JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 6 न्यायपालिका

Jharkhand Board JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 6 न्यायपालिका Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 6 न्यायपालिका

Jharkhand Board Class 11 Political Science न्यायपालिका InText Questions and Answers

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प्रश्न 1.
मेरा तो सिर चकरा रहा है और कुछ समझ में नहीं आ रहा। लोकतन्त्र में आप प्रधानमन्त्री और राष्ट्रपति तक की आलोचना कर सकते हैं, न्यायाधीशों की क्यों नहीं? और फिर, यह अदालत की अवमानना क्या बला है? क्या मैं ये सवाल करूँ तो मुझे ‘अवमानना’ का दोषी माना जायेगा?
उत्तर:
भारतीय लोकतन्त्र में प्रधानमन्त्री और राष्ट्रपति जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, इसलिए हम उनके कार्यों और निर्णयों की आलोचना कर सकते हैं। लेकिन भारतीय संविधान ने लोकतन्त्र की रक्षा, नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा तथा संविधान की सुरक्षा के लिए न्यायपालिका की स्वतन्त्रता और सुरक्षा पर बल देते हुए यह सुनिश्चित किया गया है कि न्यायाधीशों की नियुक्तियों में दलगत राजनीति की कोई भूमिका न रहे। इसलिए न्यायाधीशों की नियुक्ति का आधार व्यक्ति के राजनीतिक विचार तथा निष्ठाएँ न होकर कानूनी विशेषज्ञता व योग्यता है।

न्यायाधीशों की सुरक्षा, स्वतन्त्रता और निष्पक्षता को बनाए रखने की दृष्टि से संविधान में यह प्रावधान किया गया है कि न्यायाधीशों के कार्यों और निर्णयों की व्यक्तिगत आलोचना नहीं की जा सकती। अदालत की अवमानना यदि कोई व्यक्ति न्यायाधीशों के कार्यों और निर्णयों की व्यक्तिगत आलोचना करता है, तो वह न्यायालय की अवमानना का दोषी है। न्यायालय को उसे दण्डित करने का अधिकार है। इससे न्यायपालिका आलोचना के भय से मुक्त होकर स्वतन्त्र रूप से निर्णय करती है।

यदि मैं यह प्रश्न पूछता हूँ कि मैं न्यायाधीशों की आलोचना क्यों नहीं कर सकता? अदालत की अवमानना क्या है? ऐसे प्रश्न करना तथा उसके कारण खोजना व समझना अदालत की अवमानना नहीं है। क्योंकि इसमें आपने किसी न्यायाधीश के किसी निर्णय की कोई आलोचना नहीं की है, बल्कि यह जानना चाहा है कि हम न्यायाधीशों की आलोचना क्यों नहीं कर सकते और क्या यह लोकतन्त्र के लिए उचित है? यह न्यायाधीशों की अवमानना में नहीं आता है।

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प्रश्न 2.
आपकी राय में निम्नलिखित में से कौन-कौन न्यायाधीशों के निर्णय को प्रभावित करते हैं? क्या आप इन्हें ठीक मानते हैं?
(अ) संविधान
(ब) पहले लिए गए फैसले
(स) अन्य अदालतों की राय
(द) जनमत
(य) मीडिया
(र) कानून की परम्पराएँ
(ल) कानून
(व) समय और कर्मचारियों की कमी
(श) सार्वजनिक आलोचना का भय
(स) कार्यपालिका द्वारा कार्यवाही का भय।
उत्तर:
मेरी राय में उपर्युक्त में से निम्नलिखित न्यायाधीशों के निर्णयों को प्रभावित करते हैं और मैं इन्हें ठीक मानता हूँ।
(अ) संविधान
(ब) पहले लिए गए फैसले
(स) अन्य अदालतों की राय
(द) कानून की परम्पराएँ
(व) कानून।

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प्रश्न 3.
मेरा ख्याल है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में मन्त्रिपरिषद् की बात को ज्यादा तरजीह दी जानी चाहिए या फिर यह मान लें कि न्यायपालिका अपनी नियुक्ति आप ही करने वाला निकाय है।
उत्तर:
मैं आपके उपर्युक्त विचारों से सहमत नहीं हूँ क्योंकि यदि न्यायाधीशों की नियुक्ति में मन्त्रिपरिषद् की बात को ज्यादा तरजीह दी जायेगी तो न्यायपालिका के कार्यों में कार्यपालिका का हस्तक्षेप बढ़ जायेगा और कार्यपालिका न्यायपालिका की तटस्थता या निष्पक्षता को खत्म कर उसे प्रतिबद्ध न्यायपालिका की तरफ बढ़ायेगी। यह मानना भी त्रुटिपरक है कि न्यायपालिका अपनी नियुक्ति आप ही करना वाला निकाय है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है, इसमें प्रायः वरिष्ठता की परम्परा का पालन किया जाता है, जिसका आधार अनुभव और योग्यता है।

मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम चार न्यायाधीशों के परामर्श से मुख्य न्यायाधीश कुछ न्यायाधीशों का एक पैनल राष्ट्रपति को भेज देता है। राष्ट्रपति इनमें से किसी की भी नियुक्ति कर सकता है। इस प्रकार अन्तिम निर्णय मन्त्रिपरिषद् द्वारा ही लिया जाता है। मन्त्रिपरिषद् के निर्णय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के समय राजनीतिक निष्ठाओं के प्रभाव में योग्यता को नजर- अंदाज न किया जा सके, इसलिए मन्त्रिपरिषद् के निर्णय पर न्यायाधीशों के परामर्श की कुछ सीमाएँ लगायी गयी हैं। इस प्रकार न्यायपालिका की नियुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय और मन्त्रिपरिषद् दोनों महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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प्रश्न 4.
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का महत्त्व: निम्न कारणों से न्यायपालिका की स्वतन्त्रता महत्त्वपूर्ण है।

  1. समाज में व्यक्तियों के बीच, समूहों के बीच, व्यक्ति या समूह तथा सरकार के बीच उठने वाले विवादों को ‘कानून के शासन के सिद्धान्त’ के आधार पर एक स्वतन्त्र न्यायपालिका द्वारा ही हल किया जा सकता है।
  2. व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा एक स्वतन्त्र न्यायपालिका ही कर सकती है।
  3. स्वतन्त्र न्यायपालिका ही यह सुनिश्चित करती है कि लोकतन्त्र की जगह किसी एक व्यक्ति या समूह की तानाशाही न ले ले।
  4. स्वतन्त्र न्यायपालिका ही संविधान की रक्षा का कार्य भली-भाँति कर सकती है।

प्रश्न 5.
क्या आपकी राय में कार्यपालिका के पास न्यायाधीशों को नियुक्त करने की शक्ति होनी चाहिए?
उत्तर:
मेरी राय में कार्यपालिका के पास न्यायाधीशों को नियुक्त करने की शक्ति होनी चाहिए, तथापि यह शक्ति निरंकुश नहीं होनी चाहिए, इस पर न्यायालय की सलाह की सीमा भी रहनी चाहिए।

प्रश्न 6.
यदि आप से न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव करने का सुझाव देने को कहा जाये तो आप क्या सुझाव देंगे?
उत्तर:
यदि मुझसे न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव करने का सुझाव देने को कहा जाये तो मैं यह सुझाव दूँगा कि राष्ट्रपति को न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए नाम प्रस्तावित करने के लिए बनी कमेटी में चार वरिष्ठ न्यायाधीशों के साथ-साथ चार वरिष्ठ मन्त्रिपरिषद् के सदस्यों को भी शामिल किया जाना चाहिए जिसमें गृहमन्त्री, विधिमन्त्री व दो अन्य मन्त्री हों। इन आठ व्यक्तियों की कमेटी की सलाह राष्ट्रपति को दी जानी चाहिए।

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित दो सूचियों को सुमेलित करें-
सूची – 1
(क) बिहार और भारत सरकार के मध्य विवाद की सुनवाई कौन करेगा?
(ख) हरियाणा के जिला न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील कहाँ की जायेगी?
(ग) एकीकृत न्यायपालिका।
(घ) किसी कानून को असंवैधानिक घोषित करना।

सूची – 2
(1) उच्च न्यायालय
(2) परामर्श सम्बन्धी क्षेत्राधिकार
(3) न्यायिक पुनर्निरीक्षण
(4) मौलिक क्षेत्राधिकार
(5) सर्वोच्च न्यायालय
(6) एकल संविधान।
उत्तर:
(क) बिहार और भारत सरकार के मध्य विवाद की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय करेगा। (क + 5)
(ख) हरियाणा के जिला न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील उच्च न्यायालय में की जायेगी। (ख + 1)
(ग) एकीकृत न्यायपालिका एकल संविधान के कारण है। (ग+6)
(घ) किसी कानून को न्यायपालिका न्यायिक पुनर्निरीक्षण के द्वारा असंवैधानिक घोषित कर सकती है। ( घ+3)

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प्रश्न 8.
सर्वोच्च न्यायालय को अपने ही फैसले को बदलने की इजाजत क्यों दी गयी है? क्या ऐसा यह मानकर किया गया है कि अदालत से भी चूक हो सकती है? क्या यह सम्भव है कि फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए जो खण्डपीठ बैठी है उसमें वह न्यायाधीश भी शामिल हो, जो फैसला सुनाने वाली खण्डपीठ में था?
उत्तर:
सर्वोच्च न्यायालय को अपने ही फैसले को बदलने की इजाजत इसलिए दी गई है कि हो सकता है कि पिछले फैसले के समय जो तथ्य सामने नहीं आए हों, उन तथ्यों की रोशनी में उस पर पुनः प्रकाश डाला जा सके। यदि कुछ ऐसे नये तथ्य सामने आते हैं जिनके प्रकाश में पहला फैसला सर्वोच्च न्यायालय को गलत लगता है, तो वह अपने पुराने फैसले को बदल सकता है। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय नवीन परिस्थितियों से अनुकूलन करते रहेंगे। यह सम्भव है कि फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए जो खण्डपीठ बैठी है उसमें वह न्यायाधीश भी शामिल हो, जो फैसला सुनाने वाली खण्डपीठ में था।

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प्रश्न 9.
आप एक न्यायाधीश हैं। नागरिकों का एक समूह जनहित याचिका के माध्यम से न्यायालय जाकर प्रार्थना करता है कि वह शहर की नगरपालिका के अधिकारियों को झुग्गी-झोंपड़ियाँ हटाने और शहर को सुन्दर बनाने का काम करने का आदेश दे, ताकि शहर में पूँजी निवेश करने वालों को आकर्षित किया जा सके। उनका तर्क है कि ऐसा करना जनहित में है। झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वालों का पक्ष है कि ऐसा करने पर उनके ‘जीवन के अधिकार’ का हनन होगा। उनका तर्क है कि जनहित के लिए साफ-सुथरे शहर के अधिकार से ज्यादा जीवन का अधिकार महत्त्वपूर्ण है। आप एक निर्णय लिखें और तय करें कि इस ‘जनहित याचिका में जनहित का मुद्दा है या नहीं।
उत्तर:
इस जनहित याचिका में जनहित का मुद्दा नहीं है क्योंकि नागरिकों के समूह ने शहर को सुन्दर बनाने के लिए शहर में पूँजी निवेश करने वालों को आकर्षित करने के लिए नगरपालिका अधिकारियों को झुग्गी-झोंपड़ियाँ हटाने के आदेश के लिए न्यायपालिका को जो जनहित याचिका दी है, उनमें झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाले लोगों के हितों को नजर-अंदाज किया है। झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाले लोगों का यह पक्ष सही है कि इससे उनके ‘जीवन के अधिकार’ का हनन होगा जो कि साफ- -सुथरे शहर के अधिकार से अधिक महत्त्वपूर्ण है।

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प्रश्न 10.
न्यायालय न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग कब करता है?
उत्तर:
न्यायिक पुनरावलोकन का अर्थ है कि सर्वोच्च न्यायालय किसी भी कानून की संवैधानिकता जाँच सकता है और यदि वह संविधान के प्रावधानों के विपरीत हो, तो न्यायालय उसे गैर-संवैधानिक घोषित कर सकता है। न्यायालय न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग निम्नलिखित दशाओं में करता है।

  1. जब कभी संसद मूल अधिकारों के विपरीत कोई कानून का निर्माण करती है तो उस कानून के सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग कर सकता है।
  2. संघीय सम्बन्धों के मामले में सर्वोच्च न्यायालय अपनी न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग कर सकता है। अर्थात् कोई ऐसा कानून या कार्यपालिका का कृत्य जो संविधान में निहित शक्ति – विभाजन की योजना के प्रतिकूल हो तो सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति के द्वारा उसे असंवैधानिक घोषित कर सकता है।

प्रश्न 11.
न्यायिक पुनरावलोकन और रिट में क्या अन्तर है?
उत्तर:
रिट याचिकाकर्त्ता के मौलिक अधिकारों को फिर से स्थापित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा उस व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध जारी की जाती है, जिसने उसके मौलिक अधिकार का हनन किया है। न्यायिक पुनरावलोकन द्वारा किसी कानून की संवैधानिकता की जाँच सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की जाती है और सर्वोच्च न्यायालय उसके संविधान के प्रतिकूल होने पर उसे गैर-संवैधानिक घोषित कर सकता है। इस प्रकार रिट द्वारा नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की जाती है और न्यायिक पुनरावलोकन के द्वारा संविधान की सुरक्षा की जाती है।

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प्रश्न 12.
निम्न में से न्यायपालिका और संसद के बीच टकराव के कौनसे मुद्दे रहे हैं।
(अ) न्यायाधीशों की नियुक्ति
(ब) न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते
(स) संसद के द्वारा संविधान संशोधन का दायरा
(द) संसद द्वारा न्यायपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप।
उत्तर:
न्यायपालिका और संसद के बीच टकराव के मुद्दे रहे हैं।
(अ) न्याधीशों की नियुक्ति।
(स) संसद के द्वारा संविधान संशोधन का दायरा।
(द) संसद द्वारा न्यायपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप।

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प्रश्न 1.
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को सुनिश्चित करने के विभिन्न तरीके कौन-कौनसे हैं? निम्नलिखित जो बेमेल हो उसे छाँटें।
(क) सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह ली जाती है।
(ख) न्यायाधीशों को अमूमन अवकाश प्राप्ति की आयु से पहले नहीं हटाया जाता।
(ग) उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का तबादला दूसरे उच्च न्यायालय में नहीं किया जा सकता।
(घ) न्यायाधीशों की नियुक्ति में संसद की दखल नहीं है।
उत्तर:
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित तरीके हैं।

  1. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में सलाह ली जाती है। सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश अन्य चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों की सलाह से कुछ नाम प्रस्तावित करता है और इसी में से राष्ट्रपति नियुक्तियाँ करेगा। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने नियुक्तियों की सलाह देने में सामूहिकता का सिद्धान्त प्रतिपादित कर न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को सुनिश्चित किया है।
  2. न्यायाधीशों को अमूमन अवकाश प्राप्ति की आयु से पहले नहीं हटाया जाता उन्हें कार्यकाल की सुरक्षा प्राप्त है।
  3. न्यायाधीशों की नियुक्ति में संसद का दखल नहीं है। इससे यह सुनिश्चित किया गया है कि न्यायाधीशों की नियुक्तियों में दलगत राजनीति का दखल न हो।
  4. न्यायपालिका, व्यवस्थापिका या कार्यपालिका पर वित्तीय रूप से निर्भर नहीं है।
  5. न्यायाधीशों के कार्यों और निर्णयों की आलोचना नहीं की जा सकती न्यायालय की अवमानना का दोषी पाए जाने पर न्यायपालिका को उसे दण्डित करने का अधिकार है। इससे न्यायपालिका आलोचना के भय से मुक्त होकर स्वतन्त्र रूप से निर्णय करती है। प्रश्न के अन्दर दिये गए बिन्दुओं में जो बेमेल है, वह है- (ग) एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का तबादला दूसरे उच्च न्यायालय में नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 2.
क्या न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ यह है कि न्यायपालिका किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है। अपना उत्तर अधिकतम 100 शब्दों में लिखें।
उत्तर:
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का यह अर्थ कदापि नहीं है कि न्यायपालिका किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है। देश की न्यायपालिका अपने कार्यों के लिए देश के संविधान, लोकतान्त्रिक परम्परा और नागरिकों के प्रति जवाबदेह है। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ उसे निरंकुश बनाना नहीं है, बल्कि उसे बिना किसी भय तथा दलगत राजनीति के दुष्प्रभावों से दूर रखने का प्रयास करना है। इसी दृष्टि से भारत की न्यायपालिका विधायिका या कार्यपालिका पर वित्तीय रूप से निर्भर नहीं है। उसका कार्यकाल अमूमन अवकाश प्राप्ति की आयु तक सुनिश्चित किया गया है तथा उसे आलोचना के भय से मुक्त रखा गया है; ताकि वह निष्पक्ष तथा स्वतन्त्र होकर अपने निर्णय कर सके। हैं?

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प्रश्न 3.
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को बनाए रखने के लिए संविधान के विभिन्न प्रावधान कौन-कौनसे
उत्तर:
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के प्रावधान: न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को बनाए रखने के लिए संविधान में अग्रलिखित प्रावधान किये गये हैं।

1. न्यायाधीशों की नियुक्ति: न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में विधायिका को सम्मिलित नहीं किया गया है। इससे यह सुनिश्चित किया गया है कि इन नियुक्तियों में दलगत राजनीति की कोई भूमिका न रहे। दूसरे, न्यायाधीशों की नियुक्ति में उसकी योग्यता व विशेषता को आधार बनाया गया है। न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए किसी व्यक्ति को वकालत का अनुभव या कानून का विशेषज्ञ होना चाहिए। उसमें संविधान के प्रति निष्ठा तथा ईमानदारी की भावना होनी चाहिए। उस व्यक्ति के राजनीतिक विचार या निष्ठाएँ उसकी नियुक्ति का आधार नहीं बनायी गयी हैं।

2. न्यायाधीशों की नियुक्ति का तरीका: भारतीय संविधान में न्यायाधीशों की नियुक्ति कार्यपालिका द्वारा किये जाने का प्रावधान है क्योंकि यह पद्धति जनता द्वारा नियुक्ति या विधायिका द्वारा नियुक्ति की तुलना में श्रेष्ठ है। इसके लिए यह प्रस्तावित किया गया है कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जायेगी। साथ ही यह कहा गया है कि कार्यपालिका, न्यायाधीशों की नियुक्ति निर्धारित योग्यता के अनुसार करेगी।
वर्तमान में न्यायपालिका में कार्यपालिका के हस्तक्षेप को दूर करने तथा स्वतन्त्रता को सुनिश्चित करने की दृष्टि से सामूहिकता के सिद्धान्त को स्थापित किया गया है।

कि अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश की सलाह को माने, इस हेतु यह व्यवस्था की गई है कि सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश अन्य चार वरिष्ठतम न्ययाधीशों की सलाह से नाम प्रस्तावित करेगा और इसी में से राष्ट्रपति नियुक्तियाँ करेगा। इस तरह न्यायपालिका की नियुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय और मन्त्रिपरिषद् दोनों महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

3. न्यायाधीशों का लम्बा कार्यकाल: संविधान में न्यायाधीशों का लम्बा कार्यकाल रखा गया है अर्थात् न्यायाधीश अमूमन अवकाश प्राप्ति की आयु (65 वर्ष की आयु) तक अपने पद पर बने रहते हैं। केवल अपवादस्वरूप विशेष स्थितियों में ही न्यायाधीशों को अवकाश प्राप्ति की आयु से पूर्व हटाया जा सकता है। संविधान में न्यायाधीशों को हटाने के लिए बहुत कठिन प्रक्रिया निर्धारित की गई है। संविधान निर्माताओं का मानना था कि हटाने की प्रक्रिया कठिन हो तो न्यायपालिका के सदस्यों का पद सुरक्षित रहेगा।

4. वित्तीय रूप से निर्भरता नहीं: न्यायपालिका विधायिका या कार्यपालिका पर वित्तीय रूप से निर्भर नहीं है। संविधान के अनुसार न्यायाधीशों के वेतन और भत्तों के लिए विधायिका की स्वीकृति नहीं ली जायेगी।

5. आलोचना के भय से मुक्ति: न्यायाधीशों के कार्यों और निर्णयों की व्यक्तिगत आलोचना नहीं की जा सकती। अगर कोई न्यायालय की अवमानना का दोषी पाया जाता है, तो न्यायपालिका को उसे दण्डित करने का अधिकार है। इस अधिकार के कारण कोई उनकी नाजायज आलोचना नहीं कर सकेगा। संसद न्यायाधीशों के आचरण पर केवल तभी चर्चा कर सकती है, जब वह उनको हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा कर रही हो। इससे न्यायपालिका आलोचना के भय से मुक्त होकर स्वतन्त्र रूप से निर्णय करती है।

प्रश्न 4.
नीचे दी गई समाचार रिपोर्ट पढ़ें और उनमें निम्नलिखित पहलुओं की पहचान करें।
(क) मामला किस बारे में है?
(ख) इस मामले में लाभार्थी कौन है?
(ग) इस मामले में फरियादी कौन है?
(घ) सोचकर बताएँ कि कम्पनी की तरफ से कौन-कौनसे तर्क दिये जायेंगे?
(ङ) किसानों की तरफ से कौन-कौनसे तर्क दिये जायेंगे?
सर्वोच्च न्यायालय ने रिलायंस से दहानु के किसानों को 300 करोड़ रुपये देने को कहा – निजी कारपोरेट ब्यूरो, 24 मार्च, 2005।

मुम्बई: सर्वोच्च न्यायालय ने रिलायंस एनर्जी से मुम्बई के बाहरी इलाके दहानु में चीकू फल उगाने वाले किसानों को 300 करोड़ रुपये देने के लिए कहा है। चीकू उत्पादक किसानों ने अदालत में रिलायंस के ताप – ऊर्जा संयन्त्र से होने वाले प्रदूषण के विरुद्ध अर्जी दी थी। अदालत ने इसी मामले में अपना फैसला सुनाया।दहानु मुम्बई से 150 किमी. दूर है।

एक दशक पहले तक इस इलाके की अर्थव्यवस्था खेती और बागवानी के बूते आत्मनिर्भर थी और दहानु की प्रसिद्धि यहाँ के मछली – पालन और जंगलों के कारण थी। सन् 1989 में इस इलाके में ताप-ऊर्जा संयन्त्र चालू हुआ और इसी के साथ हुई इस इलाके की बर्बादी। अगले साल इस उपजाऊ क्षेत्र की फसल पहली दफा मारी गयी। कभी महाराष्ट्र के लिए फलों का टोकरा रहे दहानु की अब 70 प्रतिशत फसल समाप्त हो चुकी है।

मछली: पालन बन्द हो गया है और जंगल विरल होने लगे हैं। किसानों और पर्यावरणविदों का कहना है कि ऊर्जा संयन्त्र से निकलने वाली राख भूमिगत जल में प्रवेश कर जाती है और पूरा पारिस्थितिकी तन्त्र प्रदूषित हो जाता है। दहानु तालुका पर्यावरण सुरक्षा प्राधिकरण ने ताप – ऊर्जा संयन्त्र को प्रदूषण नियन्त्रण की इकाई स्थापित करने का आदेश दिया था ताकि सल्फर का उत्सर्जन कम हो सकें। सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्राधिकरण के पक्ष में अपना फैसला सुनाया था। इसके बावजूद सन् 2002 तक प्रदूषण नियन्त्रण का संयन्त्र स्थापित नहीं हुआ।

सन् 2003 में रिलायंस ने ताप-ऊर्जा संयन्त्र को हासिल किया और सन् 2004 में उसने प्रदूषण नियन्त्रण संयन्त्र लगाने की योजना के बारे में एक खाका प्रस्तुत किया। प्रदूषण नियन्त्रण संयन्त्र चूँकि अब भी स्थापित नहीं हुआ था, इसलिए दहानु तालुका पर्यावरण सुरक्षा प्राधिकरण ने रिलायन्स से 300 करोड़ रुपये की बैंक गारण्टी देने को कहा।
उत्तर:
(क) यह मामला रिलायन्स ताप – ऊर्जा संयन्त्र द्वारा प्रदूषण के विषय का विवाद है।
(ख) इस मामले में किसान लाभार्थी हैं।
(ग) इस मामले में किसान, पर्यावरणविद् तथा दहानु तालुका पर्यावरण सुरक्षा प्राधिकरण प्रार्थी/फरियादी हैं।
(घ) कम्पनी द्वारा उस क्षेत्र के लोगों के लिए ताप: ऊर्जा संयन्त्र के द्वारा होने वाले लाभों का तर्क दिया जायेगा। क्षेत्र में ऊर्जा की कमी नहीं रहेगी ऐसा आश्वासन दिया जायेगा।
(ङ) किसानों की तरफ से यह तर्क दिया जायेगा कि ताप: ऊर्जा संयन्त्र के कारण न केवल उनकी चीकू की फसलें बरबाद हुई हैं वरन् उनका मछली – पालन का कारोबार भी ठप पड़ गया है। क्षेत्र के लोग बेरोजगार हो गये हैं

प्रश्न 5.
नीचे की समाचार रिपोर्ट पढ़ें और चिन्हित करें कि रिपोर्ट में किस-किस स्तर की सरकार सक्रिय दिखाई देती है।
(क) सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका की निशानदेही करें।
(ख) कार्यपालिका और न्यायपालिका के कामकाज की कौनसी बातें आप इसमें पहचान सकते हैं?
(ग) इस प्रकरण से सम्बद्ध नीतिगत मुद्दे, कानून बनाने से सम्बन्धित बातें, क्रियान्वयन तथा कानून की व्याख्या से जुड़ी बातों की पहचान करें।

सीएनजी – मुद्दे पर केन्द्र और दिल्ली सरकार एक साथ
(स्टाफ रिपोर्टर, द हिन्दू, सितम्बर 23, 2001)

राजधानी के सभी गैर- सीएनजी व्यावसायिक वाहनों को यातायात से बाहर करने के लिए केन्द्र और दिल्ली सरकार संयुक्त रूप से सर्वोच्च न्यायालय का सहारा लेंगे। दोनों ‘सरकारों’ में इस बात की सहमति हुई है। दिल्ली और केन्द्र की सरकार ने पूरी परिवहन व्यवस्था को एकल ईंधन प्रणाली से चलाने के बजाय दोहरी ईंधन प्रणाली से चलाने के बारे में नीति बनाने का फैसला किया है क्योंकि एकल ईंधन प्रणाली खतरों से भरी है और इसके परिणामस्वरूप विनाश हो सकता है।

राजधानी के निजी वाहन धारकों द्वारा सीएनजी के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने का भी फैसला किया गया है। दोनों सरकारें राजधानी में 0.05 प्रतिशत निम्न सल्फर डीजल से बसों को चलाने की अनुमति देने के बारे में दबाव डालेगी। इसके अतिरिक्त अदालत से कहा जायेगा कि जो व्यावसायिक वाहन यूरो- दो मानक को पूरा करते हैं, उन्हें महानगर में चलने की अनुमति दी जाए। हालांकि केन्द्र और दिल्ली सरकार अलग-अलग हलफनामा दायर करेंगे इनमें समान बिन्दुओं को उठाया जायेगा। केन्द्र सरकार सीएनजी के मसले पर दिल्ली सरकार के पक्ष को अपना समर्थन देगी।

दिल्ली की मुख्यमन्त्री शीला दीक्षित और केन्द्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मन्त्री श्रीराम नाईक के बीच हुई बैठक में ये फैसले किये गये। श्रीमती शीला दीक्षित ने कहा कि केन्द्र सरकार अदालत से विनती करेगी कि डॉ. आर. ए. मशेलकर की अगुआई में गठित उच्चस्तरीय समिति को ध्यान में रखते हुए अदालत बसों को सीएनजी में बदलने की आखिरी तारीख आगे बढ़ा दे क्योंकि 10,000 बसों को निर्धारित समय में सीएनजी में बदल पाना असम्भव है। डॉ. मशेलकर की अध्यक्षता में गठित समिति पूरे देश की ऑटो ईंधन नीति का सुझाव देगी। उम्मीद है समिति छ: माह में अपनी रिपोर्ट पेश करेगी।

मुख्यमन्त्री ने कहा कि अदालत के निर्देशों पर अमल करने के लिए समय की जरूरत है। इस मामले पर समग्र दृष्टि अपनाने की बात कहते हुए श्रीमती दीक्षित ने बताया- सीएनजी से चलने वाले वाहनों की संख्या, सीएनजी की आपूर्ति करने वाले स्टेशनों पर लगी लम्बी कतार की समाप्ति, दिल्ली के लिए पर्याप्त मात्रा में सीएनजी ईंधन जुटाने तथा अदालत के निर्देशों को अमल में लाने के तरीकों और साधनों पर एक-साथ ध्यान दिया जायेगा।’

सर्वोच्च न्यायालय ने सीएनजी के अतिरिक्त किसी अन्य ईंधन से महानगर में बसों को चलाने की अपनी मनाही में छूट देने से इनकार कर दिया था लेकिन अदालत का कहना था कि टैक्सी और ऑटो-रिक्शा के लिए भी सिर्फ सीएनजी इस्तेमाल किया जाए, इस बात पर उसने कभी जोर नहीं डाला। श्री राम नाईक का कहना था कि केन्द्र सरकार सल्फर की कम मात्रा वाले डीजल से बसों को चलाने की अनुमति देने के बारे में अदालत से कहेगी, क्योंकिपूरी यातायात व्यवस्था को सीएनजी पर निर्भर बनाना खतरनाक हो सकता है। राजधानी में सीएनजी की आपूर्ति पाइपलाइन के जरिए होती है और इसमें किसी किस्म की बाधा आने पर पूरी सार्वजनिक यातायात प्रणाली अस्त-व्यस्त हो जाएगी।
उत्तर:
इस समाचार रिपोर्ट में दो सरकारें संयुक्त रूप से एक समस्या को सुलझाने के लिए सक्रिय दिखाई देती हैं। ये हैं।

  1. भारत सरकार (संघ सरकार)
  2. दिल्ली सरकार (प्रान्तीय सरकार)

(क) सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका प्रदूषण से बचने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया था कि राजधानी में सरकारी तथा निजी दोनों प्रकार की बसों में सी. एन. जी. का प्रयोग एक निश्चित तिथि तक होने लगे । इस सम्बन्ध में दिल्ली सरकार ने अदालत से यह विनती की कि अदालत के निर्देश पर अमल करने के लिए समय की छूट की आवश्यकता है। उच्चतम न्यायालय ने सिटी बसों को महानगर में सीएनजी के प्रयोग से छूट देने को मना किया परन्तु यह भी कहा कि उसने टैक्सी और ऑटो रिक्शा के लिए कभी सीएनजी के लिए दबाव नहीं डाला।

(ख) इस रिपोर्ट में कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों ही शहर बढ़ते प्रदूषण को रोकने में प्रयासरत हैं। कार्यपालिका ने इस सम्बन्ध में दिल्ली में पूरी परिवहन व्यवस्था को एकल ईंधन प्रणाली से चलाने के बजाय दोहरी ईंधन प्रणाली से चलाने के बारे में नीति बनाने का फैसला लिया क्योंकि एकल ईंधन प्रणाली खतरों से भरी है और इसके परिणामस्वरूप विनाश हो सकता है। न्यायपालिका ने इस सम्बन्ध में यह निर्णय दिया कि दोहरी ईंधन प्रणाली को सभी प्रकार के वाहनों के लिए स्वतन्त्र नहीं छोड़ा जा सकता। महानगर में सिटी बसें तो सीएनजी से ही चलायी जायेंगी, लेकिन टैक्सी और ऑटो- रिक्शा के लिए सीएनजी या डीजल किसी का भी उपयोग किया जा सकता है।

(ग) इस प्रकरण में नीतिगत मुद्दा प्रदूषण हटाना है। सभी व्यावसायिक वाहनों जो यूरो-2 मानक को पूरा करते हैं, उन्हें शहर में चलाने की अनुमति दी जाये। सरकार यह भी चाहती है कि समय-सीमा बढ़ाई जाये क्योंकि 10,000 बसों के बेड़े को निश्चित समय में सीएनजी में परिवर्तित करना सम्भव नहीं है। यह कानून बनाने और उसके क्रियान्वयन से जुड़ा प्रश्न है। न्यायालय का यह कहना है कि टैक्सी और ऑटो-रिक्शा के लिए सिर्फ सीएनजी का इस्तेमाल किया जाये, इस बात पर उसने कभी जोर नहीं डाला; कानून की व्याख्या से सम्बन्धित कथन है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 6 न्यायपालिका

प्रश्न 6.
निम्नलिखित कथन इक्वाडोर के बारे में है। इस उदाहरण और भारत की न्यायपालिका के बीच आप क्या समानता अथवा असमानता पाते हैं? सामान्य कानूनों की कोई संहिता अथवा पहले सुनाया गया कोई न्यायिक फैसला मौजूद होता तो पत्रकार के अधिकारों को स्पष्ट करने में मदद मिल सकती थी। दुर्भाग्य से इक्वाडोर की अदालत इस नीति से काम नहीं करती। पिछले मामलों में उच्चतर अदालत के न्यायाधीशों ने जो फैसले दिये हैं उन्हें कोई न्यायाधीश उदाहरण के रूप में मानने के लिए बाध्य नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका के विपरीत इक्वाडोर (अथवा दक्षिण अमेरिका में किसी और देश) में जिस न्यायाधीश के सामने अपील की गई है, उसे अपना फैसला और उसका कानूनी आधार लिखित रूप में नहीं देना होता। कोई न्यायाधीश आज एक मामले में कोई फैसला सुनाकर कल उसी मामले में दूसरा फैसला दे सकता है और इसमें उसे यह बताने की जरूरत नहीं कि वह ऐसा क्यों कर रहा है।
उत्तर:
इस उदाहरण और भारत की न्याय व्यवस्था में कोई समानता नहीं है। यथा
1. भारत में न्यायिक निर्णय आधुनिक काल में कानून के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के निर्णय दूसरे न्यायालयों में उदाहरण बन जाते हैं और पूर्व के निर्णय के आधार पर निर्णय दिये जाने लगते हैं। और इन पूर्व के निर्णयों को उसी प्रकार की मान्यता होती है, जैसे कि संसद द्वारा बनाए गए कानूनों की। उपर्युक्त उदाहरण में इक्वाडोर के न्यायालय में इस प्रकार से कार्य नहीं किया जाता। वहाँ पर न्यायालयों के पूर्व निर्णयों को आधार बनाकर निर्णय नहीं दिये जाते।

2. भारत के न्यायालय में न्यायाधीशों को अपना फ़ैसला और उसका कानूनी आधार लिखित रूप में देना होता है, जिससे एक-समान विवादों के निर्णयों में भी प्रायः समानता बनी रहती है और यदि कभी असमानता आती है तो उसके आधार का भी उल्लेख करना पड़ता है दूसरी तरफ इक्वाडोर के न्यायाधीश को अपना फैसला और उसका कानूनी आधार लिखित रूप में नहीं देना होता। इसलिए एक समान विवादों में भी निर्णयों में अन्तर आता रहता है। यहाँ तक कि वहाँ कोई न्यायाधीश आज एक मामले में कोई फैसला सुनाता है और वही न्यायाधीश दूसरे दिन उसी मामले में दूसरा फैसला दे सकता है। इसमें उसे यह बताने की आवश्यकता नहीं होती कि वह ऐसा क्यों कर रहा है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित कथनों को पढ़िये और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अमल में लाये जाने वाले विभिन्न क्षेत्राधिकार; मसलन मूल, अपीली और सलाहकारी से इनका मिलान कीजिए।
(क) सरकार जानना चाहती थी कि क्या वह पाकिस्तान अधिग्रहीत जम्मू-कश्मीर के निवासियों की नागरिकता के सम्बन्ध में कानून पारित कर सकती है।
(ख) कावेरी नदी के जल विवाद के समाधान के लिए तमिलनाडु सरकार अदालत की शरण लेना चाहती है।
(ग) बाँध स्थल से हटाये जाने के विरुद्ध लोगों द्वारा की गई अपील को अदालत ने ठुकरा दिया।
उत्तर:
(क) मौलिक क्षेत्राधिकार: प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार का आरम्भ उन विवादों से है जो उच्चतम न्यायालय में सीधे तौर पर लिये जाते हैं। ऐसे विवादों को पहले निचली अदालतों में सुनवाई के लिए नहीं लिया जा सकता है। ऐसे विवाद केन्द्र और राज्यों बीच या विभिन्न राज्यों के बीच उठे विवाद होते हैं। अपने इस क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर सर्वोच्च न्यायालय न केवल विवादों को सुलझाता है बल्कि संविधान में की गई संघ और राज्य सरकार की शक्तियों की व्याख्या भी करता है।

(ख) अपीलीय क्षेत्राधिकार: अपीलीय क्षेत्राधिकार से अभिप्राय है कि वे विवाद जो किसी उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में पाये जा सकते हैं।

(ग) सलाहकारी क्षेत्राधिकार: सलाहकारी क्षेत्राधिकार वह है जिसमें राष्ट्रपति किसी विवाद के बारे में उच्चतम न्यायालय से परामर्श माँगता है। उच्चतम न्यायालय चाहे तो परामर्श दे सकता है और चाहे तो मना कर सकता है। राष्ट्रपति भी उच्चतम न्यायालय के परामर्श को मानने के लिए बाध्य नहीं है।

प्रश्न में दिये गये कथनों को विभिन्न क्षेत्राधिकारों से निम्न प्रकार मिलान किया जा सकता हैहै।
(क) ‘सरकार जानना …………….. कर सकती है।
उत्तर:
परामर्शदात्री ( सलाहकारी) क्षेत्राधिकार।

(ख) ‘कावेरी नदी के……………….. लेना चाहती है।’
उत्तर:
मौलिक क्षेत्राधिकार।

(ग) बाँध स्थल से ………………..ठुकरा दिया।
उत्तर:
अपीलीय क्षेत्राधिकार।

प्रश्न 8.
जनहित याचिका किस तरह गरीबों की मदद कर सकती है?
उत्तर:
सन् 1980 के बाद जनहित याचिकाओं और न्यायिक सक्रियता के द्वारा न्यायपालिका ने उन मामलों में भी रुचि दिखाई है जहाँ समाज के कुछ वर्गों के लोग अर्थात् गरीब लोग आसानी से अदालत की शरण नहीं ले सकते। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए न्यायालय ने जन सेवा की भावना से भरे नागरिक, सामाजिक संगठन और वकीलों को समाज के जरूरतमंद और गरीब लोगों की ओर से याचिकाएँ दायर करने की इजाजत दी है। इससे ऐसे मुकदमों की संख्या में वृद्धि हुई है जिनमें जन सेवा की भावना रखने वाले नागरिकों ने गरीबों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए जनहित याचिका दायर कर न्यायपालिका से हस्तक्षेप की माँग की।

गरीबों का जीवन सुधारने के लिए, गरीब व्यक्तियों के अधिकारों की पूर्ति करने के लिए, शोषण के विरुद्ध अपराध को अर्थपूर्ण बनाने के लिए – बंधुआ मजदूरों की मुक्ति तथा लड़कियों से देह व्यापार कराने को रोकने आदि अनेक प्रकार के शोषण को रोकने के लिए, गरीब व्यक्तियों की उत्पीड़न की समस्याओं से छुटकारा दिलवाने के लिए स्वयंसेवी संगठन जनहित याचिकाओं के द्वारा न्यायालय से हस्तक्षेप की माँग कर सकते हैं। न्यायालय इन शिकायतों को आधार बनाकर उन पर विचार शुरू करता है और पीड़ित व्यक्तियों को शोषण से छुटकारा दिलाता है।

इन जनहित याचिकाओं के प्रचलन से यद्यपि न्यायालयों पर कार्यों का बोझ बढ़ा है, परन्तु इनसे गरीब लोगों को लाभ पहुँचा है। इसने न्याय व्यवस्था को लोकतान्त्रिक बनाया है। इससे कार्यपालिका जवाबदेह बनने पर बाध्य हुई है। अनेक बन्धुआ मजदूरों को शोषण से बचाया गया है तथा खतरनाक कामों में बाल-श्रम पर प्रतिबन्ध लगाया गया है।

प्रश्न 9.
क्या आप मानते हैं कि न्यायिक सक्रियता से न्यायपालिका और कार्यपालिका में विरोध पनप सकता है? क्यों?
उत्तर:
हाँ, मैं यह मानता हूँ कि न्यायिक सक्रियता से न्यायपालिका और कार्यपालिका में विरोध पनप सकता है। न्यायिक सक्रियता कार्यपालिका को उत्तरदायी बनाने के लिए बाध्य करती है। न्यायिक सक्रियता के कारण ही जो विषय पहले न्यायिक पुनरावलोकन के दायरे में नहीं थे, उन्हें भी अब इस दायरे में ले लिया गया है, जैसे राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियाँ। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें सर्वोच्च न्यायालय ने न्याय की स्थापना के लिए कार्यपालिका की संस्थाओं को निर्देश दिये हैं, जैसे उसने हवाला मामले, नरसिंहराव मामले और पैट्रोल पम्पों के अवैध आबण्टन जैसे अनेक मामलों सी.बी.आई. को निर्देश दिया कि वह राजनेताओं और नौकरशाहों के विरुद्ध जाँच करे।

भारतीय संविधान शक्ति के सीमित बँटवारे तथा अवरोध और सन्तुलन के एक महीन सिद्धान्त पर आधारित है। अर्थात् सरकार के प्रत्येक अंग का एक स्पष्ट कार्यक्षेत्र है। संसद कानून बनाने और संविधान का संशोधन करने में सर्वोच्च है, कार्यपालिका उन्हें लागू करने तथा न्यायपालिका विवादों को सुलझाने तथा कानून की व्याख्या करने में सर्वोच्च है। ऐसी स्थिति में यदि न्यायपालिका कानूनों को लागू करने के कार्यपालिका के काम में हस्तक्षेप करेगी तो दोनों में विरोध पनप सकता है।

दूसरे, न्यायपालिका के अपने कार्य ही बहुत हैं। उसके समक्ष न्याय हेतु विवादों का हल के लिए अंबार लगा हुआ है। यदि न्यायपालिका न्यायिक सक्रियता के माध्यम से कार्यपालिका के कामों में दखलंदाजी देगी तो वह उन समस्याओं में उलझ जायेगी जो कार्यपालिका को हल करने चाहिए। इससे शक्ति विभाजन के बीच का अन्तर धुँधला जायेगा और परस्पर टकराव बढ़ेगा।

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प्रश्न 10.
न्यायिक सक्रियता मौलिक अधिकारों की सुरक्षा से किस रूप में जुड़ी है? क्या इससे मौलिक अधिकारों के विषय क्षेत्र को बढ़ाने में मदद मिली है?
उत्तर:
संविधान ने न्यायपालिका को मौलिक अधिकारों की रक्षा करने का दायित्व सौंपा है। सर्वोच्च न्यायालय अनेक रिटों के माध्यम से तथा न्यायिक पुनरावलोकन के माध्यम से मौलिक अधिकारों की रक्षा का कार्य करता है। मूल अधिकारों के विपरीत होने पर सर्वोच्च न्यायालय किसी भी कानून को निरस्त कर सकता है। सामान्य रूप से किसी व्यक्ति के मूल अधिकार के उल्लंघन होने पर वह पीड़ित व्यक्ति ही अपने अधिकार की सुरक्षा के लिए न्यायालय में याचिका प्रस्तुत कर सकता है। लेकिन न्यायिक सक्रियता ने इस स्थिति के विषय – क्षेत्र को निम्न रूपों में बढ़ा दिया है।

1. न्यायिक सक्रियता के चलते न्यायालय ने एक ऐसे मुकदमे की सुनवाई करने का निर्णय लिया जो पीड़ित लोगों की ओर से दूसरों ने उसके अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय में प्रार्थना दी हो। ऐसी प्रार्थनाओं को जनहित याचिकाएँ कहा गया। इसी सन्दर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने कैदियों के अधिकारों से सम्बन्धित मुकदमे पर विचार किया । इससे ऐसे मुकदमों की बाढ़-सी आ गई जिसमें जन सेवा की भावना रखने वाले नागरिकों तथा स्वयंसेवी संगठनों ने अधिकारों की रक्षा से जुड़े अनेक मुद्दों पर न्यायपालिका से हस्तक्षेप की माँग की ।

2. न्यायिक सक्रियता के अन्तर्गत ही न्यायपालिका ने अखबार में छपी खबरों और डाक से प्राप्त शिकायतों को आधार बनाकर उन पर भी विचार करना शुरू कर दिया। न्यायपालिका ने उन मामलों में भी रुचि दिखाई जहाँ समाज के कुछ वर्गों के लोग आसानी से अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत की शरण नहीं ले सकते थे। इसने शोषण के विरुद्ध अधिकार को अर्थपूर्ण बना दिया क्योंकि बन्धुआ मजदूरों के अधिकारों की रक्षा करना अब सम्भव हो गया।

इस प्रकार न्यायिक सक्रियता के तहत जनहित याचिकाओं तथा न्यायपालिका की स्वयं की सक्रियता से न्यायालय के अधिकारों का दायरा बढ़ा दिया है। शुद्ध हवा, पानी और अच्छा जीवन पाना पूरे समाज का अधिकार है। न्यायालय का मानना था कि समाज के सदस्य के रूप में, अधिकारों के उल्लंघन पर व्यक्तियों को इन्साफ की गुहार लगाने का अधिकार। इस प्रकार न्यायिक सक्रियता से मौलिक अधिकारों के विषयक्षेत्र को बढ़ाने में मदद मिली है।

न्यायपालिका JAC Class 11 Political Science Notes

→ परिचय: हमें स्वतन्त्र न्यायपालिका क्यों चाहिए कानून के शासन की रक्षा और कानून की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करने, व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करने, विवादों को कानून के अनुसार हल करने, तानाशाही को रोकने के लिए हमें राजनीतिक दबाव से मुक्त स्वतन्त्र न्यायपालिका चाहिए।

→ न्यायपालिका की स्वतन्त्रता से आशय: न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ है कि सरकार के अन्य दो अंग- विधायिका और कार्यपालिका—उसके कार्यों में किसी प्रकार की बाधा न पहुँचाएँ ताकि वे ठीक ढंग से न्याय कर सकें; वे अंग न्यायपालिका के निर्णयों में हस्तक्षेप न करें तथा न्यायाधीश बिना किसी भय तथा भेदभाव के अपना कार्य कर सकें । न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ स्वेच्छाचारिता या उत्तरदायित्व का अभाव नहीं है क्योंकि न्यायपालिका देश के संविधान, लोकतांत्रिक परम्परा और जनता के प्रति जवाबदेह है।

→ भारतीय संविधान ने किन उपायों द्वारा न्यायपालिका की स्वतन्त्रता सुनिश्चित की है? भारतीय संविधान ने अनेक उपायों द्वारा न्यायपालिका की स्वतन्त्रता सुनिश्चित की है।

  • न्यायाधीशों की नियुक्तियों के मामले में विधायिका को सम्मिलित नहीं किया गया है।
  • न्यायाधीशों का कार्यकाल निश्चित होता है।
  • न्यायाधीशों की पदच्युति की कठिन प्रक्रिया।
  • न्यायपालिका विधायिका या कार्यपालिका पर वित्तीय रूप से निर्भर नहीं है।
  • न्यायाधीशों के कार्यों और निर्णयों की व्यक्तिगत आलोचना नहीं की जा सकती।

→ न्यायाधीशों की नियुक्ति: भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। इसमें यह परम्परा है कि सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश को इस पद पर नियुक्त किया जायेगा। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश की सलाह से करता है। वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय ने इस सम्बन्ध में सामूहिकता का सिद्धान्त स्थापित किया है। इसके तहत सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश अन्य चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों की सलाह से कुछ नाम प्रस्तावित करेगा और इसी में से राष्ट्रपति नियुक्तियाँ करेगा। इस प्रकार न्यायपालिका की नियुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय और मन्त्रिपरिषद् महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

→ न्यायाधीशों को पद से हटाना: कदाचार साबित होने अथवा अयोग्यता के आधार पर महाभियोग द्वारा संसद किसी न्यायाधीश को उसके पद से हटा सकती है। लेकिन यह एक कठिन प्रक्रिया है क्योंकि उसके लिए दोनों सदनों से पृथक्-पृथक् उपस्थित 2/3 बहुमत तथा कुल सदस्य संख्या के बहुमत से महाभियोग का प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है।

→ न्यायपालिका की संरचना
भारतीय संविधान एकीकृत न्यायिक व्यवस्था की स्थापना करता है। भारत में न्यायपालिका की संरचना पिरामिड की तरह है। सबसे ऊपर सर्वोच्च न्यायालय, फिर उच्च न्यायालय तथा सबसे नीचे जिला और अधीनस्थ न्यायालय हैं। यथा-
JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 संविधान - क्यों और कैसे 2

→ भारत के सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार: भारत के सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार इस प्रकार है।

  • मौलिक क्षेत्राधिकार: संघ और राज्यों के बीच तथा विभिन्न राज्यों के बीच आपसी विवादों का निपटारा।
  • रिट सम्बन्धी क्षेत्राधिकार: व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए बन्दी – प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेध – आदेश, उत्प्रेषण लेख तथा अधिकार – पृच्छा जारी करने का अधिकार।
  • अपीलीय क्षेत्राधिकार: दीवानी, फौजदारी तथा संवैधानिक सवालों से जुड़े अधीनस्थ न्यायालयों के मुकदमों की अपील पर सुनवाई करना; भारतीय भू-भाग की किसी अदालत द्वारा पारित मामले या दिए गए फैसले पर स्पेशल लीव पिटीशन के तहत की गई अपील पर सुनवाई की शक्ति।
  • सलाहकारी क्षेत्राधिकार: जनहित के मामलों तथा कानून के मसले पर राष्ट्रपति को सलाह देना।

→ न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका।
भारत में न्यायिक सक्रियता का मुख्य साधन जनहित याचिका या सामाजिक व्यवहार याचिका है। कानून की सामान्य प्रक्रिया में कोई व्यक्ति तभी अदालत जा सकता है, जब उसका कोई व्यक्तिगत नुकसान हुआ हो अर्थात् अपने अधिकार का उल्लंघन होने पर या किसी विवाद में फँसने पर कोई व्यक्ति न्याय हेतु न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। लेकिन:

  • 1979 में न्यायालय ने अपने क्षेत्राधिकार को बढ़ाते हुए एक ऐसे मुकदमे की सुनवाई करने का निर्णय लिया जिसे पीड़ित लोगों ने नहीं बल्कि उनकी ओर से दूसरों ने दाखिल किया था; क्योंकि इसमें जनहित से सम्बन्धित एक मुद्दे पर विचार हो रहा था। ऐसे ही अन्य अनेक मुकदमों को जनहित याचिकाओं का नाम दिया गया।
  • न्यायपालिका ने स्वयं प्रसंज्ञान लेते हुए अखबार में छपी खबरों और डाक से प्राप्त शिकायतों को आधार बनाकर उन पर भी विचार करना शुरू कर दिया। न्यायालय की यह नई भूमिका न्यायिक सक्रियता कहलाती है।
  • शुद्ध हवा-पानी और अच्छा जीवन पाना पूरे समाज का अधिकार है, इस आधार पर न्यायालय ने समाज के सदस्य के रूप में इन अधिकारों के उल्लंघन पर व्यक्तियों को न्यायालय में न्याय के लिए याचिका प्रस्तुत करने का अधिकार प्रदान किया।
  • 1980 के बाद न्यायालय ने जनहित याचिकाओं और न्यायिक सक्रियता के द्वारा उन मामलों में भी रुचि दिखाई जहाँ समाज के कुछ वर्गों की पूर्ति के लिए न्यायालय ने जनसेवा की भावना से भरे नागरिक, सामाजिक संगठन और वकीलों को समाज के जरूरतमंद और गरीब लोगों की ओर से याचिकाएँ दायर करने की इजाजत दी।

→ न्यायिक सक्रियता के लाभ:

  • न्यायिक सक्रियता से न केवल व्यक्तियों बल्कि विभिन्न समूहों को भी अदालत जाने का अवसर मिला।
  • इसने न्याय व्यवस्था को लोकतान्त्रिक बनाया और कार्यपालिका उत्तरदायी बनने पर बाध्य हुई|
  • चुनाव प्रणाली को भी इसने ज्यादा मुक्त और निष्पक्ष बनाने का प्रयास किया।

→ न्यायिक सक्रियता के दोष:

  • न्यायिक सक्रियता ने न्यायालयों में काम का बोझ बढ़ाया है।
  • इससे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यों के बीच का अन्तर धुँधला हो गया

→ न्यायपालिका और अधिकार:
संविधान ऐसी दो विधियों का वर्णन करता है जिससे सर्वोच्च न्यायालय अधिकारों की रक्षा कर सके:

  • यह रिट जारी करके मौलिक अधिकारों को फिर से स्थापित कर सकता है।
  • यह किसी कानून को गैर संवैधानिक घोषित कर उसे लागू होने से रोकता है। यह प्रावधान न्यायिक पुनरावलोकन की व्यवस्था करता है।

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→ न्यायिक पुनरावलोकन की व्यवस्था:

  • न्यायिक पुनरावलोकन का अर्थ: न्यायिक पुनरावलोकन का अर्थ है कि सर्वोच्च न्यायालय किसी भी कानून की संवैधानिकता की जाँच कर सकता है और यदि वह कानून संविधान के प्रावधानों के विपरीत हो, तो न्यायालय उसे गैर-संवैधानिक घोषित कर सकता है। (अनु. 13)
  • न्यायिक पुनरावलोकन शक्ति के आधार:
    • भारत में संविधान लिखित है और इसमें दर्ज है कि मूल अधिकारों के विपरीत होने पर सर्वोच्च न्यायालय किसी भी कानून को निरस्त कर सकता है।
    • संघीय सम्बन्धों के मामले में सर्वोच्च न्यायालय अपनी न्यायिक पुनरावलोकन शक्ति का प्रयोग कर सकता है।

→ निष्कर्ष: इससे स्पष्ट होता है कि सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति के द्वारा ऐसे किसी भी कानून का परीक्षण कर सकता है, जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो या संविधान में निहित शक्ति विभाजन की योजना के प्रतिकूल हो। न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति राज्यों की विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों पर भी लागू होती है। जनहित याचिकाओं और न्यायिक सक्रियता ने शोषण के विरुद्ध अधिकार अर्थपूर्ण बना दिया है।

→ न्यायपालिका और संसद:
न्यायपालिका ने जहाँ अधिकार के मुद्दे पर सक्रियता दिखाई है, वहीं राजनैतिक व्यवहार – बर्ताव से संविधान की अनदेखी करने की कार्यपालिका की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया है। इसी के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियों को न्यायपालिका ने अब न्यायिक पुनरावलोकन के दायरे में ले लिया है। ऐसे और भी अनेक उदाहरण हैं जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने न्याय की स्थापना के लिए कार्यपालिका की संस्थाओं को निर्देश दिए। यद्यपि भारत के संविधान में सरकार के तीनों अंगों के बीच कार्य का स्पष्ट विभाजन है, तथापि संसद और न्यायपालिका तथा कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव भारतीय राजनीति की विशेषता रही है। यथा-

  • सम्पत्ति के अधिकार तथा संसद की संविधान संशोधन की शक्ति से सम्बन्धित टकराव – सम्पत्ति के अधिकार और संसद की संविधान को संशोधन करने की शक्ति के सम्बन्ध में संसद और न्यायपालिका के बीच टकराव हुआ। इस टकराव का पटाक्षेप सर्वोच्च न्यायालय में 1973 में केशवानन्द भारती के मुकदमे के निर्णय से हुआ। इसमें न्यायालय ने निर्णय दिया कि
    • संविधान का एक मूल ढाँचा है और संसद सहित कोई भी उस मूल ढाँचे को संशोधित या परिवर्तित नहीं कर सकते।
    • सम्पत्ति का अधिकार संविधान के मूल ढाँचे का भाग नहीं है। इसलिए इस पर समुचित प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है।
    • कोई मुद्दा मूल ढाँचे का हिस्सा है या नहीं, इसका निर्णय न्यायालय करेगा।
  • टकराव के अन्य बिन्दु-दोनों के बीच टकराव के अन्य बिन्दु ये हैं:
    • क्या न्यायपालिका विधायिका की कार्यवाही का नियमन और उसमें हस्तक्षेप कर उसे नियन्त्रित कर सकती
    • जो व्यक्ति विधायिका के विशेषाधिकार हनन का दोषी हो क्या वह न्यायालय की शरण ले सकता है?
    • सदन के किसी सदस्य के विरुद्ध स्वयं सदन द्वारा यदि कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाती है तो क्या वह न्यायालय से सुरक्षा प्राप्त कर सकता है?
    • अनेक अवसरों पर संसद और राज्यों की विधानसभाओं में न्यायपालिका के आचरण पर अंगुली उठायी गई है। इस विवाद का निर्धारण कैसे हो?
    • न्यायपालिका ने भी अनेक अवसरों पर विधायिका की आलोचना की है और उन्हें उनके विधायी कार्यों के सम्बन्ध में निर्देश दिये हैं।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 5 विधायिका

Jharkhand Board JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 5 विधायिका Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 5 विधायिका

Jharkhand Board Class 11 Political Science विधायिका InText Questions and Answers

पृष्ठ 101

प्रश्न 1.
इन समाचारों पर विचार करें और सोचें कि यदि विधायिकाएँ न होतीं, तो क्या होता ? प्रत्येक रिपोर्ट को पढ़ने के बाद बताएँ कि कैसे कार्यपालिका को नियंत्रित करने में विधायिका सफल या असफल रही (क) 28 फरवरी, 2002; केन्द्रीय वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने केन्द्रीय बजट प्रस्तावों में 50 किलोग्राम यूरिया खाद की बोरी की कीमत 12 रुपये बढ़ाने तथा दो अन्य खादों के दाम में भी कुछ वृद्धि करने के प्रस्ताव की ‘घोषणा की। इससे खाद के दामों में 5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यूरिया खाद के वर्तमान मूल्य 4830 रु. प्रति टन पर 80 प्रतिशत सब्सिडी है। 11 मार्च 2002; विपक्ष के जबर्दस्त विरोध के कारण वित्तमंत्री को खाद के दामों में वृद्धि के प्रस्ताव को वापस लेना पड़ा।
उत्तर:
कार्यपालिका को नियंत्रित करने में विधायिका निम्न प्रकार सफल रही। तथा

(ख) 4 जून, 1998 को लोकसभा में यूरिया खाद और पेट्रोलियम पदार्थों के दामों में वृद्धि को लेकर विवादास्पद स्थिति बन गई। पूरे विपक्ष ने सदन से बहिर्गमन किया। इस मुद्दे पर सदन में दो दिनों तक गर्मा-गर्मी रही। वित्त मंत्री ने अपने बजट प्रस्तावों में यूरिया खाद के दामों में मात्र 50 पैसे प्रति किलोग्राम की वृद्धि का प्रस्ताव किया था जिससे उस पर सब्सिडी कम की जा सके। इस विरोध के परिणामस्वरूप, वित्त मंत्री यशवन्त सिन्हा को मूल्य वृद्धि के प्रस्ताव को वापस लेना पड़ा।
उत्तर:
में दिये गये समाचार बजट प्रस्तावों से संबंधित हैं। यह कार्यपालिका पर विधायका के वित्तीय नियंत्रण को स्पष्ट करता है। सरकार के कार्यक्रमों को लागू करने के लिए वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था बजट के द्वारा की जाती है। संसदीय स्वीकृति के लिए बजट बनाना और उसे पेश करना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी के कारण विधायिका को कार्यपालिका के खजाने पर नियंत्रण करने का अवसर मिल जाता है।

लोकहित को देखते हुए सरकार के किसी बजट प्रस्ताव को स्वीकृत करने से विधायिका मना कर सकती है। उपर्युक्त दोनों समाचारों में विधायिका ने बजट प्रस्तावों में यूरिया खाद और पेट्रोलियम के बढ़ाये गये दामों का विरोध किया और इस विरोध के स्वरूप अन्ततः वित्तमंत्री को इन प्रस्तावों को वापस लेना पड़ा। इससे स्पष्ट होता है कि वित्तीय नियंत्रण द्वारा विधायिका सरकार की नीतियों पर भी नियंत्रण करती है।

(ग) 22 फरवरी, 1983; एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए आज लोकसभा ने सर्वसम्मति से सरकारी काम- काज को स्थगित करने तथा असम पर बहस करने को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया। गृहमंत्री पी. सी. सेठी ने बयान दिया ” असम में रहने वाले सभी समुदायों और समूहों के बीच सद्भाव कायम करने के लिए मैं अलग-अलग विचार और नीतियों से प्रतिबद्धता रखने वाले आप सभी सदस्यों का सहयोग चाहता हूँ। यह समय विवाद का नहीं वरन् घाव पर मरहम लगाने का है।”
उत्तर:
स्थगन प्रस्ताव द्वारा नियंत्रण: 22 फरवरी, 1983 के (ग) के अन्तर्गत दिये गये समाचार में स्थगन प्रस्ताव के माध्यम से विधायिका द्वारा कार्यपालिका पर सफल नियंत्रण को दर्शाया गया है। लोकहित के मामले में विधायिका स्थगन प्रस्ताव रखकर के विधायिका में चल रहे किसी कार्य को रोककर उस ‘लोकहित’ के मुद्दे पर विचार करने तथा उस पर ध्यान देने के लिए कार्यपालिका को बाध्य करने का प्रयास करती है।

22 फरवरी, 1983 को जब लोकसभा ने गृहमंत्री के समक्ष स्थगन प्रस्ताव के माध्यम से असम की समस्या पर विचार करने के लिए प्राथमिकता देने का प्रश्न उठाया तो गृहमंत्री ने विधायिका के दबाव को समझते हुए सरकारी कामकाज स्थगित करने और असम पर बहस करने को प्राथमिकता देने की बात को स्वीकार कर लिया । यहाँ विधायिका स्थगन प्रस्ताव के द्वारा कार्यपालिका पर नियंत्रण करने में सफल रही है।

(घ) 3 मार्च, 1985: लोकसभा में कांग्रेस के सदस्यों ने आन्ध्रप्रदेश में हरिजनों (अनुसूचित जाति) के उत्पीड़न के प्रति विरोध जताया।
उत्तर:
ध्यान आकर्षित करना: (घ) में 3 मार्च, 1985 को लोकसभा में कांग्रेस के सदस्यों ने आंध्रप्रदेश में हरिजनों (अनुसूचित जाति के लोगों) के उत्पीड़न के प्रति विरोध जताकर सरकार का ध्यान इस मुद्दे की तरफ आकर्षित किया है। इस प्रकार विधायिका ने विभिन्न रूपों में कार्यपालिका को नियंत्रित किया है नकर लिया। यहाँ विधायिका स्थगन प्रस्ताव के द्वारा कार्यपालिका पर नियंत्रण करने में सफल रही है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 5 विधायिका

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प्रश्न 2.
क्या आप मानते हैं कि राज्यसभा की संरचना ने भारत में राज्यों की स्थिति को संरक्षित किया है?
उत्तर:
यद्यपि भारत में राज्यसभा की संरचना में देश के सभी राज्यों को अमेरिका की तरह समान प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है, बल्कि विभिन्न राज्यों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया गया है। इसके बावजूद राज्यसभा की संरचना ने भारत में राज्यों की स्थिति को संरक्षित किया है। क्योंकि समान प्रतिनिधित्व दिये जाने पर उत्तरप्रदेश और सिक्किम को राज्यसभा में बराबर प्रतिनिधित्व मिलता। इससे छोटे-बड़े राज्यों के साथ न्याय नहीं होता । इस विसंगति से बचने के लिए ही यहाँ ज्यादा जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक और कम जनसंख्या वाले राज्यों को कम प्रतिनिधित्व दिया गया है।

प्रश्न 3.
क्या राज्यसभा के चुनाव अप्रत्यक्ष न होकर प्रत्यक्ष होने चाहिए? इससे क्या फायदा या नुकसान होगा?
उत्तर:
भारत में संघात्मक शासन व्यवस्था स्थापित की गई है। संघात्मक शासन व्यवस्था में विधायिका के दोनों सदनों में प्रथम सदन सीधे जनता का प्रतिनिधित्व करता है और दूसरा सदन राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रकार भारत में राज्य सभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था है। इसका उद्देश्य राज्य के हितों का संरक्षण करना है। इसलिए राज्य के हितों को प्रभावित करने वाला प्रत्येक मुद्दा इसकी सहमति और स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए राज्य सभा के चुनाव अप्रत्यक्ष रखे गये हैं। राज्यसभा के प्रतिनिधि सीधे जनता द्वारा निर्वाचित नहीं होते बल्कि प्रत्येक राज्य की विधानसभा के सदस्य उनका निर्वाचन करते हैं।

  1. यदि राज्य सभा के चुनाव अप्रत्यक्ष न होकर प्रत्यक्ष रूप से होते तो उसके सदस्य अपने आपको राज्य का प्रतिनिधि न समझकर जनता का प्रतिनिधि समझते। ऐसी स्थिति में वे राज्य के हितों के संरक्षण के उद्देश्य से भटक जाते जो कि संघात्मक शासन की महती आवश्यकता है।
  2. यदि राज्य सभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होते तो लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के साथ राज्य सभा के निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन की समस्या आती और दोनों प्रकार के प्रतिनिधि अपने आपको जनप्रतिनिधि समझते। ऐसी स्थिति में दोनों में शक्ति संतुलन स्थापित करने की समस्या पैदा हो जाती।
  3. भारत में संघात्मक व्यवस्था के साथ-साथ संसदात्मक शासन व्यवस्था अपनायी गयी है। संसदात्मक शासन व्यवस्था निम्न सदन जनता का प्रतिनिधित्व करता है और दूसरा सदन राज्यों का तथा वर्गों का। इस दृष्टि से मन्त्रिपरिषद निम्न सदन के प्रति ही उत्तरदायी होती है। यदि राज्य सभा को जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित किया जाता तो उसके सदस्य भी जनता का प्रतिनिधित्व करते तथा मंत्रिपरिषद को उसके प्रति भी उत्तरदायी ठहराना पड़ता। इससे विसंगति पैदा हो जाती।

प्रश्न 4.
1971 की जनगणना से लोकसभा में सीटों की संख्या नहीं बढ़ी है। क्या आप मानते हैं कि इसे बढ़ाना चाहिए? इसके लिए क्या आधार होना चाहिए?
उत्तर;
वर्तमान में लोकसभा के 543 निर्वाचन क्षेत्र हैं। यह संख्या 1971 की जनगणना से चली आ रही है। हमारा मानना है कि लोकसभा की सीटों की संख्या पर्याप्त हैं, इसे और अधिक बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है। इसलिए लोकसभा के चुनावों के लिए पूरे देश को लगभग समान जनसंख्या वाले 543 निर्वाचन क्षेत्रों में बांटकर प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से एक प्रतिनिधि चुने जाने के वर्तमान आधार को ही जारी रखना चाहिए।

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प्रश्न 5.
सरकार से विरोध दर्ज कराने का एक आम तरीका है, सदन से वाकआउट’ करना, क्या यह काम जरूरत से ज्यादा हुआ है?
उत्तर:
‘प्रश्नकाल’ सरकार की कार्यपालिका और प्रशासकीय एजेंसियों पर निगरानी रखने का सबसे प्रभावी तरीका है। इस काल में संसद में अधिकतर प्रश्न लोकहित के विषयों, जैसे मूल्य वृद्धि, अनाज की उपलब्धता, समाज के कमजोर वर्गों के विरुद्ध अत्याचार, दंगे, कालाबाजारी आदि पर सरकार से सूचनाएँ मांगने के लिए होते हैं। इसमें सदस्यों को सरकार की आलोचना करने तथा अपने निर्वाचन क्षेत्र की समस्याओं को उठाने का अवसर मिलता है। प्रश्नकाल के दौरान वाद-विवाद इतने तीखे हो जाते हैं कि अनेक सदस्यों द्वारा अपनी बात रखने के लिए प्राय: सदन से बहिर्गमन करने जैसे कदम उठाये जाते हैं। इसमें सदन का बहुत समय बर्बाद हो जाता है। लेकिन यह कदम सरकार से रियायत प्राप्त।

संजीव पास बुक्स करने के राजनीतिक तरीके हैं और इससे कार्यपालिका का उत्तरदायित्व सुनिश्चित होता है। यह काम संसद में विपक्ष द्वारा उठाये जा रहे लोकहित के मुद्दों से जुड़ा रहा है। जैसे-जैसे देश में समस्याएँ बढ़ी हैं; सरकार जैसे-जैसे उन समस्याओं के प्रति संवेदनहीन हुई है, वैसे-वैसे विधायिका में प्रश्नकाल में ये मुद्दे पुरजोर तरीके से उठे हैं और ‘वाक आउट’ जैसे कदम भी उठे हैं। अतः इन कदमों को जरूरत से ज्यादा नहीं कहा जा सकता। बल्कि यह कहा जा सकता है कि देश में लोकहित सम्बन्धी समस्याएँ बढ़ी हैं, उनको हल करने में सरकार असफल रही है तथा संवेदनहीन हुई है। परिणामतः उसी परिणाम में कार्यपालिका को नियंत्रित करने के लिए ‘वाक आउट’ जैसे कदम बढ़े हैं।

