JAC Class 11 History Important Questions Chapter 9 संस्कृतियों का टकराव

Jharkhand Board JAC Class 11 History Important Questions Chapter 9 संस्कृतियों का टकराव Important Questions and Answers.

JAC Board Class 11 History Important Questions Chapter 9 संस्कृतियों का टकराव

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

1. अरावाकी लुकायो समुदाय के लोग रहते थे-
(अ) क्यूबा
(ब) अन्ध महासागर के क्षेत्र
(स) मैक्सिको
(द) कैरीबियन द्वीप-समूह।
उत्तर:
(द) कैरीबियन द्वीप-समूह।

2. एजटेक लोग रहते थे –
(अ) ब्राजील
(ब) काँगो
(स) मैक्सिको की मध्यवर्ती घाटी
(द) न्यूयार्क।
उत्तर:
(स) मैक्सिको की मध्यवर्ती घाटी

3. मक्का की खेती किन लोगों की सभ्यता का मुख्य आधार था –
(अ) तुपिनांबा
(ब) अरावाकी
(स) एजटेक
(द) माया।
उत्तर:
(द) माया।

4. दक्षिणी अमरीकी देशों की संस्कृतियों में से सबसे बड़ी संस्कृति थी –
(अ) स्पेनिश लोगों की
(ब) इंका लोगों की
(स) एजटेक लोगों की
(द) अरावाकी लोगों की।
उत्तर:
(ब) इंका लोगों की

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5. पन्द्रहर्वीं शताब्दी में खोज-यात्रियों में कौनसे यूरोपीय देश सबसे आगे थे?
(अ) इंग्लैण्ड
(ब) हालैण्ड
(स) स्पेन और पुर्तगाल
(द) बेल्जियम और फ्रांस।
उत्तर:
(स) स्पेन और पुर्तगाल

6. कोलम्बस द्वारा खोजे गए उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका का नामकरण किसके नाम पर किया गया-
(अ) कोलम्बस
(ब) वास्कोडिगामा
(स) अमेरिगो वेस्पुस्सी
(द) हेनरी।
उत्तर:
(ब) वास्कोडिगामा

7. मैक्सिको पर अधिकार करने वाला स्पेन का निवासी था-
(अ) डियाज –
(ब) हेनरी
(स) मोंटेजुमा
(द) कोर्टेस।
उत्तर:
(द) कोर्टेस।

8. इंका साम्राज्य पर अधिकार करने वाला स्पेन का निवासी था-
(अ) कैब्राल
(ब) पिजारो
(स) क्वेटेमोक
(द) कोर्टेस।
उत्तर:
(ब) पिजारो

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –

1. . …………… लोग लड़ने की बजाय बातचीत से झगड़ा निपटाना अधिक पसंद करते थे।
2. …………….. क्जिए ………….. लोग दक्षिणी अमरीका के पूर्वी समुद्र तट तथा ब्राजील-पेड़ों के जंगलों में बसे हुए गांवों में रह थे।
3. 12 वीं सदी में ………….. लोग उत्तर से आकर मेक्सिको की मध्यवर्ती घाटी में बस गए थे।
4. ………….. की खेती मैक्सिको की माया संस्कृति का मुख्य आधार थी।
5. दक्षिणी अमरीकी देशज संस्कृतियों में सबसे बड़ी पेरू में …………….. लोगों की संस्कृति थी।
उत्तर:
1. अरावाक
2. तुपिनांबा
3. एजटेक
4. मक्का
5. इंका

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निम्नलिखित स्तंभों के सही जोड़े बनाइये-

(अ) बहामा द्वीप समूह के गुहानाहानि द्वीप की खोज की
(ब) मैक्सिको पर विजय प्रास की
(स) इंका राज्य पर विजय प्राप्त की
(द) ‘ज्योग्राफी’ नामक पुस्तक लिखी
(य) ब्राजील की खोज की
1. टॉलेमी
2. कोलम्बस
3. कोर्टेस
4. पिजारो
5. क्रैब्राल

उत्तर-
1. टॉलेमी
(द) ‘ज्योग्राफी’ नामक पुस्तक लिखी
2. कोलम्बस
(अ) बहामा द्वीप समूह के गुहानाहानि द्वीप की खोज की
3. कोर्टेस
(ब) मैक्सिको पर विजय प्रास की

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
18वीं शताब्दी में सबसे बड़ा शहर कौन सा था ?
उत्तर:
लन्दन।

प्रश्न 2.
बैंक ऑफ इंग्लैण्ड की स्थापना कब हुई ?
उत्तर:
1694 ई. में।

प्रश्न 3.
इंग्लैण्ड में मशीनीकरण में काम आने वाली दो मुख्य सामग्रियों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
(1) कोयला तथा
(2) लोहा।

प्रश्न 4.
म्यूल का आविष्कार किसने किया और कब ?
उत्तर:
1779 में, सैम्युअल क्राम्पटन ने।

प्रश्न 5.
वाटर फ्रेम का आविष्कार किसने किया और कब ?
उत्तर:
1769 में, रिचर्ड आर्कराइट ने।

प्रश्न 6.
प्रथम भाप से चलने वाले रेल का इंजन किसने बनाया और कब ?
उत्तर:
1814 में, स्टीफेन्सन ने।

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प्रश्न 7.
इंग्लैण्ड में 1788 से 1796 की अवधि किस नाम से पुकारी जाती है?
उत्तर:
‘नहरोन्माद’ के नाम से।

प्रश्न 8.
इंग्लैण्ड में पहली नहर किसने बनाई और कब ?
उत्तर:
1761 में, जेम्स ब्रिंडली ने।

प्रश्न 9.
1801 में किसने इंजन बनाया?
उत्तर:
रिचर्ड ट्रेविथिक ने।

प्रश्न 10.
रिचर्ड ट्रेविथिक द्वारा निर्मित इंजन क्या कहलाता था ?
उत्तर:
पफिंग डेविल (फुफकारने वाला दानव)।

प्रश्न 11.
1814 में जार्ज स्टीफेन्सन ने किस रेल इंजन का निर्माण किया ?
उत्तर:
‘ब्लुचर’ नामक रेल इंजन का।

प्रश्न 12.
1850 में इंग्लैण्ड में 50 हजार से अधिक की आबादी वाले कितने नगर थे ?
उत्तर:
29।

प्रश्न 13.
अंग्रेजी में ‘औद्योगिक क्रान्ति’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किसके द्वारा किया गया ?
उत्तर:
आरनाल्ड टायनबी द्वारा।

प्रश्न 14.
स्पिन्निंग जैनी का आविष्कार किसने किया और कब किया ?
उत्तर:
1765 में, हारग्रीव्ज ने।

प्रश्न 15.
‘पावरलूम’ का आविष्कार किसने किया और कब किया?
उत्तर:
1787 में, एडमण्ड कार्टराइट ने।

प्रश्न 16.
भाप के इंजन का आविष्कार किसने किया और कब किया ?
उत्तर:
1769 में, जेम्स वाट ने।

प्रश्न 17.
किस देश के साथ लम्बे समय तक युद्ध करने में इंग्लैण्ड को औद्योगिक क्षेत्र में हानि उठानी पड़ी?
उत्तर:
फ्रांस के साथ।

प्रश्न 18.
फ्लाइंग शटल का आविष्कारक कौन था ?
उत्तर:
जान के।

प्रश्न 19.
चार्ल्स डिकन्स ने अपने किस उपन्यास में एक काल्पनिक औद्योगिक नगर कोकटाउन की दशा का वर्णन किया है ?
उत्तर:
‘हार्ड टाइम्स’ में।

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प्रश्न 20.
मजदूरों की दशा में सुधार के लिए ‘लुडिज्म’ नामक आन्दोलन किसने चलाया था?
उत्तर:
जनरल नेडलुड ने।

प्रश्न 21.
‘प्रथम औद्योगिक क्रान्ति’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
ब्रिटेन में 1780 के दशक और 1850 के दशक के बीच उद्योग और अर्थव्यवस्था का जो रूपान्तरण हुआ, उसे ‘प्रथम औद्योगिक क्रान्ति’ कहते हैं।

प्रश्न 22.
इंग्लैण्ड में दूसरी औद्योगिक क्रान्ति कब हुई ?
उत्तर:
इंग्लैण्ड में दूसरी औद्योगिक क्रान्ति लगभग 1850 के बाद आई। इसमें रसायन तथा बिजली जैसे नये औद्योगिक क्षेत्रों का विस्तार हुआ।

प्रश्न 23.
‘औद्योगिक क्रान्ति’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किन विद्वानों के द्वारा किया गया ?
उत्तर:
‘औद्योगिक क्रान्ति’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम फ्रांस के विद्वान जार्जिस मिशले तथा जर्मनी के विद्वान फ्रेडरिक एंजेल्स द्वारा किया गया।

प्रश्न 24.
लन्दन इंग्लैण्ड के बाजारों का केन्द्र क्यों बना हुआ था ?
उत्तर:
लन्दन इंग्लैण्ड का सबसे बड़ा शहर था। लन्दन ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए ऋण-प्राप्ति के प्रमुख स्रोत के रूप में एम्सटर्डम का स्थान ले लिया था।

प्रश्न 25.
‘औद्योगिक क्रान्ति’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जब हाथ के स्थान पर बड़ी-बड़ी मशीनों द्वारा विशाल कारखानों में वस्तुओं का उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जाने लगा, उसे ‘औद्योगिक क्रान्ति’ कहते हैं।

प्रश्न 26.
सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति के शुरू होने के दो कारण बताइए।
उत्तर:
(1) इंग्लैण्ड सत्रहवीं शताब्दी से राजनीतिक दृष्टि से सुदृढ़ एवं सन्तुलित रहा था।
(2) इंग्लैण्ड में कोयला और लोहा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था।

प्रश्न 27.
1750 से 1800 के बीच इंग्लैण्ड में बड़ी आबादी वाले शहरों की संख्या कितनी थी ? उनमें सबसे बड़ा शहर कौनसा था ?
उत्तर:
(1) 11
(2) लन्दन।

प्रश्न 28.
इंग्लैण्ड की वित्तीय प्रणाली का केन्द्र कौनसा बैंक था ? उस बैंक की स्थापना कब हुई थी ?
उत्तर:
इंग्लैण्ड की वित्तीय प्रणाली का केन्द्र बैंक ऑफ इंग्लैण्ड था। बैंक ऑफ इंग्लैण्ड की स्थापना 1694 में हुई

प्रश्न 29.
लोहा प्रगलन की प्रक्रिया से आप क्या समझते हैं? इसमें किसका प्रयोग किया जाता था ?
उत्तर:
लोहा प्रगलन की प्रक्रिया के द्वारा लौह खनिज में से शुद्ध तरल – धातु के रूप में निकाला जाता है। इसमें काठ कोयले (चारकोल) का प्रयोग किया जाता था।

प्रश्न 30.
लोहा प्रगलन की प्रक्रिया में काठ कोयले (चारकोल) के प्रयोग करने से उत्पन्न दो समस्याओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) काठ कोयला लम्बी दूरी तक ले जाने की प्रक्रिया में टूट जाया करता था।
(2) घटिया प्रकार के लोहे का ही उत्पादन होता था।

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प्रश्न 31.
लौह धातुकर्म उद्योग में क्रान्ति लाने का श्रेय किस परिवार को है?
उत्तर:
लौह धातुकर्म उद्योग में क्रान्ति लाने का श्रेय श्रीप शायर के एक डर्बी परिवार को है। इस परिवार की तीन पीढ़ियों ने धातुकर्म उद्योग में क्रान्ति ला दी।

प्रश्न 32.
धमन भट्टी का आविष्कार किसने किया और कब किया?
उत्तर:
1709 में प्रथम अब्राहम डर्बी ने धमन भट्टी का आविष्कार किया जिसमें सर्वप्रथम ‘कोक’ का प्रयोग किया गया।

प्रश्न 33.
धमन भट्टी में कोक के प्रयोग के दो लाभ बताइए।
उत्तर:
(1) कोक में उच्च ताप उत्पन्न करने की शक्ति थी।
(2) अब भट्टियों को काठ कोयले पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था।

प्रश्न 34.
लौह- उद्योग के क्षेत्र में हेनरी कोर्ट ने क्या आविष्कार किया ?
उत्तर:
हेनरी कोर्ट ने आलोडन भट्टी तथा बेलन मिल का आविष्कार किया।

प्रश्न 35.
लौह उद्योग के विकास में जोन विल्किन्सन के योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
1770 के दशक में जोन विल्किन्सन ने सर्वप्रथम लोहे की कुर्सियाँ, आसव तथा शराब की भट्टियों के लिए टंकियाँ और लोहे की सभी आकार की पाइपें बनाईं।

प्रश्न 36.
विश्व में प्रथम लोहे का पुल किसने और कब बनाया?
उत्तर:
1779 ई. में तृतीय डर्बी ने विश्व में पहला लोहे का पुल कोलब्रुकडेल में सेवर्न नदी पर बनाया।

प्रश्न 37.
इंग्लैण्ड में मशीनीकरण में काम आने वाले कौनसे मुख्य खनिज बहुतायत में उपलब्ध थे ?
उत्तर:
इंग्लैण्ड में मशीनीकरण में काम आने वाले मुख्य खनिज कोयला तथा लौह-अयस्क बहुतायत में उपलब्ध

प्रश्न 38.
कपास की कताई और बुनाई के क्षेत्र में हुए दो आविष्कारों और उनके आविष्कारकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) 1733 ई. में जान के ने ‘उड़न तुरी करघे’ (फ्लाइंग शटल लूम) तथा
(2) 1765 में हारग्रीव्ज ने स्पिन्निंग जैनी का आविष्कार किया।

प्रश्न 39.
‘वाटर फ्रेम’ का आविष्कार किसने किया और कब किया?
उत्तर:
1769 ई. में रिचर्ड आर्कराइट ने ‘वाटर फ्रेम’ नामक मशीन का आविष्कार किया।

प्रश्न 40.
औद्योगीकरण में भाप की शक्ति का महत्त्व बताइए।
उत्तर:
भाप की शक्ति उच्च तापमानों पर दबाव उत्पन्न करती जिससे अनेक प्रकार की मशीनें चलाई जा सकती

प्रश्न 41.
भाप की शक्ति के क्षेत्र में थामस सेवरी ने क्या आविष्कार किया ?
उत्तर:
1698 में थामस सेवरी ने खानों से पानी बाहर निकालने के लिए ‘माइनर्स फ्रेंड’ (खनक-मित्र) नामक एक भाप के इंजन का मॉडल बनाया।

प्रश्न 42.
थॉमस न्यूकामेन ने भाप के इंजन का कब आविष्कार किया?
उत्तर:
1712 में थॉमस न्यूकामेन ने भाप का इंजन बनाया।

प्रश्न 43.
जेम्स वाट ने भाप का इंजन कब बनाया? इसकी क्या विशेषता थी ?
उत्तर:
1769 में जेम्स वाट ने ऐसा भाप का इंजन बनाया जिससे कारखानों में शक्ति चालित मशीनों को ऊर्जा मिलने लगी।

प्रश्न 44.
‘सोहो फाउन्ड्री’ का निर्माण किसने किया?
उत्तर:
1775 में जेम्स वाट ने एक धनी निर्माता मैथ्यू बॉल्टन की सहायता से बर्मिंघम में ‘सोहो फाउन्ड्री’ की स्थापना की।

प्रश्न 45.
1800 ई. के पश्चात् किन तत्त्वों ने भाप के इंजन की प्रौद्योगिकी के विकास में योगदान दिया ?
उत्तर:
अधिक हल्की तथा सुदृढ़ धातुओं के प्रयोग ने, अधिक सटीक मशीनी औजारों के निर्माण ने और वैज्ञानिक उन्नति के अधिक प्रसार ने।

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प्रश्न 46.
प्रारम्भ में इंग्लैण्ड में नहरों का निर्माण क्यों किया गया?
उत्तर:
प्रारम्भ में इंग्लैण्ड में नहरों का निर्माण कोयले को शहरों तक ले जाने के लिए किया गया।

प्रश्न 47.
इंग्लैण्ड में पहली नहर कब और किसके द्वारा बनाई गई ?
उत्तर:
इंग्लैण्ड में पहली नहर ‘वर्सली कैनाल ‘ 1761 ई. में जेम्स ब्रिंडली द्वारा बनाई गई।

प्रश्न 48.
नहरों के निर्माण के दो लाभ बताइए।
उत्तर:
(1) नहरों के आपस में जुड़ जाने से नए-नए शहरों में बाजार बन गए।
(2) बर्मिंघम शहर का विकास तीव्र गति से हुआ।

प्रश्न 49.
पहला भाप से चलने वाला रेल का इंजन किसके द्वारा बनाया गया और कब ?
उत्तर:
पहला भाप से चलने वाला रेल का इंजन ‘रॉकेट’ 1814 में स्टीफेंसन के द्वारा बनाया गया।

प्रश्न 50.
रेलवे परिवहन के दो लाभ बताइए।
उत्तर:
(1) रेलगाड़ियाँ वर्ष भर उपलब्ध रहती थीं।
(2) ये सस्ती और तेज भी थीं तथा माल और यात्री दोनों को ढो सकती थीं।

प्रश्न 51.
रिचर्ड ट्रेविथिक ने रेल के इंजन का निर्माण कब किया? इसे क्या कहा जाता था ?
उत्तर:
1801 में रिचर्ड ट्रेविथिक ने रेल के इंजन का निर्माण किया। इसे ‘पफिंग डेविल’ (फुफकारने वाला दानव) कहते थे।

प्रश्न 52.
‘ब्लचर’ नामक रेलवे इंजन किसने बनाया और कब ?
उत्तर:
1814 में जार्ज स्टीफेन्सन नामक एक रेलवे इन्जीनियर ने ‘ब्लचर’ नामक रेल इंजन बनाया।

प्रश्न 53.
इंग्लैण्ड में पहली रेलवे लाइन कब बनाई गई ?
उत्तर:
1825 में इंग्लैण्ड में पहली रेलवे लाइन स्टाकटन तथा डार्लिंगटन शहरों के बीच बनाई गई।

प्रश्न 54.
1830 के दशक में नहरी परिवहन में कौनसी समस्याएँ आईं ?
उत्तर:
(1) नहरों के कुछ भागों में जलपोतों की भीड़भाड़ के कारण परिवहन की गति धीमी पड़ गई।
(2) पाले, बाढ़ या सूखे के कारण नहरों के प्रयोग का समय सीमित हो गया।

प्रश्न 55.
‘छोटे रेलोन्माद’ तथा ‘बड़े रेलोन्माद’ के दौरान कितने मील लम्बी रेल लाइन बनाई गई ?
उत्तर:
1833-37 के ‘छोटे रेलोन्माद’ के दौरान 1400 मील लम्बी रेल लाइन और 1844-47 के ‘बड़े रेलोन्माद’ के दौरान 9500 मील लम्बी रेल लाइन बनाई गई।

प्रश्न 56.
ब्रिटेन के उद्योगपति प्रायः स्त्रियों और बच्चों को अपने कारखानों में काम पर क्यों लगाते थे? दो कारण बताइए।
उत्तर:
(1) स्त्रियों और बच्चों को पुरुषों की अपेक्षा कम मजदूरी दी जाती थी।
(2) स्त्रियाँ और बच्चे अपने काम की घटिया परिस्थितियों की कम आलोचना करते थे।

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प्रश्न 57.
कारखानों में काम करते समय बच्चों को किन दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता था ?
उत्तर:
(1) कारखानों में काम करते समय कई बार तो बच्चों के बाल मशीनों में फँस जाते थे अथवा उनके हाथ कुचल जाते थे। (2) कभी – कभी बच्चे मशीनों में गिर कर मर जाते थे।

प्रश्न 58.
कोयले की खानें बच्चों के काम करने के लिए क्यों खतरनाक होती थीं? दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
(1) खानों की छतें धँस जाती थीं अथवा वहाँ विस्फोट हो जाता था।
(2) छोटे बच्चों को ‘ट्रैपर’ का काम करना पड़ता था।

प्रश्न 59.
कारखानों के मालिक बच्चों से काम लेना आवश्यक क्यों समझते थे ?
उत्तर:
कारखानों के मालिक बच्चों से काम लेना बहुत आवश्यक समझते थे ताकि वे अभी से काम सीख कर बड़े होकर उनके लिए अच्छा काम कर सकें।

प्रश्न 60.
फ्रांस के साथ लम्बे समय तक युद्ध करते रहने से इंग्लैण्ड पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
(1) इंग्लैण्ड तथा यूरोप के बीच होने वाला व्यापार अस्त-व्यस्त हो गया।
(2) अनेक फैक्ट्रियों को बन्द करना पड़ा।
(3) बेरोजगारी में वृद्धि हुई।

प्रश्न 61.
1795 के अधिनियम के अन्तर्गत ब्रिटेनवासियों पर क्या प्रतिबन्ध लगाए गए ?
उत्तर:
1795 के अधिनियम के अन्तर्गत ब्रिटेनवासियों को भाषण या लेखन द्वारा उकसाना अवैध घोषित कर दिया

प्रश्न 62.
ब्रिटेनवासियों ने ‘पुराने भ्रष्टाचार’ के विरुद्ध अपना आन्दोलन जारी रखा। ‘पुराना भ्रष्टाचार’ क्या था ?
उत्तर:
‘पुराना भ्रष्टाचार’ शब्द का प्रयोग राजतन्त्र और संसद के सम्बन्ध में किया जाता था।

प्रश्न 63.
‘कार्न लाज’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
‘कार्न लाज’ कानून के अन्तर्गत ब्रिटेन में विदेशों से सस्ते अनाज के आयात पर रोक लगा दी गई थी।

प्रश्न 64.
लुडिज्म आन्दोलन क्या था ?
उत्तर:
ब्रिटेन के जनरल नेडलुड के नेतृत्व में लुडिज्म (1811-17) नामक एक आन्दोलन चलाया गया। यह एक प्रकार के विरोध प्रदर्शन का उदाहरण था।

प्रश्न 65.
लुडिज्म के अनुयायियों की प्रमुख माँगों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) न्यूनतम मजदूरी
(2) नारी एवं बाल-श्रम पर नियन्त्रण
(3) मशीनों के आविष्कारों से बेरोजगार हुए लोगों के लिए काम।

प्रश्न 66.
‘पीटरलू के नरसंहार’ की घटना से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
ब्रिटेन में अगस्त, 1819 में 80,000 लोग अपने लिए लोकतान्त्रिक अधिकारों की माँग करने के लिए सेंट पीटर्स मैदान में इकट्ठे हुए, परन्तु उनका बलपूर्वक दमन कर दिया गया।

प्रश्न 67.
1819 के कानूनों के अनुसार ब्रिटेन में मंजदूरों को क्या सुविधाएँ प्रदान की गई ?
उत्तर:
1819 के कानूनों के अन्तर्गत 9 वर्ष से कम की आयु वाले बच्चों से फैक्ट्रियों में काम करवाने पर प्रतिबन्ध लंगा दिया गया।

प्रश्न 68.
फैक्ट्री पद्धति की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
(1) एक ही कारखाने में असंख्य लोगों का एक-साथ काम करना।
(2) मशीनों का यान्त्रिक शक्ति से चलना।

प्रश्न 69.
औद्योगिक क्रान्ति के दो सामाजिक परिणाम (प्रभाव) बताइए।
उत्तर:
(1) स्त्रियों और बच्चों की स्थिति शोचनीय हो गई।
(2) मजदूरों की स्थिति भी शोचनीय हो गई।

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प्रश्न 70.
औद्योगिक क्रान्ति के दो आर्थिक परिणाम बताइए।
उत्तर:
(1) वस्तुओं के उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुई।
(2) औद्योगिक पूँजीवाद का विकास हुआ।

प्रश्न 71.
‘नहरोन्माद’ से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
1788 से 1796 ई. तक की अवधि को ‘नहरोन्माद’ कहा जाता है क्योंकि इस अवधि में 46 नहरों के निर्माण की परियोजनाएँ शुरू की गई थीं।

लघुत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
ब्रिटेन में सम्पन्न हुई ‘प्रथम औद्योगिक क्रान्ति’ एवं ‘द्वितीय औद्योगिक क्रान्ति’ के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
ब्रिटेन में ‘प्रथम औद्योगिक क्रान्ति’ – ब्रिटेन में 1780 के दशक और 1850 के दशक के बीच उद्योग और अर्थव्यवस्था का जो रूपान्तरण हुआ, उसे ‘प्रथम औद्योगिक क्रान्ति’ कहते हैं। इस क्रान्ति के ब्रिटेन में दूरगामी प्रभाव हुए। ब्रिटेन में ‘द्वितीय औद्योगिक क्रान्ति’ – इंग्लैण्ड में ‘दूसरी औद्योगिक क्रान्ति’ लगभग 1850 ई. के बाद आई। इस क्रान्ति में रसायन तथा बिजली जैसे नये औद्योगिक क्षेत्रों का विस्तार हुआ। उस अवधि में ब्रिटेन, जो पहले विश्व- भर में औद्योगिक शक्ति के रूप में अग्रणी था, पिछड़ गया और जर्मनी तथा संयुक्त राज्य अमेरिका उससे आगे निकल गए।

प्रश्न 2.
औद्योगिक क्रान्ति का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
औद्योगिक क्रान्ति का अर्थ- जब हाथ के स्थान पर मशीनों द्वारा बड़े-बड़े कारखानों में वस्तुओं का उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगा, जिसके परिणामस्वरूप उद्योग, व्यवसाय, यातायात, संचार आदि क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए, उन्हें ‘औद्योगिक क्रान्ति’ के नाम से पुकारा जाता है। अब घरेलू उत्पादन पद्धति का स्थान कारखाना पद्धति ने ले लिया, जहाँ बड़े पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन होने लगा। इस प्रकार, औद्योगिक जीवन में परिवर्तन इतने बड़े और तीव्र गति से हुए कि उन्हें व्यक्त करने के लिए ‘औद्योगिक क्रान्ति’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। इंग्लैण्ड में 1780 के दशक और 1850 के दशक के बीच उद्योग और अर्थव्यवस्था का जो रूपान्तरण हुआ, उसे प्रथम ‘औद्योगिक क्रान्ति’ कहते हैं। इंग्लैण्ड में दूसरी औद्योगिक क्रान्ति लगभग 1850 के बाद आई। इतिहासकार डेविस ने ‘औद्योगिक क्रान्ति’ का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है कि ” ‘औद्योगिक क्रान्ति’ का अभिप्राय उन परिवर्तनों से है, जिन्होंने यह सम्भव कर दिया कि मनुष्य उत्पादन के प्राचीन साधनों को त्याग कर विशाल पैमाने पर विशाल कारखानों में वस्तुओं का उत्पादन कर सके।”

प्रश्न 3.
‘औद्योगिक क्रान्ति’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किन विद्वानों द्वारा किया गया ?
उत्तर:
‘औद्योगिक क्रान्ति’ शब्द का प्रयोग – ‘औद्योगिक क्रान्ति’ शब्द का प्रयोग फ्रांस के विद्वान जार्जिस मिले और जर्मनी के विद्वान फ्रेडरिक एंजेल्स द्वारा किया गया। अंग्रेजी में इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम दार्शनिक एवं अर्थशास्त्री आरनाल्ड टायनबी द्वारा उन परिवर्तनों का वर्णन करने के लिए किया गया जो ब्रिटेन के औद्योगिक विकास में 1760 और 1820 के बीच हुए थे। इस सम्बन्ध में टायनबी ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में कई व्याख्यान दिए थे। उनके व्याख्यान उनकी मृत्यु के पश्चात् 1884 में एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुए, जिसका नाम था -‘लेक्चर्स ऑन दि इण्डस्ट्रियल रिवोल्यूशन इन इंग्लैण्ड’।

प्रश्न 4.
सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में ही औद्योगिक क्रान्ति के प्रारम्भ होने के क्या कारण थे?
उत्तर:
1. इंग्लैण्ड में सुदृढ़ राजनीतिक व्यवस्था – इंग्लैण्ड सत्रहवीं शताब्दी से राजनीतिक दृष्टि से सुदृढ़ एवं सन्तुलित रहा था। इंग्लैण्ड में एक ही कानून व्यवस्था, एक ही सिक्का ( मुद्रा – प्रणाली) और एक ही बाजार व्यवस्था थी। मुद्रा का प्रयोग विनिमय के रूप में होने से लोगों को अपनी आय से अधिक खर्च करने के लिए साधन प्राप्त हो गए और वस्तुओं की बिक्री के लिए बाजार का विस्तार हो गया।

2. कृषि क्रान्ति – अठारहवीं शताब्दी में इंग्लैण्ड में ‘कृषि क्रान्ति’ सम्पन्न हुई। इसके परिणामस्वरूप बड़े जमींदारों ने छोटे-छोटे खेत खरीद लिए। इससे भूमिहीन किसान और चरवाहे एवं पशुपालक रोजगार की तलाश में शहरों में चले गए।

3. भूमंडलीय व्यापार – 18वीं सदी तक आते-आते भूमंडलीय व्यापार का केन्द्र इटली और फ्रांस के पत्तनों से हटकर हालैंड और ब्रिटेन के पत्तनों पर आ गया और लंदन ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में एम्सटर्डम का स्थान ले लिया।

4. कोयला, लोहा आदि की उपलब्धता – इंग्लैण्ड इस मामले में सौभाग्यशाली था कि वहाँ मशीनीकरण में काम आने वाली मुख्य सामग्रियाँ – कोयला और लौह अयस्क तथा उद्योगों में काम आने वाली खनिज जैसे सीसा, ताँबा, रांगा (टिन) आदि बहुतायत में उपलब्ध थीं।

5. अन्य कारण – उक्त कारणों के साथ-साथ अन्य कारण थे-
(i) गाँवों से आए गरीब लोग नगरों में काम करने के लिए उपलब्ध हो गए।
(ii) बड़े-बड़े उद्योग धंधे स्थापित करने के लिए आवश्यक ऋण राशि उपलब्ध कराने के लिए बैंक मौजूद थे।
(iii) परिवहन के लिए एक अच्छी व्यवस्था उपलब्ध थी। रेल मार्गों के निर्माण से वहाँ एक नया परिवहन तंत्र तैयार हो गया था।
(iv) प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों (आविष्कारों) की एक श्रृंखला ने उत्पादन के स्तर में अचानक वृद्धि कर दी थी।

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प्रश्न 5.
18वीं शताब्दी तक ब्रिटेन में लोहे के क्षेत्र में क्या समस्याएँ थीं?
उत्तर:
18वीं शताब्दी तक ब्रिटेन में प्रयोग योग्य लोहे की कमी थी। लोहा प्रगलन की प्रक्रिया के द्वारा लौह खनिज में से शुद्ध तरल – धातु के रूप में निकाला जाता था। प्रगलन प्रक्रिया के लिए काठ कोयले (चारकोल) का प्रयोग किया जाता था। इस कार्य में निम्नलिखित समस्याएँ थीं-
(1) काठ कोयला लम्बी दूरी तक ले जाने की प्रक्रिया में टूट जाया करता था।
(2) इसकी अशुद्धताओं के कारण घटिया प्रकार के लोहे का ही उत्पादन होता था।
(3) यह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध भी नहीं था, क्योंकि लकड़ी के लिए जंगल काट लिए गए
(4) यह उच्च तापमान उत्पन्न नहीं कर सकता था।

प्रश्न 6.
18वीं शताब्दी में ब्रिटेन में लोहा उद्योग के क्षेत्र में हुए विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
18वीं सदी में ब्रिटेन में लोहा उद्योग के क्षेत्र में हुए विकास –
(i) 1709 में प्रथम अब्राहम डर्बी ने धमन भट्टी का आविष्कार किया। इसमें सर्वप्रथम ‘कोक’ का प्रयोग किया गया। कोक में उच्च ताप उत्पन्न करने की शक्ति थी। इस आविष्कार से काठ कोयले की निर्भरता समाप्त हो गई।
(ii) द्वितीय डर्बी ने ढलवाँ लोहे से पिटवाँ लोहे का विकास किया जो कम भंगुर था।
(iii) हेनरी कोर्ट ने आलोडन भट्टी और बेलन मिल का आविष्कार किया। अब लोहे से अनेकानेक उत्पाद बनाना संभव हो गया।
(iv) 1770 के दशक में जोन विल्किन्सन ने सर्वप्रथम लोहे की कुर्सियाँ, आसव तथा शराब की भट्टियों के लिए टंकियाँ तथा लोहे की नलियाँ (पाइपें ) बनाईं।
(v) 1779 में तृतीय डर्बी ने विश्व में पहला लोहे का पुल कोलब्रुकडेल में सेवर्न नदी पर बनाया। (vi) विलकिन्सन ने पेरिस को पानी की आपूर्ति के लिए 40 मील लम्बी पानी की पाइपें पहली बार ढलवाँ लोहे में बनाई। ब्रिटेन के लौह उद्योग ने 1800 से 1830 की अवधि में अपने उत्पादन को चौगुना बढ़ा लिया।

प्रश्न 7.
कपास की कताई और बुनाई के क्षेत्र में ब्रिटेन में हुए विभिन्न आविष्कारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. उड़न तुरी करघा (फ्लाइंग शटल लूम ) – 1733 ई. में लंकाशायर निवासी जान के ने उड़न तुरी करघा (फ्लाइंग शटल लूम) का आविष्कार किया। इसकी सहायता से कम समय में अधिक चौड़ा कपड़ा बनाना सम्भव हो गया।

2. स्पिनिंग जैनी – 1765 ई. में ब्लैकबर्न निवासी जेम्स हारग्रीव्ज ने ‘स्पिन्निंग जैनी’ नामक मशीन का आविष्कार किया। इस पर एक अकेला व्यक्ति एक साथ कई धागे कात सकता था।

3. वाटर फ्रेम – 1769 ई. में रिचर्ड आर्कराइट ने ‘वाटर फ्रेम’ नामक मशीन का आविष्कार किया। इस मशीन द्वारा पहले से कहीं अधिक मजबूत धागा बनाया जाने लगा।

4. म्यूल – 1779 ई. में सेम्युल क्राम्पटन ने ‘म्यूल’ नामक मशीन का आविष्कार किया।

5. पावरलूम – 1787 में एडमंड कार्टराइट ने पावरलूम अर्थात् शक्ति-चालित करघे का आविष्कार किया।

प्रश्न 8.
18वीं शताब्दी के प्रारम्भ में ब्रिटेन में कताई व बुनाई के उद्योग में क्या समस्याएँ थीं?
उत्तर:
ब्रिटेन में कताई व बुनाई के उद्योग में समस्याएँ – अठारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ब्रिटेन में कताई का काम इतनी धीमी गति और परिश्रम से किया जाता था कि एक बुनकर को व्यस्त रखने के लिए आवश्यक धागा कातने के लिए 10 कातने वालों, अधिकतर स्त्रियों की आवश्यकता पड़ती थी। इसलिए कातने वाले दिन भर कताई के काम में व्यस्त रहते थे, जबकि बुनकर बुनाई के लिए धागे की प्रतीक्षा में समय नष्ट करते रहते थे।

प्रश्न 9.
“1780 के दशक से कपास उद्योग कई रूपों में ब्रिटिश औद्योगीकरण का प्रतीक बन गया। ” स्पष्ट कीजिए। इस उद्योग की क्या विशेषताएँ थीं?
उत्तर:
अठारहवीं शताब्दी में कपास की कताई और बुनाई के उद्योग में अनेक आविष्कार हुए जिसके फलस्वरूप वस्त्र उद्योग में अत्यधिक उन्नति हुई। 1780 के दशक से कपास उद्योग कई रूपों में ब्रिटिश औद्योगीकरण का प्रतीक बन गया। इस उद्योग की दो प्रमुख विशेषताएँ थीं –
(1) कच्चे माल के रूप में आवश्यक कपास सम्पूर्ण रूप से आयात करना पड़ता था।
(2) जब उससे कपड़ा तैयार हो जाता था, तो उसका अधिकांश भाग निर्यात किया जाता था। इसके लिए इंग्लैण्ड के पास अपने उपनिवेश होना आवश्यक था ताकि वह इन उपनिवेशों से कच्चा कपास प्रचुर मात्रा में मँगा सके और फिर इंग्लैण्ड में उससे कपड़ा बनाकर तैयार माल को उन्हीं उपनिवेशों के बाजारों में बेच सके।

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प्रश्न 10.
अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटेन में भाप की शक्ति के क्षेत्र में हुए आविष्कारों व परिवर्तनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. भाप के इंजन के मॉडल का आविष्कार – भाप की शक्ति का प्रयोग सर्वप्रथम खनन उद्योगों में किया गया। 1698 में थॉमस सेवरी ने खानों से पानी बाहर निकालने के लिए माइनर्स फ्रेंड ( खनक – मित्र) नामक एक भाप के इंजन का मॉडल बनाया। ये छिछली गहराइयों में धीरे-धीरे काम करते थे।

2. थॉमस न्यूकामेन द्वारा भाप का इंजन बनाना – 1712 ई. में थॉमस न्यूकामेन ने भाप का एक और इंजन बनाया। इसमें सबसे बड़ी कमी यह थी कि संघनन बेलन के निरन्तर ठण्डा होते रहने से इसकी ऊर्जा समाप्त होती रहती थी।

3. जेम्स वाट द्वारा भाप के इंजन का आविष्कार – 1769 ई. में जेम्स वाट ने भाप के इंजन का आविष्कार किया। जेम्स वाट ने एक ऐसी मशीन विकसित की, जिससे भाप का इंजन केवल एक साधारण पम्प की बजाय एक प्रमुख चालक के रूप में काम देने लगा जिससे कारखानों में शक्ति चालित मशीनों को ऊर्जा मिलने लगी।

