JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 2 मेरे संग की औरतें

Jharkhand Board JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 2 मेरे संग की औरतें Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 2 मेरे संग की औरतें

JAC Class 9 Hindi मेरे संग की औरतें Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
लेखिका ने अपनी नानी को कभी देखा भी नहीं फिर भी उनके व्यक्तित्व से वे क्यों प्रभावित थीं ?
उत्तर :
लेखिका ने अपनी नानी को कभी देखा नहीं था, परंतु अपनी नानी के संबंध में उसने जो कुछ भी सुना था, उसके कारण वह उनके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुई थी। उसकी नानी ने पारंपरिक, अनपढ़ और परदे में रहने वाली स्त्री होते हुए भी विलायती ढंग से जीवन व्यतीत करने वाले बैरिस्टर पति के साथ बिना किसी शिकवे-शिकायत के जीवन व्यतीत किया था। मरने से पूर्व वे परदे का लिहाज़ छोड़कर पति के मित्र स्वतंत्रता सेनानी प्यारेलाल शर्मा से मिली और उनसे से वचन लिया था कि वे उनकी पुत्री का विवाह किसी स्वतंत्रता सेनानी से ही करवाएँगे। उनके इन्हीं क्रांतिकारी कदमों ने लेखिका को प्रभावित किया था।

प्रश्न 2.
लेखिका की नानी की आज़ादी के आंदोलन में किस प्रकार की भागीदारी रही ?
उत्तर :
लेखिका की नानी ने जब स्वयं को मौत के करीब पाया, तो उन्हें अपनी पंद्रह वर्षीय इकलौती पुत्री के विवाह की चिंता होने लगी। वे अपने पति के अनुसार किसी साहबों के फ़रमा बरदार के साथ अपनी बेटी का विवाह नहीं होने देना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने अपने पति के मित्र प्यारेलाल शर्मा से वचन लिया कि वे उनकी बेटी का विवाह किसी स्वतंत्रता सेनानी से करवाएँगे। इस प्रकार अपनी बेटी का विवाह स्वतंत्रता सेनानी के साथ करवाकर उन्होंने आज़ादी के आंदोलन में योगदान दिया था।

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प्रश्न 3.
लेखिका की माँ परंपरा का निर्वाह न करते हुए भी सबके दिलों पर राज करती थी ? इस कथन के आलोक में-
(क) लेखिका की माँ के व्यक्तित्व विशेषताएँ लिखिए।
(ख) लेखिका की दादी के घर के माहौल का शब्द-चित्र अंकित कीजिए।
उत्तर :
(क) लेखिका की माँ बहुत सुंदर, कोमल, व्यवहारिक, ईमानदार तथा निष्पक्ष भाव की महिला थीं। लेखिका की दादी के अनुसार, ‘हमारी बहू तो ऐसी है कि धोई, पोंछी और छींके पर टाँग दी।’ पति के गांधीवादी होने के कारण उन्हें खद्दर की साड़ी पहननी पड़ती थी। वे बच्चों से लाड़-प्यार नहीं करती थीं तथा उनके लिए खाना भी नहीं पकाती थीं। वे अपना अधिकांश समय पुस्तकें पढ़ने, साहित्य-चर्चा तथा संगीत सुनने में व्यतीत करती थीं। वे कभी झूठ नहीं बोलती थीं और एक की गोपनीय बात दूसरे को नहीं बताती थीं। उन्हें घरवालों से आदर तथा बाहरवालों से स्नेह मिलता था।

(ख) लेखिका की दादी के घर का माहौल गांधीवादी था। उसके पिता की जेब में पुश्तैनी पैसा धेला एक नहीं था, पर वे होनहार थे। उनके घर में खादी के वस्त्र पहने जाते थे। लेखिका की माँ को खादी की साड़ी इतनी भारी लगती थी कि उनकी कमर चनका खा जाती थी। उसकी दादी का परिवार उसके नाना के विलायती रहन-सहन से बहुत प्रभावित था। इसलिए लेखिका की माँ से कोई ठोस काम नहीं करवाया जाता था, परंतु उनकी राय माँगकर उसे पूरी तरह निभाया जाता था। लेखिका की माँ को दादी के घर में पूरा सम्मान मिलता था। बच्चों की देखभाल भी लेखिका की माँ के अतिरिक्त दादी, जिठानियाँ, पिताजी आदि करते थे। घर में सबको पूरी आज़ादी थी। कोई किसी के पत्र के आने पर उससे उस विषय में प्रत्येक व्यक्ति को अपना निजत्व बनाए रखने की पूरी छूट थी। घर में परदादी भी थी।

