रसङ्गः – प्रस्तुत नाट्यांशे मल्लिकाचन्दनौ स्व-कृत्यं प्रति पश्चातापं कुरुतः। तौ शिक्षेते यत् कालात् पूर्वं किमपि कार्यं न कुर्यात्। (प्रस्तुत नाट्यांश में मल्लिका और चन्दन अपने किये हुए पर पछताते हैं तथा दोनों शिक्षा देते हैं-समय से पहले कोई कार्य नहीं करना चाहिए।)

व्याख्या: –
चन्दनः – यत् कार्यम् अद्य करणीयम् अस्ति तत् अद्य एव सम्पादनीय यः विरुद्ध कार्यं करोति अर्थात् अद्य करणीयं कार्यम् अद्य न कृत्वा आगामिनं दिवसं नयति सः निश्चितम् एव कष्टं प्राप्नोति। (जो कार्य आज करना है वह आज ही कर लेना चाहिए। जो (इसके) विपरीत कार्य करता है अर्थात् आज करने योग्य कार्य को आज न करके अगले दिन के लिए ले जाता है, वह निश्चित ही कष्ट
पाता है।)
मल्लिका – ओम् स्वामिन् ! ऋतम् एव। अहम् अपि एवं पठितवान् –
“यो जनाः स्वस्य भद्रम् इच्छन्ति तैः करणीयं सम्यक् विचिन्त्य एव कर्त्तव्यम् यः जनः अविवेकेन सम्पादयति सः मनुष्यः दु:खं लभते।” परञ्च सम्मुखे तु अध एव दृष्टम्। (हाँ स्वामी, सच ही है। मैंने भी ऐसा पढ़ा है.-“जो मनुष्य अपना भला चाहते हैं, उन्हें करने योग्य कार्य अच्छी प्रकार विचार करके ही करना चाहिए। जो मनुष्य बिना विचारे (अविवेकपूर्ण) करता है, वह निश्चय ही कष्ट का अनुभव करता है। परन्तु
प्रत्यक्ष तो आज ही देखा है।) .

सर्वे – यस्य दिवसस्य कार्यम् अस्ति मानवेन तस्मिन् एव दिवसे करणीयम्। यो जनः अनेन प्रकारेण न करोति अस्मै निश्चप्रचमेव पीडाम् अनुभवति। (आवरणम् पतति) (सर्वे समवेत स्वरेण गायन्ति-“यः मनुष्य ग्रहणस्य दानस्य करणीयस्य कार्यस्य सम्पादनं शीघ्रम् तत्कालमेव न करोति तस्य रसं फलं वा समय: आचयति। (जिस दिन का कार्य है उसे उसी दिन कर लेना चाहिए जो मनुष्य इस प्रकार नहीं करता वह निश्चित रूप से पीड़ा का अनुभव करता है (पर्दा गिरता है)। सभी मिलकर एक स्वर में गाते हैं-“जो मनुष्य लेन-देन और करने योग्य कर्म का (सम्पादन) शीघ्र ही न करे, समय उसके रस को पीता है।”)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 3 गोदोहनम्

अवबोधन कार्यम्

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत – (एक शब्द में उत्तर दीजिए-)
(क) कल्याणकांक्षिणा कार्यं कथं विधातव्यम् ? (भला चाहने वाले को काम कैसे करना चाहिए?)
(ख) अन्ते सर्वे मिलित्वा किं कुर्वन्ति? (अन्त में सभी मिलकर क्या करते हैं?)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(क) यः अविचार्य कार्यं करोति सः किं फलं प्राप्नोति?
(जो बिना बिचारे काम करता है, वह क्या फल प्राप्त करता है?)
(ख) कालः कस्य रसं पिबति? (समय किसका रस पीता है?)

प्रश्न 3.
यथानिर्देशम् उत्तरत-(निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(क) ‘कालः पिबति तद्रसम्’ अत्र कर्तृपदम् किम्? (‘कालः पिबति तद्रसम्’ यहाँ कर्तृ पद क्या है?)
(ख) ‘प्रसीदति’ इति क्रियापदस्य विलोमार्थकं पद नाट्यांशात चित्वा लिखत। (‘प्रसीदति क्रिया का विलोम नाट्यांश से लिखिए।)
उत्तराणि :
(1) (क) सुविचार्य। (अच्छी तरह विचार कर)।
(ख) गायन्ति (गाते हैं)।

(2) (क) यः मानवः अविचार्य कार्यं करोति सः विषीदति। (जो बिना विचारे कार्य करता है वह दुख पाता है।)
(ख) आदानस्य प्रदानस्य कर्त्तव्यस्य च कर्मणः क्षिप्रम् अक्रियमाणस्य तद्रस्य कालः पिबति। (लेन-देन करने योग्य कर्म को शीघ्र न करने वाले का रस काल पीता है।)

(3) (क) कालः (समय)।
(ख) विषीदति (दुखी होता है।)

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 11 Constructions Ex 11.1

Jharkhand Board JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 11 Constructions Ex 11.1 Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 9th Maths Solutions Chapter 11 Constructions Ex 11.1

Page-191

Question 1.
Construct an angle of 90° at the initial point of a given ray and justify the construction.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 11 Constructions Ex 11.1 - 1
Answer:
Steps of construction:
Step 1: A ray YZ is drawn.
Step 2: With Y as a centre and any radius, an arc CD is drawn cutting YZ at C.
Step 3: With C as a centre and the same radius, mark a point B on the arc ABC. Step 4: With B as a centre and the same radius, mark a point A on the arc CD. Step 5: With A and B as centres, draw two arcs intersecting each other with the same radius at X.
Step 6: X and Y are joined and a ray YX making an angle 90° with YZ is formed.

Justification for construction:
We constructed ∠BYZ = 60° and also ∠AYB = 60°.
Thus, ∠AYZ = 120°.
Also, bisector of ∠AYB is constructed such that:
∠AYB = ∠XYA + ∠XYB
⇒ ∠XYB = \(\frac{1}{2}\) ∠AYB (∠XYA = ∠XYB as XY bisects ∠AYB)
⇒ ∠XYB = \(\frac{1}{2}\) × 60°
⇒ ∠XYB = 30°
Now,∠XYZ = ∠BYZ + ∠XYB
= 60° + 30° = 90°

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 11 Constructions Ex 11.1

Question 2.
Construct an angle of 45° at the initial point of a given ray and justify the construction.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 11 Constructions Ex 11.1 - 2
Answer:
Steps of construction:
Step 1: A ray OY is drawn.
Step 2: With O as a centre and any radius, an arc AD is drawn cutting OY at A.
Step 3: With A as a centre and the same ‘ radius, mark a point B on the arc AC.
Step 4: With B as a centre and the same radius, mark a point C on the arc AD.
Step 5: With C and B as centres, draw two arcs intersecting each other with the same radius at X.
Step 6: X and O are joined and a ray making an angle 90° with OY is formed.
Step 7: With A and E as centres, two arcs are marked intersecting each other at E and the bisector of ∠XOY is drawn such that ∠EOY = 45°.

Justification for construction:
By construction,
∠XOY = 90°
We constructed the bisector of ∠XOY as ∠EOY.
Thus,
∠EOY = \(\frac{1}{2}\) ∠XOY
ZEOY = \(\frac{1}{2}\) × 90° = 45°

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 11 Constructions Ex 11.1

Question 3.
Construct the angles of the following measurements:
(i) 30° (ii) 22.5° (iii) 15°
Answer:
(i) 30°
Steps of construction:
Step 1 : A ray OY is drawn.
Step 2: With O as a centre and any radius, an arc AC is drawn cutting OY at A.
Step 3: With A as centre and the same radius, mark a point B on arc AC.
Step 4: With A and B as centres, two arcs are marked intersecting each other at X and join OX.
Thus, Z∠XOY is the required angle making 30° with OY.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 11 Constructions Ex 11.1 - 3

(ii) 22.5°
Steps of construction:
Step 1: An angle ∠XOY = 90° is drawn.
Step 2: Bisector of ∠XOY is drawn such that ∠BOY = 45° is constructed.
Step 3: Again, ∠BOY is bisected such that ∠AOY is formed.
Thus, ∠AOY is the required angle making 22.5° with OY.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 11 Constructions Ex 11.1 - 4

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 11 Constructions Ex 11.1

(iii) 15°
Steps of construction:
Step 1: An angle ∠AOY = 60° is drawn.
Step 2: Bisector of ∠AOY is drawn such that ∠BOY = 30° is constructed.
Step 3: With C and D as centres, two arcs are marked intersecting each other at X and the bisector of ∠BOY is drawn.
Thus, ∠XOY is the required angle making 15° with OY.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 11 Constructions Ex 11.1 - 5

Question 4.
Construct the following angles and verify by measuring them by a protractor:
(i) 75° (ii) 105° (iii) 135°
Answer:
(i) 75°
Steps of construction:
Step 1: A ray OY is drawn.
Step 2: An arc BAE is drawn with O as a centre and OE as radius.
Step 3: With E as a centre, and the same radius, mark point A on the arc BAE.
Step 4: With A as centre and the same radius, mark a point C on the arc BAE.
Step 5: With A and C as centres, arcs are made to intersect at X and ∠XOY = 90° is made.
Step 6: With A and F as centres, arcs are made to intersect at D.
Step 7: OD is joined and and ∠DOY = 75° is constructed.
Thus, ∠DOY is the required angle making 75° with OY.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 11 Constructions Ex 11.1 - 6

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 11 Constructions Ex 11.1

(ii) 105°
Steps of construction:
Step 1: A ray OY is drawn.
Step 2: An arc is drawn with O as a centre.
Step 3: With E as a centre and the same radius mark point A on the arc BAE.
Step 4: With A as centre and the same radius, mark a point C on the arc BAE.
Step 5: With A and C as centres, arcs are made to intersect at D and ∠DOY = 90° is made. Join DO to intersect EAC at M.
Step 6: With C and M as centres, arcs are made to intersect at X.
Step 7: OX is joined and and ∠XOY = 105° is constructed.
Thus, ∠XOY is the required angle making 105° with OY.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 11 Constructions Ex 11.1 - 7

(iii) 135°
Steps of construction:
Step 1: A ray OY is drawn.
Step 2: An arc is drawn with O as a centre to intersect OY at E and YO produced to B.
Step 3: With E as a centre and the same radius mark point A on the arc BAE.
Step 4: With A as centre and the same radius, mark a point C on the arc BAE.
Step 5: With A and C as centres, arcs are made to intersect at X and ∠XOY = 90° is made.
Step 6: With M and B as centres, arcs are made to intersect at P or bisector of ∠XOB is constructed.
Step 7: OP is joined and ∠POY = 135° is constructed.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 11 Constructions Ex 11.1 - 8

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 11 Constructions Ex 11.1

Question 5.
Construct an equilateral triangle, given its side and justify the construction.
Ans. Steps of construction:
Step 1: A line segment AB = 4 cm is drawn.
Step 2: With A and B as centres, two arcs DG and EH are made.
Step 3: With D and E as centres, arcs with previous radius are made to cut the previous arcs respectively and forming angle of 60° each.
Step 4: Lines from A and B are extended to meet each other at C.
Thus, ABC is the required triangle formed.
Justification:
By construction,
AB = 4 cm, ∠A = 60° and ∠B = 60° We know that,
∠A + ∠B + ∠C = 180° (Sum of the angles of a triangle)
⇒ 60° + 60° + ∠C = 180°
⇒ 120° + ∠C = 180°
⇒ ∠C = 60°
BC = CA = 4 cm (Sides opposite to equal angles are equal)
AB = BC = CA = 4 cm ∠A = ∠B = ∠C = 60°
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 11 Constructions Ex 11.1 - 9

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6

Jharkhand Board JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6 Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 9th Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6

Page-186

Question 1.
Prove that the line of centres of two intersecting circles subtends equal angles at the two points of intersection.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6 - 1
Answer:
Given: Two intersecting circles, in which OO’ is the line of centres and P and Q are two points of intersection.
To prove: ∠OPO’ = ∠OQO’
Construction: Join PO, QO, PO’ and QO’.
Proof: In APOO’ and AQOO,’
we have PO = QO [Radii of the same circle]
PO’ = QO'[Radii of the same circle]
OO’ = OO’ [Common]
APOO’ = AQOO’ [SSS axiom]
⇒ ∠OPO’ ≅ ∠OQO’ [CPCT]
Hence, the line of centres of two intersecting circles subtends equal angles at the two points of intersection. Proved.

Question 2.
Two chords AB and CD of lengths 5 cm and 11 cm respectively of a circle are parallel to each other and are on opposite sides of its centre. If the distance between AB and CD is 6 cm, find the radius of the circle.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6 - 2
Answer:
Let O be the centre of the circle and let its radius be r cm.
Draw OM ⊥ AB and OL ⊥ CD.
Then, AM = \(\frac{1}{2}\) AB = \(\frac{5}{2}\) cm
[As perpendicular from centre to the chord bisects the chord]
Similarly, CL = \(\frac{1}{2}\) CD = \(\frac{11}{2}\) cm
Now, LM = 6 cm
Let OL = x cm.
Then OM = (6 – x) cm Join OA and OC.
Then OA = OC = r cm.
Now, from right-angled ∆OMA and ∆OLC, we have
OA2 = OM2 + AM2
and OC2 = OL2 + CL2
[By Pythagoras Theorem]
r2 = (6 – x)2 + \(\frac{5}{2}\)2
and r2 = x2 + \(\frac{11}{2}\)2
⇒ (6 – x)2 + \(\frac{5}{2}\)2 = x2 + \(\frac{11}{2}\)2
⇒ 36 +x2 – 12x + \(\frac{25}{4}\) = x2 + \(\frac{121}{4}\)
⇒ -12x = \(\frac{121}{4}\) – \(\frac{25}{4}\) – 36
⇒ -12x = \(\frac{96}{4}\) – 36
⇒ -12x = 24 – 36
⇒ -12x = -12
⇒ x = 1

Substituting x = 1 in (i), we get
r2 = (6 – x)2 + \(\frac{5}{2}\)2
r2 = (6 – 1)2 + \(\frac{5}{2}\)2
⇒ r2 = (5)2 + \(\frac{5}{2}\)2 = 25 + \(\frac{25}{4}\)
⇒ r2 = \(\frac{125}{4}\)
⇒ r = \(\frac{5 \sqrt{5}}{2}\) cm
Hence, radius r = \(\frac{5 \sqrt{5}}{2}\) cm

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6

Question 3.
The lengths of two parallel chords of a circle are 6 cm and 8 cm. If the smaller chord is at distance 4 cm from the centre, what is the distance of the other chord from the centre?
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6 - 3
Answer:
Let PQ and RS be two parallel chord of a circle with centre O.
We have, PQ = 8 cm and RS = 6 cm.
Draw perpendicular bisector OL of RS which meets PQ of M.
Since, PQ || RS, therefore, OM is also perpendicular bisector of PQ.
Also, OL = 4 cm
RL = \(\frac{1}{2}\) RS [As perpendicular from centre to the chord bisects the chord]
= \(\frac{1}{2}\) (6)
= 3 cm
Similarly, PM = \(\frac{1}{2}\) PQ
In ORL, we have
OR2 = RL2 + OL2 [Pythagoras theorem]
⇒ OR2 = 32 + 42 = 9 + 16
⇒ OR2 = 25
⇒ OP = 5 cm
∴ OR = OP [Radii of the circle]
⇒ OP = 5 cm
Now, in ∆OPM
OM2 = OP2 – PM2 [Pythagoras theorem]
⇒ OM2 = 52 – 42 = 25 – 16 = 9
OM = \( \sqrt{9} \) = 3 cm
Hence, the distance of the other chord from the centre is 3 cm.

