JAC Class 12 Geography Solutions Chapter 6 जल संसाधन

Jharkhand Board JAC Class 12 Geography Solutions Chapter 6 जल संसाधन Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 12 Geography Solutions Chapter 6 जल संसाधन

JAC Class 12 Geography Solutions Chapter 6 जल संसाधन

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. निम्नलिखित में से जल किस प्रकार का संसाधन है?
(क) अजैव संसाधन
(ग) जैव संसाधन
(ख) अनवीकरणीय संसाधन
(घ) चक्रीय संसाधन।
उत्तर:
(घ) चक्रीय संसाधन।

2. निम्नलिखित नदियों में से, देश में किस नदी में सबसे ज्यादा पुनः पूर्तियोग्य भौम जल संसाधन है?
(क) सिंधु
(ग) गंगा
(ख) ब्रह्मपुत्र
(घ) गोदावरी।
उत्तर;
(ग) गंगा।

3. घन कि० मी० में दी गई निम्नलिखित संख्याओं में से कौन-सी संख्या भारत में कुल वार्षिक वर्षा दर्शाती है?
(क) 2,000
(ख) 3,000
(ग) 4,000
(घ) 5,000.
उत्तर:
(ग) 4,000.

4. निम्नलिखित दक्षिण भारतीय राज्यों में से किस राज्य में भौम जल उपयोग (% में) इसके कुल भौम जल संभाव्य से ज्यादा है?
(क) तमिलनाडु
(ग) आंध्र प्रदेश
(ख) कर्नाटक
(घ) केरल।
उत्तर:
(क) तमिलनाडु।

5. देश में प्रयुक्त कुल जल का सबसे अधिक समानुपात निम्नलिखित सेक्टरों में से किस सेक्टर में है?
(क) सिंचाई
(ग) घरेलू उपयोग
(ख) उद्योग
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर;
(क) सिंचाई।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें

प्रश्न 1.
यह कहा जाता है कि भारत में जल संसाधनों में तेजी से कमी आ रही है। जल संसाधनों की कमी के लिए उत्तरदायी कारकों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारत में जल-संसाधनों की तेजी से कमी आ रही है। इसके निम्नलिखित कारण हैं

  1. जल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता कम हो रही है।
  2. जनसंख्या बढ़ने से जल का उपयोग बढ़ रहा है।
  3. जल संसाधन औद्योगिक क्षेत्र के तेजी से प्रयोग हो रहे हैं।
  4. कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए जल सिंचाई आवश्यक है।
  5. जल प्रदूषण कई कारणों से बढ़ रहा है। इसलिए उपयोगी जल संसाधनों की उपलब्धता सीमित हो रही है।

प्रश्न 2.
पंजाब, हरियाणा और तमिलनाडु राज्यों में सबसे अधिक भौम जल विकास के लिए कौन-से कारक उत्तरदायी हैं?
उत्तर:
पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु में कृषि विकास के कारण भौम जल विकास अधिक है। यहां गेहूं, चावल की फ़सलों की सिंचाई आवश्यक है। यहां हरित-क्रान्ति के कारण भी भौम जल का अधिक प्रयोग किया जाता है। यहां कुल निवल क्षेत्र का 75% भाग सिंचित है।

प्रश्न 3.
देश में कुल उपयोग किए गए जल में कृषि क्षेत्र का हिस्सा कम होने की सम्भावना क्यों है?
उत्तर:
भविष्य में उद्योगों तथा घरेलू सेक्टर में जल के उपयोग बढ़ने के कृषि क्षेत्र का हिस्सा कम होने की सम्भावना है।

प्रश्न 4.
लोगों पर संदूषित जल/गन्दे पानी के उपभोग के क्या सम्भव प्रभाव हो सकते हैं?
उत्तर:
संदूषित जल के कारण सामान्य रूप से उत्पन्न होने वाली बीमारियां ये हैं-अतिसार, रोहा, आंतों के कृमि, पीलिया आदि। विश्व बैंक और विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारत में एक-चौथाई संक्रामक रोग जल से पैदा होते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें

प्रश्न 1.
देश में जल संसाधनों की उपलब्धता की विवेचना कीजिए और इसके स्थानिक वितरण के लिए उत्तरदायी निर्धारित करने वाले कारक बताइए।
उत्तर:
जल संसाधन की उपलब्धता-धरातलीय जल के चार मुख्य स्रोत हैं-नदियां, झीलें, तलैया और तालाब।

  1. देश में कुल नदियों तथा उन सहायक नदियों, जिनकी लम्बाई 1.6 कि० मी० से अधिक है, को मिलाकर 10,360 नदियां हैं।
  2. भारत में सभी नदी बेसिनों में औसत वार्षिक प्रवाह 1,869 घन कि० मी० होने का अनुमान किया गया है।
  3. फिर भी स्थलाकृतिक, जलीय और अन्य दबावों के कारण प्राप्त धरातलीय जल का केवल लगभग 690 घन कि० मी० (32%) जल का ही उपयोग किया जा सकता है।

स्थानिक वितरण के कारक:

  1. वर्षा-नदी में जल प्रवाह इसके जल ग्रहण क्षेत्र के आकार अथवा नदी बेसिन और इस जल ग्रहण क्षेत्र में हुई वर्षा पर निर्भर करता है।
  2. भारत में वर्षा में अत्यधिक स्थानिक विभिन्नता पाई जाती है और वर्षा मुख्य रूप से मानसूनी मौसम संकेन्द्रित है।
  3. नदियां-भारत में कुछ नदियां, जैसे-गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु के जल ग्रहण क्षेत्र बहुत बड़े हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र और बराक नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा अपेक्षाकृत अधिक होती है। ये नदियाँ यद्यपि देश के कुल क्षेत्र के लगभग एक-तिहाई भाग पर पाई जाती हैं जिनमें कुल धरातलीय जल संसाधनों का 60 प्रतिशत जल पाया जाता है।
  4. मौसमी नदियां-दक्षिणी भारतीय नदियों, जैसे-गोदावरी, कृष्णा और कावेरी में वार्षिक जल प्रवाह का अधिकतर भाग काम में लाया जाता है लेकिन ऐसा ब्रह्मपुत्र और गंगा बेसिनों में अभी भी सम्भव नहीं हो सका है।

प्रश्न 2.
जल संसाधनों का ह्रास सामाजिक द्वन्द्वों और विवादों को जन्म देते हैं। इसे उपयुक्त उदाहरणों सहित समझाइए।
उत्तर:
जल एक प्राकृतिक व नवीकरण संसाधन है। किसी देश की आर्थिकता में एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है। जलसंसाधन दिन-प्रतिदिन कम हो रहे हैं। इनके आबंटन व नियन्त्रण पर कई प्रकार के द्वन्द्व तथा विवाद उठ खड़े हुए हैं। कई राज्यों के बीच यह एक विचार तथा तनाव का विषय है जैसे

  1. पंजाब, हरियाणा, हिमाचल की नदियों के जल का बंटवारा एक राजनीतिक विवाद बन गया है।
  2. कर्नाटक व तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी का जल एक लम्बे समय से विवाद विषय है।
  3. नर्मदा बेसिन का जल प्रवाह महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात के बीच विवाद का विषय है।

प्रश्न 3.
जल-संभर प्रबन्धन क्या है ? क्या आप सोचते हैं कि यह सतत् पोषणीय विकास में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है ?
उत्तर:
जल संभर प्रबंधन-जल संभर प्रबन्धन से तात्पर्य, मुख्य रूप से, धरातलीय और भौम जल संसाधनों के दक्ष प्रबन्धन से है।
विधियां (Methods): इसके अन्तर्गत बहते जल को रोकना और विभिन्न विधियों, जैसे-अंत: स्रवण, तालाब, पुनर्भरण, कुओं आदि के द्वारा भौम जल का संचयन और पुनर्भरण शामिल हैं।

उद्देश्य: विस्तृत अर्थ में जल संभर प्रबन्धन के अन्तर्गत सभी संसाधनों-प्राकृतिक जैसे-भूमि, जल, पौधे और प्राणियों) और जल संभर सहित मानवीय संसाधनों के संरक्षण, पुनरुत्पादन और विवेकपूर्ण उपयोग को सम्मिलित किया जाता है। जल संभर प्रबन्धन का उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों और समाज के बीच सन्तुलन लाना है। जल-संभर व्यवस्था की सफलता मुख्य रूप से सम्प्रदाय के सहयोग पर निर्भर करती है।

कार्यक्रम: केन्द्रीय और राज्य सरकारों ने देश में बहुत-से जल-संभर विकास और प्रबन्धन कार्यक्रम चलाए हैं। इनमें से कुछ गैर सरकारी संगठनों द्वारा भी चलाए जा रहे हैं।
1. ‘हरियाली’ केन्द्र सरकार द्वारा प्रवर्तित जल-संभर विकास परियोजना है जिसका उद्देश्य ग्रामीण जनसंख्या को पीने, सिंचाई, मत्स्य पालन और वन रोपण के लिए जल संरक्षण के लिए योग्य बनाना है। परियोजना लोगों के सहयोग से ग्राम पंचायतों द्वारा निष्पादित की जा रही है।

2. नीरू-मीरू (जल और आप) कार्यक्रम (आन्ध्र प्रदेश में) और

3. अरवारी पानी संसद् (अलवर राजस्थान में) के अन्तर्गत लोगों के सहयोग से विभिन्न जल संग्रहण संरचनाएँ जैसे-अन्तः स्रवण तालाब ताल (जोहड़) की खुदाई की गई है और रोक बांध बनाए गए हैं। तमिलनाडु में घरों में जल संग्रहण संरचना को बनाना आवश्यक कर दिया गया है। किसी भी इमारत का निर्माण बिना जल संग्रहण संरचना बनाए नहीं किया जा सकता है।

4. सतत्पोषणीय विकास: कुछ क्षेत्रों में जल-संभर विकास परियोजनाएं पर्यावरण और अर्थव्यवस्था का कायाकल्प करने में सफल हुई हैं। फिर भी सफलता कुछ की ही कहानियां हैं। अधिकांश घटनाओं में, कार्यक्रम अपनी उदीयमान अवस्था पर ही हैं। देश में लोगों के बीच जल संभर विकास और प्रबन्धन के लाभों को बताकर जागरूकता उत्पन्न करने की आवश्यकता है और इस एकीकृत जल संसाधन प्रबन्धन उपागम द्वारा जल उपलब्धता सतत् पोषणीय आधार पर निश्चित रूप से की जा सकती है।

जल संसाधन JAC Class 12 Geography Notes

→ जल संसाधन (Water Resources): जल एक राष्ट्रीय संसाधन है।

→ जल के प्रमुख स्रोत (Sources of Water): पृष्ठीय जल, भौम जल, वायुमण्डलीय जल और महासागरीय जल।

→ औसत वार्षिक जल प्रवाह (Mean Annual Flow): 1869 अरब घन मीटर।

→ भौम जल क्षमता (Ground Water): 433.9 अरब घन मीटर।

→ जल सिंचित क्षेत्र (Irrigated Area): 8.47 करोड़ हेक्टेयर।

→ नहरों द्वारा सिंचाई (Canal Irrigation): 39.9 प्रतिशत क्षेत्र।

→ जलविद्युत् उत्पादन (Hydro Electric Power): 84,000 मैगावाट।

→ जल प्रदूषण (Water Pollution): एक गम्भीर समस्या।

→ वर्षा जल संग्रहण (Rain Water Harvesting): भौम जल के पुनर्भरण की तकनीक।

JAC Class 7 Social Science Solutions Geography Chapter 4 Air

JAC Board Class 7th Social Science Solutions Geography Chapter 4 Air

JAC Class 7th Geography Air InText Questions and Answers

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Question 1.
Is global warming a serious issue in today’s world?
Answer:
Concern about climate change is much less pervasive in the United States, China and Russia than among other leading nations. Just 44% in the U.S. and Russia, and even fewer in China (30%), consider global warming to be a very serious problem.

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Question 2.
For ten days note down weather report from a local newspaper and observe the changes occurring in the weather.
Answer:
Students need to do it by their own.

JAC Class 7 Social Science Solutions Geography Chapter 4 Air

JAC Class 7th Geography Air Textbook Questions and Answers

Question 1.
Answer the following questions.
(i) What is atmosphere?
Answer:
Atmosphere is a huge layer of air that surrounds the earth. It shields and guard us from the harmful rays of the sun. rays of the sun. rays of the sun.

(ii) Which two gases make the bulk of the atmosphere?
Answer:
The two gases which make the bulk of the atmosphere are nitrogen (78% ) and oxygen (21%).

(iii)
Which gas creates greenhouse effect in the atmosphere?
Answer:
The gas which creates greenhouse effect in the atmosphere is carbon dioxide.

(iv) What is weather?
Answer:
An hour to hour, day to day condition of the atmosphere is called as the weather. It is the total atmospheric conditions of a particular place at a particular time regarding temperature, air pressure, clouds, wind, humidity, etc.

(v) Name three types of rainfall?
Answer:
Three types of rainfall are:

  • Convectional rainfall
  • Orographic rainfall
  • Cyclonic rainfall

(vi) What is air pressure?
Answer:
Air pressure is the pressure which is exerted by the weight of air on the earth’s surface.

Tick (√) the correct answer.

Question 2.
(i) Which of the following gases protects us from harmful sun rays?
(a) Carbon dioxide
(b) Nitrogen
(c) Ozone
Answer:
(c) Ozone

(ii) The most important layer of the atmosphere is
(a) Troposphere
(b) Thermosphere
(c) Mesosphere
Answer:
(a) Troposphere

(iii) Which of the following layers of the atmosphere is free from clouds?
(a) Troposphere
(b) Stratosphere
(c) Mesosphere
Answer:
(b) Stratosphere

JAC Class 7 Social Science Solutions Geography Chapter 4 Air

(iv) As we go up the layers of the atmosphere, the pressure
(a) Increases
(b) Decreases
(c) Remains the same
Answer:
(b) Decreases

(v) When precipitation comes down to the earth in the liquid form, it is called
(a) Cloud
(b) Rain
(c) Snow
Answer:
(b) Rain

Question 3.
Match the following.

(i) Trade winds(a) Incoming solar energy
(ii) Loo(b) Seasonal wind
(iii) Monsoon(c) Horizontal movement of Air
(iv)Wind(d) Layer of ozone gas
(e) Permanent wind
(f) Local wind

Answer:

(i) Trade winds(e) Permanent wind
(ii) Loo(f) Local wind
(iii) Monsoon(b) Seasonal wind
(iv) Wind(c) Horizontal movement of air

 

Question 4.
Give reasons.

  1. Wet clothes take longer time to dry on a humid day?
  2. Amount of insolation decreases from equator towards poles?

Answer:
1. The air is full of water vapour on a humid day. So, the evaporation is very slow due to low temperature. That’s why, wet clothes take longer time to dry on a humid day.

2. On equator, insolation comes through on vertical rays. So, it covers up less amount of space but more heat is felt when it goes up from equator towards poles and the sun rays become slanting. Though slanting rays heat up more amount of space, the level of hotness is felt less. That’s why, amount of insolation decrease from equator towards poles.

Question 5.
(For Fun)

(i) Solve this crossword puzzle with the help of given clues:
JAC Class 7 Social Science Solutions Geography Chapter 4 Air 1

Across:
6. An Indian tree having extraordinary quality of providing oxygen round the clock
8. Gas present in atmosphere occupying only 0.03% by volume
11. Outermost layer of atmosphere
12. Mixture of many gases
14. Life giving gas
15. Air in motion
16. An indian tree valued highly for medicinal properties
18. Gas protecting us from harmful sun rays
19. Low pressure area

Down
1. Amount of water vapour in air
2. Condensation of water vapours around dust particles in atmosphere
3. Example of local wind blowing in summer in northern india
4. Short term changes in atmosphere
5. Precipitation in liquid form
7. Blanket of air around the earth
9. Instrument to measure pressure
10. Incoming solar radiation
13. Reduces visibility in winters
17. It is time when sun is overhead
Answer:

Across:
6. Peepal
11. Exosphere
14. Oxygen
16. Neem
19. Cyclone

Down:
1. Humidity
3. Loo
5. Rain
9. Barometre
10. Insolation
17. Noon
8. Carbon dioxide
12. Air
15. Wind
18. Ozone

(ii) Make a weather calendar for one week. Use pictures or symbols to show different types of weather. You can use more than one symbol in a day, if the weather changes. For example, the sun comes out when rain stops. An example is given below:

Answer:
Hint: Students can do it in this manner.
JAC Class 7 Social Science Solutions Geography Chapter 4 Air 2

JAC Class 7 Social Science Solutions Geography Chapter 4 Air 3

JAC Class 7th Geography Air Important Question and Answers

Multiple Choice Questions

Question 1.
In the atmosphere, the most abundant gas is
(a) Oxygen
(b) Carbon dioxide
(c) Nitrogen
(d) Helium
Answer:
(c) Nitrogen

Question 2.
The winds which below constantly throughout the year in a particular direction is known as
(a) Local winds
(b) Seasonal winds
(c) Permanent winds
(d) None of the these
Answer:
(a) Local winds

JAC Class 7 Social Science Solutions Geography Chapter 4 Air

Question 3.
An hour to hour, day to day condition of the atmosphere is known as
(a) temperature
(b) weather
(c) climate
(d) degree
Answer:
(b) weather

Question 4.
Exosphere is the layer of the atmosphere.
(a) uppermost
(b) middle
(c) lower most
(d) none of these
Answer:
(a) uppermost

Question 5.
The thermosphere extends between
(a) 90 – 370 km
(b) 100 – 350 km
(c) 50 – 300 km
(d) 80 – 400 km
Answer:
(d) 80 – 400 km

Question 6.
The balance of and gets disturbed, if we cut down trees and forests.
(a) oxygen, helium
(b) nitrogen, heiium
(c) oxygen, carbon dioxide
(d) oxygen, nitrogen
Answer:
(c) oxygen, carbon dioxide

Question 7.
The air which we inhale and exhale means breathe exists in the
(a) mesosphere
(b) stratosphere
(c) troposphere
(d) exosphere
Answer:
(c) troposphere

Question 8.
The instrument which measures the temperature is
(a) Barometer
(b) Thermometer
(c) Wind vane
(d) None of these
Answer:
(b) Thermometer

Question 9.
In the atmosphere, the ozone layer exists in the
(a) Stratosphere
(b) Exosphere
(c) Mesosphere
(d) Troposphere
Answer:
(a) Stratosphere

Question 10.
The other name of greenhouse gas is
(a) oxygen
(b) nitrogen
(c) argon
(d) carbon dioxide
Answer:
(b) nitrogen

Very Short Answer Type Questions

Question 1.
What do you mean by smog?
Answer:
Smog is the combination of smoke and fog. It generally occurs during winter season.

Question 2.
What will happen if there is very less rainfall?
Answer:
Water scarcity and drought occurs if there is very less rainfall.

JAC Class 7 Social Science Solutions Geography Chapter 4 Air

Question 3.
What are the various forms of precipitation?
Answer:
Various forms of precipitation are rain,snow, sleet and hail.

Question 4.
Give a word/term for the hot and dry wind of northern plains of India.
Answer: Loo.

Question 5. Air pressure is highest at which area?
Answer:
Air pressure is highest at the sea level

Question 6.
What are the three types of winds?
Answer:
The three types of winds are:

  • Permanent winds
  • Seasonal winds
  • Local winds.

Question 7.
When air is heated, what occurs?
Answer:
Air expands and becomes lighter and goes up when the air is heated.

Question 8.
Ozone layer is important for us. Why?
Answer:
Ozone layer is important for us because it protects and shields us from harmful reactions and effects of the sun rays.

Question 9.
Green plants use carbon dioxide. Why?
Answer:
Green plants use carbon dioxide because it helps them to prepare their food and release oxygen.

Question 10.
What is the consequence and importance of greenhouse gas?
Answer:
The consequence and importance of greenhouse gas is that the earth would have been too cold to live in.

Short Answer Type Questions

Question 1.
What are the instruments called for the measurement of air pressure and the measurement of amount of rainfall?
Answer:
The instruments are called as barometer for the measurement of air pressure and rain gauge for the measurement of amount of rainfall.

Question 2.
What do you mean by a climate of a place or area?
Answer:
The average weather condition of a place or area for a longer period of time constitutes the climate of a place.

Question 3.
What are permanent winds?
Answer:
Winds which blow constantly throughout the year in a particular direction is called as the permanent winds. The trade wind, westerlies and easterlies are the permanent winds.

Question 4.
What is the role of water vapour?
Answer:
One of the major component of the atmosphere is water vapour and it plays a very important role in climatic changes and results in precipitation.

JAC Class 7 Social Science Solutions Geography Chapter 4 Air

Question 5.
How many types of pollutants are found in the atmosphere?
Answer:
There are mainly two types of pollutants found in the atmosphere

  • Gaseous – carbon dioxide and smog
  • Solid – dust and bacteria

Question 6.
Which ty pe of pressure are exerted by cold and hot air?
Answer:
The air expands when heated up hence becomes lighter and goes up. Cold air is heavy and dense so it tends to go down and sinks. When hot air goes up and rises, from surrounding areas, cold air rushes to fill the gap.

Question 7.
Explain the temperature in cities are much higher than that of the villages.
Answer:
In the cities, we find many high rise buildings. The fnetals and concretes in these buildings and the asaphalt of roads get heated up during the day and this heat is released in the night.The other important cause is that in the cities the crowded buildings trap the warm air and hence raise the temperature of the cities. Therefore, the temperature in cities are much higher than that of the villages.

Question 8.
Poles are covered with snow always. Why?
Answer:
From the equator towards the poles the amount of insolation decreases. Hence, the temperature decreases in the same manner. This is the reason why poles are covered with snow always..

Question 9.
What do you mean by global warming?
Answer:
Global warming happens when the level of carbon dioxide increases in the atmosphere due to factory smoke or car fumes and the heat retained increases the temperature of the earth.

JAC Class 7 Social Science Solutions Geography Chapter 4 Air

Question 10.
Rainfall is important for us when there is excess rain, what happens?
Answer:
For the survival of animals and plants,rainfall is very important. It actually brings fresh water to the surface of the earth. There is water scarcity and drought like situation when there is less rainfall. And, if there is excess rainfall then floods take place which makes the life very difficult to sustain. Many things get damaged such as crops, houses, etc.

Question 11.
In which manner bacteria help plants use nitrogen?
Answer:
For the plant’s survival, nitrogen is very crucial and important. But plants cannot take nitrogen directly from the atmosphere. Hence, bacteria that lives in the soil and roots of some plants take nitrogen from air and changes its form so that the plant can use it.

Long Answer Type Questions

Question 1.
Discuss the different layers of the atmosphere.
Answer:
The atmosphere has five different layers. They are:

  • Troposphere
  • Stratosphere
  • Mesosphere
  • Thermosphere
  • Exosphere
  • Troposphere:
    All the weather characteristics occurs here such as fog, rainfall, hailstorm. This is the thickest and the most important layer of the atmosphere. It has the average height of 13 km. We also find the air which we breathe.
  • Stratosphere:
    It lies just above the troposphere and presents the ideal conditions for flying aeroplanes. Stratosphere extends upto a height of 50 km. It also contains the ozone gas layer which protects us from harmful ultraviolet rays of the sun.
  • Mesosphere:
    It lies above the stratosphere. It extends upto the height of 80 kms. In this layer, meteorites bum up on entering from the space.
  • Thermosphere:
    It lies just above the mesosphere. It extends between 80 400 km. Temperature rises very fast with the increase in height in this layer. In thermosphere, radio waves are transmitted from the earth are reflected back to the earth.
  • Exosphere:
    This is the last and the uppermost layer with very thin air. Light gases such as helium and hydrogen float -into the space from exosphere.

Question 2.
What are the different constituents of air? How they are important to us?
Answer:
The different constituents of air are oxygen, nitrogen, carbon dioxide, ozone, helium, argon and hydrogen. Besides these gases, the air also contains some amount of water vapour and dust particles. They are important to us in many ways:

Oxygen:
It is one of the major gas and second most in volume which makes up about 21% of the air. It is also called as life supporting gas. The atmosphere is continuously recharged and restored of oxygen by green plants through the photosynthesis process and thus keeps a healthy and efficient balance of oxygen in the air. Nitrogen: The total volume of nitrogen is about 78% in the air. The major amount of nitrogen is not utilized in our body system when we inhale. But, plants need nitrogen for the well being and survival.

They absorb it through soil and plant roots. Carbon Dioxide: Carbon dioxide is composed of very small percentage around 0.03% of the air. Then also, it is one of the important gas in maintaining the life cycle of plants on the earth. Carbon dioxide absorbs heat of the sun and warms up the lower atmosphere of the surface of the earth. It is taken by the green plants when human beings and animals release it.

JAC Class 7 Social Science Solutions

JAC Class 7 Social Science Solutions History Chapter 5 Rulers and Buildings

JAC Board Class 7th Social Science Solutions History Chapter 5 Rulers and Buildings

JAC Class 7th History Rulers and Buildings InText Questions and Answers

Question 1.
What would have been the impact of a building like the Qutb Minar on observers in the thirteenth century?
Answer:
The building like Qutb Minar would have had a huge impact such as that of Taj Mahal or Red Fort today, on the observers in the thirteenth century.

Question 2.
What differences do you notice between the shikharas of the two temples? Can you make out that the shikhara of the Rajarajeshvara temple is twice as high as that of the Kandariya Mahadeva?
Answer: Between the shikharas of the two
temples, the difference of height can be noticed. The shikhara of the Rajarajeshvara temple is twice as high as that of the Kandariya Mahadeva which is easily seen.

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Question 3.
Compare figures 2(a) and 2(b) with figures 5(a) and 5(b).
JAC Class 7 Social Science Solutions History Chapter 5 Rulers and Buildings 1

Answer:
The figures in 2(a) and 2(b) have apex shape. This is the “trabeate” or “corbelled” style of architecture. The figures 5(a) and 5(b) have curved shape. This is “arcuate” style of architecture.

JAC Class 7 Social Science Solutions History Chapter 5 Rulers and Buildings

Question 4.
Describe what the labourers are doing, the tools shown, and the means of carrying stones.
Answer:
The labourers are placing cemented plaster to construct the floor of the fort. Some of them are carrying stones by rolling it by big iron rods or by carrying it on shoulders. Some are assisting the masons. Some horses are also engaged to carry stones and other construction materials.

Question 5.
In what ways do you think the policies of Rajendra I and Mahmud of Ghazni were a product of their times? How were the actions of the two rulers different?
Answer:
The two contemporaries Rajendra I and Mahmud of Ghazni attacked and looted the temples of other states and kings and considered it as a normal activity. Temples showed power and honour for any king and by destroying the temple, the king and his statements were humiliated.

The only difference in the actions of Rajendra I and Mahmud Ghazni was that latter destroyed Hindu temples in order to become a hero of Islam. Whereas, Rajendra I destroyed temples and re-established their deities at the temples that he constructed in his state. Mahmud of Ghazni used the occupied wealth of temples in constructing a capital city for himself.

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Question 6.
Lookat theillustration and try to identify the bell towers.

JAC Class 7 Social Science Solutions History Chapter 5 Rulers and Buildings 2

Answer:
The bell towers are those wh.ch are constructed in the last floor and stand tallest in the building.

Question 7.
Imagine you are an artisan standing on a tiny wooden platform held together by bamboo and rope fifty metres above the ground. You have to place an inscription under the first balcony of the Qutb Minar. How would you do this?
Answer:
I would stand up on the tinny wooden platform held together by bamboo and rope fifty meters above the ground. And then I would do the work of inscribing by the tools such as hammer and chisel.

JAC Class 7th History Rulers and Buildings Textbook Questions and Answers

( Let’s Recall)

Question 1.
How is the “trabeate” principle of architecture different from “arcuate”?
Answer:
The difference is that in “trabeate” principle of architecture, roofs, doors and windows were made by placing in a horizontal beam across two vertical columns. Whereas, in “arcuate” form, the weight of the superstructure above the doors and windows are carried by arches.

JAC Class 7 Social Science Solutions History Chapter 5 Rulers and Buildings

Question 2.
What is a shikhara?
Answer:
The highest roof of a Hindu temple is called a ‘Shikhara’. The Rajarajeshvara temple at Thanjavur had the tallest shikhara among the temples of its time. Constructing it was not easy because there were no cranes in those days and the ninety tonne stone for the top of the shikhara was too heavy to lift manually.

Question 3.
What is pietra-dura?
Answer:
Pietradura is the coloured hard stones placed in depressions carved into marble or sandstone, creating beautiful and ornate patterns. Behind the emperor Shah Jahan’s throne were a series of pietradura inlays that depicted the legendary Greek god Orpheus playing the lute. It was believed that Orpheus’s music could calm ferocious beasts until they coexisted with humans peacefully.

Question 4.
What are the elements of a Mughal Chahar bagh garden?
Answer:
Char bagh gardens were gardens placed within rectangular walled enclosures and divided into four quarters by artificial channels. These gardens were called ‘Chahar bagh’x.Q ., four gardens because of their symmetrical division into quarters. The chahar bagh garden also had a variation that historians describe as the “riverfront garden”. This dwelling was not located in the middle of the chahar bagh but at its edge, close to the bank of the river.

(Let’s Understand)

Question 5.
How did a temple communicate the importance of a king?
Answer:
Temple communicate the importance of a king in the following manner:

  • They were meant to exhibit the powe r, wealth and devotion of the ruler.
  • The name of the god and the king were similar as god’s name was considered auspicious.
  • The king also got a chance to proclaim their close relationships with god.
  • Kings usually constructed large temples. As they worshipped their deities together in the royal temples, it seemed as if they brought the just rule of the gods on earth.
  • The temple was a miniature model of the world ruled by the king and his allies.

Question 6.
An inscription in Shah Jahan’s diwan-i khas in Delhi stated: “If there is Paradise on Earth, it is here, it is here, it is here.” How w as this image created?
Answer:
During Shah Jahan’s reign, the different elements of Mughal architecture were fused together in a grand harmonious synthesis. His reign witnessed a huge amount of construction activity, especially in Agra and Delhi. The ceremonial halls of the public and private audience (Diwan-i khas and Diwan-i-am) were carefully planned. These courts were placed within a large courtyard and were described as ‘Chihil Sutun’ or forty-pillared halls.

The audience halls wrere specially constructed to resemble a mosque, and the pedestal on which Shah Jahan’s throne was placed was frequently described as the ‘Question ibla’, i.e., the direction faced by Muslims at prayer. ‘ The idea of the king as a representative of God on earth was suggested by these architectural features.

Question 7.
How did the Mughal court suggest that everyone the rich and the poor, the powerful and the weak  received justice equally from the emperor?
Answer:
The Mughal court which had the Diwan- i-aam suggested that everyone the rich and the poor, the powerful and the weak received justice which was made for all in an equal way. Shah Jahan’s audience hall was constructed and designed in such a way to communicate that the king’s justice was equal for the high and the low.

Its aim was to create a world where all could live together in harmony. He also hanged a golden chain in front of his Taj Mahal. Anyone at anytime w’ho need justice can strike that bell. There w’as no difference between the rich and poor in the emperor’s court.

JAC Class 7 Social Science Solutions History Chapter 5 Rulers and Buildings

Question 8.
What role did the Yamuna play in the layout of the new Mughal city at Shahjahanabad?
Answer:
The river Yamuna had a very crucial role in the layout of the new Mughal city at Shahjahanabad in the following way:
In Shahjahanabad, the imperial palace commanded the river-front. Only the most favoured nobles were given access to the river. Shah Jahan chose the river-front garden in the layout of the Taj Mahal.

To control the access that the nobles had to the river, he developed the same architectural form. Only the exceptionally favoured nobles like his eldest son Dara Shukoh were given access to the river. Common people had to construct their homes in the city away from the river Yamuna. It expanded the layout of the city.

(Let’s Discuss)

Question 9.
The rich and powerful construct large houses today. In what ways were the constructions of kings and their courtiers different in the past?
Answer:
The rich and powerful construct large houses today. But these houses are not the same as those of the kings and their courtiers in the past because:

  • Safety and security were the major consideration of the kings and their courtiers for the constructions. The houses had very big courtyards, huge and thick walls, domed roofs, big gardens and beautifully decorated halls. Houses and palaces were generally surrounded by water bodies.
  • Nowadays, they have less open areas and meet mainly individual requirements. The houses do not have courtyards, domed roofs. Hence, in many ways these are inferior to those of the kings and their courtiers houses.

Question 10.
Look at Figure 4. How could that
JAC Class 7 Social Science Solutions History Chapter 5 The Delhi Sultans 3
building be constructed faster today?
Answer:
Nowadays, technologies have advanced and we have many facilities, equipments, tools which can construct huge buildings veiy easily and in less time. Earlier, it was very difficult to construct them’ but they were made possible with labourers. Those buildings took a very long time. Those temples and buildings were usually constructed as a matter of pride in old days.

(Let’s Do)

Question 11.
Find out whether there is a statue of or a memorial to a great person in your village or town. Why was it placed there? What purpose does it serve?
Answer:
Since the places will be different so students can write on their own. They need to put the following points in the write up: After finding the memorial, find out in w hich location it is situated and when it was established? Who was the founder? What was its significance?

Question 12.
Visit and describe any park or garden in your neighbourhood. In what w ays is it similar to or different from the gardens of the Mughals?
Answer:
Since the places will be different, students can discuss it in the class. Few points given such as the gardens of Mughals were spread over a large area and had varieties of plants and flowers. They were also beautifully decorated and protected.

JAC Class 7th History Rulers and Buildings Important Questions and Answers

Multiple Choice Questions

Question 1.
The Kandariva Mahadeva temple had a main hall which was known as…..
(a) Mahamandir
(b) Mahamandapa
(c) Maharaksha
(d) None of these
Answer:
(b) Mahamandapa

Question 2.
The Agra Fort was built by……
(a) Babur
(b) Shah Jahan
(c) Jahangir
(d) Akbar
Answer:
(d) Akbar

Question 3.
The surface of the Qutub Minar was……..
(a) circular
(b) rectangular
(c) curved and angular
(d)triangular
Answer:
(c) curved and angular

JAC Class 7 Social Science Solutions History Chapter 5 Rulers and Buildings

Question 4.
The Taj Mahal is the grandest architectural achievement in the reign of…….
(a) Jahangir
(b) Shah Jahan
(c) Babur
(d) Akbar
Answer:
(d) Akbar

Question 5.
Whenever the kingdoms were attacked by another ruler, temples were targeted and looted. looted the famous Shiva temple at Somnath, Gujarat.
(a) Sultan of Baghdad
(b) Sultan Mahmud of Ghazni
(c) Jahangir
(d) Ibrahim Lodi
Answer:
(b) Sultan Mahmud of Ghazni

Question 6.
Indian architecture flourished under……… dynasty.
(a) Mughal
(b) Maratha
(c) Chola
(d) Rashtrakuta
Answer:
(a) Mughal

Question 7.
Babur, built formal gardens, placed within rectangular walled enclosures and divided into four quarters by artificial channels. This style of four gardens (symmetrical division into quarters) called as…..
(a) Nayan bagh
(b) Ghazal bagh
(c) Chahar bagh
(d) None of these
Answer:
(c) Chahar bagh

Question 8.
The courts like Diwan-i-khas and Diwan-i-aam, were planned very carefully and were known as forty- pillared halls, and placed within a large courtyard. These halls are known as
(a) Chihil Sutun
(b) Pishtaq
(c) Chihil khas
(d) Sutun forty
Answer:
(a) Chihil Sutun

Question 9.
Architecture Hasht-Bihisht refers to a specific type of floor-plan, common in Persian architecture and Mughal architecture, whereby the floor plan is divided into eight chambers surrounding a central room. Hasht- Bihisht means
(a) Eight paradises in water
(b) Eight chahar bagh
(c) Paradise in the eighth life
(d) Eight paradises
Answer:
(d) Eight paradises

Question 10.
The construction of baolis were done
(a) for entertainment of royals
(b) to fulfil the water demand
(c) for rainwater harvesting
(d) to provide a place for bathing for royals
Answer:
(c) for rainwater harvesting

Very Short Answer Type Questions

Question 1.
Which building was constructed by using the architectural style pietra- dura?
Answer:
The Taj Mahal was constructed by using the architectural style pietra-dura.

Question 2.
Which language has been used to write the two bands of inscription found under the balcony of Qutb Minar?
Answer:
Arabic language has been used to write the two bands of inscription found under the balcony of Qutb Minar.

Question 3.
Was Rajendra Chola one of the powerful rulers of the Chola Dynasty?
Answer:
Yes, Rajendra Chola was one of the powerful rulers of the Chola dynasty.

Question 4.
Which Mughal Emperor has mentioned about Hindustan in his biography?
Answer:
Babur has mentioned about Hindustan in his biography.

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Question 5.
What do you mean by Mahamandapa in temple?
Answer:
Mahamandapa means the main hall in the temple.

Question 6.
Madhurai, the capital of the Pandyas was invaded by which ruler?
Answer:
Sena II, invaded Madhurai, the capital of the Pandyas.

Question 7.
Which ruler won universal appreciation for constructing a large reservoir just outside Dehli-i-Kuhna?
Answer:
Sultan Iltutmish was the ruler who won universal appreciation for constructing a large reservoir just outside Dehli-i- Kuhna.

Question 8.
To which lord, Brihadesvara temple is dedicated?
Answer:
To lord Shiva, Brihadesvara temple is dedicated.

Question 9.
What do you mean by pishtaq?
Answer:
Pishtaq means the tall gateway.

Question 10.
What was the special feature of Akbar’s capital, Fatehpur Sikri?
Answer:
The special feature of Akbar’s capital, Fatehpur Sikri was the architecture of the buildings which were influenced by the styles of Malwa and Gujarat.

Short Answer Type Questions

Question 1.
What were the main traits of Shah Jahan’s city Shahjahanabad?
Answer:
Shah Jahan’s city of Shahjahanabad that he constructed was on one side of River Yamuna. The imperial palace commanded the river-front. Only specially favoured nobles were given access to the river such as his eldest son Dara Shikoh. All other people had to construct their homes in the city away from the River Yamuna.

Question 2.
What types of buildings were built between eighth and eighteenth centuries?
Answer:
Between the eighth and the eighteenth centuries, kings and their nobles built two kinds of buildings, they were: First one were forts, palaces, garden residences and tombs safe, protected and grandiose places of rest in this world. Second one were structures meant for public activity including temples, mosques, tanks, wells, caravans, sarais and bazaars.

Question 3.
Where is Panch Mahal located and for what it is known?
Answer:
Panch Mahal is the part of Fatehpur Sikri, Uttar Pradesh, India. The Panch Mahal meaning ‘Five level Palace’ was commissioned by Akbar This structure stands close to the Zenana quarters (Harem) which supports the supposition that it was used for entertainment and relaxation. It has different temples with beautiful pillars in several designs. It was built to enjoy fresh air and has five storey buildings.

Question 4.
Describe the architecture of Taj Mahal.
Answer:
The Taj Mahal incorporates and expands on design traditions of Persian and earlier Mughal architecture. The architecture of Taj Mahal was one of
the great accomplishments. Shah Jahan adapted the river-front garden in the layout of the Taj Mahal, during his reign. The white marble mausoleum was placed on a terrace by the edge of the river and the garden was to its south. Shah Jahan developed this architectural form as a means to control the access that nobles had to the river.

Question 5.
Why Rajarajeshwara temple was very difficult to construct?
Answer:
Rajarajeshwara temple was very difficult to construct because:

  • It was built in eleventh century and it had the tallest Shikhara amongst all the temples of that time.
  • Since there were no technology like these days and to lift the stones for the ” top of Shikhara of weight around 90 kgs was a tough thing and they did it manually.
  • An inclined path was built to the top of the temple, placed the boulders on the rollers and rolled it all the way to the top.
  • The path was made from 4 kms away so that it would not be so steep and easy to climb.

Question 6.
What are the two technological and stylistic developments noticeable and appreciable from the twelfth century.
Answer:
Two technological and stylistic developments that are noticeable and appreciable from the twelfth century are:-

  • The weight of the superstructure above the doors and windows was sometimes carried by arches. This style of architectural form was known as “arcuate”.
  • In construction, limestone cement was used in many folds. This was very high quality cement which when mixed with stone chips hardened into concrete. And, for this, construction of large structures was easier and faster.

Question 7.
Write a brief note on Humayun’s tomb.
Answer:
Humayun tomb’s construction started in 1564 A.D. and it took eight years to complete. It was built by Humayun’s wife, Persian queen HamTdah Banu Begam. It was designed by Persian architect Mirak MIrza Ghiyas. The construction was made in Persian method of construction. The use of stones and marbles shows Indian influence a lot.

Question 8.
What do you understand by ‘Mausoleum’?
Answer:
A ‘Mausoleum’ is an impressive building housing a tomb or group of tombs. Some of the mausoleums such as Sheikh Salim Chisti at Fatehpur Sikri and Taj Mahal at Agra are built on Persian framework.

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Question 9.
Explain briefly the Kandariya Mahadeva temple.
Answer:
The Kandariya Mahadeva Temple meaning “The Great God of the Cave”, is the largest and most ornate Hindu temple in the medieval temple group found at Khajuraho in Madhya Pradesh, India. Brief on Kandariya Mahadeva Temple

  • The Kandariya Mahadeva temple was constructed in 999 by the king Dhangadeva of the Chandela Dynasty.
  • It was dedicated to Shiva.
  • The entrance had an ornamented gateway and the main hall (mahamandapa) was there where dances were performed.
  • The image of the chief deity was kept in the main shrine known as garbhagriha. In this place only the king, his immediate family and priests gathered for ritual worship.

Question 10.
What is Islamic architecture?
Answer:
The Islamic architecture represents the order of Islam. It was a mixture of Persian, Timurid, Samarkand and Bukhara style and not entirely foreign implant on Indian scene. It is one of the world’s most renowned building traditions and known for its minarets, domes, vaulting, arches, tombs, etc.

Long Answer Type Questions

Question 1.
Explain the main architectural technique adopted in Qutub Minar. Name the people, ruler who were involved in the construction of Qutb Minar.
Answer:
The main architectural technique adopted in Qutb Minar are:

  • Qutb Minar is five storeys high.
  • It has two bands of inscription under the balcony.
  • It has the pattern under the balcony by the geometrical designs and small arches.
  • Only the most skilled craftsperson could perform this task as the surface of the minar is curved and angular.
  • It required great distinctness to place an inscription on such a surface.
  • Qutbuddin Aybak constructed the first floor around 1199. Then Iltutmish constructed it around 1229. But over the years, it was damaged by natural calamities like earthquake, lighting but repaired by Alauddin. Khalji, Muhammad TUghluq, Firuz Shah Tughluq and Ibrahim Lodi.

Question 2.
Is the statement true ‘The Mughal ruler spent their money more on architecture and art and less on improving the condition of the people’. Justify your answer.
Answer:
It is true that the Mughal rulers spent their money more on architecture and art and less on improving the condition of the people. Reasons are:

  • Most of the Mughal rulers were interested in art and architecture. They built buildings with fine patterns and designs of architecture.
  • Akbar built Fatehpur Sikri and Buland Darwaza near Agra.
  • Jahangir made beautiful gardens like Shalimar Bagh. He also built Red Fort, Jama Masjid, the greatest achievement.
  • Art and architecture was at its peak during his reign. Shah Jahan built Taj Mahal which is also one of the achievements.
  • Lots of money were required for the construction of these architectural buildings and for monuments.
  • The Mughals got it from the royal treasury without giving a thought for the welfare of the common people.
  • It would have been commendable and admirable for the Mughal emperors, if they had spent these money on improving and for the betterment of the common people.

JAC Class 7 Social Science Solutions

JAC Class 8 Social Science Solutions History Chapter 7 Civilising the Native, Educating the Nation

JAC Board Class 8th Social Science Solutions History Chapter 7 Civilising the Native, Educating the Nation

JAC Class 8th History Civilising the Native, Educating the Nation InText Questions and Answers

Page 85

Question 1.
Imagine you are living in the 1850s. You hear of Wood’s Despatch. Write about your reactions.
Answer:
Students need to do it on their own.
Hint:

  1. As an Indian one would be quite as¬tonished to reject knowledge of the east in total.
  2. Wood’s Despatch identified grave errors in our education system.
  3. The British believed that by learn¬ing English education we would be more rational, scientific but they have failed to understand our most reversed spiritual text.

Page 88

Question 2.
Imagine you were born in a poor fam¬ily in the 1850s. How would you have responded to the coming of the new system of government regulated path- shalas?
Answer:
I would have responded against the new system of government regulated pathshalas because children from poor families like me were able to attend the pathshala as the time table was flexible but the new system don’t have flexibility and have strict rules.

JAC Class 8 Social Science Solutions History Chapter 7 Civilising the Native, Educating the Nation

Question 3.
Did you know that about 50 per cent of the children going to primary school drop out of school by the time they are 13 or 14? Can you think of the various possible reasons for this fact?
Answer:
The various possible reason for this fact are:

  1. Poverty
  2. Unemployment
  3. Child labour
  4. Unavailability of schools in villages and backward areas
  5. Due to lack of knowledge and illiteracy, people don’t give importance to education.

Question 4.
Imagine you were witness to a debate between Mahatma Gandhi and Macaulay on English education. Write a page on the dialogue you heard.
Answer:
Students need to do it on their own with the help of teacher.
Hints:
Mahatma Gandhi:
In. the minds of millions of Indians, English education has created a feeling of inferiority.

Macauley:
People need to be more civilized and this can be done only by English education.

Mahatma Gandhi:
Education should be such that could help Indians to restore their self-respect and sense of dignity.

Macauley:
A single shelf of a good European Library is worth than the whole native Indian literature. And so on….

JAC Class 8th History Civilising the Native, Educating the NationTextbook Questions and Answers

(LePsRecair)

Question 1.
Match the following:

William Jonespromotion of English education
Rabindranath Tagorerespect for ancient cultures
Thomas Macaulaygurus
Mahatma Gandhilearning in a natural environment
Pathshalascritical of English education

Answer:

William Jonesrespect for ancient cultures
Rabindranath Tagorelearning in a natural environment
Thomas Macaulaypromotion of English education
Mahatma Gandhicritical of English education
Pathshalasgurus

Question 2.
State whether true or false:
(a) James Mill was a severe critic of the Orientalists.
(b) The 1854 Despatch on education was in favour of English being introduced as a medium of higher education in India.
(c) Mahatma Gandhi thought that promotion of literacy was the most important aim of education.
(d) Rabindranath Tagore felt that children ought to be subjected to strict discipline.
Answer:
(a) True
(b) True
(c) False
(d) False

(Let’s Discuss)

Question 3.
Why did William Jones feel the need to study Indian history, philosophy and law?
Answer:
William Jones felt the need to study Indian history, philosophy and law because only those texts could reveal the real ideas and laws of the Hindus and Muslims and only a new study of these texts could form the basis of future development in India.

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Question 4.
Why did James Mill and Thomas Macaulay think that European education was essential in India?
Answer:
James Mill and Thomas Macaulay thought that European education was essential in India because the education should be useful and practical. They also thought that Indians are need to be civilized and should be made familiar with the Western culture and modernisation.

Question 5.
Why did Mahatma Gandhi want to teach children handicrafts?
Answer:
Mahatma Gandhi wanted to teach children handicrafts because he felt that education ought to develop a person’s mind and soul. Literacy to read and write by itself did not count as education. People had to work with their hands, team a craft, and know how different things operated This would develop their mind and their capacity to understand.

Question 6.
Why did Mahatma Gandhi think that English education had enslaved Indians?
Answer:
Mahatma Gandhi thought that English education had enslaved Indians because of the following reasons:

  1. British education created a sense of inferiority in the minds of Indians.
  2. It made them see Western civilisation as superior and destroyed the pride they had in their own culture.
  3. Indians educated in these institutions began admiring British rule.

(let’s Do)

Question 7.
Find out from your grandparents about what they studied in school.
Answer:
Students need to do it on their own.

Question 8.
Find out about the history of your school or any other school in the area you live.
Answer:
Students need to do it on their own.
(Hint: Can write about as when the school was built and who built it. How many students are there? How the ‘ students make the school proud?)

JAC Class 8th History Civilising the Native, Educating the NationImportant Questions and Answers

Multiple Choice Questions

Question 1.
William Jones, a junior judge in Supreme court arrived in Calcutta in the year .
(a) 1785
(b) 1783
(c) 1789
(d) 1790
Answer:
(b) 1783

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Question 2.
……….. started the Asiatic Society of Bengal.
(a) William Jones
(b) Henry Thomas Colebrooke
(c) Nathaniel Halhed
(d) All of these
Answer:
(d) All of these

Question 3.
………. felt that the Indian languages should be the medium of teaching.
(a) Mahatma Gandhi
(b) Rabindranath Tagore
(c) Subhash Chandra Bose
(d) William Jones
Answer:
(a) Mahatma Gandhi

Question 4.
The poet who reacted against the introduction of Western education in India was………
(a) Premchand
(b) Rabindranath Tagore
(c) Sarojini Naidu
(d) None of the above
Answer:
(b) Rabindranath Tagore

Question 5.
William Carey was a…..
(a) Teacher
(b) British Officer
(c) Scottish missionary
(d) Merchant
Answer:
(c) Scottish missionary

Question 6.
In 1781, a madrasa was set up in ………to promote the study of Arabic, Persian and Islamic law.
(a) Calcutta
(b) Delhi
(c) Bombay
(d) Surat
Answer:
(a) Calcutta

Question 7.
The English Education Act was introduced in the year.
(a) 1855
(b) 1846
(c) 1875
(d) 1835
Answer:
(d) 1835

Question 8.
Charles Wood was the:
(a) President of the Board of Control of the Company.
(b) Governor General in India.
(c) Viceroy.
(d) English Professor.
Answer:
(a) President of the Board of Control of the Company.

Question 9.
In Shantiniketan, school was started by
(a) Aurobindo Ghose
(b) Mahatma Gandhi
(c) Sardar Vallabh Bhai Patel
(d) Rabindranath Tagore
Answer:
(d) Rabindranath Tagore

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Question 10.
Adam found that there were over ….. pathshalas in Bengal and Bihar.
(a) 2 lakhs
(b) 3 lakhs
(c) 1 lakhs
(d) 4 lakhs
Answer:
(c) 1 lakhs

Very Short Answer Type Question 

Question 1.
What do you mean by linguist?
Answer:
A linguist is a person who knows and studies several languages.

Question 2.
William Jones was a linguist as well. What languages he knew?
Answer:
William Jones knew Greek, Latin, French, English, Arabic, Persian and Sanskrit.

Question 3.
Who sharply attacked the orientalists?
Answer:
James Mill and Thomas Babington Macaulay attacked the Orientalists.

Question 4.
Who had the opinion that Colonial education created sense of inferiority in the minds of Indians?

Answer:
Mahatma Gandhi had the opinion that Colonial education created sense of inferiority in the minds of Indians.

Question 5.
In which places the universities were first established by the company in India?
Answer:
Calcutta, Madras and Bombay were the places where the universities were first established by the company in India.

Question 6.
Which year did the East India Company decide to improve the system of vernacular education?
Answer:
After 1854 the Company decided to improve the system of vernacular education.

Question 7.
What do you mean by Orientalists?
Answer:
Orientalists are those who had a scholarly knowledge of the language and culture of Asia.

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Question 8:
In pathshalas, what kind of education was given to the children?
Answer:
In pathshalas, teaching was oral and the guru decided what to teach in accordance with the needs of the students.

Question 9.
What type of task was assigned to the pandit by the Company?
Answer:
The type of task was assigned to the pandit by the Company was to visit the pathshalas and try to improve the standard of teaching.

Question 10.
In which way were Oriental institutions like the Calcutta Madrasa and Benaras Sanskrit College viewed by the British?
Answer:
The Oriental institutions like the Calcutta Madarsa and Benaras Sanskrit College were viewed as ‘temples of darkness that were falling of themselves into decay’.

Short Answer Type Question

Question 1.
What was the reason for the establishment of the Hindu College in Benaras?
Answer:
The reason for the establishment of the Hindu College in Benaras in 1791 was to encourage the study of ancient Sanskrit texts that would be useful for the administration of the country.

Question 2.
In which way Mahatma Gandhi view literacy?
Answer:
Mahatma Gandhi viewed literacy as not the end of education nor even the beginning. It is only one of the means whereby men and women can be educated Literacy in itself is not education.

Question 3.
What did Thomas Macaulay urge the British government in India?
Answer:
Thomas Macaulay urged that the British government in India stop wasting money in promoting Oriental learning as it was of no practical use.

Question 4.
The East India Company opposed to missionary activities in India. Why?
Answer:
Until 1813, the East India Company was opposed to missionary activities in India because it feared that missionary activities would provoke reaction amongst the local population and make them suspicious of British presence in India.

Question 5.
What do you understand by Wood’s Despatch?
Answer:
The Court of Directors of the East India Company in London in 1854 sent an educational dispatch to the Governor General in India. This was issued by Charles Wood, the President of the Board of the Company and hence, it has come to be called as Wood’s Despatch.

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Question 6.
What were the provisions of English Education Act of 1835?
Answer:
The provisions of English Education Act of 1835 were as follows:

  1. English was made the medium of instruction for higher education.
  2. Promotion of Oriental institutions such as the Calcutta Madrasa and Benaras Sanskrit College was stopped These institutions were seen as ‘temples of darkness that were falling of themselves into decay’.
  3. English textbooks began to be produced for schools.

Question 7.
Explain the measures introduced by the British following the 1854 Wood’s Despatch.
Answer:
Following the 1854 Wood’s Despatch, several measures were introduced by the British as follows:

  1. Education departments of the government were set up to extend control over all matters regarding education.
  2. Steps were taken to establish a system of university education. Universities were established in Calcutta, Madras and Bombay.
  3. Attempts were also made to bring about changes within the system of school education.

Question 8.
Many British officials criticised the Orientalists. Why?
Answer:
From the early nineteenth century many British officials criticized the Orientalist vision of learning because they said that knowledge of the East was full of errors and unscientific thoughts. Eastern literature was non-serious and light-hearted Hence, they argued that it was wrong on the part of the British to spend so much effort in encouraging the study of Arabic and Sanskrit language and literature.

Question 9.
William Jones discover many things in Calcutta. What were they?
Answer:
William Jones mainly discovered the ancient Indian heritage. He discovered through his studies on ancient Indian texts on law, religion, arithmetic, medicine, science, philosophy. Soon he discovered that the interests were shared by many British officials living in Calcutta that time.

Question 10.
List the main features of educational method followed in pathshalas.
Answer:
The main features of educational method followed in pathshalas were as follows:

  1. There were no formal schools.
  2. Teaching was oral and guru decided what to teach.
  3. The system of education was flexible.
  4. In some places, classes were held in open spaces.
  5. There were no fixed school fees, no books, no annual exams, no regular time-table.

Long Answer Type Question

Question 1.
Describe in brief the irregularities of pathshalas which were checked by the Company.
Answer:
Steps taken by the Company to check the irregularities of pathshalas were:

  1. It appointed a number of government pandits. Each incharge of four to five schools. The task of the pandit was to visit the pathshalas and try to improve the standard of teaching.
  2. Each guru was asked to submit periodic reports and take classes according to a regular timetable.
  3. Teaching was now to be based on textbooks and learning was to be tested through a system of annual examination.
  4. Students were asked to pay a regular fee, attend regular classes, sit on fixed seats and obey the new rules of discipline.

Question 2.
Which type of education did Mahatma Gandhi want in India?
Answer:
Mahatma Gandhi’s views on education was as follows:

  1. Mahatma Gandhi wanted an education that could help Indians recover their sense of dignity and self-respect.
  2. Mahatma Gandhi strongly felt that Indian languages should be the medium of teaching. Education in English crippled Indians, distanced them from their own social surroundings, and made them ‘strangers in their own lands’.
    Civilising the “Native”, Educating the Nation
  3. Speaking a foreign tongue, despising local culture, the English educated did not know how to relate to the masses.
  4. He argued that education ought to develop a person’s mind and soul. Literacy to read and write by itself did not count as education.
  5. People had to work with their hands, learn a craft, and know how different things operated This would develop their mind and their capacity to understand.