4. सोहो फाउन्डरी का निर्माण – 1775 में जेम्स वाट ने मैथ्यू बाल्टन की सहायता से बर्मिंघम में ‘सोहो फाउन्डरी’ का निर्माण किया। उस फाउन्डरी से जेम्स वाट के स्टीम इंजन बराबर बढ़ती हुई संख्या में निकलने लगे। 18वीं सदी के अन्त तक जेम्स वाट के भाप इंजन ने द्रवचालित शक्ति का स्थान लेना शुरू कर दिया था। 1800 के बाद भाप के इंजन की प्रौद्योगिकी और अधिक विकसित हो गई।

प्रश्न 11.
अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटेन में नहरों के विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ब्रिटेन में प्रारम्भ में नहरें कोयले को शहरों तक ले जाने के लिए बनाई गईं। इसका कारण यह था कि कोयले को नहरों के मार्ग से ले जाने में समय और खर्च दोनों ही कम लगते थे।
इंग्लैण्ड में पहली नहर ‘वर्सली कैनाल ‘1761 ई. में जेम्स ब्रिंडली द्वारा बनाई गई। इस नहर के निर्माण का केवल यही उद्देश्य था कि इसके द्वारा वर्सले के कोयला भण्डारों से शहर तक कोयला ले जाया जाए। नहरों के आपस में जुड़ जाने से नए-नए शहरों में बाजार बन गए और उनका विकास हुआ। उदाहरणार्थ बर्मिंघम शहर का विकास केवल इसलिए तेजी से हुआ क्योंकि वह लन्दन, ब्रिस्टल चैनल और करसी तथा हंबर नदियों के साथ जुड़ने वाली नहर प्रणाली के बीच में स्थित था। ब्रिटेन में 1760 से 1790 के बीच नहरें बनाने की 25 परियोजनाएँ शुरू की गईं। 1788 से 1796 तक की अवधि में 46 नई परियोजनाएँ शुरू की गईं। उसके पश्चात् अगले 60 वर्षों में अनेक नहरें बनाई गईं जिनकी लम्बाई कुल मिलाकर 4000 मील से अधिक थी।

प्रश्न 12.
औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप ब्रिटेन में वेतनभोगी मजदूरों के जीवन की औसत अवधि कम क्यों थी?
उत्तर:
1842 में ब्रिटेन में किए गए एक सर्वेक्षण से यह ज्ञात हुआ कि वहाँ वेतनभोगी मजदूरों या कामगारों के जीवन की औसत अवधि शहरों में रहने वाले अन्य सामाजिक समूहों के जीवन-काल से कम थी जैसे बर्मिंघम में यह 15 वर्ष, मैनचेस्टर में 17 वर्ष तथा डर्बी में 21 वर्ष थी। नए औद्योगिक नगरों में गाँवों से आकर रहने वाले लोग ग्रामीण लोगों की तुलना में काफी छोटी आयु में मौत के मुँह में चले जाते थे। वहाँ उत्पन्न होने वाले बच्चों में से आधे तो पाँच वर्ष की आयु प्राप्त करने से पूर्व ही मर जाते थे।
मजदूरों की मृत्यु अधिकतर उन महामारियों के कारण होती थी जो जल- प्रदूषण से जैसे हैजा तथा आंत्रशोथ से और वायु-प्रदूषण से जैसे क्षय रोग से होती थी। 1832 में ब्रिटेन में हैजे की महामारी फैल गई जिसमें 31,000 से अधिक लोग मौत के मुँह में चले गए। 19वीं सदी के अंतिम दशकों तक नगर – प्राधिकारी जीवन की इन भयंकर परिस्थितियों की ओर कोई ध्यान नहीं देते थे और इन बीमारियों के निदान व उपचार के बारे में चिकित्सकों को कोई जानकारी नहीं थी।

प्रश्न 13.
औद्योगिक क्रान्ति से ब्रिटेनवासियों के जीवन में क्या परिवर्तन आया?
उत्तर:
1. पूँजी में वृद्धि – औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप धनी लोगों ने उद्योग-धन्धों में पूँजी निवेश किया जिससे उन्हें खूब मुनाफा हुआ और उनके धन में अत्यधिक वृद्धि हुई।
2. अन्य क्षेत्रों में वृद्धि – औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप धन, माल, आय, सेवाओं, ज्ञान और उत्पादक कुशलता के रूप में महत्त्वपूर्ण वृद्धि हुई।
3. नगरीय जनसंख्या में वृद्धि – 1750 में इंग्लैण्ड में 50,000 से अधिक की आबादी वाले नगरों की संख्या केवल दो थी जो बढ़कर 1850 में 29 हो गई।
4. परिवारों का टूटना – पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियों और बच्चों को भी कारखानों में काम करना पड़ता था। परिणामस्वरूप अनेक परिवार टूट गए।
5. नवीन समस्याएँ उत्पन्न होना – मजदूरों को अनेक नई समस्याओं का सामना करना पड़ा। उन्हें कारखानों के आस-पास भीड़भाड़ वाली गन्दी बस्तियों में रहना पड़ा। वे अनेक बीमारियों के शिकार बन गए और असमय मौत के मुँह में जाने लगे।

प्रश्न 14.
फैक्ट्री पद्धति की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
फैक्ट्री पद्धति की विशेषताएँ निम्नलिखित थीं –
(1) बड़े-बड़े कारखानों की स्थापना हुई जिनमें हजारों लोग एक-साथ काम करते थे
(2) उत्पादन के सभी साधनों पर पूँजीपतियों का स्वामित्व था।
(3) श्रमिकों की देखभाल के लिए निरीक्षकों की नियुक्ति की जाती थी।
(4) पूँजीपति कारखानों के स्वामी होते थे तथा मजदूर कारखानों में अपनी मजदूरी पाने के लिए कार्य करते थे।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
इंग्लैण्ड में ही सर्वप्रथम औद्योगिक क्रान्ति के प्रारम्भ होने के कारणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
इंग्लैण्ड में ही सर्वप्रथम औद्योगिक क्रान्ति के प्रारम्भ होने के कारण
इंग्लैण्ड में ही सर्वप्रथम औद्योगिक क्रान्ति के प्रारम्भ होने के कारण निम्नलिखित थे-
1. इंग्लैण्ड में राजनीतिक स्थिरता – इंग्लैण्ड सत्रहवीं शताब्दी से राजनीतिक दृष्टि से सुदृढ़ एवं सन्तुलित था और इसके तीनों भागों—इंग्लैण्ड, वेल्स और स्कॉटलैण्ड पर एक ही राजतन्त्र अर्थात् सम्राट का एकछत्र शासन रहा था। वहाँ अन्य देशों की अपेक्षा राजनीतिक स्थिरता अधिक थी। इंग्लैण्ड में एक ही कानून व्यवस्था, एक ही सिक्का ( मुद्रा- प्रणाली) और एक ही बाजार व्यवस्था थी। इस बाजार व्यवस्था में स्थानीय प्राधिकरणों का कोई हस्तक्षेप नहीं था। सत्रहवीं शताब्दी तक आते-आते, मुद्रा का प्रयोग विनिमय के रूप में व्यापक रूप से होने लगा था। तब तक बड़ी संख्या में ब्रिटेनवासी अपनी कमाई वस्तुओं की बजाय मजदूरी और वेतन के रूप में प्राप्त करने लगे। इससे उन्हें अपनी आय से अधिक खर्च करने के लिए साधन प्राप्त हो गए और वस्तुओं की बिक्री के लिए बाजार का विस्तार हो गया।

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2. कृषि क्रान्ति – अठारहवीं शताब्दी में इंग्लैण्ड में ‘कृषि – क्रान्ति’ सम्पन्न हुई। इसके परिणामस्वरूप बड़े जमींदारों ने अपनी जमीनों के आस-पास छोटे-छोटे खेत खरीद लिए और गाँव की सार्वजनिक जमीनों को घेर लिया। इससे विवश होकर भूमिहीन किसान, चरवाहे और पशुपालक रोजगार की तलाश में शहरों में चले गए।

3. शहरों का विकास – यूरोप के जिन 19 शहरों की आबादी सन् 1750 से 1800 के बीच दोगुनी हो गई थी; उनमें से 11 ब्रिटेन में थे। इन 11 शहरों में लन्दन सबसे बड़ा था, जो देश के बाजारों का केन्द्र था, शेष बड़े- बड़े शहर भी लन्दन के आसपास ही स्थित थे। लन्दन ने सम्पूर्ण विश्व में भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया था। शहरों में बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण वस्तुओं की माँग बहुत बढ़ गई। इससे उद्योगपतियों को बड़े पैमाने पर वस्तुओं के उत्पादन की प्रेरणा मिली।

4. व्यापार की उन्नति – 18वीं सदी तक आते-आते भू-मण्डलीय व्यापार का केन्द्र इटली तथा फ्रांस के भूमध्य सागरीय बन्दरगाहों से हट कर हालैण्ड और ब्रिटेन के अटलान्टिक बन्दरगाहों पर आ गया था। इसके बाद लन्दन ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार हेतु ऋण प्राप्ति के प्रमुख स्रोत के रूप में एम्स्टर्डम का स्थान ले लिया था। लन्दन इंग्लैण्ड, अफ्रीका और वेस्टइण्डीज के बीच स्थापित त्रिकोणीय व्यापार का केन्द्र बन गया था।

5. यातायात का विकास – 1724 से इंग्लैण्ड के पास नदियों के द्वारा लगभग 1160 मील लम्बा जलमार्ग था जिसमें नौकाएँ चल सकती थीं तथा पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़कर देश के अधिकांश स्थान नदी से अधिक से अधिक 15 मील की दूरी पर थे। इंग्लैण्ड की नदियों के समस्त नौचालन के भाग समुद्र से जुड़े हुए थे, इसलिए नदी पोतों के द्वारा ढोया जाने वाला माल समुद्र-तटीय जहाजों तक सरलता से ले जाया और सौंपा जा सकता था।

6. बैंकों का विकास – इंग्लैण्ड में बैंकों का विकास हो चुका था। 1694 में बैंक ऑफ इंग्लैण्ड की स्थापना हो चुकी थी। यह देश की वित्तीय प्रणाली का केन्द्र था। 1784 तक इंग्लैण्ड में कुल मिलाकर एक सौ से अधिक प्रान्तीय बैंक थे। 1820 के दशक तक प्रान्तों में 600 से अधिक बैंक थे। अतः बड़े-बड़े उद्योग-धन्धे स्थापित करने के लिए आवश्यक ऋण-राशि उपलब्ध कराने के लिए बैंक मौजूद थे।

7. लोहे तथा कोयले का प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होना – इंग्लैण्ड में लोहे और कोयले की खानें आसपास थीं। वहां लोहा तथा कोयला प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे। इससे पक्के लोहे का निर्माण सरलता से होने लगा।

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8. पूँजी की अधिकता – इंग्लैण्ड में पूँजी की अधिकता थी। वाणिज्यवाद के परिणामस्वरूप इंग्लैण्ड में प्रचुर पूँजी जमा हो गई थी। बैंकिंग व्यवस्था ने भी इंग्लैण्ड में पूँजी – संचय तथा विनियोग को समान बनाया।

9. वैज्ञानिक आविष्कार – 18वीं शताब्दी में इंग्लैण्ड में अनेक वैज्ञानिक हुए जिन्होंने कृषि, व्यवसाय, यातायात आदि क्षेत्रों के अनेक आविष्कार किये। इन आविष्कारों ने औद्योगिक क्रान्ति को सफल बनाने में योगदान दिया।

10. कुशल श्रमिकों की उपलब्धि – इंग्लैण्ड में कुशल श्रमिक बड़ी संख्या में उपलब्ध थे। यूरोप के अधिकांश देशों में आन्तरिक शान्ति तथा व्यवस्था का अभाव था। इसलिए वहाँ के बहुत से कुशल श्रमिक भाग कर इंग्लैण्ड में आ गए थे।

11. औपनिवेशिक साम्राज्य – अठारहवीं शताब्दी के अन्त तक इंग्लैण्ड ने एक विस्तृत औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित कर लिया था। इंगलैण्ड इन उपनिवेशों से कच्चा माल प्राप्त कर सकता था तथा वहाँ अपना तैयार माल बेच सकता था।

प्रश्न 2.
अठारहवीं शताब्दी में इंग्लैण्ड में कोयले और लोहे के उद्योग क्षेत्र में हुए विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अठारहवीं शताब्दी में इंग्लैण्ड में कोयले और लोहे के उद्योग क्षेत्र में विकास
इंग्लैण्ड में मशीनीकरण में काम आने वाली मुख्य सामग्रियाँ – कोयला और लौह-अयस्क प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थीं। इसके अतिरिक्त वहाँ उद्योग में काम आने वाले अन्य खनिज, जैसे-सीसा, ताँबा और राँगा (टिन) आदि भी उपलब्ध थे। परन्तु अठारहवीं शताब्दी तक, वहाँ प्रयोग योग्य लोहे की कमी थी।

1. काठ कोयले ( चारकोल ) के प्रयोग की समस्याएँ – लोहा प्रगलन की प्रक्रिया के द्वारा लौह खनिज में से शुद्ध तरल – धातु के रूप में निकाला जाता है। सैकड़ों वर्षों तक इस प्रगलन प्रक्रिया के लिए काठ – कोयले ( चारकोल) का प्रयोग किया जाता था। इस प्रक्रिया की निम्नलिखित समस्याएँ थीं –
(i) काठ – कोयला लम्बी दूरी तक ले जाने की प्रक्रिया में टूट जाया करता था।
(ii) इसकी अशुद्धताओं के कारण घटिया प्रकार के लोहे का ही उत्पादन होता था।
(iii) यह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं था क्योंकि लकड़ी के लिए जंगल काट लिये गए थे।
(iv) यह उच्च तापमान भी उत्पन्न नहीं कर सकता था।

2. धमन भट्टी का आविष्कार – लौह उद्योग के क्षेत्र में, 1709 में प्रथम अब्राहम डर्बी ने धमन भट्टी का आविष्कार किया जिसमें सर्वप्रथम कोक का प्रयोग किया गया। इस आविष्कार के परिणामस्वरूप भटिट्यों को काठ कोयले पर निर्भर नहीं रहना पड़ा। इन भट्टियों से निकलने वाला पिघला हुआ लोहा पहले की अपेक्षा श्रेष्ठ होता था। 3. पिटवाँ लोहे का विकास- द्वितीय अब्राहम डर्बी ने ढलवाँ लोहे से पिटवाँ लोहे का विकास किया जो कम भंगुर था।

4. आलोडन भट्टी तथा बेलन मिल का आविष्कार – हेनरी कोर्ट ने आलोडन भट्टी तथा बेलन मिल का आविष्कार किया, जिसमें परिशोधित लोहे से छड़ें तैयार करने के लिए भाप की शक्ति का प्रयोग किया जाता था। अब लोहे से अनेकानेक उत्पाद बनाना सम्भव हो गया।
5. लोहे की कुर्सियाँ, आसव तथा शराब की भट्टियों के लिए टंकियाँ बनाना – 1770 के दशक में जोन विल्किन्सन ने सर्वप्रथम लोहे की कुर्सियाँ, आसव तथा शराब की भट्टियों के लिए टंकियां और लोहे की सभी आकारों की नलियाँ (पाइपें ) बनाई।

6. लोहे के पुल का निर्माण – 1779 ई. में तृतीय अब्राहम डर्बी ने विश्व में प्रथम लोहे का पुल कोलब्रुकडेल में सेवर्न नदी पर बनाया। विल्किन्सन ने पानी की पाइपें पहली बार ढलवाँ लोहे से बनाईं।

7. इस्पात बनाने की विधि – 1856 में हेनरी बैस्सेमर ने इस्पात बनाने की विधि खोज निकाली।

8. लौह उत्पादन में वृद्धि – ब्रिटेन के लौह उद्योग ने 1800 से 1830 के दौरान अपने उत्पादन को चौगुना बढ़ा लिया और उसका उत्पादन सम्पूर्ण यूरोप में सबसे सस्ता था। 1820 में एक टन ढलवाँ लोहा बनाने के लिए 8 टन कोयले की आवश्यकता होती थी, परन्तु 1850 तक आते-आते यह मात्रा घट गई और केवल 2 टन कोयले से ही एक टन ढलवाँ लोहा बनाया जाने लगा। 1848 तक ब्रिटेन द्वारा पिघलाए जाने वाले लोहे की मात्रा शेष सम्पूर्ण विश्व द्वारा कुल मिलाकर पिघलाए जाने वाले लोहे से अधिक थी।

प्रश्न 3.
अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटेन में कपास की कताई व बुनाई के उद्योग में हुए विकास का वर्णन कीजिए।
अथवा
अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटेन में कपास की कताई व बुनाई के उद्योग में हुए आविष्कारों का वर्णन कीजिए। उत्तर- अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटेन में कपास की कताई तथा बुनाई के उद्योग में विकास – अठारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ब्रिटेन में कताई का काम धीमी गति से किया जाता था। एक ओर कातने वाले लोग दिन-भर कताई के काम में व्यस्त रहते थे, तो दूसरी ओर बुनकर लोग बुनाई के लिए धागे के लिए अपना समय नष्ट करते रहते थे। परन्तु कालान्तर में कताई व बुनाई की प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनेक आविष्कार हुए जिसके फलस्वरूप कपास से धागा कातने और उससे कपड़ा बनाने की गति में जो अन्तर था, वह समाप्त हो गया।

कपास की कताई और बुनाई के उद्योग में महत्त्वपूर्ण आविष्कार अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटेन में कपास की कताई और बुनाई के उद्योग में निम्नलिखित आविष्कार हुए-
1. उड़न तुरी करघा (फ्लाइंग शटल लूम ) – 1733 ई. में लंकाशायर निवासी जान के ने उड़न तुरी करघा (फ्लाइंग शटल लूंम) का आविष्कार किया। इसकी सहायता से कम समय में चौड़ा कपड़ा बनाना सम्भव हो गया। इसकी सहायता से दुगुनी गति से कपड़ा बुना जा सकता था।

JAC Class 11 History Important Questions Chapter 9 संस्कृतियों का टकराव

2. स्पिन्निंग जैनी – 1765 में ब्लैकबर्न निवासी जेम्स हारग्रीव्ज ने ‘स्पिन्निंग जैनी’ नामक मशीन का आविष्कार किया। इस पर एक अकेला व्यक्ति एक-साथ सूत के आठ धागे कात सकता था। इससे बुनकरों को उनकी आवश्यकता से अधिक तेजी से धागा मिलने लगा।

3. वाटर फ्रेम – 1769 ई. में रिचर्ड आर्कराइट ने ‘वाटर फ्रेम’ नामक सूत कातने की मशीन का आविष्कार किया। इस मशीन द्वारा पहले से कहीं अधिक मजबूत धागा बनाया जाने लगा। इससे लिनन और सूती धागा दोनों को मिलाकर कपड़ा बनाने की बजाय अकेले सूती धागे से ही विशुद्ध सूती कपड़ा बनाया जाने लगा। इसने भावी ‘कारखाना पद्धति’ को जन्म दिया।

4. म्यूल – 1779 ई. में सैम्युल क्राम्पटन ने ‘म्यूल’ नामक मशीन का आविष्कार किया। इससे कता हुआ धागा बहुत मजबूत और श्रेष्ठ होता था।

5. पावरलूम – 1787 ई. में एडमण्ड कार्टराइट ने शक्ति से चलने वाले ‘पावरलूम’ नामक करघे का आविष्कार किया। ‘पावरलूम’ को चलाना अत्यन्त आसान था। जब भी धागा टूटता, वह अपने आप काम करना बन्द कर देता था। इससे किसी भी प्रकार के धागे से बुनाई की जा सकती थी। 1830 के दशक से, वस्त्र उद्योग में नई-नई मशीनें बनाने की बजाय श्रमिकों की उत्पादकता बढ़ाने पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा। इन आविष्कारों के बाद कताई – बुनाई का काम अब घरों से हटकर, कारखानों में चला गया ताकि इस कार्य में और कुशलता लायी जा सके।

प्रश्न 4.
अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटेन में भाप की शक्ति के क्षेत्र में क्या परिवर्तन एवं आविष्कार हुए?
अथवा
‘भाप की शक्ति बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण के लिए निर्णायक सिद्ध हुई। “स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटेन में भाप की शक्ति के क्षेत्र में आविष्कार एवं परिवर्तन भाप की शक्ति ने ब्रिटेन के औद्योगिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। भाप की शक्ति उच्च तापमानों पर दबाव पैदा करती थी जिससे अनेक प्रकार की मशीनें चलाई जा सकती थीं। इस प्रकार भाप की शक्ति ऊर्जा का एकमात्र ऐसा स्त्रोत था जो मशीनरी बनाने के लिए विश्वसनीय एवं कम खर्चीला था। अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटेन में भाप की शक्ति के क्षेत्र में निम्नलिखित आविष्कार एवं परिवर्तन हुए-

1. भाप के इंजन के मॉडल का आविष्कार – भाप की शक्ति का प्रयोग सर्वप्रथम खनन उद्योगों में किया गया। खानों में अचानक पानी भर जाना भी एक जटिल समस्या थी। 1698 ई. में थॉमस सेवरी ने खानों से पानी बाहर निकालने के लिए ‘माइनर्स फ्रेंड’ नामक एक भाप के इंजन का मॉडल बनाया। ये इंजन छिछली गहराइयों में धीरे-धीरे काम करते थे तथा अधिक दबाव हो जाने पर उनका बायलर फट जाता था।

2. थॉमस न्यूकॉमेन द्वारा भाप का इंजन बनाना – 1712 ई. में थॉमस न्यूकॉमेन ने भाप का एक और इंजन बनाया। इसमें सबसे बड़ी कमी यह थी कि संघनन बेलन के निरन्तर ठंडा होते रहने से इसकी ऊर्जा समाप्त होती रहती थी।

3. जेम्स वाट द्वारा भाप के इंजन का आविष्कार – 1769 तक भाप के इंजन का प्रयोग केवल कोयले की खानों में ही होता था। परन्तु 1769 में जेम्स वाट ने इसका एक और प्रयोग खोज निकाला। 1769 में जेम्स वाट ने ऐसी मशीन विकसित की, जिससे भाप का इंजन केवल एक साधारण पम्प की बजाय एक प्रमुख चालक के रूप में काम देने लगा। इससे कारखानों में शक्ति चालित मशीनों को ऊर्जा मिलने लगी। इस प्रकार जेम्स वाट के भाप के इंजन के आविष्कार के कारण अब कारखानों में भी भाप की शक्ति का प्रयोग किया जाने लगा।

4. सोहो फाउन्डरी का निर्माण – 1775 में जेम्स वाट ने एक धनी निर्माता मैथ्यू बाल्टन की सहायता से बर्मिंघम में ‘सोहो फाउन्डरी’ का निर्माण किया। इस फाउन्डरी से जेम्स वाट के भाप के इंजन बड़ी संख्या में बनकर निकलने लगे। अठारहवीं सदी के अन्त तक जेम्स वाट के भाप के इंजन ने द्रवचालित शक्ति का स्थान लेना शुरू कर दिया था।

5. भाप के इंजन की प्रौद्योगिकी का विकास – 1800 ई. के बाद भाप के इंजन की प्रौद्योगिकी का और अधिक विकास हुआ। इसमें निम्नलिखित तत्त्वों ने सहयोग दिया –
(i) अधिक हल्की तथा मजबूत धातुओं का प्रयोग।
(ii) अधिक सटीक मशीनी औजारों का निर्माण।
(iii) वैज्ञानिक जानकारी का अधिक व्यापक प्रसार।
1840 में स्थिति यह थी कि ब्रिटेन में बने भाप के इंजन ही सम्पूर्ण यूरोप में आवश्यक ऊर्जा की 70 प्रतिशत से अधिक अश्व शक्ति का उत्पादन कर रहे थे।

प्रश्न 5.
अठारहवीं एवं उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटेन में रेलों के विकास का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
अठारहवीं एवं उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटेन में रेलों का विकास अठारहवीं एवं उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटेन में रेलों के विकास का विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है –
1. भाप से चलने वाले रेल के इंजन का आविष्कार – 1814 में पहला भाप से चलने वाला रेल का इंजन- स्टीफेन्सन का राकेट बना। अब रेलगाड़ियाँ परिवहन का एक ऐसा नया साधन बन गईं, जो साल भर उपलब्ध रहती थीं, सस्ती तथा तेज भी थीं और माल तथा यात्री दोनों को ढो सकती थीं। इस साधन में एक-साथ दो आविष्कार शामिल थे –
(1) लोहे की पटरी जिसने 1760 के दशक में लकड़ी की पटरी का स्थान ले लिया था तथा
(2) भाप के इंजन द्वारा इस लोहे की पटरी पर रेल के डिब्बों को खींचना।

2. रिचर्ड ट्रेविथिक द्वारा ‘पफिंग डेविल’ नामक रेलवे इंजन का निर्माण करना – 1801 में रिचर्ड ट्रेविथिक ने एक इंजन का निर्माण किया जिसे ‘पंफिंग डेविल’ (फुफकारने वाला दानव) कहते थे। यह इंजन ट्रकों को कार्नवाल में उस खान के चारों ओर खींच कर ले जाता था, जहाँ रिचर्ड ट्रेविथिक काम करता था।

3. ‘ब्लचर’ नामक रेल इंजन का निर्माण करना – 1814 में जार्ज स्टीफेन्सन नामक एक रेलवे इंजीनियर ने एक रेल इंजन का निर्माण किया, जिसे ‘ब्लचर’ कहा जाता था। यह इंजन 30 टन भार 4 मील प्रति घण्टे की गति से एक पहाड़ी पर ले जा सकता था।

4. ब्रिटेन में रेल मार्ग का विस्तार – सर्वप्रथम 1825 में स्टाकटन और डार्लिंगटन शहरों के बीच 9 मील लम्बा रेलमार्ग 24 किलोमीटर प्रति घण्टा की रफ्तार से 2 घण्टे में रेल द्वारा तय किया गया। 1830 में लिवरपूल तथा मैनचेस्टर को आपस में रेल मार्ग से जोड़ दिया गया। 20 वर्षों के अन्दर रेलें 30 से 50 मील प्रति घण्टे की गति से दौड़ने लगीं। 1830 से 1850 के बीच ब्रिटेन में रेल पथ कुल मिलाकर दो चरणों में लगभग 6000 मील लम्बा हो गया। 1833-37 के ‘छोटे रेलोन्माद’ के दौरान, 1400 मील लम्बी रेल लाइन बनाई गई। इसके बाद 1844-47 के ‘बड़े रेलोन्माद’ के दौरान फिर 9500 मील लम्बी रेल लाइन बनाने की स्वीकृति दी गई। रेलवे लाइन के निर्माण में कोयले और लोहे का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया गया तथा बड़ी संख्या में लोगों को . काम पर लगाया गया। इसके फलस्वरूप निर्माण तथा लोक कार्य उद्योगों की गतिविधियों में तेजी आई। 1850 तक अधिकांश इंग्लैण्ड के नगर और गाँव रेल मार्ग से जुड़ गए।

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प्रश्न 6. ब्रिटेन की स्त्रियों और बच्चों पर औद्योगिक क्रान्ति के प्रभावों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
ब्रिटेन की स्त्रियों और बच्चों पर औद्योगिक क्रान्ति के प्रभाव ब्रिटेन की स्त्रियों और बच्चों पर औद्योगिक क्रान्ति के अग्रलिखित प्रभाव पड़े –
1. स्त्रियों और बच्चों के काम करने के तरीकों में परिवर्तन-औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप स्त्रियों और बच्चों के काम करने के तरीकों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आए। औद्योगिक क्रान्ति से पूर्व गरीब ग्रामीणों के बच्चे घरों में या खेतों में अपने माता-पिता अथवा सम्बन्धियों की देख-रेख में अनेक प्रकार के काम किया करते थे। ये काम समय, दिन अथवा मौसम के अनुसार परिवर्तित होते रहते थे। इसी प्रकार गाँवों में स्त्रियाँ भी खेती के काम में हिस्सा लेती थीं और अपने घरों में चरखे चलाकर सूत कातती थीं।

2. प्रतिकूल परिस्थितियों में कारखानों में काम करना – औद्योगिक क्रान्ति के सूत्रपात के बाद स्त्रियों तथा बच्चों को प्रतिकूल परिस्थितियों में कारखानों में काम करना पड़ा। क्योंकि पुरुषों को बहुत कम मजदूरी मिलती थी जिससे परिवार का खर्च नहीं चल पाता था। उन्हें निरन्तर कई घण्टों तक नीरस काम कठोर अनुशासन में करना पड़ता था तथा साधारण-सी गलतियों पर उन्हें कठोर दण्ड दिया जाता था। कारखानों के मालिक पुरुषों की बजाय स्त्रियों और बच्चों को अपने यहाँ काम पर लगाना अधिक पसन्द करते थे। इसके दो कारण थे –
(1) स्त्रियों और बच्चों की मजदूरी कम होती थी तथा
(2) स्त्री एवं बच्चें कठोर और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी प्रायः शान्तिपूर्ण बने रहते थे।

3. सूती कपड़ा उद्योग में स्त्रियों और बच्चों को काम पर लगाना – स्त्रियों और बच्चों को लंकाशायर तथा यार्कशायर नगरों के सूती कपड़ा उद्योग में बड़ी संख्या में काम पर लगाया जाता था। रेशम, फीते बनाने और बुनने के उद्योग-धन्धों में और बर्मिंघम के धातु – उद्योगों में बच्चों के साथ-साथ स्त्रियों को ही अधिकतर कारखानों में काम पर लगाया जाता था। कपास कातने की जेनी जैसी अनेक मशीनें तो कुछ इस प्रकार की बनाई गई थीं कि उनमें बच्चे ही अपनी चुस्त उंगिलयों और छोटी कद-काठी के कारण सरलता से काम कर सकते थे। बच्चों को प्रायः कपड़ा मिलों में रखा जाता था क्योंकि वहाँ सटाकर रखी गई मशीनों के बीच से छोटे बच्चे सरलता से आ-जा सकते थे।

4. बच्चों का शोषण – कारखानों में बच्चों से कई घण्टों तक काम लिया जाता था। उन्हें हर रविवार को भी मशीनें साफ करने के लिए काम पर आना पड़ता था। इसके परिणामस्वरूप उन्हें विश्राम करने, ताजा हवा खाने या व्यायाम करने का कभी कोई अवसर नहीं मिलता था। काम करते समय कई बार तो बच्चों के बाल मशीनों में फँस जाते थे अथवा उनके हाथ कुचल जाते थे। निरन्तर कई घण्टों तक काम करते रहने के कारण बच्चे इतने थक जाते थे कि उन्हें नींद की झपकी आ जाती थी और वे मशीनों में गिरकर मर जाते थे।

5. कोयले की खतरनाक खानों में बच्चों द्वारा काम करना – बच्चों के लिए कोयले की खानों में काम करना बहुत खतरनाक था। खानों की छतें धँस जाती थीं या वहाँ विस्फोट हो जाता था। इससे बच्चों को चोट लगना सामान्य बात थी। कोयला खानों के मालिक कोयले के गहरे अन्तिम छोरों को देखने के लिए संकरे रास्ते पर जाने के लिए, वहाँ बच्चों को ही भेजते थे। छोटे बच्चों को कारखानों में ‘ट्रैपर’ का काम भी करना पड़ता था। कोयला कारखानों में जब कोयला भरे डिब्बे इधर-उधर ले जाये जाते थे, तो वे आवश्यकतानुसार उन दरवाजों को खोलते तथा बन्द करते थे। उन्हें अपनी पीठ पर रख कर कोयले का भारी वजन भी ढोना पड़ता था।

6. कारखानों के मालिकों द्वारा बच्चों से काम लेना – कारखानों के मालिक बच्चों से काम लेना अत्यन्त आवश्यक समझते थे, ताकि वे अभी से काम सीख कर बड़े होकर उनके लिए अच्छा काम कर सकें।

7. स्त्रियों पर प्रभाव – औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप स्त्रियों को मजदूरी मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ तथा उनके आत्म-सम्मान में भी वृद्धि हुई। परन्तु इससे उन्हें लाभ कम हुआ और हानि अधिक हुई। उन्हें अपमानजनक परिस्थितियों में काम करना पड़ता था। प्रायः उनके बच्चे पैदा होते ही या बचपन में ही मर जाते थे। उन्हें विवश होकर शहर की गन्दी एवं घिनौनी बस्तियों में रहना पड़ता था।

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प्रश्न 7.
ब्रिटेन में अठारहवीं एवं उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध मजदूरों के विरोध- आन्दोलन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ब्रिटेन में अठारहवीं एवं उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध मजदूरों का विरोध- आन्दोलन इंग्लैण्ड में फैक्ट्रियों में काम करने की कठोर एवं अपमानजनक परिस्थितियों के विरुद्ध राजनीतिक विरोध बढ़ता जा रहा था और मजदूर लोग मताधिकार प्राप्त करने के लिए आन्दोलन कर रहे थे। परन्तु ब्रिटिश सरकार ने मजदूरों की माँगों को स्वीकृत करने की बजाय दमनकारी नीति अपनाना शुरू कर दिया।

1. ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति – 1795 ई. में ब्रिटिश संसद ने दो जुड़वाँ अधिनियम पारित किए। इनके अन्तर्गत लोगों को भाषण या लेखन द्वारा सम्राट, संविधान या सरकार के विरुद्ध घृणा या अपमान करने के लिए उकसाना अवैध घोषित कर दिया गया और 50 से अधिक लोगों की अनधिकृत, सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। परन्तु लोगों ने ‘पुराने भ्रष्टाचार’ के विरुद्ध आन्दोलन करना जारी रखा जो मजदूरों को मताधिकार दिए जाने की माँग से संबंधित था। .