Question 4.
Let the vertex of an angle ABC be located outside a circle and let the sides of the angle intersect equal chords AD and CE with the circle. Prove that ∠ABC is equal to half the difference of the angles subtended by the chords AC and DE at the centre.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6 - 4
Answer:
Given: Two equal chords AD and CE of a circle with centre O meet at B when produced.
To prove: ∠ABC = \(\frac{1}{2}\) (∠AOC – ∠DOE)
Proof: Let ∠AOC = x, ∠DOE = y, and ∠AOD = ∠EOC = z [Equal chords subtends equal angles at the centre]
∴ x + y + 2z = 360° …(i)
OA = OD ⇒ ∠OAD = ∠ODA
[Angles opposite to equal sides]
∴ In ∆OAD, we have
∠OAD + ∠ODA + z = 180°
⇒ 2 ∠OAD = 180° – z [.’. ∠OAD = ∠ODA]
⇒ ∠OAD = 90° – \(\frac{z}{2}\) …(ii)
Similarly, ∠OCE = 90° – – …(iii)
⇒ ∠ODB = ∠OAD + ∠AOD
[Exterior angle property]
⇒ ∠ODB = 90° – \(\frac{z}{2}\) + z [From (ii)]
⇒ ∠ODB = 90° + \(\frac{z}{2}\) …(iv)
Also, ∠OEB = ∠OCE + ∠COE
[Exterior angle property]
⇒ ∠OEB = 90° – \(\frac{z}{2}\) + z [From (iii)]
⇒ ∠OEB = 90° + \(\frac{z}{2}\) …(v)
In ∆DOE,
OD = OE [Radii of the circle]
⇒ ∠ODE = ∠OED [Angles oposite to equal sides are equal]
Also,
∠ODE + ∠OED + ∠DOE = 180°
[Angle sum property]
⇒ ∠ODE + ∠OED + y = 180°
⇒ 2∠ODE = 180° – y
⇒ ∠ODE = 90° – \(\frac{y}{2}\)
⇒ ∠ODE = ∠OED = 90° – \(\frac{y}{2}\) …(vi)
Now, ∠BED = ∠BEO – ∠OED
= 90 + \(\frac{z}{2}\) – 90 + \(\frac{y}{2}\) [From (v) and (vi)]
= \(\frac{1}{2}\)(y + z)
Also, ∠BDE = ∠BDO – ∠ODE
= 90 + \(\frac{z}{2}\) – 90° + \(\frac{y}{2}\) [From (iv) and (vi)]
= \(\frac{1}{2}\)(y + z)

In ∆BDE,
∠BDE + ∠BED + ∠B = 180°
[Angle sum property]
=> \(\frac{1}{2}\) (y+ z) + \(\frac{1}{2}\) (y + z) + ∠ABC = 180°
⇒ y + z + ∠ABC = 180°
⇒ ∠ABC = 180 – y – z …(vii)
Consider,
\(\frac{1}{2}\)(∠AOC – ∠DOE) = \(\frac{1}{2}\)(x – y)
= \(\frac{1}{2}\)[360° – y – 2z – y] From (i)
= 180° – (y + z) …(viii)
From (vii) and (viii)
∠ABC = \(\frac{1}{2}\) (∠AOC – ∠DOE)

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6

Question 5.
Prove that the circle drawn with any side of a rhombus as diameter, passes through the point of intersection of its diagonals.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6 - 5
Answer:
Given: A rhombus ABCD whose diagonals intersect each other at O.
To prove: A circle with AB as diameter passes through O.
Proof: ∠AOB = 90°
[Diagonals of a rhombus bisect each other at 90°]
⇒ ∆AOB is a right triangle right angled at O.
⇒ AB is the hypotenuse of right ∆AOB.
⇒ If we draw a circle with AB as diameter, then it will pass through O because angle in semicircle is 90° and ∠AOB = 90°.

Question 6.
ABCD is a parallelogram. The circle through A, B and C intersect CD (produced if necessary) at E. Prove that AE = AD.
Answer:
Given: ABCD is a parallelogram.
To Prove: AE = AD.
Construction: Draw a circle which passes through ABC and intersect CD produced E.
Proof: As ABCD is a parallelogram,
∠B = ∠ADC …(i)
[Opposite angles of parallelogram]
Also, ∠ADC + ∠ADE = 180°
[Linear Pair]
⇒ ∠B + ∠ADE = 180° …(ii) [From (i)]
Also, ∠B + ∠E = 180° …(iii) [Opposite angles of cyclic quadrilateral]
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6 - 6
From (ii), (iii)
∠B = 180° – ∠ADE = 180° – ∠E
⇒ 180° – ∠ADE = 180° – ∠E
⇒ ∠ADE = ∠E
In ∆ADE, AD = AE [Sides opposite to equal angles]
Similarly, we can prove for fig. (ii).

Question 7.
AC and BD are chords of a circle which bisect each other. Prove that (i) AC and BD are diameters, (ii) ABCD is rectangle.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6 - 7
Answer:
Given: A circle with chords AC and BD which bisect each other at O.
To Prove: (i) AC and BD are diameters (ii) ABCD is a rectangle.
Proof: In ∆OAB and ∆OCD, we have
OA = OC [Given]
OB = OD [Given]
∠AOB = ∠COD
[Vertically opposite angles]
∠∆AOB = ∆COD [SAS congruence]
∠ABO = ∠CDO [CPCT]
and angles ∠ABO, ∠CDO are alternate interior angles
∴ AB || DC …(i)
Similarly, we can prove BC || AD …(ii)
Hence, ABCD is a parallelogram.
[As opposite sides are parallel]
⇒ ∠A = ∠C [Opposite angles of parallelogram]
and ∠B = ∠D
Also, as ABCD is cyclic
⇒ ∠A + ∠C = 180°
[Opposite angles of cyclic quadrilateral]
⇒ ∠A + ∠A = 180°
⇒ 2∠A = 180°
⇒ ∠A = 90°
So, ABCD is a parallelogram in which one angle is 90°
⇒ ABCD is a rectangle
⇒ ∠ABC = 90° and ∠BCD = 90°.
⇒ AC and BD are diameters.

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6

Question 8.
Bisectors of angles A, B and C of a triangle ABC intersect its circumcircle at D, E and F respectively. Prove that the angles of the triangle DEF are
90° – \(\frac{1}{2}\) A, 90° – \(\frac{1}{2}\) B and 90° – \(\frac{1}{2}\) C.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6 - 8
Answer:
Given: AABC and its circumcircle. AD, BE, CF are bisectors of ∠A, ∠B, ∠C respectively.
Construction: Join DE, EF and FD.
Proof: We know that angles in the same segment are equal.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6 - 9

Page-187

Question 9.
Two congruent circles intersect each other at points A and B. Through A any line segment PAQ is drawn so that P, Q lie on the two circles. Prove that BP = BQ.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6 - 10
Answer:
Given: Two congruent circles which intersect at A and B. PAQ is a line through A.
To Prove: BP = BQ.
Construction: Join AB.
Proof: AB is a common chord of both the circles.
As the circles are congruent,
arc ADB = arc AEB
⇒ ∠APB = ∠AQB [Angles subtended by equal arcs]
So, in APBQ, BP = BQ [Sides opposite to equal angles are equal]

Question 10.
If any triangle ABC, if the angle bisector of ∠A and perpendicular bisector of BC intersect, prove that they intersect on the circumcircle of the triangle ABC.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6 - 11
Answer:
(i) Let bisector of ∠A meet the circumcircle of ∆ABC at M.
Join BM and CM.
∴ ∠MBC = ∠MAC [Angles in same segment]
and ∠BCM = ∠BAM [Angles in the same segment]
But ∠BAM = ∠CAM [∴ AM is bisector of ∠A]
∴ ∠MBC = ∠BCM So, MB = MC [Sides opposite to equal angles are equal].
⇒ M lies on the perpendicular bisector of BC
Hence, angle bisector of ∠A and perpendicular bisector of BC intersect on the circumcircle of ∆ABC.

(ii) Let M be a point on the perpendicular bisector of BC which lie on circumcircle of ∆ABC
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 10 Circles Ex 10.6 - 12
Join AM,
∴ M lies on perpendicular bisector of BC.
∴ BM = CM
∠MBC = ∠MCB [Angle opposite to equal sides are equal]
But ∠MBC = ∠MAC [Angles in the same segment]
and ∠MCB = ∠BAM [Angles in the same segment]
So, from (i)
∠BAM = ∠CAM AM is bisector of ∠A
⇒ bisector of ∠A and perpendicular bisector of BC intersect at M which lies on circumcircle of ∆ABC.

JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 8 Quadrilaterals

Jharkhand Board JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 8 Quadrilaterals Important Questions and Answers.

JAC Board Class 9th Maths Important Questions Chapter 8 Quadrilaterals

Question 1.
ABCD is a trapezium in which AB || DC. M and N are the mid-points of AD and BC respectively. If AB = 12 cm and MN = 14 cm, find CD.
JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 8 Quadrilaterals - 1
Solution :
Here, ABCD is a trapezium in which, AB || DC and M and N are mid-points of AD and BC respectively. Since the line segment joining the midpoints of non-parallel sides of trapezium is half of the sum of the lengths of its parallel sides
⇒ MN = \(\frac {1}{2}\)(AB + CD)
⇒ 14 = \(\frac {1}{2}\)(12 + CD)
⇒ 28 = 12 + CD
⇒ CD = 28 – 12 = 16 cm

JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 8 Quadrilaterals

Question 2.
Use the informations given in figure below to calculate the value of x.
JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 8 Quadrilaterals - 2
Solution :
Since, EB is a straight line.
∴ ∠DAE + ∠DAB = 180°
⇒ 73° + ∠DAB = 180°
i.e., ∠DAB = 180° – 73° = 107°
∴ ∠DAB + ∠ABC + ∠BCD + ∠CDA = 360°
Since the sum of the angles of quadrilateral ABCD is 360°
∴ 107° + 105° + x + 80° = 360°
⇒ 292° + x = 360°
⇒ x = 360° – 292° = 68°

Question 3.
ABCD is a rhombus and AB is produced to E and F such that AE = AB = BF. Prove that EG and FG are perpendicular to each other.
JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 8 Quadrilaterals - 3
Solution :
Given: ABCD is a rhombus. AB produced to E and F such that AE = AB = BF
Construction: Join ED and CF and produce it to meet at G.
To prove: ED ⊥ FC
Proof: AB is produced to points E and F such that AE = AB = BF …(i)
Also, since ABCD is a rhombus
AB = CD = BC = AD ……..(ii)
Now, in ΔBCF, BC = BF [From (i) and (ii)]
⇒ ∠1 = ∠2
∠3 = ∠1 + ∠2 [Exterior angle]
∠3 = 2∠2 ……..(iii)
Similarly, AE = AD
∠5 = ∠6 …(iv)
⇒ ∠4 = ∠5 + ∠6 = 2∠5
Adding (iii) and (iv) we get
∠4 + ∠3 = 2∠5 +2∠2
⇒ 180° = 2(∠5 + ∠2) [∵ ∠4 and ∠3 are consecutive interior angles]
⇒ ∠5 + ∠2 = 90°
∴ Now in ΔEGF
∠5 + ∠2 + ∠EGF = 180°
⇒ ED ⊥ FC
⇒ ∠EGF = 90° Hence Proved.

JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 8 Quadrilaterals

Question 4.
In the given figure, E and F are respectively, the mid-points of nonparallel sides of a trapezium ABCD. Prove that
(i) EF || AB
(ii) EF = \(\frac {1}{2}\)(AB + DC).
JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 8 Quadrilaterals - 4
Solution :
Join BE and produce it to intersect CD produced at point P. In ΔAEB and ΔDEP, AB || PC and BP is transversal
⇒ ∠ABE – ∠DPE (Alternate interior angles)
∠AEB = ∠DEP (Vertically opposite angles)
And AE = DE (E is mid-point of AD)
⇒ ΔAEB ≅ ΔDEP (By AAS)
⇒ BE = PE [By CPCT]
And AB = DP [By CPCT]
Since the line segment joining the midpoints of any two sides of a triangle is parallel and half of the third side, therefore, in ΔBPC E is mid-point of BP [As, BE = PE]
and F is mid-point of BC [Given]
⇒ EF || PC and EF = \(\frac {1}{2}\)PC
⇒ EF || DC and EF = \(\frac {1}{2}\)(PD + DC)
⇒ EF || AB and EF = \(\frac {1}{2}\)(AB + DC) (As, DC || AB and PD = AB)
Hence, proved.

Multiple Choice Questions

Question 1.
In a parallelogram ABCD, ∠D = 105°, then the ∠A and ∠B will be :
(a) 105°, 75°
(b) 75°, 105°
(c) 105°, 105°
(d) 75°, 75°
Solution :
(b) 75°, 105°

JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 8 Quadrilaterals

Question 2.
In a parallelogram, ABCD diagonals AC and BD intersect at O and AC = 12.8 cm and BD = 7.6 cm, then the measures of OC and OD respectively equal to :
(a) 1.9 cm, 6.4 cm
(b) 3.8 cm, 3.2 cm
(c) 3.8 cm, 3.2 cm
(d) 6.4 cm, 3.8 cm
Solution :
(d) 6.4 cm, 3.8 cm

Question 3.
Two opposite angles of a parallelogram are (3x – 2)° and (50 – x)° then the value of x will be :
(a) 17°
(b) 16°
(c) 15°
(d) 13°
Solution :
(d) 13°

Question 4.
When the diagonals of a parallelogram are perpendicular to each other then it is called a :
(a) Square
(b) Rectangle
(c) Rhombus
(d) Trapezium
Solution :
(c) Rhombus

JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 8 Quadrilaterals

Question 5.
In a parallelogram ABCD, E is the midpoint of side BC. If DE and AB when produced meet at F then: (a) AF = \(\frac {1}{2}\)AB
(b) AF = 2AB
(c) AF = 4AB
(d) Data Insufficient
Solution :
(b) AF = 2AB

Question 6.
ABCD is a rhombus with ∠ABC = 56°, then the ∠ACD will be:
(a) 56°
(b) 62°
(c) 124°
(d) 34°
Solution :
(b) 62°

Question 7.
In a triangle, P, Q and R are the midpoints of the sides BC, CA and AB respectively. If AC = 16 cm, BC = 20 cm and AB = 24 cm then the perimeter of the quadrilateral ARPQ will be:
(a) 60 cm
(b) 30 cm
(c) 40 cm
(d) None of these
Solution :
(c) 40 cm

JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 8 Quadrilaterals

Question 8.
LMNO is a trapezium with LM || NO. If P and Q are the mid-points of LO and MN respectively and LM = 5 cm and ON = 10 cm then PQ =
(a) 2.5 m
(b) 5 cm
(c) 7.5 cm
(d) 15 cm
Solution :
(c) 7.5 cm

Question 9.
In an isosceles trapezium ABCD if ∠A = 45° then ∠C will be:
(a) 90°
(b) 135°
(c) 125°
(d) None of these
Solution :
(b) 135°

Question 10.
In a right-angle triangle ABC is right-angled at B. Given that AB = 9 cm, AC = 15 cm and D, E are the mid-points of the sides AB and AC respectively, then the area of ΔADE =
(a) 67.5 cm2
(b) 13.5 cm2
(c) 27 cm2
(d) Data insufficient
Solution :
(b) 13.5 cm2

JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 8 Quadrilaterals

Question 11.
When the opposite sides of quadrilateral are parallel to each other then it is called a:
(a) Square
(b) Parallelogram
(c) Trapezium
(d) Rhombus
Solution :
(b) Parallelogram

Question 12.
In the given figure, AP and BP are angle bisectors of ∠A and ∠B which meet at P in the parallelogram ABCD. Then 2∠APB =
JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 8 Quadrilaterals - 5
(a) ∠A + ∠B
(b) ∠A + ∠C
(c) ∠B + ∠D
(d) 2∠C + ∠B
Solution :
(a) ∠A + ∠B

Question 13.
In a quadrilateral ABCD, AO and DO are angle bisectors of ∠A and ∠D and given that ∠C = 105°, ∠B = 70° then the ∠AOD is :
(a) 67.5°
(b) 77.5°
(c) 87.5°
(d) 99.75°
Solution :
(c) 87.5°

JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 8 Quadrilaterals

Question 14.
In a parallelogram the sum of the angle bisectors of two adjacent angles is :
(a) 30°
(b) 45°
(c) 60°
(d) 90°
Solution :
(d) 90°

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4

Jharkhand Board JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4 Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 9th Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4

Page-164

Question 1.
Parallelogram ABCD and rectangle ABEF are on the same base AB and have equal areas. Show that the perimeter of the parallelogram is greater than that of the rectangle.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4 - 1
Answer:
In ∆AFD,
∠F = 90° [Each angle of a rectangle is equal to 90°]
∠F + ∠A + ∠D = 180°
(Angle sum property)
⇒ 90° + ∠A + ∠D = 180°
⇒ ∠A + ∠D = 180° – 90° = 90°
⇒ ∠D < 90° ( v ∠F = 90°)
⇒ ∠D < ∠F
⇒ AF < AD [Since side opposite to larger angle is longer] Adding AB to both the sides AD + AB > AF + AB
Multiplying by 2
2 [AD + AB] > 2 [AF + AB]
⇒ Perimeter of the parallelogram ABCD > Perimeter of the Rectangle ABEF.