Question 3.
Explain about Rabindranath Tagore and his school Shantiniketan.
Answer:
Rabindranath Tagore like many, also did not approve Western education wholeheartedly. At the time when several Indians urged the British to open more and more schools, colleges and universities in order to spread English education in India, Rabindranath Tagore reacted strongly against such education. He was a great educationist though he hated going to school because he saw it oppressive. In fact, he wanted to establish a school where the children were happy and were free to explore their thoughts and desires without feeling any suppression.

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He advocated for giving children natural surroundings where they would be able to cultivate their natural creativity. In the year 1901, Rabindranath Tagore established Shantiniketan. He regarded it as an ‘abode of peace’. He set up his school 100 kilometres away from Calcutta in a rural setting in order to provide children a very peaceful environment. Here, they could develop their imagination and creativity. Tagore had the opinion that existing schools were killing the natural desires of the children to be creative. Hence, it was necessary to help them develop their curiosity by providing them good teachers who could understand them. By establishing an institution like Shantiniketan he did a great job in the field of education.

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JAC Class 12 History Important Questions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

Jharkhand Board JAC Class 12 History Important Questions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Important Questions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

1. भारतीय संविधान कब अस्तित्व में आया था?
(क) 26 जनवरी, 1949
(ख) 26 जनवरी, 1930
(ग) 26 जनवरी, 1950
(घ) 26 जनवरी, 1948
उत्तर:
(ग) 26 जनवरी, 1950

2. संविधान सभा के अध्यक्ष थे –
(क) डॉ. भीमराव अम्बेडकर
(ख) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
(ग) जवाहर लाल नेहरू
(घ) पट्टाभि सीतारमैया
उत्तर:
(ख) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

3. संविधान सभा के कुल कितने सत्र हुए थे –
(क) 11
(ग) 21
(ख) 19
(घ) 17
उत्तर:
(क) 11

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4. संविधान सभा के कितने प्रतिशत सदस्य काँग्रेस के भी सदस्य थे –
(क) 95 प्रतिशत
(ख) 75 प्रतिशत
(ग) 82 प्रतिशत
(घ) 62 प्रतिशत
उत्तर:
(ग) 82 प्रतिशत

5. भारतीय संविधान सभा को कब से कब तक के मध्य सूत्रबद्ध किया गया –
(क) दिसम्बर, 1946 से दिसम्बर, 1949 के बीच
(ख) जनवरी 1947 से अक्टूबर 1949 के बीच
(ग) दिसम्बर, 1945 से दिसम्बर, 1948 के बीच
(घ) सितम्बर, 1946 से दिसम्बर, 1949 के बीच
उत्तर:
(क) दिसम्बर, 1946 से दिसम्बर, 1949 के बीच

6. संविधान पर तीन साल तक चली बहस के बाद हस्ताक्षर किए गए –
(क) दिसम्बर, 1949 में
(ख) दिसम्बर, 1948 में
(ग) अक्टूबर, 1949 में
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) दिसम्बर, 1949 में

7. संविधान सभा के कितने दिन बैठकों में गए –
(क) 169 दिन
(ग) 175 दिन
(ख) 165 दिन
(घ) 140 दिन
उत्तर:
(ख) 165 दिन

8. रॉयल इण्डियन नेवी के सिपाहियों ने विद्रोह किया था –
(क) 1946 के बसंत में
(ख) 1942 के बसंत में
(ग) 1947 के बसंत में
(घ) 1944 के बसंत में
उत्तर:
(क) 1946 के बसंत में

9. संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे –
(क) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
(ख) डॉ. भीमराव अम्बेडकर
(ग) महात्मा गाँधी
(घ) सरदार पटेल
उत्तर:
(ख) डॉ. भीमराव अम्बेडकर

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10. विश्व का सबसे बड़ा संविधान निम्न में से किस देश का है?
(क) चीन
(ग) रूस
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका
(घ) भारत
उत्तर:
(घ) भारत

11. संविधान सभा का उद्देश्य प्रस्ताव किसने पढ़ा था?
(क) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
(ख) जवाहर लाल नेहरू
(ग) गोविन्द वल्लभ पंत
(घ) महात्मा गाँधी
उत्तर:
(ख) जवाहर लाल नेहरू

12. “हम सिर्फ नकल करने वाले नहीं हैं।” यह कथन किसका है?
(क) जवाहरलाल नेहरू
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) वल्लभ भाई पटेल
(घ) भीमराव अम्बेडकर
उत्तर:
(क) जवाहरलाल नेहरू

13. ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन में गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट के तहत निम्न में से किस वर्ष में प्रान्तीय संसद के चुनाव हुए थे?
(क) 1935
(ग) 1946
(ख) 1937
(घ) 1947
उत्तर:
(क) 1935

14. ” अंग्रेज तो चले गए, लेकिन जाते-जाते शरारत क बीज बो गए।” संविधान सभा में यह किसने कहा था?
(क) नेहरू ने
(ख) सरदार पटेल ने
(ग) जी.बी. पंत ने
(घ) जिन्ना ने
उत्तर:
(ख) सरदार पटेल ने

15. निम्न में से संविधान सभा के किस सदस्य को लगता था कि पृथक निर्वाचिका आत्मघाती साबित होगी?
(क) बेगम ऐजाज रसूल
(ख) भीमराव अम्बेडकर
(ग) एन. जी. रंगा
(घ) जे.बी. पन्त
उत्तर:
(क) बेगम ऐजाज रसूल

16. राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान किस राजनेता ने दमित जातियों के लिए पृथक् निर्वाचिकाओं की माँग की थी ?
(क) भीमराव अम्बेडकर
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) जवाहरलाल नेहरू
(च) सुभाषचन्द्र बोस
उत्तर:
(क) भीमराव अम्बेडकर

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17. महात्मा गाँधी समर्थक थे-
(क) हिन्दुस्तानी भाषा के
(ख) हिन्दी के
(ग) उर्दू के
(घ) संस्कृत के
उत्तर:
(क) हिन्दुस्तानी भाषा के

18. “दक्षिण में हिन्दी का विरोध बहुत अधिक है।” यह कथन किसका है?
(क) दुर्गाबाई
(ख) बेगम एजाज रसूल
(घ) सन्तनम
(ग) पं. नेहरू
उत्तर:
(क) दुर्गाबाई

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:

1. संविधान सभा में कुल ……………. सदस्य थे।
2. ……………. को मुस्लिम लीग द्वारा ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस ‘का ऐलान किया।
3. संविधान सभा का अधिवेशन ……………. को शुरू हुआ।
4. ……………. के दिन पाकिस्तान स्वतन्त्र हुआ तथा ……………. में जश्न हुआ।
5. भारत के संविधान को दिसम्बर नवम्बर ……………. के बीच सूत्रबद्ध किया गया।
6. बिर्रिश राज के दौरान उपमहाद्वीप का लगभग-क. ……………. भू-भाग नवाबों और रजवाड़ों के नियन्न्नण में था।
7. 13 दिसम्बर, 1946 को ……………. ने संविधान सभा के सामने उद्देश्र प्रस्ताव पेश किया।
8. गणराज्य शब्द में ……………. शब्द पहले से ही निहित होता है।
9. गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट के अन्तर्गत 1937 में चुनाव हुए तो कांगेस की सरकार 11 में से ……………. प्रान्तों में बनी।
10. ……………. के अनुसार जनसंख्या की दृष्टि से हरिजन अल्पसंख्यक नहीं है।
11. अनुच्छेद ……………. पर केन्द्र सरकार को राज्य सरकार के सारे अधिकार अपने हाथ में लेने का अधिकार है।
12. ……………. द्वारा सदन को यह बताया गया कि दक्षिण में हिन्दी का विरोध बहुत ज्यादा है।
उत्तर:
1. 300
2. 16 अगस्त, 1946
3. 9 दिसम्बर, 1946
4. 14 अगस्त, 1947 कराची
5. 1946, 19496. एक तिहाई
7. जवाहरलाल नेहरू
8. लोकतान्त्रिक
9. 8
10. नागप्पा
11. 356
12. दुर्गाबाई

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान कब अस्तित्व में आया?
उत्तर:
26 जनवरी, 1950 को

प्रश्न 2.
भारत को स्वतंत्रता कब मिली?
उत्तर:
15 अगस्त, 1947 को

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प्रश्न 3.
रॉयल इंडियन नेवी के सिपाहियों ने विद्रोह कब और कहाँ किया ?
उत्तर:
1946 में बम्बई तथा अन्य शहरों में।

प्रश्न 4.
संविधान सभा में कितने सदस्य थे?
उत्तर:
तीन सौ।

प्रश्न 5.
संविधान सभा के तीन प्रमुख सदस्यों के नाम लिखिए जिनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण रही।
उत्तर:
(1) पं. जवाहरलाल नेहरू
(2) बॅ. राजेन्द्र प्रसाद
(3) वल्लभभाई पटेल।

प्रश्न 6.
सरकारें सरकारी कागजों से नहीं बनतीं। सरकार जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति होती है? यह कथन किसका था?
उत्तर:
पं. जवाहरलाल नेहरू का।

प्रश्न 7.
पृथक निर्वाचिका का समर्थन करने वाले एक सदस्य का नाम लिखिए।
उत्तर:
समर्थन करने वाले सदस्य मद्रास के बी. पोकर बहादुर थे।

प्रश्न 8.
पृथक् निर्वाचिका का विरोध करने वाले एक सदस्य का नाम लिखिए।
उत्तर:
आर.वी. धुलेकर।

प्रश्न 9.
“अंग्रेज तो चले गए, मगर जाते-जाते शरारत के बीज बो गए।” यह कथन किसका था?
उत्तर:
सरदार वल्लभ भाई पटेल का ।

प्रश्न 10.
एन. जी. रंगा के अनुसार कौन लोग असली अल्पसंख्यक थे?
उत्तर:
आदिवासी ।

प्रश्न 11.
किस अनुच्छेद के अनुसार गवर्नर की सिफारिश पर केन्द्र सरकार को राज्य सरकार के समस्त अधिकार अपने हाथ में लेने का अधिकार था ?
उत्तर:
अनुच्छेद 356

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प्रश्न 12.
महात्मा गाँधी किस भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाना चाहते थे?
उत्तर:
हिन्दुस्तानी भाषा को।

प्रश्न 13.
दो सदस्यों के नाम लिखिए जिन्होंने शक्तिशाली केन्द्र की हिमायत की थी?
उत्तर:
(1) डॉ. भीमराव अम्बेडकर तथा
(2) बालकृष्ण शर्मा।

प्रश्न 14.
किस आदिवासी नेता ने विधायिका में आदिवासियों को पृथक् निर्वाचिका का अधिकार दिए जाने की माँग की थी?
उत्तर:
जयपाल सिंह ने।

प्रश्न 15.
पृथक् निर्वाचिका का विरोध करने वाले दो सदस्यों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
(1) सरदार वल्लभ भाई पटेल
(2) गोविन्द वल्लभ पंत ।

प्रश्न 16.
स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद किसकी सलाह पर डॉ. अम्बेडकर को केन्द्रीय विधिमन्त्री बनाया गया था ?
उत्तर:
महात्मा गाँधी की सलाह पर

प्रश्न 17.
इस भूमिका में डॉ. अम्बेडकर ने किसके रूप में काम किया?
उत्तर:
संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में।

प्रश्न 18.
भारत के राष्ट्रीय ध्वज में किन रंगों की तीन बराबर चौड़ाई वाली पट्टियाँ हैं ?
उत्तर:
केसरिया, सफेद तथा गहरे हरे रंग की । प्रश्न 19. संविधान सभा के अध्यक्ष कौन थे? उत्तर- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ।

प्रश्न 20.
संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष कौन थे?
उत्तर:
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर।

प्रश्न 21.
कौनसी सूची के विषय केवल राज्य सरकार के अन्तर्गत आते हैं?
उत्तर:
राज्य सूची के।

प्रश्न 22.
भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को क्यों लागू किया गया?
उत्तर:
26 जनवरी, 1930 को भारत में पहली बार स्वतन्त्रता दिवस मनाया गया था। अतः 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान लागू किया गया।

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प्रश्न 23.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना के मुख्य आदर्श क्या हैं ?
उत्तर:
(1) न्याय
(2) स्वतन्त्रता
(3) समानता तथा
(4) अल्पसंख्यकों, पिछड़े तथा जनजातीय लोगों के लिए रक्षात्मक प्रावधान।

प्रश्न 24
विभाजित नवजात भारत राष्ट्र के सामने दो गंभीर समस्याएँ क्या थीं?
उत्तर:
(1) बर्बर हिंसा को समाप्त कर सांप्रदायिक सौहार्द स्थापित करना।
(2) देशी रियासतों के एकीकरण की समस्या।

प्रश्न 25.
भारत में हुए विभिन्न आन्दोलनों का एक अहम पहलू कौनसा था ?
उत्तर:
हिन्दू-मुस्लिम एकता।

प्रश्न 26.
संविधान सभा के सदस्यों को कैसे चुना गया?
उत्तर:
प्रान्तीय संसदों से संविधान सभा के सदस्यों को चुना गया।

प्रश्न 27.
नयी संविधान सभा में कौनसा दल प्रभावशाली था?
उत्तर:
कांग्रेस।

प्रश्न 28.
भारतीय संविधान के संवैधानिक सलाहकार कौन थे?
उत्तर:
बी.एन. राव ।

प्रश्न 29.
ब्रिटिश शासन में किन सुधारों के तहत प्रान्तीय विधायिकाओं में सीमित प्रतिनिधित्व की व्यवस्था लागू की गयी थी?
उत्तर:
मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधारों के तहत।

प्रश्न 30.
मद्रास की दक्षायणी वेलायुधान देश के कमजोर वर्ग के लिए क्या चाहती थी?
उत्तर:
मद्रास की दक्षायणी वेलायुधान देश के कमजोर वर्गों हेतु नैतिक सुरक्षा का आवरण चाहती थी।

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प्रश्न 31.
क्या संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव सार्वभौमिक मताधिकार के आधार पर हुआ था ?
उत्तर:
नहीं, संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव सार्वभौमिक मताधिकार के आधार पर नहीं हुआ था।

प्रश्न 32.
संविधान सभा के सदस्यों को किसने चुना
उत्तर:
1945-46 में भारत के प्रांतों के निर्वाचित सांसदों ने संविधान सभा के सदस्यों को चुना ।

प्रश्न 33.
विभाजन के बाद बनी नई संविधान सभा में कौनसा दल सर्वाधिक प्रभावशाली था?
उत्तर:
भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस नामक राजनैतिक दल

प्रश्न 34.
संविधान सभा में किन छह सदस्यों की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही?
उत्तर:
(1) जवाहर लाल नेहरू
(2) वल्लभ भाई पटेल
(3) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
(4) डॉ. बी. आर. अम्बेडकर
(5) के. एम. मुंशी और
(6) अल्लादि कृष्णा स्वामी अय्यर।

प्रश्न 35.
संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव कब और किसने प्रस्तुत किया?
उत्तर:
पं. जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसम्बर, 1946 को सभा के सामने उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

प्रश्न 36.
संविधान के मसविदे में कितनी सूचियाँ बनायी गई थीं, उनके नाम लिखिये।
उत्तर:
संविधान के मसविदे में तीन सूचियाँ –
(1) केन्द्रीय सूची
(2) राज्य सूची और
(3) समवर्ती सूची बनाई गई थीं।

प्रश्न 37.
केन्द्रीय सूची के विषय किस सरकार के अधीन हैं?
उत्तर:
केन्द्रीय सूची के विषय केवल केन्द्र सरकार के अधीन हैं।

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प्रश्न 38.
संविधान के कोई दो केन्द्रीय अभिलक्षण लिखिये।
उत्तर:
(1) वयस्क मताधिकार
(2) धर्मनिरपेक्षता पर बल

प्रश्न 39.
संविधान क्या है?
उत्तर:
संविधान एक कानूनी दस्तावेज है, जिसके माध्यम से किसी भी देश का शासन चलाया जाता है।

प्रश्न 40.
भारत का संविधान कब बन कर तैयार हुआ?
उत्तर:
भारत का संविधान 26 नवम्बर 1949 को बनकर तैयार हुआ।

प्रश्न 41.
संविधान की प्रस्तावना का अर्थ समझाते हुए उसका महत्त्व बताइये।
उत्तर:
संविधान की प्रस्तावना के द्वारा संविधान का परिचय कराया जाता है, प्रस्तावना इसे सरकार को मार्ग- दर्शन प्राप्त होता है।

प्रश्न 42.
भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द कब जोड़ा गया ?
उत्तर:
भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द 1976 में 42वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया।

प्रश्न 43.
धर्मनिरपेक्षता का अर्थ स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान हैं, वह किसी भी धर्म को राजधर्म घोषित नहीं करेगा।

प्रश्न 44.
महिलाओं के लिए न्याय की माँग किसने की थी?
उत्तर:
बम्बई की हंसा मेहता

प्रश्न 45.
हंसा मेहता ने महिलाओं के लिए किस प्रकार के न्याय की मांग की थी?
उत्तर:
हंसा मेहता ने महिलाओं के लिए सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय की मांग की थी।

प्रश्न 46.
हिन्दुस्तानी भाषा के प्रश्न पर महात्मा गाँधी को क्या लगता था?
उत्तर:
महात्मा गाँधी को लगता था कि हिन्दुस्तानी भाषा विविध समुदायों के मध्य संचार की आदर्श भाषा हो सकती है।

प्रश्न 47.
हमारे संविधान ने सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान कर रखी है। इस धार्मिक स्वतंत्रता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इसका अर्थ है कि व्यक्ति स्वेच्छा से किसी भी धर्म को अपना सकता है और उसका प्रचार-प्रसार कर सकता है।

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प्रश्न 48.
देशी रियासतों का एकीकरण किसके नेतृत्व में हुआ?
उत्तर:
देशी रियासतों का एकीकरण लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल के कुशल नेतृत्व में सम्पन्न हुआ। प्रश्न 49 समानता का अधिकार क्या है ? उत्तर- इस अधिकार के तहत कानून की दृष्टि में सभी समान होंगे। सरकारी नौकरी पाने का सभी को समान अवसर मिलेगा।

प्रश्न 50.
भारतीय संविधान के आधारभूत सिद्धान्त व मान्यताएँ क्या थीं?
उत्तर:
संविधान के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी लोकतांत्रिक गणराज्य होगा, जिसमें वयस्क मताधिकार के आधार पर एक संसदीय प्रणाली होगी।

प्रश्न 51.
संविधान सभा में राष्ट्रीय ध्वज का प्रस्ताव किसने पेश किया था?
उत्तर:
संविधान सभा में पं. जवाहरलाल नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव के साथ-साथ राष्ट्रीय ध्वज का प्रस्ताव भी पेश किया था।

प्रश्न 52.
शाही भारतीय सेना के सिपाहियों ने कब विद्रोह किया?
उत्तर:
1946 ई. के बसंत में

प्रश्न 53.
पृथक् निर्वाचिका के सवाल पर गोविन्द बल्लभ पंत ने क्या कहा था?
उत्तर:
गोविन्द वल्लभ पंत के अनुसार पृथक् निर्वाचिका अल्पसंख्यकों के लिए आत्मघाती होगी।

प्रश्न 54.
आप कैसे कह सकते हैं कि सारे मुसलमान पृथक् निर्वाचिका के पक्ष में नहीं थे?
उत्तर:
बेगम एजाज रसूल के अनुसार पृथक् निर्वाचिका आत्मघाती साबित होगी क्योंकि इससे अल्पसंख्यक बहुसंख्यकों से कट जाएँगे।

प्रश्न 55.
संविधान सभा की भाषा समिति ने राष्ट्रभाषा के सवाल पर क्या सुझाव दिया?
उत्तर;
भाषा समिति ने सुझाव दिया कि देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी भारत की राजकीय भाषा होगी।

प्रश्न 56.
संविधान निर्माण सभा के प्रमुख चार सदस्यों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
  • जवाहरलाल नेहरू
  • सरदार पटेल
  • मौलाना अबुल कलाम आजाद।

प्रश्न 57.
संविधान सभा की प्रथम बैठक कब आयोजित की गई ?
उत्तर:
संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसम्बर, 1946 को आयोजित की गई।

प्रश्न 58.
भारत को कैब स्वतन्त्रता प्राप्त हुई ?
उत्तर:
15 अगस्त, 1947 को

लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले त्रिगुट का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(1) पं. जवाहरलाल नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव को प्रस्तुत करते हुए स्वतन्त्र भारत के संविधान के मूल आदर्शों की रूपरेखा प्रस्तुत की।
(2) सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कई महत्त्वपूर्ण रिपोर्टों के प्रारूप लिखने में विशेष सहायता की।
(3) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया और संविधान सभा में चर्चा को रचनात्मक बनाए रखा।

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प्रश्न 2.
हमारा संविधान 26 जनवरी, 1950 को क्यों लागू किया गया? सकारण उत्तर दीजिये।
उत्तर:
हमारा संविधान नवम्बर, 1949 को बनकर तैयार हो गया था लेकिन उसे 2 महीने बाद 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया था। इसके पीछे यह कारण निहित है कि काँग्रेस के 1929 के दिसम्बर में लाहौर में आयोजित अधिवेशन में जवाहर लाल नेहरू ने पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा की तथा 26 जनवरी, 1930 को स्वतन्त्रता दिवस मनाने की घोषणा की। 26 जनवरी 1930 को औपनिवेशिक भारत में प्रथम स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।

प्रश्न 3.
राज्य के नीति-निर्देशक तत्व न्यायिक अयोग्यता रखते हैं, क्यों?
उत्तर:
भारत के संविधान के भाग संख्या 4 में नागरिकों के लिए कुछ गारंटी दी गई हैं लेकिन ये न्याय योग्य नहीं हैं। इन्हें राज्य के नीति-निर्देशक तत्व कहा जाता है। इन्हें लागू करना पूर्णतः राज्य की इच्छा पर निर्भर करता है। इन्हें लागू करने के लिए सरकार को बाध्य नहीं किया जा सकता और न ही नागरिक उन्हें लागू करवाने हेतु न्यायालय की शरण में जा सकता है।

प्रश्न 4.
भारतीय संविधान की रूपरेखा पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
भारत की संविधान सभा का गठन 1946 की कैबिनेट मिशन योजना के अन्तर्गत हुआ। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद इस सभा के अध्यक्ष बनाए गए। उद्देश्य स्वतंत्र भारत के लिए एक था भारतीय संविधान सभा के संविधान सभा का प्रमुख संविधान का निर्माण करना अधिवेशन के 9 दिसम्बर, 1946 से 26 नवम्बर, 1949 तक कुल 11 सत्र हुए। मूल संविधान 395 धाराओं 22 भागों और आठ अनुसूचियों में बँटा हुआ है, जिसमें 90 हजार शब्द हैं।

प्रश्न 5.
संविधान सभा ने सम्पूर्ण देश का प्रतिनिधित्व किया तो भी यह एक ही पार्टी का समूह बनकर क्यों रह गयी ?
उत्तर:
संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव 1946 ई. के प्रान्तीय चुनावों के आधार पर किया गया था। संविधान सभा में भारत के ब्रिटिश प्रान्तों द्वारा भेजे गये सदस्यों के अतिरिक्त रियासतों के प्रतिनिधि भी सम्मिलित थे। मुस्लिम लीग ने स्वतन्त्रता के पूर्व की संविधान सभा की बैठकों का बहिष्कार किया जिसके कारण इस दौर में संविधान सभा एक ही पार्टी का समूह बनकर रह गई थी। संविधान सभा के 82 प्रतिशत सदस्य कांग्रेस पार्टी के सदस्य थे।

प्रश्न 6.
आप कैसे कह सकते हैं कि समस्त मुसलमान पृथक निर्वाचिका की माँग के समर्थन में नहीं थे?
उत्तर:
बेगम ऐजाज रसूल के संविधान सभा में दिए गए भाषण के आधार पर हम कह सकते हैं कि समस्त मुसलमान पृथक् निर्वाचिका के समर्थन में नहीं थे बेगम ऐजाज रसूल को लगता था कि पृथक् निर्वाचिका आत्मघाती सिद्ध होगी। क्योंकि इससे अल्पसंख्यक बहुसंख्यकों से कट जायेंगे।

प्रश्न 7.
संविधान में केन्द्र को अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए किए गए किन्हीं तीन प्रावधानों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर;

  • केन्द्रीय सूची में बहुत अधिक विषय रखे गये।
  • खनिज पदार्थों एवं आधारभूत उद्योगों पर केन्द्र सरकार का ही नियन्त्रण रखा गया।
  • अनुच्छेद 356 के तहत राज्यपाल की सिफारिश पर केन्द्र सरकार को राज्य सरकार के समस्त अधिकार अपने हाथ में लेने का अधिकार दिया गया।

प्रश्न 8.
संविधान सभा में हुई चर्चाएँ जनमत से कैसे प्रभावित होती थी? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  • जब संविधान सभा में बहस होती थी तो विभिन्न पक्षों के तर्क समाचार-पत्रों में छपते थे तथा समस्त प्रस्तावों पर सार्वजनिक रूप से बहस चलती थी। इस तरह प्रेस में होने वाली इस आलोचना तथा जवाबी आलोचना से किसी मुद्दे पर बनने वाली सहमति या असहमति पर गहरा प्रभाव पड़ता था।
  • सामूहिक सहभागिता बनाने के लिए देश की जनता के सुझाव भी आमन्त्रित किये जाते थे।
  • कई भाषायी अल्पसंख्यक अपनी मातृभाषा की रक्षा की माँग करते थे।
  • धार्मिक अल्पसंख्यक अपने विशेष हित सुरक्षित करवाना चाहते थे और दलित जाति के लोग शोषण के अन्त की माँग करते हुए राजकीय संस्थाओं में आरक्षण चाहते थे।

प्रश्न 9.
भारतीय संविधान निर्माण से पहले के वर्ष काफी उथल-पुथल वाले थे क्यों ?
अथवा
“संविधान निर्माण के पूर्व के वर्ष उथल-पुथल के दौर से गुजर रहे थे।” उदाहरण देकर इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
15 अगस्त, 1947 को मिली आजादी के साथ ही देश को दो टुकड़ों में बाँट दिया गया। लोगों के मस्तिष्क में 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन की यादें अभी भी जीवित थीं, जो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सबसे बड़ा जन आन्दोलन था। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा विदेशी सहायता से देश को स्वतंत्र कराने के प्रयास लोगों को बखूबी याद थे। 1946 के बसंत में बम्बई तथा अन्य शहरों में रॉयल इण्डियन नेवी (शाही भारतीय नौसेना) के सिपाहियों द्वारा किया जाने वाला विद्रोह भी उल्लेखनीय था।

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प्रश्न 10.
स्वतन्त्रता के समय देशी रियासतों की समस्याओं का वर्णन कीजिये।
अथवा
नवजात राष्ट्र के सामने देशी रजवाड़ों के एकीकरण की समस्या बहुत ही गंभीर थी। विवेचना कीजिये।
उत्तर:
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत का लगभग एक-तिहाई भू-भाग ऐसे नवाबों और रजवाड़ों के नियन्त्रण में था, जो ब्रिटिश ताज की अधीनता स्वीकार कर चुके थे। उन्हें काफी स्वतंत्रता प्राप्त थी अंग्रेजों के भारत से चले जाने के बाद इन राजाओं और नवाबों की संवैधानिक स्थिति बहुत विचित्र हो गई थी। एक प्रेक्षक ने कहा था कि कुछ शासक तो अनेक टुकड़ों में बटे भारत में स्वतन्त्र सत्ता का सपना देख रहे थे।

प्रश्न 11.
एक शक्तिशाली केन्द्र सरकार के पक्ष में नेहरूजी ने जो बयान दिया था उसे लिखिए।
उत्तर:
नेहरूजी शक्तिशाली केन्द्र के पक्ष में थे। उन्होंने संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को लिखे पत्र में कहा था, “अब जबकि विभाजन एक हकीकत बन चुका है…… एक दुर्बल केन्द्रीय शासन व्यवस्था देश के लिए हानिकारक सिद्ध होगी क्योंकि ऐसा केन्द्र शान्ति स्थापित करने में आम सरोकारों के बीच समन्वय स्थापित करने में और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पूरे देश के लिए आवाज उठाने में सक्षम नहीं होगा।”

प्रश्न 12.
संविधान निर्माण से पूर्व के कुछ आन्दोलनों का महत्त्वपूर्ण पहलू किस तरह से व्यापक हिन्दू-मुस्लिम एकता को धारण किए हुए था? संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
संविधान निर्माण से पूर्व के कुछ आन्दोलनों का एक अहम पहलू व्यापक हिन्दू-मुस्लिम एकता इन जन आन्दोलनों का एक अहम पहलू था। इसके विपरीत काँग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों प्रमुख राजनैतिक दल धार्मिक सौहार्द और सामाजिक सामंजस्य स्थापित करने के लिए सुलह-सफाई की कोशिशों में असफल होते जा रहे थे। अगस्त, 1946 में कलकत्ता में शुरू हुई हिंसा के साथ उत्तरी और पूर्वी भारत में लगभग साल भर चलने वाले दंगा- फसाद भड़क उठे ।

प्रश्न 13.
एक शक्तिशाली केन्द्र के विषय में के. सन्तनम के विचार लिखिए।
उत्तर:
एक शक्तिशाली केन्द्र के विषय में के. सन्तनम ने कहा कि न केवल राज्यों को बल्कि केन्द्र को मजबूत बनाने के लिए भी शक्तियों का पुनर्वितरण आवश्यक है। यदि केन्द्र के पास आवश्यकता से अधिक जिम्मेदारियाँ होंगी तो वह प्रभावी ढंग से कार्य नहीं कर पाएगा। उसके कुछ दायित्वों को राज्यों को सौंपने से केन्द्र अधिक मजबूत हो सकता है।

प्रश्न 14.
भारतीय संविधान सभा की भाषा समिति राष्ट्रभाषा के प्रश्न पर क्या सुझाव दिया?
उत्तर:
राष्ट्रभाषा के सवाल पर संविधान सभा की भाषा समिति ने सुझाव दिया कि देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी भारत की राजकीय भाषा होगी। परन्तु इस फार्मूले को समिति ने घोषित नहीं किया था। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहिए। पहले 15 वर्षों तक राजकीय कार्यों में अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहेगा।

प्रश्न 15.
अगस्त 1947 का अवसर अनेक मुसलमानों, हिन्दुओं और सिक्खों के लिए निर्मम चुनाव का क्षण किस तरह से था? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर;
15 अगस्त, 1947 को स्वतन्त्रता दिवस पर आनन्द व उम्मीद का वातावरण था परन्तु भारत के बहुत से मुसलमानों और पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं तथा सिखों के लिए यह एक निर्मम क्षण था उन्हें मृत्यु अथवा अपनी पीढ़ियों की पुरानी जगह छोड़ने के बीच चुनाव करना था। करोड़ों की संख्या में शरणार्थी इधर से उधर जा रहे थे। मुसलमान पूर्वी व पश्चिमी पाकिस्तान की ओर तो हिन्दू व सिख पश्चिमी बंगाल एवं पूर्वी पंजाब की ओर बड़े जा रहे थे। उन लोगों में अनेक कभी मंजिल तक ही नहीं पहुँच सके और बीच रास्ते में ही दम तोड़ दिया।

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प्रश्न 16.
एक शक्तिशाली केन्द्र सरकार के पक्ष में नेहरूजी ने संविधान सभा में क्या बयान दिया? टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
संविधान सभा में केन्द्र व राज्य सरकारों के अधिकारों को लेकर काफी बहस हुई शक्तिशाली केन्द्र के पक्ष में नेहरूजी ने अपने विचार प्रकट किये थे। उन्होंने संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को लिखे पत्र में कहा था- ” अब जबकि विभाजन एक हकीकत बन चुका है। एक कमजोर केन्द्रीय शासन व्यवस्था देश के लिए हानिकारक सिद्ध होगी क्योंकि ऐसा केन्द्र शान्ति स्थापित करने में आम सरोकारों के मध्य समन्वय स्थापित करने में और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पूरे देश के लिए आवाज उठाने में सक्षम नहीं होगा। इसलिए राज्यों से केन्द्र को अधिक ताकतवर बनाना ही ठीक होगा।”

प्रश्न 17.
17 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि को नेहरूजी ने संविधान सभा में जो भाषण दिया था उसके एक महत्त्वपूर्ण अंश की संक्षिप्त व्याख्या अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर:
14 अगस्त, 1947 को मध्य रात्रि में नेहरूजी ने संविधान सभा में भाषण देते हुए कहा था –
“बहुत समय पहले हमने नियति से साक्षात्कार किया था और अब समय आ चुका है कि हम अपने उस संकल्प को न केवल पूर्ण रूप से या समग्रता में बल्कि उल्लेखनीय रूप से साकार करें अर्द्धरात्रि के इस क्षण में जब दुनिया सो रही है, भारत जीवन और स्वतंत्रता की ओर जाग रहा है।”

प्रश्न 18.
उद्देश्य प्रस्ताव का स्वागत करते हुए आदिवासी प्रतिनिधि जयपाल सिंह ने जो विचार प्रकट किए उन्हें संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
अगर भारतीय समाज में कोई ऐसा समूह है –
जिसके साथ सही व्यवहार नहीं किया गया है तो वह मेरा समूह है जिसे पिछले 6000 वर्षों से अपमानित किया जा रहा है और उपेक्षा का शिकार हो रहा है। आदिवासी कबीले संख्या की दृष्टि से अल्पसंख्यक नहीं हैं लेकिन उन्हें संरक्षण की आवश्यकता है। उन्हें उनके चरागाहों व जंगलों से बचत कर दिया गया है। हम आपके साथ मेलजोल चाहते हैं। आदिवासियों को प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए सीटों के आरक्षण की व्यवस्था जरूरी है।

प्रश्न 19.
नई संविधान सभा में काँग्रेस प्रभावशाली क्यों थी?
उत्तर:

  1. प्रांतीय चुनावों में काँग्रेस ने सामान्य चुनाव क्षेत्रों में भारी जीत प्राप्त की।
  2. यद्यपि मुस्लिम लीग को अधिकांश आरक्षित मुस्लिम सीटें मिल गई थीं, लेकिन लीग ने संविधान सभा का बहिष्कार कर दिया था और वह पाकिस्तान की माँग जारी रखे हुए थी।
  3. प्रारम्भ में समाजवादी भी संविधान सभा से परे रहे क्योंकि वे उसे अँग्रेजों की बनाई संस्था मानते थे। वे मानते थे कि इस सभा का वाकई स्वायत्त होना असम्भव है।
  4. संविधान सभा के 82 प्रतिशत सदस्य काँग्रेस पार्टी के ही सदस्य थे।

प्रश्न 20.
भारतीय संविधान की रूपरेखा को संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
भारत के संविधान हेतु संविधान सभा का गठन त 1946 ई. के कैबिनेट मिशन योजना के अन्तर्गत हुआ। इस त संविधान सभा में 300 सदस्य थे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को इस न संविधान सभा का अध्यक्ष बनाया गया था। भारतीय संविधान को 9 दिसम्बर, 1946 से 26 नवम्बर, 1949 के मध्य सूत्रबद्ध किया गया। संविधान सभा के कुल 11 सत्र हुए जिनमें 165 दिन बैठकों में गए मूल संविधान में 22 भाग, 395 अनुच्छेद एवं 8 अनुसूचियाँ थीं जिनके बाद में कई संशोधन हो चुके हैं। यह विश्व का सबसे लम्बा संविधान है जो 26 जनवरी, 1950 को अस्तित्व में आया।

प्रश्न 21.
नेहरूजी ने अपने उद्देश्य प्रस्ताव में अमेरिकी व फ्रांसीसी संविधान सभाओं से हमको प्रेरणा लेने की बात कही है। क्यों?
उत्तर:
नेहरूजी ने अपने उद्देश्य प्रस्ताव में अमेरिकी व फ्रांसीसी संविधान सभाओं का उल्लेख करते हुए कहा ” कि जिस प्रकार उन्होंने अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए संविधान के निर्माण का कार्य पूर्ण किया है उसी प्रकार हम भी उन संविधान सभाओं की तरह ही अपना संविधान बनाकर ही दम लेंगे चाहे इसके मार्ग में कितनी ही परेशानियाँ एवं रुकावटें आएँ हम भी उनकी ही तरह एक कालजयी संविधान का निर्माण करेंगे जो हमारी जनता के स्वभाव के अनुकूल होकर उनकी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करेगा। हमारा संविधान भी उन संविधानों की तरह ही लोकतन्त्रात्मक, धर्मनिरपेक्ष एवं आर्थिक-सामाजिक न्याय को स्थापना करने वाला होगा।

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प्रश्न 22.
नेहरू ने अमेरिकी संविधान निर्माताओं और फ्रांसीसी संविधान निर्माताओं का उल्लेख उद्देश्य प्रस्ताव में किसलिए किया?
उत्तर:
नेहरू ने अमेरिका संविधान निर्माण की प्रक्रिया के सम्बन्ध में कहा कि अमेरिकी राष्ट्र निर्माताओं ने एक ऐसा संविधान रचा जो डेढ़ सदी से भी ज्यादा समय से कसौटी पर खरा उतर रहा है। उन्होंने संविधान पर आधारित एक महान् राष्ट्र गढ़ा। दूसरे, नेहरू ने उस संविधान सभा का उल्लेख किया जो स्वतंत्रता के इतने सारे संघर्ष लड़ने वाले पेरिस के भव्य एवं खूबसूरत शहर में जुटी थी उस संविधान सभा ने अनेक मुश्किलों का सामना किया।

प्रश्न 23.
” संविधान सभा अंग्रेजों की बनाई हुई है और वह अंग्रेजों की योजना को साकार करने का काम कर रही है।” सोमनाथ लाहिड़ी के इस कथन पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
संविधान सभा के कम्युनिस्ट सदस्य सोमनाथ लाहिड़ी का कहना था कि संविधान सभा अंग्रेजों की बनाई हुई है और वह अंग्रेजों की योजना को साकार करने का काम कर रही है न केवल ब्रिटिश योजना ने भावी संविधान बना दिया है, बल्कि इससे यह भी संकेत मिलता है कि मामूली से मामूली मतभेद के लिए भी संघीय न्यायालय जाना होगा।

प्रश्न 24.
भारतीय संविधान में विषयों की तीन सूचियों और अनुच्छेद 356 का उल्लेख करें।
अथवा
संविधान के अनुसार केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का बँटवारा किस प्रकार किया गया?
अथवा
संघ सूची, राज्य सूची तथा समवर्ती सूची का संक्षिप्त वर्णन करें।
अथवा
राज्य सूची के विषय में आप क्या जानते हैं ? समवर्ती सूची पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
संविधान के मसविदे में समस्त विषयों की तीन सूचियाँ बनाई गई हैं। ये हैं –
(1) केन्द्रीय या संघ सूची
(2) राज्य सूची और
(3) समवर्ती सूची यथा
(1) केन्द्रीय सूची में दिए गए विषय केवल केन्द्र सरकार के अधीन रखे गए हैं। राज्य सूची
(2) अन्तर्गत रखे गये हैं। के विषय केवल राज्य सरकारों के
(3) समवर्ती सूची में दिए गए केन्द्र और राज्य दोनों की साझा जिम्मेदारी है।
अनुच्छेद 356 में गवर्नर की सिफारिश पर केन्द्र सरकार को राज्य सरकार के समस्त अधिकार अपने हाथ में लेने का अधिकार दिया गया है।

प्रश्न 25.
केन्द्र को अधिक शक्तिशाली बनाने वाले प्रावधानों का उल्लेख कीजिये ।
उत्तर:
(1) अन्य संघों की तुलना में केन्द्रीय सूची में बहुत ज्यादा विषयों को केवल केन्द्रीय नियन्त्रण में रखा गया है।
(2) समवर्ती सूची में भी प्रान्तों की इच्छाओं की उपेक्षा करते हुए बहुत ज्यादा विषय रखे गये हैं तथा राज्य की तुलना में केन्द्र को वरीयता दी गई है।
(3) खनिज पदार्थों तथा प्रमुख उद्योगों पर भी केन्द्र सरकार को ही नियन्त्रण दिया गया है।
(4) अनुच्छेद 356 में गवर्नर की सिफारिश पर केन्द्र सरकार को राज्य सरकार के सारे अधिकार अपने हाथ में लेने का अधिकार दिया गया है।

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प्रश्न 26.
संविधान में राजकोषीय संघवाद की क्या व्यवस्था की गई है?
उत्तर:
(1) कुछ करों (जैसे सीमा शुल्क और कम्पनी कर) से होने वाली सारी आय केन्द्र सरकार के पास रखी गई है।
(2) कुछ अन्य मामलों में (जैसे- आय कर और आबकारी शुल्क) में होने वाली आय राज्य और केन्द्र सरकार के बीच बाँट दी गई है।
(3) कुछ अन्य मामलों (जैसे- राज्य स्तरीय शुल्क) से होने वाली आय पूरी तरह राज्यों को सौंप दी गई है। (4) राज्य सरकारों को अपने स्तर पर भी कुछ अधिभार और कर वसूलने का अधिकार दिया गया है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संविधान सभा में पृथक् निर्वाचिका की माँग किसके लिए की गई थी? यह माँग किसने उठाई तथा इसका क्या परिणाम रहा?
उत्तर:
पृथक निर्वाचिका की माँग अल्पसंख्यकों के लिए विभिन्न नेताओं ने समय-समय पर संविधान सभा में अपने तर्क देते हुए उठाई थी, उनकी माँग का विरोध भी किया गया।

(1) बी. पोकर बहादुर की माँग-27 अगस्त, 1947 को पास के थी. पोकर बहादुर ने पृथक् निर्वाचिका बनाए रखने के पक्ष में एक प्रभावशाली भाषण दिया। बहादुर कहा कि अल्पसंख्यक सब जगह होते हैं, हम उन्हें चाहकर भी हटा नहीं सकते। हमें जरूरत एक ऐसे ढाँचे की है जिसके भीतर अल्पसंख्यक भी औरों के साथ सद्भाव से रह सकें और समुदायों के बीच मतभेद कम से कम हों।

(2) एन. जी. रंगा का बयान-रंगा ने कहा था कि तथाकथित पाकिस्तानी प्रान्तों में रहने वाले हिन्दू, सिख यहाँ तक कि मुसलमान भी अल्पसंख्यक नहीं हैं। असली अल्पसंख्यक तो यहाँ की जनता है।

(3) जयपाल सिंह का बयान-जयपाल सिंह आदिवासी नेता थे। उन्होंने कहा कि आदिवासी कबीले संख्या की दृष्टि से अल्पसंख्यक नहीं हैं लेकिन उन्हें संरक्षण की जरूरत है। वे विधायिका में आदिवासियों के प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण की व्यवस्था चाहते थे।

(4) डॉ. अम्बेडकर की माँग डॉ. अम्बेडकर ने राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान पृथक् निर्वाचिका की माँग की थी।

(5) नागप्पा का बयान मद्रास के सदस्य जे. नागप्पा ने पृथक निर्वाचिका की माँग उठाई।

(6) के. जे. खाण्डेलकर का बयान-खाण्डेलकर ने कहा था—“हमें हजारों साल तक दबाया गया है। इस हद तक दबाया गया कि हमारे दिमाग, हमारी देह काम नहीं करती और अब हमारा हृदय भी भावशून्य हो चुका है।

” पृथक् निर्वाचिका का विरोध –
(1) पं. गोविन्द वल्लभ पंत के विचार-यह प्रस्ताव न केवल राष्ट्र के लिए बल्कि अल्पसंख्यकों के लिए भी खतरनाक है। उनका मानना था कि पृथक निर्वाचिका अल्पसंख्यकों के लिए आत्मघाती साबित होगी, जो उन्हें कमजोर बना देगी और शासन में उन्हें प्रभावी हिस्सेदारी नहीं मिल पायेगी।

(2) बेगम एजाज रसूल के विचार बेगम एजज रसूल को लगता था कि पृथक निर्वाचिका आत्मघाती साबित होगी क्योंकि इससे अल्पसंख्यक बहुसंख्यकों से कट जाएँगे।

(3) महात्मा गाँधी द्वारा विरोध-गाँधीजी ने यह कहते हुए अपना विरोध प्रकट किया था कि पृथक् निर्वाचिका की माँग करने से ये समुदाय शेष समुदायों से हमेशा के लिए कट जाएँगे। संविधान सभा का सुझाव-संविधान सभा ने अंततः यह सुझाव दिया कि अस्पृश्यता का उन्मूलन किया जाए, हिन्दू मन्दिरों के द्वार सभी जातियों के लिए खोल दिए जाएँ और निचली जातियों को विधायिकाओं और सरकारी नौकरियाँ में आरक्षण दिया जाए।

प्रश्न 2.
संविधान निर्माण से पूर्व के वर्ष भारत के लिए बहुत उथल-पुथल बाल थे।” उपर्युक्त कथन के समर्थन में उदाहरण सहित अपना तर्क लिखिए।
उत्तर:
इसमें कोई सन्देह नहीं है कि संविधान निर्माण से पूर्व के वर्ष भारत के लिए बहुत उथल-पुथल वाले थे। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं –
(1) 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतन्त्र तो हो गया, परन्तु इसके साथ ही इसे दो भागों भारत व पाकिस्तान के रूप में विभाजित भी कर दिया गया।

(2) लोगों की याद में 1942 भारत छोड़ो आन्दोलन अभी भी जीवित था जो ब्रिटिश औपनिवेशिक राज्य के विरुद्ध सम्भवतः सबसे व्यापक जनान्दोलन था

(3) विदेशी सहायता से सशस्त्र संघर्ष द्वारा के ता पाने के लिए सुभाष चन्द्र बोस द्वारा किए गए प्रयत्न भी लोगों को याद थे।

(4) सन् 1946 में बम्बई व देश के अन्य शहरों में रॉयल्स इण्डिया नेवी (शाही भारतीय नौसेना) के सिपाहियों का विद्रोह भी लोगों को बार-बार आन्दोलित कर रहा था। लोगों की सहानुभूति इन सिपाहियों के साथ थी।

(5) 1940 के दशक के अन्तिम वर्षों में देश के विभिन्न भागों में किसानों व मजदूरों के आन्दोलन भी हो रहे थे।

(6) हिन्दू मुस्लिम एकता विभिन्न जनान्दोलनों का एक महत्त्वपूर्ण पहलू था। इसके विपरीत कांग्रेस व मुस्लिम लीग दोनों ही मुख्य राजनीतिक दल धार्मिक सद्भावना और सामाजिक तालमेल स्थापित करने में सफल नहीं हो पा रहे थे।

(7) 16 अगस्त, 1946 में मुस्लिम लीग द्वारा प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस मनाने की घोषणा से कलकत्ता में हिंसा भड़क उठी।

(8) देश के भारत व पाकिस्तान के रूप में विभाजन की घोषणा के पश्चात् असंख्य लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने लगे। जिससे शरणार्थियों की समस्या खड़ी हो गई थी।

(9) 15 अगस्त, 1947 को स्वतन्त्रता दिवस पर आनन्द और उम्मीद का वातावरण था। लेकिन भारत के मुसलमानों व पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं व सिखों के लिए यह एक निर्मम क्षण था। मुसलमान पूर्वी व पश्चिमी पाकिस्तान की ओर तो हिन्दू और सिख पश्चिमी बंगाल तथा पूर्वी पंजाब की ओर बढ़ रहे थे।

(10) नवजात राष्ट्र के समक्ष एक और समस्या देशी रियासतों को लेकर थी। ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के शासन काल के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप का लगभग एक-तिहाई भू-भाग ऐसे नवाबों और रजवाड़ों के नियन्त्रण में था जो ब्रिटिश ताज की अधीनता स्वीकार कर चुके थे

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प्रश्न 3.
संविधान सभा में पृथक् निर्वाचिकाओं की माँग के जवाब में सरदार पटेल, धुलेकर तथा गोविन्द वल्लभ पंत आदि प्रमुख कांग्रेसी सदस्यों ने अनेक दलीलें प्रस्तुत कीं। इन दलीलों के पीछे कौनसी चिन्ता काम कर रही थी? अन्त में क्या सहमति बनी?
उत्तर:
पृथक् निर्वाचिकाओं की मांग के विरोध में दी गई समस्त दलीलों के पीछे एक एकीकृत राज्य के निर्माण की चिन्ता काम कर रही थी। वह इस प्रकार थी –
(1) व्यक्ति को नागरिक बनाना तथा प्रत्येक समूह को राष्ट्र का अंग बनाना-राजनीतिक एकता और राष्ट्र की स्थापना करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को राज्य के नागरिक के सांचे में ढालना था, हर समूह को राष्ट्र भीतर समाहित किया जाना था।

(2) नागरिकों में राज्य के प्रति निष्ठा का होना- संविधान नागरिकों को अधिकार देगा परन्तु नागरिकों को भी राज्य के प्रति अपनी निष्ठा का वचन लेना होगा।

(3) सभी समुदायों के सदस्यों को राज्य के सामान्य सदस्यों के रूप में काम करना-समुदायों को सांस्कृतिक इकाइयों के रूप में मान्यता दी जा सकती थी और उन्हें सांस्कृतिक अधिकारों का आश्वासन दिया जा सकता था मगर राजनीतिक रूप से सभी समुदायों के सदस्यों को राज्य के सामान्य सदस्य के रूप में काम करना था अन्यथा उनकी निष्ठाएँ विभाजित होतीं। पंत ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा कि, “हमारे भीतर यह आत्मघाती और अपमानजनक आदत बनी हुई है कि हम कभी नागरिक के रूप में नहीं सोचते बल्कि समुदाय के रूप में ही सोच पाते हैं…….। हमें याद रखना चाहिए कि महत्व केवल नागरिक का होता है। सामाजिक पिरामिड का आधार भी और उसकी चोटी भी नागरिक ही होता है।”

(4) एक शक्तिशाली राष्ट्र व शक्तिशाली राज्य की स्थापना-जब सामुदायिक अधिकारों का महत्त्व रेखांकित किया जा रहा था, उस समय भी बहुत सारे राष्ट्रवादियों में यह भय सिर उठाने लगा था कि इससे निष्ठाएँ खण्डित होंगी और एक शक्तिशाली राष्ट्र व शक्तिशाली राज्य की स्थापना नहीं हो पायेगी।

(5) कुछ मुसलमान भी पृथक् निर्वाचिका की मांग के समर्थन में नहीं-सारे मुसलमान भी पृथक् निर्वाचिका की मांग के समर्थन में नहीं थे। उदाहरण के लिए बेगम एजाज रसूल को लगता था कि पृथक निर्वाचिका आत्मघाती साबित होगी क्योंकि इससे अल्पसंख्यक बहुसंख्यकों से कट जायेंगे।

पृथक् निर्वाचिका की माँग पर निर्णय सन् 1949 तक संविधान सभा के ज्यादातर सदस्य इस बात पर सहमत हो गए थे कि पृथक् निर्वाचिका का प्रस्ताव अल्पसंख्यकों के हितों के खिलाफ जाता है। इसकी बजाय मुसलमानों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए ताकि राजनीतिक व्यवस्था में उनको एक निर्णायक आवाज मिल सके।

प्रश्न 4.
संविधान सभा के ऐसे दो महत्त्वपूर्ण अभिलक्षणों का उल्लेख कीजिए जिन पर संविधान सभा में काफी हद तक सहमति थी।
उत्तर:
व्यापक सहमति वाले महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण – भारतीय संविधान गहन विवादों और परिचर्चाओं से गुजरते हुए बना उसके कई प्रावधान लेन-देन की प्रक्रिया के जरिए बनाए गए थे उन पर सहमति तब बन पाई जब सदस्यों ने दो विरोधी विचारों के बीच की जमीन तैयार कर ली लेकिन संविधान के कुछ ऐसे महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण भी हैं, जिन पर संविधान सभा में काफी हद तक सहमति थी। यथा –

(1) वयस्क मताधिकार संविधान का एक केन्द्रीय अभिलक्षण वयस्क मताधिकार है। इस पर संविधान सभा में प्रायः आम सहमति थी यह सहमति प्रत्येक वयस्क भारतीय को मताधिकार देने पर थी। इसके पीछे एक खास किस्म का भरोसा था जिसके पूर्व उदाहरण अन्य देश के इतिहास में नहीं थे। दूसरे लोकतंत्रों में पूर्ण वयस्क मताधिकार धीरे-धीरे कई चरणों से गुजरते हुए, लोगों को मिला। संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में शुरू-शुरू में मताधिकार केवल सम्पत्ति रखने वाले पुरुषों को ही दिया गया, फिर पढ़े-लिखे पुरुषों को इस विशेष वर्ग में शामिल किया गया। लम्बे व कटु संघर्षो के बाद श्रमिक व किसान वर्ग के पुरुषों को मताधिकार मिल पाया। ऐसा अधिकार पाने के लिए महिलाओं को और भी लम्बा संघर्ष करना पड़ा।

(2) धर्मनिरपेक्षता पर बल – हमारे संविधान का दूसरा महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण था-
धर्मनिरपेक्षता पर बल। संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता के गुण तो नहीं गाए गए थे परन्तु संविधान व समाज को चलाने के लिए भारतीय सन्दर्भों में उसके मुख्य अभिलक्षणों का जिक्र आदर्श रूप में किया गया था। ऐसा मूल अधिकारों की श्रृंखला को रचने के जरिये किया गया, विशेषकर ‘धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार’ (अनुच्छेद 25-28), ‘सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार’ (अनुच्छेद 29-30) एवं ‘समानता का अधिकार’ (अनुच्छेद 14, 16, 17)।

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यथा –
(1) राज्य ने सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार की गारन्टी दी और उन्हें हितैषी संस्थाएँ बनाने का अधिकार भी दिया। और सरकारी स्कूलों व
(2) राज्य ने अपने आपको विभिन्न धार्मिक समुदायों से दूर रखने की कोशिश की कॉलेजों में अनिवार्य धार्मिक शिक्षा पर रोक लगा दी।
(3) सरकार ने रोजगार में धार्मिक भेदभाव को अवैध ठहराया।
(4) राज्य धार्मिक समुदायों से जुड़े सामाजिक सुधार मुं कार्यक्रमों के लिए अवश्य कुछ कानूनी गुंजाइश अर्थात् राज्य ने उसमें दखल देने की गुंजाइश रखी। ऐसा करके ही अस्पृश्यता पर कानूनी रोक लग पायी और इसी कारण इ व्यक्तिगत एवं पारिवारिक कानूनों में परिवर्तन हो पाये।
(5) भारतीय राजनीतिक धर्मनिरपेक्षता में राज्य व धर्म के बीच पूर्ण विच्छेद नहीं रहा। संविधान सभा ने इन दोनों के बीच एक विवेकपूर्ण फासला बनाने की कोशिश की है।

प्रश्न 5.
संविधान सभा के क्रियाकलापों में किन- किन सदस्यों की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थी? उनकी भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डालिए।
उत्तर:
संविधान सभा के कुल 300 सदस्यों में से 6 सदस्यों की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थी। इनके नाम है –

  1. पं. जवाहरलाल नेहरू
  2. सरदार वल्लभ भाई पटेल
  3. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
  4. डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर
  5. के.एम. मुंशी
  6. अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर।

(1) पं. जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में 13 दिसम्बर, 1946 को एक निर्णायक प्रस्ताव ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ प्रस्तुत किया था। यह एक ऐतिहासिक प्रस्ताव था जिसमें स्वतन्त्र भारत के संविधान के मूल आदर्शों की रूपरेखा प्रस्तुत की गयी थी तथा यह फ्रेमवर्क सुझाया गया था जिसके तहत संविधान का कार्य आगे बढ़ना था। पं. नेहरू ने संविधान सभा में झण्डा प्रस्ताव भी पेश किया था। नेहरू ने कहा था कि भारत का राष्ट्रीय ध्वज केसरिया, सफेद एवं गहरे हरे रंग की तीन बराबर पट्टियों वाला तिरंगा झण्डा होगा जिसके मध्य में गहरे नीले रंग का चक्र होगा।