प्रश्न 4.
आप अपनी कल्पना से लिखिए कि परदादी ने पतोहू के लिए पहले बच्चे के रूप में लड़की पैदा होने की मन्नत क्यों माँगी ?
उत्तर :
परदादी को सदा लीक से हटकर चलने की आदत थी। परिवार में परदादी के पुत्र तथा पोते की भी बहनें थीं, इसलिए कोई ऐसा कारण नहीं था कि परदादी पतोहू के लिए पहली संतान के रूप में लड़के के स्थान पर लड़की की मन्नत मानती। उन्होंने समाज में प्रचलित इस परंपरा को तोड़ने के लिए ही पतोहू की पहली संतान लड़की होने की मन्नत माँगी थी, क्योंकि आम लोग पहली संतान के रूप में लड़का माँगते हैं। वह संसार में प्रचलित परंपराओं के विरुद्ध चलना चाहती हैं, इसलिए वे लड़की के जन्म की मन्नत माँगती हैं।

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प्रश्न 5.
डराने-धमकाने, उपदेश देने या दबाव डालने की जगह सहजता से किसी को भी सही राह पर लाया जा सकता है-पाठ के आधार पर तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर :
लेखिका की बहन रेणु बी०ए० की परीक्षा न देने पर अड़ गई थी। वह बार-बार यही कहती थी कि पहले मुझे समझाओ कि बी०ए० करना क्यों ज़रूरी हैं। इसके बाद ही मैं बी०ए० करूँगी। सबने अनेक तर्क दिए, पर वह नहीं मानी। पिताजी ने उसे समझाया कि बी०ए० करके उसे नौकरी मिल सकती है; अच्छी शादी हो जाएगी; समाज में सम्मान मिलेगा आदि। ये सब तर्क रेणु और स्वयं पिताजी को भी ठीक नहीं लगे। तब पिताजी ने उसे कहा कि बी०ए० करो, क्योंकि मैं कह रहा हूँ। इस प्रकार से सहज भाव से कहने पर रेणु ने बी०ए० पास कर लिया। अतः स्पष्ट है कि डराने-धमकाने, उपदेश देने या दबाव डालने की अपेक्षा सहजता से किसी से भी कोई कार्य करवाया जा सकता है।

प्रश्न 6.
‘शिक्षा बच्चों का जन्मसिद्ध अधिकार है’ – इस दिशा में लेखिका के प्रयासों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
लेखिका जब कर्नाटक के छोटे-से कस्बे बागलकोट पहुँची तो उसके दो बच्चे हो चुके थे, जो स्कूल जाने योग्य थे। बागलकोट में कोई स्कूल नहीं था। उसने पास के कैथोलिक बिशप से मिशन और वहाँ के सीमेंट कारखाने की आर्थिक सहायता से बागलकोट में प्राइमरी स्कूल खोलने का अनुरोध किया। क्योंकि वहाँ क्रिश्चियनों की संख्या कम थी, इसलिए उन्होंने स्कूल खोलने में असमर्थता व्यक्त की। तब लेखिका ने अपने जैसे विचार वाले लोगों की सहायता से वहाँ अंग्रेज़ी – कन्नड़ – हिंदी भाषाएँ पढ़ाने वाला प्राइमरी स्कूल खोला और बाद में उसे कर्नाटक सरकार से मान्यता भी दिलवाई।

प्रश्न 7.
पाठ के आधार पर लिखिए कि जीवन में कैसे इनसानों को अधिक श्रद्धा भाव से देखा जाता है ?
उत्तर :
इस पाठ में लोग अपनी-अपनी पसंद के अनुसार किसी-किसी को अधिक श्रद्धा भाव से देखते हैं। लेखिका की नानी परंपरावादी होते हुए भी मरने से पहले अपने पति के मित्र स्वतंत्रता सेनानी प्यारेलाल शर्मा से अपनी इकलौती बेटी का विवाह अंग्रेज सरकार के गुलामों से न करके किसी स्वतंत्रता सेनानी से करवाने का वायदा लेती है। इस प्रकार आज़ादी की लड़ाई में किसी भी रूप से सहयोग देने के कारण वह श्रद्धा की पात्र है। लेखिका की परदादी चोर को खेतीहर बनाकर श्रद्धा योग्य बनती है। लेखिका के नाना के प्रति लेखिका की माँ का ससुराल पक्ष श्रद्धावान है, क्योंकि उनका साहबी दबदबा है। हम लेखिका के प्रति श्रद्धावान हैं, क्योंकि उसने विषम परिस्थितियों में जीवन जीया है तथा औरों को भी जीना सिखाया है। डालमिया नगर में नाटक मंडली बनाना तथा बागलकोट में प्राइमरी स्कूल खुलवाना लेखिका के प्रति हमें नतमस्तक कर देता है।