Jharkhand Board Class 11 Political Science विधायिका Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
आलोक मानता है कि किसी देश को कारगर सरकार की जरूरत होती है जो जनता की भलाई करे अतः यदि हम सीधे-सीधे अपना प्रधानमंत्री और मंत्रीगण चुन लें और शासन का काम उन पर छोड़ दें, तो हमें विधायिका की जरूरत नहीं पड़ेगी। क्या आप इससे सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण बताएँ।
उत्तर;
आलोक का यह विचार त्रुटिपरक है। हम इससे सहमत नहीं हैं। क्योंकि यदि आलोक के विचार के हिसाब से मंत्रिपरिषद का गठन किया जाये और विधायिका का गठन नहीं हो, ऐसी स्थिति में कार्यपालिका ही विधायिका का कार्य करेगी। और यदि विधायिका और कार्यपालिका के कार्य एक ही संस्था को दे दिये जाएँ तो कार्यपालिका निरंकुश हो जायेगी । ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री और मंत्रीगण के कार्यों पर किसी का नियंत्रण नहीं रहेगा। इससे नागरिकों की स्वतंत्रता समाप्त हो सकती है। इसलिए कार्यपालिका को निरंकुश होने से रोकने के लिए, नागरिकों की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए विधायिका का होना आवश्यक है।

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प्रश्न 2.
किसी कक्षा में द्वि-सदन प्रणाली के गुणों पर बहस चल रही थी। चर्चा में निम्नलिखित बातें उभरकर सामने आयीं। इन तर्कों को पढ़िये और इनसे अपनी सहमति – असहमति के कारण बताइये।
(क) नेहा ने कहा कि द्विसदनीय प्रणाली से कोई उद्देश्य नहीं सधता।
(ख) शमा का तर्क था कि राज्यसभा में विशेषज्ञों का मनोनयन होना चाहिए।
(ग) त्रिदेव ने कहा कि यदि कोई देश संघीय नहीं है, तो फिर दूसरे सदन की जरूरत नहीं रह जाती।
उत्तर:
(क) नेहा का यह कथन कि द्विसदनीय प्रणाली से कोई उद्देश्य नहीं सधता, सत्य नहीं है क्योंकि भारत जैसे विशाल देश के अन्दर जहाँ अनेक विविधताएँ हैं, 28 राज्य और 7 संघ शासित क्षेत्र हैं; वहाँ पर दूसरा सदन होना ही चाहिए जो इन विभिन्न राज्यों तथा संघ शासित क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कर सके तथा प्रथम सदन द्वारा जल्दबाजी में लिए गए निर्णयों पर पुनर्विचार कर उन्हें यथोचित रूप दे सके।

(ख) शमा का यह कथन कि द्वितीय सदन में विशेषज्ञों को मनोनीत किया जाना चाहिए, उचित है। हमारे देश में राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा में कला, साहित्य, विज्ञान और समाज सेवा के क्षेत्र से जुड़े 12 सदस्यों की नियुक्ति करता है। लेकिन इसके अतिरिक्त राज्यों का प्रतिनिधित्व करने के लिए उस क्षेत्र के निर्वाचित सदस्यों का होना भी आवश्यक है।

(ग) त्रिदेव के इस तर्क से भी कि यदि कोई देश संघीय नहीं है, तो फिर दूसरे सदन की जरूरत नहीं रह जाती, हम सहमत नहीं हैं क्योंकि द्वितीय सदन संघात्मक राज्यों में इकाइयों के प्रतिनिधित्व करने के साथ-साथ वह पुनर्विचार का महत्वपूर्ण कार्य भी करता है। एक सदन द्वारा लिया गया प्रत्येक निर्णय दूसरे सदन में निर्णय के लिए भेजा जाता है। इससे हर मुद्दे को दो बार जांचने का मौका मिलता है। यदि एक सदन जल्दबाजी में कोई निर्णय ले लेता है तो दूसरे सदन में बहस के दौरान उस पर पुनर्विचार संभव हो पाता है।

प्रश्न 3.
लोकसभा कार्यपालिका को राज्यसभा की तुलना में क्यों कारगर ढंग से नियंत्रण में रख सकती है?
उत्तर:
लोकसभा कार्यपालिका पर राज्यसभा की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली ढंग से नियंत्रण रख सकती है क्योंकि।
1. अविश्वास प्रस्ताव;
प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है, राज्यसभा के प्रति नहीं। राज्य सभा मंत्रिपरिषद से प्रश्न पूछ सकती है, लेकिन उसे हटा नहीं सकती; जबकि लोकसभा मंत्रिपरिषद पर सीधा नियंत्रण करती है। लोकसभा यदि सरकार के प्रति अविश्वास का प्रस्ताव पारित कर दे, तो सरकार गिर जाती है। राज्यसभा मंत्रिपरिषद की आलोचना तो कर सकती है लेकिन उसे हटा नहीं सकती । इस दृष्टि से राज्य सभा की अपेक्षा लोकसभा कार्यपालिका को अधिक कारगर ढंग से नियंत्रण में रख सकती है।

2. बजट पर नियंत्रण:
सरकार के कार्यक्रमों को लागू करने के लिए वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था बजट के द्वारा रखी जाती है। सरकार के लिए संसाधन स्वीकृत करने से विधायिका मना कर सकती है। धन विधेयक लोकसभा में ही प्रस्तुत किये जा सकते हैं और वही उसे संशोधित या अस्वीकृत कर सकती है। राज्यसभा के पास धन विधेयक को केवल 14 दिन तक ही रोके रखने का अधिकार है। यदि लोकसभा में धन विधेयक गिर जाता है तो सरकार को त्यागपत्र देना होता है। राज्यसभा के पास यह शक्ति नहीं है।

इससे स्पष्ट होता है कि राज्यसभा सरकार की आलोचना तो कर सकती है, पर उसे हटा नहीं सकती जबकि लोकसभा सरकार की आलोचना करने के साथ-साथ उसे हटा भी सकती है। अतः लोकसभा राज्यसभा की तुलना में मंत्रिपरिषद पर अधिक कारगर ढंग से नियंत्रण रख सकती है।

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प्रश्न 4.
लोकसभा कार्यपालिका पर कारगर ढंग से नियंत्रण रखने की नहीं बल्कि जनभावनाओं और जनता की अपेक्षाओं की अभिव्यक्ति का मंच है। क्या आप इससे सहमत हैं? कारण बताएँ।
उत्तर:
हाँ, हम इस बात से सहमत हैं कि लोकसभा यद्यपि कार्यपालिका पर नियंत्रण बनाए रखती है लेकिन नियंत्रण के साथ-साथ लोकसभा एक ऐसा मंच है जहाँ जनता की इच्छाओं और भावों की अभिव्यक्ति की जाती है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं।
1. लोकसभा के लिए जनता सीधे सदस्यों को चुनती है। यह देश के विभिन्न क्षेत्रीय, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक समूहों के अलग-अलग विचारों का प्रतिनिधित्व करती है। यह देश में वाद-विवाद का सर्वोच्च और सबसे लोकतांत्रिक तथा खुला मंच है। इसके पास कार्यपालिका का चयन करने और उसे बर्खास्त करने की शक्ति भी है विचार-विमर्श करने की उसकी शक्ति पर कोई अंकुश नहीं है। सदस्यों को किसी भी विषय पर निर्भीकता से बोलने की स्वतंत्रता है। इससे लोकसभा राष्ट्र के समक्ष आने वाले हर मुद्दे का विश्लेषण कर पाती है। यह विचार-विमर्श हमारी लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया की आत्मा है।

2. लोकसभा में विधेयक प्रस्तुत किये जाने से पहले ही इस बात पर काफी बहस होती है कि उस विधेयक की क्या जरूरत है। कोई भी राजनीतिक दल अपने चुनावी वायदों को पूरा करने या आगामी चुनावों को जीतने के इरादे से किसी विधेयक को प्रस्तुत करने के लिए सरकार पर दबाव डाल सकता है। अनेक हित-समूह, मीडिया और नागरिक संगठन भी किसी विधेयक को लाने के लिए सरकार पर दबाव डाल सकते हैं। दूसरे, लोकसभा में सदस्यों को कार्यपालिका द्वारा बनाई गई नीतियों और उसके क्रियान्वयन के तरीकों पर भी बहस करने का अवसर मिलता है।

प्रश्नकाल में मंत्रियों को सदस्यों के तीखे प्रश्नों का जवाब देना पड़ता है। शून्यकाल में इसके सदस्य किसी भी महत्वपूर्ण मुद्दे को उठा सकते हैं। लोकहित के मामले में आधे घण्टे की चर्चा और स्थगन प्रस्ताव आदि का भी विधान है। प्रश्नकाल में सदस्यों को अपने निर्वाचन क्षेत्र की समस्याओं को उठाने का अवसर मिलता है। प्रश्नकाल में तीखे वाद-विवाद होते हैं।
अतः स्पष्ट है कि लोकसभा जनभावनाओं और जनता की अपेक्षाओं की अभिव्यक्ति का मंच है।

प्रश्न 5.
नीचे संसद को ज्यादा कारगर बनाने के कुछ प्रस्ताव लिखे जा रहे हैं। इनमें से प्रत्येक के साथ अपनी सहमति या असहमति का उल्लेख करें। यह भी बताएँ कि इन सुझावों को मानने के क्या प्रभाव होंगे?
(क) संसद को अपेक्षाकृत ज्यादा समय तक काम करना चाहिए।
(ख) संसद के सदस्यों की सदन में मौजूदगी अनिवार्य कर दी जानी चाहिए।
(ग) अध्यक्ष को यह अधिकार होना चाहिए कि सदन की कार्यवाही में बाधा पैदा करने पर संसद को दंडित कर सकें।
उत्तर:
(क) संसद को अपेक्षाकृत ज्यादा समय तक काम करना चाहिए – इसका अभिप्राय यह है कि संसद का कार्यकाल अधिक लम्बा रखा जाए। मैं इस प्रस्ताव से असहमत हूँ। यदि इस सुझाव को मान लिया जायेगा तो संसद अर्थात् लोकसभा की अवधि 5 वर्ष से अधिक की हो जायेगी। (चूंकि राज्यसभा एक स्थायी सदन है।) लोकसभा की लम्बी अवधि कर दी जायेगी तो लोकसभा सदस्य एक बार लम्बी अवधि के लिए चुने जाने पर जनता की आशाओं और उनके हितों का ध्यान नहीं रखेंगे।

(ख) संसद के सदस्यों की सदन में मौजूदगी अनिवार्य कर दी जानी चाहिए: मैं इस सुझाव से सहमत हूँ क्योंकि सांसद अपने कर्त्तव्यों का पालन ईमानदारी से नहीं करते। बहुत से सांसद सदन में होने वाली चर्चा में भाग ही नहीं लेते। यदि संसद सदस्यों की सदन में मौजूदगी अनिवार्य कर दी जायेगी तो सभी सांसद संसद की कार्यवाही में संजीव पास बुक्स भाग लेंगे, इस कार्यवाही में उनकी रुचि बढ़ेगी तथा अपने क्षेत्र की समस्याओं को सही ढंग से समय-समय पर उठाते रहेंगे।

(ग) अध्यक्ष को यह अधिकार होना चाहिए कि सदन की कार्यवाही में बाधा पैदा करने पर सदस्य को दंडित कर सकें – मैं इस सुझाव से सहमत हूँ क्योंकि अध्यक्ष लोकसभा की कार्यवाही चलाने में अन्तिम अधिकारी है उसे लोकसभा में अनुशासन बनाए रखना है। परन्तु आजकल संसद सदस्य सदन के अन्दर इस प्रकार से व्यवधान उत्पन्न करते हैं कि सदन की कार्यवाही चलाना कठिन हो जाता है। सत्र चलने के समय में अधिकांश समय सदन स्थगित रहते हैं क्योंकि सांसदों द्वारा गलत व्यवहार किया जाता है, उनकी गतिविधियाँ शर्मनाक होती हैं।

ऐसी स्थितियों को रोकने के लिए यह आवश्यक है कि अध्यक्ष को ऐसे सदस्यों को दण्डित करने का पूर्ण अधिकार हो। यद्यपि, इसमें एक खतरा अवश्य है कि अध्यक्ष बहुमत दल का सदस्य होता है और इस दृष्टि से उसका दृष्टिकोण भेदभावपरक हो सकता है; तथापि इस खतरे को मोल लेते हुए भी संसद की कार्यवाहियों को सुचारु रूप से चलाने के लिए अध्यक्ष को यह अधिकार दिया ही जाना चाहिए।

प्रश्न 6.
आरिफ यह जानना चाहता था कि अगर मंत्री ही अधिकांश महत्वपूर्ण विधेयक प्रस्तुत करते हैं और बहुसंख्यक दल अक्सर सरकारी विधेयक को पारित कर देता है, तो फिर कानून बनाने की प्रक्रिया में संसद की भूमिका क्या है? आप आरिफ को क्या उत्तर देंगे ?
उत्तर:
आरिफ ने अपने प्रश्न में यह बात उठायी है कि जब अधिकांश महत्वपूर्ण विधेयक मंत्रियों द्वारा प्रस्तावित किये जाते हैं और बहुमत दल उसको पारित करवा ही देता है तो संसद की क्या भूमिका रह जाती है? यह सत्य है कि संसदात्मक शासन व्यवस्था में बहुमत दल के लिए यह आवश्यक होता है कि मंत्रियों द्वारा प्रस्तावित विधेयक अवश्य पारित हो जाने चाहिए अन्यथा सरकार गिर जायेगी।

सरकारी विधेयक पारित न होने पर मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है। ऐसी स्थिति में सरकार को बचाने के लिए सत्तादल को वे विधेयक पारित करवाने अनिवार्य हो जाते हैं। लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं है कि विधि निर्माण प्रक्रिया में संसद की कोई भूमिका नहीं है। विधि निर्माण प्रक्रिया में इस स्थिति के होते हुए भी संसद की महत्वपूर्ण भूमिका है।

  • निजी विधेयक भी संसद में प्रस्तावित किये जाते हैं। संसद में इन विधेयकों को अलग-अलग सोपानों से गुज़रना पड़ता है तथा उस पर प्रत्येक सोपान में चर्चा होती है।
  • प्रत्येक सरकारी विधेयक को भी विभिन्न सोपानों से गुजरना पड़ता है, जैसे
    1. प्रस्तुतीकरण व प्रथम वाचन
    2. द्वितीय वाचन
    3. समिति स्तर
    4. रिपोर्ट स्तर
    5. तृतीय वाचन। इन सोपानों के बाद ही विधेयक पर मतदान होता है।

एक सदन में पारित होने के बाद विधेयक दूसरे सदन में जाता है। दूसरे सदन में यह आवश्यक नहीं है कि सत्तारूढ़ दल का बहुमत हो ही। ऐसी स्थिति में यहाँ विधेयक को कठिन परीक्षा के दौर से गुजरना पड़ता है। जब दूसरा सदन भी उसे पारित कर देता है तो राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है। विधेयक निर्माण की इस समूची संसदीय प्रक्रिया में प्रत्येक विधेयक पर गंभीरता से विचार संभव हो पाता है तथा उसकी खामियों में आवश्यक संशोधन भी कर दिया जाता है। यदि विधि निर्माण प्रक्रिया में संसद की भूमिका को हटा देंगे तो विधेयकों पर गंभीरतापूर्वक विचार संभव नहीं हो सकेगा।

तीसरे, यदि विधि निर्माण प्रक्रिया में संसद की भूमिका को हटा दिया जाये तो कार्यपालिका ही विधि निर्माता हो जायेगी। विधि निर्माण में उस पर कोई अंकुश नहीं रह जायेगा तथा वह निरंकुश होकर लोकहितकारी विधायकों से विमुख हो सकती है तथा उन्हें अत्याचारीपूर्ण ढंग से कार्यान्वित कर सकती है। इससे नागरिकों की स्वतंत्रता का हनन हो जायेगा तथा कार्यपालिका पर विधि निर्माण के क्षेत्र में कोई नियंत्रण नहीं रह जायेगा।

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प्रश्न 7.
आप निम्नलिखित में से किस कथन से सबसे ज्यादा सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण दें।
( क ) सांसद/विधायकों को अपनी पसंद की पार्टी में शामिल होने की छूट होनी चाहिए।
(ख) दलबदल विरोधी कानून के कारण पार्टी के नेता का दबदबा पार्टी के सांसद/विधायकों पर बढ़ा है।
(ग) दलबदल हमेशा स्वार्थ के लिए होता है और इस कारण जो विधायक/सांसद दूसरे दल में शामिल होना चाहता है उसे आगामी दो वर्षों के लिए मंत्री पद के अयोग्य करार कर दिया जाना चाहिए।
उत्तर:
1. उपर्युक्त तीनों कथनों में से हम दूसरे कथन (ख) से सबसे ज्यादा सहमत हैं कि दलबदल विरोधी कानून के कारण पार्टी के नेता का दबदबा पार्टी के सांसद / विधायकों पर बढ़ा है। इसका कारण यह है कि नेता का आदेश सांसदों/विधायकों को मानना पड़ता है अन्यथा वे दल-बदल विरोधी कानून के अन्तर्गत अपनी सदस्यता से हाथ धो बैठते हैं। पार्टी नेतृत्व का इसमें दबदबा रहता है और पार्टी अध्यक्ष सदस्यों को सदन में उपस्थित रहने तथा पार्टी के निर्णय के अनुसार मतदान करने के लिए व्हिप जारी करते हैं। व्हिप का उल्लंघन करने वाले सदस्यों की सदस्यता समाप्त कर दी जाती है।

2. हम (क) कथन से इसलिए सहमत नहीं हैं क्योंकि यदि सांसद/विधायकों को अपनी पसंद की पार्टी में शामिल होने की छूट दे दी जायेगी तो इससे उन नागरिकों की इच्छा का दमन होगा जिन्होंने उसे चुनकर संसद/विधानमण्डल में भेजा था।

3. (ग) कथन से हम इसलिए सहमत नहीं हैं क्योंकि इसमें दल-बदल के कारण विधायक या सांसद को जो दण्ड निर्धारित किया गया है वह यह है कि उसे आगामी दो वर्षों के लिए मंत्री पद के लिए अयोग्य करार किया जाता है। लेकिन यह दण्ड पर्याप्त नहीं है क्योंकि उसकी सदस्यता संसद/विधानमण्डल में बराबर बनी रहेगी।

प्रश्न 8.
डॉली और सुधा में इस बात पर चर्चा चल रही थी कि मौजूदा वक्त में संसद कितनी कारगर और प्रभावकारी है। डॉली का मानना था कि भारतीय संसद के कामकाज में गिरावट आयी है। यह गिरावट एकदम साफ दिखती है क्योंकि अब बहस-मुबाहिसे पर समय कम खर्च होता है और सदन की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करने अथवा वॉकआउट (बहिर्गमन) करने में ज्यादा। सुधा का तर्क था कि लोकसभा में अलग-अलग सरकारों ने मुँह की खायी है, धराशायी हुई हैं। आप सुधा या डॉली के तर्क के पक्ष या विपक्ष में और कौन – सा तर्क देंगे?
उत्तर:
” डॉली का मानना था कि भारतीय संसद के कामकाज में गिरावट आयी है। यह गिरावट एकदम साफ दिखती है क्योंकि अब बहस-मुबाहिसे पर समय कम खर्च होता है और सदन की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करने अथवा वॉकआउट (बहिगर्मन) करने में ज्यादा।” डॉली के इस कथन में आंशिक सत्यता है। यथा
1. संसद वाद:
विवाद के बीच अपने जरूरी काम को अंजाम दे रही है। जब हम दूरदर्शन पर संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण देख रहे होते हैं तो सदन में सदस्य कटुता लिए हुए एक-दूसरे की टांग खींचते नजर आते हैं। विभिन्न दलों के बीच आपस में बहस होती रहती है। कई बार ऐसा लगता है कि राष्ट्र का धन बरबाद हो रहा है। लेकिन संसद तो वाद-विवाद का मंच ही है। इस वाद-विवाद के जरिये ही संसद अपने सभी जरूरी काम को अंजाम देती है।

2. कार्यपालिका का उत्तरदायित्व सुनिश्चित होता है:
प्रश्नकाल के दौरान वाद-विवाद इतने तीखे हो जाते हैं कि अनेक सदस्यों द्वारा अपनी बात रखने के लिए प्रायः ऊँची आवाज में बोलना, अध्यक्ष के आसन के पास चले जाना तथा सदन से बहिर्गमन करने जैसी घटनाएँ देखी जा सकती हैं। इसमें सदन का बहुत समय बर्बाद हो जाता है। लेकिन इसी के साथ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ये सभी कदम सरकार से रियायत प्राप्त करने के राजनीतिक तरीके हैं और इससे कार्यपालिका का उत्तरदायित्व सुनिश्चित होता है।

3. अधिकांश सदस्य अभी भी मर्यादापूर्ण बहस में रुचि रखते हैं- वाद- विवाद सार्थक और शांतिपूर्ण होना चाहिए। कुछ सदस्यों की लापरवाही के कारण संसद की कार्यकुशलता और दक्षता निकट समय में कम हुई है। कुछ सदस्य अपने दायित्वों का निर्वाह ईमानदारी से नहीं कर रहे हैं। उनका व्यवहार पक्षपातपूर्ण है। वे सदन में शोर-शराबा उत्पन्न करते हैं। इसी संदर्भ में डॉली ने कहा है कि यह संसद में गिरावट का समय चल रहा है और संसद की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करने में अधिक समय खर्च किया जा रहा है। लेकिन अधिकांश सदस्य अपने अधिकारों व दायित्वों का प्रयोग संसद में अभी भी उचित रूप से कर रहे हैं।

वे सदन में वाद-विवाद में ईमानदारी से भाग लेते हैं जिससे सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चलती रहती है। इससे सदन की गरिमा भी बनी रहती है। इससे स्पष्ट होता है कि कुछ सदस्यों के अनुचित व्यवहार के कारण सदन का काम-काज प्रभावित होता है, लेकिन अधिकांश सदस्यों के ईमानदारी से कार्य करने के कारण अभी भी सदन की गरिमा बनी हुई है। आवश्यकता इस बात की है कि सदन में किये जा रहे व्यवहार को और अधिक मर्यादापूर्ण बनाने के प्रयास किये जाएँ। इसके लिए यह आवश्यक है कि सदन के पास पर्याप्त समय हो, सदस्य मर्यादापूर्ण बहस में रुचि पैदा करें तथा उसमें प्रभावशाली ढंग से भाग लें।

प्रश्न 9.
किसी विधेयक को कानून बनने के क्रम में जिन अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है, उन्हें क्रमवार सजाएँ।
(क) किसी विधेयक पर चर्चा के लिए प्रस्ताव पारित किया जाता है।
(ख) विधेयक भारत के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है – बताएँ कि वह अगर इस पर हस्ताक्षर नहीं करता/करती है, तो क्या होता है?
(ग) विधेयक दूसरे सदन में भेजा जाता है और वहाँ इसे पारित कर दिया जाता है।
(घ) विधेयक का प्रस्ताव जिस सदन में हुआ है उसमें यह विधेयक पारित होता है।
(ङ) विधेयक की हर धारा को पढ़ा जाता है और प्रत्येक धारा पर मतदान होता है।
(च) विधेयक उप-समिति के पास भेजा जाता है- समिति उसमें कुछ फेर-बदल करती है और चर्चा के लिए सदन में भेज देती है।
(छ) संबद्ध मंत्री विधेयक की जरूरत के बारे में प्रस्ताव करता है।
(ज) विधि – मंत्रालय का कानून – विभाग विधेयक तैयार करता है।
उत्तर:
विधेयक पारित होने की क्रमिक अवस्थाओं को क्रमवार निम्न प्रकार सजाया गया है-
(ज) विधि मंत्रालय का कानून – विभाग विधेयक तैयार करता है।
(छ) सम्बद्ध मंत्री विधेयक की जरूरत के बारे में प्रस्ताव करता है।
(क) किसी विधेयक पर चर्चा के लिए प्रस्ताव पारित किया जाता है।
(च) विधेयक उप-समिति के पास भेजा जाता है। समिति उसमें कुछ फेर-बदल करती है और चर्चा के लिए सदन में भेज देती है।
(ङ) विधेयक की हर धारा को पढ़ा जाता है और प्रत्येक धारा पर मतदान होता है।
(घ) विधेयक का प्रस्ताव जिस सदन में हुआ, उसमें यह पारित होता है।
(ग) विधेयक दूसरे सदन में भेजा जाता है और वहाँ इसे पारित कर दिया जाता है।
(ख) विधेयक भारत के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति की स्वीकृति से विधेयक कानून बन जाता
परन्तु यदि राष्ट्रपति उस पर हस्ताक्षर न करे, वह उसे रोक ले या उस पर स्वीकृति न दे तो निम्नलिखित स्थितियाँ उभरेंगी।

प्रथमतः राष्ट्रपति उस विधेयक को दुबारा संसद के पास पुनर्विचार के लिए भेज सकता है और यदि संसद उसे दुबारा पारित करके पुनः राष्ट्रपति के पास भेजती है तो राष्ट्रपति को उस पर अपनी स्वीकृति देनी ही होगी। लेकिन यदि धन विधेयक या संविधान संशोधन विधेयक है तो राष्ट्रपति को उसे पुनर्विचार के लिए भेजने का भी अधिकार नहीं है, इन पर राष्ट्रपति को हस्ताक्षर करने ही होंगे।

दूसरे, संसद के पास पुनर्विचार के लिए भेजने की कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है। इसका अर्थ यह हुआ कि राष्ट्रपति किसी भी विधेयक को बिना किसी समय-सीमा के अपने पास लंबित रख सकता है। इसे कई बार ‘पाकिट वीटो’ भी कहा जाता है । इस प्रकार राष्ट्रपति विधेयक को ठंडे बस्ते में भी डाल सकता है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 5 विधायिका

प्रश्न 10.
संसदीय समिति की व्यवस्था से संसद के विधायी कामों के मूल्यांकन और देखरेख पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
विभिन्न विधायी कार्यों के लिए संसदीय समितियों का गठन संसदीय कामकाज का एक महत्वपूर्ण पहलू है। ये समितियाँ केवल कानून बनाने में ही नहीं, वरन् सदन के दैनिक कार्यों में भी अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यथा

  1. चूंकि संसद केवल अपने अधिवेशन के दौरान ही बैठती है, इसलिए उसके पास अत्यन्त सीमित समय होता है।
  2. किसी कानून को बनाने के लिए उससे जुड़े विषय का गहन अध्ययन करना पड़ता है। इसके लिए उस पर ज्यादा ध्यान और समय देने की जरूरत पड़ती है।
  3. अन्य और भी कई महत्त्वपूर्ण कार्य होते हैं, जैसे विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान माँगों का अध्ययन, विभिन्न विभागों के द्वारा किये गये खर्चों की जाँच, भ्रष्टाचार के मामलों की पड़ताल आदि।

संसदीय समितियाँ संसद के विधायी कार्यों के अतिरिक्त इन सब कार्यों को भी करती हैं। संसदीय समितियों की व्यवस्था का संसद पर प्रभाव-समितियों की इस व्यवस्था ने संसद का कार्यभार हल्का कर दिया है। अनेक महत्वपूर्ण विधेयकों को समितियों को भेजा गया। संसद ने समितियों द्वारा किये गये काम में छुट- पुट बदलाव करके मंजूरी दे दी है। प्राय: समितियों द्वारा सुझाये गये सुझावों को संसद ने मंजूर कर लिया है।

विधायिका JAC Class 11 Political Science Notes

→ संसद या विधायिका का महत्त्व ( हमें संसद क्यों चाहिए?)
संसद या विधायिका जनता द्वारा निर्वाचित होती है और जनता के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करती है। यह कानून निर्माण का महत्त्वपूर्ण कार्य करती है तथा जनप्रतिनिधियों का जनता के प्रति उत्तरदायित्व सुनिश्चित करती है। यह सभी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का केन्द्र तथा प्रतिनिधिक लोकतंत्र का आधार है। यह मंत्रिमंडल पर नियंत्रण रखती है तथा इसके पास कार्यपालिका का चयन करने और बर्खास्त करने की भी शक्ति है। यह वाद-विवाद का सबसे लोकतांत्रिक खुला मंच है। अपनी संरचनात्मक विशेषता के कारण यह सरकार के सभी अंगों में सबसे ज्यादा प्रतिनिधिक है।

→ भारत में विधायिका का नाम तथा स्वरूप:
संसद: भारत की राष्ट्रीय विधायिका का नाम संसद है। भारतीय संसद में दो सदन हैं प्रथम सदन को लोकसभा और दूसरे सदन को राज्यसभा कहते हैं।

विधान मण्डल: राज्यों की विधायिकाओं को विधानमण्डल कहते हैं। संविधान ने राज्यों को एक सदनात्मक या द्विसदनात्मक विधायिका स्थापित करने का विकल्प दिया है। वर्तमान में केवल छ : राज्यों में ही द्वि-सदनात्मक विधायिकाएँ हैं। ये हैं।

  • आंध्रप्रदेश
  • बिहार
  • कर्नाटक
  • महाराष्ट्र
  • तेलंगाना
  • उत्तरप्रदेश।

→ द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका की आवश्यकता जब किसी विधायिका में दो सदन होते हैं, तो उसे द्वि- सदनात्मक विधायिका कहते हैं। भारतीय संसद एक द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका है। द्विसदनात्मक विधायिका के लाभ ये हैं

  • समाज के सभी वर्गों और देश के सभी क्षेत्रों को समुचित प्रतिनिधित्व संभव।
  • संसद के प्रत्येक निर्णय पर दूसरे सदन में पुनर्विचार संभव।

→  राज्य सभा (अ) राज्यसभा का संगठन:
राज्यों का प्रतिनिधित्व तथा आधार: जनसंख्या – राज्य सभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है। इसका निर्वाचन अप्रत्यक्ष विधि से होता है। राज्य विधान सभा के निर्वाचित सदस्य राज्य विधानसभा के सदस्यों को चुनते हैं । राज्यसभा में देश के विभिन्न क्षेत्रों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया गया है। इस दृष्टि से ज्यादा जनसंख्या वाले राज्यों को ज्यादा और कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों को कम प्रतिनिधित्व दिया गया है । जनसंख्या के आधार पर संविधान की चौथी अनुसूची में प्रत्येक राज्य से निर्वाचित होने वाले सदस्यों की संख्या निर्धारित कर दी गई हैं।

→ कार्यकाल: राज्यसभा के सदस्यों को 6 वर्ष के लिए निर्वाचित किया जाता है। उन्हें दुबारा निर्वाचित किया जा सकता है।

→ स्थायी सदन: राज्य सभा एक स्थायी सदन है क्योंकि इसके सभी सदस्य अपना कार्यकाल एक साथ पूरा नहीं करते। प्रत्येक दो वर्ष पर राज्य सभा के 1/3 सदस्य अपना कार्यकाल पूरा करते हैं और इन 1/3 सीटों के लिए चुनाव होते हैं। इस तरह राज्य सभा कभी भी पूरा तरह भंग नहीं होती।

→ मनोनीत सदस्य: निर्वाचित सदस्यों के अतिरिक्त राज्य सभा में 12 मनोनीत सदस्य होते हैं। साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष उपलब्धि पाने वाले व्यक्तियों को राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किया जाता है।

(ब) राज्य सभा की शक्तियाँ राज्यसभा की प्रमुख शक्तियाँ इस प्रकार हैं।

  • विधि निर्माण सम्बन्धी शक्ति: सामान्य विधेयकों पर विचार कर उन्हें पारित करती है। धन विधेयकों में संशोधन प्रस्तावित कर सकती है तथा संवैधानिक संशोधनों को पारित करती है।
  • कार्यपालिका पर नियंत्रण की शक्ति: प्रश्न पूछकर तथा संकल्प और प्रस्ताव प्रस्तुत करके कार्यपलिका पर नियंत्रण करती है।
  • निर्वाचन तथा पदच्युक्ति सम्बन्धी शक्ति: राज्य सभा राष्ट्रपंति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में भागीदारी करती है। उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव केवल राज्य सभा में ही लाया जा सकता है। यह
  • महाभियोग द्वारा राष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया में भाग लेती है।
  •  विशेष शक्तियाँ: यह संसद को राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार दे सकती है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 5 विधायिका

→ लोकसभा (अ) लोकसभा का संगठन:
निर्वाचन: लोकसभा के लिए जनता सीधे (प्रत्यक्ष निर्वाचन से) सदस्यों को चुनती है। लोकसभा चुनावों के लिए पूरे देश को लगभग समान जनसंख्या वाले निर्वाचन क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से एक प्रतिनिधि चुना जाता है। चुनाव सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर होता है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति के मत का मूल्य बराबर होता है। इस समय लोकसभा के 543 निर्वाचन क्षेत्र हैं। कार्यकाल-लोकसभा के लिए सदस्यों को 5 वर्ष के लिए चुना जाता है। लेकिन बहुमत की सरकार न बनाने की स्थिति में अथवा प्रधानमंत्री की लोकसभा भंग करने की सलाह पर राष्ट्रपति लोकसभा को 5 वर्ष की अवधि से पहले भी भंग कर सकता है।

(ब) लोकसभा की शक्तियाँ लोकसभा की प्रमुख शक्तियाँ ये हैं।

  • कानून निर्माण करना
  • वित्तीय शक्तियाँ
  • कार्यपालिका पर नियन्त्रण रखना
  • संविधान में संशोधन करना
  • निर्वाचन सम्बन्धी शक्तियाँ
  • न्य शक्तियाँ जैसे आपातकाल की घोषणा को स्वीकृति देना, महाभियोग लगाने की शक्ति, समिति और आयोगों का गठन करना आदि। यथा

→ लोकसभा की विशेष शक्तियाँ: कुछ ऐसी शक्तियाँ हैं जिनका प्रयोग केवल लोकसभा ही कर सकती है।

  • धन सम्बन्धी विधेयक प्रस्तुत करना, उसे संशोधित या अस्वीकृत करना।
  • मंत्रिपरिषद् के प्रति अविश्वास प्रस्ताव पारित करना।

→ लोकसभा और राज्यसभा की समान शक्तियाँ:

  • सामान्य और संवैधानिक विधेयकों को पारित करना।
  • राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाना
  • उपराष्ट्रपति को हटाना आदि।

→ संसद की शक्तियाँ व कार्य संसद के प्रमुख कार्य व शक्तियाँ निम्नलिखित हैं।

  • विधायी कामकाज
  • कार्यपालिका पर नियंत्रण तथा उसका उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना
  • वित्तीय कार्य
  • प्रतिनिधित्व
  • बहस का मंच
  • संवैधानिक कार्य
  • निर्वाचन सम्बन्धी कार्य
  • न्यायिक कार्य

→ संसद कानून कैसे बनाती है? संसद द्वारा कानून बनाने के लिए एक निश्चित प्रक्रिया अपनायी जाती है जिसमें किसी विधेयक को कई अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है।

  • विधेयक का प्रस्तुतीकरण: ( प्रथम वाचन) विधेयक यदि धन विधेयक नहीं है तो उसे किसी भी सदन प्रस्तुत किया जा सकता है। लेकिन धन विधेयक लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है।
  • विधेयक का द्वितीय वाचन: दूसरे चरण में विधेयक को या तो समिति के पास भेजा जाता है या उस पर सदन में चर्चा होती है। समिति को भेजे जाने पर समिति रिपोर्ट देती है। सदन इस रिपोर्ट को स्वीकार या अस्वीकार करता है। इसके बाद सदन में विधेयक पर विस्तृत विचार-विमर्श होता है। जो विधेयक समिति को नहीं भेजा जाता है, तो उस पर विस्तृत चर्चा होती है।
  • तृतीय वाचन: तृतीय चरण में विधेयक पर मतदान होता है। पारित हो जाने पर उसे दूसरे सदन में भेजा जाता है।
  • दूसरे सदन की प्रक्रिया: दूसरे सदन में उपर्युक्त प्रक्रिया अपनाई जाती है। दूसरा सदन या तो इसे स्वीकार कर लेता है या इस पर सुझाव भेजता है। यदि प्रथम सदन इस सुझाव को स्वीकार नहीं करता तो राष्ट्रपति द्वारा दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाई जाती है जिसकी अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है । संयुक्त बैठक में उस पर मतदान किया जाता है और उसे स्वीकार या रद्द किया जाता है।

→ राष्ट्रपति के हस्ताक्षर: दोनों सदनों से पारित होने के बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास जाता है। राष्ट्रपति या तो विधेयक को मंजूरी देता है या उसे पुनर्विचार के लिए लौटा देता है। लेकिन यदि संसद उसे पुनः पारित कर राष्ट्रपति के पास भेज देती है, तो राष्ट्रपति को उस पर अपनी मंजूरी देनी ही होती है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद विधेयक कानून बन जाता है। विधेयकों के विभिन्न प्रकार – विधेयकों के विभिन्न प्रकार होते हैं। यथा

  • सरकारी विधेयक या निजी सदस्यों का विधेयक।
  • वित्त विधेयक या गैर – वित्त विधेयक।
  • सामान्य विधेयक या संविधान संशोधन विधेयक।

धन विधेयक: धन विधेयक केवल लोकसभा में पेश किया जाता है। लोकसभा से पारित होने के बाद वह राज्य सभा में जाता है। राज्यसभा या तो उसे स्वीकार कर लेती है या संशोधन प्रस्तावित कर सकती है, लेकिन अस्वीकार नहीं कर सकती। यदि राज्य सभा 14 दिनों तक उस पर कोई निर्णय नहीं ले तो उसे राज्य सभा द्वारा पारित मान लिया जाता है। धन विधेयकों में राज्यसभा द्वारा प्रस्तावित संशोधनों को लोकसभा मान भी सकती है और नहीं भी।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 5 विधायिका

→ संसद द्वारा कार्यपालिका पर नियंत्रण:  संसद अनेक विधियों का प्रयोग कर कार्यपालिका को नियंत्रित करती है।

  • बहस और वाद-विवाद: प्रश्नकाल, शून्यकाल, आधे घंटे की चर्चा और स्थगन प्रस्ताव आदि के माध्यम से संसद बहस या वाद-विवाद द्वारा मंत्रिपरिषद पर नियंत्रण रखती है।
  • कानूनों की स्वीकृति या अस्वीकृति: इस अधिकार के द्वारा भी संसद कार्यपालिका पर नियंत्रण करती है।
  • वित्तीय नियंत्रण: धन स्वीकृत करने से पहले लोकसभा सरकार से धन मांगने के कारणों पर चर्चा कर, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक व लोक लेखा समिति की रिपोर्ट पर धन के दुरुपयोग के मामलों की जाँच कर, आदि वित्तीय नियंत्रणों द्वारा विधायिका सरकार की नीतियों पर नियंत्रण करती है।
  • अविश्वास प्रस्ताव: विधायिका अपने सबसे सशक्त हथियार ‘अविश्वास प्रस्ताव’ पेश कर सरकार पर नियंत्रण स्थापित करती है। सन् 1989 के बाद से अपने प्रति सदन के अविश्वास के कारण अनेक सरकारों को त्यागपत्र देना पड़ा।

→ संसदीय समितियों की कार्यविधि: संसदीय समितियाँ कानून बनाने के साथ-साथ सदन के दैनिक कार्यों में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यथा

  • संसदीय समितियों के कार्य-संसदीय समितियों के प्रमुख कार्य ये हैं।
    • किसी कानून को बनाने के लिए उससे जुड़े विषय का गहन अध्ययन करना।
    • विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान माँगों का अध्ययन।
    • विभिन्न विभागों द्वारा किये गए खर्चों की जाँच।
    • भ्रष्टाचार के मामलों की पड़ताल।
  • स्थायी समितियाँ: स्थायी समितियाँ विभिन्न विभागों के कार्यों, उनके बजट, खर्चे तथा उनसे संबंधित विधेयकों की देखरेख करती है।
  • संयुक्त संसदीय समितियाँ: इन समितियों में संसद के दोनों सदनों के सदस्य होते हैं। इनका गठन किसी विधेयक पर संयुक्त चर्चा अथवा वित्तीय अनियमितताओं की जाँच के लिए किया जा सकता है।
    सामान्यतः समितियों द्वारा दिये गये सुझावों को संसद स्वीकार कर लेती है।

→ संसद स्वयं को कैसे नियंत्रित करती है?

  • संविधान में संसद की कार्यवाही को सुचारु ढंग से चलाने के लिए प्रावधान बनाए गए हैं। सदन का अध्यक्ष इनके अनुसार सदन का संचालन करता है।
  • सदन का अध्यक्ष दलबदल से संबंधित अंतिम निर्णय लेता है और यदि यह सिद्ध हो जाये कि किसी सदस्य ने दल बदल किया है, तो उसकी सदन की सदस्यता समाप्त हो जाती है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 कार्यपालिका

Jharkhand Board JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 कार्यपालिका Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 कार्यपालिका

Jharkhand Board Class 11 Political Science कार्यपालिका InText Questions and Answers

पृष्ठ 79

प्रश्न 1.
कार्यपालिका क्या है?
उत्तर:
सरकार का वह अंग जो विधायिका द्वारा स्वीकृत नीतियों और कानूनों को लागू करता है और प्रशासन का काम करता है, कार्यपालिका कहलाता है।

प्रश्न 2.
मुझे याद है कोई कह रहा था कि लोकतन्त्र में कार्यपालिका जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। क्या यह बड़ी कम्पनियों के बड़े अधिकारियों के लिए भी सही है? क्या उन्हें हम मुख्य कार्यपालिका अधिकारी नहीं कहते ? वे किसके प्रति उत्तरदायी हैं?
उत्तर:
बड़ी कम्पनियों के अधिकारी जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं होते। उन्हें हम मुख्य कार्यपालिका अधिकारी नहीं कहते क्योंकि वे लोक सेवा आयोगों के माध्यम से नियुक्त नहीं किये जाते हैं । वे अपने कार्यों के लिए कम्पनी बोर्ड के प्रति उत्तरदायी होते हैं।

पृष्ठ 80

प्रश्न 3.
कार्यपालिका कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:

  • कार्यपालिका को मोटे रूप से दो प्रकारों में विभाजित किया जाता है
    1. सामूहिक नेतृत्व के सिद्धान्त पर आधारित प्रणाली और
    2. एक व्यक्ति के नेतृत्व के सिद्धान्त पर आधारित प्रणाली।
  • प्रथम के आधार पर कार्यपालिका के दो प्रकार हैं
    1. संसदात्मक कार्यपालिका,
    2. अर्द्ध- अध्यक्षात्मक कार्यपालिका। दूसरे आधार पर कार्यपालिका का जो प्रकार उभरा है, उसे अध्यक्षात्मक कार्यपालिका कहा जाता है।
  • इस प्रकार लोकतान्त्रिक देशों में कार्यपालिका के तीन प्रकार उभरे हैं
    1. संसदात्मक कार्यपालिका,
    2. अध्यक्षात्मक कार्यपालिका
    3. अर्द्ध- अध्यक्षात्मक कार्यपालिका।

पृष्ठ 82

प्रश्न 4.
श्रीलंका के राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री की स्थिति भारत से कैसे भिन्न है? भारत और श्रीलंका के राष्ट्रपति के महाभियोग में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका की तुलना करें।
उत्तर:
श्रीलंका के राष्ट्रपति और भारत के राष्ट्रपति की स्थिति की तुलना – श्रीलंका के संविधान में अर्द्ध- अध्यक्षात्मक कार्यपालिका लागू की गई है। वहाँ जनता प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रपति को चुनती है। राज्य का निर्वाचित प्रधान और सशस्त्र सेनाओं का प्रधान सेनापति होने के अतिरिक्त श्रीलंका का राष्ट्रपति सरकार का भी प्रधान होता है। भारत के संविधान में संसदात्मक कार्यपालिका लागू की गई है। यहाँ राष्ट्रपति सरकार का नाम मात्र का (संवैधानिक) अध्यक्ष है, न कि वास्तविक अध्यक्ष । इसका निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से होता है अर्थात् संसद के निर्वाचित सदस्य तथा राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य भारत के राष्ट्रपति का निर्वाचन करते हैं। यह राज्य का प्रधान और सशस्त्र सेनाओं का प्रधान सेनापति होता है, लेकिन सरकार का प्रधान नहीं होता है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 कार्यपालिका

पृष्ठ 83

प्रश्न 5.
नेहा यह तो बहुत सरल है। जिस देश में राष्ट्रपति है, वहाँ अध्यक्षात्मक कार्यपालिका और जिस देश में प्रधानमन्त्री है, वहाँ संसदीय कार्यपालिका है। आप नेहा को कैसे समझायेंगे कि ऐसा हमेशा सच नहीं होता?
उत्तर:
हम नेहा को इस प्रकार समझायेंगे कि जिस देश में कार्यपालिका के संवैधानिक अध्यक्ष और वास्तविक अध्यक्ष अलग-अलग होते हैं और वास्तविक अध्यक्ष, चाहे उसका पद नाम राष्ट्रपति हो या प्रधानमन्त्री, अपने कार्यों के लिये संसद के प्रति उत्तरदायी होता है; उसे संसदात्मक शासन कहते हैं जिस देश में कार्यपालिका का संवैधानिक और वास्तविक अध्यक्ष एक ही होता है चाहे उसका पद-नाम राष्ट्रपति हो या चांसलर तथा जो संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं होता, उसे अध्यक्षात्मक शासन कहते हैं।

उदाहरण के लिए, भारत में राष्ट्रपति कार्यपालिका का संवैधानिक अध्यक्ष है और प्रधानमन्त्री कार्यपालिका का वास्तविक अध्यक्ष है, लेकिन यहाँ वास्तविक अध्यक्ष संसद के प्रति उत्तरदायी है। अतः यहाँ संसदात्मक सरकार है, जबकि यहाँ राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री दोनों ही पद विद्यमान हैं। दूसरी तरफ अमेरिका में राष्ट्रपति संवैधानिक और वास्तविक कार्यपालिका अध्यक्ष दोनों है तथा वह अपने कार्यों के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं है। अतः वहाँ अध्यक्षात्मक सरकार है।

श्रीलंका के प्रधानमन्त्री और भारत के प्रधानमन्त्री की स्थिति की भिन्नता:
अर्द्ध-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली होने के कारण श्रीलंका के प्रधानमन्त्री की स्थिति भारत के प्रधानमन्त्री से कमजोर है। भारत का प्रधानमन्त्री सरकार का अध्यक्ष होता है और व्यवहार में संवैधानिक अध्यक्ष या राज्य के अध्यक्ष की समस्त शक्तियों का उपभोग करता है। राष्ट्रपति लोकसभा में बहुमत दल या गठबन्धन के नेता को प्रधानमन्त्री नियुक्त करता है और जब तक लोकसभा में उसके पक्ष में बहुमत का समर्थन रहता है, राष्ट्रपति उसे पदच्युत नहीं कर सकता। दूसरी तरफ, श्रीलंका में राष्ट्रपति संसद में बहुमत वाले दल के सदस्यों में से प्रधानमन्त्री चुनता है। वह प्रधानमन्त्री और दूसरे मन्त्रियों को हटा सकता है। प्रधानमन्त्री सरकार का अध्यक्ष नहीं होता है तथा वह राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होता है।

भारत और श्रीलंका के राष्ट्रपति के महाभियोग में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका:

  1. श्रीलंका में राष्ट्रपति छः वर्ष के लिए चुना जाता है और उसे इससे पहले भी संसद की कुल सदस्य संख्या के 2/3 बहुमत से पारित प्रस्ताव के द्वारा भी हटाया जा सकता है। यदि वह प्रस्ताव संसद के कम-से-कम आधे सदस्यों. द्वारा पास किया जाये और संसद का अध्यक्ष भी सन्तुष्ट हो कि आरोपों में दम है, तो संसद का अध्यक्ष उसे सर्वोच्च न्यायालय को भेज सकता है।
  2. भारत में राष्ट्रपति 5 वर्ष के लिए चुना जाता है और उसे इससे पहले केवल संविधान के उल्लंघन के आधार पर महाभियोग के द्वारा हटाया जा सकता है। संसद विशेष बहुमत की प्रक्रिया के द्वारा राष्ट्रपति को पदच्युत कर सकती है। यहाँ राष्ट्रपति के महाभियोग में सर्वोच्च न्यायालय की कोई भूमिका नहीं है।

पृष्ठ 86

प्रश्न 6.
राष्ट्रपति के लिए किताबों में स्त्रीलिंग और पुल्लिंग- दोनों का प्रयोग किया जाता है। क्या कभी कोई महिला भी राष्ट्रपति हुई है?
उत्तर:
हाँ, भारत में महिला भी राष्ट्रपति हुई हैं। श्रीमती प्रतिभा पाटिल महिला राष्ट्रपति हुई हैं।

पृष्ठ 89

प्रश्न 7.
कल्पना करें कि प्रधानमन्त्री किसी राज्य में इस आधार पर राष्ट्रपति शासन लगाना चाहता है कि वहाँ की सरकार दलितों पर अत्याचार रोकने में विफल रही है। राष्ट्रपति की सोच कुछ अलग है। उसका कहना है कि राष्ट्रपति शासन का अपवाद स्वरूप ही प्रयोग करना चाहिए। इस स्थिति में राष्ट्रपति के पास निम्नलिखित में से कौनसा विकल्प है?
(क) वह प्रधानमन्त्री को बताए कि राष्ट्रपति शासन की घोषणा करने वाले आदेश पर वह हस्ताक्षर नहीं करेगा।
(ख) प्रधानमन्त्री को बर्खास्त कर दे।
(ग) वह प्रधानमन्त्री से वहाँ केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल भेजने को कहे।
(घ) एक प्रेस वक्तव्य दे कि क्यों प्रधानमन्त्री गलत है।
(ङ) इस सम्बन्ध में प्रधानमन्त्री से बातचीत करे और उसे ऐसा करने से रोके परन्तु यदि प्रधानमन्त्री दृढ़ रहे तब उस पर हस्ताक्षर कर दे।
उत्तर:
(ङ) इस सम्बन्ध में राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री से बातचीत करे और उसे ऐसा करने से रोके परन्तु यदि प्रधानमन्त्री दृढ़ रहे, तब उस पर हस्ताक्षर कर दे।

पृष्ठ 93.

प्रश्न 8.
मुख्यमन्त्री विश्वासमत जीतकर भी खुश नहीं हैं। वे कह रहे हैं कि विश्वास मत जीतने के बावजूद उनकी परेशानियाँ बरकरार हैं। क्या आप सोच सकते हैं, वे ऐसा क्यों कह रहे हैं?
उत्तर:
जब विधानसभा में किसी एक दल को या किसी चुनाव पूर्व गठबन्धन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता तो राज्यपाल सबसे बड़े दल या गठबन्धन के नेता को इस शर्त पर मुख्यमन्त्री बनाता है कि उसे अमुक तिथि तक विधानसभा विश्वासमत जीतना है। इस स्थिति में जब मुख्यमन्त्री विश्वास मत जीत भी लेता है, तो भी उसकी परेशानियाँ बनी रहती हैं। क्योंकि अब उसे एक नेता से अधिक एक मध्यस्थ की भूमिका निभानी होती है। उसे निरन्तर अपने राजनीतिक सहयोगियों से परामर्श कर चलना पड़ता है क्योंकि विभिन्न सहयोगी दलों के बीच काफी बातचीत और समझौते के बाद ही नीतियाँ बन पायेंगी। इसी सन्दर्भ में विश्वासमत जीतने के बावजूद मुख्यमन्त्री ऐसा कह रहे हैं कि अभी उनकी परेशानियाँ बरकरार हैं।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 कार्यपालिका

पृष्ठ 94

प्रश्न 9.
मान लीजिए कि प्रधानमन्त्री को मन्त्रिपरिषद् का गठन करना है। वह क्या करेगा/करेगी-
(क) विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों का चयन।
(ख) केवल अपनी पार्टी के लोगों का चयन।
(ग) केवल व्यक्तिगत रूप से निष्ठावान और विश्वसनीय लोगों का चयन।
(घ) केवल सरकार के समर्थकों का चयन।
(ङ) मन्त्री बनने की होड़ में शामिल व्यक्तियों की राजनीतिक ताकत का अंदाजा लगाकर ही उनका चयन।
उत्तर:
(ङ) प्रधानमन्त्री मन्त्रिपरिषद् का गठन करते समय मन्त्री बनने की होड़ में शामिल व्यक्तियों की राजनीतिक ताकत का अंदाजा लगाकर ही उनका चयन करेगा।

Jharkhand Board Class 11 Political Science कार्यपालिका Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
संसदीय कार्यपालिका का अर्थ होता है
(क) जहाँ ससद हो वहाँ कार्यपालिका का होना।
(ख) संसद द्वारा निर्वाचित कार्यपालिका।
(ग) जहाँ संसद कार्यपालिका के रूप में काम करती है।
(घ) ऐसी कार्यपालिका जो संसद के बहुमत के समर्थन पर निर्भर हो।
उत्तर:
(घ) संसदीय कार्यपालिका का अर्थ होता है ऐसी कार्यपालिका जो संसद के बहुमत के समर्थन पर निर्भर हो।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित संवाद पढ़ें। आप किस तर्क से सहमत हैं और क्यों? अमित- संविधान के प्रावधानों को देखने से लगता है कि राष्ट्रपति का काम सिर्फ ठप्पा मारना है। शमा: राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की नियुक्ति करता है। इस कारण उसे प्रधानमन्त्री को हटाने का भी अधिकार होना चाहिए। राजेश: हमें राष्ट्रपति की जरूरत नहीं। चुनाव के बाद, संसद बैठक बुलाकर एक नेता चुन सकती है जो प्रधानमन्त्री बने।
उत्तर:
अमित, शमा और राजेश के उपर्युक्त संवाद में मैं अमित के तर्क से सहमत हूँ, लेकिन शमा और राजेश के तर्क से सहमत नहीं हूँ। अमित के तर्क से सहमत होने का कारण यह है कि भारत में संसदात्मक कार्यपालिका को अपनाया गया है जिसमें राष्ट्र या राज्य का अध्यक्ष नाम मात्र का कार्यपालिका अध्यक्ष होता है और मन्त्रिपरिषद् सहित प्रधानमन्त्री सरकार का अध्यक्ष होता है और वह वास्तविक कार्यपालिका अध्यक्ष होता है। भारत में राष्ट्रपति का पद नाममात्र की कार्यपालिका अध्यक्ष का पद है।

यद्यपि सिद्धान्त रूप में समस्त सरकार के कार्य राष्ट्रपति के नाम से किये जाते हैं लेकिन व्यवहार में सामान्य स्थिति में राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री सहित मन्त्रिपरिषद् की सलाह के अनुसार ही कार्य करता है। इससे स्पष्ट होता है कि संवैधानिक दृष्टि से राष्ट्रपति नाम मात्र का अध्यक्ष है। संविधान में स्पष्ट लिखा है कि राष्ट्रपति अपने कृत्यों का प्रयोग करने में मन्त्रिपरिषद् की सलाह के अनुसार ही कार्य करेगा। राष्ट्रपति मन्त्रिपरिषद् की सलाह मानने के लिए बाध्य है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित को सुमेलित करें:

(क) भारतीय विदेश सेवाजिसमें बहाली हो उसी प्रदेश में काम करती है।
(ख) प्रादेशिक लोक सेवाकेन्द्रीय सरकार के दफ्तरों में काम करती हैं जो या तो देश की राजधानी में होते हैं या देश में कहीं और।
(ग) अखिल भारतीय सेवाएँजिस प्रदेश में भेजा जाए उसमें काम करती है, इसमें प्रतिनियुक्ति पर केन्द्र में भी भेजा जा सकता है।
(घ) केन्द्रीय सेवाएँभारत के विदेशों में कार्यरत।

उत्तर:

(क) भारतीय विदेश सेवाभारत के विदेशों में कार्यरत।
(ख) प्रादेशिक लोक सेवाजिसमें बहाली हो उसी प्रदेश में काम करती है।
(ग) अखिल भारतीय सेवाएँजिस प्रदेश में भेजा जाए उसमें काम करती है, इसमें प्रतिनियुक्ति पर केन्द्र में भी भेजा जा सकता है।
(घ) केन्द्रीय सेवाएँकेन्द्रीय सरकार के दफ्तरों में काम करती हैं जो या तो देश की राजधानी में होते हैं या देश में कहीं और।

प्रश्न 4.
उस मन्त्रालय की पहचान करें जिसने निम्नलिखित समाचार को जारी किया होगा। यह मन्त्रालय प्रदेश की सरकार का है या केन्द्र सरकार का और क्यों?
(क) आधिकारिक तौर पर कहा गया है कि सन् 2004-05 में तमिलनाडु पाठ्यपुस्तक निगम कक्षा 7, 10 और 11 की नई पुस्तकें जारी करेगा।
(ख) भीड़ भरे तिरुवल्लूर: चेन्नई खण्ड में लौह-अयस्क निर्यातकों की सुविधा के लिए एक नई रेल लूप लाइन बिछाई जायेगी। नई लाइन लगभग 80 कि.मी. की होगी। यह लाइन पुट्टूर से शुरू होगी और बन्दरगाह के निकट अतिपट्टू तक जाएगी।
(ग) रमयपेट मण्डल में किसानों की आत्महत्या की घटनाओं की पुष्टि के लिए गठित तीन सदस्यीय उप- विभागीय समिति ने पाया कि इस माह आत्महत्या करने वाले दो किसान फसल के मारे जाने से आर्थिक समस्याओं का सामना कर रहे थे।
उत्तर:
(कं) यह समाचार तमिलनाडु राज्य के शिक्षा मन्त्रालय द्वारा जारी किया गया होगा क्योंकि तमिलनाडु पाठ्यपुस्तक निगम द्वारा तमिलनाडु राज्य में कक्षा 7, 10 और 11 के लिए नया सत्र शुरू करना था।

(ख) पुट्टूर से प्रारम्भ होकर चेन्नई बन्दरगाह के निकट अतिपट्टू तक 80 किमी. लम्बी नई रेल लूप लाइन बिछाने का आदेश रेल मन्त्रालय का है। यह मन्त्रालय केन्द्र सरकार का है क्योंकि रेलवे विषय संघ सूची का विषय है

(ग) रायमपेट मण्डल में दो किसानों ने आत्महत्या की जिसके लिए तीन सदस्यीय सब-डिवीजनल समिति ने जाँच की कि ये किसान फसल के मारे जाने की वजह से आर्थिक समस्या से परेशान थे और इसलिए आत्महत्या कर ली। यह मामला कृषि मन्त्रालय का है जो राज्य मन्त्रिमण्डल के अधीन आता है। लेकिन इसमें केन्द्र सरकार का कृषि मन्त्रालय भी राज्य सरकार के माध्यम से किसानों की सहायता हेतु कदम उठा सकता है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 कार्यपालिका

प्रश्न 5.
प्रधानमन्त्री की नियुक्ति करने में राष्ट्रपति:
(क) लोकसभा के सबसे बड़े दल के नेता को चुनता है।
(ख) लोकसभा में बहुमत अर्जित करने वाले गठबन्धन के दलों में सबसे बड़े दल के नेता को चुनता है।
(ग) राज्यसभा के सबसे बड़े दल के नेता को चुनता है।
(घ) गठबन्धन अथवा उस दल के नेता को चुनता है जिसे लोकसभा के बहुमत का समर्थन प्राप्त हो।
उत्तर:
(घ) प्रधानमन्त्री की नियुक्ति में राष्ट्रपति गठबन्धन अथवा उस दल के नेता को चुनता है जिसे लोकसभा के बहुमत का समर्थन प्राप्त हो।

प्रश्न 6.
इस चर्चा को पढ़कर बताएँ कि कौनसा कथन भारत पर सबसे ज्यादा लागू होता है।
आलोक:  प्रधानमन्त्री राजा के समान है। वह हमारे देश में हर बात का फैसला करता है।
शेखर: प्रधानमन्त्री सिर्फ ‘समान हैसियत के सदस्यों में प्रथम है। उसे कोई विशेष अधिकार प्राप्त नहीं। सभी मन्त्रियों और प्रधानमन्त्री के अधिकार बराबर हैं।
बॉबी: प्रधानमन्त्री को दल के सदस्यों तथा सरकार को समर्थन देने वाले सदस्यों का ध्यान रखना पड़ता है। लेकिन कुल मिलाकर देखें तो नीति-निर्माण तथा मन्त्रियों के चयन में प्रधानमन्त्री की बहुत ज्यादा चलती है।
उत्तर:
उपर्युक्त चर्चा में तीसरा कथन अर्थात् बॉबी का कथन भारत के सन्दर्भ में सबसे ज्यादा लागू होता है।

प्रश्न 7.
क्या मन्त्रिमण्डल की सलाह राष्ट्रपति को हर हाल में माननी पड़ती है? आप क्या सोचते हैं? अपना उत्तर अधिकतम 100 शब्दों में लिखें।
उत्तर:
भारत में राष्ट्रपति संवैधानिक या नाममात्र का अध्यक्ष है और मन्त्रिमण्डल वास्तविक अध्यक्ष। संविधान के अनुच्छेद 74(1) में कहा गया है कि ” राष्ट्रपति की सहायता और सलाह देने के लिए एक मन्त्रिपरिषद् होगी जिसका
उत्तर:
(क) भारतीय विदेश सेवा
(ख) प्रादेशिक लोक सेवा
(ग) अखिल भारतीय सेवाएँ
(घ) केन्द्रीय सेवाएँ
भारत के विदेशों में कार्यरत।
जिसमें बहाली ( भर्ती) हो उसी प्रदेश में कार्य करती है।

प्रश्न 8.
संसदीय व्यवस्था ने कार्यपालिका को नियन्त्रण में रखने के लिए विधायिका को बहुत से अधिकार दिये हैं। कार्यपालिका को नियन्त्रित करना इतना जरूरी क्यों है? आप क्या सोचते हैं?
उत्तर:
भारतीय संविधान के द्वारा संसदीय शासन व्यवस्था की स्थापना की गई है। अतः कार्यपालिका संसद अर्थात् लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। मन्त्रिमण्डल उसी समय तक अपने पद पर रहता है जब तक कि उसे लोकसभा का विश्वास प्राप्त हो । संसद अनेक प्रकार से कार्यपालिका पर नियन्त्रण रख सकती है। संसद सदस्य मन्त्रियों से सरकारी नीति के सम्बन्ध में प्रश्न तथा पूरक प्रश्न पूछकर कार्यपालिका पर अंकुश लगाते हैं।

संसद सरकारी विधेयक या बजट को अस्वीकार करके, मन्त्रियों के वेतन में कटौती का प्रस्ताव स्वीकार करके अथवा किसी सरकारी विधेयक में ऐसा संशोधन करके जिससे सरकार सहमत न हो, अपना विरोध प्रदर्शित कर सकती है। इसके अतिरिक्त वह काम रोको प्रस्ताव, निन्दा प्रस्ताव तथा अविश्वास प्रस्ताव के द्वारा कार्यपालिका पर नियन्त्रण रखती है।

निम्नलिखित कारणों से संसद द्वारा कार्यपालिका को नियन्त्रित करना आवश्यक है।

  1. एक लोकतान्त्रिक शासन में समस्त शक्तियाँ जनता में निहित होती हैं। कार्यपालिका जनता की तरफ से ही अपनी शक्तियों का प्रयोग करती है। इसलिए इसे संसद, जो कि जनता का प्रतिनिधि सदन है, के माध्यम से जनता के प्रति उत्तरदायी बनाया गया है।
  2. यदि बजट के स्वरूप में कार्यपालिका पर कोई नियन्त्रण नहीं रखा जाये तो कार्यपालिका जनता पर निरंकुश होकर कर लगायेगी और करों का संकलन भी निरंकुशतापूर्ण ढंग से करेगी तथा राष्ट्र के धन को भी निरंकुशतापूर्ण ढंग से व्यय करेगी। इसलिए कार्यपालिका द्वारा प्रस्तुत बजट पर संसद के नियन्त्रण का होना आवश्यक है।
  3. संसदीय नियन्त्रण के अभाव में, कार्यपालिका अपनी शक्तियों का प्रयोग निरंकुश होकर करेगी। इससे लोक- कल्याण से उसका ध्यान हटेगा और उसका व्यवहार पक्षपातपूर्ण होगा क्योंकि शक्ति भ्रष्ट करती है और निरंकुश शक्ति पूर्णत: भ्रष्ट करती है।
  4. यदि कार्यपालिका पर संसद कोई नियन्त्रण नहीं रखे तो कार्यपालिका धीरे-धीरे समस्त शक्तियाँ अपने हाथों में केन्द्रित कर लेगी और वह निरंकुशता का व्यवहार करने लगेगी।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 कार्यपालिका

प्रश्न 9.
कहा जाता है कि प्रशासनिक तन्त्र के कामकाज में बहुत ज्यादा राजनीतिक हस्तक्षेप होता है। सुझाव के तौर पर कहा जाता है कि ज्यादा से ज्यादा स्वायत्त एजेन्सियां बननी चाहिए जिन्हें मन्त्रियों को जवाब न देना पड़े।
(क) क्या आप मानते हैं कि इससे प्रशासन ज्यादा जन हितैषी होगा?
(ख) क्या इससे प्रशासन की कार्यकुशलता बढ़ेगी?
(ग) क्या लोकतन्त्र का अर्थ यह होता है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों का प्रशासन पर पूर्ण नियन्त्रण हो?
उत्तर:
(क) प्रशासनिक तन्त्र के माध्यम से सरकार अपनी लोक कल्याणकारी नीतियों को जनता तक पहुँचाती है; उन्हें कार्यान्वित करती है। सामान्यतः आम आदमी की पहुँच प्रशासनिक अधिकारियों तक नहीं होती। नौकरशाही आम नागरिकों की माँगों और आशाओं के प्रति संवेदनशील नहीं होती। राजनीतिक हस्तक्षेप के द्वारा प्रजातन्त्र में नौकरशाही की इस कमी को दूर करने का प्रयास किया जाता है। लेकिन यदि यह राजनीतिक हस्तक्षेप बहुत ज्यादा हो जाता है तो प्रशासन राजनीतिज्ञों के हाथ का खिलौना बन जाता है तथा प्रशासन पूर्णत: संवेदनहीन होकर राजनीतिज्ञों की हाँ में हाँ मिलाने लगता है।

इससे प्रशासन में भ्रष्टाचार, निरंकुशता, पक्षपातपूर्ण व्यवहार बढ़ जाता है और लोक कल्याण तिरोहित हो जाता है। इस स्थिति से छुटकारा पाने तथा प्रशासन को संवेदनशील, कार्यकुशल तथा निष्पक्ष बनाने रखने के लिए यह सुझाव कि ज्यादा से ज्यादा स्वायत्त एंजेन्सियाँ बनायी जायें ताकि राजनैतिक हस्तक्षेप रुके और प्रशासन जन हितैषी बन सके, उपयुक्त है। इससे प्रशासन अधिक जन हितैषी होगा क्योंकि वह स्वतन्त्रतापूर्वक निष्पक्षता व कुशलता से अपना कार्य कर सकेगा।

(ख) ज्यादा से ज्यादा ऐसी स्वायत्त एजेन्सियाँ बनाने से, जिन्हें मन्त्रियों को जवाब न देना पड़े, भ्रष्टाचार, संवेदनहीनता और निष्क्रियता समाप्त होगी और वह स्वतन्त्रतापूर्वक बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के कार्य करेंगे। इससे उनकी कार्यकुशलता में वृद्धि होगी।

(ग) लोकतन्त्र का अर्थ है कि शासन जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप हो। जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि अर्थात् मन्त्री जब प्रशासन पर नियन्त्रण रखते हैं तो जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप शासन संचालित होता है क्योंकि प्रशासन संवेदनशील होकर लोक कल्याणकारी नीतियों को कार्यान्वित करने लगता है। लेकिन जब चुने हुए प्रतिनिधियों का प्रशासन पर पूर्ण नियन्त्रण हो जाता है, तो प्रशासनिक अधिकारी चाटुकार हो जाते हैं। वे मन्त्रियों की हाँ में हाँ मिलाने को ही अपना प्रमुख कार्य समझने लगते हैं। ऐसी स्थिति में प्रशासन संवेदनशील नहीं रहता, वह जनहित की उपेक्षा करने लगता है; भ्रष्टाचार तथा पक्षपातपूर्ण व्यवहार बढ़ जाता है।

इस प्रकार सही अर्थों में लोकतन्त्र नहीं रहता है। अतः यह कहना सही नहीं है कि चुने हुए प्रतिनिधियों का प्रशासन पर पूर्ण नियन्त्रण होना ही लोकतन्त्र है। लोकतन्त्र का सही अर्थ है। प्रशासन द्वारा जनहितकारी कार्यों को निष्पक्षता तथा कार्यकुशलता से जनता के प्रति संवेदनशील होते हुए करना। जनप्रतिनिधियों का ऐसा नियन्त्रण जो प्रशासन को इस ओर सक्रिय करे, उत्तरदायी बनाए लोकतन्त्रकारी कहलायेगा और ऐसा नियन्त्रण जो उसे जनता के प्रति संवेदनहीन, भ्रष्ट तथा अकुशल बनायेगा, वह लोकतन्त्र विरोधी कहलायेगा।

प्रश्न 10.
नियुक्ति आधारित प्रशासन की जगह निर्वाचित आधारित प्रशासन होना चाहिए- इस विषय पर 200 शब्दों में एक लेख लिखो
उत्तर:
निर्वाचित आधारित प्रशासन
यदि प्रशासनिक कर्मचारियों को नियुक्ति के आधार के स्थान पर निर्वाचन के आधार पर लिया जाये तो यह हानिप्रद होगा। इसे निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है।
1. नीतियों को लागू करने में अनिश्चितता व अस्थिरता: यदि प्रशासन निर्वाचन के आधार पर लिया जायेगा तो निर्वाचित प्रशासक नीतियों को बदल देंगे। इससे नीतियों को लागू करने में अनिश्चितता और अस्थिरता की स्थिति पैदा हो जायेगी।