(2) जवाहरलाल नेहरू के विपरीत वल्लभ भाई पटेल की भूमिका परदे के पीछे की थी उन्होंने अनेक प्रतिवेदनों के प्रारूप लिखे।

(3) भारत के प्रथम राष्ट्रपति तथा संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सभा की चर्चाओं को रचनात्मक दिशा की ओर ले जाते थे। वे इस बात का भी ध्यान रखते थे कि सभी सदस्यों को अपनी बात रखने का अवसर मिले।

(4) कांग्रेस के इस त्रिगुट के अतिरिक्त प्रसिद्ध विधिवेत्ता एवं अर्थशास्त्री डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर भी संविधान सभा के सबसे महत्वपूर्ण सदस्यों में से एक थे भीमराव रामजी अम्बेडकर पर संविधान में संविधान के प्रारूप को पारित करवाने की जिम्मेदारी थी।

(5) संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर के साथ-साथ दो अन्य प्रसिद्ध वकील कार्य कर रहे थे, इनमें से एक गुजरात के के.एम. मुंशी तो द्वितीय मद्रास के अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर थे।

(6) संविधान सभा में इन छः सदस्यों के अतिरिक्त दो प्रशासनिक अधिकारी भी महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहे थे। इनमें से एक बी. एन. राव संविधान सभा अथवा भारत के संवैधानिक सलाहकार थे। संविधान सभा में एस.एन. मुखर्जी की स्थिति भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण थी। वे संविधान सभा में मुख्य योजनाकार की भूमिका निभा रहे थे।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

प्रश्न 6.
संविधान सभा के गठन का विवेचन कीजिये।
अथवा
संविधान सभा के निर्माण और कार्यप्रणाली की म चर्चा कीजिये।
अथवा
संविधान सभा कैसे घटित हुई थी?
उत्तर:
संविधान सभा का गठन संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव सार्वभौमिक 3 मताधिकार के आधार पर नहीं हुआ था। 1945-46 की सर्दियों में भारत के प्रान्तों में चुनाव हुए थे। इसके पश्चात् में प्रान्तीय संसदों ने संविधान सभा के सदस्यों को चुना।

(1) नई संविधान सभा में कांग्रेस का प्रभावशाली या होना नई संविधान सभा में कांग्रेस प्रभावशाली थी। रू प्रान्तीय चुनावों में कांग्रेस ने सामान्य चुनाव क्षेत्रों में भारी क विजय प्राप्त की और मुस्लिम लीग को अधिकांश आरक्षित मुस्लिम सीटें मिल गई। परन्तु मुस्लिम लीग ने संविधान गा सभा का बहिष्कार उचित समझा और एक अन्य संविधान बनाकर उसने पाकिस्तान के निर्माण की माँग जारी रखी। प्रारम्भ में समाजवादी भी संविधान सभा से दूर रहे क्योंकि वे उसे अंग्रेजों के द्वारा बनाई हुई संस्था मानते थे। इन सभी कारणों से संविधान सभा के 82 प्रतिशत सदस्य के कांग्रेस पार्टी के ही सदस्य थे।

(2) कांग्रेस में मतभेद – सभी कांग्रेस सदस्य एकमत ते नहीं थे कई निर्णायक मुद्दों पर उनके भिन्न-भिन्न मत थे। सर कई कांग्रेसी समाजवाद से प्रेरित थे तो कई जमींदारी के समर्थक थे। कई कांग्रेसी समाजवाद से प्रेरित थे तो कई अन्य जमींदारी के समर्थक थे कुछ साम्प्रदायिक दलों के निकट थे, तो कुछ पक्के धर्मनिरपेक्ष थे राष्ट्रीय आन्दोलन के कारण कांग्रेसी बाद-विवाद करना और मतभेदों पर बातचीत कर समझौतों की खोज करना सीख गए थे। संविधान सभा में भी कांग्रेस सदस्यों ने इसी प्रकार का दृष्टिकोण अपनाया।

(3) संविधान सभा में हुई चर्चाओं का जनमत से प्रभावित होना-संविधान सभा में हुई चर्चाएँ जनमत से भी प्रभावित होती थीं। जब संविधान सभा में बहस होती थी, तो विभिन्न पक्षों के तर्क समाचार-पत्रों में भी प्रकाशित होते थे और समस्त प्रस्तावों पर सार्वजनिक रूप से बहस चलती थी। इस प्रकार की आलोचना और जवाबी आलोचना में किसी मुद्दे पर बनने वाली सहमति या असहमति पर गहरा प्रभाव पड़ता था।

(4) सामूहिक सहभागिता-सामूहिक सहभागिता बनाने के लिए जनता के सुझाव भी मांगे जाते थे। कई भाषाई अल्पसंख्यक अपनी मातृभाषा की रक्षा की मांग करते थे। धार्मिक अल्पसंख्यक अपने विशेष हित सुरक्षित करवाना चाहते थे और दलित वर्गों के लोग शोषण के अन्त की माँग करते हुए सरकारी संस्थाओं में आरक्षण चाहते थे।

प्रश्न 7.
संविधान सभा में विभिन्न सदस्यों की महत्त्वपूर्ण भूमिकाओं की विवेचना कीजिये।
उत्तर:
संविधान सभा में विभिन्न सदस्यों की भूमिका संविधान सभा में तीन सौ सदस्य थे। इनमें निम्नलिखित 6 सदस्यों की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण रही –
(1) पं. जवाहरलाल नेहरू-पं. जवाहरलाल नेहरू ने सविधान सभा में 13 दिसम्बर, 1946 को एक निर्णायक प्रस्ताव ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ को प्रस्तुत किया था। इसमें उन्होंने स्वतन्त्र भारत के संविधान के मूल आदर्शों की रूपरेखा प्रस्तुत की थी। उन्होंने यह प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया था कि भारत का राष्ट्रीय ध्वज केसरिया, सफेद और गहरे रंग की तीन बराबर चौड़ाई वाली पट्टियों का तिरंगा झंडा होगा जिसके बीच में गहरे नीले रंग का चक्र होगा।

(2) सरदार वल्लभ भाई पटेल- सरदार वल्लभ भाई पटेल ने मुख्य रूप से परदे के पीछे कई महत्त्वपूर्ण कार्य किये। उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण रिपोर्टों के प्रारूप लिखने में विशेष सहायता की और कई परस्पर विरोधी विचारों के बीच सहमति उत्पन्न करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(3) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे। उनकी ये जिम्मेदारियाँ थीं कि संविधान सभा में चर्चा रचनात्मक दिशा ले और सभी सदस्यों को अपनी बात कहने का अवसर मिले।

(4) डॉ. भीमराव अम्बेडकर डॉ. भीमराव अम्बेडकर एक प्रख्यात विधिवेत्ता तथा अर्थशास्त्री थे। वह संविधान सभा के सबसे महत्त्वपूर्ण सदस्यों में से एक थे। स्वतन्त्रता प्राप्त करने के बाद महात्मा गांधी की सलाह पर डॉ. अम्बेडकर को केन्द्रीय विधिमंत्री के पद पर नियुक्त किया गया था। इस भूमिका में उन्होंने संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उनके पास सभा में संविधान के प्रारूप को पारित करवाने की जिम्मेदारी थी।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

(5) के. एम. मुंशी डॉ. अम्बेडकर के साथ दो अन्य वकील भी कार्य कर रहे थे। एक गुजरात के के. एम. मुंशी थे तथा दूसरे मद्रास के अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर। इन- दोनों ने संविधान के प्रारूप पर महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए।

(6) दो प्रशासनिक अधिकारी-उपरोक्त 6 सदस्यों को दो प्रशासनिक अधिकारियों ने महत्त्वपूर्ण सहायता दी। इनमें से एक बी. एन. राव थे। वह भारत सरकार के संवैधानिक सलाहकार थे और उन्होंने अन्य देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का गहन अध्ययन करके कई चर्चा- पत्र तैयार किए थे। दूसरे अधिकारी एस.एन. मुखर्जी थे। इनकी भूमिका मुख्य योजनाकार की थी। मुखर्जी जटिल प्रस्तावों को स्पष्ट वैधिक भाषा में व्यक्त करने की क्षमता रखते थे।

JAC Class 12 History Solutions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

Jharkhand Board JAC Class 12 History Solutions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Solutions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

Jharkhand Board Class 12 History उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन In-text Questions and Answers

पृष्ठ संख्या 262

प्रश्न 1.
यह बताइये कि जोतदार जमींदारों की सत्ता का किस प्रकार प्रतिरोध किया करते थे?
उत्तर:
जोतदार बड़ी-बड़ी जमीनें जोतते थे। वे अपना राजस्व भी पूरा जमा नहीं करते थे और राजस्व को बकाया रखते थे। यदि जमींदार गाँव की लगान को बढ़ाने के लिए प्रयत्न करते थे, तो वे उनका घोर प्रतिरोध करते थे। वे जमींदारी अधिकारियों को अपने कर्त्तव्यों का पालन करने से रोकते थे।

वे जमींदार को राजस्व के भुगतान में जान- बूझकर देरी करा देते थे जमींदार के कारिंदों द्वारा डराये – धमकाए जाने पर वे फौजदारी थाने ( पुलिस थाने में जमींदार के कारिंदों के खिलाफ शिकायत करते थे कि उन्होंने उनका अपमान किया है। इस प्रकार राजस्व का बकाया बढ़ता जाता था तथा जोतदार छोटे-छोटे रैयत को राजस्व न देने के लिए भड़काते रहते थे। इस तरह जोतदार जमींदार की सत्ता का प्रतिरोध किया करते थे।

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प्रश्न 2.
चित्र संख्या 10.5 ( पाठ्यपुस्तक की) के साथ दिये गये पाठ को सावधानीपूर्वक पढ़िये और तीर के निशानों के साथ-साथ उपयुक्त स्थलों पर ये शब्द भरिए लगान, राजस्व, ब्याज, उधार (ऋण), उपज।
उत्तर:
JAC Class 12 History Solutions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात सरकारी अभिलेखों का अध्ययन - 1

पृष्ठ संख्या 265

प्रश्न 3.
जिस लहजे में साक्ष्य ( पाठ्यपुस्तक का स्रोत- 2 ) अभिलिखित किया गया है, उससे आप रिपोर्ट में वर्णित तथ्यों के प्रति रिपोर्ट लिखने वाले के रुख के बारे में क्या सोचते हैं? आँकड़ों के जरिए रिपोर्ट में क्या दर्शाने की कोशिश की गई है? क्या इन दो वर्षों के आँकड़ों से आपके विचार से, किसी भी समस्या के बारे में दीर्घकालीन निष्कर्ष निकालना सम्भव होगा?
उत्तर:
(1) पाँचवीं रिपोर्ट में वर्णित तथ्यों के प्रति रिपोर्ट लिखने वाले के रुख के बारे में पता चलता है कि जमींदारों की लापरवाही के कारण राजस्व समय पर वसूल नहीं किया जाता था जिसके परिणामस्वरूप बहुत-सी जमीनें नीलाम करनी पड़ती थीं।
(2) आँकड़ों के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया गया है कि नीलामी में राजस्व की राशि कम प्राप्त होती थी।
(3) दो वर्षों के आँकड़ों के आधार पर किसी भी समस्या के बारे में दीर्घकालीन निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

पृष्ठ संख्या 265 चर्चा कीजिए

प्रश्न 4.
आपने जमींदारों के हाल के बारे में अभी जो कुछ पड़ा है उसकी तुलना अध्याय-8 में दिए गए विवरण से कीजिए।
उत्तर:
यहाँ जमींदारों में अत्यधिक भिन्नता है। इस अध्याय में वर्णित जमींदार औपनिवेशिक प्रवृत्ति के हैं जबकि अध्याय- 8 में वर्णित जमींदार प्रजातान्त्रिक प्रवृत्ति के थे।

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पृष्ठ संख्या 267

प्रश्न 5.
पृष्ठ 267 पर दिए गए चित्र को देखिए और यह पता लगाइए कि होजेज ने राजमहल की पहाड़ियों को किसलिए रमणीय माना था ?
उत्तर:
विलियम होजेज द्वारा यह चित्र 1782 में तैयार किया गया। होजेज स्वच्छंदतावादी चित्रकार था । उसके विचार से प्रकृति की पूजा करनी चाहिए। उसे सपाट और समतल भूखण्डों की तुलना में विविधतापूर्ण, ऊँची- नीची ऊबड़-खाबड़ जमीन में सुन्दरता के दर्शन हुए. इसलिए होजेज ने इन दृश्यों को मनमोहक और रमणीय माना था। यहाँ कलाकार ने स्वयं को प्रकृति के अत्यधिक निकट पाया।

पृष्ठ संख्या 268

प्रश्न 6.
चित्र 10.8 और 10.9 को देखिए। इन चित्रों द्वारा जनजातीय मनुष्य और प्रकृति के बीच के सम्बन्धों को किस प्रकार दर्शाया गया है; वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पुस्तक में दिखाए गए दोनों चित्रों को देखने से यह प्रतीत होता है कि जनजातियों का जीवन जंगल से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ था। वे इमली के पेड़ों के बीच बनी अपनी झोंपड़ियों में रहते थे और आम के पेड़ों की छाँह में आराम करते थे। उनका पूरा जीवन ही जंगल से प्राप्त होने वाले पदार्थों पर आधारित था। वे पूरे प्रदेश को अपनी निजी भूमि मानते थे यह जंगल की भूमि उनकी पहचान तथा जीवन का आधार थी। इस प्रकार जनजातीय लोगों तथा प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित था।

पृष्ठ संख्या 270

प्रश्न 7.
पाठ्यपुस्तक के पृष्ठ संख्या 270 के चित्र संख्या 10.10 की तुलना पृष्ठ संख्या 272 के चित्र संख्या 10.12 से कीजिए।
उत्तर:
पृष्ठ संख्या 270 के चित्र संख्या 10.10 में दिखाए गए गाँव के दृश्य में गाँव शान्तिपूर्ण, नीरव और रमणीय दिखाई पड़ता है और प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण है। यह बाहरी संसार के प्रभाव से मुक्त है। जबकि चित्र संख्या 10.12 यह प्रदर्शित करता है कि संथाल लोग शान्तिप्रिय होने के साथ-साथ अपनी अस्मिता को बचाने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाने को भी तैयार रहते थे। इस चित्र में संथालों को अंग्रेजी सैनिकों से युद्ध करते हुए दिखाया गया है। यह चित्र अंग्रेजों के अत्याचारपूर्ण एवं बर्बरतापूर्ण कार्यों को दर्शाता है।

पृष्ठ संख्या 273

प्रश्न 8.
कल्पना कीजिए कि आप ‘इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज’ के पाठक हैं। पाठ्यपुस्तक के चित्र संख्या 10.12, 10.13 और 10.14 में चित्रित दृश्यों के प्रति आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी? इन चित्रों से आपके मन में संथालों की क्या क्या छवि बनती है?
उत्तर:
(1) चित्र 10.12 में संथालों को ब्रिटिश सैनिकों से युद्ध करते हुए दिखाया गया है। इसमें अनेक संथाल घायल अवस्था में हैं तथा कुछ मरे हुए दिखाई देते हैं। यह चित्र ब्रिटिश सैनिकों के अत्याचारपूर्ण एवं बर्बरतापूर्ण कार्यों को उजागर करता है।

(2) चित्र 10.13 में संथालों के गाँव जलते हुए दिखाए गए हैं। इसमें संथालों को अपने आवश्यक सामान के साथ गाँवों से पलायन करते हुए दिखाया गया है। इस चित्र के माध्यम से ब्रिटिश सरकार अपनी शक्ति और मिध्याभिमान को प्रदर्शित करना चाहती थी।

(3) चित्र 10.14 में संचालों को बन्दी बनाकर जेल ले जाते हुए दिखाया गया है। संथाल जंजीरों से बंधे हुए और अंग्रेज सिपाही उन्हें चारों ओर से घेरे हुए हैं।

(4) यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने संथालों को अनेक सुविधाएँ प्रदान की थीं, परन्तु संथालों ने अपनी स्वतन्त्र सत्ता स्थापित करने के लिए विद्रोह कर दिया। इस स्थिति में ब्रिटिश सरकार द्वारा संथालों के विद्रोह को कुचलने के लिए की गई सैनिक कार्यवाही उचित प्रतीत होती है।

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पृष्ठ संख्या 275 चर्चा कीजिए

प्रश्न 9.
बुकानन का वर्णन विकास के सम्बन्ध में उसके विचारों के बारे में क्या बतलाता है? उद्धरणों से उदाहरण देते हुए अपनी दलील पेश कीजिए। यदि आप एक पहाड़िया बनवासी होते तो उसके इन विचारों के प्रति आपकी प्रतिक्रिया क्या होती ?
उत्तर:
बुकानन ने राजमहल की पहाड़ियों का रोचक वर्णन किया है। परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का एक कर्मचारी था। उसने वाणिज्यिक दृष्टि से मूल्यवान पत्थरों तथा खनिजों को खोजने का प्रयास किया। उसने लौह खनिज और अवरक, ग्रेनाइट तथा साल्टमीटर से सम्बन्धित सभी स्थानों का पता लगाया। उसने राजमहल की पहाड़ियों में उगाई जाने वाली धान की फसलों का भी वर्णन किया है परन्तु उसके अनुसार इस क्षेत्र में प्रगति की तथा विस्तृत और उन्नत खेती की कमी थी।

उसने सुझाव देते हुए लिखा है कि यहाँ टसर और लाख के लिए बड़े-बड़े बागान लगाए जा सकते थे परन्तु प्रगति के सम्बन्ध में बुकानन पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित था। इसलिए वह पहाड़िया वनवासियों की जीवन-शैली का आलोचक था। उसकी मान्यता थी कि वनों को कृषि भूमि में बदलना ही होगा। यदि मैं एक पहाड़िया बनवासी होता तो बुकानन के विचारों के प्रति मेरी प्रतिक्रिया विपरीत होती।

पृष्ठ संख्या 276

प्रश्न 10.
लेखक द्वारा प्रयुक्त भाषा या शब्दावली से अक्सर उसके पूर्वाग्रहों का पता चल जाता है। स्रोत 7 को सावधानीपूर्वक पढ़िए और उन शब्दों को छाँटिए जिनसे लेखक के पूर्वाग्रहों का पता चलता है। चर्चा कीजिये कि उस इलाके का रैयत उसी स्थिति का किन शब्दों में वर्णन करता होगा?
उत्तर:
‘नेटिव ओपीनियन’ नामक समाचार पत्र में लेखक द्वारा प्रयुक्त निम्नलिखित शब्दों से उसके पूर्वाग्रहों का पता चलता है –
(1) जासूस (गुप्तचर ) – लेखक ने रैयत को जासूस कहा है जो गाँवों की सीमाओं पर यह देखने के लिए जासूसी करते हैं कि क्या कोई सरकारी अधिकारी आ रहा है।
(2) अपराधी लेखक ने निर्दोष रैयत को अपराधी बताया है जो अपराधियों को समय रहते उनके आने की सूचना दे देते हैं।
(3) हमला करना – लेखक के अनुसार वनवासी ऋणदाताओं पर हमला करके ऋणपत्र तथा दस्तावेज छीन लेते थे।
इस प्रकार लेखक ने रैयत का वर्णन जासूसों अपराधियों एवं हमलावरों के रूप में किया है जिससे लेखक के पूर्वाग्रहों का पता चलता है। परन्तु उस इलाके का रैयत इन शब्दों का कभी प्रयोग नहीं करता और वनवासियों को निरपराधी, शान्तिप्रिय और मानवीय व्यक्ति के रूप में वर्णित करता है।

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पृष्ठ संख्या 280

प्रश्न 11.
पाठ्यपुस्तक के चित्र 10.17 के तीन भाग हैं, जिनमें कपास ढोने के विभिन्न साधन दर्शाए गए सड़क हैं। चित्र में कपास के बोझ से दबे जा रहे बैलों, पर पड़े शिलाखण्डों और नौका पर लदी गाँठों के विशाल ढेर को देखिए। कलाकार इन तस्वीरों के माध्यम से क्या दर्शाना चाहता है?
उत्तर:
पाठ्यपुस्तक के चित्र संख्या 10.17 के द्वारा कलाकार यह बताना चाहता है कि रेलमार्ग प्रारम्भ होने से पहले कपास ढोने के लिए परिवहन के जितने साधन उपलब्ध थे, उनका पूरी तरह उपयोग किया जा रहा था तथा उन सभी साधनों अर्थात् सड़क मार्ग तथा नदी मार्ग द्वारा अधिक से अधिक कपास ढोकर संग्रहण केन्द्र तक पहुँचायी जाती थी।
इस प्रकार संग्रहित की गई कपास का निर्यात पूर्ण रूप से ब्रिटेन को होता था।

पृष्ठ संख्या 282

प्रश्न 12.
रेवत अपनी अर्जी में क्या शिकायत कर रहा है? ऋणदाता द्वारा किसान से ले जाई जाने वाली फसल उसके खाते में क्यों नहीं चढ़ाई जाती? किसानों को कोई रसीद क्यों नहीं दी जाती? यदि आप ऋणदाता होते तो इन व्यवहारों के लिए क्या-क्या कारण देते?
उत्तर:
(1) रैयत अपनी अर्जी में कलेक्टर अहमदनगर को शिकायत कर रहा है कि साहूकार उन पर अत्याचार कर रहे हैं। उन्हें कपड़ा और अनाज देकर कड़ी शर्तों पर बंधपत्र लिखवाया जाता है तथा नकद मूल्य की अपेक्षा उन्हें सामान 25 से 50 प्रतिशत अधिक मूल्य पर दिया जाता है। किसानों के खेत की उपज ले जाते समय साहूकार आश्वासन देता है कि उपज की कीमत उसके खाते में चढ़ा दी जायेगी, लेकिन वे ऐसा नहीं करते तथा उन्हें कोई रसीद भी नहीं देते हैं।

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(2) ऋणदाता बेईमान प्रवृत्ति के थे तथा किसानों का अधिक से अधिक शोषण करना चाहते थे इसलिए वे किसान की उपज की कीमत उसके खाते में नहीं चढ़ाते थे और न ही किसान को कोई रसीद देते थे। किसान की उपज की कीमत उसके खाते में इस कारण नहीं चढ़ाता होगा कि उसका अधिक समय तक शोषण किया जा सके। इसीलिए उसे रसीद भी नहीं दी जाती होगी।

(3) यदि हम ऋणदाता होते तो यही कहते कि हम रैयत को सही कीमत पर सामान आदि देते हैं, उसे रसीद भी देते हैं, जब हम अपना उधार वापस मांगते हैं तो किसान आनाकानी करता है और हमारी झूठी शिकायत करता है।

पृष्ठ संख्या 283

प्रश्न 13.
उन सभी वचनबद्धताओं की सूची बनाइए जो किसान इस (स्रोत 8 ) दस्तावेज में दे रहा है। ऐसा कोई दस्तावेज हमें किसान और ऋणदाता के बीच के सम्बन्धों के बारे में क्या बताता है? इससे किसान और बैलों (जो पहले उसी के थे) के बीच के सम्बन्धों में क्या अन्तर आएगा?
उत्तर:
वचनबद्धताओं की सूची जो किसान द्वारा दी गई –

  • मैंने अपनी लोहे के धुरों वाली 2 गाड़ियाँ साज-सामान एवं चार बैलों सहित आपको कर्जा चुकाने के रूप में बेची हैं।
  • मैंने इस दस्तावेज के तहत उन्हीं दो गाड़ियों और चार बैलों को आपसे किराये (भाड़े पर लिया है।
  • मैं हर माह आपको चार रुपये प्रतिमाह की दर से किराया दूँगा तथा आपसे आपकी लिखावट में रसीद प्राप्त करूंगा।
  • रसीद न मिलने पर मैं यह दलील नहीं दूंगा कि किराया नहीं चुकाया गया है।

यह दस्तावेज हमें यह बताता है कि ऋणदाता किसानों का पूर्ण रूप से शोषण कर रहे थे। अब किसान अपने बैलों तथा गाड़ियों का मालिक नहीं रह गया था। किसान तथा बैलों के बीच के सम्बन्धों में यह अन्तर आयेगा कि पहले किसान स्वयं बैलों का मालिक था तथा बैलों और उसके बीच आत्मीय सम्बन्ध थे अब बैल उसके नहीं थे बल्कि साहूकार के हो गए थे। इस कारण वह बैलों से अधिक से अधिक काम लेना चाहेगा जिससे उसका किराया वसूल हो सके।

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उत्तर दीजिए ( लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
ग्रामीण बंगाल के बहुत से इलाकों में जोतदार एक ताकतवर हस्ती क्यों था?
अथवा
ग्रामीण बंगाल में जोतदारों के उत्कर्ष का वर्णन कीजिये।
अथवा
अठारहवीं शताब्दी के अन्त में ‘जोतदारों’ की स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अठारहवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में जहाँ जमींदार संकट से जूझ रहे थे, वहीं धनी किसानों का एक वर्ग जोतदार के रूप में ताकतवर बनकर उभर रहा था। बुकानन के एक विवरण में हमें दिनाजपुर के ऐसे ही जोतदारों का वर्णन मिलता है। इन जोतदारों ने बड़े रकवों पर अपना कब्जा कर रखा था तथा बटाई पर खेती करवाते थे बटाईदार अपने हल-बैल लाकर खेती करते थे तथा जोतदार को फसल की आधी पैदावार देते थे।

जमींदारों की तुलना में जोतदार अधिक ताकतवर हो गये थे। वे गाँवों में रहते थे तथा किसानों पर उनका सीधा नियंत्रण था। जमींदारों द्वारा लगान बढ़ाये जाने पर वे उनका घोर प्रतिरोध करते थे तथा लगान वसूलने में बाधा डालते थे जो रैवत उनके सीधे नियन्त्रण में थे, उनको अपने पक्ष में एकजुट रखते थे तथा राजस्व के भुगतान में जान-बूझकर देरी करा देते थे। राजस्व अदा न करने पर जब जमींदारी नीलाम होती थी तो अक्सर जोतदार ही इन्हें खरीद लेते थे उत्तरी बंगाल में जोतदार सबसे अधिक ताकतवर थे। कुछ जगहों पर जोतदारों को ‘हवलदार’ कहते थे तथा कहीं पर ये ‘गाँटीदार’ या ‘मंडल’ कहलाते थे जोतदारों के उदय से जमींदारों के अधिकारों का कमजोर पड़ना लाजिमी था।

प्रश्न 2.
जमींदार लोग अपनी जमींदारियों पर किस प्रकार नियन्त्रण बनाए रखते थे?
अथवा
अगर आप एक जमींदार होते, तो अपनी जमींदारी पर किस प्रकार नियन्त्रण बनाए रखते?
उत्तर:
अपनी जमींदारियों पर नियन्त्रण बनाए रखने के लिए जमींदार लोग कई प्रकार के हथकण्डे अपनाते थे, जो इस प्रकार
(1) फर्जी बिक्री द्वारा – जब राजस्व जमा न कराने पर जमींदारी को कम्पनी द्वारा नीलाम किया जाता था तो जमींदार के एजेन्ट ऊँची बोली लगाकर सम्पत्ति खरीद लेते तथा खरीद राशि अदा न करने पर उसकी दुबारा बोली लगाई जाती थी, फिर जमींदार के एजेन्ट ही बोली लगाते तथा खरीद राशि अदा नहीं करते। यह प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती। अन्त में वह सम्पदा नौची कीमत पर पूर्व जमींदार को बेच दी जाती।

(2) सम्पत्ति स्त्रियों के नाम करना – कम्पनी ने यह नियम बनाया था कि स्त्रियों के नाम की सम्पत्ति को उनसे छीना नहीं जायेगा इसलिए बर्दवान के राजा ने अपनी जमींदारी बचाने के लिए अपनी जमींदारी का कुछ हिस्सा अपनी माँ को दे दिया।

(3) बाहरी व्यक्ति को अधिकार न करने देना- यदि कभी कोई बाहरी व्यक्ति जमींदारी को खरीद लेता था तो पुराने जमींदार के ‘लठियाल’ उसको मार-पीट कर भगा देते थे और उसे जमींदारी पर अधिकार नहीं करने देते थे।

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(4) रैयत का लगाव – रैयत भी पूर्व जमींदार को अपना अन्नदाता मानती थी तथा स्वयं को उसकी प्रजा । वे बाहरी व्यक्ति का प्रतिरोध करते थे और जमींदारी की नीलामी को अपना अपमान महसूस करते थे।

प्रश्न 3.
पहाड़िया लोगों ने बाहरी लोगों के आगमन पर कैसी प्रतिक्रिया दर्शाई ?
उत्तर:
पहाड़िया लोग बाहरी लोगों से आशंकित रहते थे। वे बाहरी लोगों का अपने इलाके में प्रवेश का प्रतिरोध करते थे। जब बुकानन राजमहल की पहाड़ियों में गया तो उसने पाया कि पहाड़िया लोग उससे बात करने को भी तैयार नहीं थे तथा कई स्थानों पर तो पहाड़िया लोग अपने गाँव छोड़कर ही भाग जाते थे। बुकानन जहाँ कहीं भी गया, उसने पहाड़िया लोगों का अपने प्रति व्यवहार शत्रुतापूर्ण ही पाया। पहाड़िया लोग बराबर उन मैदानों पर आक्रमण करते रहते धे जहाँ किसान एक स्थान पर बसकर कृषि कार्य करते थे। पहाड़िया लोगों द्वारा ये आक्रमण अधिकतर अपने आपको विशेष रूप से अभाव या अकाल के वर्षों में जीवित रखने के लिए किये जाते थे।

इसके साथ ही ये हमले मैदानों में बसे हुए समुदाय पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने का एक माध्यम भी थे। मैदानी भागों में रहने वाले जमींदारों को प्रायः पहाड़ी मुखियाओं को नियमित रूप से खिराज देकर शान्ति खरीदनी पड़ती थी। इसी प्रकार व्यापारी लोग भी इन पहाड़ी व्यक्तियों द्वारा नियन्त्रित मार्गों का प्रयोग करने के लिए उन्हें कुछ पथकर दिया करते थे। पहाड़िया लोगों की मान्यता धी कि गोरे लोग उनसे उनके जंगल और जमीनें छीन कर उनकी जीवन शैली और जीवित रहने के साधनों को नष्ट कर देना चाहते थे। अतः वे बाहरी लोगों के प्रति आशकित रहते थे।

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प्रश्न 4.
संथालों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह क्यों किया?
उत्तर:
संथाल लोग बंगाल के जमींदारों के यहाँ भाड़े पर काम करने आते थे। कम्पनी के अधिकारियों ने उन्हें राजमहल की पहाड़ियों में बसने का निमन्त्रण दिया। संचाल उस क्षेत्र में बसकर जंगलों को साफ करके स्थायी खेती करने लगे। उनकी बस्तियों और जनसंख्या में तेजी से वृद्धि होने लगी। 1832 तक जमीन के काफी बड़े भाग को ‘दामिन-इ-कोह’ के नाम से सीमांकित करके इसे संभाल – भूमि घोषित कर दिया गया। शीघ्र ही संथालों का भ्रम टूट गया। उन्हें यह महसूस होने लगा कि जिस भूमि पर वे खेती कर रहे हैं, वह उनके हाथ से निकलती जा रही है।

इसके प्रमुख कारण थे –

  • सरकार ने संथालों की भूमि पर भारी कर लगा दिया था।
  • साहूकार बहुत ऊँची दर पर ब्याज लगा रहे थे और ऋण न चुकाने पर उनकी कृषि भूमि पर कब्जा कर रहे थे तथा
  • जमींदार लोग उनके इलाके पर अपने नियंत्रण का दावा कर रहे थे।

1850 के दशक तक संथाल लोग यह अनुभव करने लगे थे कि अपने लिए एक आदर्श संसार का निर्माण करने के लिए, जहाँ उनका अपना शासन हो, जमींदारों, साहूकारों तथा औपनिवेशिक राज के विरुद्ध विद्रोह करने का समय आ गया है। अन्त में 1855-56 में संथालों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

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प्रश्न 5.
बक्कन के रैयत ऋणदाताओं के प्रति क्रुद्ध क्यों थे?
उत्तर:
दक्कन के रैयत (किसान) ऋणदाताओं के प्रति निम्न कारणों से क्रुद्ध थे –

  • ऋणदाताओं ने रैयत को ऋण देने से इनकार कर दिया था
  • रैयत समुदाय इस बात से अधिक नाराज था कि ऋणदाता संवेदनहीन हो गए हैं तथा उनकी दयनीय स्थिति पर वे कोई तरस नहीं खा रहे हैं।
  • प्रायः न चुकाई गई शेष राशि पर सम्पूर्ण ब्याज को मूलधन के रूप में नये बंधपत्रों में सम्मिलित कर लिया जाता था और उस पर नये सिरे से ब्याज लगने लगता था।
  • ऋणदाता बन्धपत्रों में जाली आंकड़े भर लेते थे वे किसानों की फसल को नीची कीमतों पर खरीदते थे तथा अन्त में वे किसानों की धन-सम्पत्ति पर ही अधिकार कर लेते थे।
  • रैयत से ऋण के पेटे भारी ब्याज लगाया जाता था।
  • ऋण चुकता होने पर भी उन्हें रसीद नहीं दी जाती थी।
  • ऋणदाताओं ने गाँव की पारम्परिक प्रथाओं का उल्लंघन करना शुरू कर दिया तथा मूलधन से अधिक ब्याज लेना शुरू कर दिया।

निम्नलिखित पर एक लघु निबन्ध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में) –

प्रश्न 6.
इस्तमरारी बन्दोबस्त के बाद बहुत-सी जमींदारियाँ क्यों नीलाम कर दी गई?
अथवा
स्थायी भूमि प्रबन्ध के पश्चात् बहुत-सी जमींदारियाँ क्यों नीलाम कर दी गई?
उत्तर:
इस्तमरारी बन्दोबस्त 1793 ई. में बंगाल के गवर्नर-जनरल लार्ड कार्नवालिस ने बंगाल में इस्तमरारी बन्दोबस्त लागू किया। इस व्यवस्था के अनुसार जमींदार को एक निश्चित राजस्व की राशि ईस्ट इण्डिया कम्पनी को देनी होती थी। जो जमींदार अपनी निश्चित राशि नहीं चुका पाते थे, उनकी जमींदारियाँ नीलाम कर दी जाती थीं। अतः इस्तमरारी बन्दोबस्त लागू होने के बाद 75% से अधिक “जमींदारियाँ नौलाम की गई क्योंकि जमींदार समय पर राजस्व की राशि जमा कराने में असफल रहे थे।

जमींदारी के नीलाम होने के कारण जमींदारों द्वारा राजस्व जमा न कराने तथा उनकी जमींदारी नीलाम होने के पीछे कई कारण थे –
(1) ऊँचा राजस्व निर्धारण – राजस्व की प्रारम्भिक माँग बहुत ऊँची थी, ऐसा इसलिए किया गया कि आगे चलकर आय में वृद्धि हो जाने पर भी राजस्य नहीं बढ़ाया जा सकता था। इस हानि को पूरा करने के लिए दरें ऊँची रखी गर्यो इसके लिए यह दलील दी गई कि जैसे ही कृषि का उत्पादन बढ़ेगा, वैसे ही धीरे-धीरे जमींदारों का बोझ कम होता जायेगा।

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(2) उपज की नीची कीमतें राजस्व की यह ऊँची माँग 1790 के दशक में रखी गई जब कृषि की उपज की कीमतें नीची थीं। ऐसे में कृषकों के लिए राजस्व चुकाना बहुत मुश्किल था जब जमींदार किसानों से ही लगान वसूल नहीं कर सकता था तो वह आगे कम्पनी को अपनी निर्धारित राजस्व राशि कैसे अदा कर सकता था।

(3) असमान दरे – राजस्व की दरें असमान थीं, फसल अच्छी हो या खराब, राजस्व समय पर जमा कराना आवश्यक था। यदि राजस्व निश्चित दिन के सूर्यास्त तक जमा नहीं कराया जाता तो जमींदारी को नीलाम किया जा सकता था।

(4) जमींदार की शक्ति सीमित होना इस्तमरारी बन्दोबस्त ने प्रारम्भ में जमींदार की शक्ति को रैयत से राजस्व एकत्र करने तथा अपनी जमींदारी का प्रबन्ध करने तक ही सीमित कर दिया। राजस्व एकत्र करने के लिए जमींदार का एक अधिकारी, जिसे अमला कहते थे, गाँव में आता था।

लेकिन राजस्व संग्रहण एक गम्भीर समस्या थी कभी-कभी खराब फसल और नीची कीमतों के कारण किसानों को देय राशि का भुगतान करना कठिन हो जाता था कभी-कभी रैयत जान-बूझकर भी भुगतान में देरी कर देते थे, क्योंकि जमींदार उन पर अपनी ताकत का प्रयोग नहीं कर सकता था। जमींदार उन बाकीदारों पर मुकदमा तो चला सकता था मगर न्यायिक प्रक्रिया बहुत लम्बी चलती थी 1798 में अकेले बर्दवान जिले में ही राजस्व भुगतान के बकाया से सम्बन्धित 30,000 से अधिक बद लम्बित थे।

(5) जोतदारों का उदव इसी बीच जोतदारों (धनी किसानों) के वर्ग का उदय हुआ यह वर्ग गाँवों में रहता था और रैयत पर अपना नियन्त्रण रखता था। यह वर्ग जान- बूझकर रैयत को राजस्व का भुगतान न करने के लिए प्रोत्साहित करता था, क्योंकि जब समय पर राजस्व जमा नहीं होता तो जमींदारी नीलाम की जाती थी और यह जोतदार ही उस जमींदारी को खरीद लेते थे।

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प्रश्न 7.
पहाड़िया लोगों की आजीविका संथालों की आजीविका से किस प्रकार भिन्न थी?
उत्तर:
पहाड़िया लोगों की आजीविका और संथालों की आजीविका में भिन्नता बंगाल में राजमहल की पहाड़ियों के आसपास रहने वाले पहाड़िया लोगों और संचालों की आजीविका के प्रमुख अन्तर को अग्रलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है –

(1) पहाड़ियों की आजीविका जंगलों पर आधारित थी, जबकि संथालों की आजीविका कृषि पर आधारित थी पहाड़िया लोगों का जीवन पूरी तरह से जंगल पर निर्भर था। वे जंगल की उपज से अपना जीवन निर्वाह करते थे। कुछ पहाड़िया लोग शिकार करके अपना जीवनयापन करते थे वे जंगलों से खाने के लिए महुआ के फूल इकट्ठा करते थे तथा बेचने के लिए रेशम के कोया और राल तथा काठकोयला बनाने के लिए लकड़ियाँ इकट्ठी करते थे वे इमली के पेड़ की पनी छाँव में अपनी झोंपड़ी बनाते थे तथा आम की छाँव में बैठकर आराम करते थे। दूसरी तरफ ब्रिटिश सरकार से प्रोत्साहित होकर संथालों ने अपना खानाबदोश जीवन छोड़कर जब राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में बसना शुरू किया तो उन्होंने वहाँ जंगलों को साफ कर स्थायी कृषि करना प्रारम्भ कर दिया और कृषि उत्पाद ही संथालों की आजीविका के आधार थे।

(2) पहाड़िया झूम कृषि करते थे और संथाल स्थायी कृषि पहाड़िया लोग जंगलों को जलाकर जमीन को साफ करके ‘झूम’ खेती करते थे। वे कुदाल 1 के द्वारा जमीन को थोड़ा खुरचकर विभिन्न प्रकार की दालें तथा ज्वार बाजरा पैदा कर उन्हें अपने खाने के काम में लेते धे एक स्थान पर कुछ वर्षों तक खेती करने के बाद वे उस जमीन को परती छोड़कर अन्य स्थान पर चले जाते थे जिससे जमीन की खोई उर्वरता पुनः प्राप्त हो सके। दूसरी तरफ संथाल जंगलों को साफ कर स्थायी कृषि करते थे। यही कारण है कि ‘दामिन-ई-कोह’ नामक राजमहल की पहाड़ियों के तलहटी क्षेत्र में कुछ ही वर्षों में संचालों के गाँवों और उनकी जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई। वे हल से जमीन को जोतकर कृषि करते थे।

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(3) पहाड़िया परती भूमि को चरागाह के रूप में उपयोग लेते थे, संथालों ने उन्हें खेतों में बदल दिया – परती जमीन पर उगी हुई घास आदि पहाड़िया लोगों के पशुओं के लिए चरागाह का कार्य करती थी, जबकि संथालों ने पहाड़ियों के चरागाहों को धान के खेत के रूप में बदल दिया तथा वे वाणिज्यिक खेती भी करते थे तथा साहूकारों से लेन-देन भी करते थे।

(4) कृषि उत्पादों में अन्तर पहाड़िया लोग झूम खेती कर ज्वार, बाजरा तथा दालें उपजते थे, जबकि संथाल लोग कपास, धान, तम्बाकू, सरसों तथा अन्य व्यापारिक फसलें उगाते थे।

(5) खानाबदोश व स्थायी जीवन सम्बन्धी अन्तर- पहाड़िया लोग खानाबदोश जीवन जीते थे। इसके अतिरिक्त ये मैदानी इलाकों के किसानों के पशुओं व अनाज को लूटकर ले जाते थे वे मैदानी जमींदारों से कुछ खिराज लेते थे और उसके बदले में उनके क्षेत्र में आक्रमण नहीं करते थे, लेकिन ये राय अस्थायी आधार होते थे। दूसरी तरफ संथाल ‘दामिन-इ-कोह’ क्षेत्र में स्थायी रूप से असकर, गाँवों में रहते थे तथा स्थायी कृषि करते थे। वे व्यापारियों तथा साहूकारों के साथ लेन-देन करने लगे थे।

(6) कृषि के साधनों में अन्तर पहाड़िया लोग शूम कृषि के लिए कुदाल का प्रयोग करते थे, इसलिए यदि कुदाल को पहाड़िया जीवन का प्रतीक माना जाए तो हल को संथालों की शक्ति का प्रतीक मानना पड़ेगा; क्योंकि संथाल लोग स्थायी कृषि के लिए हल का प्रयोग करते थे।

प्रश्न 8.
अमेरिकी गृहयुद्ध ने भारत में रैयत समुदाय के जीवन को कैसे प्रभावित किया?
उत्तर:
अमेरिकी गृहयुद्ध का भारत में रैयत समुदाय पर प्रभाव अमेरिका में गृहयुद्ध शुरू होने से पूर्व ब्रिटेन में जितना कपास का आयात होता था, उसका 75% अमेरिका से आता था। इस प्रकार ब्रिटेन पूरी तरह अमेरिकी कपास पर निर्भर था। इंग्लैण्ड के सूती वस्त्रों के निर्माता इस बात से परेशान थे कि यदि अमेरिका से आयात बन्द हो गया तो हमारे व्यापार का क्या होगा।

से अमेरिकी गृहयुद्ध से भारत में कपास में तेजी उत्पादन में वृद्धि और रैयत समुदाय को राहत – 1861 ई. में अमेरिका में गृहयुद्ध छिड़ने से भारत में रैयत समुदाय पर अग्रलिखित प्रभाव पड़े –

(i) अमेरिकी गृहयुद्ध से वहाँ कपास उत्पादन व निर्यात में कमी 1861 में अमेरिका में गृहयुद्ध शुरू हो जाने से वहाँ कपास का उत्पादन कम हो गया तथा कपास के आयात में भारी कमी आ गई। 1861 में जहाँ 20 लाख गाँठें ब्रिटेन में आयात की गई थीं, वहाँ 1862 में सिर्फ पचपन हजार गाँठों का ही आयात हो पाया।

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(ii) अमेरिकी गृहयुद्ध के कारण ब्रिटेन में वहाँ से कपास न आने पर भारत में कपास उत्पादन को प्रोत्साहन ब्रिटेन द्वारा भारत से कपास आयात करने का प्रावधान किया गया। इसके लिए ब्रिटेन की सरकार ने यम्बई सरकार को अधिक कपास उपजाने के लिए प्रोत्साहित किया। बम्बई के कपास निर्यातकों ने कपास की आपूर्ति का आकलन करने के लिए कपास उत्पादक जिलों का दौरा कर किसानों को कपास उगाने हेतु प्रोत्साहित किया।

(iii) किसानों को ऋणदाताओं द्वारा अग्रिम राशि देना ऋणदाताओं ने किसानों को अधिक कपास उगाने हेतु अग्रिम ऋण देना शुरू कर दिया क्योंकि कपास की कीमतों में इजाफा हो रहा था। दक्कन में इसका काफी प्रभाव पड़ा तथा किसानों को कपास उगाई जाने वाले प्रति एकड़ के लिए 100 रुपये अग्रिम राशि दी गई। साहूकार लम्बी अवधि के लिए देने को तैयार थे, क्योंकि जब बाजार में तेजी आती है तो कर्ज आसानी से उपलब्ध हो जाता है।

(iv) अमेरिकी गृहयुद्ध काल में भारत में कपास उत्पादन में वृद्धि – जब तक अमेरिका में गृहयुद्ध चलता रहा, दक्कन में कपास का उत्पादन बढ़ता गया। 1860 से 1864 के दौरान कपास उगाने वाले एकड़ों की संख्या दो गुनी हो गई 1862 में यह स्थिति आई कि ब्रिटेन में जितना कपास आयात होता था, उसका 90% भाग अकेले भारत से जाता था

(v) कपास में आई तेजी से धनी किसानों को लाभ अमेरिकी गृहयुद्ध के कारण आई कपास की तेजी से सभी किसानों को लाभ नहीं हुआ, जो धनी किसान थे उन्हें ही लाभ मिला। अधिकांश किसान कर्ज के बोझ से और अधिक दब गये।

(vi) अमेरिकी गृहयुद्ध के समाप्त होने पर भारत से कपास निर्यात में कमी आना तथा रैयत समुदाय की कठिनाइयों में वृद्धि – 1865 में अमेरिका का गृहयुद्ध समाप्त हो गया और वहाँ कपास का उत्पादन फिर से होने लगा और ब्रिटेन के भारतीय कपास के निर्यात में निरन्तर गिरावट आती गई। साहूकारों ने कपास की गिरती कीमत को देखते हुए किसानों को ऋण देने से मना कर दिया तथा अपने उधार की वसूली पर जोर देने लगे। एक तरफ ऋण मिलना बन्द हो गया, दूसरी ओर राजस्व की माँग बढ़ा दी गई रैयत के लिए राजस्व जमा कराना मुश्किल हो गया। इसके फलस्वरूप रैयत की कठिनाइयाँ बढ़ती चली गई।

प्रश्न 9.
किसानों का इतिहास लिखने में सरकारी स्रोतों के उपयोग के बारे में क्या समस्याएँ आती हैं?
उत्तर:
सरकारी स्रोतों के उपयोग की समस्याएँ किसानों का इतिहास लिखने में सरकारी स्रोतों के उपयोग सम्बन्धी प्रमुख समस्याएं निम्नलिखित हैं –
(1) सरकारी रिपोर्टों का एकपक्षीय होना किसानों के इतिहास लेखन में सरकारी स्रोतों का उपयोग बहुत ही छानबीन करके करना चाहिए क्योंकि सरकारी रिपोर्ट ज्यादातर एकपक्षीय ही पाई गई हैं। इसलिए अन्य उपलब्ध स्रोतों से उनकी तुलना करके ही सही तथ्यों तक पहुंचा जा सकता है।

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(2) सरकारी दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति – सरकारी स्त्रोतों में वर्णित विवरण सरकार के दृष्टिकोण को ही प्रस्तुत करते हैं।

(3) दूसरे पक्ष को दोषी ठहराना – औपनिवेशिक सरकार ने कभी भी अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं किया। उनकी जांच रिपोटों में दूसरे पक्ष को ही दोषी ठहराया गया। उदाहरण के लिए, जब दक्कन में किसानों ने बढ़े हुए राजस्व के विरुद्ध विद्रोह किया तो सरकार ने दंगे का कारण बड़े हुए राजस्व की दर को न मानकर साहूकारों और ऋणदाताओं को विद्रोह के लिए उत्तरदायी ठहराया।

(4) अपनी दमनकारी नीति को न्यायोचित बताना – पहाड़िया लोगों का उन्मूलन करने के लिए जो क्रूरतापूर्ण नीति अपनाई गई, उसके पीछे ब्रिटिश सरकार ने अपने तथ्यों में पहाड़ियों को बर्बर, असभ्य और जंगली घोषित करके उनके दमन को उचित बताया जबकि पहाड़िया आदिवासी थे और बाहरी जगत से अपना सम्पर्क कम से कम रखना चाहते थे।

(5) संथालों के विरुद्ध की गई कार्यवाही को उचित बताना संथालों का विद्रोह भी इसी तथ्य को इंगित करता है। पहले पहाड़ियों का उन्मूलन करने तथा कृषि का विस्तार करने हेतु ब्रिटिश सरकार ने उन्हें छूट देकर बसने हेतु प्रोत्साहित किया। जब उनकी प्रगति होने संगी तो उनके ऊपर भारी कर लगाने शुरू किये संथालों द्वारा इस अन्याय के विरुद्ध किये गये विद्रोह को सरकार ने नृशंसता से कुचला और अपने कृत्य को उचित बताते हुए इंग्लैण्ड के अखबारों में खबरें तथा चित्र प्रकाशित करवाये।

(6) सरकारी सरोकार को व्यक्त करना – दक्कन दंगा आयोग द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट भी सरकारी सरोकार को ही प्रतिबिम्बित करती है। दक्कन दंगा आयोग से विशेष रूप से यह पता लगाने को कहा गया था कि क्या सरकारी राजस्व की माँग का स्तर विद्रोह का कारण था सम्पूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत करने के बाद आयोग ने सूचित किया कि सरकारी माँग किसानों के गुस्से की वजह नहीं थी। इसमें सारा दोष साहूकारों और ऋणदाताओं का ही था। इन बातों से यह स्पष्ट होता है कि औपनिवेशिक सरकार यह मानने को कदापि तैयार नहीं थी कि जनता में असंतोष या क्रोध कभी सरकारी कार्यवाही के कारण उत्पन्न हुआ था।

इस तरह सरकारी रिपोर्टों के आधार पर किसानों का सही इतिहास नहीं लिखा जा सकता। सरकारी रिपोर्ट इतिहास लेखन में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं, लेकिन उनका प्रयोग करते समय उन्हें सावधानीपूर्वक काम में लेना चाहिए। समाचार-पत्रों, गैर-सरकारी स्रोतों, वैधिक अभिलेखों और यथासम्भव मौखिक साक्ष्यों के साथ उनका भली प्रकार मिलान करके उनकी विश्वसनीयता की जाँच कर फिर उनका उपयोग करना चाहिए।

उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन JAC Class 12 History Notes

→ बंगाल और वहाँ के जमींदार – ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की शुरुआत सबसे पहले बंगाल में हुई। वहाँ ग्रामीण समाज को पुनर्व्यवस्थित करने तथा भूमि सम्बन्धी अधिकारों की नयी व्यवस्था तथा नयी राजस्व प्रणाली स्थापित करने के प्रयत्न किए गए।

→ इस्तमरारी बन्दोबस्त के तहत बर्दवान में की गई नीलामी की एक घटना – 1793 में बंगाल में इस्तमरारी बन्दोबस्त लागू किया गया। इसमें ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने राजस्व की राशि निश्चित कर दी थी जो प्रत्येक जमींदार को अदा करनी होती थी। जमींदार से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह कम्पनी को नियमित रूप से यह राशि अदा करेगा जो जमींदार समय पर राजस्व अदा नहीं करते थे, उनकी जमींदारियाँ नीलाम कर दी जाती थीं। ऐसी ही एक नीलामी की घटना 1797 में बर्दवान में हुई ।

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→ अदा न किए गए राजस्व की समस्या – इस्तमरारी बन्दोबस्त लागू होने के बाद लगभग 75% से अधिक जमींदारियाँ नीलाम की गई। ब्रिटिश अधिकारियों का मानना था कि इस्तमरारी बन्दोबस्त लागू होने से सारी समस्याएँ। हल हो जायेंगी। लेकिन उनकी सोच बेकार हो गई। कारण यह रहा कि बंगाल में बार बार अकाल पड़े, पैदावार कम होती गई। जमींदारों द्वारा समय पर राजस्व जमा नहीं कराया गया जिससे उनकी जमींदारियाँ नीलाम की जाने
लगीं।

→ राजस्व राशि के भुगतान में जमींदारों द्वारा चूक करना-ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधिकारियों का मानना था कि राजस्व माँग निर्धारित होने से जमींदार स्वयं को सुरक्षित समझकर अपनी सम्पदाओं का विकास करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका इस्तमरारी बन्दोबस्त लागू होने के बाद कुछ दशकों में जमींदारों द्वारा राजस्व जमा करने में कोताही की जाने लगी और राजस्व की बकाया रकमें बढ़ती गई इस कोताही के कई कारण थे –

  • कम्पनी द्वारा राजस्व की माँग को ऊंचे स्तर पर रखा गया।
  • यह ऊँची माँग 1790 के दशक में लागू की गई उस समय उपज की कीमतें नीची थीं, जिससे किसानों के लिए जमींदार को लगान चुकाना मुश्किल था ।
  • राजस्व की दर असमान थी फसल चाहे अच्छी हो या खराब, राजस्व का भुगतान एक निश्चित समय पर ही करना आवश्यक था।
  • जमींदार की शक्ति को सीमित कर दिया गया। उसका कार्य केवल राजस्व वसूलना तथा जमींदारी का प्रबन्ध करना रह गया।

→ जोतदारों का उदय – गाँवों में जोतदारों के एक नये वर्ग का उदय हो गया। यह धनी किसानों से बना था। ये धनी किसान गाँवों में ही रहते थे तथा गरीब किसानों पर अपना नियंत्रण रखते थे ये जमींदार द्वारा लगान बढ़ाने का प्रतिरोध करते थे तथा जमींदारी अधिकारियों को अपने कर्तव्यों का पालन करने से रोकते थे उत्तरी बंगाल में जोतदारों की ताकत बहुत बढ़ गई थी जमींदार की सम्पदा नीलाम होने पर कई बार जोतदार ही उसे खरीद लेते थे।

→ जमींदारों की ओर से प्रतिरोध – ग्रामीण क्षेत्रों में जमींदारों की सत्ता समाप्त नहीं हुई थी, वे अपनी भू-सम्पदा बचाने के लिए कई हथकण्डे अपनाते थे –

  • फर्जी बिक्री द्वारा जमींदार के एजेन्ट ही नीलामी में भाग लेकर उसे खरीद लेते थे।
  • स्वियों के नाम सम्पत्ति कर दी जाती थी क्योंकि कम्पनी ने ऐसा नियम बनाया था कि स्वियों की सम्पदा को छीना नहीं जायेगा।
  • बाहरी व्यक्ति द्वारा जमींदारी खरीद लेने पर उसे मारपीट कर भगा दिया जाता था।
  • किसान पुराने जमींदार को अपना अन्नदाता मानते थे और जमींदारी की नीलामी को खुद का अपमान मानते थे जिससे जमींदार आसानी से विस्थापित नहीं किए जा सकते थे।
  • 19वीं सदी के प्रारम्भ में कीमतों में मंदी की स्थिति समाप्त होने से जमींदारों ने अपनी सत्ता को पुनः सुदृढ़ बना लिया था। लेकिन 1930 की मंदी में पुनः जमींदार कमजोर हो गये और जोतदार शक्तिशाली हो गए।

→ पाँचवीं रिपोर्ट- सन् 1813 में ब्रिटिश संसद में कई रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, उन्हीं में से एक रिपोर्ट जो ईस्ट इंडिया कम्पनी के भारत प्रशासन के बारे में थी, ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ कहलाती है। यह रिपोर्ट कम्पनी के कुशासन, अव्यवस्थित प्रशासन, कम्पनी के अधिकारियों के लोभ-लालच और भ्रष्टाचार की घटनाओं को दर्शाती थी।