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प्रश्न 8.
‘सच, अकेलेपन का मज़ा ही कुछ और है – इस कथन के आधार पर लेखिका की बहन एवं लेखिका के व्यक्तित्व के बारे में अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर :
लेखिका की बहन रेणु – लेखिका की बहन रेणु अत्यंत संवेदनशील तथा ज़िद्दी स्वभाव की है। स्कूल से बस स्टैंड तक वह बस से आती है, परंतु बस स्टैंड से घर तक घर से आई हुई गाड़ी में न बैठकर पैदल जाती है क्योंकि उसे इस प्रकार गाड़ी में बैठना सामंतशाही लगता है। वह सबकी चुनौतियाँ भी स्वीकार कर लेती है। बचपन में किसी की चुनौती स्वीकार कर उसने जनरल थिमैया को पत्र लिखकर उनका चित्र मँगवाया था, जो उसे मिल भी गया था। उसे परीक्षाएँ देना अच्छा नहीं लगता था। बी०ए० की परीक्षा उसने पिता के कहने पर ही उत्तीर्ण की थी।

एक दिन तेज वर्षा में भी वह सबके मना करने पर दो मील पैदल चलकर स्कूल गई और स्कूल बंद देखकर लौट आई थी। लेखिका – लेखिका पाँच बहनों में दूसरे नंबर पर है। वह दिल्ली के कॉलेज में पढ़ाती थी, परंतु विवाह के बाद उसे डालमियानगर तथा बागलकोट जैसे छोटे कस्बों में रहना पड़ा था। वहाँ अकेले होते हुए भी उसने अपने प्रयासों से डालमियानगर में अपने जैसे विचारों वालों से मिलकर नाटक मंडली बनाई और नाटकों का मंचन कर विभिन्न सहायता कोषों में सहयोग राशि दी। अपने प्रयत्नों से बागलकोट में बच्चों के लिए प्राइमरी स्कूल भी खुलवाया। इस प्रकार स्पष्ट है कि ये दोनों बहनें अकेले चलकर भी बहुत कुछ कर सकीं, क्योंकि अकेलेपन का मज़ा ही कुछ और होता है।

JAC Class 9 Hindi मेरे संग की औरतें Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
लेखिका की नानी ने किससे क्या वचन लिया और क्यों ?
उत्तर :
लेखिका की नानी ने अपने पति के मित्र स्वतंत्रता सेनानी प्यारेलाल शर्मा से यह वचन लिया कि वे उनकी इकलौती बेटी का विवाह किसी उन जैसे स्वतंत्रता सेनानी से करवा देंगे, क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि उसकी बेटी का विवाह साहबों के किसी आज्ञाकारी व्यक्ति से हो।

प्रश्न 2.
जिस लड़के से लेखिका की माँ का विवाह हुआ, वह कौन था ?
उत्तर :
लेखिका की माँ का विवाह जिस लड़के से हुआ था, वह बहुत पढ़ा-लिखा तथा होनहार था। आर्थिक दृष्टि से उसके पास कोई पुश्तैनी जायदाद अथवा जमा पूँजी नहीं थी। वह गांधीवादी था और खादी पहनता था। आज़ादी के आंदोलनों में भाग लेने के कारण उसे आई० सी० एस० की परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया था

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प्रश्न 3.
लेखिका की परदादी का तार भगवान से कैसे जुड़ा हुआ था ?
उत्तर :
लेखिका की परदादी बहुत ही धार्मिक विचारों की महिला थी तथा उसका जीवन अत्यंत सीधा-सादा था। नकुड़ गाँव के लोगों की मान्यता थी कि उनका भगवान के साथ सीधा तार जुड़ा है, इधर वे तार खींचती और उधर उनकी मुराद पूरी हो जाती थी। उन्होंने जब पतोहू की पहली संतान लड़की माँगी, तो भगवान ने उनकी इच्छा पूरी करते हुए पतोहू को एक नहीं बल्कि पाँच लड़कियाँ दे दी थीं। परदादी की हर इच्छा को भगवान पूरी कर देते थे, इसलिए उनके तार भगवान से जुड़े हुए माने जाते थे।

प्रश्न 4.
लेखिका के परिवार में कौन-कौन किस-किस नाम से लिखता है ?
उत्तर :
लेखिका के परिवार में उसकी बड़ी बहन रानी ‘मंजुल भगत’ के नाम से लिखती हैं। उन्होंने अपने विवाह के बाद लिखना आरंभ किया था, इसलिए अपना नाम बदलकर पति का ग्रहण किया। लेखिका का घर का नाम ही उमा था। उसने भी शादी के बाद लिखना शुरू किया और अपना नाम मृदुला गर्ग रख लिया। सबसे छोटी बहन अचला ने अपने नाम से लिखा, परंतु वह अंग्रेजी में लिखती है। लेखिका का छोटा भाई राजीव भी लिखता है, लेकिन वह हिंदी में ही लिखता है। इस प्रकार लेखिका के परिवार के चार सदस्य लिखते हैं।