Question 2.
In Figure, D and E are two points on BC such that BD = DE = EC. Show that ar (ABD) = ar (ADE) = ar (AEC).
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4 - 2
Answer:
In ∆ABE, AD is median [∵ BD = DE]
So, ar (ABD) = ar (AED) ………..(i)
[∵ Median of a triangle divides it into two parts of equal areas.]
Similarly,
In ∆ADC, AE is median [∵ DE = EC]
So, ar (ADE) = ar (AEC) ………..(ii)
From equations (i) and (ii), we get
ar (ABD) = ar (ADE) = ar (AEC)

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4

Page-165

Question 3.
In figure, ABCD, DCFE and ABFE are parallelograms. Show that ar (ADE) = ar (BCF).
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4 - 3
Answer:
In ∆ADE and ∆BCF,
AD = BC [∵ Opposite sides of parallelogram ABCD]
DE = CF [∵ Opposite sides of parallelogram DCFE]
AE = BF [∵ Opposite sides of parallelogram ABFE]
So, ∆ADE ≅ ∆BCF [∵ SSS Congruence theorem]
∴ ar (ADE) = ar (BCF) [∵ Congruent triangles have equal areas]

Question 4.
In Fig, ABCD is a parallelogram and BC is produced to a point Q such that AD = CQ. If AQ intersect DC at P, show that ar (BPC) = ar (DPQ).
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4 - 4
Answer:
In ∆ADP and ∆QCP,
∠APD = ∠QPC [∵ Vertically Opposite Angles]
∠ADP = ∠QCP [∵ Alternate angles]
AD = CQ [∵ Given]
So, ∆APD ≅ ∆CPQ [∵ AAS Congruence theorem]
So, DP = CP [∵ CPCT]
In ∆CDQ, QP is median. [∵ DP = CP]
So, ar (DPQ) = ar (QPC) …(i)
[∵ Median of a triangle divides it into two parts of equal areas.]
Similarly,
In ∆PBQ, PC is median.
[∵ AD = CQ and AD = BC ⇒ BC = QC]
So, ar (QPC) = ar (BPC) …(ii)
From equations (i) and (ii), we get
ar (BPC) = ar (DPQ)

Question 5.
In Figure, ABC and BDE are two equilateral triangles such that D is the mid-point of BC. If AE intersects BC at F, show that
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4 - 5
(i) ar (BDE) = \(\frac{1}{4}\) ar (ABC)
(ii) ar (BDE) = \(\frac{1}{2}\) ar (BAE)
(iii) ar (ABC) = 2 ar (BEC)
(iv) ar (BFE) = ar (AFD)
(v) ar (BFE) = 2 ar (FED)
(vi) ar (FED) = \(\frac{1}{8}\) ar (AFC)
[Hint: Join EC and AD. Show that BE 11 AC and DE|| AB, etc.]
Answer:
(i) Construction: Join EC and AD
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4 - 6
Let, BC = x
So, ar(∆ABC) = \(\frac{\sqrt{3}}{4}\) x2
[∵ Area of a equilateral triangle = \(\frac{\sqrt{3}}{4}\) (Side)2
and ar (∆BDE) = \(\frac{\sqrt{3}}{4}\left(\frac{x}{2}\right)^2\)
[∵ D is the mid-point of BC]
= \(\frac{1}{4}\) [\(\frac{\sqrt{3}}{4}\) x2] = \(\frac{1}{4}\) [ar(AABC)]

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4

(ii) In ∆BEC, ED is median
[∵ D is the mid-point of BC]
So, ar (BDE) = \(\frac{1}{2}\) ar (∆BEC) …(i)
[∵ Median of a triangle divides it into two parts of equal areas.]
∠EBC = 60° and ∠BCA = 60°
[∵ Angles of equilateral triangle]
So, ∠AEBC = ∠BCA
Since, alternate angles (∠EBC = ∠BCA) are equal, so BE || AC
Triangles BEC and BAE are on the same base BE and between same parallels BE || AC
So, ar (∆BEC) = ar (∆BAE) …(ii)
[∵ Triangles on the same base and between same parallels are equal in area]
From equation (i) and (ii), we get
So, ar (∆BDE) = \(\frac{1}{2}\) ar (∆BAE)

(iii) In ∆BEC, ED is median
[∵ D is the mid-point of BC]
So, ar (∆BDE) = \(\frac{1}{2}\) ar (∆BEC) …(iii)
[∵ Median of a triangle divides it into two parts of equal areas.]
ar (∆BDE) = \(\frac{1}{2}\) ar (∆ABC) ………..(iv)
[∵ Proved in (i)]
From the equations (iii) and (iv), we get
ar (∆ABC)= 4 ar (∆BDE) = 4 (\(\frac{1}{2}\)) ar(∆BEC) = 2 ar (∆BEC)

(iv) ∠ABD = 60° and ∠BDE = 60°
[∵ Angles of equilateral triangle]
So, ∠ABD = ∠BDE
Since, alternate angles (∠ABD = ∠BDE) are equal, so BA || ED Triangles BDE and AED are on the same base ED and between same parallels BA || ED.
So, ar (∆BDE) = ar (∆AED)
[∵ Triangles on the same base and betwee same parallels are equal in area]
Subtracting ar (∆FED) from both the sides
ar (∆BDE) – ar (∆FED) = ar (∆AED) – ar (∆FED)
⇒ ar (∆BEF) = ar (∆AFD)

(v) ΔADF is also right angled at D. [As in equilateral triangle, median and altitude are same]
⇒ AB2 = AD2 + BD2
⇒ AD2 = AB2 – BD2
Let AB = a and hence BD = \(\frac{a}{2}\)
(as AD is the median)
⇒ AD = \(\frac{\sqrt{3}a}{2}\)
In ΔFED,
EF2 = DE2 – DF2 = (\(\frac{a}{2}\))2 – (\(\frac{a}{4}\))2
= \(\frac{a^{2}}{4}\) – \(\frac{a^{2}}{10}\) = \(\frac{3a^{2}}{16}\)
⇒ EF = \(\frac{\sqrt{3}a}{2}\)
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4 - 7

(vi) ar (ΔBDE) = \(\frac{1}{4}\) ar (ΔABC) [∵ From Part (i)]
⇒ ar (ΔBEF) + ar (ΔFED) = \(\frac{1}{4}\) ar (ΔABC)
⇒ ar (ΔBEF) + ar (ΔFED) = \(\frac{1}{4}\) [2 ar (ΔADC)]
[∵ ar (ΔABC) = 2 ar (ΔADC)]
⇒ 2 ar (ΔFED) + ar (ΔFED) = \(\frac{1}{2}\) ar (ΔADC) [∵ From Part (v)]
⇒ 3 ar (ΔFED) = \(\frac{1}{2}\) [ar (ΔAFC) – ar (ΔAFD)]
⇒ 3 ar (ΔFED) = \(\frac{1}{2}\) [ar (ΔAFC) – 2ar (ΔFED)] [∵ From Part (vii)]
⇒ 3 ar (ΔFED) = \(\frac{1}{2}\) ar (ΔAFC) – \(\frac{1}{2}\) × 2ar (ΔFED)
⇒ 3 ar (ΔFED) = \(\frac{1}{2}\) ar (ΔAFC) – ar (ΔFED)
⇒ 4 ar (ΔFED) = \(\frac{1}{2}\) ar (ΔAFC)
⇒ ar (ΔFED) = \(\frac{1}{8}\) ar (ΔAFC)

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4

Question 6.
Diagonals AC and BD of a quadrilateral ABCD intersect each other at P. Show that ar (APB) × ar (CPD) = ar (APD) × ar (BPC).
[Hint: From A and C, draw perpendiculars to BD]
Answer:
Construction: From A and C, draw perpendiculars AM and CN to BD.
ar (ΔAPB) × ar (ΔCPD) = \(\frac{1}{2}\) × BP × AM × \(\frac{1}{2}\) × PD × CN …(i)
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4 - 8
ar (ΔAPD) × ar (ΔBPC) = \(\frac{1}{2}\) × PD × AM × \(\frac{1}{2}\) × BP × CN …(ii)
From (i) and (ii), we get
ar (ΔAPB) × ar (ΔCPD) = ar (ΔAPD) × ar (ΔBPC)

Question 7.
P and Q are respectively the mid-points of sides AB and BC of a triangle ABC and R is the mid-point of AP, show that
(i) ar (PRQ) = \(\frac{1}{2}\) ar (ARC)
(ii) ar (RQC) = \(\frac{3}{8}\) ar (ABC)
(iii) ar (PBQ) = ar (ARC)
Answer:
Construction: Join AQ, PC, RC and RQ.
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4 - 9
(i) In ΔAPQ, QR is median [∵ Given]
So, ar (ΔPQR) = \(\frac{1}{2}\) ar (ΔAPQ) …(i)
[∵ Median of a triangle divides it into two parts of equal areas.]
Similarly,
In ΔAQB, QP is median [∵ Given]
[∵ So, ar (ΔAPQ) = \(\frac{1}{2}\) ar (ΔABQ) ……(ii)
and in ΔABC, AQ is median [∵ Given]
So, ar (ΔABQ) = \(\frac{1}{2}\) ar (ΔABC) ……..(iii)
Form (i), (ii) and (iii), we get
ar (ΔPQR) = \(\frac{1}{2}\) ar (ΔAPQ)
= \(\frac{1}{2}\)[\(\frac{1}{2}\) ar(ΔABQ)]
= \(\frac{1}{4}\)[\(\frac{1}{2}\)ar(ΔABC)]
= \(\frac{1}{8}\) ar (ABC) ………(iv)
In ΔAPC, CR is median. [∵ Given]
So, ar (ΔARC) = \(\frac{1}{2}\) ar (APC) ……(v)
[∵ Median of a triangle divides it into two parts of equal areas.]
Similarly,
In ΔABC, CP is median [∵ Given]
So, ar (ΔAPC) = \(\frac{1}{2}\) ar (ΔABC) ……..(vi)
Form (v) and (vi), we get
ar (ΔARC) = \(\frac{1}{2}\) ar (ΔAPC)
= \(\frac{1}{2}\)[\(\frac{1}{2}\) ar(ΔABC)]
= \(\frac{1}{2}\)[\(\frac{1}{2}\) ar(ΔABC)]
= \(\frac{1}{4}\) ar(ΔABC) ……..(vii)
Form (iv) and (vii), we get
ar (ΔPQR) = \(\frac{1}{8}\) ar (ΔABC)
= \(\frac{1}{2}\)[\(\frac{1}{4}\) ar(ΔABC)]
= \(\frac{1}{2}\)[\(\frac{1}{2}\) ar(ΔABC)]
= \(\frac{1}{8}\) ar(ΔARC)

(ii) ar (∆RQC) = = ar (∆RQA) + ar (∆AQC) – ar (∆ARC) ……(viii)
In ∆PQA, QR is median [∵ Given]
So, ar (RQA) = \(\frac{1}{2}\) ar (PQA) …(ix)
In ∆AQB, PQ is median. [∵ Given]
So, ar (PQA) = \(\frac{1}{2}\) ar (AQB) …….(x)
In ABC, AQ is median [∵ Given]
So, ar (∆AQB) = \(\frac{1}{2}\) ar (∆ABC) …(xi)
From (ix), (x) and (xi), we get
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4 - 10

(iii) In ΔABQ, PQ is median [∵ Given]
So, ar (ΔPBQ) = \(\frac{1}{2}\) ar (ΔABQ) ……..(xvii)
In ΔABC, AQ is median
So, ar (ΔABQ) = \(\frac{1}{2}\) ar (ΔABC) ……..(xviii)
Form (xvi), (xvii) and (xviii), we get
ar (ΔARC) = \(\frac{1}{4}\) ar (ΔABC)
= \(\frac{1}{4}\)[2 ar(ΔABQ)]
= \(\frac{1}{2}\) (2) ar(ΔPBQ)
= ar(ΔPBQ)

Question 8.
In the figure, ABC is a right triangle right angled at A. BCED, ACFG and ABMN are squares on the sides BC, CA and AB respectively. Line segment AX ⊥ DE meets BC at Y. Show that:
JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4 - 11
(i) ∆MBC ≅ ∆ABD
(ii) ar (BYXD) = 2 ar (MBC)
(iii) ar (BYXD) = ar (ABMN)
(iv) ∆FCB ≅ ∆ACE
(v) ar (CYXE) = 2 ar (FCB)
(vi) ar (CYXE) = ar (ACFG)
(vii) ar (BCED) = ar (ABMN) + ar (ACFG)
Answer:
(i) In ∆MBC and ∆ABD,
BC = BD [ v Sides of square]
∠MBC = ∠ABD = 90° + ∠ABC
MB = AB [∵ Sides of square]
So, ∆MBC ≅ ∆ABD
[∵ SAS Congurence theorem]

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4

(ii) YX || BD
[Opposite sides of square are parallel]
Triangle ABD and parallelogram BYXD are on the same base BD and lie between the same parallels AX j | BD.
So, ar (AABD) = \(\frac{1}{2}\) ar (BYXD) …(i)
[∵ If a parallelogram and a triangle are on the same base and between the same parallels, then area of the triangle is half the area of the parallelogram.]
But, ∆MBC ≅ ∆ABD
[∵ Proved above]
So, ar (MBC) = ar (ABD) …(ii)
From (i) and (ii), we get
ar (∆MBC) = ar (∆ABD)
= \(\frac{1}{2}\) ar (BYXD) …(iii)
⇒ 2 ar (MBC) = ar (BYXD)

(iii) MB || NA (Opposite sides of square are parallel)
Triangle MBC and square ABMN are on the same base MB and lie between the same parallels MB || NC.
So, ar (∆MBC) = \(\frac{1}{2}\) ar (ABMN)…(iv)
[∵ If a parallelogram and a triangle are on the same base and between the same parallels, then area of the triangle is half the area of the parallelogram.]
From (iii) and (iv), we get
ar (BYXD) = 2 ar (MBC) = ar (ABMN)

(iv) In ∆ACE and ∆BCF,
CE = BC [∵ Sides of square]
∠ACE = ∠BCF = 90° + ∠ACB
AC = CF [∵ Sides of square]
So, ΔACE ≅ ΔBCF
[∵ SAS Congruence rule]

(v) EC || XY (Opposite sides of square are parallel)
Triangle ACE and square CYXE are on the same base CE and lie between same parallels CE || AX.
So, ar (ACE) = \(\frac{1}{2}\) ar (CYXE)
[∵ If a parallelogram and a triangle are on the same base and between the same parallels, then area of the triangle is half the area of the parallelogram.]
⇒ ar (AFCB) = \(\frac{1}{2}\) ar (CYXE) …(v)
[As ΔACE ≅ ΔBCF ⇒ ar (FCB) = ar (AACE)]
⇒ 2 ar (AFCB) = ar (CYXE)

JAC Class 9 Maths Solutions Chapter 9 Areas of Parallelograms and Triangles Ex 9.4

(vi) CF || AG (Opposite sides of square are parallel)
Triangle BCF and square ACFG are on the same base CF and lie between same parallels CF || FG.
So, ar (ABCF) = \(\frac{1}{2}\) ar (ACFG) …(vi)
[∵ If a parallelogram and a triangle are on the same base and between the same parallels, then area of the triangle is half the area of the parallelogram.]
From (v) and (vi), we get
⇒ ac (CYXE) = 2ar (FCB)
= 2 (\(\frac{1}{2}\))ar (ACFG) = ar (ACFG)

(vii) From part (iii) and (vi), we get
ar (BYXD) = ar (ABMN)
and ar (CYXE) = ar (ACFG)
Adding both, we get
ar (BYXD) + ar (CYXE) = ar (ABMN) + ar (ACFG)
⇒ ar (BCED) = ar (ABMN)+ ar (ACFG)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः

Jharkhand Board JAC Class 9 Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 9th Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः

JAC Class 9th Sanskrit भारतीवसन्तगीतिः Textbook Questions and Answers

1. एकपदेन उत्तरं लिखत-(एक शब्द में उत्तर दीजिये-)
(क) कविः कां सम्बोधयति? (कवि किसको संबोधित करता है?)
उत्तरम् :
वाणीम् (वाणी को)।

(ख) कविः वाणीं कां वादयितुं प्रार्थयति? (कवि वाणी से क्या बजाने की प्रार्थना करता है?)
उत्तरम् :
वीणाम्। (वीणा को)

(ग) कीदृशीं वीणां निनादयितुं प्रार्थयति? (कैसी वीणा बजाने की प्रार्थना करता है?)
उत्तरम् :
नवीनाम् (नई वीणा को)।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः

(घ) गीति कथं गातुं कथयति? (कैसा गीत गाने के लिए कहता है?)
उत्तरम् :
नीतिलीनाम् (नीति से पूर्ण)।

(ङ) सरसाः रसालाः कदा लसन्ति? (रसीले आम कब शोभा देते हैं ?)
उत्तरम् :
वसन्ते (वसन्तु ऋतु में)।

2. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत-(पूरे वाक्य में उत्तर दीजिये-)
(क) कविः वाणी किं कथयति? (कवि वाणी को क्या कहता है?)
उत्तरम् :
कविः वाणी नवीनां वीणां निनादयितुं कथयति। (कवि वाणी को नई वीणा बजाने के लिए कहता है।)

(ख) वसन्ते किं भवति? (वसन्त ऋतु में क्या होता है?)
उत्तरम् :
वसन्ते मधुर-मञ्जरी-भूतमालाः सरसा:-रसालाः लसन्ति। (वसन्त में मधुर मंजरियों से पीले वर्ण से युक्त रसीले आमों के वृक्ष शोभा देते हैं।)

(ग) सलिलं तव वीणामाकर्ण्य कथम् उच्चलेत्? (पानी तुम्हारी वीणा को सुनकर कैसे उछलता है?)
उत्तरम् :
तव वीणामाकर्ण्य सलीलं जलमुच्चलेत्। (तुम्हारी वीणा को सुनकर पानी खेल ही खेल में उछलता है।)

(घ) कविः भगवतीं भारती कस्याः तीरे मधुमाधवीनां नतां पंक्तिम् अवलोक्य वीणां वादयितुं कथयति? (कवि भगवती भारती (सरस्वती) से किस नदी के तट पर (कहाँ) मधुमाधवी की झुकी हुई पंक्तियों को देखकर वीणा को बजाने के लिए कहता है?)
उत्तरम् :
कविः भगवर्ती भारती कलिन्दात्मजायाः सवानीरतीरे मधुमाधवीनां नतां पंक्तिम् अवलोक्य वीणां वादयितुं कथयति। (कवि भगवती भारती (सरस्वती) से यमुना नदी के बेंत की लताओं से युक्त तट पर मधुर मालती की झुकी हुई पंक्तियों को देखकर वीणा बजाने के लिए कहता है।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः

3. ‘क’ स्तम्भे पदानि ‘ख’ स्तम्भे तेषां पर्यायपदानि दत्तानि। तानि चित्वा पदानां समक्षे लिखत –
(‘क’ स्तम्भ के पदों के पर्यायपद ‘ख’ स्तम्भ में दिये गये हैं, उनमें से सही पद चुनकर उनके समक्ष लिखिए-)

‘क’ स्तम्भः‘ख’ स्तम्भः
(क) सरस्वती1. तीरे
(ख) आम्रम्2. अलीनाम्
(ग) पवनः3. समीरः
(घ) तटे4. वाणी
(ङ) भ्रमराणाम्5. रसालः

उत्तरम् :

‘क’ स्तम्भः‘ख’ स्तम्भः
(क) सरस्वती4. वाणी
(ख) आम्रम्5. रसालः
(ग) पवनः3. समीरः
(घ) तटे1. तीरे
(ङ) भ्रमराणाम्2. अलीनाम्

4. अधोलिखितानि पदानि प्रयुज्य संस्कृतभाषया वाक्यरचनां कुरुत –
(निम्नलिखित पदों का प्रयोग करते हुए संस्कृत-भाषा में वाक्य-रचना कीजिए)
(क) निनादय
(ख) मन्दमन्दम्
(ग) मारुतः
(घ) सलिलम्
(ङ) सुमनः
उत्तरम् :
वाक्यरचना –
(क) निनादय – अये वाणि! नवीनां वीणां निनादय। (हे सरस्वती! नवीन वीणा को बजाओ।)
(ख) मन्दमन्दम् – कलिन्दात्मजायाः सवानीरतीरे समीरः मन्दमन्दं वहति। (यमुना नदी के बेंत की लताओं से युक्त तट पर हवा धीरे-धीरे चलती है।)
(ग) मारुतः – सायंकाले मारुतः मन्द-मन्दं वहति। (सायंकाल हवा धीरे-धीरे चलती है।)
(घ) सलिलम् – अये वाणि! तव नवीनां वीणाम् आकर्ण्य नदीनां कान्तसलिलं सलीलम् उच्छलेत्। (हे सरस्वती ! तुम्हारी नवीन वीणा को सुनकर नदियों का सुन्दर जल खेल-खेल में उछल पड़े।)
(ङ) सुमनः – पुष्पस्य पर्यायं सुमनः अस्ति। (पुष्प का पर्यायवाची सुमन है।)

5. प्रथमश्लोकस्य आशयं हिन्दीभाषया आङ्गलभाषया वा लिखत।
(प्रथम श्लोक का आशय हिन्दी अथवा अंग्रेजी भाषा में लिखिए।)
उत्तरम् :
प्रथम श्लोक का आशय-हे माँ वाणी (सरस्वती)! आप अपनी वीणा से ऐसे सुन्दर नीतियों से युक्त गीत का मधुर गान करो, जिसे सुनकर समस्त चराचर में सौन्दर्य के प्रति चेतना जाग्रत हो जाए। प्राणी नीति के मार्ग पर अग्रसर हों।

हे माता सरस्वती! वसन्त ऋतु आ गई है। आम के वृक्ष बौरा गए हैं। अमराइयाँ पीली कान्ति से युक्त हो गई हैं। उन आम्र-वृक्षों पर कूकती कोयलों के समूह मनमोहक लगते हैं। फिर भी परतन्त्र भारतीयों के मनों में उत्साह नहीं है। हे माँ सरस्वती ! आप ऐसी वीणा बजाइये, जिससे सभी भारतीयों के मनों में उत्साह भर जाये और वे भारत-माता की स्वतन्त्रता का मार्ग प्रशस्त करें।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः

6. अधोलिखितपदानां विलोमपदानि लिखत – (निम्नलिखित पदों के विलोमपद लिखिए।)
(क) कठोरम् ………..
(ख) कटु …………
(ग) शीघ्रम् ………..
(घ) प्राचीनम् ……….
(ङ) नीरस: ……….
उत्तरम् :
पदानि – विलोमपदानि
(क) कठोरम् – कोमलम्
(ख) कटु – मृदु
(ग) शीघ्रम् – विलम्बम्
(घ) प्राचीनम् – नवीनम्
(ङ) नीरसः – सरस:

JAC Class 9th Sanskrit भारतीवसन्तगीतिः Important Questions and Answers

प्रश्न: 1.
वाणी किं निनादय? (सरस्वती क्या बजाये?)
उत्तरम् :
वाणी नवीनां वीणां निनादय। (सरस्वती नवीनता से युक्त वीणा को बजाये।)

प्रश्न: 2.
वसन्ते के लसन्ति? (वसन्त में क्या सुशोभित होते हैं ?)
उत्तरम् :
वसन्ते मधुरमञ्जरी-पिञ्जरी-भूतमालाः सरसा: रसाला: लसन्ति। (वसन्त में मधुर मञ्जरियों से पीली हुई सरस आम के वृक्षों की पंक्तियाँ सुशोभित होती हैं।)

प्रश्न: 3.
मन्दमन्दं कः वहति? (धीरे-धीरे क्या बहता है?)
उत्तरम् :
सनीर: समीर: मन्दमन्दं वहति। (जल से युक्त पवन धीरे-धीरे बहता है।)

प्रश्न: 4.
सवानीरतीरः कस्याः अस्ति? (बेंत की लताओं से आच्छादित तट किसका है?)
उत्तरम् :
कलिन्दात्मजायाः सवानीरतीरः अस्ति। (यमुना का तट बेंत की लताओं से आच्छादित है।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः

प्रश्नः 5.
पादपाः कैः युक्ताः? (वृक्ष किनसे युक्त हैं?)
उत्तरम् :
पादपाः ललितपल्लवैः युक्ताः सन्ति। (वृक्ष मन को आकर्षित करने वाले पत्तों से युक्त हैं।)

प्रश्नः 6.
अलीनां ततिम् किं करोति? (भ्रमरों की पंक्ति क्या करती है?)
उत्तरम् :
अलीनां ततिम् स्वनन्तीम्। (भ्रमरों की पंक्ति ध्वनि करती है।)

प्रश्न: 7.
किं कृत्वा वीणां निनादयितुं कथितः? (क्या करके वीणा को बजाने के लिए कहा गया है?)
उत्तरम् :
पादपे पुष्पपुजे, मञ्जुकुञ्ज, अलीनां मलिनं ततिं दृष्ट्वा वीणां निनादयितुं कथितः। (वृक्षों पर, पुष्पों के समूह पर, सुन्दर कुञ्जों पर भौंरों की काली पंक्ति अथवा भौरों के काले समूह को देखकर वीणा बजाने को कहा गया है।)

प्रश्न: 8.
कीदृशीं वीणां निनादयितुं कथितः? (कैसी वीणा बजाने के लिए कहा गया है?)
उत्तरम् :
नवीनां वीणां निनादयितुं कथितः। (नवीन वीणा को बजाने के लिए कहा गया है।)

प्रश्न: 9.
वीणाम् आकर्ण्य सुमं किं कुर्यात्? (वीणा को सुनकर पुष्प क्या करे?)
उत्तरम् :
वीणाम् आकर्ण्य सुमं चलेत्। (वीणा को सुनकर पुष्प चलायमान हो जाये।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः

प्रश्न: 10.
नदीनां जलं कथम् उच्छलेत्? (नदियों का जल कैसे उछल पड़े?)
उत्तरम् :
नदीनां जलं सलीलम् उच्छलेत्। (नदियों का जल खेल-खेल में उछल पड़े।)

प्रश्न: 11.
वाणी कीदृशीं गीतिं गायतु? (वाणी कैसा गीत गाये?)
उत्तरम् :
वाणी ललित-नीति-लीनाम् गीतिम् गायतु। (वाणी सुन्दर नीति से युक्त गीत गाये।

प्रश्न: 12.
केषां कलापाः लसन्ति? (किनके समूह शोभा दे रहे हैं?)
उत्तरम् :
ललित-कोकिला-काकलीनां कलापाः लसन्ति। (सुन्दर कोमल स्वरों के समूह शोभा देते हैं।)

प्रश्न: 13.
यमुना तीरे केषां नतां पंक्तिमालोक्य वाणी वीणां निनादयतु? (यमुना के किनारे किनकी झुकी हुई पंक्ति को देखकर वाणी वीणा वादन करे।)
उत्तरम् :
मधुमाधवीनां पंक्तिमालोक्य वाणी वीणां निनादयतु। (मधुर माधवी लताओं को देखकर वाणी वीणा बजाये।)

प्रश्न: 14.
पुष्प पुजे केषा ततिः स्वनति? (पुष्पसमूह पर किनकी पंक्ति स्वर करती है ?)
उत्तरम् :
पुष्प पुजे अलीनाम् पक्तिः स्वनति। (पुष्पसमूह पर भौरों की पंक्ति स्वर करता है।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः

प्रश्न: 15.
‘भारतीवसन्तगीतिः’ कस्य रचना अस्ति? (‘भारतीवसन्तगीतिः’ किसकी रचना है? )
उत्तरम् :
भारतीवसन्तगीति : पं. जानकी वल्लभ शास्त्रिण: रचना अस्ति। (भारतीवसन्तगीति पं. जानकी वल्लभ शास्त्री की रचना है।

रेखांकित पदान्यधिकृत्य प्रश्न निर्माणं कुरुत। (रेखांकित शब्दों के आधार पर प्रश्न निर्माण कीजिए।)

प्रश्न: 1.
वसन्ते लसन्ति सरसाः रसालाः। (वसन्त में सरस आम शोभा देते हैं।)
उत्तरम् :
वसन्ते के लसन्ति? (वसन्त में कौन शोभा देते हैं?)

प्रश्न: 2.
वाणी नवीनां वीणां निनादयतु? (वाणी नई वीणा बजाये।)
उत्तरम् :
वाणी कीदृशी वीणां निनादयतु? (वाणी कैसी वीणा बजाये?)

प्रश्न: 3.
वहति मन्द-मन्द सनीरः समीरः। (धीरे-धीरे सजल वायु चलती है।)
उत्तरम् :
मन्दम् मन्दम् कीदृशः समीर: वहति? (धीरे-धीरे कैसी हवा चलती है?)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः

प्रश्न: 4.
उच्छलेत् कान्तं सलिलम्। (सुन्दर जल उछले।)
उत्तरम् :
कीदृशं सलिलं उच्छलेत्। (कैसा पानी उछले?)

प्रश्नः 5.
तवाकर्ण्य वीणामदीनां नदीनां जलं उच्छलेत्। (तुम्हारी ओजस्वी वीणा को सुनकर नदियों का जल उछल पड़े।)
उत्तरम् :
नदीनां जलं काम् आकर्ण्य उच्छलेत्? (नदियों का जल क्या सुनकर उछल पड़े?)

परियोजना-कार्यम्

पाठेऽस्मिन् वीणायाः चर्चा अस्ति। अन्येषां पञ्चवाद्ययन्त्राणां चित्रं रचयित्वा संकलय्य वा तेषां नामानि लिखत।
(इस पाठ में वीणा की चर्चा है। दूसरे पाँच वाद्य-यन्त्रों के चित्र बनाकर अथवा संकलित करके उनके नाम लिखिए।) निर्देश-यहाँ कुछ वाद्य-यन्त्रों के नाम संस्कृत में दिये जा रहे हैं, छात्र इनके चित्र स्वयं बनाएँ या उनका संकलन करें।
वाद्य यन्त्र – (1) वंशी (बाँसुरी) (2) डमरूः (डमरू) (3) ढक्का (ढोल) (4) झिल्लिका (झाँझ) (5) मृदङ्गः (डफली) (6) सारङ्गी (सारंगी) (7) शङ्खः (शंख) (8) घण्टिका (घंटी) (9) जलतरङ्गम् (जलतरंग) (10) करतालः (करताल)।

भारतीवसन्तगीतिः Summary and Translation in Hindi

पाठ-परिचय – ‘भारतीवसन्तगीतिः’ प्रख्यात कवि पं. जानकी वल्लभ शास्त्री की रचना ‘काकली’ नामक गीत-संग्रह से लिया गया है। इसमें कवि ने अपने देश और मातृ-भूमि की स्वतन्त्रता तथा कल्याण की कामना वाणी (सरस्वती) से की है। प्रार्थना करता हुआ कवि कहता है कि हे सरस्वती! ऐसी नवीन वीणा बजाओ जिससे वसन्त ऋतु में मधुर मञ्जरियों से पीली पंक्ति वाले आम के वृक्ष, कोयल का कूजन, वायु का धीरे-धीरे बहना, अमराइयों में काले भौरों का गुंजन और यमुना आदि नदियों का जल अत्यन्त मनमोहक हो जाये तथा तुम्हारी ओजस्विनी वीणा को सुनकर लताओं के नितान्त शान्त सुमन हिलने लगें अर्थात् ऐसी नवीन ओजस्विनी वीणा बजाओ जिससे सृष्टि में नवीन चेतना का संचार हो। इस गीत में कवि का देशानुराग देखने को मिलता है। स्वतन्त्रता-संग्राम की पृष्ठभूमि में लिखा गया यह गीत एक ऐसे वीणा स्वर की कल्पना करता है, जो नवीन चेतना का आह्वान करने के साथ स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए जनसामान्य को प्रेरित करे। अत: यह गीत ओज और माधुर्य गुणों से परिपूर्ण एक पवित्र राग है।