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18वीं सदी के अन्तिम दशकों में ब्रिटिश सरकार ने कम्पनी को बाध्य किया था कि वह भारत के प्रशासन के बारे में नियमित रूप से अपनी रिपोर्ट भेजे। कम्पनी के कामकाज की जाँच के लिए कई समितियाँ नियुक्त की गई। पाँचवीं रिपोर्ट एक ऐसी ही रिपोर्ट है जो एक प्रवर समिति द्वारा तैयार की गई थी और जो भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन के स्वरूप पर ब्रिटिश संसद में गम्भीर वाद-विवाद का आधार बनी। इसमें परम्परागत जमींदारी सत्ता के पतन का अतिरंजित वर्णन है।

II. कुदाल और हल – 19वीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों में राजमहल की पहाड़ियों में पहाड़िया और संचालों के बीच संघर्ष हुआ पहाड़िया कुदाल से झूम खेती करते थे और संथाल हल जोतकर स्थायी खेती कुदाल और हल इसी के प्रतीक हैं।

(1) राजमहल की पहाड़ियों में पहाड़िया लोगों की स्थिति – उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ के वर्षों में बुकानन द्वारा इस क्षेत्र का दौरा किया गया। उसके वर्णन के अनुसार, यहाँ के निवासी पहाड़िया कहलाते थे जो बाहरी व्यक्तियों के प्रति आशंकित रहते थे ये जंगल की भूमि को साफ कर शूम खेती करते थे और कुदाल से जमीन को खुरच अपने खाने लायक अनाज व दालें पैदा कर लेते थे। जंगल से उनका घनिष्ठ सम्बन्ध था। वे इसे अपनी निजी भूमि मानते थे। यह जमीन व जंगल उनकी पहचान थी। वे बाहरी लोगों के प्रवेश का विरोध करते थे तथा कई बार मैदानों में आकर लूटपाट भी कर लेते थे अंग्रेज इन पहाड़ियों को असभ्य और बर्बर मानकर इनका उन्मूलन करना चाहते थे।

(2) संथाल अगुआ बाशिंदे-सन् 1800 ई. के लगभग संथालों का राजमहल की पहाड़ियों में आगमन हुआ। इससे पूर्व वे बंगाल में भाड़े के मजदूर के रूप में काम करने आते थे अंग्रेजों ने इन्हें राजमहल की पहाड़ियों में बसने के लिए तैयार कर लिया। 1832 में जमीन के काफी बड़े भू-भाग को ‘दामिन-इ-कोह’ के रूप में सीमांकित करके उसे संथाल भूमि घोषित कर दिया गया। दामिन-इ-कोह के सीमांकन के बाद संथालों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। संथालों और पहाड़िया लोगों के बीच संघर्ष हुआ जिसमें संथाल विजयी रहे।

उन्होंने पहाड़िया लोगों को पहाड़ियों के भीतर की ओर चले जाने के लिए मजबूर कर दिया और उन्हें ऊपरी पहाड़ियों के चट्टानी और अधिक बंजर इलाकों तथा भीतरी शुष्क भागों तक सीमित कर दिया गया। इससे उनके रहन-सहन पर बुरा प्रभाव पड़ा और वे आगे चलकर गरीब हो गये। संथालों ने स्थायी कृषि शुरू की, लेकिन सरकार संथालों की जमीन पर भारी कर लगाने लगी; साहूकार लोग ऊँची ब्याज पर ऋण दे रहे थे और कर्ज अदा न किए जाने पर उनकी जमीन पर कब्जा कर रहे थे। तीसरे, जमींदार लोग उनके इलाके पर अपने नियंत्रण का दावा कर रहे थे। फलतः 1850 तक संथालों ने ब्रिटिश राज्य के प्रति विद्रोह करने का मानस बनाया। 1855-56 के संथाल विद्रोह के बाद संथाल परगने का निर्माण किया गया।

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III. देहात में विद्रोह (बम्बई दक्कन ) उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य भारत के विभिन्न प्रान्तों में किसानों द्वारा साहूकारों तथा अनाज के व्यापारियों के विरुद्ध अनेक विद्रोह किए गए। ऐसा ही एक विद्रोह 1875 में दक्कन में हुआ।

(1) बहीखाते जलाना-2 मई, 1875 को पूना जिले के सूपा गाँव में किसानों ने साहूकारों पर हमला कर ऋणबन्धों तथा बहीखातों को जला दिया। साहूकारों के परों में आग लगा दी। पुणे से यह विद्रोह अहमदनगर तक फैल गया तथा 6500 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र इसकी चपेट में आ गया। विद्रोह दबाने में कई महीने लगे।

(2) नई राजस्व प्रणाली – इस्तमरारी बन्दोबस्त बंगाल से बाहर बहुत कम लागू किया गया। 1810 में खेती की कीमतों तथा उपज के मूल्यों में वृद्धि हुई लेकिन कम्पनी का राजस्व नहीं बढ़ा क्योंकि इस्तमरारी बन्दोबस्त के कारण कम्पनी राजस्व नहीं बढ़ा सकती थी इसलिए कम्पनी ने राजस्व बढ़ाने के नये तरीके ढूँढ़े। जो राजस्व प्रणाली बम्बई में लागू की गई, वह रैयतवाड़ी कहलायी क्योंकि इसे कम्पनी और रैयत (किसान) के मध्य तय किया गया। यह प्रणाली 30 वर्ष के लिए लागू की गई 30 वर्ष बाद इसमें परिवर्तन हो सकता था।

(3) राजस्व की माँग और किसान का कर्ज – बम्बई दक्कन में पहला राजस्व बन्दोबस्त 1820 के दशक में किया गया। राजस्व अधिक होने के कारण किसान गाँव छोड़कर भाग गये। राजस्व कठोरता से वसूला गया, जुर्माने ठोके गये। 1832 ई. के पश्चात् कीमतों में आई तीव्र गिरावट, अकाल आदि के कारण किसानों की स्थिति और दयनीय हो गई किसानों को साहूकारों से ऋण लेकर अपने दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करनी पड़ती थी। उन्हें हल-बैल और बीज के लिए साहूकारों से ऋण लेना पड़ा, लेकिन राजस्व की बकाया राशियाँ आसमान छू रही थीं। 1840 के दशक में कम्पनी के अधिकारियों को भी इसका बोध हुआ तो उन्होंने राजस्व सम्बन्धी माँग को कुछ हल्का किया।

(4) कपास में तेजी – 1860 के दशक से पूर्व ब्रिटेन में कच्चे माल के रूप में आयात की जाने वाली समस्त कपास का तीन-चौथाई भाग अमेरिका से आता था। 1857 में ब्रिटेन में कपास आपूर्ति संघ की स्थापना हुई, 1859 में मैनचेस्टर कॉटन कम्पनी बनाई गई 1861 में अमेरिका में गृह युद्ध छिड़ने के कारण कपास के आयात में भारी गिरावट आई। बम्बई के कपास के सौदागरों द्वारा शहरी साहूकारों को अधिक से अधिक अग्रिम राशियाँ दी गई ताकि वे भी ग्रामीण ऋणदाताओं को अधिकाधिक मात्रा में ऋण दे सकें। सौदागरों द्वारा 1862 तक ब्रिटेन के आयात की कपास का 900% भारत से जाता था लेकिन इसका लाभ कुछ धनी किसानों को ही हुआ, शेष किसान कर्ज के बोझ से दब गये।

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(5) ऋण नहीं मिलना अमेरिका में गृह युद्ध समाप्त होने पर कपास का उत्पादन पुनः होने पर ब्रिटेन को भारत से निर्यात कम हो गया। साहूकारों ने किसानों को ऋण देना बन्द कर दिया। एक ओर ऋण का सोत सूख गया, दूसरी ओर राजस्व की दर 50 से 100% बढ़ गई जिसे चुकाना किसानों के वंश के बाहर हो गया।

(6) अन्याय का अनुभव- किसानों ने यह अनुभव किया कि ऋणदाता उनके साथ अन्याय कर रहा है। वह संवेदनहीन होकर देहात की प्रथाओं का उल्लंघन कर रहा है। ब्याज की दरें कई गुना बढ़ा दी गई 100 रु. के मूलधन पर 2000 रु. व्याज वसूला गया। ऋण चुकता होने पर भी रसीद नहीं दी जाती थी। बन्धपत्रों में जाली आँकड़े भरे जाते थे बिना दस्तावेजों के किसान को ऋण नहीं मिलता था।

IV. दक्कन दंगा आयोग – दक्कन में दंगा शुरू होने पर बम्बई सरकार ने इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया। भारत सरकार द्वारा दबाव डालने पर बम्बई सरकार ने एक आयोग की स्थापना की। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि दंगे के लिए साहूकार एवं ऋणदाता ही उत्तरदायी थे सरकारी राजस्व की बढ़ोतरी दंगा फैलने का कारण नहीं थी औपनिवेशिक सरकार कभी यह मानने को तैयार नहीं थी कि जनता में असंतोष सरकारी कार्यवाही के कारण उत्पन्न हुआ। रिपोर्टों की विश्वसनीयता ये सरकारी रिपोर्ट थीं इस प्रकार की रिपोर्टों का अध्ययन सावधानी के साथ करना चाहिए तथा अन्य स्रोतों से इनका मिलान करके ही उनकी विश्वसनीयता पर विश्वास करना चाहिए।

JAC Class 12 History Solutions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

Jharkhand Board JAC Class 12 History Solutions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Solutions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

Jharkhand Board Class 12 History संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत In-text Questions and Answers

पृष्ठ संख्या 413

प्रश्न 1.
उद्देश्य प्रस्ताव में ‘लोकतांत्रिक’ शब्द का इस्तेमाल न करने के लिए जवाहर लाल नेहरू ने क्या कारण बताया था?
उत्तर:
उद्देश्य प्रस्ताव में ‘लोकतांत्रिक’ शब्द के इस्तेमाल न करने के पीछे नेहरूजी ने जो कारण बताया वह इस प्रकार है— नेहरूजी ने कहा कि कोई गणराज्य लोकतांत्रिक न हो ऐसा नहीं हो सकता, हमारा पूरा इतिहास इस बात का साक्षी है कि हम लोकतांत्रिक संस्थानों के ही पक्षधर हैं। हमारा लक्ष्य लोकतंत्र ही है। यद्यपि इस प्रस्ताव में हमने लोकतांत्रिक शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है क्योंकि हमें लगा कि यह तो स्वाभाविक ही है कि ‘गणराज्य’ शब्द में लोकतांत्रिक शब्द पहले ही निहित होता है। इसलिए हम अनावश्यक और अनुपयोगी शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहते थे। हमने इस प्रस्ताव में लोकतंत्र की अंतर्वस्तु प्रस्तुत की है बल्कि लोकतंत्र की ही नहीं आर्थिक लोकतंत्र की अन्तर्वस्तु भी प्रस्तुत की है।

पृष्ठ संख्या 415

प्रश्न 2.
स्रोत दो में वक्ता को ऐसा क्यों लगता है कि संविधान सभा ब्रिटिश बंदूकों के साये में काम कर रही है?
उत्तर:
वक्ता सोमनाथ लाहिड़ी को ऐसा इसलिए लगता था कि संविधान ब्रिटिश योजना के अनुसार बना है और मामूली मतभेद के लिए भी उसे संघीय न्यायालय में अथवा ब्रिटिश प्रधानमंत्री के द्वार पर दस्तक देनी होगी। हमारा भविष्य अभी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। मूल रूप से सत्ता अभी भी अंग्रेजों के हाथ में है और सत्ता का प्रश्न बुनियादी तौर पर अभी तक तय नहीं हुआ है जिसका अर्थ यह निकलता है कि हमारा भविष्य अभी भी पूरी तरह हमारे हाथों में नहीं है।

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पृष्ठ संख्या 416 : चर्चा कीजिए

प्रश्न 3.
जवाहरलाल नेहरू ने ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ पर अपने भाषण में कौनसे विचार पेश किए?
उत्तर:
जवाहरलाल नेहरू ने ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ पर निम्न विचार अपने भाषण में पेश किए-

  • भारत एक स्वतन्त्र सम्प्रभु गणराज्य होगा।
  • अल्पसंख्यक, पिछड़ों तथा जनजातियों को सभी अधिकार मिलेंगे।
  • भारतीय संविधान में सिर्फ नकल नहीं होगी।
  • भारतीय संविधान का उद्देश्य यह होगा कि लोकतन्त्र के उदारवादी विचारों तथा आर्थिक न्याय के समाजवादी विचारों का एक-दूसरे में समावेश किया जायेगा।

पृष्ठ संख्या 418

प्रश्न 4.
स्रोत तीन व चार को पढ़िए पृथक् निर्वाचिकाओं के विरोध में कौन-कौन से तर्क दिए गए हैं?
उत्तर:
स्रोत 3 व 4 में पृथक् निर्वाचिकाओं के विरोध में निम्नलिखित तर्फ दिए गए हैं-

  • सरदार पटेल ने कहा, “क्या आप मुझे एक भी स्वतंत्र देश दिखा सकते हैं जहाँ पृथक् निर्वाचिका हो? अर्थात् स्वतंत्र देश में पृथक् निर्वाचिका की जरूरत नहीं है।”
  • वह सभी के भले के लिए है कि हम अंग्रेजों द्वारा बोए गए शरारत के बीजों को भूलकर इससे बाहर निकलने की सोचें।
  • गोविन्द बल्लभ पंत ने कहा कि मेरा मानना है कि पृथक् निर्वाचिका अल्पसंख्यकों के लिए आत्मघाती सिद्ध होगी और उन्हें भारी नुकसान पहुँचाएगी। वे हमेशा के लिए अलग बने रहेंगे, कभी भी बहुसंख्यक नहीं बन पाएंगे।
  • अगर अल्पसंख्यक पृथक निर्वाचिकाओं से जीत कर आते रहे तो कभी भी प्रभावी योगदान नहीं दे पाएँगे।
  • क्या अल्पसंख्यक हमेशा अल्पसंख्यकों के रूप में ही रहना चाहते हैं या वे भी एक दिन एक महान् राष्ट्र का अभिन्न अंग बनने का सपना देखते हैं?

पृष्ठ संख्या 419

प्रश्न 5.
जी. बी. पंत निष्ठावादी नागरिकों के अभिलक्षणों को कैसे परिभाषित करते हैं?
उत्तर:
जी.बी. पंत ने निष्ठावान नागरिकों के निम्नलिखित अभिलक्षण बताए है –

  • व्यक्ति को आत्म-अनुशासन की कला सीखनी चाहिए।
  • लोकतंत्र में व्यक्ति को अपने लिए कम तथा दूसरों के लिए अधिक चिन्ता करनी चाहिए।
  • हमारी सारी निष्ठाएँ केवल राज्य पर केन्द्रित होनी चाहिए।
  • यदि व्यक्ति अपने अपव्यय पर अंकुश लगाने की बजाय दूसरों के हितों की तनिक भी चिन्ता नहीं करता, तो ऐसा लोकतंत्र निश्चित रूप से नष्ट हो जाता है।

पृष्ठ संख्या 420

प्रश्न 6.
रंगा द्वारा ‘अल्पसंख्यक’ की अवधारणा को किस तरह परिभाषित किया गया है?
उत्तर:

  • एन. जी. रंगा के अनुसार तथाकथित पाकिस्तानी प्रान्तों में रहने वाले हिन्दू, सिख और यहाँ तक मुसलमान भी अल्पसंख्यक नहीं हैं।
  • असली अल्पसंख्यक तो इस देश की गरीब जनता है जो इतनी दबी-कुचली और उत्पीड़ित है जो अभी तक साधारण नागरिक के अधिकारों का लाभ नहीं उठा पा रही है।
  • असली अल्पसंख्यक वे आदिवासी हैं जिनका सदियों से व्यापारियों, जमींदारों और सूदखोरों द्वारा शोषण किया जा रहा है। इन लोगों को मूलभूत शिक्षा तक नहीं मिल पा रही है असली अल्पसंख्यक यही लोग हैं जिन्हें वास्तव में सुरक्षा का आश्वासन मिलना चाहिए।

पृष्ठ संख्या 422 चर्चा कीजिए

प्रश्न 7.
आदिवासियों के लिए सुरक्षात्मक उपायों की माँग करते हुए जयपाल सिंह कौन-कौनसे तर्क देते हैं?
उत्तर:
आदिवासियों के लिए सुरक्षात्मक उपायों की माँग करते हुए जयपाल सिंह तर्क देते हैं कि आदिवासी कबीले संख्या के दृष्टिकोण से अल्पसंख्यक नहीं है, परन्तु उन्हें फिर भी संरक्षण की आवश्यकता है क्योंकि उन्हें वहाँ से बेदखल कर दिया गया है जहाँ वे रहते थे। उन्हें उनके जंगल और चरागाहों से दूर कर दिया गया है। इन्हें आदिम और पिछड़ा हुआ मानकर शेष समाज हेय दृष्टि से देखता है।

पृष्ठ संख्या 425

प्रश्न 8.
एक शक्तिशाली केन्द्र सरकार की हिमायत में क्या दलीलें दी जा रही थीं?
उत्तर:
(1) डॉ. अम्बेडकर का कहना था कि वह एक शक्तिशाली और एकीकृत केन्द्र चाहते हैं। 1935 के गवर्नमेन्ट एक्ट में हमने जो केन्द्र बनाया था, उससे भी अधिक शक्तिशाली केन्द्र चाहते हैं।

(2) देश में हो रही हिंसात्मक घटनाओं पर नियन्त्रण करने के लिए शक्तिशाली केन्द्र होना चाहिए।

(3) बालकृष्ण शर्मा का कहना था कि शक्तिशाली केन्द्र का होना आवश्यक है ताकि वह देशहित में योजनाएँ बना सके, उपलब्ध आर्थिक संसाधनों को जुटा सके, उचित शासन व्यवस्था स्थापित कर सके और विदेशी आक्रमणों से देश की रक्षा कर सके।

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उत्तर दीजिए ( लगभग 100 से 150 शब्दों में )

प्रश्न 1.
‘उद्देश्य प्रस्ताव’ में किन आदर्शों पर जोर दिया गया था?
उत्तर:
13 दिसम्बर, 1946 को जवाहर लाल नेहरू ने संविधान सभा के सामने उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिसमें संविधान के मूल आदर्शों की रूपरेखा प्रस्तुत की गई तथा फ्रेमवर्क सुझाया जिसके तहत संविधान का कार्य आगे बढ़ाना था। बंधा-

  • इसमें भारत को एक ‘स्वतन्त्र सम्प्रभु गणराज्य’ घोषित किया गया।
  • इसमें समस्त नागरिकों को स्वतंत्रता, समानता और न्याय का आश्वासन दिया गया।
  • इसमें इस बात पर भी बल दिया गया कि अल्पसंख्यकों, पिछड़े व जनजातीय क्षेत्रों एवं दमित व अन्य पिछड़े वर्गों के लिए पर्याप्त रक्षात्मक प्रावधान किए जाएंगे।
  • इसी अवसर पर नेहरू ने बोलते हुए कहा कि उनकी दृष्टि अतीत में हुए उन ऐतिहासिक प्रयोगों की ओर जा रही है जिनमें अधिकारों के ऐसे दस्तावेज तैयार किए गए थे।
  • नेहरू ने कहा कि भारतीय संविधान का उद्देश्य होगा-लोकतंत्र के उदारवादी विचारों और आर्थिक न्याय के समाजवादी विचारों का एक-दूसरे में समावेश करें तथा भारतीय संदर्भ में इनकी रचनात्मक व्याख्या करें।

प्रश्न 2.
विभिन्न समूह’ अल्पसंख्यक’ शब्द को किस तरह परिभाषित कर रहे थे?
उत्तर:
सामान्यतः अल्पसंख्यक शब्द से हमारा तात्पर्य राष्ट्र की कुल जनसंख्या में किसी वर्ग अथवा समुदाय के कम अनुपात से है परन्तु अलग-अलग लोगों ने अपने- अपने ढंग से अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित किया है, जो इस प्रकार हैं –

  1. मद्रास के बी. पोकर बहादुर के अनुसार मुसलमान अल्पसंख्यक थे, क्योंकि मुसलमानों की आवश्यकताओं को गैर-मुसलमान अच्छी प्रकार से नहीं समझ सकते, न ही अन्य समुदायों के लोग मुसलमानों का कोई सही प्रतिनिधि चुन सकते हैं।
  2. कुछ लोग दमित वर्ग के लोगों को हिन्दुओं से अलग करके देख रहे थे, और उनके लिए अधिक स्थानों का आरक्षण चाह रहे थे।
  3. एन. जी. रंगा के अनुसार असली अल्पसंख्यक गरीब और दबे-कुचले लोग थे रंगा आदिवासियों को अल्पसंख्यक मानते थे। उनका शोषण व्यापारियों, जमींदारों तथा सूदखोरों द्वारा किया जा रहा था। जयपालसिंह ने भी आदिवासियों को अल्पसंख्यक बताया।
  4. एन. जी. रंगा के अनुसार अल्पसंख्यक तथाकथित पाकिस्तानी प्रान्तों में रहने वाले हिन्दू, सिख और यहाँ तक मुसलमान भी अल्पसंख्यक नहीं हैं असली अल्पसंख्यक इस देश की जनता है; यह जनता इतनी दमित, उत्पीड़ित और कुचली हुई है कि अभी तक साधारण नागरिक को मिलने वाले लाभ भी नहीं उठा रही है।

प्रश्न 3.
प्रांतों के लिए ज्यादा शक्तियों के पक्ष में क्या तर्क दिए गए?
उत्तर:
राज्यों के अधिकारों की सबसे शक्तिशाली हिमायत मद्रास के सदस्य के संतनम ने प्रस्तुत की। उन्होंने प्रान्तों के लिए ज्यादा शक्तियों के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए –
(1) उन्होंने कहा कि न केवल राज्यों को बल्कि केन्द्र को ताकतवर बनाने के लिए शक्तियों का पुनर्वितरण आवश्यक है। यदि केन्द्र के पास जरूरत से ज्यादा शक्तियाँ होंगी तो वह प्रभावी ढंग से कार्य नहीं कर पाएगा। उसके कुछ दायित्वों को कम करने से और उन्हें राज्यों को सौंप देने से केन्द्र ज्यादा मजबूत हो सकता है।

(2) संतनम का दूसरा तर्क यह था कि शक्तियों का मौजूदा वितरण उन्हें पंगु बना देगा। राजकोषीय प्रावधान प्रांतों को खोखला कर देगा क्योंकि भू-राजस्व के अलावा ज्यादातर कर केन्द्र सरकार के अधिकार में दे दिए गए हैं। यदि पैसा ही नहीं होगा तो राज्यों में विकास परियोजनाएँ कैसे चलेंगी।

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(3) संतनम ने एक और तर्क देते हुए कहा कि अगर पर्याप्त जाँच-पड़ताल किए बिना शक्तियों का प्रस्तावित वितरण लागू कर दिया गया तो हमारा भविष्य अंधकार में पढ़ जाएगा। उन्होंने कहा कि कुछ ही सालों में सारे प्रान्त केन्द्र के विरुद्ध उठ खड़े होंगे। उड़ीसा के एक सदस्य के अनुसार बेहिसाब केन्द्रीकरण के कारण केन्द्र बिखर जाएगा।

प्रश्न 4.
महात्मा गाँधी को ऐसा क्यों लगता था कि हिन्दुस्तानी राष्ट्रीय भाषा होनी चाहिए?
अथवा
महात्मा गाँधी हिन्दुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा क्यों बनाना चाहते थे? विवेचना कीजिये।
उत्तर:
भाषा विचारों के आदान-प्रदान का सशक्त माध्यम है। इसलिए किसी भी देश में राष्ट्रीयता की भावना को विकसित करने हेतु एक भाषा का होना आवश्यक है। भारत बहुभाषी देश है। यहाँ विभिन्न संस्कृतियों को आश्रय प्राप्त है, इसलिए यहाँ अनेक भाषाएं बोली जाती हैं।

भाषा के सन्दर्भ में गाँधीजी का मानना था –
(1) महात्मा गाँधी का मानना था कि हिन्दुस्तानी भाषा हिन्दी और उर्दू के मेल से बनी है और यह भारतीय जनता के बहुत बड़े हिस्से की भाषा थी। यह भाषा विविध संस्कृतियों के आदान- प्रदान से समृद्ध हुई एक साझी भाषा थी।

(2) समय बीतने के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के स्रोतों से नये-नये शब्द और अर्थ हिन्दुस्तानी भाषा में समाविष्ट होते गए और उसे विभिन्न क्षेत्रों के बहुत सारे लोग समझने लगे।

(3) महात्मा गाँधी ने महसूस किया कि यह बहुसांस्कृतिक भाषा विविध समुदायों के बीच संचार की आदर्श भाषा बन सकती है। यह हिन्दुओं और मुसलमानों को, उत्तर और दक्षिण के लोगों को एकजुट कर सकती है। इन सभी कारणों से गाँधीजी हिन्दुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा बनाना चाहते थे।

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निम्नलिखित पर एक लघु निबन्ध लिखिये (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

प्रश्न 5.
वे कौन सी ऐतिहासिक ताकतें थीं जिन्होंने संविधान का रूप तय किया?
उत्तर:
संविधान का रूप तय करने वाली ताकतें संविधान का रूप तय करने वाली प्रमुख ऐतिहासिक ताकतें निम्नलिखित –
(1) काँग्रेस पार्टी काँग्रेस पार्टी देश की एक प्रमुख राजनीतिक ताकत थी जिसने देश के संविधान को लोकतांत्रिक गणराज्य, धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने में भूमिका अदा की थी। संविधान सभा में लगभग 82 प्रतिशत सदस्य कॉंग्रेस पार्टी के थे। कांग्रेस पार्टी में विभिन्न वैचारिक धाराएँ कार्य कर रही थीं।

कॉंग्रेस के तीन सदस्यों की प्रमुख भूमिका रही। ये सदस्य थे- जवाहरलाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल और राजेन्द्र प्रसाद पं. जवाहरलाल नेहरू ने संविधान के ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ को पेश किया तथा भारत के राष्ट्रीय ध्वज की |रूप-रेखा भी निर्धारित की थी। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कई रिपोर्टों के प्रारूप लिखने में विशेष सहायता की और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।

(2) दलित वर्ग जो नेता दलितों या हरिजनों के पक्षधर थे उन्होंने संविधान को कमजोर वर्गों के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक समानता व न्याय दिलाने वाला, आरक्षण की व्यवस्था करने वाला, छुआछूत को मिटाने वाला स्वरूप प्रदान करने में योगदान दिया। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में काम किया।

(3) वामपंथी विचारधारा-जिन समुदायों या राजनैतिक दलों पर वामपंथी विचारों या समाजवादी विचारों का प्रभाव था, उन्होंने संविधान में समाजवादी ढाँचे के अनुसार सरकार बनाने, भारत को कल्याणकारी राज्य बनाने और धीरे-धीरे समान काम के लिए समान वेतन, बंधुआ मजदूरी समाप्त करने, जमींदारी उन्मूलन आदि की व्यवस्थाएँ करने के लिए वातावरण या संवैधानिक व्यवस्थाएँ तय करने में योगदान दिया।

(4) आदिवासियों के प्रतिनिधि- आदिवासियों से सम्बन्धित नेताओं ने संविधान सभा में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि आदिवासियों के साथ अनेक वर्षों से ब्रिटिश सरकार, जमींदारों, सूदखोरों और साहूकारों ने सही व्यवहार नहीं किया। आदिवासी नेता पृथक् निर्वाचिका बनाने के पक्ष में नहीं थे लेकिन विधायिका में आदिवासियों को प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए सीटों के आरक्षण की व्यवस्था को आवश्यक समझते थे।

(5) लोगों की आकांक्षा की अभिव्यक्ति पं. नेहरू ने कहा था कि सरकार जनता की इच्छा को अभिव्यक्ति होती है। हमारे पास जनता की शक्ति है। हम उतनी दूर तक ही जायेंगे, जितनी दूर तक लोग हमें ले जाना चाहेंगे। सविधान सभा उन लोगों की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का साधन मानी जा रही थी जिन्होंने स्वतन्त्रता के आन्दोलनों में भाग लिया। लोकतन्त्र, समानता तथा न्याय जैसे आदर्श 19वीं शताब्दी से भारत में स्वमाजिक संघर्षो के साथ गहरे तौर पर जुड़ चुके थे। इस प्रकार समाज सुधारकों ने सामाजिक न्याय पर तथा धार्मिक सुधारकों ने धर्मों को न्यायसंगत बनाने पर बल दिया।

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(6) जनमत-संविधान सभा में हुई चर्चाएँ जनमत से भी प्रभावित होती थीं जब संविधान सभा में बहस होती थी तो विभिन्न पक्षों की दलीलें अखबारों में भी छपती थीं और तमाम प्रस्तावों पर सार्वजनिक रूप से बहस चलती थी। इस तरह प्रेस में होने वाली इस आलोचना और जवाबी आलोचना से किसी मुद्दे पर बनने वाली सहमति या असहमति पर गहरा असर पड़ता था सामूहिक सहभागिता बनाने के लिए जनता के सुझाव भी आमंत्रित किए जाते थे।

प्रश्न 6.
दमित समूहों की सुरक्षा के पक्ष में किए गए विभिन्न दावों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
दमित समूहों (जातियों) की सुरक्षा के लिए बहुत सारे दावे किये गए जो निम्नानुसार हैं –
(1) पृथक निर्वाचिका की माँग राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने दमित या दलित जातियों के लिए पृथक् निर्वाचिका की माँग की थी जिसका गाँधीजी ने यह कहते हुए विरोध किया था कि ऐसा करने से यह समुदाय स्थायी रूप से कट जाएगा।

(2) संरक्षण और बचाव संविधान सभा में मौजूद दमित जातियों के सदस्यों का आग्रह था कि अस्पृश्यों अछूतों की समस्या को केवल संरक्षण और बचाव के द्वारा हल नहीं किया जा सकता। उनकी अपंगता के पीछे जाति विभाजित समाज के सामाजिक कायदे-कानूनों और नैतिक मूल्य-मान्यताओं का हाथ है। समाज ने उनकी सेवाओं और श्रम का इस्तेमाल किया है परन्तु उन्हें सामाजिक तौर पर स्वयं से दूर रखा है, अन्य जातियों के लोग उनके साथ घुलने-मिलने से कतराते हैं, उनके साथ भोजन नहीं करते और उन्हें मन्दिरों में प्रवेश से रोका जाता है।

(3) कष्ट उठाने को तैयार नहीं-मद्रास के सदस्य जे. नागप्पा ने कहा था, “हम सदा कष्ट उठाते रहे हैं पर अब और कष्ट उठाने को तैयार नहीं हैं। हमें अपनी जिम्मेदारियों का एहसास हो गया है, हमें मालूम है कि अपनी बात कैसे मनवानी है।” नागप्पा ने दूसरा तर्क दिया कि हरिजन अल्पसंख्यक नहीं है आबादी में उनका हिस्सा 20-25 प्रतिशत है। उनकी पीड़ा का कारण यह है कि उन्हें बाकायदा समाज व राजनीति के हाशिए पर रखा गया है उसका कारण उनकी संख्यात्मक महत्वहीनता नहीं है। उनके पास न तो शिक्षा तक पहुँच थी और न ही शासन में हिस्सेदारी।

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(4) हजारों साल तक दमन-मध्य प्रान्त के सदस्य के. जे. खांडेलकर ने कहा था “हमें हजारों साल तक दबाया गया है। …इस हद तक दबाया गया कि हमारे दिमाग, हमारी देह काम नहीं करती और अब हमारा हृदय भी भावशून्य हो चुका है। न ही हम आगे बढ़ने लायक रह गए हैं। यही हमारी स्थिति हैं।”

(5) अस्पृश्यता का उन्मूलन – भारत को स्वतंत्रता मिलने तथा देश के विभाजन के बाद डॉ. अम्बेडकर ने दमित वर्ग के लिए पृथक् निर्वाचिका को माँग छोड़ दी थी। उन्होंने संविधान के द्वारा अस्पृश्यता उन्मूलन किए जाने और मन्दिरों के द्वार सभी के लिए खोल दिए जाने व तथाकथित निम्न जाति कहे जाने वालों के लिए विद्याविकाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिए जाने का समर्थन किया। बहुत सारे लोगों का मानना था कि इससे भी समस्त समस्याओं का समाधान नहीं हो सकेगा। सामाजिक भेदभाव को केवल संवैधानिक कानून पारित करके समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए समाज की सोच में परिवर्तन लाना होगा। परन्तु लोकतान्त्रिक जनता ने इन प्रावधानों का स्वागत किया।

प्रश्न 7.
संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने उस समय की राजनीतिक परिस्थिति और एक मजबूत केन्द्र सरकार की जरूरत के बीच क्या सम्बन्ध देखा?
उत्तर:
तत्कालीन परिस्थितियाँ और मजबूत केन्द्र की आवश्यकता –
संविधान सभा के कुछ सदस्यों द्वारा तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में ताकतवर केन्द्रीय सरकार की वकालत की गई। उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति और एक मजबूत केन्द्र सरकार की जरूरत के बीच निम्नलिखि सम्बन्ध देखा –

(1) शान्ति स्थापित करने, आम सरोकारों के बी समन्वय स्थापित करने तथा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर देश की आवाज उठाने के लिए मजबूत केन्द्र की आवश्यकत पर बल-जवाहरलाल नेहरू ने तत्कालीन परिस्थितियों शक्तिशाली केन्द्र सरकार की आवश्यकता पर बल देते हु संविधान सभा के अध्यक्ष के नाम लिखे पत्र में कहा कि “अब जबकि विभाजन एक हकीकत बन चुका है.. एक दुर्बल केन्द्रीय शासन की व्यवस्था देश के लिए हानिकारक होगी क्योंकि ऐसा केन्द्र शान्ति स्थापित करने में, आम सरोकारों के बीच समन्वय स्थापित करने में औ- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरे देश के लिए आवाज उठाने सक्षम नहीं होगा।”

(2) सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए शक्तिशाली केन्द्र की आवश्यकता- डॉ. अम्बेडकर अन्य अनेक सदस्यों ने सड़कों पर हो रही जिस हिंसा के कारण देश टुकड़े-टुकड़े हो रहा था, उसका हवाला देते हुए बार-बार यह कहा कि केन्द्र की शक्तियों में भारी इजाफा होना चाहिए ताकि वह सांप्रदायिक हिंसा को रोक सके डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि 1935 के गवर्नमेन्ट एक्ट में हमने जो केन्द्र बनाया था, उससे भी ज्यादा शक्तिशाली केन्द्र हम चाहते हैं।

(3) योजना बनाने, आर्थिक संसाधनों को जुटाने तथा देश को विदेशी आक्रमण से बचाने के लिए शक्तिशाली केन्द्र की आवश्यकता संयुक्त प्रान्त के एक सदस्य बालकृष्ण शर्मा ने विस्तार से इस बात पर प्रकाश डाला कि एक शक्तिशाली केन्द्र का होना जरुरी है ताकि वह देश के हित में योजना बना सके उपलब्ध आर्थिक संसाधनों को जुटा सके, एक उचित शासन व्यवस्था स्थापित कर सके और देश को विदेशी आक्रमण से बचा सके।

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(4) प्रान्तीय स्वायत्तता के लिए विभाजन के बाद, राजनैतिक दबाव का कम होना विभाजन से पहले काँग्रेस ने प्रान्तों को काफी स्वायत्तता देने पर अपनी सहमति व्यक्त की थी कुछ हद तक यह मुस्लिम लीग को इस बात का भरोसा दिलाने की कोशिश थी कि जिन प्रान्तों में लीग की सरकार बनी है, यहाँ दखलंदाजी नहीं की जाएगी। लेकिन विभाजन के बाद अब एक विकेन्द्रीकृत संरचना के लिए पहले जैसे राजनैतिक दबाव नहीं रह गये थे इसलिए राष्ट्रवादियों ने अब शक्तिशाली केन्द्र की आवश्यकता पर बल दिया।

(5) उस समय विद्यमान एकल राजनीतिक व्यवस्था- औपनिवेशिक शासन द्वारा थोपी गई एकल राजनैतिक व्यवस्था पहले से ही मौजूद थी। उस जमाने में हुई घटनाओं व से केन्द्रीयतावाद को बढ़ावा मिला जिसे अब अफरा-तफरी T पर अंकुश लगाने तथा देश के आर्थिक विकास की योजना बनाने के लिए और भी जरूरी माना जाने लगा।

प्रश्न 8.
संविधान सभा ने भाषा के विवाद को हल करने के लिए क्या रास्ता निकाला ?
अथवा
संविधान सभा ने भाषा विवाद को किस प्रकार सुलझाने का प्रयास किया?
अथवा
संविधान सभा ने भाषा के विवाद को किस प्रकार हल किया? व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
संविधान सभा में भाषा के सुवाल को लेकर कई महीनों तक गरमागरम बहस हुई और कई बार काफी तनाव भी उत्पन्न हुआ। भारत एक बहुभाषी देश है, हर प्रान्त की अपनी-अपनी अलग भाषा है। ऐसे में राष्ट्रभाषा किसे बनाया जाए, यह मुद्दा बहुत ही पेचीदा था।

(1) काँग्रेस व गाँधीजी द्वारा हिन्दुस्तानी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने का विचार बीसवीं शताब्दी के तीस के दशक तक कांग्रेस पार्टी ने यह मान लिया था कि हिन्दुस्तानी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाए। महात्मा गाँधी का मानना था कि हरेक को एक ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जिसे सभी लोग आसानी से समझ सकें हिन्दी व उर्दू के मेल से बनी हिन्दुस्तानी भारतीय जनता के एक बहुत बड़े हिस्से द्वारा बोली व समझी जाती थी और यह विभिन्न संस्कृतियों के आदान-प्रदान से समृद्ध हुई एक साझी भाषा थी। जैसे-जैसे समय बीता कई प्रकार के स्रोतों से नए- नए शब्द व अर्थ इसमें समाते गए और उसे विभिन्न क्षेत्रों के बहुत सारे लोग समझने लगे। गाँधीजी को लगता था कि यह बहुसांस्कृतिक भाषा विविध समुदायों के संचार की आदर्श भाषा हो सकती है वह हिन्दू-मुसलमानों तथा उत्तर-दक्षिण के लोगों को एकजुट कर सकती है।

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(2) हिन्दुस्तानी का परिवर्तित रूप तथा हिन्दी और उर्दू की बढ़ती दूरियाँ उन्नीसवीं सदी के आखिर से एक भाषा के रूप में हिन्दुस्तानी में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा था। जैसे-जैसे सांप्रदायिक टकराव गहराते गए हिन्दी व उर्दू के बीच दूरियाँ बढ़ती गई। एक ओर तो हिन्दी से अरबी- फारसी के शब्दों को निकाल कर उसे संस्कृतनिष्ठ बनाने की कोशिश की जा रही थी तो दूसरी तरफ उर्दू लगातार फारसी के निकट होती जा रही थी। परिणाम यह निकला कि भाषा भी धार्मिक पहचान की राजनीति का हिस्सा बन गई। लेकिन हिन्दुस्तानी के साझा चरित्र में गाँधीजी की आस्था कम नहीं हुई।

(3) आर.वी. धुलेकर का हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने पर जोर देना – संयुक्त प्रान्त के सदस्य आर.वी. धुलेकर का विचार था कि संविधान को लिखने की भाषा भी हिन्दी ही होनी चाहिए। इस पर कई सदस्यों ने एतराज किया कि संविधान सभा के सभी सदस्यों को हिन्दी नहीं आती। इसका धुलेकर ने जवाब दिया कि “इस सदन में जो लोग भारत का संविधान रचने बैठे हैं और हिन्दुस्तानी नहीं जानते वे इस सभा के पात्र नहीं हैं। उन्हें चले जाना चाहिये।” धुलेकर की टिप्पणी से सभा में हंगामा खड़ा हो गया, नेहरूजी के हस्तक्षेप के बाद शान्त हुआ। लेकिन भाषा का सवाल अगले तीन साल तक बार-बार कार्यवाहियों में बाधा पैदा करता रहा।

(4) भाषा समिति की रिपोर्ट संविधान सभा की भाषा समिति ने हिन्दी के समर्थकों व विरोधियों के बीच पैदा गतिरोध को तोड़ने हेतु एक फार्मूला प्रस्तुत किया। समिति ने सुझाव दिया कि देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी भारत की राजकीय भाषा होगी। परन्तु इस फार्मूले को समिति ने घोषित नहीं किया था। समिति का मानना था कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए हमें धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहिए। पहले 15 साल तक सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहेगा। प्रत्येक प्रान्त को अपने कामकाज हेतु कोई एक क्षेत्रीय भाषा चुनने का अधिकार होगा।

संविधान सभा की भाषा समिति ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा की बजाय राजभाषा कहकर विभिन्न पक्षों की भावनाओं को शान्त करने और सर्व स्वीकृत समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया था। आखिर में कुछ सदस्यों ने जिनमें दक्षिण भारत, महाराष्ट्र, मद्रास आदि के सदस्य थे, ने कहा कि हिन्दी के लिए जो कुछ भी किया जाए, बड़ी सावधानी से किया जाए तभी इस भाषा का भला हो पायेगा। सभी सदस्यों ने हिन्दी की हिमायत को तो स्वीकार किया लेकिन उसके वर्चस्व को अस्वीकार कर दिया।

JAC Class 12 History Solutions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत JAC Class 12 History Notes

→ भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को अस्तित्व में आया और यह दुनिया का सबसे लंबा संविधान है। भारत के संविधान को दिसम्बर, 1946 से दिसम्बर, 1949 के बीच सूत्रबद्ध किया गया। सविधान सभा के कुल 11 सत्र हुए, जिनमें 165 दिन बैठकों में गए। सत्रों के बीच-बीच विभिन्न समितियाँ और उपसमितियाँ मसविदे को सुधारने एवं संवारने का काम करती थीं।

→ उथल-पुथल का दौर-संविधान निर्माण के पहले के वर्ष काफी उथल-पुथल वाले थे। यह महान् आशाओं का क्षण भी था और भीषण मोहभंग का भी 15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद तो कर दिया गया किन्तु इसके साथ ही इसे विभाजित भी कर दिया गया। लोगों की स्मृति में 1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन, सुभाष चन्द्र बोस के स्वतंत्रता के प्रयास, शाही भारतीय नौसेना का विद्रोह अभी भी जीवित थे देश के विभिन्न भागों में मजदूरों व किसानों के आन्दोलन जारी थे।

→ व्यापक हिन्दू-मुस्लिम एकता इन जन आन्दोलनों का एक अहम पहलू था इसके विपरीत काँग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों प्रमुख राजनीतिक दल धार्मिक सौहार्द और सामाजिक सामंजस्य स्थापित करने के लिए सुलह- सफाई की कोशिशों में असफल होते जा रहे थे। अगस्त, 1946 में कलकत्ता में शुरू हुई हिंसा उत्तर और पूर्वी भारत में फैल गई थी। इसके साथ ही देश के विभाजन की घोषणा हुई और असंख्य लोग एक जगह से दूसरी जगह जाने लगे। इससे शरणार्थियों की समस्या खड़ी हो गई थी।

121 नवजात राष्ट्र के सामने इतनी गंभीर एक और समस्या देशी रियासतों को लेकर थी। ब्रिटिश राज के दौरान उपमहाद्वीप का लगभग एक तिहाई भूभाग ऐसे नवाबों और रजवाड़ों के नियन्त्रण में था जो ब्रिटिश ताज की अधीनता स्वीकार कर चुके थे स्वतंत्रता की घोषणा के बाद कुछ महाराजा तो बहुत सारे टुकड़ों में बँटे भारत में स्वतंत्र सत्ता का सपना देख रहे थे इन देशी रियासतों की भारत राज्य में एकीकरण की समस्या सामने थी।

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→ संविधान सभा का गठन –
(क) संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव 1946 के प्रांतीय चुनावों के आधार पर किया गया था। संविधान सभा में ब्रिटिश भारतीय प्रांतों द्वारा भेजे गए सदस्यों के अतिरिक्त रियासतों के प्रतिनिधि भी शामिल थे उन्हें इसलिए शामिल किया गया था क्योंकि ये राज्य एक-एक करके भारतीय संघ में शामिल हो चुके थे मुस्लिम लीग ने संविधान सभा का बहिष्कार किया तथा एक अन्य संविधान बनाकर उसने पाकिस्तान की माँग जारी रखी।

समाजवादी भी शुरुआत में संविधान सभा से परे रहे जिसके कारण उस दौर में संविधान सभा एक ही पार्टी का समूह बनकर रह गई थी और संविधान सभा के 82 प्रतिशत सदस्य काँग्रेस पार्टी के सदस्य थे। लेकिन सभी कांग्रेस सदस्य एकमत नहीं थे। वे समाजवादी, जमींदारी के पक्षधर तथा धर्मनिरपेक्ष विचारधाराओं से सम्बन्धित थे इसलिए मुद्दों पर वाद-विवाद, बातचीत तथा समझौते के द्वारा उन्हें हल करते थे।

(ख) संविधान सभा में हुई चर्चाएँ जनमत से भी प्रभावित होती थीं जब संविधान सभा में बहस होती थी तो विभिन्न पक्षों की दलीलें अखबारों में भी छपती थीं और सभी प्रस्तावों पर सार्वजनिक रूप से बहस चलती थी। इस तरह प्रेस में होने वाली इस आलोचना और जवाबी आलोचना से किसी मुद्दे पर चलने वाली सहमति या असहमति पर गहरा असर पड़ता था।

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→ संविधान सभा में मुख्य आवाजें संविधान सभा में कुल तीन सी सदस्य थे। इनमें से छह सदस्यों की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण दिखाई देती है।

यथा –
(क) नेहरू ने ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ तथा तिरंगे झण्डे का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था।
(ख) पटेल ने परदे के पीछे रहकर कई प्रारूपों को लिखने में मदद की थी तथा विरोधी विचारों के बीच सहमति पैदा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की।
(ग) राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे।
(प) डॉ. बी. आर. अम्बेडकर संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे।
(ङ) गुजरात के के.एम. मुंशी और

(च) मद्रास के अल्लादि कृष्णा स्वामी अय्यर दोनों ने ही संविधान के प्रारूप पर महत्वपूर्ण सुझाव दिए। (छ) इन छः सदस्यों को दो प्रशासनिक अधिकारी बी. एन. राव और एस. एन. मुखर्जी जटिल प्रस्तावों को स्पष्ट वैधिक भाषा में व्यक्त करने की क्षमता रखते थे। इस कार्य में कुल मिलाकर तीन वर्ष लगे और इस दौरान हुई चर्चाओं के मुद्रित रिकॉर्ड 11 भारी-भरकम खंडों में प्रकाशित हुए।

→ संविधान की दृष्टि –
(1) उद्देश्य प्रस्ताव 13 दिसम्बर, 1946 को जवाहर लाल नेहरू ने संविधान सभा के सामने ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ पेश किया। इस प्रस्ताव में भारत के मूल संविधान के आदशों की रूपरेखा प्रस्तुत की गई। इसमें भारत को ‘स्वतंत्र संप्रभु गणराज्य घोषित किया गया। नागरिकों को न्याय, समानता व स्वतंत्रता का आश्वासन दिया गया था और यह वचन दिया गया था कि अल्पसंख्यकों, पिछड़े व जनजातीय क्षेत्रों एवं दमित व अन्य पिछड़े वर्गों के लिए पर्याप्त रक्षात्मक प्रावधान किए जाएँगे। भारतीय संविधान का उद्देश्य यह होगा कि लोकतंत्र के उदारवादी विचारों और आर्थिक न्याय के समाजवादी विचारों का एक-दूसरे में समावेश किया जाए और भारतीय संदर्भ में इन विचारों की रचनात्मक व्याख्या की जाए।

(ii) लोगों की इच्छा –
(क) संविधान सभा के कम्यूनिस्ट सदस्य सोमनाथ लाहिड़ी ने यह प्रश्न उठाया कि संविधान सभा अंग्रेजों की बनाई हुई है और वह अंग्रेजों की योजना को साकार करने का काम कर रही हैं। इसके उत्तर में नेहरू ने कहा कि यह सही है कि राष्ट्रवादी नेता एक भित्र प्रकार की संविधान सभा चाहते थे तथा उस सभा के गठन में ब्रिटिश सरकार का काफी हाथ है तथा इसके कामकाज पर कुछ शर्तें भी लगी हुई हैं, लेकिन इसके पास जनता की ताकत है।

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(ख) संविधान सभा उन लोगों की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का साधन मानी जा रही थी, जिन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलनों में भाग लिया था। लोकतंत्र, समानता तथा न्याय जैसे आदर्श उन्नीसवीं सदी से भारत में सामाजिक संघर्षो के साथ गहरे तौर पर जुड़ चुके थे।

(ग) जैसे-जैसे प्रतिनिधित्व की मांग बढ़ी, अंग्रेजों को चरणबद्ध ढंग से संवैधानिक सुधार करने पड़े प्रांतीय सरकारों में भारतीयों की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए कई कानून (1909 1919 और 1935) पारित किए गए, जो प्रतिनिध्यात्मक सरकार के लिए लगातार बढ़ती माँग के जवाब में थे। इन्हें पारित करने की प्रक्रिया में भारतीयों की कोई प्रत्यक्ष हिस्सेदारी नहीं थी, उन्हें औपनिवेशिक सरकार ने ही लागू किया था, लेकिन इस सविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान भारतीय जनता के प्रतिनिधियों द्वारा निर्मित तथा एक स्वतंत्र संप्रभु भारतीय गणराज्य के संविधान की कल्पना थी।

→ अधिकारों का निर्धारण नागरिकों के अधिकार किस तरह निर्धारित किये जाएँ? क्या उत्पीड़ित समूहों को कोई विशेष अधिकार मिलने चाहिए? अल्पसंख्यकों के क्या अधिकार हो ? वास्तव में अल्पसंख्यक किसे कहा जाए? जैसे-जैसे संविधान सभा के पटल पर बहस आगे बढ़ी, यह साफ हो का कोई ऐसा उत्तर मौजूद नहीं है जिस पर पूरी सभा सहमत हो यथा –
गया कि इनमें से किसी भी सवाल

(i) पृथक् निर्वाचिका की समस्या – 27 अगस्त, 1947 को मद्रास के बी. पोकर बहादुर ने पृथक निर्वाचिका बनाए रखने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया तथा इसके पक्ष में अपनी दलीलें रखीं। लेकिन पृथक निर्वाचिका की हिमायत में दिए गए बयान से राष्ट्रवादी नेता भड़क गए। विभाजन के कारण तो राष्ट्रवादी नेता और भड़कने लगे। उन्हें निरन्तर गृहयुद्ध, दंगों और हिंसा की आशंका दिखाई देती थी। गोविन्द वल्लभ पंत ने ऐलान किया कि पृथक् निर्वाचिका का प्रस्ताव न केवल राष्ट्र के लिए अपितु अल्पसंख्यकों के लिए भी खतरनाक है।

इन सारी दलीलों के पीछे एक एकीकृत राज्य के निर्माण की चिन्ता काम कर रही थी राजनीतिक एकता और राष्ट्र की स्थापना के लिए प्रत्येक व्यक्ति को राज्य के नागरिक सांचे में ढालना था तथा हर समूह को राष्ट्र के भीतर समाहित किया जाना था संविधान नागरिकों को अधिकार देगा, समुदायों को सांस्कृतिक इकाइयों के रूप में मान्यता दी जा सकती थी, उन्हें सांस्कृतिक अधिकारों का आश्वासन दिया जा सकता था लेकिन राजनीतिक रूप से सभी समुदायों के सदस्यों को राज्य के सामान्य सदस्य के रूप में काम करना था अन्यथा उनकी निष्ठाएँ विभाजित होतीं। 1949 तक संविधान सभा के अधिकतर सदस्य इस बात पर सहमत हो गये थे कि पृथक् निर्वाचन का प्रस्ताव अल्पसंख्यकों के हितों के खिलाफ जाता है।

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(ii) केवल इस प्रस्ताव से काम चलने वाला नहीं है –

(क) उद्देश्य प्रस्ताव का स्वागत करते हुए किसान आन्दोलन के नेता और समाजवादी विचारों वाले एन. जी. रंगा ने आह्वान किया कि अल्पसंख्यक शब्द की व्याख्या आर्थिक स्तर पर की जानी चाहिए रंगा की नजर में असली अल्पसंख्यक गरीब और दबे-कुचले लोग थे। उन्होंने इस बात का स्वागत किया कि संविधान में प्रत्येक व्यक्ति को कानूनी अधिकार दिए जा रहे हैं मगर उन्होंने इसकी सीमाओं को भी चिह्नित किया तथा कहा कि ऐसी परिस्थितियाँ बनाई जाएँ जहाँ संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का जनता प्रभावी ढंग से प्रयोग कर सके। इसलिए गरीबों को सहारे की जरूरत है।

(ख) रंगा ने आम जनता और संविधान सभा में उसके प्रतिनिधित्व का दावा करने वालों के बीच मौजूद विशाल खाई की ओर भी ध्यान आकर्षित कराया।

(ग) रंगा ने आदिवासियों को भी ऐसे ही समूहों में गिनाया था। इस समूह के प्रतिनिधियों में जयपाल सिंह जैसे जबरदस्त वक्ता भी शामिल थे।

(घ) जयपाल सिंह ने आदिवासियों की सुरक्षा तथा उन्हें आम आबादी के स्तर पर लाने के लिए जरूरी परिस्थितियाँ रचने की आवश्यकता पर सुन्दर वक्तव्य दिया तथा विधायिका में आदिवासियों को प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए सीटों के आरक्षण की व्यवस्था का होना आवश्यक बताया।

(iii) हमें हजारों साल तक दबाया गया है –
संविधान में दलितों के अधिकारों को किस तरह परिभाषित किया जाए? राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान अम्बेडकर ने दलितों के लिए पृथक् निर्वाचिकाओं की मांग की थी जिसका महात्मा गाँधी ने यह कहते हुए विरोध किया था ऐसा करने से यह समुदाय स्थायी रूप से शेष समाज से कट जाएगा। संविधान सभा इस विवाद को कैसे हल कर सकती थी? दलितों को किस तरह की सुरक्षा दी जा सकती थी? इस पर विभिन्न सदस्यों ने अपने-अपने सुझाव दिये अंततः सविधान सभा में यह निर्णय हुआ कि अस्पृश्यता का उन्मूलन किया जाए, हिन्दू मन्दिरों को सभी जातियों के लिए खोल दिया जाये और निचली जातियों को विधायिकाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जाये। लोकतांत्रिक जनता ने इन प्रावधानों का स्वागत किया।

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→ राज्य की शक्तियाँ –
(क) संविधान सभा में इस बात पर काफी बहस हुई कि केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों के क्या अधिकार होने चाहिए? जो लोग शक्तिशाली केन्द्र के पक्ष में थे उनमें से एक जवाहरलाल नेहरू भी थे। उन्होंने अपने पत्र में लिखा कि दुर्बल केन्द्रीय शासन की व्यवस्था देश के लिए हानिकारक होगी दुर्बल केन्द्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरे देश के लिए आवाज उठाने में सक्षम नहीं होगा।

(ख) भारतीय संविधान के मसविदे में विषयों की तीन सूचियाँ बनाई गई थीं। केन्द्रीय सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची। पहली सूची के विषय केन्द्र सरकार के अधीन होंगे, जबकि दूसरी सूची के विषय केवल राज्य सरकार के अधीन होंगे। तीसरी सूची के विषय केन्द्र व राज्य दोनों की साझा जिम्मेदारी थे परन्तु अन्य संपों की तुलना में बहुत ज्यादा विषयों को केवल केन्द्रीय नियन्त्रण में रखा गया। समवर्ती सूची में भी प्रांतों की इच्छाओं की उपेक्षा करते हुए बहुत ज्यादा विषय रखे गए।