प्रश्न 5.
लेखिका और उसकी बहनों में कौन-सी बात एक-सी रही ?
उत्तर :
लेखिका और उसकी बहनों में एक बात एक-सी रही थी। सभी बहनों ने अपना घर-बार चाहे परंपरागत ढंग से न चलाया हो परंतु उन्होंने अपने घरों को तोड़ा भी नहीं है। वे मानती हैं कि विवाह एक बार किया जाता है और उसे उन्होंने पूरी तरह से निभाया है। उन सबकी यह मान्यता रही है कि ‘मर्द बदलने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। घर के भीतर रहते हुए भी, अपनी मर्जी से जी लो, तो काफ़ी है।’

प्रश्न 6.
लेखिका ने बागलकोट में कैथोलिक बिशप से जब प्राइमरी स्कूल खोलने का आग्रह किया, तो उनका क्या उत्तर था ?
उत्तर :
लेखिका ने जब बागलकोट के कैथोलिक बिशप से प्रार्थना की कि वे मिशन और सीमेंट कारखाने की आर्थिक सहायता से वहाँ प्राइमरी स्कूल खुलवा दें, तो उन्होंने कहा कि यहाँ क्रिश्चियन जनसंख्या कम है इसलिए वे स्कूल खोलने में असमर्थ हैं। जब लेखिका ने अपना अनुरोध बार-बार दोहराया तो उन्होंने कहा कि हम कोशिश कर सकते हैं, यदि आप यह विश्वास दिलाएँ कि यह स्कूल अगले सौ वर्षों तक चलेगा। इस पर लेखिका को क्रोध आ गया और उसने कहा कि किसी के संबंध में भी यह विश्वास नहीं दिलाया जा सकता कि वह अगले सौ वर्ष तक चलेगा। इस पर वे भी गुस्से में भरकर बोले कि खुदा का लाख शुक्र है; बच्चों के न पढ़ पाने की समस्या आपकी है, मेरी नहीं।

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प्रश्न 7.
लेखिका के नाना नानी से किस प्रकार भिन्न थे ?
उत्तर :
लेखिका की नानी परंपरावादी, अनपढ़ और परदेवाली औरत थी; परंतु उसके नाना ने विलायत से बैरिस्ट्री पढ़ी थी। उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से डिग्री प्राप्त की थी। विलायत से वापस आने के बाद वे विलायती रीति-रिवाज़ के साथ जिंदगी गुज़ारने लगे थे। वे अंग्रेज़ों के प्रशंसक थे। वे अपनी पैदाइश के कारण हिंदुस्तानी थे, नहीं तो चेहरे-मोहरे, रंग-ढंग, पढ़ाई-लिखाई सबमें अंग्रेज़ लगते थे।

प्रश्न 8.
लेखिका की माँ आम भारतीय महिलाओं से कैसे भिन्न थी ?
उत्तर :
लेखिका की माँ आम भारतीय महिलाओं की तरह नहीं थी। उन्हें घरेलू काम करने की आदत नहीं थी। उन्होंने कभी भी लेखिका और उसके अन्य भाई-बहनों से लाड़-दुलार नहीं किया। उन्होंने कभी अपने बच्चों के लिए खाना नहीं बनाया और न ही अपनी बेटियों को अच्छी पत्नी, माँ और बहू बनने की सीख दी। उन्हें घर-परिवार सँभालने की आदत नहीं थी। उनका ज्यादा समय किताबें पढ़ने, संगीत सुनने और साहित्यिक चर्चा में व्यतीत होता था। उन्होंने कभी भी किसी के काम में हस्तक्षेप नहीं किया था। इस प्रकार वे आम महिलाओं से बिल्कुल अलग थी।

प्रश्न 9.
लेखिका की माँ कोई भी काम नहीं करती थी, फिर भी सबकी उनके प्रति इतनी श्रद्धा क्यों थी ?
उत्तर :
लेखिका के अनुसार उसकी माँ ने कभी भी आम महिलाओं की तरह घर में कोई कार्य नहीं किया था। वह पत्नी, माँ और बहू के किसी भी प्रचारित कर्तव्य का पालन नहीं करती थी। फिर भी परिवार के अन्य सदस्य उन्हें पूरी इज्जत देते थे। इसके दो कारण थे। एक तो वे साहबी खानदान से थीं तथा दूसरा वे कभी भी झूठ नहीं बोलती थीं। वे दूसरों की गोपनीय बातों को किसी पर भी जाहिर नहीं करती थी।