2. ब्रेड के लिए दंगे – 1790 के दशक से सम्पूर्ण इंग्लैण्ड में ब्रेड अथवा खाद्य के लिए दंगे होने लगे। गरीब लोगों का मुख्य आहार ब्रैड ही था और इसके मूल्य पर ही उनके रहन-सहन का स्तर निर्भर करता था। आन्दोलनकारियों ने ब्रैड के भण्डारों पर अधिकार कर लिया और उन्हें मुनाफाखोरों द्वारा निर्धारित ऊँची कीमतों से काफी कम मूल्य में बेचना शुरू किया। यह कीमत सामान्य व्यक्ति के लिए उचित थी और नैतिक दृष्टि से भी सही थी। ऐसे दंगे, विशेषकर 1795 ई. में इंग्लैण्ड और फ्रांस के बीच चलने वाले युद्ध के दौरान बार- बार हुए परन्तु वे 1840 के दशक तक जारी रहे।

3. चकबन्दी या बाड़ा पद्धति से मजदूरों में असन्तोष – इंग्लैण्ड के लोगों में चकबन्दी या बाड़ा-पद्धति के विरुद्ध भी तीव्र असन्तोष था। इस पद्धति के अन्तर्गत 1770 के दशक से छोटे-छोटे सैकड़ों खेत शक्तिशाली जमींदारों के बड़े फार्मों में मिला दिए गए। इससे गरीब लोगों में घोर असन्तोष उत्पन्न हुआ और उन्होंने औद्योगिक काम देने की माँग की। परन्तु मशीनों के प्रचलन के कारण हजारों की संख्या में हथकरघा बुनकर बेरोजगार हो गए थे तथा गरीबी का जीवन व्यतीत कर रहे थे।

4. बुनकरों द्वारा हड़ताल – 1790 के दशक से बुनकर लोग अपने लिए न्यूनतम वैध मजदूरी की माँग करने लगे। परन्तु जब ब्रिटिश संसद ने उनकी मांग को अस्वीकार कर दिया, तो वे हड़ताल पर चले गए। परन्तु सरकार ने दमनकारी नीति अपनाते हुए आन्दोलनकारियों को तितर-बितर कर दिया। इससे हताश और क्रुद्ध होकर सूती कपड़े के बुनकरों ने लंकाशायर में पावरलूमों को नष्ट कर दिया। इसका कारण यह था कि वे अपना रोजगार छिन जाने के लिए इन बिजली के करघों को ही उत्तरदायी मानते थे। नोटिंघम में ऊनी वस्त्र उद्योग में भी मशीनों के प्रयोग का प्रतिरोध किया गया। इसी प्रकार लैसेस्टरशायर और डर्बीशायर में भी मजदूरों ने विरोध-प्रदर्शन किये।

5. यार्कशायर में विरोध आन्दोलन – यार्कशायर में ऊन कतरने वालों ने ऊन कतरने के ढाँचों को नष्ट कर दिया। ये लोग अपने हाथों से भेड़ों के बालों को काटते थे। 1830 के दंगों में फार्मों में काम करने वाले, मजदूरों को भी उनके धन्धे के चौपट हो जाने की आशंका पैदा हुई क्योंकि खेती में भूसी से दाना अलग करने के लिए नई खलिहानी मशीनों का प्रयोग शुरू हो गया था। दंगाइयों ने इन खलिहानी मशीनों को नष्ट कर दिया। परिणामस्वरूप नौ दंगाइयों को फाँसी की सजा हुई और 450 लोगों को बन्दियों के रूप में आस्ट्रेलिया भेज दिया गया।

6. लुडिज्म आन्दोलन – इंग्लैण्ड में जनरल नेडलुड के नेतृत्व में लुडिज्म नामक आन्दोलन चलाया गया। लुडिज्म के अनुयायी मशीनों की तोड़-फोड़ में ही विश्वास नहीं करते थे, बल्कि न्यूनतम मजदूरी आदि अनेक माँगों पर भी जोर देते थे। लुडिज्म के अनुयायियों की माँगें निम्नलिखित थीं –

(i) न्यूनतम मजदूरी प्रदान की जाए
(ii) नारी एवं बाल-श्रम पर नियन्त्रण स्थापित किया जाए
(iii) मशीनों के आविष्कार एवं प्रचलन से बेरोजगार हुए लोगों को काम दिया जाए
(iv) कानूनी तौर पर अपनी माँगें प्रस्तुत करने के लिए उन्हें मजदूर संघ (ट्रेड यूनियन) बनाने का अधिकार दिया जाए।

7. ‘पीटरलू का नर-संहार’ – अगस्त, 1819 में 80,000 लोग अपने लिए लोकतान्त्रिक अधिकारों अर्थात् राजनीतिक संगठन बनाने, सार्वजनिक सभाएँ करने तथा प्रेस की स्वतन्त्रता के अधिकारों की माँग करने हेतु मैनचेस्टर में सेन्टपीटर्स मैदान में इकट्ठे हुए। वे शान्तिपूर्ण थे, परन्तु सरकार ने उनका कठोरतापूर्वक दमन कर दिया। इसे ‘पीटरलू का नरसंहार’ के नाम से पुकारा जाता है। उन्होंने जिन अधिकारों की माँग की थी, उन्हें उसी वर्ष संसद द्वारा ठुकरा दिया गया। परन्तु इससे कुछ लाभ भी हुए। पीटरलू के नरसंहार के बाद ब्रिटिश संसद के निचले सदन ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ को अधिक प्रतिनिधित्वकारी बनाए जाने की आवश्यकता उदारवादी राजनीतिक दलों द्वारा अनुभव की गई। 1824-25 ई. में 1795 के जुड़वाँ अधिनियमों को भी निरस्त कर दिया गया।

प्रश्न 8.
ब्रिटिश सरकार द्वारा मजदूरों की दशा सुधारने के लिए बनाए गए कानूनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ब्रिटिश सरकार द्वारा मजदूरों की दशा सुधारने के लिए बनाए गए कानून धीरे-धीरे मजदूरों में जागृति उत्पन्न हुई और उन्होंने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष शुरू कर दिया। अन्त में बाध्य होकर सरकार को मजदूरों की दशा में सुधार करने के लिए अनेक कानून बनाने पड़े। ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों का वर्णन निम्नानुसार है –
1. 1819 के कानून-1819 में ब्रिटिश सरकार द्वारा कुछ कानून बनाए गए जिनके अन्तर्गत नौ वर्ष से कम की आयु वाले बच्चों से फैक्ट्रियों में काम करवाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। नौ से सोलह वर्ष की आयु वाले बच्चों से काम कराने की सीमा 12 घण्टे तक सीमित कर दी गई। परन्तु इस कानून में प्रमुख दोष यह था कि इस कानून का पालन कराने के लिए आवश्यक अधिकारों की व्यवस्था नहीं की गई।

2. 1833 का अधिनियम – 1833 में एक अन्य अधिनियम पारित किया गया जिसके अन्तर्गत नौ वर्ष से कम आयु वाले बच्चों को केवल रेशम की फैक्ट्रियों में काम पर लगाने की अनुमति दी गई। बड़े बच्चों के लिए काम के घण्टे सीमित कर दिए गए और कुछ फैक्ट्री निरीक्षकों की व्यवस्था की गई ताकि अधिनियम के प्रावधानों का उचित प्रकार से पालन कराया जा सके।

3. दस घण्टा विधेयक – 1847 में ‘दस घण्टा विधेयक’ पारित किया गया। इस कानून के अन्तर्गत स्त्रियों और युवकों के लिए काम के घण्टे सीमित कर दिए गए तथा पुरुष श्रमिकों के लिए 10 घण्टे का दिन निश्चित कर दिया गया। ये अधिनियम वस्त्र उद्योगों पर ही लागू होते थे, खान उद्योग पर नहीं। ब्रिटिश सरकार द्वारा स्थापित, 1842 के खान आयोग ने यह घोषित किया कि खानों में काम करने की परिस्थितियाँ वास्तव में 1833 के अधिनियम के लागू होने से पहले कहीं अधिक खराब हो गई हैं। इसका कारण यह था कि पहले से अधिक संख्या में बच्चों को कोयला खानों में काम पर लगाया जा रहा था।

4. 1842 का खान और कोयला खान अधिनियम – 1842 के खान और कोयला खान अधिनियम के अन्तर्गत दस वर्ष से कम आयु के बच्चों और स्त्रियों से खानों में नीचे काम लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।

5. फील्डर्स फैक्ट्री अधिनियम – फील्डर्स फैक्ट्री अधिनियम ने 1847 में यह कानून बना दिया कि अठारह वर्ष से कम आयु के बच्चों और स्त्रियों से 10 घण्टे प्रतिदिन से अधिक काम न लिया जाए।

6. त्रुटियाँ – इन कानूनों का पालन फैक्ट्री निरीक्षकों के द्वारा किया जाना था, परन्तु यह एक कठिन और जटिल काम था। निरीक्षकों का वेतन बहुत कम था। प्रायः प्रबन्धक उन्हें रिश्वत देकर सरलता से चुप कर देते थे। दूसरी ओर, बच्चों के माता-पिता भी उनकी आयु के सम्बन्ध में झूठ बोलकर उन्हें काम पर लगवा देते थे ताकि उनकी मजदूरी से परिवार का खर्च चलाने में सुविधा मिले।

प्रश्न 9.
क्या 1780 के दशक से 1820 के दशक के बीच हुए औद्योगिक विकास को ‘औद्योगिक क्रान्ति’ के नाम से पुकारना तर्कसंगत है ? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
औद्योगिक क्रान्ति – 1970 के दशक तक, इतिहासकार ‘औद्योगिक क्रान्ति’ शब्द का प्रयोग ब्रिटेन में 1780 के दशक से 1820 के दशक के बीच हुए औद्योगिकी विकास व विस्तारों के लिए करते थे। परन्तु उसके पश्चात् इस शब्द के प्रयोग को अनेक आधारों पर चुनौती दी जाने लगी। 1780 के दशक से 1820 के दशक के बीच हुए औद्योगिक विकास को औद्योगिक क्रान्ति की संज्ञा देना तर्क-संगत नहीं – कुछ विद्वानों का विचार है कि 1780 के दशक से 1820 के दशक के बीच हुए औद्योगिक विकास को ‘औद्योगिक क्रान्ति’ की संज्ञा देना तर्क संगत नहीं है। इन विद्वानों का कहना है कि औद्योगीकरण की क्रिया इतनी धीमी गति से होती रही कि इसे क्रान्ति की संज्ञा देना उचित नहीं है। इसके परिणामस्वरूप फैक्ट्रियों में मजदूरों की संख्या अवश्य बहुत अधिक बढ़ गई तथा धन का प्रयोग भी पहले से अधिक व्यापक रूप से होने लगा। इस सम्बन्ध में विद्वानों निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए हैं –

1. इंग्लैण्ड के बड़े-बड़े क्षेत्रों में फैक्ट्रियाँ या खानों का अभाव – उन्नीसवीं शताब्दी शुरू होने के काफी समय बाद तक भी इंग्लैण्ड के बड़े-बड़े क्षेत्रों में कोई फैक्ट्रियाँ या खानें नहीं थीं। इसलिए इसे ‘औद्योगिक क्रान्ति’ शब्द की संज्ञा देना उपयुक्त नहीं है। इंग्लैण्ड में परिवर्तन प्रमुख रूप से लन्दन, मैनचेस्टर, बर्मिंघम, न्यूकासल आदि नगरों के चारों ओर हुआ, परन्तु यह परिवर्तन सम्पूर्ण देश में नहीं हुआ।

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2. कपास या लोहा उद्योगों में हुए विकास को क्रान्तिकारी कहना उचित नहीं है- इन विद्वानों का कहना है कि 1780 के दशक से 1820 के दशक तक कपास या लौह उद्योग अथवा विदेशी व्यापार में हुए विकास को क्रान्तिकारी कहना उचित नहीं है। नई मशीनों के कारण सूती वस्त्र उद्योग में जो उल्लेखनीय विकास हुआ, वह एक ऐसे कच्चे माल (कपास) पर आधारित था जो इंग्लैण्ड में बाहर से मँगाया जाता था। इसी प्रकार तैयार माल भी दूसरे देशों में विशेषतः भारत में बेचा जाता था। धातु से निर्मित मशीनें तथा भाप की शक्ति तो उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक दुर्लभ रहीं। 1780 के दशक में ब्रिटेन के आयात-निर्यात में वृद्धि अमरीकी स्वतंत्रता संग्राम के खत्म होने के कारण हुई, न कि औद्योगिक क्रांति के कारण।

3. सतत् औद्योगीकरण का 1815-20 के बाद में दिखाई देना- विद्वानों के अनुसार सतत् औद्योगीकरण 1815-20 से पहले की बजाय बाद में दिखाई दिया था। लाभदायक निवेश उत्पादकता के स्तरों के साथ – साथ 1820 के बाद धीरे-धीरे बढ़ने लगा। 1840 के दशक तक कपास, लोहा और इन्जीनियरिंग उद्योगों से आधे से भी कम औद्योगिक उत्पादन होता था। तकनीकी उन्नति केवल इन्हीं शाखाओं में नहीं हुई, बल्कि वह कृषि उपकरणों तथा मिट्टी के बर्तन बनाने जैसे अन्य उद्योग-धन्धों में भी देखी जा सकती थी। स्पष्ट है कि ब्रिटेन में औद्योगिक विकास 1815 से पहले की अपेक्षा उसके बाद ही अधिक तीव्र गति से हुआ।

4. क्रांति के साथ प्रयुक्त ‘औद्योगिक’ शब्द सीमित अर्थ वाला है – ब्रिटेन में इस काल में जो रूपान्तरण हुआ वह केवल आर्थिक और औद्योगिक क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उसका विस्तार इन क्षेत्रों से परे समाज के भीतर भी हुआ। इसके फलस्वरूप ही दो वर्गों – मध्यम वर्ग और मजदूर ( सर्वहारा ) वर्ग को प्रधानता मिली। अतः इसे औद्योगिक क्रांति कहना इस परिवर्तन के आयामों को सीमित करना है।

प्रश्न 10.
औद्योगिक क्रान्ति के सामाजिक एवं आर्थिक परिणामों की विवेचना कीजिए।
अथवा
औद्योगिक क्रान्ति के परिणामों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
I. औद्योगिक क्रान्ति के सामाजिक परिणाम – औद्योगिक क्रान्ति के सामाजिक परिणामों का विवेचन निम्नानुसार है –
1. मजदूरों की दयनीय दशा – औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप मजदूरों की दशा दयनीय बनी हुई थी। उनसे अधिक से अधिक काम लिया जाता था परन्तु उन्हें मजदूरी बहुत कम दी जाती थी। मजदूरों को गन्दे मकानों में पशुओं की भाँति जीवन व्यतीत करना पड़ता था।

2. संयुक्त परिवारों का विघटन – मजदूर रोजगार की तलाश में गाँव छोड़कर नगरों में आ गए जिससे संयुक्त परिवार प्रथा विघटित होती चली गई। अब संयुक्त परिवार टूट गए।

3. गन्दी बस्तियों की समस्या – कारखानों के आसपास मजदूरों के परिवार बस गए। वे कच्चे-पक्के झोंपड़ों में रहने लगे। इससे गन्दी बस्तियों का जन्म हुआ।

4. स्वास्थ्य की हानि – मजदूरों को गन्दे कारखानों में काम करना पड़ता था। कारखानों में शुद्ध वायु तथा प्रकाश का अभाव था। गन्दी बस्तियों में रहने तथा शुद्ध पेय जल की व्यवस्था न होने से मजदूर कई प्रकार की बीमारियों के शिकार बन जाते थे।

5. नैतिक पतन – थकावट को दूर करने के लिए मजदूरों को मनोरंजन के रूप में मद्यपान, जुए, वेश्यावृत्ति आदि का सहारा लेना पड़ा। इसके फलस्वरूप उनका नैतिक पतन हुआ।

6. मध्यम वर्ग का उदय – कारखानों के संचालन के लिए पूँजी तथा व्यावसायिक बुद्धि की आवश्यकता थी। मध्यम वर्ग के लोगों के पास पूँजी तथा व्यावसायिक बुद्धि दोनों ही थीं। इसके फलस्वरूप मध्यम वर्ग का उदय हुआ।

7. पारिवारिक जीवन पर बुरा प्रभाव – जीवन – निर्वाह करने के लिए पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियों और बच्चों को भी कारखानों में काम करना पड़ता था। अतः अब घर सुनसान रहने लगे। स्त्री, पुरुष और बच्चों को आपस में मिलने- जुलने का समय नहीं मिल पाता था।

8. मानव समाज की सुख-सुविधा में वृद्धि – औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप लोगों के रहन-सहन, खान-पान, वस्त्रादि में परिवर्तन आ गया। अब मानव जीवन को अधिक से अधिक सुखदायक बनाए जाने पर बल दिया जाने लगा।

II. औद्योगिक क्रान्ति के आर्थिक परिणाम – औद्योगिक क्रान्ति के निम्नलिखित आर्थिक परिणाम हुए –
1. औद्योगिक पूँजीवाद का विकास – औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप औद्योगिक पूँजीवाद का विकास हुआ। नवीन औद्योगिक व्यवस्था में वही लोग ठहर सके जिनके पास अधिक पूँजी थी।

2. नये नगरों का विकास – औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप हजारों भूमिहीन किसान अपने गाँव छोड़कर आजीविका की तलाश में नगरों में आ गए और औद्योगिक केन्द्रों के आसपास रहने लगे। इस प्रकार औद्योगिक केन्द्रों के आसपास नये नगरों का विकास हुआ।

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3. राष्ट्रीय पूँजी में वृद्धि – उद्योग-धन्धों तथा व्यापार की उन्नति के कारण अनेक देशों की राष्ट्रीय पूँजी में वृद्धि हुई।

4. बड़े कारखानों की स्थापना – औद्योगिक क्रान्ति के कारण बड़े-बड़े कारखानों की स्थापना हुई जिनमें हजारों लोग एक-साथ काम करते थे। बड़े-बड़े कारखानों में ‘फैक्ट्री पद्धति अपनाई गई।

5. बड़े पैमाने पर उत्पादन – औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप उत्पादन बहुत बढ़ गया। इंग्लैण्ड में वस्त्र – उद्योग, लौह एवं इस्पात उद्योग, कोयला उद्योग, जहाज, मशीनों तथा रेलों के उद्योगों में आश्चर्यजनक उन्नति हुई।

6. दैनिक जीवन की वस्तुओं का सस्ता होना – बड़े-बड़े कारखानों में दैनिक आवश्यकता में काम में आने वाली वस्तुओं का उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जाने लगा। परिणामस्वरूप दैनिक जीवन में काम में आने वाली वस्तुएँ सस्ती हो गईं।

7. घरेलू उद्योगों का विनाश – मशीनों से बनी हुई वस्तुएँ घरेलू उद्योगों की वस्तुओं से काफी सस्ती तथा सुन्दर होती थीं। परिणामस्वरूप घरेलू उद्योग-धन्धे नष्ट होते गए।

8. बेरोजगारी की समस्या – घरेलू उद्योग-धन्धों के नष्ट हो जाने से असंख्य लोग बेरोजगार हो गए। एक मशीन कई व्यक्तियों का कार्य कर सकती थी। परिणामस्वरूप घरेलू उद्योगों में लगे हुए कारीगर बड़ी संख्या में बेरोजगार हो गए।

JAC Class 11 History Important Questions Chapter 6 तीन वर्ग

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बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

1. लार्ड का घर कहलाता था –
(अ) राजमहल
(ब) वैसल
(स) वर्साई का महल
(द) मेनर।
उत्तर:
(द) मेनर।

2. कुशल घुड़सवारों की आवश्यकता की पूर्ति के लिए किस नए वर्ग का प्रादुर्भाव हुआ?
(अ) सामन्त वर्ग
(ब) योद्धा वर्ग
(स) नाइट वर्ग
(द) पादरी वर्ग।
उत्तर:
(स) नाइट वर्ग

3. लार्ड द्वारा नाइट को दिया गया भूमि का भाग कहलाता था –
(अ) सर्फ
(ब) मेनर
(स) जागीर
(द) फीफ।
उत्तर:
(द) फीफ।

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4. कृषकों द्वारा चर्च को दिया जाने वाला कर कहलाता था –
(अ) टीथ
(ब) धार्मिक कर
(स) कृषक कर
(द) स्वैच्छिक कर।
उत्तर:
(अ) टीथ

5. इंग्लैण्ड में सामन्तवाद का विकास हुआ –
(अ) तेरहवीं सदी में
(ब) नौवी सदी में
(स) ग्यारहर्वी सदी में
(द) दसवीं सदी में।
उत्तर:
(स) ग्यारहर्वी सदी में

6. फ्रांस के प्रान्त नारमैंडी के किस ड्यूक ने इंग्लैण्ड पर विजय प्राप्त की थी?
(अ) जेम्स
(ब) चार्ल्स
(स) लुई तेरहवाँ
(द) विलियम।
उत्तर:
(द) विलियम।

7. फ्रांस में समाज में किसने एक चौथा वर्ग बना लिया था?
(अ) शिल्पकारों ने
(ब) व्यवारियों ने
(स) सैनिकों ने
(द) नगरवासियों ने।
उत्तर:
(द) नगरवासियों ने।

8. फ्रांस के नगरों में बनने वाले बड़े चर्च क्या कहलाते थे?
(अ) आबे
(ब) विशाल चर्च
(स) कथीड्रल
(द) वृहद गिरजाघर।
उत्तर:
(स) कथीड्रल

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-

1. सामन्तवाद की पहचान थी-दुर्गों व मेनर-भवन के इर्द-गिर्द ……………….
2. जीवन के सुनिश्चित तरीके के रूप में सामन्तवाद की उत्पत्ति यूरोप के अनेक भागों में ………………. के उत्तराई्द्ध में हुई।
3. जर्मनी की एक जनजाति ………………. ने गॉल को अपना नाम देकर उसे फ्रांस बना दिया।
4. यूरोप में ईसाई समाज का मार्गदर्शन विशपों और पादरियों द्वारा किया जाता था, जो ………………. के अंग थे।
5. काश्तकार दो तरह के होते थे ………………. (i) स्वतंत्र किसान और (ii) ……………….
उत्तर:
1. कृषि-उत्पादन
2: 11वीं सदी
3. फ्रैंक
4. प्रथम वर्ग
5. सर्फ ( कृषिदास)।

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निम्नलिखित में से सत्य / असत्य कथन छाँटिये –

1. तीर्थयात्रा ईसाइयों के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा थी।
2. भिक्षु जिस धार्मिक समुदाय में रहते थे, उसे चर्च कहा जाता था।
3. यूरोप में स्थानीय युद्धों के कारण कुशल अश्व सेना की आवश्यकता ने एक नए वर्ग को बढ़ावा दिया जो लार्ड कहलाते थे।
4. फ्रांस के शासकों का लोगों से जुड़ाव ‘वैसलेज’ प्रथा के कारण था।
5. 9वीं से 16वीं सदी के मध्य चर्च यूरोप में एक मुख्य भूमिधारक और राजनीतिक शक्ति बन गया था।
उत्तर:
1. सत्य
2. असत्य
3. असत्य
4. सत्य
5. सत्य

निम्नलिखित स्तंभों के सही जोड़े बनाइये –

1. मेनर(क) फ्रांस के नगरों में बनने वाले बड़े चर्च
2. फीफ(ख) लार्ड का घर
3. टीथ(ग) मठों में रहने वाले अत्यधिक धार्मिक व्यक्ति
4. कथीड्रल(घ) लार्ड द्वारा नाइट को दिया गया भूमि का भाग
5. भिक्षु(च) कृषकों द्वारा चर्च को दिया जाने वाला कर

उत्तर:

1. मेनर(ख) लार्ड का घर
2. फीफ(घ) लार्ड द्वारा नाइट को दिया गया भूमि का भाग
3. टीथ(च) कृषकों द्वारा चर्च को दिया जाने वाला कर
4. कथीड्रल(क) फ्रांस के नगरों में बनने वाले बड़े चर्च
5. भिक्षु(ग) मठों में रहने वाले अत्यधिक धार्मिक व्यक्ति

 

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मार्क ब्लाक कौन थे ?
उत्तर:
मार्क ब्लाक (1886 – 1994) फ्रांस के प्रसिद्ध विद्वान थे।

प्रश्न 2.
सामन्ती समाज’ का रचयिता कौन था ?
उत्तर:
मार्क ब्लाक।

प्रश्न 3.
मार्क ब्लाक क्यों प्रसिद्ध थे ?
उत्तर:
सामन्तवाद पर महत्त्वपूर्ण कार्य करने के लिए।

प्रश्न 4.
अभिजात वर्ग का घर क्या कहलाता था ?
उत्तर:
मेनर

प्रश्न 5.
योरोप में काश्तकार कितने प्रकार के होते थे?
उत्तर:
दो प्रकार के –
(1) स्वतन्त्र किसान तथा
(2) कृषि – दास।

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प्रश्न 6.
एंजिललैण्ड किस देश का रूपान्तरण है ?
उत्तर:
इंग्लैण्ड का।

प्रश्न 7.
1614 के बाद फ्रांस की एस्टेट्स जनरल का अधिवेशन कब बुलाया गया ?
उत्तर:
1789 ई. में।

प्रश्न 8.
यूरोप में चौथा वर्ग किन लोगों का था ?
उत्तर:
नगरवासियों का।

प्रश्न 9.
इंग्लैण्ड में सामन्तवाद का विकास कब हुआ ?
उत्तर:
ग्यारहवीं शताब्दी से।

प्रश्न 10.
शार्लमैन कौन था ?
उत्तर:
शार्लमैन (742-814 ई.) फ्रांस का राजा था।

प्रश्न 11.
इंग्लैण्ड पर ग्यारहवीं सदी में किस व्यक्ति ने विजय प्राप्त की थी ?
उत्तर:
नारमैंडी के ड्यूक विलियम ने।

प्रश्न 12.
आबे से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
आबे से तात्पर्य है-मठ।

प्रश्न 13.
1347 और 1350 के मध्य यूरोप पर महामारी का क्या प्रभाव हुआ ?
उत्तर:
यूरोप की आबादी का लगभग 20% भाग नष्ट हो गया।

प्रश्न 14.
15वीं और 16वीं शताब्दी में किन नए शासकों का प्रादुर्भाव हुआ? दो का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) इंग्लैण्ड में हैनरी सप्तम
(2) फ्रांस में लुई ग्यारहवाँ।

प्रश्न 15.
इंग्लैण्ड में स्थापित संसद के दो सदनों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
(1) हाउस ऑफ लाईर्ड्स
(2) हाउस ऑफ कामन्स।

प्रश्न 16.
इंग्लैण्ड के किस शासक को मृत्यु – दण्ड देकर वहाँ गणतन्त्र की स्थापना की गई ?
उत्तर:
चार्ल्स प्रथम को।

प्रश्न 17.
फ्रांस के एस्टेट्स जनरल के तीन सदनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) पादरी वर्ग
(2) अभिजात वर्ग
(3) सामान्य लोगों का वर्ग।

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प्रश्न 18.
विश्व इतिहास में विभिन्न तरीकों से परम्पराएँ बदलने के क्या कारक थे? दो का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) वैज्ञानिक ज्ञान का विकास
(2) लोक-सेवाओं का निर्माण।

प्रश्न 19.
‘वाइकिंग’ कौन थे?
उत्तर:
वाइकिंग स्कैंडीनेविया के वे लोग थे जो आठवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य उत्तर-पश्चिमी यूरोप पर आक्रमण करने के बाद वहाँ बस गए थे ।

प्रश्न 20.
तीन वर्ग से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
तीन वर्ग यूरोप की तीन सामाजिक श्रेणियाँ थीं। ये वर्ग थे –
(1) ईसाई पादरी
(2) भूमि- धारक अभिजात वर्ग तथा
(3) कृषक।

प्रश्न 21.
‘मध्यकालीन युग’ से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
‘मध्यकालीन युग’ शब्द पाँचवीं और पन्द्रहवीं सदी के मध्य के यूरोपीय इतिहास को इंगित करता है।

प्रश्न 22.
‘सामन्तवाद’ शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सामन्तवाद शब्द जर्मन शब्द ‘फ्यूड’ से बना है जिसका अर्थ है- ‘भूमि का टुकड़ा’। यह ऐसे समाज की ओर इंगित करता है जो फ्रांस और इंग्लैण्ड में विकसित हुआ।

प्रश्न 23.
‘सामन्तवाद’ की उत्पत्ति कब हुई ?
उत्तर:
जीवन के सुनिश्चित तरीके के रूप में सामन्तवाद की उत्पत्ति यूरोप के अनेक देशों में ग्यारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुई।

प्रश्न 24.
फ्रांस की स्थापना किस प्रकार हुई ?
उत्तर:
जर्मनी की एक जनजाति फ्रैंक ने रोमन साम्राज्य के गॉल नामक एक प्रान्त को अपना नाम देकर उसे फ्रांस बना दिया।

प्रश्न 25.
फ्रांस में समाज कितने वर्गों में विभाजित था ?
उत्तर:
फ्रांस में समाज मुख्य रूप से तीन वर्गों में विभाजित था –
(1) पादरी
(2) अभिजात
(3) कृषक।

प्रश्न 26.
सामाजिक प्रक्रिया में अभिजात वर्ग की महत्त्वपूर्ण भूमिका क्यों थी ?
उत्तर:
भूमि पर अभिजात वर्ग के नियन्त्रण के कारण सामाजिक प्रक्रिया में अभिजात वर्ग की महत्त्वपूर्ण भूमिका

प्रश्न 27.
अभिजात वर्ग के दो विशेषाधिकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) अभिजात वर्ग का अपनी सम्पदा पर स्थायी तौर पर पूर्ण नियन्त्रण था।
(2) वे अपना स्वयं का न्यायालय लगा सकते थे।

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प्रश्न 28.
मेनर की जागीर से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
फ्रांस में लार्ड का घर मेनर कहलाता था। वह गाँवों पर नियन्त्रण रखता था। प्रतिदिन के उपभोग की प्रत्येक वस्तु जागीर पर मिलती थी। जागीरों में अरण्य भूमि और वन होते थे

प्रश्न 29.
तेरहवीं शताब्दी से दुर्गों का विकास क्यों किया गया ?
उत्तर:
तेरहवीं शताब्दी से कुछ दुर्गों का विस्तार किया गया ताकि नाइट के परिवार के लोग उन दुर्गों में निवास कर सकें।

प्रश्न 30.
मेनर के आत्मनिर्भर न होने के क्या कारण थे?
उत्तर:
(1) मेनर को नमक, चक्की का पाट तथा धातु के बर्तन बाहर के स्रोतों से प्राप्त करने पड़ते थे।
(2) लार्ड को महँगे साजो-सामान को, दूसरे स्थानों से प्राप्त करना पड़ता था।

प्रश्न 31.
‘फीफ’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
लार्ड ‘नाइट’ को भूमि का एक भाग देता था, जो ‘फीफ’ कहलाता था। फीफ की भूमि को कृषक जोतते थे।

प्रश्न 32.
फ्रांस में घुमक्कड़ चारण कौन थे ?
उत्तर:
घुमक्कड़ चारण गायक लोग थे।

प्रश्न 33.
फ्रांस में घुमक्कड़ चारणों का क्या कार्य था ?
उत्तर:
ये लोग फ्रांस के मेनरों में वीर राजाओं और नाइट्स की वीरता की कहानियाँ गीतों के रूप में सुनाते हुए घूमते रहते थे।

प्रश्न 34.
कौन लोग पादरी बनने के लिए अयोग्य थे ?
उत्तर:
(1) कृषि – दास तथा शारीरिक रूप से बाधित लोग पादरी नहीं हो सकते थे।
(2) स्त्रियाँ भी पादरी नहीं बन सकती थीं।

प्रश्न 35.
बिशप कौन थे ?
उत्तर:
धर्म के क्षेत्र में बिशप अभिजात माने जाते थे। बिशपों के पास भी लार्ड की भाँति बड़ी-बड़ी जागीरें थीं तथा वे शानदार महलों में रहते थे।

प्रश्न 36.
टीथ’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
चर्च को एक वर्ष में कृषक से उसकी उपज का दसवाँ भाग लेने का अधिकार था। इसे ‘टीथ’ कहा जाता था।

प्रश्न 37.
कैथोलिक चर्च की आय के दो स्रोत बताइए।
उत्तर:
(1) किसानों द्वारा चर्च को दिया जाने वाला ‘टीथ’,
(2) धनी लोगों द्वारा चर्च को दिया जाने वाला दान।

प्रश्न 38.
भिक्षु कौन लोग थे ?
उत्तर:
कुछ अत्यधिक धार्मिक व्यक्ति एकान्त जीवन जीना पसन्द करते थे। ये लोग मठों में रहते थे जो प्रायः मनुष्य की आम आबादी से बहुत दूर होते थे है।

प्रश्न 39.
‘मोनेस्ट्री’ शब्द से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
‘मोनेस्ट्री’ शब्द ग्रीक भीषा के शब्द ‘मोनोस’ से बना है जिसका अर्थ है – ऐसा व्यक्ति जो अकेला रहता

प्रश्न 40.
पादरियों और भिक्षुओं में क्या अन्तर था ?
उत्तर:
पादरी लोगों के बीच में नगरों और गाँवों में गिरजाघरों में रहते थे परन्तु भिक्षु मठों में रहते हुए एकान्त जीवन पसन्द करते थे।

प्रश्न 41.
मठ किसे कहते थे ?
उत्तर:
कुछ अत्यधिक धार्मिक व्यक्ति एकान्त जीवन व्यतीत करना पसन्द करते थे। वे धार्मिक समुदायों में रहते थे, जिन्हें मठ कहते थे।

प्रश्न 42.
यूरोप के दो सबसे अधिक प्रसिद्ध मठों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) 529 ई. में इटली में स्थापित सेंट बेनेडिक्ट का मठ।
(2) 910 ई. में बरगंडी में स्थापित क्लूनी का मठ।

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प्रश्न 43.
अबेसे हिल्डेगार्ड कौन था ?
उत्तर:
अबेसे हिल्डेगार्ड एक प्रसिद्ध संगीतज्ञ था। उसने चर्च की प्रार्थनाओं में सामुदायिक गायन की प्रथा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था।

प्रश्न 44.
‘फ्रायर’ कौन थे ?
उत्तर:
यूरोप में तेरहवीं शताब्दी से भिक्षुओं के कुछ समूह मठों में नहीं रहते थे तथा विभिन्न स्थानों पर घूम-घूम कर लोगों को उपदेश देते थे। ये ‘फ्रायर’ कहलाते थे।

प्रश्न 45.
चौदहवीं शताब्दी में मठवाद के महत्त्व में कमी आने के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
(1) भिक्षुओं के द्वारा आरामदायक एवं विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करना
(2) चौसर द्वारा अपनी रचना ‘कैंटरबरी टेल्स’ में भिक्षु–भिक्षुणी तथा फ्रायर का हास्यास्पद चित्रण करना।

प्रश्न 46.
‘टैली कर’ क्या था ?
उत्तर:
टैली एक प्रकार का प्रत्यक्ष कर था, जिसे राजा कृषकों पर कभी-कभी लगाते थे।

प्रश्न 47.
लार्ड को कृषि – दासों पर क्या एकाधिकार प्राप्त थे
उत्तर:
(1) कृषि दास अपने लार्ड की चक्की में ही आटा पीस सकते थे।
(2) वे उनके तन्दूर में ही रोटी सेंक सकते थे तथा उनकी मदिरा सम्पीडक में ही शराब बना सकते थे।

प्रश्न 48.
मध्यकाल में प्रारम्भ में इंग्लैण्ड की कृषि प्रौद्योगिकी के दो दोष बताइए।
उत्तर:
(1) कृषक का लकड़ी का हल केवल पृथ्वी की सतह को खुरच सकता था।
(2) फसल चक्र के एक प्रभावहीन तरीके का उपयोग हो रहा था।

प्रश्न 49.
इंग्लैण्ड में मेनरों के लार्ड के विरुद्ध कृषकों ने निष्क्रिय प्रतिरोध की नीति क्यों अपनाई?
उत्तर:
इंग्लैण्ड में कृषकों को मेनरों की जागीर की समस्त भूमि को कृषिगत बनाने के लिए बाध्य होना पड़ता था।

प्रश्न 50.
इंग्लैण्ड में नई कृषि प्रौद्योगिकी नीति के अन्तर्गत कृषि में हुए कोई दो परिवर्तन बताइए।
उत्तर:
(1) लोहे के भारी नोक वाले हल और साँचेदार पटरे का उपयोग होने लगा।
(2) पशुओं को हलों में जोतने के तरीकों में सुधार हुआ।

प्रश्न 51.
मध्यकाल में यूरोप में नगरों के विकास के दो कारण लिखिए।
उत्तर:
(1) कृषि का विस्तार और जनसंख्या का बढ़ना।
(2) नगरों का वातावरण स्वतन्त्रतापूर्ण था।

प्रश्न 52.
‘श्रेणी’ (गिल्ड) से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
आर्थिक संस्था का आधार ‘ श्रेणी’ (गिल्ड ) था। प्रत्येक शिल्प या उद्योग एक ‘ श्रेणी’ के रूप में संगठित था। यह उत्पाद की गुणवत्ता, उसके मूल्य और बिक्री पर नियन्त्रण रखती थी।

प्रश्न 53.
आप ‘कथीड्रल नगर’ के बारे में क्या जानते हो ?
उत्तर:
बारहवीं सदी में फ्रांस में बड़े- बड़े चर्चों का निर्माण होने लगा, जो कथीड्रल कहलाते थे। इन चर्चों के चारों तरफ विकसित होने वाले नगर ‘कथीड्रल नगर’ कहलाये।

प्रश्न 54.
कथीड्रल बनाते समय किन दो बातों का ध्यान रखा जाता था ?
उत्तर:
(1) कथीड्रल इस प्रकार बनाए जाते थे कि पादरी की आवाज सभागार में लोगों को स्पष्ट रूप से सुनाई पड़े
(2) लोगों को प्रार्थना के लिए बुलाने वाली घण्टियाँ दूर तक सुनाई पड़ सकें।

प्रश्न 55.
यूरोप में चौदहवीं शताब्दी के दो संकटों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) 1315 और 1317 में यूरोप में भयंकर अकाल पड़े।
(2) 1347-1350 के मध्य यूरोप में भीषण महामारी फैल गई।

प्रश्न 56.
यूरोप में चौदहवीं शताब्दी के संकट के सामाजिक क्षेत्र में पड़े दो प्रभाव बताइए।
उत्तर:
(1) जनसंख्या में अत्यधिक कमी हो गई तथा मजदूरों की संख्या में अत्यधिक कमी आई।
(2) कृषि और उत्पादन के बीच असन्तुलन हुआ।

प्रश्न 57.
चौदहवीं शताब्दी में हुए कृषकों के विद्रोह के दो कारण बताइए।
उत्तर:
(1) आय कम होने से अभिजात वर्ग ने धन सम्बन्धी अनुबन्धों को तोड़ दिया।
(2) उन्होंने पुरानी मजदूरी सेवाओं को फिर से प्रचलित कर दिया।

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प्रश्न 58.
पन्द्रहवीं तथा सोलहवीं शताब्दी में यूरोपीय शासकों को ‘नए शासक’ क्यों कहा गया ? उत्तर-पन्द्रहवीं तथा सोलहवीं शताब्दी में यूरोपीय शासकों ने अपनी सैनिक एवं वित्तीय शक्ति में वृद्धि की और नए शक्तिशाली राज्यों का निर्माण किया।

प्रश्न 59.
फ्रांस की ‘एस्टेट्स जनरल’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
फ्रांस की ‘एस्टेट्स जनरल’ फ्रांस की परामर्शदात्री सभा थी। इसके तीन सदन थे जो पादरी, अभिजात वर्ग तथा साधारण लोगों का प्रतिनिधित्व करती थी।

प्रश्न 60.
1789 ई. तक फ्रांस की एस्टेट्स जनरल का अधिवेशन क्यों नहीं बुलाया गया ?
उत्तर:
फ्रांस की एस्टेट्स जनरल का अधिवेशन 1789 ई. तक नहीं बुलाया गया, क्योंकि फ्रांस के राजा तीन वर्गों के साथ अपनी शक्ति बाँटना नहीं चाहते थे।

प्रश्न 61.
मध्यकालीन यूरोप के पादरी वर्ग (प्रथम वर्ग) को समझाइये
उत्तर:
पादरी लोग चर्च में धर्मोपदेश दिया करते थे। ये लोग ईसाई समाज का मार्गदर्शन करते थे। ये अविवाहित होते थे।