2. निष्पक्षता व तटस्थता का अभाव: नियुक्त प्रशासन पक्षपात रहित होता है क्योंकि सिविल सेवकों को केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारों के द्वारा योग्यता के आधार पर नियुक्त किया जाता है। इनकी नियुक्ति एक स्वतन्त्र लोक सेवा आयोग की सिफारिश पर की जाती है। इससे प्रशासन में निष्पक्षता तथा तटस्थता बनी रहती है। लेकिन यदि लोकसेवकों की भर्ती चुनाव के द्वारा की जायेगी तो अलग-अलग पार्टियों के उम्मीदवारों की जीत होने पर नीतियों को लागू करने में अड़चनें आयेंगी। वे निष्पक्ष और तटस्थ नहीं रह पायेंगे।

3. अयोग्य तथा अकुशल प्रशासक: लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित किये गये प्रशासक योग्य तथा कुशल होते हैं क्योंकि उनके चयन का मापदण्ड योग्यता एवं कुशलता ही होता है। लेकिन यदि इनकी भर्ती निर्वाचन के आधार पर होगी तो उनकी योग्यता व कुशलता की गारण्टी नहीं दी जा सकती क्योंकि उनकी भर्ती का आधार उनकी योग्यता व कुशलता न होकर लोकप्रियता होगी। ऐसी स्थिति में प्रशासन में योग्यता व कुशलता का अभाव हो जायेगा अर्थात् प्रशासन प्राय: अकुशल हो जावेगा।

4. अस्थिरता और अनुभवहीनता: निर्वाचन के आधार पर प्रशासनिक अधिकारियों व कर्मचारियों की भर्ती प्रशासन में अस्थिरता और अनुभवहीनता भी लायेगी। लोक सेवा आयोगों द्वारा चयनित प्रशासनिक अधिकारी एक निश्चित आयु तक नियुक्त किये जाते हैं। इसलिए ये एक लम्बी अवधि तक प्रशासन में रहते हैं। इस कारण प्रशासन स्थायी, तटस्थ, अनुभवशील तथा कार्यकुशल होता है लेकिन निर्वाचन द्वारा भर्ती किये गये प्रशासनिक अधिकारी एक छोटी अवधि के लिए निर्वाचित होंगे। फलतः प्रशासन में अस्थिरता आयेगी और आवश्यक नहीं है कि वे पुनः निर्वाचित हो सकें।

इस कारण प्रशासन में अनुभवहीनता का प्रवेश हो जाता है। ऐसी स्थिति में वे नीतियों को बनाने व लागू करने में मन्त्रियों को कोई सहयोग नहीं दे पायेंगे। वे राजनीतिक रूप से तटस्थ भी नहीं रह सकते। अतः स्पष्ट है कि यदि प्रशासन को नियुक्ति के बजाय निर्वाचित किया जायेगा तो प्रशासन पक्षपातमूलक, अस्थिर, अयोग्य, अकुशल हो जायेगा ! अतः नियुक्ति आधारित प्रशासन की जगह निर्वाचित आधारित प्रशासन नहीं होना चाहिए।

 कार्यपालिका JAC Class 11 Political Science Notes

→ परिचय: सरकार के तीन अंग हैं। विधायका, कार्यपालिका और न्यायपालिका । ये तीनों मिलकर शासन का कार्य करते हैं तथा कानून व्यवस्था बनाए रखने और जनता का कल्याण करने में योगदान देते हैं। संविधान यह सुनिश्चित करता है कि ये सभी एक-दूसरे से तालमेल बनाकर काम करें और आपस में सन्तुलन बनाये रखें। कार्यपालिका क्या है? सरकार का वह अंग जो विधायिका द्वारा लिये गये नीतिगत निर्णयों, नियमों और कायदों को लागू करता है और प्रशासन का काम करता है, कार्यपालिका कहलाता है। कार्यपालिका का औपचारिक नाम अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न होता है। कुछ देशों में राष्ट्रपति होता है, तो कहीं चांसलर। कार्यपालिका में केवल राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री या मन्त्री ही नहीं होते बल्कि इसके अन्दर सम्पूर्ण प्रशासनिक ढाँचा भी सामिल है।

→ राजनीतिक कार्यपालिका: सरकार के प्रधान और उनके मन्त्रियों को राजनीतिक कार्यपालिका कहते हैं और वे सरकार के सभी नीतियों के लिए उत्तरदायी होते हैं।

→  स्थायी कार्यपालिका: जो लोग रोज-रोज के प्रशासन के लिए उत्तरदायी होते हैं, उन्हें स्थायी कार्यपालिका कहते हैं।

→  कार्यपालिका के प्रकार: नेतृत्व के आधार पर कार्यपालिका के दो प्रकार बताये जा सकते हैं।

  • सामूहिक नेतृत्व के सिद्धान्त पर आधारित प्रणाली और
  • एक व्यक्ति के नेतृत्व के सिद्धान्त पर आधारित प्रणाली।

→ सामूहिक नेतृत्व के सिद्धान्त पर आधारित प्रणाली: सामूहिक नेतृत्व के सिद्धान्त पर आधारित कार्यपालिका के दो प्रकार हैं।
(अ) संसदीय कार्यपालिका,
(ब) अर्द्ध- अध्यक्षात्मक कार्यपालिका। यथा

(अ) संसदीय कार्यपालिका।

  • संसदीय सरकार (कार्यपालिका) के प्रमुख को आम तौर पर प्रधानमन्त्री कहते हैं। प्रधानमन्त्री तथा मन्त्रिमण्डल के पास वास्तविक शक्ति होती है।
  • प्रधानमन्त्री विधायिका में बहुमत वाले दल का नेता होता है।
  • वह विधायिका के प्रति जवाबदेह होता है
  • संसदीय कार्यपालिका में राजा या राष्ट्रपति देश का (राष्ट्र का) प्रमुख होता है जो औपचारिक या नाम मात्र का कार्यपालिका प्रमुख होती है।
  • जर्मनी, इटली, जापान, इंग्लैण्ड, पुर्तगाल तथा भारत आदि देशों में यह व्यवस्था है।

(ब) अर्द्ध- अध्यक्षात्मक कार्यपालिका-

  • अर्द्ध-अध्यक्षात्मक कार्यपालिका (सरकार) में राष्ट्रपति देश का प्रमुख होता है।
  • इसमें प्रधानमन्त्री सरकार का प्रमुख होता है।
  • इसमें प्रधानमन्त्री और उसका मन्त्रिपरिषद् विधायिका के प्रति जवाबदेह होता है।
  • फ्रांस, रूस और श्रीलंका में ऐसी ही व्यवस्था है।

→ एक व्यक्ति के नेतृत्व के सिद्धान्त पर आधारित प्रणाली: अध्यक्षात्मक प्रणाली:

  • अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति देश का प्रमुख होता है। वही सरकार का भी प्रमुख होता है।
  • राष्ट्रपति का चुनाव प्रायः प्रत्यक्ष मतदान से होता है।
  • वह विधायिका के प्रति जवाबदेह नहीं होता।
  • अमेरिका, ब्राजील और लैटिन अमेरिका के अनेक देशों में ऐसी व्यवस्था पायी जाती है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 कार्यपालिका

→ भारत में संसदीय कार्यपालिका
भारतीय संविधान में राष्ट्रीय और प्रान्तीय दोनों ही स्तरों पर संसदीय कार्यपालिका की व्यवस्था को स्वीकार किया गया है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत राष्ट्रपति, भारत में राज्य का औपचारिक प्रधान होता है तथा प्रधानमन्त्री सहित मन्त्रिपरिषद् राष्ट्रीय स्तर पर सरकार चलाते हैं। राज्यों के स्तर पर राज्यपाल राज्य का नाम मात्र का प्रमुख तथा मुख्यमन्त्री और मन्त्रिपरिषद् वास्तविक सरकार के प्रमुख होते हैं।

→  भारत का राष्ट्रपति: भारत के संविधान में औपचारिक रूप से संघ की कार्यपालिका शक्तियाँ राष्ट्रपति को दी गई हैं।

→ निर्वाचन: राष्ट्रपति 5 वर्ष के लिए चुना जाता है। राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष तरीके से होता है। इसका अर्थ यह है कि राष्ट्रपति का निर्वाचन निर्वाचित विधायक और सांसद करते हैं। यह निर्वाचन समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली और एकल संक्रमणीय मत के सिद्धान्त के अनुसार होता है।

→ पदच्युति: केवल संसद ही राष्ट्रपति को महाभियोग की प्रक्रिया के द्वारा उसके पद से हटा सकती है। महाभियोग केवल संविधान के उल्लंघन के आधार पर लगाया जा सकता है।

→ शक्ति और स्थिति: राष्ट्रपति सरकार का औपचारिक प्रधान है। उसे औपचारिक रूप से बहुत-सी कार्यकारी, विधायी, कानूनी और आपात शक्तियाँ प्राप्त हैं। लेकिन राष्ट्रपति अपने कृत्यों का प्रयोग करने में प्रधानमन्त्री सहित मन्त्रिपरिषद् की सलाह के अनुसार कार्य करेगा। इस प्रकार अधिकतर मामलों में राष्ट्रपति को मन्त्रिपरिषद् की सलाह माननी पड़ती है। लेकिन राष्ट्रपति मन्त्रिपरिषद को अपनी सलाह पर एक बार पुनर्विचार करने के लिए कह सकता है, लेकिन उसे मन्त्रिपरिषद् के द्वारा पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह को मानना ही पड़ेगा।

→ राष्ट्रपति के विशेषाधिकार:

  • संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति को सभी महत्त्वपूर्ण मुद्दों और मन्त्रिपरिषद् की कार्यवाही के बारे में सूचना प्राप्त करने का अधिकार है।
  • राष्ट्रपति मन्त्रिपरिषद् की सलाह को पुनर्विचार करने के लिए एक बार लौटा सकता है।
  • राष्ट्रपति के पास वीटो (निषेधाधिकार) की शक्ति होती है जिससे वह संसद द्वारा पारित विधेयकों (धन विधेयकों को छोड़कर) पर स्वीकृति देने में विलम्ब कर सकता है या स्वीकृति देने से मना कर सकता है। इसे कई बार ‘पाकेट वीटो’ भी कहा जाता है।
  • जब आम चुनाव के बाद किसी एक दल या गठबन्धन को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ हो और दो या तीन नेता यह दावा करें कि उन्हें लोकसभा में बहुमत प्राप्त है। तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति को अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर यह निर्णय लेना होता है कि किसे बहुमत का समर्थन प्राप्त है। भारत में 1989 के बाद से राष्ट्रपति के इस विशेषाधिकार का महत्त्व बढ़ गया है।

→ राष्ट्रपति पद की आवश्यकता (महत्त्व):
यद्यपि भारत की संसदीय व्यवस्था में राष्ट्रपति का पद एक औपचारिक शक्ति वाले आलंकारिक प्रधान का पद है, तथापि संसदीय व्यवस्था में इस पद का अपना महत्त्व है। यथा

→ सामान्य परिस्थितियों में आवश्यकता: संसदीय व्यवस्था में जब कभी मन्त्रिपरिषद् में लोकसभा का विश्वास नहीं रहता तो उसे पद से हटना पड़ता है और तब उसकी जगह एक नई मन्त्रिपरिषद् की नियुक्ति करनी पड़ेगी । ऐसी परिस्थिति में एक ऐसे राष्ट्र प्रमुख की जरूरत पड़ती है, जिसका कार्यकाल स्थायी हो, जिसके पास प्रधानमन्त्री को नियुक्त करने की शक्ति हो और जो सांकेतिक रूप से पूरे देश का प्रतिनिधित्व कर सके। सामान्य परिस्थितियों में राष्ट्रपति की यही भूमिका है।

→ असामान्य परिस्थितियों में महत्त्व: जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता तब राष्ट्रपति पर अपने विवेक से निर्णय लेने और देश की सरकार चलाने के लिए प्रधानमन्त्री को नियुक्त करने की अतिरिक्त जिम्मेदारी होती है।

→ भारत का उपराष्ट्रपति: भारत का उपराष्ट्रपति पाँच वर्ष के लिए चुना जाता है। इसे संसद के निर्वाचित सदस्य ही चुनते हैं। उपराष्ट्रपति को हटाने के लिए राज्यसभा को अपने बहुमत से इस आशय का प्रस्ताव पास करना पड़ता है और उस प्रस्ताव पर लोकसभा की सहमति लेनी पड़ती है। उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन अध्यक्ष होता है और किसी कारणवश राष्ट्रपति का पद रिक्त होने पर वह कार्यवाहक राष्ट्रपति का काम करता है।

→ मन्त्रिपरिषद् का गठन: प्रधानमन्त्री और मन्त्रिपरिषद्: प्रधानमन्त्री मन्त्रिपरिषद् का प्रधान है। लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री नियुक्त करता है और उसकी सलाह से अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है। प्रधानमन्त्री विभिन्न मन्त्रियों में पद स्तर और मन्त्रालयों का आबंटन करता है। मन्त्रियों को उनकी वरिष्ठता और राजनीतिक महत्त्व के अनुसार मन्त्रिमण्डल का मन्त्री, राज्यमन्त्री या उपमन्त्री बनाया जाता है। प्रधानमन्त्री और सभी मन्त्रियों के लिए छ: महीने के अन्दर संसद का सदस्य होना अनिवार्य है। मन्त्रिपरिषद् के सदस्यों की संख्या लोकसभा (राज्यों में विधानसभा) की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती।

→ सामूहिक उत्तरदायित्व: मन्त्रिपरिषद् लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। यदि किसी एक मन्त्री के विरुद्ध भी अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाए तो सम्पूर्ण मन्त्रिपरिषद् को त्याग-पत्र देना पड़ता है।

→प्रधानमन्त्री की भूमिका तथा शक्तियाँ: मन्त्रिपरिषद् की केन्द्रीय धुरी: भारत में प्रधानमन्त्री का सरकार में स्थान सर्वोपरि है। बिना प्रधानमन्त्री के मन्त्रिपरिषद् का कोई अस्तित्व नहीं। प्रधानमन्त्री के पद ग्रहण करने के पश्चात् ही मन्त्रिपरिषद् अस्तित्व में आती है और उसके त्याग-पत्र देने पर पूरी मन्त्रिपरिषद् ही भंग हो जाती है।

→ सेतु की भूमिका; प्रधानमन्त्री एक तरफ मन्त्रिपरिषद् तथा दूसरी ओर राष्ट्रपति और संसद के बीच एक सेतु का काम करता है। सरकार की नीतियों के निर्णय में प्रभावी भूमिका: प्रधानमन्त्री सरकार के सभी महत्त्वपूर्ण निर्णयों में सम्मिलित होता है और सरकार की नीतियों के बारे में निर्णय लेता है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 कार्यपालिका

→ अन्य भूमिकाएँ: प्रधानमन्त्री की अन्य भूमिकाएँ हैं मन्त्रिपरिषद् पर नियन्त्रण, लोकसभा का नेतृत्व, अधिकारी जमात पर आधिपत्य, मीडिया तक पहुंच, चुनाव के दौरान उसके व्यक्तित्व का उभार, अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और विदेश यात्राओं के दौरान राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरना। जब लोकसभा में किसी एक राजनीतिक दल को बहुमत मिलता है, तब प्रधानमन्त्री की शक्तियाँ निर्विवाद रहती हैं, लेकिन गठबन्धन की सरकारों में राष्ट्रपति की ये शक्तियाँ अनेक सीमाओं से बँधी रहती हैं।

→ राज्यों की कार्यपालिका: भारत में कुछेक बदलावों के साथ राज्यों में भी ठीक केन्द्र की तरह ही लोकतान्त्रिक कार्यपालिका होती है।

  • राष्ट्रपति के स्थान पर राज्य में एक राज्यपाल होता है जो ( केन्द्रीय सरकार की सलाह पर) राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है।
  • राज्यपाल के पास राष्ट्रपति से कहीं अधिक विवेकाधीन शक्तियाँ हैं।
  • प्रधानमन्त्री की ही तरह राज्य में मुख्यमन्त्री होता है जो विधानसभा में बहुमत दल का नेता होता है।
  • राज्य के स्तर पर भी संसदात्मक सरकार के प्रमुख सिद्धान्त लागू होते हैं।

→ स्थायी कार्यपालिका नौकरशाही:
मन्त्रियों के निर्णय को प्रशासनिक मशीनरी नागरिक सेवा के स्थायी अधिकारी व कर्मचारी लागू करते हैं। इसे ही नौकरशाही कहते हैं। सरकार के स्थायी कर्मचारी के रूप में कार्य करने वाले प्रशिक्षित और प्रवीण अधिकारी नीतियों को बनाने और उसे लागू करने में मन्त्रियों का सहयोग करते हैं। नौकरशाही से यह अपेक्षा की जाती है कि वह राजनीतिक रूप से तटस्थ हो। भारत में एक दक्ष प्रशासनिक मशीनरी मौजूद है जो राजनीतिक रूप से उत्तरदायी है।

→ सिविल सेवाओं का वर्गीकरण:

  • अखिल भारतीय सेवाएँ
    • भारतीय प्रशासनिक सेवा
    • भारतीय पुलिस सेवा।
  • केन्द्रीय सेवाएँ
    • भारतीय विदेश सेवा
    • भारतीय राजस्व सेवा।
  • प्रान्तीय सेवाएँ  बिक्रीकर अधिकारी।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

Jharkhand Board JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

Jharkhand Board Class 11 Political Science चुनाव और प्रतिनिधित्व InText Questions and Answers

पृष्ठ 52

प्रश्न 1.
क्या बिना चुनाव के लोकतन्त्र कायम रह सकता है?
उत्तर:
नहीं, बिना चुनाव के लोकतन्त्र कायम नहीं रह सकता क्योंकि वर्तमान लोकतन्त्र का स्वरूप प्रतिनिध्यात्मक लोकतन्त्र है जो जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के द्वारा ही संचालित होता है।

प्रश्न 2.
क्या बिना लोकतन्त्र के चुनाव हो सकता है?
उत्तर:
यद्यपि बिना लोकतन्त्र के निष्पक्ष व स्वतन्त्र चुनाव नहीं हो सकता। लेकिन बहुत सारे गैर-लोकतान्त्रिक देशों में भी चुनाव होते हैं। वास्तव में गैर-लोकतान्त्रिक शासक स्वयं को लोकतान्त्रिक साबित करने के लिए बहुत आतुर रहते हैं। इसके लिए वे चुनावों को ऐसे ढंग से कराते हैं कि उनके शासन को कोई खतरा न हो।

पृष्ठ 56

प्रश्न 3.
50 प्रतिशत से भी कम वोट और 80 प्रतिशत से अधिक सीटें। क्या यह ठीक है? हमारे संविधान निर्माताओं ने ऐसी गड़बड़ व्यवस्था को कैसे स्वीकार किया?
उत्तर:
50 प्रतिशत से भी कम वोट पाने वाले दल को 80 प्रतिशत से अधिक सीटें मिलना ‘सर्वाधिक वोट से जीत वाली (FPTP) व्यवस्था में ही सम्भव है। भारतीय संविधान निर्माताओं ने लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों के लिए इसी निर्वाचन विधि को अपनाया है। भारत में ‘सर्वाधिक वोट से जीत वाली व्यवस्था’ के अपनाने के कारण- भारत के संविधान निर्माताओं ने सर्वाधिक वोट से जीत वाली व्यवस्था (फर्स्ट – पास्ट – द – पोस्ट सिस्टम) को अपनाने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे।

1. सरल विधि: समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की तुलना में ‘सर्वाधिक वोट से जीत वाली प्रणाली’ सरल है। उन सामान्य मतदाताओं के लिए जिन्हें राजनीति और चुनाव का विशेष ज्ञान नहीं है, वे इस चुनाव प्रणाली को आसानी से समझ सकते हैं। स्वतन्त्रता के समय सामान्य भारतीय मतदाताओं की भी यही स्थिति थी। इस तथ्य को समझते हुए संविधान निर्माताओं ने इस चुनाव व्यवस्था को अपनाया।

2. स्पष्ट विकल्प का होना: सर्वाधिक वोट से जीत वाली व्यवस्था में मतदाताओं के सामने स्पष्ट विकल्प होते हैं, जबकि समानुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था में इस स्पष्ट विकल्प का अभाव होता है। राजनीति की वास्तविकता को ध्यान में रखकर मतदाता किसी प्रत्याशी को भी वरीयता दे सकता है और किसी दल को भी। वह चाहे तो इन दोनों में, मतदान के समय सन्तुलन बनाने की भी कोशिश कर सकता है। सर्वाधिक वोट से जीत वाली प्रणाली मतदाताओं को केवल दलों में ही नहीं वरन् उम्मीदवारों में भी चयन का स्पष्ट विकल्प देती है। अन्य चुनावी व्यवस्थाओं में, विशेषकर समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में, मतदाताओं को किसी एक दल को चुनने का विकल्प दिया जाता है; लेकिन प्रत्याशियों का चयन पार्टी द्वारा जारी की गई सूची के अनुसार होता है।

3. प्रतिनिधि का मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी होना: समानुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था में किसी क्षेत्र विशेष का प्रतिनिधित्व करने वाला और मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी, कोई एक प्रतिनिधि नहीं होता। लेकिन
संजीव पास बुक्स सर्वाधिक वोट से जीत वाली व्यवस्था में किसी निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता जानते हैं कि उनका प्रतिनिधि कौन है और उसे उत्तरदायी ठहरा सकते हैं।

4. सरकार का स्थायित्व: भारतीय संविधान निर्माताओं ने भारत के लिए संसदीय शासन व्यवस्था को अपनाया। संसदीय प्रणाली की प्रकृति की यह माँग है कि कार्यपालिका को विधायिका में बहुमत प्राप्त हो। संविधान निर्माता यह समझते थे कि समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली पर आधारित चुनाव संसदीय प्रणाली में सरकार के स्थायित्व के लिए उपयुक्त नहीं होंगे क्योंकि इसमें मतों के प्रतिशत के अनुपात में विधायिका में सीटें बँट जायेंगी। ‘सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली’ में प्राय: बड़े दलों या गठबन्धनों को बोनस के रूप में मत प्रतिशत से अतिरिक्त कुछ सीटें मिल जाती हैं । अत: यह प्रणाली एक स्थायी सरकार बनाने का मार्ग प्रशस्त कर संसदीय सरकार को सुचारु और प्रभावी ढंग से काम करने का अवसर देती है।

5. विभिन्न वर्गों में एकजुटता प्रदान करने की दृष्टि से उपयुक्त: सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली एक निर्वाचन क्षेत्र में विभिन्न सामाजिक वर्गों को एकजुट होकर चुनाव जीतने में मदद करती है जबकि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में, समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली प्रत्येक समुदाय को अपनी एक राष्ट्रव्यापी पार्टी बनाने को प्रेरित करेगी। यह बात भी हमारे संविधान निर्माताओं के मस्तिष्क में रही होगी।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

पृष्ठ 66

प्रश्न 4.
भारत की आबादी में मुसलमान 14.2 प्रतिशत हैं। लेकिन लोकसभा में मुसलमान सांसदों की संख्या सामान्यतः 6 प्रतिशत से थोड़ा कम रही है जो जनसंख्या के अनुपात में आधे से भी कम है। यही स्थिति अधिकतर राज्य विधानसभाओं में भी है। तीन छात्रों ने इन तथ्यों से तीन अलग-अलग निष्कर्ष निकाले। आप बतायें कि आप उनसे सहमत हैं या असहमत और क्यों?
हिलाल: यह सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली के अन्याय को दिखाता है। हमें समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली अपनानी चाहिए थी।
आरिफ: यह अनुसूचित जातियों और जनजातियों को आरक्षण देने के औचित्य को बताता है। आवश्यकता इस बात की है कि मुसलमानों को भी उसी तरह का आरक्षण दिया जाये, जैसा अनुसूचित जातियों और जनजातियों को दिया गया।
सबा: सभी मुसलमानों को एक जैसा मानकर बात करने का कोई मतलब नहीं है। मुसलमान महिलाओं को इसमें कुछ भी नहीं मिलेगा। हमें मुसलमान महिलाओं के लिए अलग आरक्षण चाहिए।
उत्तर:
भारत के संविधान में धर्म-आधारित आरक्षण का निषेध किया गया है लेकिन पिछड़े हुए लोगों को समुचित प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण देने की व्यवस्था का प्रावधान किया गया है। मेरी दृष्टि से चूँकि मुस्लिम महिलाएँ अधिक पिछड़ी हुई अवस्था में हैं, इसलिए ‘मुस्लिम महिला वर्ग’ को पिछड़ा वर्ग मानते हुए मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण प्रदान करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। इसलिए इससे एक तरफ तो भारत की संसद तथा विधानसभाओं में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा तथा मुस्लिम महिला वर्ग का प्रतिनिधित्व होने से उनकी समस्याएँ विधायिका में रखी जा सकेंगी। इस दृष्टि से मैं सबा के मत से सहमत हूँ।

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प्रश्न 5.
मैं इतनी समझ रखती हूँ कि भविष्य में अपने कैरियर को चुन सकूँ और इतनी उम्रदराज हूँ कि ड्राइविंग लाइसेंस बना सकूँ, तो क्या मैं इतनी बड़ी नहीं कि वोट डाल सकूँ? यदि ये कानून मुझ पर लागू होते हैं, तो मैं इन कानूनों को बनाने वाले के बारे में फैसला क्यों नहीं ले सकती?
उत्तर:
भारत में 18 वर्ष के प्रत्येक वयस्क नागरिक को वोट देने का अधिकार प्राप्त है। चूँकि आप ड्राइविंग लाइसेंस बनवा सकने की उम्र रखती हैं, जो कि कम-से-कम 18 वर्ष है। इस दृष्टि से आप एक वयस्क भारतीय नागरिक हैं तथा भविष्य में अपना कैरियर चुन सकने की समझ रखती हैं अर्थात् पागल तथा चित्त विकृत नहीं हैं। अतः आप वोट डाल सकती हैं और वोट डालकर कानून बनाने वाले जनप्रतिनिधियों (विधायकों या संसद सदस्यों) के बारे में फैसला ले सकती हैं।

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प्रश्न 6.
क्या बहुसदस्यीय निर्वाचन आयोग की व्यवस्था भारत में स्थायी हो गयी है या सरकार एक सदस्यीय निर्वाचन आयोग को दुबारा कायम कर सकती है? क्या संविधान इस खेल की आज्ञा देता है?
उत्तर:
संविधान में यह स्पष्ट लिखा है। कि निर्वाचन आयोग में एक निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य उतने निर्वाचन आयुक्त होंगे जितने कि राष्ट्रपति समय-समय पर नियत करे। अतः सरकार एकसदस्यीय निर्वाचन आयोग की व्यवस्था को दुबारा कायम कर सकती है। संविधान इसकी आज्ञा देता है। जहाँ तक बहुसदस्यीय निर्वाचन आयोग की व्यवस्था के स्थायित्व का प्रश्न है, संवैधानिक दृष्टि से तो यह व्यवस्था स्थायी नहीं है। लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से यह स्थायित्व का रूप ले चुकी है। 1993 से निर्वाचन आयोग की व्यवस्था बहुसदस्यीय बनी हुई है। अब इस बात पर सामान्य सहमति बन चुकी है कि बहुसदस्यीय निर्वाचन आयोग ज़्यादा उपयुक्त है क्योंकि इससे आयोग की शक्तियों में साझेदारी हो गई है और आयोग पहले से कहीं ज्यादा जवाबदेह बन गया है।

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प्रश्न 7.
क्या कानून में परिवर्तन करके चुनावों में धन और बल के प्रयोग को रोका जा सकता है? क्या केवल कानून बदलने से कोई चीज वास्तव में बदलती है?
उत्तर:
केवल ‘कानून’ में परिवर्तन करके ही चुनावों में धन और बल के प्रयोग को नहीं रोका जा सकता है। इसके लिए कानून में परिवर्तन के साथ-साथ अन्य प्रयास भी किये जाने चाहिए। यथा यह आवश्यक है कि धन और बल के प्रयोग को रोकने में जो संवैधानिक संस्थाएँ हैं, वे प्राप्त शक्तियों का और प्रभावशाली ढंग से प्रयोग करें। उदाहरण के लिए 20 वर्ष पहले की तुलना में आज निर्वाचन आयोग अधिक स्वतन्त्र तथा प्रभावी है। ऐसा इसलिए नहीं हुआ है कि निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ या उसकी संवैधानिक सुरक्षा बढ़ा दी गई है बल्कि निर्वाचन आयोग ने केवल उन शक्तियों का और प्रभावशाली ढंग से प्रयोग करना शुरू कर दिया है।

जो उसे संविधान में पहले से ही प्राप्त थीं। दूसरे, चुनावों में धन और बल के प्रयोग को रोकने के लिए कानून में परिवर्तन, निर्वाचन आयोग के और प्रभावशाली ढंग से अपनी शक्तियों के प्रयोग करने के साथ-साथ जनता को स्वयं भी और अधिक सतर्क रहना होगा तथा राजनीतिक कार्यों में और अधिक सक्रियता से भाग लेना आवश्यक है। तीसरे, चुनावों में धन और बल के प्रयोग को रोकने के लिए यह भी आवश्यक है कि ऐसी राजनीतिक संस्थाओं और राजनीतिक संगठनों का विकास किया जाये जो स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित कराने के लिए पहरेदारी करें।

इससे स्पष्ट होता है कि चुनावों में धन और बल के प्रयोग को रोकने के लिए चौतरफा प्रयास किये जाने आवश्यक हैं। प्रथम कानून में आवश्यक परिवर्तन किया जाये; दूसरे, संवैधानिक संस्थाएँ और अधिक प्रभावशाली ढंग से अपनी शक्तियों का प्रयोग करें; तीसरे, जनता स्वयं अधिक सतर्क और सक्रिय हो और चौथे, इस हेतु अन्य राजनीतिक संस्थाओं व राजनीतिक संगठनों का विकास किया जाये। अकेले कानून में परिवर्तन करने से चुनावों में धन और बल के प्रयोग को नहीं रोका जा सकता है।

Jharkhand Board Class 11 Political Science चुनाव और प्रतिनिधित्व Textbook Questions and Answers

1. निम्नलिखित में कौन प्रत्यक्ष लोकतन्त्र के सबसे नजदीक बैठता है?
(क) परिवार की बैठक में होने वाली चर्चा।
(ख) कक्षा – संचालक ( क्लास – मॉनीटर) का चुनाव।
(ग) किसी राजनीतिक दल द्वारा अपने उम्मीदवार का चयन।
(घ) मीडिया द्वारा करवाये गये जनमत-संग्रह।
उत्तर:
(घ) मीडिया द्वारा करवाये गये जनमत-संग्रह

2. इनमें से कौनसा कार्य चुनाव आयोग नहीं करता है?
(क) मतदाता सूची तैयार करना
(ग) मतदान केन्द्रों की स्थापना
(ङ) पंचायत के चुनावों का पर्यवेक्षण।
उत्तर;
(ङ) पंचायत के चुनावों का पर्यवेक्षण
(ख) उम्मीदवारों का नामांकन
(घ) आचार-संहिता लागू करना

3. निम्नलिखित में कौनसी बात राज्यसभा और लोकसभा के सदस्यों के चुनाव की प्रणाली में समान है?
(क) 18 वर्ष से ज्यादा की उम्र का हर नागरिक मतदान करने के योग्य है।
(ख) विभिन्न प्रत्याशियों के बारे में मतदाता अपनी पसन्द को वरीयता क्रम में रख सकता है।
(ग) प्रत्येक मत का समान मूल्य होता है।
(घ) विजयी उम्मीदवार को आधे से अधिक मत प्राप्त होने चाहिए । उत्तर-(ग) प्रत्येक मत का समान मूल्य होता है।
(नोट : राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव राज्य विधानसभा के सदस्य करते हैं जहाँ प्रत्येक विधायक के मत का मूल्य एक होता है। इसी प्रकार लोकसभा के सदस्यों का चुनाव वयस्क नागरिक करते हैं। इसमें एक मतदाता के मत का मूल्य एक ही होता है।)

4. फर्स्ट पास्ट द पोस्ट प्रणाली में वही प्रत्याशी विजेता घोषित किया जाता है जो।
(क) डाक से आने वाले मतों में सर्वाधिक संख्या में मत अर्जित करता है।
(ख) देश में सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाले दल का सदस्य हो।
(ग) चुनाव क्षेत्र के अन्य उम्मीदवारों से ज्यादा मत हासिल करता है।
(घ) 50 प्रतिशत से अधिक मत हासिल करके प्रथम स्थान पर आता है।
उत्तर:
(ग) चुनाव क्षेत्र के अन्य उम्मीदवारों से ज्यादा मत हासिल करता है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

प्रश्न 5.
पृथक् निर्वाचन मण्डल और आरक्षित चुनाव क्षेत्र के बीच क्या अन्तर है? संविधान निर्माताओं ने पृथक् निर्वाचन मण्डल को क्यों स्वीकार नहीं किया?
उत्तर:
पृथक् निर्वाचन मण्डल और आरक्षित चुनाव क्षेत्र के बीच अन्तर: आरक्षित चुनाव क्षेत्र व्यवस्था से यह आशय है कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में सभी वर्गों के मतदाता वोट डालेंगे लेकिन प्रत्याशी उसी समुदाय या सामाजिक वर्ग का होगा जिसके लिए यह सीट आरक्षित है। पृथक् निर्वाचन मण्डल का आशय यह है कि किसी समुदाय के प्रतिनिधि के चुनाव में केवल उसी समुदाय के मतदाता ही मत डालेंगे। पृथक् निर्वाचन मण्डल व्यवस्था को नहीं अपनाने के कारण – संविधान निर्माताओं ने उपर्युक्त दोनों व्यवस्थाओं में से पृथक् निर्वाचन मण्डल व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने इसके स्वीकार नहीं किये जाने के निम्नलिखित कारण बताये

  1. पृथक् निर्वाचन मण्डल व्यवस्था के अपनाने से समाज में एकता नहीं हो पायेगी पृथक् निर्वाचन मण्डल की व्यवस्था भारत के लिए अभिशाप रही। भारत का विभाजन कराने में इस व्यवस्था का भी सहयोग रहा है।
  2. पृथक् निर्वाचन मण्डल में प्रत्याशी केवल अपने समुदाय या वर्ग का हित ही सोच पाता है और एकीकृत समाज के भावों की उपेक्षा करने लगता है, जबकि आरक्षित चुनाव क्षेत्र व्यवस्था में विजयी प्रत्याशी अपने क्षेत्र के अन्तर्गत समाज के सभी वर्गों के हित की बात सोचने को बाध्य रहता है। यही कारण है कि संविधान निर्माताओं ने पृथक् निर्वाचन मण्डल पद्धति को स्वीकार नहीं किया।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में कौनसा कथन गलत है? इसकी पहचान करें और किसी एक शब्द अथवा पद को बदल कर, जोड़कर अथवा नये क्रम में सजाकर इसे सही करें।
(क) एक फर्स्ट- पास्ट – द – पोस्ट प्रणाली ( जो सबसे आगे वही जीते प्रणाली) का पालन भारत के हर चुनाव में होता है।
(ख) चुनाव आयोग पंचायत और नगरपालिका के चुनावों का पर्यवेक्षण नहीं करता।
(ग) भारत का राष्ट्रपति किसी चुनाव आयुक्त को नहीं हटा सकता।
(घ) चुनाव आयोग में एक से ज्यादा चुनाव आयुक्त की नियुक्ति अनिवार्य है।
उत्तर:
(क) ‘एक फर्स्ट – पास्ट – द – पोस्ट प्रणाली (जो सबसे आगे, वही जीते प्रणाली) का पालन भारत के हर चुनाव में होता है।’ यह कथन गलत है। इसमें एक वाक्यांश जोड़कर पुनः सही रूप में इस प्रकार लिखा गया है।
‘भारत में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यसभा और विधान परिषदों के सदस्यों के चुनावों को छोड़कर फर्स्ट- पास्ट- द-पोस्ट प्रणाली का पालन भारत के शेष सभी चुनावों में होता है।’
(ख) सही कथन इस प्रकार है। ‘चुनाव आयोग स्थानीय निकायों के चुनावों का पर्यवेक्षण नहीं करता।
(ग) सही कथन इस प्रकार है। भारत का राष्ट्रपति निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से हटा सकता है।
(घ) सही कथन इस प्रकार है। निर्वाचन आयोग में एक से अधिक निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति विधिक आदेश सूचक है।

प्रश्न 7.
भारत की चुनाव प्रणाली का लक्ष्य समाज के कमजोर तबके की नुमाइंदगी को सुनिश्चित करना है। लेकिन अभी तक हमारी विधायिका में महिला सदस्यों की संख्या 12 प्रतिशत तक पहुँची है। इस स्थिति में सुधार के लिए आप क्या उपाय सुझायेंगे?
उत्तर:
भारत की चुनाव प्रणाली का लक्ष्य समाज के कमजोर तबके की नुमाइंदगी को सुनिश्चित करना है। इस सन्दर्भ में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों तथा आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। लेकिन अभी तक हमारी विधायिका में महिला सदस्यों की संख्या 12 प्रतिशत तक ही पहुँची है। लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिला सदस्यों की नुमाइंदगी बढ़ाने की बात लगभग सभी दल करते हैं। लेकिन जब-जब इस प्रकार का विधेयक संसद में प्रस्तुत किया जाता है तो उसको सामान्यतः प्रस्तुत करने ही नहीं दिया जाता। विधायिका में महिला सदस्यों की स्थिति में सुधार के लिए निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिए

  1. लोकसभा तथा विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  2. देश में महिलाओं के लिए उचित शिक्षा का प्रबन्ध होना चाहिए ताकि शिक्षा प्राप्त कर उनमें जागरूकता आए और वह अपने अधिकारों के प्रति सजग होकर स्वयं आगे बढ़कर चुनाव लड़े और विजयी होकर राजनीति में भाग ले।

प्रश्न 8.
एक नये देश के संविधान के बारे में आयोजित किसी संगोष्ठी में वक्ताओं ने निम्नलिखित आशाएँ जतायीं। प्रत्येक कथन के बारे में बतायें कि उनके लिए फर्स्ट – पास्ट – द – पोस्ट ( सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली) उचित होगी या समानुपातिक प्रतिनिधित्व वाली प्रणाली?
(क) लोगों को इस बात की साफ-साफ जानकारी होनी चाहिए कि उनका प्रतिनिधि कौन है ताकि वे उसे निजी तौर पर जिम्मेदार ठहरा सकें।
(ख) हमारे देश में भाषायी रूप से अल्पसंख्यकों के छोटे-छोटे समुदाय हैं और देश भर में फैले हैं, हमें इनकी ठीक-ठीक नुमाइंदगी को सुनिश्चित करना चाहिए।
(ग) विभिन्न दलों के बीच सीट और वोट को लेकर कोई विसंगति नहीं रखनी चाहिए।
(घ) लोग किसी अच्छे प्रत्याशी को चुनने में समर्थ होने चाहिए भले ही वे उसके राजनीतिक दल को पसन्द न करते हों।
उत्तर:
(क) फर्स्ट-पास्ट – द – पोस्ट प्रणाली (सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली)
(ख) समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली
(ग) समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (घ) फर्स्ट – पास्ट – द – पोस्ट प्रणाली।

प्रश्न 9.
एक भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने एक राजनीतिक दल का सदस्य बनकर चुनाव लड़ा। इस मसले पर कई विचार सामने आये। एक विचार यह था कि भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एक स्वतन्त्र नागरिक है। उसे किसी राजनीतिक दल में होने और चुनाव लड़ने का अधिकार है। दूसरे विचार के अनुसार, ऐसे विकल्प की सम्भावना कायम रखने से चुनाव आयोग की निष्पक्षता प्रभावित होगी। इस कारण, भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। आप इसमें किस पक्ष से सहमत हैं और क्यों?
उत्तर:
मैं इस विचार से सहमत हूँ कि भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एक स्वतंत्र नागरिक है। उसे किसी राजनीतिक दल में होने और चुनाव लड़ने का अधिकार है। इसका कारण यह है कि चुनाव में उम्मीदवारों को चुनने की शक्ति मतदाताओं के पास होती है, न कि राजनीतिक दलों के पास। भूतपूर्व चुनाव आयुक्त चुनाव में अपने पद का प्रयोग नहीं कर सकता क्योंकि मतदाताओं की संख्या बहुत अधिक होती है और उनके साथ उसका किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं होता है अत: वह चुनाव की निष्पक्षता को प्रभावित नहीं कर सकता।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर वकालत करने का प्रतिबंध इसलिए होता है क्योंकि न्यायाधीश होने के समय अन्य न्यायाधीशों पर उसका नियंत्रण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से होता है। वह अपने प्रभाव से उन्हें प्रभावित कर सकता है। लेकिन मुख्य निर्वाचन आयुक्त इस रूप में मतदाताओं को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं होता है। वह चुनाव लड़ते समय जनता की अदालत में खड़ा होता है और प्रजातंत्र में जनता का फैसला निर्णायक होता है। अतः मेरी दृष्टि से भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त को एक स्वतंत्र नागरिक के रूप में चुनाव लड़ने का अधिकार है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

प्रश्न 10.
भारत का लोकतन्त्र अब अनगढ़ ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ प्रणाली को छोड़कर समानुपातिक प्रतिनिध्यात्मक प्रणाली को अपनाने के लिए तैयार हो चुका है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? इस कथन के पक्ष अथवा विपक्ष में – तर्क दें।
संजीव पास बुक्स उत्तर: मैं इस कथन से सहमत हूँ कि भारत का लोकतन्त्र अब अनगढ़ ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ प्रणाली को छोड़कर समानुपातिक प्रतिनिध्यात्मक प्रणाली को अपनाने के लिए तैयार हो चुका है। इस कथन के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं।
1. समानुपातिक प्रतिनिध्यात्मक प्रणाली से दलों के मत प्रतिशत और प्राप्त सीटों में एक समानता आयेगी। फर्स्ट पास्ट द पोस्ट प्रणाली में जो राजनैतिक दल जितने प्रतिशत वोट प्राप्त करता है, उसके अनुपात में उसे सीटें प्राप्त नहीं होती हैं। या तो उसकी सीटों की संख्या प्राप्त मत प्रतिशत से बहुत अधिक होती है या बहुत कम। उदाहरण के लिए 1984 में आम चुनाव के समय लोकसभा में कांग्रेस ने 48% मत प्राप्त करके जहाँ 415 सीटें प्राप्त कीं, वहीं भाजपा को 7.4% मत प्राप्त करने पर केवल दो सीटें मिलीं। समानुपातिक प्रतिनिध्यात्मक प्रणाली को अपनाने से यह विसंगति समाप्त हो जायेगी। इससे लोकतन्त्र सुदृढ़ होगा।

2. समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली अपनाने से सही अर्थों में बहुमत प्राप्त प्रत्याशी ही विजयी होगा। ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ प्रणाली में एक निर्वाचन क्षेत्र में कई उम्मीदवार होने के कारण 30 प्रतिशत मत प्राप्त करने वाला प्रत्याशी ही विजयी हो जाता है, जबकि हारने वाले उम्मीदवारों को 70 प्रतिशत मत मिले। इस प्रकार इस प्रणाली में अल्पमत वाला उम्मीदवार भी जनता का प्रतिनिधित्व करता है। अतः वर्तमान में लोकतन्त्र का सही प्रतिनिधित्व करने के लिए समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को अपनाया जाना चाहिए।

3. स्वतन्त्रता के समय भारतीय मतदाता को प्रतिनिध्यात्मक लोकतन्त्र की परिपक्व समझ नहीं थी। इसलिए ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ प्रणाली को उसकी सरलता को देखते हुए अपनाया गया था। लेकिन भारतीय लोकतन्त्र अब परिपक्व हो गया है। यहाँ का आम मतदाता लोकतान्त्रिक प्रणाली को अपना चुका है। ऐसी स्थिति में अब वह समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का भी सही उपयोग कर सकेगा क्योंकि अब यहाँ दलीय व्यवस्था बहुदलीय व द्विदलीय रूप में विकसित हो चुकी है। लोगों का दलों के प्रति रुझान स्पष्ट हो रहा है और वे दलीय आधार पर प्रत्याशियों को मत दे रहे हैं।

4. स्वतन्त्रता के समय ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ प्रणाली को अपनाने का एक अन्य कारण इस बात की सम्भावना थी कि समानुपातिक प्रतिनिधिक प्रणाली में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल सकेगा। लेकिन 1986 के बाद से भारत में बहुदलीय गठबन्धन की कार्यप्रणाली प्रचलन में आ गई है और अब यहाँ गठबन्धन सरकारें बनाना अनिवार्य हो गया है। तो ऐसी स्थिति में दलों को प्राप्त मत प्रतिशत और सीटों के बीच संतुलन बिठाकर ही लोकतंत्र के सही रूप में सार्थक करना चाहिए क्योंकि विभिन्न दल जब अब गठबन्धन कर सरकारें बना रहे हैं तो उस स्थिति में भी बना लेंगे।

5. अन्त में वर्तमान लोकतान्त्रिक युग में जनता का सही प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के लिए भारत में समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को अपनाया जाना चाहिए। चूँकि भारत विविधताओं का देश है जिसमें प्रत्येक वर्ग, विचारधाराओं का उचित प्रतिनिधित्व के लिए समानुपातिक प्रतिनिधित्व अधिक सार्थक है।

चुनाव और प्रतिनिधित्व JAC Class 11 Political Science Notes

→ लोकतंत्र और चुनाव:
(अ) लोकतन्त्र – लोकतन्त्र के दो प्रकार हैं।

  • प्रत्यक्ष लोकतन्त्र और
  • अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र।

→ प्रत्यक्ष लोकतन्त्र: प्रत्यक्ष लोकतन्त्र में नागरिक रोजमर्रा के फैसलों और सरकार चलाने में सीधे भाग लेते हैं। प्राचीन यूनान के नगर राज्य प्रत्यक्ष लोकतन्त्र के उदाहरण माने जाते हैं। आधुनिक युग में स्थानीय स्वशासन की ‘ग्राम सभाएँ’ इसकी उदाहरण हैं।

→ अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र: लेकिन जब लाखों-लाख लोगों को निर्णय लेना हो, तो इस प्रकार के प्रत्यक्ष लोकतन्त्र को व्यवहार में नहीं लाया जा सकता। ऐसी व्यवस्था में नागरिक अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं जो देश के शासन और प्रशासन को चलाने में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। ऐसे शासन को अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र या प्रतिनिध्यात्मक शासन कहा जाता है।

→ चुनाव या निर्वाचन: अपने प्रतिनिधियों को चुनने की विधि को चुनाव या निर्वाचन कहते हैं निर्वाचन का महत्त्व – सरकार के संचालन हेतु लोग अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं। इसलिए चुनाव महत्त्वपूर्ण हो जाता है। आज चुनाव पूरी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के जाने-पहचाने प्रतीक हो गये हैं। लोकतन्त्र और चुनाव एक-दूसरे के पूरक हैं। लेकिन सभी चुनाव लोकतांत्रिक नहीं होते। बहुत सारे गैर लोकतांत्रिक देशों में भी चुनाव होते हैं। लोकतांत्रिक संवैधानिक नियमों के अनुसार चुनाव कराने की व्यवस्था लोकतांत्रिक चुनाव को एक गैर लोकतांत्रिक चुनाव से अलग करती है।

→ संविधान और निर्वाचन: एक लोकतान्त्रिक देश का संविधान चुनावों के लिए कुछ मूलभूत नियम बनाता है और इस सम्बन्ध में विस्तृत नियम बनाने का काम विधायिका पर छोड़ देता है। संविधान का लक्ष्य होता है।

  • एक स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनाव जिसे लोकतान्त्रिक चुनाव कहा जा सके तथा।
  • न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व।

→ भारत में चुनाव व्यवस्था: लोकतान्त्रिक चुनाव में जनता वोट देती है और उसकी इच्छा ही यह तय करती है कि कौन चुनाव जीतेगा लेकिन लोगों के द्वारा अपनी रुचि को व्यक्त करने के अनेक तरीके हो सकते हैं और उनकी पसन्द की गणना करने की भी बहुत सारी विधियाँ हो सकती हैं। इस प्रकार प्रतिनिध्यात्मक लोकतन्त्र में निर्वाचन की अनेक प्रणालियाँ होती हैं। भारत के संविधान में दो प्रकार की निर्वाचन प्रणालियों को अपनाया गया है।

→ सर्वाधिक मत से जीतने वाली प्रणाली ( जो सबसे आगे वही जीते ):
इस व्यवस्था में जिस प्रत्याशी को अन्य सभी प्रत्याशियों से अधिक वोट मिल जाते हैं, उसे ही निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है। विजयी प्रत्याशी के लिए यह आवश्यक नहीं है कि कुल मतों का बहुमत मिले। इस विधि को ‘जो सबसे आगे वही जीते प्रणाली’ ( फर्स्ट – पास्ट – द – पोस्ट सिस्टम) कहते हैं। भारत में लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं के चुनाव आदि के लिए संविधान में इसी विधि को स्वीकार किया गया है। विशेषताएँ – इस प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ ये हैं।

  • इसके अन्तर्गत पूरे देश को छोटी-छोटी भौगोलिक इकाइयों में बाँट दिया जाता है जिसे निर्वाचन क्षेत्र या जिला कहते हैं।
  • हर निर्वाचन क्षेत्र से केवल एक प्रतिनिधि चुना जाता है।
  • मतदाता प्रत्याशी को वोट देता है।
  • पार्टी को प्राप्त वोटों के अनुपात से अधिक या कम सीटें विधायिका में मिल सकती हैं।
  • विजयी उम्मीदवार को जरूरी नहीं कि वोटों का बहुमत (50% + 1 ) मिले।
  • यूनाइटेड किंगडम और भारत में यह प्रणाली अपनायी गई है।

→ समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली: दलों को प्राप्त मतों के अनुपात में विधायिका में प्रत्येक दल को सीटें प्रदान करने की व्यवस्था को समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली कहा जाता है। विशेषताएँ समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ ये हैं।

  • समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में किसी बड़े भौगोलिक क्षेत्र को एक निर्वाचन क्षेत्र मान लिया जाता है। पूरा का पूरा देश भी एक निर्वाचन क्षेत्र गिना जा सकता है।
  • इसमें एक निर्वाचन क्षेत्र से कई प्रतिनिधि चुने जा सकते हैं।
  • इसमें मतदाता प्रत्याशी को नहीं बल्कि पार्टी को वोट देता है।
  • हर पार्टी को प्राप्त मत के अनुपात में विधायिका में सीटें हासिल होती हैं।
  • विजयी उम्मीदवार को वोटों का बहुमत हासिल होता है।
  • इजरायल और नीदरलैंड में यह व्यवस्था अपनायी गयी है। भारत में केवल अप्रत्यक्ष चुनावों के लिए इसे सीमित रूप में अपनाया गया है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

→ समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के रूप: समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तीन रूपों का उल्लेख किया जा सकता है।

  1. इजरायल और नीदरलैंड में प्रचलित रूप: इजरायल और नीदरलैंड में पूरे देश को एक निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है और प्रत्येक पार्टी को राष्ट्रीय चुनावों में प्राप्त वाटों के अनुपात में सीटें दे दी जाती हैं।
  2. अर्जेंटीना और पुर्तगाल में प्रचलित रूप: अर्जेन्टीना और पुर्तगाल में पूरे देश को बहु सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है। प्रत्येक पार्टी प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए अपने प्रत्याशियों की एक सूची जारी करती है जिसमें उतने ही नाम होते हैं जितने प्रत्याशियों को उस निर्वाचन क्षेत्र से चुना जाना होता है। एक पार्टी को किसी निर्वाचन क्षेत्र में जितने मत प्राप्त होते हैं, उसी आधार पर उसे उस निर्वाचन क्षेत्र में सीटें दे दी जाती हैं। इस प्रकार उक्त दोनों प्रणालियों में किसी निर्वाचन क्षेत्र के प्रतिनिधि वास्तव में राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि होते हैं। मतदाता प्रत्याशी को वोट न देकर राजनीतिक दलों को वोट देते हैं।

→ भारत में प्रचलित रूप: भारत में समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को केवल अप्रत्यक्ष चुनावों के लिए ही सीमित रूप में अपनाया गया है। भारत का संविधान राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यसभा और विधान परिषदों के चुनावों के
लिए समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का एक तीसरा और जटिल स्वरूप प्रस्तावित करता है। इसे ‘एकल संक्रमणीय मत प्रणाली’ कहते हैं। भारत में सर्वाधिक वोट प्रणाली क्यों स्वीकार की गई? भारत में सर्वाधिक वोट प्रणाली के स्वीकार करने के प्रमुख कारण हैं।

  • सर्वाधिक वोट प्रणाली एक सरल तथा लोकप्रिय प्रणाली है।
  • इसमें चुनाव के समय मतदाताओं के पास स्पष्ट विकल्प होते हैं। यह प्रणाली मतदाताओं को केवल दलों में ही नहीं वरन् उम्मीदवारों में भी चयन का स्पष्ट विकल्प देती है।
  • इस प्रणाली में किसी निर्वाचन क्षेत्र के लोग यह जानते हैं कि उनका प्रतिनिधि कौन है और वे उसे उत्तरदायी ठहरा सकते हैं।
  • यह प्रणाली एक स्थायी सरकार बनाने का मार्ग प्रशस्त कर संसदीय सरकार को सुचारु और प्रभावी ढंग से काम करने का अवसर देती है।
  • यह प्रणाली एक निर्वाचन क्षेत्र में विभिन्न सामाजिक वर्गों को एकजुट होकर चुनाव जीतने में मदद करती है।

→ निर्वाचन क्षेत्रों का आरक्षण
भारत के संविधान निर्माताओं ने दलित उत्पीड़ित सामाजिक समूहों के लिए उचित और न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने हेतु निर्वाचन क्षेत्रों के आरक्षण की व्यवस्था को अपनाया है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत, किसी निर्वाचन क्षेत्र में सभी मतदाता वोट तो डालेंगे लेकिन प्रत्याशी केवल उसी समुदाय या सामाजिक वर्ग का होगा जिसके लिए वह सीट आरक्षित है। भारत का संविधान अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं में आरक्षण की व्यवस्था करता है। प्रारम्भ में यह व्यवस्था 10 वर्ष के लिए की गई थी, पर अनेक संवैधानिक संशोधनों द्वारा इसे बढ़ाकर 2020 तक कर दिया गया है। आरक्षण की अवधि खत्म होने पर संसद इसे और आगे बढ़ाने का निर्णय ले सकती है।

संविधान अन्य उपेक्षित या कमजोर वर्गों के लिए इस प्रकार के आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं करता। स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित कर दी गई हैं। परिसीमन आयोग भारत में परिसीमन आयोग एक स्वतन्त्र संस्था है जिसका गठन राष्ट्रपति करते हैं। इसका गठन पूरे देश में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमा खींचने तथा निर्वाचन क्षेत्रों के आरक्षण हेतु किया जाता है। यह चुनाव आयोग के साथ मिलकर काम करता है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

→ स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव: किसी भी चुनाव प्रणाली की कसौटी यह है कि वह एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित कर सके, जिसमें मतदाताओं की आकांक्षाएँ चुनाव परिणामों में न्यायपूर्ण ढंग से व्यक्त हो सकें।

(स) सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार: लोकतान्त्रिक चुनावों में देश के सभी वयस्क नागरिकों को चुनाव में मत देने के अधिकार को ही सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार कहा जाता है। भारतीय संविधान में प्रत्येक वयस्क भारतीय नागरिक को वोट देने का अधिकार प्रदान किया गया है।

(द) चुनाव लड़ने का अधिकार: भारत में सभी भारतीय नागरिकों को चुनाव में खड़े होने और जनता का प्रतिनिधि होने का अधिकार है। लेकिन विभिन्न पदों पर चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु अर्हता भिन्न-भिन्न है। जैसे- लोकसभा और विधानसभा प्रत्याशी के लिए कम-से-कम 25 वर्ष की आयु आवश्यक है। राज्यसभा के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष है। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य अर्हताएँ भी हैं। लेकिन चुनाव लड़ने के लिए आय, शिक्षा, वर्ग या लिंग के आधार पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है।

(य) स्वतन्त्र निर्वाचन आयोग:
संगठन: भारत में एक स्वतन्त्र निर्वाचन आयोग का प्रावधान किया गया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार चुनाव आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त तथा कुछ अन्य चुनाव आयुक्त होते हैं। वर्तमान में एक मुख्य चुनाव आयुक्त तथा दो अन्य चुनाव आयुक्त हैं। भारत में निर्वाचन आयोग की सहायता करने के लिए प्रत्येक राज्य में एक मुख्य निर्वाचन अधिकारी होता है। निर्वाचन आयोग स्थानीय निकायों के चुनाव के लिए जिम्मेदार नहीं होता।

→ कार्यकाल: संविधान मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों के कार्यकाल की सुरक्षा देता है। उन्हें 6 वर्षों के लिए अथवा 65 वर्ष की आयु तक (जो पहले खत्म हो) के लिए नियुक्त किया जाता है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को कार्यकाल समाप्त होने के पूर्व राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है; पर इसके लिए संसद के दोनों सदनों को विशेष बहुमत (2/3 बहुमत से पारित कर इस आशय का प्रतिवेदन राष्ट्रपति को देना होगा। निर्वाचन आयुक्तों को भारत का राष्ट्रपति हटा सकता है।

→ कार्य मतदाता सूची तैयार करना: चुनाव के संचालन का अधीक्षण, निर्देशन और नियन्त्रण करना; चुनाव कार्यक्रम तय करना, राजनीतिक दलों व उम्मीदवारों के लिए एक आदर्श आचार संहिता लागू करना, आवश्यकता होने पर किसी क्षेत्र में दोबारा मतगणना की आज्ञा देना, राजनीतिक दलों को मान्यता देना तथा उन्हें चुनाव चिह्न आवण्टित करना आदि प्रमुख कार्य चुनाव आयोग के हैं। पिछले 65 वर्षों में भारत में लोकसभा के 16 चुनाव हो चुके हैं।

→ चुनाव सुधार:
वयस्क मताधिकार, चुनाव लड़ने की स्वतन्त्रता और एक स्वतन्त्र निर्वाचन आयोग की स्थापना के द्वारा भारत में चुनावों को स्वतन्त्र और निष्पक्ष बनाने की कोशिश की गई है। लेकिन पिछले 65 वर्षों के अनुभव के बाद निर्वाचन आयोग, विभिन्न राजनीतिक दलों, स्वतन्त्र समूहों और अनेक विद्वानों द्वारा चुनाव प्रणाली में सुधार के लिए अनेक सुझाव दिये गए हैं। चुनाव सम्बन्धी प्रावधानों को संशोधन करने से सम्बन्धित कुछ सुझाव ये है।

  • संसद और विधानसभाओं में 1/3 सीटों पर महिलाओं को चुनने हेतु विशेष प्रावधान बनाए जायें।
  • चुनावी राजनीति में धन के प्रभाव को नियन्त्रित किया जाये।
  • फौजदारी मुकदमे वाले उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से रोक दिया जाये।
  • चुनाव प्रचार में जाति एवं धर्म के आधार पर की जाने वाली अपीलों को प्रतिबन्धित किया जाये।
  • राजनीतिक दलों की कार्यविधि को और अधिक पारदर्शी और लोकतान्त्रिक बनाने के लिए कानून बनाया जाये।

→ चुनाव सुधारों के अतिरिक्त चुनावों को स्वतन्त्र व निष्पक्ष बनाने के दो अन्य तरीके ये हैं।

  • जनता स्वयं ही और अधिक सतर्क रहे तथा राजनीतिक कार्यों में और सक्रियता से भाग ले।
  • इसके लिए अनेक राजनीतिक संस्थाओं और राजनीतिक संगठनों का विकास किया जाये।

→ (ल) भारत में चुनाव व्यवस्था की सफलता के मापदण्ड।

  • स्वतन्त्रतापूर्वक प्रतिनिधियों का चुनाव तथा शान्तिपूर्ण ढंग से सरकारों का बदलना।
  • चुनाव प्रक्रिया में बढ़ती जनता की रुचि तथा उम्मीदवारों और दलों की बढ़ती संख्या।
  • सभी वर्गों के प्रतिनिधियों को साथ लेकर चलना।
  • अधिकतर भागों में चुनाव परिणाम चुनावी अनियमितताओं से अप्रभावित।
  • चुनावों का लोकतान्त्रिक जीवन का अभिन्न अंग बन जाना।

भारत में मतदाता के अन्दर आत्मविश्वास बढ़ा है तथा मतदाताओं की नजरों में निर्वाचन आयोग का कद बढ़ा हैं।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 2 भारतीय संविधान में अधिकार

Jharkhand Board JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 2 भारतीय संविधान में अधिकार Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 2 भारतीय संविधान में अधिकार

Jharkhand Board Class 11 Political Science भारतीय संविधान में अधिकार InText Questions and Answers

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प्रश्न 1.
भारतीय संविधान कौन-कौनसे मौलिक अधिकार प्रदान करता है?
उत्तर:
1978 में किये गये 44वें संविधान संशोधन के बाद से भारतीय संविधान निम्नलिखित छः मौलिक अधिकार प्रदान करता है।

  1. समता का अधिकार
  2. स्वतन्त्रता का अधिकार
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार
  4. धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार
  5. शिक्षा एवं संस्कृति का अधिकार
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार।

प्रश्न 2.
मूल अधिकारों को कैसे सुरक्षित किया जाता है?
उत्तर:
भारतीय संविधान में सूचीबद्ध मूल अधिकार वाद योग्य हैं। कोई व्यक्ति, निजी संगठन या सरकार के कार्यों से किसी व्यक्ति के मूल अधिकारों का हनन होता है या उन पर सरकार द्वारा अनुचित प्रतिबन्ध लगाया जाता है, तो वह व्यक्ति ऐसे कार्य के विरुद्ध वाद दायर कर सकता है। न्यायालय सरकार के ऐसे कार्य को अवैध घोषित कर सकती है या सरकार को आदेश व निर्देश दे सकती है।

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प्रश्न 3.
मौलिक अधिकारों की व्याख्या और सुरक्षा करने में न्यायपालिका की क्या भूमिका रही है?
उत्तर:
मौलिक अधिकारों की व्याख्या और सुरक्षा करने में न्यायपालिका की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। यथा

  1. न्यायपालिका ने जब-जब उसके समक्ष मूल अधिकारों के अतिक्रमण के वाद नागरिकों के द्वारा दायर किये गये, न्यायपालिका ने तब-तब उनकी व्याख्या कर मूल अधिकारों के अतिक्रमण को रोका है।
  2. विधायिका या न्यायपालिका के किसी कार्य या निर्णय से यदि मौलिक अधिकारों का हनन हुआ है या उन पर अनुचित प्रतिबन्ध लगाया गया है तो न्यायपालिका ने उस कार्य या प्रतिबन्ध को अवैध घोषित कर मूल अधिकारों की सुरक्षा प्रदान की है।

प्रश्न 4.
मौलिक अधिकारों तथा राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्वों में क्या अन्तर है?
उत्तर:
मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्वों में अन्तर: मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्वों में प्रमुख अन्तर निम्नलिखित हैं।

  1. नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कानूनी संरक्षण प्राप्त है, लेकिन राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्वों को कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं है।
  2. नीति-निर्देशक तत्त्व राज्य से सम्बन्धित हैं, जबकि मौलिक अधिकार नागरिकों से सम्बन्धित हैं।
  3. जहाँ मौलिक अधिकार सरकार के कुछ कार्यों पर प्रतिबन्ध लगाते हैं, वहीं नीति-निर्देशक तत्त्व उसे कुछ कार्यों को करने की प्रेरणा देते हैं।
  4. मौलिक अधिकार खास तौर से व्यक्ति के अधिकारों को संरक्षित करते हैं, जबकि नीति-निर्देशक तत्त्व पूरे समाज के हित की बात करते हैं।

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प्रश्न 5.
अगर लालुंग धनी और ताकतवर होता तब क्या होता? यदि निर्माण करने वाले ठेकेदार के साथ काम करने वाले इंजीनियर होते तो क्या होता? क्या उनके साथ भी अधिकारों का इसी तरह से हनन होता?
उत्तर:
अगर लालुंग धनी और ताकतवर होता तो वह अपने संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए न्यायालय में स्वस्थ होने के बाद ही जेल से मुक्त होने के लिये चुनौती देता और न्यायालय के निर्णय के अनुसार ही जेल की सजा काटता।
यदि निर्माण करने वाले ठेकेदार के साथ काम करने वाले इंजीनियर होते तो वह उनका शोषण करने में सक्षम नहीं होता और उनके साथ अधिकारों का इस तरह से हनन नहीं होता।

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प्रश्न 6.
भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों की तुलना दक्षिण अफ्रीका के संविधान में दिये गये अधिकारों के घोषणा-पत्र से करें। उन अधिकारों की एक सूची बनायें जो।
(क) दोनों संविधानों में पाये जाते हों।
(ख) दक्षिण अफ्रीका में हों पर भारत में नहीं।
(ग) दक्षिण अफ्रीका के संविधान में स्पष्ट रूप से दिये गये हों पर भारतीय संविधान में निहित माने जाते हैं?
उत्तर:
(क) भारत और दक्षिण अफ्रीका दोनों के संविधानों में पाये जाने वाले अधिकार निम्नलिखित हैं।

  1. निजता का अधिकार अर्थात् स्वतन्त्रता और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अधिकार।
  2. श्रम सम्बन्धी समुचित व्यवहार का अधिकार अर्थात् रोजगार में अवसर की समानता, शोषण के विरुद्ध अधिकार तथा कोई भी पेशा चुनने व व्यापार करने की स्वतन्त्रता।
  3. सांस्कृतिक, धार्मिक एवं भाषायी समुदायों का अधिकार ( धार्मिक स्वतन्त्रता तथा शिक्षा और संस्कृति सम्बन्धी अधिकार)।

(ख) वे अधिकार जो दक्षिण अफ्रीका में हैं, लेकिन भारत के संविधान में नहीं हैं, ये हैं।

  1. स्वास्थ्यप्रद पर्यावरण और पर्यावरण संरक्षण का अधिकार
  2. स्वास्थ्य सुविधाएँ, भोजन, पानी और सामाजिक सुरक्षा का अधिकार
  3. बाल अधिकार
  4. बुनियादी और उच्च शिक्षा का अधिकार
  5. सूचना प्राप्त करने का अधिकार।

(ग) वे अधिकार जो दक्षिण अफ्रीका के संविधान में स्पष्ट रूप से दिये गये हों, पर भारतीय संविधान में निहित माने जाते हैं, ये हैं।

  1. समुचित आवास का अधिकार
  2. गरिमा का अधिकार।

सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय संविधान के जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अधिकार में उपर्युक्त दोनों अधिकारों को निहित माना है।

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प्रश्न 7.
आप एक न्यायाधीश हैं। आपको उड़ीसा के पुरी जिले के दलित समुदाय के एक सदस्य- हादिबन्धु – से एक पोस्टकार्ड मिलता है। उसमें लिखा है कि उसके समुदाय के पुरुषों ने उस प्रथा का पालन करने से इन्कार कर दिया जिसके अनुसार उन्हें उच्च जातियों के विवाहोत्सव में दूल्हे और सभी मेहमानों के पैर धोने पड़ते थे। इसके बदले उस समुदाय की चार महिलाओं को पीटा गया और उन्हें निर्वस्त्र करके घुमाया गया। पोस्टकार्ड लिखने वाले के अनुसार, “हमारे बच्चे शिक्षित हैं और वे उच्च जातियों के पुरुषों के पैर धोने, विवाह में भोज के बाद जूठन हटाने और बर्तन मांजने का परम्परागत काम करने को तैयार नहीं हैं। यह मानते हुए कि उपर्युक्त तथ्य सही हैं, आपको निर्णय करना है कि क्या इस घटना में मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है? आप इसमें सरकार को क्या करने का आदेश देंगे?
उत्तर:
यह मानते हुए कि उपर्युक्त तथ्य सही है। एक न्यायाधीश होने के नाते मैं एक निर्णय करूँगा कि इस घटना में ‘शोषण के विरुद्ध अधिकार’ तथा कोई भी पेशा चुनने तथा व्यापार करने की स्वतन्त्रता के अधिकार का उल्लंघन हुआ है। अपने देश में करोड़ों लोग गरीब, दलित-शोषित और वंचित हैं या लोगों द्वारा उनका शोषण बेगार या बन्धुआ मजदूरी के रूप में किया जाता रहा है। ऐसे शोषणों पर संविधान प्रतिबन्ध लगाता है। इसे अपराध घोषित कर दिया गया है और यह शोषण कानून द्वारा दण्डनीय है।