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प्रश्न 10.
लेखिका आज़ादी का पहला जश्न देखने क्यों नहीं जा सकी ?
उत्तर :
15 अगस्त, सन् 1947 को देश को आज़ादी मिली थी। चारों ओर आनंद का वातावरण था। सभी लोग आज़ादी का जश्न मना रहे थे। परंतु लेखिका बीमार थी। उसे टायफाइड हो गया था। उसका घर से निकलना बंद था। उसके रोने का किसी पर भी प्रभाव नहीं पड़ा। उसे और उसके पिताजी को छोड़कर सभी लोग आज़ादी का जश्न देखने चले गए। इस बात का लेखिका को बहुत दुःख था।

प्रश्न 11.
लेखिका को कौन-सा पहला उपन्यास पढ़ने को मिला था और उसका लेखिका पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर :
लेखिका आज़ादी के जश्न में नहीं गई थी। उसके पिताजी ने उसे पढ़ने के लिए ‘ब्रदर्स कारामजोव’ का उपन्यास दिया। उस समय उसकी आयु नौ वर्ष थी। उस समय लेखिका को वह उपन्यास समझ में नहीं आया था। लेकिन उसका एक अध्याय जो बच्चों पर होने वाले अनाचार अत्याचार का था, वह उसे कंठस्थ हो गया था। उसका लेखिका पर इतना प्रभाव था कि वह उम्र के हर पड़ाव में उनके साथ रहा तथा उनकी लेखनी को प्रभावित करता रहा।

प्रश्न 12.
लेखिका की बहन रेणु का स्वभाव कैसा था ?
उत्तर :
लेखिका की बहन रेणु का स्वभाव सबसे अलग था। वह अपने काम के लिए किसी को परेशान नहीं करती थी। उसे किसी भी तरह के ऐशो-आराम से परहेज था। उसका स्वभाव बहुत जिद्दी था। घर से कार उसे बस अड्डे पर लेने जाती, तो वह पैदल चलने में विश्वास करती। जिस काम के लिए उसे कहा जाता, वह उसका उल्टा करती थी। उसे पढ़ने के लिए कहा जाता, तो वह पूछती कि पढ़कर क्या मिलेगा, जो अब उसके पास नहीं है। कहने का अभिप्राय है कि वह अपने ढंग से जीवन व्यतीत करने में विश्वास करती थी। उसे दखल पसंद नहीं था। वह सच बोलने में माँ से भी दो कदम आगे थी। अधिकतर लोग उसके सच को मज़ाक समझ लेते थे। वह स्वतंत्र विचारों वाली थी।

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प्रश्न 13.
लेखिका की बहन चित्रा का स्वभाव कैसा था ?
उत्तर :
लेखिका की बहन चित्रा का स्वभाव भी अलग था। वह जो काम सोच लेती थी, उसे अवश्य पूरा करती थी। वह अपनी पढ़ाई की अपेक्षा दूसरों को पढ़ाने में अधिक दिलचस्पी दिखाती थी। इससे उसके नंबर कम और दूसरों के नंबर अधिक आते थे। उसने शादी अपनी पसंद से की थी। यहाँ तक कि उसने लड़के से भी उसकी पसंद नहीं पूछी। लड़के से साफ कह दिया कि वह उससे शादी करना चाहती है। लड़के ने उसके आगे पहली मुलाकात में हथियार डाल दिए थे। चित्रा भी स्वतंत्र विचारों वाली थी।

प्रश्न 14.
क्या सबसे छोटी बहन अचला ने भी अपनी बहनों का अनुसरण किया था ?
उत्तर :
सबसे छोटी बहन अचला प्रारंभ से ही पिताजी के विचारों पर चलने वाली लगी थी। पिता की आज्ञा मानकर उसने अर्थशास्त्र और पत्रकारिता की। फिर पिता की पसंद के लड़के से शादी की। परंतु उसका मन घर-परिवार में अधिक नहीं लगा। उसने भी अपनी दोनों बड़ी बहनों की तरह लिखना शुरू कर दिया। वह अंग्रेज़ी में लिखती थी।

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प्रश्न 15.
पाँचों बहनों में क्या बात सामान्य थी ?
उत्तर :
पाँचों बहनों में एक बात सामान्य थी। उन्होंने शादी के बाद अपने घर-परिवार को परंपरागत तरीके से नहीं चलाया था, परंतु अपने परिवार को तोड़ा भी नहीं था। एक बार शादी की और उसे निभाया। उनके वैवाहिक जीवन में उतार-चढ़ाव रहे। बात तलाक तक भी पहुँची, परंतु शादी को टूटने नहीं दिया। लगभग सभी ने अपने-आप को व्यस्त रखने के लिए लिखना आरंभ कर दिया था। उनका विश्वास था कि मर्द बदलने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। घर के अंदर भी अपने ढंग से जीवन व्यतीत कर लो, वह बहुत है।