प्रश्न 62.
पाँचवीं शताब्दी से ग्यारहवीं शताब्दी तक यूरोप में पर्यावरण का कृषि पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
तीव्र सर्दी के कारण फसलों का उपज काल छोटा हो गया और कृषि की उपज कम हो गई। परन्तु 11वीं सदी में तापमान बढ़ने से कृषि पर अच्छा प्रभाव पड़ा।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मध्यकालीन यूरोप में वैसलेज नामक प्रथा क्या थी?
उत्तर:
वैसलेज प्रथा के अन्तर्गत बड़े भू-स्वामी ( अभिजात वर्ग) राजा के अधीन और कृषक भू-स्वामियों के अधीन होते थे। अभिजात वर्ग राजा को अपना स्वामी मान लेता था और वे आपस में वचनबद्ध होते थे। अभिजात वर्ग दास व कृषक की रक्षा करता था और बदले में वह उसके प्रति निष्ठावान रहता था। इस प्रकार वैसलेज की प्रथा के कारण फ्रांस के शासकों का लोगों से जुड़ाव रहता था।

प्रश्न 2.
मध्यकालीन यूरोप के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक इतिहास की जानकारी के मुख्य स्रोतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक इतिहास की जानकारी इतिहासकारों को भू- स्वामित्व के विवरणों, मूल्यों, कानूनी मुकदमों जैसी बहुत-सी सामग्री दस्तावेजों के रूप में उपलब्ध थी। इसलिए वे विविध क्षेत्रों के इतिहासों पर उपयोगी कार्य कर सके। उदाहरण के लिए चर्चों में मिलने वाले जन्म, मृत्यु तथा विवाह के अभिलेखों की सहायता से परिवारों और जनसंख्या की संरचना को समझने में सहायता मिली। चर्चों से प्राप्त अभिलेखों से व्यापारिक संस्थाओं के बारे में जानकारी मिली और गीतों तथा कहानियों से त्यौहारों तथा सामुदायिक गतिविधियों के बारे में बोध हुआ।

प्रश्न 3.
मार्क ब्लाक की रचनाओं से सामन्तवाद पर क्या प्रकाश पड़ता है?
उत्तर:
सामन्तवाद पर सर्वप्रथम कार्य करने वाले विद्वानों में से एक फ्रांस के मार्क ब्लाक थे। मार्क ब्लाक का ‘सामन्ती समाज’ यूरोपियों, विशेषकर 900 से 1300 के बीच, फ्रांसीसी समाज के सामाजिक सम्बन्धों और श्रेणियों, भूमि प्रबन्धन तथा उस समय की जन-संस्कृति के बारे में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण जानकारी देता है।

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प्रश्न 4.
‘सामन्तवाद’ के बारे में एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
सामन्तवाद-‘सामन्तवाद’ (Feudalism) जर्मन शब्द ‘फ्यूड’ से बना है जिसका अर्थ है – एक भूमि का टुकड़ा। यह एक ऐसे समाज की ओर संकेत करता है जो मध्य फ्रांस और बाद में इंग्लैण्ड तथा दक्षिणी इटली में भी विकसित हुआ। आर्थिक दृष्टि से सामन्त एक प्रकार के कृषि उत्पाद की ओर संकेत करता है जो सामन्त तथा कृषकों के सम्बन्धों पर आधारित है। कृषक अपने खेतों के साथ-साथ लार्ड (सामन्त ) के खेतों पर कार्य करते थे।

इस प्रकार कृषक लार्ड को – सेवा प्रदान करते थे तथा बदले में लार्ड उन्हें सैनिक सुरक्षा प्रदान करते थे। इसके अतिरिक्त लार्ड को कृषकों पर न्यायिक अधिकार भी प्राप्त थे। इस प्रकार सामन्तवाद ने कृषकों के आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन पर अधिकार कर लिया था। श्रम-ऐसा माना जाता है कि जीवन के सुनिश्चित तरीके के रूप में सामन्तवाद की उत्पत्ति यूरोप के अनेक भागों में गयारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुई।

प्रश्न 5.
फ्रांस और इंग्लैण्ड किस प्रकार अस्तित्व में आए ?
उत्तर:
गॉल रोमन साम्राज्य का एक प्रान्त था। इसमें दो विस्तृत तट रेखाएँ, पर्वत – श्रेणियाँ, लम्बी नदियाँ, वन और कृषि करने के लिए विस्तृत मैदान थे। जर्मनी की फ्रैंक नामक एक जनजाति ने गॉल को अपना नाम देकर उसे फ्रांस बना दिया। छठी शताब्दी से इस प्रदेश पर फ्रैंकिश अथवा फ्रांस के ईसाई राजा शासन करते थे। फ्रांसीसियों के चर्च के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध थे। ये सम्बन्ध पोप द्वारा फ्रांस के सम्राट शार्लमैन को ‘पवित्र रोमन सम्राट’ की उपाधि दिए जाने पर और अधिक सुदृढ़ हो गए। ग्यारहवीं शताब्दी में फ्रांस के नारमंडी नामक प्रान्त के राजकुमार विलियम ने एक संकरे जलमार्ग के पार स्थित इंग्लैण्ड- स्काटलैण्ड के द्वीपों पर अधिकार कर लिया। छठी शताब्दी में मध्य यूरोप से ऐंजिल और सेक्सन इंग्लैण्ड में आकर बस गए थे। इंग्लैण्ड देश का नाम ‘एंजिल लैण्ड’ का रूपान्तरण है।

प्रश्न 6.
मध्यकालीन यूरोप में मठों में रहने वाले भिक्षुओं के जीवन पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
भिक्षु – भिक्षु कुछ विशेष श्रद्धालु ईसाइयों की एक श्रेणी थी। ये अत्यन्त धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे तथा एकान्त जीवन जीना पसन्द करते थे। वे धार्मिक समुदायों में रहते थे जिन्हें एबी या मठ कहते थे। ये मठ अधिकतर मनुष्य की सामान्य आबादी से बहुत दूर होते थे। मध्यकालीन यूरोप के दो सबसे प्रसिद्ध मठों में एक मठ 529 में इटली में स्थापित सेन्ट बेनेडिक्ट था तथा दूसरा 910 में बरगंडी में स्थापित क्लूनी का मठ था।

भिक्षुओं का जीवन – मध्यकालीन यूरोप के भिक्षु अपना सारा जीवन ऐबी में रहने और अपना समय प्रार्थना करने तथा अध्ययन एवं कृषि जैसे शारीरिक श्रम में लगाने का व्रत लेते थे। भिक्षु का जीवन पुरुष और स्त्री दोनों ही अपना सकते थे। ऐसे पुरुषों को ‘मोंक’ तथा स्त्रियों को ‘नन’ कहा जाता था। पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग मठ थे। पादरियों की भाँति भिक्षु और भिक्षुणियाँ भी विवाह नहीं कर सकते थे।

प्रश्न 7.
मध्यकालीन यूरोप के भिक्षुओं तथा भिक्षुणियों के लिए बनाए गए नियमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बेनेडिक्टीन मठों में भिक्षुओं के लिए एक हस्तलिखित पुस्तक होती थी जिसमें नियमों के 73 अध्याय थे। भिक्षुओं द्वारा इन नियमों का पालन कई सदियों तक किया जाता रहा। इनमें से कुछ नियम इस प्रकार हैं –
(1) भिक्षुओं को बोलने की आज्ञा कभी-कभी ही दी जानी चाहिए।
(2) विनम्रता का अर्थ है-आज्ञा-पालन।
(3) किसी भी भिक्षु को निजी सम्पत्ति नहीं रखनी चाहिए।
(4) आलस्य आत्मा का शत्रु है। इसलिए भिक्षु भिक्षुणियों को निश्चित समय में शारीरिक श्रम और निश्चित घण्टों में पवित्र पाठ करना चाहिए।
(5) मठों का निर्माण इस प्रकार करना चाहिए कि आवश्यकता की सभी वस्तुएँ- जल, चक्की, उद्यान, कार्यशाला आदि सभी उसकी सीमा के अन्दर हों।

प्रश्न 8.
मध्यकालीन यूरोप के समाज पर चर्च का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
यद्यपि यूरोपवासी ईसाई बन गए थे, परन्तु उन्होंने अभी भी कुछ सीमा तक चमत्कार और रीति-रिवाज से जुड़े अपने पुराने विश्वासों को नहीं त्यागा था। चौथी शताब्दी से ही क्रिसमस तथा ईस्टर कैलेंडर की महत्त्वपूर्ण तिथियाँ बन गए थे। 25 दिसम्बर को मनाए जाने वाले ईसा मसीह के जन्म दिन ने एक पुराने पूर्व- रोमन त्यौहार का स्थान ले लिया था। इस तिथि की गणना सौर- पंचांग के आधार पर की गई थी। ईस्टर ईसा के शूलारोपण तथा उनके पुनर्जीवित होने का प्रतीक था।

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इसने एक प्राचीन त्यौहार का स्थान ले लिया था जो लम्बी सर्दी के बाद बसन्त के आगमन का स्वागत करने के लिए मनाया जाता था। यद्यपि यह दिन प्रार्थना करने के लिए था, परन्तु लोग सामान्यतः इसका अधिकतर समय मौज-मस्ती करने और दावतों में बिताते थे। तीर्थयात्रा ईसाइयों के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण भाग थी। अतः बहुत से लोग शहीदों की समाधियों अथवा बड़े गिरजाघरों की लम्बी यात्राओं पर जाते थे।

प्रश्न 9.
मध्यकालीन यूरोप में कृषि – दासों द्वारा लार्ड को दी गई सेवाओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा
मध्यकालीन यूरोप में कृषि – दासों की दशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कृषि – दास अपने जीवन – निर्वाह के लिए जिन भू-खण्डों पर कृषि करते थे, वे लार्ड के स्वामित्व में थे। इसलिए उनकी अधिकतर उपज भी लार्ड को ही मिलती थी। कृषि-दास उन भूखण्डों पर भी कृषि करते थे, जो केवल लार्ड के स्वामित्व में थे। इसके लिए उन्हें कोई मजदूरी नहीं मिलती थी।

कृषि – दासों पर अनेक प्रतिबन्ध लगे हुए थे। वे लार्ड की आज्ञा के बिना जागीर नहीं छोड़ सकते थे। कृषि – दास केवल अपने लार्ड की चक्की में ही आटा पीस सकते थे, उनके तन्दूर में ही रोटी सेंक सकते थे तथा उनकी मदिरा – सम्पीडक में ही मदिरा और बीयर तैयार कर सकते थे। लार्ड को कृषि – दास का विवाह तय करने का भी अधिकार था। वह कृषि – दास की पसन्द को भी अपना आशीर्वाद दे सकता था, परन्तु इसके लिए कृषि – दास से शुल्क लेता था।

प्रश्न 10.
मध्यकालीन यूरोप में स्वतन्त्र कृषकों की दशा पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
स्वतन्त्र कृषक अपनी भूमि को लार्ड के काश्तकार के रूप में रखते थे। पुरुषों को सैनिक सेवा भी देनी पड़ती थी। कृषकों के परिवारों को लार्ड की जागीरों पर जाकर काम करने के लिए सप्ताह के तीन या उससे अधिक कुछ दिन निश्चित करने पड़ते थे। इस श्रम से होने वाला उत्पादन ‘ श्रम – अधिशेष’ कहलाता था। यह ‘श्रम – अधिशेष’ सीधे लार्ड के पास जाता था। इसके अतिरिक्त उनसे गड्ढे खोदना, जलाने के लिए लकड़ियाँ इकट्ठी करना, बाड़ बनाना, सड़कों व इमारतों की मरम्मत करने आदि कार्य करने की भी आशा की जाती थी ।

इन कार्यों के लिए उन्हें कोई मजदूरी नहीं मिलती थी। स्त्रियों और बच्चों को खेतों में सहायता करने के अतिरिक्त अन्य कार्य भी करने पड़ते थे। वे सूत कातते, कपड़ा बुनते, मोमबत्ती बनाते तथा लार्ड के उपयोग के लिए अंगूरों से रस निकाल कर शराब तैयार करते थे । कृषकों को एक प्रत्यक्ष कर ‘टैली’ भी राजा को देना पड़ता था, जबकि पादरी वर्ग तथा अभिजात वर्ग इस कर से मुक्त थे।

प्रश्न 11.
इंग्लैण्ड में सामन्तवाद के विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इंग्लैण्ड में सामन्तवाद का विकास – सामन्तवाद का विकास इंग्लैंड में 11वीं सदी से हुआ। ग्यारहवीं शताब्दी में फ्रांस के एक प्रान्त नारमैंडी के ड्यूक विलियम ने इंग्लैण्ड पर आक्रमण किया और वहाँ के सैक्शन राजा को पराजित कर दिया और इंग्लैण्ड पर अधिकार कर लिया। विलियम प्रथम ने देश की भूमि नपवाई, उसके नक्शे तैयार करवाये और उसे अपने साथ आए 180 नारमन अभिजातों में बाँट दिया।

ये लार्ड राजा के प्रमुख काश्तकार बन गए। इनसे राजा सैन्य सहायता की आशा करता था। वे राजा को कुछ नाइट देने के लिए बाध्य थे। शीघ्र ही लार्ड नाइटों को कुछ भूमि उपहार में देने लगे और बदले में वे उनसे उसी प्रकार सेवा की आशा रखते थे जैसी वे राजा से करते थे। परन्तु वे अपने निजी युद्धों के लिए नाइटों का उपयोग नहीं कर सकते थे। क्योंकि इस पर इंग्लैण्ड में प्रतिबन्ध था। ऐंग्लो-सेक्सन कृषक विभिन्न स्तरों के भूस्वामियों के काश्तकार बन गए।

प्रश्न 12.
पाँचवीं शताब्दी से ग्यारहवीं शताब्दी तक यूरोप में पर्यावरण का कृषि पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
पाँचवीं से दसवीं शताब्दी तक यूरोप का अधिकांश भाग विस्तृत वनों से घिरा हुआ था। अतः कृषि के लिएं उपलब्ध भूमि सीमित थी। इसके अतिरिक्त अत्याचारों से बचने के लिए कृषक वहाँ से भाग कर वनों में आश्रय प्राप्त कर सकते थे। इस समय यूरोप में भीषण शीत का दौर चल रहा थ। इससे सर्दियाँ प्रचण्ड और लम्बी अवधि की हो गई थीं।

इससे फसलों का उपज – काल भी छोटा हो गया था। इसके कारण कृषि की उपज कम हो गई। ग्यारहवीं शताब्दी से यूरोप में गर्मी का दौर शुरू हो गया और औसत तापमान बढ़ गया जिसका कृषि पर अच्छा प्रभावं पड़ा। अब कृषकों को कृषि के लिए लम्बी अवधि मिलने लगी। मिट्टी पर पाले का प्रभाव कम होने से खेती आसानी से की जा सकती थी। इसके परिणामस्वरूप यूरोप के अनेक भागों में वन- -क्षेत्रों में कमी हुई जिसके फलस्वरूप कृषि भूमि का विस्तार · हुआ।

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प्रश्न 13.
“प्रारम्भ में यूरोप में कृषि प्रौद्योगिकी बहुत आदिम किस्म की थी। ” स्पष्ट कीजिए।
अथवा
11वीं शताब्दी से पूर्व यूरोप में कृषि की दशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(1) प्रारम्भ में किसानों के पास केवल बैलों की जोड़ी से चलने वाला लकड़ी का हल था। यह हल केवल पृथ्वी की सतह को खुरच ही सकता था । यह भूमि की प्राकृतिक उत्पादकता को पूरी तरह से बाहर निकाल पाने में असमर्थ था। इसलिए कृषि में अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता था । भूमि को प्रायः चार वर्ष में एक बार हाथ से खोदा जाता था जिसके लिए अत्यधिक मानव श्रम की आवश्यकता होती थी।

(2) उस समय फसल-चक्र के एक प्रभावहीन तरीके का उपयोग हो रहा था। भूमि को दो भागों में बाँट दिया जाता था। एक भाग में शरद् ऋतु में सर्दी का गेहूँ बोया जाता था, जबकि दूसरी भूमि को परती या खाली रखा जाता था। अगले वर्ष परती भूमि पर राई बोई जाती थी, जबकि दूसरा आधा भाग खाली रखा जाता था। इस व्यवस्था के कारण मिट्टी की उर्वरता का धीरे-धीरे ह्रास होने लगा और प्रायः अकाल पड़ने लगे। दीर्घकालीन कुपोषण और विनाशकारी अकालों से गरीबों के लिए जीवन अत्यन्त मुश्किल हो गया।

प्रश्न 14.
मध्यकालीन यूरोप में कृषि सम्बन्धी समस्याओं के कारण लार्डों तथा कृषकों के बीच विवाद क्यों उत्पन्न हुआ?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में लार्ड अपनी आय बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। चूँकि भूमि का उत्पादन बढ़ाना सम्भव नहीं था, इसलिए कृषकों को मेनरों की जागीर की समस्त भूमि को कृषिगत बनाने के लिए बाध्य होना पड़ता था। यह कार्य करने के लिए उन्हें नियमानुसार निर्धारित समय से अधिक समय देना पड़ता था। कृषक इस अत्याचार को सहन नहीं कर सकते थे। चूँकि उनमें खुलकर विरोध करने की सामर्थ्य नहीं थी, इसलिए उन्होंने निष्क्रिय प्रतिरोध का सहारा लिया।

वे अपने खेतों पर कृषि करने में अधिक समय लगाने लगे और उस परिश्रम का अधिकतर उत्पाद अपने पास रखने . लगे। वे बेगार करने से भी संकोच करने लगे। चरागाहों तथा वन- -भूमि के कारण उनका उन लार्डों के साथ विवाद होने लगा। लार्ड इस भूमि को अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति समझते थे जबकि कृषक इसको सम्पूर्ण समुदाय की साझी सम्पदा मानते थे।

प्रश्न 15.
ग्यारहवीं शताब्दी में यूरोप में होने वाले नये प्रौद्योगिकी परिवर्तनों के क्या परिणाम हुए?
उत्तर:
ग्यारहवीं शताब्दी में यूरोप में होने वाले नये प्रौद्योगिकी परिवर्तनों के निम्नलिखित परिणाम हुए –
(1) विभिन्न सुधारों से भूमि की प्रत्येक इकाई में होने वाले उत्पादन में तीव्र गति से वृद्धि हुई। फलस्वरूप भोजन की उपलब्धता दुगुनी हो गई।
(2) आहार में मटर और सेम का अधिक उपयोग अधिक प्रोटीन का स्रोत बन गया।
(3) पशुओं को भी अच्छा चारा मिलने लगा।
(4) कृषक अब कम भूमि पर अधिक भोजन का उत्पादन कर सकते थे।
(5) तेरहवीं सदी तक एक कृषक के खेत का औसत आकार सौ एकड़ से घट कर बीस से तीस एकड़ तक रह गया। छोटी जोतों पर अधिकतर कुशलता से कृषि की जा सकती थी और उसमें कम श्रम की आवश्यकता थी। इससे कृषकों को अन्य गतिविधियों के लिए समय मिल गया।

प्रश्न 16.
मध्यकालीन यूरोप में प्रौद्योगिकी परिवर्तनों में लगने वाली धन-सम्बन्धी समस्याओं का समाधान किस प्रकार किया गया?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में कुछ प्रौद्योगिकी परिवर्तनों में अत्यधिक धन लगता था। कृषकों के पास पनचक्की तथा पवन चक्की स्थापित करने के लिए पर्याप्त धन नहीं था । इस सम्बन्ध में पहल लार्डों द्वारा की गई। परन्तु कृषक भी कुछ मामलों में पहल करने में सक्षम रहे। उदाहरण के लिए, उन्होंने खेती – योग्य भूमि का विस्तार किया । उन्होंने फसलों की तीन चक्रीय व्यवस्था को अपनाया और गाँवों में लोहार की दुकानें तथा भट्टियाँ स्थापित कीं। यहाँ पर लोहे की नोक वाले हल तथा घोड़ों की नाल बनाने और मरम्मत करने का काम सस्ती दरों पर किया जाने लगा।

प्रश्न 17.
ग्यारहवीं शताब्दी में लार्डों तथा कृषकों के बीच व्यक्तिगत सम्बन्ध क्यों कमजोर पड़ गए ?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में कथीड्रलों का निर्माण- मध्यकालीन यूरोप में कथीड्रलों का निर्माण इस प्रकार किया गया था कि पादरी की आवाज कथीड्रल में लोगों के एकत्रित होने वाले सभागार में स्पष्ट रूप से सुनाई दे सके और भिक्षुओं का गायन भी अधिक मधुर सुनाई पड़े। इस प्रकार का भी प्रावधान रखा जाता था कि लोगों को प्रार्थना के लिए बुलाने वाली घण्टियाँ दूर तक सुनाई पड़ सकें।

खिड़कियों के लिए अभिरंजित काँच का प्रयोग होता था। दिन के समय सूर्य की रोशनी उन्हें कथीड्रल के अन्दर मौजूद व्यक्तियों के लिए चमकदार बना देती थी। सूर्य अस्त होने के बाद मोमबत्तियों की रोशनी उन्हें बाहर के व्यक्तियों के लिए स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाला भवन बनाती थी। अभिरंजित काँच की खिड़कियों पर बने चित्र बाइबल की कथाओं से सम्बन्धित थे जिन्हें अनपढ़ व्यक्ति भी पढ़ सकते थे

प्रश्न 23.
एबट सुगेर ने पेरिस के निकट सेन्ट डेनिस में स्थित आबे के बारे में क्या विवरण दिया है?
उत्तर:
एबट सुगेर ने पेरिस के निकट सेन्ट डेनिस में स्थित आबे के बारे में लिखा है कि विभिन्न क्षेत्रों से आए अनेक विशेषज्ञों के अत्यन्त कुशल हाथों से अनेक प्रकार की शानदार नई खिड़कियों की पुताई करवाई, क्योंकि ये खिड़कियाँ अपने अद्भुत निर्माण तथा अत्यधिक महँगे रंजित एवं सफायर काँच के कारण बहुत मूल्यवान थीं। इसलिए उनकी रक्षा के लिए हमने एक सरकारी प्रधान शिल्पकार और स्वर्णकार को नियुक्त किया। वे अपना वेतन वेदिका से सिक्कों के रूप में और आटा अपने भाई-बन्धुओं के सार्वजनिक भण्डार से प्राप्त कर सकते थे। वे उन कला- देखभाल के कर्त्तव्यों की अवहेलना कभी नहीं कर सकते थे।

प्रश्न 24.
चौदहवीं सदी के शुरू में यूरोप में पड़े भीषण अकालों के लिए कौनसी परिस्थितियाँ उत्तरदायी
उत्तर:
उत्तरी यूरोप में तेरहवीं सदी के अन्त तक पिछले तीन सौ वर्षों की तेज ग्रीष्म ऋतु का स्थान तेज ठण्डी ग्रीष्म ऋतु ने ले लिया था। परिणामस्वरूप उपज वाले मौसम छोटे हो गए तथा ऊँची भूमि पर फसल उगाना काफी कठिन हो गया। तूफानों और सागरीय बाढ़ों के कारण अनेक फार्म-प्रतिष्ठान नष्ट हो गए जिसके परिणामस्वरूप राज्य सरकारों को करें द्वारा कम आय हुई तेरहवीं सदी के पूर्व की अनुकूल जलवायु के कारण अनेक जंगल तथा चरागाह कृषि भूमि में बदल गए।

परन्तु गहन जुताई ने फसलों के तीन क्षेत्रीय फसल चक्र के प्रचलन के बावजूद भूमि को कमजोर बना दिया। भूमि के कमजोर होने का कारण उचित भू-संरक्षण का अभाव था। चरागाहों की कमी के कारण पशुओं की संख्या में भारी कमी आ गई। दूसरी ओर जनसंख्या इतनी तीव्र गति से बढ़ी कि उपलब्ध संसाधन कम पड़ गए। इसके परिणामस्वरूप यूरोपवासियों को अकालों का सामना करना पड़ा। 1315 और 1317 के बीच यूरोप में भीषण अकाल पड़े। इसके पश्चात् 1320 के दशक में अनगिनत पशुओं की मौतें हुईं।

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प्रश्न 25.
चौदहवीं शताब्दी में यूरोप में फैली महामारियों का वर्णन कीजिए। इनके क्या परिणाम हुए?
उत्तर:
बारहवीं तथा तेरहवीं सदी में वाणिज्य – व्यापार में विस्तार के कारण दूर देशों से व्यापार करने वाले पोत यूरोप के तटों पर आने लगे। पोतों के साथ-साथ बड़ी संख्या में चूहे भी आ गए जो अपने साथ ब्यूबोनिक प्लेग जैसी महामारी का संक्रमण ( Black Death) लाए। अतः पश्चिमी यूरोप 1347 और 1350 के बीच महामारी से अत्यधिक प्रभावित हुआ। आधुनिक विद्वानों के अनुसार यूरोप की आबादी का लगभग 20% भाग मौत के मुँह में चला गया।

कुछ स्थानों पर तो मौत के मुँह में जाने वाली संख्या वहाँ की जनसंख्या का 40% तक थी। व्यापार केन्द्र के होने के कारण, नगर महामारी से सर्वाधिक प्रभावित हुए। मठों तथा आश्रमों में जब एक व्यक्ति प्लेग की चपेट में आ जाता था, तो वहाँ रहने वाले सभी व्यक्ति महामारी के शिकार बन जाते थे । परिणामस्वरूप कोई भी व्यक्ति महामारी से नहीं बच पाता था। इस प्लेग के पश्चात् 1360 और 1370 में प्लेग की कुछ छोटी-छोटी घटनाएँ हुईं। इस महामारी के कारण यूरोप की जनसंख्या 1300 ई. में 730 लाख से घटकर 1400 ई. में 450 लाख रह गई।

प्रश्न 26.
यूरोप में फैली महामारी के क्या परिणाम हुए?
उत्तर:
यूरोप में फैली महामारी के निम्नलिखित परिणाम हुए –
(1) इस विनाश – लीला के साथ आर्थिक मंदी के जुड़ने से व्यापक सामाजिक विस्थापन हुआ।
(2) जनसंख्या में कमी के कारण मजदूरों की संख्या में अत्यधिक कमी आ गई।
(3) कृषि और उत्पादन के बीच भारी असन्तुलन पैदा हो गया। क्योंकि इन दोनों ही कार्यों में पर्याप्त संख्या में लग सकने वाले लोगों में भारी कमी आ गई थी।
(4) खरीददारों की कमी के कारण कृषि उत्पादों के मूल्यों में कमी आई।
(5) प्लेग के बाद इंग्लैण्ड में मजदूरों, विशेषकर कृषि मजदूरों की भारी माँग के कारण मजदूरी की दरों में 250 प्रतिशत तक वृद्धि हो गई।

प्रश्न 27.
चौदहवीं शताब्दी में यूरोप में कृषकों के विद्रोहों का वर्णन कीजिए। इन विद्रोहों के क्या परिणाम हुए?
उत्तर:
चौदहवीं शताब्दी में यूरोप में कृषकों के विद्रोह – चौदहवीं शताब्दी में पड़े अकालों, महामारी, आर्थिक मन्दी आदि के कारण यूरोप के लार्डों की आय काफी कम हो गई। मजदूरों की दरें बढ़ने तथा कृषि सम्बन्धी मूल्यों में कमी ने अभिजात वर्ग की आय को कम कर दिया। इससे उनमें निराशा आ गई और उन्होंने उन धन सम्बन्धी अनुबन्धों को तोड़ दिया जिसे उन्होंने हाल ही में सम्पन्न किया था। उन्होंने पुरानी मजदूरी सेवाओं को फिर से प्रचलित कर दिया। इससे कृषकों में असन्तोष उत्पन्न हुआ और उन्होंने विशेषकर पढ़े-लिखे तथा समृद्ध कृषकों ने विद्रोह कर दिया। 1323 में कृषकों ने फ्लैंडर्स में, 1358 में फ्रांस में तथा 1381 में इंग्लैण्ड में विद्रोह किए।

प्रश्न 28.
चौदहवीं शताब्दी में हुए कृषकों के विद्रोहों के क्या परिणाम हुए?
उत्तर:
चौदहवीं शताब्दी में हुए कृषकों के विद्रोहों के निम्नलिखित परिणाम हुए-
(1) यद्यपि इन विद्रोहों का क्रूरतापूर्वक दमन कर दिया गया, परन्तु इससे स्पष्ट हो गया कि कृषक पिछली संदियों हुए लाभों को बचाने के लिए प्रयत्नशील थे।
(2) इन विद्रोहों की तीव्रता ने यह सुनिश्चित कर दिया कि पुराने सामन्ती सम्बन्धों को पुनः थोपा नहीं जा सकता। धन अर्थव्यवस्था काफी अधिक विकसित थी, जिसे पलटा नहीं जा सकता था।
(3) यद्यपि लार्डों ने कृषक – विद्रोहों का दमन कर दिया, परन्तु कृषकों ने यह सुनिश्चित कर लिया कि दासता का युग पुनः नहीं लौट सकेगा।

प्रश्न 29.
पन्द्रहवीं तथा सोलहवीं सदियों में यूरोप में शक्तिशाली राज्यों का प्रादुर्भाव किस प्रकार हुआ ?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में शक्तिशाली राज्यों का प्रादुर्भाव – पन्द्रहवीं तथा सोलहवीं सदियों में यूरोपीय शासकों ने अपनी सैनिक तथा आर्थिक शक्ति में काफी वृद्धि कर ली। उनके द्वारा निर्मित शक्तिशाली राज्य उस समय होने वाले आर्थिक परिवर्तनों के समान ही महत्त्वपूर्ण थे। इसी कारण इतिहासकारों ने इन राजाओं को ‘नए शासक’ की संज्ञा दी। फ्रांस में लुई ग्यारहवें आस्ट्रिया में मैक्समिलन, इंग्लैण्ड में हेनरी सप्तम तथा स्पेन में इजाबेला और फर्डीनेण्ड निरंकुश शासक थे। उन्होंने संगठित स्थायी सेनाओं, स्थायी नौकरशाही तथा राष्ट्रीय कर – र- प्रणाली की स्थापना की। स्पेन और पुर्तगाल ने यूरोप के समुद्र पार विस्तार की योजनाएँ बनाईं।

प्रश्न 30.
मध्यकालीन यूरोप में शक्तिशाली राजतन्त्रों की स्थापना के लिए उत्तरदायी तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. सामाजिक परिवर्तन – जागीरदारी तथा सामन्तशाही वाली सामन्त प्रथा के विलय और आर्थिक विकास की धीमी गति ने यूरोप के शासकों को प्रभावशाली बनाया। शासकों ने सामन्तों से अपनी सेना के लिए कर लेना बन्द कर दिया और उसके स्थान पर बन्दूकों तथा बड़ी तोपों से सुसज्जित प्रशिक्षित सेना का गठन किया जो पूर्ण रूप से उनके अधीन थी। राजाओं की शक्तिशाली सेना के कारण अभिजात वर्ग उनका विरोध करने में असमर्थ रहा।

2. करों में वृद्धि से शासकों की आय में वृद्धि -करों में वृद्धि करने से यूरोप के शासकों को पर्याप्त राजस्व प्राप्त हुआ। इसके फलस्वरूप वे पहले से बड़ी सेनाएँ रखने में समर्थ हुए। सेना की सहायता से उन्होंने अपने राज्य में होने वाले आन्तरिक विद्रोहों का भी दमन कर दिया।

प्रश्न 31.
इंग्लैण्ड में हुए राजनीतिक परिवर्तन की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
इंग्लैण्ड में राजनीतिक परिवर्तन- इंग्लैण्ड में नारमन – विजय से भी पहले ऐंग्लो-सेक्सन लोगों की एक महान परिषद होती थी। अपनी प्रजा पर कर लगाने से पहले राजा को महान परिषद की सलाह लेनी पड़ती थी। यह परिषद कालान्तर में पार्लियामेन्ट के रूप में विकसित हुई जिसमें ‘हाउस ऑफ लाईस’ तथा ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ शामिल थे। इंग्लैण्ड के शासक चार्ल्स प्रथम (1629 – 1640 ) ने पार्लियामेन्ट का अधिवेशन बिना बुलाए ग्यारह वर्षों तक शासन किया।

धन की आवश्यकता पड़ने पर एक बार उसे पार्लियामेन्ट का अधिवेशन बुलाना पड़ा। इस अवसर पर पार्लियामेन्ट के एक भाग ने राजा का विरोध किया। बाद में चार्ल्स प्रथम को मृत्यु – दण्ड देकर इंग्लैण्ड में गणतन्त्र की स्थापना की गई। परन्तु यह व्यवस्था अधिक समय तक नहीं चल सकी और राजतन्त्र की पुनः स्थापना इस शर्त पर की गई कि अब पार्लियामेन्ट नियमित रूप से बुलायी जायेगी।

निबन्धात्मक प्रश्न 

प्रश्न 1.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज कितने सामाजिक वर्गों में बंटा हुआ था? मध्यकाल के अन्त में कौन- सा नया वर्ग इन समाजों में उदय हुआ?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोपीय समाज तीन सामाजिक वर्गों में बंटा हुआ था। ये सामाजिक वर्ग निम्नलिखित थे –
(1) प्रथम वर्ग – पादरी वर्ग-पादरियों ने स्वयं को प्रथम वर्ग में रखा था। यूरोप में ईसाई समाज का मार्गदर्शन बिशपों तथा पादरियों द्वारा किया जाता था। जो पुरुष पादरी बनते थे, वे शादी नहीं कर सकते थे। धर्म के क्षेत्र में विशप अभिजात माने जाते थे। बिशपों के पास लॉर्ड की तरह विस्तृत जागीरें थीं तथा वे शानदार महलों में रहते थे चर्च एक शक्तिशाली संस्था थी। अधिकतर गांवों में चर्च हुआ करते थे, जहाँ पर प्रत्येक रविवार को लोग पादरी के धर्मोपदेश सुनने तथा सामूहिक प्रार्थना हेतु इकट्ठा होते थे।

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(2) दूसरा वर्ग – अभिजात वर्ग- दूसरा सामाजिक वर्ग अभिजात वर्ग था। यह बड़ा भू-स्वामी वर्ग था। बड़े भू- स्वामी और अभिजात राजा के अधीन होते थे और कृषक भू-स्वामियों के अधीन होते थे। भूस्वामियों का अपनी संपदा पर स्थायी रूप से नियंत्रण था। वह अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा सकते थे तथा स्वयं अपना न्यायालय लगा सकते थे एवं अपनी मुद्रा भी प्रचलित कर सकते थे। वे अपनी भूमि पर बसे सभी व्यक्तियों के मालिक थे। वे विस्तृत क्षेत्रों के मालिक थे। उनका घर ‘मेनर’ कहलाता था। उनकी भूमि कृषकों द्वारा जोती जाती थी जिनको वे आवश्यकता पड़ने पर युद्ध के समय पैदल सैनिकों के रूप में काम में लेते थे।

(3) तीसरा वर्ग – किसान-यूरोपीय समाज का तीसरा वर्ग काश्तकारों का था जो पहले दो वर्गों का भरण-पोषण करते थे। काश्तकार दो तरह के होते थे –
(i) स्वतंत्र किसान और
(ii) सर्फ ( कृषि दास ) –
स्वतंत्र किसान- ये अपनी भूमिका को लॉर्ड के काश्तकार के रूप में देखते थे। इसकी एवज में पुरुषों का सैनिक सेवा में योगदान आवश्यक होता था। कृषक के परिवार कुछ लार्ड की जागीरों पर काम करते थे। इस श्रम से होने वाला उत्पादन सीधे लार्ड के पास जाता था। इसके अतिरिक्त भी उनसे अन्य अनेक काम कराये जाते थे। इनके लिए उन्हें कोई मजदूरी नहीं मिलती थी। इसके अतिरिक्त एक प्रत्यक्ष कर ‘टैली’ था जिसे राजा कृषकों पर कभी – कभी लगाते थे।

(4) चौथा वर्ग-नए नगरवासी – कृषि के विस्तार के साथ-साथ जनसंख्या, व्यापार और नगरों का विस्तार हुआ। नगरों में लोग, सेवा के स्थान पर, उन लार्डों को जिनकी भूमि पर वे बसे थे, कर देने लगे। इसके कृषक परिवारों को लार्ड के नियंत्रण से मुक्ति मिली। इसके अतिरिक्त नगर में आकर कृषि दास भी स्वाधीन नागरिक बने। ये लोग कार्य की दृष्टि से अकुशल श्रमिक होते थे। इसके बाद वकीलों और साहूकारों की आवश्यकता हुई। इस प्रकार नगरों में नया वर्ग स्वतंत्र श्रमिकों, व्यापारियों तथा मध्यम वर्ग अस्तित्व में आया।

प्रश्न 2. मध्यकालीन फ्रांस में अभिजात वर्ग की दशा की विवेचना कीजिए।
अथवा
मध्यकालीन फ्रांस में अभिजात वर्ग को कौन-कौनसे अधिकार प्राप्त थे ? इस वर्ग की समाज में क्या भूमिका
उत्तर:
मध्यकालीन फ्रांस में अभिजात वर्ग की दशा- यद्यपि पादरी को प्रथम वर्ग में तथा अभिजात वर्ग को द्वितीय वर्ग में रखा गया था, परन्तु वास्तव में सामाजिक प्रक्रिया में अभिजात वर्ग की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। इसका कारण यह था किं भूमि पर अभिजात वर्ग का नियन्त्रण था। यह नियन्त्रण वैसलेज नामक एक प्रथा के विकास के कारण हुआ।
वैसलेज की प्रथा – फ्रांस के शासक ‘वैसलेज’ नामक एक प्रथा के कारण लोगों से जुड़े हुए थे। बड़े भू-स्वामी और अभिजात वर्ग राजा के अधीन होते थे, जबकि कृषक भू-स्वामियों के अधीन होते थे।

अभिजात वर्ग राजा को अपना स्वामी (Seigneur अथवा Senior) – मान लेता था और वे आपस में वचनबद्ध होते थे। सेन्योर अथवा लार्ड दास (वैसल) की रक्षा करता था और बदले में वह लार्ड के प्रति निष्ठावान रहता था। इन सम्बन्धों के साथ व्यापक रीति-रिवाज तथा शपथें जुड़ी हुई थीं। ये शपथें चर्च में बाइबल की शपथ लेकर ली जाती थीं। इस समारोह में दास को लार्ड द्वारा दी गई भूमि के प्रतीक के रूप में एक लिखित अधिकार-पत्र अथवा एक छड़ी या केवल एक मिट्टी का डला दिया जाता था।

अभिजात वर्ग के अधिकार ( समाज में भूमिका) – अभिजात वर्ग के निम्नलिखित अधिकार थे –
1. सम्पदा पर स्थायी अधिकार – अभिजात वर्ग की एक विशेष हैसियत थी। उनका अपनी सम्पदा पर स्थायी तौर पर पूर्ण नियन्त्रण था।
2. सैन्य क्षमता में वृद्धि करना – वे अपनी सैन्य क्षमता में वृद्धि कर सकते थे। उनके द्वारा गठित सेना सामन्ती सेना कहलाती थी।
3. अपना न्यायालय स्थापित करना – वे अपना स्वयं का न्यायालय स्थापित कर लेते थे
4. मुद्रा प्रचलित करना – यहाँ तक कि वे अपनी मुद्रा भी प्रचलित कर सकते थे।
5. विस्तृत क्षेत्र के स्वामी – वे अपनी भूमि पर बसे सभी लोगों के स्वामी थे। वे विस्तृत क्षेत्रों के स्वामी थे जिसमें उनके घर, उनके निजी खेत, जोत व चरागाह और उनके असामी कृषकों के घर और खेत होते थे। उनका घर ‘मेनर’ कहलाता था।
6. कृषकों द्वारा सेवा प्रदान करना – उनकी व्यक्तिगत भूमि कृषकों द्वारा जोती जाती थी। आवश्यकता पड़ने पर युद्ध के समय कृषकों को पैदल सैनिकों के रूप में कार्य करना पड़ता था । इसके अतिरिक्त उन्हें अपने लार्ड के खेतों पर भी काम करना पड़ता था।

प्रश्न 3.
‘मेनर की जागीर’ के बारे में आप क्या जानते हैं? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मेनर की जागीर – मध्यकालीन यूरोप में समाज में अभिजात वर्ग का बोलबाला था। लार्ड का अपना मेनर- भवन होता था। वह गाँवों पर नियन्त्रण रखता था। कुछ लार्ड अनेक गाँवों के स्वामी थे। किसी छोटे मेनर की जागीर में दर्जन भर तथा बड़ी जागीर में 50-60 परिवार हो सकते थे।

मेनर की जागीर की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं –

1. दैनिक उपभोग की वस्तुओं का उपलब्ध होना – दैनिक उपभोग की प्रत्येक वस्तु जागीर पर ही मिलती थी। अनाज खेतों में उगाये जाते थे। लोहार तथा बढ़ई लार्ड के औजारों की देखभाल तथा हथियारों की मरम्मत करते थे। राजमिस्त्री लार्ड की इमारतों की देखभाल करते थे। स्त्रियाँ सूत कातती एवं बुनती थीं। बच्चे लार्ड की मदिरा – सम्पीडक में कार्य करते थे। जागीरों में विस्तृत अरण्य भूमि और वन होते थे जहाँ लार्ड शिकार करते थे। जागीर में चरागाह होते थे जहाँ लार्ड के पशु और घोड़े चरते थे। जागीर में एक चर्च और सुरक्षा के लिए एक दुर्ग होता था ।

2. दुर्गों का विकास – तेरहवीं शताब्दी से कुछ दुर्गों को बड़ा बनाया जाने लगा ताकि वे नाइट के परिवार का निवास-स्थान बन सकें। वास्तव में इंग्लैण्ड में नारमन – विजय के पहले दुर्गों की कोई जानकारी नहीं थी और दुर्गों का विकास सामन्त प्रथा के अन्तर्गत राजनीतिक प्रशासन तथा सैनिक शक्ति के केन्द्रों के रूप में हुआ था ।

3. मेनरों का आत्म-निर्भर न होना – मेनर कभी भी आत्म-निर्भर नहीं हो सकते थे क्योंकि उन्हें नमक, चक्की का पाट और धातु के बर्तन बाहर के स्रोतों से प्राप्त करने पड़ते थे । कुछ लार्ड विलासी जीवन व्यतीत करना चाहते थे। उन्हें महंगी वस्तुएँ, वाद्य-यन्त्र और आभूषण आदि दूसरे स्थानों से प्राप्त करनी पड़ती थीं क्योंकि ये वस्तुएँ स्थानीय जगह पर उपलब्ध नहीं होती थीं।.