मूलपाठः,अन्वयः,शब्दार्थाः, हिन्दी-अनुवादः, संस्कृत व्यारव्याःअवबोधनकार्यमच

निनादय नवीनामये वाणि! वीणाम्
मृदुं गाय गीति ललित-नीति-लीनाम्।
मधुर-मञ्जरी-पिञ्जरी-भूत-मालाः
वसन्ते लसन्तीह सरसा रसाला:
कलापाः ललित-कोकिला-काकलीनाम्॥1॥ निनादय………….।।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः

अन्वयः – अये वाणि! नवीनां वीणां निनादय। ललितनीतिलीनां गीतिं मृदुं गाय। इह वसन्ते मधुर-मञ्जरी पिञ्जरी–भूत-मालाः सरसा: लसन्ती। ललित कोकिला काकलीनां कलापाः। नवीनां वीणां निनादय।

शब्दार्था: – निनादय = नितरां वादय (बजाओ), नवीनाम् = नूतनां (नवीन), अये = भो (अरे), वाणि = सरस्वति (हे सरस्वती), वीणाम् = वल्ली (वीणा को), मृदुम् = मधुरं (कोमल), गाय = स्तुहि (गाओ), गीतिम् = गानं (गीत), ललितनीतिलीनाम् सुन्दरनीतिसंलग्नाम् (सुन्दर नीति में लीन), मधुर = चारु (सुन्दर), मञ्जरी = आम्रकुसुम (आम के पुष्प/बौर), पिञ्जरी-भूत-माला: = पीतपङ्क्तयः (पीले वर्ण से युक्त पंक्तियाँ), वसन्ते = वसन्तकाले (वसन्त ऋतु में), . लसन्ति = शोभन्ते (सुशोभित हो रही हैं), इह = अत्र (यहाँ),सरसा = रसपूर्णाः (रस से पूर्ण), रसालाः = आम्राः = (आम के पेड़) कलापाः = समूहाः (समूह), ललित-कोकिला = मनोहरः पिकः (मनमोहक कोयल), काकली = कोकिलानां ध्वनिः (कोयल की आवाज) अये वाणि! = भो माता सरस्वति! (हे माँ सरस्वती), नवीनाम् = नूतनां (नवीन), वीणाम् = वल्ली (वीणा को), निनादय = नितरां वादय (बजाओ)।

हिन्दी अनुवादः

सन्दर्भ – प्रस्तुत गीतांश में कवि ने माँ सरस्वती से वसन्त ऋतु में प्रकृति में नवीन चेतना का संचार करने वाली ओजस्विनी वीणा को बजाने की प्रार्थना की है।

प्रसंग – हे सरस्वती! नवीन वीणा को बजाओ। सुन्दर नीतियों से पूर्ण गीत का मधुर गान करो। इस वसन्त ऋतु में मधुर आम्रपुष्प (बौरों) के कारण पीले वर्ण से युक्त सरस आम के वृक्षों की पंक्तियाँ सुशोभित हो रही हैं। मनमोहक कोयल
की कूक तथा कोयलों के समूह सुन्दर लग रहे हैं। हे सरस्वती! नवीन वीणा को बजाओ।

हिन्दी-अनुवाद – हे सरस्वती! नवीन वीणा को बजाओ। सुन्दर नीतियों से पूर्ण गीत का मधुर गान करो। इस वसन्त
(बौरों) के कारण पीले वर्ण से युक्त सरस आम के वृक्षों की पंक्तियाँ सुशोभित हो रही हैं। मनमोहक कोयल की कूक तथा कोयलों के समूह सुन्दर लग रहे हैं। हे सरस्वती! नवीन वीणा को बजाओ।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः

संस्कृत व्यारव्याः

सन्दर्भ: – प्रस्तुतो गीतांशोऽस्माकं ‘शेमुषी’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘भारतीवसन्तगीतिः’ इति पाठात् उद्धनः। य आधुनिक संस्कृत-साहित्ये प्रख्यातस्य कवेः पं. जानकीवल्लभशास्त्रिणः ‘काकली’ इति गीत संग्रहात् सङ्कलितः। (प्रस्तुत गीतांश हमारी शेमुषी पाठ्यपुस्तक के भारतीवसन्तगीति:’ पाठ से लिया गया है, जो आधुनिक संस्कृत-साहित्य में प्रसिद्ध कवि पं. जानकी वल्लभ शास्त्री के ‘काकली’ गीत-संग्रह से संकलित है।)

प्रसंग: – प्रस्तुत गीतांशे कविना माता सरस्वती वसन्तकाले प्रकृतौ नवचेतना सञ्चारिकाम् ओजस्विनी वीणां वादितुं निवेदिता। (प्रस्तुत गीतांश में कवि द्वारा सरस्वती माँ वसन्त काल में प्रकृति में नई चेतना का सञ्चार करने वाली ओजस्वमयी वीणा को बजाने के लिए निवेदन किया जा रहा है।)

व्याख्या: – हे सरस्वति! त्वं नूतनां वल्लकी वादय। रम्यनयस्य मधुरं गीतं गाय। अस्मिन् वसन्त काले मृदुपुष्पैः पीतवर्णानाम् आम्रवृक्षाणां पङ्क्तयः शोभन्ते। मनमोहकानां पिकानां तेषां केकानां च समूहः शोभन्ते! हे सरस्वति! नूतनां . वल्लकी वादय। (हे सरस्वती! तुम नई वीणा को बजाओ! सुन्दर नीति का मधुर गीत गाओ। इस वसन्त काल में कोमल बौर (मंजरी) से युक्त आम के वृक्ष शोभा दे रहे हैं। मनोहर कोयल और उसकी कूक का समूह शोभा दे रहे हैं। हे सरस्वती! नई वीणा बजाओ।)

अवबोधन कार्यम्

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत- (एक शब्द में उत्तर दीजिए-)
(क) सरस्वती कीदृशी वीणां निनादयतु? (सरस्वती कैसी वीणा बजाये?)
(ख) वसन्ते कासां कलापाः भवन्ति ? (वसन्त में किनका कलरव होता है?)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(क) कीदृशीं गीतिं गायतु? (कैसा गीत गाये?)
(ख) वसन्ते काः सरसा: लसन्ति ? (वसन्त में क्या सरस शोभा देती है?)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः

प्रश्न 3.
यथानिर्देशम् उत्तरत-(निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(क) ‘वादय’ इति पदस्य पर्यायपदं गीतांशात् चुनत। (‘वादय’ पद का पर्याय पद गीतांश से छाँटकर लिखो।)
(ख) ‘नीरस’ पदस्य विलोमपदं गीतांशात् चित्वा लिखत। (‘नीरस’ पद का विलोम-पद गीतांश में से चुनकर
लिखिए।)
उत्तराणि :
(1) (क) नवीनाम् (नई)।
(ख) कोकिला काकलीनाम् (कोयलों की केका ध्वनि)।

(2) (क) ललितनीतिलीनां मृदुगीतिं गायतु। (सुन्दर नीति से युक्त मृदु गीत गायें।)
(ख) वसन्ते मधुर-मञ्जरी-पिञ्जरी-भूत-मालाः सरसाः लसन्ति। (वसन्त में मधुर पीले रंग की मंजरी सरस शोभा देती हैं।)

(3) (क) निनादय ।
(ख) सरस।

वहति मन्दमन्दं सनीरे समीरे
कलिन्दात्मजायास्सवानीरतीरे,
नतां पङ्किमालोक्य मधुमाधवीनाम् ॥2॥ निनादय………….।।

अन्वयः – कलिन्दात्मजायाः सवानीरतीरे सनीरे समीरे मन्दमन्दं वहति। मधुमाधवीनाम् नतां पंक्तिम् आलोक्य अये वाणि! नवीनां वीणां निनादय।

शब्दार्थाः – वहति = चलति (चलती है, बहती है), मन्दमन्दम् = शनैः-शनैः (धीरे-धीरे), सनीरे = सजले (जल से पूर्ण), समीरे = पवने (हवा में), कलिन्दात्मजायाः = यमुनायाः (यमुना नदी के), सवानीरतीरे = वेतसयुक्त तटे (बेंत की लता से युक्त तट पर), नताम् = नतिप्राप्ताम् (झुकी हुई), पक्तिम् = श्रेणिम् (पक्ति को), अवलोक्य = वीक्ष्य (देखकर), मधुमाधवीनाम् = मधुमाधवीलतानाम् (मधुर मालती लताओं को), अये वाणि = ओ माँ सरस्वति! (हे माँ सरस्वती), नवीनाम् = नूतनां (नवीन), वीणाम् = वल्लकी (वीणा को), निनादय = नितरां वादय (बजाओ)।

हिन्दी अनुवादः

सन्दर्भ – प्रस्तुत गीतांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘भारतीवसन्तगीतिः’ नामक पाठ से उद्धृत है। यह पाठ आधुनिक संस्कृत-साहित्य के प्रख्यात कवि पं. जानकी वल्लभ शास्त्री की रचना ‘काकली’ नामक गीतसंग्रह से संकलित है।

प्रसंग – प्रस्तुत गीतांश में कवि ने सरस्वती से यमुना के तट पर झुकी हुई मधुर मालती की लताओं को देखकर नवीन वीणा को बजाने की प्रार्थना की है। – हिन्दी-अनुवाद-यमुना नदी के बेंत की लताओं से युक्त तट पर जल से पूर्ण वायु धीरे-धीरे बहती है। (उस हवा से) मधुर मालती की लता-पंक्ति को झुकी हुई देखकर हे सरस्वती! नवीन वीणा को बजाओ।

संस्कृत व्याख्याः

सन्दर्भ: – प्रस्तुतो गीतांशोऽस्माकं ‘शेमुषी’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘भारतीवसन्तगीतिः’ इति पाठात् उद्धृतः। य आधुनिक संस्कृत-साहित्ये प्रख्यातस्य कवेः जानकीवल्लभशास्त्रिण: ‘काकली’ इति गीतसंग्रहात् संकलितः। (प्रस्तुत गीतांश हमारी ‘शेमुषी’ पाठ्यपुस्तक के ‘भारतीवसन्तगीतिः’ पाठ से लिया गया है। यह आधुनिक संस्कृत-साहित्य में प्रसिद्ध कवि पं. जानकी वल्लभ शास्त्री के ‘काकली’ गीत संग्रह से संकलित है।)

प्रसङ्गः – प्रस्तुतगीतांशे कविः यमुनातटे अवनता: मृदु मालती लताः अवलोकस्य नूतनां वल्लवी वादनाय प्रार्थयति। (प्रस्तुत गीतांश में कवि यमुना के तट पर झुकी कोमल मालती लताओं का अवलोकन कर नई वीणा बजाने के लिए प्रार्थना करता है।)

व्याख्या: – नेत्र लताभिः युक्ते यमुना तटे जलसंयुता पवनः शनैः-शनै: वहति । तेन पवनेन मदमालतीलतानां पङ्क्तयोऽवनंता: सन्ति। तान् अवलोक्य हे सरस्वति! त्वं नूतना वीणाम् वल्ली वा वादय। (बेंत की लताओं से युक्त यमुना के किनारे पर जल से युक्त वायु मन्द-मन्द चल रही है। उस पवन से कोमल मालती लताओं की पंक्तियाँ झुकी हुई हैं। उन्हें देखकर हे सरस्वती! तुम नई वीणा को बजाओ।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः

अवबोधन कार्यम

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत – (एक शब्द में उत्तर दीजिए-)
(क) समीरः कथं वहति? (हवा कैसे चलती है?)
(ख) यमुना कस्याः आत्मजा? (यमुना किसकी बेटी है?)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(क) यमुना तीरे वायुः कथं वहति? (यमुना-किनारे वायु कैसी चलती है?)
(ख) सरस्वती किमालोक्य वीणां निनादयतु? (सरस्वती क्या देखकर वीणा बजाये?)

प्रश्न 3.
यथानिर्देशम् उत्तरत-(निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(क) ‘सनीरे समीरे’ इति पदयोः किं विशेषण पदम्? (‘सनीरे-समीरे’ में कौनसा विशेषण है?)
(ख) गीतांशे ‘वहति’ क्रियापदस्य कर्तृपदं लिखत। (गीतांश में ‘वहति’ क्रियापद का कर्ता लिखिए।)
उत्तराणि :
(1) (क) मन्दमन्दम्। (धीरे-धीरे)।
(ख) कलिन्दस्य (सूर्य की)।

(2) (क) यमुना तीरे सनीरे समीरे मन्द-मन्दं वहति। (यमुना के किनारे पानी से युक्त वायु धीरे-धीरे चलती है।)
(ख) मधुरमाधवीनां पंक्तिमालोक्य वीणां निनादयतु सरस्वती। (मधुरमाधवी की पंक्तियों को देखकर सरस्वती वीणा बजाये।)

(3) (क) ‘सनीरे’, इति विशेषणपदम्।
(ख) ‘वायुः’ वहति क्रियाया कर्ता।

ललित-पल्लवे पादपे पुष्पपुजे
मलयमारुतोच्चुम्बिते मञ्जुकुञ्ज,
स्वनन्तीन्ततिम्प्रेक्ष्य मलिनामलीनाम् ॥3॥ निनादय…………।।

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः

अन्वयः – ललितपल्लवे पादपे पुष्पपुजे मञ्जुकुञ्जे मलय-मारुतोच्चुम्बिते स्वनन्तीम् अलीनां मलिनां ततिं प्रेक्ष्य अये वाणि! नवीनां वीणां निनादय।

शब्दार्था: – ललित = मनोहर (सुन्दर, मन को आकर्षित करने वाले), पल्लवे = पत्राणि (पत्तों वाले), पादपे = तरौ (वृक्षों पर), पुष्पपुजे = पुष्पसमूहे (पुष्पों के समूह पर), मलयमारुतोच्चुम्बिते = मलयानिलसंस्पृष्टे (चन्दन वृक्ष की सुगन्धित वायु से स्पर्श किये गये), मञ्जुकुञ्ज = शोभनलताविताने (सुन्दर लताओं से आच्छादित स्थान/सुन्दर कुञ्जों पर), स्वनन्तीम् = ध्वनि कुर्वन्तीम् (ध्वनि करती हुई), ततिम् = पंक्तिम् (समूह को), प्रेक्ष्य = दृष्ट्वा (देखकर), मलिनाम् = कृष्णवर्णाम् (मलिन), अलीनाम् = भ्रमराणाम् (भ्रमरों की)।

हिन्दी अनुवादः

सन्दर्भ – प्रस्तुत गीतांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘भारतीवसन्तगीतिः’ नामक पाठ से उद्धृत है। यह पाठ आधुनिक संस्कृत-साहित्य के प्रख्यात कवि पं. जानकीवल्लभ शास्त्री की रचना ‘काकली’ नामक गीतसंग्रह से संकलित है।

प्रसंग – प्रस्तुत गीतांश में कवि ने सरस्वती से मनमोहक कुञ्जों में काले भौंरों की पंक्ति को देखकर नवीन वीणा को . . बजाने की प्रार्थना की है।

हिन्दी-अनुवाद – चन्दन-वृक्ष की सुगन्धित वायु से स्पर्श किये गए, मन को आकर्षित करने वाले पत्तों से युक्त वृक्षों पर, पुष्पों के समूह पर तथा सुन्दर कुञ्जों पर भौंरों की ध्वनि करती हुई पंक्ति समूह को देखकर हे सरस्वती! नवीन वीणा को बजाओ। संस्कृत व्यारव्याः

सन्दर्भ: – प्रस्तुतोऽयं गीतांशोऽस्माकं ‘शेमुषी’ इति पाठ्य-पुस्तकस्य ‘भारतीवसन्तगीतिः’ इति पाठात् उद्धृतः।’ पाठोऽयमाधुनिक-संस्कृत साहित्यस्य प्रख्यातकवेः पं. जानकी वल्लभ शास्त्रिण: ‘काकली’ इति गीति संग्रहात् सङ्कलितः। (प्रस्तुत गीतांश हमारी शेमुषी पाठ्य-पुस्तक के ‘भारतीवसन्तगीतिः’ पाठ से उद्धृत है। यह पाठ आधुनिक संस्कृत-साहित्य के प्रसिद्ध कवि पं. जानकी वल्लभ शास्त्री के काकली गीत-संग्रह से संकलित है।) .