मेरे संग की औरतें Summary in Hindi

पाठ का सार :

‘मेरे संग की औरतें’ मृदुला गर्ग द्वारा रचित संस्मरण है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि परंपरागत रूप से जीवन व्यतीत करते कैसे लीक से हटकर जीया जाता है। लेखिका की एक नानी थीं, जिन्हें उसने देखा नहीं था। लेखिका की माँ के विवाह से पूर्व ही उनकी मृत्यु हो गई थी। लेखिका की नानी एक परंपरागत, अनपढ़ तथा परदे में रहने वाली स्त्री थीं। नाना शादी के तुरंत बाद बैरिस्ट्री पढ़ने विलायत चले गए थे और लौटकर विलायती ढंग से जीवन जीने लगे थे, जबकि नानी अपने ही ढंग से जी रही थीं।

उन्होंने अपनी पसंद-नापसंद कभी भी अपने पति पर व्यक्त नहीं की। जब नानी मरने वाली थीं, तो उन्हें अपनी पंद्रह वर्षीय अविवाहिता बेटी की चिंता ने परदे का लिहाज़ छोड़ने पर विवश कर दिया। उन्होंने अपने पति से कहा कि वे उनके मित्र स्वतंत्रता सेनानी प्यारेलाल शर्मा से मिलना चाहती हैं। सब उनके इस कथन से हैरान थे, पर नाना ने उन्हें प्यारेलाल शर्मा से मिलाया। नानी ने उनसे वचन ले लिया कि वे उनकी बेटी का विवाह किसी स्वतंत्रता सेनानी से ही करवाएँगे।

नानी की मृत्यु हो गई, परंतु लेखिका की माँ का विवाह एक ऐसे पढ़े-लिखे युवक से हुआ जिसे आई० सी० एस० की परीक्षा में इसलिए बैठने नही दिया गया था क्योंकि वह स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेता था। लेखिका की माँ बहुत ही कोमल तथा सुकुमारी महिला थीं। उन्हें पति के स्वतंत्रता सेनानी होने के कारण गांधी जी के आदर्शों का पालन करते हुए तथा सादा जीवन व्यतीत करते हुए खादी पहननी पड़ती थी। ससुराल वालों की आर्थिक स्थिति अधिक सुदृढ़ नहीं थी, परंतु वे इसी बात से प्रसन्न थे कि उनके समधी पक्के साहब हैं।

लेखिका की माँ की सुंदरता, नजाकत, गैर-दुनियादारी और ईमानदारी का भी इस परिवार पर बहुत प्रभाव पड़ा था। उनसे कोई ठोस काम नहीं करवाया जाता था। वे बच्चों की देखभाल, लाड़-प्यार आदि पर ध्यान नहीं देती थीं तथा बच्चों के लिए खाना भी नहीं पकाती थीं। वे बीमार रहती थीं। उन्हें पुस्तक पढ़ने, साहित्य-चर्चा तथा संगीत सुनने में बहुत रुचि थी। परिवार वाले उन्हें कुछ नहीं कहते थे, क्योंकि वे साहबी परिवार से थीं। वे कभी झूठ नहीं बोलती थीं और एक की गोपनीय बात दूसरे को नहीं बताती थीं।

इन्हीं विशेषताओं के कारण उन्हें घरवालों से आदर मिलता था तथा बाहरवालों से मित्रता। वे लेखिका तथा अन्य बच्चों की भी मित्र थीं। माँ के सारे काम लेखिका के पिता निभा देते थे। उनके पत्रों को भी घर में कोई नहीं खोलता था। घर में सबको अपना निजत्व बनाए रखने की पूरी छूट थी, जिस कारण वे तीन बहनें और छोटा भाई लेखन कार्य में लग सके। परंपरा से हटकर जीने वाली लेखिका की परदादी भी थीं। उनका व्रत था कि यदि कभी उनके पास दो से तीन धोतियाँ हो गईं, तो वे तीसरी धोती दान कर देंगी।

उन्होंने लेखिका की माँ के पहली बार गर्भवती होने पर मंदिर में जाकर लड़की की कामना की, जबकि सब पहली संतान लड़का चाहते हैं। उन्होंने अपनी इस इच्छा को सबके सामने भी व्यक्त कर दिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि माँ ने पाँच कन्याओं को जन्म दिया। लोगों का मानना था कि मेरी परदादी के भगवान से सीधे तार जुड़े हुए हैं। एक बार किसी विवाह के संदर्भ में सभी पुरुष गाँव से बाहर गए हुए थे तथा औरतें रतजगा मना रही थीं। एक चोर सेंध लगाकर परदादी के कमरे में घुस गया, तो उन्होंने पूछा कि कौन है ? उत्तर ‘जी मैं’ मिलने पर परदादी ने उसे पानी पिलाने के लिए कहा और लोटा पकड़ा दिया।