प्रश्न 4.
नाइट कौन थे? उनके लार्ड के साथ क्या सम्बन्ध थे?
उत्तर:
नाइट- नौवीं शताब्दी में यूरोप में स्थानीय युद्ध प्रायः होते रहते थे। शौकिया कृषक – सैनिक इन युद्धों के लिए अधिक उपयोगी नहीं थे। इनके लिए कुशल घुड़सवारों की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक नये वर्ग का उदय हुआ, जो ‘नाइट्स’ कहलाते थे। लार्ड से सम्बन्ध-नाइट लार्ड से उसी प्रकार सम्बद्ध थे, जिस प्रकार लार्ड राजा से सम्बद्ध था।

लार्ड नाइट को भूमि का एक भाग देता था और उसकी रक्षा करने का वचन देता था। इस भू-भाग को ‘फीफ’ कहा जाता था। फीफ को उत्तराधिकार में प्राप्त किया जा सकता था। यह 1000-2000 एकड़ या इससे अधिक क्षेत्र में फैली हुई हो सकती थी। इसमें नाइट और उसके परिवार के लिए एक पनचक्की और मदिरा – सम्पीडक के अतिरिक्त उसके व उसके परिवार के लिए घर, चर्च और उस पर निर्भर व्यक्तियों के रहने का स्थान होता था।

सामन्ती मेनर की भाँति फीफ की भूमि को भी कृषक जोतते थे। इसके बदले में नाइट, अपने लार्ड को एक निश्चित रकम देता था तथा युद्ध में उसकी ओर से लड़ने का वचन देता था। अपनी सैन्य- योग्यताओं को बनाए रखने के उपाय – अपनी सैन्य- योग्यताओं को बनाए रखने के लिए नाइट प्रतिदिन अपना समय बाड़ बनाने, घेराबन्दी करने और पुतलों से लड़ने तथा अपने बचाव का अभ्यास करने में व्यतीत अन्य लार्डों को सेवाएँ प्रदान करना – नाइट अपनी सेवाएँ अन्य लार्डों को भी प्रदान कर सकता था, परन्तु उसकी सर्वप्रथम निष्ठा अपने लार्ड के प्रति ही होती थी। घुमक्कड़ चारणों द्वारा नाइट्स की वीरता की कहानियाँ सुनाना – बारहवीं शताब्दी से गायक फ्रांस के मेनरों में वीर और पराक्रमी राजाओं तथा नाइट्स की वीरता की कहानियाँ, गीतों के रूप में सुनाते हुए घूमते रहते थे। उस युग में जब शिक्षित लोगों की कमी थी तथा पाण्डुलिपियाँ भी अधिक नहीं थीं, ये घुमक्कड़ चारण बहुत प्रसिद्ध थे।

प्रश्न 5.
मध्यकालीन यूरोप में पादरी-वर्ग की स्थिति की विवेचना कीजिए।
अथवा
कैथोलिक चर्च तथा पादरी-वर्ग की समाज में क्या भूमिका थी?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में पादरी-वर्ग की स्थिति – मध्यकालीन यूरोप में समाज में पादरी वर्ग को प्रथम वर्ग में रखा गया था। समाज में कैथोलिक चर्च तथा पादरी वर्ग का बोलबाला था। कैथोलिक चर्च के अपने नियम थे। उसके पास बड़ी-बड़ी भूमियाँ थीं जिनसे वे कर वसूल करते थे। इसलिए कैथोलिक चर्च एक शक्तिशाली संस्था थी, जो राजा पर निर्भर नहीं थी। पोप पश्चिमी चर्च के अध्यक्ष थे। वे रोम में रहते थे। यूरोप में ईसाई समाज का मार्गदर्शन बिशपों तथा पादरियों द्वारा किया जाता था। अधिकतर गाँवों के अपने चर्च होते थे जहाँ प्रत्येक रविवार को लोग पादरी के धर्मोपदेश सुनने तथा सामूहिक प्रार्थना करने के लिए एकत्रित होते थे। कृषि – दास, शारीरिक रूप से बाधित व्यक्ति और स्त्रियाँ पादरी नहीं बन सकते थे। वे विवाह नहीं कर सकते थे।

पादरी वर्ग के अधिकार – धर्म के क्षेत्र में बिशप अभिजात माने जाते थे। बिशपों के पास भी लार्ड की भाँति बड़ी-बड़ी जागीरें थीं और वे शानदार महलों में रहते थे । चर्च को एक वर्ष में कृषक से उसकी उपज का दसवाँ भाग लेने का अधिकार था। इसे ‘टीथ’ कहा जाता था। इसके अतिरिक्त धनी लोग अपने कल्याण तथा मृत्यु के बाद अपने सम्बन्धियों के कल्याण के लिए चर्च को दान देते थे। यह भी चर्च की आय का एक स्रोत था।

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चर्च के औपचारिक सामन्ती रीति-रिवाज – चर्च के औपचारिक रीति-रिवाज की कुछ महत्त्वपूर्ण रस्में सामन्ती कुलीनों की नकल थीं। चर्च में प्रार्थना करते समय हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर घुटनों के बल झुकना, नाइट द्वारा अपने वरिष्ठ लार्ड के प्रति स्वामि भक्ति की शपथ लेते समय अपनाये गए तरीके की नकल थी। इसी प्रकार ईश्वर के लिए लार्ड शब्द का प्रचलन इस बात का प्रतीक था कि सामन्ती संस्कृति ने चर्च के उपासना – कक्षों में प्रवेश कर लिया था। इस प्रकार चर्च ने अनेक सांस्कृतिक सामन्ती रीति-रिवाजों और तौर-तरीकों को अपना लिया था।

प्रश्न 6.
मध्यकालीन यूरोप के मठों तथा उनमें रहने वाले भिक्षुओं के जीवन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप के मठ तथा भिक्षु भिक्षु कुछ विशेष श्रद्धालु ईसाइयों की एक श्रेणी थी। भिक्षु अत्यन्त धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे तथा एकान्त जीवन जीना पसन्द करते थे। वे धार्मिक समुदायों में रहते थे, जो ऐबी या मोनेस्ट्री या मठ कहलाते थे। ये मठ अधिकतर मनुष्य की सामान्य आबादी से बहुत दूर होते थे। मध्यकालीन यूरोप के दो सबसे प्रसिद्ध मठों में एक मठ 529 ई. में इटली में स्थापित सेन्ट बेनेडिक्ट मठ था तथा दूसरा 910 में बरगंडी में स्थापित क्लून मठ था।

भिक्षुओं का जीवन – मध्यकालीन यूरोप के भिक्षु अपना सारा जीवन ऐबी में रहने और अपना समय प्रार्थना करने तथा अध्ययन एवं कृषि जैसे शारीरिक श्रम में लगाने का व्रत लेते थे। भिक्षु का जीवन पुरुष और स्त्रियाँ दोनों ही अपना सकते थे। ऐसे पुरुषों को ‘मोंक’ तथा स्त्रियों को ‘नन’ कहा जाता था। पुरुष और स्त्रियों के लिए अलग-अलग मठ थे। पादरियों की भाँति भिक्षु और भिक्षुणियाँ भी विवाह नहीं कर सकते थे।

बेनेडिक्टीन – मठों में भिक्षुओं के लिए एक हस्तलिखित पुस्तक होती थी जिसमें नियमों के 73 अध्याय थे इसका पालन भिक्षुओं द्वारा कई सदियों तक किया जाता रहा। इसके कुछ प्रमुख नियम थे – विनम्रता तथा आज्ञापालन, निजी सम्पत्ति नहीं रखना, निश्चित समय में शारीरिक श्रम और निश्चित घंटों में पवित्र पाठ करना तथा आवश्यकता की समस्त वस्तुएँ मठ की सीमा के अंदर हो आदि। मठों के आकार का विस्तार- कालान्तर में मठों का आकार बढ़ गया और उनमें भिक्षुओं की संख्या सैकड़ों तक पहुँच गई।

इन बड़े मठों से बड़ी इमारतें और भू- जागीरों के साथ-साथ स्कूल या कॉलेज और अस्पताल सम्बद्ध थे। कला के विकास में मठों का योगदान- इन मठों ने कला के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। आबेस हिल्डेगार्ड एक प्रसिद्ध एवं प्रतिभाशाली संगीतज्ञ था जिसने चर्च की प्रार्थनाओं में सामुदायिक गायन की प्रथा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। फ्रायर-तेरहवीं सदी में भिक्षुओं के ऐसे समूहों का प्रादुर्भाव हुआ जो फ्रायर कहलाते थे। फ्रायर मठों में नहीं रहते थे। वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूम-घूम कर लोगों को उपदेश देते थे और दान से अपनी जीविका चलाते थे।

प्रश्न 7.
मध्यकालीन यूरोप में कृषकों की दशा पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
मध्यकालीन यूरोप में कृषकों की दशा मध्यकालीन यूरोप में कृषक तीसरे वर्ग में रखे गये थे।
कृषक दो प्रकार के होते थे –
(1) स्वतन्त्र किसान
(2) कृषिदास अथवा सर्फ।

1. स्वतन्त्र कृषकों की दशा – स्वतन्त्र कृषक अपनी भूमि को लार्ड के काश्तकार के रूप में देखते थे। पुरुषों को सैनिक सेवा भी देनी पड़ती थी । उन्हें अपने लार्ड को वर्ष में कम-से-कम 40 दिन सैनिक सेवा देनी पड़ती थी। कृषकों के परिवारों को लार्ड की जागीरों पर जाकर काम करना पड़ता था। उन्हें सप्ताह में तीन या उससे अधिक दिनों तक लार्ड की जागीरों पर जाकर काम करना पड़ता था। इस श्रम से होने वाला उत्पादन ‘ श्रम – अधिशेष’ कहलाता था।

यह श्रम- अधिशेष सीधे लार्ड के पास जाता था। इसके अतिरिक्त उनसे खड्डे खोदना, जलाने के लिए लकड़ियाँ इकट्ठे करना, बाड़ बनाना, सड़कों व इमारतों की मरम्मत करने आदि कार्य करने की भी आशा की जाती थी। इन कार्यों के लिए उन्हें कोई मजदूरी नहीं मिलती थी। स्त्रियों और बच्चों को खेतों में सहायता करने के अतिरिक्त अन्य कार्य भी करने पड़ते थे। वे. सूत कातते, कपड़ा बुनते, मोमबत्ती बनाते तथा लार्ड के उपयोग के लिए अंगूरों से रस निकाल कर शराब तैयार करते थे। कृषकों को एक प्रत्यक्ष कर ‘टैली’ भी राजा को देना पड़ता था, जबकि पादरी और अभिजात वर्ग इस कर से मुक्त थे।

2. कृषि – दासों की दशा – कृषि – दास अथवा सर्फ अपने जीवन – निर्वाह के लिए जिन भूखण्डों पर कृषि करते थे, वे लार्ड के स्वामित्व में थे। इसलिए उनकी अधिकतर उपज भी लार्ड को मिलती थी। कृषि – दास उन भूखण्डों पर भी कृषि करते थे जो केवल लार्ड के स्वामित्व में थे। इसके लिए उन्हें कोई मजदूरी नहीं मिलती थी। वे लार्ड की आज्ञा के बिना जागीर नहीं छोड़ सकते थे। कृषि – दासों पर अनेक प्रतिबन्ध लगे हुए थे।

वे केवल अपने लार्ड की चक्की में ही आटा पीस सकते थे, उनके तन्दूर में ही रोटी सेंक सकते थे तथा उनकी मदिरा – सम्पीडक में ही शराब और बीयर तैयार कर सकते थे। लार्ड को कृषि – दास का विवाह तय करने का भी अधिकार था। वह कृषि – दास की पसन्द को भी अपना आशीर्वाद दे सकता था, परन्तु इसके लिए वह कृषि – दास से शुल्क लेता था। इस प्रकार मध्यकालीन यूरोप में कृषकों की दशा बड़ी शोचनीय थी। लार्ड द्वारा उनका शोषण किया जाता था जिससे उनकी दशा दयनीय बनी हुई थी । कठोर परिश्रम करने के बाद भी उन्हें भरपेट भोजन नहीं मिल पाता था।

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प्रश्न 8.
मध्यकालीन यूरोप में ग्यारहवीं शताब्दी में कृषि प्रौद्योगिकी में आए परिवर्तनों का वर्णन कीजिए । इनके क्या परिणाम हुए ?
अथवा
मध्यकालीन यूरोप में लार्ड और सामन्तों के सामाजिक और आर्थिक सम्बन्धों को प्रभावित करने वाले कारकों का विवेचन कीजिए ।
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में सामाजिक और आर्थिक सम्बन्धों को प्रभावित करने वाले कारक मध्यकालीन यूरोप में सामाजिक और आर्थिक सम्बन्धों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित थे –
1. पर्यावरण-पाँचवीं से दसवीं शताब्दी तक यूरोप का अधिकांश भाग विस्तृत वनों से घिरा हुआ था। अतः कृषि के लिए उपलब्ध भूमि सीमित थी। इस समय यूरोप में भीषण शीत पड़ने के कारण सर्दियाँ प्रचण्ड और लम्बी अवधि की हो गई थीं। इससे फसलों का उपज – काल भी छोटा हो गया था। इसके कारण कृषि की उपज कम हो गई।

ग्यारहवीं शताब्दी में यूरोप में गर्मी का दौर शुरू हो गया और औसत तापमान बढ़ गया, जिसका कृषि पर अच्छा प्रभाव पड़ा। अब कृषकों को कृषि के लिए लम्बी अवधि मिलने लगी। मिट्टी पर पाले का प्रभाव कम होने से खेती आसानी से की जा सकती थी । इसके परिणामस्वरूप यूरोप के अनेक भागों में वन क्षेत्रों में कमी हुई, जिसके परिणामस्वरूप कृषि भूमि का विस्तार हुआ ।

2. भूमि का उपयोग – प्रारम्भ में कृषि प्रौद्योगिकी बहुत आदिम किस्म की थी। कृषक बैलों की जोड़ी से चलने वाले लकड़ी के हल से जमीन जोतते थे। भूमि को प्रायः चार वर्ष में एक बार हाथ से खोदा जाता था और उसमें अत्यधिक मानव श्रम की आवश्यकता होती थी। इसके अतिरिक्त फसल चक्र के एक प्रभावहीन तरीके का उपयोग हो रहा था। इस व्यवस्था के कारण, मिट्टी की उर्वरता का धीरे-धीरे ह्रास होने लगा और प्राय: अकाल पड़ने लगे। दीर्घकालीन कुपोषण और विनाशकारी अकाल बारी- बारी से पड़ने लगे जिससे गरीबों के लिए जीवन अत्यन्त कठिन हो गया।

इन कठिनाइयों के बावजूद लार्ड अपनी आय को अधिकाधिक बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। भूमि के उत्पादन को बढ़ाना सम्भव नहीं था, इसलिए कृषकों को मेनरों की जागीर की समस्त भूमि को कृषिगत बनाने के लिए बाध्य किया जाता था। इस कार्य के लिए उन्हें नियमानुसार निर्धारित समय से अधिक समय देना पड़ता था। कृषक इस अत्याचार को मौन रहकर नहीं सहते थे। उन्होंने निष्क्रिय प्रतिरोध का मार्ग अपनाया। वे अपने खेतों पर कृषि करने में अधिक समय लगाने लगे और उस श्रम का अधिकतर उत्पाद अपने लिए रखने लगे। वे बेगार करने से भी बचने लगे। चरागाहों व वन – भूमि के कारण उनका उन लार्डों के साथ विवाद होने लगा। लार्ड इस भूमि को अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति समझते थे, जबकि कृषक इसको सम्पूर्ण समुदाय द्वारा उपयोग की जाने वाली साझा सम्पदा मानते थे।

3. नई कृषि प्रौद्योगिकी – यूरोप में कृषि प्रौद्योगिकी में निम्नलिखित परिवर्तन हुए –
(1) लोहे की भारी नोक वाले हल और साँचेदार पटरे का उपयोग – अब लकड़ी के हल के स्थान पर लोहे की भारी नोक वाले हल तथा साँचेदार पटरे का उपयोग होने लगा। ऐसे हल अधिक गहरा खोद सकते थे तथा साँचेदार पटरे सही तरीके से ऊपरी मिट्टी को पलट सकते थे। इसके फलस्वरूप भूमि में मौजूद पौष्टिक तत्त्वों का बेहतर उपयोग होने लगा।

(2) पशुओं को हलों में जोतने के तरीकों में सुधार – पशुओं को हलों में जोतने के तरीकों में सुधार हुआ। अब जुआ पशु के गले के स्थान पर कन्धे पर बाँधा जाने लगा। इससे पशुओं को अधिक शक्ति मिलने लगी।

(3) घोड़े के खुरों पर लोहे की नाल लगाना – घोड़े के खुरों पर अब लोहे की नाल लगाई जाने लगी जिससे उनके खुर सुरक्षित हो गए।

(4) कृषि के लिए वायु-शक्ति और जल- शक्ति का उपयोग – कृषि के लिए वायु-शक्ति तथा जल-शक्ति का उपयोग बड़ी मात्रा में होने लगा।

(5) कारखानों की स्थापना – अन्न को पीसने तथा अंगूरों को निचोड़ने के लिए अधिक जल-शक्ति तथा वायु- शक्ति से चलने वाले कारखाने स्थापित हुए।

(6) भूमि के उपयोग के तरीके में परिवर्तन – भूमि के उपयोग के तरीके में भी परिवर्तन आया। सबसे क्रान्तिकारी परिवर्तन था—दो खेतों वाली व्यवस्था से तीन खेतों वाली व्यवस्था में परिवर्तन। इस व्यवस्था में कृषक तीन वर्षों में से दो वर्ष अपने खेत का उपयोग कर सकता था।

परिणाम – कृषि प्रौद्योगिकी में परिवर्तनों के निम्नलिखित परिणाम हुए –
1. उत्पादन में वृद्धि – इन सुधारों के कारण भूमि की प्रत्येक इकाई में होने वाले उत्पादन में तीव्र गति से वृद्धि
2. अधिक प्रोटीन का स्त्रोत- मटर और सेम जैसे पौधों का अधिक उपयोग यूरोपीय लोगों के आहार में अधिक प्रोटीन का स्रोत बन गया। इसी प्रकार उनके पशुओं के लिए अच्छे चारे का स्रोत बन गया।
3. कृषकों को उत्तम अवसर प्राप्त होना – अब कृषकों को उत्तम अवसर मिलने लगे। अब वे कम भूमि पर अधिक खाद्यान्न का उत्पादन कर सकते थे
4. छोटी जोतों पर अधिक कुशलता से कृषि करना – तेरहवीं शताब्दी तक एक कृषक के खेत का औसत आकार घटकर बीस से तीस एकड़ तक रह गया। छोटी जोतों पर अधिक कुशलता से खेती की जा सकती थी और उसमें कम श्रम की आवश्यकता होती थी। इससे कृषकों को अन्य गतिविधियों के लिए समय मिल गया।
5. खेती योग्य भूमि का विस्तार- कृषकों ने खेती योग्य भूमि का विस्तार करने में पहल की।

प्रश्न 9.
मध्यकालीन यूरोप में नगरों के विकास की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में नगरों का विकास मध्यकालीन यूरोप में नगरों के विकास के लिए निम्नलिखित परिस्थितियाँ उत्तरदायी थीं –
1. कृषि के विकास व विस्तार से नगरों का विकास – रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् उसके नगर उजाड़ और बर्बाद हो गए थे। परन्तु ग्यारहवीं शताब्दी से जब कृषि का विस्तार हुआ और वह अधिक जनसंख्या का भार ‘सहन करने में सक्षम हुई, तो नगरों का पुनः विकास होने लगा। जिन कृषकों के पास अपनी आवश्यकता से अधिक खाद्यान्न होता था, उन्हें एक ऐसे स्थान की आवश्यकता अनुभव हुई जहाँ वे अपना बिक्री केन्द्र स्थापित कर सकें और जहाँ से वे अपने उपकरण और कपड़े आदि खरीद सकें।

इस आवश्यकता ने मियादी हाट – मेलों को प्रोत्साहन दिया और छोटे विपणन – केन्द्रों का विकास किया, जिनमें धीरे-धीरे नगरों के लक्षण पनपने लगे। ये लक्षण थे – एक नगर चौक, चर्च, सड़कें, व्यापारियों के घर और दुकानें। इन लक्षणों में एक कार्यालय भी था जहाँ नगर के प्रशासन का संचालन करने वाले व्यक्ति आपस में मिलते थे। अन्य स्थानों पर नगरों का विकास, बड़े दुर्गों, बिशपों की जागीरों और बड़े चर्चों के चारों ओर होने लगा।

2. नगरों में लोगों द्वारा सेवा के स्थान पर कर देना- नगरों में लोग सेवा के स्थान पर उन लार्डों को कर देने लगे जिनकी भूमि पर नगर बसे हुए थे।

3. नगरों में कृषक परिवारों के लोगों को वैतनिक कार्य मिलना-नगरों में कृषक परिवारों के नवयुवक लोगों को वैतनिक कार्य मिलने लगा। इसके अतिरिक्त नगरों में रहने से उन्हें लार्ड के कठोर नियन्त्रण से मुक्ति मिलने की अधिक सम्भावनाएँ थीं।

4. नगरों का स्वतन्त्र जीवन तथा मध्यम वर्ग का उदय – स्वतन्त्र होने के इच्छुक अनेक कृषि – दास भाग कर नगरों में छिप जाते थे। अपने लार्ड की नजरों से एक वर्ष व एक दिन तक छिपे रहने में सफल रहने वाला कृषि – दास एक स्वतन्त्र नागरिक माना जाता था। नगरों में रहने वाले अधिकतर व्यक्ति या तो स्वतन्त्र कृषक या भगोड़े कृषक होते थे। ये कार्य की दृष्टि से अकुशल श्रमिक होते थे। इनके अतिरिक्त दुकानदार एवं व्यापारी भी काफी बड़ी संख्या में थे। बाद में विशिष्ट कौशल वाले व्यक्तियों जैसे साहूकारों एवं वकीलों की आवश्यकता हुई। बड़े नगरों की जनसंख्या लगभग तीस हजार होती थी। इस प्रकार नगरों का विकास होता गया।

5. श्रेणी (गिल्ड ) – मध्यकालीन यूरोप में आर्थिक संस्था का आधार श्रेणी (गिल्ड) था। प्रत्येक शिल्प या उद्योग एक श्रेणी के रूप में संगठित था। श्रेणी उत्पाद की गुणवत्ता, उसके मूल्य तथा बिक्री पर नियन्त्रण रखती थी। ‘ श्रेणी सभागार’ प्रत्येक नगर का एक आवश्यक अंग था। इस सभागार में आनुष्ठानिक समारोह आयोजित किये जाते थे, जहाँ श्रेणियों के प्रधान आपस में मिलते थे और विचार-विमर्श करते थे । पहरेदार नगर के चारों ओर गश्त लगाते थे तथा नगर में शान्ति स्थापित करते थे। संगीतकारों को प्रीतिभोजों तथा नागरिक जुलूसों में अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए बुलाया जाता था । सराय वाले यात्रियों की देखभाल की जाती थी।

6. वाणिज्य – व्यापार का विकास – ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में यूरोप तथा पश्चिमी एशिया के बीच नवीन व्यापार-मार्ग विकसित हो रहे थे । बारहवीं सदी तक फ्रांस में भी वाणिज्य और शिल्प का विकास होने लग गया था । पहले दस्तकारों को एक मेनर से दूसरे मेनर में जाना पड़ता था । परन्तु अब उन्हें एक स्थान पर बसना अधिक सुविधाजनक लगा जहाँ वे वस्तुओं का उत्पादन कर सकते थे तथा अपने जीवन-निर्वाह के लिए उनका व्यापार कर सकते थे। इस प्रकार वाणिज्य-व्यापार तथा शिल्प के विकास के कारण नगर भी विकसित होते चले गए।

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प्रश्न 10.
यूरोप में चौदहवीं शताब्दी का संकट क्या था? इसके लिए उत्तरदायी कारकों का वर्णन कीजिए।
अथवा
यूरोप में चौदहवीं शताब्दी के संकट के लिए कौनसी परिस्थितियाँ उत्तरदायी थीं? इसके क्या परिणाम हुए? चौदहवीं शताब्दी का संकट
उत्तर:
चौदहवीं शताब्दी में यूरोपवासियों को भीषण अकालों, धातु मुद्रा की कमी तथा प्लेग जैसी महामारी का सामना करना पड़ा।
चौदहवीं शताब्दी के यूरोप के संकट के लिए निम्नलिखित परिस्थितियाँ उत्तरदायी थीं –

1. मौसम में परिवर्तन – उत्तरी यूरोप में, तेरहवीं शताब्दी के अन्त तक पिछले तीन सौ वर्षों की तेज ग्रीष्म ऋतु का स्थान तेज ठण्डी ग्रीष्म ऋतु ने ले लिया था। परिणामस्वरूप उपज वाले मौसम छोटे हो गए और ऊँची भूमि पर फसल उगाना काफी कठिन हो गया। तूफानों और सागरीय बाढ़ों के कारण अनेक फार्म-प्रतिष्ठान नष्ट हो गए जिसके परिणामस्वरूप राज्य सरकारों को करों द्वारा कम आय हुई । तेरहवीं सदी के पूर्व की अनुकूल जलवायु के कारण अनेक जंगल तथा चरागाह कृषि भूमि में बदल गए।

2. भूमि का कमजोर होना – गहन जुताई ने फसलों के तीन क्षेत्रीय फसल चक्र के प्रचलन के बावजूद भूमि को कमजोर बना दिया। भूमि के कमजोर होने का कारण उचित भू-संरक्षण का अभाव था। चरागाहों की कमी के कारण पशुओं की संख्या में भारी कमी आ गई।

3. जनसंख्या में वृद्धि – मध्यकालीन यूरोप में जनसंख्या इतनी तीव्र गति से बढ़ी कि उपलब्ध संसाधन कम पड़ गए। इसके परिणामस्वरूप यूरोपवासियों को अकालों का सामना करना पड़ा। 1315 और 1317 के बीच यूरोप में कई भयंकर अकाल पड़े। इसके पश्चात् 1320 के दशक में अनगिनत पशु मृत्यु के मुँह में चले गए।

4. चाँदी के उत्पादन में कमी – आस्ट्रिया और सर्बिया की चाँदी की खानों के उत्पादन में कमी आ गई। इसके कारण धातु मुद्रा में भारी कमी आई जिसका व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इसके फलस्वरूप सरकार को मुद्रा में चाँदी की शुद्धता में कमी करनी पड़ी और उसमें सस्ती धातुओं का मिश्रण करना पड़ा।

5. महामारी-बारहवीं तथा तेरहवीं शताब्दी में वाणिज्य – व्यापार में विस्तार के कारण दूर देशों से व्यापार करने वाले पोत यूरोप के तटों पर आने लगे। पोतों के साथ-साथ बड़ी संख्या में चूहे भी आ गए, जो अपने साथ ब्यूबोनिक . प्लेग जैसी महामारी का संक्रमण (Black Death) लाए। अतः पश्चिमी यूरोप 1347 और 1350 के बीज महामारी से अत्यधिक प्रभावित हुआ।

आधुनिक विद्वानों के अनुसार महामारी के कारण यूरोप की जनसंख्या का लगभग 20% भाग मौत के मुँह में चला गया। नगर इस महामारी से सर्वाधिक प्रभावित हुए। इस महामारी के कारण यूरोप की जनसंख्या 1300 ई. में 730 लाख से घट कर 1400 ई. में 450 लाख रह गई।
परिणाम- इसके निम्नलिखित परिणाम हुए –

1. सामाजिक विस्थापन – इस विनाशलीला के साथ आर्थिक मंदी के जुड़ जाने से व्यापक सामाजिक विस्थापन
2. मजदूरों की संख्या में कमी- जनसंख्या में कमी के कारण मजदूरों की संख्या में अत्यधिक कमी आ गई।
3. कृषि और उत्पादन के बीच असन्तुलन – कृषि और उत्पादन के बीच भारी असन्तुलन पैदा हो गया।
4. कृषि उत्पादों के मूल्यों में कमी-खरीददारों की कमी के कारण कृषि उत्पादों के मूल्यों में कमी आई।
5. मजदूरी की दरों में वृद्धि – प्लेग के पश्चात् इंग्लैण्ड में मजदूरों, विशेषकर कृषि मजदूरों की भारी माँग के कारण मजदूरों की दरों में 250 प्रतिशत तक की वृद्धि हो गई।

प्रश्न 11.
मध्यकालीन यूरोप में हुए राजनीतिक परिवर्तनों की विवेचना कीजिए।
अथवा
मध्यकालीन यूरोप में शक्तिशाली राज्यों के प्रादुर्भाव का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में राजनीतिक परिवर्तन ( शक्तिशाली राज्यों का प्रादुर्भाव ) – पन्द्रहवीं तथा सोलहवीं शताब्दियों में यूरोप के शासकों ने अपनी सैनिक एवं वित्तीय शक्ति में काफी वृद्धि कर ली थी। फ्रांस में लुई ग्यारहवें आस्ट्रिया में मैक्समिलन, इंग्लैण्ड में हेनरी सप्तम तथा स्पेन में इजाबेला और फर्डीनेण्ड निरंकुश शासक थे।

उन्होंने संगठित स्थायी सेनाओं, स्थायी नौकरशाही और राष्ट्रीय कर प्रणाली की स्थापना की । स्पेन और पुर्तगाल ने यूरोप के समुद्र – पार विस्तार की योजनाएँ बनाईं। इस प्रकार यूरोप में अनेक शक्तिशाली राज्यों की स्थापना हुई। यूरोप में शक्तिशाली राजतन्त्रों की स्थापना के लिए उत्तरदायी तत्त्व – यूरोप में शक्तिशाली राजतन्त्रों की स्थापना के लिए निम्नलिखित तत्त्व उत्तरदायी थे –

1. सामाजिक परिवर्तन – मध्यकालीन यूरोप में बारहवीं तथा तेरहवीं सदी में जागीरदारी तथा सामन्तशाही वाली सामन्त प्रथा के विलय तथा आर्थिक विकास की धीमी गति ने यूरोप के शासकों को प्रभावशाली बनाया और उन्हें जन – साधारण पर अपना नियन्त्रण स्थापित करने का अवसर दिया। शासकों ने सामन्तों से अपनी सेना के लिए कर लेना बन्द कर दिया और उसके स्थान पर बन्दूकों तथा बड़ी तोपों से सुसज्जित तथा प्रशिक्षित सेना का गठन किया जो पूर्ण रूप से उनके अधीन थी । राजाओं की शक्तिशाली सेनाओं के कारण अभिजात वर्ग उनका विरोध करने में असमर्थ रहा।

2. करों में वृद्धि से शासकों की आय में वृद्धि-करों में वृद्धि करने से यूरोप के शासकों को पर्याप्त राजस्व प्राप्त हुआ । इसके फलस्वरूप वे पहले से बड़ी सेनाएँ रखने में समर्थ हुए। अपनी शक्तिशाली सेनाओं की सहायता से उन्होंने अपने राज्यों की सीमाओं की रक्षा की तथा उनका विस्तार किया। सेना की सहायता से उन्होंने राज्य में होने वाले आन्तरिक विद्रोहों का भी दमन कर दिया।

प्रश्न 12.
मध्यकालीन यूरोप में राजाओं के अभिजात वर्ग के साथ सम्बन्धों की विवेचना कीजिए। फ्रांस और इंग्लैण्ड राजनीतिक परिवर्तनों से किस प्रकार प्रभावित हुए?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में राजाओं के अभिजात वर्ग के साथ सम्बन्ध – मध्यकालीन यूरोप में राजाओं के विरुद्ध अभिजात वर्ग ने अनेक विद्रोह किये, परन्तु उनका दमन कर दिया गया।

1. अभिजात वर्ग द्वारा अपने को राजभक्त के रूप में बदलना – अभिजात वर्ग ने अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए कूटनीति से काम लिया। उन्होंने नई शासन व्यवस्था का विरोधी होने की बजाय अपने को राज-भक्त के रूप में बदल लिया। इसी कारण शाही निरंकुशता को सामन्तवाद का सुधरा हुआ रूप माना जाता है।

वास्तव में लार्ड, जो सामन्ती प्रथा में शासक थे, राजनीतिक क्षेत्र में अभी भी प्रभावशाली बने हुए थे। उन्हें प्रशासनिक सेवाओं में स्थायी स्थान दिए गए थे। परन्तु नवीन शासन व्यवस्था कई तरीकों में सामन्ती प्रथा से अलग थी। अब शासक उस पिरामिड के शिखर पर नहीं था जहाँ राज – भक्ति विश्वास और आपसी निर्भरता पर टिकी थी। अब शासक एक व्यापक दरबारी समाज का केन्द्र – बिन्दु था। वह अपने अनुयायियों को आश्रय देने वाला केन्द्र-बिन्दु भी था।