अतः शोषण का विरोध करने पर उस समुदाय की चार महिलाओं को जिन व्यक्तियों ने निर्वस्त्र करके घुमाया, उन्हें मैं कानून सम्मत दण्ड निर्धारित करूँगा तथा सरकार को यह आदेश दूँगा कि समाज में ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करें कि सभी लोग बिना किसी बाधा के स्वतन्त्रतापूर्वक अपने व्यवसाय का चुनाव कर सकें। जो व्यक्ति, समुदाय, संगठन इसमें बाधा डालता है, उसे रोके तथा दण्डित करे।

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प्रश्न 8.
कुछ ऐसे मामले भी हो सकते हैं जिनमें कानून एक आदमी की जिन्दगी ले सकता है? यह तो अजीब बात है। क्या आपको कोई ऐसा मामला याद आता है?
उत्तर:
कानून किसी भी आदमी की जिन्दगी नहीं ले सकता क्योंकि भारतीय संविधान में स्वतन्त्रता के अधिकारों के तहत ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अधिकार प्राप्त है।’ किसी भी नागरिक को कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किये बिना उसे जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता से वंचित नहीं किया जा सकता। इसका अभिप्राय यह है कि किसी भी व्यक्ति को बिना कारण बताये गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। गिरफ्तार किये जाने पर उस व्यक्ति को अपने पसन्दीदा वकील के माध्यम से अपना बचाव करने का अधिकार है।

इसके अलावा, पुलिस के लिए यह आवश्यक है कि वह अभियुक्त को 24 घण्टे के अन्दर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करे। मजिस्ट्रेट ही इस बात का निर्णय करेगा कि गिरफ्तारी उचित है या नहीं। इस अधिकार के द्वारा किसी व्यक्ति के जीवन को मनमाने ढंग से समाप्त करने के विरुद्ध गारण्टी मिलती है। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने इसमें शोषण से मुक्त और मानवीय गरिमा से पूर्ण जीवन जीने का अधिकार भी अन्तर्निहित माना है।

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प्रश्न 9.
क्या आप मानते हैं कि निम्न परिस्थितियाँ स्वतन्त्रता के अधिकार पर प्रतिबन्धों की माँग करती हैं? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दें।
(क) शहर में साम्प्रदायिक दंगों के बाद लोग शान्ति मार्च के लिए एकत्र हुए हैं।
(ख) दलितों को मन्दिर में प्रवेश की मनाही है । मन्दिर में जबर्दस्ती प्रवेश के लिए एक जुलूस का आयोजन किया जा रहा है।
(ग) सैकड़ों आदिवासियों ने अपने परम्परागत अस्त्र तीर-कमान और कुल्हाड़ी के साथ सड़क जाम कर रखा है। ये माँग कर रहे हैं कि एक उद्योग के लिए अधिग्रहित खाली जमीन उन्हें लौटाई जाये।
(घ) किसी जाति की पंचायत की बैठक यह तय करने के लिए बुलाई गई कि जाति से बाहर विवाह करने के लिए एक नव दंपति को क्या दंड दिया जाए।
उत्तर:
(क) ‘शहर में साम्प्रदायिक दंगों के बाद लोग शान्ति मार्च के लिए एकत्र हुए हैं।’ यह परिस्थिति स्वतन्त्रता के अधिकार पर प्रतिबन्ध की माँग नहीं करती क्योंकि इसमें शान्तिपूर्वक ढंग से स्वतन्त्रता के अधिकार का उपयोग किया जा रहा है जिसका उद्देश्य साम्प्रदायिक दंगे फैलाना नहीं, बल्कि शान्तिमय वातावरण की स्थापना करना है।

(ख) ‘दलितों को मन्दिर में प्रवेश की मनाही है। मन्दिर में जबर्दस्ती प्रवेश के लिए एक जुलूस का आयोजन किया जा रहा है।’ यह परिस्थिति भी स्वतन्त्रता के अधिकार पर प्रतिबन्ध की माँग नहीं करती क्योंकि समता के मूल अधिकार के अन्तर्गत सार्वजनिक स्थलों, जैसे दुकान, होटल, मनोरंजन स्थल, कुआँ, स्नान घाट और पूजा-स्थलों में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई भेदभाव वर्जित करता है। अतः दलितों को मन्दिर प्रवेश की मनाही इस मूल अधिकार का उल्लंघन है। इस मूल अधिकार के प्रयोग के लिए मन्दिर में जबरदस्ती प्रवेश का आयोजन करना अनुचित नहीं है। यह स्थिति भी स्वतन्त्रता के अधिकार पर प्रतिबन्ध की माँग नहीं करती है। मन्दिर में जबरन प्रवेश का आयोजन किसी के स्वतन्त्रता के अधिकार का हनन नहीं कर रहा है, बल्कि समता के अधिकार को व्यावहारिक बना रहा है।

(ग) आदिवासियों द्वारा अस्त्र-शस्त्र आदि के साथ एकत्रित होना बिना अस्त्र-शस्त्र के शान्तिपूर्ण ढंग से जमा होने और सभा करने के स्वतन्त्रता के अधिकार का अतिक्रमण है। अस्त्र-शस्त्र के साथ एकत्रित होने व सभा करने की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध आवश्यक है।

(घ) जाति के बाहर विवाह करने के लिए एक नवदम्पति को दण्ड देने के लिए बुलाई गई जाति की पंचायत की बैठक स्वतन्त्रता के किसी अधिकार का अतिक्रमण नहीं है, बल्कि ‘विवाह कानून’ का उल्लंघन है। जाति की पंचायत को ऐसा दण्ड देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। फिर भी यदि वह दण्ड देने की कार्यवाही करती है तो उसे सामान्य कानून की प्रक्रिया के तहत रोका जा सकता है।

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प्रश्न 10.
मैं अपने मुहल्ले में तो अल्पसंख्यक हूँ पर शहर में बहुसंख्यक भाषा के हिसाब से तो अल्पसंख्यक हूँ लेकिन धर्म के लिहाज से मैं बहुसंख्यक हूँ। क्या हम सभी अल्पसंख्यक नहीं?
उत्तर:
अल्पसंख्यक वह समूह है जिनकी अपनी एक भाषा या धर्म होता है और देश के किसी एक भाग में या पूरे देश में संख्या के आधार पर वे किसी अन्य समूह से छोटा है। इस प्रकार किसी समुदाय को केवल धर्म के आधार पर ही नहीं बल्कि भाषा और संस्कृति के आधार पर भी अल्पसंख्यक माना जाता है। हम सभी अल्पसंख्यक नहीं हैं। चूँकि आप बहुसंख्यक धर्म वाले समुदाय के सदस्य हैं, लेकिन इस क्षेत्र की भाषा आपकी मातृभाषा नहीं है । इसलिए भाषा की दृष्टि से आप अल्पसंख्यक हैं।

दूसरे जिस क्षेत्र में आप निवास कर रहे हैं, उस क्षेत्र के बहुसंख्यक धार्मिक समुदाय से भिन्न जो दूसरे धार्मिक समुदाय के लोग निवास करते हैं, चाहे वे बहुसंख्यक भाषायी समुदाय के सदस्य है, अल्पसंख्यक कहलायेंगे। तीसरे, उस क्षेत्र में ऐसे लोग जो बहुसंख्यक धार्मिक समुदाय और बहुसंख्यक भाषायी समुदाय के सदस्य हैं, वे अल्पसंख्यक नहीं कहलायेंगे।

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प्रश्न 11.
ऐसा अनुमान है कि भारत में लगभग 30 लाख लोग शहरों में बेघर हैं। इनमें से 5 प्रतिशत लोगों के पास रात में सोने की जगह भी नहीं है। इनमें सैकड़ों बूढ़े और बीमार बेघर लोगों की जाड़े में शीतलहर से मृत्यु हो जाती है। उन्हें ‘निवास प्रमाण-पत्र’ न दे पाने के कारण रार्शन कार्ड या मतदाता पहचान पत्र नहीं मिल पाते। इसके अभाव में उन्हें जरूरतमंद मरीज के रूप में सरकारी मदद भी नहीं मिल पाती। इनमें एक बड़ी संख्या में लोग दिहाड़ी मजदूर हैं जिन्हें बहुत कम मजदूरी मिलती है। वे मजदूरी की तलाश में देश के विभिन्न हिस्सों से शहरों में आते हैं। आप इन तथ्यों के आधार पर ‘संवैधानिक उपचारों के अधिकार’ के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका भेजें। आपकी याचिका में निम्न दो बातों का उल्लेख होना चाहिए।
(क) इन बेघर लोगों के किस मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो रहा है?
(ख) आप सर्वोच्च न्यायालय से किस प्रकार का आदेश देने की प्रार्थना करेंगे?
उत्तर:
सेवा में,

श्रीमान मुख्य न्यायाधीश
सर्वोच्च न्यायालय, भारत

महोदय,
निवेदन है कि ” ऐसा अनुमान है कि भारत में लगभग 30 लाख लोग शहरों में बेघर हैं। …………….-वे मजदूरी की तलाश में विभिन्न हिस्सों से शहरों में आते हैं।”
(क) महोदय, उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि इन लोगों के ‘जीवन जीने’ के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो रहा है। क्योंकि आपके न्यायालय द्वारा पूर्व में दिये गए एक निर्णय के अनुसार, इस अधिकार में शोषण से मुक्त और मानवीय गरिमा से पूर्ण जीवन जीने का अधिकार अन्तर्निहित है। इस प्रकार न्यायालय ने माना है कि जीवन के अधिकार का अर्थ है कि व्यक्ति को आश्रय और आजीविका का अधिकार हो क्योंकि इसके बिना कोई जिन्दा नहीं रह सकता।

(ख) उपर्युक्त उद्धरण में दिये गए तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि भारत में लगभग 30 लाख लोग आवास और मजदूरी के अभाव में सर्दी की शीतलहर में मृत्यु के शिकार हो जाते हैं। सरकार इन लोगों के ‘गरिमापूर्ण जीवन जीने’ के अधिकार की ओर उदासीन है। अतः आप देश की सरकार को ऐसा आदेश या निर्देश दें कि ये लोग गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार का उपभोग कर सकें और भविष्य में ऐसे लोगों के बेघर होने तथा शोषण व बिना आजीविका के कारण शीतलहर में मृत्यु न हो सके।

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प्रश्न 12.
मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्त्वों के बीच सम्बन्धों पर उठे विवाद के पीछे एक महत्त्वपूर्ण कारण था: मूल संविधान में सम्पत्ति अर्जन, स्वामित्व और संरक्षण को मौलिक अधिकार दिया गया था। लेकिन संविधान में स्पष्ट कहा गया था कि सरकार लोक-कल्याण के लिए सम्पत्ति का अधिग्रहण कर सकती है। 1950 से ही सरकार ने अनेक ऐसे कानून बनाये जिससे सम्पत्ति के अधिकार पर प्रतिबन्ध लगा। मौलिक अधिकारों और नीति- निर्देशक तत्त्वों के मध्य विवाद के केन्द्र में यही अधिकार था। आखिरकार 1973 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में ‘सम्पत्ति के अधिकार’ को ‘संविधान के मूल ढाँचे’ का तत्त्व नहीं माना और कहा कि संसद को संविधान का संशोधन करके इसे प्रतिबन्धित करने का अधिकार है। 1978 में जनता पार्टी की सरकार ने 44वें संविधान संशोधन के द्वारा सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से निकाल दिया और संविधान के अनुच्छेद 300 ( क ) के अन्तर्गत उसे एक सामान्य कानूनी अधिकार बना दिया। आपकी राय में ‘सम्पत्ति के अधिकार’ को मौलिक अधिकार से कानूनी अधिकार बनाने से क्या फर्क पड़ता है?
उत्तर:
मेरी राय में सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से कानूनी अधिकार बनाने से यह फर्क पड़ता है कि अब सरकार कोई कानून बनाकर लोक-कल्याण के लिए जब किसी सम्पत्ति का अधिग्रहण करेगी तो उसका मालिक सम्पत्ति के मौलिक अधिकार के हनन के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय में सरकार के विरुद्ध याचिका प्रस्तुत नहीं कर सकेगा। अब उसे सम्पत्ति के सामान्य कानून के अन्तर्गत ही न्यायालय में वाद दायर करना होगा।

दूसरे, सम्पत्ति के मौलिक अधिकार के होने पर सरकार को उसके लोकहित में अधिग्रहण करने पर उसके बाजार मूल्य की राशि का मुआवजा देना पड़ता था, अब सरकार कोई भी राशि उसके एवज में कानून के अन्तर्गत निर्धारित कर सकती है। तीसरे, सम्पत्ति के मौलिक अधिकार के कारण ही नीति-निर्देशक तत्त्व और मूल अधिकारों के मध्य विवाद पैदा हुए। अब ऐसा कोई विवाद पैदा नहीं होगा।

पृष्ठ 48

प्रश्न 13.
दक्षिण अफ्रीका के संविधान में अधिकारों के घोषणा पत्र और भारतीय संविधान में दिए नीति- निर्देशक तत्त्वों को पढ़ें। दोनों सूचियों में आपको कौनसी बातें एकसमान लगती हैं?
उत्तर:
दक्षिण अफ्रीका के संविधान में अधिकारों को घोषणा-पत्र और भारतीय संविधान में दिये नीति-निर्देशक तत्त्वों की सूचियों में निम्नलिखित बातें एकसमान लगती है।

  1. स्वास्थ्यप्रद पर्यावरण और पर्यावरण संरक्षण
  2. स्वास्थ्य सुविधाएँ, भोजन, पानी और सामाजिक सुरक्षा
  3. बुनियादी और उच्च शिक्षा का अधिकार।

प्रश्न 14.
दक्षिण अफ्रीका के संविधान में संवैधानिक अधिकारों को अधिकारों के घोषणा-पत्र में क्यों रखा? उत्तर-दक्षिण अफ्रीका का संविधान तब बनाया तथा लागू किया गया जब रंगभेद वाली सरकार के हटने के बाद दक्षिण अफ्रीका गृहयुद्ध के खतरे से जूझ रहा था। ऐसी स्थिति में नस्ल, लिंग, गर्भधारण, वैवाहिक स्थिति, जातीय या सामाजिक मूल, रंग, आयु, अपंगता, धर्म, अन्तरात्मा, आस्था, संस्कृति, भाषा और जन्म के आधार पर भेदभाव वर्जित करने के लिए नागरिकों को व्यापक अधिकार देना आवश्यक था। यही कारण है कि दक्षिण अफ्रीका के संविधान में संवैधानिक अधिकारों को अधिकारों के घोषणा-पत्र में रखा।

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प्रश्न 1.
निम्नलिखित प्रत्येक कथन के बारे में बताएँ कि वह सही है या गलत।
(क) अधिकार-पत्र में किसी देश की जनता को हासिल अधिकारों का वर्णन रहता है।
(ख) अधिकार-पत्र व्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा करता है।
(ग) विश्व के हर देश में अधिकार – पत्र होता है।
उत्तर:
(क) सत्य
(ख) सत्य
(ग) असत्य।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में कौन मौलिक अधिकारों का सबसे सटीक वर्णन है?
(क) किसी व्यक्ति को प्राप्त समस्त अधिकार
(ख) कानून द्वारा नागरिक को प्रदत्त समस्त अधिकार
(ग) संविधान द्वारा प्रदत्त और सुरक्षित समस्त अधिकार
(घ) संविधान द्वारा प्रदत्त वे अधिकार जिन पर कभी प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता।
उत्तर:
(ग) संविधान द्वारा प्रदत्त और सुरक्षित समस्त अधिकार।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित स्थितियों को पढ़ें। प्रत्येक स्थिति के बारे में बताएँ कि किस मौलिक अधिकार का उपयोग या उल्लंघन हो रहा है और कैसे?
(क) राष्ट्रीय एयरलाइन के चालक-परिचालक दल (Cabin Crew) के ऐसे पुरुषों को जिनका वजन ज्यादा है। नौकरी में तरक्की दी गई लेकिन उनकी ऐसी महिला सहकर्मियों को दण्डित किया गया जिनका वजन बढ़ गया था।
(ख) एक निर्देशक एक डॉक्यूमेन्ट्री फिल्म बनाता है जिसमें सरकारी नीतियों की आलोचना है।
(ग) एक बड़े बाँध के कारण विस्थापित हुए लोग अपने पुनर्वास की माँग करते हुए रैली निकालते हैं।
(घ) आन्ध्र-सोसायटी आन्ध्र प्रदेश के बाहर तेलगू माध्यम से विद्यालय चलाती है।
उत्तर:
(क) राष्ट्रीय एयरलाइन के चालक-परिचालक दल के ऐसे पुरुषों को जिनका वजन ज्यादा है। पदोन्नति दी गई, लेकिन उन्हीं की साथी महिला सहकर्मियों को जिनका वजन बढ़ गया था, दण्डित किया गया। इस दशा में समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन हो रहा है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 16

  1. के अनुसार राज्य के अधीन किसी नियोजन या नियुक्ति से सम्बन्धित विषयों में सभी नागरिकों के लिए समान अवसर की समानता होगी। अनुच्छेद 16
  2. के अनुसार राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के सम्बन्ध में धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म-स्थान, निवास के आधार पर कोई विभेद नहीं किया जायेगा। लेकिन उपर्युक्त घटना में लिंग के आधार पर भेदभाव किया गया है। यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

(ख) ‘एक निर्देशक एक डॉक्यूमेन्ट्री फिल्म बनाता है जिसमें सरकारी नीतियों की आलोचना है।’ इस स्थिति में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकार का उपयोग हो रहा है। अनुच्छेद 19(i) के अनुसार सभी नागरिकों को विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार प्राप्त है।

(ग) ‘एक बड़े बांध के कारण विस्थापित लोग अपने पुनर्वास की माँग करते हुए रैली निकालते हैं।
इस स्थिति में अनुच्छेद 19(ii) के नागरिकों को प्रदत्त शान्तिपूर्ण सम्मेलन करने की स्वतन्त्रता का उपयोग हो रहा है।

(घ) ‘आन्ध्र-सोसायटी आन्ध्र प्रदेश के बाहर तेलगू माध्यम से विद्यालय चलाती है।’
इस स्थिति में अल्पसंख्यकों के अधिकार का उपभोग हो रहा है। संविधान के अनुच्छेद 30 के अनुसार अल्पसंख्यकों को अपनी शिक्षण संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार प्राप्त है। इसी के आधार पर आन्ध्र सोसायटी आन्ध्र प्रदेश के बाहर तेलगू भाषा के विद्यालय चलाती है।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित में कौन सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की सही व्याख्या है?
(क) शैक्षिक संस्था खोलने वाले अल्पसंख्यक वर्ग के ही बच्चे उस संस्थान में पढ़ाई कर सकते हैं।
(ख) सरकारी विद्यालयों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अल्पसंख्यक वर्ग के बच्चों को उनकी संस्कृति और धर्म-विश्वासों से परिचित कराया जाए।
(ग) भाषायी और धार्मिक अल्पसंख्यक अपने बच्चों के लिए विद्यालय खोल सकते हैं और उनके लिए इन विद्यालयों को आरक्षित कर सकते हैं।
(घ) भाषायी और धार्मिक अल्पसंख्यक यह माँग कर सकते हैं कि उनके बच्चे उनके द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थाओं के अतिरिक्त किसी अन्य संस्थान में नहीं पढ़ेंगे।
उत्तर:
उपर्युक्त चारों कथनों में (ग) ‘भाषायी और धार्मिक अल्पसंख्यक अपने बच्चों के लिए विद्यालय खोल सकते हैं और उनके लिए इन विद्यालयों को आरक्षित कर सकते हैं।’ यही सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की सही व्याख्या है।

प्रश्न 5.
इनमें कौन मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और क्यों?
(क) न्यूनतम देय मजदूरी नहीं देना।
(ख) किसी पुस्तक पर प्रतिबन्ध लगाना।
(ग) 9 बजे रात के बाद लाऊड स्पीकर बजाने पर रोक लगाना।
(घ) भाषण तैयार करना।
उत्तर:
(क) न्यूनतम देय मजदूरी नहीं देना: शोषण के विरुद्ध संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है। सर्वोच्च न्यायालय में अपने एक निर्णय में इस बात को स्वीकार किया है कि न्यूनतम मजदूरी से कम मजदूरी देना ‘बेगार’ या ‘बंधुआ मजदूरी’ जैसा है और नागरिकों को प्राप्त ‘शोषण के विरुद्ध’ मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

(ख) किसी पुस्तक पर प्रतिबंध लगाना: इस उदाहरण में विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है क्योंकि पुस्तक किसी एक व्यक्ति के या समूह के विचारों की अभिव्यक्ति है।

(ग) एवं

(घ) में किसी भी मूल अधिकार का उल्लंघन नहीं है।

प्रश्न 6.
गरीबों के बीच काम कर रहे एक कार्यकर्त्ता का कहना है कि गरीबों को मौलिक अधिकारों की जरूरत नहीं है। उनके लिए जरूरी यह है कि नीति-निर्देशक सिद्धान्तों को कानूनी तौर पर बाध्यकारी बना दिया जाय। क्या आप इससे सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण बताइए।
उत्तर:
मैं इस कथन से सहमत नहीं हूँ। यदि मूल अधिकारों को समाप्त कर दिया जायेगा तो समानता, स्वतन्त्रता और शोषण के विरुद्ध मौलिक अधिकार नहीं रहेगा। ऐसी स्थिति में अराजकता आ जायेगी। राजनैतिक स्वतन्त्रता और समानता के अभाव में आर्थिक समानता की स्थापना बाध्यकारी ढंग से करने पर नौकरशाही का बोलबाला हो जायेगा और वह निरंकुश हो जायेगी।

परिणामतः गरीब कार्यकर्त्ता को नीति-निर्देशक सिद्धान्तों को लागू किये जाने का काम नहीं मिल पायेंगा। दूसरे, राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों को बाध्यकारी बनाना संभव नहीं है। यदि इन सिद्धान्तों को बाध्यकारी बना दिया जाये तो उसके लिए व्यापक संसाधनों की व्यवस्था करनी पड़ेगी जो कि एक दुष्कर कार्य है।

प्रश्न 7.
अनेक रिपोर्टों से पता चलता है कि जो जातियाँ पहले झाडू देने के काम में लगी थीं, उन्हें अब भी मजबूरन यही काम करना पड़ रहा है। जो लोग अधिकार- पद पर बैठे हैं वे इन्हें कोई और काम नहीं देते। इनके बच्चों को पढ़ाई-लिखाई करने पर हतोत्साहित किया जाता है। इस उदाहरण में किस मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो रहा है।
उत्तर:
इस उदाहरण से अग्रलिखित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है।
1. स्वतन्त्रता का अधिकार:
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के अनुसार सभी नागरिकों को वृत्ति, उपजीविका, व्यापार अथवा व्यवसाय की स्वतन्त्रता है। उक्त रिपोर्टों से यह पता चलता है कि आजीविका या पेशा चुनने की स्वतन्त्रता नहीं दी जा रही है । अतः उनके स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकार का हनन हुआ है।

2. संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार:
उपर्युक्त रिपोर्टों में दी गई स्थिति में झाडू देने वाली जातियों के व्यक्तियों के संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार का भी उल्लंघन हुआ है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 29 में यह स्पष्ट कहा गया है कि राज्य द्वारा घोषित या राज्य निधि से सहायता प्राप्त किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश से किसी भी नागरिक को धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें से किसी के भी आधार पर वंचित नहीं किया जायेगा।

3. समानता का अधिकार:
उपरोक्त घटना में समानता के अधिकार का भी उल्लंघन होता है। समानता के अधिकार के अनुसार भारत के राज्य-क्षेत्र में प्रत्येक व्यक्ति कानून के समक्ष समान समझा जायेगा। धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा। लेकिन उपरोक्त घटना में जाति के आधार पर भेदभाव किया गया है।

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प्रश्न 8.
एक मानवाधिकार समूह ने अपनी याचिका में अदालत का ध्यान देश में मौजूद भुखमरी की स्थिति की तरफ खींचा भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में 5 करोड़ टन से ज्यादा अनाज भरा हुआ था। शोध से पता चलता है कि अधिकांश राशन कार्डधारी यह नहीं जानते कि उचित मूल्य की दुकानों से कितनी मात्रा में वे अनाज खरीद सकते हैं। मानवाधिकार समूह ने अपनी याचिका में अदालत से निवेदन किया कि वह सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार करने का आदेश दे।
(क) इस मामले में कौन-कौनसे अधिकार शामिल हैं? ये अधिकार आपस में किस तरह जुड़े हैं?
(ख) क्या ये अधिकार जीवन के अधिकार का एक अंग हैं?
उत्तर:
(क) उपर्युक्त उदाहरण के अन्तर्गत संवैधानिक उपचारों का अधिकार तथा जीवन का अधिकार शामिल हैं। ये अधिकार परस्पर जुड़े हुए हैं। भूख से मरने के कारण ‘जीवन के अधिकार’ का उल्लंघन हुआ। गोदामों में पाँच करोड़ टन अनाज होते हुए भी सरकार ने वितरण व्यवस्था ठीक नहीं की और मानव अधिकार समूह द्वारा न्यायालय से यह प्रार्थना की गई कि सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार के आदेश दे। इस प्रकार इसमें संवैधानिक उपचारों का अधिकार सम्मिलित है।

(ख) ये अधिकार यद्यपि अलग-अलग मूल अधिकार हैं तथापि ये इस मामले में ‘जीवन के अधिकार’ के भाग हैं।

प्रश्न 9.
इस अध्याय में उद्धृत सोमनाथ लाहिडी द्वारा संविधान सभा में दिये गये वक्तव्य को पढ़ें। क्या आप उनके कथन से सहमत हैं? यदि ‘हाँ’ तो इसकी पुष्टि में कुछ उदाहरण दें। यदि ‘नहीं’ तो उनके कथन के विरुद्ध तर्क प्रस्तुत करें।
उत्तर:
सोमनाथ लाहिडी द्वारा संविधान सभा में दिया गया वक्तव्य इस प्रकार है: “मैं समझता हूँ कि इनमें से अनेक मौलिक अधिकारों को एक सिपाही के दृष्टिकोण से बनाया गया है। आप देखेंगे कि काफी कम अधिकार दिये गये हैं और प्रत्येक अधिकार के बाद एक उपबन्ध जोड़ा गया है। लगभग प्रत्येक अनुच्छेद के बाद एक उपबन्ध है जो उस अधिकार को पूरी तरह से वापस ले लेता है। मौलिक अधिकारों की हमारी क्या अवधारणा होनी चाहिए? हम उस प्रत्येक अधिकार को संविधान में पाना चाहते हैं जो हमारी जनता चाहती हैं। ” मैं इस कथन से सहमत हूँ क्योंकि।

1. हमारे संविधान में मौलिक अधिकार कम दिये गये हैं। बहुत-सी ऐसी बातों को छोड़ दिया गया है जो मौलिक अधिकारों में शामिल होनी चाहिए थीं। जैसे काम करने का अधिकार, निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार, आवास का अधिकार, सूचना प्राप्त करने का अधिकार आदि।

2. प्रत्येक मौलिक अधिकार के साथ अनेक प्रतिबन्ध लगा दिये गए हैं जिससे यह समझना कठिन हो जाता है कि व्यक्ति को मौलिक अधिकारों से क्या मिला है। भारतीय संविधान इस प्रकार एक हाथ से नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है और दूसरे हाथ से वह उनसे उन मौलिक अधिकारों को छीन लेता है।

3. प्रत्येक मौलिक अधिकार पर प्रतिबन्ध लगाने से यह स्पष्ट होता है कि ये अधिकार पुलिस के सिपाही के दृष्टिकोण से दिये गये हैं। हरिविष्णु कामथ ने भी संविधान सभा में कहा था कि “इस व्यवस्था द्वारा हम तानाशाही राज्य और पुलिस राज्य की स्थापना कर रहे हैं।” इसी प्रकार सरदार हुकुमसिंह ने कहा था कि “यदि हम इन स्वतन्त्रताओं को व्यवस्थापिका की इच्छा पर ही छोड़ देते हैं जो कि एक राजनीतिक दल के अलावा कुछ नहीं है, तो इन स्वतन्त्रताओं के अस्तित्व में भी सन्देह हो जायेगा ।” उदाहरण के लिए ‘भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता’ पर कानून व्यवस्था, शान्ति और नैतिकता के आधार पर प्रतिबन्ध लगाये जा सकते हैं। प्रशासन इस शक्ति का आसानी से दुरुपयोग कर सकता है।

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प्रश्न 10.
आपके अनुसार कौनसा मौलिक अधिकार सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है? इसके प्रावधानों को संक्षेप में लिखें और तर्क देकर बताएँ कि यह क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
44वें संविधान द्वारा 1979 में सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से निकाल देने के पश्चात् भारतीय संविधान में नागरिकों को छः मूल अधिकार दिये गये हैं। ये हैं।

  1. समता का अधिकार,
  2. स्वतन्त्रता का अधिकार,
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार,
  4. धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार,
  5. शिक्षा तथा सम्पत्ति का अधिकार और
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार। यद्यपि ये सभी अधिकार महत्त्वपूर्ण हैं, तथापि इनमें ‘संवैधानिक उपचारों का अधिकार’ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।

संवैधानिक उपचारों के मौलिक अधिकार के अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया है कि प्रत्येक नागरिक अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में सीधे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए सरकार या उल्लंघनकर्त्ता को आदेश या निर्देश दे सकते हैं। ये न्यायालय इस हेतु बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध लेख, अधिकार पृच्छा या उत्प्रेषण लेख जारी कर सकते हैं। यह मौलिक अधिकार भारतीय संविधान में दिये अन्य मौलिक अधिकारों से निम्नलिखित कारणों से अधिक महत्त्वपूर्ण है-

  1. संवैधानिक उपचार के मौलिक अधिकार के माध्यम से ही न्यायालय ऐसे मामलों में त्वरित कार्यवाही करता है ताकि एक क्षण के लिए भी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो सके।
  2. संवैधानिक उपचार के मौलिक अधिकार के माध्यम से ही मौलिक अधिकारों को व्यवहार में लाया जा सकता है तथा मौलिक अधिकारों के उल्लंघन होने पर उनकी रक्षा की जा सकती है। डॉ. अम्बेडकर ने इसीलिए इस अधिकार को ‘संविधान का हृदय’ और ‘आत्मा’ की संज्ञा दी है। इस अधिकार के बिना सभी मूलकार अव्यावहारिक हो जायेंगे।

भारतीय संविधान में अधिकार JAC Class 11 Political Science Notes

→ परिचय: भारत के संविधान के तीसरे भाग में मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है; उसमें प्रत्येक मौलिक अधिकार के प्रयोग की सीमा का भी उल्लेख है।

→ अधिकारों का घोषणा-पत्र: अधिकतर लोकतान्त्रिक देशों में नागरिकों के अधिकारों को संविधान में सूचीबद्ध कर दिया जाता है। संविधान द्वारा प्रदान किये गये और संरक्षित अधिकारों की ऐसी सूची को ‘अधिकारों का घोषणा- पत्र’ कहते हैं। अधिकारों का घोषणा-पत्र सरकार को नागरिकों के अधिकारों के विरुद्ध काम करने से रोकता है और उसका उल्लंघन हो जाने पर उपचार सुनिश्चित करता है। संविधान नागरिकों के अधिकारों को अन्य व्यक्ति या नागरिकों, निजी संगठन तथा सरकार की विभिन्न संस्थाओं से संरक्षित करता है।

→ भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार।

  • मौलिक अधिकार से आशय – संविधान में उन अधिकारों को सूचीबद्ध किया गया है जिन्हें सुरक्षा देनी थी और इन अधिकारों को मौलिक अधिकारों की संज्ञा दी गई है। उनकी सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान बनाये गये हैं। वे इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि संविधान स्वयं यह सुनिश्चित करता है कि सरकार भी उनका उल्लंघन न कर सके।
  • मौलिक अधिकार अन्य अधिकारों से भिन्न हैं।
    • कानूनी अधिकारों की सुरक्षा हेतु जहाँ साधारण कानूनों का सहारा लिया जाता है, वहाँ मौलिक अधिकारों की गारण्टी व सुरक्षा संविधान स्वयं करता है।
    • सामान्ये अधिकारों को संसद कानून बनाकर परिवर्तित कर सकती है, लेकिन मौलिक अधिकारों में परिवर्तन के लिए संविधान संशोधन आवश्यक है।
    • सरकार के कार्यों से मौलिक अधिकारों के हनन को रोकने की शक्ति और इसका उत्तरदायित्व न्यायपालिका के पास है।
    • मौलिक अधिकार निरंकुश या असीमित अधिकार नहीं हैं। सरकार मौलिक अधिकारों के प्रयोग पर ‘औचित्यपूर्ण’ प्रतिबन्ध लगा सकती है।

→ भारतीय संविधान में प्रदत्त प्रमुख मौलिक अधिकार; भारतीय संविधान में नागरिकों को निम्नलिखित प्रमुख मौलिक अधिकार प्रदान किये गये हैं। समता का अधिकार: समता के अधिकार के अन्तर्गत निम्नलिखित बातों का समावेश किया गया है।

  • कानून के समक्ष समानता
  • कानून का समान संरक्षण
  • धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध दुकानों, होटलों, कुओं, तालाबों, स्नानघाटों, सड़कों आदि में प्रवेश की समानता
  • रोजगार में अवसर की समानता
  • उपाधियों का अन्त
  • छुआछूत की समाप्ति।

→ स्वतन्त्रता का अधिकार:
(क) व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार इस अधिकार के अन्तर्गत निम्नलिखित स्वतन्त्रताओं का समावेश किया गया है।

  • भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता
  • शान्तिपूर्ण ढंग से जमा होने और सभा करने की स्वतन्त्रता,
  • संगठित होने की स्वतन्त्रता,
  • भारत में कहीं भी आने-जाने की स्वतन्त्रता,
  • भारत के किसी भी हिस्से में बसने और रहने की स्वतन्त्रता,
  • कोई भी पेशा चुनने, व्यापार करने की स्वतन्त्रता,

(ख) अपराधों के लिए दोष सिद्धि के संबंध में संरक्षण;
(ग) जीवन की रक्षा और दैहिक स्वतन्त्रता का अधिकार;
(घ) शिक्षा का अधिकार तथा
(ङ) अभियुक्तों और सजा पांए लोगों के अधिकार।

→ शोषण के विरुद्ध अधिकार: इसके अन्तर्गत निम्नलिखित बातों का समावेश किया गया है।

  • मानव के दुर्व्यापार और बंधुआ मजदूरी पर रोक,
  • 14 वर्ष से कम उम्र के बालकों को जोखिम वाले कामों में मजदूरी कराने पर रोक। बाल-श्रम को अवैध बनाकर और शिक्षा को बच्चों का मौलिक अधिकार बनाकर शोषण के विरुद्ध संवैधानिक अधिकार को और अर्थपूर्ण बनाया गया है।

→ धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार: सके अन्तर्गत इन बातों का समावेश किया गया है।

  • आस्था और प्रार्थना की आजादी,
  • धार्मिक मामलों के प्रबन्धन,
  •  किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए कर अदायगी की स्वतंत्रता,
  • कुछ शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या उपासना में उपस्थित होने की स्वतंत्रता,
  • सभी धर्मों की समानता।

→ सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार: इसके अन्तर्गत निम्नलिखित बातें समाहित हैं।

  1. अल्पसंख्यकों की भाषा और संस्कृति के संरक्षण का अधिकार।
  2. अल्पसंख्यकों को शैक्षिक संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार।

→ संवैधानिक उपचारों का अधिकार: इसके तहत मौलिक अधिकारों को लागू करवाने के लिए न्यायालय में जाने का अधिकार आता है। न्यायालय बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेध आदेश, अधिकार पृच्छा तथा उत्प्रेषण लेख के माध्यम से मूल अधिकारों की रक्षा करता है। राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व: नीति-निर्देशक तत्त्व से आशय संविधान के भाग चार में नीतियों की एक निर्देशक सूची रखी गयी है। निर्देशों की इस सूची को राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व कहते हैं। नीति-निर्देशक तत्त्व ‘वाद  योग्य’ नहीं हैं। नीति-निर्देशक तत्त्वों की सूची में तीन प्रमुख बातें हैं।

  • वे लक्ष्य और उद्देश्य जो एक समाज के रूप में हमें स्वीकार करने चाहिए।
  • वे अधिकार जो नागरिकों को मौलिक अधिकारों के अलावा मिलने चाहिए।
  • वे नीतियाँ जिन्हें सरकार को स्वीकार करना चाहिए।

समय-समय पर सरकार ने कुछ नीति-निर्देशक तत्त्वों को लागू करने का प्रयास किया है।

→  नीति-निर्देशक तत्त्वों के उद्देश्य: राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्वों के उद्देश्य ये हैं।

  • लोगों का कल्याण; सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय।
  • जीवन स्तर ऊँचा उठाना; संसाधनों का समान वितरण।
  • अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को बढ़ावा देना।

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→ प्रमुख नीतियाँ:

  • समान नागरिक संहिता,
  • मद्यपान निषेध,
  • घरेलू उद्योगों को बढ़ावा,
  • उपयोगी पशुओं को मारने पर रोक,
  • ग्राम पंचायतों को प्रोत्साहन।

→ ऐसे अधिकार जिनके लिए न्यायालय में दावा नहीं किया जा सकता:

  • पर्याप्त जीवन-यापन,
  • महिलाओं और पुरुषों को समान काम की समान मजदूरी,
  • आर्थिक शोषण के विरुद्ध अधिकार,
  • काम का अधिकार तथा
  • छः वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देख-रेख और शिक्षा।

→ नीति-निर्देशक तत्त्वों और मौलिक अधिकारों में सम्बन्ध: मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक तत्त्वों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखा जा सकता है। यथा

  • जहाँ मौलिक अधिकार सरकार के कुछ कार्यों पर प्रतिबन्ध लगाते हैं, वहीं नीति-निर्देशक तत्त्व उसे कुछ कार्यों को करने की प्रेरणा देते हैं।
  • मौलिक अधिकार खास तौर से व्यक्ति के अधिकारों को संरक्षित करते हैं, पर नीति-निर्देशक तत्त्व पूरे समाज के हित की बात करते हैं। लेकिन कभी-कभी जब सरकार नीति-निर्देशक तत्त्वों को लागू करने का प्रयास करती है, तो वे नागरिकों के मौलिक अधिकारों से टकरा सकते हैं।

→ नागरिकों के मौलिक कर्त्तव्य: 42वें संविधान संशोधन के द्वारा संविधान में नागरिकों के मौलिक कर्त्तव्यों की एक सूची का समावेश किया गया है जिसमें कुल 10 कर्त्तव्यों का उल्लेख किया गया है। लेकिन इन्हें लागू करने के सम्बन्ध में संविधान मौन है।

→ प्रमुख कर्त्तव्यु: संविधान में वर्णित नागरिकों के प्रमुख कर्त्तव्य हैं। संविधान का पालन करना, देश की रक्षा करना, सभी नागरिकों में भाईचारा बढ़ाने का प्रयत्न करना तथा पर्यावरण की रक्षा करना। संविधान में मौलिक कर्त्तव्यों के समावेश से हमारे मौलिक अधिकारों पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 संविधान – क्यों और कैसे?

Jharkhand Board JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 संविधान – क्यों और कैसे? Textbook Exercise Questions and Answers.

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Jharkhand Board Class 11 Political Science संविधान – क्यों और कैसे? InText Questions and Answers

पृष्ठ 1

प्रश्न 1.
संविधान किस्से कहते हैं? या संविधान क्या है?
उत्तर:
संविधान एक लिखित या अलिखित दस्तावेज या दस्तावेजों का पुंज है जिसमें राज्य सम्बन्धी प्रावधान यह बताते हैं कि राज्य का गठन कै से होगा और वह किन सिद्धान्तों का पालन करेगा।

प्रश्न 2.
संविधान समाज को क्या देता है?
उत्तर:
संविधान समाज में तालमेल बिठाता है।, सरकार का निर्माण करता है, सरकार की सीमाएँ बताता है तथा समाज की आकांक्षाओं और लक्ष् यों को बताता है। यथा

  1. संविधान समाज में तालमेल बिठाता है: संविधान समाज में तालमेल बिठाता है। यह समाज में बुनियादी नियमों को प्रस्तुत कर रता है तथा उन्हें लागू कराता है ताकि समाज के सदस्यों में न्यूनतम समन्वय और विश्वास बना रहे।
  2. यह शक्ति का वित रण स्पष्ट करता है: यह समाज में शक्ति के मूल वितरण को स्पष्ट करता है तथा यह स्पष्ट करता है कि समाज में निर्णय लेने की शक्ति किसके पास होगी तथा सरकार कैसे निर्मित होगी।
  3. सरकार की शक्तियों पर सीमाएँ: संविधान सरकार द्वारा अपने नागरिकों पर लागू किये जाने वाले कानूनों की सीमाएँ तय करता है । इसी सन्दर्भ में वह नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है।
  4. समाज की आकांक्षाएँ और लक्ष्य: संविधान सरकार को ऐसी क्षमता प्रदान करता है जिससे वह समाज की आकांक्षाओं को पूरा कर सके और एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए उचित परिस्थितियों का निर्माण कर सके।

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प्रश्न 3.
संविधान समाज में शक्ति का बंटवारा कैसे करता है?
उत्तर:
संविधान समाज में शक्ति के मूल वितरण को स्पष्ट करता है। संविधान यह तय करता है कि कानून कौन बनायेगा। उदाहरण के लिए भारतीय संविधान में यह स्पष्ट किया गया है कि अधिकतर कानून संसद और राज्य विधानमण्डल बनायेंगे। संसद और राज्य विधानमण्डलों को कानून निर्माण का अधिकार संविधान प्रदान करता है। इसी प्रकार संविधान सरकार की अन्य संस्थाओं को भी शक्ति जैसे कार्यपालिका को कानूनों के क्रियान्वयन और न्यायपालिका को कानूनों को लागू करने की शक्ति प्रदान करता है।

प्रश्न 4.
भारत का संविधान कैसे बनाया गया?
उत्तर:
भारत के संविधान का निर्माण संविधान सभा ने 2 वर्ष 11 मास 18 दिन की अवधि में 166 दिनों तक बैठकें कर 26 नवम्बर, 1949 को पारित किया। संविधान सभा की संविधान निर्माण की प्रक्रिया इस प्रकार रही

  1. सार्वजनिक हित: संविधान सभा के सदस्यों ने पूरे देश के हित को ध्यान में रखकर विचार-विमर्श कर निर्णय लिया।
  2. सार्वजनिक विवेकयुक्त कार्यविधि: विभिन्न मुद्दों के लिए संविधान सभा की आठ मुख्य कमेटियाँ थीं। प्रत्येक कमेटी ने संविधान के कुछ-कुछ प्रावधानों का प्रारूप तैयार किया जिन पर बाद में पूरी संविधान सभा में चर्चा की गयी । प्रायः प्रयास यह किया गया कि निर्णय आम राय से हो, लेकिन कुछ प्रावधानों पर निर्णय मत विभाजन करके भी लिये गये।
  3. राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत को मूर्त रूप देना: संविधान सभा ने उन सिद्धान्तों को मूर्त रूप आकार दिया जो उसके सदस्यों ने राष्ट्रीय आन्दोलन से विरासत में प्राप्त किये थे। इन सिद्धान्तों का सारांश नेहरू द्वारा 1946 में प्रस्तुत ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ में मिलता है। इसी प्रस्ताव के आधार पर संविधान में समानता, स्वतंत्रता, लोकतंत्र और संप्रभुता को संस्थागत रूप दिया गया।
  4. संस्थागत व्यवस्थाएँ: संविधान सभा ने सरकार को जनकल्याण तथा लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध रखने हेतु शासन . के तीनों अंगों – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए बहुत विचार मंथन – किया। परिणामस्वरूप संविधान सभा ने संसदीय व्यवस्था और संघात्मक व्यवस्था को स्वीकार किया।
  5. विभिन्न देशों के संविधानों के प्रावधानों को ग्रहण करना: संविधान सभा ने शासकीय संस्थाओं की संतुलित व्यवस्था स्थापित करने के लिए विभिन्न देशों के संविधानों के प्रावधानों व संवैधानिक परम्पराओं को ग्रहण किया तथा उन्हें भारतीय समस्याओं व परिस्थितियों के अनुरूप ढालकर अपना बना लिया।

पृष्ठ 10

प्रश्न 5.
(ख) संविधान कितना प्रभावी है?
उत्तर:
संविधान कितना प्रभावी है? इस बात का निर्धारण इस बात के निर्धारण से किया जाता है कि कोई संविधान कैसे अस्तित्व में आया? किसने संविधान बनाया और उनके पास इसे बनाने की कितनी शक्ति थी?
यदि संविधान सैनिक शासकों या ऐसे अलोकप्रिय नेताओं द्वारा बनाये जाते हैं जिनके पास लोगों को अपने साथ लेकर चलने की क्षमता नहीं होती, तो वे संविधान कम प्रभावी या निष्प्रभावी होते हैं। यदि संविधान सफल राष्ट्रीय आन्दोलन के बाद आंदोलन के लोकप्रिय नेताओं द्वारा निर्मित किया जाता है तो उसमें समाज के सभी वर्गों को एक साथ ले चलने की क्षमता होती है, ऐसा संविधान प्रभावशाली होता है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि जिस संविधान निर्मात्री सभा के सदस्यों में जितनी अधिक लोकप्रियता, जनहित की भावना और समाज के सभी वर्गों को साथ ले चलने की क्षमता होगी संविधान उतना ही अधिक प्रभावी होगा। विश्व के सर्वाधिक सफल व प्रभावी संविधान भारत, दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका के हैं जिन्हें एक सफल राष्ट्रीय आन्दोलन के बाद बनाया गया है।

(ग) क्या संविधान न्यायपूर्ण है?
उत्तर:
एक न्यायपूर्ण संविधान, संविधान के प्रावधानों का आदर करने का कोई कारण अवश्य देता है। एक न्यायपूर्ण संविधान वह है जो लोगों को यह विश्वास दिला सके कि वह बुनियादी न्याय को प्राप्त करने के लिए उपयुक्त ढाँचा उपलब्ध कराता है।

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पृष्ठ 10.

प्रश्न 6.
नीचे भारतीय और अन्य संविधानों के कुछ प्रावधान दिये गये हैं। बताएँ कि इनमें प्रत्येक प्रावधान का क्या कार्य है?
(क) सरकार किसी भी नागरिक को किसी धर्म का पालन करने या न करने की आज्ञा नहीं दे सकती।
(ख) सरकार को आय और सम्पत्ति की असमानताएँ कम करने का प्रयास अवश्य करना चाहिए।
(ग) राष्ट्रपति के पास प्रधानमंत्री को नियुक्त करने की शक्ति है।
(घ) संविधान वह सर्वोच्च कानून है जिसका सभी को पालन करना पड़ता है।
(ङ) भारतीय नागरिकता किसी खास नस्ल, जाति या धर्म तक सीमित नहीं है।
उत्तर:
(क) सरकार की शक्ति पर सीमा
(ख) समाज की आकांक्षा व लक्ष्य
(ग) निर्णय लेने की शक्ति की विशिष्टता
(घ) संविधान बुनियादी तालमेल बिठाता है।
(ङ) राष्ट्र की बुनियादी पहचान (राष्ट्रीय पहचान)।

पृष्ठ 11

प्रश्न 7.
लोगों को जब यह पता चलता है कि उनका संविधान न्यायपूर्ण नहीं है तो वे क्या करते हैं?
उत्तर:
लोगों को जब यह पता चलता है कि उनका संविधान न्यायपूर्ण नहीं है तो वे संविधान के प्रावधानों का आदर नहीं करते। ऐसे संविधान को जनता से निष्ठा मिलनी बंद हो जाती है।

प्रश्न 8.
ऐसे लोगों का क्या होता है जिनका संविधान केवल कागज पर ही होता है?
उत्तर:
ऐसे लोगों को बुनियादी न्याय प्राप्त करने का ढाँचा उपलब्ध नहीं हो पाता।

पृष्ठ 16

प्रश्न 9.
यदि भारत की संविधान सभा देश के सभी लोगों के द्वारा निर्वाचित होती तो क्या होता? क्या वह उस संविधान सभा से भिन्न होती जो बनाई गई?
उत्तर:
यदि भारत की संविधान सभा देश के सभी लोगों के द्वारा निर्वाचित होती तो भी संविधान सभा का रूप यही होता क्योंकि इस संविधान सभा में राष्ट्र के सभी प्रमुख नेता तथा समाज के सभी वर्गों के नेता व प्रबुद्ध लोग सम्मिलित थे। इसका प्रमाण यह है कि संविधान निर्माण के बाद हुए प्रथम आम चुनाव में संविधान सभा के लगभग सभी सदस्य निर्वाचित हो गये थे।

पृष्ठ 19

प्रश्न 10.
यदि हमें 1937 में स्वतंत्रता मिल जाती तो क्या होता? हमें 1957 तक इंतजार करना पड़ता तो क्या होता? क्या तब बनाया गया संविधान हमारे वर्तमान संविधान से भिन्न होता?
उत्तर:
चाहे हमें 1937 में स्वतंत्रता मिल जाती, चाहे हमें 1957 तक इंतजार करना पड़ता; यदि स्वतंत्रता के समय विभाजन की परिस्थितियाँ इसी तरह की होतीं, तो हमारा संविधान वर्तमान संविधान से भिन्न नहीं होता क्योंकि हमारे संविधान निर्माता, उनकी लोकप्रियता तथा सार्वजनिक हित की दृष्टि यही होती।

पृष्ठ 21

प्रश्न 11.
क्या यह संविधान उधार का था?
उत्तर:
नहीं, भारत का संविधान उधार का नहीं था । इसमें दूसरे संविधानों के जिन प्रावधानों को ग्रहण किया गया था, उन्हें देश की समस्याओं व परिस्थितियों के अनुकूल परिवर्तित कर अपनाया गया था।

प्रश्न 12.
हम ऐसा संविधान क्यों नहीं बना सके जिसमें कहीं से कुछ भी उधार न लिया गया हो?
उत्तर:
विश्व इतिहास के इस पड़ाव पर बनाये गये संविधान में पूर्णतः नवीन ढांचे को नहीं अपनाया जा सकता। संविधान में यदि कुछ नया हो सकता है तो वह यह है कि उसमें उधार लिए गए प्रावधानों में कुछ ऐसे परिवर्तन किये जाएं जो असफलताओं को दूर कर देश की आवश्यकताओं के अनुरूप बन सकें। भारत के संविधान निर्माताओं ने यह बखूबी किया है।

Jharkhand Board Class 11 Political Science संविधान – क्यों और कैसे? Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
इनमें कौनसा संविधान का कार्य नहीं है?
(क) यह नागरिकों के अधिकार की गारंटी देता है।
(ख) यह शासन की विभिन्न शाखाओं की शक्तियों के अलग-अलग क्षेत्र का रेखांकन करता है।
(ग) यह सुनिश्चित करता है कि सत्ता में अच्छे लोग आयें।
(घ) यह कुछ साझे मूल्यों की अभिव्यक्ति करता है।
उत्तर:
(ग) यह सुनिश्चित करता हैं कि सत्ता में अच्छे लोग आयें.

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 संविधान - क्यों और कैसे?

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में कौन-सा कथन इस बात की एक बेहतर दलील है कि संविधान की प्रामाणिकता संसद से ज्यादा है?
(क) संसद के अस्तित्व में आने से कहीं पहले संविधान बनाया जा चुका था।
(ख) संविधान के निर्माता संसद के सदस्यों से कहीं ज्यादा बड़े नेता थे।
(ग) संविधान ही यह बताता है कि संसद कैसे बनायी जाये और इसे कौन-कौनसी शक्तियाँ प्राप्त होंगी।
(घ) संसद, संविधान का संशोधन नहीं कर सकती।
उत्तर:
(ग) संविधान ही यह बताता है कि संसद कैसे बनायी जाये और इसे कौन-कौनसी शक्तियाँ प्राप्त होंगी।

प्रश्न 3.
बतायें कि संविधान के बारे में निम्नलिखित कथन सही हैं या लत?
(क) सरकार के गठन और उसकी शक्तियों के बारे में संविधान एक लिखित दस्तावेज है।
(ख) संविधान सिर्फ लोकतांत्रिक देशों में होता है और उसकी जरूरत ऐसेही देशों में होती है।
(ग) संविधान एक कानूनी दस्तावेज है और आदर्शों तथा मूल्यों से इसका नेई सरोकार नहीं।
(घ) संविधान एक नागरिक को नई पहचान देता है।
उत्तर:
(क) सत्य
(ख) असत्य
(ग) असत्य
(घ) सत्य।

प्रश्न 4.
बतायें कि भारतीय संविधान के निर्माण के बारे में निम्नलिखित नुमान सही हैं या नहीं? अपने उत्तर का कारण बतायें।
(क) संविधान सभा में भारतीय जनता की नुमाइंदगी नहीं हुई। इसका निश्चन सभी नागरिकों द्वारा नहीं हुआ था।
(ख) संविधान बनाने की प्रक्रिया में कोई बड़ा फैसला नहीं लिया गया क्यंके उस समय नेताओं के बीच संविधान की बुनियादी रूपरेखा के बारे में आम सहमति थी।
(ग) संविधान में कोई मौलिकता नहीं है क्योंकि इसका अधिकांश हिस्सा गरे देशों से लिया गया है।
उत्तर:
(क) यद्यपि यह बात सत्य है कि संविधान सभा के सदस्य सार्वभौमिक वस्क मताधिकार के आधार पर नहीं चुने गये थे, तथापि उसे अधिक से अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने का प्रयास शि गया था। विभाजन के बाद संविधान सभा में कांग्रेस का वर्चस्व था। लेकिन कांग्रेस स्वयं विविधताओं से भरी हुई ऐसी पार्टी थी जिसमें लगभग सभी विचारधाराओं की नुमाइंदगी थी। इसमें सभी धर्म के सदस्यों को समुचित प्रनिधित्व दिया गया था। इसके अतिरिक्त संविधान सभा में अनुसूचित वर्गों के भी 26 सदस्य थे। अतः यह कह गलत होगा कि संविधान सभा भारतीय जनता की नुमाइंदगी नहीं करती थी।

(ख) यह बात भी असत्य है कि संविधान सभा के सदस्यों के बीच संविधकी बुनियादी रूपरेखा के बारे में आम सहमति थी इसलिए संविधान बनाने की प्रक्रिया में कोई बड़ा फैसला नहीं संविधान सभा के बड़े नेताओं के विचार हर बात पर एक-दूसरे के समान थे। डॉ. अम्बेडकर कांग्रेस और गांधी के कटु आलोचक थे। पटेल और नेहरू अनेक मुद्दों पर एक-दूसरे से असहम्। वास्तव में संविधान का केवल एक ही प्रावधान ऐसा है जो बिना किसी वाद-विवाद के पारित हुआ। यह प्रावधान भौमिक मताधिकार का था। इसके अतिरिक्त प्रत्येक विषय पर गंभीर विचार-विमर्श और वाद-विवाद हुए।

(ग) यह कहना गलत है कि संविधान में कोई मौलिकता नहीं है क्योंकि का अधिकांश हिस्सा दूसरे देशों से लिया गया है। वास्तव में हमारे संविधान निर्माताओं ने अन्य देशों की संवैधानिक पाओं से कुछ ग्रहण करने में परहेज नहीं किया। उन्होंने दूसरे देशों के प्रयोगों और अनुभवों से कुछ सीखने में संकनेहीं किया। परन्तु उन प्रावधानों व परम्पराओं को ग्रहण करने में कोरी अनुकरण की मानसिकता नहीं थी, बल्कि ने संविधान के प्रत्येक प्रावधान को भारत की समस्याओं और आशाओं के अनुरूप ग्रहण किया और उन्हें अपना बनाग।

भारत का संविधान एक विशाल तथा जटिल दस्तावेज है। इसकी मौलिकता पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा ता। संजीव पास बुक्स की शक्तियों को कई प्रकार से सीमित करता है। संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का स्पष्टीकरण कर दिया जाता है जिनका उल्लंघन कोई भी सरकार नहीं कर सकती। नागरिकों को मनमाने ढंग से बिना कारण के गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यह सरकार की शक्तियों के ऊपर एक सीमा कहलाती है।

नागरिकों को सामान्यतः कुछ मौलिक स्वतंत्रताओं का अधिकार है, जैसे- भाषण की स्वतंत्रता, अंतर्रात्मा की आवाज पर काम करने की स्वतंत्रता, संगठन बनाने की स्वतंत्रता आदि। व्यवहार में इन अधिकारों को राष्ट्रीय आपातकाल में सीमित किया जा सकता है और संविधान उन परिस्थितियों का उल्लेख भी करता है जिसमें इन अधिकारों को वापिस लिया जा सकता है।

II. नागरिकों के अधिकारविहीन संविधान की संभावना-संसार का कोई भी संविधान अपने नागरिकों को शक्तिविहीन नहीं कर सकता। हाँ, तानाशाह शासक अवश्य संविधान को नष्ट कर देते हैं और वे नागरिकों की स्वतंत्रताओं का हनन करने की कोशिश करते हैं यद्यपि संविधान में नागरिकों को सुविधायें प्रदान की जाती हैं।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 संविधान - क्यों और कैसे?

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान के बारे में निम्नलिखित प्रत्येक निष्कर्ष की पुष्टि में दो उदाहरण दें।
(क) संविधान का निर्माण विश्वसनीय नेताओं द्वारा हुआ। उनके लिए जनता के मन में आदर था।
(ख) संविधान ने शक्तियों का बंटवारा इस तरह किया कि इसमें उलट-फेर मुश्किल है।
(ग) संविधान जनता की आशा और आकांक्षाओं का केन्द्र है।
उत्तर:
(क) संविधान का निर्माण उस संविधान सभा ने किया जो विश्वसनीय नेताओं से बनी थी क्योंकि

  1. इन सभी नेताओं ने राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लिया था। वे राष्ट्रीय आन्दोलन के लोकप्रिय नेता थे।
  2. संविधान निर्माण के सदस्य भारतीय समाज के सभी अंगों, वर्गों, जातियों; समुदायों और धर्मों के प्रतिनिधि सदस्य थे। भारतीय जनता के मन में उनके प्रति आदर था क्योंकि राष्ट्रीय आन्दोलन में उठने वाली सभी मांगों को संविधान बनाते समय उन्होंने ध्यान में रखा तथा उन्होंने पूरे देश व समाज के हित को ध्यान में रखकर ही विचार-विमर्श किया।

(ख) संविधान ने शक्तियों का बंटवारा इस तरह किया कि उसमें उलट-फेर मुश्किल है। कोई समूह संविधान को नष्ट नहीं कर सकता है। किसी एक संस्था का सारी शक्तियों पर एकाधिकार नहीं है। संविधान ने शक्ति को एक समान धरातल पर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं और स्वतंत्र संवैधानिक निकाय जैसे निर्वाचन आयोग आदि में बांट दिया है। यह सुनिश्चित किया गया है कि यदि कोई एक संस्था संविधान को नष्ट करना चाहे तो अन्य दूसरी संस्थाएँ उसके अतिक्रमण को नियंत्रित कर लेंगी। अवरोध और संतुलन का भारतीय संविधान में कुशल प्रयोग किया गया है।

(ग) संविधान जनता की आशा और आकांक्षाओं का केन्द्र है। संविधान न्यायपूर्ण है। भारत के संविधान में न्याय के बुनियादी सिद्धान्तों का विशेष ध्यान दिया गया है। भारतीय संविधान सरकार को वह सामर्थ्य प्रदान करता है जिससे वह कुछ सकारात्मक लोक कल्याणकारी कदम उठा सके और जिन्हें कानून की मदद से लागू किया जा सके। हमारे संविधान में प्रस्तावना, मौलिक अधिकार, राज्य के नीति निर्देशक तत्व सरकार वयस्क मताधिकार तथा आरक्षण के प्रावधान आदि के द्वारा लोगों की आशा और आकांक्षाओं को पूरा करने की अपेक्षा की गई है।

प्रश्न 6.
किसी देश के संविधान में शक्तियों और जिम्मेदारियों का साफ-साफ निर्धारण क्यों जरूरी है? इस तरह का निर्धारण न हो तो क्या होगा?
उत्तर:
I. संविधान में शक्तियों और जिम्मेदारियों के निर्धारण की आवश्यकता – किसी भी देश के संविधान में शक्तियों और जिम्मेदारियों का साफ-साफ निर्धारण करना अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि

  1. जब कोई एक समूह या संस्था अपनी शक्तियों को बढ़ा लेती है तो वह पूरे संविधान को नष्ट कर सकती है। इस समस्या से बचने के लिए यह आवश्यक है कि संविधान में शक्तियों और जिम्मेदारियों का निर्धारण साफ-साफ इस तरह से किया जाये कि कोई भी संस्था या समूह संविधान को नष्ट न कर सके।
  2. संविधान की रूपरेखा इस प्रकार से तैयार की जाये कि कोई एक संस्था एकाधिकार प्राप्त न कर सके। ऐसा करने के लिए शक्तियों का विभाजन विभिन्न संस्थाओं में किया जाये। उदाहरण के लिए भारतीय संविधान में समान स्तर पर शक्तियों का वितरण कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के मध्य तथा कुछ स्वतन्त्र संवैधानिक निकायों जैसे निर्वाचन आयोग आदि में किया गया है।
  3. इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि यदि कोई संस्था संविधान को नष्ट करना चाहे तो अन्य संस्थाएँ उसके अतिक्रमण को रोक सकती हैं। भारतीय संविधान में इसी उद्देश्य से अवरोध व संतुलन के सिद्धान्त को अपनाया गया है।

II. निर्धारण के अभाव में क्या होगा: यदि संविधान में शक्तियों और जिम्मेदारियों का साफ-साफ निर्धारण नहीं होगा तो कोई एक संस्था या सरकार का कोई अंग अपनी शक्तियों को बढ़ाकर दूसरी संस्थाओं की शक्तियों का अतिक्रमण कर लेगा और इस प्रकार सरकार की समस्त शक्तियों पर एकाधिकार कर संविधान को नष्ट कर सकता है। ऐसा होने पर सरकार निरंकुश हो जायेगी और नागरिकों की स्वतंत्रता नष्ट हो जायेगी।

प्रश्न 7.
शासकों की सीमा का निर्धारण करना संविधान के लिए क्यों जरूरी है? क्या कोई ऐसा भी संविधान हो सकता है जो नागरिकों को कोई अधिकार न दे?
उत्तर:
I. शासकों की सीमा के निर्धारण की आवश्यकता: संविधान का एक प्रमुख कार्य यह भी है कि वह सरकार द्वारा अपने नागरिकों पर लागू किये जाने वाले कानूनों की कोई सीमा तय करे। ये सीमाएँ इस रूप में मौलिक होती हैं कि सरकार कभी उनका उल्लंघन नहीं कर सकती। यदि संविधान द्वारा शासकों पर ऐसी सीमाएँ निर्धारित नहीं की जाती हैं तो सरकार निरंकुश होकर नागरिकों की स्वतंत्रताओं का हनन कर सकती है और शासन की शक्ति पर एकाधिकार कर संविधान को ही नष्ट कर सकती है। इसलिए नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा हेतु संविधान सरकार की शक्तियों को कई प्रकार से सीमित करता है। संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का स्पष्टीकरण कर दिया जाता है जिनका उल्लंघन कोई भी सरकार नहीं कर सकती।

नागरिकों को मनमाने ढंग से बिना कारण के गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यह सरकार की शक्तियों के ऊपर एक सीमा कहलाती है। नागरिकों को सामान्यतः कुछ मौलिक स्वतंत्रताओं का अधिकार है, जैसे- भाषण की स्वतंत्रता, अंतर्रात्मा की आवाज पर काम करने की स्वतंत्रता, संगठन बनाने की स्वतंत्रता आदि । व्यवहार में इन अधिकारों को राष्ट्रीय आपातकाल में सीमित किया जा सकता है और संविधान उन परिस्थितियों का उल्लेख भी करता है जिसमें इन अधिकारों को वापिस लिया जा सकता है।

II. नागरिकों के अधिकारविहीन संविधान की संभावना-संसार का कोई भी संविधान अपने नागरिकों को शक्तिविहीन नहीं कर सकता। हाँ, तानाशाह शासक अवश्य संविधान को नष्ट कर देते हैं और वे नागरिकों की स्वतंत्रताओं का हनन करने की कोशिश करते हैं यद्यपि संविधान में नागरिकों को सुविधायें प्रदान की जाती हैं।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 संविधान - क्यों और कैसे?

प्रश्न 8.
जब जापान का संविधान बना तब दूसरे विश्वयुद्ध में पराजित होने के बाद जापान अमेरिकी सेना के कब्जे में था। जापान के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान होना असंभव था, जो अमेरिकी सेना को पसंद न हो क्या आपको लगता है कि संविधान को इस तरह बनाने में कोई कठिनाई है ? भारत में संविधान बनाने का अनुभव किस तरह इससे अलग है?
उत्तर:
संविधान वह लिखित दस्तावेज होता है जिसमें राज्य के विषय में कई प्रावधान होते हैं जो यह बताते हैं कि राज्य किन सिद्धान्तों का पालन करेगा। राज्य की सरकार किस विचारधारा पर आधारित नियमों एवं सिद्धान्तों के द्वारा शासन चलायेगी। जब किसी राज्य पर दूसरे राज्य का आधिपत्य हो जाता है तो उस राज्य के संविधान में शासकों की इच्छाओं के विपरीत कोई प्रावधान नहीं रखे जा सकते। अतः यह स्वाभाविक ही है कि जब जापान का संविधान बना उस समय जापान अमेरिकी सेना के कब्जे में था।

अतः यह स्वाभाविक ही है कि संविधान में कोई ऐसा प्रावधान नहीं रखा गया जो अमेरिकी सेना को पसन्द न हो। अतः जापान के उस संविधान में अमेरिकी शासकों के हितों का विशेष ध्यान रखा जाना स्वाभाविक था। भारत का संविधान बनाते समय कोई ऐसी बात नहीं थी। भारत में जब संविधान बना उस समय भारत एक स्वतंत्र तथा संप्रभु राष्ट्र था। भारतीय संविधान को औपचारिक रूप से गठित संविधान सभा ने बनाया था। इसमें देश के राष्ट्रीय आंदोलन के लगभग सभी नेता सम्मिलित थे तथा समाज के सभी धर्मों व वर्गों के लोगों का प्रतिनिधित्व था।

इसलिए भारत के संविधान में प्रत्येक प्रावधान भारत के राष्ट्रीय हित तथा सार्वजनिक हित तथा लोकतंत्रात्मक को ध्यान में रखकर बनाया गया। संविधान का अंतिम प्रारूप उस समय की राष्ट्रीय व्यापक आम सहमति को व्यक्त करता है। स्पष्ट है कि भारतीय संविधान के निर्माण का अनुभव जापान के संविधान के निर्माण से अलग था। जापान का संविधान एक थोपा गया संविधान था, जबकि भारत का संविधान निर्वाचित जन प्रतिनिधियों द्वारा जनहित में निर्मित किया गया था।

प्रश्न 9.
रजत ने अपने शिक्षक से पूछा: ” संविधान एक पचास साल पुराना दस्तावेज है और इस कारण पुराना पड़ चुका है। किसी ने इसको लागू करते समय मुझसे राय नहीं माँगी। यह इतनी कठिन भाषा में लिखा हुआ है कि मैं इसे समझ नहीं सकता। आप मुझे बतायें कि मैं इस दस्तावेज की बातों का पालन क्यों करूँ?” अगर आप शिक्षक होते तो रजत को क्या उत्तर देते?
उत्तर:
यदि मैं रजत का शिक्षक होता तो उसके प्रश्न का उत्तर इस प्रकार देता।
1. भारतीय संविधान एक जीवन्त दस्तावेज है। इसमें प्रमुख मूल्यों की रक्षा करने और नई परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने में एक संतुलन रखा गया है। भारतीय संविधान कठोरता और लचीलेपन दोनों का मिश्रण है। संविधान के कुछ अनुच्छेदों को तो संसद साधारण बहुमत से संशोधित कर सकती है और कुछ अनुच्छेदों में संशोधन के लिए उसे 2/3 बहुमत की आवश्यकता होती है तथा कुछ विषयों की संशोधन प्रक्रिया अत्यधिक जटिल है।

जिसमें संशोधन के लिए संसद के 2/3 बहुमत के साथ-साथ कम से कम आधे राज्यों के विधानमण्डलों का अनुमोदन आवश्यक है। इस संतुलन के कारण 50 वर्षों के बाद भी भारतीय संविधान बीते युग की बात नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसमें आवश्यकतानुसार संशोधन किया जा सकता है। इसमें दिसम्बर 2017 तक तक 101 संशोधन किये जा चुके हैं।

2. भारतीय संविधान के अधिकांश प्रावधान इस प्रकार के हैं जो कभी भी पुराने नहीं पड़ सकते। संविधान का मूल ढांचा सदैव ही एक जैसा रहेगा उसमें परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

3. इस संविधान का निर्माण संविधान सभा द्वारा किया गया जिसमें भारत के सभी घटकों, सभी धर्मों, सभी विचारधाराओं तथा जातियों व वर्गों का प्रतिनिधित्व था। ये सभी प्रतिनिधि राष्ट्रीय आन्दोलन के लोकप्रिय नेता, अनुभवी तथा जनहित से प्रेरित थे। अतः संविधान को काफी विचार-विमर्श के बाद लोकतंत्र तथा जनहित की दृष्टि से निर्मित किया गया तथा भावी परिस्थितियों के अनुरूप ढलने के लिए विशेष प्रावधान में किये गये हैं। अतः भारतीय संविधान पुराना दस्तावेज न होकर एक जीवन्त दस्तावेज है जिसमें भारत की परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार ढलने की क्षमता है।

प्रश्न 10.
संविधान के क्रिया-कलाप से जुड़े अनुभवों को लेकर एक चर्चा में तीन वक्ताओं ने अलग-अलग पक्ष लिए।
(क) हरबंस: भारतीय संविधान एक लोकतांत्रिक ढांचा प्रदान करने में सफल रहा है।
(ख) नेहा: संविधान में स्वतंत्रता, समता और भाईचारा सुनिश्चित करने का विधिवत वादा है। चूंकि ऐसा नहीं हुआ इसलिए संविधान असफल है।
(ग) नाजिमा: संविधान असफल नहीं हुआ, हमने उसे असफल बनाया। क्या आप इनमें से किसी पक्ष से सहमत हैं? यदि हाँ, तो क्यों? यदि नहीं, तो आप अपना पक्ष बतायें।
उत्तर:
मैं, हरबंस के इस कथन से सहमत हूँ कि भारतीय संविधान एक लोकतांत्रिक ढांचा प्रदान करने में सफ़ल भारतीय संविधान में सभी वर्गों के कल्याण एवं उनकी आवश्यताओं को ध्यान में रखते हुए संविधान निर्माताओं ने संविधान में लोकतंत्रीय शासन को स्थापित किया गया है। यथा

  1. संविधान में जहाँ सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार प्रदान कर प्रतिनिध्यात्मक शासन की स्थापना की गयी है।
  2. शासन की शक्तियों को समान स्तर पर सरकार के तीनों अंगों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में स्पष्ट रूप से विभाजित किया गया है ताकि कोई भी अंग निरंकुश न बन सके। उदाहरण के लिए संसद ने जब संविधान संशोधन के माध्यम से निरंकुश शक्तियों को प्राप्त करने की कोशिश की तो न्यायपालिका ने ‘मूल ढांचे की अवधारणा’ के माध्यम से संसद के इस अतिक्रमण को रोका है। इस प्रकार संविधान में नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था के द्वारा शासन की शक्ति को मर्यादित किया गया है।
  3. संविधान में नागरिकों को मूल अधिकार प्रदान कर नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा की गयी है।
  4. भारत के संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, पंथ निरपेक्ष और प्रजातंत्रात्मक गणराज्य घोषित किया गया है। यह भी बताया गया है कि संविधान का उद्देश्य सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय प्रदान करना है जिससे भारतीय नागरिक अपने को स्वतंत्र महसूस करें।
  5. यद्यपि भारतीय संविधान अभी अपने समानता के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाया है। इसका प्रमुख कारण संविधान की असफलता नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता के समय मिली यहाँ की विषम परिस्थितियाँ रही हैं, इन परिस्थितियों से जूझते हुए संविधान स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लक्ष्य की ओर निरन्तर बढ़ रहा है।

संविधान – क्यों और कैसे? JAC Class 11 Political Science Notes

(अ) हमें संविधान की क्या आवश्यकता है?