उसने घबराकर कहा कि मैं तो चोर हूँ। परदादी ने उसे अच्छी तरह से हाथ धोकर पानी लाने के लिए भेज दिया। पहरेदार ने उसे कुएँ पर देखकर पकड़ लिया, तो परदादी ने लोटे का आधा पानी स्वयं पीकर शेष उस चोर को पिला दिया और उसे अपना बेटा कहकर चोरी छोड़कर खेती करने की सलाह दे डाली। 15 अगस्त, 1947 को आजादी मिलने पर लेखिका इंडिया गेट पर जाकर आज़ादी का समारोह देखना चाहती थी, परंतु टाइफाइड के कारण न जा सकी। उस समय वह नौ वर्ष की थी। वह रोने लगी, तो पिता ने उसे ‘ब्रदर्स कारामजोव’ उपन्यास पढ़ने के लिए दिया।

लेखिका को पुस्तकें पढ़ने का विशेष शौक था। वह रोना छोड़कर पढ़ने लगी। इस पुस्तक में निहित बच्चों पर होने वाले अत्याचार- अनाचार का अध्याय उसे कंठस्थ हो गया था। लेखिका व उसकी चारों बहनें लड़कियाँ होते हुए भी कभी हीनभावना से ग्रस्त नहीं हुईं और सदा लीक पर चलने से इनकार करती रहीं। पहली लड़की लेखिका की बड़ी बहन मंजुल भगत थी, जिनका घर का नाम रानी था। इन्होंने ये नाम विवाह के बाद लेखिका बनने पर रखा था। लेखिका का घर का नाम उमा था, परंतु साहित्य जगत में मृदुला गर्ग हुआ।

लेखिका से छोटी लड़की का घर का नाम गौरी और बाहर का चित्रा है, पर वह लिखती नहीं थी। चौथी रेणु और पाँचवीं अचला थी। इन पाँचों के बाद भाई पैदा हुआ, जिसका नाम राजीव रखा गया। अचला और राजीव भी लिखते हैं। अचला अंग्रेज़ी में लिखती थी, परंतु राजीव हिंदी में ही लिखता था। इन चारों का लिखा परिवार में सभी पढ़ते हैं, परंतु लेखिका को उसकी ससुराल में कोई नहीं पढ़ता। इससे वह प्रसन्न है कि घर में तो कोई उसकी आलोचना नहीं करेगा।

लेखिका अपनी उन बहनों की चर्चा करती है, जो लिखती नहीं थीं। चौथी बहन रेणु कार में बैठना सामंतशाही का प्रतीक मानकर गरमी की दुपहरी में भी बस अड्डे से घर पैदल आती थी, जबकि अचला गाड़ी में बैठकर आती थी। रेणु ने बचपन में एक बार चुनौती दिए जाने पर जनरल थिमैया को पत्र लिखकर उनका चित्र मँगवा लिया था, जो एक मोटर सवार फौजी उसे घर आकर दे गया था। तब से आस-पास के सभी बच्चे उसे मानने लगे थे।

उसे परीक्षा देना भी पसंद नहीं था। स्कूल कक्षाएँ तो उसने पास कर ली थीं, परंतु बी०ए० की परीक्षा न देने के लिए अड़ गई थी। उसका मानना था कि बी०ए० करने से क्या लाभ? उसे नौकरी व समाज में सम्मान पाने आदि के तर्क भी बी०ए० करने के लिए प्रभावित न कर सके तो पिताजी की खुशी के लिए उसने बी०ए० पास किया। सच बोलने में तो वह माँ से भी आगे थी। किसी की भेंट भी उसे अच्छी नहीं लगती थी।

यदि कोई उसे इत्र भेंट करता, तो वह कहती मुझे नहीं चाहिए क्योंकि मैं तो रोज नहाती हूँ। लेखिका की तीसरे नंबर की बहन चित्रा थी। वह कॉलेज में पढ़ती थी। वह स्वयं पढ़ने के स्थान पर दूसरों को पढ़ाने में अधिक रुचि रखती थी। इस कारण उसे परीक्षा में कम अंक मिलते थे। उसने स्वयं एक लड़के को पसंद करके अपने विवाह का निर्णय लिया था, जबकि उस लड़के, लड़के के माता-पिता तथा लेखिका के माता-पिता को भी यह पता नहीं था। उसने उस लड़के को पहली मुलाकात में ही अपना निर्णय बता दिया था और वह उससे विवाह करने के लिए तैयार हो गया था।