JAC Class 11 History Important Questions Chapter 6 तीन वर्ग

2. राजतन्त्रों द्वारा सत्ताधारियों से सहयोग प्राप्त करना – सभी राजतन्त्र, चाहे वे कमजोर हों अथवा शक्तिशाली हों, सत्ताधारियों का सहयोग प्राप्त करना चाहते थे। धन इस प्रकार के सहयोग को प्राप्त करने का साधन था। सत्ताधारियों का सहयोग अथवा समर्थन धन के माध्यम से दिया या प्राप्त किया जा सकता था । अतः धन गैर – अभिजात वर्गों जैसे व्यापारियों और साहूकारों के लिए राजदरबार में प्रवेश करने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम बन गया। वे राजाओं को धन उधार देते थे तथा राज़ा इस धन का उपयोग सैनिकों को वेतन देने के लिए करते थे । इस प्रकार शासकों ने राज्य-व्यवस्था में गैर-सामन्ती तत्त्वों के लिए स्थान बना दिया।

राजनीतिक परिवर्तनों का फ्रांस पर प्रभाव – 1614 में शासक लुई XIII के शासन काल में फ्रांस की परामर्शदात्री सभा-एस्टेट्स जनरल का एक अधिवेशन हुआ। इसके तीन सदनं थे, जो तीन वर्गों―पादरी वर्ग, अभिजात वर्ग तथा सामान्य लोगों का प्रतिनिधित्व करते थे। इसके पश्चात् 175 वर्ष तक अर्थात् 1789 तक इसका अधिवेशन नहीं बुलाया गया। इसका कारण यह था कि फ्रांस के राजा तीन वर्गों के साथ अपनी शक्ति बाँटना नहीं चाहते थे।

राजनीतिक परिवर्तनों का इंग्लैण्ड पर प्रभाव – इंग्लैण्ड में नारमन – विजय से भी पहले ऐंग्लो-सेक्सन लोगों की एक महान परिषद होती थी। अपनी प्रजा पर कर लगाने से पहले राजा को महान परिषद की सलाह लेनी पड़ती थी। यह परिषद कालान्तर में पार्लियामेन्ट के रूप में विकसित हुई, जिसमें ‘हाउस ऑफ लार्ड्स’ तथा ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ शामिल थे। हाउस ऑफ लाईस के सदस्य लार्ड तथा पादरी थे तथा ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ में नगरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिनिधि होते थे।

इंग्लैण्ड के शासक चार्ल्स प्रथम (1629 – 1640 ) ने पार्लियामेन्ट का अधिवेशन बिना बुलाए ग्यारह वर्षों तक शासन किया। धन की आवश्यकता पड़ने पर एक बार पार्लियामेन्ट का अधिवेशन बुलाना पड़ा। इस अवसर पर पार्लियामेन्ट के एक भाग ने राजा का विरोध किया। बाद में चार्ल्स प्रथम को मृत्यु – दण्ड देकर इंग्लैण्ड में गणतन्त्र की स्थापना की गई।

परन्तु यह व्यवस्था अधिक दिनों तक नहीं चल सकी और राजतन्त्र की पुनः स्थापना इस शर्त पर की गई कि अब पार्लियामेन्ट नियमित रूप से बुलाई जायेगी। साधारण पर अपना नियन्त्रण स्थापित करने का अवसर दिया। शासकों ने सामन्तों से अपनी सेना के लिए कर लेना बन्द कर दिया और उसके स्थान पर बन्दूकों तथा बड़ी तोपों से सुसज्जित तथा प्रशिक्षित सेना का गठन किया जो पूर्ण रूप से उनके अधीन थी। राजाओं की शक्तिशाली सेनाओं के कारण अभिजात वर्ग उनका विरोध करने में असमर्थ रहा।

2. करों में वृद्धि से शासकों की आय में वृद्धि-करों में वृद्धि करने से यूरोप के शासकों को पर्याप्त राजस्व प्राप्त हुआ । इसके फलस्वरूप वे पहले से बड़ी सेनाएँ रखने में समर्थ हुए। अपनी शक्तिशाली सेनाओं की सहायता से उन्होंने अपने राज्यों की सीमाओं की रक्षा की तथा उनका विस्तार किया। सेना की सहायता से उन्होंने राज्य में होने वाले आन्तरिक विद्रोहों का भी दमन कर दिया।

प्रश्न 12.
मध्यकालीन यूरोप में राजाओं के अभिजात वर्ग के साथ सम्बन्धों की विवेचना कीजिए। फ्रांस और इंग्लैण्ड राजनीतिक परिवर्तनों से किस प्रकार प्रभावित हुए?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में राजाओं के अभिजात वर्ग के साथ सम्बन्ध – मध्यकालीन यूरोप में राजाओं के विरुद्ध अभिजात वर्ग ने अनेक विद्रोह किये, परन्तु उनका दमन कर दिया गया।

1. अभिजात वर्ग द्वारा अपने को राजभक्त के रूप में बदलना – अभिजात वर्ग ने अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए कूटनीति से काम लिया। उन्होंने नई शासन व्यवस्था का विरोधी होने की बजाय अपने को राज-भक्त के रूप में बदल लिया। इसी कारण शाही निरंकुशता को सामन्तवाद का सुधरा हुआ रूप माना जाता है।

वास्तव में लार्ड, जो सामन्ती प्रथा में शासक थे, राजनीतिक क्षेत्र में अभी भी प्रभावशाली बने हुए थे। उन्हें प्रशासनिक सेवाओं में स्थायी स्थान दिए गए थे। परन्तु नवीन शासन व्यवस्था कई तरीकों में सामन्ती प्रथा से अलग थी। अब शासक उस पिरामिड के शिखर पर नहीं था जहाँ राज – भक्ति विश्वास और आपसी निर्भरता पर टिकी थी। अब शासक एक व्यापक दरबारी समाज का केन्द्र – बिन्दु था। वह अपने अनुयायियों को आश्रय देने वाला केन्द्र-बिन्दु भी था।

2. राजतन्त्रों द्वारा सत्ताधारियों से सहयोग प्राप्त करना – सभी राजतन्त्र, चाहे वे कमजोर हों अथवा शक्तिशाली हों, सत्ताधारियों का सहयोग प्राप्त करना चाहते थे। धन इस प्रकार के सहयोग को प्राप्त करने का साधन था। सत्ताधारियों का सहयोग अथवा समर्थन धन के माध्यम से दिया या प्राप्त किया जा सकता था। अतः धन गैर – अभिजात वर्गों जैसे व्यापारियों और साहूकारों के लिए राजदरबार में प्रवेश करने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम बन गया। वे राजाओं को धन उधार देते थे तथा राज़ा इस धन का उपयोग सैनिकों को वेतन देने के लिए करते थे। इस प्रकार शासकों ने राज्य-व्यवस्था में गैर-सामन्ती तत्त्वों के लिए स्थान बना दिया।

राजनीतिक परिवर्तनों का फ्रांस पर प्रभाव – 1614 में शासक लुई XIII के शासन काल में फ्रांस की परामर्शदात्री सभा-एस्टेट्स जनरल का एक अधिवेशन हुआ। इसके तीन सदनं थे, जो तीन वर्गों-पादरी वर्ग, अभिजात वर्ग तथा सामान्य लोगों का प्रतिनिधित्व करते थे। इसके पश्चात् 175 वर्ष तक अर्थात् 1789 तक इसका अधिवेशन नहीं बुलाया गया। इसका कारण यह था कि फ्रांस के राजा तीन वर्गों के साथ अपनी शक्ति बाँटना नहीं चाहते थे।

राजनीतिक परिवर्तनों का इंग्लैण्ड पर प्रभाव – इंग्लैण्ड में नारमन – विजय से भी पहले ऐंग्लो-सेक्सन लोगों की एक महान परिषद होती थी। अपनी प्रजा पर कर लगाने से पहले राजा को महान परिषद की सलाह लेनी पड़ती थी। यह परिषद कालान्तर में पार्लियामेन्ट के रूप में विकसित हुई, जिसमें ‘हाउस ऑफ लार्ड्स’ तथा ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ शामिल थे। हाउस ऑफ लाईस के सदस्य लार्ड तथा पादरी थे तथा ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ में नगरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिनिधि होते थे।

इंग्लैण्ड के शासक चार्ल्स प्रथम (1629 – 1640 ) ने पार्लियामेन्ट का अधिवेशन बिना बुलाए ग्यारह वर्षों तक शासन किया। धन की आवश्यकता पड़ने पर एक बार पार्लियामेन्ट का अधिवेशन बुलाना पड़ा। इस अवसर पर पार्लियामेन्ट के एक भाग ने राजा का विरोध किया। बाद में चार्ल्स प्रथम को मृत्यु – दण्ड देकर इंग्लैण्ड में गणतन्त्र की स्थापना की गई। परन्तु यह व्यवस्था अधिक दिनों तक नहीं चल सकी और राजतन्त्र की पुनः स्थापना इस शर्त पर की गई कि अब पार्लियामेन्ट नियमित रूप से बुलाई जायेगी।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 3 परमाणु एवं अणु

Students must go through these JAC Class 9 Science Notes Chapter 3 परमाणु एवं अणु to get a clear insight into all the important concepts.

JAC Board Class 9 Science Notes Chapter 3 परमाणु एवं अणु

→ किसी तत्व का वह छोटे से छोटा कण जो रासायनिक क्रिया में भाग लेता है, परमाणु कहलाता है।

→ परमाणु का आकार अत्यन्त सूक्ष्म होता है। इसकी त्रिज्या नैनोमीटर की कोटि की होती है।

→ किसी यौगिक का वह छोटे से छोटा कण जो प्रकृति में स्वतन्त्र अवस्था में रह सकता है, अणु कहलाता है।

→ द्रव्यमान संरक्षण के नियमानुसार किसी रासायनिक अभिक्रिया में द्रव्यमान का न तो सृजन किया जा सकता है न ही विनाश।

→ स्थिर अनुपात के नियमानुसार एक शुद्ध रासायनिक यौगिक में तत्व हमेशा द्रव्यमानों के निश्चित अनुपात में विद्यमान होते हैं।

→ किसी यौगिक का रासायनिक सूत्र उसके सभी संघटक तत्वों तथा संयोग करने वाले सभी तत्वों के परमाणुओं की संख्या को दर्शाता है।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 3 परमाणु एवं अणु

→ आण्विक यौगिकों के रासायनिक सूत्र प्रत्येक तत्व की संयोजकता द्वारा निर्धारित होते हैं।

→ किसी तत्व का द्रव्यमान जिसका संख्यात्मक मान ग्राम में उसके परमाणु द्रव्यमान के बराबर हो, ग्राम अणु द्रव्यमान कहलाता है।

→ मोल-किसी पदार्थ की वह मात्रा है जिसमें उतने ही कण (परमाणु, अणु या आयन आदि) उपस्थित हों जितनी कार्बन (C-12) के 12 ग्राम (0.012 किग्रा) द्रव्यमान में कार्बन परमाणुओं की संख्या होती है।

→ ग्राम कार्बन (C-12) में कार्बन परमाणुओं की संख्या 6.022 x 1023 होती है। इस संख्या को आवोगाद्रो संख्या कहते हैं। इसे NA से प्रदर्शित करते हैं।

→ पदार्थ के एक मोल अणुओं का द्रव्यमान उसका मोलर द्रव्यमान कहलाता है।

JAC Class 9 Science Solutions Chapter 6 ऊतक

Jharkhand Board JAC Class 9 Science Solutions Chapter 6 ऊतक Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 9 Science Solutions Chapter 6 ऊतक

Jharkhand Board Class 9 Science ऊतक Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
ऊतक को परिभाषित करें।
उत्तर:
कोशिकाओं के ऐसे समूह को जिसकी उत्पत्ति, संरचना एवं कार्य समान हों, ऊतक कहते हैं।

प्रश्न 2.
कितने प्रकार के तत्व मिलकर जाइलम ऊतक का निर्माण करते हैं? उनके नाम बताएँ।
उत्तर:
चार प्रकार के तत्व मिलकर जाइलम ऊतक का निर्माण करते हैं। ये चार तत्व हैं-

  • वाहिनिका (ट्रैकीड्स)
  • वाहिका (Trachea)
  • जाइलम पैरेन्काइमा और
  • जाइलम फाइबर (रेशे)।

प्रश्न 3.
पौधों में सरल ऊतक जटिल ऊतक से किस प्रकार भिन्न होते हैं?
उत्तर:
सरल ऊतक एवं जटिल ऊतक में भिन्नता

सरल ऊतकजटिल ऊतक
1. ये एक ही प्रकार की कोशिकाओं के बने हो ते हैं। उदाहरण पैरेन्काइमा, कॉलेन्काइमा, स्क्लेरेनकाइमा।1. ये एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं के बने होते हैं। उदाहरण-जाइलम तथा फ्लोएम।
2. इनकी कोशिकाएँ जीवित होती हैं।2. अधिकतर कोशिकाएँ मृत होती हैं।
3. ये पतली कोशिका भित्ति वाली सरल कोशिकाओं के बने होते हैं।3. इनकी कोशिका भित्ति मोटी होती है।
4. सरल ऊतक आधारीय पैकिंग पदार्थ के रूप में जल एवं भोजन संचय करने तथा यान्त्रिक सहायता प्रदान करने का कार्य करते हैं।4. जटिल ऊतक संवहन ऊतक का कार्य करते हैं एवं पौधों को यान्त्रिक दृढ़ता प्रदान करते हैं।

प्रश्न 4.
कोशिका भित्ति के आधार पर पैरेन्काइमा, कॉलेन्काइमा और स्क्लेरेन्काइमा के बीच भेद स्पष्ट करें।
उत्तर:
पैरेन्काइमा, कॉलेन्काइमा एवं स्क्लेरेन्काइमा में भेद (अन्तर)

पैरेन्काइमाकॉलेन्काइमास्क्लेरेन्काइमा
1. यह गोल, महीन कोशिका भित्ति वाली कोशिकाओं का बना होता है, जिनमें केन्द्रक विद्यमान होता है। इनके बीच अंतराकोशिकीय स्थान पाये जाते हैं।1. यह बहुभुजी कोशिकाओं का बना होता है। इनके बीच अंतराकोशिकीय स्थान नहीं होते हैं।1. यह मोटी भित्ति वाली कोशिकाओं का बना होता है जो आकार में लम्बी अथवा अनियमित होती हैं।
2. ये सजीव होती हैं।2. ये भी सजीव होती हैं।2. ये कोशिकाएँ मृत होती हैं।
3. कोशिका भित्ति पैक्टिन तथा सेल्यूलोज की बनी व पतली होती है।3. कोशिका भित्ति पैक्टिन तथा सेल्यूलोज की बनी होती है।3. कोशिका भित्ति लिगिन की बनी तथा मोटी होती है।

प्रश्न 5.
रन्ध्र के क्या कार्य हैं?
उत्तर:
रन्ष्र के प्रमुख कार्य-

  • वायुमण्डल से गैसों का आदान-प्रदान करना,
  • वाष्पोत्सर्जन की क्रिया करना।

JAC Class 9 Science Solutions Chapter 6 ऊतक

प्रश्न 6.
तीनों प्रकार के पेशीय रेशों के चित्र बनाकर अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
चित्र 6.11 देखिये।

ऐच्छिक पेशीअनैच्छिक पेशीहृदयक पेशी
1. ये प्रायः अस्थियों से जुड़ी रहती हैं।1. ये आँख की पलकों, मूत्रवाहिनी और फेफड़ों की श्वसनी में होती हैं।1. ये हुदय की भित्ति में होती हैं।
2. ये ऐच्छिक होती हैं।2. ये अनैच्छिक होती हैं।2. ये भी अनैच्छिक होती हैं।
3. इनमें गहरे तथा हल्के रंग की पट्टियाँ होती हैं। इसलिए इन्हें रेखित पेशियाँ भी कहते हैं।3 इनमें गहरे तथा हल्के रंग की पट्टियाँ नहीं होती हैं। इसलिए इन्हें अरेखित पेशियाँ भी कहते हैं।3. इनमें गहरे तथा हल्के रंग की पद्टियों का अभाव होता है।
4. ये लम्बी, बेलनाकार, शाखारहित और बहुकेन्द्रकीय होती हैं।4. ये लम्बी, एक केन्द्रकीय और सिरों की ओर नुकीली तर्कुआकार होती हैं।4. ये बेलनाकार, शाखाओं वाली और केन्द्रकीय होती हैं।

प्रश्न 7.
कार्डिक (हृदयक) पेशी का विशेष कार्य क्या है?
उत्तर:
कार्डिक पेशियाँ जीवन भर बिना थके लयबद्ध होकर प्रसार तथा संकुचन करती रहती हैं। इससे प्राणियों में रक्त परिसंचरण होता है।

प्रश्न 8.
रेखित, अरेखित तथा कार्डिक (हददयक) पेशियों में शरीर में स्थित कार्य और स्थान के आधार पर अन्तर स्पष्ट करें।।
उत्तर:
रेखित, अरेखित व कार्डिक पेशियों में अन्तर

रेखित पेशियाँअरेखित पेशियाँकार्डिक पेशियाँ
शरीर में स्थिति के स्थान-हाथ, पैर में अस्थियों से जुड़ी हुई।आहार नली में, आँख की पलक, मूत्रवाहिनी, फेफड़ों की श्वसनी, रक्त वाहिनियाँ।हृदय की भित्ति।
कार्य-
शरीर के अंगों (हाथ, पैर आदि) में इच्छानुसार गति प्रदान करना। इनकी गति ऐच्छिक पेशियों द्वारा नियन्त्रित होती है।
जन्तु की इच्छानुसार गति नहीं करती हैं। इनकी गति को अनैच्छिक पेशियाँ नियन्त्रित करती हैं।ये जीवन भर बिना थके लयबद्ध होकर प्रसार और संकुचन करती हैं। इससे प्राणियों में रक्त परिसंचरण होता है।

प्रश्न 9.
न्यूरॉन का एक चिह्लित चित्र बनाएँ।
उत्तर:
चित्र 6.12 देखिये।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित के नाम लिखें-
(a) ऊतक जो मुँह के भीतरी अस्तर का निर्माण करता है।
(b) ऊतक जो मनुष्य में पेशियों को अस्थि से जोड़ता है।
(c) ऊतक जो पौधों में भोजन का संवहन करता है।
(d) ऊतक जो हमारे शरीर में वसा का संचय करता है।
(e) तरल आधात्री सहित संयोजी ऊतक।
(f) मस्तिष्क में स्थित ऊतक।
उत्तर:
(a) शल्की एपीथीलियम ऊतक
(b) कंडरा
(c) फ्लोएम ऊतक
(d) वसामय (एडीपोज) ऊतक
(e) रक्त (Blood)
(f) तन्त्रिका ऊतक।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित में ऊतक के प्रकार की पहचान करें-त्वचा, पौधों का वल्क, अस्थि, वृक्कीय नलिका अस्तर, संवहन बंडल।
उत्तर:

  • त्वच – एपीथीलियम ऊतक
  • पौधों का वल्क- सरल स्थायी ऊतक-पैरेन्काइमा
  • अस्थि – संयोजी कंकाल ऊतक (अस्थि)
  • वृक्कीय नलिका अस्तर – घनाकार एपीथीलियम
  • संवहन बण्डल – जटिल ऊतक- जाइलम तथा फ्लोएम।

प्रश्न 12.
पैरेन्काइमा ऊतक किस क्षेत्र में स्थित होते हैं?
उत्तर:
पैरेन्काइमा ऊतक तने तथा पत्तियों में स्थित होते हैं।

प्रश्न 13.
पौधों में एपीडर्मिस की क्या भूमिका है?
उत्तर:
एपीड़्रिस ऊतक पौँधों की पूरी सतह को ढके रहता है और पौधों के सभी भागों की रक्षा करता है। यह पौधों को यान्त्रिक सहायता प्रदान करती है।

JAC Class 9 Science Solutions Chapter 6 ऊतक

प्रश्न 14.
छाल (कॉक) किस प्रकार सुरक्षा ऊतक के रूप में कार्य करता है?
उत्तर:
छाल या कॉर्क मोटी भित्ति वाली मृत कोशिकाओं का बना होता है। इनकी भित्ति पर सुबेरिन नामक रसायन होता है, जो कॉर्क को हवा एवं पानी के लिए अभेद्य बनाता है। इस प्रकार छाल या कॉर्क सुरक्षा ऊतक के रूप में कार्य करता है।

प्रश्न 15.
निम्न दी गई तालिका को पूर्ण करें-
JAC Class 9 Science Solutions Chapter 6 ऊतक 1a
उत्तर:
JAC Class 9 Science Solutions Chapter 6 ऊतक 1b

Jharkhand Board Class 9 Science ऊतक InText Questions and Answers

खण्ड 6.1 से सम्बन्धित पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर (पा. पु. पृ. सं. 77)

प्रश्न 1.
ऊतक क्या है?
उत्तर:
ऊतक (Tissue) – ऊतक समान उत्पत्ति, संरचना तथा कार्य करने वाली कोशिकाओं का एक समूह होता है।

प्रश्न 2.
बहुकोशिक जीवों में ऊतकों का क्या उपयोग है?
उत्तर:
बहुकोशिक जीवों में प्रत्येक कार्य कोशिकाओं के विभिन्न समूहों द्वारा किया जाता है। कोशिकाओं के ये समूह एक विशिष्ट कार्य को ही अति दक्षतापूर्वक सम्पन्न करने की क्षमता रखते हैं। अतः बहुकोशिक जीवों में ऊतकों के कारण श्रम-विभाजन होता है। प्रत्येक ऊतक एक विशिष्ट कार्य बड़ी दक्षता से करता है।

जैसे-मनुष्यों तथा पशु-पक्षियों में अस्थिओं और पेशिओं की सहायता से गति होती है, पक्षी वायु में उड़ते हैं। तन्त्रिका से संदेश का संवहन होता है। रक्त तथा लसीका द्वारा ऑक्सीजन, CO2 पोषक पदार्थ, हार्मोन्स तथा उत्सर्जी पदार्थों का संवहन होता है। पौधों में भोजन तथा जल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाता है। ऊतक पेड़ पौधों को स्थिरता प्रदान करते हैं। उन्हें सहारा और मजबूती देते हैं।

क्रियाकलाप 6.1.
दो काँच के जार लेकर उनमें पानी भर देते हैं। अब दो प्याज लेकर दोनों जारों पर एक-एक
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प्याज रख देते हैं (चित्र 6.2 के अनुसार)। कुछ दिनों तक दोनों प्याजों की मूलों की लम्बाई को मापते हैं। पहले, दूसरे और तीसरे दिनों में मूल की लम्बाई को माप लेते हैं। दूसरे जार में रखी प्याज की मूल को चौथे दिन 1 cm. काट लेते हैं। इसके बाद दोनों जार में रखी प्याज की मूलों की लम्बाइयों का पाँच दिनों तक निरीक्षण करते हैं और उनमें हुई प्रत्येक दिन की वृद्धि को मापते हैं।

प्रश्न 1.
किस जार में रखी हुई प्याज की मूल लम्बी होती है?
उत्तर:
पहले जार में रखी हुई प्याज की मूल लम्बी होती है।

प्रश्न 2.
हमारे द्वारा मूल के ऊपरी हिस्से को काट लेने के बाद भी क्या वह वृद्धि करती रहती है?
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 3.
जार-2 में रखी प्याज की मूल के ऊपरी हिस्से को काटने से वह वृद्धि करना बन्द कर देगी, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि प्याज के ऊपरी हिस्से पर विभज्योतक ऊतक उपस्थित होते हैं। अतः उस हिस्से के काटने से वे ऊतक नष्ट हो जाते हैं और मूल में वृद्धि नहीं होती।

क्रियाकलाप 6.2.
एक पौधे का तना लेकर अपने शिक्षक की सहायता से उसके पतले सैक्शन (अनुप्रस्थ काट) काट लेते हैं। अब सभी सैकशनों को सेफ्रेनिन से रंजित कर लेते
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हैं। उनमें से एक अच्छे से कटे हुए सैक्शन को स्लाइड पर रखकर उस पर ग्लिसरीन की एक बूँद डालते हैं। उसको कवर स्लिप से ढक कर स्लाइड का सूक्ष्मदर्शी से निरीक्षण करते हैं और कोशिकाओं के विन्यास का अध्ययन करते हैं।

प्रश्न 1.
(i) क्या सभी कोशिकाओं की संरचनाएँ समान हैं?
उत्तर:
नहीं। सभी कोशिकाओं की संरचनाएँ समान नहीं हैं।

JAC Class 9 Science Solutions Chapter 6 ऊतक

(ii) कोशिकाओं के विभिन्न प्रकार क्यों हैं?
उत्तर:
क्योंकि विभज्योतक की कोशिकाएँ विभाजित होकर विशेष प्रकार का कार्य करती हैं। इस प्रकार विशिष्ट कार्य करने के लिए इन कोशिकाओं का विभेदीकरण हो जाता है। इसलिए ये विभिन्न प्रकार की होती हैं।

क्रियाकलाप 6.3.
रियो की एक ताजा तोड़ी हुई पत्ती लेते हैं। इसे दबाव लगाकर इस तरह तोड़ते हैं कि पत्ती का छिलका निकल आये। इस छिलके को अलग करके जल सै
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भरी हुई पैट्रीडिश में रखते हैं। इसमें कुछ बूंदे सैफ्रेनिन विलयन की डालकर लगभग 2 मिनट बाद छिलके को स्लाइड पर रखते हैं और इसे धीरे से कवर स्लिप से ढक देते हैं। अब इसका सूक्ष्मदर्शी द्वारा अवलोकन करते हैं। हम देखते हैं कि कोशिकाओं की सबसे बाहरी परत एपीडर्मिस हैं। यह जल की हानि कम करके पादपों की रक्षा करती ह तथा पौधों के सभी भागों की रक्षा करती है।

इसकी कोशिकाएँ बिना किसी अन्तर्कोशिकीय स्थान के अविछिन्न परत बनाती हैं। अधिकांश एपीडर्मल कोशिकाएँ अपेक्षाकृत चपटी होती हैं। पत्ती की एपीडर्मिस में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिन्हें स्टोमेटा कहते हैं। स्टोमेटा दो वृक्काकार कोशिकाओं से घिरे रहते हैं जिन्हें रक्षी कोशिकाएँ कहते हैं। ये कोशिकाएँ वायुमण्डल से गैसों का आदान-प्रदान करने का कार्य करती हैं। वाष्पोत्सर्जन की क्रिया भी स्टोमेटा द्वारा होती है।

प्रश्न 1.
पैरेन्काइमा ऊतक का कार्य क्या है?
उत्तर:
पैरेन्काइमा ऊतक पौधे को सहायता प्रदान करता है और भोजन का भण्डारण करता है।

प्रश्न 2.
क्लोरोफिल किन कोशिकाओं में पाया जाता है?
उत्तर:
क्लोरोफिल पैरेन्काइमा ऊतक की कोशिकाओं में पाया जाता है।

प्रश्न 3.
प्रकाश संश्लेषण की क्रिया किन ऊतकों में होती है?
उत्तर:
प्रकाश संश्लेषण की क्रिया क्लोरेन्काइमा (हरित ऊतक) की कोशिकाओं में होती है।

प्रश्न 4.
जलीय पौधों में कौन से ऊतक की कोशिकाएँ उत्प्लावन बल प्रदान करती हैं?
उत्तर:
जलीय पौधों में पैरेन्काइमा ऊतक की कोशिकाएँ उत्प्लावन बल प्रदान करती हैं।

प्रश्न 5.
लिग्निन क्या है तथा यह क्या कार्य करता है?
उत्तर:
लिग्निन कोशिकाओं को दृढ़ बनाने के लिए सीमेन्ट का कार्य करने वाला एक रासायनिक पदार्थ होता है।

प्रश्न 6.
कोशिकाओं की बाहरी परत कौन सी होती है?
उत्तर:
कोशिकाओं की बाहरी परत एपीडर्मिस होती है।

प्रश्न 7.
एपीडर्मिस का कार्य बताओ।
उत्तर:
एपीडर्मिस पौधों के सभी भागों की रक्षा करती है। यह जल हानि के विरुद्ध यान्त्रिक आघात व परजीवी कवक के प्रवेश को रोकती है।

प्रश्न 8.
पौधों में स्टोमेटा का क्या कार्य है?
उत्तर:
पौधों में स्टोमेटा गैसों का आदान-प्रदान करने तथा वाष्पोत्सर्जन का कार्य करते हैं।

खण्ड 6.2 सम्बन्धित पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर (पा.पु. पू. सं. 81)

प्रश्न 1.
याद करें प्रकाश संश्लेषण के लिए किस गैस की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
प्रकाश संश्लेषण के लिए कार्बन डाइ ऑक्साइड (CO2) गैस की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 2.
पौधों में वाष्पोत्सर्जन के कार्यों का उल्लेख
उत्तर:
पौधों में वाष्पोत्सर्जन के कार्य-

  • वाष्पोत्सर्जन के कारण जल के अवशोषण, रसारोहण तथा समान वितरण में सहायता मिलती है।
  • भूमि से खनिज लवणों के अवशोषण में सहायता मिलती है।
  • पौधों में ताप का नियमन होता रहता है।
  • वाष्पोत्सर्जन के कारण पौधे सड़ने-गलने नहीं पाते हैं।
  • फलों में शर्करा आदि पोषक पदार्थों की मात्रा में वृद्धि होती है।

जड़ों की एपीडर्मल कोशिकाएँ जल को अवशोषित करने का कार्य करती हैं। इनमें बाल जैसे प्रवर्ध होते हैं जो अवशोषक सतह को बढ़ा देते हैं और उनकी जड़ की कुल पानी सोखने की क्षमता बढ़ जाती है।

मरुस्थलीय पौधों की बाह्य सतह पर एपीडर्मिस में क्यूटिन का लेप होता है क्यूटिन एक जल अवरोधक रासायनिक पदार्थ होता है।
JAC Class 9 Science Solutions Chapter 6 ऊतक 4
पेड़ों की आयु बढ़ने के साथ उनके बाहरी सुरक्षात्मक ऊतकों में भी परिवर्तन आता है। द्वितीयक विभज्योतक की एक पट्टी (जो कॉर्टेक्स में होती है), कॉर्क नामक कोशिकाओं की परत का निर्माण करती है। इन छालों की कोशिकाएँ मृत होती हैं। ये अंत: कोशिकीय स्थानों के बिना व्यवस्थित होती हैं (चित्र 6.6 देखें)। इनकी भित्ति पर सुबरिन होता है। सुबरिन छालों को पानी और हवा के लिए अभेद्य बनाता।

खण्ड 6.2.2 (ii) से सम्बन्धित पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर (पा.पु. पृ. सं. 83)

प्रश्न 1.
सरल ऊतक के कितने प्रकार हैं?
उत्तर:
सरल ऊतक तीन प्रकार के होते हैं-

  • पैरेन्काइमा (मृदूतक-Parenchyma)
  • कॉलेन्काइमा (स्थूलकोण ऊतक-Collenchyma) तथा
  • स्क्लेरेन्काइमा (दृढ़ ऊतक Sclerenchyma)।

प्रश्न 2.
प्ररोह का शीर्षस्थ विभज्योतक कहाँ पाया जाता है?
उत्तर:
प्ररोह का शीर्षस्थ विभज्योतक जड़ों और तनों की वृद्धि वाले भागों में पाया जाता है, और यह इनकी लम्बाई में वृद्धि करता है।

प्रश्न 3.
नारियल का रेशा किस ऊतक का बना होता है?
उत्तर:
नारियल का रेशा स्क्लेरेन्काइमा (दृढ़ ऊतक ) का बना होता है।

JAC Class 9 Science Solutions Chapter 6 ऊतक

प्रश्न 4.
फ्लोएम के संघटक कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
चालनी नलिका, साथी कोशिकाएँ, फ्लोएम पैरेन्काइमा तथा फ्लोएम रेशे फ्लोएम के संघटक हैं।

क्रियाकलाप 6.4.
रक्त की एक बूँद स्लाइड पर डालें। सूक्ष्मदर्शी की सहायता से उसमें उपस्थित विभिन्न कोशिकाओं को देखें।

रक्त (Blood) एक प्रकार का तरल संयोजी ऊतक है। रक्त के तरल आधात्री भाग को प्लाज्मा (Plasma) कहते हैं। प्लाज्मा में लाल रक्त कोशिकाएँ (RBC), श्वेत रक्त कोशिकाएँ (WBC) तथा प्लेटलेट्स निलम्बित होते हैं। प्लाज्मा में प्रोटीन, नमक तथा हॉर्मोन भी होते हैं।

रक्त गैसों, शरीर के पचे हुए भोजन, हॉर्मोन और उत्सर्जी पदार्थों का शरीर के एक भाग से दूसरे भाग में संवहन करता है। अस्थि (Bone) कंकाल संयोजी ऊतक है। यह पंजर का निर्माण कर शरीर को निश्चित आकार प्रदान करता है, माँसपेशियों को सहारा देता है और शरीर के मुख्य अंगों को सहारा देता है।
JAC Class 9 Science Solutions Chapter 6 ऊतक 5
संयोजी ऊतकों के प्रकार: (a) एरिओलर ऊतक, (b) वसामय (एडीपोज़) ऊतक, (c) संहत अस्थि ऊतक, (d) काचाभ स्नायु ऊतक (e) विभिन्न रक्त कोशिकाएँ।

यह ऊतक कठोर और मजबूत होता है। अस्थि कोशिकाएँ कठोर आधात्री में धँसी होती हैं जो कैल्सियम तथा फॉस्फोरस से बनी होती हैं।

दो अस्थियाँ परस्पर एक अन्य संयोजी ऊतक-स्नायु (Ligament) से जुड़ी होती हैं। यह ऊतक बहुत लचीला एवं मजबूत होता है। स्नायु में बहुत कम आधात्री होती है। एक अन्य प्रकार का संयोजी ऊतक कन्डरा (Tendon) है, जो माँसपेशियों को अस्थियों से जोड़ता है। यह मजबूत तथा सीमित लचीलेपन वाले रेशेदार ऊतक होते हैं।

उपास्थि (Cartilage) भी एक प्रकार का कंकाल संयोजी ऊतक है। इसमें कोशिकाओं के बीच पर्याप्त स्थान होता है। इसकी ठोस आधानी प्रोटीन और शर्करा की बनी होती है। यह अस्थियों के जोड़ों को चिकना बनाती है। यह नाक, कान, कंठ और श्वास नली में भी उपस्थित होती है।

ऐरियोलर (Aerolar) संयोजी ऊतक त्वचा और माँसपेशियों के बीच, रक्त नलिका के चारों ओर तथा नसों और अस्थि मज्जा में पाया जाता है। यह अंगों के भीतर की खाली जगह को भरता है, आन्तरिक अंगों को सहारा देता है और ऊतकों की मरम्मत में सहायता करता है।

वसामय (Adipose) ऊतक त्वचा के नीचे आन्तरिक अंगों के बीच पाया जाता है और वसा के संग्रह का कार्य करता है । इस ऊतक की कोशिकाएँ वसा की गोलिकाओं से भरी होती हैं। यह वसा संग्रहित होने के कारण ऊष्मीय कुचालक का कार्य भी करता है।

क्रियाकलाप 6.5.
विभिन्न प्रकार की पेशीय ऊतकों की संरचना की तुलना कीजिए। उनके आकार, केन्द्रक की संख्या और कोशिका में केन्द्रक की स्थिति को नोट कीजिए।

लक्षणरेखितचिकनीहृद्
आकारबेलनाकार, अशखितलंबी और शंक्वाकारबेलनाकार व शखित
केंद्रकों की संख्याबहुनाभिकीयएकएक
केंद्रकों की स्थितिहाथ, पैर में अस्थितयों से जुड़ी हुईआहार नली, आँख्र की नलक, मूत्रवाहिनी, फेफड़ों की श्वसनी रक्त-वाहिनियाँहदय की भित्ति

खण्ड 6.3 से सम्बन्धित पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर (पा. पु. पृ. सं. 87)

प्रश्न 1.
उस ऊतक का नाम बताएँ जो हमारे शरीर में गति के लिए उत्तरदायी है।
उत्तर:
पेशीय ऊतक हमारे शरीर में गति के लिए उत्तरदायी हैं।

प्रश्न 2.
न्यूरॉन देखने में कैसा लगता है?
उत्तर:
न्यूरॉन देखने में लम्बा धागे जैसा लगता है। इसकी लम्बाई 1 मीटर तक हो सकती है। न्यूरॉन का मुख्य भाग कोशिकाकाय (Cyton) कहलाता है। इससे एक लम्बा एक्सॉन (Axon) तथा अनेक छोटे-छोटे डेन्ड्राइट्स (Dendrites) निकले होते हैं।

प्रश्न 3.
हृदय पेशी ‘के तीन लक्षणों को बताएँ।
उत्तर:
हृदय पेशी के तीन लक्षण-

  • यह केवल हृदय भित्ति में पायी जाती है।
  • इसकी कोशिकाएँ बेलनाकार, शाखाओं युक्त व एक केन्द्रकीय होती हैं।
  • ये पेशियाँ जीवन भर बिना थके लयबद्ध होकर प्रसार एवं संकुचन करती रहती हैं।

प्रश्न 4.
एरियोलर ऊतक के क्या कार्य हैं?
उत्तर:
एरियोलर ऊतक के कार्य-

  • यह अंगों के भीतर की खाली जगह को भरता है।
  • यह ऊतकों की मरम्मत में सहायता करता है।
  • यह ऑतरिक अंगों को सहारा प्रदान करता है।

JAC Class 9 Science Important Questions Chapter 2 क्या हमारे आस-पास के पदार्थ शुद्ध हैं

Jharkhand Board JAC Class 9 Science Important Questions Chapter 2 क्या हमारे आस-पास के पदार्थ शुद्ध हैं Important Questions and Answers.