प्रसङ्गः – गीतांशेऽस्मिन् कविः देवी सरस्वती मनमोहकेषु कुञ्जेषु भ्रमराणां श्यामपंक्तिमवलोक्य नूतनां वल्लकी वादयितुं निवेदयति। (इस गीतांश में कवि देवी सरस्वती को मनमोहक कुंजों में भ्रमरों की श्याम पंक्ति को देखकर नई वीणा बजाने के लिए निवेदन करती है।)

व्याख्या: – चन्दन-वृक्षाणां सुरभित-पवनेन स्पृष्टै: मनमोहकैः पत्रैः संयुतेषु वृक्षेषु, पुष्पस्तवकेषु, रम्य कुंजेषु गुञ्जनरतानां मधुकराणां पंक्ति-सम्मर्द चावलोक्य देवि सरस्वति! नूतनां वल्लकी वादय। (चन्दन के वृक्षों की सुगन्धित पवन से छुई हुई, मनमोहक पत्तों से युक्त वृक्षों पर फूलों के गुच्छों पर सुन्दर कुंजों पर गुंजन करने में रत भौंरों की पंक्तियों के समूह को देख हे देवी सरस्वती! तुम नई वीणा को बजाओ।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः

अवबोधन कार्यम्

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत – (एक शब्द में उत्तर दीजिए-)
(क) अलीनां पंक्तिः केन स्पृष्टा वहति? (भौरों की पंक्ति किससे स्पर्श कर बहती हैं ?)
(ख) केषां पंक्तिमवलोक्य सरस्वती वीणां निनादयतु? (किनकी पंक्ति को देखकर सरस्वती वीणा बजाये?)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(क) अलीनां पंक्तिः किं कुर्वन्ती अवलोक्य सरस्वती वीणां निनादयतु ? (क्या करती हुई भौरों की पंक्ति को देखकर सरस्वती वीणा बजाये?)
(ख) मलिनामलीनां पंक्ति कुत्र स्वनति? (मलिन भौंरों की पंक्ति कहाँ स्वर करती है?)

प्रश्न 3.
यथानिर्देशम् उत्तरत-(निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)
(क) ‘ललितपल्लवे पादपे’ इत्यत्र ‘पादपे’ इति पदस्य विशेषण पदं लिखत। (‘ललितपल्लव पादपे’ में ‘पादपे’ पद का विशेषण लिखिए।)
(ख) ‘निर्मलाम्’ इति पदस्य विलोमार्थक पदं गीतांशात् चित्वा लिखत : (‘निर्मलाम्’ पद का विलोमपद गीतांश से चुन कर लिखिए।)
उत्तराणि :
(1) (क) मलयमरुतेन। (मलयानिल से)।
(ख) मलिनामलीनाम्। (मलिन भौरों की)।

(2) (क) मलिनामलीनां पंक्तिं स्वनन्तीम् अवलोक्य बीणां निनादयतु। (गुंजन करती मलिन भौरों की पंक्ति को
देखकर सरस्वती वीणा बजाये।)
(ख) मलिनामलीनां पंक्ति मञ्जुकुंजे स्वनति। (मलिन भौंरों की पंक्ति सुन्दर कुञ्ज पर स्वर करती है।)

(3) (क) ‘ललितपल्लवे’ इति पदं पादपे पदस्य विशेषणपदम्। (‘ललितपल्लवे’ पद ‘पादपे’ का विशेषण है।)
(ख) मलिनाम्। (कृष्ण वर्ण/मैली)।

लतानां नितान्तं सुमं शान्तिशीलम्
चलेदुच्छलेत्कान्तसलिलं सलीलम्,
तवाकर्ण्य वीणामदीनां नदीनाम् ॥4॥ निनादय….॥

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः

अन्वयः – तव अदीनां वीणाम् आकर्ण्य लतानां नितान्तं शान्तिशीलम् शुमं चलेत्। नदीनां कान्तसलिलं सलीलम् उच्छलेत्। अये वाणि! नवीनां वीणां निनादय।

शब्दार्थाः – लतानाम् = वल्लरीनां (लताओं के/बेलों के), नितान्तम् = अमितं (अत्यधिक), सुमम् = कुसुमम् (पुष्प को), शान्तिशीलम् = शान्तियुक्तम् (शान्ति से युक्त), चलेत् = गच्छेत् (चलायमान हो जाएँ), उच्छलेत् = ऊर्ध्वं गच्छेत् (उच्छलित हो उठे/ उछल पड़े), कान्तसलिलम् = मनोहरजलम् (सुन्दर जल), सलीलम् = क्रीडासहित साथ), तव = ते (तुम्हारी), आकर्ण्य = निशम्य/श्रुत्वा (सुनकर), वीणाम् = वल्ली (वीणा को), अदीनाम् = तेजस्विनी (ओजस्वी), नदीनाम् = सरिताम् (नदियों का)।

हिन्दी अनुवादः

सन्दर्भ – प्रस्तुत गीतांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ के ‘भारतीवसन्तगीतिः’ नामक पाठ से उद्धत है। यह पाठ आधुनिक संस्कृत-साहित्य के प्रख्यात कवि पं. जानकीवल्लभ शास्त्री की रचना ‘काकली’ नामक गीतसंग्रह से संकलित है।

प्रसंग – प्रस्तुत गीतांश में कवि ने सरस्वती से प्रकृति में नवीन प्राण फूंक देने वाली ओजस्विनी वीणा को बजाने की प्रार्थना की है।

हिन्दी-अनुवाद – तुम्हारी ओजस्विनी वीणा को सुनकर लताओं के अत्यधिक शान्ति से युक्त पुष्प चलायमान हो जाएँ। नदियों का सुन्दर जल खेल-खेल में उछल पड़े। हे वाणी (सरस्वती)! (ऐसी ओजस्विनी) नवीन वीणा को बजाओ।

संस्कृत व्यारव्याः

सन्दर्भ: – गीतांशोऽयमस्माकं ‘शेमुषी’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘भारतीवसन्तगीतिः’ इति पाठात् उद्धृत। पाठोऽयमाधुनिक संस्कृत-साहित्यस्य प्रख्यातकवेः पं. जानकी वल्लभ शास्त्रिणः ‘काकली’ इति गीतसंग्रहात् सङ्कलितः। (यह गीतांश हमारी ठ्य-पुस्तक के ‘भारतीवसन्तगीतिः’ पाठ से लिया गया है। यह पाठ आधुनिक संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कवि पं. जानकी वल्लभ शास्त्री के काकली गीत-संग्रह से सङ्कलित है।)

प्रसङ्गः – प्रस्तुत गीतांशे कविः प्रकृतौ नव प्राण सम्प्रेषणाय देवी सरस्वती प्रति प्रार्थयति। (प्रस्तुत गीतांश में कवि प्रकृति में नये प्राण भरने के लिए देवी सरस्वती से प्राथना करता

व्याख्या:-हे सरस्वति! तव ओजस्विी वल्लकी श्रुत्वा लतानामपि शान्त पुष्पाणि चलायमानानि भवन्तु (गतिशीलाः भवन्तु) नदीनां स्वच्छं जलं क्रीडायामेव उच्चलतु। हे देवि सरस्वति! एवमोजस्विनी वल्ली वादय। (हे सरस्वती ! तुम्हारी
ओजपूर्ण वीणा को सुनकर लताओं के भी शान्त पुष्प चलायमान (गतिशील) हो जायें। नदियों का स्वच्छ जल खेल ही खेल में उछल पड़े। हे देवी सरस्वती ! ऐसी ओजपूर्ण वीणा बजाओ।)

JAC Class 9 Sanskrit Solutions Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः

अवबोधन कार्यम्

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत- (एक शब्द में उत्तर दीजिए-)
(क) सरस्वत्याः वीणा कीदृशी अस्ति? (सरस्वती की वीणा कैसी है? )
(ख) कासां जलम् उच्छलति? (किनका जल उछलता है?)

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूरे वाक्य में उत्तर दीजिए-)
(क) किमाकर्ण्य लता चलति? (क्या सुनकर लता चलायमान होती है?)
(ख) नदीनां स्वच्छं जलं कथम् उच्छलति? (नदियों का स्वच्छ जल कैसे उछलता है?)

प्रश्न 3.
यथानिर्देशम् उत्तरत-(निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-)।
(क) ‘नितान्तं शान्तिशीलं सुमम्’ विशेष्य पदं किम्? (विशेष्य पद क्या है?)
(ख) ‘उच्छलेत्’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदं गीतांशात् लिखत। (‘उच्छलेत्’ क्रियापद का कर्ता गीतांश से लिखिए।)
उत्तराणि :
(1) (क) अदीना। (ओजपूर्ण) ।
(ख) नदीनाम् (नदियों का)।

(2) (क) सरस्वत्याः अदीनां वीणाम् आकर्ण्य लताः चलन्ति। (सरस्वती की ओजपूर्ण वीणा को सुनकर लताएँ
चलायमान हो जाती हैं।)
(ख) सरस्वत्याः अदीनां वीणां श्रुत्वा नदीनां जलं सलीलम् उच्छलति। (सरस्वती की ओजस्वी वीणा को
सुनकर नदियों का जल उछलता है।)

(3) (क) सुमम् (पुष्प) ।
(ख) ‘जलम्’ उच्छलेत् क्रियापदस्य कर्तृपदम्।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी

Jharkhand Board JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी

JAC Class 10 Hindi कबीर की साखी Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –
(निबंधात्मक प्रश्न)

प्रश्न 1.
मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त
अथवा
कबीर ने कैसी वाणी बोलने की सलाह दी है ?
उत्तर :
कबीरदास कहते हैं कि मनुष्य को सदैव मधुर वचन बोलने चाहिए। मीठी वाणी बोलने से उसे सुनने वाला सुख का अनुभव करता है, क्योंकि मीठी वाणी जब हमारे कानों तक पहुँचती है तो उसका प्रभाव हमारे हृदय पर होता है। इसके विपरीत किसी के द्वारा कहे गए कड़वे वचन तीर की भाँति हृदय में चुभने वाले होते हैं। जब हम मीठे वचनों का प्रयोग करते हैं, तो हमारा अहंकार नष्ट हो जाता है। अहंकार के नष्ट होने पर हमें शीतलता प्राप्त होती है। इस प्रकार मीठी वाणी बोलने से न केवल दूसरों को हम सुख प्रदान करते हैं, अपितु स्वयं भी शीतलता को अनुभव करते हैं।

प्रश्न 2.
दीपक दिखाई देने पर अँधियारा कैसे मिट जाता है? साखी के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कबीरदास के अनुसार जिस प्रकार दीपक के जलने पर अंधकार अपने आप दूर हो जाता है, उसी प्रकार हृदय में ज्ञानरूपी दीपक के जलने कबीरदास के अना पर अज्ञानरूपी अंधकार दूर हो जाता है। जब तक मनुष्य में अज्ञान रहता है, तब तक उसमें अहंकार और अन्य दुर्गुण होते हैं। वह अपने ही हृदय में निवास करने वाले ईश्वर को पहचान नहीं पाता। अज्ञानी मनुष्य अपने आप में डूबा रहता है। लेकिन जैसे ही उसके हृदय में ज्ञानरूपी दीपक जलता है, उसका हृदय प्रकाशित हो उठता है। ज्ञानरूपी दीपक के जलते ही मनुष्य का अज्ञानरूपी अंधकार नष्ट हो जाता है। ज्ञान के दीपक के जलने पर मनुष्य ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग पर चल पड़ता है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी

प्रश्न 3.
ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे क्यों नहीं देख पाते?
उत्तर :
कबीरदास का मानना है कि निर्गुण ब्रह्म कण-कण में समाया हुआ है, किंतु अपनी अज्ञानता के कारण हम उसे नहीं देख पाते। जिस प्रकार कस्तूरी नामक सुगंधित पदार्थ हिरण की अपनी नाभि में ही विद्यमान होता है लेकिन वह उसे जंगल में इधर-उधर ढूँढ़ता है; उसी प्रकार मनुष्य भी अपने हृदय में छिपे ईश्वर को अपनी अज्ञानता के कारण पहचान नहीं पाता। वह ईश्वर को धर्म के अन्य साधनों जैसे मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर, गुरुद्वारा आदि में व्यर्थ ढूँढ़ता है। कबीरदास का मत है कि कण-कण में छिपे परमात्मा को देखने के लिए ज्ञान का होना अति आवश्यक है।

प्रश्न 4.
संसार में सुखी व्यक्ति कौन है और दुखी कौन? यहाँ ‘सोना’ और ‘जागना’ किसके प्रतीक हैं ? इसका प्रयोग यहाँ क्यों किया गया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कबीरदास के अनुसार जो व्यक्ति केवल सांसारिक सुखों में डूबा रहता है और जिसके जीवन का उद्देश्य केवल खाना, पीना और सोना है, वही व्यक्ति सुखी है। इसके विपरीत जो व्यक्ति संसार की नश्वरता को देखकर ईश्वर प्राप्ति के लिए रोता है, वह दखी है। यहाँ ‘सोना’ शब्द सांसारिक सुखों में डूबे रहने का प्रतीक है तथा ‘जागना’ ज्ञान प्राप्त होने का प्रतीक है। इन शब्दों का प्रयोग कवि ने यह बताने के लिए किया है कि मूर्ख व्यक्ति अपना जीवन यूँ ही निश्चित रहकर नष्ट कर देता है। दूसरी ओर ज्ञानी व्यक्ति जानता है कि संसार नश्वर है। वह ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रयत्न करता है और दुखी रहता है। वह चाहता है कि मनुष्य भौतिक सुखों को त्यागकर ईश्वर-प्राप्ति की ओर अग्रसर हो।

प्रश्न 5.
अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है ?
अथवा
कबीर के विचार से निंदक को निकट रखने के क्या-क्या लाभ हैं?
उत्तर :
कबीर का मानना है कि अपने स्वभाव को निर्मल रखने का सबसे अच्छा उपाय निंदा करने वाले को अपने साथ रखना है। निंदा करने वाले को घर में अपने आस-पास रखना चाहिए। ऐसा करने से हमारा स्वभाव अपने आप ही निर्मल हो जाएगा, क्योंकि निंदा करने वाला व्यक्ति हमारे गलत कार्यों की निंदा करेगा तो हम अपने आप को सुधारने का प्रयास करेंगे। इस प्रकार निंदा करने वाले व्यक्ति के पास रहने पर हम धीरे-धीरे अपने स्वभाव को बिलकुल निर्मल कर लेंगे। इस तरह उसके द्वारा बताए गए अपने अवगुणों को दूर करके हम अपने स्वभाव को निर्मल बनाने में सफल हो सकते हैं।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी

प्रश्न 6.
‘एकै आषिर पीव का, पढे स पंडित होइ’-इस पंक्ति के दवारा कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर :
इस पंक्ति के द्वारा कवि स्पष्ट करना चाहता है कि जो व्यक्ति अपने प्रिय परमात्मा के प्रेम का अक्षर पढ़ लेता है, वही ज्ञानवान है। कुछ लोग बड़े-बड़े धर्मग्रंथों को पढ़कर अपने आपको विद्वान और ज्ञानवान सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। कबीर का मत है कि वेदों, पुराणों और उपनिषदों को पढ़ने से कोई लाभ नहीं होता। इनको पढ़ना व्यर्थ है। इसके विपरीत जो ईश्वर-प्रेम के मार्ग को अपनाकर उसमें डूब जाता है, वही वास्तविक विद्वान और ज्ञानवान है।

प्रश्न 7.
कबीर की उद्धत साखियों की भाषा की विशेषता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
प्रयोग हुआ है। कहीं-कहीं इन्होंने पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग किया है, किंतु अधिकांश साखियों में प्राय: बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है। इन साखियों में कबीरदास ने सामान्य भाषा में भी लोक व्यवहार की शिक्षा दी है। जैसे –

ऐसी बाँणी बोलिए, मन का आपा खोइ।
अपना तन सीतल करै, औरन कौं सुख होई॥

कबीर की भाषा में कहीं-कहीं बौद्धिकता के भी दर्शन होते हैं। यह बौद्धिकता प्राय: उपदेशात्मक साखियों में अधिक है। दोहा छंद में लिखी गई इन साखियों में मुक्तक शैली का प्रयोग है तथा गीति-तत्व के सभी गुण विद्यमान हैं। भाषा पर कबीर के अधिकार को देखते हुए ही डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इन्हें ‘वाणी का डिक्टेटर’ कहा है।