(ग) संविधान में राजकोषीय संघवाद की भी एक जटिल व्यवस्था बनाई गई कुछ करों (जैसे सीमा शुल्क और कम्पनी कर) से होने वाली सारी आय केन्द्र सरकार के पास रखी गई, कुछ अन्य मामलों (जैसे आबकारी शुल्क और आयकर से होने वाली आय केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच वॉट दी गई। कुछ अन्य मामलों से होने वाली आय (जैसे राज्य स्तरीय शुल्क) पूरी तरह राज्यों को सौंप दी गई। राज्य सरकारों को अपने स्तर पर भी कुछ अधिभार और कर वसूलने का अधिकार दिया गया। उदाहरण के लिए वे जमीन और सम्पत्ति कर, बिक्री कर तथा बोतलबंद शराब पर अलग से कर वसूल सकते थे।

(i) केन्द्र बिखर जाएगा – राज्य के अधिकारों की सबसे शक्तिशाली हिमायत मद्रास के सदस्य संतनम ने पेश की। उन्होंने कहा कि न केवल राज्यों को बल्कि केन्द्र को मजबूत बनाने के लिए शक्तियों का पुनर्वितरण जरूरी है। क्योंकि शक्तियों का वर्तमान वितरण उन्हें पंगु बना देगा। राजकोषीय प्रावधान प्रांतों को खोखला कर | देगा, क्योंकि भू-राजस्व के अलावा ज्यादातर कर केन्द्र सरकार के अधिकार में दे दिए गए हैं। यदि पैसा नहीं होगा तो राज्यों में विकास परियोजनाएँ कैसे चलेंगी। प्रान्तों के बहुत सारे सदस्य भी इस तरह की आशंकाओं से परेशान थे।

(ii) “आज हमें एक शक्तिशाली सरकार की आवश्यकता है – प्रांतों के लिए अधिक शक्तियों की माँग से सभा में तीखी प्रतिक्रियाएँ आने लगीं। शक्तिशाली केन्द्र की जरूरत को असंख्य अवसरों पर रेखांकित किया जा चुका था। अम्बेडकर ने घोषणा की थी कि वह ‘एक शक्तिशाली और एकीकृत केन्द्र चाहते हैं। 1935 के गवर्नमेंट एक्ट में हमने जो केन्द्र बनाया था उससे भी ज्यादा शक्तिशाली केन्द्र चाहते हैं सड़कों पर हो रही जिस हिंसा के कारण देश टुकड़े-टुकड़े हो रहा था उसका सन्दर्भ देते हुए बहुत सारे सदस्यों ने बार-बार यह कहा कि केन्द्र की शक्तियों में बढ़ोतरी होनी चाहिए ताकि वह सांप्रदायिक हिंसा रोक सके।

विभाजन से पहले कांग्रेस ने प्रांतों को काफी स्वायत्तता देने पर अपनी सहमति व्यक्त की थी। कुछ हद तक यह मुस्लिम लीग को इस बात का भरोसा दिलाने की कोशिश थी कि जिन प्रान्तों में लीग की सरकार बनी है वहाँ दखलंदाजी नहीं की जाएगी। लेकिन विभाजन के बाद विकेन्द्रीकृत संरचना के लिए पहले जैसे दबाव नहीं बचे थे।

औपनिवेशिक शासन द्वारा थोपी गई एकल व्यवस्था पहले से ही मौजूद थी उस जमाने में घटी घटनाओं से केन्द्रीयतावाद को और बढ़ावा मिला जिसे अब अफरातफरी पर अंकुश लगाने तथा देश के आर्थिक विकास की योजना बनाने के लिए और भी जरूरी माना जाने लगा। इस प्रकार संविधान में भारतीय संघ के घटक राज्यों के अधिकारों की ओर स्पष्ट झुकाव दिखाई देता है।

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→ राष्ट्र की भाषा – 1930 के दशक तक काँग्रेस ने यह मान लिया था कि हिन्दुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जये महात्मा गाँधी का मानना था कि हर एक को ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जिसे लोग आसानी से समझ सकें हिन्दी और उर्दू के मेल से बनी हिन्दुस्तानी भारतीय जनता के बहुत बड़े हिस्से की भाषा थी और यह विविध संस्कृतियों के आदान-प्रदान से समृद्ध हुई एक साझी भाषा थी।

लेकिन उन्नीसवीं सदी के आखिर से एक भाषा के रूप में हिन्दुस्तानी धीरे-धीरे बदल रही थी। जैसे-जैसे सांप्रदायिक टकराव गहरे होते जा रहे थे हिन्दी और उर्दू एक-दूसरे से दूर जा रही थी। एक तरफ तो फारसी और अरबी मूल के सारे शब्दों को हटाकर हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ बनाने की कोशिश की जा रही थी, दूसरी तरफ उर्दू फारसी के नजदीक होती जा रही थी। परिणाम यह हुआ कि भाषा भी धार्मिक पहचान की राजनीति का हिस्सा बन गई। लेकिन हिन्दुस्तानी के साझा चरित्र में महात्मा गाँधी की आस्था कम नहीं हुई।

(क) हिन्दी की हिमायत-संविधान सभा के एक शुरुआती सत्र में संयुक्त प्रांत के काँग्रेसी सदस्य आर. बी. धुलेकर ने इस बात के लिए पुरजोर शब्दों में आवाज उठाई थी कि हिन्दी को संविधान निर्माण की भाषा के रूप में प्रयोग किया जाए तब से भाषा का प्रश्न अगले तीन साल तक बार-बार कार्रवाइयों में बाधा डालता रहा और सदस्यों को उत्तेजित करता रहा। इस बीच संविधान सभा की भाषा समिति ने राष्ट्रीय भाषा के सवाल पर हिन्दी के समर्थकों और विरोधियों के बीच पैदा हो गए गतिरोध को तोड़ने के लिए एक फार्मूला विकसित किया। समिति ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा की जगह राजभाषा घोषित कर दिया। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए हमें धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहिए। पहले 15 साल तक सरकारी कामों में अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहेगा। प्रत्येक प्रांत को कोई एक क्षेत्रीय भाषा चुनने का अधिकार होगा।

(ख) वर्चस्व का भय मद्रास की सदस्य श्रीमती जी. दुर्गाबाई ने सदन को बताया कि दक्षिण में हिन्दी का विरोध बहुत ज्यादा है, विरोधियों का यह मानना संभवतः सही है कि हिन्दी के लिए हो रहा यह प्रचार प्रांतीय भाषाओं की जड़े खोदने का प्रयास है। इसके बावजूद बहुत सारे अन्य सदस्यों के साथ-साथ उन्होंने भी महात्मा गांधी के आह्नान का पालन किया और दक्षिण में हिन्दी का प्रचार जारी रखा, विरोध का सामना किया, हिन्दी के स्कूल खोले और कक्षाएं चलाई दुर्गाबाई हिन्दुस्तानी को जनता की भाषा स्वीकार कर चुकी थीं।

मगर अब उस भाषा को बदला जा रहा था उर्दू तथा क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों को उससे निकालकर उसमें संस्कृतनिष्ठ शब्द भरे जा रहे थे जैसे-जैसे चर्च तीखी होती गई, बहुत सारे सदस्यों ने परस्पर समायोजन व सम्मान की भावना का आह्वान किया। बम्बई के एक सदस्य श्री शंकर राव देव ने कहा कि काँग्रेसी तथा महात्मा गाँधी का अनुवायी होने के नाते वे हिन्दुस्तानी को राष्ट्र की भाषा के रूप में स्वीकार कर चुके हैं, परन्तु उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “अगर आप (हिन्दी के लिए) दिल से समर्थन चाहते हैं तो आपको ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहिए जिससे मेरे भीतर संदेह पैदा हो और मेरी आशंकाओं को बल मिले।” मद्रास के श्री टी. ए. रामलिंगम चेट्टियार ने इस बात पर जोर दिया कि जो कुछ भी किया जाए, एतिहात के साथ किया जाए। यदि आक्रामक होकर कार्य किया गया तो हिन्दी का कोई भला नहीं हो पाएगा।

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निष्कर्ष –
(1) भारतीय संविधान गहन विवादों और परिचर्चाओं से गुजरते हुए बना। इसके कई प्रावधान लेनदेन के प्रक्रिया की द्वारा बनाए गए थे उन पर सहमति तब बन पाई जब सदस्यों ने दो विरोधी विचारों के बीच जमीन तैयार कर ली।

(2) परन्तु संविधान के एक केन्द्रीय अभिलक्षण पर काफी हद तक सहमति थी। यह सहमति प्रत्येक वयस्क भारतीय को मताधिकार देने पर थी।

(3) हमारे संविधान की दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता भी धर्मनिरपेक्षता पर बल संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता का गुणगान तो नहीं किया गया था परन्तु संविधान व समाज को चलाने के लिए भारतीय संदर्भों में उसे मुख्य अभिलक्षणों का जिक्र आदर्श रूप में किया गया था। मूल अधिकारों में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार और सांस्कृतिक व शैक्षिक अधिकार, समानता का अधिकार इसके प्रमाण हैं।

(4) संविधान सभा के विवादों से हमें यह समझ तो आती है कि सविधान के निर्माण में कैसी-कैसी निरोधी आवाजें उठी थीं और कैसी-कैसी माँगें की गई। ये चर्चाएं हमें उन आदर्शों और सिद्धान्तों के विषय में बताती हैं जिनका वर्णन सविधान निर्माताओं ने किया, परन्तु इन विवादों को समझने में हमें याद रखना चाहिए कि आदर्शों को विशेष संदर्भों के मुताबिक बदला गया। इसके अलावा ऐसा भी हुआ कि सभा के कुछ सदस्यों ने तीन वर्षों में हुई चर्चाओं के साथ-साथ अपने विचार ही बदल डाले। कुछ सदस्यों ने दूसरों के तर्कों के प्रकाश में अपनी समझ बदली और खुले दिलो-दिमाग से काम किया कुछ अन्य सदस्यों आस-पास की घटनाओं को देखते हुए अपने विचार बदल डाले।

काल-रेखा
1945 26 जुलाई दिसम्बर-जनवरीब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार सत्ता में आती है। भारत में आम चुनाव।
1946 16 मईकैबिनेट मिशन अपनी संवैधानिक योजना की घोषणा करता है।
16 जूनमुस्लिम लीग कैबिनेट मिशन की संवैधानिक योजना पर स्वीकृति देती है।
16 जूनकैबिनेट मिशन केन्द्र में अन्तरिम सरकार के गठन का प्रस्ताव पेश करता है।
2 सितम्बरकांग्रेस अन्तरिम सरकार का गठन करती है, जिसमें नेहरू को उपराष्ट्रपति बनाया जाता है।
13 अक्टूबरमुस्लिम लीग अन्तरिम सरकार में शामिल होने का फैसला लेती है।
3-6 दिसम्बरब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली कुछ भारतीय नेताओं से मिलते हैं। इन वार्ताओं का कोई नतीजा नहीं निकलता है।
9 दिसम्बरसंविधान सभा के अधिवेशन शुरू हो जाते हैं।
1947 29 जनवरीमुस्लिम लीग संविधान सभा को भंग करने की माँग करती है।
16 जुलाईअन्तरिम सरकार की अन्तिम बैठक होती है।
11 अगस्तजिन्ना को पाकिस्तान की संविधान सभा का अध्यक्ष निर्वाचित किया जाता है।
14 अगस्तपाकिस्तान को स्वतन्त्रता : कराची में जश्न।
14-15 अगस्त मध्यरात्रिभारत में स्वतन्त्रता का जश्न।
1949 दिसम्बरभारतीय संविधान पर हस्ताक्षर।

JAC Class 12 History Solutions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

Jharkhand Board JAC Class 12 History Solutions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Solutions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

Jharkhand Board Class 12 History विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव In-text Questions and Answers

पृष्ठ संख्या 379

प्रश्न 1.
प्रत्येक स्रोत से आपस में बातचीत करने वाले इन लोगों के रुख के बारे में हमें क्या पता चलता है?
उत्तर:
प्रत्येक खोत से हमें आपस में बातचीत करने वालों से यह पता चलता है कि प्रत्येक का दृष्टिकोण अलग-अलग है-
(1) स्रोत एक के अब्दुल लतीफ एक सहृदय व्यक्ति हैं जो अपने पिता की जान बचाने वाले की मदद करके अपने पिता पर चढ़े हुए कर्ज को चुका रहे हैं पाकिस्तान के नागरिक होते हुए भी वे हिन्दुस्तानी से नफरत नहीं करते।

(2) दूसरे स्रोत के इकबाल अहमद अपनी वतनपरस्ती (देशभक्ति) के कारण हिन्दुस्तानियों की मदद नहीं करते हैं। लेकिन उनके दिल में कहीं इंसानियत छिपी है, जिसके कारण वे शोधार्थी को चाय पिलाते तथा अपनी आपबीती सुनाते हैं। दिल्ली में मिलने वाला सिख उन्हें अपने सगे- सम्बन्धी जैसा लगा । वतन छूट जाने पर भी सिख के मन में लाहौर के
मुसलमानों से लगाव था।

(3) तीसरी घटना वाला व्यक्ति घृणा से भरपूर है। जब उसे पता लगा कि शोधार्थी पाकिस्तानी न होकर भारतीय है, उसके मुख से अनायास घृणा भरे शब्द निकल पड़े” वह भारतीयों को अपना कट्टर दुश्मन मानता है।”

JAC Class 12 History Solutions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

प्रश्न 2.
ये कहानियाँ लोगों की विभाजन सम्बन्धी विभिन्न स्मृतियों के बारे में हमें क्या बताती हैं?
उत्तर:
ये कहानियाँ विभाजन सम्बन्धी स्मृतियों के बारे में हमें बताती हैं कि कुछ लोग विभाजन के बाद भी आपसी भाईचारे में विश्वास रखने वाले थे तथा कुछ बिल्कुल कट्टर शत्रुवत् व्यवहार करने वाले थे।

प्रश्न 3.
इन लोगों ने खुद को और एक-दूसरे को कैसे पेश किया और पहचाना?
उत्तर:
अब्दुल लतीफ ने शोधार्थी के सामने स्वयं को एक सहृदय एहसानमन्द व्यक्ति की तरह पेश किया। इकबाल अहमद ने स्वयं को डरपोक लेकिन अच्छे इंसान की तरह पेश किया तथा तीसरे व्यक्ति ने अपने को सामान्य भारतीयों के कट्टर शत्रु के रूप में प्रस्तुत किया। उनकी बोलचाल से उन्होंने एक-दूसरे को पहचाना।

पृष्ठ संख्या 387

प्रश्न 4.
लीग की माँग क्या थी? क्या वह ऐसे पाकिस्तान की माँग कर रही थी जैसा हम आज देख रहे हैं?
उत्तर:
लीग की माँग थी कि भौगोलिक दृष्टि से सटी हुई इकाइयों को क्षेत्रों के रूप में चिह्नित किया जाए, जिन्हें बनाने में जरूरत के हिसाब से इलाकों का फिर से ऐसा समायोजन किया जाए कि हिन्दुस्तान के उत्तर-पश्चिम और पूर्वी क्षेत्रों जैसे जिन हिस्सों में मुसलमान बहुसंख्यक हैं उन्हें एकत्र करके ‘स्वतंत्र राज्य’ बना दिया जाए, जिसमें शामिल इकाइयाँ स्वाधीन और स्वायत्त होंगी। मुस्लिम लीग उपमहाद्वीप के मुस्लिम बहुल इलाकों के लिए कुछ स्वायत्तता चाहती थी उस समय लीग आज जैसा पाकिस्तान नहीं चाहती थी जैसा अब है आज का पाकिस्तान एक स्वायत्त राज्य न होकर स्वतंत्र राष्ट्र है।

पृष्ठ संख्या 390

प्रश्न 5.
पाकिस्तान के विचार का विरोध करते हुए महात्मा गाँधी ने क्या तर्क दिए?
उत्तर:
पाकिस्तान के विचार का विरोध करते हुए गांधीजी ने निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए –

  • हिन्दू और मुसलमान दोनों एक ही मिट्टी से उपजे हैं। उनका खून एक है, वे एक जैसा भोजन करते हैं, एक ही पानी पीते हैं और एक ही भाषा बोलते हैं।
  • लीग द्वारा पाकिस्तान की माँग पूरी तरह गैर- इस्लामिक है और मैं इसे पापपूर्ण कार्य मानता हूँ।
  • इस्लाम मानव की एकता और भाईचारे का समर्थक है न कि मानव परिवार की एकजुटता को तोड़ने का।
  • जो तत्व भारत को एक-दूसरे के खून के प्यासे टुकड़ों में बाँट देना चाहते हैं वे भारत और इस्लाम दोनों के शत्रु हैं।
  • भले ही वे मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दें परन्तु मुझसे ऐसी बात नहीं मनवा सकते जिसे मैं गलत मानता हूँ।

 पृष्ठ संख्या 391

प्रश्न 6.
भाग 3 को पढ़कर यह जाहिर है कि पाकिस्तान कई कारणों से बना आपके मत में इनमें से कौन से कारण सबसे महत्त्वपूर्ण थे और क्यों ?
उत्तर:

  • अंग्रेजों द्वारा पृथक् चुनाव क्षेत्रों की व्यवस्था से मुस्लिम साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहन मिला।
  • अंग्रेजों की फूट डालो और शासन करो की नीति से मुस्लिम लोग को पाकिस्तान के निर्माण के लिए प्रोत्साहन मिला।
  • साम्प्रदायिक दंगों के कारण देश में अशान्ति और अव्यवस्था फैल गई परन्तु अंग्रेजों ने इन्हें रोकने का प्रयास नहीं किया।

पृष्ठ संख्या 394 चर्चा कीजिए

प्रश्न 7.
भारत छोड़ते समय अंग्रेजों ने शान्ति बनाए रखने के लिए क्या किया? महात्मा गाँधी ने ऐसे दुःखद दिनों में क्या किया?
उत्तर:
(1) अंग्रेजों ने शान्ति स्थापित करने के लिए कुछ नहीं किया अपितु पीड़ितों को कांग्रेसी नेताओं की शरण में जाने को कहा।
(2) महात्मा गाँधी जगह-जगह घूम-घूमकर साम्प्रदायिक सौहार्द की अपील कर रहे थे।

पृष्ठ संख्या 396

प्रश्न 8.
किन विचारों की वजह से विभाजन के दौरान कई निर्दोष महिलाओं की मृत्यु हुई और उन्होंने कष्ट उठाया ? भारतीय और पाकिस्तानी सरकारें क्यों अपनी महिलाओं की अदला-बदली के लिए तैयार हुई ? क्या आपको लगता है कि ऐसा करते समय वे सही थे ?
उत्तर:
(1) दोनों सम्प्रदायों के लोग बदले की भावना से और महिलाओं को अपनी कामवासना का शिकार बनाने के लिए महिलाओं पर हमले कर रहे थे सैकड़ों महिलाओं ने अपनी इज्जत बचाने के लिए कुओं में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए। इस कारण कई निर्दोष महिलाओं की मृत्यु हुई और उन्हें कष्ट उठाने पड़े।

(2) दोनों सम्प्रदायों की महिलाओं की स्थिति अत्यधिक शोचनीय हो चुकी थी इसलिए भारतीय तथा पाकिस्तानी सरकारें अपनी महिलाओं की अदला-बदली के लिए तैयार हुई।

(3) कुछ सीमा तक वे सही थे परन्तु उन्हें संवेदनशीलता से काम लेते हुए महिलाओं की भावनाओं का भी ध्यान रखना चाहिए था।

JAC Class 12 History Solutions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

Jharkhand Board Class 12 History विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव Text Book Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में )

प्रश्न 1.
1940 के प्रस्ताव के जरिए मुस्लिम लीग ने क्या माँग की?
उत्तर:
23 मार्च, 1940 को मुस्लिम लीग ने उपमहाद्वीप के मुस्लिम बहुल इलाकों के लिए सीमित स्वायत्तता की मांग का प्रस्ताव पेश किया। इस अस्पष्ट से प्रस्ताव में कहीं भी विभाजन या पाकिस्तान का उल्लेख नहीं था बल्कि इस प्रस्ताव के लेखक पंजाब के प्रधानमंत्री और यूनियनिस्ट पार्टी के नेता सिकन्दर हयात खान ने 1 मार्च, 1941 को पंजाब असेम्बली को संबोधित करते हुए घोषणा की थी कि वह ऐसे पाकिस्तान की अवधारणा का विरोध करते हैं, जिसमें यहाँ “मुस्लिम राज और बाकी जगह हिन्दू राज होगा। अगर पाकिस्तान का मतलब यह है कि पंजाब में खालिस मुस्लिम राज कायम होने वाला है तो मेरा उससे कोई वास्ता नहीं है।” उन्होंने संघीय इकाइयों के लिए उल्लेखनीय स्वायत्तता के आधार पर एक ढीले-ढाले (संयुक्त) महासंघ के समर्थन में अपने विचारों को फिर दोहराया।

प्रश्न 2.
कुछ लोगों को ऐसा क्यों लगता था कि बँटवारा बहुत अचानक हुआ?
उत्तर:
शुरुआत में मुस्लिम नेताओं ने भी एक संप्रभु राज्य के रूप में पाकिस्तान की मांग विशेष गंभीरता से नहीं उठाई थी। आरम्भ में शायद स्वयं जिन्ना भी पाकिस्तान की सोच को सौदेबाजी में एक पैंतरे के तौर पर प्रयोग कर रहे थे जिसका वे सरकार द्वारा काँग्रेस को मिलने वाली रियायतों पर रोक लगाने और मुसलमानों के लिए और रियायतें हासिल करने के लिए इस्तेमाल कर सकते थे। बँटवारा बहुत अचानक हुआ इसके बारे में खुद मुस्लिम लीग की राय स्पष्ट नहीं थी।

उपमहाद्वीप के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए सीमित स्वायत्तता की माँग (1940) तथा विभाजन (1947) होने के बीच बहुत कम समय केवल 7 वर्ष का अन्तर रहा। किसी को मालूम नहीं था कि पाकिस्तान के गठन का क्या मतलब होगा और उससे भविष्य में लोगों की जिन्दगी किस तरह तय होगी। इसी कारण कुछ लोगों को लगता था कि विभाजन बहुत अचानक हुआ।

प्रश्न 3.
आम लोग विभाजन को किस तरह देखते थे?
उत्तर:
विभाजन के बारे में आम लोगों का विचार था कि यह विभाजन पूर्णतया या तो स्थायी नहीं होगा अथवा शान्ति और कानून व्यवस्था बहाल होने पर सभी लोग अपने गाँव, कस्बे, शहर या राज्य में वापस लौट जाएँगे। कुछ लोग इसे मात्र गृह युद्ध ही मान रहे थे कुछ लोग इसे ‘मार्शल लॉ’, ‘मारामारी’, ‘रौला’ या ‘हुल्लड़’ बता रहे थे। कई लोग इसे ‘महाध्वंस’ (होलोकास्ट) की संज्ञा दे रहे थे। कुछ लोगों के लिए यह विभाजन बहुत दर्दनाक था जिसमें उनके मित्र- सम्बन्धी बिछड़ गए, वे अपने घरों, खेतों, व्यवसाय से वचित हो गए। वास्तव में देखा जाए तो आम लोगों की सोच उनके भोलेपन, अज्ञानता और वास्तविकता से आँखें बन्द करने के समान थी।

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प्रश्न 4.
मुहम्मद अली जिन्ना के पाकिस्तान के विचार का विरोध करते हुए महात्मा गाँधी ने क्या तर्क दिये थे?
अथवा
बंटवारे के विरुद्ध गाँधीजी के विचारों की समीक्षा कीजिये।
अथवा
विभाजन के खिलाफ महात्मा गाँधी की दलील क्या थे?
उत्तर:
गाँधीजी विभाजन के कट्टर विरोधी थे। उन्हें यह पक्का विश्वास था कि वे देश में सांप्रदायिक सद्भाव स्थापित करने में पुनः सफल हो जाएंगे। देशवासी घृणा और हिंसा का रास्ता छोड़कर पुनः आपसी भाईचारे के साथ रहने लगेंगे। गाँधीजी मानते थे कि सैकड़ों सालों से हिन्दू और मुस्लिम भारत में इकट्ठे रहते आए हैं।

वे एक जैसा भोजन करते हैं, एकसी भाषाएँ बोलते हैं तथा एक ही देश का पानी पीते हैं वे शीघ्र आपसी घृणा भूल कर पहले की तरह आपसी मेलजोल से रहने लग जाएँगे। गांधीजी लीग द्वारा पाकिस्तान की माँग को गैर-इस्लामिक व पापपूर्ण मानते थे। उनका मानना था कि इस्लाम एकता व भाईचारे का संदेश देता है, एकजुटता को तोड़ने का नहीं। गाँधीजी का कहना था कि चाहे उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएँ. परन्तु लोग मुझसे ऐसी बात नहीं मनवा सकते, जिसे वे (गाँधीजी ) गलत मानते थे।

प्रश्न 5.
विभाजन को दक्षिण एशिया के इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ क्यों माना जाता है?
उत्तर:
भारत के विभाजन को दक्षिण एशिया के इतिहास में ऐतिहासिक मोड़ माना जाता है। इस विभाजन में लाखों लोग मारे गए, लाखों को रातोंरात अपना घरबार, देश व सम्पत्ति को छोड़कर एक अजनबी स्थान और अजनबी लोगों के बीच जाने को मजबूर होना पड़ा और वहाँ जाकर वे शरणार्थी बन गए। लगभग डेढ़ करोड़ लोगों को भारत और पाकिस्तान के बीच रातों-रात खड़ी कर दी गई सरहद के इस या उस पार जाना पड़ा दोनों ही संप्रदायों के नेता विभाजन के इस दुष्परिणाम की कल्पना भी नहीं कर सके कि विभाजन इतना भयंकर और हिंसात्मक होगा।

विभाजन के कारण लाखों लोगों को अपनी रेशा रेशा जिन्दगी दुबारा शुरू करनी पड़ी। विभाजन का सबसे बड़ा शिकार औरतों को होना पड़ा। उन पर बलात्कार हुए, उनको अगवा किया गया या जबरदस्ती दूसरों के साथ रहने को मजबूर होना पड़ा इन्हीं सब कारणों से इस विभाजन को दक्षिण एशिया के इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ कहा गया।

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निम्नलिखित पर एक लघु निबन्ध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में ) –

प्रश्न 6.
आपके अनुसार भारत विभाजन के लिए कौनसी परिस्थितियाँ उत्तरदायी थीं ? उल्लेख कीजिए।
अथवा
ब्रिटिश भारत का बँटवारा क्यों किया गया?
अथवा
भारत विभाजन के लिए उत्तरदायी कारणों का विवरण दीजिये।
अथवा
उन कारणों का वर्णन कीजिये जिनके कारण भारत का विभाजन हुआ।
उत्तर:
ब्रिटिश भारत के विभाजन के उत्तरदायी कारक – ब्रिटिश भारत के बँटवारे के प्रमुख कारण निम्नलिखित –
(1) अँग्रेजों की ‘फूट डालो राज करो’ नीति- अंग्रेज ‘फूट डालो और राज करो की नीति पर चल रहे थे। उन्होंने अपनी नीति को सफल बनाने के लिए सांप्रदायिक ताकतों, साहित्य, लेखों तथा भारतीय मध्यकालीन इतिहास की उन घटनाओं का बार-बार जिक्र किया जिन्होंने सांप्रदायिकता को बढ़ाया।

(2) मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की माँग-23 मार्च, 1940 को मुस्लिम लीग ने उपमहाद्वीप के मुस्लिम- बहुल इलाकों के लिए कुछ स्वायत्तता की माँग का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। यह उसका प्रबल दावा था कि भारत में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाली वही एकमात्र पार्टी है लेकिन 1946 में कैबिनेट मिशन योजना के त्रिस्तरीय महासंघ के प्रस्ताव को जब कॉंग्रेस और लीग दोनों ने ही नहीं माना तो इसके बाद विभाजन लगभग अनिवार्य हो गया और लीग ने पाकिस्तान की माँग को अमली जामा दिये जाने पर बल दिया।

(3) सांप्रदायिकता में तीव्र वृद्धि-मुसलमानों में मस्जिदों के सामने संगीत बजाए जाने, गोरक्षा आन्दोलन तथा शुद्धिकरण (मुसलमान बने हिन्दुओं को पुनः हिन्दू बनाना) आदि कार्यों से तीव्र आक्रोश व्याप्त था। दूसरी ओर मुस्लिम संगठनों द्वारा तबलीग (प्रचार) तथा तंजीम (संगठन) आन्दोलन चलाकर देश में साम्प्रदायिक वातावरण तैयार किया गया। इससे दोनों सम्प्रदायों में तनाव बढ़ गया।

(4) पृथक् निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था करना- 1909 के मिण्टो मार्ले सुधारों में मुसलमानों के लिए पृथक् निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था की गई जिसका साम्प्रदायिक राजनीति की प्रकृति पर गहरा प्रभाव पड़ा। इससे मुस्लिम साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहन मिला।

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(5) संयुक्त प्रांत में काँग्रेस द्वारा लीग के साथ गठबंधन सरकार बनाने से इनकार करना 1937 में सम्पन्न हुए चुनावों के बाद संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) में मुस्लिम लीग कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाना चाहती थी, परन्तु कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के इस प्रस्ताव हुई को ठुकरा दिया जिससे मुसलमानों के मन में निराशा उत्पन्न ये मानने लगे कि अगर भारत अविभाजित रहा तो मुसलमानों के हाथ में राजनीतिक सत्ता नहीं आ पायेगी क्योंकि वे अल्पसंख्यक हैं और मुस्लिम हितों को प्रतिनिधित्व एक मुस्लिम पार्टी ही कर सकती है। काँग्रेस हिन्दुओं की पार्टी है इसलिए मुस्लिम लीग ने विभाजन और पाकिस्तान निर्माण पर जोर दिया।

(6) सांप्रदायिक दंगे- सांप्रदायिक दंगे भी विभाजन का कारण बने। दंगे इससे पूर्व भी हुए थे लेकिन विभाजन से ठीक पूर्व हुए दंगों ने देश के सांप्रदायिक सद्भाव को निगल लिया। सम्पत्ति की हानि हुई महिलाओं और बच्चों पर भयंकर अत्याचार किए गए लोगों का यह मानना था कि विभाजन के बाद सांप्रदायिक दंगों की समस्या हल हो जायेगी।

(7) प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस- 16 अगस्त, 1946 को मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के निर्माण की माँग पर बल देते हुए ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ मनाया। उस दिन कलकत्ता में भीषण दंगा भड़क उठा जो कई दिनों तक चला और उसमें कई हजार लोग मारे गए।

प्रश्न 7.
बँटवारे के समय औरतों के क्या अनुभव रहे?
उत्तर:
बँटवारे के समय औरतों के अनुभव-बँटवारे के समय औरतों के अनुभव बहुत खराब रहे।
यथा –
(1) बलात्कार, अगवा करना तथा खरीदा व बेचा जाना कई विद्वानों ने उस हिंसक काल में औरतों के भयानक अनुभवों के बारे में लिखा है उनके साथ बलात्कार हुए, उनको अगवा किया गया, उन्हें बार-बार खरीदा और बेचा गया। उन्हें अनजान हालात में अजनबियों के साथ एक नई जिन्दगी बसर करने के लिए मजबूर किया गया।

(2) औरतों की बरामदगी औरतों ने जो कुछ भुगता उसके गहरे सदमे के बावजूद बदले हुए हालात में कुछ औरतों ने अपने नए पारिवारिक बंधन विकसित किए। लेकिन भारत और पाकिस्तान की सरकारों ने इंसानी सम्बन्धों की जटिलता के बारे में कोई संवेदनशील रवैया नहीं अपनाया।

बहुत सारी औरतों को जबरदस्ती घर बिठा ली गई मानते हुए उनके नए परिवारों से छीनकर दोबारा पुराने परिवारों या स्थानों पर भेज दिया गया। औरतों से उनकी मर्जी के बारे में कोई सलाह या मशविरा नहीं किया गया। एक अंदाजे के अनुसार करीब 30,000 औरतों की बरामदगी हुई जिनमें 22,000 मुस्लिम औरतों को भारत से और 8000 हिन्दू व सिख औरतों को पाकिस्तान से निकाला गया। यह मुहिम 1954 तक चलती रही।

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(3) इज्जत की रक्षा हेतु औरतों द्वारा शहादत देना- इस भयंकर समय में जब परिवार के मर्दों को यह लगता कि वे अपनी बीवियों, बहनों और बेटियों को दुश्मनों से नहीं बचा पाएँगे तो वे उनको स्वयं ही मार देते थे। उर्वशी बुटालिया ने अपनी पुस्तक ‘दी अदर साइड ऑफ वायलेंस’ में रावलपिंडी जिले के धुआ गाँव का दर्दनाक किस्सा लिखा है कि तकसीम के समय। विभाजन के समय) सिखों के इस गाँव की 90 औरतों ने दुश्मनों के हाथों पड़ने की बजाय अपनी मर्जी से कुएं में कूद कर जान दे दी थी।

इस गाँव से आए शरणार्थी आज भी दिल्ली के गुरुद्वारे में इस घटना पर कार्यक्रम आयोजित करते हैं तथा उन औरतों की मौत को आत्महत्या न कह उसे शहादत कहते हैं। लेकिन इस कार्यक्रम में उन औरतों को याद नहीं किया जाता जो मरना नहीं चाहती थीं तथा जिन्हें अपनी इच्छा के खिलाफ मौत का रास्ता चुनना पड़ा। उस समय पुरुषों ने औरतों के फैसले को बहादुरी से स्वीकार किया बल्कि कई बार तो उन्होंने औरतों को अपनी जान देने के लिए उकसाया भी हर साल 13 मार्च को शहादत का यह कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।

प्रश्न 8.
बँटवारे के सवाल पर कॉंग्रेस की सोच कैसे बदली?
उत्तर:
बैंटवारे के सवाल पर कांग्रेस की सोच बदलने के पीछे कई कारण रहे जो इस प्रकार हैं –
(1) मुस्लिम लीग का पृथक् पाकिस्तान की माँग पर अड़ जाना-कॉंग्रेस मुस्लिम लीग को उसकी राष्ट्र विभाजन की माँग छोड़ने के लिए बहुत प्रयत्न करने पर भी राजी न कर पाई।

(2) काँग्रेस का राष्ट्र की एकता को बनाए रखने का स्वप्न टूटना – मुस्लिम लीग की मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी वाले क्षेत्रों को पाकिस्तान के लिए माँग पर कुछ काँग्रेसी नेताओं के दिमाग में यह विचार उत्पन्न कर दिया कि शायद कुछ समय बाद गाँधीजी देश की एकता को फिर से स्थापित करने में कामयाब हो जायेंगे लेकिन ऐसा हो नहीं सका, उनकी सोच ख्याली पुलाव बनकर रह गई।

(3) प्रत्यक्ष कार्यवाही के दौरान हिंसक दंगे भड़क उठना- मुस्लिम लीग द्वारा प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस की धमकी के साथ ही कलकत्ता व नोआखाली में हिंसक दंगे भड़काना, हिन्दू महासभा द्वारा हिन्दू राष्ट्र की माँग उठाना तथा कुछ अंग्रेज अधिकारियों द्वारा यह घोषणा करना कि यदि लीग और काँग्रेस किसी नतीजे पर नहीं पहुँचते हैं तो भी वे भारत छोड़कर चले जाएँगे आदि घटनाओं ने भी विभाजन को प्रोत्साहित किया। काँग्रेस जानती थी कि 90 साल बीत जाने पर भी अंग्रेज अपने बच्चों और औरतों के लिए वे खतरे नहीं उठाना चाहते थे जो उन्होंने 1857 के दौरान उठाए थे।

(4) 1946 के चुनावों में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मुस्लिम लीग की अपार सफलता- 1946 के चुनाव में जिन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी थी वहाँ मुस्लिम लीग को मिली अपार सफलता, मुस्लिम लीग द्वारा संविधान सभा का बहिष्कार करना, अंतरिम सरकार में लीग का शामिल न होना और जिना द्वारा दोहरे राष्ट्र के सिद्धान्त पर बार- बार जोर देना आदि बातों ने कांग्रेस की मानसिकता को राष्ट्र विभाजन का समर्थक बनाने में सहयोग दिया।

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(5) पंजाब और बंगाल के बंटवारे पर क्षेत्रीय कांग्रेसी नेताओं की सहमति मार्च 1947 में कांग्रेस हाईकमान ने पंजाब को मुस्लिम बहुल तथा हिन्दू/सिख बहुल हिस्सों में बाँटने पर अपनी सहमति दे दी, क्योंकि सांप्रदायिक हिंसा रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी बंगाल के लिए भी यही सिद्धान्त अपनाया गया। अंकों के खेल में उलझकर पंजाब के बहुत सारे सिख नेता व काँग्रेसी भी इस बात को मान चुके थे कि अब विभाजन अनिवार्य विकृति है जिसे टाला नहीं जा सकता।

उनको लगता था कि वे अविभाजित पंजाब में मुसलमानों से घिर जाएँगे और उन्हें मुस्लिम नेताओं के रहमोकरम पर जीना पड़ेगा। इसलिए वे कमोबेश बँटवारे के फैसले के हक में थे। बंगाल में भी भद्रलोक बंगाली हिन्दुओं का जो तबका सत्ता अपने हाथ में रखना चाहता था, वह ‘मुसलमानों की स्थायी गुलामी’ (उनके एक नेता ने यही शब्द कहे थे) की आशंका से भयभीत था संख्या की दृष्टि से वे कमजोर थे इसलिए उनको लगता था कि प्रांत के विभाजन से ही उनका राजनीतिक प्रभुत्व बना रह सकता है। 1947 में कानून व्यवस्था का नाश हो चुका था। ऐसी परिस्थितियों में कांग्रेस अपनी सोच बदलने के लिए मजबूर हो गई कि शायद बँटवारे के बाद सांप्रदायिक हिंसा खत्म हो जायेगी लेकिन विभाजन के बाद भी 1947-48 तक यह चलती ही रही।

(6) कैबिनेट मिशन के ढीले-ढाले त्रिस्तरीय महासंघ के सुझाव पर कॉंग्रेस और लीग में सहमति न बन पाना- कैबिनेट मिशन के त्रिस्तरीय संघ की योजना को प्रारम्भ में तो सभी प्रमुख दलों ने स्वीकार कर लिया था लेकिन यह समझौता अधिक समय तक नहीं चला क्योंकि सभी पक्षों ने इस योजना के बारे में अलग-अलग व्याख्या की।

प्रश्न 9.
मौखिक इतिहास से विभाजन को हम कैसे समझ सकते हैं ?
अथवा
मौखिक इतिहास के फायदे / नुकसानों की पड़ताल कीजिए। मौखिक इतिहास की पद्धतियों से विभाजन के बारे में हमारी समझ को किस तरह विस्तार मिलता है?
उत्तर:
मौखिक इतिहास के फायदे- मौखिक इतिहास के प्रमुख फायदे निम्नलिखित हैं –
(1) इतिहास को बारीकी से समझने में मदद- व्यक्तिगत स्मृतियाँ जो एक तरह की मौखिक स्रोत हैं- की एक विशेषता यह है कि उनमें हमें अनुभवों और स्मृतियों को और बारीकी से समझने का मौका मिलता है। इससे इतिहासकारों को विभाजन के दौरान लोगों के साथ क्या-क्या हुआ, इस बारे में बहुरंगी और सजीव वृत्तांत लिखने की काबिलियत मिलती है।

(2) उपेक्षित स्त्री-पुरुषों के अनुभवों की पड़ताल करने में सफल मौखिक इतिहास से इतिहासकारों को गरीबों और कमजोरों, औरतों, शरणार्थियों, विधवाओं, व्यापारियों के अनुभवों को उपेक्षा के अंधकार से निकालकर अपने विषय के क्षेत्रों को और फैलाने का मौका मिलता है।

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(3) साक्ष्यों की विश्वसनीयता को तौलना संभव कुछ इतिहासकार मौखिक इतिहास की यह कहकर खारिज कर देते हैं कि मौखिक जानकारियों में सटीकता नहीं होती और उनसे घटनाओं का जो क्रम उभरता है, वह अक्सर सही नहीं होता। लेकिन भारत के विभाजन के संदर्भ में ऐसी गवाहियों की कोई कमी नहीं है जिनसे पता चलता है कि उनके दरमियान अनगिनत लोगों ने कितनी तरह की और कितनी भीषण कठिनाइयों और तनावों का सामना किया।

(4) प्रासंगिकता – अगर इतिहास में साधारण और कमजोरों के वजूद को जगह देनी है तो यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि बंटवारे का मौखिक इतिहास केवल सतही मुद्दों से सम्बन्धित नहीं है।

मौखिक इतिहास की सीमाएँ –
इतिहासकारों ने मौखिक इतिहास की अग्रलिखित सीमाएँ या दोष बताए हैं-
(1) सामान्यीकरण करना संभव नहीं-इतिहासकारों का तर्क है कि निजी तजुओं की विशिष्टता के सहारे सामान्यीकरण करना अर्थात् किसी सामान्य नतीजे पर पहुँचना मुश्किल होता है।

(2) अप्रासंगिक – कुछ इतिहासकारों का तर्क है कि मौखिक विवरण संतही मुद्दों से ताल्लुक रखते हैं और ये छोटे-छोटे अनुभव इतिहास की वृहत्तर प्रक्रियाओं का कारण ढूँढ़ने में अप्रासंगिक होते हैं।

(3) सटीकता का अभाव – कुछ इतिहासकारों ने यह कहा है कि मौखिक जानकारियों में सटीकता नहीं होती और उनसे घटनाओं का सही क्रम नहीं उभरता है।

(4) निहायत निजी आपबीती अनुभवों की प्राप्ति कठिन बँटवारे के बारे में मौखिक ब्यौरे स्वयं या आसानी से उपलब्ध नहीं होते। उन्हें साक्षात्कार पद्धति के द्वारा हासिल किया जा सकता है और इसमें सबसे मुश्किल यही होता है कि संभवतः इन अनुभवों से गुजरने वाले निहायत निजी आपबीती के बारे में बात करने को राजी ही न हों।

(5) याददाश्त की समस्या मौखिक इतिहास की एक अन्य बड़ी समस्या याददाश्त सम्बन्धी है। किसी घटना के बारे में कुछ दशक बाद जब बात की जाती है तो लोग क्या याद रखते हैं या भूल जाते हैं, यह आंशिक रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि बीच के वर्षों में उनके अनुभव किस प्रकार के रहे हैं। इस दौरान उनके समुदायों और राष्ट्रों के साथ क्या हुआ है। इस प्रकार मौखिक इतिहासकारों को विभाजन के वास्तविक अनुभवों को निर्मित स्मृतियों के जाल से बाहर निकालने का चुनौतीपूर्ण कार्य भी करना पड़ता है।

मौखिक इतिहास की पद्धतियों से विभाजन की समझ को विस्तार –
(1) आम मर्दों औरतों के अनुभवों की पड़ताल – विभाजन का मौखिक इतिहास ऐसे आम स्त्री-पुरुषों के अनुभवों की पड़ताल करने में कामयाब रहा है जिनके वजूद को अब तक नजरअंदाज कर दिया जाता था।

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(2) स्याह खौफनाक दौर से गुजरे लोगों के अनुभवों की जानकारी – विभाजन का एक समग्र वृत्तांत बुनने के लिए बहुत तरह के स्रोतों का इस्तेमाल करना जरूरी है ताकि हम उसे एक घटना के साथ-साथ एक प्रक्रिया के रूप में भी देख सकें और ऐसे लोगों के अनुभवों को समझ सकें जो उस स्याह खौफनाक दौर से गुजर रहे हैं।

विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव JAC Class 12 History Notes

→ भारत का जो विभाजन दो राष्ट्रों में हुआ उसके कारण लाखों लोग उजड़ गए, शरणार्थी बन कर रह गए। इसलिए 1947 में हमारी आजादी से जुड़ी खुशी विभाजन की हिंसा और बर्बरता से बदरंग पड़ गई थी। ब्रिटिश भारत के दो संप्रभु राज्यों— भारत और पाकिस्तान (जिसके पश्चिमी और पूर्वी दो भाग थे) में बँटवारे से कई परिवर्तन अचानक आए। लाखों मारे गए, कइयों की जिन्दगियाँ पलक झपकते बदल गई, शहर बदला, भारत बदला, एक नए देश का जन्म हुआ और ऐसा जनसंहार, हिंसा और विस्थापन हुआ जिसका इतिहास में पहले से कोई उदाहरण नहीं मिलता है।

→ बँटवारे के कुछ अनुभव यहाँ बँटवारे से सम्बन्धित तीन घटनाएँ दी जा रही हैं जिनका बयान उन दुःखद दिनों से गुजरे लोगों ने 1993 में एक शोधकर्ता के सामने किया था। बयान करने वाले पाकिस्तानी थे और शोधकर्ता भारतीय शोधकर्ता का उद्देश्य यह समझना था कि जो लोग पीढ़ियों से कमोबेश मेल-मिलाप से रहते आए थे, उन्होंने 1947 में एक-दूसरे पर इतना कहर कैसे ढाया।

(अ) “मैं तो सिर्फ अपने अब्बा पर चढ़ा हुआ कर्ज चुका रहा हूँ” – शोधकर्ता 1992 की सर्दियों में पंजाब यूनिवर्सिटी, लाहौर के इतिहास विभाग के पुस्तकालय में जाया करता था तो वहाँ पर अब्दुल लतीफ नामक एक सज्जन उसकी बहुत मदद करते थे। एक दिन शोधकर्ता ने उनसे मदद का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि बँटवारे के समय एक हिन्दू बुढ़िया माँ ने मेरे अब्बा की जान बचायी थी। इसलिए आपकी मदद करके मैं “अपने अब्बा पर चढ़ा कर्ज चुका रहा हूँ” सुनकर शोधार्थी की आँखों में आँसू छलक आए।

(ब) “बरसों हो गए, मैं किसी पंजाबी मुसलमान से नहीं मिला शोधकर्ता का दूसरा किस्सा लाहौर के यूथ हॉस्टल के मैनेजर के बारे में है जिसने भारतीय होने के कारण शोधकर्ता को हॉस्टल में कमरा देने से मना कर दिया। लेकिन उसने उसे चाय पिलाई तथा दिल्ली का एक किस्सा सुनाया तो उसने कहा कि पचास के दशक में मेरी पोस्टिंग दिल्ली में पाकिस्तानी दूतावास में हुई थी। वहाँ एक सरदार से उसने पंजाबी में पहाड़गंज का पता पूछा तो सरदार ने उससे गले मिलते हुए कहा कि “बरसों हो गए मैं किसी पंजाबी मुसलमान से नहीं मिला। मैं मिलने को तरस रहा था। परन्तु यहाँ पंजाबी बोलने वाले मुसलमान मिलते ही नहीं।”

(स) “ना, नहीं! तुम कभी हमारे नहीं हो सकते” यह शोधकर्ता शोध के ही दौरान लाहौर में एक आदमी से मिला जिसने भूल से उसे अप्रवासी पाकिस्तानी समझ लिया था जब शोधकर्ता ने बताया कि वह भारतीय है तो उसके मुँह से निकल पड़ा, “ओह हिन्दुस्तानी में समझा था आप पाकिस्तानी हैं।” शोधकर्ता ने उसे समझाने की पूरी कोशिश की कि हम दोनों दक्षिण एशियाई हैं लेकिन वह अड़ा रहा कि “ना, नहीं तुम कभी हमारे नहीं हो सकते। तुम्हारे लोगों ने 1947 में मेरा पूरा गाँव का गाँव साफ कर दिया था। हम कट्टर दुश्मन हैं और हमेशा रहेंगे।”

JAC Class 12 History Solutions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

→ ऐतिहासिक मोड़ –
(अ) बँटवारा या महाध्वंस (होलोकॉस्ट) – बँटवारे में कई लाख लोग मारे गए करोड़ों बेघरबार हो गए तथा अजनबी धरती पर शरणार्थी बनकर रह गए। सबसे ज्यादा ज्यादती औरतों के साथ हुई, उनका अपहरण हुआ, बलात्कार किया गया तथा जबरन दूसरे के साथ रहने को मजबूर होना पड़ा। जानकारों के अनुसार मरने वालों की संख्या 2 से 5 लाख तक रही होगी। ये लोग दुबारा तिनकों से अपनी जिन्दगी खड़ी करने को मजबूर हो गए। जिन्दा बचने वाले ने दूसरे शब्दों में इसे ‘मार्शल लॉ’, ‘मारा-मारी’, ‘रौला’ या ‘हुल्लड़’ कहा है। समकालीन प्रेक्षकों और विद्वानों ने कई बार ‘महाध्वंस’ (होलोकॉस्ट) शब्द का उल्लेख किया है। भारत विभाजन | के समय जो ‘नस्ली सफाया हुआ वह सरकारी कारगुजारी नहीं बल्कि धार्मिक समुदायों के स्वयंभू-प्रतिनिधियों की कारगुजारी थी।

(ब) रूढ़ छवियों की ताकत – भारत में पाकिस्तान के प्रति घृणा का दृष्टिकोण और पाकिस्तान में भारत के प्रति घृणा का दृष्टिकोण रखने वाले दोनों ही विभाजन की उपज हैं।

→ विभाजन क्यों और कैसे हुआ? – विभाजन क्यों और कैसे हुआ इसके अनेक कारण बताए गए हैं। यथा- (अ) हिन्दू-मुस्लिम झगड़ों की निरन्तरता का लम्बा इतिहास – कुछ इतिहासकार भारतीय भी और पाकिस्तानी भी, यह मानते हैं कि मोहम्मद अली जिन्ना की यह समझ कि औपनिवेशिक भारत में हिन्दू और मुसलमान दो पृथक् राष्ट्र थे, मध्यकालीन इतिहास पर भी लागू की जा सकती है। ये इतिहासकार इस बात पर बल देते हैं कि 1947 की घटनाएँ मध्य और आधुनिक युगों में हुए हिन्दू-मुस्लिम झगड़ों के लम्बे इतिहास से बारीकी से जुड़ी हुई हैं। यद्यपि उनकी यह बात महत्त्वपूर्ण है तथापि इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि लोगों की मानसिकता पर बदलती परिस्थितियों का असर होता है।

(ब) पृथक् चुनाव क्षेत्र की राजनीति – कुछ अन्य विद्वानों का यह मानना है कि देश का बँटवारा एक ऐसी सांप्रदायिक राजनीति का आखिरी बिन्दु था जो बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में मुसलमानों के लिए बनाए गए पृथक् चुनाव क्षेत्रों की सांप्रदायिक राजनीति से प्रारम्भ हुआ था। लेकिन यह नहीं माना जा सकता कि बँटवारा पृथक् चुनाव क्षेत्रों की प्रत्यक्ष देन है।

(स) अन्य कारण 20वीं शताब्दी के शुरुआती दशकों में सांप्रदायिक अस्मिताएँ कई अन्य कारणों से भी पक्की हुई। 1920-30 के दशकों में कई घटनाओं की वजह से तनाव पैदा हुए। फिर भी ऐसा कहना सही नहीं होगा कि बँटवारा केवल सीधे-सीधे बढ़ते हुए सांप्रदायिक तनावों के कारणों से हुआ। क्योंकि सांप्रदायिक तनावों तथा साम्प्रदायिक राजनीति और विभाजन में गुणात्मक अन्तर है।

सांप्रदायिकता से अभिप्राय साम्प्रदायिकता उस राजनीति को कहा जाता है जो धार्मिक समुदायों के बीच विरोध और झगड़े पैदा करती है ऐसी राजनीति धार्मिक पहचान को बुनियादी और अटल मानती है। यह किसी धार्मिक समुदाय के आंतरिक फर्को को दबाकर उसकी एकता पर बल देती है तथा उसे अन्य समुदाय के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित करती है। यह किसी चिह्नित ‘गैर’ के खिलाफ घृणा की राजनीति को पोषित करती हैं। अतः सांप्रदायिकता धार्मिक अस्मिता का विशेष तरह का राजनीतिकरण है जो धार्मिक समुदायों में झगड़े पैदा करवाने की कोशिश करता है।

→ 1937 में प्रांतीय चुनाव और कॉंग्रेस मंत्रालय प्रांतीय संसदों के गठन के लिए 1937 में पहली बार चुनाव कराये गये। इन चुनावों में कांग्रेस के परिणाम अच्छे रहे। लेकिन मुस्लिम लीग इन चुनावों में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पायी। उसे कुल मुस्लिम मतों का केवल 44 प्रतिशत ही मिल पाया। इन चुनावों के बाद निम्न कारणों से विभाजन के विचार को बढ़ावा मिला –

(अ) मुस्लिम लीग संयुक्त प्रान्त में कॉंग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाना चाहती थी, लेकिन काँग्रेस को यहाँ पूर्ण बहुमत प्राप्त था। इसलिए उसने मुस्लिम लीग का प्रस्ताव ठुकरा दिया। इससे लीग के सदस्यों में यह बात घर कर गई कि अविभाजित भारत में मुसलमानों के हाथों में राजनीतिक सत्ता नहीं आयेगी क्योंकि वे अल्पसंख्यक हैं।

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(ब) मुसलमानों में यह मान्यता उभरी कि मुस्लिम हितों का प्रतिनिधित्व एक मुस्लिम पार्टी ही कर सकती है।

(स) जिला की यह जिद कि मुस्लिम लीग को ही मुसलमानों की एकमात्र प्रवक्ता पार्टी माना जाये, उस समय बहुत कम लोगों को मंजूर भी फलतः 1930 के दशक में लीग ने मुस्लिम क्षेत्रों में एकमात्र प्रवक्ता बनने की अपने कोशिशें दोहरी कर दीं।

(द) काँग्रेस मंत्रालयों ने संयुक्त प्रान्त में मुस्लिम लीग के प्रस्ताव को ठुकरा कर मुस्लिम जनसम्पर्क कार्यक्रम पर अधिक बल न देकर मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकी थी।

→ पाकिस्तान का प्रस्ताव- पाकिस्तान की स्थापना की माँग धीरे-धीरे ठोस रूप ले रही थी। यथा –
(अ) 23 मार्च, 1940 को मुस्लिम लीग ने उपमहाद्वीप के मुस्लिम बहुल इलाकों के लिए कुछ स्वायत्तता की माँग का प्रस्ताव पेश किया। इस अस्पष्ट सी मांग में कहीं भी विभाजन या पाकिस्तान का जिक्र नहीं था। इस प्रस्ताव के लेखक सिकंदर हयात ने संघीय इकाइयों के लिए इस स्वायत्तता के आधार पर एक ढीले-ढाले संयुक्त महासंघ के समर्थन में अपने विचारों को पुनः 1941 में दोहराया।

(ब) कुछ लोगों का मानना है कि पाकिस्तान गठन की माँग उर्दू कवि मो. इकबाल से शुरू होती है जिन्होंने ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ लिखा था 1930 में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण देते हुए उन्होंने एक ‘उत्तर-पश्चिमी भारतीय मुस्लिम राज्य’ की जरूरत पर जोर दिया। उस भाषण में भी उन्होंने एक नये देश की माँग नहीं उठाई थी बल्कि पश्चिमोत्तर भारत में मुस्लिम बहुल इलाकों को शिथिल भारतीय संघ के भीतर एक स्वायत्त इकाई की स्थापना पर जोर दिया था।

→ विभाजन का अचानक हो जाना – पाकिस्तान के बारे में अपनी माँग पर लीग की राय पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी प्रारम्भ में खुद जिला भी पाकिस्तान की सोच को सौदेबाजी में एक पैंतरे के तौर पर ही इस्तेमाल कर रहे थे, जिसका वे सरकार द्वारा काँग्रेस को मिलने वाली रियायतों पर रोक लगाने और मुसलमानों के लिए रियायतें हासिल करने के लिए इस्तेमाल कर सकते थे। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के परिणामस्वरूप अंग्रेजों को झुकना पड़ा और संभावित सत्ता हस्तान्तरण के बारे में भारतीय पक्षों के साथ वार्ता जारी की।