→ संविधान तालमेल बिठाता है- प्रत्येक समाज ( बड़े समूह) की अपनी कुछ विशेषताएँ होती हैं, उसके सदस्यों में अनेक भिन्नताएँ जैसे- धार्मिक, सांस्कृतिक, भाषायी भिन्नताएँ होती हैं । लेकिन अपनी भिन्नताओं के बावजूद इसके सदस्यों को एक साथ रहना है तथा वे अनेक रूपों में परस्पर आश्रित। ऐसे समूह को शांतिपूर्वक साथ रहने के लिए कुछ बुनियादी नियमों के बारे में सहमत होना आवश्यक है।

अतः किसी भी समूह को सार्वजनिक रूप से मान्यता प्राप्त कुछ बुनियादी नियमों की आवश्यकता होती है जिसे समूह के सभी सदस्य जानते हों, ताकि आपस में एक न्यूनतम समन्वय बना रहे। जब इन नियमों को न्यायालय द्वारा लागू किया जाता है तो सभी लोग इन नियमों का पालन करते हैं। इस आवश्यकता की पूर्ति संविधान करता है। संविधान के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-

→ संविधान का पहला काम यह है कि वह बुनियादी नियमों का एक ऐसा समूह उपलब्ध कराये जिससे समाज के सदस्यों में एक न्यूनतम समन्वय और विश्वास बना रहे।

→ निर्णय निर्माण शक्ति की विशिष्टताएँ: संविधान कुछ ऐसे बुनियादी सिद्धान्तों का समूह है जिसके आधार पर राज्य का निर्माण और शासन होता है। वह समाज में शक्ति के मूल वितरण को स्पष्ट करता है तथा यह तय करता है कि कानून कौन बनायेगा। वह सत्ता जिसे कानूनों को बनाने का अधिकार है, उसे इस अधिकार को देने का काम संविधान करता है। अतः संविधान सरकार निर्मात्री सत्ता है। दूसरे शब्दों में, संविधान का दूसरा काम यह स्पष्ट करना है कि समाज में निर्णय लेने की शक्ति किसके पास होगी? संविधान यह भी तय करता है कि सरकार कैसे निर्मित होगी।

→ सरकार की शक्तियों पर सीमाएँ: संविधान का तीसरा काम यह है कि वह सरकार द्वारा अपने नागरिकों पर लागू किये जाने वाले कानूनों पर कुछ सीमाएँ लगाए। ये सीमाएँ इस रूप में मौलिक होती हैं कि सरकार कभी उनका उल्लंघन नहीं कर सकती। सरकार की शक्तियों को सीमित करने का सबसे सरल तरीका यह है कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों को स्पष्ट कर दिया जाये और कोई भी सरकार कभी भी उनका उल्लंघन न कर सके। व्यवहार में, इन अधिकारों को राष्ट्री य आपातकाल में सीमित किया जा सकता है और संविधान उन परिस्थितियों का भी उल्लेख करता है जिनमें इन अधिकारों को वापस लिया जा सकता है या सीमित किया जा सकता है।

→ समाज की आकांक्षाएँ और लक्ष्य: संविधान का चौथा कार्य यह है कि वह सरकार को ऐसी क्षमता प्रदान करे जिससे वह जनता की आकांक्षाओं को पूरा कर सके और एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए उचित परिस्थितियों का निर्माण कर सके। उदाहरण के लिए भारतीय संविधान सरकार को वह सामर्थ्य प्रदान करता है जिससे वह कुछ सकारात्मक लोक कल्याणकारी कदम उठा सके और जिन्हें कानून की मदद से लागू भी किया जा सके। राज्य के नीति निर्देशक तत्व सरकार से लोगों की कुछ आकांक्षाएँ पूरी करने की अपेक्षा करते हैं।

→ राष्ट्र की बुनियादी पहचान: संविधान किसी समाज की बुनियादी पहचान होता है। प्रथमतः, इसके माध्यम से ही किसी समाज की एक सामूहिक इकाई के रूप में पहचान होती है। इसके तहत कोई समाज कुछ बुनियादी नियमों और सिद्धान्तों पर सहमत होकर अपनी मूलभूत राजनीतिक पहचान बनाता है। दूसरे, संवैधानिक नियम समाज को एक ऐसी विशाल ढांचा प्रदान करते हैं जिसके अन्तर्गत उसके सदस्य अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाओं, संजीव पास बुक्स लक्ष्य और स्वतन्त्रताओं का प्रयोग करते हैं।

अतः संविधान हमें नैतिक पहचान देता है। तीसरा, अनेक बुनियादी राजनैतिक और नैतिक नियम विश्व के सभी प्रकार के संविधानों में स्वीकार किये गये हैं। अधिकतर संविधान कुछ मूलभूत अधिकारों की रक्षा करते हैं; लोकतांत्रिक सरकारों का निर्माण करते हैं। चौथा, विभिन्न राष्ट्रों में देश की केन्द्रीय सरकार और विभिन्न क्षेत्रों के बीच के संबंधों को लेकर भिन्न-भिन्न अवधारणाएँ होती हैं। यह सम्बन्ध उस देश की राष्ट्रीय पहचान बनाता है।

JAC Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 संविधान - क्यों और कैसे?

→  (ब) संविधान की सत्ता: संविधान की सत्ता के सम्बन्ध निम्नलिखित प्रश्न उभरते हैं।

→ संविधान क्या है ? संविधान एक लिखित या अलिखित दस्तावेज या दस्तावेजों का पुंज है जिसमें राज्य सम्बन्धी प्रावधान यह बताते हैं कि राज्य का गठन कैसे होगा और वह किन सिद्धान्तों का पालन करेगा।

→ संविधान को प्रचलन में लाने का तरीका कोई संविधान कैसे अस्तित्व में आया, किसने संविधान बनाया और उनके पास इसे बनाने की कितनी शक्ति थी? यदि संविधान सैनिक शासकों या ऐसे अलोकप्रिय नेताओं द्वारा बनाये जाते हैं जिनके पास लोगों को अपने साथ लेकर चलने की क्षमता नहीं होती, तो वे संविधान निष्प्रभावी होते हैं। यदि संविधान सफल राष्ट्रीय आन्दोलन के बाद लोकप्रिय नेताओं द्वारा निर्मित किया जाता है।

तो उसमें समाज के सभी वर्गों को एक साथ ले चलने की क्षमता होती है, ऐसा संविधान प्रभावशाली होता है। विश्व के सर्वाधिक सफल संविधान भारत, दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका के हैं जिन्हें एक सफल राष्ट्रीय आन्दोलन के बाद बनाया गया। अतः संविधान बनाने वालों का प्रभाव भी एक हद तक संविधान की सफलता की संभावना सुनिश्चित करता है।

→ संविधान के मौलिक प्रावधान: एक सफल संविधान की यह विशेषता है कि वह प्रत्येक व्यक्ति को संविधान के प्रावधानों का आदर करने का कोई कारण अवश्य देता है। कोई भी संविधान खुद न्याय के आदर्श स्वरूप की स्थापना नहीं करता बल्कि उसे लोगों को यह विश्वास दिलाना पड़ता है कि वह बुनियादी न्याय को प्राप्त करने के लिए ढाँचा उपलब्ध कराता है। कोई संविधान अपने सभी नागरिकों की स्वतंत्रता और समानता की जितनी अधिक सुरक्षा करता है, उसकी सफलता की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है।

→  (स) संस्थाओं की संतुलित रूपरेखा:
संविधान की रूपरेखा बनाने की एक कारगर विधि यह सुनिश्चित करना है कि किसी एक संस्था की सारी शक्तियों पर एकाधिकार न हो। ऐसा करने के लिए शक्ति को कई संस्थाओं में बांट दिया जाता है। उदाहरण के लिए भारतीय संविधान शक्ति को एक समान धरातल पर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं और स्वतंत्र संवैधानिक निकाय जैसे निर्वाचन आयोग आदि, में बांट देता है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि यदि कोई एक संस्था संविधान को नष्ट करना चाहे तो अन्य दूसरी संस्थाएँ उसके अतिक्रमण को नियंत्रित कर लेंगी।

अवरोध और संतुलन के कुशल प्रयोग ने भारतीय संविधान की सफलता सुनिश्चित की है। संस्थाओं की रूपरेखा बनाने में इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि उसमें बाध्यकारी मूल्य, नियम और प्रक्रियाओं के साथ अपनी कार्यप्रणाली में लचीलापन का संतुलन होना चाहिए जिससे वह बदलती आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुकूल अपने को ढाल सके। सफल संविधान प्रमुख मूल्यों की रक्षा करने और नई परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने में एक संतुलन रखते हैं।

→  (द) भारतीय संविधान कैसे बना?:
औपचारिक रूप से एक संविधान सभा ने संविधान को बनाया जिसे अविभाजित भारत ने ‘कैबिनेट मिशन’ की योजना के अनुसार भारत में निर्वाचित किया गया था। इसकी पहली बैठक 9 दिसम्बर, 1946 को हुई और फिर 14 अगस्त, 1947 को विभाजित भारत की संविधान सभा के रूप में इसकी पुनः बैठक हुई। विभाजन के बाद संविधान सभा के वास्तविक सदस्यों की संख्या घटकर 2299 रह गई। इनमें से 26 नवम्बर, 1949 को कुल 284 सदस्य उपस्थित थे। इन्होंने ही संविधान को अंतिम रूप से पारित व इस पर हस्ताक्षर किये। इस प्रकार संविधान सभा ने 9 दिसम्बर, 1946 से संविधान निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया जिसे 26 नवम्बर, 1949 को पूर्ण किया।

→ संविधान सभा का स्वरूप: भारत की संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार 1935 में स्थापित प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष विधि से हुआ जिसमें 292 सदस्य ब्रिटिश प्रान्तों से और 93 सीटें देशी रियासतों से आवंटित होनी थीं। प्रत्येक प्रान्त की सीटों को तीन प्रमुख समुदायों मुसलमान, सिक्ख और सामान्य की सीटों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में बाँट दिया गया।

इस प्रकार हमारी संविधान सभा के सदस्य सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर नहीं चुने गये थे, पर उसे अधिकाधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने के प्रयास किये गये। सभी धर्म के सदस्यों को तथा अनुसूचित वर्ग के सदस्यों को उसमें स्थान दिया गया । संविधान सभा में यद्यपि 82% सीटें कांग्रेस दल से सम्बद्ध थीं, लेकिन कांग्रेस दल स्वयं भी विविधताओं से भरा था।

→ संविधान सभा के कामकाज की शैली: संविधान सभा के सदस्यों ने पूरे देश के हित को ध्यान में रखकर विचार-विमर्श किया। सदस्यों में हुए मतभेद वैध सैद्धान्तिक आधारों पर होते थे। संविधान सभा में लगभग उन सभी विषयों पर गहन चर्चा हुई जो आधुनिक राज्य की बुनियाद हैं। संविधान सभा में केवल एक प्रावधान सार्वभौमिक मताधिकार के अधिकार का प्रावधान – बिना किसी वाद-विवाद के ही पारित हुआ था।

→ संविधान सभा की कार्य विधि: संविधान सभा की सामान्य कार्यविधि में भी सार्वजनिक विवेक का महत्व स्पष्ट दिखाई देता था। विभिन्न मुद्दों के लिए संविधान सभा की आठ मुख्य कमेटियाँ थीं। प्राय: पं. नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल, मौलाना आजाद और डॉ. अंबेडकर इन कमेटियों की अध्यक्षता करते थे जिनके विचार हर बात पर एक-दूसरे के समान नहीं थे, फिर भी सबने एक साथ मिलकर काम किया। प्रत्येक कमेटी ने संविधान के कुछ-कुछ प्रावधानों का प्रारूप तैयार किया जिन पर बाद में पूरी संविधान सभा में चर्चा की गई। प्राय: प्रयास यह किया गया कि निर्णय आम राय से हो, लेकिन कुछ प्रावधानों पर निर्णय मत विभाजन करके भी लिए गये।

→ राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत: संविधान सभा केवल उन सिद्धान्तों को मूर्त रूप और आकार दे रही थी जो उसने राष्ट्रीय आन्दोलन से विरासत में प्राप्त किये थे। इस सिद्धान्तों का सारांश नेहरू द्वास 1946 में प्रस्तुत ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ में मिलता है। इसी प्रस्ताव के आधार पर संविधान में समानता, स्वतंत्रता, लोकतंत्र और संप्रभुता को संस्थागत स्वरूप दिया गया था।

→ संस्थागत व्यवस्थाएँ: संविधान को प्रभावी बनाने का तीसरा कारक यह है कि सरकार की सभी संस्थाओं को संतुलित ढंग से व्यवस्थित किया जाये। मूल सिद्धान्त यह रखा गया कि सरकार लोकतांत्रिक रहे, और जन कल्याण के लिए प्रतिबद्ध हो। संविधान सभा ने शासन के तीनों अंगों के बीच समुचित सन्तुलन स्थापित करने के लिए बहुत विचार मंथन किया। संविधान सभा ने संसदीय शासन व्यवस्था और संघात्मक व्यवस्था को स्वीकार किया।

शासकीय संस्थाओं की संतुलित व्यवस्था स्थापित करने में हमारे संविधान निर्माताओं ने दूसरे देशों के प्रयोगों और अनुभवों से सीखने में कोई संकोच नहीं किया। अतः उन्होंने विभिन्न देशों से अनेक प्रावधानों को लिया, संवैधानिक परम्पराओं को ग्रहण किया तथा उन्हें भारत की समस्याओं और परिस्थितियों के अनुकूल ढालकर अपना बना लिया।

JAC Class 11 History Solutions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परम्पराएँ

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Jharkhand Board Class 11 History बदलती हुई सांस्कृतिक परम्पराएँ In-text Questions and Answers

पृष्ठ 159

क्रियाकलाप 2 : सोलहवीं शताब्दी के इंटली के कलाकारों की कृतियों के विभिन्न वैज्ञानिक तत्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इटली के कलाकारों की कृतियों में वैज्ञानिक तत्त्व – मध्य युग में कला पर धर्म का बहुत अधिक प्रभाव था परन्तु सोलहवीं शताब्दी में कला, धर्म के प्राचीन बन्धनों से मुक्त हो गई। अब कलाकार यथार्थवादी बन गए और स्वतन्त्र रूप से कलाकृति रचने लगे। अतः कला में मौलिकता तथा वास्तविकता पाई जाने लगी। अब कलाकार हूबहू मूल आकृति जैसी मूर्त्तियाँ बनाना चाहते थे। उनकी इस प्रवृत्ति से वैज्ञानिकों के कार्यों में बड़ी सहायता मिली। नरकंकालों का अध्ययन करने के लिए कलाकार आयुर्विज्ञान कालेजों की प्रयोगशालाओं में गए। बेल्जियम मूल के आन्ड्रीयस वेसेलियस पादुआ विश्वविद्यालय में आयुर्विज्ञान के प्राध्यापक थे।

वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सूक्ष्म परीक्षण के लिए मनुष्य के शरीर की चीर-फाड़ की। इसी समय से आधुनिक शरीर क्रिया विज्ञान की शुरुआत हुई । चित्रकारों को अब ज्ञात हो गया कि रेखागणित के ज्ञान से चित्रकार अपने परिदृश्य को ठीक तरह से समझ सकता है तथा प्रकाश के बदलते गुणों का अध्ययन करने से उनके चित्रों में त्रि-आयामी रूप दिया जा सकता है। बनाया।

चित्र के लिए तेल के एक माध्यम के रूप में प्रयोग के चित्रों को पूर्व की तुलना में अधिक रंगीन और चटख लियानार्डो दा विंची इटली का प्रसिद्ध चित्रकार था । उसकी अभिरुचि वनस्पति विज्ञान और शरीर रचना विज्ञान से लेकर गणित शास्त्र तथा कला तक विस्तृत थी। वह वर्षों तक आकाश में पक्षियों के उड़ने का परीक्षण करता रहा और उसने एक उड़न-मशीन का प्रतिरूप बनाया। उसने अपना नाम ‘लियोनार्डो दा विंची, परीक्षण का अनुयायी’ रखा।

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उसने मोनालिसा तथा लास्ट सपर नामक चित्र बनाए। माइकेल एंजिलो भी इटली का एक प्रसिद्ध मूर्त्तिकार, चित्रकार और वास्तुकार था। उसने अपने चित्रों में यथार्थता लाने के लिए शरीर – विज्ञान का गहन अध्ययन किया। उसने पोप के सिस्टाइन चैपल की छत पर लेपचित्र बनाए। इस प्रकार शरीर – विज्ञान, रेखा गणित, भौतिकी और सौन्दर्य की उत्कृष्ट भावना ने इतालवी कला को नया रूप प्रदान किया, जिसे बाद में ‘यथार्थवाद’ कहा गया। यथार्थवाद की यह परम्परा उन्नीसवीं सदी तक चलती रही । पृष्ठ 162

क्रियाकलाप 3 : महिलाओं की आकांक्षाओं के संदर्भ में एक महिला (फेदेले) तथा एक पुरुष (कास्टिल्योनी) द्वारा अभिव्यक्त भावों की तुलना कीजिये। उन लोगों की सोच में क्या महिलाओं का एक निर्दिष्ट वर्ग ही था ?
उत्तर:
(1) महिलाओं की आकांक्षाओं के संदर्भ में फेदेले नामक महिला के विचार – सोलहवीं शताब्दी की .. कुछ महिलाएँ बौद्धिक रूप से बहुत रचनात्मक थीं और मानवतावादी शिक्षा की समर्थक थीं। वेनिस निवासी कसान्द्रा फेदेले ने महिलाओं के बारे में अपने विचार अभिव्यक्त करते हुए लिखा था कि ” यद्यपि महिलाओं को शिक्षा न तो पुरस्कार देती है और न किसी सम्मान का आश्वासन, तथापि प्रत्येक महिला को सभी प्रकार की शिक्षा को प्राप्त करने की इच्छा रखनी चाहिए और उसे ग्रहण करना चाहिए।” फेदेला ने तत्कालीन इस विचारधारा को चुनौती दी कि एक मानवतावादी विद्वान के गुण एक महिला के पास नहीं हो सकते। फ

ेदेले ने गणतन्त्र की आलोचना “स्वतन्त्रता की एक बहुत सीमित परिभाषा निर्धारित करने के लिए की, जो महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों की इच्छा का अधिक समर्थन करती थी। ” फेदेले के विचारों से यह स्पष्ट होता है कि उस काल में सब लोग शिक्षा को बहुत महत्त्व देते थे। चाहे वे पुरुष हों या महिला। इससे ज्ञात होता है कि महिलाओं को पुरुष-प्रधान समाज में अपनी अलग पहचान बनाने के लिए अधिक आर्थिक स्वतन्त्रता, सम्पत्ति और शिक्षा मिलनी चाहिए।

(2) महिलाओं की आकांक्षाओं के संदर्भ में कास्टिल्योनी नामक पुरुष के विचार – प्रसिद्ध लेखक और कूटनीतिज्ञ बाल्थासार कास्टिल्योनी ने अपनी पुस्तक ‘दि कोर्टियर’ में लिखा है कि ” मेरे विचार से अपने तौर-तरीके, व्यवहार, बातचीत के तरीके, भाव-भंगिमा और छवि में एक महिला पुरुष के सदृश नहीं होनी चाहिए।

जैसे कि यह कहना बिल्कुल उपयुक्त होगा कि पुरुषों को हट्टा-कट्टा और पौरुष – सम्पन्न होना चाहिए, इसी तरह एक स्त्री के लिए यह अच्छा ही है कि उसमें कोमलता और सहृदयता हो, एक स्त्रियोचित मधुरता का आभास उसके हर हाव-भाव में हो और यह उसके चाल-चलन, रहन-सहन और हर ऐसे कार्य में हो जो वह करती है, ताकि ये सारे गुण उसे हर हाल में एक स्त्री के रूप में ही दिखाएँ, न कि किसी पुरुष के सदृश।

यदि उन महानुभावों द्वारा दरबारियों को सिखाए गए नियमों में इन नीति वचनों को जोड़ दिया जाए, तो महिलाएँ इनमें से अनेक को अपनाकर स्वयं को श्रेष्ठ गुणों से सुसज्जित कर सकेंगी। मेरा यह मानना है कि मस्तिष्क के कुछ ऐसे गुण हैं जो महिलाओं के लिए उतने ही आवश्यक हैं जितने कि पुरुष के लिए जैसे कि अच्छे कुल का होना, दिखावे का परित्याग करना, सहज रूप से शालीन होना, आचरणवान, चतुर और बुद्धिमान होना, गर्वी, ईर्ष्यालु, कटु और उद्दण्ड न होना ” ” जिससे महिलाएँ उन क्रीड़ाओं को, शिष्टता और मनोहरता के साथ सम्पन्न कर सकें, जो उनके लिए उपयुक्त हैं।”

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उपर्युक्त विचारों से यह ज्ञात होता है कि उस युग में प्रायः सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी बहुत सीमित थी और उनमें शिक्षा का प्रसार बहुत कम था। व्यापारी परिवारों में महिलाओं में शिक्षा का प्रसार अधिक था जबकि अभिजात वर्ग के परिवारों की महिलाओं में शिक्षा का प्रसार कम था। उस युग की प्रबुद्ध महिलाओं ने इस बात पर बल दिया कि महिलाओं की शिक्षा पर उचित ध्यान दिया जाना चाहिए।

पृष्ठ 164

क्रियाकलाप 4: वे कौनसे मुद्दे थे जिनको लेकर प्रोटेस्टेन्ट धर्म के अनुयायी कैथोलिक चर्च की आलोचना करते थे?
उत्तर:
र – प्रोटेस्टेन्ट धर्म के अनुयायियों द्वारा कैथोलिक चर्च की आलोचना करना – प्रोटैस्टेन्ट धर्म के अनुयायी निम्नलिखित मुद्दों को लेकर कैथोलिक चर्च की आलोचना करते थे –

  1.  कैथोलिक चर्च के अनुयायी अपने पुराने धर्मग्रन्थों में बताए गए तरीकों से धर्म का पालन नहीं कर रहे थे।
  2. कैथोलिक चर्च में अनेक अनावश्यक कर्मकाण्ड, अन्धविश्वास और आडम्बरों का समावेश हो गया था।
  3. कैथोलिक चर्च एक लालची तथा साधारण लोगों से बात-बात पर लूट-खसोट करने वाली संस्था बन गई थी।
  4. पादरी लोगों से धन ऐंठते रहते थे। उनका लोगों से धन ठगने का सबसे आसान तरीका ‘पाप-स्वीकारोक्ति’-नामक दस्तावेज था। इसे खरीदने वाला व्यक्ति अपने समस्त पापों से मुक्ति पा सकता था।
  5. चर्च द्वारा लगाए गए अनेक करों के कारण किसानों में असन्तोष था। उन्होंने इन करों का विरोध किया।
  6. यूरोप के शासक भी राज-काज में चर्च के हस्तक्षेप से नाराज थे।

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लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
चौदहवीं और पन्द्रहवीं शताब्दियों में यूनानी और रोमन संस्कृति के किन तत्वों को पुनर्जीवित किया गया?
उत्तर:
चौदहवीं तथा पन्द्रहवीं शताब्दियों में यूनानी और रोमन संस्कृति के तत्वों को पुनर्जीवित करना- चौदहवीं तथा पन्द्रहवीं शताब्दियों में यूनानी तथा रोमन संस्कृतियों के निम्नलिखित तत्वों को पुनर्जीवित किया गया –
(1) साहित्य के क्षेत्र में – प्राचीन यूनानी एवं रोमन साहित्य के अध्ययन पर बल दिया गया। पेट्रार्क ने प्राचीन यूनानी तथा रोमन ग्रन्थों के अध्ययन पर बल दिया।

(2) कला के क्षेत्र में – चौदहवीं तथा पन्द्रहवीं शताब्दियों में स्थापत्य कला की एक नई शैली का जन्म हुआ जिसमें यूनानी, रोमन तथा अरबी शैलियों का समन्वय था । इस नवीन शैली में शृंगार, सजावट तथा डिजाइन पर विशेष बल दिया गया। इस शैली में मेहराबों, गुम्बदों तथा स्तम्भों की प्रधानता थी।

यह नवीन शैली रोमन साम्राज्यकालीन शैली का पुनरुद्धार थी, जिसे बाद में ‘शास्त्रीय शैली’ कहा गया। “मूर्त्तिकला में भी नवीन शैली अपनाई गई। अब मूर्त्तिकला धर्म के प्राचीन बन्धनों से मुक्त हो गई तथा अब साधारण मनुष्य की मूर्त्तियाँ बनाई जाने लगीं। चित्रकला पर से भी धर्म का प्रभाव समाप्त हो गया। अब धार्मिक चित्रों के स्थान पर जन-जीवन से सम्बन्धित मौलिक एवं यथार्थ चित्र बनने लगे। जियटो ने जीते-जागते रूपचित्र (पोर्ट्रेट) बनाए।

(3) विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में – चौदहवीं शताब्दी में यूरोप के अनेक विद्वानों ने प्लेटो और अरस्तू के ग्रन्थों से अनुवादों का अध्ययन करना शुरू किया। यूरोप के विद्वानों ने यूनानी ग्रन्थों के अरबी अनुवादों का अध्ययन किया। ये ग्रन्थ प्राकृतिक विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, औषधि विज्ञान और रसायन विज्ञान से सम्बन्धित थे।

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(4) मावतावाद – यूनानी और रोमन संस्कृतियों के प्रभाव से यूरोप में मानवतावादी विचारों का व्यापक प्रसार हुआ। मानवतावादी धार्मिक पाखण्डों, रूढ़ियों और अन्धविश्वासों में विश्वास नहीं करते थे। वे मानव जीवन पर धर्म का नियन्त्रण नहीं चाहते थे। वे भौतिक सुखों पर बल देते थे तथा वर्तमान जीवन को सुखी और आनन्ददायक बनाने पर बल देते थे।

प्रश्न 2.
इस काल में इटली की वास्तुकला और इस्लामी वास्तुकला की विशिष्टताओं की तुलना कीजिए।
उत्तर:
इटली की वास्तुकला की विशिष्टताएँ – पन्द्रहवीं शताब्दी में इटली में स्थापत्य कला की एक नई शैली का जन्म हुआ, जिसमें यूनानी, रोमन तथा अरबी शैलियों का समन्वय था। इस नवीन शैली में श्रृंगार, सजावट तथा डिजाइन पर विशेष बल दिया गया। इस शैली में मेहराबों, गुम्बदों तथा स्तम्भों की प्रधानता थी। यह नई शैली वास्तव मे रोमन साम्राज्यकालीन शैली का पुनरुद्धार थी जिसे ‘शास्त्रीय शैली’ कहा गया।

चित्रकारों और शिल्पकारों ने भवनों को लेपचित्र, मूर्तियों तथा उभरे चित्रों से सुसज्जित किया। प्रसिद्ध वास्तुकार ब्रुनेलेशी ने फ्लोरेन्स के भव्य गुम्बद का परिरूप प्रस्तुत किया था। रोम का सन्त पीटर का गिरजाघर तत्कालीन वास्तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना है। लन्दन का सन्त पाल का गिरजाघर तथा वेनिस का सन्त मार्क का गिरजाघर आदि भी तत्कालीन वास्तुकला के श्रेष्ठ नमूने हैं।

इस्लामी वास्तुकला की विशिष्टताएँ – इस्लामी वास्तुकला में अनेक मस्जिदों, राजमहलों, इबादतगाहों तथा मकबरों का निर्माण किया गया। इनका आधारभूत नमूना एक जैसा था। मेहराब, गुम्बद, मीनार और खुले सहन इन इमारतों की विशेषताएँ थीं। ये इमारतें मुसलमानों की आध्यात्मिक और व्यावहारिक आवश्यकताओं को प्रकट करती थीं। मस्जिदों में एक खुला प्रांगण होता था।

इसमें एक फव्वारा अथवा जलाशय बनाया जाता था। बड़े कमरे की दो विशेषताएँ थीं –

  1. दीवार में मेहराब तथा
  2. एक मंच इसमें एक मीनार होती थी।

इस्लाम में सजीव चित्रों के निर्माण पर प्रतिबन्ध था परन्तु इससे कला के दो रूपों को प्रोत्साहन मिला-खुशनवीसी (सुन्दर लेखन की कला) तथा अरबेस्क (ज्यामितीय और वनस्पतीय डिजाइन)। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि इटली की वास्तुकला और इस्लामी वास्तुकला में हमें कुछ समानताएँ और कुछ अन्तर दिखाई देते हैं। इस्लामी वास्तुकला पर जहाँ धर्म का अधिक प्रभाव दिखाई देता है, वहीं इटली की वास्तुकला में मानवतावादी यथार्थ का अधिक प्रभाव दिखाई देता है।

प्रश्न 3.
मानवतावादी विचारों का अनुभव सबसे पहले इतालवी शहरों में क्यों हुआ?
उत्तर:
इतालवी शहरों में मानवतावादी विचारों का अनुभव – इतालवी शहरों में मानवतावादी विचारों का अनुभव सबसे पहले निम्नलिखित कारणों से हुआ –
(1) व्यापार एवं वाणिज्य की उन्नति के कारण इटली में बड़े-बड़े नगरों का उदय हुआ। वेनिस, जिनेवा, फ्लोरेन्स आदि प्रसिद्ध नगर थे। ये नगर यूनान के नगर – राज्य जैसे बन गए। ये यूरोप के अन्य नगरों से इस दृष्टि से अलग .थे कि यहाँ पर धर्माधिकारी और सामन्त वर्ग राजनीतिक दृष्टि से शक्तिशाली नहीं थे। नगरों के धनी व्यापारी और महाजन नगरों के शासन में स्वतन्त्रतापूर्वक भाग लेते थे। ये नगर शिक्षा, कला और व्यापार के केन्द्र बन गए।

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(2) यूरोप में सबसे पहले विश्वविद्यालय इटली के शहरों में स्थापित हुए। इन विश्वविद्यालयों में रोमन कानून, चिकित्साशास्त्र, प्राकृतिक विज्ञान, गणित, रसायन विज्ञान, व्याकरण आदि विषय पढ़ाए जाते थे। ये विषय धार्मिक नहीं थे, बल्कि उस कौशल पर बल देते थे जो व्यक्ति चर्चा और वाद-1 द- विवाद से विकसित करता है।

(3) पन्द्रहवीं शताब्दी तक रोम तथा यूनानी विद्वानों ने अनेक क्लासिकी ग्रन्थ लिखे । ये ग्रन्थ प्राकृतिक विज्ञान, . गणित, खगोल विज्ञान आदि से सम्बन्धित थे। छापेखाने के निर्माण के बाद इन ग्रन्थों का मुद्रण इटली में हुआ था। इन पुस्तकों ने नये विचारों, वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि मानवतावादी विचारधारा का इतालवी नगरों में प्रसार करने में योगदान दिया।

(4) पेट्रार्क, दोनातेलो, माइकेल एंजेलो, लियोनार्दो दी विन्ची आदि मानवतावादी विचारकों ने इतालवी नगरों में मानवतावादी विचारधारा के प्रसार में योगदान दिया।

प्रश्न 4.
वेनिस और समकालीन फ्रांस में ‘अच्छी सरकार’ के विचारों की तुलना कीजिए।
उत्तर:
(1) वेनिस में ‘अच्छी सरकार’ के विचार- इटली में अनेक नगरों का उदय हुआ। ये नगर अपने आपको स्वतन्त्र नगर-राज्यों का एक समूह मानते थे। इन नगरों में वेनिस प्रमुख था । वेनिस एक गणराज्य था। यहाँ पर धर्माधिकारी तथा सामन्त वर्ग राजनीतिक दृष्टि से शक्तिशाली नहीं थे। अतः प्रशासन और राजनीति में उनका कोई प्रभाव नहीं था। नगर के धनी व्यापारी और महाजन नगर के शासकों में सक्रिय रूप से भाग लेते थे जिससे वहाँ नागरिकता की भावना विकसित हुई। इन नगरों के शासन सैनिक तानाशाहों के हाथ में आने के बाद भी इन नगरों के निवासी अपने को यहाँ का नागरिक कहने में गर्व का अनुभव करते थे

(2) फ्रांस में अच्छी सरकार के विचार – समकालीन फ्रांस में निरंकुश राजतन्त्र स्थापित था। वहाँ प्रशासन और राजनीति में धर्माधिकारियों तथा सामन्तों का बोलबाला था। सभी उच्च तथा महत्वपूर्ण पदों पर सामन्त वर्ग के लोग आसीन थे। ये लोग जन-साधारण का शोषण करते थे तथा अपने स्वार्थों की पूर्ति में लगे रहते थे।

यद्यपि फ्रांस में एस्टेट्स जनरल (परामर्शदात्री सभा) बनी हुई थी, परन्तु 1614 के बाद 175 वर्षों तक इसका अधिवेशन नहीं बुलाया गया था। इसका कारण यह था कि फ्रांस के शासक जन साधारण के साथ अपनी शक्ति बाँटना नहीं चाहते थे। फ्रांस में स्वतन्त्र किसानों, कृषि – दासों की बहुत बड़ी संख्या थी, परन्तु उन्हें किसी प्रकार के राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे । वहाँ मध्यम वर्ग की भी घोर उपेक्षा की जाती थी।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 5.
मानवतावादी विचारों के क्या अभिलक्षण थे?
उत्तर:
मानवतावादी विचारों के अभिलक्षण – मानवतावादी विचारों के अभिलक्षण निम्नलिखित थे –
(1) उन्नत ज्ञान प्राप्त करना – मानवतावाद का शाब्दिक अर्थ है – उन्नत ज्ञान। ‘मानवतावाद’ की विचारधारा के अनुसार ज्ञान असीमित है, बहुत कुछ जानना बाकी है और यह सब हम केवल धार्मिक शिक्षण से नहीं सीखते । इसी नयी संस्कृति को इतिहासकारों ने ‘मानवतावाद’ की संज्ञा दी।

(2) ‘मानवतावादी’ शब्द का प्रयोग – पन्द्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ‘मानवतावादी’ शब्द उन अध्यापकों के लिए प्रयुक्त होता था जो व्याकरण, ‘अलंकारशास्त्र’, कविता, इतिहास और नीति दर्शन पढ़ाते थे। लैटिन शब्द ‘ह्यूमेनिटास’ से ‘ह्यूमेनिटिज’ शब्द अर्थात् ‘मानवतावाद’ की उत्पत्ति हुई है, जिसे कई शताब्दियों पूर्व रोम के वकील तथा निबन्धकार सिसरो ने ‘संस्कृति’ के अर्थ में लिया था। ये विषय धार्मिक नहीं थे, वरन् उस कौशल पर बल देते थे, जो व्यक्ति चर्चा और वाद-विवाद से विकसित करता है।

(3) धार्मिक कर्मकाण्डों और अन्धविश्वासों में अविश्वास – मानवतावादी धार्मिक कर्मकाण्डों, पाखण्डों तथा अन्धविश्वासों में विश्वास नहीं करते थे। मानवतावादी संस्कृति की विशेषताओं में से एक था-मानव जीवन पर धर्म का नियन्त्रण कमजोर होना।

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(4) भौतिक सुखों पर बल देना – मानवतावादी भौतिक सम्पत्ति, शक्ति तथा गौरव पर बल देते थे। वेनिस के मानवतावादी फ्रेनचेस्को बरबारो ने अपनी एक पुस्तिका में सम्पत्ति प्राप्त करने को एक विशेष गुण बताकर उसका पक्ष लिया। लोरेन्जो वल्ला ने अपनी पुस्तक ‘आन प्लेजर’ में भोग-विलासों पर लगाई गई ईसाई धर्म की निषेधाज्ञा की आलोचना की ।

(5) अच्छे व्यवहारों पर बल – मानवतावादी अच्छे व्यवहारों पर बल देते थे। उनकी अच्छे व्यवहारों के प्रति रुचि थी-व्यक्ति को किस प्रकार विनम्रता से बोलना चाहिए, कैसे वस्त्र पहनने चाहिए तथा एक सभ्य व्यक्ति को किसमें दक्षता प्राप्त करनी चाहिए।

(6) मनुष्य का स्वभाव बहुमुखी है – मानवतावादियों की मान्यता थी कि मनुष्य का स्वभाव बहुमुखी है। सामन्ती समाज तीन भिन्न-भिन्न वर्गों (पादरी, अभिजात तथा कृषक) में विश्वास करता था परन्तु मानवतावादियों ने इस विचार को नकार दिया।

(7) वर्तमान जीवन को सुन्दर और उपयोगी बनाना – मानवतावादी वर्तमान जीवन को सुन्दर, आनन्ददायक और उपयोगी बनाने पर बल देते थे। वे परलोक की बजाय इस लोक को सफल और सुखी बनाने पर बल देते थे।

(8) सत्य, तर्क और नवीन दृष्टिकोण पर बल देना – मानवतावादी स्वतन्त्र चिन्तन, सत्य, तर्क और नवीन दृष्टिकोण का प्रचार करते थे।

प्रश्न 6.
सत्रहवीं शताब्दी के यूरोपियों को विश्व किस प्रकार भिन्न लगा? उसका एक सुचिन्तित विवरण दीजिए।
उत्तर:
सत्रहवीं शताब्दी के यूरोपियों की दृष्टि में विश्व – सत्रहवीं शताब्दी तक विश्व में कला, विज्ञान, साहित्य, धर्म, समाज, राजनीति आदि सभी क्षेत्रों में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन हो चुके थे। अतः सत्रहवीं शताब्दी के यूरोपियों की दृष्टि में विश्व निम्नलिखित बातों में भिन्न लगा-

(1) साहित्य के क्षेत्र में –
(i) मध्य युग में विद्वान लैटिन और यूनानी भाषाओं में अपनी पुस्तकों की रचना करते थे, परन्तु आधुनिक युग में बोलचाल की भाषा में साहित्य की रचना की जाने लगी। अब अंग्रेजी, फ्रांसीसी, जर्मन, इतालवी, स्पेनिश, डच आदि भाषाओं का विकास हुआ। अब समस्त विश्व में लोक भाषाओं तथा राष्ट्रीय . साहित्य की रचना होने लगी।
(ii) अब साहित्य पर से धर्म का प्रभाव समाप्त हो गया । अब साहित्य में मानव जीवन से सम्बन्धित विषयों पर विवेचन किया जाता था। अब साहित्य आलोचना – प्रधान, मानववादी और व्यक्तिवादी हो गया। इस युग में काव्य, महाकाव्य, नाटक, उपन्यास, कहानी, निबन्ध आदि पर उच्च कोटि के ग्रन्थ लिखे गए।

(2) कला के क्षेत्र में – मध्ययुग में कला पर धर्म का बहुत अधिक प्रभाव था तथा उस समय कलाकार स्वतन्त्र रूप से कलाकृति नहीं रच सकता था, परन्तु आधुनिक युग में कला धर्म के बन्धनों से मुक्त हो गई। अब कलाकार यथार्थवादी बन गए और स्वतन्त्र रूप से कलाकृति रचने लगे। अतः कला में मौलिकता तथा वास्तविकता पाई जाने लगी।

(3) विज्ञान के क्षेत्र में – आधुनिक युग में विज्ञान के क्षेत्र में पर्याप्त उन्नति हुई। इस युग में नये सिद्धान्त प्रतिपादित किए गए. तथा नवीन आविष्कार किए गए। कोपरनिकस ने इस मत का प्रतिपादन किया कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है जिससे दिन-रात होते हैं। केपलर ने कोपरनिकस के सिद्धान्त को गणित के प्रमाणों से पुष्ट किया। इसी प्रकार चिकित्साशास्त्र, रसायनशास्त्र, भौतिकशास्त्र आदि क्षेत्रों में भी पर्याप्त उन्नति हुई।

(4) भौगोलिक खोजें- आधुनिक युग में सामुद्रिक यात्राओं तथा भौगोलिक खोजों को प्रोत्साहन मिला। 1498 में वास्कोडिगामा उत्तमाशा अन्तरीप होता हुआ भारत के समुद्रतट पर स्थित कालीकट बन्दरगाह पहुँचा। कोलम्बस एक द्वीप पर पहुँचा जिसे यूरोपवासियों ने वेस्टइण्डीज कहा। कोलम्बस की इस यात्रा से ‘नये विश्व’ की खोज करना सरल हो गया। मेगलान के साथियों ने पृथ्वी का सर्वप्रथम चक्कर लगाया। अमेरिगो ने दक्षिणी अमेरिका का पता लगाया।

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(5) सामाजिक क्षेत्र – व्यापारिक वर्ग के प्रभाव में वृद्धि हुई तथा कुलीन लोगों के सम्मान में कमी हुई। साधारण जनता में शिक्षा का प्रसार हुआ तथा दास- कृषकों को मुक्ति मिली।

(6) धार्मिक क्षेत्र में – कैथोलिक चर्च में व्याप्त धार्मिक पाखण्डों, कर्मकाण्डों और अन्धविश्वासों के विरुद्ध सोलहवीं शताब्दी में धर्म सुधार आन्दोलन हुआ।

(7) आर्थिक क्षेत्र में – उद्योग-धन्धों का विकास शुरू हुआ, जिसके फलस्वरूप औद्योगिक क्रान्ति के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गईं। व्यापारी वर्ग धनी वर्ग बन गया और पूंजीवाद का विकास हुआ।

(8) राजनीतिक क्षेत्र में – विश्व के विभिन्न देशों में राष्ट्रीयता की भावना का विकास हुआ। यूरोप में अनेक राष्ट्रीय राज्यों का उदय हुआ। पोप की राजनीतिक शक्ति में कमी हुई और राजाओं की शक्ति में वृद्धि हुई। भाषा के आधार पर यूरोप के विभिन्न क्षेत्रों ने अपनी पहचान बनानी शुरू की।

(9) बौद्धिक क्षेत्र में – अब लोग स्वतन्त्रतापूर्वक चिन्तन करने लगे। सत्य की खोज, वाद-विवाद, तार्किक दृष्टिकोण आदि को बढ़ावा मिला। इससे वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास हुआ।

(10) भौतिकवादी दृष्टिकोण – आधुनिक युग में मनुष्य की धर्म एवं परलोक में रुचि कम हो गई तथा वह अपने वर्तमान जीवन को सुखी एवं सम्पन्न बनाने के लिए अधिक प्रयत्न करने लगा। अब मनुष्य का भौतिक जीवन महत्वपूर्ण हो गया। परिणामस्वरूप अधिक आकर्षक नगरों तथा सुविधाजनक घरों का निर्माण किया जाने लगा। अब मानव का रहन-सहन तथा खान-पान का स्तर बढ़ गया।

(11) नगरीय संस्कृति – 17वीं शताब्दी में अनेक नगरों की संख्या बढ़ रही थी। एक विशेष प्रकार की ‘नगरीय संस्कृति’ विकसित हो रही थी। नगर के लोग गाँवों के लोगों से अपने आपको अधिक सभ्य मानते थे। फ्लोरेन्स, वेनिस, रोम आदि नगर कला और विद्या के केन्द्र बन गए थे। अब नगर कला और ज्ञान के केन्द्र बन गए।

बदलती हुई सांस्कृतिक परम्पराएँ JAC Class 11 History Notes

पाठ- सार

1. इटली के नगरों का पुनरुत्थान- जब पश्चिमी यूरोप सामन्ती सम्बन्धों के कारण नया रूप ले रहा था तथा चर्च के नेतृत्व में उसका एकीकरण हो रहा था, पूर्वी यूरोप बाइजेंटाइन साम्राज्य के शासन में बदल रहा था, तब पश्चिम में इस्लाम एक साझी सभ्यता का निर्माण कर रहा था। इन्हीं परिवर्तनों ने इतालवी संस्कृति के पुनरुत्थान में सहायता प्रदान की । इससे इटली के तटवर्ती बंदरगाह पुनर्जीवित हो गए । बारहवीं शताब्दी से जब मंगोलों ने चीन के साथ व्यापार आरम्भ किया, तो इसके कारण पश्चिमी यूरोपीय देशों के व्यापार को बढ़ावा मिला। इसमें इटली के नगरों ने मुख्य भूमिका निभाई। अब वे अपने आपको स्वतन्त्र नगर- राज्यों का एक समूह मानते थे ।

2. विश्वविद्यालय – यूरोप में सबसे पहले विश्वविद्यालय इटली के शहरों में स्थापित हुए। ग्यारहवीं शताब्दी से पादुआ तथा बोलोनिया विश्वविद्यालय विधिशास्त्र के अध्ययन केन्द्र रहे थे। पेट्रार्क ने इस बात पर बल दिया कि प्राचीन यूनानी और रोमन लेखकों की रचनाओं का भली-भाँति अध्ययन किया जाना चाहिए।

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3. मानवतावाद –
(i) पन्द्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ‘मानवतावादी’ शब्द उन अध्यापकों के लिए प्रयुक्त होता था जो व्याकरण, अलंकारशास्त्र, कविता, इतिहास और नीति दर्शन विषय पढ़ाते थे। ये विषय धार्मिक नहीं थे वरन् उस कौशल पर बल देते थे जो व्यक्ति चर्चा और वाद-विवाद से विकसित करता है। इन क्रान्तिकारी विचारों ने अनेक विश्वविद्यालयों का ध्यान आकर्षित किया। फ्लोरेन्स धीरे-धीरे एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय बन गया । वह इटली के सबसे जीवन्त बौद्धिक नगर के रूप में जाना जाने लगा।

(ii) फ्लोरेन्स नगर की प्रसिद्धि में दो व्यक्तियों का प्रमुख हाथ था। ये दो व्यक्ति थे –
(1) दाँते
(2) जोटो।
(iii) ‘रेनेसाँ व्यक्ति’ शब्द का प्रयोग प्रायः उस मनुष्य के लिए किया जाता है जिसकी अनेक रुचियाँ हों और अनेक कलाओं में उसे निपुणता प्राप्त हो।

4. इतिहास का मानवतावादी दृष्टिकोण – मानवतावादियों ने पाँचवीं सदी से लेकर चौदहवीं सदी तक के युग को ‘मध्ययुग’ की संज्ञा दी। उनके अनुसार 15वीं शताब्दी से ‘आधुनिक युग’ की शुरुआत हुई।

5. विज्ञान और दर्शन – अरबों का योगदान – एक ओर यूरोप के विद्वान यूनानी ग्रन्थों के अरबी अनुवादों का अध्ययन कर रहे थे, दूसरी ओर यूनानी विद्वान अरबी और फारसी विद्वानों की रचनाओं को अन्य यूरोपीय लोगों के बीच प्रसार के लिए अनुवाद कर रहे थे। ये ग्रन्थ प्राकृतिक विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, औषधि विज्ञान और रसायन विज्ञान से सम्बन्धित थे। मुस्लिम लेखकों में अरबी के हकीम और बुखारा के दार्शनिक इब्न-सिना तथा आयुर्विज्ञान विश्वकोश के लेखक अल-राजी उल्लेखनीय थे।

6. कलाकार और यथार्थवाद – कला, वास्तुकला और ग्रन्थों ने मानवतावादी विचारों के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

  • मूर्तिकला – 1416 में दोनातल्लो ने सजीव मूर्त्तियाँ बनाकर नई परम्परा स्थापित की। नर कंकालों का अध्ययन करने के लिए कलाकार आयुर्विज्ञान कालेजों की प्रयोगशालाओं में गए।
  • चित्रकला – चित्रकारों ने मूर्तिकारों की भाँति यथार्थ चित्र बनाने का प्रयास किया। लियानार्डो दा विन्ची नामक चित्रकार ने ‘मोनालिसा’ तथा ‘द लॉस्ट सपर’ नामक चित्रों का निर्माण किया।
  • यथार्थवाद – शरीर विज्ञान, रेखागणित, भौतिकी और सौन्दर्य की उत्कृष्ट भावना ने इतालवी कला को नया रूप दिया जिसे बाद में ‘यथार्थवाद’ कहा गया। यथार्थवाद की यह परम्परा उन्नीसवीं शताब्दी तक चलती रही।

7. वास्तुकला – पुरातत्वविदों द्वारा रोम के अवशेषों का उत्खनन किया गया। इसने वास्तुकला की एक ‘नई शैली’ को बढ़ावा दिया जिसे ‘शास्त्रीय शैली’ कहा गया। पोप, धनी व्यापारियों और अभिजात वर्ग के लोगों ने उन वास्तुविदों को अपने भवन बनाने के लिए नियुक्त किया, जो शास्त्रीय वास्तुकला से परिचित थे। चित्रकारों और शिल्पकारों ने भवनों को लेपचित्रों, मूर्त्तियों और उभरे चित्रों से भी सुसज्जित किया। ब्रुनेलेशी ने फ्लोरेन्स के गुम्बद का परिरूप तैयार किया।

8. प्रथम मुद्रित पुस्तकें – 1455 में जर्मन मूल के जोहानेस गुटनबर्ग ने पहले छापेखाने का निर्माण किया। पन्द्रहवीं शताब्दी तक अनेक क्लासिकी ग्रन्थों का मुद्रण इटली में हुआ था। नये विचारों को बढ़ावा देने वाली एक मुद्रित पुस्तक सैकड़ों पाठकों के पास शीघ्रतापूर्वक पहुँच सकती थी। छपी हुई पुस्तकों के वितरण के कारण पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्त से इटली की मानवतावादी संस्कृति का आल्पस पर्वत के पार तीव्रगति से प्रसार हुआ।

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9. मनुष्य की एक नई संकल्पना – मानवतावादी संस्कृति की विशेषताओं में से एक था – मानव जीवन पर धर्म का नियंत्रण कमजोर होना। इटली के निवासी भौतिक सम्पत्ति, शक्ति और गौरव से बहुत ज्यादा आकृष्ट थे। लोरेन्जो वल्ला ने भोग-विलास पर ईसाई धर्म की निषेधाज्ञा की आलोचना की तथा अच्छे व्यवहारों की वकालत की।

10. महिलाओं की आकांक्षाएँ – मध्ययुगीन यूरोप में प्रायः सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी अत्यन्त सीमित थी और उन्हें घर-परिवार की देखभाल करने वाले के रूप में देखा जाता था। परन्तु व्यापारी परिवारों में महिलाओं की स्थिति भिन्न थी। दुकानदारों की स्त्रियाँ दुकानों को चलाने में प्रायः उनकी सहायता करती थीं। आधुनिक युग में कुछ महिलाएँ बौद्धिक रूप से रचनात्मक थीं और मानवतावादी शिक्षा से प्रभावित थीं। वेनिस निवासी कसान्द्रा फेरेले के अनुसार प्रत्येक महिला को सभी प्रकार की शिक्षा को प्राप्त करने की इच्छा रखनी चाहिए और उसे ग्रहण करना चाहिए। मंटुआ की मार्चिसा इसाबेल दि इस्ते ने अपने पति की अनुपस्थिति में अपने राज्य पर शासन किया।

11. ईसाई धर्म के अन्तर्गत वाद-विवाद –
(1) उत्तरी यूरोप में मानवतावादियों ने ईसाइयों को अपने पुराने धर्मग्रन्थों में बताए गए तरीकों से धर्म का पालन करने का आह्वान किया। उन्होंने अनावश्यक कर्मकाण्डों को त्यागने पर बल दिया। इसके बाद दार्शनिकों ने भी कहा कि मनुष्य को अपनी खुशी इसी विश्व में वर्तमान में ढूँढ़नी चाहिए।

(2) इंगलैण्ड के टॉमस मोर तथा हालैण्ड के इरैस्मस ने कहा कि चर्च एक लालची और साधारण लोगों से बात-बात पर लूट-खसोट करने वाली संस्था बन गई है।

(3) पादरी लोगों से धन लूटने के लिए ‘पाप-स्वीकारोक्ति’ नामक दस्तावेज का लाभ उठा रहे थे जिससे जन- साधारण में असन्तोष व्याप्त था।

(4) चर्च द्वारा लगाए गए करों से किसानों में भी असन्तोष था । उन्होंने इन करों का विरोध किया।

(5) यूरोप के शासक भी राज-काज में चर्च के हस्तक्षेप से नाराज थे।

(6) 1517 में एक जर्मन युवा भिक्षु मार्टिन लूथर ने कैथोलिक चर्च के विरुद्ध अभियान छेड़ा। इस आन्दोलन को ‘प्रोटेस्टेन्ट सुधारवाद’ की संज्ञा दी गई। फ्रांस में कैथोलिक चर्च ने प्रोटैस्टेन्ट लोगों को अपनी इच्छा के अनुसार उपासना करने की छूट दी। इंग्लैण्ड के शासकों ने पोप से अपने सम्बन्ध तोड़ दिए। इसके बाद राजा / रानी इंग्लैण्ड के चर्च के प्रमुख बन गए।

(7) प्रोटैस्टेन्ट धर्म सुधार आन्दोलन की बढ़ती हुई प्रगति से कैथोलिक चर्च बड़ा चिन्तित हुआ और उसने भी अनेक आन्तरिक सुधार करने शुरू कर दिये।

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12. कोपरनिकसीय क्रान्ति – पोलैण्ड के वैज्ञानिक कोपरनिकस ने यह घोषणा की कि पृथ्वी समेत सारे ग्रह सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते हैं। इसके बाद खगोलशास्त्री जोहानेस कैप्लर ने अपने ग्रन्थ में कोपरनिकस के सिद्धान्त को लोकप्रिय बनाया। गैलिलियो ने गतिशील विश्व के सिद्धान्त की पुष्टि की। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

13. ब्रह्माण्ड का अध्ययन – गैलिलियो तथा अन्य विचारकों ने बताया कि ज्ञान विश्वास से हटकर अवलोकन एवं प्रयोगों पर आधारित है। शीघ्र ही भौतिकी, रसायनशास्त्र तथा जीव-विज्ञान के क्षेत्र में अनेक प्रयोग और खोज- कार्य तीव्र गति से होने लगे। परिणामस्वरूप सन्देहवादियों तथा नास्तिकों के मन में समस्त सृष्टि की रचना के स्रोत के रूप में प्रकृति ईश्वर का स्थान लेने लगी। वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर बल दिया जाने लगा और सार्वजनिक क्षेत्र में एक नई वैज्ञानिक संस्कृति की स्थापना हुई।

14. क्या चौदहवीं शताब्दी में पुनर्जागरण हुआ था ?
पुनर्जागरण की अवधारणा –
(1) यूरोप में इस समय आए सांस्कृतिक परिवर्तन में रोम और यूनान की ‘क्लासिकी’ सभ्यता का ही केवल हाथ नहीं था। यूरोपियों ने न केवल यूनानियों तथा रोमनवासियों से सीखा, बल्कि भारत, अरब, ईरान, मध्य एशिया और चीन से भी ज्ञान प्राप्त किया।

(2) इस काल में जो महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए, उनमें धीरे-धीरे ‘निजी’ और ‘सार्वजनिक’ दो अलग-अलग क्षेत्र बनने लगे। व्यक्ति की दो भूमिकाएँ थीं – निजी और सार्वजनिक। वह न केवल तीन वर्गों (पादरी, अभिजात, कृषक ) में से किसी एक वर्ग का सदस्य ही था, बल्कि अपने आप में एक स्वतन्त्र व्यक्ति था।

(3) इस काल की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि भाषा के आधार पर यूरोप के विभिन्न क्षेत्रों ने अपनी पहचान बनानी शुरू की। इन राज्यों के आंतरिक जुड़ाव का कारण समान भाषा का होना था।

चौदहवीं तथा पन्द्रहवीं शताब्दियाँ:

तिथिघटना
1300इटली के पादुआ विश्वविद्यालय में मानवतावाद पढ़ाया जाने लगा।
1341पेट्रार्क को रोम में ‘राजकवि’ की उपाधि से सम्मानित किया गया।
1349फ्लोरेन्स में विश्वविद्यालय की स्थापना।
1390जेफ्री चॉसर की ‘केन्टरबरी टेल्स’ का प्रकाशन।
1436ब्रुनेलेशी ने फ्लोरेन्स में ड्यूमा का परिरूप तैयार किया।
1453कुस्तुन्तुनिया के बाइजेन्टाइन शासक को ऑटोमन तुर्कों ने पराजित किया।
1454गुटेनबर्ग ने विभाज्य टाइप से बाइबल का प्रकाशन किया।
1484पुर्तगाली गणितज्ञों ने सूर्य का अध्ययन कर अक्षांश की गणना की।
1492कोलम्बस अमरीका पहुँचे।
1495लियोनार्डो दा विंची ने ‘द लास्ट सपर’ (अन्तिम भोज) चित्र बनाया।
1512माइकल एंजिलो ने सिस्टीन चैपल की छत पर चित्र बनाए।
सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दियाँ
1516टामस मोर की ‘यूटोपिया’ का प्रकाशन।
1517मार्टिन लूथर द्वारा नाइन्टी – फाइव थीसेज की रचना।
1522मार्टिन लूथर द्वारा बाइबल का जर्मन में अनुवाद।
1525जर्मनी में किसान विद्रोह।
1543एन्ड्रीयास वसेलियस द्वारा ‘ऑन एनाटमी’ ग्रन्थ की रचना।
1559इंग्लैण्ड में आंग्ल – चर्च की स्थापना जिसके प्रमुख राजा / रानी थे।
1569गेरहार्डस मरकेटर ने पृथ्वी का पहला बेलनाकार मानचित्र बनाया।
1582पोप ग्रेगरी – XIII के द्वारा ग्रेगोरियन कैलेंडर का प्रचलन।
1628विलियम हार्वे ने हृदय को रुधिर – परिसंचरण से जोड़ा।
1673पेरिस में ‘अकादमी ऑफ साइंसेज’ की स्थापना।
1687आइजक न्यूटन के ‘प्रिन्सिपिया मैथेमेटिका’ का प्रकाशन।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव

Jharkhand Board JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 Political Science Important Questions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव

बहुच्चयनात्मक प्रश्न

1. भारतीय दलीय व्यवस्था का स्वरूप है।
(क) एकदलीय
(ख) द्विदलीय
(ग) बहुदलीय
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) बहुदलीय

2. निर्बल व अस्थिर शासन जिस प्रणाली का दोष है, वह है।
(क) एकदल की तानाशाही
(ख) द्विदलीय प्रणाली
(ग) बहुदलीय प्रणाली
(घ) दलविहीन प्रणाली
उत्तर:
(ग) बहुदलीय प्रणाली

3. जनता पार्टी का उदय कब हुआ?
(क) 1980
(ख) 1998
(ग) 1999
(घ) 1977
उत्तर:
(घ) 1977

4. निम्न में कौनसा दल अखिल भारतीय दल है?
(क) तेलुगूदेशम
(ख) कांग्रेस
(ग) समाजवादी पार्टी
(घ) राष्ट्रीय जनता दल।
उत्तर:
(ख) कांग्रेस

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5. निम्न में से किस राज्य में क्षेत्रीय दल प्रभावी है।
(क) तमिलनाडु
(ख) उत्तरप्रदेश
(ग) राजस्थान
(घ) मध्यप्रदेश
उत्तर:
(क) तमिलनाडु

6. निम्न में दक्षिण भारत की प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी कौनसी है?
(क) डी. एम. के.
(ख) राष्ट्रीय जनता दल
(ग) इनैलो
(घ) नेशनल कांफ्रेंस
उत्तर:
(क) डी. एम. के.