(ख) निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए –
(लघु उत्तरीय प्रश्न)

प्रश्न 1.
बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
उत्तर :
कबीरदास का कहना है कि जब विरहरूपी सर्प शरीर में बैठ जाता है, तो विरही व्यक्ति सदा तड़पता है। उस पर किसी प्रकार के मंत्र का कोई प्रभाव नहीं होता। जब आत्मा अपने प्रिय परमात्मा की विरह में तड़पती है, तो वह केवल अपने प्रिय परमात्मा के दर्शन पाकर होती है। विरहरूपी सर्प आत्मा को तब तक तड़पाता है, जब तक परमात्मा के दर्शन नहीं हो जाते।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी

प्रश्न 2.
कस्तूरी कुंडलि बसैं, मृग ढूँढ़े बन माँहि।
उत्तर :
कवि यहाँ यह स्पष्ट करना चाहता है कि हिरण की अपनी नाभि में ही कस्तूरी नामक सुगंधित पदार्थ होता है। जब हिरण को उसकी सुगंध आती है तो वह उसे इधर-उधर खोजता है, किंतु वह उसे ढूँढ़ नहीं पाता। इसी प्रकार ईश्वर भी मनुष्य के हृदय में विद्यमान है, किंतु मनुष्य अज्ञानतावश उसे पहचान नहीं पाता। वह ईश्वर को अन्य स्थानों पर खोज रहा है, जोकि व्यर्थ है।

प्रश्न 3.
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
उत्तर :
यहाँ कबीरदास के कहने का भाव है कि जब तक मनुष्य में ‘मैं’ अर्थात अहंकार की भावना होती है, तब तक वह ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता। मनुष्य जैसे ही अपने भीतर से अहंकार की भावना को नष्ट कर देता है, ईश्वर को सहजता से पा लेता है। ईश्वर को पाने के लिए अहंकार को त्यागना आवश्यक है।

प्रश्न 4.
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
उत्तर :
कबीरदास का मत है कि धार्मिक ग्रंथ आदि पढ़ने से कोई व्यक्ति विद्वान अथवा बुद्धिमान नहीं बनता। जो व्यक्ति ईश्वर-प्रेम को जान लेता है, वही सच्चा विद्वान है। धार्मिक ग्रंथों को पढ़कर स्वयं को विद्वान और ज्ञानी कहने वाले अनेक लोग मिट जाते हैं, किंतु ईश्वर-प्रेम के एक अक्षर को समझने वाला व्यक्ति अमर हो जाता है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी

भाषा अध्ययन –

प्रश्न :
पाठ में आए निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित रूप उदाहरण के अनुसार लिखिए –
उदाहरणः जिवै – जीना
औरन, माँहि, देख्या, भुवंगम, नेड़ा, आँगणि, साबण, मुवा, पीव, जालौं, तास।
उत्तर :

  • औरन – दूसरे को/अन्य को
  • माँहि – में
  • देख्या – देखा
  • भुवंगम – भुजंग/साँप
  • नेड़ा – निकट/समीप
  • आँगणि – आँगन
  • साबण – साबुन
  • मुवा – मरा
  • पीव – पिया, प्रिय, प्रियतम
  • तास – उस
  • जालौं – जलाऊँ

योग्यता विस्तार –

प्रश्न 1.
‘साधु में निंदा सहन करने से विनयशीलता आती है’ तथा ‘व्यक्ति को मीठी व कल्याणकारी वाणी बोलनी चाहिए’-इन विषयों पर कक्षा में परिचर्चा आयोजित कीजिए।
उत्तर :
विद्यार्थी अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करें।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी

प्रश्न 2.
कस्तूरी के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए।
उत्तर :
कस्तूरी एक सुगंधित पदार्थ होता है, जो ‘कस्तूरी’ नामक मृग की नाभि में होता है। भारत में यह मृग हिमालय के वन्य क्षेत्र में पाया जाता है। वर्तमान समय में अनेक लोग कस्तूरी के लिए इस मृग का शिकार कर रहे हैं, जिससे उनकी संख्या तेजी से कम हो रही है। यही कारण है कि कस्तूरी मृग को दुर्लभ और संरक्षित प्रजाति घोषित किया गया है।

परियोजना कार्य –

प्रश्न 1.
मीठी वाणी/बोली संबंधी व ईश्वर प्रेम संबंधी दोहों का संकलन कर चार्ट पर लिखकर भित्ति पत्रिका पर लगाइए।
उत्तर :
विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रश्न 2.
कबीर की साखियों को याद कीजिए और कक्षा में अंत्याक्षरी में उनका प्रयोग कीजिए।
उत्तर :
विद्यार्थी स्वयं करें।

JAC Class 10 Hindi कबीर की साखी Important Questions and Answers

लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
‘साखी’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर :
‘साखी’ शब्द साक्षी शब्द से बिगड़कर बना है, जिसका अर्थ है-‘गवाही’। कबीर ने जिन बातों को अपने अनुभव से जाना और सत्य पाया, उन्हें ‘साक्षी’ या साखी रूप में लिखा है। साखियाँ अनुभूत सत्य की प्रतीक हैं और कबीर उस सच्चाई के गवाह हैं।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी

प्रश्न 2.
ईश्वर के प्रति भक्ति कब दृढ़ हो जाती है?
उत्तर :
कबीरदास का मत है कि जब ईश्वर की विरह में जलने वाला व्यक्ति ऐसे ही दूसरे व्यक्ति से मिलता है, तो ईश्वर के प्रति भक्ति और दृढ़ हो जाती है। ईश्वर के प्रेम में घायल व्यक्ति जब ईश्वर के प्रेम में तड़पने वाले अपने ही समान अन्य व्यक्ति से मिलता है, तो उनमें विचारों का आदान-प्रदान होता है। दोनों अपने अनुभवों को बताते हैं और इस प्रकार दोनों के हृदयों में ईश्वर के प्रति भक्ति-भाव और अधिक प्रगाढ़ हो जाता है। इससे ईश्वर के प्रति भक्ति को दृढ़ता मिलती है।

प्रश्न 3.
हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि।
अब घर जालौ तास का, जे चलै हमारे साथि।
प्रस्तुत साखी के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि कबीर ने क्रांतिकारी स्वर में क्या कहा?
उत्तर :
संत कबीर ने जनमानस में चेतना लाने के लिए क्रांतिकारी स्वरों में कहा कि उन्होंने विषय-वासनाओं से युक्त अपने शरीर को जलाकर नष्ट कर दिया है। अब उन्हें सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हो गई है। इस सच्चे ज्ञान की मशाल को लेकर वे निकल पड़े हैं। जिसे भी उनके साथ चलना है, वह उनके साथ आ जाए। कबीर उनके सभी विकारों को समाप्त कर देंगे।

प्रश्न 4.
‘बिरह भुवंगम तन बसै …. जिवै तो बौरा होइ’ दोहे में कबीर ने विरह के विषय में क्या कहा है?
उत्तर :
कबीर ने प्रस्तुत दोहे में विरह की पीड़ा और प्रभाव को व्यक्त किया है। उन्होंने विरह को साँप की संज्ञा देते हुए कहा है कि विरहरूपी साँप शरीररूपी बिल में घुसा बैठा है। विरहाग्नि दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। कोई भी मंत्र इस विरहरूपी जहर पर अपना प्रभाव नहीं छोड़ पा रहा। जो व्यक्ति परमात्मा के विरह में तड़पने वाला है, वह उस पीड़ा से जीवित नहीं रह पाता। यदि किसी कारणवश वह जीवित रह भी जाता है, तो भी उसकी स्थिति पागलों के समान हो जाती है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी

प्रश्न 5.
“लिया मुराड़ा हाथि’ से कवि का क्या आशय है?
उत्तर :
‘मुराड़ा’ से कवि का अर्थ ‘ज्ञानरूपी मशाल’ से है। कवि का मानना है कि जिस प्रकार जलती हुई लकड़ी या मशाल से अंधकार का नाश होता है; चारों ओर उजाला एवं रोशनी फैलती है, ठीक उसी प्रकार ज्ञानरूपी मशाल से मनुष्य के मन का अज्ञानरूपी अंधकार दूर होता है।

प्रश्न 6.
कबीर ने ईश्वर प्राप्ति हेतु किसे त्यागने की बात कही है?
उत्तर :
कबीर ने ईश्वर प्राप्ति हेतु अहंकार को त्यागने की बात कही है। जब तक मनुष्य के मन में अहंकार होता है, तब तक उसे परमात्मा की प्राप्ति संभव नहीं हो सकती। परमात्मा उसे ही मिलता है, जिसका हृदय अहंकार रहित होता है।

प्रश्न 7.
कबीर ने जीवित रहते हुए भी किस प्रकार के व्यक्ति को मृतक समान माना है?
उत्तर :
कबीरदास ने प्रभु-भक्ति में लीन उन भक्तों को जीवित रहते हुए भी मृतक माना है, जो सांसारिक सुख-सुविधाओं को त्याग चुके हैं; जो परमात्मा की भक्ति में स्वयं को भुला चुके हैं। जिन्हें भौतिक वस्तुओं से कोई लेना-देना नहीं; जिन्होंने सांसारिक सुखों को पाने की इच्छा को त्याग दिया है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी

प्रश्न 8.
कबीर की भाषा का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर :
कबीरदास की भाषा सधुक्कड़ी अथवा खिचड़ी भाषा है। इनकी भाषा-शैली मुक्त है। इनके पदों में अनेक राग-रागनियों का प्रयोग हुआ है। इन्होंने अपनी भाषा में ब्रज, अवधी, खड़ी बोली, राजस्थानी आदि शब्दों का खूब प्रयोग किया है। इन्हें भाषा डिक्टेटर कवि भी कहा जाता है। अलंकारों तथा प्रतीकों के प्रयोग ने इनकी भाषा को सुंदरता प्रदान की है।

कबीर की साखी Summary in Hindi

कवि-परिचय :

जीवन – कबीर भक्तिकाल की ज्ञानमार्गी शाखा के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। उनकी जन्म-तिथि और जन्म-स्थान के विषय में विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत हैं। बहुमत के अनुसार कबीर का जन्म सन 1398 में काशी में हुआ था। उनका पालन-पोषण ‘नीरु-नीमा’ नामक दंपति ने किया। कबीर के गुरु का नाम स्वामी रामानंद था। कुछ लोग शेख तकी को भी कबीर का गुरु मानते हैं। रामानंद के विषय में कबीर ने स्वयं कहा है –

काशी में हम प्रकट भए, रामानंद चेताये।

कबीर का विवाह भी हुआ था। उनकी पत्नी का नाम लोई था। उनके ‘कमाल’ एवं ‘कमाली’ नाम के बेटा-बेटी थे। स्वभाव से वैरागी होने के कारण कबीर साधुओं की संगति में रहने लगे। सन 1518 में काशी के निकट मगहर में उनका निधन हुआ। रचनाएँ-कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे। वे बहुश्रुत थे। उन्होंने जो कुछ कहा, अपने अनुभव के बल पर कहा। एक स्थान पर उन्होंने शास्त्र-ज्ञाता पंडित को कहा भी है –

मैं कहता आँखिन की देखी, तू कहता कागद की लेखी।

कबीर की वाणी ‘बीजक’ नामक ग्रंथ में संकलित है। इस रचना में कबीर द्वारा रचित साखी, रमैनी एवं सबद संग्रहीत हैं।

काव्यगत विशेषताएँ – कबीर के काव्य की प्रमुख विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है –
1. समन्वय-भावना – कबीर के समय में हिंदू एवं मुस्लिम संप्रदायों में संघर्ष की भावना तीव्र हो चुकी थी। कबीर ने हिंदू-मुस्लिम एकता तथा विभिन्न धर्मों एवं संप्रदायों में समन्वय लाने का प्रयत्न किया। उन्होंने एक ऐसे धर्म की नींव रखी, जिस पर मुसलमानों के एकेश्वरवाद, शंकर के अद्वैतवाद, सिद्धों के हठ योग, वैष्णवों की भक्ति एवं सूफ़ियों के पीर-प्रेम का प्रभाव था।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी

2. ईश्वर के निर्गुण रूप की उपासना – कबीर ईश्वर के निर्गुण रूप के उपासक थे। उनके अनुसार ईश्वर प्रत्येक हृदय में वास करते हैं, उन्हें मंदिर-मस्जिद में ढूँढ़ना व्यर्थ है। भगवान की भक्ति के लिए आडंबर की अपेक्षा मन की शुद्धता एवं पवित्र आचरण की आवश्यकता है –

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढे बन माँहि।
ऐसैं घटि घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहि ॥

3. समाज-सुधार की भावना – कबीर उच्च कोटि के कवि होने के साथ-साथ समाज-सुधारक भी थे। उन्होंने अपने काव्य के द्वारा धर्म एवं जाति के नाम पर होने वाले अत्याचारों का डटकर विरोध किया। जाति-पाँति की भेद-रेखा खींचने वाले पंडितों एवं मौलवियों की उन्होंने खूब खबर ली –

ऊँचे कुल क्या जनमिया, जो करनी ऊँच न होय।
सवरन कलस सुरइ भरा, साधु निंदै सोय॥

4. गुरु महिमा – कबीर ने सच्चे गुरु को भगवान के समान ही मानकर उनकी वंदना की है। उनके अनुसार गुरु ही ईश्वर तक पहुँचने की राह दिखाता है –

गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपण, गोबिंद दियो बताय॥

5. सत्संगति का महत्त्व – सत्संगति का प्रभाव अटल होता है। कबीर ने सत्संग की महिमा में अनेक दोहों एवं शब्दों की रचना की है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी

6. रहस्यवाद – आत्मा एवं परमात्मा के मध्य चलने वाली प्रणय लीला को रहस्यवाद कहते हैं। इस विषय में कबीर ने कहा है
कि आत्मा एवं परमात्मा के मिलने में माया सबसे बड़ी बाधा है। माया का पर्दा हटते ही आत्मा-परमात्मा एक हो जाते हैं।
कबीर ने प्रेम-पक्ष की तीव्रता का भी बड़ा मार्मिक चित्रण किया है।

भाषा-शैली – कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे, इसलिए उनके काव्य में कला-पक्ष का अधिक निखार नहीं है। दूसरा कारण यह है कि कबीर सुधारक पहले थे और कवि बाद में। फिर भी उनके काव्य में भाषा का सहज सौंदर्य दिखाई देता है। कबीर की भाषा सधुक्कड़ी अथवा खिचड़ी भाषा है। उसमें ब्रज, पंजाबी, खड़ी बोली, अवधी आदि भाषाओं के अनेक शब्दों का मिश्रण एवं अलंकारों ने भी सहयोग दिया है। शैली मुक्तक है। कबीर के पदों में अनेक राग-रागनियों का प्रयोग भी हुआ है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि कबीर हिंदी साहित्य की महान विभूति हैं। उनकी कविता में क्रांति का स्वर, समाज-सुधार की भावना और एक सच्चे भक्त की पुकार है।

साखियों का सार :

प्रस्तुत साखियाँ कबीरदास द्वारा रचित हैं। इन साखियों में कवि ने विभिन्न विषयों पर अपने विचारों को सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किया है। कबीरदास के अनुसार हमें ऐसे मधुर वचनों का प्रयोग करना चाहिए, जिससे दूसरों को भी सुख का अनुभव हो। उनका मानना है कि ईश्वर प्रत्येक हृदय में विद्यमान है, किंतु मनुष्य कस्तूरी मृग की तरह उसे इधर-उधर ढूँढ़ता फिरता है। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए अहंकार को नष्ट करना आवश्यक है और मन को पूर्ण एकाग्र करके ही ईश्वर को पाया जा सकता है।