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→ युद्धोत्तर घटना क्रम –
(अ) केन्द्रीय कार्यकारिणी सभा का विचार जब युद्ध के बाद 1945 में दुबारा बातचीत प्रारम्भ हुई तो अँग्रेज इस बात पर राजी हो गए कि एक केन्द्रीय कार्यकारिणी सभा बनाई जाएगी, जिसके सभी सदस्य भारतीय होंगे सिवाय वायसराय और सशस्त्र सेनाओं के सेनापति के उनकी राय में यह पूर्ण स्वतंत्रता की ओर प्रारम्भिक कदम होगा। सत्ता हस्तान्तरण के बारे में यह चर्चा टूट गई क्योंकि जिला इस बात पर अड़े हुए थे कि कार्यकारिणी सभा के मुस्लिम सदस्यों का चुनाव करने का अधिकार किसी को नहीं है। पंजाब में यूनियनिस्टों का मुसलमानों में दबदबा था और अंग्रेजों के वफादार होने के कारण अँग्रेज उन्हें नाराज नहीं करना चाहते थे।

मुस्लिम लीग के अतिरिक्त और –

(ब) सामान्य चुनाव – 1946 में पुनः प्रांतीय चुनाव हुए। सामान्य सीटों पर कांग्रेस को एकतरफा सफलता मिली 91.3 प्रतिशत गैर मुस्लिम वोट काँग्रेस को मिले मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों पर मुस्लिम लीग को भी ऐसी सफलता मिली। मध्य प्रान्त में भी लीग को भारी सफलता मिली। इस प्रकार 1946 में जाकर ही मुस्लिम लोग खुद को मुसलमानों की एकमात्र प्रवक्ता होने का दावा करने में सक्षम बनी।

→ विभाजन का एक संभावित विकल्प –

(अ) मार्च, 1946 में ब्रिटिश मंत्रिमंडल ने लीग की माँग का अध्ययन करने और स्वतंत्र भारत के लिए एक उचित राजनीतिक रूपरेखा सुझाने के लिए तीन सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल दिल्ली भेजा। इसे कैबिनेट मिशन कहा गया। इस मिशन ने तीन महीने तक भारत का दौरा किया और एक ढीले- ढाले त्रिस्तरीय महासंघ का सुझाव दिया। इसमें भारत अविभाजित ही रहने वाला था, जिसकी केन्द्रीय सरकार काफी कमजोर होती और उसके पास केवल विदेश रक्षा और संचार का जिम्मा होता मौजूदा प्रांतीय सभाओं को तीन हिस्सों क, ख, ग में समूहबद्ध किया जाना था।

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(ब) शुरुआत में सभी प्रमुख पार्टियों ने इस योजना को मान लिया था लेकिन वह समझौता अधिक देर तक नहीं चल पाया। सभी पक्षों ने अलग-अलग ढंग से इसकी व्याख्या की थी। कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव को काँग्रेस और लीग दोनों ने नहीं माना और यह मिशन अपने उद्देश्य में असफल रहा। इसके बाद विभाजन कमोबेश अपरिहार्य हो गया था काँग्रेस के ज्यादातर नेता इसे अवश्यंभावी परिणाम मान चुके थे लेकिन गाँधीजी व अब्दुल गफ्फार खाँ अन्त तक विभाजन का विरोध करते रहे।

→ विभाजन की ओर कैबिनेट मिशन से अपना समर्थन वापस लेने के बाद मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की अपनी माँग को अमली जामा पहनाने के लिए प्रत्यक्ष कार्यवाही करने का फैसला लिया। 16 अगस्त, 1946 को प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस मनाने का ऐलान किया। उसी दिन कलकत्ता में दंगा भड़क उठा, जो कई दिनों तक चला और उसमें कई हजार लोग मारे गए मार्च, 1947 तक उत्तर भारत के बहुत सारे हिस्सों में हिंसा फैल चुकी थी। मार्च, 1947 में काँग्रेस हाईकमान ने पंजाब को मुस्लिम बहुल और हिन्दू सिख बहुल, दो हिस्सों में बाँटने की मंजूरी दे दी। इसे पंजाब के सिख और काँग्रेसी नेताओं ने मान लिया। कॉंग्रेस ने बंगाल के मामले में भी यही सिद्धान्त अपनाने का सुझाव दिया क्योंकि बंगाल में भद्र बंगाली हिन्दुओं का सत्ताधारी तबका मुसलमानों के रहम पर जीना नहीं चाहता था।

→ कानून व्यवस्था का नाश मार्च, 1947 से तकरीबन साल भर तक रक्तपात चलता रहा। इसका एक कारण था कि शासन की संस्थाएँ बिखर चुकी थीं। सांप्रदायिक हिंसा इसलिए अधिक बढ़ रही थी कि पुलिस वाले भी हिन्दू, मुस्लिम और सिख के आधार पर आचरण करने लगे थे। जैसे-जैसे सांप्रदायिक तनाव बढ़ने लगा वैसे- वैसे वर्दीधारियों के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर पड़ने लगा। बहुत सारे स्थानों पर न केवल पुलिसवालों ने अपने धर्म व लोगों की मदद की बल्कि उन्होंने दूसरे समुदायों पर हमले भी किए।

→ महात्मा गाँधी एक अकेली फौज –

(अ) दंगों की उथल-पुथल में सांप्रदायिक सद्भाव बहाल करने के लिए एक आदमी की बहादुराना कोशिशें आखिरकार रंग लाने लगीं। 77 साल के बुजुर्ग गाँधीजी ने अहिंसा के अपने जीवन पर्यन्त सिद्धान्त को एक बार फिर आजमाया और अपना सर्वस्व दाँव पर लगा दिया। उन्हें विश्वास था लोगों का हृदय परिवर्तित किया जा सकता है। वे पूर्वी बंगाल के नोआखाली (वर्तमान बांग्लादेश) से बिहार के गाँवों और कलकत्ता व दिल्ली के दंगों में झुलसी झोपड़पट्टियों की यात्रा पर निकल पड़े। उनकी कोशिश थी कि सांप्रदायिक सद्भावना बनी रहे सभी मिलजुल कर रहें। उन्होंने लोगों को दिलासा दी।

(ब) 28 नवम्बर, 1947 को गुरुनानक जयन्ती के अवसर पर गाँधीजी ने गुरुद्वारा शीशगंज में अपने संबोधन में कहा, “हमारे लिए यह बड़ी शर्म की बात है कि चाँदनी चौक में एक भी मुसलमान दिखाई नहीं देता।” गाँधीजी अपनी हत्या तक दिल्ली में ही रहे पाकिस्तान से आए हिन्दू और सिख शरणार्थी भी गाँधीजी के साथ अनशन में बैठे। उनकी हत्या के बाद दिल्ली के बहुत सारे मुसलमानों ने कहा, “दुनिया सच्चाई की राह पर आ गई थी।”

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→ बँटवारे में औरतों पर अत्याचार – बँटवारे के दौरान औरतों पर बलात्कार हुए, उनको अगवा किया गया, उन्हें बार-बार खरीदा और बेचा गया। अनजान हालत में अजनबियों के साथ उन्हें अपनी जिन्दगी गुजारने के लिए मजबूर होना पड़ा। एक अंदाजे के मुताबिक 30 हजार औरतों को बरामद किया गया। कई स्थानों पर परिवार की इज्जत बचाने के लिए स्वयं मर्दों ने ही अपनी बहन-बेटियों और पत्नियों को जान से मार दिया। कई स्थानों पर शत्रुओं से बचने के लिए औरतों ने कुएँ में कूद कर जान दे दी। इस प्रकार औरतें अपनी इज्जत बचाती थीं।

→ क्षेत्रीय विविधताएँ –
(अ) विभाजन का सबसे ज्यादा खूनी और विनाशकारी रूप पंजाब, उत्तर-पश्चिम से लेकर वर्तमान भारतीय पंजाब, हिमाचल और हरियाणा तक में सामने आया।

(अ) उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और हैदराबाद (आंध्र प्रदेश) के बहुत सारे परिवार पचास व साठ के दशक तक के शुरुआती सालों में भी पाकिस्तान जाकर बसते रहे। लेकिन बहुत सारों ने भारत में ही रहना पसन्द किया पाकिस्तान गए ऐसे लोग जो उर्दू भाषी थे, जिन्हें वहाँ पर मुहाजिर (अप्रवासी) कहा जाता है, वे सिन्ध प्रान्त के कराची और हैदराबाद इलाके में बस गए। धर्म के नाम पर विभाजन हुआ। लेकिन धर्म पूर्वी और पश्चिम पाकिस्तान को जोड़कर नहीं रख पाया। 1971-72 में पूर्वी पाकिस्तान ने स्वयं को पश्चिम से अलग कर नया राज्य बांग्लादेश बनाया।

→ मदद, मानवता, सद्भावना – हिंसा के कचरे और विभाजन की पीड़ा तले, इंसानियत और सौहार्द का एक विशाल इतिहास दबा पड़ा है क्योंकि आम लोग बँटवारे के समय एक-दूसरे की मदद भी कर रहे थे।

→ मौखिक गवाही और इतिहास –
(अ) मौखिक वृत्तांत, संस्मरण, डायरियाँ, पारिवारिक इतिहास और स्वलिखित ब्यौरे इन सबसे तकसीम (बँटवारे के दौरान आम लोगों की कठिनाइयों और मुसीबतों को समझने में मदद मिलती है। लाखों लोग बँटवारे की पीड़ा तथा एक मुश्किल दौर को चुनौती के रूप में देखते हैं। उनके लिए यह जीवन में अनपेक्षित बदलावों का समय था। 1946-50 के तथा उसके बाद भी जारी रहने वाले इन बदलावों से निपटने के लिए मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और सामाजिक समायोजन की जरूरत थी।

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(ब) व्यक्तिगत स्मृतियों से इतिहासकारों को बँटवारे जैसी घटनाओं के इस बारे में बहुरंगी और सजीव वृत्तांत लिखने की काबिलियत मिलती है मिलना नामुमकिन होता है। दौरान लोगों के साथ क्या-क्या हुआ, सरकारी दस्तावेजों से ऐसी जानकारी

→ कानून व्यवस्था का नाश मार्च, 1947 से तकरीबन साल भर तक रक्तपात चलता रहा। इसका एक कारण था कि शासन की संस्थाएँ बिखर चुकी थीं सांप्रदायिक हिंसा इसलिए अधिक बढ़ रही थी कि पुलिस वाले भी हिन्दू, मुस्लिम और सिख के आधार पर आचरण करने लगे थे। जैसे-जैसे सांप्रदायिक तनाव बढ़ने लगा वैसे- वैसे वर्दीधारियों के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर पड़ने लगा। बहुत सारे स्थानों पर न केवल पुलिसवालों ने अपने धर्म व लोगों की मदद की बल्कि उन्होंने दूसरे समुदायों पर हमले भी किए।

→ महात्मा गाँधी एक अकेली फौज –
(अ) दंगों की उथल-पुथल में सांप्रदायिक सद्भाव बहाल करने के लिए एक आदमी की बहादुराना कोशिशें आखिरकार रंग लाने लगीं। 77 साल के बुजुर्ग गाँधीजी ने अहिंसा के अपने जीवन पर्यन्त सिद्धान्त को एक बार फिर आजमाया और अपना सर्वस्व दाँव पर लगा दिया। उन्हें विश्वास था लोगों का हृदय परिवर्तित किया जा सकता है। वे पूर्वी बंगाल के नोआखाली (वर्तमान बांग्लादेश) से बिहार के गाँवों और कलकत्ता व दिल्ली के दंगों में झुलसी झोपड़पट्टियों की यात्रा पर निकल पड़े। उनकी कोशिश थी कि सांप्रदायिक सद्भावना बनी रहे सभी मिलजुल कर रहें। उन्होंने लोगों को दिलासा दी।

(ब) 28 नवम्बर, 1947 को गुरुनानक जयन्ती के अवसर पर गाँधीजी ने गुरुद्वारा शीशगंज में अपने संबोधन में कहा, “हमारे लिए यह बड़ी शर्म की बात है कि चाँदनी चौक में एक भी मुसलमान दिखाई नहीं देता।” गाँधीजी अपनी हत्या तक दिल्ली में ही रहे पाकिस्तान से आए हिन्दू और सिख शरणार्थी भी गाँधीजी के साथ अनशन में बैठे। उनकी हत्या के बाद दिल्ली के बहुत सारे मुसलमानों ने कहा, “दुनिया सच्चाई की राह पर आ गई थी।”

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→ बँटवारे में औरतों पर अत्याचार – बँटवारे के दौरान औरतों पर बलात्कार हुए, उनको अगवा किया गया, उन्हें बार-बार खरीदा और बेचा गया। अनजान हालत में अजनबियों के साथ उन्हें अपनी जिन्दगी गुजारने के लिए मजबूर होना पड़ा। एक अंदाजे के मुताबिक 30 हजार औरतों को बरामद किया गया। कई स्थानों पर परिवार की इज्जत बचाने के लिए स्वयं मदों ने ही अपनी बहन-बेटियों और पत्नियों को जान से मार दिया। कई स्थानों पर शत्रुओं से बचने के लिए औरतों ने कुएं में कूद कर जान दे दी। इस प्रकार औरतें अपनी इज्जत बचाती थीं।

→ क्षेत्रीय विविधताएँ –
(अ) विभाजन का सबसे ज्यादा खूनी और विनाशकारी रूप पंजाब, उत्तर-पश्चिम से लेकर वर्तमान भारतीय पंजाब, हिमाचल और हरियाणा तक में सामने आया।

(अ) उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और हैदराबाद (आंध्र प्रदेश) के बहुत सारे परिवार पचास व साठ के दशक तक के शुरुआती सालों में भी पाकिस्तान जाकर बसते रहे लेकिन बहुत सारों ने भारत में ही रहना पसन्द किया। पाकिस्तान गए ऐसे लोग जो उर्दू भाषी थे, जिन्हें वहाँ पर मुहाजिर (अप्रवासी) कहा जाता है, वे सिन्ध प्रान्त के कराची और हैदराबाद इलाके में बस गए। धर्म के नाम पर विभाजन हुआ। लेकिन धर्म पूर्वी और पश्चिम पाकिस्तान को जोड़कर नहीं रख पाया। 1971-72 में पूर्वी पाकिस्तान ने स्वयं को पश्चिम से अलग कर नया राज्य बांग्लादेश बनाया।

→ मदद, मानवता, सद्भावना – हिंसा के कचरे और विभाजन की पीड़ा तले, इंसानियत और सौहार्द का एक विशाल इतिहास दबा पड़ा है। क्योंकि आम लोग बँटवारे के समय एक-दूसरे की मदद भी कर रहे थे।

→ मौखिक गवाही और इतिहास –
(अ) मौखिक वृत्तांत, संस्मरण, डायरियाँ, पारिवारिक इतिहास और स्वलिखित ब्यौरे इन सबसे तकसीम (बँटवारे के दौरान आम लोगों की कठिनाइयों और मुसीबतों को समझने में मदद मिलती है। लाखों लोग बँटवारे की पीड़ा तथा एक मुश्किल दौर को चुनौती के रूप में देखते हैं। उनके लिए यह जीवन में अनपेक्षित बदलावों का समय था। 1946-50 के तथा उसके बाद भी जारी रहने वाले इन बदलावों से निपटने के लिए मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और सामाजिक समायोजन की जरूरत थी।

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(ब) व्यक्तिगत स्मृतियों से इतिहासकारों को बंटवारे जैसी घटनाओं के दौरान लोगों के साथ क्या-क्या हुआ, इस बारे में बहुरंगी और सजीव वृत्तांत लिखने की काबिलियत मिलती है सरकारी दस्तावेजों से ऐसी जानकारी मिलना नामुमकिन होता है।

(स) मौखिक इतिहास से इतिहासकारों को गरीबों और कमजोरों, औरतों, शरणार्थियों, विधवाओं एवं पेशावरी व्यापारी आदि के अनुभवों को उपेक्षा के अंधकार से निकाल कर अपने विषय के किनारों की तरफ फैलाने का मौका मिलता है। इस प्रकार सम्पन्न और सुज्ञात लोगों की गतिविधियों से आगे जाते हुए विभाजन का मौखिक इतिहास ऐसे मर्दों औरतों के अनुभवों की पड़ताल करने में कामयाब रहा है जिनके वजूद को नजरअंदाज कर दिया जाता था, सहज-स्वाभाविक मान लिया जाता था। यह उल्लेखनीय बात है क्योंकि जो इतिहास हम पढ़ते हैं उसमें आम इंसानों के जीवन और कार्यों को अकसर पहुँच के बाहर या महत्त्वहीन मान लिया जाता है।

(द) अनेक इतिहासकारों को यह शक है कि मौखिक जानकारियों में सटीकता नहीं होती और इनसे घटनाओं का जो क्रम उभरता है वह अकसर सही नहीं होता। ऐसे इतिहासकारों की दलील है कि निजी तजुबों की विशिष्टता के सहारे सामान्यीकरण करना, यानी किसी सामान्य नतीजे पर पहुँचना मुश्किल होता है।

(य) भारत के विभाजन और जर्मनी के महाविध्वंस जैसी घटनाओं के संदर्भ में ऐसी गवाहियों की कोई कमी नहीं होगी, जिनसे पता चलता है कि उनके बीच अनगिनत लोगों ने कितनी तरह की और कितनी भीषण कठिनाइयों व तनावों का सामना किया। मिसाल के तौर पर सरकारी रिपोर्टों से हमें भारतीय और पाकिस्तानी सरकारों द्वारा ‘बरामद ‘ की गई औरतों की अदला-बदली और तादाद का पता चल जाता है। लेकिन उन औरतों ने भोगा क्या, उन पर क्या कुछ बीती इसका जवाब तो सिर्फ वे औरतें ही दे सकती हैं।

काल-रेखा
1930प्रसिद्ध उर्दू कवि मुहम्मद इकबाल एकीकृत ढीले-ढाले भारतीय संघ के भीतर एक ‘उत्तरपश्चिमी भारतीय मुस्लिम राज्य’ की जरूरत का विचार पेश करते हैं।
1933,1935कैम्ब्रिज में पढ़ने वाले एक पंजाबी मुसलमान युवक चौधरी रहमत अली ने पाकिस्तान या पाक-स्तान नाम पेश किया।
1937-39ब्रिटिश भारत के 11 में से 7 प्रांतों में काँग्रेस के मंत्रिमंडल सत्ता में आए।
1940लाहौर में मुस्लिम लीग मुस्लिम-बहुल इलाकों के लिए कुछ हद तक स्वायत्तता की माँग करते हुए प्रस्ताव पेश करती है।
1346प्रांतों में चननाव सम्पन्न होते हैं। सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में काँग्रेस को और मुस्लिम सीटों पर मुस्लिम लीग को शानदार कामयाबी मिलती है।
मार्च से जूनब्रिटिश कैबिनेट अपना तीन सदस्य मिशन दिल्ली भेजता है।
अगस्तमुस्लिम लीग पाकिस्तान की स्थापना के लिए ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही’ के पक्ष में फैसला लेती है।
16 अगस्तकलकत्ता में हिन्दू-सिखों और मुसलमानों के बीच हिंसा फूट पड़ती है, कई दिन चलने वाली इस हिंसा में हजारों लोग मारे जाते हैं।
मार्च, 1947काँग्रेस हाईकमान पंजाब को मुस्लिम-बहुल और हिन्दू/सिख बहुल हिस्सों में बाँटने के पक्ष में फैसला लेता है और बंगाल में भी इसी सिद्धान्त को अपनाने का आह्वान करता है।
मार्च, 1947 के बादअँग्रेज भारत छोड़कर जाने लगते हैं।
14-15 अगस्त, 1947पाकिस्तान का गठन होता है; भारत स्वतंत्र होता है। महात्मा गाँधी सांप्रदायिक सौहार्द बहाल करने के लिए बंगाल का दौरा करते हैं।

JAC Class 12 History Solutions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

Jharkhand Board JAC Class 12 History Solutions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Solutions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

Jharkhand Board Class 12 History महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे In-text Questions and Answers

पृष्ठ संख्या 349

प्रश्न 1.
1915 से पूर्व भारत में हुए राष्ट्रीय आन्दोलनों के बारे में और जानकारी इकट्ठा कीजिए व पता लगाइए कि क्या महात्मा गाँधी की टिप्पणियाँ न्यायसंगत हैं?
उत्तर:
1915 से पूर्व भारत में निम्नलिखित राष्ट्रीय आन्दोलन हुए –

  • 1857 का विद्रोह
  • 1885 में कांग्रेस की स्थापना
  • 1905 में बंगाल का विभाजन
  • स्वदेशी आन्दोलन।

महात्मा गाँधी की टिप्पणियां न्यायसंगत हैं।

पृष्ठ संख्या 354

प्रश्न 2.
आपने अध्याय 11 में अफवाहों के बारे में पढ़ा और देखा कि इन अफवाहों का प्रसार एक समय के विश्वास के ढाँचों के बारे में बताता है, यह बताता है उन लोगों के मन-मस्तिष्क के बारे में जो इन अफवाहों में विश्वास करते हैं और उन परिस्थितियों के बारे में जो इन विश्वासों को संभव बनाती है। आपके अनुसार गाँधीजी के विषय में अफवाहों से क्या पता चलता है?
उत्तर:
गाँधीजी के बारे में फैली अफवाहों से हमें यह पता चलता है कि लोग उन्हें एक पहुँचा हुआ महात्मा या सिद्ध पुरुष मानकर उनमें अपनी श्रद्धा प्रकट करते थे। भले ही ये घटनाएँ किन्हीं परिस्थितियोंश घट गई हों, लेकिन आम जनता ने उन्हें सच मानकर उनमें अपना विश्वास प्रकट किया। गरीब जनता गाँधीजी को अपना उद्धारक मानने लगी थी।

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पृष्ठ संख्या 355 चर्चा कीजिए

प्रश्न 3.
असहयोग क्या था? विभिन्न सामाजिक वर्गों ने आन्दोलन में किन विभिन्न तरीकों से भाग लिया, इसके बारे में पता लगाइए।
उत्तर:
(1) असहयोग एक ऐसा आन्दोलन था जिसमें से भारतीयों ने अंग्रेजों द्वारा बनाये गये सामान को प्रयोग करने मना कर दिया था। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों की नौकरी न करना भी इसका एक मुख्य भाग था
(2) सामाजिक वर्गों की प्रतिक्रिया

  • व्यक्तियों ने सरकारी नौकरी से त्याग पत्र दे दिया।
  • विदेशी सामान का प्रयोग बन्द कर दिया।
  • विदेशी उपाधि वापस कर दी गयी।
  • विदेशी वस्त्रों की होली जलायी गयी।

पृष्ठ संख्या 357

प्रश्न 4.
औपनिवेशिक सरकार द्वारा नमक को क्यों नष्ट किया जाता था? महात्मा गाँधी नमक कर को अन्य करों की तुलना में अधिक दमनात्मक क्यों मानते थे?
उत्तर:
(1) औपनिवेशिक सरकार द्वारा नमक पर कर लगाया गया था। यह कर नमक की लागत का 14 गुना तक होता था। बिना कर अदा किए गए नमक का प्रयोग करने से रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार उस नमक को, जिससे वह लाभ नहीं कमा पाती थी, नष्ट कर देती थी। वह देश की जनता को नमक के उत्पादन से रोकती थी। प्रकृति ने जिसे बिना किसी श्रम के उत्पादित किया जाता उसे भी नष्ट कर देती थी। यह उसकी अन्यायपूर्ण नीति की विशेषता कही जा सकती थी। सरकार बेरहम थी तथा भारतीयों की समस्या को बिलकुल नहीं समझती थी

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(2) महात्मा गाँधी नमक कर को इसलिए अन्य करों की तुलना में दमनात्मक मानते थे क्योंकि नमक भोजन का अनिवार्य अंग है और इसे अमीर-गरीब सभी प्रयोग करते हैं। नमक कर की माश भी बहुत अधिक थी। यह लागत का 14 गुना तक लगाया जाता था। नमक हमारी राष्ट्रीय संपदा का मूल्यवान अंश था। इस पर लगाया जाने वाला कर भूखे लोगों से हजार प्रतिशत से अधिक की उगाही की जाती थी। आम लोगों की उदासीनता के कारण यह कर लम्बे समय तक बना रहा। अब जनता जाग चुकी है। अतः इस कर को समाप्त करना ही होगा।

पृष्ठ संख्या 358

प्रश्न 5.
उल्लिखित भाषण के आधार पर बताइये कि गाँधीजी औपनिवेशिक राज्य को कैसे देखते थे?
उत्तर:
5 अप्रैल, 1930 को दाण्डी में दिए गए भाषण में गाँधीजी के सरकार के बारे में निम्नलिखित विचारों का पता लगता है –
(1) वे ब्रिटिश सरकार को पर्याप्त उदार मानते थे। जब गाँधीजी नमक बनाने के लिए अपने साथियों के साथ दाण्डी यात्रा पर निकले तो उन्हें विश्वास नहीं था कि उन्हें दाण्डी तक पहुँचने दिया जाएगा।

(2) वे ब्रिटिश शासन में यह आस्था रखते थे कि वह औपनिवेशिक राज्य होते हुए भी कानून की सीमा में रहने वालों को अनावश्यक रूप से हतोत्साहित नहीं करेगी।

(3) उनका मानना था कि औपनिवेशिक राज्य शान्ति और अहिंसा में विश्वास रखने वाले राष्ट्रभक्तों की सेना को गिरफ्तार करने की हिम्मत नहीं रखता।

(4) गाँधीजी मानते थे कि सरकार को शान्ति व अहिंसा में विश्वास रखने वालों को गिरफ्तार करने में शर्म महसूस होती है। उनके अनुसार सरकार शान्तिप्रिय सत्याग्रहियों को गिरफ्तार न करके अपनी शिष्टता का परिचय दे रही है। यदि वह अन्यायपूर्ण ढंग से गिरफ्तार करती तो उसके देश में ही उसकी आलोचना होती।

(5) गाँधीजी औपनिवेशिक राज्य द्वारा जनमत की परवाह करने के लिए उसे बधाई का पात्र मानते थे। पृष्ठ संख्या 362 चर्चा कीजिए

प्रश्न 6.
स्रोत 5 एवं 6 को पढ़िए। दमित वर्गों के लिए पृथक् निर्वाचिका के मुद्दे पर अम्बेडकर और महात्मा गाँधी के बीच काल्पनिक संवाद को लिखिए।
उत्तर:

  • गाँधीजी के अनुसार पृथक् निर्वाचिका से यह समस्या समाप्त नहीं हो सकती अपितु स्थायी हो जाएगी।
  • गाँधीजी के अनुसार अस्पृश्यता की समस्या को सामाजिक प्रयासों से हल करना चाहिए।
  • अम्बेडकर के अनुसार हिन्दू व्यवस्था अत्यधिक जटिल है। यहाँ दमित वर्ग का कोई स्थान नहीं है।
  • अम्बेडकर के अनुसार राजनैतिक भागीदारी ही दमित वर्ग का कल्याण कर सकती है ।

पृष्ठ संख्या 369

प्रश्न 7.
(क) इन पत्रों से इस बारे में क्या पता चलता है कि समय के साथ काँग्रेस के आदर्श किस तरह विकसित हो रहे थे?
(ख) राष्ट्रीय आन्दोलन में महात्मा गाँधी की भूमिका के बारे में इन पत्रों से क्या पता चलता है?
(ग) क्या ऐसे पत्रों से काँग्रेस की आन्तरिक कार्यप्रणाली तथा राष्ट्रीय आन्दोलन के बारे में कोई विशेष दृष्टि प्राप्त होती है?
उत्तर:
(क) इन पत्रों से हमें यह पता चलता है कि काँग्रेस के आदर्शों में निम्न रूप में परिवर्तन आ रहा था –

  • जवाहरलाल नेहरू सोवियत रूस से प्रभावित होकर समाजवादी विचारधारा के अनुसार काँग्रेस को चलाना चाहते थे
  • सरदार पटेल व डॉ. राजेन्द्र प्रसाद अपनी पुरानी रूढ़िवादी विचारधारा के समर्थक थे।
  • इन्हीं विचारों के कारण दोनों में टकराहट भी बढ़ रही थी जिसमें गाँधीजी मध्यस्थता करते थे।

(ख) राष्ट्रीय आन्दोलन में गांधीजी की भूमिका के बारे में हमें पता चलता है कि गांधीजी दोनों पक्षों को समझाने का प्रयास करते थे तथा उनका शुकाव जवाहरलाल नेहरू के प्रति अधिक था।

(ग) इन पत्रों से हमें कॉंग्रेस की आन्तरिक कार्यप्रणाली का भी पता चलता है कि काँग्रेस में अन्तर्कलह भी शुरू हो गया था। नेहरूजी समाजवाद की ओर बढ़ रहे थे तथा उनके सहयोगी रूढ़िवादी विचारधारा के समर्थक थे। पृष्ठ संख्या 370, चित्र संख्या 13.16

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प्रश्न 8.
क्या आपको इस तस्वीर और पुलिस की पाक्षिक रिपोटों में दी गई जानकारियों के बीच कोई अन्तर्विरोध दिखाई देता है?
उत्तर:
हाँ, हमें प्रस्तुत तस्वीर और पाक्षिक रिपोर्टों के मध्य अन्तर्विरोध स्पष्ट दिखाई पड़ता है पाक्षिक रिपोर्ट बताती है कि गृह विभाग यह मानने को तैयार ही नहीं था कि महात्मा गाँधी की कार्यवाहियों को व्यापक जन समर्थन मिल रहा था रिपोर्ट में इस जन आन्दोलन को एक नाटक करतब तथा हताश लोगों का प्रयास बताया गया, जबकि तस्वीर को देखने से पता चलता है कि गाँधीजी की कार्यवाही को भरपूर जनसमर्थन मिल रहा था।

पृष्ठ संख्या 373

प्रश्न 9.
पाक्षिक रिपोर्टों को ध्यान से पढ़िए। बाद रखिए कि ये औपनिवेशिक गृह विभाग की गोपनीय रिपोर्टों के अंश हैं। इन रिपोर्टों में हमेशा केवल पुलिस की ओर से भेजी गई जानकारियों को ही नहीं लिखा जाता था।
(1) स्रोत की पृष्ठभूमि से यह बात किस हद तक प्रभावित होती है कि इन रिपोटों में क्या कहा जा रहा है? उपर्युक्त अंशों से उद्धरण लेते हुए अपने तर्क को पुष्ट कीजिए।
(2) क्या आपको लगता है कि गृह विभाग महात्मा गाँधी की संभावित गिरफ्तारी के बारे में लोगों की सोच को अपनी रिपोर्टों में सही ढंग से दर्ज नहीं कर रहा था? यदि आपका उत्तर हाँ है तो उसके समर्थन में कारण बताइए। 5 अप्रैल, 1930 को दांडी में अपने भाषण में गाँधीजी ने गिरफ्तारियों के सवाल पर जो कहा था, उसे दुबारा पढ़िए।
(3) महात्मा गाँधी को क्यों गिरफ्तार नहीं किया गया? गृह विभाग लगातार यह क्यों कहता रहा कि दांडी यात्रा के प्रति लोगों में कोई उत्साह नहीं है?
उत्तर:
(1) रिपोर्टों की पृष्ठभूमि को पढ़ने से पता लगता है कि इन गोपनीय रिपोर्टों में सही तथ्यों को छिपाया जा रहा था। गाँधीजी की दाण्डी यात्रा में एक बड़ा जनसमूह उनके साथ था लेकिन रिपोर्ट में उसे कम आँका गया उदाहरण के लिए मार्च, 1930 के पहले पखवाड़ा की रिपोर्ट हमारे तर्क को पुष्ट करती है। 44 “गुजरात में आ रहे तेज राजनीतिक बदलावों पर यहाँ गहरी नजर रखी जा रही है। इनसे प्रांत की राजनीतिक परिस्थितियों पर किस हद तक और क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका अभी अंदाजा लगाना मुश्किल है। रबी की फसल अच्छी हुई है इसलिए फिलहाल किसान फसलों की कटाई में व्यस्त हैं। विद्यार्थी आने वाली परीक्षाओं की तैयारी में जुटे हैं।” यह रिपोर्ट वास्तविकता को प्रकट नहीं करती है।

(2) गृह विभाग महात्मा गाँधी की गिरफ्तारी को लेकर जनता की सोच को वास्तव में प्रकट नहीं कर रहा था। इसका कारण यह था कि सत्याग्रह की सक्रियता और निष्क्रियता दोनों से सरकार को ही नुकसान पहुँचेगा। यदि सरकार गाँधीजी को गिरफ्तार करती है तो उसे राष्ट्र के कोप का भाजन बनना पड़ेगा और यदि सरकार ऐसा नहीं करती है तो सविनय अवज्ञा आन्दोलन फैलता जायेगा। इसलिए हमारा मानना है कि अगर सरकार गांधीजी को दण्डित करती है तो भी राष्ट्र की विजय होगी और अगर सरकार उन्हें अपने रास्ते पर चलने देती है तो राष्ट्र की और भी बड़ी विजय होगी। (केसरी अखबार से)

(3) सरकार ने गाँधीजी को इस कारण से गिरफ्तार नहीं किया कि यदि वह गाँधीजी को गिरफ्तार करती है तो राष्ट्र के कोप का भाजन बनना पड़ेगा तथा आन्दोलन और जोर पकड़ जायेगा।

(4) गृह विभाग अपनी रिपोर्ट में वास्तविकता बताता तो जनता में इसका और प्रचार होता तथा आन्दोलन और जोर पकड़ सकता था। इसी बात को ध्यान में रखकर गृह विभाग अपनी सही रिपोर्ट नहीं देता था।

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Jharkhand Board Class 12 History महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे स्थापत्य Text Book Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
महात्मा गाँधी ने खुद को आम लोगों जैसा दिखाने के लिए क्या किया?
उत्तर:
महात्मा गाँधी ने स्वयं को आम लोगों जैसा दिखाने के लिए निम्नलिखित कार्य किए –
(1) गाँधीजी ने आम आदमी की तरह साधारण वस्त्र विशेषकर खादी से बने वस्त्र पहनना शुरू किया। उन्होंने चरखा चलाया, कुटीर उद्योग-धंधों, दलितों के हितों, महिलाओं के प्रति सद्व्यवहार और सच्ची सहानुभूति प्रदर्शित की।
(2) वह आम लोगों की तरह रहते थे और उनकी ही भाषा में बोलते थे। अन्य नेताओं की भाँति वह सामान्य बल्कि वे उनसे सहानुभूति रखते थे तथा उनसे पनिष्ठ सम्बन्ध भी स्थापित कर लेते थे। जनसमूह से अलग नहीं खड़े होते थे –
(3) गाँधीजी आम लोगों के बीच एक साधारण धोती में जाते थे।
(4) गाँधीजी प्रतिदिन कुछ समय के लिए चरखा चलाते थे।
(5) वह मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम में कोई भेदभाव नहीं करते थे।
(6) वह सामान्यजनों के सुख-दुःख में निरन्तर भाग लोते थे।
(7) गाँधीजी साधारण लोगों की तरह मात्र धोती पहनते थे। वे अपने कार्य स्वयं किया करते थे।

प्रश्न 2.
किसान महात्मा गाँधी को किस तरह देखते थे?
उत्तर:
किसान गाँधीजी को निम्न रूप में देखते थे –
(1) अपना सच्चा हितैषी किसान गाँधीजी को अपना सच्चा हितैषी मानते थे किसानों की मान्यता थी कि वे उनके दुःखों एवं कठिनाइयों का निवारण कर सकते हैं तथा उनके पास सभी स्थानीय अधिकारियों के निर्देशों को अस्वीकृत कराने की शक्ति है।

(2) उद्धारक के रूप में गांधीजी किसानों में बहुत लोकप्रिय थे। वे गाँधीजी को ‘गाँधी बाबा’, ‘गाँधी महाराज’, ‘सामान्य महात्मा’ आदि नामों से पुकारते थे। गाँधीजी किसानों के लिए एक उद्धारक के समान थे जो उनको भूराजस्व की ऊंची दरों और दमनकारी अधिकारियों से सुरक्षा करने वाले तथा उनके जीवन में मान-मर्यादा तथा स्वायत्तता वापस लाने वाले थे। गाँधीजी की सात्विक शैली तथा साधारण वेशभूषा किसानों को प्रभावित करती थी।

(3) चमत्कारी शक्ति किसानों की दृष्टि में गाँधीजी एक चमत्कारी व्यक्ति थे। किसानों की मान्यता थी कि गाँधीजी औपनिवेशिक शासन से मुक्ति दिला सकते हैं। उस समय ये अफवाहें भी प्रचलित थीं कि गाँधीजी की आलोचना करने वाले लोगों के पर गिर गए और उनकी फसलें नष्ट हो गई।

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प्रश्न 3.
नमक कानून स्वतंत्रता संघर्ष का महत्त्वपूर्ण मुद्दा क्यों बन गया था?
उत्तर:
नमक कानून स्वतंत्रता संघर्ष के लिए एक विशेष विषय या मुद्दा बन गया था, क्योंकि –
(1) उन दिनों नमक के निर्माण और बेचने पर ब्रिटिश शासन का एकाधिकार था।
(2) नमक ऐसी वस्तु थी जिसका गरीब से गरीब और अमीर से अमीर सभी अपने भोजन में प्रयोग करते थे परन्तु उन्हें ऊंचे दामों पर नमक खरीदना पड़ता था।
(3) नमक कानून को तोड़ने का अर्थ था विदेशी शासन व ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देना। नमक पर सरकार का एकाधिकार बहुत अलोकप्रिय था। गाँधीजी नमक के इस कानून को सबसे घृणित मानते थे। इसी को मुद्दा बनाते हुए गाँधीजी ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध आन्दोलन शुरू करने का निश्चय कर लिया। अधिकांश भारतीयों को गाँधीजी की इस चुनौती का महत्त्व समझ में आ गया था यह स्वतंत्रता प्राप्ति का साधन था। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए गाँधीजी ने मार्च, 1930 में दाण्डी यात्रा शुरू की तथा समुद्र के किनारे नमक का उत्पादन करके ब्रिटिश कानून को तोड़ा।

प्रश्न 4.
राष्ट्रीय आन्दोलन के अध्ययन के लिए अखबार महत्त्वपूर्ण स्रोत क्यों हैं?
उत्तर:
भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन को भली-भाँति समझने के लिए अखबार बहुत ही महत्वपूर्ण स्रोत हैं, क्योंकि
(1) अखबार जनसंचार का अच्छा माध्यम हैं और विशेषकर शिक्षित समुदाय पर अपना व्यापक प्रभाव डालते हैं प्रबुद्ध जनता लेखकों, कवियों, पत्रकारों, विचारकों तथा साहित्यकारों से अधिक प्रभावित होती है।

(2) समाचार पत्र जनमत का निर्माण करने के साथ जनता की अभिव्यक्ति को भी बताते हैं।

(3) यह सरकार और सरकारी अधिकारियों और आम लोगों में विचारों और समस्या के विषय में जानकारी देते हैं तथा कार्य में क्या प्रगति हो रही है तथा कौन से कार्य या क्षेत्र उपेक्षित हैं, उनकी जानकारी प्रदान करते हैं।

(4) राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान अखवार जिन लोगों द्वारा पढ़े जाते थे वे देश में घटित घटनाओं, नेतागणों और अन्य लोगों की गतिविधियों तथा विचारों को जानते थे अखबार गाँधीजी की गतिविधियों पर नजर रखते थे तथा आम भारतीय उनके बारे में क्या सोचता है, वे इसको भी बताते थे।

प्रश्न 5.
चरखे को राष्ट्रवाद का प्रतीक क्यों चुना गया?
उत्तर:
(1) चरखा गाँधीजी को बहुत ही प्रिय था। वे अपने खाली समय में चरखा चलाते थे और स्वयं कती खादी से बने वस्त्र ही पहनते थे।

(2) उनका मानना था कि आधुनिक युग में मशीनों ने आदमी को अपना गुलाम बनाकर रख दिया है तथा बेरोजगारी को भी बढ़ावा दिया है। उन्होंने मशीनों की आलोचना की तथा चरखे को एक ऐसे मानव समाज के प्रतीक के रूप में देखा जिसमें मशीनों और प्रौद्योगिकी को बहुत महिमा मंडित नहीं किया जाएगा।

(3) गाँधीजी के अनुसार भारत एक गरीब देश है। चरखे के द्वारा लोगों को पूरक आमदनी प्राप्त होगी, जिससे वे स्वावलंबी बनेंगे, बेरोजगारी और गरीबी से छुटकारा दिलाने में चरखा मदद करेगा।

(4) उनके अनुसार मशीनों से काम करके जो श्रम की बचत हो रही है उससे लोगों को मौत के मुंह में धकेला जा रहा है। उन्हें बेरोजगारी की दलदल में फेंका जा रहा है।

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(5) चरखा धन के विकेन्द्रीकरण में भी सहायक होगा। निम्नलिखित पर एक लघु निबन्ध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में )-

प्रश्न 6.
असहयोग आन्दोलन एक तरह का प्रतिरोध कैसे था?
उत्तर:
असहयोग आन्दोलन निम्नलिखित कारणों से एक तरह का प्रतिरोध ही था –
(1) रॉलेट एक्ट वापस लेने के लिए प्रतिरोध – यह आन्दोलन गाँधीजी के द्वारा ब्रिटिश सरकार द्वारा थोपे गए रॉलेट एक्ट जैसे काले कानून को वापस लेने के लिए जन आक्रोश और प्रतिरोध प्रकट करने का लोकप्रिय माध्यम था।

(2) जलियाँवाला बाग हत्याकांड के दोषियों को बचाने की कार्यवाही का प्रतिरोध असहयोग आन्दोलन इसलिए भी प्रतिरोध आन्दोलन था क्योंकि भारत के राष्ट्रीय नेता उन अंग्रेज अधिकारियों कों दण्डित करवाना चाहते थे जिन्होंने जलियांवाला बाग में निर्दोष लोगों का संहार किया था। जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड में 400 से अधिक लोग मारे गए थे।

(3) खिलाफत आन्दोलन के साथ सहयोग – असहयोग आन्दोलन इसलिए भी प्रतिरोधात्मक आन्दोलन था क्योंकि यह खिलाफत आन्दोलन के साथ सहयोग करके देश के दो प्रमुख धार्मिक समुदायों हिन्दुओं और मुसलमानों को संगठित कर औपनिवेशिक शासन का अन्त कर देगा।

(4) सरकारी संस्थाओं व शिक्षा संस्थाओं का बहिष्कार – असहयोग आन्दोलन के दौरान विदेशी शिक्षा संस्थाओं और सरकारी विद्यालयों और कॉलेजों का बहिष्कार किया गया।

(5) वकीलों द्वारा सरकारी अदालतों का बहिष्कार- असहयोग आन्दोलन में गांधीजी के आह्वान पर वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार कर दिया।

(6) मजदूरों द्वारा हड़ताल करना- इस व्यापक लोकप्रिय प्रतिरोध का असर कस्बों और शहरों में काम करने वाले मजदूरों पर भी पड़ा, उन्होंने हड़ताल कर दी जानकार सूत्रों से पता चलता है कि 1921 में 396 हड़तालें हुई, जिनमें 6 लाख से अधिक मजदूरों ने भाग लिया।

(7) जनजातियों तथा किसानों का प्रतिरोध- असहयोग आन्दोलन का प्रभाव देश के ग्रामीण इलाकों में भी दिखाई पड़ रहा था। उदाहरण के लिए, उत्तरी आंध्र की पहाड़ी जनजातियों ने वन-कानूनों की अवहेलना करनी शुरू कर दी। अवध के किसानों ने सरकारी लगान नहीं चुकाया । कुमाऊँ के किसानों ने अंग्रेज अधिकारियों का सामान दोने से मना कर दिया।

(8) असहयोग आन्दोलन को स्थगित करना- चौरी- चौरा की हिंसात्मक घटना के कारण गाँधीजी ने 1922 में असहयोग आन्दोलन को स्थगित कर दिया। फिर भी यह आन्दोलन काफी सफल रहा।

प्रश्न 7.
गोलमेज सम्मेलन में हुई वार्ता से कोई नतीजा क्यों नहीं निकल पाया?
उत्तर:
गाँधीजी की दाण्डी यात्रा की सफलता से अंग्रेजों को इस बात का एहसास हो गया कि अब भारत में उनका राज अधिक दिन तक नहीं चल पायेगा तथा उन्हें भारतीयों को भी सत्ता में हिस्सा देना पड़ेगा। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए ब्रिटिश सरकार ने लंदन में तीन गोलमेज सम्मेलन आयोजित किए। लेकिन ये सम्मेलन सफल नहीं हो पाये।
(1) पहला गोलमेज सम्मेलन – पहला गोलमेज सम्मेलन नवम्बर, 1930 में लंदन में आयोजित किया गया, जिसमें देश के प्रमुख नेता सम्मिलित नहीं हुए। अतः यह सम्मेलन निरर्थक साबित हुआ।

(2) गाँधी इर्विन समझौता जनवरी, 1931 में गाँधीजी को जेल से मुक्त कर दिया गया। अगले ही महीने गाँधीजी और लार्ड इर्विन के साथ कई बैठकें हुईं। इन्हीं बैठकों के बाद गाँधी इर्विन समझौते पर सहमति बनी, जिसकी शर्तें इस प्रकार थीं –
(क) सविनय अवज्ञा आन्दोलन को वापस लेना।
(ख) सारे कैदियों की रिहाई और तटीय इलाकों में नमक उत्पादन की अनुमति देना शामिल था। रैडिकल राष्ट्रवादियों ने इस समझौते की आलोचना की क्योंकि गांधीजी वायसराय से भारतीयों की राजनैतिक स्वतंत्रता का आश्वासन नहीं ले पाए थे।

(3) दूसरा गोलमेज सम्मेलन – दूसरा गोलमेज सम्मेलन 1931 के आखिर में लंदन में आयोजित किया गया। उसमें गाँधीजी भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में शामिल होकर नेतृत्व कर रहे थे। गाँधीजी का कहना था कि उनकी पार्टी पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करती है। उनके दावे को तीन पार्टियों ने चुनौती दी
(क) मुस्लिम लीग का इस विषय में कहना था कि वह भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यकों के हित में काम करती है।
(ख) भारत के राजे-रजवाड़ों का कहना था कि काँग्रेस का उनके नियन्त्रण वाले भागों पर कोई अधिकार नहीं है।
(ग) तीसरी चुनौती तेज-तर्रार वकील और विचारक ‘भीमराव अम्बेडकर की तरफ से थी, जिनका कहना था कि गाँधीजी और कॉंग्रेस पार्टी निचली जातियों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। इसका परिणाम यह हुआ कि यह सम्मेलन भी असफल हो गया और गांधीजी लंदन से खाली हाथ लौट आए।

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(4) तीसरा गोलमेज सम्मेलन भारत में जिन दिनों सविनय अवज्ञा आन्दोलन चल रहा था, ब्रिटिश सरकार ने लंदन में तीसरा गोलमेज सम्मेलन बुलाया। परन्तु कॉंग्रेस पार्टी ने इसमें भाग नहीं लिया। सम्मेलन में लिए गए निर्णयों पर एक श्वेत पत्र प्रकाशित किया गया, फिर इसके आधार पर 1935 का गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट पास किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत को स्वतन्त्रता प्रदान न करने और साम्प्रदायिकता की नीति को बढ़ावा देने के कारण गोलमेज सम्मेलन में हुई वार्ताओं का कोई परिणाम नहीं निकला।

प्रश्न 8.
महात्मा गाँधी ने राष्ट्रीय आन्दोलन के स्वरूप को किस तरह बदल डाला?
उत्तर:
महात्मा गाँधी ने राष्ट्रीय आन्दोलन के स्वरूप को निम्नलिखित तरीकों से बदल डाला—
(1) विश्व स्तर पर ख्याति – 1915 में भारत आने से पहले गाँधीजी दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह को सफल बना चुके थे। उन्होंने मानववाद, समानता आदि के लिए प्रयास किए तथा रंगभेद और जातीय भेदभाव के विरुद्ध सत्याग्रह किया तथा विश्व स्तर पर ख्याति प्राप्त की।

(2) राष्ट्रीय आन्दोलन को विशिष्ट वर्गीय आन्दोलन से जन-आन्दोलन में बदलना गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन के माध्यम से राष्ट्रीय आन्दोलन में किसानों, श्रमिकों और कारीगरों को भी शामिल कर एक जन- आन्दोलन में परिणत कर दिया।

(3) भारत के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक शोषण के लिए ब्रिटिश भारत सरकार जिम्मेदार – गाँधीजी ने अपने भाषणों तथा लेखों के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को बता दिया कि भारत में फैली गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, दरिद्रता, निम्न जीवन स्तर, अशिक्षा और अंधविश्वास के लिए ब्रिटिश शासन जिम्मेदार है।

(4) जन – अनुरोध – गाँधीजी एक कुशल संगठनकर्त्ता थे। उन्होंने राष्ट्रवादी संदेश का संचार अंग्रेजी भाषा के स्थान पर मातृभाषा में किया। भारत के विभिन्न भागों में कांग्रेस की नवीन शाखाएँ खोली गईं तथा देशी राज्यों में ‘प्रजामण्डलों’ की स्थापना की गई।

(5) जननेता तथा अन्याय व शोषण के प्रति आवाज मुखरित करना – गाँधीजी समझते थे कि जब तक वे किसानों, मजदूरों और जनसाधारण के प्रति सरकार, जमींदारों, ताल्लुकदारों आदि के द्वारा किए जा रहे अन्याय व शोषण के विरुद्ध आवाज नहीं उठाएँगे तब तक जनता उन्हें अपने बीच का व्यक्ति नहीं समझेगी। इसलिए उन्होंने गरीब किसानों, मजदूरों और आम आदमी के शोषण के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद की।

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(6) साम्प्रदायिक एकता के समर्थक – गाँधीजी हिन्दू और मुसलमान दोनों को अपनी दो आँखें मानते थे। वे साम्प्रदायिक एकता के हामी थे वे हिन्दू और मुसलमान में कोई भेद नहीं मानते थे। उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों का समर्थन प्राप्त करने के लिए खिलाफत आन्दोलन का समर्थन किया।

(7) नारी सशक्तिकरण के समर्थक गांधीजी नारी सशक्तिकरण के समर्थक थे। वे स्त्री और पुरुष में कोई भेदभाव नहीं करते थे। उन्होंने नारियों को राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल होने, चरखा कातने, खादी का प्रचार-प्रसार करने, शराब व नशाबंदी का विरोध करने को प्रेरित किया।

(8) प्रमुख समाज सुधारक – गाँधीजी ने समाज सुधार के कार्यों पर भी बहुत अधिक बल दिया। उन्होंने साबरमती आश्रम में स्वयं अपने हाथों से कार्य किया, ‘हरिजन सेवक पत्र’ के माध्यम से अस्पृश्यता के विरुद्ध शंखनाद किया। जब देश में धार्मिक घृणा व उन्माद फैला तो उन्होंने कई बार आमरण अनशन किया और दंगाग्रस्त इलाकों का दौरा कर शान्ति स्थापना की।

उन्होंने चर्खा चलाने, स्वदेशी वस्त्रों का प्रयोग करने, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करने, दलितोद्धार, स्वयं साधारण वस्त्र पहनने तथा सामान्य लोगों की तरह रहने, जनसामान्य की भाषा का प्रयोग करने आदि पर बल दिया। इस प्रकार गाँधीजी ने अपनी गतिविधियों और कार्यकलापों के माध्यम से भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन का स्वरूप बदल डाला तथा अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त की।

प्रश्न 9.
निजी पत्रों और आत्मकथाओं से किसी व्यक्ति के बारे में क्या पता चलता है? ये स्रोत सरकारी ब्यौरों से किस तरह भिन्न होते हैं?
उत्तर:
निजी पत्रों तथा आत्मकथाओं से किसी व्यक्ति के बारे में हमें निम्नलिखित जानकारी प्राप्त होती है –
(1) सम्पूर्ण जीवन वृत्त आत्मकथाओं या पत्रों से सम्बन्धित व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन काल, जन्म-स्थान, उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, शिक्षा, व्यवसाय संचयों, कठिनाइयों तथा जीवन में आए उतार-चढ़ाव का पता लग जाता है। आत्मकथा में जीवन से जुड़ी घटनाएँ भी शामिल होती हैं।

(2) काँग्रेस के आदर्श और प्राथमिकताएँ – निजी पत्र जो राष्ट्रीय आन्दोलन के समय डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा नेहरूजी को लिखे गये या नेहरूजी ने गाँधीजी को लिखे अथवा गाँधीजी ने नेहरू या अन्य नेताओं को समय-समय पर लिखे से काँग्रेस के आदर्श कैसे विकसित हुए, काँग्रेस के कार्यक्रम तथा प्राथमिकताएँ क्या र्थी इनका पता लगता है (छात्र/छात्राएँ पृष्ठ 367, स्रोत 7 में दिये गये पत्रों को पढ़कर देखें ) समय-समय पर उठने वाले आन्दोलनों में गाँधीजी की क्या भूमिका रही, यह हमें उस समय लिखे पत्रों से पता लगता है। इन पत्रों से हमें कॉंग्रेस की आंतरिक कार्यप्रणाली तथा राष्ट्रीय आन्दोलन के बारे में अलग-अलग नेताओं के दृष्टिकोणों का पता लगता है।

(3) विभिन्न नेताओं की चारित्रिक विशेषताओं/ त्रुटियों की जानकारी – निजी पत्रों के माध्यम से विभिन्न राष्ट्रीय नेताओं की चारित्रिक विशेषताओं अथवा त्रुटियों के बारे में जानकारी मिलती है। उदाहरण के लिए, गाँधीजी ने जवाहरलाल नेहरू को पत्र में लिखा, “तुम्हारे साथियों में तुम्हारे जैसा साहस और बेबाकी नहीं है। इसके परिणाम विनाशकारी हो रहे हैं। उनके पास साहस न होने के कारण वे जब भी बोलते हैं ऊटपटांग बोलते हैं जिससे तुम चिढ़ जाते हो। मैं तुम्हें बताता हूँ कि वे तुम्हें इसलिए डरा रहे हैं कि तुम उनसे चिढ़ जाते हो और उनके सामने धैर्य खो देते हो।”

इस प्रकार इस पत्र के माध्यम से हमें जवाहरलाल नेहरू के स्वभाव का पता चलता है तथा दूसरे नेताओं के व्यवहार का भी पता लग जाता है। सरकारी ब्यौरों और निजी पत्रों में अन्तर सरकारी ब्यौरों से निजी पत्र और आत्मकथाएँ बिल्कुल अलग होती हैं सरकारी ब्यौरे प्रायः गुप्त रूप से लिखे जाते हैं। ये लिखाने वाली सरकार और लिखने वाले विवरणदाता या लेखकों के पूर्वाग्रहों, नीतियों, दृष्टिकोणों आदि से प्रभावित होते हैं।

दूसरी ओर प्रायः निजी पत्र दो व्यक्तियों के बीच में आपसी सम्बन्ध, विचारों के आदान-प्रदान और निजी स्तर से जुड़ी सूचनाएँ देने के लिए होते हैं किसी भी व्यक्ति की आत्मकथा, उसकी ईमानदारी, निष्पक्षता और सच्चे विवरण पर उसका मूल्य निर्धारित करती है। इस तरह सरकारी ब्यौरों से आत्मकथा तथा निजी पत्र बिल्कुल भिन्न होते हैं। उदाहरण के लिए गाँधीजी ने अपनी आत्मकथा में अपनी बुराइयों को भी दर्शाया है और अच्छाइयों को भी।

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महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे JAC Class 12 History Notes

→ प्रस्तावना-राष्ट्रवाद के इतिहास में प्राय: एक अकेले व्यक्ति को राष्ट्र-निर्माण के साथ जोड़कर देखा जाता है। इसी दृष्टि से भारत की आजादी के साथ महात्मा गाँधी को जोड़ कर देखा जाता है और उन्हें राष्ट्रपिता के नाम से संबोधित किया जाता है।