7. 1980 के दशक के आखिर के सालों में देश की राष्ट्रीय राजनीति में किस मुद्दे का उदय हुआ?
(क) काँग्रेस प्रणाली
(ख) अन्य पिछड़ा वर्ग
(ग) मंडल मुद्दे
(घ) राष्ट्रीय मोर्चा
उत्तर:
(ग) मंडल मुद्दे

8. राजीव गाँधी की हत्या कब हुई थी?
(क) 1983
(ख) 1990
(ग) 1985
(घ) 1991
उत्तर:
(घ) 1991

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9. राजीव गाँधी की मृत्यु के पश्चात् प्रधानमंत्री किसको चुना गया?
(क) संजय गाँधी
(ख) नरसिम्हा राव
(ग) गुलजारी लाल नंदा
(घ) मोरारजी देसाई
उत्तर:
(ख) नरसिम्हा राव

10. बामसेफ का गठन हुआ-
(क) 1978
(ख) 1980
(ग) 1991
(घ) 1989
उत्तर:
(क) 1978

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए 

1. 1978 में ………….. का गठन हुआ।
उत्तर:
बामसेफ

2. बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक ……………. थे।
उत्तर:
कांशीराम

3. मुस्लिम महिला अधिनियम ………………में पास किया गया।
उत्तर:
1986

4. अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने का प्रस्ताव …………….. मुद्दे में किया गया था।
उत्तर:
मंडल

5. बाबरी मस्जिद के विवादित ढाँचे को विध्वंस करने की घटना ………………… के दिसंबर महीने में घटी।
उत्तर:
1992

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में गठबन्धन की राजनीति की शुरुआत कौनसे दशक में शुरू हुई?
उत्तर:
1990 के दशक में।

प्रश्न 2.
जनता दल का गठन कब किया गया?
उत्तर:
सन् 1988 में।

प्रश्न 3.
राजग का गठन हुआ
उत्तर:
1999 में।

प्रश्न 4.
संप्रग सरकार का गठन कब हुआ?
उत्तर:
2004 में।

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प्रश्न 5.
सन् 1989 की प्रमुख राजनैतिक घटना क्या थी?
उत्तर:
कांग्रेस की हार।

प्रश्न 6.
किसी भी दल को बहुमत प्राप्त नहीं हो ऐसी संसद को कहते हैं।
उत्तर:
त्रिशंकु संसद।

प्रश्न 7.
2004 के लोकसभा चुनावों में किस गठबन्धन की सरकार बनी?
उत्तर:
संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन।

प्रश्न 8.
भारत में सन् 2009 में किस गठबंधन की सरकार केंन्द्र में दोबारा बनी थी?
उत्तर:
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की।

प्रश्न 9.
संयुक्त मोर्चा की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
सन् 1996 में।

प्रश्न 10.
मण्डल आयोग की सिफारिशों को कब लागू किया गया?
उत्तर:
1990 में।

प्रश्न 11.
1989 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी को कितनी सीटों पर विजय मिली?
उत्तर:
1989 के चुनाव में काँग्रेस पार्टी को 197 सीटों पर विजय मिली थी।

प्रश्न 12.
कौनसा क्षेत्रीय दल है जो राष्ट्रभाषा हिन्दी का विरोध और राज्यों की स्वायत्तता का हिमायती है?
उत्तर:
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डी.एम.के.)।

प्रश्न 13.
भारत में राजनीतिक दलों को मान्यता देने वाली संस्था का नाम बताइये।
उत्तर:
निर्वाचन आयोग।

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प्रश्न 14.
भारतीय दलीय व्यवस्था का वह कौनसा स्वरूप है जो राजनीतिक अस्थायित्व और अवसरवादिता को जन्म देता है?
उत्तर:
राजनीतिक दल-बदल।

प्रश्न 15.
राजनीतिक दलों के ध्रुवीकरण के प्रमुख बाधक तत्त्व क्या हैं?
उत्तर:
विचारधाराओं की विभिन्नता।

प्रश्न 16.
भारतीय दलीय व्यवस्था की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर: बहुदलीय व्यवस्था, शासन सत्ता को मर्यादित करना।

प्रश्न 17.
राजनीतिक दलों के दो कार्य बताइए।
उत्तर:
,राजनीतिक चेतना का प्रसार, शासन सत्ता को मर्यादित करना।

प्रश्न 18.
क्षेत्रीय दल किसे कहते हैं?
उत्तर:
क्षेत्रीय दल वे दल कहलाते हैं जिनका संगठन एवं प्रभाव क्षेत्र प्रायः केवल एक राज्य या प्रदेश तक सीमित होता है।

प्रश्न 19.
वर्तमान दलीय व्यवस्था की उभरती हुई दो प्रवृत्तियाँ बताइए।
उत्तर:

  1. जाति आधारित दलों का गठन
  2. राजनीतिक अपराधीकरण।

प्रश्न 20.
भारतीय दलीय व्यवस्था के दो दोष बताइए।
उत्तर:

  1. साम्प्रदायिकता तथा क्षेत्रवाद की प्रबलता।
  2. नैतिकता का अभाव।

प्रश्न 21.
राजनीतिक दलों के दो आवश्यक तत्त्व बताइये।
उत्तर:
संगठन, सामान्य सिद्धान्तों में एकता।

प्रश्न 22.
किन्हीं चार क्षेत्रीय दलों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. डी. एम. के.
  2. ए. डी. एम. के.
  3. अकाली दल
  4. तेलगूदेशम।

प्रश्न 23.
किस चुनाव के बाद लोकसभा में किसी भी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला?
उत्तर:
1989 के लोकसभा चुनावों के बाद किसी भी एक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ।

प्रश्न 24.
1989 के चुनावों के पश्चात् केन्द्र में जनता दल ने किसके नेतृत्व में सरकार बनाई?
उत्तर:
1989 के चुनावों के पश्चात् केन्द्र में जनता दल ने वी. पी. सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाई।

प्रश्न 25.
1989 से 2004 के चुनावों तक लोकसभा में किस पार्टी के स्थान बढ़ते रहे हैं?
उत्तर:
भारतीय जनता पार्टी के।

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प्रश्न 26.
लोकतान्त्रिक सरकार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
लोकतान्त्रिक सरकार वह सरकार होती है जिसमें सत्ता के बारे में अन्तिम निर्णय जनता द्वारा लिया जाता है।

प्रश्न 27.
संयुक्त मोर्चा की एक विशेषता लिखिए।
उत्तर:
संयुक्त मोर्चा का गठन कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए किया गया।

प्रश्न 28.
मंडल मुद्दा से आपका क्या आशय है?
उत्तर:
अन्य पिछड़ा वर्ग को मिले आरक्षण के समर्थक और विरोधियों के बीच चले विवाद को मंडल मुद्दा कहा गया।

प्रश्न 29.
भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार से समर्थन वापस कब लिया?
उत्तर:
भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार से 23 अक्टूबर, 1990 को समर्थन वापस लिया।

प्रश्न 30.
भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में गठबन्धन युग के उदय का कोई एक कारण लिखें।
उत्तर:
भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में गठबन्धनवादी युग के उदय का महत्त्वपूर्ण कारण क्षेत्रीय दलों में वृद्धि है।

प्रश्न 31.
गठबन्धन की राजनीति से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
गठबन्धन की राजनीति का अर्थ कई दलों द्वारा सरकार का निर्माण करने से लिया जाता है।

प्रश्न 32.
गठबन्धनवादी राजनीति की प्रमुख समस्या क्या है?
उत्तर:
गठबन्धनवादी राजनीति की प्रमुख समस्या है। इसमें क्षेत्रीय पार्टियाँ राजनीतिक सौदेबाजी तथा अवसरवादिता की राजनीति करती हैं।

प्रश्न 33.
बाबरी मस्जिद कब गिराई गई, उस समय केन्द्र में किस पार्टी की सरकार थी?
उत्तर:
बाबरी मस्जिद 6 दिसम्बर, 1992 को गिराई गई, उस समय केन्द्र में कांग्रेस पार्टी की सरकार थी तथा पी. वी. नरसिम्हा राव प्रधानमन्त्री थे।

प्रश्न 34.
2014 के लोकसभा चुनावों में किस दल को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ है?
उत्तर:
भारतीय जनता पार्टी को।

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प्रश्न 35.
वैचारिक प्रतिबद्धता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वैचारिक प्रतिबद्धता: वैचारिक प्रतिबद्धता से अभिप्राय है। राजनीतिक दलों का आर्थिक तथा राजनीतिक विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध होना।

प्रश्न 36.
चुनावों में क्षेत्रीय दलों की शक्ति में वृद्धि के फलस्वरूप होने वाले तीन राजनैतिक परिणाम बताइये।
उत्तर:
चुनावों में क्षेत्रीय दलों की शक्ति में वृद्धि के फलस्वरूप होने वाले तीन राजनैतिक परिणाम हैं।

  1. राजनीतिक अस्थिरता में वृद्धि
  2. क्षेत्रवाद को बढ़ावा
  3. मिली-जुली राजनीति का प्रारंभ।

प्रश्न 37.
भारत के किन्हीं तीन क्षेत्रीय दलों के नाम लिखिए।
उत्तर:
क्षेत्रीय दल हैं।

  1. द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डी.एम.के.)।
  2. अखिल भातीय अन्ना द्रविड़ मुनैत्र कड़गम (ए. आई. अन्ना डी. एम. के.) तथा।
  3. तेलगूदेशम।

प्रश्न 38.
भारत के दो राष्ट्रीय दलों के नाम लिखिये।
उत्तर:
राष्ट्रीय दल हैं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी।

प्रश्न 39.
भारत में दलीय व्यवस्था की कोई तीन समस्याएँ बताइए।
उत्तर:
भारतीय दलीय व्यवस्था की तीन समस्याएँ ये हैं।

  1. दलों की सरकार
  2. दलों में वैचारिक प्रतिबद्धता का अभाव
  3. दलों में आन्तरिक लोकतन्त्र का अभाव।

प्रश्न 40.
निम्न को सुमेलित कीजिए:
(i) राष्ट्रीय मोर्चा – कांग्रेस व क्षेत्रीय दल
(ii) संयुक्त मोर्चा – भाजपा व क्षेत्रीय दल
(iii) राजग – कांग्रेस व राष्ट्रीय मोर्चा
(iv) संप्रग – जनता दल व क्षेत्रीय दल
उत्तर:
(i) राष्ट्रीय मोर्चा – जनता दल व क्षेत्रीय दल
(ii) संयुक्त मोर्चा – कांग्रेस व राष्ट्रीय मोर्चा
(iii) राजग – भाजपा व क्षेत्रीय दल
(iv) संप्रग – कांग्रेस व क्षेत्रीय दल

प्रश्न 41.
राजीव गाँधी की हत्या के जिम्मेदार कौन थे?
उत्तर:
राजीव गाँधी की हत्या के जिम्मेदार लिट्टे से जुड़े श्रीलंकाई तमिल थे

प्रश्न 42.
अन्य पिछड़ा वर्ग को और क्या बोल कर संकेत किया जाता है?
उत्तर:
अदर बैकवर्ड क्लासेज।

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प्रश्न 43.
मंडल आयोग को आधिकारिक रूप से क्या कहा गया?
उत्तर:
मंडल आयोग को आधिकारिक रूप से दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग कहा गया।

प्रश्न 44.
बामसेफ का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर:
बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एम्पलाइज फेडरेशन।

प्रश्न 45.
हिन्दुत्व अथवा हिंदूपन शब्द को किसने गढ़ा था?
उत्तर:
हिन्दुत्व अथवा हिंदूपन शब्द को वी. डी. सावरकर ने गढ़ा था।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
किस वर्ष भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई और इसके प्रथम अध्यक्ष कौन थे?
उत्तर:
भारतीय जनता पार्टी की स्थापना सन् 1980 में हुई। पहले यह जनता पार्टी का घटक थी लेकिन दोहरी सदस्यता के प्रश्न पर जनता पार्टी से मतभेद हो गया और पूर्व जनसंघ अलग हो गया। अटल बिहारी वाजपेयी पार्टी के प्रथम अध्यक्ष थे।

प्रश्न 2.
राजनीतिक दल-बदल से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कोई जनप्रतिनिधि किसी खास दल के चुनाव चिह्न को लेकर चुनाव लड़े और चुनाव जीतने के बाद इस दल को छोड़कर किसी दूसरे दल में शामिल हो जाए, तो इसे राजनीतिक दल-बदल कहते हैं।

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प्रश्न 3.
संयुक्त मोर्चा सरकार की प्रमुख विशेषता बताइये।
उत्तर:
संयुक्त मोर्चा सरकार 1 जून, 1996 में देवेगौड़ा के नेतृत्व में बनी। इस सरकार की महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि केन्द्र में बनी सरकार क्षेत्रीय पार्टियों के समर्थन पर टिकी हुई थी और भारतीय राजव्यवस्था के इतिहास में पहली बार भारतीय साम्यवादी दल केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में शामिल हुआ।

प्रश्न 4.
1989 में भारत में गठबन्धन सरकार की आवश्यकता क्यों पड़ी? एक उदाहरण दें।
उत्तर:
1989 में भारत में गठबन्धन सरकार की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि लोकसभा के चुनाव में त्रिशंकु लोकसभा का गठन हुआ था। किसी भी एक राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ और यह समय की आवश्यकता थी।

प्रश्न 5.
गठबंधन सरकार का क्या अर्थ है? गठबंधन सरकार सबसे पहले केन्द्र में कब बनी?
उत्तर:
गठबंधन सरकार: विभिन्न दल एक गठबंधन बनाकर जब एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम के अन्तर्गत सरकार का गठन करते हैं तो उसे गठबंधन सरकार कहा जाता है। केन्द्र में पहली गठबंधन सरकार सन् 1989 में वी. पी. सिंह के नेतृत्व में बनी थी।

प्रश्न 6.
पोखरण नाभिकीय परीक्षण कब किए गये और उस समय किस दल की सरकार थी?
उत्तर:
पोखरण में पहली बार 1974 में नाभिकीय परीक्षण किये गये। उस समय केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी। इन्दिरा गांधी प्रधानमन्त्री थीं। पोखरण – II नाभिकीय परीक्षण 11 मई और 13 मई, 1999 में किए गए, उस समय राजग की सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे।

प्रश्न 7.
1988 का वर्ष भारतीय राजनीति में क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
1988 का वर्ष भारतीय राजनीति में विशेष स्थान रखता है क्योंकि इस वर्ष राष्ट्रीय स्तर पर एक नए राजनीतिक दल – जनता दल का निर्माण हुआ था। वी. पी. सिंह को जनता दल का सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुना गया था।

प्रश्न 8.
क्या क्षेत्रीय दल आवश्यक हैं? अपने उत्तर के पक्ष में दो तर्क दीजिए।
उत्तर:
भारत में क्षेत्रीय दल आवश्यक हैं, क्योंकि।

  1. भारत एक विशाल देश है जिसमें विभिन्न भाषाओं, धर्मों तथा जातियों के लोग रहते हैं। अनेक क्षेत्रीय दलों का निर्माण जाति, धर्म एवं भाषा के आधार पर हुआ है।
  2. भारत में विभिन्न क्षेत्रों की अपनी समस्याएँ तथा आवश्यकताएँ हैं। इनके हितों की पूर्ति के लिए विभिन्न क्षेत्रीय दलों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

प्रश्न 9.
भारत में गठबन्धन सरकारों के निर्माण के दो कारण बताइए।
उत्तर:

  1. 1989 के बाद राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस का आधिपत्य समाप्त हो गया और कांग्रेस के विरुद्ध अनेक राजनीतिक दल आये जिससे गठबन्धनवादी सरकारों का दौर शुरू हुआ।
  2. क्षेत्रीय दलों की बढ़ती संख्या के कारण भी एक राष्ट्रीय दल को लोकसभा या विधानसभा में बहुमत मिलना कठिन हो गया, जिससे गठबन्धन की राजनीति शुरू हुई।

प्रश्न 10.
संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (संप्रग): संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन का निर्माण मई, 2004 में कांग्रेस एवं उसके सहयोगी दलों ने किया। इस दल की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी को बनाया गया तथा कांग्रेस के नेता डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का निर्णय लिया गया जिन्होंने 2004 और 2009 में अपनी सरकार बनाई।

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प्रश्न 11.
कांग्रेस प्रणाली से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कांग्रेस पार्टी की स्थापना 1885 में हुई। उसके कई वर्षों बाद तक भी कांग्रेस स्वयं में एक गठबन्धन पार्टी के रूप में कार्य करती रही क्योंकि इसमें कई धर्मों, जातियों, भाषाओं तथा क्षेत्रों के लोग शामिल थे। इसे ही कांग्रेस प्रणाली कहते हैं।

प्रश्न 12.
मंडल मुद्दा क्या था?
उत्तर: मंडल मुद्दा – सन् 1990 में वी. पी. सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए यह प्रावधान किया कि केन्द्र सरकार की नौकरियों ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ को 27 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया जायेगा। इससे अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के समर्थक और विरोधियों के बीच एक विवाद चला। इस विवाद को ही मंडल मुद्दा कहा गया।

प्रश्न 13.
अयोध्या में विवादित ढाँचे को कब गिराया गया था? राज्य सरकार को कैसे दंडित किया गया?
उत्तर:
6 दिसम्बर, 1992 को अयोध्या में विवादित ढाँचे को गिराया गया था। इसके दंड स्वरूप प्रथमतः उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भाजपा सरकार को बर्खास्त किया गया। दूसरे, मुख्यमंत्री कल्याण सिंह पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायालय के अवमानना के विरोध में मुकदमा दर्ज किया गया। तीसरे, जिन-जिन राज्यों में भाजपा सरकारें थीं उन्हें बर्खास्त कर वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू किया गया।

प्रश्न 14.
वी. पी. मंडल पर संक्षेप में टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
वी.पी. मंडल का जन्म 1918 में हुआ था। ये 1967-1970 तथा 1977 – 1979 में बिहार से सांसद चुने गए। इन्होंने दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग की अध्यक्षता की। इस आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने की सिफारिश समाजवादी नेता बने। 1968 में ये डेढ़ माह के लिए बिहार के मुख्यमंत्री बने। 1977 में ये जनता पार्टी में शामिल हुए।

प्रश्न 15.
मिली-जुली सरकारों के दुष्परिणामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
साझा सरकारों के दुष्परिणाम निम्न हैं।

  1. विभाजन व विघटन की प्रवृत्ति
  2. अवसरवादिता की प्रवृत्ति
  3. उत्तरदायित्व की प्रवृत्ति
  4. राजनीतिक दलों की नीतियों और कार्यक्रमों में अनिश्चितता और अस्पष्टता।

प्रश्न 16.
निर्दलीय उम्मीदवार की वर्तमान समय में बढ़ती संख्या एक चुनौती है, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
चुनावों में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या में वृद्धि हो रही है। यह निर्दलीय उम्मीदवार भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं। यह भारतीय दलीय व्यवस्था के हित में नहीं है।

प्रश्न 17.
राजनीतिक अपराधीकरण से क्या आशय है?
उत्तर:
राजनीतिक दलों द्वारा अपराध जगत के माफिया सरदारों को चुनावों में उम्मीदवार बनाकर धन-बल, बल के आधार पर लोकसभा और विधानसभाओं में पहुँचाया जाना राजनीतिक अपराधीकरण कहलाता है।

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प्रश्न 18.
स्पष्ट जनादेश और खण्डित जनादेश में क्या अन्तर है?
उत्तर:
स्पष्ट जनादेश का अभिप्राय है। किसी एक राजनैतिक दल को लोकसभा के चुनावों में स्पष्ट बहुमत मिलना और खण्डित जनादेश का अभिप्राय है। लोकसभा के चुनावों में किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत न मिलना।

प्रश्न 19.
बहुदलीय प्रणाली से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
बहुदलीय व्यवस्था: बहुदलीय व्यवस्था से अभिप्राय है। लोकसभा या राज्य विधानसभाओं में अनेक राजनीतिक दल विद्यमान होना जैसे आज लोकसभा में 50 से भी अधिक राजनीतिक दल हैं।

प्रश्न 20.
भारत की नई आर्थिक नीति कब शुरू की गई थी? इसका मुख्य वास्तुकार कौन था?
उत्तर:
भारत की नई आर्थिक नीति को 1991 में संरचना समायोजन कार्यक्रम के रूप में शुरू किया गया था और इसे तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव द्वारा शुरू किया गया था।

  1. भारत की नई आर्थिक नीति का शुभारंभ तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने किया था।
  2. आर्थिक परिवर्तन पहली बार 1991 में दिखाई दिए और मौलिक रूप से उस दिशा को बदल दिया जो भारतीय अर्थव्यवस्था ने आजादी के बाद से उदारीकृत और खुली अर्थव्यवस्था के लिए अपनायी थी।

प्रश्न 21.
शाहबानो मामला क्या था? इस मामले पर भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस विरोधी रुख क्यों अपनाया?
उत्तर:
शाहबानो मामला: शाहबानो मामला एक 62 वर्षीया तलाकशुदा मुस्लिम महिला शाहबानो का है। उसने अपने भूतपूर्व पति से गुजारा भत्ता हासिल करने के लिए अदालत में एक अर्जी दायर की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो के पक्ष में फैसला सुनाया। पुरातनपंथी मुसलमानों ने अदालत के इस फैसले को अपने ‘पर्सनल लॉ’ में हस्तक्षेप माना । कुछ मुस्लिम नेताओं की माँग पर सरकार ने मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 पास किया जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को निरस्त कर दिया गया।

प्रश्न 12.
मंडल मुद्दा क्या था?
उत्तर:
मंडल मुद्दा: सन् 1990 में वी. पी. सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए यह प्रावधान किया कि केन्द्र सरकार की नौकरियों ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ को 27 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया जायेगा। इससे अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के समर्थक और विरोधियों के बीच एक विवाद चला। इस विवाद को ही मंडल मुद्दा कहा गया।

प्रश्न 13.
अयोध्या में विवादित ढाँचे को कब गिराया गया था? राज्य सरकार को कैसे दंडित किया गया?
उत्तर:
6 दिसम्बर, 1992 को अयोध्या में विवादित ढाँचे को गिराया गया था। इसके दंड स्वरूप प्रथमतः उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भाजपा सरकार को बर्खास्त किया गया। दूसरे, मुख्यमंत्री कल्याण सिंह पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायालय के अवमानना के विरोध में मुकदमा दर्ज किया गया। तीसरे, जिन-जिन राज्यों में भाजपा सरकारें थीं उन्हें बर्खास्त कर वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू किया गया।

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प्रश्न 14.
वी. पी. मंडल पर संक्षेप में टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
वी.पी. मंडल का जन्म 1918 में हुआ था। ये 1967-1970 तथा 1977 – 1979 में बिहार से सांसद चुने गए। इन्होंने दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग की अध्यक्षता की। इस आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने की सिफारिश समाजवादी नेता बने। 1968 में ये डेढ़ माह के लिए बिहार के मुख्यमंत्री बने। 1977 में ये जनता पार्टी में शामिल हुए।

प्रश्न 15.
मिली-जुली सरकारों के दुष्परिणामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
साझा सरकारों के दुष्परिणाम निम्न हैं।

  1. विभाजन व विघटन की प्रवृत्ति
  2. अवसरवादिता की प्रवृत्ति
  3. उत्तरदायित्व की प्रवृत्ति
  4. राजनीतिक दलों की नीतियों और कार्यक्रमों में अनिश्चितता और अस्पष्टता।

प्रश्न 16.
निर्दलीय उम्मीदवार की वर्तमान समय में बढ़ती संख्या एक चुनौती है, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
चुनावों में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या में वृद्धि हो रही है। यह निर्दलीय उम्मीदवार भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं। यह भारतीय दलीय व्यवस्था के हित में नहीं है।

प्रश्न 17.
राजनीतिक अपराधीकरण से क्या आशय है?
उत्तर:
राजनीतिक दलों द्वारा अपराध जगत के माफिया सरदारों को चुनावों में उम्मीदवार बनाकर धन-बल, बल के आधार पर लोकसभा और विधानसभाओं में पहुँचाया जाना राजनीतिक अपराधीकरण कहलाता है।

प्रश्न 18.
स्पष्ट जनादेश और खण्डित जनादेश में क्या अन्तर है?
उत्तर:
स्पष्ट जनादेश का अभिप्राय है। किसी एक राजनैतिक दल को लोकसभा के चुनावों में स्पष्ट बहुमत मिलना और खण्डित जनादेश का अभिप्राय है। लोकसभा के चुनावों में किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत न मिलना।

प्रश्न 19.
बहुदलीय प्रणाली से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
बहुदलीय व्यवस्था: बहुदलीय व्यवस्था से अभिप्राय है। लोकसभा या राज्य विधानसभाओं में अनेक राजनीतिक दल विद्यमान होना जैसे आज लोकसभा में 50 से भी अधिक राजनीतिक दल हैं।

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प्रश्न 20.
भारत की नई आर्थिक नीति कब शुरू की गई थी? इसका मुख्य वास्तुकार कौन था?
उत्तर:
भारत की नई आर्थिक नीति को 1991 में संरचना समायोजन कार्यक्रम के रूप में शुरू किया गया था और इसे तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव द्वारा शुरू किया गया था।

  1. भारत की नई आर्थिक नीति का शुभारंभ तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने किया था।
  2. आर्थिक परिवर्तन पहली बार 1991 में दिखाई दिए और मौलिक रूप से उस दिशा को बदल दिया जो भारतीय अर्थव्यवस्था ने आजादी के बाद से उदारीकृत और खुली अर्थव्यवस्था के लिए अपनायी थी।

प्रश्न 21.
शाहबानो मामला क्या था? इस मामले पर भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस विरोधी रुख क्यों अपनाया?
उत्तर:
शाहबानो मामला: शाहबानो मामला एक 62 वर्षीया तलाकशुदा मुस्लिम महिला शाहबानो का है। उसने अपने भूतपूर्व पति से गुजारा भत्ता हासिल करने के लिए अदालत में एक अर्जी दायर की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो के पक्ष में फैसला सुनाया। पुरातनपंथी मुसलमानों ने अदालत के इस फैसले को अपने ‘पर्सनल लॉ’ में हस्तक्षेप माना।

कुछ मुस्लिम नेताओं की माँग पर सरकार ने मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 पास किया जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को निरस्त कर दिया गया। भाजपा ने कांग्रेस सरकार के इस कदम की आलोचना की और इसे अल्पसंख्यक समुदाय को दी गई अनावश्यक रियायत तथा तुष्टिकरण करार दिया।

प्रश्न 22.
भारत में वामपंथी एवं दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों का उल्लेख कीजिए तथा उनकी विचारधारा में कोई दो अन्तर लिखिये।
उत्तर:
प्रमुख वामपंथी तथा दक्षिण पंथी राजनैतिक दल: भारत में वामपंथी विचारधारा के पोषक दल हैं। सीपीएम, सीपीआई, रिपब्लिक पार्टी, फारवर्ड ब्लाक एवं समाजवादी पार्टी, जबकि दक्षिणपंथी विचारधारा का पोषक दल भारतीय जनता पार्टी है। वामपंथी तथा दक्षिणपंथी राजनैतिक दलों की विचारधारा में अन्तर:

  1. वामपंथी दल धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक- आर्थिक न्याय, राष्ट्रीयकरण आदि का समर्थन करते हैं, जबकि दक्षिणपंथी दल भारतीय संस्कृति, प्रबल राष्ट्रवाद, उदारीकरण, भूमंडलीकरण की नीतियों का समर्थन करते हैं।
  2. वामपंथी दल सार्वजनिक क्षेत्र के समर्थक हैं जबकि दक्षिणपंथी दल निजी क्षेत्र के समर्थक हैं ।

प्रश्न 23.
राजनीतिक दलों में आन्तरिक लोकतन्त्र के अभाव से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
राजनीतिक दलों में आन्तरिक लोकतन्त्र का अभाव: भारत के अधिकांश राजनीतिक दलों में आन्तरिक लोकतन्त्र का अभाव है। यथा – प्रथमतः 1997 तक अधिकांश राजनीतिक दलों में लम्बे समय से संगठनात्मक चुनाव नहीं हुए। 1997 में चुनाव आयोग के निर्देश पर ही ये चुनाव हो सके। दूसरे, भारतीय राजनीतिक दलों का निर्माण किन्हीं प्रक्रियाओं, मर्यादाओं, सिद्धान्तों या कानूनों के आधार पर नहीं होता है। तीसरे, भारतीय राजनीतिक दलों के आय-व्यय का कोई लेखा-जोखा सदस्यों के सामने प्रस्तुत नहीं किया जाता।

प्रश्न 24.
भारत की बहुदलीय व्यवस्था पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
बहुदलीय व्यवस्था: भारत में बहुदलीय व्यवस्था है अर्थात् लोकसभा में अनेक राजनैतिक दलों के सदस्य हैं। वर्तमान में लोकसभा में कुल मिलाकर 50 से भी अधिक राजनैतिक दल हैं। कुछ राजनैतिक दल राष्ट्रीय या अखिल भारतीय राजनैतिक दल हैं तो कुछ राज्य स्तरीय तथा क्षेत्रीय दल हैं। 1989 तक भारत की बहुदलीय व्यवस्था में एक राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रधानता की स्थिति बनी रही, लेकिन धीरे-धीरे कांग्रेस का वर्चस्व समाप्त हो गया और वर्तमान में किसी एक राजनैतिक दल का वर्चस्व नहीं है। यद्यपि 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला है तथापि अनेक क्षेत्रीय दलों को भी अपने राज्यों में अच्छी सफलता मिली है।

प्रश्न 25.
जनता दल का निर्माण किन कारणों से हुआ? इसके मुख्य घटकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
जनता दल: जनता दल का निर्माण 1988 में हुआ। 1987 में कांग्रेस के कई प्रमुख नेताओं ने पार्टी का त्याग करके जनमोर्चा का निर्माण किया। इसके साथ ही अनेक नेता एक ऐसे नये राजनीतिक दल का निर्माण करने का प्रयास कर रहे थे, जो कांग्रेस का विकल्प बन सके। 26 जुलाई, 1988 को चार विपक्षी दलों जनता पार्टी, लोकदल, कांग्रेस (स) और जनमोर्चा के विलय से एक नये राजनीतिक दल की स्थापना की गई। इस नये दल का नाम समाजवादी जनता दल रखा गया। 11 अक्टूबर, 1988 को बैंगलोर में समाजवादी जनता दल का नाम बदलकर जनता दल कर दिया गया। श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को जनता दल का प्रधान मनोनीत किया गया।

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प्रश्न 26.
जनता दल के कार्यक्रमों एवं नीतियों का संक्षिप्त उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जनता दल के कार्यक्रम एवं नीतियाँ – जनता दल के प्रमुख कार्यक्रम एवं नीतियाँ निम्नलिखित हैं।

  1. जनता दल का लोकतन्त्र में दृढ़ विश्वास है और उत्तरदायी प्रशासनिक व्यवस्था को अपनाने के पक्ष में है।
  2. जनता दल ने भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए सात सूत्रीय कार्यक्रम अपनाने की बात कही है।
  3.  पार्टी राजनीति में बढ़ते हुए भ्रष्टाचार को रोकने के लिए लोकपाल की नियुक्ति के पक्ष में है।
  4. पार्टी पंचायती राज संस्थाओं को अधिक स्वायत्तता देने के पक्ष में है।
  5. जनता दल महिलाओं को संसद और राज्य विधानमण्डलों में 33 प्रतिशत और सरकारी, सार्वजनिक व निजी क्षेत्र की नौकरियों में 30 प्रतिशत आरक्षण दिलाने के पक्ष में है।

प्रश्न 27.
1990 के पश्चात् भारत में राजनीतिक दलों के कौनसे गठबंधन उभरे? इस परिवर्तन के किन्हीं दो परिणामों को उजागर कीजिये।
उत्तर:

  • 1990 के पश्चात् भारत में केन्द्र में राजनीतिक दलों के तीन गठबंधन उभरे
    1. 1996 और 1997 में देवेगोड़ा और इन्द्रकुमार गुजराल के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा सरकार बनी जिसे कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया।
    2. 1998 और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपानीत राजग की गठबंधन सरकार बनी।
    3. 2004 तथा 2009 में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार का गठन हुआ।
    4. 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपानीत राजग की सरकार बनी।
  • गठबंधन राजनीति के परिणाम इस प्रकार रहे।
    1. गठबंधन की राजनीति के परिणामस्वरूप पिछड़ी जातियों के राजनीतिक और सामाजिक दावे को सभी दलों ने स्वीकार कर लिया।
    2. गठबंधन की राजनीति के परिणामस्वरूप केन्द्रीय शासन में क्षेत्रीय दलों का प्रभुत्व बढ़ा।

प्रश्न 28.
भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में गठबन्धनवादी युग के उदय के किन्हीं चार कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में गठबन्धनवादी राजनीति के उदय के कारण – भारत में गठबन्धनवादी राजनीति के उदय के कारण निम्नलिखित हैं।

  1. कांग्रेसी प्रभुत्व का अन्त: 1989 के बाद कांग्रेस पार्टी की स्थिति पहले जैसी नहीं रही जिससे गठबन्धनवादी सरकारों का दौर शुरू हुआ।
  2. क्षेत्रीय दलों की संख्या में वृद्धि: क्षेत्रीय दलों की बढ़ती संख्या के कारण किसी भी एक राष्ट्रीय दल को लोक सभा या विधानसभा में बहुमत मिलना कठिन हो गया। इससे राजनीतिक दल गठबन्धन बनाने लगे हैं।
  3. दलबदल -दल-बदल के कारण सरकारों का अनेक बार पतन हुआ और जो नई सरकारें बनीं वे भी गठबन्धन करके बनीं।
  4. क्षेत्रीय हितों की उपेक्षा: प्रायः केन्द्र में बनी राष्ट्रीय दलों की सरकारों ने क्षेत्रीय हितों की उपेक्षा की है। इससे क्षेत्रीय स्तर के दलों ने मुद्दों पर आधारित राजनीति के अनुसार गठबन्धनकारी दौर की शुरुआत की।

प्रश्न 29.
राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन के उदय का वर्णन करें।
उत्तर:
राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन;
राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन (NDA) का निर्माण मई, 1999 में भारतीय जनता पार्टी एवं इसके सहयोगी दलों ने किया। इस गठबन्धन में अधिकतर वे दल ही सम्मिलित थे जो बारहवीं लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी के गठबन्धन में सम्मिलित थे। राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन ने भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमन्त्री के रूप में पेश किया। इस गठबन्धन ने 1999 में हुए 13वीं लोकसभा के चुनावों में 297 सीटों पर विजय प्राप्त की तथा अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाई, परन्तु 2004 में 14वीं और 2009 में 15वीं लोकसभा के चुनावों में इस गठबन्धन को हार का सामना करना पड़ा। 2014 के लोकसभा चुनावों में पुन: इस गठबन्धन ने विजय प्राप्त की और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वर्तमान में राजग की ही सरकार है।

प्रश्न 30.
1989 के बाद कांग्रेस एवं भारतीय जनता पार्टी के निर्वाचित प्रदर्शन का क्या रुझान रहा? उत्तर-1989 के बाद कांग्रेस एवं भारतीय जनता पार्टी के निर्वाचन प्रदर्शन का रुझान इस प्रकार रहा-
1. कांग्रेस:
1989 के बाद कांग्रेस के निर्वाचन प्रदर्शन में गिरावट आई है तथा प्रत्येक चुनाव में कांग्रेस के वोट एवं सीटें कम होती चली गईं तथा जो पार्टी 1960 एवं 70 के दशक में दो-तिहाई बहुमत प्राप्त कर लेती थी वह अपने दम पर इतनी सीट भी नहीं जीत पाती कि वह अपनी सरकार बना ले। 2004 के 14वीं और 2009 के 15वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात् कांग्रेस अन्य दलों के सहयोग से केन्द्र में सरकार बनाने में सफल रही है, लेकिन 2014 के 16वीं लोकसभा चुनावों में उसे केवल 44 सीटें ही प्राप्त हुई हैं।

2. भारतीय जनता पार्टी:
1989 के बाद भारतीय जनता पार्टी की वोट एवं सीटें बढ़ती गईं तथा भारतीय राजनीति में इसने महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया तथा 1998, 1999 तथा 2014 के लोकसभा चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और इसने केन्द्र में सरकार बनाई।

प्रश्न 31.
यह कहना कहाँ तक उचित है कि भारत में कुछ सहमति बनाने में गठबंधन सरकार ने सहायता की है?
उत्तर:
गठबंधन सरकार की सहमति बनाने में भूमिका:

  1. नयी आर्थिक नीति पर सहमति: अधिकतर दलों का मानना है कि नई आर्थिक नीतियों से देश समृद्ध होगा और भारत विश्व की एक आर्थिक शक्ति बनेगा।
  2. पिछड़ी जातियों के राजनीतिक और सामाजिक दावे की स्वीकृति: गठबंधन सरकारों में शामिल राजनीतिक दलों में यह सहमति बनी है कि पिछड़ी जातियों को शिक्षा तथा रोजगार में आरक्षण दिया जाए।
  3. केन्द्रीय शासन में प्रान्तीय दलों की भूमिका की स्वीकृति: गठबंधन सरकारों में प्रान्तीय दल केन्द्रीय सरकार में साझेदार बन रहे हैं। अब प्रान्तीय और केन्द्रीय दलों का भेद कम हो रहा है।
  4. विचारधारा की जगह कार्यसिद्धि पर जोर-गठबंधन सरकार में एक साझा कार्यक्रम होता है और इस कार्यक्रम की क्रियान्विति पर अधिक जोर दिया जाता है। विचारधारा का तत्त्व इस सरकार में गौण हो गया है।

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प्रश्न 32.
कांशीराम के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
कांशीराम का जन्म 1934 में हुआ था। ये बहुजन समाज के सशक्तीकरण के प्रतिपादक और बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक थे। इन्होंने सामाजिक और राजनीतिक कार्य के लिए केन्द्र सरकार की नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। इन्होंने डीएस-4 की स्थापना की। ये एक कुशाग्र रणनीतिकार थे। इनके अनुसार राजनीतिक सत्ता, सामाजिक समानता का आधार है। ये उत्तर भारत के राज्यों में दलित राजनीति के संगठनकर्ता की भूमिका निभा चुके हैं।

प्रश्न 33.
गठबन्धन की राजनीति के उदय का हमारे लोकतंत्र पर क्या असर पड़ा है?
अथवा
भारत में गठबन्धन की राजनीति के प्रभाव समझाइये।
उत्तर:
गठबन्धन की राजनीति के लोकतन्त्र पर प्रभाव: भारत में गठबन्धन की राजनीति का भारतीय लोकतंत्र पर निम्न प्रमुख प्रभाव पड़े-

  1. एकदलीय प्रभुत्व की समाप्ति: गठबन्धन की राजनीति से भारतीय लोकतंत्र में कांग्रेस के दबदबे की समाप्ति हुई और बहुदलीय प्रणाली का युग शुरू हुआ।
  2. क्षेत्रीय पार्टियों का बढ़ता प्रभाव: क्षेत्रीय पार्टियों ने गठबन्धन सरकार बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। अब प्रान्तीय दल केन्द्रीय सरकार में साझेदार बन रहे हैं तथा उनका दृष्टिकोण व्यापक हुआ है।
  3. विचारधारा की जगह कार्यसिद्धि पर जोर-गठबंधन की राजनीति के इस दौर में राजनीतिक दल विचारधारागत की जगह सत्ता में हिस्सेदारी पर जोर दे रहे हैं।
  4. जन-आंदोलन और संगठन विकास के नये रूप-गठबंधन की राजनीति में जन-आंदोलन और संगठन विकास के नये रूप सामने आ रहे हैं। ये रूप गरीबी, विस्थापन, न्यूनतम मजदूरी, भ्रष्टाचार विरोध, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा के मुद्दों पर जन-आंदोलन के जरिये राजनीति में उभर रहे हैं।

प्रश्न 34.
भारतीय जनता पार्टी के उदय पर संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
भारतीय जनता पार्टी: भारतीय जनता पार्टी का उदय 1980 में जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता के मुद्दे को लेकर असहमति के कारण हुआ। 19 मार्च, 1980 को जनता पार्टी के केन्द्रीय संसदीय बोर्ड ने बहुमत से फैसला किया कि जनता पार्टी का कोई भी अधिकारी, विधायक और सांसद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की दैनिक गतिविधियों में भाग नहीं ले सकता। परन्तु बोर्ड की बैठक में श्री अटल बिहारी वाजपेयी और श्री लालकृष्ण आडवाणी तथा नाना जी देशमुख ने इस निर्णय का विरोध किया।

5 अप्रैल, 1980 को भूतपूर्व जनसंघ के सदस्यों ने नई दिल्ली में दो दिन का सम्मेलन किया और एक नई पार्टी बनाने का निश्चय किया। 6 अप्रैल, 1980 को भूतपूर्व विदेशमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में भारतीय जनता पार्टी के नाम से एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल का गठन किया गया।

प्रश्न 35.
संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की नीतियों एवं कार्यक्रमों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (संप्रग) के नीति एवं कार्यक्रम-संप्रग की प्रमुख नीतियाँ एवं कार्यक्रम निम्नलिखित हैं।

  1. सामाजिक सद्भावना को बनाए रखना और उसमें वृद्धि करना।
  2. आने वाले दशकों में आर्थिक विकास की दर 7% से 8% के मध्य बनाए रखना ताकि रोजगार के अवसर पैदा हो सकें।
  3. कृषकों, कृषि श्रमिकों व विशेष तौर पर असंगठित क्षेत्रों के श्रमिकों के कल्याण में वृद्धि करना और उनके परिवार के भविष्य को विश्वसनीय व सुरक्षित बनाना
  4. स्त्रियों को राजनीतिक, शैक्षणिक, आर्थिक और कानूनी पक्ष से सुदृढ़ करना।
  5. अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़ी जातियों तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों को पूर्ण अवसर की समानता, विशेषकर शिक्षा तथा रोजगार के क्षेत्र में दी जाए।

प्रश्न 36.
भारत के राजनीतिक मानचित्र में लोकसभा चुनाव, 2004 में निम्नांकित को दर्शाइये।
1. ऐसे दो राज्य जहाँ राजग को संप्रग से अधिक सीटें मिलीं।
2. ऐसे दो राज्य जहाँ संप्रग को राजग से अधिक सीटें मिलीं।
उत्तर:
(नोट- मानचित्र सम्बन्धी प्रश्नों में प्रश्न संख्या 5 का उत्तर देखें।)

प्रश्न 37.
गठबन्धन की राजनीति पर संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
गठबन्धन सरकार की शुरुआत केन्द्रीय स्तर पर 1977 में हुई जब केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बनी। इसी दौरान केन्द्र स्तर पर काँग्रेस का एकाधिकार समाप्त हो चुका था। आगे चलकर भारत में कई गठबन्धन की सरकारें बनीं। 1989, 1991, 1996, 1998, 1999, 2004, 2009 तथा 2014 के चुनावों में गठबंधन की सरकार बनी। 1999 में भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन का निर्माण किया तो 2004 में काँग्रेस ने सत्ता प्राप्ति के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का निर्माण किया।

प्रश्न 38.
बामसेफ पर संक्षेप में टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
बामसेफ का गठन 1978 में हुआ। इसका पूरा नाम बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एम्पलाइज फेडरेशन है। यह सरकारी कर्मचारियों का कोई साधारण – सा ट्रेड यूनियन नहीं था। इस संगठन ने ‘बहुजन’ अर्थात् अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों की राजनीतिक सत्ता की जबरदस्त तरफदारी की।

प्रश्न 39.
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद राज्य सरकार का क्या हुआ?
उत्तर:

  1. भाजपा की राज्य सरकार बर्खास्त कर दी गई थी।
  2. इसके साथ ही, अन्य राज्य जहाँ भाजपा सत्ता में थी, उन्हें भी राष्ट्रपति शासन के तहत रखा गया था।
  3. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मामला दर्ज किया गया था।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव

प्रश्न 40.
‘हिन्दुत्व’ अथवा ‘हिंदूपन’ शब्द को परिभाषित करते हुए वी.डी. सावरकर का क्या आशय था?
उत्तर:
‘हिन्दुत्व’ अथवा ‘हिन्दूपन’ शब्द को वी. डी. सावरकर ने गढ़ा था और इसको परिभाषित करते हुए उन्होंने इसे भारतीय राष्ट्र की बुनियाद बताया। उनके कहने का आशय यह था कि भारत राष्ट्र का नागरिक वही हो सकता है, जो भारतभूमि को न सिर्फ ‘पितृभूमि’ बल्कि अपनी ‘पुण्यभूमि’ भी स्वीकार करें। हिन्दुत्व के समर्थकों का तर्क है कि मजबूत राष्ट्र सिर्फ एकीकृत राष्ट्रीय संस्कृति की बुनियाद पर ही बनाया जा सकता है।

प्रश्न 41.
भारत में गठबंधन राजनीति का।
उत्तर:
भारत में गठबंधन का युग 1989 के लंबा दौर कब और क्यों शुरू हुआ?
चुनावों के बाद देखा जा सकता है। काँग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी लेकिन उसने एक भी बार बहुमत हासिल नहीं किया, इसलिए उसने विपक्षी पार्टी की भूमिका निभाई। इसके कारण राष्ट्रीय मोर्चा (जनता दल और अन्य क्षेत्रीय दलों का गठबंधन) अस्तित्व में आया। इसको बीजेपी और लेफ्ट फ्रंट का समर्थन मिला। बीजेपी और लेफ्ट फ्रंट सरकार में शामिल नहीं हुए लेकिन उन्होंने बाहर से अपना समर्थन दिया। गठबंधन के दौर में कई प्रधानमंत्री बने और उनमें से कुछ के पास छोटी अवधि के लिए कार्यालय था।

प्रश्न 42.
मंडल आयोग को लागू करने का समाज और राजनीति पर क्या प्रभाव हुआ?
उत्तर:
मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का फैसला राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार द्वारा लिया गया। इससे अन्य पिछड़ा वर्ग की राजनीति को सुगठित रूप देने में मदद मिली। नौकरी में आरक्षण के सवाल पर बहस हुई और इनसे’अन्य पिछड़ा वर्ग अपनी पहचान लेकर सजग हुआ। जो इस तबके को लामबंद करना चाहते थे उनका फायदा हुआ। इस दौर में अनेक पार्टियाँ आगे आयीं, जिन्होंने रोजगार और शिक्षा के क्षेत्र में अन्य पिछड़ा वर्ग को बेहतर अवसर उपलब्ध कराने की माँग की। इन दलों ने सत्ता में ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ की हिस्सेदारी का सवाल भी उठाया।

प्रश्न 43.
मंडल आयोग का गठन क्यों किया गया था?
उत्तर:
मंडल आयोग का गठन भारतीय समाज के विभिन्न तबकों के बीच शैक्षिक और सामाजिक पिछड़ेपन की व्यापकता का पता लगाने और इन पिछड़े वर्गों की पहचान के तरीके बताने के लिए किया गया था। आयोग से यह भी अपेक्षा की गई थी कि वह इन वर्गों के पिछड़ेपन को दूर करने के उपाय सुझाएगा।

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प्रश्न 44.
बसपा पार्टी के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
1978 में दलितों के राजनीतिक संगठन बामसेफ का उदय हुआ । इस संगठन ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों की राजनीतिक सत्ता की जबरदस्त तरफदारी की। इसी का परवर्ती विकास ‘दलित-शोषित समाज संघर्ष समिति’ है, जिससे बाद के समय में बहुजन समाज पार्टी का उदय हुआ। इस पार्टी की अगुवाई कांशीराम ने की। यह पार्टी अपने शुरुआती दौर में एक छोटी पार्टी थी और इसे पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के दलित मतदाताओं का समर्थन हासिल था, लेकिन 1989 और 1991 के चुनावों में इस पार्टी को उत्तर प्रदेश में सफलता मिली। आजाद भारत में यह पहला मौका था, जब कोई राजनीतिक दल मुख्यतया दलित मतदाताओं के समर्थन के बूते ऐसी राजनीतिक सफलता हासिल कर पाया था। इस पार्टी का समर्थन सबसे ज्यादा दलित मतदाता करते हैं।

प्रश्न 45.
इंदिरा साहनी केस के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
1990 के अगस्त में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों में से एक को लागू करने का फैसला लिया। यह सिफारिश केन्द्रीय सरकार और उसके उपक्रमों की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के संबंध में थी। सरकार के फैसले से उत्तर भारत के कई शहरों में हिंसक विरोध का स्वर उमड़ा। इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में भी चुनौती दी गई और यह प्रकरण ‘इंदिरा साहनी केस’ के नाम से जाना जाता है। क्योंकि सरकार के फैसले के खिलाफ अदालत में जिन लोगों ने अर्जी दायर की थी, उनमें एक नाम इंदिरा साहनी का भी था।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में क्षेत्रीय दलों का महत्त्व क्यों बढ़ता जा रहा है?
अथवा
भारत में राज्य स्तरीय (क्षेत्रीय) पार्टियों की भूमिका की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारत में क्षेत्रीय दलों की बढ़ती भूमिका: भारत में अनेक राजनैतिक दल क्षेत्रीय आधार पर गठित हैं। ऐसे दलों में द्रमुक, अन्ना द्रमुक, अकाली दल मुस्लिम लीग, नेशनल कांफ्रेंन्स, असम गण परिषद्, सिक्किम संग्राम परिषद्, तेलगूदेशम, तमिल मनीला कांग्रेस, नगालैण्ड लोकतान्त्रिक दल, मणिपुर पीपुल्स पार्टी – सपा, बीजद, राष्ट्रीय लोकदल, एकीकृत जनता दल, राजद आदि प्रमुख हैं। अपने-अपने क्षेत्रों में यह दल प्रभावी हैं और राष्ट्रीय दलों का कुछ राज्यों को छोड़कर शेष में प्रभाव नगण्य है।

1989 से 2009 तक के चुनावों में किसी भी एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाने के कारण भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का महत्त्व बढ़ गया। जहाँ-जहाँ क्षेत्रीय दल प्रभावी हैं, वहाँ-वहाँ राष्ट्रीय दल, विशेषकर कांग्रेस और भाजपा उखड़ गये हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि लोकसभा में राजनैतिक दल चार समूहों में विभाजित हो गए।

  1. भाजपा और उसके क्षेत्रीय सहयोगी दल
  2. कांग्रेस और उसके सहयोगी दल
  3. वामपंथी दल और उसके सहयोगी क्षेत्रीय दल
  4. तीनों मोर्चों से तटस्थ क्षेत्रीय व राष्ट्रीय दल (सपा तथा बसपा आदि)।

इस प्रकार अब सरकार बनाने के लिए राष्ट्रीय दलों को क्षेत्रीय दलों के साथ गठबन्धन करना तथा सरकार निर्माण में तथा सत्ता की भागीदारी में उनको शामिल करना संसद में आवश्यक बहुमत प्राप्त करने के लिए आवश्यक हो गया है।

प्रश्न 2.
1980 के दशक के आखिर के सालों में आए उन बदलावों का उल्लेख कीजिये, जिनका हमारी भावी राजनीति पर गहरा असर पड़ा।
उत्तर:
1980 के दशक के आखिर के सालों में देश में ऐसे पांच बदलाव आए, जिनका हमारी आगे की राजनीति पर गहरा असर पड़ा। यथा।

  1. 1989 के चुनावों में कांग्रेस की हार: 1989 के इस चुनाव में कांग्रेस लोकसभा की 197 सीटें ही जीत की और केन्द्र में भी एकदलीय प्रभुत्व की स्थिति समाप्त हो गई।
  2. मंडल मुद्दे का उदय: 1990 में राष्ट्रीय मोर्चा की नयी सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया जिसमें प्रावधान किया गया कि केन्द्र सरकार की नौकरियों में ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ को 27% आरक्षण दिया जायेगा। इसके बाद की देश की राजनीति में पिछड़ी जातियों के आरक्षण का यह मुद्दा, जिसे ‘मंडल मुद्दा’ कहा गया, छाया रहा।
  3. नये आर्थिक सुधार की नीतियाँ: इस दौर में विभिन्न सरकारों ने आर्थिक सुधार की नीतियाँ अपनायीं। इसकी शुरुआत राजीव गाँधी की सरकार के समय हुई। बाद की सभी सरकारों ने इस नयी आर्थिक नीति पर अमल जारी रखा।
  4. अयोध्या के विवादित ढाँचे का बिध्वंस: 1992 में अयोध्या के विवादित ढाँचे को ध्वस्त करने की घटना ने राजनीति में कई परिवर्तनों को जन्म दिया। इन बदलावों का संबंध भाजपा के उदय और हिंदुत्वं की राजनीति से है।
  5. राजीव गाँधी की हत्या; मई, 1991 में राजीव गाँधी की हत्या के परिणामस्वरूप कांग्रेस के प्रति चुनावों में सहानुभूति लहर ने कांग्रेस को लाभ पहुँचाया तथा केन्द्र में कांग्रेस पार्टी सत्तारूढ़ हुई।

प्रश्न 3.
भारत में मिली-जुली या गठबन्धन सरकारों की राजनीति की व्याख्या करें।
उत्तर:
भारत में मिली-जुली या गठबन्धन की राजनीति मिली-जुली सरकार का साधारण अर्थ है। कई दलों द्वारा मिलकर सरकार का निर्माण करना। मिली-जुली सरकार का निर्माण प्रायः उस स्थिति में किया जाता है। जब किसी एक दल को चुनावों के बाद स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हुआ हो। तब दो या दो से अधिक दल मिलकर संयुक्त सरकार का निर्माण करते हैं। इन मिली-जुली सरकारों की राजनीति की अपनी कुछ विशेषताएँ होती हैं। जिनका वर्णन निम्नलिखित है।

  1. समझौतावादी कार्यक्रम: ऐसी सरकारों का राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक कार्यक्रम समझौतावादी होता है, जिसमें कि प्रत्येक दल की बातों को व कार्यक्रम को ध्यान में रखा जाता है।
  2. सर्वसम्मत नेता: मिली-जुली सरकार के निर्माण से पूर्व यद्यपि सभी दल मिलकर अपने नेता का चुनाव करते हैं, नेता का चुनाव प्रायः सर्वसम्मति के आधार पर किया जाता है तथापि घटक दलों के नेता व उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जाता। इसके कारण सरकार में एकता बनी रहती है।
  3. सर्वसम्मत निर्णय: मिली-जुली सरकार में शामिल घटक दल किसी भी राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय समस्या का हल सर्वसम्मति से करते हैं।
  4. मिल-जुलकर कार्य करना: मिली-जुली सरकार में शामिल सभी घटक दल मिल-जुलकर कार्य करते हैं। एक दल द्वारा किया गया गलत कार्य सभी दलों द्वारा किया गया गलत कार्य समझा जाएगा, इसलिए सभी दल मिल-जुल कर कार्य करते हैं।

प्रश्न 4.
राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन की नीतियों एवं कार्यक्रमों का वर्णन करें।
उत्तर:
राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन: अप्रैल, 1999 में वाजपेयी की सरकार मात्र 13 दिन की अवधि में ही गिर जाने के बाद मई, 1999 में 24 राजनीतिक दलों ने मिलकर राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन (राजग) के नाम से एक गठबन्धन बनाया। राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन ने भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमन्त्री के रूप में पेश किया। राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन की नीतियाँ एवं कार्यक्रम – राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन की प्रमुख नीतियाँ व कार्यक्रम निम्नलिखित हैं।

  1. लोकपाल; घोषणा पत्र में वायदा किया गया कि प्रधानमन्त्री समेत सभी व्यक्तियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच के लिए लोकपाल विधेयक पारित किया जाएगा।
  2. आर्थिक उदारीकरण-: देश में आर्थिक उदारीकरण की नीति को जारी रखा जायेगा।
  3. निर्धनता: घोषणा पत्र में निर्धनता के निवारण पर बल दिया गया।
  4. आम सहमति से शासन: घोषणा पत्र में सभी प्रमुख मुद्दों पर विपक्ष के साथ मिलकर आम सहमति से शासन चलाने की बात कही गयी।
  5. नए राज्य: छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड तथा झारखण्ड नए राज्य बनाए गए।
  6. प्रसार भारती: प्रसार भारती अधिनियम की समीक्षा की जाएगी। इसके साथ भारतीय हितों के संरक्षण के लिए व्यापक प्रसारण विधेयक पारित किया जाएगा।
  7. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को विभिन्न सामाजिक- आर्थिक क्षेत्रों में विकास कार्यक्रम के साथ जोड़ने के प्रयास किए जाएंगे।
  8. राष्ट्रीय सुरक्षा: गठबन्धन ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि महत्त्व देने का वायदा किया।
  9. अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध: अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पड़ौसी व मित्र राष्ट्रों के सम्बन्धों में प्रगाढ़ता लाई जाएगी तथा सार्क और आसियान की तरह क्षेत्रीय और समूहीकरण को बढ़ावा दिया जाएगा।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव

प्रश्न 5.
वर्तमान में भारतीय दलीय व्यवस्था की उभरती प्रवृत्तियों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय दलीय व्यवस्था की उभरती प्रवृत्तियाँ वर्तमान में भारतीय दलीय व्यवस्था की उभरती हुई प्रवृत्तियाँ निम्नलिखित हैं।

  1. एक दल से साझा सरकारों की ओर: 1989 के बाद के लोकसभा के चुनावों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला परिणामतः साझा सरकारें अस्तित्व में आईं।
  2. क्षेत्रीय दलों का बढ़ता वर्चस्व: वर्तमान राजनीतिक दलीय स्थिति में सत्ता की जोड़-तोड़ में क्षेत्रीय दलों की भूमिका बढ़ी है।
  3. निर्दलीय सदस्यों की बढ़ती भूमिका: किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में निर्दलीय उम्मीदवारों की भी भूमिका बढ़ जाती है।
  4. दलीय प्रणाली का सत्ता केन्द्रित स्वरूप: वर्तमान समय में राजनीतिक दलों का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना रह गया है तथा उनके लिए विचारधाराएँ, समस्याएँ गौण हो गई हैं।
  5. भाषावाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद का प्रभाव: सत्ता प्राप्ति के लिए राजनीतिक दल भाषा, जाति एवं सम्प्रदायों का भी सहारा लेते हैं।
  6. दलों में आन्तरिक गुटबन्दी: भारत के सभी राजनीतिक दल आन्तरिक गुटबन्दी की समस्या से पीड़ित हैं।
  7. राजनीतिक अपराधीकरण: प्रायः सभी राजनीतिक दलों द्वारा आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को चुनावों में खड़ा किया जा रहा है जो धन-बल व भुज-बल के आधार पर मत प्राप्त करते हैं।
  8. दल की कथनी व करनी में अन्तर: पिछले कुछ वर्षों में भारतं में दलों की कथनी व करनी में अन्तर अपने भीषणतम रूप में उभरा है।
  9. केन्द्र व राज्य में टकराहट:  केन्द्र व राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें होती हैं जिससे केन्द्र व राज्यों के मध्य विभिन्न राजनीतिक मुद्दों को लेकर टकराहट की स्थिति बनी रहती है।

प्रश्न 6.
भारतीय दलीय व्यवस्था की प्रमुख समस्याओं का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय दलीय व्यवस्था की: समस्याएँ भारतीय दलीय व्यवस्था की प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं।

  1. दलों की संख्या में वृद्धि: भारत में बहुदलीय व्यवस्था है। राजनीतिक दलों की इस प्रकार की भरमार ने अस्थिर राजनैतिक स्थिति के साथ-साथ अन्य समस्याओं को भी जन्म दिया है।
  2. वैचारिक प्रतिबद्धता का अभाव: भारतीय राजनीतिक दलों में वैचारिक प्रतिबद्धता का अभाव है। वैचारिक प्रतिबद्धता से रहित इन दलों का मुख्य उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण सत्ता प्राप्त करना होता है।
  3. दलीय व्यवस्था में अस्थायित्व: भारतीय राजनीतिक दल निरन्तर बिखराव और विभाजन के शिकार हैं। इस कारण इन दलों में तथा भारतीय दलीय व्यवस्था में स्थायित्व का अभाव है।
  4. दलों में आन्तरिक लोकतंत्र का अभाव: भारत के अधिकांश राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है और वे घोर अनुशासनहीनता से पीड़ित हैं।
  5. राजनीतिक दलों में गुटीय राजनीति: लगभग सभी राजनीतिक दल तीव्र आंतरिक गुटबन्दी की समस्या से पीड़ित हैं।
  6. सत्ता के लिए संविधानेतर और विघटनकारी प्रवृत्तियों को अपनाना: राजनीतिक दलों ने पिछले दशक की राजनीति में बहुत अधिक मात्रा में संविधानेतर और विघटनकारी प्रवृत्तियों को अपना लिया है।
  7. नेतृत्व का संकट: भारत में वर्तमान में राजनीतिक दलों के समक्ष नेतृत्व का संकट भी बना हुआ है। अधिकांश राजनीतिक दलों के पास ऐसा नेतृत्व नहीं है, जिसका अपना ऊँचा राजनैतिक कद हो।

प्रश्न 7.
” भारतीय राजनीतिक दलों में अत्यधिक प्रतियोगिता एवं विरोध होने के बावजूद भी कई विषयों में सर्वसहमति है।” इस कथन के संदर्भ में सर्व- सहमति के बिन्दुओं की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
भारतीय राजनीतिक व्यवस्था की यह एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है कि ” भारतीय राजनीतिक दलों में अत्यधिक प्रतियोगिता एवं विरोध होने के बावजूद भी कई विषयों में सर्वसहमति है।” यथा।

  1. संवैधानिक व्यवस्था में विश्वास; भारत का प्रत्येक राजनीतिक दल भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में विश्वास रखता हैं तथा विभिन्न मुद्दों का संवैधानिक दायरे के अन्तर्गत ही हल चाहता है।
  2. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता बनाये रखना: भारत के सभी राजनीतिक दल देश की एकता व अखण्डता को बनाये रखने पर सहमत हैं।
  3. मौलिक अधिकार एवं स्वतन्त्रताओं की रक्षा: भारत के सभी राजनीतिक दल लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के प्रति एकमत रहते हैं।
  4. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ी जातियों के राजनीतिक तथा सामाजिक दावे की स्वीकृति: आज सभी राजनीतिक दल शिक्षा और रोजगार में अनुसूचित जाति, जनजाति एवं पिछड़ी जातियों के लिए सीटों के आरक्षण के पक्ष में हैं।
  5. नई आर्थिक नीतियों पर सहमति: ज्यादातर राजनीतिक दल नई आर्थिक नीतियों के पक्ष में हैं। इनका मानना है कि नई आर्थिक नीतियों से देश समृद्ध होगा और भारत विश्व की एक आर्थिक शक्ति बनेगा।
  6. राष्ट्र के शासन में प्रान्तीय दलों की भूमिका की स्वीकृति -गठबंधन सरकारों में प्रान्तीय दल केन्द्रीय सरकार में साझेदार बन रहे हैं।
  7. विचारधारा की जगह कार्यसिद्धि पर जोर- अब राजनीतिक दलों में विचारधारा के स्थान पर सत्ता प्राप्ति तथा कार्यसिद्धि पर सहमति बनती जा रही है।

प्रश्न 8.
मंडल आयोग पर विस्तार में लेख लिखिए।
उत्तर:
1977-79 की जनता पार्टी की सरकार के समय उत्तर भारत में पिछड़े वर्ग के आरक्षण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से आवाज उठाई गई। बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर इस दिशा में अग्रणी थे। उनकी सरकार ने बिहार में ‘ओबीसी’ को आरक्षण देने के लिए एक नीति लागू की। इसके बाद केन्द्र सरकार ने 1978 में एक आयोग बैठाया। इस आयोग को पिछड़ा वर्ग की स्थिति को सुधारने के उपाय बताने का काम दिया गया। इसी कारण आधिकारिक रूप से इस आयोग को ‘दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग’ कहा गया। इस आयोग को इसके अध्यक्ष बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल के नाम पर ‘मंडल कमीशन’ कहा गया।

मंडल आयोग का गठन भारतीय समाज के विभिन्न तबकों के बीच शैक्षिक और सामाजिक पिछड़ेपन की व्यापकता का पता लगाने और इन पिछड़े वर्गों की पहचान के तरीके बताने के लिए किया गया था। आयोग से यह भी अपेक्षा की गई थी कि वह इन वर्गों के पिछड़ेपन को दूर करने के उपाय सुझाएगा। आयोग ने 1980 में अपनी सिफारिशें पेश कीं। आयोग का मशविरा था कि पिछड़ा वर्ग को पिछड़ी जाति के अर्थ में स्वीकार किया जाए, क्योंकि अनुसूचित जातियों से इतर ऐसी अनेक जातियाँ हैं, जिन्हें वर्ण व्यवस्था में ‘नीच’ समझा जाता है।

आयोग ने एक सर्वेक्षण किया और पाया कि इन पिछड़ी जातियों की शिक्षा संस्थाओं तथा सरकारी नौकरियों में बड़ी कम मौजूदगी है। इस वजह से आयोग ने इन समूहों के लिए शिक्षा संस्थाओं तथा सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत सीट आरक्षित करने की सिफारिश की। मंडल आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग की स्थिति सुधारने के लिए कई और समाधान सुझाए जिनमें भूमि सुधार भी एक था।

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प्रश्न 9.
अयोध्या विवाद के बारे में विस्तारपूर्वक लिखिए।
उत्तर:
बाबरी विवाद पर फैजाबाद जिला न्यायालय द्वारा फरवरी, 1986 में एक फैसला सुनाया गया। इस अदालत ने फैसला सुनाया था कि बाबरी मस्जिद के अहाते का ताला खोल दिया जाना चाहिए ताकि हिन्दू यहाँ पूजा कर सकें संजीव पास बुक्स क्योंकि वे इस जगह को पवित्र मानते हैं। अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद को लेकर दशकों से विवाद चला आ रहा था। बाबरी मस्जिद 16वीं सदी में बनी थी। कुछ हिन्दुओं के मतानुसार यह मस्जिद एक राम मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी।

इस विवाद ने अदालती मुकदमे का रूप ले लिया और मुकदमा कई दशकों तक जारी रहा। 1940 के दशक के आखिरी सालों में मस्जिद में ताला लगा दिया गया क्योंकि मामला अदालत में था। जैसे ही बाबरी मस्जिद के अहाते का ताला खुला वैसे ही दोनों पक्षों में लामबंदी होने लगी। अनेक हिन्दू और मुस्लिम संगठन इस मसले पर अपने-अपने समुदाय को लामबंद करने की कोशिश में जुट गए। भाजपा ने इसे अपना बहुत बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया।

प्रश्न 10.
कड़े मुकाबले और कई संघर्षों के बावजूद अधिकतर दलों के बीच सहमति उभरती सी दिखती है। इस कथन की पुष्टि के लिए तर्क दीजिए।
उत्तर:

  1. नयी आर्थिक नीति पर सहमति: कई समूह नयी आर्थिक नीति के खिलाफ हैं, लेकिन ज्यादातर राजनीतिक दल इन नीतियों के पक्ष में हैं। इन दलों का मानना है कि नई आर्थिक नीतियों से देश समृद्ध होगा और भारत, विश्व की एक आर्थिक शक्ति बनेगा।
  2. पिछड़ी जातियों के राजनीतिक और सामाजिक दावे की स्वीकृति: राजनीतिक दलों ने पहचान लिया है कि पिछड़ी जातियों के सामाजिक और राजनीतिक दावे को स्वीकार करने की जरूरत है। इस कारण आज सभी राजनीतिक दल शिक्षा और रोजगार में पिछड़ी जातियों के लिए सीटों के आरक्षण के पक्ष में हैं। राजनीतिक दल यह भी सुनिश्चित करने के लिए तैयार हैं कि ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ को सत्ता में समुचित हिस्सेदारी मिले।
  3. देश के शासन में प्रांतीय दलों की भूमिका की स्वीकृति: प्रांतीय दल और राष्ट्रीय दल का भेद लगातार कम होते जा रहा है। प्रांतीय दल केन्द्रीय सरकार में साझीदार बन रहे हैं और इन दलों ने पिछले बीस सालों में देश की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  4. विचारधारा की जगह कार्यसिद्धि पर जोर और विचारधारागत सहमति के बगैर राजनीतिक गठजोड़: गठबंधन की राजनीति के इस दौर में राजनीतिक दल विचारधारागत अंतर की जगह सत्ता में हिस्सेदारी की बातों पर जोर दे रहे हैं। उदाहरण: अनेक दल भाजपा की ‘हिन्दुत्व’ की विचारधारा से सहमत नहीं हैं, लेकिन ये दल भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल हुए और सरकार बनाई, जो पाँच सालों तक चली।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

Jharkhand Board JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 Political Science Important Questions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

बहुचयनात्मक प्रश्न

1. विविधता के सवाल पर भारत ने कौन-सा दृष्टिकोण अपनाया?
(क) लोकतांत्रिक
(ख) राजनीतिक
(ग) सामाजिक
(घ) सांस्कृतिक
उत्तर:
(क) लोकतांत्रिक

2. इन्दिरा गाँधी की हत्या कब हुई थी?
(क) 24 जून, 1982
(ख) 25 अगस्त, 1974
(ग) 31 अक्टूबर, 1983
(घ) 31 अक्टूबर, 1984
उत्तर:
(घ) 31 अक्टूबर, 1984

3. किस राज्य में असम गण परिषद् सक्रिय है?
(क) गुजरात
(ख) तमिलनाडु
(ग) पंजाब
(घ) असम
उत्तर:
(घ) असम

4. द्रविड़ आंदोलन के प्रणेता कौन थे-
(क) हामिद अंसारी
(ख) लाल डेंगा
(ग) ई.वी. रामास्वामी नायकर
(घ) शेख मोहम्मद अब्दुल्ला
उत्तर:
(ग) ई.वी. रामास्वामी नायकर

5. पंजाब और हरियाणा राज्य बने
(क) 1950
(ख) 1966
(ग) 1965
(घ) 1947
उत्तर:
(ख) 1966

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

6. जम्मू और कश्मीर को संविधान के किस अनुच्छेद के अंतर्गत विशेष दर्जा दिया गया था?
(क) अनुच्छेद 370
(ख) अनुच्छेद 371
(ग) अनुच्छेद 375
उत्तर:
(क) अनुच्छेद 370

7. डी. एम. के. किस राज्य में सक्रिय है?
(क) तमिलनाडु
(ख) आन्ध्रप्रदेश
(ग) पंजाब
(घ) उत्तरप्रदेश
उत्तर:
(क) तमिलनाडु

8. नेशनल कान्फ्रेंस किस राज्य में सक्रिय है?
(क) जम्मू-कश्मीर
(ख) राजस्थान
(ग) पंजाब
(घ) हिमाचल प्रदेश
उत्तर:
(क) जम्मू-कश्मीर

9. शेख अब्दुल्ला के निधन के पश्चात् नेशनल कॉन्फेरेंस का नेतृत्व किसके पास गया?
(क) उमर अब्दुल्ला
(ख) गुलाम मोहम्मद सादिक
(ग) फारूक अब्दुल्ला
(घ) महबूबा मुफ्ती
उत्तर:
(ग) फारूक अब्दुल्ला

10. जम्मू और कश्मीर राज्य को पुनर्गठित करके किन दो केन्द्र शासित प्रदेशों का गठन किया?
और कश्मीर
(क) लेह और लद्दाख
(ख) जम्मू
(ग) जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख
(घ) लद्दाख और कश्मीर
उत्तर:
(ग) जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:

1. सिखों की राजनीतिक शाखा के रूप में 1920 के दशक में …………………. दल का गठन किया गया।
उत्तर:
अकाली

2. ………………… को जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 द्वारा अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया गया।
उत्तर:
5 अगस्त, 2019

3. भारत सरकार द्वारा ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ ………………. में चलाया गया।
उत्तर:
जून, 1984

4. पूर्वोत्तर क्षेत्र को भारत से जोड़ने वाली राहदारी ………………….. किलोमीटर लंबी है।
उत्तर:
22

5. नागालैंड को राज्य का दर्जा …………………में दिया गया।
उत्तर:
1963

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय भू-भाग में किस क्षेत्र को सात बहनों का भाग कहा जाता है?
उत्तर:
पूर्वोत्तर के सात राज्यों को।

प्रश्न 2.
भारत और पाकिस्तान के मध्य विवाद का मुख्य मुद्दा क्या रहा है?
उत्तर:
कश्मीर मुद्दा।

प्रश्न 3.
1947 से पहले जम्मू-कश्मीर का शासक कौन था ?
उत्तर:
हरि सिंह।

प्रश्न 4.
नेशनल कांफ्रेंस ने किसके नेतृत्व में आन्दोलन चलाया?
उत्तर:
शेख अब्दुल्ला।

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प्रश्न 5.
ई. वी. रामास्वामी नायकर किस नाम से प्रसिद्ध थे?
उत्तर:
पेरियार।

प्रश्न 6.
जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी ताकतों का बोलबाला कब से शुरू हुआ?
उत्तर:
1989 से।

प्रश्न 7.
धारा 370 किस राज्य से सम्बन्धित है?
उत्तर:
जम्मू-कश्मीर।

प्रश्न 8.
धारा 370 को समाप्त करने के पक्ष में कौनसी पार्टी रही है?
उत्तर;
भारतीय जनता पार्टी।

प्रश्न 9.
दक्षिण भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन किसे माना जाता है?
उत्तर:
द्रविड़ आन्दोलन।

प्रश्न 10.
1984 में स्वर्ण मन्दिर में हुई सैनिक कार्यवाही को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
ऑपरेशन ब्लू स्टार।

प्रश्न 11.
असम को बाँटकर किन प्रदेशों को बनाया गया?
उत्तर:
मेघालय, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश।

प्रश्न 12.
लाल डेंगा किस दल के नेता थे?
उत्तर:
मीजो नेशनल फ्रंट|

प्रश्न 13.
सिक्किम विधानसभा के लिए पहला लोकतांत्रिक चुनाव कब हुआ?
उत्तर:
1974 में।

प्रश्न 14.
अंगमी जापू फिजो किसकी आजादी के आन्दोलन के नेता थे?
उत्तर:
नगालैण्ड|

प्रश्न 15.
असम आन्दोलन आसू ( AASU) का पूरा नाम क्या है?
उत्तर:
ऑल असम स्टूडेन्ट यूनियन।

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प्रश्न 16.
पूर्वोत्तर के किन राज्यों को सात बहनों के नाम से जाना जाता है?
उत्तर:

  1. असम
  2. नगालैंड
  3. मेघालय,
  4. मिजोरम,
  5. अरुणाचल प्रदेश,
  6. त्रिपुरा और
  7. मणिपुर।

प्रश्न 17.
जम्मू-कश्मीर में कौनसे तीन राजनीतिक क्षेत्र शामिल हैं?
उत्तर:
जम्मू, कश्मीर और लद्दाख।

प्रश्न 18.
नेशनल कांफ्रेन्स किस राज्य में सक्रिय क्षेत्रीय दल है?
उत्तर:
जम्मू-कश्मीर।

प्रश्न 19.
अकाली दल और जनसंघ ने किस वर्ष पंजाब में गठबन्धन सरकार का निर्माण किया?
उत्तर:
1967 में।

प्रश्न 20.
पूर्वोत्तर भारत के किन्हीं दो पड़ौसी देशों के नाम बताइए।
उत्तर: म्यांमार, चीन।

प्रश्न 21.
क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने वाला कोई एक कारण बतायें।
उत्तर:
क्षेत्र का असन्तुलित आर्थिक विकास।

प्रश्न 22.
ऑपरेशन ब्लू स्टार कब और किसके द्वारा चलाया गया?
उत्तर:
ऑपरेशन ब्लू स्टार 1984 में इंदिरा गाँधी द्वारा चलाया गया।

प्रश्न 23.
क्षेत्रीय आकांक्षाओं का एक आधारभूत सिद्धान्त क्या है?
उत्तर:
क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतान्त्रिक राजनीति का अभिन्न अंग हैं।

प्रश्न 24.
अकाली दल किस राज्य से सम्बन्धित है?
उत्तर:
अकाली दल पंजाब से सम्बन्धित है।

प्रश्न 25.
किन्हीं दो क्षेत्रीय दलों के नाम लिखिए।
उत्तर:  नेशनल कान्फ्रेंस, डी. एम. के.।.