JAC Board Class 9 Science Important Questions Chapter 2 क्या हमारे आस-पास के पदार्थ शुद्ध हैं

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से तत्व को बताइए-
(a) साबुन
(b) वायु
(c) सिलिकॉन
(d) कैल्शियम कार्बोनेट।
उत्तर:
(c) सिलिकॉन।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित मिश्रणों में से विलयन को पहचानिए-
(a) वायु
(b) मिट्टी
(c) कोयला
(d) लकड़ी की राख।
उत्तर:
(a) वायु।

प्रश्न 3.
कोलाइड का उदाहरण है-
(a) दूध
(b) स्याही
(c) रक्त
(d) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 4.
दो या दो से अधिक प्रकार के तत्वों का रासायनिक रूप से संयोजित पदार्थ है-
(a) तत्व
(b) यौगिक।
(c) मिश्रण
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(b) यौगिक

JAC Class 9 Science Important Questions Chapter 2 क्या हमारे आस-पास के पदार्थ शुद्ध हैं

प्रश्न 5.
जिस विलयन में उसी ताप पर और अधिक
विलेय न घोला जा सके, उसे कहते हैं-
(a) असंतृप्त विलयन
(b) सम्पूर्ण विलयन
(c) संतृप्त विलयन
(d) घुलनशील विलयन।
उत्तर:
(c) संतृप्त विलयन।

प्रश्न 6.
विलयन की दी हुई मात्रा में उपस्थित विलेय की मात्रा कहलाती है-
(a) सान्द्रता
(b) यौगिक
(c) घुलनशीलता
(d) संतृप्तता।
उत्तर:
(a) सान्द्रता।

प्रश्न 7.
कमरे के ताप पर कौन-सा तत्व द्रव है?
(a) लोहा
(b) ताँबा
(c) ब्रोमीन
(d) एल्यूमिनियम।
उत्तर:
(c) ब्रोमीन।

प्रश्न 8.
उपधातु का उदाहरण है-
(a) ताँबा
(b) आयोडीन
(c) कार्बन
(d) जर्मेनियम।
उत्तर:
(d) जर्मेनियम।

प्रश्न 9.
विलयन में कणों का आकार लगभग क्या होता है?
(a) 10-6 मीटर
(b) 10-9 मीटर
(c) 10-15 मीटर
(b) 10-2 मीटर
उत्तर:
(b) 10-9 मीटर

प्रश्न 10.
पीतल का संघटन होता है-
(a) जिंक 50%, कॉपर 50%.
(b) कॉपर 30%, जिंक 70%
(c) जिंक 30%, कॉपर 70%
(d) जिंक 60%, कॉपर 40%
उत्तर:
(c) जिंक 30%, कॉपर 70%

प्रश्न 11.
दूध से क्रीम अलग की जाती है-
(a) अपकेन्द्रीकरण द्वारा
(c) निलंबन द्वारा
(b) वाष्पीकरण द्वारा
(d) आसवन द्वारा।
उत्तर:
(a) अपकेन्द्रीकरण द्वारा।

प्रश्न 12.
ऊष्मा तथा विद्युत की सर्वोत्तम चालक है-
(a) चाँदी
(b) एल्यूमिनियम
(c) ताँबा
(d) पीतल।
उत्तर:
(a) चाँदी।

प्रश्न 13.
एरोसॉल का उदाहरण है-
(a) पनीर
(b) दूध
(c) शेविंग क्रीम
(d) धुआँ।
उत्तर:
(d) धुआँ।

प्रश्न 14.
द्रवों के मिश्रण को अलग करने की तकनीक
(a) छानना
(b) प्रभाजी आसवन
(c) वाष्पन
(d) ऊर्ध्वपातन।
उत्तर:
(b) प्रभाजी आसवन।

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प्रश्न 15.
ऑक्सीजन का क्वथनांक है-
(a) -200°C
(b) 182°C
(c) – 182°C
(d) – 186 °C1
उत्तर:
(c) – 182°C1

प्रश्न 16.
प्राकृतिक तत्वों की संख्या है-
(a) 92
(b) 100
(c) 83
(d) 104.
उत्तर:
(a) 92.

प्रश्न 17.
एक विलयन 320 ग्राम 40 ग्राम साधारण नमक रखता है, विलयन की सान्द्रता होगी-
(a) 19%
(b) 25%
(c) 5%
(d) 11.1%।
उत्तर:
(d) 11.1%

प्रश्न 18.
सल्फर है-
(a) धातु
(b) अधातु।
(c) उपधातु
(d) मिश्रण।
उत्तर:
(b) अधातु

प्रश्न 19.
निम्न चित्र क्या दर्शाता है?
(a) निलंबन
(b) वाष्पीकरण
(c) टिण्डल प्रभाव
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं।
JAC Class 9 Science Important Questions Chapter 2 क्या हमारे आस-पास के पदार्थ शुद्ध हैं 1
उत्तर:
(c) टिण्डल प्रभाव।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित में से भौतिक परिवर्तन है-
(a) लोहे के चूर्ण तथा बालू को मिलाना
(b) लोहे में जंग लगना
(c) भोजन का पाचन
(d) मोमबत्ती का जलना।
उत्तर:
(a) लोहे के चूर्ण तथा बालू को मिलाना।

रिक्त स्थान भरो-

  1. दो या दो से अधिक अवयवों का समांगी मिश्रण ……………….. कहलाता है।
  2. अस्थाई असामांगिक मिश्रण ……………….. कहलाता है।
  3. दो या दो से अधिक किसी भी भौतिक रूप से मिले पदार्थों को ……………….. कहते हैं।
  4. निश्चित अनुपात में दो या दो से अधिक पदार्थों के रासायनिक बंधनों से बने नए पदार्थ को ……………….. को कहते हैं।

उत्तर:

  1. वास्तविक विलयन
  2. निलंबन
  3. मिश्रण,
  4. यौगिक।

सुमेलन कीजिए-

कॉलम ‘क’कॉलम ‘ख’
1. चीनी + पानी(क) कोलाइडी विलयन
2. अंडे की सफेदी + पानी(ख) यौगिक
3. मिट्टी(ग) वास्तविक विलयन
4. आयरन सल्फाइड(घ) मिश्रण

उत्तर:
1. (ग) वास्तविक विलयन
2. (क) कोलाइडी विलयन
3. (घ) मिश्रण
4. (ख) यौगिक

सत्य / असत्य-

  1. यौगिक के अवयवों को भौतिक विधियों से अलग किया जा सकता है।
  2. कॉपर सल्फेट को जल में घोलने पर रंगीन विलयन मिलता है।
  3. समांगी दिखने वाला विषमांगी विलयन कोलाइडी विलयन कहलाता है।
  4. वास्तविक विलयन अपारदर्शी होता है।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. सत्य
  4. असत्य।

अति लघूत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मिश्रण तथा विलयन में क्या अन्तर है?
उत्तर:
मिश्रण विषमांग होते हैं, जबकि विलयन समांग होते हैं।

प्रश्न 2.
किसी एक ठोस विलयन का नाम लिखिए।
उत्तर:
पीतल (जिंक 30% तथा कॉपर 70% का समांग मिश्रण) ठोस विलयन है।

प्रश्न 3.
परिक्षिप्त प्रावस्था क्या है?
उत्तर:
कोलाइडी कण, जब विलायक जैसे माध्यम, जिसे परिक्षेपण माध्यम कहा जाता है, में वितरित रहते हैं, परिक्षिप्त प्रावस्था बनाते हैं; जैसे- दूध में वसा, प्रोटीन तथा लैक्टोस जल में परिक्षिप्त होकर, परिक्षिप्त प्रावस्था बनाते हैं।

प्रश्न 4.
संसार में सबसे सस्ता एवं अच्छा विलायक कौन-सा है?
उत्तर:
संसार में सबसे सस्ता एवं अच्छा विलायक जल है।

प्रश्न 5.
क्रोमैटोग्राफी का प्रयोग किन पदार्थों पर किया जाता है?
उत्तर:
क्रोमैटोग्राफी का प्रयोग उन विलेय पदार्थों को पृथक् करने में होता है जो एक ही प्रकार के विलायक में घुले होते हैं।

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प्रश्न 6.
किसी द्रव में ठोस के विलयन से ठोस प्राप्त करने की विधि बताइए।
उत्तर:
क्रिस्टलीकरण।

प्रश्न 7.
अतिसंतृप्त विलयन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
यदि विलयन में विलेय पदार्थ की सान्द्रता संतृप्त स्तर से अधिक हो तो उसे अतिसंतृप्त विलयन कहते हैं।

प्रश्न 8.
जलीय विलयन के तीन उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  1. जल में चीनी का विलयन
  2. जल में दूध का विलयन
  3. जल में सिरके का विलयन।

प्रश्न 9.
दूध से दही बनना कौन सा परिवर्तन है?
उत्तर:
रासायनिक परिवर्तन।

प्रश्न 10.
यदि एक संतृप्त विलयन को गर्म किया जाए तब क्या होगा?
उत्तर:
संतृप्त

प्रश्न 11.
क्या कोलाइडी कणों को आँखों से देखा जा सकता है?
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 12.
जेल का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
पनीर।

प्रश्न 13.
इमल्शन का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
फेस क्रीम।

प्रश्न 14.
30 50K से अधिक क्वथनांक में अन्तर वाले मिश्रणीय द्रवों को पृथक् करने की विधि का नाम बताइए।
उत्तर:
साधारण आसवन।

प्रश्न 15.
ठोस में ठोस विलयन क्या है?
उत्तर:
मिश्र धातुएँ ठोस में ठोस विलयन कहलाती हैं। जैसे पीतल में 30% जिंक तथा 70% कॉपर होता है। यहाँ Cu विलायक तथा Zn विलेय है।

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प्रश्न 16.
टिण्डल प्रभाव क्या होता है?
उत्तर:
कोलाइडल कणों के छोटे आकार के कारण हम इन्हें नग्न आँख से नहीं देख सकते, परन्तु ये कण प्रकाश की किरण को आसानी से फैला देते हैं। इस घटना को टिण्डल प्रभाव कहते हैं।

प्रश्न 17.
विलयन के द्रव्यमान प्रतिशत का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
JAC Class 9 Science Important Questions Chapter 2 क्या हमारे आस-पास के पदार्थ शुद्ध हैं 2

प्रश्न 18.
विलयन के आयतन प्रतिशत का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
JAC Class 9 Science Important Questions Chapter 2 क्या हमारे आस-पास के पदार्थ शुद्ध हैं 3

प्रश्न 19.
निम्नलिखित में से धातु तथा अधातु छाँटिए – जस्ता, बेरियम, नाइट्रोजन, सीसा, ऑक्सीजन, कार्बन, ताँबा, आयोडीन।
उत्तर:
जस्ता, बेरियम, सीसा तथा ताँबा धातुएँ हैं। नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन तथा आयोडीन अधातुएँ हैं।

प्रश्न 20.
अपकेन्द्रण विधि में क्या होता है?
उत्तर:
अपकेन्द्रण विधि में जब किसी मिश्रण को अत्यन्त तीव्र गति से घुमाया जाता है तो भारी कण पात्र की तली में बैठ जाते हैं तथा हल्के कण ऊपर ही रह जाते हैं जिन्हें पृथक् करना सरल हो जाता है।

प्रश्न 21.
अपकेन्द्रण विधि किन मिश्रणों पर लागू की जाती है?
उत्तर:
अपकेन्द्रण विधि उन मिश्रणों पर लागू की जाती है जिनमें द्रव में उपस्थित ठोस कण इतने छोटे होते हैं जो कि छानक पत्र से बाहर निकल आते हैं। अतः छानक विधि का प्रयोग न करके अपकेन्द्रण विधि का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 22.
ऊर्ध्वपातन क्या है?
उत्तर:
कुछ ठोस पदार्थ गर्म करने पर बिना द्रव अवस्था में परिवर्तित हुए, सीधे गैस अवस्था में परिवर्तित हो जाते हैं, यह प्रक्रिया ऊर्ध्वपातन कहलाती है।

प्रश्न 23.
शुद्ध पदार्थ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जिन पदार्थों का संघटन समान होता है तथा जिनके गुण; जैसे- बनावट, स्वाद आदि समान होते हैं, शुद्ध पदार्थ कहलाते हैं; जैसे- जल, सोडियम क्लोराइड आदि।

प्रश्न 24.
समांगी मिश्रण की परिभाषा देते हुए एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
वह मिश्रण जिसका संघटन एकसमान होता है, समांगी मिश्रण कहलाता है; जैसे- कॉपर सल्फेट जल में घुलकर समांगी मिश्रण बनाता है।

प्रश्न 25.
विषमांगी मिश्रण की परिभाषा देते हुए एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
वह मिश्रण जिसका संघटन एकसमान नहीं होता, विषमांगी मिश्रण कहलाता है। उदाहरणार्थ – लवण तथा सल्फर का मिश्रण।

लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धातु तथा अधातु क्या हैं? इनमें क्या अन्तर है? निम्नलिखित को धातु तथा अधातु में वर्गीकृत कीजिए – सोडियम, जस्ता, हाइड्रोजन, सीसा, ऑक्सीजन, गन्धक, ताँबा, फॉस्फोरस।
उत्तर:
धातु – “वे तत्व, जो सामान्य अभिक्रियाओं में अपने परमाणुओं से एक अथवा अधिक इलेक्ट्रॉन त्यागते हैं, धातु (metal) कहलाते हैं।” जैसे- सोडियम, जस्ता, सीसा तथा ताँबा आदि।

अधातु -“वे तत्व, जो सामान्य अभिक्रियाओं में दूसरे परमाणुओं से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करते हैं, अधातु (non-metal) कहलाते हैं।” जैसे- हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, गन्धक तथा फॉस्फोरस आदि।

धातु तथा अधातु में अन्तर:

गुणधातुअधातु
अवस्थापारे के अतिरिक्त सभी धातुएँ साधारण ताप पर ठोस होती हैं; जैसे-लोहा, सोना, चाँदी, ताँबा, पीतल आदि।ये साधारण ताप पर ठोस, द्रव तथा गैस तीनों अवस्थाओं में पाई जाती है; जैसे-गन्धक (ठोस), ब्रोमीन (द्रव), ऑक्सीजन (गैस) आदि।
चमकइनमें एक विशेष प्रकार की धात्विक चमक होती है।ग्रेफाइट तथा आयोडीन के अतिरिक्त किसी भी अधातु में विशेष चमक नहीं होती है।
घनत्वइनका घनत्व प्रायः अधिक होता हैइनका घनत्व प्रायः कम होता है।
मिश्र-धातु का निर्माणकुछ धातुएँ आपस में मिलकर समांग मिश्रण बनाती हैं, जो मिश्र-धातु कहलाता है।ये आपस में मिलकर मिश्र-धातु नहीं बनाती हैं, बल्कि इनकी थोड़ी मात्रा ही मिश्र-धातु बनाने में प्रयोग की जाती है।
आघात वर्धनीयता तथा तन्यताये पीटने से बढ़ती हैं तथा इनके तार खीचे जा सकते हैं अर्थात् ये आघातवर्धनशील तथा तन्य होती हैं।ये पीटने से टूट जाती हैं तथा इनके तार भी नर्हीं खींचे जा सकते हैं अर्थात् ये आघात वर्धनशील तथा तन्य नहीं होती हैं।
कठोरताकुछ धातुओं; जैसे-सोडियम, पोटैशियम, आदि को छोड़कर सभी कठोर होती हैं।कठोर नहीं होती हैं।
गिरने या पीटने परध्वनि निकलती है।ध्वनि नहीं निकलती है।
ऊष्मा तथा विद्युत चालकताऊष्मा तथा विद्युत की सूँचालक होती है।ऊष्मा तथा विद्युत की कुचालक होती है।
गलनांक तथा क्वथनांकप्रायः अधिक होते हैं।प्रायः कम होते हैं (कुछ को छोड़कर)

प्रश्न 2.
तत्वों का वर्गीकरण किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर:
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प्रश्न 3.
पदार्थों के वर्गीकरण की एक रूपरेखा दीजिए।
उत्तर:
JAC Class 9 Science Important Questions Chapter 2 क्या हमारे आस-पास के पदार्थ शुद्ध हैं 5

प्रश्न 4.
25°C पर आप सोडियम क्लोराइड का जल के साथ विलयन किस प्रकार तैयार करोगे? यदि विलयन को 10°C तक ठण्डा किया जाए तो क्या होगा?
उत्तर:
संतृप्त विलयन तैयार करने के लिए, एक बीकर में 100 मिली. जल लेते हैं। जल में सोडियम क्लोराइड की थोड़ी-थोड़ी मात्रा धीरे-धीरे डालते हैं। ताप लगभग 25°C स्थिर रखते हैं और जल को हिलाते रहते हैं। धीं धीरे सोडियम क्लोराइड की मात्रा बढ़ाते जाते हैं। एक अजस्था ऐसी आती है जब सोडियम क्लोराइड घुलना बंद हो जाता है। इस अवस्था में अब यह एक संतृप्त विलयन तैयार हो जाता है। जब इस विलयन को 10°C तक ठंडा किया जाता तो सोडियम क्लोराइड (नमक) के क्रिस्टल बनने लग जाते और बीकर की तली में बैठ जाते हैं।

प्रश्न 5.
कैसे पता लगाओगे कि दिया हुआ पदार्थ यौगिक है या मिश्रण ?
उत्तर:
1. (a) पदार्थ को यदि इसके अवयवों में भौतिक विधियों द्वारा पृथक् किया जा सकता है तो यह मिश्रण है।
(b) पदार्थ को यदि इसके अवयवों में भौतिक विधियों द्वारा पृथक् नहीं किया जा सकता है तो यह यौगिक है।

2. (a) पदार्थ यदि अपने अवयवों के गुणधर्म प्रदर्शित करता है, तो यह मिश्रण है।
(b) पदार्थ के गुणधर्म यदि इसके अवयवों से पूर्णतया भिन्न हैं, तो यह यौगिक है।

3. (a) पदार्थ के बनने में यदि ऊष्मा, प्रकाश इत्यादि नहीं निकलता या अवशोषित होता है, तो वह मिश्रण है।
(b) पदार्थ के बनने में यदि ऊष्मा, प्रकाश इत्यादि निकलता है या अवशोषित होता है, तो यह यौगिक है।

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प्रश्न 6.
विलयन क्या है? इसके चार उदाहरण दीजिए। विलयन के गुणधर्मों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
विलयन-विलयन दो या दो से अधिक पदार्थों का समांगी मिश्रण है। नीबू जल, सोडा जल आदि विलयन के उदाहरण हैं। एक विलयन के कणों में समांगिकता होती है। उदाहरण के लिए-नीबू जल का स्वाद सदैव समान रहता है। यह दर्शाता है कि इस विलयन में चीनी, नमक आदि के कण समान हूप से वितरित होते हैं।

विलयन सदैव तरल अवस्था में ही नहीं होते। प्रकृति में ठोस विलयन तथा गैसीय विलयन भी पाए जाते हैं। मिश्र-धातुएँ, ठोस विलयन का उदाहरण हैं तथा वायु एक गैसीय विलयन का उदाहरण है।

किसी विलयन को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

  • विलेय तथा
  • विलायक।

इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-
विलेय-विलयन का वह घटक जो प्रायः कम मात्रा में होता है तथा विलायक में घुला होता है, विलेय (Solute) कहलाता है।
विलायक – विलयन का वह घटक जिसकी मात्रा दूसरे घटक से अधिक होती है तथा दूसरे घटक को विलयन में मिलाता है, विलायक (Solvent) कहलाता है।

उदाहरण के लिए –

  • चीनी और जल का विलयन एक तरल घोल में ठोस का उदाहरण है। इसमें चीनी विलेय है और जल विलायक है।
  • आयोडीन और एल्कोहॉल का विलयन जिसे टिंचर आयोडीन के नाम से जाना जाता है, इसमें आयोडीन विलेय है और एल्कोहॉल विलायक है।
  • वायुयुक्त पेय; जैसे- सोडा जल, कोक आदि तरल विलयन में गैस के रूप में हैं। इनमें कार्बन डाइ ऑक्साइड गैस विलेय और जल विलायक है।
  • वायु में गैस का विलयन है। यह मुख्यतः दो घटकों ऑक्सीजन ( 21%) और नाइट्रोजन (78% ) का समांगी मिश्रण है। नाइट्रोजन को वायु का विलायक कहा जाता है। वायु में अन्य गैसें बहुत कम मात्रा में उपलब्ध होती हैं।

विलयन के गुणधर्म:
विलयन के कुछ महत्वपूर्ण गुणधर्म निम्नलिखित हैं-

  • विलयन एक समांगी मिश्रण है।
  • विलयन के कण व्यास में 1 नैनोमीटर (10 m) से भी छोटे होते हैं। इसलिए वे आँख से नहीं देखे जा सकते।
  • अपने छोटे आकार के कारण विलयन के कण, गुजर रही प्रकाश की किरण को नहीं फैलाते। इसलिए विलयन में प्रकाश का मार्ग दिखाई नहीं देता।
  • छानने की विधि द्वारा विलेय के कणों को विलयन में से पृथक् नहीं किया जा सकता है। विलयन को शान्त छोड़ देने पर विलेय के कण नीचे नहीं बैठते, अर्थात् विलयन स्थायी होता है।

प्रश्न 7.
तत्व तथा यौगिक में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
तत्व तथा यौगिक में अन्तर:

तत्वयौगिक
1. तत्व एक ही प्रकार के परमाणुओं से मिलकर बना होता है।यौगिक के अणु दो या दो से अधिक परमाणुओं से मिलकर बने होते हैं।
2. तत्व को भौतिक अथवा रासायनिक विधियों द्वारा दो या दो से अधिक भिन्न-भिन्न गुणधर्म वाले सरल पदार्थों में विभाजित नहीं किया जा सकता है।यौगिक को दो या दो से अधिक भिन्न-भिन्न गुणधर्म वाले सरल पदार्थौं में विभाजित किया जा सकता है। जैसे-सोडियम क्लोराइड को सोडियम तथा क्लोरीन में विभाजित किया जा सकता है।
3. तत्व के गुणधर्म उसके सूक्ष्मतम कण (परमाणु) के कारण होते हैं।यौगिक के गुणधर्म उसके सूक्ष्मतम कण (अणु) के कारण होते हैं। प्रायः यौगिक के गुणधर्म उसके अवयवी तत्वों के गुणों से भिन्न होते हैं।
4. कुछ तत्व परमाणुओं के रूप में पाए जाते हैं; जैसे कॉपर, सिल्वर, गोल्ड, सोडियम, पोटैशियम आदि। कुछ तत्व अणुओं के रूप में पाए जाते हैं; जैसे-हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन आदि।यौगिक अणुओं के रूप में पाए जाते हैं; जैसे- जल, साधारण नमक, नौसादर आदि।

आंकिक प्रश्न

प्रश्न 1.
एक विलयन में 10 ग्राम ग्लूकोस, 90 ग्राम जल में विलेय है। द्रव्यमान प्रतिशत में विलयन की सान्द्रता ज्ञात कीजिए। = 10 ग्राम
उत्तर:
विलेय (ग्लूकोस) का द्रव्यमान = 10 ग्राम
विलयन का द्रव्यमान 10 + 90 = 100 ग्राम
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प्रश्न 2.
90 मिली जल में 10 मिली H2 SO4 विलेय है। विलयन का आयतन प्रतिशत ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
विलेय का आयतन = 10ml
विलयन का आयतन = 10 + 90 = 100ml
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प्रश्न 3.
यदि 500g विलयन में 100g लवण उपस्थित है, तो विलयन की सान्द्रता की गणना कीजिए।
उत्तर:
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विलयन का द्रव्यमान = 500 g
विलेय का द्रव्यमान = 100g
विलयन की सान्द्रता = \(\frac { 100 }{ 500 }\) x 100
= \(\frac { 100 }{ 5 }\)
= 20%

प्रश्न 4.
यदि एसीटोन के 5mL, इसके जलीय विलयन के 50 mL में उपस्थित हैं, तो इस विलयन की सान्द्रता की गणना कीजिए।
हल:
विलेय (एसीटोन) का आयतन = 5 mL
(विलेय + विलायक का आयतन) = 50ml
विलयन की सान्द्रता
JAC Class 9 Science Important Questions Chapter 2 क्या हमारे आस-पास के पदार्थ शुद्ध हैं 9

प्रश्न 5.
एक विलयन में जल के 350 g में 50g शक्कर घुली है। इस विलयन की सान्द्रता की गणना कीजिए।
हल:
विलेय (शक्कर) का द्रव्यमान = 50 g
विलायक (जल) का द्रव्यमान = 350 g
विलयन की सान्द्रता
JAC Class 9 Science Important Questions Chapter 2 क्या हमारे आस-पास के पदार्थ शुद्ध हैं 10

JAC Class 9 Science Solutions Chapter 1 हमारे आस-पास के पदार्थ

Jharkhand Board JAC Class 9 Science Solutions Chapter 1 हमारे आस-पास के पदार्थ Textbook Exercise Questions and Answers.

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Jharkhand Board Class 9 Science हमारे आस-पास के पदार्थ Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
निम्नलिखित तापमानों को सेल्सियस इकाई में परिवर्तित करें-
(a) 300K
(b) 573K
उत्तर:
सेल्सियस K273
(a) सेल्सियस = 300 K – 273 = 27°C
(b) सेल्सियस 573K – 273 = 300°C

प्रश्न 2.
निम्नलिखित तापमानों को केल्विन इकाई में परिवर्तित करें-
(a) 25°C
(b) 373°C
उत्तर:
केल्विन = सेल्सियस + 273
(a) 25°C केल्विन (25+ 273) K 298K
(b) 373°C केल्विन (373273) K= 646K

प्रश्न 3.
निम्नलिखित अवलोकनों हेतु कारण लिखें-
(a) नैफ्थलीन को रखा रहने देने पर यह समय के साथ कुछ भी ठोस पदार्थ छोड़े बिना अदृश्य हो जाती है।
(b) हमें इत्र की गंध बहुत दूर बैठे हुए भी पहुँच जाती है।
उत्तर:
(a) नैफ्थलीन की गोलियाँ बिना कोई अवशेष छोड़ गायब हो जाती हैं क्योंकि उनका ऊर्ध्वपातन हो जाता है। अर्थात ठोस अवस्था से बिना द्रव में बदले गैसीय अवस्था में परिवर्तित हो जाता है। इस क्रिया को ऊर्ध्वपातन कहते हैं।

(b) इत्र के कण अपने-आप हवा के कणों के साथ मिलकर चारों तरफ फैल जाते हैं। इत्र के कणों के इस तरह फैलने के कारण कुछ दूरी पर बैठे होने पर भी हम इसकी गंध प्राप्त कर लेते हैं।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पदार्थों को उनके कणों के बीच बढ़ते हुए आकर्षण के अनुसार व्यवस्थित करें-
(a) जल
(b) चीनी
(c) ऑक्सीजन।
उत्तर:
अन्तराण्विक आकर्षण बल सबसे कम गैस में, उससे अधिक द्रव में सबसे अधिक ठोस में होता है अतः यह ऑक्सीजन में सबसे कम, फिर जल में तथा सर्वाधिक चीनी में होगा।

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प्रश्न 5.
निम्नलिखित तापमानों पर जल की भौतिक अवस्था क्या है?
(a) 25°C
(b) 0°C
(c) 100°C
उत्तर:
(a) 25°C पर – द्रव अवस्था में होगा।
(b) 0°C पर ठोस अवस्था में होगा।
(c) 100°C पर वाष्प अवस्था में होगा।

प्रश्न 6.
पुष्टि हेतु कारण दें-
(a) जल कमरे के ताप पर द्रव है।
(b) लोहे की अलमारी कमरे के ताप पर ठोस है।
उत्तर:
(a) कमरे के ताप पर पानी द्रव होता है क्योंकि इसका कोई निश्चित आकार नहीं होता। यह उस बर्तन का आकार ग्रहण कर लेता है जिसमें उसे रखा जाता है तथा यह आसानी से प्रवाहित हो सकता है। अतः यह तरल है।

(b) लोहे की अलमारी एक ठोस है क्योंकि इसका आकार निश्चित होता है। यह प्रवाहित नहीं होती। अर्थात् यह ठोस है।

प्रश्न 7.
273 K पर बर्फ को ठंडा करने पर तथा जल को इसी तापमान पर ठंडा करने पर शीतलता का प्रभाव अधिक क्यों होता है?
उत्तर:
273K पर पानी के कणों की अपेक्षा बर्फ के कणों की ऊर्जा कम होती है। अतः बर्फ वातावरण से अधिक ऊष्मा अवशोषित कर सकती है। यही कारण है कि समान ताप पर होते हुए भी बर्फ पानी की अपेक्षा अधिक ठंडक पहुँचाती है।

प्रश्न 8.
उबलते हुए जल अथवा भाप में से जलने की तीव्रता किसमें अधिक महसूस होती है?
उत्तर:
373 K पर वाष्प के कणों की ऊर्जा समान ताप पर पानी के कणों की ऊर्जा से अधिक होती है। ऐसा वाष्प के कणों द्वारा वाष्पन की गुप्त ऊष्मा के रूप में अतिरिक्त ऊर्जा अवशोषित किए जाने के कारण होता है। अतः जब वाष्प त्वचा के सम्पर्क में आती है तो समान ताप पर उबलते पानी की अपेक्षा अधिक ऊर्जा मुक्त करती है। इसलिए 373 K पर वाष्प द्वारा समान ताप पर उबलते पानी की अपेक्षा अधिक जलन पैदा होती है।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित चित्र के लिए A, B, C, D, E तथा F की अवस्था परिवर्तन को नामांकित करें :
JAC Class 9 Science Solutions Chapter 1 हमारे आस-पास के पदार्थ 1a
उत्तर:

  • A – संगलन
  • B – वाष्पन
  • C – संघनन
  • D – जमना
  • E – ऊर्ध्वपातन
  • F – निक्षेपण

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क्रियाकलाप 1.
एक 100 mL का बीकर लेकर उसे जल से आधा भरकर जल के स्तर पर निशान लगा देते हैं। अब चम्मच में रखे गए नमक या शक्कर (चीनी) को काँच की छड़ की मदद से घोल लें तथा जल के स्तर में बदलाव को देखें। (पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. -1)
JAC Class 9 Science Solutions Chapter 1 हमारे आस-पास के पदार्थ 3

अब उत्तर दें-

प्रश्न 1.
नमक या शक्कर (चीनी) का क्या हुआ? ये कहाँ गायब हो गए?
उत्तर:
जल में नमक या शक्कर को घोलने पर इनके कण जल के कणों के बीच स्थित रिक्त स्थानों में समावेशित हो जाते हैं तथा दिखाई नहीं देते हैं।

प्रश्न 2.
क्या जल के स्तर में कोई बदलाव आया?
उत्तर:
नहीं।

क्रियाकलाप 2.
100 ml पानी को एक बीकर में लेकर उसमें 2 या 3 क्रिस्टल पोटैशियम परमैगनेट के डालकर घोल बनाइये।
JAC Class 9 Science Solutions Chapter 1 हमारे आस-पास के पदार्थ 4
इस घोल से 10mL घोल निकालकर उसे 90mL जल में मिला दें। फिर इस घोल में से 10 ml निकालकर उसे भी 90ml जल में एक अन्य बीकर में मिला दें। इसी प्रकार इस घोल को 5 से 8 बार तनुकृत (Dilute ) करें।

अब उत्तर दें-

प्रश्न 1.
पोटैशियम परमैगनेट के एक क्रिस्टल में कितने सूक्ष्म कण होते हैं?
उत्तर:
पोटैशियम परमैगनेट के एक क्रिस्टल में बहुत से सूक्ष्म कण होते हैं तथा ये कण भी अत्यन्त छोटे-छोटे कणों में एक सीमा तक विभाजित किए जा सकते हैं।

प्रश्न 2.
जल के रंग के बारे में आपका क्या निष्कर्ष है?
उत्तर:
जल का रंग धीरे-धीरे हल्का होता जाता है फिर भी यह रंगीन ही रहता है।

क्रियाकलाप 3.
अपनी कक्षा के किसी कोने में एक बुझी हुई अगरबत्ती रख देने पर इसकी सुगन्ध लेने के लिए आपको इसके पास जाना पड़ेगा। यदि यही अगरबत्ती जल रही हो तब इसकी सुगन्ध दूर से भी आ जाती है। इस क्रियाकलाप द्वारा प्रदर्शित होता है कि पदार्थ के कण निरन्तर गतिशील होते हैं। (पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. – 2)

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क्रियाकलाप 4.
जल से भरे दो गिलास लें। पहले गिलास के एक सिरे पर सावधानी से एक बूँद लाल या नीली स्याही की डालें तथा दूसरे में शहद डालें और प्रेक्षण को नोट करें। स्याही जल में तुरन्त फैल जाती है।
(पाठ्य पुस्तक पृ. सं. – 3)

क्रियाकलाप 5.
यदि दो गिलास लेकर उसमें से एक में ठंडा पानी व दूसरे में गर्म पानी डाला जाए तथा अब इन दोनों में एक-एक क्रिस्टल पोटैशियम परमैगनेट का डाला जाए, तब हम पाते हैं कि गर्म जल वाले गिलास का पानी जल्दी रंगीन हो जाता है।

अब उत्तर दें-

प्रश्न 1.
क्या पदार्थ के कण निरन्तर गतिशील रहते हैं?
उत्तर:
हाँ, पदार्थ के कण निरन्तर गतिशील रहते हैं, अर्थात इनमें गतिज ऊर्जा होती है।

प्रश्न 2.
तापमान का पदार्थ के कणों की गतिशीलता पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
तापमान बढ़ाने से पदार्थ के कणों की गतिशीलता बढ़ जाती है।

प्रश्न 3.
पदार्थ के कण अपने आप अन्तः मिश्रित क्यों हो जाते हैं?
उत्तर:
पदार्थ के कणों के बीच रिक्त स्थान होता है। इन रिक्त स्थानों में कणों के समावेश के कारण ये अन्तः मिश्रित हो जाते हैं।

प्रश्न 4.
विसरण को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
दो विभिन्न पदार्थों के कणों का स्वत: मिलना ही विसरण कहलाता है।

प्रश्न 5.
तापमान का विसरण पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
तापमान बढ़ाने पर वि रण तेज हो जाता है।

क्रियाकलाप 6.
एक खेल के मैदान में चार समूह बनाकर मानव श्रृंखला बनाएँ। पहले समूह में ‘ईद्- मिश्मी नर्तकों’ की तरह एक दूसरे को पीछे से कसकर पकड़ लें। दूसरे समूह में एक दूसरे का हाथ पकड़कर मानव श्रृंखला बनाएँ। तीसरे समूह में केवल उंगली के सिरे से छूकर एक श्रृंखला बना लें। अब चौथे समूह द्वारा इन तीनों मानव श्रृंखलाओं को तोड़कर छोटे समूह में बाँटने का प्रयास करें। (पाठ्य पुस्तक पृ. सं. 3)

क्रियाकलाप 7.
एक लोहे की कील, एक चॉक का टुकड़ा एवं एक रबर बैंड काटकर या खींचकर उसे लेकर इन पर हथौड़ा मारकर, भंगुर करने का प्रयास करें। (पाठ्य पुस्तक पृ. सं. – 4)

क्रियाकलाप 8.
एक थाली में जल लेकर उसे उंगली से काटने का प्रयास करें एवं प्रेक्षण लें।

अब उत्तर दें-

प्रश्न 1.
क्रियाकलाप 6 में, यदि प्रत्येक समूह में उपस्थित व्यक्तियों को कणों के रूप में माना जाए तो किस समूह में कणों से आपस में सर्वाधिक बल लगता है?
उत्तर:
प्रथम समूह में सर्वाधिक बल लगता है क्योंकि इसमें प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे को पीछे से कसकर पकड़ता है, अतः प्रत्येक पदार्थ में कणों के बीच एक बल कार्य करता है जो कर्णों को एक साथ रखता है।

प्रश्न 2.
क्रियाकलाप 7 में तीनों में से किसके कण अधिक बल से एक दूसरे को जकड़े हुए हैं?
उत्तर:
लोहे की कील के कण अधिक बल से एक- दूसरे को जकड़े हुए हैं।

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प्रश्न 3.
क्रियाकलाप 8 में क्या जल की धारा कटती है?
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 4.
जल की सतह न कटने का क्या कारण है?
उत्तर:
जल के कणों के बीच आकर्षण बल अधिक है इसी कारण जल की सतह उंगली को बीच में करने से नहीं कटती है।