→ स्वयं की उद्घोषणा करता एक नेता –
(क) दक्षिणी अफ्रीका काल – मोहनदास करमचन्द गाँधी 20 वर्ष तक विदेश में रहने के बाद 1915 में भारत लौटे। इन वर्षों का उनका अधिकांश समय दक्षिण अफ्रीका में बीता, जहाँ वे इस क्षेत्र के भारतीय समुदाय के नेता बन गये। यहाँ उन्होंने पहली बार सत्याग्रह के रूप में अपनी विशिष्ट तकनीक का इस्तेमाल किया, विभिन्न धर्मों के बीच सौहार्द बढ़ाने का प्रयास किया।

(ख) भारत लौटने पर भारत की स्थिति – जब वे भारत आए तो उस समय का भारत 1893 में जब वे विदेश गए थे, तब के समय से अपेक्षाकृत भिन्न था।

  • भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का विकास – अभी भी ब्रिटिश शासन था लेकिन अधिकांश शहरों में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की शाखाएँ खुल चुकी थीं।
  • प्रमुख उग्रवादी नेता – 1905-07 के स्वदेशी आन्दोलन ने कुछ प्रमुख नेताओं को जन्म दिया जिनमें लाल, बाल और पाल अत्यधिक प्रसिद्ध थे जिन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लड़ाकू प्रतिरोध का समर्थन किया था।
  • उदारवादी नेता – इसके अतिरिक्त कुछ उदारवादी नेता भी थे, जो क्रमिक विकास के हिमायती थे। इनमें प्रमुख गोपाल कृष्ण गोखले थे जो गाँधीजी के राजनीतिक गुरु थे 1

(ग) पहली सार्वजनिक उपस्थिति – उनकी पहली सार्वजनिक उपस्थिति फरवरी, 1916 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के समय दर्ज हुई। इसमें उन्होंने मजदूर गरीबों की ओर ध्यान न देने के कारण भारत के विशिष्ट वर्ग के लोगों को आड़े हाथों लिया।

(घ) चम्पारन में सत्याग्रह – 1916 के दिसम्बर में गाँधीजी को अपने नियमों को व्यवहार में लाने का मौका मिला। जब लखनऊ में चम्पारन से आये एक किसान ने उन्हें वहाँ अंग्रेज नील उत्पादकों द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों के बारे में बताया। यहीं से गांधीजी के राजनीतिक जीवन का प्रारम्भ हुआ और चंपारन (बिहार) में प्रथम सत्याग्रह करके किसानों को मुक्ति दिलाई।

→ असहयोग की शुरुआत और अन्त- गाँधीजी का 1917 का अधिकतर समय काश्तकारी की सुरक्षा के साथ किसानों को मनपसन्द फसल पैदा करने की आजादी दिलाने में बीता।

(i) चंपारन, अहमदाबाद और खेड़ा में पहल – चंपारन, अहमदाबाद और खेड़ा में की गई पहल से गाँधीजी एक ऐसे राष्ट्रवादी के रूप में उभरे जिसमें गरीबों के लिए गहरी सहानुभूति थी। ये सभी स्थानिक संघर्ष थे।

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(ii) रॉलेट एक्ट के विरुद्ध सत्याग्रह 1919 में औपनिवेशिक सरकार ने गाँधीजी की झोली में एक ऐसा मुद्दा डाल दिया जिससे वे कहीं अधिक विस्तृत आन्दोलन खड़ा कर सकते थे। प्रथम विश्व युद्ध (1914 1918) के दौरान अंग्रेजों ने प्रेस पर प्रतिबन्ध लगाया तथा बिना जाँच के कारावास की अनुमति दे दी थी। युद्ध के बाद ‘रॉलेट एक्ट’ के द्वारा ये प्रतिबन्ध जारी रखे गए।

गाँधीजी ने रॉलेट एक्ट के विरुद्ध सत्याग्रह शुरू कर दिया। रॉलेट एक्ट के विरुद्ध किए गए सत्याग्रह से गाँधीजी एक राष्ट्रीय नेता बन गए थे। इस सफलता से प्रोत्साहित होकर गाँधीजी ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक बड़ा आन्दोलन चलाने का निश्चय किया। 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में जनरल डायर द्वारा भयंकर जनसंहार किया गया।

(iii) असहयोग आन्दोलन- गाँधीजी को यह आशा थी कि असहयोग को खिलाफत के साथ मिलाने से भारत के दो प्रमुख धार्मिक समुदाय हिन्दू और मुसलमान मिलकर औपनिवेशिक शासन का अन्त कर देंगे। छात्रों ने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों का बहिष्कार कर दिया, वकीलों ने अदालत में जाना छोड़ दिया। कस्बों, नगरों और शहरों में मजदूरों ने हड़ताल कर दी। सरकारी आँकड़े बताते हैं कि 1921 में 396 हड़तालें हुई और इससे 70 लाख कार्य दिवसों का नुकसान हुआ। इस हड़ताल में 6 लाख मजदूर शामिल थे।

(iv) चौरी-चौरा काण्ड और असहयोग आन्दोलन का अन्त-फरवरी 1922 में संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के गोरखपुर जिले में स्थित एक पुलिस चौकी को आग लगा दी गई, जिसमें करीब 20 पुलिसकर्मी जलकर मर गए। आन्दोलन हिंसक हो जाने के कारण गाँधीजी ने इसे वापस ले लिया। आन्दोलन के दौरान हजारों भारतीयों को जेल में डाल दिया गया। स्वयं गाँधीजी को मार्च, 1922 में राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। गाँधीजी को 6 वर्ष की सजा दी गई।

→ गाँधीजी जन नेता के रूप में अब गाँधीजी एक जन नेता के रूप में स्थापित हो गए। निम्न स्थितियों ने उन्हें एक जन नेता बना दिया
(i) राष्ट्रीय आन्दोलन को जन आन्दोलन में परिणत करना – 1922 तक गांधीजी ने भारतीय राष्ट्रवाद को एकदम बदल दिया था इस प्रकार फरवरी, 1916 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अपने भाषण में किए वायदे को उन्होंने पूरा किया। अब यह व्यावसायिकों और बुद्धिजीवियों का आन्दोलन न रहकर हजारों श्रमिकों, कारीगरों, किसानों और आम जनता का आन्दोलन बन गया था। इनमें से कई लोग गाँधीजी के प्रति आदर प्रकट करते हुए उन्हें ‘महात्मा’ कहने लगे। गाँधीजी साधारण वेशभूषा धारण करते थे। उन्होंने पारंपरिक जाति व्यवस्था में प्रचलित मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम की दीवार तोड़ने में मदद की।

(ii) किसानों के उद्धारक – गांधीजी भारतीय किसान के लिए उद्धारक के समान थे। लोग उन्हें ‘गांधी बाबा’, ‘गांधी महाराज’ अथवा ‘सामान्य महात्मा’ जैसे अलग-अलग नामों से पुकारते थे वे किसानों की दमनात्मक अधिकारियों से सुरक्षा करने वाले, ऊँची दर के करों से मुक्ति दिलाने वाले और उनके जीवन में मान-मर्यादा और स्वायत्तता वापस लाने वाले थे।

(iii) भारतीय उद्योगपति और व्यापारी भी आन्दोलन के समर्थक कांग्रेस में कुछ भारतीय उद्योगपति और व्यापारी भी शामिल हो गए थे उनकी सोच थी कि अंग्रेजों द्वारा जो उनका शोषण हो रहा है, वह स्वतन्त्र भारत में समाप्त हो जाएगा।

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(iv) गाँधी व उनके अनुयायी नेता- 1917 से 1922 के बीच भारतीयों के एक बहुत ही प्रतिभाशाली वर्ग ने स्वयं को गाँधीजी से जोड़ लिया था। इनमें महादेव भाई देसाई, वल्लभ भाई पटेल, जे. बी. कृपलानी, सुभाष चन्द्र बोस, अबुल कलाम आजाद, जवाहरलाल नेहरू, सरोजिनी नायडू, गोविन्द वल्लभ पंत और सी. राजगोपालाचार्य शामिल थे।

(v) समाज सुधारक के रूप में गाँधीजी – 1924 में जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने अपना ध्यान खादी को बढ़ावा देने तथा छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों को मिटाने तथा बाल विवाह को रोकने में लगाया। उन्होंने हिन्दू-मुसलमानों के बीच सौहार्द पर बल दिया। उन्होंने विदेशों से आयातित वस्त्रों को पहनने के स्थान पर खादी पहनने की महत्ता पर जोर दिया।

→  नमक सत्याग्रह नजदीक से एक नजर-
(i) साइमन कमीशन के विरुद्ध आन्दोलन – असहयोग आन्दोलन की समाप्ति के कई वर्षों तक गाँधीजी ने अपने को समाज सुधार कार्यों में केन्द्रित रखा। 1927 में साइमन कमीशन के विरुद्ध होने वाले आन्दोलन तथा बारदोली में किसानों के सत्याग्रह में स्वयं भाग न लेकर दोनों को केवल अपना आशीर्वाद दिया था।

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(ii) लाहौर अधिवेशन और पूर्ण स्वराज की घोषणा – 1929 में दिसम्बर के अन्त में लाहौर में काँग्रेस ने अपना वार्षिक अधिवेशन किया। इस अधिवेशन की दो बातें मुख्य थीं –
(1) जवाहरलाल नेहरू द्वारा अध्यक्षता करना और
(2) भारत को ‘पूर्ण स्वराज’ अथवा पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा करना। 26 जनवरी, 1930 को देशभर में राष्ट्रीय ध्वज फहराकर और देशभक्ति के गीत गाकर औपनिवेशिक भारत में प्रथम स्वतंत्रता दिवस मनाया गया जो हर 26 जनवरी के दिन प्रतिवर्ष 1947 तक मनाया जाता रहा।

(iii) दाण्डी यात्रा स्वतंत्रता दिवस’ मनाए जाने के तुरन्त बाद महात्मा गाँधी ने एक घोषणा की कि वे ब्रिटिश भारत के सबसे अधिक घृणित कानूनों में से एक, जिसने नमक के उत्पादन और विक्रय पर राज्य को एकाधिकार दे दिया है, को तोड़ने के लिए एक यात्रा का नेतृत्व करेंगे। प्रत्येक भारतीय के घर में नमक का प्रयोग अपरिहार्य था इसके बावजूद उन्हें नमक बनाने से रोका गया। नमक कानून को निशाना बनाकर गाँधीजी ब्रिटिश शासन के खिलाफ व्यापक असंतोष को संघटित करने की सोच रहे थे।

(iv) मुट्ठीभर नमक – अधिकांश भारतीयों को गाँधीजी की इस चुनौती का महत्त्व समझ में आ गया था, लेकिन ब्रिटिश शासन इसे नहीं समझ सका। अपनी दाण्डी यात्रा की सूचना गाँधीजी ने लार्ड इरविन को दे दी थी, लेकिन उसकी समझ में बात नहीं आई। 12 मार्च, 1930 को गाँधीजी ने साबरमती आश्रम से अपनी यात्रा शुरू की तीन हफ्ते बाद समुद्र किनारे पहुँचकर उन्होंने मुट्ठीभर नमक बनाकर कानून को तोड़ा और स्वयं को कानून की निगाह में अपराधी बना दिया।

(v) स्वराज की सीढ़ियाँ – वसना नामक गाँव में गाँधीजी ने ऊंची जाति वालों को संबोधित करते हुए कहा था कि “यदि आप स्वराज के हक में आवाज उठाते हैं तो आपको अछूतों की सेवा करनी पड़ेगी सिर्फ नमक कर या अन्य करों के खत्म हो जाने से आपको स्वराज नहीं मिल जायेगा। स्वराज के लिए आपको अपनी उन गलतियों का प्रायश्चित करना होगा जो आपने अछूतों के साथ की हैं। स्वराज के लिए हिन्दू, मुसलमान, पारसी और सिक्ख सबको एकजुट होना पड़ेगा ये स्वराज की सीढ़ियाँ हैं।”

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(vi) नमक यात्रा का महत्त्व – नमक याश कम से कम निम्नलिखित तीन कारणों से उल्लेखनीय थी –
(क) यही वह घटना थी जिसके चलते महात्मा गाँधी दुनिया की नजर में आए इस यात्रा को यूरोप और अमेरिकी प्रेस ने व्यापक कवरेज दी
(ख) यह पहली गतिविधि थी जिसमें औरतों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। समाजवादी कार्यकर्ता कमला देवी चट्टोपाध्याय ने गाँधीजी को समझाया कि वे अपने आन्दोलनों को पुरुषों तक ही सीमित न रखें। कमला देवी खुद उन असंख्य औरतों में से एक थीं जिन्होंने नमक या शराब कानूनों को तोड़ते हुए सामूहिक गिरफ्तारी दी।
(ग) तीसरा और संभवतः सबसे महत्वपूर्ण कारण यह था कि नमक यात्रा के कारण अंग्रेजों को यह एहसास हुआ था कि अब उनका राज बहुत दिन तक नहीं टिक पाएगा और उन्हें भारतीयों को भी सत्ता में हिस्सा देना पड़ेगा।

→ गोलमेज सम्मेलन –
(i) पहला गोलमेज सम्मेलन नवम्बर, 1930 में लंदन में आयोजित किया गया, जिसमें देश के प्रमुख नेता शामिल नहीं हुए।
(ii) दूसरा गोलमेज सम्मेलन दिसम्बर, 1931 में लंदन में आयोजित हुआ जिसमें गाँधीजी शामिल हुए। लेकिन यह सम्मेलन सफल नहीं हुआ।

(7) सविनय अवज्ञा आन्दोलन भारत लौटकर गाँधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू किया।

(8) गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया एक्ट 1935 में गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट में सीमित प्रातिनिधिक शासन व्यवस्था का आश्वासन व्यक्त किया गया। दो साल बाद सीमित मताधिकार के आधार पर हुए चुनावों में काँग्रेस -को जबरदस्त सफलता मिली 11 में से 8 प्रांतों में काँग्रेस के प्रधानमंत्री’ सत्ता में आए जो ब्रिटिश गवर्नर की देखरेख में काम करते थे।

(9) पाकिस्तान की माँग मार्च, 1940 में मुस्लिम लीग ने ‘पाकिस्तान’ के नाम से पृथक् राष्ट्र की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया और उसे अपना लक्ष्य घोषित कर दिया। अब राजनीतिक भू-दृश्य काफी जटिल हो गया था। यह संघर्ष भारतीय बनाम ब्रिटिश न रहकर काँग्रेस, मुस्लिम लीग और ब्रिटिश शासन के बीच शुरू हो गया।

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(10) भारत छोड़ो आन्दोलन- क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपना तीसरा बड़ा आन्दोलन छेड़ने का फैसला लिया। अगस्त, 1942 में शुरू हुए इस आन्दोलन को ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का नाम दिया गया था। हालांकि गाँधीजी फौरन गिरफ्तार कर लिए गए, लेकिन युवा कार्यकर्ता देश में हड़तालों और तोड़फोड़ के जरिए आन्दोलन चलाते रहे। भारत छोड़ो आन्दोलन सही मायने में जन आन्दोलन था जिसमें लाखों आम हिन्दुस्तानी शामिल थे।

(11) द्वितीय विश्व युद्ध व गाँधीजी की रिहाई-जून, 1944 में जब द्वितीय विश्व युद्ध समाप्ति की ओर था तो गाँधीजी को जेल से रिहा कर दिया गया। जेल से छूटने के बाद उन्होंने काँग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच फासले को पाटने के लिए जिला के साथ कई बार बातचीत की। 1945 में ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बनी, जो भारत को स्वतंत्र करने के पक्ष में थी।

(12) कैबिनेट मिशन – 1946 की गर्मियों में कैबिनेट मिशन भारत आया। इस मिशन ने काँग्रेस और मुस्लिम लीग को एक ऐसी संघीय व्यवस्था पर राजी करने का प्रयास किया जिसमें भारत के भीतर विभिन्न प्रान्तों को सीमित स्वायत्तता दी जा सकती थी कैबिनेट मिशन का यह प्रयास विफल रहा।

(13) प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस जिन्ना ने पाकिस्तान स्थापना के लिए लीग की माँग के समर्थन में एक ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ का आह्वान किया। इसके लिए 16 अगस्त, 1946 का दिन तय किया। उसी दिन कलकत्ता में खूनी संघर्ष शुरू हो गया। यह संघर्ष कलकत्ता से लेकर ग्रामीण बंगाल, बिहार संयुक्त प्रान्त और पंजाब तक फैल गया।

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(14) स्वतंत्रता व विभाजन फरवरी, 1947 में वावेल की जगह माउंटबैटन वायसराय बनकर आये, उन्होंने वार्ताओं के लिए अन्तिम दौर का आह्वान किया। जब सुलह के लिए उनका अन्तिम प्रयास भी विफल हो गया तो उन्होंने ऐलान कर दिया कि ब्रिटिश भारत को स्वतंत्र कर दिया जायेगा, लेकिन उसका विभाजन होगा। इसके लिए 15 अगस्त का दिन नियत किया गया। दिल्ली में संविधान सभा के अध्यक्ष ने गांधीजी को ‘राष्ट्रपिता’ की उपाधि से संबोधित किया।

(15) आखिरी, बहादुराना दिन –
(i) 15 अगस्त, 1947 को राजधानी में हो रहे उत्सवों में गाँधीजी नहीं थे उस समय वे कलकत्ता में थे लेकिन उन्होंने वहाँ भी न तो किसी कार्यक्रम में भाग लिया, न ही कहीं शण्डा फहराया। गाँधीजी उस दिन 24 घण्टे के उपवास पर थे। उन्होंने इतने दिन तक जिस स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया था वह एक अकल्पनीय कीमत पर उन्हें मिली थी। उनका राष्ट्र विभाजित था, हिन्दू-मुसलमान एक-दूसरे की गर्दन पर सवार थे।

(ii) काँग्रेस ने आश्वासन दिया कि “वह अल्पसंख्यकों के नागरिक अधिकारों के किसी भी अतिक्रमण के विरुद्ध हर मुमकिन रक्षा करेगी।”

(iii) बहुत सारे विद्वानों ने स्वतंत्रता के बाद के महीनों को गाँधीजी के जीवन का ‘ श्रेष्ठतम क्षण’ कहा है। बंगाल में शान्ति स्थापना के बाद वे दिल्ली आ गए।

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(iv) गाँधीजी ने स्वतंत्र और अखण्ड भारत के लिए जीवन भर संघर्ष किया। फिर भी जब देश विभाजित हो गया तो उनकी दिली इच्छा थी कि दोनों देश एक-दूसरे के साथ सम्मान और दोस्ती के सम्बन्ध बनाए रखेंगे।। लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी।

(v) गाँधीजी की हत्या 30 जनवरी, 1948 की शाम को दैनिक प्रार्थना सभा में एक युवक ने गोली मारकर गाँधी जी की हत्या कर दी। उनके हत्यारे ने कुछ समय बाद आत्मसमर्पण कर दिया। वह नाथूराम गोडसे नाम का व्यक्ति था। पुणे का रहने वाला गोडसे एक अखबार का संपादक था।

काल-रेखा
1915महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका से वापस लौटते हैं।
1917चम्पारन आन्दोलन।
1918खेड़ा (गुजरात) में किसान आन्दोलन तथा अहमदाबाद में कपड़ा मिल मजदूर आन्दोलन।
1919रॉलेट सत्याग्रह (मार्च-अप्रैल)।
1919जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड (13 अप्रैल)।
1921असहयोग आन्दोलन और खिलाफत आन्दोलन।
1928बारदोली में किसान आन्दोलन।
1929लाहौर अधिवेशन (दिसम्बर) में ‘पूर्ण स्वराज्य’ को काँग्रेस का लक्ष्य घोषित किया जाता है।
1930सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू; दांडी यात्रा (मार्च-अप्रैल)।
1931गाँधी-इर्विन समझौता (मार्च); दूसरा गोलमेज सम्मेलन।
1935गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया एक्ट में सीमित प्रातिनिधिक सरकार के गठन का आश्वासन।
1939काँग्रेस मंत्रिमण्डलों का त्याग-पत्र, द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ (सितम्बर)।
1942भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू (अगस्त)।
1946महात्मा गाँधी सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए नोआखाली तथा अन्य हिंसाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा करते हैं।
1947भारत को स्वतंत्रता (15 अगस्त) व विभाजन।
1948जनवरी 30, गाँधीजी का बलिदान-दिवस।

JAC Class 12 History Solutions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

Jharkhand Board JAC Class 12 History Solutions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Solutions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

Jharkhand Board Class 12 History औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य In-text Questions and Answers

पृष्ठ संख्या 323 चर्चा कीजिए

प्रश्न 1.
जनगणना के अलावा ऐसी दो विधियाँ बताइए जिनके माध्यम से आधुनिक शहरों में आँकड़े इकट्ठा करने और उनको संकलित करने का काम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बन चुका है। सांख्यिकीय आँकड़ों या शहर के नक्शों में से किसी एक का अध्ययन कीजिए। पता लगाइए कि ये आँकड़े किसने और क्यों इकट्ठा किए? इस तरह के संग्रह में कौनसे सम्भावित भेद छिपे हो सकते हैं? कौनसी जानकारियाँ थीं जिनको दर्ज नहीं किया गया? यह पता लगाइए कि वे नक्शे क्यों बनाए गए और क्या उनमें शहर के सभी भागों को समान बारीकी से चिन्हित किया गया है?
उत्तर:
(1) नगरपालिका के द्वारा किया जाने वाला गृह-सर्वेक्षण
(2) पल्स पोलियो अभियान।
शेष प्रश्नों की जानकारी विद्यार्थी शिक्षक के माध्यम से प्राप्त करें।

पृष्ठ संख्या 325

प्रश्न 2.
चित्र 12.8 तथा 12.9 को देखिए। सड़कों पर होने वाली उन गतिविधियों पर ध्यान दीजिए, जिन्हें डेनियल बन्धु चित्र में दर्शाना चाहते हैं। इन गतिविधियों से अठारहवीं सदी के आखिर में कलकत्ता की सड़कों के सामाजिक जीवन के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर:
चित्र संख्या 128 और 12.9 में डेनियल बन्धुओं ने कलकत्ता की सड़कों पर आवागमन के साधनों को दर्शाया है। चित्र संख्या 12.8 से पता चलता है कि सड़कों में सुधार हो गया था। सम्पन्न लोग पालकी और टमटम (बन्द घोड़ागाड़ी) में बैठकर चलते थे जिनके आगे -पीछे घुड़सवार चलते थे सामान ढोने के लिए बैलगाड़ी का प्रयोग होता था, आम आदमी अपने सिर पर टोकरों में सामान लेकर चलता था। लोग पैदल भी चलते थे। सड़कें पक्की बन गई थीं। चित्र में राइटर्स बिल्डिंग चित्र थीं भी दर्शायी गई है, जो एक प्रमुख प्रशासनिक केन्द्र था। संख्या 12.9 से हमें पता चलता है कि सड़कें कच्ची तथा आवागमन के लिए बग्गी, बैलगाड़ी, ऊँट आदि का प्रयोग सम्पन्न लोगों द्वारा किया जाता था तथा आम आदमी पैदल चलता था।

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पृष्ठ संख्या 334

प्रश्न 3.
रिपोटों में लिखी बातों से अक्सर रिपोर्ट लिखने वाले के विचारों का पता चलता है। उपरोक्त वक्तव्य में लिखने वाला व्यक्ति किस तरह के शहरी भू- दृश्य को बेहतर मानता है और वह किस तरह की बसावट को हेय दृष्टि से देख रहा है? क्या आप इन विचारों से सहमत हैं?
उत्तर:
उपरोक्त वक्तव्य में लिखने वाला यूरोपीय ढंग से बनने वाले व्हाइट टाउन पार्क जैसे मकानों को अच्छी दृष्टि से देख रहा है और भारतीय ढंग से बसे व बने ब्लैक टाउन के मकानों को हेय दृष्टि से देख रहा है। |यद्यपि व्यक्ति को अपने देश की इमारतों तथा भवन निर्माण की शैली से विशेष लगाव या प्यार होता है, लेकिन दूसरे | देश की शैली की भी अपनी विशेषता होती है। इसलिए उसे हेय दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। हम लिखने वाले के विचार से सहमत नहीं हैं।

पृष्ठ संख्या 337

प्रश्न 4.
वेलेजली ने सरकार की जिम्मेदारी को किस तरह परिभाषित किया है? इस भाग को पढ़िए और चर्चा कीजिए कि इन विचारों को लागू किया जाता तो उनसे शहर में रहने वाले भारतीयों पर क्या असर पड़ता ?
उत्तर:
वेलेजली ने कलकत्ता मिनट्स (1803) में लिखा था, “यह सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी है कि इस विशाल शहर में सड़कों, नालियों और जलमार्गों में एक समग्र व्यवस्था बनाकर तथा मकानों व सार्वजनिक भवनों के निर्माण व प्रसार के बारे में स्थायी नियम बनाकर और हर तरह की गड़बड़ियों को नियंत्रित करने के स्थायी नियम बनाकर यहाँ के निवासियों को स्वास्थ्य, सुरक्षा और सुविधा उपलब्ध कराए।”

यदि वेलेजली के इन विचारों को लागू किया जाता तो शहर में रहने वाले भारतीयों पर इसके अच्छे और बुरे दोनों प्रभाव पड़ते। जो सम्पन्न और धनी मानी लोग थे, उन्हें उपरोक्त सुविधाएँ उपलब्ध हो सकती थीं लेकिन जो मजदूर वर्ग के या गरीब तबके के लोग थे, उन्हें शहर के बाहर बस्तियों में रहने को मजबूर होना पड़ता। जैसा आगे चलकर लॉटरी कमेटी द्वारा बहुत सारी झोंपड़ियों को साफ करके गरीब मेहनतकशों को बाहर निकालकर कलकत्ता के बाहरी किनारे पर रहने की जगह दी गई।

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Jharkhand Board Class 12 History औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य Text Book Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
औपनिवेशिक शहरों में रिकॉर्ड्स सम्भाल कर क्यों रखे जाते थे?
उत्तर:
औपनिवेशिक शहरों में निम्नलिखित कारणों से रिकॉर्ड्स सम्भाल कर रखे जाते थे –

  • शहर की आबादी कितनी बढ़ी है या घटी है, यह जानने के लिए उसका रिकॉर्ड रखा जाता था। शहरों तथा ग्रामीण जनसंख्या का प्रतिशत जानने में भी ये रिकार्ड उपयोगी थे।
  • शहर की चारित्रिक विशेषताओं के अन्वेषण के समय उन रिकार्डों का प्रयोग सामाजिक और अन्य परिवर्तनों को जानने के लिए आवश्यक था।
  • इन रिकार्डों के द्वारा शहरों में यातायात, व्यापारिक गतिविधियाँ, सफाई, परिवहन और प्रशासनिक कार्यालयों की आवश्यकताओं को जानने, समझने और उन पर आवश्यकतानुसार कार्य करने के लिए नागरिकों की मृत्यु दर तथा बीमारियों का पता लगाने के लिए यह रिकार्ड सहायक होते थे। ये आंकड़े स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होते थे।
  • शहरों में मूलभूत सुविधाओं को उपलब्ध कराने तथा शहरों के विकास की योजनाएँ बनाने के लिए भी ये रिकार्ड उपयोगी होते थे।
  • इन आंकड़ों से कानून व्यवस्था बनाये रखने में सहायता प्राप्त होती थी।

प्रश्न 2.
औपनिवेशिक सन्दर्भ में शहरीकरण के रुझानों को समझने के लिए जनगणना सम्बन्धी आँकड़े किस हद तक उपयोगी होते हैं?
उत्तर:

  • जनगणना सम्बन्धी आँकड़े शहरीकरण की गति को दर्शाते हैं। इन आँकड़ों से हमें पता चलता है कि सन् 1800 के बाद हमारे देश में शहरीकरण की गति धीमी रही। पूरी 19वीं शताब्दी और बीसवीं सदी के प्रथम दो दशकों में शहरी आबादी का अनुपात बहुत साधारण और लगभग स्थिर रहा।
  • जनसंख्या सम्बन्धी आँकड़ों से नागरिकों के लिंग, जाति, धर्म एवं व्यवसाय आदि के बारे में जानकारी मिलती है।
  • इन आँकड़ों से नागरिकों की जन्म दर एवं मृत्यु दर के प्रतिशत के बारे में जानकारी मिलती है।
  • जनसंख्या सम्बन्धी आँकड़े विभिन्न समुदायों तथा जातियों के लोगों के रोजगार तथा व्यवसायों की जानकारी देते हैं।
  • ये आंकड़े लोगों के स्वास्थ्य के स्तर की भी जानकारी देते हैं।
  • जनसंख्या सम्बन्धी आँकड़े श्वेत व अश्वेत टाऊन के निर्माण, विस्तार एवं उनके जीवन सम्बन्धी स्तर, भयंकर बीमारियों के जनसंख्या पर पड़े दुष्प्रभाव आदि को जानने में भी उपयोगी होते हैं।

प्रश्न 3.
‘हाइट’ और ‘ब्लैक’ टाउन शब्दों का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
डाइट और ब्लैक टाउन शब्दों का महत्व- अंग्रेज लोग नस्लभेद, रंग-भेद व जातीय भेदभाव में विश्वास करते थे। हाइट टाउन गोरे लोगों की बस्ती के लिए जाना जाता था और ब्लैक टाउन भारतीय व्यापारी, कारीगर और कामगारों की बस्ती के लिए जाना जाता था। हाइट टाउन- 18वीं सदी में अंग्रेजों ने मद्रास, कलकत्ता और बम्बई में जो बस्तियों के किले बनाए उनमें किले के अन्दर रहने के लिए गोरे लोगों की बस्तियाँ बसाई गई। इन्हें उस समय के लेखन में ‘हाइट टाउन’ के नाम से उद्धृत किया जाता था। यहाँ गोरे लोगों को जीवन की सभी मूलभूत सुविधाएँ प्राप्त थीं। यहाँ चौड़ी सड़कों, बड़े बगीचों में बने बंगलों, बैरकों, परेड मैदान, चर्च, क्लब आदि की समुचित व्यवस्था थी। यहाँ सफाई और सुरक्षा की उत्तम व्यवस्था थी।

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अंग्रेजों की दृष्टि में –

  • भारतीयों की बस्ती ब्लैक टाउन कहलाती थी।
  • ब्लैक टाउन घने और बेतरतीब ढंग से बसे हुए थे।
  • ये अराजकता और हो-हल्ले के केन्द्र थे तथा गन्दगी और बीमारी के स्रोत भी थे।
  • अंग्रेजों ने यहाँ सफाई और स्वच्छता के लिए कोई ध्यान नहीं दिया।
  • ब्लैक टाउन में मन्दिर और बाजार के इर्द- गिर्द रिहायशी मकान बनाए गए थे
  • शहर के बीच से गुजरने वाली आड़ी-टेढ़ी संकरी गलियों में अलग-अलग जातियों के मोहल्ले थे। चिन्ताद्रीपेठ इलाका केवल बुनकरों के लिए था। वाशरमेनपेट में रंगसाज तथा धोबी रहते थे।

प्रश्न 4.
प्रमुख भारतीय व्यापारियों ने औपनिवेशिक शहरों में खुद को किस तरह स्थापित किया?
उत्तर:
प्रमुख भारतीय व्यापारियों ने औपनिवेशिक शहरों अर्थात् कलकत्ता, मद्रास और बम्बई में खुद को निम्न प्रकार स्थापित किया –
(1) मद्रास में दुबाश लोग एजेन्ट और व्यापारी के रूप में काम करते थे और भारतीय समाज तथा अंग्रेजों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे।

(2) 18वीं शताब्दी तक मद्रास, बम्बई और कलकत्ता महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह बन चुके थे। यूरोपीय व्यापारियों के साथ लेन-देन चलाने वाले भारतीय व्यापारी, कारीगर अलग बस्तियों में रहते थे। रेलवे के विकास के साथ शहरों का भी विकास हुआ। 1850 के दशक के बाद भारतीय व्यापारियों ने भी बम्बई में सूती कपड़ा मिलें स्थापित कीं।

(3) भारतीय व्यापारी कम्पनी के व्यापार में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे बम्बई के रहने वाले व्यापारी चीन को जाने वाली अफीम के व्यापार में हिस्सेदार थे। उन्होंने बम्बई की अर्थव्यवस्था को मालवा, सिंध और राजस्थान जैसे अफीम उत्पादक इलाकों से जोड़ने में सहायता दी। कम्पनी के साथ गठजोड़, एक मुनाफे का सौदा था, जिससे आगे चलकर पूँजीपति वर्ग का जन्म हुआ। भारतीय व्यापारियों में सभी समुदाय – पारसी, मारवाड़ी, यहूदी, कोंकणी, मुसलमान, गुजराती बनिए, बोहरा आदि शामिल थे। 1869 में स्वेज नहर को व्यापार के लिए खोले जाने से बम्बई के व्यापारिक सम्बन्ध विश्व अर्थव्यवस्था के साथ और मजबूत हुए। उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक बम्बई में भारतीय व्यापारी काटन मिल जैसे नए उद्योगों में अपना धन लगा रहे थे।

प्रश्न 5.
औपनिवेशिक मद्रास में शहरी और ग्रामीण तत्व किस हद तक घुल-मिल गए थे?
अथवा
औपनिवेशिक काल में मद्रास के क्रमिक शहरीकरण का वर्णन कीजिये।
अथवा
अंग्रेजों ने मद्रास का शहरीकरण किस प्रकार किया?
उत्तर:
(1) आसपास के गाँवों से लोग आकर मद्रास में रहने लगे थे। ग्रामीण तथा शहरी लोग मुख्यतः मद्रास के ‘ब्लैक टाउन’ में रहते थे। ब्लैक टाउन में परम्परागत भारतीय ढंग के मन्दिर, रिहायशी मकान, आड़ी-टेढ़ी सँकरी गलियाँ और अलग-अलग जातियों के मोहल्ले थे।

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(2) मद्रास में विविध प्रकार के व्यवसाय करने वाले लोग रहते थे। स्थानीय ग्रामीण जाति के बेल्लालार लोग ब्रिटिश कम्पनी के अधीन नौकरियाँ करते थे। पेरियार और वन्नियार गरीब कामगार वर्ग के तमिल लोग थे।

(3) यूरोपवासी भी धीरे-धीरे किले से बाहर जाने लगे। उन्होंने गार्डेन हाउसेज बनाये। इसी दौरान सम्पन्न भारतीय भी अंग्रेजों की भाँति रहने लगे। परिणामस्वरूप मद्रास के आस-पास स्थित गाँवों की जगह अनेक नये उपनगर बस गए। गरीब लोग निकट पड़ने वाले गाँवों में बस गए। इस प्रकार मद्रास के बढ़ते शहरीकरण के परिणामस्वरूप इन गाँवों के बीच वाले इलाके शहर के भीतर आ गए। इस प्रकार मद्रास में शहरी और ग्रामीण तत्त्व काफी हद तक घुल-मिल गए।

निम्नलिखित पर एक लघु निबन्ध लिखिए ( लगभग 250 से 300 शब्दों में ) –

प्रश्न 6.
अठारहवीं सदी में शहरी केन्द्रों का रूपान्तरण किस तरह हुआ?
अथवा
18वीं शताब्दी के मध्य में नगरों का रूप परिवर्तन क्यों और कैसे हुआ?
उत्तर:
18वीं सदी में शहरी केन्द्रों का रूपान्तरण 16वीं और 17वीं सदी में आगरा, दिल्ली और लाहौर मुगलकालीन प्रशासन और सत्ता के महत्त्वपूर्ण केन्द्र थे तथा मदुरई और कांचीपुरम दक्षिण भारत के प्रमुख धार्मिक और व्यापारिक केन्द्र थे। लेकिन 18वीं सदी में इन शहरी केन्द्रों का रूपान्तरण होने लगा। इन शहरी केन्द्रों का रूपान्तरण निम्न प्रकार हुआ—
(1) राजनीतिक पुनर्गठन के कारण नये शहरी केन्द्रों का विकास – राजनीतिक पुनर्गठन के कारण नये शहरी केन्द्रों का विकास हुआ। यथा –

  • मुगल राजधानियों का पतन – मुगल सत्ता के पतन के कारण ही उसके शासन से सम्बद्ध नगरों का अवसान हो गया। मुगल राजधानियों, दिल्ली और आगरा ने अपना राजनीतिक प्रभुत्व खो दिया।
  • क्षेत्रीय राजधानियों का विकास-नयी क्षेत्रीय ताकतों का विकास क्षेत्रीय राजधानियों – लखनऊ, हैदराबाद, सेरिंगपद्म पूना (पुणे), नागपुर, बड़ौदा और तंजौर (तंजावुर ) के बढ़ते महत्त्व में परिलक्षित हुआ। व्यापारी, प्रशासक, शिल्पकार तथा अन्य लोग पुराने मुगल केन्द्रों से इन नयी राजधानियों की ओर काम तथा संरक्षण की तलाश में आए। नये राज्यों के बीच निरन्तर लड़ाइयों का परिणाम यह था कि भाड़े के सैनिकों को भी यहाँ तैयार रोजगार मिलता था।
  • कस्बे और गंज जैसी नयी शहरी बस्तियों का विकास – कुछ स्थानीय विशिष्ट लोगों तथा उत्तर भारत में मुगल साम्राज्य से सम्बद्ध अधिकारियों ने भी इस अवसर का उपयोग ‘कस्बे’ और ‘गंज’ जैसी नयी शहरी बस्तियों को बसाने में किया।

(2) व्यापारिक पुनर्गठन के कारण नये शहरी केन्द्रों का विकास – व्यापार तन्त्रों में परिवर्तन शहरी केन्द्रों के रूपान्तरण में परिलक्षित हुए।

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यथा –
यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों की व्यापारिक गतिविधियों में विस्तार यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों ने पहले, मुगलकाल में ही विभिन्न स्थानों पर अपने व्यापारिक केन्द्र स्थापित कर लिये थे। जैसे – पुर्तगालियों ने 1510 में पणजी में, डचों ने 1605 में मछलीपट्नम में अंग्रेजों ने मद्रास में 1639 में तथा फ्रांसीसियों ने 1673 में पांडिचेरी में व्यापारिक गतिविधियों में विस्तार के साथ ही इन व्यापारिक केन्द्रों के आसपास नगर विकसित होने लगे।

(3) ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के राजनीतिक नियंत्रण के स्थापित होने के बाद विकसित आर्थिक राजधानियाँ- मध्य 18वीं सदी से परिवर्तन का एक नया चरण प्रारम्भ हुआ। जब व्यापारिक गतिविधियाँ अन्य स्थानों पर केन्द्रित होने लगीं तो 17वीं सदी में विकसित हुए सूरत, मछलीपट्नम तथा ढाका पतनोन्मुख हो गये 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद जैसे-जैसे अंग्रेजों ने राजनीतिक नियंत्रण हासिल किया और ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का व्यापार फैला तो मद्रास, कलकत्ता तथा बम्बई जैसे औपनिवेशिक बन्दरगाह शहर तेजी से नयी आर्थिक राजधानियों के रूप में उभरे इन तीनों शहरी केन्द्रों का विकास इस प्रकार हुआ –

  • ये शहर औपनिवेशिक प्रशासन और सत्ता के केन्द्र बन गये थे।
  • यहाँ नए भवनों और संस्थानों का विकास हुआ।
  • यहाँ शहरी स्थानों को नए तरीकों से व्यवस्थित किया गया।
  • यहाँ नए रोजगार विकसित हुए और लोग इन औपनिवेशिक शहरों की ओर उमड़ने लगे। लगभग सन् 1800 तक ये जनसंख्या की दृष्टि से भारत के विशालतम शहर बन गये थे।

प्रश्न 7.
औपनिवेशिक शहर में सामने आने वाले नए तरह के सार्वजनिक स्थान कौन से थे? उनके क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
औपनिवेशिक शहरों में सामने आने वाले नए सार्वजनिक स्थान और उनके उद्देश्य निम्नलिखित थे –
(i) गोदियों और घाटियों का विकास -18वीं सदी तक मद्रास, बम्बई तथा कलकत्ता महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह बन चुके थे। यहाँ अनेक कारखाने तथा व्यापारिक केन्द्र स्थापित हुए नदी या समुद्र के किनारे आर्थिक गतिविधियों से गोदियों वा घाटियों का विकास हुआ।

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(ii) गोदामों, बीमा एजेंसियों आदि की स्थापना- समुद्र किनारे गोदामों, वाणिज्यिक कार्यालयों, जहाजरानी उद्योग के लिए बीमा एजेंसियों, यातायात डिपो और बैंकिंग संस्थानों की स्थापना हुई।

(iii) प्रशासनिक कार्यालय- कम्पनी के मुख्य प्रशासकीय कार्यालय समुद्र तट से दूर बनाये गये। कलकत्ता में स्थित ‘राइटर्स बिल्डिंग’ इसी तरह का एक दफ्तर हुआ करती थी। यह ब्रिटिश शासन में नौकरशाही के बढ़ते प्रभाव का संकेत था। यहाँ ‘राइटर्स’ से तात्पर्य क्लर्कों से था।

(iv) यूरोपीय शैली के मकान – किले की चारदीवारी के आसपास यूरोपीय व्यापारियों और एजेण्टों ने यूरोपीय शैली के महलनुमा मकान बना लिए थे। कुछ लोगों ने शहर की सीमा से सटे उपशहरी इलाकों में बगीचाघर बना लिए थे। शासक वर्ग के लिए शहरों में क्लब, रेसकोर्स और रंगमंच भी बनाए गए।

(v) ह्वाइट और ब्लैक टाउन- 19वीं शताब्दी के मध्य में औपनिवेशिक शहरों को दो भागों में बाँट दिया गया, जिनको क्रमश: सिविल लाइन्स या हाइट टाउन, जिसमें सफेद रंग वाले गोरे यूरोपीय रहते थे तथा दूसरा ब्लैक टाउन, जिसमें देसी भारतीय लोग रहते थे, कहा गया। ह्वाइट टाउन व सिविल लाइन्स में यूरोपीय शैली के महलनुमा मकान, बगीचा घर, क्लब, रेसकोर्स और रंगमंच, सड़कें, बंगले, परेड मैदान, चर्च आदि थे जो शासक वर्ग के लिए नस्ली विभेद पर आधारित थे।

(vi) भूमिगत पाइपलाइन तथा नालियों की व्यवस्था – साफ-सफाई का ध्यान रखने के लिए भूमिगत पाइपलाइन तथा ढकी हुई नालियों की व्यवस्था की गई।

(vii) हिल स्टेशन – गर्म जलवायु के प्रभाव को कम करने के लिए तथा अंग्रेज सैनिकों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अंग्रेजों ने शिमला, माउन्ट आबू तथा दार्जिलिंग में हिल स्टेशन स्थापित किए।

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(viii) मिलने-जुलने के स्थान, शिक्षा संस्थान व अन्य सार्वजनिक स्थल-यहाँ यूरोपीय शैली की इमारतों, विला, काटेज, एंग्लिकन चर्च तथा शैक्षणिक संस्थाओं का निर्माण किया गया। टाउन हाल सार्वजनिक पार्क, रंगशालाएँ तथा सिनेमा हाल जैसे मिलने-जुलने के स्थान बनाए गए। शिक्षा से जुड़ी संस्थाओं, जैसे – स्कूल, कॉलेज, लाइब्रेरी उपलब्ध थे। सार्वजनिक सेवा केन्द्र या सामुदायिक भवन भी थे, जहाँ लोगों को समाचार पत्र तथा पत्रिकाएँ मिल सकती थीं।

(ix) रेलवे का नेटवर्क-1853 में भारत में रेलवे की शुरुआत हुई। रेलवे के फैलते नेटवर्क ने औपनिवेशिक शहरों को शेष भारत से जोड़ दिया।

प्रश्न 8.
उन्नीसवीं सदी में नगर नियोजन को प्रभावित करने वाली चिन्ताएँ कौनसी थीं?
उत्तर:
उन्नीसवीं सदी में औपनिवेशिक शहरों में नगर नियोजन का कार्य प्रारम्भ करते समय चिन्ताएँ निम्नलिखितं थीं –
(i) बढ़ती आबादी लोग गाँवों से शहरों की ओर उमड़ रहे थे। ऐसे में बढ़ती हुई आबादी को बसाने की चिन्ता थी, जिससे सभी को आवास उपलब्ध हो सके।

(ii) नगर नियोजन व सफाई व्यवस्था – शहरों को उचित प्रकार से बसाने के लिए योजना व नक्शे बनाना तथा नियमित साफ-सफाई की व्यवस्था करना, जिससे बीमारियों को फैलने से रोका जा सके, यह भी चिन्ता का विषय था । गन्दे तालाबों, सड़ांध और निकासी की शोचनीय अवस्था से अंग्रेज शासक परेशान थे। उनका मानना था कि दलदली जमीन और ठहरे हुए पानी के तालाबों से जहरीली गैसें निकलती हैं जिनसे बीमारियाँ फैलती हैं। अतः शहरों में खुले स्थान छोड़े जाने पर बल दिया गया।

(iii) रंग व जातिभेद – रंगभेद व जातिभेद को आधार बनाकर शहरों का विभाजन करना तथा उनमें सार्वजनिक सुविधाओं का प्रबन्ध करना अंग्रेज अधिकारियों के लिए चिन्ता का विषय था। अंग्रेज भारतीयों को हीन मानते थे और उनके साथ उठने-बैठने में अपना अपमान समझते थे।

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(iv) सुरक्षा प्रबन्ध – 1857 के विद्रोह से सबक लेकर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा का विशेष प्रबन्ध करना भी अंग्रेजों के लिए चिन्ता का कारण था, जिसमें उनके सम्मान की रक्षा, यूरोपीय सम्पत्ति की रक्षा तथा इमारतों और साजो-सामान की रक्षा करना भी शामिल था। इसलिए अंग्रेजों के लिए अधिक सुरक्षित व पृथक् बस्तियों की व्यवस्था की गई और ‘सिविल लाइन्स’ के नाम से नये शहरी क्षेत्र विकसित किए गए।

(v) चालों का निर्माण – शहरों की फैक्ट्रियों तथा अन्य काम-धन्धों में लगे हुए लोग विभिन्न राज्यों से आए थे, उनको निवास उपलब्ध कराने की भी चिन्ता थी। इसके लिए बहुमंजिली इमारतें तथा चालों का निर्माण किया गया।

(vi) स्थापत्य शैलियों की भिन्नता – शहरों में भवन और इमारतों का निर्माण किस शैली के आधार पर किया जाए, यह भी चिन्ता का विषय था अंग्रेजों ने अपनी आवश्यकताओं और रुचियों की पूर्ति के लिए स्थापत्य में अनेक यूरोपीय शैलियों का उपयोग किया। बम्बई में बम्बई सचिवालय, बम्बई विश्वविद्यालय और उच्च न्यायालय, विक्टोरिया टर्मिनस आदि इमारतें नव-गॉथिक शैली में बनाई गई।

(vii) धन सम्बन्धी समस्या- अंग्रेजी सरकार शहरों के सुनियोजित विकास के लिए धन की व्यवस्था करना नागरिकों की जिम्मेदारी मानती थी। अतः कलकत्ता में नगर सुधार के लिए पैसे की व्यवस्था जनता के बीच लॉटरी बेचकर की जाती थी। इस प्रकार कलकत्ता में नगर नियोजन का काम लॉटरी कमेटी करती थी। लॉटरी कमेटी ने भारतीय बस्तियों में सड़क- निर्माण और नदी किनारे से अवैध कब्जों को हटवाया।

(viii) यातायात के साधन उपलब्ध करवाना – समस्त लोगों को कारखानों या कार्यालयों में जाने के लिए यातायात के साधनों को उपलब्ध करवाना भी एक प्रमुख समस्या थी।

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(ix) महामारी की समस्या- अंग्रेज महामारी की आशंका से भी चिन्तित थे। शहरों में हैजा व प्लेग की बीमारियों से लोग पीड़ित रहते थे।

(x) अग्निकांड की घटनाएँ शहरों में होने वाली अग्निकांड की घटनाओं से भी अंग्रेज चिन्तित थे। इसी आशंका के कारण 1836 में कलकत्ता में पास-फूंस की झोंपड़ियों को अवैध घोषित कर दिया गया। इसके अतिरिक्त मकानों में ईंटों की छत अनिवार्य कर दी गई।

प्रश्न 9.
नए शहरों में सामाजिक सम्बन्ध किस हद तक बदल गए थे?
अथवा
नये औपनिवेशिक नगरों में सामाजिक सम्बन्धों का स्वरूप किस सीमा तक परिवर्तित हो गया था? चर्चा कीजिये ।
उत्तर:
नए अनुभव – साधारण भारतीय आबादी के लिए ये नए शहर आश्चर्यचकित कर देने वाले अनुभव थे, जहाँ पर जिन्दगी हमेशा दौड़ती भागती सी दिखाई पड़ती थी। वहाँ पर एक ओर चरम सम्पन्नता दिखाई देती थी तो दूसरी ओर गहन गरीबी के भी दर्शन होते थे। यातायात के नए साधन आने से सम्पन्न लोग उपनगरों में भी रहने लगे थे।
नये शहरों में सामाजिक सम्बन्धों में आए परिवर्तन

नये शहरों में सामाजिक सम्बन्ध निम्न प्रकार बदल गये थे –
(1) यातायात के नये साधनों का विकास – घोड़ा गाड़ी जैसे नये यातायात के साधन और बाद में ट्रामों तथा बसों के आगमन के परिणामस्वरूप लोग शहर के केन्द्र से दूर जाकर भी बस सकते थे। समय के साथ काम की जगह और रहने की जगह दोनों एक-दूसरे से अलग होते गए। घर से कार्यालय या फैक्ट्री जाना एक नये प्रकार का अनुभव बन गया।

(2) सार्वजनिक मेल-मिलाप के स्थलों में परिवर्तन यद्यपि अब पुराने शहरों में पहले जैसा सामंजस्य नहीं दिखाई पड़ता था, लेकिन फिर भी लोगों का मेल- मिलाप सार्वजनिक पार्कों, टाउन हॉलों, सिनेमाघरों और रंगशालाओं के माध्यम से हो जाता था।

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(3) नये सामाजिक समूहों का निर्माण शहरों में अब नए सामाजिक समूह बनने लगे और पुरानी पहचान अब गौण होने लगी। एक मध्यम वर्ग का शहरों में उदय होने लगा, जिनमें डॉक्टर, शिक्षक, वकील, एकाउन्टेन्ट्स, इंजीनियर क्लर्क आदि आते थे। पढ़े-लिखे होने के कारण ये लोग पत्र पत्रिकाओं, समाचार पत्रों और सार्वजनिक सभाओं में अपने विचार प्रकट कर सकते थे। सामाजिक रीति-रिवाज, कायदे-कानून और तौर-तरीकों पर सवाल उठने लगे थे।

(4) सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की बढ़ती उपस्थिति – शहरों में स्त्रियों के लिए नए अवसर मौजूद थे। समाचार-पत्रों, पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों के द्वारा मध्यम वर्ग की नारियाँ स्वयं को अभिव्यक्त करने की कोशिश कर रही थीं परन्तु महिला शिक्षा के समर्थक चाहते थे कि स्त्रियाँ घर की चारदीवारी के भीतर ही रहें। समय बीतने के साथ सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की उपस्थिति बढ़ने लगी। कालान्तर में महिलाएँ भी नौकरानी, फैक्ट्री मजदूर, शिक्षिका और रंगकर्मी के रूप में दिखाई पड़ने लगीं। लेकिन ऐसी महिलाओं को लम्बे समय तक सामाजिक रूप से सम्मानित नहीं माना जाता था, जो घर से निकलकर सार्वजनिक स्थानों पर जा रही थीं।

(5) मेहनतकशों का नया वर्ग उभरना तथा नई शहरी संस्कृति-शहरों में मेहनतकश गरीबों या कामगारों का एक नया वर्ग उभर रहा था। ज्यादातर पुरुष अपना परिवार गाँव में छोड़कर आते थे। शहरी जिन्दगी संघर्षपूर्ण तथा नौकरी पक्की नहीं थी, खाना महँगा था, रिहायश का खर्चा भी उठाना मुश्किल था। फिर भी गरीब मजदूरों ने वहाँ प्रायः अपनी एक शहरी संस्कृति रच ली थी। वे धार्मिक त्यौहारों, तमाशों (लोक रंगमंच) और स्वांग आदि में पूरे उत्साह से भाग लेते थे, जिनमें ज्यादातर भारतीय और यूरोपीय स्वामियों का मजाक उड़ाया जाता था।

(6) औपनिवेशिक शहरों में दोहरी व्यवस्था – बम्बई, कलकत्ता, मद्रास में निवास हेतु दोहरी व्यवस्था अपनाई गई। यूरोपीय लोगों के लिए सिविल लाइन्स (डाइट टाउन) बसाये गये तथा भारतीय व शेष एशियाई लोगों के लिए ब्लैक टाउन बसाए गए हाइट टाउन में भवन यूरोपीय शैली के आधार पर बनाए गए और वहाँ पर स्वच्छता, सफाई सड़कों आदि की अच्छी व्यवस्था थी, जबकि ब्लैक टाउन में परम्परागत भारतीय शैली के मकान थे तथा साफ-सफाई की व्यवस्था नगण्य थी।

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औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य JAC Class 12 History Notes

→ औपनिवेशिक भारत में शहरीकरण – औपनिवेशिक भारत में शहरीकरण की प्रक्रिया के अन्तर्गत शहरों और | कस्बों में आए उन परिवर्तनों को सम्मिलित किया जाता है, जो यूरोपीय कम्पनियों अथवा शासकों के पैर भारत में जम जाने के कारण आए। इनमें औपनिवेशिक शहरों की मुख्य विशेषताओं तथा उनमें होने वाले सामाजिक बदलाव को भी शामिल किया जाता है। इसी सन्दर्भ में हम तीन बड़े शहरों मद्रास (चेन्नई), कलकत्ता (कोलकाता) और बम्बई (मुम्बई) के विकास के बारे में पढ़ेंगे।

→ पृष्ठभूमि तीनों शहर मुख्य रूप से मछली पकड़ने तथा बुनाई के गाँव थे, जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी की व्यापारिक गतिविधियों के कारण व्यापार के महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन गए। कम्पनी के एजेन्ट 1639 में मद्रास तथा 1690 में कलकत्ता में बस गए। 1661 में बम्बई को भी ब्रिटेन के राजा ने कम्पनी को दे दिया। कम्पनी ने इन तीनों ही शहरों में अपने व्यापारिक तथा प्रशासनिक कार्यालय स्थापित किए।

→ पूर्व औपनिवेशिक काल में कस्बे और शहर –
(क) कस्बे कस्बे मुख्यतः विशेष प्रकार की आर्थिक गतिविधियों और संस्कृतियों के प्रतिनिधि बनकर उभरे। कस्बों में व्यापारी, शिल्पकार, प्रशासक और शासक रहते थे। कस्बों का ग्रामीण जनता पर प्रभाव रहता था और वे खेती से प्राप्त करों तथा अधिशेष के आधार पर फलते-फूलते थे। ज्यादातर कस्बों और शहरों की किलेबन्दी की जाती थी, जो ग्रामीण क्षेत्र से इनकी पृथकता को दिखाती थी फिर भी कस्बों और गाँवों की पृथकता अनिश्चित होती थी।

(ख) मुगलों द्वारा बनाए गए शहर –
16वीं तथा 17वीं शताब्दियों में मुगलों द्वारा बनाए गए शहर-आगरा, दिल्ली और लाहौर – जनसंख्या के केन्द्रीकरण, अपने विशाल भवनों तथा शाही शोभा और समृद्धि के लिए प्रसिद्ध थे मनसबदार जागीरदार और कुलीन वर्ग की उपस्थिति के कारण यहाँ अच्छे शिल्पकार, बाजार तथा राजकोष स्थित थे। सम्राट एक किलेबन्द महल में रहता था और नगर एक दीवार से घिरा होता था तथा द्वारों से आने-जाने पर नियंत्रण रखा जाता था। नगरों के भीतर उद्यान, मस्जिदें, मन्दिर, महाविद्यालय, बाजार, सराय, मकबरे आदि स्थित होते थे। नगर का केन्द्र महल और मुख्य मस्जिद होते थे। दक्षिण भारत के नगरों – मदुरई, कांचीपुरम- मुख्य केन्द्र मन्दिर होता था। कोतवाल नगर में आन्तरिक मामलों पर नजर रखता था और कानून व्यवस्था को मैं बनाए रखता था।