कबीरदास कहते हैं कि सांसारिक लोग विषय – वासनाओं में डूबे रहते हैं, वे खाने-पीने और सोने में सुख अनुभव करते हैं। इसके विपरीत ज्ञानी व्यक्ति जीवन की नश्वरता को देखकर दुखी रहता है। ईश्वर की विरह में तड़पने वाला व्यक्ति अत्यंत कष्टमय जीवन व्यतीत करता है। उनका मानना है कि मनुष्य को अपने आलोचकों को भी अपने आस-पास रखना चाहिए, क्योंकि निंदा करने वाले व्यक्ति के सभी दोषों को दूर कर देते हैं। कवि के अनुसार वेदों, उपनिषदों आदि ग्रंथों को पढ़कर कोई व्यक्ति विद्वान नहीं होता। जो व्यक्ति ईश्वर-प्रेम के मार्ग पर चलता है, वही वास्तविक विद्वान होता है। ईश्वर-प्रेम के प्रकाशित होने पर एक विचित्र-सा प्रकाश फैल जाता है। उसके बाद मनुष्य की वाणी से भी सुगंध आने लगती है। अंत में कबीरदास क्रांतिकारी स्वर में कहते हैं कि ईश्वर-प्रेम के मार्ग पर चलना सरल नहीं है। इस मार्ग में चलने के लिए तो अपना सर्वस्व न्योछावर करना पड़ता है।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी

सप्रसंग व्याख्या :

1. ऐसी बॉणी बोलिये, मन का आपा खोइ।
अपना तन सीतल करै, औरन कौं सुख होइ।।

शब्दार्थ : बाँणी – वाणी, शब्द, वचन। आपा – अहंकार, घमंड। खोइ – नष्ट होना। तन – शरीर। सीतल – शीतलता, सुख, आनंद।

प्रसंग : प्रस्तुत साखी महान संत कबीरदास द्वारा रचित है। इस साखी में कवि ने मनुष्य को मधुर वचनों के लाभ बताए हैं।

व्याख्या : कबीर मधुर वचन बोलने के संबंध में कहते हैं कि मनुष्य को ऐसे मीठे वचन बोलने चाहिए, जिससे मन का अहंकार समाप्त हो जाए। मनुष्य के द्वारा बोले गए मीठे वचनों से वह स्वयं तो आनंद का अनुभव करता ही है, उसे सुनने वाला भी सुख प्राप्त करता है। कहने का भाव यह है कि मनुष्य को सदैव मधुर वचन बोलने चाहिए।

2. कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढ़े बन माँहि।
ऐसें घटि घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहि॥

शब्दार्थ : कस्तूरी – एक सुंगधित पदार्थ। मृग – हिरण। बन – वन, जंगल। माँहि – में। घटि – हृदय। दुनियाँ – संसार, विश्व।

प्रसंग : प्रस्तुत साखी महाकवि कबीरदास द्वारा रचित है। इस साखी में उन्होंने बताया है कि ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है। वह प्रत्येक हुदय में निवास करता है।

व्याख्या : कबीरदास कहते हैं कि कस्तूरी नामक सुगंधित पदार्थ हिरण की अपनी नाभि में ही विद्यमान होता है, किंतु वह इस तथ्य से अनजान होकर उसे जंगल में इधर-उधर खोजता है। इसी प्रकार ईश्वर भी सभी के हृदय में विद्यमान है, किंतु लोग इस बात को नहीं समझते। वे ईश्वर को दुनिया भर में खोजते हैं।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी

3. जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि।

शब्दार्थ : हरि – परमात्मा, ईश्वर। अँधियारा – अंधेरा। दीपक – दीया। मिटि – समाप्त। देख्या – देखा।

प्रसंग : प्रस्तुत साखी कवि कबीरदास द्वारा रचित है। इसमें उन्होंने ईश्वर-प्राप्ति के लिए अहंकार को त्यागने पर बल दिया है।

व्याख्या : कबीर कहते हैं कि जब तक मुझमें अहंकार था, तब तक प्रभु मुझसे दूर थे। अब अहंकार के मिट जाने पर मुझे प्रभु मिल गए हैं। जब मैंने ज्ञानरूपी दीपक को लेकर अपने अंत:करण में देखा, तो मेरे हृदय का अज्ञानरूपी अंधकार पूरी तरह से नष्ट हो गया। भाव यह है कि ईश्वर-प्राप्ति के लिए अहंकार को त्यागना आवश्यक है।

4. सुखिया सब संसार है, खायै अरू सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरू रोवै॥

शब्दार्थ : सुखिया – सुखी। अरू – और। सोवै – सोना। दुखिया – दुखी। रोवै – रोना।

प्रसंग : प्रस्तुत साखी कबीरदास द्वारा रचित है। इसमें उन्होंने सांसारिक और ज्ञानी व्यक्ति के अंतर को स्पष्ट किया है।

व्याख्या : कबीर कहते हैं कि सारा संसार सुखी है। सांसारिक व्यक्ति खाने-पीने और सोने में जीवन व्यतीत कर देता है। वह इसी को सच्चा सुख मानकर इसमें डूबा हुआ है। दूसरी ओर मैं संसार की नश्वरता को समझ चुका हूँ और ईश्वर की प्राप्ति के लिए प्रयास कर रहा हूँ। उसके वियोग में रो रहा हूँ और उदास हूँ।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी

5. बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ॥

शब्दार्थ : भुवंगम – भुजंग, साँप । तन – शरीर। वियोगी – विरह में तड़पने वाला। जिवै – जीवित। बौरा – पागल।

प्रसंग : प्रस्तुत साखी कबीरदास द्वारा रचित है। इसमें उन्होंने ईश्वरीय विरह की पीड़ा और प्रभाव को व्यक्त किया है।

व्याख्या : कबीर कहते हैं कि विरहरूपी साँप शरीररूपी बिल में घुसा बैठा है। कोई भी मंत्र उस पर अपना प्रभाव नहीं डाल पा रहा। ईश्वर के प्रेम की विरह में तड़पने वाला व्यक्ति विरह की पीड़ा के कारण जीवित नहीं रहता और यदि वह जीवित रह जाता है, तो उसकी स्थिति पागलों जैसी हो जाती है। वह स्वयं में ही डूबा रहता है।

6. निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटी बंधाइ।
बिन साबण पाणी बिना, निरमल करै सुभाइ॥

शब्दार्थ : निंदक – निंदा करने वाला। नेड़ा – समीप, निकट। आँगणि – आँगन। कुटी – कुटिया। साबण – साबुन। पाँणी – पानी। निरमल – स्वच्छ। सुभाइ – स्वभाव।

प्रसंग : प्रस्तुत साखी कबीरदास द्वारा रचित है। इसमें उन्होंने निंदा करने वाले व्यक्ति की उपयोगिता बताई है।

व्याख्या : कबीरदास कहते हैं कि निंदा करने वाले व्यक्ति का भी महत्व होता है। निंदक व्यक्ति बार-बार हमारे अवगुणों को बताता है और इस प्रकार वह साबुन और पानी के बिना ही हमारे स्वभाव को निर्मल एवं स्वच्छ बना देता है। अत: उसे अपने आस-पास ही रखना चाहिए। यदि संभव हो तो अपने घर के आँगन में ही उसके लिए छप्पर डाल देना चाहिए।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी

7. पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
ऐकै अषिर पीव का, पढ़े सु पंडित होइ।

शब्दार्थ : पोथी – ग्रंथ, पुस्तक। जग – संसार। पंडित – विद्वान। भया – होना। ऐकै – एक। आषिर – अक्षर। पीव – प्रियतम, ईश्वर। सु – वही।

प्रसंग : प्रस्तुत साखी कबीरदास द्वारा रचित है। इसमें उन्होंने बताया है कि जो व्यक्ति ईश्वर-प्रेम के सच्चे रस में डूब जाता है, वही वास्तविक विद्वान है।

व्याख्या : कबीर कहते हैं कि इस संसार में धार्मिक ग्रंथों को पढ़-पढ़कर अनेक सांसारिक लोग मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं, किंतु कोई भी सच्चा विद्वान नहीं बन सका। दूसरी ओर जो व्यक्ति प्रेम के अक्षर को पढ़ लेता है अर्थात् प्रेम को स्वयं में समाहित कर लेता है, वही सच्चा विद्वान बन जाता है। ईश्वर- प्रेम में डूबने वाला व्यक्ति ही ईश्वर को प्राप्त करने में सफल होता है। धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने से कोई लाभ नहीं होता।

JAC Class 10 Hindi Solutions Sparsh Chapter 1 कबीर की साखी

8. हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि।
अब घर जालौं तास का, जे चलै हमारे साथि॥

शब्दार्थ : जाल्या – जलाया। आपणाँ – अपना। मुराड़ा – जलती हुई लकड़ी, मशाल। तास का – उसका। साथि – साथ।

प्रसंग : प्रस्तुत साखी कवि कबीर द्वारा रचित है। इस साखी में उन्होंने समस्त विकारों को त्यागकर ज्ञान-प्राप्ति की बात कही है।

व्याख्या : कबीरदास कहते हैं कि उन्होंने विषय-वासनाओं और अन्य विकारों से युक्त अपने शरीररूपी घर को जलाकर नष्ट कर दिया है। अब उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हो गई है। अब वे ज्ञानरूपी मशाल को लेकर निकल पड़े हैं और जो उनके साथ चलने के लिए तैयार होगा, वे उसके भी अज्ञान को जलाकर नष्ट कर देंगे।

JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 7 Triangles

Jharkhand Board JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 7 Triangles Important Questions and Answers.

JAC Board Class 9th Maths Important Questions Chapter 7 Triangles

Question 1.
If D is the mid-point of the hypotenuse AC of a right triangle ABC, prove that BD = \(\frac {1}{2}\)AC.
Solution :
Let ΔABC is a right triangle such that ∠B = 90° and D is midpoint of AC then we have to prove that BD = \(\frac {1}{2}\)AC, we produce BD to E such that BD = DE and join EC
JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 7 Triangles - 1
Now, in ΔADB and ΔCDE we have
AD = DC (Given)
BD = DE (By construction)
And, ∠ADB = ∠CDE
[Vertically opposite angles]
∴ By SAS criterion of congruence, we have
ΔADB ≅ ΔCDE
⇒ EC = AB and ∠CED = ∠ABD ….(i)
(By CPCT)
But ∠CED and ∠ABD are alternate interior angles .
∴ CE || AB ⇒ ∠ABC + ∠ECB = 180°
(interior angles)
⇒ 90° + ∠ECB = 180°
⇒ ∠ECB = 90°
Now, in ΔABC and ΔECB, we have
AB = EC [By (i)]
BC = BC [Common]
And, ∠ABC = ∠ECB = 90°
∴ BY SAS criterion of congruence
ΔABC ≅ ΔECB
⇒ AC = EB = 2BD [By CPCT and also D is a midpoint of AC and BE]
⇒ BD = \(\frac {1}{2}\) AC Hence, proved.

JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 7 Triangles

Question 2.
In a right-angled triangle, one acute angle is double the other. Prove that the hypotenuse is double the smallest side.
Solution :
Let ΔABC is a right triangle such that ∠B = 90° and ∠ACB = 2∠CAB, then we have to prove AC = 2BC. We produce CB to D such that BD = CB and join AD. Let
⇒ ∠ACB = 2x and ∠CAB = x
JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 7 Triangles - 2
Proof: In ΔABD and ΔABC, we have
BD = BC (By construction)
AB = AB [Common]
∠ABD = ∠ABC = 90°
∴ By SAS criterion of congruence we get
ΔABD ≅ ΔABC
⇒ AD = AC and ∠DAB = ∠CAB
(By CPCT)
⇒ AD = AC and ∠DAB = x[∵ ∠CAB = x]
Now, ∠DAC = ∠DAB + ∠CAB = x + x = 2x
∴ ∠DAC = ∠ACD
⇒ DC = AD
[Sides opposite to equal angles] (∵ DC = 2BC)
⇒ 2BC = AD
⇒ 2BC = AC (AD = AC)
Hence, Proved.

Question 3.
In figure, T is a point on side QR of ΔPQR and S is a point such that RT = ST. Prove that PQ + PR > QS.
JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 7 Triangles - 3
Solution :
In ΔPQR we have
PQ + PR > QR
⇒ PQ + PR > QT + TR
⇒ PQ + PR > QT + ST
[∵ RT = ST]
In ΔQST, QT + ST > SQ
∴ PQ + PR > SQ Hence, proved.

JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 7 Triangles

Question 4.
In the given figure, PQ = QR and ∠x = ∠y. Prove that AR = PB.
JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 7 Triangles - 4
Solution :
Proof: In the figure, ∠QAR + ∠PAR = 180°(Linear pair axiom)
⇒ ∠QAR + ∠x = 180°
⇒ ∠QAR = 180° – ∠x°
Similarly ∠QBP + ∠RBP = 180° (Linear pair axiom)
⇒ ∠QBP + ∠y = 180°
⇒ ∠QBP = 180° – ∠y …(ii)
But given, ∠x = ∠y
∴ ∠QAR = ∠QBP [From (i) and (ii)]
Now, in ΔQAR and ΔQBP, QR = PQ (Given)
∠QAR = ∠QBP (As proved above)
∠Q = ∠Q (Common)
⇒ ΔQAR = ΔQBP
(AAS congruence rule)
⇒ AR = PB (CPCT)
Hence proved.

Question 5.
Diagonal AC and BD of quadrilateral ABCD intersect each other at O. Prove that
(i) AB + BC + CD + DA > AC + BD
(ii) AB + BC + CD + DA < 2 (AC + BD)
JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 7 Triangles - 5
Solution :
Given: AC and BD are the diagonals of quadrilateral ABCD. (i) To prove: AB + BC + CD + DA > AC + BD
Proof: We know that the sum of any two sides of a triangle is always greater than the third side. Therefore,
In ΔABC, AB + BC > AC …(i)
In ΔBCD, BC + CD > BD …(ii)
In ΔCDA CD + DA > CA …(iii)
In ΔABD, AB + AD > BD …(iv)
Adding (i), (ii), (iii) and (iv), we get
2 (AB + BC + CD + DA) > 2 (AC + BD)
⇒ AB + BC + CD + DA > AC + BD
Hence proved.

(i) To prove: AB + BC + CD + DA < 2 (AC + BD) Proof : In ΔOAB, OA + OB > AB ……(i)
In ΔBOC, OB + OC > BC …(ii)
In ΔCOD, OC + OD > CD …(iii)
In ΔAOD, OA + OD > DA …(iv)
Adding (i), (ii), (iii) and (iv), we get
2 (OA + OB + OC + OD) > AB + BC + CD + DA
2 [(OA + OC) + (OB + OD)] > AB + BC + CD + DA
2 (AC + BD) > AB + BC + CD + DA
AB + BC + CD + DA < 2 (AC + BD)
Hence proved

Multiple Choice Questions

Question 1.
If the three altitudes of a Δ are equal then triangle is :
(a) isosceles
(b) equilateral
(c) right-angled
(d) none
Solution :
(b) equilateral

JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 7 Triangles

Question 2.
ABCD is a square and P, Q, R are points on AB, BC and CD respectively such that AP = BQ = CR and ∠PQR = 90°, then ∠QPR =
(a) 45°
(b) 50°
(c) 60°
(d) 75°
Solution :
(a) 45°

Question 3.
In a ΔXYZ, LM ⊥ YZ and bisectors YN and ZN of ∠Y and ∠Z respectively meet at Non LM then YL + ZM =
(a) YZ
(b) XY
(c) XZ
(d) LM
Solution :
(d) LM

JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 7 Triangles

Question 4.
In a ΔPQR, PS is bisector of ∠P and ∠Q = 70°, ∠R = 30°, then
(a) QS > PQ > PR
(b) QS < PQ < PR
(c) PQ > QS > SR
(d) PQ < QS < SR
Solution :
(b) QS < PQ < PR

Question 5.
If D is any point on the side BC of a ΔABC, then:
(a) AB + BC + CA > 2AD
(b) AB + BC + CA < 2AD
(c) AB + BC + CA > 3AD
(d) None of these
Solution :
(a) AB + BC + CA > 2AD

Question 6.
For given figure, which one is correct:
(a) ΔABC ≅ ΔDEP
(b) ΔABC ≅ ΔFED
(c) ΔABC ≅ ΔDFE
(d) ΔABC ≅ ΔEDF
JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 7 Triangles - 6
Solution :
(a) ΔABC ≅ ΔDEP

JAC Class 9 Maths Important Questions Chapter 7 Triangles

Question 7.
In a right-angled triangle, one acute angle is double the other then the hypotenuse is :
(a) Equal to the smallest side
(b) Double the smallest side
(c) Triple the smallest side
(d) None of these
Solution :
(d) None of these