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प्रश्न 26.
1979 से 1985 तक चला असम आन्दोलन किसके विरुद्ध चला?
उत्तर:
यह आन्दोलन विदेशियों के विरुद्ध चला।

प्रश्न 27.
गोवा, दमन और दीव पुर्तगाल से कब स्वतन्त्र हुए?
उत्तर:
दिसम्बर, 1961 में गोवा, दमन और दीव पुर्तगाल से स्वतन्त्र हुए।

प्रश्न 28.
सिक्किम विधानसभा के लिए प्रथम लोकतान्त्रिक चुनाव कब हुए?
उत्तर:
सिक्किम विधानसभा के लिए प्रथम लोकतान्त्रिक चुनाव 1974 में हुए।

प्रश्न 29.
आनन्दपुर साहिब प्रस्ताव कब पास किया गया और इसका सम्बन्ध किसके साथ है?
उत्तर:
आनन्दपुर साहिब प्रस्ताव 1973 में पास किया गया और इसका सम्बन्ध राज्यों की स्वायत्तता से है।

प्रश्न 30.
पंजाब में किस दल ने पंजाबी सूबा के लिए आन्दोलन चलाया?
उत्तर:
पंजाब में अकाली दल ने पंजाबी सूबा के लिए आन्दोलन चलाया।

प्रश्न 31.
जम्मू-कश्मीर के उग्रवादियों की सहायता कौनसा देश कर रहा था?
उत्तर:
कश्मीर के उग्रवादियों को पाकिस्तान भौतिक और सैन्य सहायता दे रहा था।

प्रश्न 32.
अनुच्छेद 370 किस राज्य को अन्य राज्यों के मुकाबले में अधिक स्वायत्तता देता है?
उत्तर:
अनुच्छेद 370 में जम्मू-कश्मीर को भारत के अन्य राज्यों के मुकाबले अधिक स्वायत्तता दी गई है।

प्रश्न 33.
विविधता की चुनौती से निपटने के लिए क्या किया गया?
उत्तर:
विविधता की चुनौती से निपटने के लिए देश की अंदरूनी सीमा रेखाओं का पुनर्निर्धारण किया गया।

प्रश्न 34.
भारत में किस दशक को स्वायत्तता की माँग के दशक के रूप में देखा जाता है?
उत्तर:
भारत में 1980 के दशक को स्वायत्तता की माँग के दशक के रूप में देखा जाता है।

प्रश्न 35.
डी.एम. के. ने किस भाषा का विरोध किया?
उत्तर:
डी. एम. के. ने हिन्दी भाषा का विरोध किया।

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प्रश्न 36.
क्षेत्रवाद को रोकने के कोई दो उपाय बताइये।
उत्तर:
क्षेत्रवाद को रोकने के दो उपाय हैं।

  1. राष्ट्रीय नीति का निर्धारण करना तथा
  2. सांस्कृतिक एकीकरण के लिए प्रयास करना।

प्रश्न 37.
भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की माँग करते हुए जनआंदोलन कहाँ चले?
उत्तर:
आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात।

प्रश्न 38.
जम्मू और कश्मीर किन तीन सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों को मिलाकर बना है?
उत्तर:
जम्मू, कश्मीर और लद्दाख।

प्रश्न 39.
द्रविड़ आंदोलन का लोकप्रिय नारा क्या था?
उत्तर:
‘उत्तर हर दिन बढ़ता जाए, दक्षिण दिन – दिन घटता जाए’।

प्रश्न 40.
डी. एम. के. के संस्थापक कौन थे?
उत्तर”:
सी. अन्नादुरै।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
क्षेत्रवाद से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
क्षेत्रवाद: क्षेत्रवाद से अभिप्राय किसी भी देश के उस छोटे से क्षेत्र से है जो औद्योगिक, सामाजिक आदि कारणों से अपने पृथक् अस्तित्व के लिए जागृत है। क्षेत्रवाद केन्द्रीयकरण के विरुद्ध क्षेत्रीय इकाइयों को अधिक शक्ति व स्वायत्तता प्रदान करने के पक्ष में है।

प्रश्न 2.
क्षेत्रवाद के उदय के कोई दो कारण बताइए।
उत्तर:
क्षेत्रवाद के उदय के कारण – क्षेत्रवाद के उदय के कारण हैं।

  1. भाषावाद: भारत में सदैव ही अनेक भाषाएँ बोलने वालों ने कई बार अलग-अलग राज्य के निर्माण के लिए व्यापक आन्दोलन किया।
  2. जातिवाद: जिन क्षेत्रों में किसी एक जाति की प्रधानता रही है, वहीं पर क्षेत्रवाद का उग्र रूप देखने को मिलता है।

प्रश्न 3.
क्षेत्रवादी आन्दोलन से हमें क्या सबक मिलता है?
उत्तर:
क्षेत्रीय आन्दोलन से हमें

  1. यह सबक मिलता है कि क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोक राजनीति का अभिन्न अंग हैं तथा
  2. लोकतान्त्रिक वार्ता करके क्षेत्रीय आकांक्षाओं का हल निकालना चाहिए।

प्रश्न 4.
क्षेत्र पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
क्षेत्र-क्षेत्र उस भू-भाग को कहते हैं जिसके निवासी सामान्य भाषा, धर्म, परम्पराएँ, सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक विकास आदि की दृष्टि से भावनात्मक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हों। यह भूभाग सीमावर्ती राज्य, राज्य का एक या अधिक भाग भी हो सकते हैं। भारतीय संदर्भ में प्रान्तों तथा संघीय प्रदेश को क्षेत्र कहा जाता है।

प्रश्न 5.
अलगाववाद का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अलगाववाद: अलगाववाद से अभिप्राय एक राज्य से कुछ क्षेत्र को अलग-अलग करके स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की माँग है। अर्थात् सम्पूर्ण इकाई से अलग अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाए रखने की माँग अलगाववाद है। अलगाववाद का उदय उस समय होता है जब क्षेत्रवाद की भावना उग्र रूप धारण कर लेती है।

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प्रश्न 6.
भारत में अलगाववाद के दो उदाहरण बताइए।
उत्तर:
अलगाववाद के उदाहरण- भारत में अलगाववाद के उदाहरण हैं।

  1. 1960 में डी. एम. के. तथा अन्य तमिल दलों ने तमिलनाडु को भारत से अलग करवाने का आन्दोलन किया।
  2. असम के मिजो हिल के लिए जिले के लोगों ने भारत से अलग होने की माँग की और इस मांग को पूरा करवाने के लिए उन्होंने मिजो फ्रंट की स्थापना की।

प्रश्न 7.
अलगाववाद के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  1. राजनीतिक कारण: अलगाववाद की भावना को भड़काने में राजनीतिक दलों की संकीर्ण मनोवृत्ति को प्रमुख कारण माना जा सकता है।
  2. आर्थिक पिछड़ापन: असमान आर्थिक विकास और पिछड़ापन भी अलगाववाद को बढ़ावा देता है। पिछड़े क्षेत्रों में पृथकतावाद की भावना जन्म लेती है।

प्रश्न 8.
भारत और पाकिस्तान का मसला सुलझाने के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 21 अप्रैल, 1948 के प्रस्ताव में किन तीन चरणों वाली प्रक्रिया की अनुशंसा की?
उत्तर:
पाकिस्तान ने कश्मीर राज्य के बड़े हिस्से पर नियंत्रण जारी रखा इसलिए इस मामले को संयुक्त राष्ट्रसंघ में ले जाया गया। 21 अप्रेल, 1948 के अपने प्रस्ताव में निम्न तीन चरणों वाली प्रक्रिया की अनुशंसा की

  1. पाकिस्तान को अपने वे सारे नागरिक वापस बुलाने थे जो कश्मीर में घुस गए थे।
  2. भारत को धीरे-धीरे अपनी फौज कम करनी थी ताकि कानून व्यवस्था बनी रहे।
  3. स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से जनमत संग्रह कराया जाए।

प्रश्न 9.
भारत में क्षेत्रीय दलों के विकास के कोई दो कारण बताइए।
उत्तर:

  1. भारत एक विशाल देश है। इसकी बनावट में विभिन्नताएँ पाई जाती हैं। भौगोलिक विभिन्नता के कारण अलग-अलग क्षेत्रीय दल भी पाये जाते हैं।
  2. राजनीतिक दलों की महत्त्वाकांक्षी प्रवृत्ति व अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए क्षेत्रीय भावनाओं को अपने स्वार्थ के लिए प्रयोग करते हैं।

प्रश्न 10.
रामास्वामी नायकर ( अथवा पेरियार ) के जीवन का संक्षिप्त परिचय दीजिये।
उत्तर:
रामास्वामी नायकर का जन्म सन् 1879 में हुआ। वे पेरियार के नाम से प्रसिद्ध हुए। वे जाति विरोधी आंदोलन और द्रविड़ संस्कृति और पहचान के पुनः संस्थापक के रूप में प्रसिद्ध हुए। उन्होंने दक्षिण में ब्राह्मण विरोधी आंदोलन का नेतृत्व किया तथा द्रविड़ कषगम नामक संस्था स्थापित की।

प्रश्न 11.
डी. एम. के. दल पर संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
डी. एम. के. – डी. एम. के. तमिलनाडु का महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय दल है। वर्तमान समय में इस दल के अध्यक्ष करुणानिधि हैं। इस दल की स्थापना 1949 में चेन्नई में श्री सी. एम. अन्नादुराय ने की। डी. एम. के. का पूरा नाम द्रविड़ – मुनेत्र कषगम है। इसमें द्रविड़ शब्द द्रविड़ जाति का प्रतीक है, मुनेत्र का अर्थ है प्रगतिशीलता और कषगम का अर्थ है- संगठन।

प्रश्न 12.
तेलगूदेशम् पार्टी का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
तेलगूदेशम् पार्टी: तेलगूदेशम् पार्टी आन्ध्रप्रदेश का महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय दल है। इस दल के वर्तमान अध्यक्ष चन्द्रबाबू नायडू हैं। इस दल की स्थापना 1982 में फिल्म अभिनेता एन. टी. रामाराव ने की। तेलगूदेशम् पार्टी की स्थापना कांग्रेस शासन की प्रतिक्रियास्वरूप हुई। तेलगूदेशम विकेन्द्रित संघवाद का समर्थक है।

प्रश्न 13.
अन्ना डी. एम. के. पार्टी के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
अन्ना डी. एम. के. – अन्ना डी. एम. के. पार्टी भी तमिलनाडु का महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय दल है। इस दल की वर्तमान अध्यक्ष सुश्री जयललिता हैं। इस दल की स्थापना रामचन्द्रन ने 1972 में की। यह दल हिन्दी भाषा को दक्षिण के राज्यों पर थोपने के विरुद्ध है। यह दल द्विभाषा फार्मूला का समर्थन करता है।

प्रश्न 14.
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव का सिखों तथा देश पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के निम्न प्रभाव पड़े चलाया।

  1. इसके प्रभावस्वरूप अकाली दल ने पंजाब और पड़ौसी राज्यों के मध्य पानी के बँटवारे के मुद्दे पर आंदोलन
  2. इसके प्रभावस्वरूप स्वायत्त सिख पहचान की बात उठी।
  3. इसके प्रभावस्वरूप ही चरमपंथी सिखों ने भारत से अलग होकर खालिस्तान की माँग की।

प्रश्न 15.
1980 में अकाली दल की प्रमुख मांगों का संक्षिप्त उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. चण्डीगढ़ को पंजाब की राजधानी बनाया जाए।
  2. दूसरे राज्यों के पंजाबी भाषी क्षेत्रों को पंजाब में मिलाया जाए।
  3. पंजाब का औद्योगिक विकास किया जाए।
  4. भाखड़ा नांगल योजना पंजाब के नियन्त्रणाधीन हो।
  5. देश के सभी गुरुद्वारे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्ध कमेटी के प्रबन्ध में हों।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

प्रश्न 16.
ऑपरेशन ब्लू स्टार से क्या आशय है?
उत्तर:
ऑपरेशन ब्लू स्टार: 1980 के दशक में पंजाब में सन्त भिण्डरावाले ने स्वर्ण मन्दिर को अपने कब्जे में लेकर वहाँ पर अस्त्र-शस्त्र एकत्र करना शुरू कर दिये जिसके कारण श्रीमती इन्दिरा गाँधी की सरकार को भिण्डरावाले के विरुद्ध ऑपरेशन ब्लू स्टार के अन्तर्गत कार्यवाही करनी पड़ी। सरकार ने स्वर्ण मन्दिर में सेना भेजकर उसे भिण्डरावाला से मुक्त करवाया।

प्रश्न 17.
1985 के पंजाब समझौते के किन्हीं दो महत्त्वपूर्ण पक्षों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. एक सितम्बर, 1982 के बाद हुई किसी कार्यवाही के दौरान आन्दोलन में मारे गये लोगों को अनुग्रह राशि के भुगतान के साथ-साथ सम्पत्ति की क्षति के लिए मुआवजा दिया जायेगा।
  2. दिल्ली में नवम्बर में हुए दंगों की जाँच कर रहे रंगनाथ मिश्र आयोग का कार्यक्षेत्र बढ़ाकर उसमें बोकारो और में उपद्रवों की जांच को भी शामिल किया जायेगा।

प्रश्न 18.
सिख विरोधी दंगे कब और क्यों हुए?
उत्तर:
सिख विरोधी दंगे 1984 में हुए। यह दंगे 31 अक्टूबर, 1984 में श्रीमती गांधी की हत्या के विरोध में हुए जिसमें 2000 से अधिक सिख स्त्री-पुरुष व बच्चे मारे गये। इन दंगों से देश की एकता व अखण्डता के लिए खतरा उत्पन्न हो गया। इसलिए राजीव गांधी ने पंजाब में शान्ति बनाये रखने के लिए अकाली नेताओं से समझौता किया जिसे पंजाब समझौता कहा जाता है।

प्रश्न 19.
नेशनल कान्फ्रेंस के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
नेशनल कान्फ्रेंस: नेशनल कान्फ्रेंस जम्मू-कश्मीर का महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय दल है। इस दल के वर्तमान अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला हैं। इस दल की स्थापना 1920 में हुई। नेशनल कान्फ्रेंस धारा 370 को बनाये रखने के पक्ष में है। तथा जम्मू-कश्मीर को और अधिक स्वायत्तता देने के पक्ष में है। इस पार्टी ने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को स्थायी माना है।

प्रश्न 20.
1980 के दशक में पंजाब एवं असम संकट में एक समानता एवं एक असमानता बताइए।
उत्तर:

  1. समानता: 1980 के दशक में पंजाब एवं असम में होने वाले दोनों संकट क्षेत्रीय स्तर के थे।
  2. असमानता: पंजाब संकट केवल एक धर्म एवं समुदाय से सम्बन्धित था, जबकि असम संकट अलग धर्मों एवं समुदायों से सम्बन्धित था।

प्रश्न 21.
क्षेत्रवाद राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती है। समझाइये|
उत्तर:
संकीर्ण क्षेत्रवाद राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती बन जाता है। क्षेत्रवाद के फलस्वरूप विभिन्न क्षेत्र के लोग कभी प्रादेशिक भाषा, कभी राजनीतिक स्वशासन, कभी क्षेत्रीय स्वार्थ को लेकर पृथक् राज्य की माँग करने लगते हैं, जो राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती होती है।

प्रश्न 22.
नये राज्यों के निर्माण के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
नये राज्यों के निर्माण के पक्ष में तर्क।

  1. पिछड़े क्षेत्रों का विकास तीव्र गति से होने लगता है।
  2. लोगों की शासन में सहभागिता बढ़ती है।
  3. राजनीतिक चेतना का विकास होता है।
  4. केन्द्रीय शासन के प्रशासनिक दबाव से मुक्ति मिल जाती है।
  5. नये राज्यों का गठन राष्ट्रविरोधी गतिविधि नहीं है।

प्रश्न 23.
नये राज्यों के निर्माण के विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
नये राज्यों के निर्माण के विपक्ष में तर्क।

  1. नये राज्यों की माँग विभिन्न क्षेत्रों में संघर्ष तथा तनाब पैदा करती है।
  2. पिछड़े क्षेत्रों का विकास नये राज्यों के गठन मात्र से सम्भव नहीं है।
  3. नये राज्यों के गठन से अनावश्यक प्रशासनिक तन्त्र में वृद्धि होती है।
  4. नये राज्यों के गठन से क्षेत्रवाद की भावना को बल मिलता है।

प्रश्न 24.
द्रविड आन्दोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालिए द्रविड़ आन्दोलन।
उत्तर:
द्रविड आन्दोलन की बागडोर तमिल समाज सुधारक ई.वी. रामा स्वामी नायकर ‘पेरियार’ के हाथों में थी। इस आन्दोलन से एक राजनीतिक संगठन ‘द्रविड – कषगम’ का सूत्रपात हुआ। यह संगठन ब्राह्मणों के वर्चस्व तथा हिन्दी का विरोध करता था तथा उत्तरी भारत के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व को नकारते हुए क्षेत्रीय गौरव की प्रतिष्ठा पर जोर देता था। प्रारम्भ में द्रविड आन्दोलन समग्र दक्षिण भारतीय सन्दर्भ में अपनी बात रखता था लेकिन अन्य दक्षिणी राज्यों से समर्थन न मिलने के कारण धीरे-धीरे तमिलनाडु तक ही सिमट कर रह गया। बाद में द्रविड कषगम दो धड़ों में बँट गया और आन्दोलन की समूची राजनीतिक विरासत द्रविड मुनेत्र कषगम के पाले में केन्द्रित हो गयी।

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प्रश्न 25.
क्षेत्रवाद क्या है? यह भारत की राज्य व्यवस्था को किस प्रकार प्रभावित करता है?
उत्तर:
क्षेत्रवाद: क्षेत्रवाद का अर्थ किसी ऐसे छोटे से क्षेत्र से है जो भाषायी धार्मिक, भौगोलिक, सामाजिक अथवा ऐसे ही अन्य कारक के आधार पर अपने पृथक् अस्तित्व के लिए प्रयत्नशील है। इस प्रकार क्षेत्रवाद से अभिप्राय है राज्य की तुलना में किसी क्षेत्र विशेष से लगाव| क्षेत्रवाद के प्रभाव: भारत की राज्य व्यवस्था को क्षेत्रवाद निम्न प्रकार से प्रभावित करता है।

  1. क्षेत्रवाद के आधार पर राज्य केन्द्र सरकार से सौदेबाजी करते हैं।
  2. क्षेत्रवाद ने कुछ हद तक भारतीय राजनीति में हिंसक गतिविधियों को उभारा है।
  3. चुनावों के समय क्षेत्रवाद के आधार पर राजनीतिक दल उम्मीदवारों का चुनाव करते हैं और क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काकर वोट प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं।
  4. मन्त्रिमण्डल का निर्माण करते समय मन्त्रिमण्डल में प्रायः सभी मुख्य क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को लिया जाता है।

प्रश्न 26. भारत में क्षेत्रवाद के उदय के चार कारण बताइये।
उत्तर:
क्षेत्रवाद के कारण: क्षेत्रवाद के उदय के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं।

  1. आर्थिक असन्तुलन:क्षेत्र विशेष के लोगों की यह धारणा है कि पिछड़ेपन के कारण उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है तथा उनके आर्थिक विकास की उपेक्षा की जा रही है, यह भावना भी क्षेत्रवाद को बढ़ावा देती है।
  2. भाषागत विभिन्नताएँ: भारत में भाषा के आधार पर अनेक राज्यों का निर्माण हुआ है।
  3. राज्यों के आकार में असमानता: राज्यों का विशाल आकार भी क्षेत्रवाद को बढ़ावा देता है।
  4. प्रशासनिक कारण: प्रशासनिक कारणों से भी विभिन्न राज्यों की प्रगति में अन्तर रहा है, पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा भी राज्यों का समान विकास नहीं हुआ। यह अन्तर भी क्षेत्रवाद को बढ़ावा देता है।

प्रश्न 27.
संविधान की धारा 370 क्या है? इस प्रावधान का विरोध क्यों हो रहा है?
उत्तर:
संविधान की धारा 370: कश्मीर को संविधान में धारा 370 के तहत विशेष दर्जा दिया गया है। धारा 370 के अन्तर्गत जम्मू-कश्मीर को भारत के अन्य राज्यों के मुकाबले अधिक स्वायत्तता दी गई है। राज्य का अपना संविधान है। धारा 370 का विरोध: धारा 370 का विरोध लोगों का एक समूह इस आधार पर कर रहा है कि जम्मू-कश्मीर राज्य को धारा 370 के अन्तर्गत विशेष दर्जा देने से यह भारत के साथ नहीं जुड़ पाया है। अतः धारा 370 को समाप्त कर जम्मू-कश्मीर राज्य को भी अन्य राज्यों के समान होना चाहिए।

प्रश्न 28.
क्षेत्रीय असन्तुलन से आप क्या समझते हैं? भारतीय राजनीतिक व्यवस्था पर इसके प्रभावों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
क्षेत्रीय असन्तुलन: क्षेत्रीय असन्तुलन का अर्थ यह है कि भारत के विभिन्न राज्यों तथा क्षेत्रों का विकास एक जैसा नहीं है। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के विकास स्तर और लोगों के जीवन स्तर में पाये जाने वाले अन्तर को क्षेत्रीय असन्तुलन का नाम दिया जाता है। क्षेत्रीय असन्तुलन के प्रभाव: क्षेत्रीय असन्तुलन भारतीय लोकतन्त्र पर मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रभाव डाल रहा

  1. पिछड़े क्षेत्रों में असन्तुष्टता की भावना बड़ी तेजी से बढ़ रही है।
  2. क्षेत्रीय असन्तुलन से क्षेत्रवाद की भावना को बल मिला है।
  3. क्षेत्रीय असन्तुलन ने अनेक क्षेत्रीय दलों को जन्म दिया है।
  4. क्षेत्रीय असन्तुलन से पृथकतावाद तथा आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा मिला है।

प्रश्न 29.
भारत में क्षेत्रीय असन्तुलन के प्रमुख कारणों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
क्षेत्रीय असन्तुलन के कारण: भारत में क्षेत्रीय असन्तुलन के प्रमुख कारण अग्रलिखित हैं।

  1. भौगोलिक विषमताओं ने क्षेत्रीय असन्तुलन पैदा किया है। परिस्थितियों के कारण भारत में एक ओर राजस्थान जैसा मरुस्थल है। जो कम उपजाऊ है तो दूसरी ओर पंजाब जैसे उपजाऊ क्षेत्र हैं।
  2. भाषा की विभिन्नता ने क्षेत्रीय असन्तुलन को बढ़ावा दिया है।
  3. ब्रिटिश सरकार ने कुछ क्षेत्रों का विकास किया और कुछ का नहीं किया, जिससे क्षेत्रीय असन्तुलन पैदा हुआ।
  4. क्षेत्रीय असन्तुलन का एक महत्त्वपूर्ण कारण नेताओं की अपने निर्वाचन क्षेत्र के विकास पर अधिक बल देने की प्रवृत्ति भी है।

प्रश्न 30.
क्षेत्रीय असन्तुलन को दूर करने के सुझाव दीजिए।
उत्तर:
क्षेत्रीय असन्तुलन को दूर करने के उपाय: क्षेत्रीय असन्तुलन को दूर करने हेतु निम्नलिखित सुझाव दिये जा सकते हैं।

  1. पिछड़े हुए क्षेत्रों के विकास के लिए विशेष प्रयास किए जाएँ। पिछड़े क्षेत्रों में विशेषकर बिजली, यातायात व संचार के साधनों का विकास किया जाए।
  2. पिछड़े लोगों व जन-जातियों के विकास के लिए विशेष कदम उठाए जाएँ।
  3. जो प्रशासनिक अधिकारी आदिवासी क्षेत्रों में नियुक्त किए जाएँ उन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया जाए और उन्हीं को नियुक्त किया जाए जो इन क्षेत्रों के बारे में थोड़ा-बहुत ज्ञान भी रखते हों।
  4. केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में सभी क्षेत्रों को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए।

प्रश्न 31.
क्षेत्रीय असन्तुलन क्षेत्रवाद का जनक है। व्याख्या कीजिए।
अथवा
क्षेत्रीय असन्तुलन भारत में क्षेत्रवाद का प्रमुख कारण है। समझाइये
उत्तर:
क्षेत्रीय असन्तुलन क्षेत्रवाद के जनक के रूप में – क्षेत्रीय असन्तुलन से अभिप्राय विभिन्न क्षेत्रों के बीच प्रति व्यक्ति आय, साक्षरता दरों, स्वास्थ्य और चिकित्सा सेवाओं की उपलब्धता, औद्योगीकरण का स्तर आदि के आधार पर अन्तर पाया जाना है। भारत में विभिन्न राज्यों के बीच बड़े पैमाने पर असन्तुलन पाया जाता है। क्षेत्रीय असन्तुलन ने भारत में निम्न रूप में क्षेत्रवाद को पैदा किया है।

  1. क्षेत्रीय विभिन्नताओं एवं असन्तुलन के कारण क्षेत्रीय भेदभाव को बढ़ावा मिला है।
  2. भारत में क्षेत्रीय असन्तुलन के कारण क्षेत्रवादी भावनाओं को बल मिला है। इसके कारण कई क्षेत्रों ने पृथक् राज्य की मांग की है।
  3. क्षेत्रीय असन्तुलन ने क्षेत्रवादी हिंसा, आन्दोलनों व तोड़-फोड़ को बढ़ावा दिया है।
  4. अनेक क्षेत्रीय दल क्षेत्रीय असन्तुलन के कारण ही बने हैं जो अब क्षेत्रवाद को बढ़ावा दे रहे हैं।

प्रश्न 32.
भारत में दबाव की प्रक्रिया के रूप में क्षेत्रवाद की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारत में दबाव की प्रक्रिया के रूप में क्षेत्रवाद की भूमिका- भारत में दबाव की प्रक्रिया के रूप में क्षेत्रवाद को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है।

  1. दबाव की प्रक्रिया के रूप में क्षेत्रवाद एक सीमा तक भारत के विकास में गति प्रदान करता है। क्षेत्रवादी नेतृत्व सत्ता में रहकर अपने राज्यों के विकास के लिए विशेष प्रयत्न करता है। तमिलनाडु, पंजाब व हरियाणा इसके प्रमाण हैं।
  2. दबाव की प्रक्रिया के रूप में क्षेत्रवाद अनेक बार पूर्ण या पृथक् राज्य की मांग के रूप में उभरता है। इसके कारण अनेक आन्दोलन हुए और अनेक पृथक् राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, गुजरात, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा आदि का जन्म हुआ।
  3. दबाव की प्रक्रिया की भूमिका में क्षेत्रवाद का एक अन्य रूप अन्तर्राज्यीय नदी विवादों के रूप में सामने आया है। कावेरी, रावी, व्यास नदियों का पानी आदि इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

प्रश्न 33.
” क्षेत्रवाद का अभिप्राय पृथकतावाद नहीं है ।” व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
क्षेत्रवाद क्षेत्रीय असन्तुलन का परिणाम है। क्षेत्रीय हितों के संरक्षण हेतु यह लोकतंत्र की प्राणवायु है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में काफी समय से अनेक क्षेत्रवादी आंदोलन चल रहे हैं। ये आंदोलन अपने क्षेत्र को भारतीय संघ में एक अलग राज्य की माँग करते हैं। झारखण्ड, छत्तीसगढ़ के क्षेत्रवादी आंदोलन इसी तरह के थे। क्षेत्रवादी आंदोलन अपने क्षेत्र में आर्थिक विकास की गति को तेज करना चाहते हैं तथा अपनी सांस्कृतिक भाषायी पहचान भी बनाए रखना चाहते हैं। इस प्रकार क्षेत्रवाद का अभिप्राय पृथकतावाद नहीं है।

प्रश्न 34.
लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भारत ने विविधता के सवाल पर लोकतांत्रिक दृष्टिकोण को अपनाया। लोकतंत्र में क्षेत्रीय आकांक्षाओं की राजनीतिक अभिव्यक्ति की अनुमति है और लोकतंत्र क्षेत्रीयता को राष्ट्र-विरोधी नहीं मानता। लोकतांत्रिक राजनीति में इस बात के पूरे अवसर होते हैं कि विभिन्न दल और समूह क्षेत्रीय पहचान, आकांक्षा अथवा किसी खास क्षेत्रीय समस्या को आधार बनाकर लोगों की भावनाओं की नुमाइंदगी करें। इस तरह लोकतांत्रिक राजनीति की प्रक्रिया में क्षेत्रीय आकांक्षाएँ और बलवती होती हैं। लोकतांत्रिक राजनीति का एक अर्थ यह भी है कि क्षेत्रीय मुद्दों और समस्याओं पर नीति-निर्माण की प्रक्रिया में समुचित ध्यान दिया जाएगा और उन्हें इसमें भागीदारी दी जाएगी।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

प्रश्न 35.
जम्मू और कश्मीर के सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों के बारे में बताइए।
उत्तर:
जम्मू और कश्मीर तीन सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों: जम्मू, कश्मीर और लद्दाख से बना हुआ है।

  1. जम्मू: इस क्षेत्र में छोटी पहाड़ियाँ और मैदानी भाग हैं। इसमें मुख्य रूप से हिन्दू रहते हैं। मुसलमान, सिख और अन्य मतों के लोग भी रहते हैं।
  2. कश्मीर: यह क्षेत्र मुख्य रूप से कश्मीर घाटी है। यहाँ रहने वाले अधिकतर कश्मीरी मुसलमान हैं और शेष हिन्दू, सिख, बौद्ध तथा अन्य हैं।
  3. लद्दाख: यह पहाड़ी क्षेत्र है। इसकी जनसंख्या बहुत कम है, जिसमें बराबर संख्या में बौद्ध और मुसलमान रहते हैं।

प्रश्न 36.
कश्मीरियत से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जम्मू और कश्मीर एक राजसी रियासत थी। यहाँ हिन्दू राजा हरिसिंह का शासन था। हरिसिंह भारत या पाकिस्तान में न शामिल होकर अपना स्वतंत्र राष्ट्र बनाना चाहते थे। पाकिस्तानी नेताओं के अनुसार कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा है क्योंकि वहाँ अधिकांश आबादी मुसलमान थी। परंतु उस रियासत के लोगों ने इसे इस तरह नहीं देखा उन्होंने सोचा कि सबसे पहले वे कश्मीरी हैं। क्षेत्रीय अभिलाषा का यह मुद्दा कश्मीरियत कहलाता है।

प्रश्न 37.
पंजाब समझौते के मुख्य प्रावधानों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
पंजाब समझौता: पंजाब समझौते के महत्त्वपूर्ण प्रावधान निम्न हैं।

  1. मारे गये निरपराध व्यक्तियों के लिए मुआवजा: एक सितम्बर, 1982 के बाद हुई किसी कार्यवाही में आन्दोलन में मारे गये लोगों को अनुग्रह राशि के भुगतान के साथ सम्पत्ति की क्षति के लिए मुआवजा दिया जायेगा।
  2. सेना में भर्ती: देश के सभी नागरिकों को सेना में भर्ती का अधिकार होगा और चयन के लिए केवल योग्यता ही आधार होगा।
  3. नवम्बर दंगों की जाँच: दिल्ली में नवम्बर में हुए दंगों की जांच कर रहे रंगनाथ मिश्र आयोग का कार्यक्षेत्र बढ़ाकर उसमें बोकारो और कानपुर में हुए उपद्रवों की जाँच को शामिल किया जायेगा।
  4. सेना से निकाले हुए व्यक्तियों का पुनर्वास – सेना से निकाले हुए व्यक्तियों को पुनर्वास और उन्हें लाभकारी रोजगार दिलाने के प्रयास किये जायेंगे।

प्रश्न 38.
असम समझौता क्या था और इसके क्या परिणाम हुए?
उत्तर:
असम समझौता: 1985 में प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और आसू के बीच एक समझौता हुआ जिसमें यह तय किया गया कि जो लोग बांग्लादेश युद्ध के दौरान या उसके बाद के वर्षों में असम आए हैं, उनकी पहचान की जाएगी और . उन्हें वापस भेजा जायेगा। समझौते के परिणाम: समझौते के निम्न प्रमुख परिणाम निकले

  1. समझौते के बाद ‘आसू’ और असम-गण-संग्राम परिषद् ने साथ मिलकर ‘असम-गण- क्षेत्रीय राजनीतिक दल बनाया।
  2. असम गण परिषद् 1985 में इस वायदे के साथ सत्ता में आया कि विदेशी लोगों की समस्या का समाधान कर लिया जायेगा।
  3. असम समझौते से प्रदेश में शान्ति कायम हुई तथा प्रदेश की राजनीति का चेहरा बदल गया।

प्रश्न 39.
शेख अब्दुल्ला के जीवन के कुछ प्रमुख पहलुओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
शेख अब्दुल्ला:
शेख अब्दुल्ला का जन्म 1905 में हुआ। वे भारतीय स्वतन्त्रता से पूर्व ही जम्मू एवं कश्मीर के नेता के रूप में उभरे। वे जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता दिलाने के साथ-साथ वहाँ धर्मनिरपेक्षता की स्थापना के समर्थक थे। उन्होंने राजशाही के विरुद्ध राज्य में जन-आन्दोलन का नेतृत्व किया। वे धर्मनिरपेक्षता के आधार पर जीवन भर पाकिस्तान का विरोध करते रहे। वे नेशनल कान्फ्रेंस के संगठनकर्ता और प्रमुख नेता थे।

वे भारत में जम्मू-कश्मीर के विलय के उपरान्त जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री (1947 में) बने। उनके मन्त्रिमण्डल को भारत सरकार की कांग्रेस सरकार ने 1953 में बर्खास्त कर दिया था तभी से 1968 तक उन्हें कारावास में ही रखा। 1974 में इन्दिरा गाँधी की कांग्रेस सरकार से समझौता हुआ। वे राज्य के मुख्यमन्त्री पद पर आरूढ़ हुए। 1982 में उनका देहान्त हो गया।

प्रश्न 40.
लालडेंगा का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
लालडेंगा-लालडेंगा का जन्म 1937 में हुआ। वे मिजो नेशनल फ्रंट के संस्थापक और सबसे ख्याति प्राप्त नेता थे। 1959 में मिजोरम में पड़े भयंकर अकाल और उस समय की असम सरकार द्वारा उस समय के अकाल की समस्या के समाधान में विफल होने के कारण वे देश-विद्रोही बन गए। वे अनेक वर्षों तक भारत के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष करते रहे। यह संघर्ष लगभग बीस वर्षों तक चला। वे पाकिस्तान में एक राज्य शरणार्थी के रूप में रहते हुए भी भारत विरोधी गतिविधियाँ चलाते रहे।

अंत में वे प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के बुलाने पर स्वदेश लौटे और 1986 में राजीव गाँधी के साथ उन्होंने सुलह की और दोनों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किये और मिजोरम को नया राज्य बनाया गया। लालडेंगा नवनिर्मित मिजोरम के मुख्यमन्त्री बने। 1990 में उनका निधन हो गया।

प्रश्न 41.
राजीव गाँधी का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
राजीव गाँधी फिरोज गाँधी और इन्दिरा गाँधी के पुत्र थे। उनका जन्म 1944 में हुआ। 1980 के बाद वे देश की सक्रिय राजनीति में शामिल हुए। अपनी माँ इन्दिरा गाँधी की हत्या के बाद वे राष्ट्रव्यापी सहानुभूति के वातावरण में भारी बहुमत से 1984 में देश के प्रधानमंत्री बने और 1989 के बीच वह प्रधानमंत्री पद पर रहे। उन्होंने पंजाब में आतंकवाद के विरुद्ध उदारपंथी नीतियों के समर्थक लोंगोवाल से समझौता किया।

उन्हें मिजो विद्रोहियों और असम के छात्र संघों में समझौता करने में सफलता मिली। राजीव देश में उदारवाद या खुली अर्थव्यवस्था एवं कंप्यूटर प्रौद्योगिकी के प्रणेता थे। श्रीलंका नक्सलीय समस्या को सुलझाने के लिए उन्होंने भारतीय शांति सेना को श्रीलंका भेजा। संभवत: ऐसा माना जाता है कि श्रीलंका के विद्रोही तमिल संगठन (एल.टी.टी.ई.) ने आत्मघाती हमले द्वारा 1991 में उनकी हत्या कर दी।

प्रश्न 42.
गोवा को संघ शासित प्रदेश तथा पूर्ण राज्य का दर्जा किस प्रकार प्राप्त हुआ? संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा: 1961 में पुर्तगालियों से गोवा को मुक्त कराने के बाद महाराष्ट्रवादी पार्टी ने गोवा को महाराष्ट्र में मिलाने की माँग रखी जबकि यूनाइटेड गोअन पार्टी ने गोवा को स्वतन्त्र या पृथक् राज्य बनाने की माँग की। फलतः 1967 की जनवरी में केन्द्र सरकार ने गोवा में एक विशेष जनमत सर्वेक्षण कराया। इसमें गोवा के लोगों से पूछा गया कि आप लोग महाराष्ट्र में शामिल होना चाहते हैं अथवा अलग बने रहना चाहते हैं। भारत में यही एकमात्र अवसर था जब किसी मसले पर सरकार ने जनमत की इच्छा को जानने के लिए जनमत संग्रह जैसी प्रक्रिया अपनायी थी। अधिकतर लोगों ने महाराष्ट्र से अलग रहने के पक्ष में मत डाला। इस तरह गोवा संघ शासित प्रदेश बना रहा। अन्ततः 1987 में गोवा भारत संघ का एक राज्य बना।

प्रश्न 43.
1980 के दशक में उत्पन्न पंजाब और असम संकट के बीच एक समानता और एक अन्तर बताइये।
उत्तर:
पंजाब व असम संकट के बीच समानता: 1980 के दशक में पंजाब और असम दोनों में भाषा के आधार पर नवीन राज्य गठन की माँग उठाई गई। इसके तहत पंजाबी और हिन्दी भाषा के आधार पर पंजाब का तीन राज्यों- पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में विभाजन हुआ। इसी प्रकार असम भी क्षेत्रीय भाषाओं के आधार पर क्रमशः नगालैंड, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश व मिजोरम और असम सात राज्यों में विभाजित हुआ। पंजाब व असम के विभाजन के बीच अन्तर: पंजाब, हरियाणा व हिमाचल प्रदेश की मांग पूर्णत: भाषा पर आधारित थी जबकि असम से पृथक् हुए राज्यों का आधार भाषा के साथ-साथ संस्कृति और क्षेत्रीय परिवेश भी थे।

प्रश्न 44.
भारत में पूर्वोत्तर की क्षेत्रीय आकांक्षा स्वायत्तता की माँग रही है ।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारत में पूर्वोत्तर में स्वायत्तता की माँग भारत में पूर्वोत्तर की क्षेत्रीय आकांक्षा स्वायत्तता की माँग रही है। स्वतंत्रता के समय मणिपुर और त्रिपुरा को छोड़कर पूर्वोत्तर का सारा हिस्सा असम कहलाता था। इस क्षेत्र के गैर असमी लोगों को जब लगा कि असम सरकार उन पर असमी भाषा थोप रही है तो इस क्षेत्र से राजनीतिक स्वायत्तता की माँग उठी। 1970 के दशक में पूरे राज्य में असमी भाषा लादने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और दंगे हुए।

इन्होंने ‘आल पार्टी हिल्स कांफ्रेंस’ का गठन किया और माँग की कि असम से अलग जनजातीय राज्य बनाये जाएं। अन्ततः केन्द्र सरकार ने असम को बाँट कर मेघालय, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश बनाया तथा त्रिपुरा और मणिपुर को भी राज्य का दर्जा दिया करबी और दिमसा समुदायों को जिला परिषद् के अन्तर्गत स्वायत्तता दी गई तथा बोड़ो जनजाति को स्वायत्त परिषद् का दर्जा दिया गया।

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प्रश्न 45.
मास्टर तारा सिंह का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
मास्टर तारा सिंह: मास्टर तारा सिंह 1885 में जन्मे। वे युवा अवस्था में ही प्रमुख सिख धार्मिक एवं राजनैतिक नेता के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त कर सके। वे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्ध कमेटी (एस.पी.डी.) के शुरुआती नेताओं में से एक थे। उन्हें इतिहास में अकाली आन्दोलन के सबसे महान नेता के रूप में याद किया जाता है। वे देश की स्वतन्त्रता आन्दोलन के समर्थक, ब्रिटिश सत्ता के विरोधी थे लेकिन उन्होंने केवल मुसलमानों के साथ समझौते की कांग्रेस
नीति का डटकर विरोध किया। वे देश की आजादी के बाद अलग पंजाबी राज्य के निर्माण के समर्थक रहे। 1967 में उनका निधन हो गया।

प्रश्न 46.
कश्मीर का भारत में विलय किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
अक्टूबर 1947 में, पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जा करने के लिए अपनी तरफ से कबायली घुसपैठिए भेजे। इसने महाराजा को भारतीय सैनिक सहायता लेने के लिए बाध्य किया। भारत ने सैनिक सहायता दी और कश्मीर घाटी से. घुसपैठियों को वापस खदेड़ दिया, परंतु भारत ने सहायता देने से पहले महाराजा से विलय प्रपत्र पर हस्ताक्षर करवा लिये। इस प्रकार कश्मीर का भारत में विलय हुआ।

प्रश्न 47.
भारत सरकार ने सन् 2000 में कौनसे तीन नये राज्यों का गठन किया? इनके गठन का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए। नये राज्यों के निर्माण के दो उद्देश्य बताइये|
अथवा
उत्तर:
नये राज्यों के निर्माण के उद्देश्य: भारत सरकार ने सन् 2000 में उत्तरांचल (उत्तराखण्ड), झारखण्ड और छत्तीसगढ़ नामक तीन नये राज्यों का गठन किया। इन राज्यों के गठन के प्रमुख उद्देश्य निम्न हैं।
1. ऐतिहासिक कारण: स्वतन्त्र भारत में विभिन्न देशी रियासतों और प्रान्तों को मिलाकर राज्यों का पुनर्गठन किया गया था। लेकिन कुछ रियासतों को यह महसूस होता था कि यदि उनका पृथक् अस्तित्व रहता तो वे न केवल अपनी मौलिक संस्कृति तथा क्षेत्रीय विशिष्टता को बनाये रखते बल्कि सीमित क्षेत्र होने के कारण उनका विकास भी बेहतर और तीव्र गति से सम्भव हो पाता।

2. राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएँ: स्थानीय नेताओं और राजनीतिक दलों ने अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए जनता को उज्ज्वल भविष्य के नाम पर पृथक् राज्य निर्माण के लिए भड़काया।

प्रश्न 48.
भारत में सिक्किम का विलय किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
भारत में सिक्किम का विलय: स्वतंत्रता के समय सिक्किम भारत का अंग तो नहीं था लेकिन उसकी रक्षा और विदेशी मामलों का जिम्मा भारत सरकार का था और वहाँ के आंतरिक प्रशासन की बागडोर यहाँ के राजा चोग्याल के हाथों में थीं। लेकिन सिक्किम के राजा स्थानीय जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को संभाल नहीं सके। वहाँ की नेपाली मूल की जनता में यह भाव घर कर गया कि चोग्याल अल्पसंख्यक लेवचा भूटिया के छोटे से अभिजन तबके का शासन उन पर लाद रहा है। 1975 में अप्रैल में भारत के साथ सिक्किम के पूर्ण विलय का एक प्रस्ताव सिक्किम विधानसभा ने पारित किया। इस प्रस्ताव के बाद सिक्किम में जनमत संग्रह कराया गया जिसमें जनता ने प्रस्ताव के पक्ष में मुहर लगा दी। भारत सरकार ने सिक्किम विधानसभा के अनुरोध को तुरन्त मान लिया तथा सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बन गया।

प्रश्न 49.
भारत में मणिपुर के विलय को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारत में मणिपुर का विलय: वर्तमान में पूर्वोत्तर क्षेत्र में सात राज्य हैं। असम, मेघालय, मिजोरम, नगालैण्ड, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और मणिपुर। इन सात राज्यों को ‘सात बहनें’ कहा जाता है। 1947 के भारत विभाजन से पूर्वोत्तर के इलाके भारत के शेष भागों से एकदम अलग-थलग पड़ गये। अलग-थलग पड़ जाने के कारण इस इलाके में विकास नहीं हो सका। स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय मणिपुर भी ब्रिटिश शासन के अधीन था। 15 अक्टूबर, 1949 को भारतीय संघ में भाग ‘ग’ के राज्य के रूप में शामिल हुआ। इसके बाद 1963 में केन्द्र शासित प्रदेश अधिनियम के अन्तर्गत विधानसभा गठित की गयी। 21 जनवरी, 1972 को मणिपुर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया।

प्रश्न 50.
संत हरचंद सिंह लोंगोवाल का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
हरचंद सिंह का जन्म 1932 में हुआ था। ये सिखों के धार्मिक एवं राजनीतिक नेता थे। इन्होंने छठे दशक के दौरान राजनीतिक जीवन की शुरुआत अकाली नेता के रूप में की। 1980 में अकाली दल के अध्यक्ष बने। इन्होंने अकालियों की प्रमुख माँगों को लेकर प्रधानमंत्री राजीव गाँधी से समझौता किया। 1985 में एक अज्ञात युवक ने इनकी हत्या कर दी।

प्रश्न 51.
अंगमी जापू फिजो कौन थे? संक्षेप में परिचय दीजिए।
उत्तर:
अंगमी जापू फिजो का जन्म 1904 में हुआ था। वे पूर्वोत्तर भारत में नागालैंड की आजादी के आंदोलन के नेता के रूप में प्रसिद्ध हुए। वे नागा नेशनल काउंसिल के अध्यक्ष बने। उन्होंने नागालैंड को भारत से अलग देश बनाने के लिए भारत सरकार के विरुद्ध अनेक वर्षों तक सशस्त्र संघर्ष चलाया। वे भूमिगत हो गए और पाकिस्तान में शरण ली अपने जीवन के अंतिम तीन वर्ष ब्रिटेन में गुजारें। 1990 में इनका निधन हो गया।

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प्रश्न 52.
1990 के दशक के मध्यवर्ती वर्षों में पंजाब में किस प्रकार शांति आई? इसके अच्छे परिणाम क्या थे?
उत्तर:
यद्यपि 1992 में पंजाब राज्य में आम चुनाव हुए लेकिन गुस्से में आई जनता ने मतदान में सहयोग नहीं दिया। महज 24 फीसदी मतदाता वोट डालने आए। हालाँकि उग्रवाद को सुरक्षा बलों ने दबा दिया था परंतु पंजाब के लोगों ने, चाहे वे सिख हों या हिन्दू, इस क्रम में अनेक कष्ट और यातनाएँ सहीं। 1990 के दशक के मध्यवर्ती वर्षों में पंजाब में शांति बहाल हुई। इसके पश्चात् 1997 में अकाली दल और भाजपा के गठबंधन को बड़ी विजय मिली। उग्रवाद के खात्मे के बाद के दौर में यह पंजाब का पहला चुनाव था। राज्य में एक बार फिर आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन के सवाल प्रमुख हो उठे। हालांकि धार्मिक पहचान यहाँ की जनता के लिए लगातार प्रमुख बनी हुई है लेकिन राजनीति अब धर्मनिरपेक्षता की राह पर चल पड़ी है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सिक्किम का भारत में विलय किस प्रकार हुआ? विस्तार में लिखिए।
उत्तर:
आजादी के समय सिक्किम को भारत की ‘शरणागति’ प्राप्त थी। इसका मतलब यह था कि सिक्किम भारत का अंग नहीं था लेकिन वह पूरी तरह संप्रभु राष्ट्र भी नहीं था। सिक्किम की रक्षा और विदेशी मामलों का जिम्मा भारत सरकार का था जबकि सिक्किम के आंतरिक प्रशासन की बागडोर यहाँ के राजा चोग्याल के हाथों में थी। यह व्यवस्था टिक नहीं पायी क्योंकि सिक्किम के राजा स्थानीय जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को संभाल नहीं सके। यहाँ की आबादी में एक बड़ा हिस्सा नेपालियों का था। नेपाल मूल की जनता के मन में यह भाव घर कर गया कि चोग्याल अल्पसंख्यक लेपचा-भूटिया के एक छोटे से अभिजन तबके का शासन उन पर लाद रहा है। चोग्याल विरोधी दोनों समुदायों के नेताओं ने भारत सरकार से मदद माँगी और भारत सरकार का समर्थन हासिल किया।

सिक्किम विधानसभा के लिए पहला लोकतांत्रिक चुनाव 1974 में हुआ और इसमें सिक्किम काँग्रेस को जीत मिली। यह पार्टी भारत में सिक्किम विलय की पक्षधर थी। सिक्किम विधानसभा ने पहले भारत के सह-प्रान्त बनने की कोशिश की और 1975 के अप्रैल में एक प्रस्ताव पास किया। इस प्रस्ताव में भारत के साथ सिक्किम विलय की बात कही गई थी। इसके बाद तुरंत सिक्किम में जनमत-संग्रह कराया गया और जनमत संग्रह में जनता ने विधानसभा के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी। भारत सरकार ने सिक्किम विधानसभा की बात तुरंत मान ली और इस प्रकार सिक्किम, भारत का 22वाँ राज्य बना।

प्रश्न 2.
भारत में नए राज्यों के निर्माण सम्बन्धी दृष्टिकोण का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारत में नए राज्यों के निर्माण सम्बन्धी दृष्टिकोण भारत में नए राज्यों के निर्माण की माँग के प्रमुख कारण व दृष्टिकोण निम्नलिखित हैं।
1. आर्थिक असन्तुलन एवं विषमताएँ: स्वतन्त्रता के पश्चात् देश की विकास योजनाओं तथा कार्यक्रमों का लाभ सभी राज्यों को समान रूप से नहीं मिल पाया। परिणामस्वरूप क्षेत्र आर्थिक रूप से पिछड़ गये। उन्होंने नए राज्यों की माँग प्रारम्भ कर दी। विदर्भ, तेलंगाना, उत्तराखण्ड आदि राज्य इसी के अन्तर्गत आते हैं।

2. भाषायी और सांस्कृतिक कारण: भारत भाषायी तथा सांस्कृतिक विविधता वाला देश है। अतः स्वतन्त्रता के बाद इसी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की माँग उठने लगी और इसी आधार पर आंध्रप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा. आदि राज्यों का गठन हुआ।

3. ऐतिहासिक कारण: स्वतन्त्र भारत में किसी राज्य में विलीन हुई कुछ रियासतों को यह महसूस होता था कि उनका अलग अस्तित्व रहता तो वे अपनी मौलिक संस्कृति और क्षेत्रीय विशिष्टता को बनाये रखतीं।

4. राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएँ: कुछ स्थानीय नेताओं तथा राजनीतिक दलों ने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए स्थानीय जनता को पृथक् राज्य निर्माण के लिए भड़काया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, नगा राष्ट्रीय मोर्चा, गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट इसी श्रेणी में आते हैं।

5. विशिष्ट क्षेत्रीय मुद्दे: उत्तराखण्ड राज्य की माँग पहाड़ी क्षेत्र के विकास के सन्दर्भ में तथा झारखण्ड और छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण की माँग आदिवासी बहुल क्षेत्र के विकास के सन्दर्भ में उठी।

प्रश्न 3.
पुर्तगाल से गोवा मुक्ति का संक्षेप में विवरण दीजिए।
अथवा
गोवा का भारत में विलय किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
1974 में भारत में अंग्रेजी साम्राज्य का खात्मा हो गया था लेकिन पुर्तगाल ने गोवा, दमन और दीव से अपना शासन हटाने से इनकार कर दिया। यह क्षेत्र सोलहवीं सदी से ही औपनिवेशिक शासन में था। अपने लंबे शासनकाल में पुर्तगाल ने गोवा की जनता का दमन किया था। उसने यहाँ के लोगों को नागरिक के अधिकार से वंचित रखा और जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन कराया। आजादी के बाद भारत सरकार ने बड़े धैर्यपूर्वक पुर्तगाल को गोवा से शासन हटाने के लिए रजामंद करने का प्रयत्न किया। गोवा में आजादी के लिए मजबूत जन आंदोलन चला। इस आंदोलन को महाराष्ट्र के समाजवादी सत्याग्रहियों का साथ मिला।

दिसंबर, 1961 में भारत सरकार ने गोवा में अपनी सेना भेज दी। दो दिन की कार्यवाही में भारतीय सेना ने गोवा मुक्त करा लिया। जल्दी ही एक और समस्या उठ खड़ी हुई। महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के नेतृत्व में एक तबके ने माँग रखी कि गोवा को महाराष्ट्र में मिला दिया जाए क्योंकि यह मराठी भाषी क्षेत्र है। परंतु बहुत से गोवावासी गोवानी पहचान और संस्कृति की स्वतंत्र अहमियत बनाए रखना चाहते थे। कोंकणी भाषा के लिए भी इनके मन में आग्रह था। इस तबके का नेतृत्व यूनाइटेड गोअन पार्टी ने किया। 1967 के जनवरी में केन्द्र सरकार ने गोवा में एक विशेष जनमत सर्वेक्षण कराया। अधिकतर लोगों ने महाराष्ट्र से अलग रहने के पक्ष में मत डाला। इस तरह गोवा संघ शासित प्रदेश बना रहा। अंततः 1987 में गोवा भारत संघ का एक राज्य बना।

प्रश्न 4.
संक्षेप में स्वतंत्र भारत के समक्ष 1947 से 1991 के मध्य तनाव के दायरे के नामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
तनाव के दायरे निम्नलिखित हैं।

  1. आजादी के तुरंत बाद ही हमारे देश को विभाजन, विस्थापन, देसी रियासतों के विलय और राज्यों के पुनर्गठन जैसे कठिन मसलों का सामना करना पड़ा। देश और विदेश के अनेक पर्यवेक्षकों का अनुमान था कि भारत एकीकृत राष्ट्र के रूप में ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाएगा।
  2. आजादी के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर का मसला सामने आया। यह मद्दा सिर्फ भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष का नहीं था। कश्मीर घाटी के लोगों की राजनीतिक आकांक्षाओं का सवाल भी इससे जुड़ा हुआ था।
  3. पूर्वोत्तर के कुछ भागों में भारत का अंग होने के मसले पर सहमति नहीं थी। पहले नागालैंड में और फिर मिजोरम में भारत से अलग होने की माँग उठी । दक्षिण भारत में भी द्रविड़ आंदोलन से जुड़े कुछ समूहों ने अलग राष्ट्र की बात उठायी थी।
  4. अलगाव के इन आंदोलनों के अतिरिक्त देश में भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की मांग करते हुए जन आंदोलन चले। मौजूदा आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात ऐसे ही आंदोलनों वाले राज्य हैं। दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों खासकर तमिलनाडु में हिन्दी को राजभाषा बनाने के खिलाफ विरोध आंदोलन चला।
  5. 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध से पंजाबी भाषी लोगों ने अलग राज्य बनाने की आवाज उठानी शुरू कर दी। उनकी माँग आखिरकार मान ली गई और 1966 में पंजाब और हरियाणा नाम से राज्य बनाए गए। बाद में छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड का गठन हुआ। विविधता की चुनौती से निपटने के लिए देश की अंदरूनी सीमा रेखाओं का पुनर्निर्धारण किया गया।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

प्रश्न 5.
भारत के उत्तर पूर्वी भाग में बढ़ती राजनीतिक हिंसा की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारत के उत्तर-पूर्वी भाग में बढ़ती राजनीतिक हिंसा: भारत के उत्तर-1 – पूर्वी भाग में बढ़ती राजनीतिक हिंसा के मूल में निम्नलिखित तीन मुद्दे प्रमुख रहे हैं। यथा
1. स्वायत्तता की माँग:
स्वतंत्रता के समय मणिपुर और त्रिपुरा को छोड़कर पूर्वोत्तर का सारा हिस्सा असम कहलाता था। इस क्षेत्र के गैर- असमी लोगों को जब लगा कि असम की सरकार उन पर असमी भाषा थोप रही है तो इस इलाके से राजनीतिक स्वायत्तता की माँग उठी। 1970 के दशक में पूरे राज्य में असमी भाषा लादने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और दंगे हुए। इन्होंने ‘आल पार्टी हिल्स कांफ्रेंस’ का गठन किया और माँग की कि असम से अलग एक जनजातीय राज्य बनाया जाये। संजीव पास बुक्स अन्ततः केन्द्र सरकार ने असम को बाँटकर मेघालय, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश बनाया तथा त्रिपुरा और मणिपुर को भी राज्य का दर्जा दिया गया।

2. अलगाववादी आंदोलन:
पूर्वोत्तर के कुछ समूहों ने सिद्धान्तगत तैयारी के साथ अलग देश बनाने की माँग भी की। 1966 में लालडेंगा के नेतृत्व में मिजो नेशनल फ्रंट ने आजादी की माँग करते हुए सशस्त्र अभियान शुरू किया और भारतीय सेना और मिजो विद्रोहियों के बीच दो दशक तक लड़ाई चली। अन्ततः 1986 में राजीव गाँधी और लालडेंगा के बीच शांति समझौता हुआ।

3. बाहरी लोगों के खिलाफ आंदोलन:
बांग्लादेश से बहुत सी मुस्लिम आबादी असम में आकर बसी। इससे असमी लोगों के मन में यह भावना घर कर गई कि इन विदेशी लोगों को पहचान कर उन्हें अपने देश नहीं भेजा गया तो स्थानीय जनता अल्पसंख्यक हो जायेगी।
1979 में ‘आसू’ नामक छात्र संगठन ने विदेशियों के विरोध में एक आंदोलन चलाया जिसे पूरे असम का समर्थन मिला। आंदोलन के दौरान हिंसक और त्रासद घटनाएँ भी हुईं। अन्ततः 1985 में सरकार के साथ एक समझौता हुआ और हिंसक आन्दोलन समाप्त हुआ।

प्रश्न 6.
जम्मू-कश्मीर की 1948 से 1986 के मध्य राजनीति से जुड़ी प्रमुख घटनाओं का विवरण लिखिए।
उत्तर:

  1. जम्मू-कश्मीर में 1948 के उपरांत तथा 1952 तक की राजनीति: प्रधानमंत्री बनने के बाद, शेख अब्दुल्ला ने भूमि सुधार और अन्य नीतियाँ शुरू कीं जिनसे सामान्य जन को लाभ पहुँचा। हालाँकि कश्मीर के दर्जे पर उनकी स्थिति के विषय में उनके और केन्द्र सरकार के बीच मतभेद बढ़ता गया।
  2. शेख अब्दुल्ला की बर्खास्तगी एवं चुनाव: 1953 में शेख अब्दुल्ला को बर्खास्त कर दिया गया और कई वर्षों तक कैद रखा गया। शेख अब्दुल्ला के बाद जो नेता सत्तासीन हुए उनको उतना लोकप्रिय समर्थन नहीं मिला और वह राज्य में शासन नहीं चला पाए जिसका मुख्य कारण केन्द्र का समर्थन था। विभिन्न चुनावों में अनाचार और हेरफेर संबंधी गंभीर आरोप थे।
  3. जम्मू-कश्मीर में 1953 से 1977 तक की राजनीतिक घटनाएँ
    • 1953 से 1974 के बीच की अवधध में कांग्रेस पार्टी मे राज्य की नीतियों पर प्रभाव डाला। विभाजित हो चुकी नेशनल कांफ्रेंस काँग्रेस के समर्थन से राज्य में कुछ समय तक सत्तासीन रही लेकिन बाद में वह काँग्रेस में मिल गई। इस तरह राज्य की सत्ता सीधे काँग्रेस के नियंत्रण में आ गई। इसी बीच शेख अब्दुल्ला और भारत सरकार के बीच समझौते की कोशिश जारी रही।
    • 1965 में जम्मू और कश्मीर के संविधान में परिवर्तन करके राज्य के प्रधानमंत्री का पदनाम बदलकर मुख्यमंत्री कर दिया गया। इसके अनुसार, भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के गुलाम मोहम्मद सादिक राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने।
    • 1974 में इंदिरा गाँधी का शेख अब्दुल्ला के साथ समझौता हुआ और वे राज्य के मुख्यमंत्री बन गए। उन्होंने नेशनल कांफ्रेंस को फिर से खड़ा किया और 1977 के विधानसभा चुनाव में बहुमत से जीत हासिल की।
  4. जम्मू-कश्मीर फारूख अब्दुल्ला के प्रथम कार्यकाल में (1982-1986): सन् 1982 में शेख अब्दुल्ला की मृत्यु के पश्चात् नेशनल कांफ्रेंस के नेतृत्व की कमान उनके पुत्र फारूख अब्दुल्ला ने संभाली और मुख्यमंत्री बने। परंतु कुछ ही समय बाद उन्हें पदच्युत कर दिया गया और नेशनल कांफ्रेंस से अलग हुआ एक गुट अल्प अवधि के लिए सत्ता में आया । केन्द्र सरकार के हस्तक्षेप से फारूख अब्दुल्ला की सरकार को हटाने पर कश्मीर में नाराजगी की भावना पैदा हुई। 1986 में नेशनल कांफ्रेंस ने केन्द्र में सत्तासीन पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन किया।

प्रश्न 7.
भारत के कुछ भागों में व्याप्त अलगाववादी आंदोलन से हम क्या सबक सीख सकते हैं?
उत्तर:
1980 के बाद के दौर में भारत के कुछ भागों में व्याप्त अलगाववादी आन्दोलन से हम अग्रलिखित सबक सीख सकते हैं।

  1. क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग हैं। क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग हैं। अतः भारत को क्षेत्रीय आकांक्षाओं से निपटने की तैयारी लगातार रखनी होगी।
  2. क्षेत्रीय आकांक्षाओं के लिए लोकतांत्रिक बातचीत का रास्ता ही उचित है – क्षेत्रीय आकांक्षाओं को दबाने की जगह उनके साथ लोकतांत्रिक बातचीत का तरीका अपनाना सबसे अच्छा होता है। उदाहरण के लिए पंजाब के उग्रवाद, पूर्वोत्तर के अलगाववादी आन्दोलन तथा कश्मीर समस्या पर बातचीत के जरिये सरकार ने क्षेत्रीय आंदोलनों के साथ समझौता किया। इससे सौहार्द का माहौल बना और कई क्षेत्रों में तनाव कम हुआ।
  3. साझेदारी के महत्त्व को समझना: केवल लोकतांत्रिक ढाँचा खड़ा कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। इसके साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के दलों और समूहों को केन्द्रीय राजव्यवस्था में हिस्सेदारी बनाना भी जरूरी है। यदि राष्ट्रीय स्तर के निर्णयों में क्षेत्रों को वजन नहीं दिया गया तो उनमें अन्याय और अलगाव का बोध पनपेगा।
  4. आर्थिक विकास की प्रक्रिया में पिछड़ेपन को प्राथमिकता दें: भारत में आर्थिक विकास की प्रक्रिया का एक तथ्य क्षेत्रीय असंतुलन भी है। ऐसे में पिछड़े इलाकों को लगता है कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है। ऐसी स्थिति में यह प्रयास किया जाना चाहिए कि पिछड़े इलाकों को लगे कि उनके पिछड़ेपन को प्राथमिकता के आधार पर दूर किया जा रहा है।

प्रश्न 8.
उत्तर-पूर्वी राज्यों की चुनौतियों एवं उसकी अनुक्रियाओं पर एक नोट लिखिए।
उत्तर:
उत्तर-पूर्वी राज्यों की चुनौतियाँ भारत का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र सात राज्यों (असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, नगालैण्ड, मिजोरम एवं त्रिपुरा) से मिलकर बनता है। इन सात राज्यों को सात बहनें भी कहकर पुकारा जाता है। इन राज्यों की चुनौतियों तथा उनकी अनुक्रियाओं को निम्न प्रकार वर्णित किया गया है।

  1. नगालैण्ड: नगालैण्ड की जनसंख्या लगभग 20 लाख है। नगालैण्ड में अनेक जातियाँ एवं कबीले पाये जाते हैं। इसमें यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट, नंगा नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी तथा नगा नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल जैसे राजनीतिक दल पाये जाते हैं। ये दल अलगाववादियों से सम्बन्धित हैं।
  2. मिजोरम: मिजोरम राज्य की जनसंख्या लगभग 10 लाख है। मिजोरम के मुख्य क्षेत्रीय दल पीपुल्स कान्फ्रेंस तथा मिजो यूनियन पार्टी, मिजोरम में एक अलगाववादी संगठन मिजो नेशनल फ्रंट भी है, जो हिंसक कार्यवाहियों में संलग्न रहता है।
  3. त्रिपुरा: त्रिपुरा की जनसंख्या लगभग 32 लाख है। त्रिपुरा में चार जिले हैं। यहाँ पर छोटे-छोटे क्षेत्रीय राजनीतिक दल हैं। इनमें त्रिपुरा उपजाति युवा समिति तथा त्रिपुरा जन मुक्ति संगठन सेना प्रमुख हैं।
  4. मणिपुर: मणिपुर की जनसंख्या लगभग 32 लाख है। इसमें मणिपुर हिल यूनियन, कूरी नेशनल एसेम्बली तथा मणिपुर जन मुक्ति सेना जैसे क्षेत्रीय दल हैं। अन्तिम दल अलगाववादी दल है।
  5. मेघालय: मेघालय की जनसंख्या लगभग 24 लाख है। मेघालय के कुछ क्षेत्रीय दल ऑल पार्टी हिल लीडर्स कान्फ्रेंस तथा हिल स्टेट पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी हैं।
  6. असम: असम की जनसंख्या 2 करोड़ 70 लाख से भी अधिक है। असम में उल्फा नामक एक उग्रवादी एवं अलगाववादी संगठन पाया जाता है।

प्रश्न 9.
द्रविड़ आन्दोलन पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
द्रविड़ आन्दोलन: द्रविड़ आन्दोलन भारत के क्षेत्रीय आन्दोलनों में एक शक्तिशाली आन्दोलन था। देश की राजनीति में यह आन्दोलन क्षेत्रीय भावनाओं की सर्वप्रथम और सबसे प्रबल अभिव्यक्ति था। द्रविड़ आन्दोलन को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत समझा जा सकता

  1. आन्दोलन का स्वरूप: सर्वप्रथम इस आन्दोलन के नेतृत्व में एक हिस्से की आकांक्षा एक स्वतन्त्र द्रविड़ राज्य बनाने की थी, परन्तु आन्दोलन ने कभी सशस्त्र संघर्ष का मार्ग नहीं अपनाया। अन्य दक्षिणी राज्यों का समर्थन न मिलने के कारण यह आन्दोलन तमिलनाडु तक ही सीमित रहा।
  2. नेतृत्व के साधन: द्रविड़ आन्दोलन का नेतृत्व तमिल सुधारक नेता ई. वी. रामास्वामी नायकर के हाथों में था।
  3. आन्दोलन का संगठन: द्रविड़ आन्दोलन की प्रक्रिया से एक राजनैतिक संगठन द्रविड़ कषगम का सूत्रपात हुआ। यह संगठन ब्राह्मणों के वर्चस्व की खिलाफत (विरोध) करता था। उत्तरी भारत के राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक प्रभुत्व को नकारते हुए क्षेत्रीय गौरव की प्रतिष्ठा पर जोर देता था।
  4. डी. एम. के. की सफलताएँ: 1965 के हिन्दी विरोधी आन्दोलन की सफलता ने डी.एम. के. को जनता के बीच और भी लोकप्रिय बना दिया। 1967 के विधानसभा चुनावों में उसे सफलता मिली।
  5. डी.एम.के. का विभाजन एवं कालान्तर की राजनीतिक घटनाएँ: सी. अन्नादुरै की मृत्यु के बाद डी.एम.के. दल के दो टुकड़े हो गये। इसमें एक दल मूल नाम डी.एम. के. को लेकर आगे चला जबकि दूसरा दल खुद को ऑल इण्डिया अन्नाद्रमुक कहने लगा। तमिलनाडु की राजनीति में ये दोनों दल चार दशकों से दबदबा बनाए हुए हैं।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

प्रश्न 10.
भारतीय राजनीति में अलगाववादी आंदोलन का वर्णन कीजिये। भारतीय राजनीति में अलगाववादी आंदोलन
उत्तर:
भारतीय राजनीति में अलगाववादी आन्दोलन का विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है।
1. अलगाववाद से आशय: अलगाववाद से अभिप्राय एक राज्य से कुछ क्षेत्र को अलग करके स्वतंत्र राज्य की स्थापना की माँग है अर्थात् सम्पूर्ण इकाई से अलग अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने की माँग अलगाववाद है। अलगाववाद का उदय उस समय होता है, जब क्षेत्रवाद की भावना उग्र रूप धारण कर लेती है।

2. भारत में हुए प्रमुख अलगाववादी आंदोलन: भारत में प्रमुख अलगाववादी आंदोलन निम्नलिखित रहे

  • जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन: स्वतंत्रता के तुरन्त बाद जम्मू-कश्मीर का मामला सामने आया। यह सिर्फ भारत – पाकिस्तान के मध्य संघर्ष का मामला नहीं था। कश्मीर घाटी के लोगों की राजनीतिक आकांक्षाओं का सवाल भी इससे जुड़ा हुआ था। 1989 में जम्मू-कश्मीर में पुनः अलगाववादी राजनीति ने सिर उठाया। अलगाववादियों का एक वर्ग कश्मीर को अलग राष्ट्र बनाना चाहता था जो न तो भारत का हिस्सा हो और न पाक का। केन्द्र ने विभिन्न अलगाववादी समूहों से बातचीत शुरू कर दी है। अलग राष्ट्र की माँग की जगह अब अलगाववादी समूह अपनी बातचीत में भारत संघ के साथ कश्मीर के रिश्ते को पुनर्परिभाषित करने पर जोर दे रहे हैं।
  • पूर्वोत्तर में अलगाववादी आंदोलन: पूर्वोत्तर के कुछ भागों में भारत का अंग होने के मुद्दे पर सहमति नहीं थी। पहले नागालैंड में और फिर मिजोरम में भारत से अलग होने की माँग करते हुए जोरदार आंदोलन चले। भारत के पूर्वोत्तर के राज्य असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, नागालैंड, मिजोरम, त्रिपुरा में इस प्रकार की मागें उठती रहती हैं।
  • द्रविड़ आंदोलन: दक्षिण भारत में द्रविड़ आंदोलन से जुड़े कुछ समूहों ने एक समय अलग राष्ट्र की बात उठायी थी। लेकिन कुछ समय बाद ही दक्षिणी राज्यों का यह आंदोलन समाप्त हो गया ।

3. लगाववादी आंदोलन के कारण: भारतीय राजनीति में अलगाववादी आंदोलन के प्रमुख कारण निम्नलिखित

  • राजनीतिक कारण: भारतीय राजनीति में अलगाववादी भावना को भड़काने में राजनीतिक दलों की संकीर्ण मनोवृत्ति प्रमुख कारण रही है। पूर्वोत्तर के अलगाववादी आंदोलन के पीछे उनकी क्षेत्रीय आकांक्षा रही है।
  • आर्थिक पिछड़ापन: असमान आर्थिक विकास और पिछड़ापन भी अलगाववाद को बढ़ावा देता है। पिछड़े क्षेत्रों में पृथकतावाद की भावना जन्म लेती है।

4. भारतीय राजनीति में अलगाववादी आंदोलन में सबक- भारतीय राजनीति को अलगाववादी आंदोलनों से निम्न शिक्षाएँ मिली हैं।

  • क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग हैं। भारत सरकार को इनसे निपटने की तैयारी लगातार रखनी होगी।
  • क्षेत्रीय आकांक्षाओं के लिए लोकतांत्रिक बातचीत का रास्ता ही उचित है।
  • विभिन्न क्षेत्रीय दलों को केन्द्रीय राजनीति का हिस्सा बनाना भी आवश्यक है।
  • आर्थिक विकास में पिछड़े राज्यों को प्राथमिकता दी जाये।

प्रश्न 11.
जम्मू और कश्मीर में 2002 और इससे आगे की राजनीति पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

  1. 2002 में जम्मू और कश्मीर राज्य में चुनाव हुए जिसमें नेशनल कांफ्रेंस पार्टी को हार का सामना करना पड़ा और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और कॉंग्रेस की मिली-जुली सरकार आ गई। मुफ्ती मोहम्मद पहले तीन वर्ष सरकार के मुखिया बनें और बाद में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के गुलामनबी आजाद मुखिया बने। परंतु 2008 में राष्ट्रपति शासन लगने के कारण वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए।
  2. अगला चुनाव नवंबर: दिसंबर के 2008 में हुआ। एक और मिली-जुली सरकार 2009 में उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में सत्ता में आई। परन्तु, राज्य को लगातार हुर्रियत कॉन्फ्रेंस द्वारा पैदा की गई गड़बड़ियों का सामना करना पड़ा।
  3. 2014 में, राज्य में फिर चुनाव हुए, जिसमें पिछले 25 वर्षों में सबसे अधिक मतदान हुआ। परिणामस्वरूप पीडीपी और बीजेपी की गठबंधन वाली सरकार सत्ता में आई। मुफ्ती मोहम्मद सईद के बाद उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती
    अप्रैल, 2016 में राज्य की प्रथम महिला मुख्यमंत्री बनी। महबूबा मुफ्ती के कार्यकाल में बाहरी और भीतरी तनाव बढ़ाने वाली बड़ी आतंकवादी घटनाएँ हुईं।
  4. जून, 2018 में बीजेपी द्वारा मुफ्ती सरकार को दिया समर्थन वापस लेने पर वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। 5 अगस्त, 2019 को जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 द्वारा अनुच्छेद 370 समाप्त कर दिया और राज्य को पुनर्गठित कर दो केन्द्र शासित प्रदेश – जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख बना दिए गए।

प्रश्न 12.
1980 के बाद के दौर में भारत की राजनीति तनावों के घेरे में रही और समाज के विभिन्न तबकों की माँगों में पटरी बैठा पाने की लोकतांत्रिक राजनीति की क्षमता की परीक्षा हुई। इन उदाहरणों से क्या सबक मिलता है?
उत्तर:

  1. पहला और बुनियादी सबक यह है कि क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग हैं। क्षेत्रीय मुद्दे की अभिव्यक्ति कोई असामान्य अथवा लोकतांत्रिक राजनीति के व्याकरण से बाहर की घटना नहीं है। भारत एक बड़ा लोकतंत्र है और यहां विभिन्नताएँ भी बड़े पैमाने पर हैं। अतः भारत को क्षेत्रीय आकांक्षाओं से निपटने की तैयारी लगातार रखनी होगी।
  2. दूसरा सबक यह है कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं को दबाने की जगह उनके साथ लोकतांत्रिक बातचीत का तरीका अपनाना सबसे अच्छा होता है।
  3. तीसरा सबक है सत्ता की साझेदारी के महत्त्व को समझना। सिर्फ लोकतांत्रिक ढाँचा खड़ा कर लेना ही काफी नहीं होता बल्कि इसके साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के दलों और समूहों को केन्द्रीय राजव्यवस्था में हिस्सेदार बनाना भी जरूरी है।
  4. चौथा सबक यह है कि आर्थिक विकास के ऐतबार से विभिन्न इलाकों के बीच असमानता हुई तो पिछड़े क्षेत्रों को लगेगा कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है। भारत में आर्थिक विकास प्रक्रिया का एक तथ्य क्षेत्रीय असंतुलन भी है। ऐसे में स्वाभाविक है कि पिछड़े प्रदेशों अथवा कुछ प्रदेशों के पिछड़े इलाकों को लगे कि उनके पिछड़ेपन को प्राथमिकता के आधार पर दूर किया जाना चाहिए।
  5. सबसे आखिरी और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इन मामलों से हमें अपने संविधान निर्माताओं की दूरदृष्टि का पता चलता है। वे विभिन्नताओं को लेकर अत्यंत सजग थे। हमारे संविधान के प्रावधान इस बात के साक्ष्य हैं। संविधान की छठी अनुसूची में विभिन्न जनजातियों को अपने आचार-व्यवहार और पारंपरिक नियमों को संरक्षित रखने की पूर्ण स्वायत्तता दी गई है। पूर्वोत्तर की कुछ जटिल राजनीतिक समस्याओं को सुलझाने में ये प्रावधान बड़े निर्णायक साबित हुए।

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 4 माटी वाली

Jharkhand Board JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 4 माटी वाली Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 4 माटी वाली

JAC Class 9 Hindi माटी वाली Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘शहरवासी सिर्फ़ माटी वाली को नहीं, उसके कंटर को भी अच्छी तरह पहचानते हैं, आपकी समझ में वे कौन-से कारण रहे
होंगे जिनके रहते ‘माटी वाली’ को सब पहचानते थे ?
उत्तर :
भागीरथी और भीलांगना नामक दो नदियों के तटों पर बसे टिहरी शहर की मिट्टी पूरी तरह रेतीली है जिससे चूल्हों पर लिपाई का काम नहीं हो सकता। शहर के हर घर में सुबह-दोपहर-शाम चूल्हा जलता है और हर बार उसकी लिपाई-पुताई के लिए लाल मिट्टी की आवश्यकता होती है। कभी-कभी घरों के कमरों की दीवारों की गोबरी- लिपाई में भी लाल मिट्टी की आवश्यकता अनुभव होती थी। सारे शहर में ‘माटी वाली’ ही एक ऐसी औरत है जो हर घर जाकर लाल मिट्टी पहुँचाती है। शहर का हर वासी उसे और उसके कंटर लगभग रोज़ देखता है। वर्षों से लगातार प्रतिदिन माटी वाली और उसके ढक्कन-कटे कंटर को देखने के कारण सारे शहरवासी उन दोनों को भली-भाँति पहचानते हैं।

प्रश्न 2.
माटी वाली के पास अपने अच्छे या बुरे भाग्य के बारे में ज्यादा सोचने का समय क्यों नहीं था ?
उत्तर :
माटी वाली का गाँव टिहरी नगर से इतना दूर था कि उसे वहाँ पहुँचने में कम-से-कम एक घंटा अवश्य लगता था। इतना ही समय उसे घर वापिस आने में लगता था। वह सारा दिन माटाखान से खोद – खोदकर लाल मिट्टी अपने कनस्तर में भरती और फिर उसे अपने सिर पर रखकर घर-घर बेचती। उसे अच्छे या बुरे भाग्य के बारे में सोचने का समय ही नहीं था। वैसे भी उसके पास न कोई ज़मीन थी और न झोंपड़ी। सारे टिहरी नगर में वह अकेली ही थी जो लाल मिट्टी पहुँचाती थी। अति व्यस्तता और अपने विशिष्ट स्वभाव के कारण उसके पास ज्यादा सोचने का समय ही नहीं था।

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 4 माटी वाली

प्रश्न 3.
‘भूख मीठी कि भोजन मीठा’ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर :
भूख किसी स्वाद को नहीं पहचानती। जब कोई व्यक्ति वास्तव में ही भूखा हो, उसका पेट पूरी तरह लंबे समय से खाली हो तो वह उसे भरने के लिए स्वाद नहीं माँगता। वह किसी भी तरह भरना चाहता है। उसे रूखी-सूखी रोटी भी अच्छी लगती है। उसे तब किसी दाल-सब्जी की आवश्यकता नहीं होती। जब पेट भरा हो तो व्यक्ति को स्वाद सूझता है और वह स्वाद को अच्छा या बुरा बताता है।
‘भूख मीठी कि भोजन मीठा’ से यही तात्पर्य है कि जब भूख सता रही हो तो हर प्रकार का रूखा-सूखा भी मीठा लगता है

प्रश्न 4.
‘पुरखों की गाढ़ी कमाई से हासिल की गई चीज़ों को हराम के भाव बेचने को मेरा दिल गवाही नहीं देता।’ – मालकिन के इस कथन के आलोक में विरासत के बारे में अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर :
मध्यवर्गीय या निम्नवर्गीय परिवारों में धन कमाने के लिए खूब पसीना बहाना पड़ता है। एक-एक पैसा जोड़कर घर के लिए उपयोगी और आवश्यक सामान खरीदा जाता है। उसे ठोक-बजा कर खरीदा जाता है कि वह लंबे समय तक टिकाऊ बना रहे। घर की मालकिन ने घर में पीतल और काँसे के बर्तनों को सहेजकर रखा हुआ था क्योंकि वह पुरखों की मेहनत से कमाई हुई संपत्ति के महत्व को भली-भाँति समझती थी। पता नहीं उन्होंने कितनी कठिनाई से उन बर्तनों को खरीदा होगा। वह अपने पुरखों की मेहनत की कमाई को मिट्टी के भाव नहीं बेचना चाहती थी। विरासत में प्राप्त धन-संपत्ति का उपयोग मानव के द्वारा सोच-समझकर किया जाना चाहिए। उसके साथ पूर्वजों का स्नेह, यादें और मान भी जुड़ा होता है। वे उनके परिश्रम, पसंद और भविष्य के प्रति लगाव के प्रतीक होते हैं। उसका दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए। नयेपन के मोह में अपनों की स्मृतियों को नहीं भुलाया जाना चाहिए।

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 4 माटी वाली

प्रश्न 5.
माटी वाली का रोटियों का इस तरह हिसाब लगाना उसकी किस मजबूरी को प्रकट करता है?
उत्तर :
माटी वाली का रोटियों का इस तरह हिसाब लगाना उसकी निर्धनता, अभावग्रस्तता और असहायता को प्रकट करता है। उसका पति बहुत कमज़ोर और बुड्ढा था। अशक्त होने के कारण वह काम नहीं कर सकता था इसीलिए माटी वाली को जी-तोड़ शारीरिक मेहनत करनी पड़ती थी, फिर भी वह पेट भर रोटी नहीं कमा पाती थी।

प्रश्न 6.
आज माटी वाली बुड्ढे को कोरी रोटियाँ नहीं देगी – इस कथन के आधार पर माटी वाली के हृदय के भावों को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर :
माटी वाली आर्थिक दृष्टि से असहाय है। वह अति निर्धन है और चाहकर भी अपने बुड्ढे पति के लिए ठीक से रोटी नहीं कमा पाती। बुड्ढा अति कमज़ोर था और इस कारण वह डेढ़ से अधिक रोटी नहीं खा सकता था। आज बुढ़िया के पास तीन रोटियाँ थीं। उसके पास मिट्टी बेचने से प्राप्त कुछ पैसे भी थे। वह आज गठरी में बाँधे गए अपने बुड्ढे को कोरी रोटियाँ नहीं खिलाएगी। उसने एक पाव प्याज खरीदे और सोच लिया कि वह उन्हें कूटकर जल्दी-जल्दी तल लेगी। वह पहले उसे रोटियाँ दिखाएगी ही नहीं। सब्ज़ी तैयार होते ही दो रोटियाँ उसे परोस देगी। माटी वाली के हृदय में अपने पति के प्रति गहरा लगाव था। वह उसकी पीड़ा से पीड़ित थी, पर चाहकर भी उसकी भूख और पीड़ा को दूर नहीं कर पाती थी। उसका इस दुनिया में सिवाय बुड्ढे के कोई भी नहीं था।

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 4 माटी वाली

प्रश्न 7.
‘गरीब आदमी का श्मशान नहीं उजड़ना चाहिए।’ इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
गरीब आदमी के पास रहने और सिर छिपाने के लिए अपना कोई सहारा नहीं होता। कुछ भी तो नहीं होता उसके पास, जिसे वह अपना कह सके। श्मशान ही एक ऐसी जगह है जहाँ मरने के बाद उसे जगह अवश्य मिलती है-चाहे अपने वहाँ छोड़ आएँ या पराए। ऐसा नहीं होता कि गरीब की लाश सदा के लिए वहीं पड़ी रहे जहाँ वह मरा हो। माटी वाली का बुड्ढा मरा और उसे श्मशान में जगह मिली, चाहे माटी वाली के पास पैसे नहीं थे। अब जब टिहरी में पानी भरने लगा तो सबसे पहले पानी में श्मशान डूबा। माटी वाली को लगा कि अब तो उसे वहाँ भी स्थान नहीं मिल पाएगा। इसीलिए उसने अपने हृदय की व्यथा को प्रकट करते हुए कहा कि ‘ग़रीब आदमी का श्मशान नहीं उजड़ना चाहिए।’

प्रश्न 8.
‘विस्थापन की समस्या’ पर एक अनुच्छेद लिखिए।
उत्तर :
विस्थापन है – अपना घर और स्थान छोड़ना। दो-चार दिन के लिए नहीं बल्कि हमेशा के लिए। यह बहुत दुखदायी स्थिति है जिससे कोई भी व्यक्ति अपने जीवन काल में नहीं गुज़रना चाहता। अपने घर से सभी को लगाव होता है, चाहे वह टूटा-फूटा और दूसरों की दृष्टि में बेकार ही क्यों न हो। वह उसे सिर छिपाने की जगह देता है। जब-जब कोई राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक या प्राकृतिक विपदा आती है तब-तब विस्थापन की समस्या लोगों के सामने सिर उठा कर खड़ी हो जाती है। बाढ़, तूफान, भूकंप आदि की स्थितियों में लोगों को अपने घर से विस्थापित होना पड़ता है, पर सदा के लिए नहीं बल्कि कुछ देर के लिए।

इन स्थितियों में आर्थिक नुकसान होता है पर व्यक्ति फिर सामान्य स्थिति हो जाने पर वापिस लौट आता है। अपना टूटा-फूटा और उजड़ा आशियाना फिर से तैयार कर लेता है, पर राजनीतिक कारणों से कभी-कभी स्थायी रूप से विस्थापन हो जाता है। जब हमारे देश का बँटवारा अंग्रेज़ सरकार ने कर दिया था तब लाखों परिवारों को अपना बसा-बसाया घर छोड़ रातों-रात दूसरी जगह जाना पड़ा था। तब आसमान ही सिर पर छत का काम करता है। सन 1972 में जब बांग्लादेश बना था तब भी लाखों लोग विस्थापित होकर भारत आ गए थे। राजनीतिक अशांति के कारण लोग अपना घर छोड़ अन्यत्र विस्थापित होने के लिए विवश होते हैं।

विस्थापन की स्थिति मनुष्य को मानसिक रूप से तोड़ देती है। व्यक्ति जहाँ कहीं भी बसने के लिए जाता है उसे वहाँ की परिस्थितियों में स्वयं को ढालना पड़ता है, नये सिरे से स्थापित होना पड़ता है। किसी पौधे को उखाड़कर दूसरी जगह लगाया जाए तो वह भी कई दिनों तक मुर्झाया रहता है। उसकी पुरानी पत्तियाँ पीली होकर झड़ जाती हैं और फिर धीरे-धीरे नई पत्तियाँ निकलनी शुरू होती हैं। बाहर से घर के भीतर आ जाने वाले किसी कीड़े-मकोड़े को भी जगह ढूँढ़ने में परेशानी होती है। मनुष्य तो अति संवेदनशील प्राणी है इसलिए विस्थापन की स्थिति में उसका विचलित हो जाना सहज – स्वाभाविक है। टिहरी नगर के डूब जाने से लोग विस्थापित हुए हैं। चाहे सरकार ने उनके पुनर्वास का प्रबंध किया है, उनकी हुई क्षति की पूर्ति की है पर वे लोग इस विस्थापन को कभी नहीं भूल पाएँगे।

JAC Class 9 Hindi माटी वाली Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘माटी वाली’ के आधार पर मुख्य पात्रा की चरित्रगत विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :
‘माटी वाली’ कहानी की मुख्य पात्रा है-बुढ़िया। कहानीकार ने पूरी कहानी में उसका नाम नहीं लिया है। मुख्य पात्रा होकर भी वह नाम-रहित है। उसकी चरित्रगत प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
1. बाह्य व्यक्तित्व-बुढ़िया मैली-कुचैली छोटे कद की महिला थी जो अति साधारण व्यक्तित्व की स्वामिनी थी। सारे नगरवासियों को उसकी अच्छी पहचान है क्योंकि वह टिहरी नगर के हर घर में जाती थी। उसका जन्म हरिजन परिवार में हुआ था।

2. परिश्रमी – माटी वाली बहुत परिश्रमी औरत थी। वृद्धावस्था में भी वह दिन-भर कठोर परिश्रम करती थी। माटाखान से मिट्टी खोदना और सिर पर कनस्तर रख शहर में जगह-जगह जाना उसका कार्य था।

3. अभावग्रस्त और असहाय- माटी वाली पूर्ण रूप से अभावग्रस्त थी। उसके पास धन के नाम पर कुछ नहीं था। वह जिस झोंपड़ी में रहती थी वह ठाकुर की ज़मीन पर बनी थी। उसके लिए भी उसे बेगार करनी पड़ती थी। अपनी असहायावस्था के कारण ही वह कहती है-
“गरीब, आदमी का श्मशान नहीं उजड़ना चाहिए।”

4. डरपोक माटी वाली स्वभाव से डरपोक थी। जब वह ठकुराइन के घर मिट्टी देने के लिए गई तो उसे वहाँ दो रोटियाँ दी गईं और ठकुराइन उसके लिए चाय लेने गई। माटी वाली ने एक रोटी झट से छिपाकर अपने डिल्ले में बाँध ली और झूठ-मूठ ही मुँह हिलाने लगी जैसे वह रोटी को चबा-चबाकर खा रही हो। जब गृहस्वामिनी ने स्वयं ही उसे रोटी दी थी, तो उसे रोटी छिपाने और डरने की क्या बात थी।

5. पति के प्रति लगाव – बुढ़िया का बुड्ढा पति बहुत कमज़ोर था। वह अपनी झोंपड़ी में पड़ा रहता था पर बुढ़िया का मन उसके आस-पास मँडराता रहता था। वह स्वयं रोटी न खा उसके लिए रोटी लाने का प्रयत्न करती थी। उसके प्रति उसके हृदय में अगाध लगाव था। तभी तो वह उसके लिए एक पाव प्याज खरीदती है ताकि वह कोरी रोटी न खाए। उसकी बात ‘भूख मीठी कि भोजन मीठा ?’ उसके कानों में गूँजता रहता है।
वास्तव में बुढ़िया गरीबी, असहायावस्था और पीड़ा की प्रतीक है जिसके जीवन में दुख ही दुख हैं।

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 4 माटी वाली

प्रश्न 2.
कहानी के आधार पर बुड्ढे की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :
1. बीमार और अशक्त – माटी वाली का पति बहुत अशक्त और बीमार था। वह चलने-फिरने के योग्य नहीं था। इसलिए ठाकुर की ज़मीन पर बनी झोंपड़ी में दिन-रात पड़ा रहता था।
2. सचेत – बुड्ढा चाहे कमज़ोर और विवश था, पर सचेत था। जब माटी वाली बुढ़िया वापिस झोंपड़ी में पहुँचती तो आहट होते ही वह चौंक जाया करता था और नारें उठाकर उसकी तरफ देखा करता था।
3. भूख से त्रस्त – बुड्ढा भूख से त्रस्त रहता था। जब बुढ़िया उसके लिए रोटी लेकर पहुँचती थी तो वह खिल उठता था। सब्ज़ी न मिलने पर भी वह संतुष्ट रहता था और कहता था-

‘भूख मीठी कि भोजन मीठा। ”

प्रश्न 3.
टिहरी शहर के पास गाँव में रहने वाली बुढ़िया को विस्थापित क्यों होना पड़ा ?
उत्तर :
भागीरथी और भीलांगना नदियों के तटों पर टिहरी शहर बसा हुआ था। बिजली उत्पादन के लिए जब वहाँ बाँध बनाया गया तो टिहरी शहर को मानव निर्मित झील में समा जाना था। जिन लोगों की जमीन थी, उन्हें तो उनकी संपत्ति के आधार पर सरकार ने पुनर्वास दे दिया, पर बुढ़िया के पास तो कुछ भी नहीं था इसलिए उसे विस्थापित होना पड़ा।

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 4 माटी वाली

प्रश्न 4.
ठकुराइन ने बुढ़िया को भाग्यवान क्यों कहा था ?
उत्तर :
जब ठकुराइन के घर ‘माटी वाली’ मिट्टी का कनस्तर लेकर पहुँची तब चाय का समय हो चुका था। भारतीय संस्कृति में मेहमान को भगवान का ही रूप मानते हैं। इसलिए उसने कहा था, ” तू बहुत भाग्यवान है। चाय के टैम पर आई है हमारे घर। भाग्यवान आए खाते वक्त।”

प्रश्न 5.
शहर वालों को लाल मिट्टी की जरूरत क्यों होती थी ?
उत्तर :
दो नदियों के बीच बसे टिहरी शहर की ज़मीन रेतीली थी। वे लोग खाना पकाने के लिए चूल्हा जलाते थे और हर बार उन्हें चूल्हों की लाल मिट्टी से पुताई करनी पड़ती थी क्योंकि रेतीली मिट्टी से पुताई नहीं हो सकती। साथ ही वे कमरों और दीवारों की गोबरी- लिपाई करने के लिए भी लाल मिट्टी का प्रयोग करते थे।

प्रश्न 6.
टिहरी शहर में आपाधापी कब मची थी ?
उत्तर :
जब टिहरी बाँध की दो सुरंगों को बंद कर दिया गया तो शहर में पानी भरने लगा। शहरवासी अपने घरों को छोड़कर वहाँ से भागने लगे। इस कारण सारे शहर में आपाधापी मच गई थी।

प्रश्न 7.
नगर वालों के लिए माटी वाली क्या महत्व रखती थी ?
उत्तर :
नगर वालों के लिए माटी वाली बहुत महत्व रखती थी। माटी वाली की मिट्टी से नगर वालों के चूल्हे जलते थे। लोगों को रसोई के चूल्हे-चौकों की लिपाई के लिए मिट्टी की आवश्यकता होती थी। इसलिए घर में साफ़ लाल मिट्टी का होना जरूरी थी। साल दो साल में मकान की दीवारों को गोबरी- लिपाई करने के लिए मिट्टी की आवश्यकता होती थी। इसलिए नगर वालों के लिए माटी वाली उनके जीवन में बहुत महत्व रखती थी।

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 4 माटी वाली

प्रश्न 8.
माटी वाली ने मालकिन द्वारा दी गई दो रोटियों का क्या किया ?
उत्तर :
माटी वाली जिस घर में मिट्टी डालने गई थी, उस घर की मालकिन ने उसे रोटी खाने के लिए दी। मालकिन के घर के अंदर जाते ही उसने अपने सिर पर रखने वाला कपड़ा निकाला, उसमें से एक रोटी मोड़ कर अपने पति के लिए उस कपड़े में रख लिया। मालकिन के आने पर वह ऐसे मुँह चलाने लगी जैसे उसने एक रोटी समाप्त कर ली है। दूसरी रोटी उसने चाय के साथ खाई।

प्रश्न 9.
आजकल घरों में से कौन बरतन दिखाई नहीं देते हैं और उनकी जगह किस धातु के बरतन आ गए हैं ?
उत्तर :
आजकल घरों में पीतल, काँसे और ताँबे के बरतन दिखाई नहीं देते हैं। किसी-किसी के घर में सजावट के रूप में यह बरतन दिखाई देते हैं। आजकल अधिकतर घरों में स्टील, काँच और ऐल्युमीनियम ने बरतन दिखाई देते हैं।

प्रश्न 10.
घर की मालकिन ने यह क्यों कहा कि अपनी चीज का मोह बहुत बुरा होता है ?
उत्तर :
घर की मालकिन दूर की बात सोचने वाली महिला थी। उसके घर में पीतल के बरतन थे। वह सोचती थी कि उसके पूर्वजों ने यह बरतन पता नहीं किस प्रकार पेट काट-काट कर इकट्ठे किए होंगे। उसे इन बरतनों से बहुत लगाव था। वह उसके पुरखों की गाढ़ी कमाई के थे। अब टिहरी पर बाँध बन रहा था जिस कारण उसे मकान छोड़ना पड़ेगा। वह इस उम्र में दूसरी नई जगह जाने को तैयार नहीं है। इसलिए वह माटी वाली से कहती है कि अपनी चीज़ का मोह बहुत बुरा होता है।

प्रश्न 11.
माटी वाली चाय किस ढंग से पी रही थी ?
उत्तर :
घर की मालकिन माटी वाली के लिए पीतल के गिलास में चाय लेकर आई थी। माटी वाली ने खुले कपड़े से पूरी गोलाई में गरम चाय का गिलास पकड़ लिया। गरम चाय पीने से पहले, वह गिलास के अंदर रखी चाय को ठंडा करने के लिए सू-सू करके, उस पर लंबी-लंबी फूकें मारने लगी। फिर धीरे-धीरे रोटी के साथ चाय सुड़कने लगी।

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 4 माटी वाली

प्रश्न 12.
मादी वाली की आर्थिक स्थिति कैसी थी ?
उत्तर :
माटी वाली की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उसका पति बीमार तथा कमज़ोर था। उससे कोई काम नहीं होता था। माटी वाली मिट्टी ढोकर घर का गुजारा चलाती थी। उसके पास अपना कोई खेत भी नहीं था। जिस जमीन पर उसकी झोंपड़ी थी वह गाँव के ठाकुर की थी। ठाकुर ज़मीन के एवज में उससे कई तरह के काम करवा लेता था। उसके पैसे भी नहीं देता था। इस प्रकार माटी वाली बड़ी तंगी से अपने घर का निर्वाह करती थी।

प्रश्न 13.
माटी वाली के बुड्ढे को अब रोटी की ज़रूरत क्यों नहीं थी ?
उत्तर :
माटी वाली रोटियों का हिसाब लगाते हुए घर पहुँची। उसने सोचा था कि आज वह बुड्ढे को सूखी रोटी नहीं देगी। उसने एक पाव प्याज खरीद लिए। उसने सोचा कि वह प्याज की सब्ज़ी बनाकर अपने पति को रोटी के साथ देगी। परंतु घर पहुँचकर प्रतिदिन की तरह बुड्ढे ने उसकी आहट सुनकर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई। माटी वाली ने उसका बदन छूकर देखा तो उसका पति अपनी मिट्टी छोड़कर जा चुका था अर्थात् मर गया था। इसलिए, अब उसके बुड्ढे को रोटी की ज़रूरत नहीं थी।

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 4 माटी वाली

प्रश्न 14.
टिहरी बाँध पुनर्वास वाले साहब किन लोगों को मुआवजा दे रहे थे ?
उत्तर :
टिहरी बाँध बनने से नीचे के शहरों में पानी भर गया था, इसलिए वहाँ के लोगों को दूसरी जगह विस्थापित किया गया। टिहरी बाँध वाले साहब उन लोगों का मुआवजा दे रहे थे जिनके पास जमीन, घर और दुकान संबंधी कागज थे। जिन लोगों के पास कुछ नहीं था उनके लिए सरकार कुछ नहीं कर रही थी। माटी वाली के पास भी किसी प्रकार की संपत्ति नहीं थी, इसलिए बाँध बनने के बाद वह अपना गुजारा कैसे करे, उसे इस बात की चिंता सताने लगी।

माटी वाली Summary in Hindi

पाठ का सार :

विस्थापन की समस्या पर आधारित ‘माटी वाली’ स्वतंत्र भारत के अनियोजित विकास और उससे प्रभावित आम आदमी की पीड़ा से संबंधित कहानी है। बड़ी-बड़ी योजनाएँ किसी भी राष्ट्र के विकास के लिए अनिवार्य होती हैं पर उनकी बलिवेदी पर न जाने कितने निरीह प्राणियों को स्वयं को मिटाना पड़ता है। उनकी पीड़ा को कोई नहीं समझता, कोई नहीं जानना चाहता।
‘माटी वाली’ सारे टिहरी शहर में जगह-जगह घूमकर लाल मिट्टी बेचती थी। नगर में कोई भी ऐसा घर नहीं था जहाँ वह लाल मिट्टी बेचने न जाती हो। सारे टिहरीवासी उसे बरसों से जानते-पहचानते थे क्योंकि हर घर में चूल्हों के लिए लाल मिट्टी वही पहुँचाती थी 4 हर बार खाने पकाने के बाद चूल्हे पर इस मिट्टी को पोता जाता था। उस सारे क्षेत्र में रेतीली मिट्टी पाई जाती थी, उससे चूल्हों पर लिपाई नहीं की जा सकती थी।

लोग इस मिट्टी को अपने घरों की गोबरी-लिपाई में भी प्रयुक्त करते थे। शहर के सेमल का तप्पड़ मोहल्ले की ओर बने आखिरी खोली में पहुँचकर मिट्टी वाली हरिजन बुढ़िया अपने सिर पर रखे मिट्टी से भरे कनस्तर को नीचे उतारा। कनस्तर पर कोई ढक्कन नहीं था। ढक्कन को वह काटकर उतार देती थी क्योंकि वह मिट्टी भरने और फिर खाली करने में रुकावट बनता था। घर की मालकिन ने मिट्टी वाली से मिट्टी का कनस्तर कच्चे आँगन के एक कोने में उड़ेलने के लिए कहा। उसने मिट्टी वाली को खाने के लिए दो रोटियाँ दीं।

उसने एक रोटी को अपने सिर पर रखे डिल्ले को खोलकर उसके कपड़े में लपेट लिया और दूसरी को घर की मालकिन के द्वारा दी गई पीतल के गिलास में चाय के साथ निगल लिया। चाय के साथ रोटी खाते हुए उसने कहा कि चाय तो बहुत अच्छा साग है तो मालकिन ने कहा कि भूख तो अपने आप में एक साग होती है। सामान्य बातचीत में घर की मालकिन ने उसे बताया कि चाहे बाकी लोगों ने अपने घर की पीतल और काँसे के बर्तन बेचकर स्टील और चीनी मिट्टी के बर्तन खरीद लिए थे, पर वह अपने पूर्वजों की मेहनत से खरीदे बर्तनों को नहीं बेचेगी।

उसे पुरानी चीज़ों के प्रति मोह था पर अब वह सोच-सोचकर परेशान थी कि अब जब टिहरी बाँध के कारण यह जगह उसे छोड़कर जाना पड़ेगा तो वह क्या करेगी। मिट्टी वाली वहाँ से दूसरे घर में गई जहाँ उसे अगले दिन मिट्टी लाने का आदेश मिला। वहाँ से उसे दो रोटियाँ भी मिलीं जिन्हें उसने अपने कपड़े के दूसरे छोर में बाँध लिया। लोग नहीं जानते थे कि उसने रोटियाँ अपने साथ ले जाने के लिए क्यों बाँधी थीं। घर में उसका बुड्ढा पति था। वह रोटी का इंतज़ार कर रहा होगा। आज तो उसे खाने के लिए तीन रोटियाँ मिल जाएँगी जिन्हें देख वह प्रसन्न हो जाएगा।

उसका गाँव टिहरी शहर से दूर था। तो चलने पर भी एक घंटा तो लग ही जाता है। वह हर रोज अपने घर से माटाखान में मिट्टी खोदने जाती। फिर वहाँ से उसे सिर पर ढोकर दूर-दूर बेचने जाती। उसके पास अपना कोई झोंपड़ी या जमीन का टुकड़ा नहीं था। वह तो ठाकुर की जमीन पर झोंपड़ी बनाकर रहती थी जिसके बदले उसे कई काम बेगार करने पड़ते थे।

माटी वाली ने रास्ते में एक पाव प्याज खरीदे ताकि वह अपने बुड्ढे को रोटियों के साथ तले हुए प्याज दे सके। उसका बुड्ढा बहुत कमजोर हो चुका था। अब तो वह डेढ़ से अधिक रोटी खा ही नहीं सकता था। वह अपनी झोंपड़ी में पहुँची। रोज की तरह आज उसका बुड्ढा आहट सुनकर चौंका नहीं। माटी वाली ने घबराकर उसे छू कर देखा। वह तो सदा के लिए जा चुका था। अब उसे किसी रोटी की आवश्यकता नहीं थी।

टिहरी बाँध के पुनर्वास के साहब ने उसे बता दिया था कि जब वहाँ पानी भर जाएगा तो उसके पास रहने के लिए कोई स्थान नहीं होगा। उसे रहने-खाने के लिए स्वयं कहीं प्रबंध करना होगा। टिहरी बाँध की दो सुरंगों को बंद कर दिया गया। शहर में पानी भरने लगा। सारे शहर में आपाधापी मच गई। लोग वहाँ से भागने लगे। सबसे पहले पानी में श्मशान डूब गए। माटी वाली अपनी झोंपड़ी के बाहर हर आने-जाने वाले से यही कहती रही- “गरीब आदमी का श्मशान नहीं उजड़ना चाहिए।”

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 4 माटी वाली

कठिन शब्दों के अर्थ :

  • धरा – रखा
  • तलक – तक
  • अलावा – अतिरिक्त
  • माटी – मिट्टी
  • टैम – समय
  • बेगार – बिना मज़दूरी काम करना
  • कंटर – कनस्तर
  • मुशिकल – कठिन
  • नाटे – छोटे, ठिगने
  • डिल्ले – सिर पर बोझे के नीचे रखने के लिए कपड़े की गद्दी
  • गाढ़ी कमाई – परिश्रम से कमाया हुआ धन
  • तमाम – सारी

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 3 रीढ़ की हड्डी

Jharkhand Board JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 3 रीढ़ की हड्डी Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 3 रीढ़ की हड्डी

JAC Class 9 Hindi रीढ़ की हड्डी Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद बात-बात पर “एक हमारा जमाना था….” कहकर अपने समय की तुलना वर्तमान समय से करते हैं। इस प्रकार की तुलना करना कहाँ तक तर्कसंगत है ?
उत्तर :
मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह अपने अतीत से चिपका रहना चाहता है। सबको अपना अतीत सदैव सुखदायी लगता है। अपने अतीत की बातों को याद करके वह मन-ही-मन प्रसन्न होता रहता है। रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद भी अपने अतीत को याद करते हैं। किंतु उनका अपने अतीत की तुलना वर्तमान से करना उचित नहीं है। समय सदा एक-सा नहीं रहता। उसमें परिवर्तन आता रहता है। यह आवश्यक नहीं कि जो पहले था, वह आज भी रहे। इसी प्रकार अतीत में भी सभी चीजें अच्छी नहीं होतीं। कुछ चीजें अतीत में अच्छी रही होंगी तो कुछ चीजें वर्तमान में भी अच्छी होती हैं। केवल अतीत से चिपके रहकर वर्तमान की बुराई करना तर्कसंगत नहीं है। अतीत और वर्तमान में सदा सामंजस्य बिठाकर चलना चाहिए।

प्रश्न 2.
रामस्वरूप का अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलवाना और विवाह के लिए छिपाना, यह विरोधाभास उनकी किस विवशता को उजागर करता है ?
उत्तर :
रामस्वरूप अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलाता है। वह मानता है कि लड़कियों के लिए भी शिक्षा उतनी ही जरूरी है जितनी लड़कों के लिए होती है। वह नारी – शिक्षा का पक्षधर हैं किंतु जब उसे गोपाल प्रसाद के लड़के के साथ अपनी बेटी का रिश्ता करना होता है तो वह अपनी बेटी की शिक्षा छिपाता है। एक लड़की का पिता होने की विवशता उससे ऐसा करवाती है। रामस्वरूप चाहता है कि उसकी बेटी का विवाह गोपाल प्रसाद के लड़के शंकर से हो जाए, परंतु गोपाल प्रसाद चाहते हैं कि उनकी बहू अधिक पढ़ी-लिखी न हो, अतः रामस्वरूप को विवश होकर अपनी लड़की की उच्च शिक्षा को छिपाना पड़ता है।

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 3 रीढ़ की हड्डी

प्रश्न 3.
अपनी बेटी का रिश्ता तय करने के लिए रामस्वरूप उमा से जिस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा कर रहे हैं, वह उचित क्यों नहीं है ?
उत्तर :
रामस्वरूप अपनी बेटी का रिश्ता गोपाल प्रसाद के बेटे शंकर से तय करना चाहते हैं। गोपाल प्रसाद उनकी बेटी से तरह-तरह के सवाल पूछते हैं। रामस्वरूप चाहता है कि उसकी बेटी उमा उनके सभी सवालों का उत्तर बड़े सहज भाव से दे। वह यह भी चाहता है कि गोपाल प्रसाद के द्वारा पूछे गए बेहूदा प्रश्नों के भी वह चुपचाप उत्तर देती जाए और उनके द्वारा किए गए अपने अपमान को चुपचाप सहन कर ले, क्योंकि वे लड़के वाले हैं। रामस्वरूप का अपनी बेटी से ऐसे व्यवहार की अपेक्षा करना बिल्कुल गलत है। आजकल लड़का और लड़की दोनों में किसी प्रकार का कोई भेद नहीं रह गया है। दोनों ही बराबर की शिक्षा के अधिकारी हैं और विवाह के समय केवल लड़की होने के कारण उसे चुपचाप अपमान सहना पड़े, यह उचित नहीं है। लड़का और लड़की बराबर सम्मान के अधिकारी हैं।

प्रश्न 4.
गोपाल प्रसाद विवाह को ‘बिजनेस’ मानते हैं और रामस्वरूप अपनी बेटी की उच्च शिक्षा छिपाते हैं। क्या आप मानते हैं कि दोनों ही समान रूप से अपराधी हैं ? अपने विचार लिखें।
उत्तर :
गोपाल प्रसाद अपने लड़के शंकर का रिश्ता तय करने के लिए रामस्वरूप के घर आते हैं। वे विवाह की बातचीत आरंभ करते हुए विवाह को ‘बिजनेस’ कहते हैं। ‘बिजनेस’ का अर्थ होता है – व्यापार। व्यापार में निर्जीव वस्तुओं को खरीदा – बेचा जाता है। अतः उनके द्वारा विवाह जैसे पवित्र बंधन को ‘बिजनेस’ कहना सरासर अनुचित है। दूसरी ओर रामस्वरूप गोपाल प्रसाद के पुत्र के साथ रिश्ता जोड़ने के लिए अपनी बेटी की उच्च शिक्षा को छिपाते हैं।

गोपाल प्रसाद अपने बेटे के लिए कम पढ़ी-लिखी लड़की चाहते हैं। अतः रामस्वरूप अपनी बेटी की शिक्षा मैट्रिक तक बताकर जैसे-तैसे इस रिश्ते को जोड़ने का प्रयास करते हैं। रामस्वरूप द्वारा अपनी बेटी की पसंद और नापसंद का ध्यान न रखना और जबरन उसका विवाह करना भी उचित नहीं है। अतः गोपाल प्रसाद और रामस्वरूप दोनों ही समान रूप से अपराधी हैं। उमा इस कथन के माध्यम से शंकर की किन कमियों की

प्रश्न 5.
आपके लाड़ले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं.. ओर संकेत करना चाहती है ?
उत्तर :
गोपाल प्रसाद अपने बेटे शंकर का रिश्ता तय करने से पहले उमा से तरह-तरह के सवाल पूछते हैं। उमा स्वयं को अपमानित अनुभव करती है। वह शंकर को भी पहचान लेती है। शंकर का चरित्र ठीक नहीं था। वह लड़कियों के छात्रावास के आस-पास घूमता रहता था और कई बार वहाँ से भगाया भी गया था। इसके साथ-साथ सबसे बड़ी बात यह थी कि जिस लड़के लिए गोपाल प्रसाद हर प्रकार से परिपूर्ण लड़की चाहते थे, वह उनका अपना लड़का शंकर स्वयं रीढ़ की हड्डी से रहित था अर्थात पूर्ण रूप से अपने पिता पर आश्रित था। साथ ही वह तथा झुककर चलता था। शंकर अपने लिए अत्यंत सुंदर लड़की की तलाश में था, जबकि उसमें अपने में बहुत सारी कमियाँ थीं। उसकी रीढ़ की हड्डी न होना और ठीक प्रकार से खड़ा न हो पाना, उसकी सबसे बड़ी कमी थी। उमा ने यहाँ उसकी इसी कमी की ओर संकेत किया है।

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प्रश्न 6.
शंकर जैसे लड़के या उमा जैसी लड़की – समाज को कैसे व्यक्तित्व की ज़रूरत है ? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर :
आज समाज को उमा जैसी लड़की की आवश्यकता है। शंकर जैसे लड़के समाज को किसी भी रूप में ऊँचा उठाने में योगदान नहीं दे सकते। वह पढ़ा-लिखा तो अवश्य है किंतु वह चारित्रिक एवं मानसिक रूप से इतना दृढ़ नहीं है कि समाज को एक नई दिशा दे सके। दूसरी ओर उमा वर्तमान नारी की साक्षात् प्रतिमूर्ति है। वह अन्याय का डटकर विरोध करने वाली है। उसमें रूढ़ियों और कुरीतियों से लड़ने का साहस है। वह अन्याय को चुपचाप सहन करके उसे बढ़ावा देने वाली नहीं है। वह लड़का और लड़की के भेदभाव को समाप्त कर देना चाहती है। वह स्पष्ट करती है कि रिश्ता तय करते समय लड़की से तरह-तरह के सवाल पूछकर उसे अपमानित करना उचित नहीं है। उमा समाज को एक नई दिशा देने में सक्षम है, अतः आज समाज को उमा जैसे व्यक्तित्व की ज़रूरत है।

प्रश्न 7.
‘रीढ़ की हड्डी’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
रीढ़ की हड्डी’ एक सामाजिक एकांकी है। इस एकांकी में लेखक ने समाज की रूढ़ियों पर प्रहार किया है। गोपाल प्रसाद अपने बेटे शंकर के लिए कम पढ़ी-लिखी किंतु अत्यंत सुंदर बहू चाहते हैं। वे यह भी चाहते हैं कि लड़की प्रत्येक कार्य में निपुण हो। उसे गाना- बजाना, सिलाई-कढ़ाई, बुनाई और अन्य सभी कार्य आते हों। वे उमा से तरह-तरह के सवाल पूछते हैं। उनमें लड़के का पिता होने की ऐंठ है। वे चाहते हैं कि लड़की सर्वगुण संपन्न हो किंतु एकांकी के अंत में पता चलता है कि उनका अपना लड़का शंकर तो किसी प्रकार भी पूर्ण नहीं है। वह चरित्रहीन तो है ही साथ ही शारीरिक दृष्टि से अपंग भी है तथा पूर्ण रूप से अपने पिता पर आश्रित है। वह ठीक प्रकार से खड़ा नहीं हो पाता क्योंकि उसकी रीढ़ की हड्डी ही नहीं है। इस प्रकार इस एकांकी का शीर्षक ‘रीढ़ की हड्डी’ अत्यंत सार्थक है।

प्रश्न 8.
कथावस्तु के आधार पर आप किसे एकांकी का मुख्य पात्र मानते हैं और क्यों ?
उत्तर :
कथावस्तु के आधार पर एकांकी की मुख्य पात्र उमा है। कोई भी लेखक जिस पात्र के माध्यम से अपने उद्देश्य की पूर्ति करता है, वही कथावस्तु का मुख्य पात्र होता है। इस एकांकी में भी लेखक ने अपने उद्देश्य की पूर्ति उमा के माध्यम से की है। उमा ही स्पष्ट करती है कि वर्तमान समाज में लड़का और लड़की का भेदभाव करना उचित नहीं है। दोनों को समान अधिकार और बराबर सम्मान मिलना चाहिए अब वह समय नहीं रहा जब लड़की घर की चारदीवारी में बंद रहती थी। रिश्ता करते समय लड़की से तरह-तरह के सवाल करके उसे अपमानित करना भी उचित नहीं है। इस प्रकार लेखक ने उमा के माध्यम से हमारे समाज के कुछ लोगों की दकियानूसी विचारधारा पर चोट की है। अतः उमा ही इस एकांकी की मुख्य पात्रा है।

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 3 रीढ़ की हड्डी

प्रश्न 9.
एकांकी के आधार पर रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :
एकांकी में रामस्वरूप एक लड़की का पिता है और गोपाल प्रसाद एक लड़के का पिता है। रामस्वरूप में जहाँ एक ओर लड़की का पिता होने के कारण एक अनावश्यक विवशता है वहीं गोपाल प्रसाद में लड़के का पिता होने की ऐंठ है। रामस्वरूप अधेड़ उम्र का व्यक्ति है। वह किसी भी प्रकार अपनी बेटी का रिश्ता गोपाल प्रसाद के बेटे से कर देना चाहता है, इसी कारण वह अपनी बेटी की उच्च शिक्षा को भी छिपाता है। वह जरा-जरा सी बात पर झुंझलाने वाला व्यक्ति है। उसके नौकर और उसके बीच हुई बातचीत में उसकी झुंझलाहट को देखा जा सकता है।

वह नारी शिक्षा का पक्षधर तो है किंतु नारी को पूर्ण अधिकार देने के पक्ष में नहीं है। इसी कारण वह उमा द्वारा गोपाल प्रसाद को खरी-खोटी सुनाने पर परेशान हो उठता है। दूसरी ओर गोपाल प्रसाद तो नारी का शत्रु ही दिखाई देता है। वह नारी की शिक्षा का प्रबल विरोधी है। वह आज भी नारी को घर की चारदीवारी में बंद करके रखना चाहता है। वह अत्यंत दकियानूसी और अपने अतीत से चिपका रहने वाला व्यक्ति है। उसके मत में इस संसार में समस्त सम्मान और अधिकारों का एकमात्र हकदार पुरुष है। गोपाल प्रसाद एक आत्मप्रशंसक व्यक्ति भी है। उसे अपनी प्रशंसा स्वयं करके आनंद की अनुभूति होती है।

प्रश्न 10.
इस एकांकी का क्या उद्देश्य है ? लिखिए।
उत्तर :
‘रीढ़ की हड्डी’ एक उद्देश्यपूर्ण एकांकी है। इस एकांकी में लेखक ने स्पष्ट किया है कि लड़के और लड़की में भेदभाव करना उचित नहीं है। लड़की भी उच्च शिक्षा के साथ-साथ सम्मान की अधिकारिणी है। विवाह के नाम पर उससे तरह-तरह के सवाल पूछकर उसे अपमानित करना उचित नहीं है। आज लड़कियाँ भी लड़कों के ही समान उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं, अतः उन्हें भी उचित सम्मान मिलना चाहिए। लेखक ने गोपाल प्रसाद जैसे रूढ़िवादी विचारधारा के लोगों पर प्रहार भी किया है। ऐसे लोग जो नारी को समस्त अधिकारों से वंचित रखना चाहते हैं और उसे अपमानित करते हैं, उन्हें स्वयं अपमानित होना पड़ता है। इस प्रकार लेखक ने इस एकांकी में लड़के और लड़की का भेदभाव समाप्त करते हुए शंकर जैसे लड़कों की अपेक्षा उमा जैसी लड़की की समाज की आवश्यकता बताई है।

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 3 रीढ़ की हड्डी

प्रश्न 11.
समाज में महिलाओं को उचित गरिमा दिलाने हेतु आप कौन-कौन से प्रयास कर सकते हैं ?
उत्तर :
‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता’ अर्थात् जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति में काफी सुधार हुआ है, लेकिन आज भी गाँव की महिलाओं की स्थिति दयनीय है। नारी की प्रगति का मुख्य आधार शिक्षा है। जब तक महिलाएँ शिक्षित नहीं होंगी वे न तो अपना विकास कर सकती हैं और न ही देश की उन्नति में अपना योगदान दे पाएँगी।

अतः सर्वप्रथम नारी को शिक्षित किया जाना चाहिए। नारी को पुरुष के समान अधिकार और सम्मान दिलाने के लिए समाज को जागरूक किया जाना चाहिए। महिलाएँ किसी भी मायने में पुरुष से कम नहीं हैं। महिलाओं के कल्याण के लिए सरकार द्वारा बनाई गई सभी योजनाओं को लागू करवाने के लिए प्रयास करना चाहिए और प्रत्येक महिला को इसका लाभ मिलना चाहिए। हमें यह याद रखना चाहिए कि यदि महिलाएँ विकसित और उन्नत नहीं हैं तो देश के उज्ज्वल भविष्य की कामना नहीं की जा सकती।

JAC Class 9 Hindi रीढ़ की हड्डी Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
रतन कौन है ? वह कैसा है ?
उत्तर :
रतन रामस्वरूप का नौकर है। वह बार-बार गलतियाँ करता रहता है और मालिक की डाँट फटकार सुनता रहता है। वह भुलक्कड़ प्रवृत्ति का है। वह कभी कुछ तो कभी कुछ भूलता ही रहता है। रामस्वरूप बाबू उसे उल्लू, कमबख्त और अन्य कई प्रकार की गालियाँ देकर फटकारते रहते हैं।

प्रश्न 2.
उमा अपने कमरे में मुँह फुलाकर क्यों लेटी हुई थी ?
उत्तर :
उमा आधुनिक लड़की है। वह पढ़-लिखकर जीवन में कुछ बनना चाहती है। उसके माता-पिता उसका विवाह करना चाहते थे। वह अभी विवाह नहीं करना चाहती। इसी कारण वह मुँह फुलाकर लेटी हुई थी। इसके साथ-साथ उमा को खूब सज-सँवरकर लड़के वालों के समक्ष आना बिल्कुल उचित नहीं लगता था। वह छोटी आयु में विवाह करके अपने भविष्य को भी चौपट नहीं करना चाहती थी।

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 3 रीढ़ की हड्डी

प्रश्न 3.
रामस्वरूप अपनी पत्नी प्रेमा को गोपाल प्रसाद और शंकर के विषय में क्या बताता है?
उत्तर :
रामस्वरूप प्रेमा को बताता है कि उनकी लड़की उमा को देखने दो व्यक्ति आ रहे हैं। उनमें से एक लड़के का पिता बाबू गोपाल प्रसाद है जो दकियानूसी विचारों का है। वह स्वयं पढ़ा-लिखा है और पेशे से वकील है। बड़ी-बड़ी सभा सोसाइटियों में जाता है किंतु अपने लड़के के लिए ऐसी लड़की चाहता है जो अधिक पढ़ी-लिखी न हो। उनका लड़का शंकर बी०एससी० करने के बाद लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में पढ़ता है। वह भी लड़कियों की उच्च शिक्षा के पक्ष में नहीं है। रामस्वरूप अपनी पत्नी को समझाता है कि वह उनके सामने उमा की उच्च शिक्षा की बात को छिपाकर ही रखे।

प्रश्न 4.
“अच्छा तो साहब, ‘बिजनेस’ की बातचीत हो जाए।” यह कथन किसका है ? इससे उसके चरित्र की किस विशेषता का पता
चलता है ?
उत्तर :
यह कथन बाबू गोपाल प्रसाद का है। वह विवाह को बिजनेस कहता है। उसकी दृष्टि में विवाह एक व्यापार है। वह उमा से भी इस प्रकार व्यवहार करता है जैसे वह अपने लड़के के लिए बहू नहीं अपितु घर के लिए कोई जानवर खरीद रहा हो। गोपाल प्रसाद बिजनेस के समान ही विवाह में भी लेन-देन की बात अवश्य करता किंतु उमा द्वारा फटकारने पर उसे वहाँ से उठने के लिए विवश होना पड़ता है। वह निश्चित रूप से अपने लड़के के लिए दहेज की माँग भी करता।

प्रश्न 5.
उमा गाना गाने के बाद गोपाल प्रसाद द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर क्यों नहीं देती हैं ?
उत्तर :
उमा जब गाना गाती है तो गाते-गाते उसका झुका हुआ मस्तक उठ जाता है और वह शंकर को देख लेती है। वह शंकर को पहचान लेती है। शंकर कुछ ही दिनों पहले लड़कियों के हॉस्टल के इर्द-गिर्द तांक-झाँक करता पकड़ा गया था और उसे वहाँ से भगाया गया था। उसे देखने के बाद उमा निश्चय कर लेती है कि वह उसके साथ किसी भी स्थिति में विवाह नहीं करेगी। इसी कारण बाबू गोपाल प्रसाद द्वारा पूछे गए सवालों का वह उत्तर नहीं देती।

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 3 रीढ़ की हड्डी

प्रश्न 6.
‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
रीढ़ की हड्डी एकांकी में लेखक ने अत्यंत सरल एवं बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है। भाषा प्रसंगानुकूल, भावानुकूल एवं पात्रों के अनुरूप है। लेखक ने अंग्रेजी के अनेक शब्दों को बड़े सहज भाव से प्रयोग किया है। एकांकी में आए अंग्रेजी के शब्द हैं- बैकबोन, हॉस्टल, मैट्रिक, वीक एंड पॉलिटिक्स, कॉलेज आदि। इसके साथ-साथ उर्दू-फारसी के शब्दों की भरमार है; जैसे-मर्ज, दकियानूसी, तकदीर, काबिल, जायका, निहायत, बेइज्जती, दगा, बेढब आदि। लेखक ने कहीं-कहीं मुहावरों का भी प्रयोग किया है। जैसे-भीगी बिल्ली बनना, चौपट कर देना आदि।

‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी की शैली संवादात्मक है। लेखक ने छोटे-छोटे संवादों का प्रयोग करते हुए कथावस्तु को गति प्रदान की है। भाषा-शैली में नाटकीयता और चित्रात्मक का गुण सर्वत्र विद्यमान है।

प्रश्न 7.
रामस्वरूप बाबू के घर में साज-सज्जा क्यों हो रही थी ?
उत्तर :
रामस्वरूप बाबू के घर में सुबह से साज-सज्जा हो रही थी। इसका कारण यह था कि उनकी लड़की उमा को देखने के लिए लड़के वाले आ रहे थे। रामस्वरूप बाबू लड़के वालों की खातिरदारी की तैयारियाँ कर रहे थे क्योंकि वह यहाँ पर अपनी लड़की का रिश्ता पक्का करना चाहते थे।

प्रश्न 8.
उमा को देखने कौन-कौन आया ?
उत्तर :
उमा को देखने लड़के वाले आए। लड़के शंकर के साथ उसके पिता गोपाल प्रसाद आए।

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प्रश्न 9.
शंकर का व्यक्तित्व कैसा है ?
उत्तर :
शंकर खींसे निपोरने वाला नौजवान है। उसकी आवाज़ पतली और खिसियाहट से भरी हुई है। कमर झुकी हुई है इसलिए उसके मित्र उसे ‘बैक बोन’ बुलाते हैं। वह बी०एससी० के बाद लखनऊ मेडिकल कॉलेज में पढ़ता है। उसका चरित्र ठीक नहीं है, वह गर्ल्स कॉलेज हॉस्टल की लड़कियों को छेड़ते हुए पकड़ा गया था।

प्रश्न 10.
गोपाल बाबू के पढ़ी-लिखी लड़की के लिए कैसे विचार थे ?
उत्तर :
गोपाल बाबू वकील थे। वे सभा-सोसाइटियों में जाते थे। उनका लड़का भी पढ़ा-लिखा था। परंतु उन्हें लड़के के लिए बहू कम पढ़ी-लिखी चाहिए थी। पढ़ी-लिखी लड़कियाँ उन्हें पसंद नहीं थी। उनके अनुसार पढ़ी-लिखी लड़कियों के नखरे बहुत होते हैं। वे घर का काम नहीं कर सकतीं। वे अंग्रेजी अखबार पढ़ने लगती हैं और पॉलिटिक्स पर बहस करती हैं। इसलिए उन्हें केवल गृहस्थी सँभालने वाली कम पढ़ी-लिखी लड़की चाहिए।

प्रश्न 11.
रामस्वरूप ने उमा की शादी के लिए क्या झूठ बोला ?
उत्तर :
रामस्वरूप को भी एक आम पिता की तरह अपनी लड़की के विवाह की चिंता थी। उनकी लड़की उमा पढ़ी-लिखी थी। परंतु जो रिश्ता उसके लिए आया था, वे लोग कम पढ़ी-लिखी लड़की चाहते थे। इसलिए रामस्वरूप ने अपनी पढ़ी-लिखी लड़की को कम पढ़ी-लिखी बताया। उसके चश्मे का कारण आँख का दुखना बताया था। यह झूठ एक लड़की के पिता की मजबूरी भी दिखाता है।

प्रश्न 12.
उमा गोपाल प्रसाद की बातों का क्या जवाब देती है ?
उत्तर :
गोपाल प्रसाद उमा से कई तरह के सवाल पूछते हैं जिसका जवाब रामस्वरूप देते हैं। जब गोपाल प्रसाद कहते हैं कि उमा को जवाब देने दें। उस पर उमा के अंदर की मजबूरी बाहर आती है कि वह क्या जवाब दे। जब कोई मेज- कुर्सी बिकती है तो दुकानदार मेज – कुर्सी की मर्ज़ी नहीं पूछते, केवल उसे खरीददार को दिखा देते हैं। अब यह खरीददार की इच्छा पर होता है कि पसंद है या नहीं। वह भी एक मेज़ – कुर्सी की तरह है। उसके पिता ने उसे लड़के वालों के समक्ष प्रस्तुत किया है। उमा कहती है कि लड़कियों के भी दिल होते हैं। उन्हें भी चोट लगती है, वे लाचार भेड़-बकरियाँ नहीं हैं जिन्हें कसाई को अच्छी तरह दिखाया जाए। उमा के शब्दों में हर उस लड़की की मजबूरी है जिसे लड़के वालों के सामने सजावटी वस्तु बनाकर पेश किया जाता है।

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प्रश्न 13.
उमा ने शंकर के विषय में क्या सच्चाई बताई ?
उत्तर :
गोपाल प्रसाद को उमा के जवाब पसंद नहीं आए। उन्हें क्रोध आ जाता है। उन्हें लगता है कि उमा उनकी बेइज्जती कर रही है। उस समय उमा शंकर की असलियत बताती है कि शंकर पिछली फरवरी को लड़कियों के हॉस्टल के चक्कर लगाते हुए पकड़ा गया था। उसे वहाँ से कैसे भगाया गया था। एक बार वह नौकरानी के पैरों में गिरकर माफ़ी माँगते हुए भागा था। उमा कहती है कि उनके लड़के की तो बैक-बोन ही नहीं है। वह उनके लड़के की तरह नहीं है, उसे अपने माता-पिता की इज्ज़त का ध्यान है।

प्रश्न 14.
गोपाल बाबू अपने लड़के शंकर की कमियों को किस प्रकार ढकते हैं ?
उत्तर :
उमा ने सबके सामने शंकर की असलियत खोल दी। इस पर गोपाल प्रसाद बाबू को अपनी बेइज्जती लगती है। वह गुस्से में खड़े हो जाते हैं। वह रामस्वरूप बाबू से कहते हैं कि उन्होंने उनसे झूठ बोला है। उनकी लड़की ने हॉस्टल में रहकर बी०ए० किया है। उन्हें कम पढ़ी-लिखी लड़की चाहिए थी। ऐसे झूठे लोगों से वह संबंध नहीं जोड़ना चाहते और घर से बाहर निकल जाते हैं। इस प्रकार एक घमंडी लड़के का पिता लड़की में कमी ढूँढ़ता हुआ अपने लड़के की कमियों को छिपाता है।

प्रश्न 15.
एकांकी के आधार पर उमा की चारित्रिक विशेषताएँ लिखें।
उत्तर :
एकांकी में उमा वह लड़की है जिसे लड़के वाले देखने आते हैं। उमा वर्तमान नारी का प्रतीक है। वह बी०ए० पढ़ी हुई है। उसे प्रदर्शन की वस्तु बनना पसंद नहीं है। वह गृह कार्य में दक्ष है। वह संगीत विद्या में भी निपुण है। उसे अन्याय सहन नहीं होता है। जब गोपाल प्रसाद बाबू उसके विषय में तरह-तरह के सवाल पूछते हैं तो उसे अपना अपमान लगता है। इसके लिए वह अपनी बातों से अपना विरोध प्रकट करती है। उसे यह पसंद नहीं है कि लड़की को उसकी इच्छा के बिना सजावटी वस्तु की तरह लड़के वालों के सामने प्रस्तुत कर दिए गए। इस प्रकार उमा एक वर्तमान नारी का उदाहरण प्रस्तुत करती है जो अपने अधिकार के लिए लड़ना जानती है। गलत का विरोध करती है और लड़के वालों को उनकी असलियत का आईना दिखाती है।

रीढ़ की हड्डी Summary in Hindi

पाठ का सार :

एकांकी ‘रीढ़ की हड्डी’ एक सामाजिक एकांकी है। इस एकांकी के लेखक श्री जगदीश चंद्र माथुर हैं। इसमें उन्होंने लड़के और लड़की में भेदभाव करने वाले लोगों पर प्रहार करते हुए दोनों को समान सामाजिक प्रतिष्ठा देने की बात कही है। एकांकी का संक्षिप्त सार इस प्रकार है –

एकांकी का आरंभ रामस्वरूप बाबू के घर में होने वाली साज-सज्जा से होता है। उनकी लड़की उमा को देखने के लिए बाबू गोपाल प्रसाद और उनका बेटा शंकर आने वाले हैं। बावू रामस्वरूप, उनकी पत्नी प्रेमा और उनका नौकर रतन कमरे को सजाते हैं। बीच-बीच में बाबू रामस्वरूप अपने नौकर पर झुंझलाते भी हैं, तभी प्रेमा उन्हें बताती है कि उनकी लड़की उमा को जब से लड़के वालों के आने की बात कही है, तभी से वह मुँह फुलाए पड़ी है। रामस्वरूप अपनी पत्नी को कहते हैं कि वह उमा को जैसे-तैसे समझाकर तैयार कर दे। साथ ही वे अपनी पत्नी से कहते हैं कि लड़के वालों के सामने उमा की उच्च शिक्षा की बात नहीं बतानी है। वे कम पढ़ी-लिखी लड़की चाहते हैं, अतः वे उमा को मैट्रिक तक पढ़ा-लिखा ही बताएँगे।

उसी समय लड़के वालों का आगमन होता है। बाबू गोपाल प्रसाद पढ़े-लिखे और पेशे से वकील हैं। उनका बेटा शंकर बी० एससी० के बाद लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में पढ़ता है। उसकी आवाज़ पतली और खिसियाहट भरी है। झुकी हुई कमर उसकी खासियत है रामस्वरूप अतिथियों की आवभगत करते हैं। गोपाल प्रसाद अपने अतीत की बातें करते हैं और आत्म-प्रशंसा करते हुए अपने आप को महान साबित करने की कोशिश करते हैं।

कुछ ही देर बाद गोपाल प्रसाद विवाह को ‘बिजनेस’ कहकर विवाह की बात छेड़ते हैं। रामस्वरूप उनके लिए नाश्ता लाकर उनकी सेवा करते हैं। कुछ इधर-उधर की बातों के बाद गोपाल प्रसाद स्पष्ट कहते हैं कि उन्हें कम पढ़ी-लिखी लड़की चाहिए। उनका मत है कि लड़कियों को अधिक पढ़ाना बेकार है। पढ़ना और कमाकर लाना तो केवल पुरुषों का काम है। स्त्रियों का कार्य तो केवल घर-गृहस्थी संभालना है। गोपाल प्रसाद कहते हैं कि उच्च शिक्षा प्राप्त करना केवल लड़कों का अधिकार है, लड़कियों का नहीं। उनका लड़का शंकर भी उनकी इस विचारधारा का समर्थन करता है।

थोड़ी दी देर बाद रामस्वरूप अपनी बेटी उमा को आवाज़ लगाते हैं। पान की तश्तरी हाथों में लिए उमा अत्यंत सादे कपड़ों में आती है। उसकी आँखों पर लगे चश्मे को देखते ही गोपाल प्रसाद और शंकर चौंक पड़ते हैं। रामस्वरूप बताता है कि कुछ दिन पहले ही आँखों में आई कुछ खराबी के कारण ही वह चश्मा लगा रही है। गोपाल प्रसाद उससे गाने-बजाने के बारे में पूछते हैं। रामस्वरूप भी उमा को गाने के लिए कहते हैं। उमा सितार उठाकर मीरा का मशहूर गीत ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’ गाने लगती है।

वह गीत में इतना तल्लीन हो जाती है कि उसकी झुकी गर्दन ऊपर उठती है तो वह शंकर को देखती है। शंकर को देखते ही वह गाना बंद कर देती है। तब गोपाल प्रसाद उससे पेंटिंग, सिलाई और अन्य चीज़ों से संबंधित सवाल पूछते हैं किंतु उमा कोई उत्तर नहीं देती। गोपाल प्रसाद उसे बोलने के लिए कहते हैं। रामस्वरूप भी अपनी बेटी को जवाब देने के लिए कहता है। तरह-तरह के सवालों से अपमानित उमा कहती है कि लड़कियाँ केवल निर्जीव वस्तुएँ अथवा बेबस जानवर नहीं होतीं। उनका भी मान-सम्मान होता है। इस प्रकार तरह-तरह के सवाल पूछकर उन्हें अपमानित करना उचित नहीं है।

गोपाल प्रसाद जाने के लिए उठते हैं। तब उमा उन्हें बताती है कि जिस लड़के के लिए वे सर्वगुणसंपन्न लड़की चाहते हैं उनका वह लड़का लड़कियों के हॉस्टल के इर्द-गिर्द ताक-झाँक करता हुआ कई बार पकड़ा गया है। गोपाल प्रसाद को पता चल जाता है कि उमा पढ़ी-लिखी लड़की है। वे रामस्वरूप को कहते हैं कि उन्होंने उनके साथ धोखा किया है। यह कहकर वे दरवाज़े की ओर बढ़ते हैं। तब उमा कहती है कि जाइए और घर जाकर यह ज़रूर पता लगा लेना कि आपके लाडले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं।

बाबू गोपाल प्रसाद के चेहरे पर बेबसी का गुस्सा और शंकर के चेहरे पर रुआँसापन आ जाता है। दोनों बाहर चले जाते हैं। रामस्वरूप वहीं कुर्सी पर धम से बैठ जाते हैं। उमा रोने लगती है। घबराई हुई प्रेमा वहाँ पहुँचती है। तभी उनका नौकर रतन भी वहाँ आ जाता है। वह मेहमानों के लिए मक्खन लेने गया हुआ था। सभी रतन की ओर देखते हैं। यहीं एकांकी समाप्त हो जाती है।

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कठिन शब्दों के अर्थ :

  • सहसा – अचानक
  • मर्प्र – बीमारी
  • टीम-टाम – साज-सज्जा, शृंगार
  • तालीम – शिक्षा
  • खासियत – विशेषता
  • वीक-एंड – सप्ताह का अंतिम दिन
  • तकदीर – भाग्य
  • बैकबोन – रीढ़ की हड्डी
  • आमदनी – आय
  • तश्तरी – प्लेट
  • जायचा – जन्म-पत्री
  • पालिटिक्स – राजनीति
  • अधीर – बेचैन
  • बेबस – माबूर
  • होस्टल – छात्रावास
  • दगा – धोखा
  • भीगी बिल्ली की तरह – डरा-डरा सा जतन – यत्न, प्रयास
  • दकियानूसी – रूढ़िवादी
  • सब चौपट कर देना – काम बिगाड़ देना तकलीफ – परेशानी
  • मार्जिन – अंतर
  • काबिल – योग्य
  • जायका – स्वाद
  • बेढब – अजीव, विचित्र
  • निहायत – बहुत ही
  • खुद-ब-खुद – अपने आप
  • ज़ाहिर – पता चलना
  • खरीददार – चीज खरीदने वाला
  • बेइज्जती – अपमान
  • इर्द-गिर्द – आस-पास