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(ग) अठारहवीं शताब्दी में परिवर्तन –
(1) राजनीतिक और व्यापारिक पुनर्गठन के साथ पुराने नगरों का पतन हुआ और नए नगरों का विकास होने लगा। मुगल राजधानियों दिल्ली और आगरा ने अपना राजनीतिक प्रभुत्व खो दिया। नई क्षेत्रीय ताकतों का विकास क्षेत्रीय राजधानियों, लखनऊ, हैदराबाद, सेरिंगपट्म, पूना (पुणे), नागपुर, बड़ौदा तथा तंजौर (तंजावुर) के बढ़ते महत्त्व में दिखाई पड़ने लगा। (2) व्यापारी, प्रशासक, शिल्पकार तथा अन्य लोग इन नई राजधानियों में आने लगे।
(3) भाड़े के सैनिक भी यहाँ रोजगार हेतु आए तथा कुछ स्थानीय तथा विशिष्ट लोगों ने इस काल में ‘कस्बे’ और ‘गंज’ जैसी नई शहरी बस्तियों का विकास किया।
(4) यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों ने मुगलकाल में ही विभिन्न स्थानों पर अपने आधार स्थापित कर लिए थे।
(5) 1757 ई. में प्लासी के युद्ध के बाद जैसे-जैसे अंग्रेजों ने राजनीतिक नियंत्रण हासिल किया और इंग्लिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का व्यापार फैला, मद्रास, कलकत्ता और बम्बई जैसे औपनिवेशिक बन्दरगाह तेजी से नयी आर्थिक राजधानियों के रूप में उभरे तथा औपनिवेशिक प्रशासन और सत्ता के केन्द्र बन गए।

→ औपनिवेशिक शहरों की पड़ताल
(क) रिकार्ड्स और शहरी इतिहास – औपनिवेशिक शासन बेहिसाब आँकड़ों और जानकारियों के संग्रह पर आधारित था। बढ़ते हुए शहरों में जीवन की गति और दिशा पर नजर रखने के लिए वे नियमित रूप से सर्वेक्षण कराते थे। सांख्यिकीय आँकड़े एकत्र करते थे तथा विभिन्न प्रकार की सरकारी रिपोर्ट प्रकाशित करते थे।

यथा –
(i) मानचित्र पर जोर शुरुआत के वर्षों में औपनिवेशिक सरकार ने मानचित्र बनाने पर विशेष जोर दिया। सरकार का मानना था कि किसी स्थान की बनावट और भू-दृश्यों को समझने के लिए नक्शे जरूरी होते हैं। इस जानकारी के आधार पर वे इलाके पर ज्यादा बेहतर नियंत्रण स्थापित कर सकते थे जब शहरों का विकास होने लगा तो उनके विकास और व्यवसाय को विकसित करने के लिए नक्शे बनाए जाने लगे।

(ii) कर वसूली उन्नीसवीं शताब्दी के आखिर से अंग्रेजों ने वार्षिक नगरपालिका कर के माध्यम से शहरों के रख-रखाव के वास्ते पैसा एकत्र करना शुरू कर दिया। नगर निगम जैसे संस्थानों का उद्देश्य शहरों में जलापूर्ति, निकासी सड़क निर्माण और स्वास्थ्य व्यवस्था जैसी अत्यावश्यक सेवाएँ उपलब्ध कराना था।

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(iii) नियमित गिनती शहरों के फैलाव पर नजर रखने के लिए नियमित रूप से लोगों की गिनती की जाती थी। उन्नीसवीं सदी के मध्य तक विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर जनगणना शुरू की जा चुकी थी। अखिल भारतीय जनगणना का प्रथम प्रयास 1872 में किया गया। इसके बाद, 1881 से दशकीय (हर दस साल में होने वाली) जनगणना एक नियमित व्यवस्था बन गई। जनगणनाओं का सावधानीपूर्वक अध्ययन करने से कुछ दिलचस्प रुझान सामने आते हैं। सन् 1800 के बाद हमारे देश में शहरीकरण की गति धीमी रही। पूरी उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी के पहले दो दशकों में देश की जनसंख्या में कुल जनसंख्या में शहरी जनसंख्या का हिस्सा बहुत मामूली और स्थिर रहा। 1900 से 1940 के बीच 40 सालों के मध्य शहरी आबादी 10 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 13 प्रतिशत हो गई थी।

(ख) वस्त्र संग्रह डिपो औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के केन्द्र होने के कारण ये शहर भारतीय सूती कपड़े जैसे निर्यात उत्पादों के लिए संग्रह डिपो थे मगर इंग्लैण्ड में होने वाली औद्योगिक क्रान्ति के बाद इस प्रवाह की दिशा बदल गई और इन शहरों में ब्रिटेन के कारखानों में बनी चीजें उतरने लगीं। भारत से तैयार माल की जगह कच्चे माल का निर्यात होने लगा।

(ग) रेलवे का विकास सन् 1853 में रेलवे की शुरुआत हुई। इसने शहरों की काया पलट दी। आर्थिक गतिविधियों का केन्द्र परम्परागत शहरों से दूर जाने लगा क्योंकि ये शहर पुराने मार्गों और नदियों के समीप थे। हरेक रेलवे स्टेशन कच्चे माल का संग्रह केन्द्र और आयातित वस्तुओं का वितरण बिन्दु बन गया था।

→ नये शहरों का स्वरूप नये शहरों का स्वरूप इस प्रकार था –

→ बन्दरगाह, किले और सेवाओं के केन्द्र तथा हाइट टाउन और ब्लैक टाउन का निर्माण अठारहवीं सदी तक मद्रास, कलकत्ता और बम्बई महत्वपूर्ण बन्दरगाह बन चुके थे अंग्रेजों ने अपने कारखानों की सुरक्षा हेतु इन बस्तियों में किलेबन्दी की मद्रास में फोर्ट सेंट जार्ज, कलकत्ता में फोर्ट विलियम और बम्बई में फोर्ट, ये इलाके ब्रिटिश आबादी के रूप में जाने जाते थे। यूरोपीय व्यापारियों के साथ लेन-देन चलाने वाले भारतीय व्यापारी, कारीगर और कामगार इन किलों के बाहर बस्तियों में रहते थे। यूरोपीय और भारतीयों के लिए शुरू से ही अलग क्वार्टर बनाए जाते थे उस समय के लेखन में इन्हें ‘हाइट टाउन’ (गोरा शहर) और ‘ब्लैक टाउन’ (काला शहर) कहा जाता था। राजनीतिक सत्ता अंग्रेजों के हाथ में आने के बाद यह नस्ली भेदभाव और बढ़ गया था।

JAC Class 12 History Solutions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

→ एक नया शहरी परिवेश – नये शहरों का शहरी परिवेश भी नया था।

यथा –
(i) शासकों की वाणिज्यिक संस्कृति के दिग्दर्शक- औपनिवेशिक शहर नए शासकों की वाणिज्यिक संस्कृति को प्रकट करते थे। राजनीतिक सत्ता और संरक्षण भारतीय शासकों के हाथों से निकल कर अंग्रेजों के हाथों में जाने लगा। दुभाषिए, बिचौलिए, व्यापारियों और माल की आपूर्ति करने वाले भारतीयों का भी इन नए शहरों में एक महत्त्वपूर्ण स्थान था। नदी या समुद्र के किनारे आर्थिक गतिविधियों से गोदियों और घाटों का विकास हुआ। समुद्र के किनारे गोदाम, वाणिज्यिक कार्यालय, जहाजरानी उद्योग के लिए बीमा कम्पनियाँ यातायात डिपो और बैंकिंग संस्थानों की स्थापना होने लगी। कम्पनी के मुख्य प्रशासकीय कार्यालय समुद्र से दूर बनाए गए। कलकत्ता में स्थित ‘राइटर्स बिल्डिंग’ इसी तरह का एक दफ्तर हुआ करती थी। ‘राइटर्स’ से तात्पर्य यहाँ क्लकों से था।

(ii) सिविल लाइन्स नाम से नये शहरी इलाकों का विकास-उन्नीसवीं सदी के मध्य इन शहरों का रूप और भी बदल गया। 1857 के विद्रोह के बाद भारत में अंग्रेजों का रवैया विद्रोह की लगातार आशंका से तय होने लगा था। उनको लगता था कि शहरों की और अच्छी प्रकार हिफाजत करना जरूरी है और अंग्रेजों को देशियों के खतरे से दूर सुरक्षित स्थान पर रहना चाहिए। पुराने कस्बों के पास चरागाहों और खेतों को साफ करके ‘सिविल लाइन्स’ नाम से नए शहरी इलाके विकसित किए गए।

(iii) छावनियाँ छावनियों को भी सुरक्षित स्थानों के रूप में विकसित किया गया। यहाँ यूरोपीय कमान के अन्तर्गत भारतीय सैनिक तैनात किये जाते थे ये छावनियाँ यूरोपीय लोगों के लिए सुरक्षित आश्रय स्थल थीं।

(iv) हिल स्टेशन छावनियों की तरह हिल स्टेशन भी औपनिवेशिक शहरी विकास का एक खास पहलू था।

यथा –
(अ) शिमला – हिल स्टेशनों की स्थापना का उद्देश्य सर्वप्रथम ब्रिटिश सेना की जरूरतों से सम्बन्धित था। शिमला की स्थापना गुरखा युद्ध ( 1815 1816) के दौरान की गई थी।
(ब) माउन्ट आबू – अंग्रेज-मराठा युद्ध 1818 के कारण अंग्रेजों की दिलचस्पी माउन्ट आबू में बनी जबकि दार्जिलिंग को 1835 में सिक्किम के राजाओं से छीना गया था। ये हिल स्टेशन फौजियों के ठहरने, सरहद की चौकसी करने और दुश्मन के खिलाफ हमला करने के लिए महत्त्वपूर्ण स्थान थे।

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→ नए शहरों में सामाजिक जीवन – नये शहरों में चरम सम्पन्नता और गहन गरीबी दोनों के दर्शन एक साथ होते थे। इनमें सामाजिक जीवन इस प्रकार का था –

(i) बढ़ते यातायात के साधनों से निवास स्थल और कार्यस्थल की दूरी बढ़ी घोड़ागाड़ी जैसे यातायात के नए साधन और बाद में बसों और ट्रामों के आने से यह हुआ कि अब लोग शहर के केन्द्र से दूर जाकर भी बस सकते थे। समय के साथ काम की जगह और रहने की जगह दोनों एक-दूसरे से अलग होते गए। घर से फैक्ट्री या दफ्तर जाना एक नए प्रकार का अनुभव था।

(ii) औरतों की सार्वजनिक उपस्थिति में बढ़ोतरी – शहरों में औरतों के लिए नए अवसर थे। पत्र-पत्रिकाओं, आत्मकथाओं और पुस्तकों के द्वारा मध्यम वर्ग की औरतें खुद को अभिव्यक्त करने का प्रयास कर रही थीं। सार्वजनिक स्थानों पर औरतों की उपस्थिति बढ़ रही थी।

(ii) कामगारों के एक नए वर्ग का उदय शहरों में मेहनतकश गरीबों या कामगारों का एक नया वर्ग उभर रहा था। ग्रामीण इलाकों से गरीब रोजगार की उम्मीद में शहरों की तरफ भाग रहे थे। कुछ लोगों को शहर नए अवसरों के स्रोत के रूप में दिखाई पड़ रहे थे कुछ को एक भिन्न जीवन शैली शहरों की तरफ खींच रही थी। ज्यादातर पुरुष प्रवासी अपना परिवार गाँव में छोड़कर आते थे।

→ पृथक्करण, नगर-नियोजन और भवन निर्माण मद्रास, कलकत्ता और बम्बई तीनों औपनिवेशिक शहर पहले के भारतीय कस्बों और शहरों से अलग थे।

यथा –
→ मद्रास में बसावट और पृथक्करण
(i) वस्त्र उत्पादों की खोज में 1639 ई. में अंग्रेज व्यापारियों ने मद्रासपद्म में अपनी व्यापारिक कोठी स्थापित की। यह बस्ती स्थानीय लोगों द्वारा ‘चेनापट्टनम’ कही जाती थी।

(ii) सफेद कस्बा में फ्रांसीसियों की हार के फ्रेंच कम्पनी के साथ प्रतिद्वन्द्विता के कारण अंग्रेजों को यहाँ किलेबन्दी करनी पड़ी। 1761 बाद मद्रास स्थित फोर्ट सेंट जार्ज हाइट टाउन का केन्द्रक बन गया था, जिसमें अधिकतर यूरोपीय लोग ही रहते थे दीवारों और बुर्जों ने इसे एक घेराबन्दी में बदल दिया था किले के अन्दर रहने का फैसला रंग और धर्म पर आधारित था।

(iii) सुरक्षा क्षेत्र का निर्माण – ब्लैक टाउन किले के बाहर विकसित हुआ। इस आबादी को भी सीधी कतारों में बसाया गया था जो कि औपनिवेशिक शहरों की विशेषता थी। लेकिन अठारहवीं सदी के प्रथम दशक के मध्य में सुरक्षा कारणों से उसे गिरा दिया गया, ताकि किले के चारों ओर एक सुरक्षा क्षेत्र बनाया जा सके।

(iv) नया अश्वेत कस्बा – उत्तर दिशा में दूर जाकर एक नया ब्लैक टाउन बसाया गया। नया ब्लैक टाउन परम्परा से चले आ रहे शहरों के जैसा था। वहाँ मन्दिर तथा बाजार के आस-पास रिहायशी मकान बनाए गए थे। शहर के बीच से गुजरने वाली आड़ी-टेढ़ी संकरी गलियों में अलग-अलग जातियों के लोग अपने मोहल्लों में रहते थे। इनमें बुनकरों, कारीगरों, विचौलियों और दुभाषियों को बसाया गया था।

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(v) आबादी का ढाँचा – मद्रास का विकास बहुत सारे गाँवों को मिलाकर किया गया था। यहाँ विविध समुदायों के लिए अवसरों और स्थानों का इंतजाम था। विभिन्न प्रकार के आर्थिक कार्य करने वाले समुदाय आए और मद्रास में ही बस गए। जैसे—दुबाश, वेल्लालार, ब्राह्मण, तेलुगू कोमाटी समुदाय, गुजराती बैंकर, पेरियार और बनियार आदि ।

(vi) उपशहरी इलाके – अंग्रेजी सत्ता के मजबूत होने के बाद यूरोपीय निवासी किले से बाहर जाकर गार्डन हाउसेज बनाने लगे। किले से छावनी तक जाने वाली सड़कों पर ये निवास बनाए गए। सम्पन्न भारतीयों ने मद्रास के इर्द-गिर्द बहुत सारे उपशहरी इलाकों का निर्माण कर लिया। बढ़ते शहरीकरण के कारण गाँवों के बीच वाले इलाके शहर के भीतर आ गए।

→ कलकत्ता में नगर नियोजन आधुनिक नगर नियोजन का प्रारम्भ औपनिवेशिक शहरों से हुआ। इस प्रक्रिया में भू-उपयोग और भवन- निर्माण के नियमन के द्वारा शहर के स्वरूप को परिभाषित किया गया। इसका एक मतलब यह था कि शहरों में लोगों के जीवन को सरकार ने नियन्त्रित करना शुरू कर दिया था। इसके लिए एक योजना तैयार करना और पूरी शहरी परिधि का स्वरूप तैयार करना जरूरी था।

(1) कम्पनी द्वारा किलेबन्दी – बंगाल में अंग्रेजों द्वारा नगर नियोजन के कार्य को अपने हाथ में लेने का तात्कालिक उद्देश्य सुरक्षा से सम्बन्धित था। इसीलिए प्लासी के युद्ध (1757) में सिराजुद्दौला की हार होने के बाद कम्पनी ने एक ऐसा किला बनाने का विचार किया, जिस पर आसानी से आक्रमण नहीं किया जा सके। कलकत्ता को सुतानाती कोलकाता और गोविन्दपुर इन तीनों गाँवों को मिलाकर बसाया गया था। इस तरह कलकत्ता में फोर्ट विलियम का निर्माण किया गया।

(2) मैदान या गारेर मठ – फोर्ट विलियम के इर्द-गिर्द एक विशाल खाली जगह छोड़ी गई, जिसे मैदान या गारेर मठ कहा जाता था।

(3) गवर्नमेंट हाउस नामक नये महल का निर्माण – कलकत्ता में नगर नियोजन का काम केवल फोर्ट विलियम और मैदान के निर्माण के साथ पूरा होने वाला नहीं था। 1798 में लार्ड वेलेजली गवर्नर जनरल बने। उन्होंने अपने रहने के लिए कलकत्ता में ‘गवर्नमेन्ट हाउस’ के नाम से एक महल बनवाया।

(4) स्वास्थ्य की दृष्टि से नगर नियोजन की आवश्यकता- शहर को ज्यादा स्वास्थ्यपरक बनाने का एक तरीका यह था कि शहर में खुले स्थान छोड़े जाएँ। वेलेजली ने 1803 में नगर नियोजन की आवश्यकता पर एक प्रशासकीय आदेश जारी किया और इसके लिए कई कमेटियाँ बनाई गई।

(5) लॉटरी कमेटी – वेलेजली के जाने के बाद नगर नियोजन का काम सरकार की मदद से लॉटरी कमेटी (1817) ने जारी रखा। इसका नाम लॉटरी कमेटी इसलिए पड़ा क्योंकि नगर सुधार के लिए पैसों की व्यवस्था जनता के बीच लॉटरी बेचकर की जाती थी। लॉटरी कमेटी ने शहर का एक नया नक्शा बनवाया जिससे कलकत्ता की एक पूरी तस्वीर सामने आ सके। इसके साथ ही अवैध कब्जे हटाये गए तथा बहुत सारी झोंपड़ियों को साफ कर दिया गया।

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(6) महामारी की आशंका से नगर नियोजन की अवधारणा को बल- अगले कुछ दशकों में महामारी की आशंका से नगर नियोजन के विचार को अधिक बल मिला। 1817 में हैजा फैलने लगा और 1896 में प्लेग ने शहर को अपनी चपेट में ले लिया। कामकाजी लोगों की बस्तियों और झोंपड़ियों को तेजी से हटाया गया तथा इनकी कीमत पर ब्रिटिश आबादी वाले हिस्सों को तेजी से विकसित किया गया। स्वास्थ्यकर और अस्वास्थ्यकर के नये विभेद के सहारे ‘हाइट’ और ‘ब्लैक’ टाउन वाले नस्ली विभाजन को बल मिला।

→ बम्बई में भवन निर्माण कार्यकलाप जैसे-जैसे ब्रिटिश साम्राज्य फैला, अंग्रेज कलकत्ता, मद्रास और बम्बई जैसे शहरों को शानदार राजधानियों में बदलने की कोशिश करने लगे। उनकी सोच से ऐसा लगता था मानो शहरों की भव्यता से ही शाही सत्ता की ताकत प्रतिबिम्बित होती है।

(1) शानदार भव्य इमारतों के निर्माण पर बल – यदि इस शाही दृष्टि को साकार करने का एक तरीका नगर नियोजन था तो दूसरा तरीका यह था कि शहर में शानदार इमारतों का निर्माण किया जाए। शहरों में बनने वाली इमारतों में किले, सरकारी दफ्तर, शिक्षा संस्थान आदि हो सकते थे बुनियादी तौर पर ये इमारतें रक्षा, प्रशासन और वाणिज्य जैसी प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करती थीं।

(2) टापुओं का जुड़ाव प्रारम्भ में बम्बई सात टापुओं का इलाका था। जैसे-जैसे आबादी बढ़ी, इन टापुओं को आपस में जोड़ दिया गया ताकि ज्यादा जगह पैदा की जा सके। आखिरकार ये टापू एक-दूसरे से जुड़ गए और एक विशाल शहर अस्तित्व में आया। बम्बई औपनिवेशिक भारत की आर्थिक राजधानी थी। पश्चिमी तट पर एक प्रमुख बन्दरगाह होने के कारण यह अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का केन्द्र था। उन्नीसवीं सदी के अन्त तक भारत का आधा निर्यात और आयात बम्बई से ही होता था।

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(3) अमेरिकी गृहयुद्ध का प्रभाव – 1861 में अमेरिका में गृहयुद्ध छिड़ने से वहाँ से कपास का आयात बहुत कम हो गया। इससे भारतीय कपास की माँग बहुत बढ़ गई। इसकी खेती मुख्य रूप से दक्कन में की जाती थी। भारतीय व्यापारियों और बिचौलियों के लिए यह बहुत मुनाफे का सौदा था। 1869 में स्वेज नहर खुल जाने के कारण विश्व अर्थव्यवस्था के साथ बम्बई के सम्बन्ध और मजबूत हो गए। बम्बई सरकार और भारतीय व्यापारियों ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए बम्बई को ‘Urts prima in Indis’ यानी भारत का सरताज शहर घोषित कर दिया। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक बम्बई में भारतीय व्यापारी कॉटन मिल जैसे नए उद्योगों में अपना पैसा लगा रहे थे। निर्माण गतिविधियों में भी उनका काफी दखल था।

(4) शैलियों का आपसी विनिमय प्रारम्भ में ये भवन भारतीय भवनों के बीच कुछ अजीब से दिखाई देते थे, लेकिन धीरे-धीरे भारतीयों ने भी यूरोपीय शैली को स्वीकार कर भवनों का निर्माण कराया। दूसरी तरफ अंग्रेजों ने भी अपनी आवश्यकता के अनुरूप भारतीय शैली को अपना लिया। इस तरह दोनों शैलियों में परस्पर विनिमय हो गया। इसकी एक मिसाल उन बंगलों को माना जा सकता है जिन्हें बम्बई और पूरे देश में सरकारी अफसरों के लिए बनाया जाता था। सार्वजनिक भवनों के लिए मोटे तौर पर तीन स्थापत्य शैलियों का प्रयोग किया गया।
ये थीं –
(1) नवशास्त्रीय या नियोक्लासिकल शैली
(2) नव-गॉथिक शैली
(3) इंडो-सारासेनिक शैली।

(5) चाल शहर में जगह की कमी और भीड़-भाड़ की वजह से बम्बई में खास तरह की इमारतों का भी निर्माण हुआ, जिन्हें ‘चाल’ कहा गया।

→ इमारतें और स्थापत्य शैलियाँ क्या बताती हैं?
(1) स्थापत्य शैलियों से अपने समय के सौन्दर्यात्मक आदर्शों और उनमें निहित विविधताओं का पता चलता है। इमारतों के माध्यम से सभी शासक अपनी ताकत को प्रदर्शित करना चाहते थे इस प्रकार एक खास वक्त की स्थापत्य शैली को देखकर हम यह समझ सकते हैं कि उस समय सत्ता को किस तरह देखा जा रहा था और वह इमारतों और उनकी विशेषताओं – ईंट-पत्थर खम्भे और मेहराब, आसमान छूते गुम्बद या उभरी हुई छतों के जरिये किस प्रकार की अभिव्यक्ति होती थी।

(2) रूपरेखा सम्बन्धी निर्णय स्थापत्य शैलियों से केवल प्रचलित रुचियों का ही पता नहीं चलता, वे उनको बदलती भी हैं वे नयी शैलियों को लोकप्रियता प्रदान करती हैं और संस्कृति की रूपरेखा तय करती हैं।

काल-रेखा
1500-1700यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियाँ भारत में अपने ठिकाने स्थापित करती हैं। पणजी में पुर्तगाली (1510) ; मछलीपट्नम में डच (1605); मद्रास (1639); बम्बई (1661) और कलकत्ता (1690) में अंग्रेज तथा पाण्डिचेरी (1673) में फ्रांसीसी अपने ठिकाने बनाते हैं।
1757प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों की निर्णायक जीत होती है। वे बंगाल के शासक हो जाते हैं।
1773ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना।
1803कलकत्ता नगर सुधार पर लॉर्ड वेलेजली द्वारा लिखित मिनट्स।
1818दक्कन पर अंग्रेजों का कब्जा, बम्बई को नए प्रान्त की राजधानी बनाया जाता है।
1853बम्बई से ठाणे तक रेल लाइन बिछाई जाती है।
1857बम्बई में पहली स्पिनिंग और वीविंग मिल की स्थापना।
1857बम्बई, मद्रास और कलकत्ता में विश्वविद्यालयों की स्थापमा।
1870 का दशकनगरपालिकाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों को शामिल किया जाने लगा।
1881मद्रास हार्बर का निर्माण पूरा हुआ।
1896बम्बई के वाटसन्स होटल में पहली बार फिल्म दिखाई गई।
1896बड़े शहरों में प्लेग फैलने लगता है।
1911कलकत्ता की जगह दिल्ली को राजधानी बनाया जाता है।

JAC Class 9 Hindi Solutions Sparsh Chapter 4 तुम कब जाओगे, अतिथि

Jharkhand Board JAC Class 9 Hindi Solutions Sparsh Chapter 4 तुम कब जाओगे, अतिथि Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 9 Hindi Solutions Sparsh Chapter 4 तुम कब जाओगे, अतिथि

JAC Class 9 Hindi तुम कब जाओगे, अतिथि Textbook Questions and Answers

मौखिक –

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक- दो पंक्तियों में दीजिए –

प्रश्न 1.
अतिथि कितने दिनों से लेखक के घर पर रह रहा है ?
उत्तर :
अतिथि चार दिनों से लेखक के घर पर रह रहा है।

प्रश्न 2.
कैलेंडर की तारीखें किस तरह फड़फड़ा रही हैं ?
उत्तर :
कैलेंडर की तारीखें अपनी सीमा में नम्रता से फड़फड़ा रही हैं।

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प्रश्न 3.
पति – पत्नी ने मेहमान का स्वागत कैसे किया ?
उत्तर :
पति-पत्नी ने मेहमान का स्वागत गर्मजोशी से किया। लेखक उससे स्नेह भरी मुस्कराहट के साथ गले मिला और लेखक की पत्नी ने उसे सादर नमस्ते की।

प्रश्न 4.
दोपहर के भोजन को कौन-सी गरिमा प्रदान की गई ?
उत्तर :
दोपहर के भोजन को लंच की गरिमा प्रदान की गई जिसमें सब्ज़ियों, रायता, चावल, रोटी, मिष्ठान आदि था।

प्रश्न 5.
तीसरे दिन सुबह अतिथि ने क्या कहा ?
उत्तर :
तीसरे दिन सुबह अतिथि ने कहा कि मैं धोबी को धोने के लिए कपड़े देना चाहता हूँ।

प्रश्न 6.
सत्कार की ऊष्मा समाप्त होने पर क्या हुआ ?
उत्तर :
लेखक ने अतिथि के लिए पत्नी को खिचड़ी बनाने के लिए कह दिया। लेखक ने यह भी कहा कि यदि वह अब भी न गया तो उसे उपवास करना होगा।

लिखित –

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए –

प्रश्न 1.
लेखक अतिथि को कैसी विदाई देना चाहता था ?
उत्तर :
लेखक अतिथि के जाने से पहले उससे कुछ दिन और रुकने का आग्रह करना चाहता था। अतिथि जाने की ज़िद करता और लेखक उसे भावभीनी विदाई देता; उसे छोड़ने के लिए रेलवे स्टेशन तक जाता और भीगे नयनों से उसे विदा करता। दोनों ही इस विदाई के अवसर पर भावविभोर हो जाते।

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प्रश्न 2.
पाठ में आए निम्नलिखित कथनों की व्याख्या कीजिए –
(क) अंदर ही अंदर कहीं मेरा बटुआ काँप गया।
(ख) अतिथि सदैव देवता नहीं होता, वह मानव और थोड़े अंशों में राक्षस भी हो सकता है।
(ग) लोग दूसरे के होम की स्वीटनेस को काटने न दौड़ें।
(घ) मेरी सहनशीलता की वह अंतिम सुबह होगी।
(ङ) एक देवता और एक मनुष्य अधिक देर साथ नहीं रहते।
उत्तर :
(क) जब लेखक के घर अतिथि आया, तो उसे लगा कि इसके अतिथि सत्कार में जो खर्च करना पड़ेगा, उससे उसके बजट पर भी असर पड़ेगा। इसलिए उसे लगा कि इस अतिथि के आने से उसका खर्चा बढ़ जाएगा।
(ख) लेखक का मानना है कि जब अतिथि एक-दो दिन रहकर चला जाए तो वह देवता है। यदि वह तीसरे दिन चला जाए तो मानव है। यदि अतिथि चार दिन से भी अधिक दिनों तक नहीं जाता है, तो वह राक्षस हो जाता है जो मेज़बान के लिए मुसीबत बन जाता है।
(ग) लेखक का मानना है कि अतिथि को अतिथि के समान आकर तुरंत वापस भी लौट जाना चाहिए, जिससे वह जिसके घर में अतिथि बनकर आया है उसके घर में प्रेमभाव के स्थान पर कलह न होने लगे। उसे उस घर की प्रेम भावना को बनाए रखना चाहिए।
(घ) लेखक कहता है कि यदि अतिथि पाँचवें दिन भी अपने घर नहीं लौटता, तो वह उसे और अधिक सहन नहीं कर सकेगा तथा उसे घर से जाने के लिए गेट आउट तक कहने से भी संकोच नहीं करेगा।
(ङ) लेखक का मानना है कि एक देवता और एक मनुष्य अधिक देर तक साथ नहीं रह सकते क्योंकि देवता मनुष्य को दर्शन देकर तुरंत चले जाते हैं, वे उसके पास जमकर नहीं बैठे रहते। मनुष्य भी देवता का दर्शन करके शीघ्र ही अपने घर चला जाता है।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए –

प्रश्न 1.
कौन-सा आघात अप्रत्याशित था और उसका लेखक पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर :
लेखक सोच रहा था कि अब तो तीसरा दिन हो गया है, इसलिए अतिथि अवश्य चला जाएगा। तीसरे दिन सुबह जब अतिथि ने लेखक से कहा कि वह अपने कपड़े धुलवाने के लिए धोबी को देना चाहता है, तो लेखक को झटका लगा। उसे यह उम्मीद नहीं थी कि अतिथि अभी कुछ और दिन उसके घर रहेगा। लेकिन अतिथि की बात से स्पष्ट हो गया कि उसका इरादा अभी कुछ दिन और उसके घर रुकने का है। इस प्रकार अतिथि के कपड़े धुलवाने की बात लेखक के लिए अप्रत्याशित आघात था।

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प्रश्न 2.
‘संबंधों का संक्रमण के दौर से गुज़रना’ – इस पंक्ति से आप क्या समझते हैं ? विस्तार से लिखिए।
उत्तर :
जब लेखक के घर आया हुआ अतिथि चौथे दिन भी अपने घर नहीं गया, तो लेखक और अतिथि के बीच मुस्कुराहटों का आदान-प्रदान समाप्त हो गया। ठहाके लगने बिल्कुल बंद हो गए थे; आपसी चर्चा समाप्त हो गई थी। लेखक कोई उपन्यास पढ़ता रहता था तथा अतिथि पत्र-पत्रिकाओं के पृष्ठ उलटता रहता था। परस्पर प्रेमभाव बोरियत में बदल गया था। लेखक की पत्नी ने भी पकवान आदि बनाने के स्थान पर खिचड़ी बनाने का निश्चय कर लिया था। इस प्रकार लेखक और उसके अतिथि के संबंध धीरे-धीरे बदलते जा रहे थे। उनमें अपनेपन के स्थान पर परायापन आ गया था और लेखक चाह रहा था कि अतिथि शीघ्र से शीघ्र उसके घर से चला जाए।

प्रश्न 3.
जब अतिथि चार दिन तक नहीं गया तो लेखक के व्यवहार में क्या-क्या परिवर्तन आए ?
उत्तर :
जब अतिथि चार दिन तक अपने घर नहीं गया, तो लेखक का व्यवहार उसके प्रति बदलने लगा। उसने अतिथि के साथ हँसना-बोलना छोड़ दिया। लेखक ने उपन्यास पढ़ना शुरू कर दिया, जिससे उसे अतिथि के साथ बातचीत न करनी पड़े। लेखक अतिथि के साथ अपने पुराने मित्रों, प्रेमिकाओं आदि का जिक्र किया करता था; वह जिक्र करना भी उसने बंद कर दिया। लेखक का अतिथि के प्रति प्रेमभाव और भाईचारा समाप्त हो गया था। वह मन ही मन अतिथि को गालियाँ देने लगा था। लेखक की पत्नी ने जब कहा कि वह आज खिचड़ी बनाएगी, तो लेखक उसे खिचड़ी बनाने के लिए ही कहता है। वह अब अतिथि की और अधिक आवभगत नहीं करना चाहता था।

भाषा-अध्ययन –

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्याय लिखिए –
चाँद ज़िक्र आघात ऊष्मा अंतरंग
उत्तर :
चाँद = शशि, इंदु।
ज़िक्र = वर्णन, बयान।
आघात = चोट, प्रहार।
ऊष्मा = तपन, गरमी।
अंतरंग = आत्मीय, अभिन्न।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिए –
(क) हम तुम्हें स्टेशन तक छोड़ने जाएँगे। (नकारात्मक वाक्य)
(ख) किसी लॉण्ड्री पर दे देते हैं, जल्दी धुल जाएँगे। (प्रश्नवाचक वाक्य)
(ग) सत्कार की ऊष्मा समाप्त हो रही थी। (भविष्यत् काल)
(घ) इनके कपड़े देने हैं। (स्थानसूचक प्रश्नवाची)
(ङ) कब तक टिकेंगे ये ? (नकारात्मक)
उत्तर :
(क) हम तुम्हें स्टेशन तक छोड़ने नहीं जाएँगे।
(ख) किसी लॉण्ड्री पर देने से क्या जल्दी धुल जाएँगे ?
(ग) सत्कार की ऊष्मा समाप्त हो जाएगी।
(घ) इनके कपड़े कहाँ देने हैं?
(ङ) वे देर तक नहीं टिकेंगे।

प्रश्न 3.
पाठ में आए इन वाक्यों में ‘चुकना’ क्रिया के विभिन्न प्रयोगों को ध्यान से देखिए और वाक्य संरचना को समझिए –
(क) तुम अपने भारी चरण-कमलों की छाप मेरी ज़मीन पर अंकित कर चुके।
(ख) तुम मेरी काफ़ी मिट्टी खोद चुके।
(ग) आदर-सत्कार के जिस उच्च बिंदु पर हम तुम्हें ले जा चुके थे।
(घ) शब्दों का लेन-देन मिट गया और चर्चा के विषय चुक गए।
(ङ) तुम्हारे भारी-भरकम शरीर से सलवटें पड़ी चादर बदली जा चुकी और तुम यहीं हो।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित वाक्य संरचनाओं में ‘तुम’ के प्रयोग पर ध्यान दीजिए –
(क) लॉण्ड्री पर दिए कपड़े धुलकर आ गए और तुम यहीं हो।
(ख) तुम्हें देखकर फूट पड़ने वाली मुसकुराहट धीरे-धीरे फीकी पड़कर अब लुप्त हो गई है।
(ग) तुम्हारे भरकम शरीर से सलवटें पड़ी चादर बदली जा चुकी।
(घ) कल से मैं उपन्यास पढ़ रहा हूँ और तुम फ़िल्मी पत्रिका के पन्ने पलट रहे हो।
(ङ) भावनाएँ गालियों का स्वरूप ग्रहण रही हैं, पर तुम जा नहीं रहे।
उत्तर :
विद्यार्थी प्रश्न 3 और 4 को ध्यान से पढ़कर समझें।

योग्यता विस्तार –

प्रश्न 1.
‘अतिथि देवो भव’ उक्ति की व्याख्या करें तथा आधुनिक युग के संदर्भ में इसका आकलन करें।
उत्तर :
‘अतिथि देवो भव’ उक्ति का अर्थ है कि घर आए हुए मेहमान का देवताओं के समान आदर-सम्मान करना चाहिए। उन्हें प्रेमभाव से अच्छा भोजन करवाना चाहिए। उनकी समस्त सुख-सुविधाओं का ध्यान रखना चाहिए। आधुनिक समय में मेहमान का आना मुसीबत का आगमन माना जाता है। मेहमान बोझ प्रतीत होता है। उसे किसी प्रकार से खिला-पिलाकर तुरंत विदा करने की इच्छा होती है। यदि वह दो-चार दिन टिक जाता है, तो घर का वातावरण बिगड़ जाता है।

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प्रश्न 2.
विद्यार्थी अपने घर आए अतिथियों के सत्कार का अनुभव कक्षा में सुनाएँ।
उत्तर :
विद्यार्थी अपने-अपने अनुभव स्वयं सुनाएँ।

प्रश्न 3.
अतिथि के अपेक्षा से अधिक रुक जाने पर लेखक की क्या-क्या प्रतिक्रियाएँ हुईं, उन्हें क्रम से छाँटकर लिखिए।
उत्तर :
अतिथि के अपेक्षा से अधिक रुक जाने पर लेखक की निम्नलिखित प्रतिक्रियाएँ हुईं –

  1. अतिथि ने जब कपड़े धुलवाने की बात की, तो लेखक को लगा कि वह अब शीघ्र नहीं जाएगा।
  2. उसे अतिथि देवता नहीं बल्कि मानव और राक्षस लगने लगा।
  3. उसने अतिथि के साथ हँसना – बोलना बंद कर दिया।
  4. अतिथि के प्रति उसकी आत्मीयता बोरियत में बदल गई।
  5. अतिथि को अच्छा भोजन खिलाने के स्थान पर खिचड़ी बनाई गई।

JAC Class 9 Hindi तुम कब जाओगे, अतिथि Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘तुम कब जाओगे, अतिथि’ पाठ का मूल भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
इस पाठ के माध्यम से लेखक ने उन व्यक्तियों की ओर संकेत किया है, जो अपने किसी संबंधी अथवा परिचित के घर बिना बताए आ जाते हैं और फिर वहाँ से जाने का नाम नहीं लेते। उनका इस प्रकार आना और फिर वहाँ टिके रहना मेज़बान को अच्छा नहीं लगता। वे एक-दो दिन तो उसकी मेहमाननवाज़ी करते हैं, बाद में उससे बात भी नहीं करते। वे उसे अपने घर से भगाने की चिंता में लगे रहते हैं। अतः जब भी कहीं अतिथि बनकर जाना हो, तो उसे पूर्व सूचना दे देनी चाहिए तथा वहाँ एक- दो दिन ठहरकर वापस लौट जाना चाहिए।

प्रश्न 2.
लेखक ने यह क्यों कहा कि ‘अतिथि! तुम्हारे जाने का यह उच्च समय अर्थात् हाइटाइम है’ ?
उत्तर :
लेखक चौथे दिन भी अतिथि के न जाने से परेशान हो गया था। वह अतिथि को दिखा-दिखाकर कैलेंडर की तारीखें बदलता है। वह कहता है कि लाखों मील की यात्रा करके चाँद पर पहुँचने वाले अंतरिक्ष यात्री भी चाँद पर इतने समय तक नहीं रुके थे, जितने दिनों से अतिथि उसके घर टिका हुआ है। लेखक को लगता है कि अतिथि ने उससे खूब आत्मीय संबंध स्थापित कर लिए हैं तथा उसका काफ़ी खर्चा करवा दिया है, जिससे उसका बजट भी डगमगा गया है। इसलिए अब उसकी भलाई इसी में है कि वह उसके घर से चला जाए। यही उसके जाने का हाइटाइम अथवा उचित समय है। अन्यथा उसका यहाँ अतिथि सत्कार होना बंद हो जाएगा।

JAC Class 9 Hindi Solutions Sparsh Chapter 4 तुम कब जाओगे, अतिथि

प्रश्न 3.
लेखक पाँचवें दिन के लिए अतिथि को क्या चेतावनी देता है ?
उत्तर :
लेखक जब देखता है कि अतिथि चौथे दिन भी नहीं गया तो वह चाहता है कि पाँचवें दिन अतिथि सम्मानपूर्वक उसके घर से जाने का निर्णय ले ले अन्यथा वह उसे और अधिक समय तक अपने घर में सहन नहीं कर पाएगा। वह जानता है कि अतिथि देवता के समान होता है। इसलिए वह चाहता है कि जैसे देवता दर्शन देकर लौट जाते हैं, उसी प्रकार अतिथि भी लौट जाए। यदि अब भी अतिथि नहीं जाता है, तो वह उसे अपमानित करके घर से निकाल देगा।

प्रश्न 4.
लेखक अतिथि को कैलेंडर दिखाकर तारीख क्यों बदल रहा था ?
उत्तर :
अतिथि को लेखक के घर आए हुए चार दिन हो गए थे। उसके व्यवहार से लेखक को कोई भी ऐसी गंध नहीं मिल रही थी कि वह उनके घर से जाना चाहता है। इसलिए लेखक पिछले दो दिन से अतिथि को दिखा-दिखाकर कैलेंडर की तारीख बदल रहा था। यदि अतिथि कैलेंडर को ध्यान से देखता, तो उसे अनुभव हो जाता कि उसे वहाँ आए चार दिन हो गए हैं; अब उसे जाना चाहिए।

प्रश्न 5.
लेखक ने यह क्यों कहा कि ‘तुम्हारे सतत आतिथ्य का चौथा भारी दिन’ ?
उत्तर :
आज का युग महँगाई का युग है; सभी चीज़ों के दाम आसमान छू रहे हैं। ऐसे में किसी अतिथि की चार दिन तक मेहमाननवाज़ी करना सरल कार्य नहीं है। इसलिए लेखक कह रहा है कि अब वह अतिथि की मेहमाननवाज़ी करके थक गया है। उसका आर्थिक बजट बिगड़ गया है। अब वह अतिथि का और खर्च नहीं उठा सकता। उसने पहले ही उस पर अधिक खर्च कर दिया है।

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प्रश्न 6.
आरंभ में लेखक और उसकी पत्नी ने अतिथि का सेवा-सत्कार किस प्रकार किया ?
उत्तर :
पहले दिन लेखक और उसकी पत्नी ने मुस्कराहट और सम्मान के साथ अतिथि का सेवा-सत्कार किया। उसके लिए खाने में दो सब्जियाँ, रायता और मीठा बनाया। अगले दिन मनोरंजन के लिए उसे सिनेमा भी दिखाया। यह सब उन्होंने यह सोचकर किया कि अतिथि भगवान होता है, जो दर्शन देकर एक-दो दिन में चला जाएगा।

प्रश्न 7.
लेखक का भावभीनी विदाई से क्या तात्पर्य था ?
उत्तर :
लेखक का भावभीनी विदाई से तात्पर्य था कि जब अतिथि घर से जाता है, तो सबके मन भीग जाते हैं। वे लोग अतिथि को कुछ दिन और रुकने का आग्रह करते हैं, परंतु वह वहाँ से जाने के लिए तैयार हो जाता है। अतिथि से फिर आने का वायदा लिया जाता है। परिवार वाले अश्रुपूर्ण आँखों से अतिथि को स्टेशन छोड़ने जाते हैं और जाते-जाते एक-दूसरे को प्रेम भरे आँसुओं से भिगो देते हैं। इससे दोनों के मन प्रसन्न हो जाते हैं।

प्रश्न 8.
अतिथि के लेखक के घर से न जाने पर घर का वातावरण कैसा हो गया ?
उत्तर :
अतिथि को घर आए हुए चार दिन हो गए थे और उसके प्रति सम्मान धीरे-धीरे कम हो रहा था। अतिथि को देखकर खिलने वाला चेहरा मुरझाने लगा था। उनकी आपस में बातचीत समाप्त हो गई थी। लेखक कमरे में लेटा हुआ उपन्यास पढ़ रहा था और अतिथि फिल्मी पत्रिकाओं के पन्ने पलट रहा था। कमरे में बोरियत भरा वातावरण छा गया था। प्यार की भावनाएँ मन-ही-मन गालियों का स्वरूप ग्रहण कर चुकी थीं। परंतु अतिथि के वहाँ से जाने का कोई आसार नज़र नहीं आ रहा था, जिस कारण घर का वातावरण असहनीय हो गया था।

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प्रश्न 9.
लेखक की पत्नी ने खिचड़ी बनाने का निर्णय क्यों किया ?
उत्तर :
अतिथि को आए हुए चार दिन हो गए थे और इन चार दिन की मेहमाननवाजी से घर का बजट बिगड़ गया था। लेखक की पत्नी भी अतिथि के सेवा – सत्कार से तंग आ गई थी। इसलिए उसने खिचड़ी बनाने का निर्णय किया।

प्रश्न 10.
सत्कार की ऊष्मा क्या है ? वह क्यों समाप्त हो रही थी ?
उत्तर :
सत्कार की ऊष्मा से अभिप्राय है कि घर आने वाले अतिथि का गर्मजोशी से स्वागत करना तथा उसका खूब सेवा-सत्कार करना। लेखक ने भी अपने अतिथि का खूब सेवा-सत्कार किया, परंतु अतिथि को आए हुए चार दिन हो गए थे। अतिथि के कारण लेखक का बजट बिगड़ गया था। अब वह उस पर अधिक खर्च नहीं कर सकता था। इसलिए अतिथि के प्रति अब उसकी सत्कार की ऊष्मा समाप्त हो रही थी।

प्रश्न 11.
अतिथि के जाने का यह चरम क्षण कैसा था ?
उत्तर :
लेखक अतिथि की सेवा करते हुए तंग आ गया था। वह चाहता था कि अतिथि सम्मानपूर्वक उसके यहाँ से चला जाए। अब वह और उसका परिवार अतिथि को सहन करने का धैर्य खो चुके थे। लेखक भी एक मनुष्य है, इसलिए वह चाहता था कि अतिथि उसके घर से चला जाए। यही उसके घर में ठहरने की चरम सीमा थी। इससे ही लेखक और अतिथि में परस्पर मधुर रिश्ते बने रहेंगे।

तुम कब जाओगे, अतिथि Summary in Hindi

लेखक परिचय :

जीवन-परिचय – शरद जोशी हिंदी के श्रेष्ठ व्यंग्य-लेखकों में से एक हैं। जोशी जी का जन्म सन् 1931 में मध्य प्रदेश के उज्जैन में हुआ था। पिता सरकारी नौकरी में थे, अतः तबादले होते रहते थे जिससे इनकी शिक्षा मध्य प्रदेश के विभिन्न स्कूलों में हुई। युवावस्था में आकाशवाणी और सरकारी कार्यालयों में काम करने के पश्चात जोशी जी नौकरी छोड़कर स्वतंत्र लेखन करने लगे। इंदौर से प्रकाशित ‘नई दुनिया’ में इनकी रचनाएँ छपने लगीं। सन् 1980 में ‘हिंदी एक्सप्रेस’ के संपादन का भार भी इन्होंने सँभाला।

शरद जोशी मूलत: व्यंग्य लेखक थे और इसी रूप में इन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली। भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्मश्री’ से अलंकृत किया था। सन् 1991 में इनका देहावसान हुआ। रचनाएँ – शरद जोशी की प्रमुख व्यंग्य रचनाएँ हैं- परिक्रमा, ‘जीप पर सवार इल्लियाँ, किसी बहाने’, ‘रहा किनारे बैठ’, ‘तिलस्म’, ‘दूसरी सतह’, ‘मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ’, ‘यथासंभव’ तथा ‘हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे ‘।

भाषा-शैली – शरद जोशी व्यंग्य में हास्य का पुट अधिक रखते हैं, क्योंकि उनके ही शब्दों में, “हास्य के माध्यम से कुछ बातें बहुत कम शब्दों में और बड़ी सरलता से कह देने में सफलता मिली है। सामान्य पाठक बड़ी जल्दी विषय-प्रवेश कर जाता है और उसको जब इस बात का अहसास होता है कि इन सीधी-सादी बातों के पीछे गहरा तथ्य है, तो जो ‘शॉक’ पाठक को लगता है वही उसे झकझोरता है।” इस प्रकार वे हास्य को व्यंग्य का औज़ार मानते हैं, न कि लक्ष्य।

‘तुम कब जाओगे, अतिथि’ पाठ में जब अतिथि चार दिन तक लेखक के घर से नहीं जाता, तो पाँचवें दिन लेखक उसे चुनौती देते हुए कहता है – “तुम लौट जाओ, अतिथि ! इसी में तुम्हारा देवत्व सुरक्षित रहेगा। यह मनुष्य अपनी वाली पर उतरे, उसके पूर्व तुम लौट जाओ!” लेखक के इस कथन में अनचाहे मेहमानों पर कटाक्ष किया गया है। लेखक ने तत्सम प्रधान – चतुर्थ, दिवस, अंकित, संक्रमण शब्दों के साथ ही एस्ट्रॉनॉट्स, स्वीट- होम, स्वीटनेस, शराफ़त, सेंटर आदि विदेशी शब्दों का यथास्थान सहज रूप से प्रयोग किया है।

लेखक की शैली व्यंग्यात्मक है, जिसमें यथास्थान लाक्षणिकता एवं चित्रात्मकता भी विद्यमान है; जैसे- ‘मेरी पत्नी की आँखें एकाएक बड़ी-बड़ी हो गईं। आज से कुछ बरस पूर्व उनकी ऐसी आँखें देख मैंने अपने अकेलेपन की यात्रा समाप्त कर बिस्तर खोल दिया था। पर अब जब वे ही आँखें बड़ी होती हैं, तो मन छोटा होने लगता है। वे इस आशंका और भय से बड़ी हुई थीं कि अतिथि अधिक दिनों तक ठहरेगा।’

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पाठ का सार :

‘तुम कब जाओगे, अतिथि’ पाठ के लेखक शरद जोशी हैं। इस पाठ में लेखक ने उन लोगों पर व्यंग्य किया है, जो अपने किसी परिचित के घर बिना सूचना दिए आ जाते हैं और फिर वहाँ से जाने का नाम नहीं लेते। लेखक के घर अचानक आए हुए अतिथि को आज चार दिन हो गए हैं और वह जाने का नाम नहीं ले रहा। लेखक सोचता है कि ‘तुम कब जाओगे अतिथि ?’

लेखक के घर आया हुआ अतिथि जहाँ बैठा सिगरेट का धुआँ फेंक रहा है, उसके सामने लगे कैलेंडर की तारीखें पिछले दो दिनों से लेखक ने अतिथि को दिखा-दिखा कर बदली हैं। लेखक के घर आए आज उसका चौथा दिन है, पर वह जाने का नाम नहीं ले रहा। लेखक कहता है कि इतने समय तक तो चंद्रयात्री भी चाँद पर भी नहीं रुके थे। क्या उसे उसकी अपनी धरती नहीं पुकार रही ?

जिस दिन यह अतिथि लेखक के घर आया था, उस दिन वह किसी अनजानी मुसीबत के आने की संभावना से घबरा गया था और उसे अपने बजट की चिंता होने लगी थी। इतना होने पर भी उसने पत्नी सहित अतिथि का स्वागत किया था। रात के भोजन में उसे दो सब्ज़ियाँ, रायता, मीठा आदि खिलाया था। उन्होंने सोचा था कि कल तो यह अतिथि चला ही जाएगा। परंतु ऐसा नहीं हुआ, तो दूसरे दिन भी उसे अच्छा भोजन करवाया और सिनेमा भी दिखाया। लेखक ने सोचा था कि अगले दिन उसे स्टेशन पहुँचाकर भावभीनी विदाई दे देंगे।

तीसरे दिन जब अतिथि ने अपने कपड़े धोबी को देने के लिए कहा, तो लेखक बहुत घबरा गया। उसे लगा कि अतिथि सदा देवता नहीं होता, वह मानव और राक्षस भी हो सकता है। उसके कपड़े देने के लिए लेखक उसके साथ लॉंड्री की ओर चला, तो उसने देखा कि उसकी पत्नी की आँखें इस आशंका से फैल गई हैं कि अतिथि अधिक दिन तक ठहरेगा। लाँड्री से कपड़े धुल कर भी आ गए; उसके बिस्तर की चादर भी बदल दी, पर उसके जाने के कोई चिह्न नहीं दिखाई दे रहे थे। दोनों की आपस में बातचीत भी बंद हो गई। लेखक उपन्यास पढ़ता, तो अतिथि फिल्मी पत्रिका के पृष्ठ पलटता रहता था।

लेखक की पत्नी ने पूछा कि यह महाशय कब प्रस्थान करेंगे? लेखक ने केवल इतना ही कहा कि क्या कह सकता हूँ। पत्नी ने कहा कि आज मैं खिचड़ी बना रही हूँ। लेखक ने बनाने के लिए कह दिया। उनके मन में अतिथि सत्कार के सब भाव समाप्त हो गए थे। अब अतिथि को भी खिचड़ी खानी होगी। अगर वह अब भी न गया, तो उसे उपवास भी करना पड़ सकता है। लेखक को लगता है कि अतिथि को यहाँ अच्छा लग रहा है, इसलिए वह यहाँ से जाना नहीं चाहता क्योंकि दूसरों का घर सबको अच्छा लगता है। वह उसे गेट आउट कहना चाहता है, पर शराफत के मारे ऐसा कहता नहीं है।

लेखक सोचता है कि अगले दिन जब अतिथि सो कर उठेगा, तो वह उसका यहाँ आने का पाँचवाँ दिन होगा। लेखक को लगता है कि तब वह यहाँ से सम्मानपूर्वक विदा होने का निर्णय अवश्य ले लेगा। यह लेखक की सहनशीलता का अंतिम दिन होगा। उसके बाद वह उसका आतिथ्य नहीं कर सकेगा। वह जानता है कि अतिथि देवता होता है, पर वह अधिक समय तक देवताओं का भार नहीं उठा सकता क्योंकि देवता दर्शन देकर लौट जाते हैं न कि उसके समान जमकर बैठ जाते हैं। इसलिए लेखक चाहता है कि उसका अतिथि भी लौट जाए, जिससे उसका देवत्व सुरक्षित रहेगा अन्यथा लेखक उसे भगाने के लिए कुछ भी कर सकता है।

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कठिन शब्दों के अर्थ :

अतिथि – मेहमान। आगमन – आना। चतुर्थ – चौथा। दिवस – दिन। निस्संकोच – बिना किसी संकोच के। नम्रता – नरमी, कोमलता। विगत – पिछले। सतत – निरंतर, लगातार। आतिथ्य – आवभगत, अतिथि का सत्कार। संभावना – उम्मीद, आशा। एस्ट्रॉनाट्स – अंतरिक्ष यात्री। अंतरंग – घनिष्ठ। मिट्टी खोदना – बुरी हालत करना। हाईटाइम – उच्च समय, ठीक समय, उचित समय। आशंका – भय, संदेह। डिनर – रात्रि-भोज। मेहमाननवाज़ी – अतिथि सत्कार। आग्रह – अनुरोध। पीड़ा – दुख। लंच – दोपहर का भोज। गरिमा – गौरव। छोर – सीमा, किनारा।

भावभीनी – प्रेम से भरपूर। आघात – चोट, प्रहार। अप्रत्याशित – जिसके बारे में सोचा न गया हो, आकस्मिक, अचानक। मार्मिक – मर्मस्थल पर प्रभाव डालने वाली, प्रभावशाली। सामीप्य – निकटता। बेला – समय, अवसर। लॉड्री – कपड़े धुलने का स्थान। औपचारिक – जो केवल दिखलाने भर के लिए हो। निर्मूल – निराधार, व्यर्थ, बिना जड़ के। लुप्त – समाप्त। कोनलों – कोनों से। चर्चा – बातचीत। चुक गए – समाप्त हो गए। सौहार्द – सज्जनता, मित्रता। शनै:-शनै: – धीरे-धीरे। रूपांतरित – बदल जाना। अदृश्य – जो दिखाई न दे। ऊष्मा – गरमी, आवेश। संक्रमण – एक अवस्था से दूसरी अवस्था में पहुँचना। चरम – अंतिम। होम – घर। स्वीटनेस मिठास। गेट आउट – निकल जाओ। गुंजायमान – गूँजती हुई।