खंड 1.1 1.2 से सम्बन्धित पाठ्य पुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन से पदार्थ हैं- (पाठ्य पुस्तक पृ. सं. 4)
कुर्सी, वायु, स्नेह, गंध, नींबू पानी, इत्र घृणा, बादाम, विचार, शीत, की सुगंध।
उत्तर:
कुर्सी, वायु, बादाम व नींबू पानी पदार्थ हैं।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रेक्षण के कारण बताएँ- गर्मा-गरम खाने की गंध कई मीटर दूर से ही आपके पास पहुँच जाती है, लेकिन ठंडे खाने की महक लेने के लिए आपको उसके पास जाना पड़ता है।
उत्तर:
पदार्थ के कण सदैव गतिशील रहते हैं तथा तापमान बढ़ने पर कणों की गति तेज हो जाती है। खाने की गंध विसरण विधि द्वारा हम तक पहुँचती है। गर्म खाने का तापमान अधिक होने के कारण विसरण की दर ठंडे खाने की अपेक्षा अधिक होती है अतः कई मीटर दूर से ही गंध हम तक पहुँच जाती है।

प्रश्न 3.
स्वीमिंग पूल में गोताखोर पानी काट पाता है। इससे पदार्थ का कौन-सा गुण प्रेक्षित होता है?
उत्तर:
स्वीमिंग पूल में पानी के कणों के बीच लगने वाला आकर्षण बल गोताखोर के द्वारा लगाये बल से कम होता है जिसके कारण गोताखोर पानी को काट पाता है।

प्रश्न 4.
पदार्थ के कणों की क्या विशेषताएँ होती हैं?
उत्तर:
पदार्थों के कणों के बीच निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं-

  • पदार्थ के कणों के बीच रिक्त स्थान होता है।
  • पदार्थ के कण निरन्तर गतिशील होते हैं।
  • पदार्थ के कण एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं।

अब उत्तर दें-

प्रश्न 1.
रबर बैंड को क्या हम ठोस कह सकते हैं? क्या खींचकर इसका आकार बदला जा सकता है?
उत्तर:
बाह्य बल लगाने पर रबर बैंड का आकार बदलता है तथा बल को हटा लेने पर यह पुनः उसी आकार में आ जाता है परन्तु एक सीमा से अधिक बल लगाने पर यह टूट जाता है। अतः रबर बैंड को ठोस कह सकते हैं।

प्रश्न 2.
चीनी व नमक को जिस बर्तन में रखा जाता है, वे उन्हीं बर्तनों के आकार को ग्रहण कर लेते हैं। क्या ये ठोस हैं?
उत्तर:
ये सभी ठोस हैं, क्योंकि इन्हें किसी प्लेट या जार में रखने पर इनके क्रिस्टलों के आकार में परिवर्तन नहीं होता है।

प्रश्न 3.
स्पंज एक ठोस है फिर भी इसका संपीडन संभव है, क्यों?
उत्तर:
स्पंज में बहुत छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिनमें वायु भरी रहती है, जब हम स्पंज को दबाते हैं तो उसमें भरी वायु बाहर निकल जाती है। इसी कारण स्पंज का संपीडन सम्भव हो जाता है।

अब उत्तर दें-

प्रश्न 1.
इन द्रवों को यदि फर्श पर डाल दिया जाए तो क्या होगा?
उत्तर:
फर्श पर डालने पर ये सभी द्रव बहने लगते हैं परन्तु इनके गाड़ेपन व पतलेपन के कारण बहने के वेग अलग-अलग होते हैं।

प्रश्न 2.
यदि किसी द्रव का 50 mL मापकर विभिन्न बर्तनों में क्रमशः एक-एक करके डाला जाए तो क्या प्रत्येक अवस्था में आयतन समान रहता है?
उत्तर:
हाँ, प्रत्येक अवस्था में आयतन समान ही रहता है।

प्रश्न 3.
क्या द्रव का आकार एकसमान रहता है?
उत्तर:
नहीं, द्रव का आकार बर्तन की आकृति के अनुसार बदलता है।

प्रश्न 4.
द्रव को एक बर्तन से दूसरे बर्तन में उड़ेलने पर क्या यह आसानी से बहता है?
उत्तर:
हाँ, यह आसानी से बहता है।

प्रश्न 5.
द्रवों में विसरण दर ठोसों से अधिक क्यों होती है?
उत्तर:
ठोस की अपेक्षा द्रव के कर्णों में रिक्त स्थान अधिक होने के कारण द्रवों में विसरण की दर ठोसों से अधिक होती है।

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प्रश्न 6.
उपरोक्त क्रियाकलाप से क्या निष्कर्ष निकलता है?
उत्तर:
द्रव का आयतन निश्चित होता है लेकिन आकार अनिश्चित होता है। इन्हें जिस बर्तन में रखा जाता है ये उसी का आकार ग्रहण कर लेते हैं।

क्रियाकलाप 11.
100 mL की तीन सीरिन्ज लेकर उनके सिरों को रबर के कॉर्क से बन्द कर दें तथा सभी के पिस्टन को हटा दें। पहली सीरिज में हवा रहने दें, दूसरी सीरिज में जल तथा तीसरी में चॉक के टुकड़े भर दें। सीरिन्ज के आसानी से गतिशील होने के लिए उस पर वैसलीन लगा दें तथा पिस्टन को सिरिन्ज में डालकर संपीडित करने की कोशिश करें।

अब उत्तर दें-

प्रश्न 1.
पिस्टन किस स्थिति में आसानी से भीतर चला जाता है?
उत्तर:
पिस्टन हवा के सिरिन्ज में रहने पर आसानी से भीतर चला जाता है।

प्रश्न 2.
इस प्रेक्षण से क्या पता चलता है?
उत्तर:
इससे यह पता चलता है कि हवा (गैसों) को ठोसों व द्रवों की अपेक्षा अधिक दबाया जा सकता है। इसका अर्थ है कि गैसों की संपीड्यता (Compressibility) बहुत अधिक होती है।

नोट- संपीड्यता के गुण का उपयोग घरों में खाना बनाने में उपयोग की जाने वाली सिलिण्डर में भरी जाने वाली गैसों में किया जाता है। सिलिण्डर में भरी गैस द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) को संपीड्य करके ही भरा जाता है, आजकल वाहनों में संपीडित प्राकृतिक गैस (CNG) का उपयोग किया जाता है। संपीड्यता अधिक होने के कारण गैस के अधिक आयतन को कम आयतन में संपीडित किया जा सकता है।

खंड 1.3 से सम्बन्धित पाठ्य पुस्तक के प्रश्न (पा.पु. पृ. सं. – 6)

प्रश्न 1.
किसी तत्व के द्रव्यमान प्रति इकाई आयतन को घनत्व कहते हैं।
(घनत्व = द्रव्यमान / आयतन) बढ़ते हुए घनत्व के क्रम में निम्नलिखित को व्यवस्थित करें-वायु, चिमनी का धुआँ, शहद, जल, चॉक, रुई और लोहा।
उत्तर:
वायु, चिमनी का धुआँ, रुई, जल, शहद, चॉक, लोहा।

प्रश्न 2.
(a) पदार्थ की विभिन्न अवस्थाओं के गुणों में होने वाले अन्तर को सारणीबद्ध कीजिए। (b) निम्नलिखित पर टिप्पणी कीजिए -दृढ़ता, संपीड्यता, तरलता, बर्तन में गैस का भरना, आकार, गतिज ऊर्जा एवं घनत्व।
उत्तर:
(a) पदार्थ की विभिन्न अवस्थाओं के गुणों में होने वाले अर-

ठोसद्रवगैस
1. ठोसों का निश्चित आयतन व आकार होता है।द्रव का आयतन तो निशिचत होता है किन्तु आकार निशिचत नहीं होता।गैसों का आयतन तथा आकार निश्चित नहीं होता। गैसें जिस बर्तन में रखी जाती हैं, उसी का आयतन तथा आकार ग्रहण कर लेती हैं।
2. इन्हें दबाया नहीं जा सकता।द्रव उच्च तल से निम्न तल की ओर बहते हैं।इन्हैं दबाया जा सकता है।
3. इनके गलनांक व क्वथनांक कक्षताप से अधिक होते हैं।इनमें गलनांक कक्षताप से कम तथा क्वथनांक कक्षतताप से अधिक होते हैं।इनके गलनांक तथा क्वथनांक क क्षताप अधिक होते हैं।
4. इन्हें संपीडित नहीं किया जा सकता।इन्हें संपीडित नहीं किया जा सकता है।इन्हें संपीडित किया जा सकता है।
5. कणों के बीच आकर्ष ण बल अधिक होता है।कणों के बीच आकर्षण बल ठोसों से कम होता है।कणों के बीच आकर्षण बल द्रवों से कम होता है।
6. ठोस में विसरण द्रव तथा गैसों की अपेक्षा कम होता है।विसरण तीव्र होता है।विसरण द्रवों से अधिक होता है।

(b) दृढ़ता – ठोस पदार्थों के कण आपस में अत्यधिक आकर्षण बल से जुड़े होते हैं जिससे उन्हें तोड़ना या दबाना कठिन होता है, इसे दृढ़ता कहते हैं।
संपीड्यता – द्रव व गैसीय पदार्थों के कणों के बीच अत्यधिक रिक्त स्थान होता है, जिसमें हवा भरी होती है, जिससे वह दबाये जा सकते हैं। इस गुण को संपीड्यता कहते हैं।
तरलता – पदार्थों के बहने के गुण को तरलता कहते हैं।
बर्तन में गैस का भरना – गैसों के बीच काफी रिक्त स्थान होता है इसीलिए उन्हें काफी दबाया जा सकता है। इस प्रकार एक छोटे बर्तन में काफी गैस भरी जा सकती है।
आकार – कोई वस्तु जितना स्थान घेरती है, उसे उस वस्तु का आकार कहते हैं।
गतिज ऊर्जा – वस्तुओं में गति के कारण जो ऊर्जा या कार्य करने की क्षमता होती है, उसे गतिज ऊर्जा कहते हैं।
K.E. = \(\frac { 1 }{ 2 }\) mv²
(जहाँ m वस्तु का द्रव्यमान तथा वस्तु का वेग है)
घनत्व – किसी वस्तु के इकाई आयतन के द्रव्यमान को घनत्व कहते हैं।
JAC Class 9 Science Solutions Chapter 1 हमारे आस-पास के पदार्थ 5

प्रश्न 3.
कारण बताएँ – (a) गैस पूरी तरह उस बर्तन को भर देती हैं, जिसमें इसे रखते हैं। (b) गैस बर्तन की दीवारों पर दबाव डालती हैं। (c) लकड़ी की मेज ठोस कहलाती है। (d) हवा में हम आसानी से अपना हाथ चला सकते हैं लेकिन ठोस लकड़ी के टुकड़े में हाथ चलाने के लिए हमें कराटे में दक्ष होना पड़ेगा।
उत्तर:
(a) गैस के कणों के बीच आकर्षण बल नगण्य होता है। गैस के कण एक-दूसरे से दूर-दूर होते हैं और उसमें बहने का गुण होता है जिससे वह जिस बर्तन में रखे जाते हैं, उस पूरे बर्तन में फैल जाते हैं।

(b) गैस के अणु तीव्र गति से इधर-उधर घूमते रहते हैं और जिस बर्तन में होते हैं, उसकी दीवारों से टकराते हैं। जिससे बर्तन की दीवारों पर दबाव डालते हैं।

(c) लकड़ी के कण पास-पास होते हैं और अत्यधिक बल से जुड़े होते हैं जिससे उनका आयतन तथा आकार निश्चित होता है, जो ठोस का गुण हैं अतः लकड़ी ठोस है। इसलिए लकड़ी की मेज ठोस कहलाती है।

(d) हवा के कणों के बीच में आकर्षण बल बहुत कम होता है, (लगभग नगण्य )। इसलिए हवा के अणु आसानी से काटे जा सकते हैं और हवा में हाथ आसानी से चला सकते हैं। जबकि लकड़ी के कणों के बीच में आकर्षण बल अधिक होता है तथा लकड़ी के कण पास-पास होते हैं। अतः हाथ चलाने के लिए कराटे में दक्ष होना चाहिए।

प्रश्न 4.
सामान्यतया ठोस पदार्थों की अपेक्षा द्रवों का घनत्व कम होता है। लेकिन आपने बर्फ के टुकड़ों को पानी पर तैरते देखा होगा। पता लगाइए ऐसा क्यों होता है?
उत्तर:
बर्फ का टुकड़ा अपने अधिक आयतन के कारण अपने द्रव्यमान से अधिक पानी हटा देता है। इसलिए बर्फ का टुकड़ा पानी पर तैरता रहता है। बर्फ का आयतन जल से अधिक होता है।

अब उत्तर दें-

प्रश्न 1.
बर्फ क्यों पिघल जाती है?
उत्तर:
बर्फ को दी गई ऊष्मा उसके कणों की गतिज ऊर्जा में वृद्धि कर देती है, इस कारण कण अपने नियत स्थान को छोड़कर अधिक स्वतन्त्र होकर गति करने लगते हैं। एक अवस्था ऐसी आती है, जब ठोस (बर्फ) पूर्णतः पिघलकर द्रव में परिवर्तित हो जाता है।
JAC Class 9 Science Solutions Chapter 1 हमारे आस-पास के पदार्थ 1
चित्र:
(a) बर्फ़ का जल में बदलने की प्रक्रिया
(b) जल से जलवाष्प में बदलने की प्रक्रिया।

प्रश्न 2.
गलनांक किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह निश्चित तांपमान जिस पर ठोस पिघलकर द्रव बन जाता है, वह इसका गलनांक कहलाता है।

प्रश्न 3.
किसी ठोस का गलनांक क्या दर्शाता है?
उत्तर:
किसी ठोस का गलनांक उसके कणों के बीच के आकर्षण बल के सामर्थ्य को दर्शाता है।

प्रश्न 4.
बर्फ का गलनांक कितना होता है?
उत्तर:
273.15 K।

प्रश्न 5.
गुप्त ऊष्मा से आप क्या समझते हो?
उत्तर:
गलने की प्रक्रिया के दौरान जब तक सम्पूर्ण बर्फ पिघल नहीं जाती है तापमान नहीं बदलता है, तापमान में बिना किसी तरह की वृद्धि दर्शाए इस ऊष्मीय ऊर्जा को बर्फ अवशोषित कर लेती है। यह ऊर्जा बीकर में ली गई सामग्री में छुपी रहती है, इसे ही गुप्त ऊष्मा कहते हैं।

प्रश्न 6.
गुप्त ऊष्मा को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
वायुमण्डलीय दाब पर किग्रा ठोस को उसके गलनांक पर द्रव में बदलने के लिए आवश्यक ऊर्जा की मात्रा को गुप्त ऊष्मा कहा जाता है।

JAC Class 9 Science Solutions Chapter 1 हमारे आस-पास के पदार्थ

प्रश्न 7.
जल के वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा क्या है?
उत्तर:
373 K (100°C) वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा है। (पा. पु. पृ. सं. 8)

क्रियाकलाप 13.
चीनी की प्याली में थोड़ा सा कपूर या अमोनियम क्लोराइड (NH4 Cl) लिया तथा इसका चूर्ण बनाया। एक कीप को उल्टा करके इस प्याली के ऊपर रख दिया तथा इसे गर्म किया तब हम पाते हैं कि कपूर या अमोनियम क्लोराइड बिना द्रव अवस्था में परिवर्तित हुए सीधे गैस में बदल गया। इस क्रिया को ऊर्ध्वपातन कहते हैं।
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अब उत्तर दें-

प्रश्न 1.
ऊर्ध्वपातन किसे कहते हैं?
उत्तर:
द्रव अवस्था में परिवर्तित हुए बिना ठोस अवस्था से सीधे गैस अवस्था में बदलने की प्रक्रिया को ऊर्ध्वपातन कहते हैं। गैस के सीधे ठोस में बदलने की प्रक्रिया निक्षेपण कहलाती है।

खंड 1.4 से सम्बन्धित पाठ्य पुस्तक के प्रश्न (पा. पु. पू. सं. १)

प्रश्न 1.
निम्नलिखित तापमान को सेल्सियस में बदलें-
(a) 300K
(b) 573 K
उत्तर:
सेल्सियस K – 273
(a) सेल्सियस- 300K 273 27°C
(b) सेल्सियस = 573K – 273300°C

प्रश्न 2.
निम्नलिखित ताप पर जल की भौतिक अवस्था क्या होगी?
(a) 250°C
(b) 100°C
उत्तर:
(a) 250°C पर जल वाष्प अवस्था में होगा।
(b) 100°C पर जल द्रव अवस्था में होगा तथा उबल रहा होगा एवं वाष्प में परिवर्तित हो रहा होगा।

प्रश्न 3.
किसी भी पदार्थ की अवस्था परिवर्तन के दौरान तापमान स्थिर क्यों रहता है?
उत्तर:
किसी पदार्थ का तापमान बढ़ाने पर वह दूसरी अवस्था में परिवर्तित होना प्रारम्भ कर देता है। एक निश्चित ताप के बाद ताप स्थिर हो जाता है क्योंकि अब समस्त ऊर्जा, अवस्था परिवर्तन के काम आती है। ऐसा तब तक होता रहता है जब तक पदार्थ एक अवस्था से दूसरी अवस्था में पूर्ण रूप से परिवर्तित न हो जाए, इस ऊष्मा को पदार्थ की गुप्त ऊष्मा कहते हैं।

प्रश्न 4.
वायुमण्डलीय गैसों को द्रव में परिवर्तन करने के लिए कोई विधि सुझाइए।
उत्तर:
पदार्थों की अवस्थाएँ दाब व तापमान पर निर्भर होती हैं। अतः वाष्प अवस्था में ताप कम करके व दाब बढ़ाकर अवस्था परिवर्तन किया जा सकता है। वायुमण्डलीय गैसें ऊँचाई पर होती हैं जहाँ ताप कम होता है। ताप कम होने के कारण गैसें संघनित होकर बादलों में बदल जाती हैं जो द्रव की छोटी-छोटी बूँदों से मिलकर बना होता है।

क्रियाकलाप 14.
एक परखनली में 5 mL जल लेकर इसे खिड़की के पास या पंखे के नीचे रखें खुली रखी चीनी मिट्टी की प्याली में जल रखकर उसे खिड़की के पास या पंखे के नीचे रख दें। एक अन्य चीनी मिट्टी की प्याली में 5 mL जल रखकर उसे अपनी कक्षा की किसी अलमारी के अन्दर रख दें। कमरे का तापमान नोट करके सभी में वाष्पीकरण में लगे समय को नोट करें।
इस क्रियाकलाप को बारिश में भी दोहराएँ।

निष्कर्ष-इसमें निष्कर्ष निकलता है कि वाष्पीकरण की दर निम्नलिखित के साथ बढ़ती है-

  • सतह का क्षेत्रफल बढ़ने पर वाष्पीकरण की दर भी बढ़ जाती है जैसे कपड़े सुखाने के लिए हम उन्हें फैला देते हैं।
  • तापमान में वृद्धि होने से वाष्पीकरण में वृद्धि होती है।
  • वायु में आर्द्रता कम होने पर वाष्पीकरण अधिक हो जाता है। आर्द्रता होने पर वाष्पीकरण की दर घट जाएगी।
  • वायु की गति बढ़ने पर भी जलवाष्प के कण वायु के साथ उड़ जाते हैं। इससे आस पास के जलवाष्प की मात्रा घट जाती है।

खंड 1.5 से सम्बन्धित पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर (पा.पु. पृ.सं.-11)

प्रश्न 1.
गर्म, शुष्क दिन में कूलर अधिक ठंडा क्यों करता है?
उत्तर:
गर्म, शुष्क दिनों में वायुमण्डल में जलवाष्प बहुत कम होती है। इस कारण वाष्पीकरण की दर बढ़ जाती है जब कूलर चलता है तो उसका जल अपनी वाष्पीकरण की ऊर्जा अपने वातावरण से लेता है तथा तेजी से वाष्पित होता है। वाष्पन के कारण कूलर अधिक ठंडा करता है।

प्रश्न 2.
गर्मियों में घड़े का जल ठंडा क्यों होता है?
उत्तर:
गर्मियों में वायुमण्डल में जलवाष्प कम होती है। जो वाष्पन की दर को बढ़ा देती है। घड़े में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिनसे पानी धीरे-धीरे रिसता रहता है जो वाष्पन के लिए ऊष्मा जल से व वायुमण्डल से लेता है। जिससे घड़े के आस-पास का वातावरण ठंडा हो जाता है और घड़े का पानी ठंडा हो जाता है।

प्रश्न 3.
ऐसीटोन / पेट्रोल या इत्र डालने पर हमारी हथेली ठंडी क्यों हो जाती है?
उत्तर:
ऐसीटोन / पेट्रोल या इत्र वाष्पशील पदार्थ हैं। जब इन्हें हथेली पर रखते हैं तो हाथ की गर्मी के कारण इनका वाष्पन तेज हो जाता है। इसके लिए यह ऊर्जा हथेली से लेते हैं जिससे वह ठंडी हो जाती है।

JAC Class 9 Science Solutions Chapter 1 हमारे आस-पास के पदार्थ

प्रश्न 4.
कप की अपेक्षा प्लेट से हम गर्म दूध या चाय जल्दी क्यों पी लेते हैं?
उत्तर:
कप का क्षेत्रफल कम होने के कारण चाय या दूध का वाष्पन धीरे होता है और वह देर में ठंडी होती है तथा पीने में देर लगती है, जबकि प्लेट का क्षेत्रफल अधिक होने के कारण वाष्पन तेजी से होता है और चाय या दूध जल्दी ठंडे हो जाते है अतः प्लेट में दूध या चाय जल्दी पी लेते हैं।

प्रश्न 5.
गर्मियों में हमें किस प्रकार के कपड़े पहनने चाहिए?
उत्तर:
गर्मियों में हमें सूती कपड़े पहनने चाहिए क्योंकि इनके द्वारा पसीने का अधिक अवशोषण हो जाता है जो वायुमण्डल में आसानी से वाष्पीकृत हो जाता है।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 9 बल तथा गति के नियम

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JAC Board Class 9 Science Notes Chapter 9 बल तथा गति के नियम

→ बल वह बाह्य कारक है जो किसी वस्तु में गति उत्पन्न कर सकता है, अथवा गति उत्पन्न करने का प्रयास करता है।

→ बल किसी वस्तु की गति की अवस्था में परिवर्तन उत्पन्न कर सकता है, उसकी गति को धीमा या तेज कर सकता है।

→ बल किसी वस्तु के रूप अथवा आकार को बदल सकता है।

→ बल दो प्रकार के होते हैं-(i) सन्तुलित बल (ii) असन्तुलित बल।

→ वस्तु पर असन्तुलित बल लगा होने पर वस्तु में अवश्य ही गति उत्पन्न हो जाती है।

→ किसी वस्तु पर लगे सन्तुलित बल वस्तु में गति उत्पन्न नहीं कर सकते।

→ S.I. पद्धति में बल का मात्रक किग्रा मी./से² है। इसे न्यूटन के नाम से भी जाना जाता है।

→ एक न्यूटन का बल किसी एक किग्रा की वस्तु में एक मीटर प्रति सेकण्ड² का त्वरण उत्पन्न करता है।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 9 बल तथा गति के नियम

→ बल के प्रभाव से वस्तुओं में होने वाली गति के लिए न्यूटन ने तीन मौलिक नियम दिए-प्रथम नियम-प्रत्येक वस्तु अपनी वर्तमान अवस्था (विराम की अवस्था या एकसमान गति की अवस्था) को बनाए रखती है, जब तक कि उस पर कोई बाह्य बल न लगाया जाए। इस नियम को ‘जड़त्व का नियम’ भी कहते हैं।

→ द्वितीय नियम-किसी वस्तु के संवेग परिवर्तन की दर उस पर लगाए गए असन्तुलित बल की दिशा में तथा उस बल के समानुपाती होती है।

→ तृतीय नियम-जब एक वस्तु दूसरी वस्तु पर बल लगाती है तो दूसरी वस्तु भी पहली वस्तु पर बल लगाती है। ये दोनों बल परिमाण में बराबर तथा दिशा में विपरीत होते हैं। इस नियम को ‘क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम’ भी कहते हैं।

→ वस्तुओं में उनकी वर्तमान अवस्था को बनाए रखने की प्रवृत्ति को ‘जड़त्व’ कहते हैं।

→ किसी वस्तु का द्रव्यमान ही उसंके जड़त्व की माप है।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 9 बल तथा गति के नियम

→ किसी वस्तु के द्रव्यमान m तथा वेग v के गुणनफल को संवेग कहते हैं। इसे p से प्रदर्शित करते हैं। p = m v

→ संवेग एक सदिश राशि है। संवेग की दिशा वही होती है जो वस्तु के वेग की होती है। इसका मात्रक किग्रा-मीटर/सेकण्ड है।

→ गति के दूसरे नियम का गणितीय रूप F = m a है, वहाँ F वस्तु पर लगा बल, m वस्तु का द्रव्यमान तथा a वस्तु का त्वरण है।

→ एक विलग निकाय में कुल संवेग संरक्षित रहता है।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 8 गति

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JAC Board Class 9 Science Notes Chapter 8 गति

→ यदि किसी वस्तु की स्थिति अपने पास स्थित वस्तुओं से परिवर्तित होती है तो वस्तु को गति की अवस्था में कहा जाता है।

→ किसी वस्तु की स्थिति तथा उसकी गति का वर्णन करने के लिए एक निर्देश बिन्दु की आवश्यकता होती है।

→ किसी गतिमान वस्तु द्वारा अपने यात्रा के समय में तय किए गए पथ की कुल लम्बाई को वस्तु द्वारा तय की गई दूरी कहते हैं।

→ किसी गतिमान वस्तु के यात्राकाल में उसकी प्रारम्भिक स्थिति व अन्तिम स्थिति तक के बीच की न्यूनतम दूरी को वस्तु का विस्थापन कहते हैं।

→ एक समान गति में वस्तु सरल रेखा में गतिमान होती हुई समान समय अन्तरालों में समान दूरी तय करती है।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 8 गति

→ यदि गतिमान वस्तु द्वारा समान समय अन्तरालों में असमान दूरियाँ तय की जाती हैं तब वस्तु की गति को असमान गति कहते हैं।

→ किसी वस्तु की गति दर अथवा वस्तु द्वारा दूरी तय करने की समय दर को वस्तु की चाल कहते हैं। चाल के मात्रक मीटर/सेकण्ड; सेमी/सेकण्ड तथा किमी/घन्टा हैं।

→ वस्तु की चाल तथा उसकी गति की दिशा दोनों को एक साथ व्यक्त करने के लिए वेग राशि का प्रयोग किया जाता है।

→ किसी गतिमान वस्तु के वेग परिवर्तन की दर को उस वस्तु का त्वरण कहते हैं।

→ एक समान त्वरण से चल रही किसी वस्तु की गति की व्याख्या निम्न तीन समीकरणों के माध्यम से की जा सकती है-

  • v = u + a t
  • s = u t + \(\frac { 1 }{ 2 }\) a t²
  • v² = u² + 2 a s

जहाँ u वस्तु का प्रारम्भिक वेग, v वस्तु का अन्तिम वेग तथा वस्तु t समय के लिए एक समान त्वरण a से गति करती है तथा t समय में तय की गई दूरी s है।

→ किसी वस्तु के दूरी-समय ग्राफ का ढाल उस वस्तु की चाल को व्यक्त करता है।

→ किसी वस्तु के वेग-समय ग्राफ तथा समय अक्ष के बीच घिरा क्षेत्रफल किसी समयान्तराल में वस्तु द्वारा तय की गई दूरी को व्यक्त करता है।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 8 गति

→ वेग-समय ग्राफ का ढाल वस्तु के त्वरण को व्यक्त करता है।

→ एकसमान चाल से गतिमान वस्तु का दूरी-समय ग्राफ एक सरल रेखा होता है।

→ एकंसमान वेग से गतिमान वंस्तु का वेग-समय ग्राफ, समय अक्ष के समान्तर सरल रेखा होता है।

→ एकसमान त्वरण से गतिमान वस्तु का वेग-समय ग्राफ एक सरल रेखा होता है।

→ एकसमान चाल से किसी वृत्तीय पथ पर गतिमान वस्तु की गति एकसमान वृत्तीय गति कहलाती है।

→ वेग को किमी/घण्टा से मीटर/सेकण्ड में बदलने के लिए \(\frac { 5 }{ 18 }\) से गुणा करना चाहिए तथा मीटर/सेकण्ड को किमी/घण्टा में बदलने के लिए \(\frac { 18 }{ 5 }\) से गुणा करना चाहिए।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 10 गुरुत्वाकर्षण

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JAC Board Class 9 Science Notes Chapter 10 गुरुत्वाकर्षण

→ जब कोई पिण्ड एकसमान चाल से वृत्तीय पथ पर गति करता है तो उसकी गति की दिशा लगातार बदलती रहती है, अतः वृत्तीय पथ पर गति करते हुए पिण्ड की गति में त्वरण होता है। इस त्वरण की दिशा सदैव वृत्त के केन्द्र की ओर होती है; अतः इस त्वरण को अभिकेन्द्रीय त्वरण कहते हैं।

→ एकसमान वृत्तीय गति करते पिण्ड पर, केन्द्र की ओर सदैव ही एक बल कार्य करता है जिसे अभिकेन्द्र बल कहते हैं।

→ विश्व का प्रत्येक पिण्ड, प्रत्येक अन्य पिण्ड को अपनी ओर एक बल से आकर्षित करता है। इस बल को गुरुत्वाकर्षण बल कहते हैं।

→ दो पिण्डों के बीच लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल, पिण्डों के द्रव्यमानों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
F ∝ m1 m2 तथा F ∝ \(\frac { 1 }{ d² }\) अत: F ∝ \(\frac{m_1 m_2}{d^2}\)
∴ F = \(\frac{G m_1 m_2}{d^2}\)
इस नियम को न्यूटन का सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण का नियम कहते हैं।

→ सार्वत्रिक गुरुजाकर्षण नियतांक G का मान 6.673 x 10-11 न्यूटन मी²/किम्र² है।

→ गुरुचाकर्षण बल के कारण ही चृथ्वी प्रत्रेक घनुदु को अपने केन्यू की और आकर्षित करती है। पृष्दी द्वारा किती बस्तु पर लगाए गए बल को गुणनीय बल काजे है।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 10 गुरुत्वाकर्षण

→ पृथ्नी की ओर मुक्त रूप से गिरती हुई वस्तु के त्वरण को गुरुपीय त्वरण करते हैं तथा इसे ‘g’ से प्रदर्शित करते हैं।

→ पृथ्वी के केन्द्र से d दूरी पर गुरुचीय त्वरण का मान निम्नलिखित सूत्र द्वारा प्राप्त होता है-
g = \(\frac{\mathrm{GM}}{d^2}\)

→ जहाँ पृथ्वी का द्रव्यमान M तथा दूरी d पृथ्वी की त्रिज्या से अधिक या उसके बराबर है।

→ गुरुत्वीय त्वरण g का मान विषुवत् रेखा पर सबसे कम तथा ध्रुवों पर सबसे अधिक होता है।

→ पृथ्वी द्वारा किसी वस्तु पर आरोपित गुरुत्वीय बल को उस वस्तु के भार के रूप में भी जाना जाता है।

→ m द्रव्यमान की किसी वस्तु का पृथ्वी तल पर भार W = m g होता है।

→ किसी वस्तु का भार विषुवत रेखा पर सबसे कम तथा ध्रुवों पर सबसे अधिक होता है।

→ किसी पृष्ठ के लम्बवत् लगने वाले बल को ‘प्रणोद’ कहते हैं।

→ किसी पृष्ठ के एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाले प्रणोद को ‘दाब’ कहते हैं।
JAC Class 9 Science Notes Chapter 10 गुरुत्वाकर्षण 1

→ दाब का S.I. मात्रक न्यूटन/मीटर² है जिसे पास्कल भी कहते हैं तथा Pa से प्रदर्शित करते हैं।

→ जब किसी ठोस वस्तु को द्रव में छोड़ा जाता है तो द्रव उस वस्तु पर ऊपर की ओर एक बल लगाता है जिसे द्रव का उक्षेप या उत्प्लावन बल कहते हैं।

→ किसी वस्तु पर कार्य करने वाला द्रव का उत्प्लावन बल, वस्तु द्वारा हटाये गए द्रव के भार के बराबर होता है।

→ यदि वस्तु का घनत्व, द्रव के घनत्व से अधिक है तो वह उस द्रव में डूब जाती है। इसके विपरीत यदि वस्तु का घनत्व, द्रव के घनत्व से कम होता है तो वस्तु द्रव पर तैरती है।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 10 गुरुत्वाकर्षण

→ जब किसी वस्तु को द्रव में डुबाया जाता है तो वस्तु के भार में कमी हो जाती है। वस्तु के भार में होने वाली कमी, वस्तु द्वारा हटाए गए द्रव के भार के बराबर होती है। इस सिद्धान्त को आर्किमिडीज के सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है।

→ किसी पदार्थ के घनत्व का मात्रक किग्रा/मीटर³ है।

→ किसी पदार्थ का आपेक्षिक घनत्व, उस पदार्थ के घनत्व तथा जल के घनत्व के अनुपात के बराबर होता है।
JAC Class 9 Science Notes Chapter 10 गुरुत्वाकर्षण 2
आपेक्षिक घनत्व का कोई मात्रक नहीं होता।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 7 जीवों में विविधता

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JAC Board Class 9 Science Notes Chapter 7 जीवों में विविधता

→ वर्गीकरण जीवों की विविधता को स्पष्ट करने में सहायक होता है।

→ जीवों को पाँच जगत् में वर्गीकृत करने के लिए निम्न विशेषताओं को ध्यान में रखा जाता है-

  • कोशिकीय संरचना-प्रौकेरियोटी अथवा यूकेरियोटी।
  • जीव का शरीर एककोशिक अथवा बहुकोशिक है। बहुकोशिक जीवों की संरचना जटिल होती है।
  • कोशिका भित्ति की उपस्थिति या स्वपोषण की क्षमता।

→ उपरोक्त आधार पर सभी जीवों को पाँच जगत् में बाँटा गया है-मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक (फंजाई), प्लांटी और एनीमेलिया।

→ जीवों का वर्गीकरण उनके विकास से सम्बन्धित है।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 7 जीवों में विविधता

→ प्लांटी और एनीमेलिया को उनकी क्रमिक शारीरिक जटिलता के आधार पर वर्गीकृत किया गया है।

→ पौधों को पाँच वर्गों में बाँटा गया है-शैवाल, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म

→ जन्तुओं को दस फाइलम में बाँटा गया है-पोरीफेरा, सीलेंटरेटा, प्लेटिहेल्मिन्थीज, निमेटोडा, एनीलिडा, आर्थ्रोपोडा, मोलस्का, इकाइनोडर्मेटा, प्रोटोकॉर्डेटा और कॉर्डेटा।

→ द्विपद- नाम पद्धति जीवों की सही पहचान में सहायता करती है।

→ द्विपद- नाम पद्धति में पहला नाम जीनस और दूसरा स्पीशीज का होता है।
हमारे चारों ओर अनेक प्रकार के जीव समूह पाये जाते हैं। सभी जीवधारी एक दूसरे से किसी न किसी रूप में भिन्न हैं। हम मनुष्य तथा बन्दर की आपस में तुलना करें तो निश्चय ही मनुष्य और बन्दर में अधिक समानताएँ हैं। किन्तु गाय और बन्दर में काफी अन्तर है।

जैव विविधता रंगहीन जीवधारियों, पारदर्शी कीटों और विभिन्न रंगों वाले पक्षियों और फूलों में भी पायी जाती है। इन समस्त जीवधारियों को जानने व समझने के लिए जीवों को उनकी समानता एवं भिन्नता के आधार पर विभिन्न वर्गों व समूहों में वर्गीकृत किया गया है।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 6 ऊतक

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JAC Board Class 9 Science Notes Chapter 6 ऊतक

→ ऊतक कोशिकाओं का समूह होता है जिसमें कोशिकाओं की संरचना तथा कार्य एक समान होते हैं।

→ पादप ऊतक दो प्रकार के होते हैं-विभज्योतक तथा स्थायी ऊतक।

→ विभज्योतक (मेरिस्टेमेटिक) ऊतक एक विभाज्य ऊतक है तथा यह पौधों के वृद्धि वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

→ स्थायी ऊतक विभज्योतक से बनते हैं जो एक बार विभाजित होने की क्षमता को खो देते हैं। इनको सरल तथा जटिल ऊतकों में वर्गीकृत किया जाता है।

JAC Class 9 Science Notes Chapter 6 ऊतक

→ पैरेन्काइमा, कॉलेन्काइमा तथा स्कलेरेनकाइमा सरल ऊतकों के तीन प्रकार हैं। जाइलम और फ्लोएम जटिल ऊतकों के प्रकार हैं।

→ एपीथीलियमी, पेशीय, संयोजी तथा तन्त्रिका ऊतक जन्तु ऊतक हैं।

→ आकृति और कार्य के आधार पर एपीथीलियमी ऊतकों को शल्की, घनाकार, स्तम्भाकार, रोमीय तथा ग्रंथिल श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है।

→ हमारे शरीर में विद्यमान संयोजी ऊतकों के विभिन्न प्रकार हैं-एरिओलर ऊतक, एडीपोज (वसामय)ऊतक, अस्थि, कंडरा, स्नायु, उपास्थि तथा रक्त (रुधिर)।

→ पेशीय ऊतक तीन प्रकार के होते हैं-रेखित, अरेखित और कार्डियक (हृदयक पेशी)।

→ तन्त्रिका ऊतक न्यूरॉन का बना होता है, जो संवेदना को प्राप्त और संचालित करता है।