लेखिका की सबसे छोटी बहन अचला ने पिता के कथनानुसार अर्थशास्त्र, पत्रकारिता आदि की पढ़ाई करके उनकी इच्छा के अनुरूप ही विवाह किया। वह भी परंपरा के अनुसार न चलकर तीस वर्ष की होते ही लिखने लग गई थी। उन सब बहनों में एक बात एक-सी रही कि उन सबने घर-परिवार परंपरागत रूप से न चलाते हुए भी परिवार को तोड़ा नहीं। शादी एक बार की और उसे कायम रखा। शादी के बाद लेखिका को बिहार के छोटे-से कस्बे डालमिया नगर में रहना पड़ा, जहाँ फ़िल्म देखते समय स्त्री-पुरुष को पति-पत्नी होते हुए भी अलग-अलग बैठना पड़ता था।

वह वहाँ दिल्ली के कॉलेज में नौकरी छोड़कर गई थी। उसे नाटकों में अभिनय करने का शौक था। वहाँ उसने साल भर में ही अकाल राहत कोष के लिए नाटक किया था। कर्नाटक के बागलकोट में रहते हुए उसने बच्चों के लिए स्कूल भी चलाया और उसे कर्नाटक सरकार से मान्यता भी दिलवाई। लेखिका बहुत ज़िद्दी थी। अपने लेखन को भी उसने अपनी ज़िद्द से ही आगे चलाया था। लेकिन वह स्वयं को अपनी छोटी बहन रेणु के बराबर नहीं पहुँचा पाई थी। उदाहरणस्वरूप उन्नीस सौ पचास के आखिरी दिनों में दिल्ली में खूब वर्षा हो रही थी। सब यातायात ठप्प था।

रेणु को स्कूल बस लेने नहीं आई थी। सबने उसे समझाया कि स्कूल बंद होगा, मत जाओ। स्कूल में फोन था, पर वह भी ठप्प था। किसी का कहना न मानकर वह पैदल ही स्कूल चल दी। वह सड़क पर फैले पानी में दो मील पैदल चलकर स्कूल पहुँची और स्कूल बंद देखकर दो मील चलकर वापस घर पहुँची। सबने उसे कहा कि हमने तो पहले ही कह दिया था। उसने उसे भी नहीं माना। लेखिका को लगा कि रेणु का इस प्रकार पानी में लब-लब करते, सुनसान शहर में निपट अकेले अपनी ही धुन में मंज़िल की तरफ चले जाना-इस अकेलेपन का मजा ही और था।

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कठिन शब्दों के अर्थ :

  • ज्ञाहिर – स्पष्ट
  • मर्म – रहस्य, भेद
  • परदानर्शी – परदा करने वाली
  • इज़हार – व्यक्त करना, प्रकट करना
  • मुहज्तोर – बहुत बोलने वाली
  • लिहाज़ – व्यवहार
  • नज़ाकत – सुकुमारता
  • हैरतअंगेज़ – आश्चर्यजनक
  • फ़रमा बरदार – आज्ञाकारी
  • जुनून – सनक
  • दरअसल – वास्तव में
  • बाशिंदों – निवासियों
  • अभिभूत – वशीभूत
  • ख्वाहिश – इच्छा
  • रज़ामंदी – स्वीकार करना
  • मुस्तैद – चुस्त
  • फ़ायदा – लाभ
  • फ़ज़ल – कृपा, दया
  • अपरिग्रह – संग्रह न करना
  • पोशीदा – गुप्त रखना, छिपाना
  • वाजिब – उचित
  • बदस्तूर – नियमपूर्वक
  • आरजू – इच्छा
  • गुमान – अनुमान, कल्पना
  • जुस्तजू – तलाश, खोज
  • जुगराफ़िया – भूगोल, नक्शा
  • अकबकाया – घबराया
  • जश्न – समारोह
  • शिरकत – शामिल होना, भाग लेना
  • इजाज़त – आज्ञा
  • मोहलत – अवकाश
  • फ़ारिग – काम से खाली होना
  • खरामा-खरामा – धीरे-धीरे
  • इसरार – आग्रह
  • मलाल – खेद, दुख

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 1 इस जल प्रलय में

Jharkhand Board JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 1 इस जल प्रलय में Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 1 इस जल प्रलय में

JAC Class 9 Hindi इस जल प्रलय में Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
बाढ़ की खबर सुनकर लोग किस तरह की तैयारी करने लगे ?
उत्तर :
बाढ़ की खबर सुनकर लोग सुरक्षित स्थानों पर जाने लगे। लोगों ने अपने घर में ईंधन, आलू, मोमबत्ती, दियासलाई, पीने का पानी, कांपोज़ की गोलियाँ, पत्र-पत्रिकाएँ आदि एकत्र करके रख ली, जिससे बाढ़ के दिनों में उन्हें खाने-पीने की तकलीफ़ न हो तथा बाढ़ के कारण घर से न निकल पाने की स्थिति में पत्रिकाएँ पढ़कर समय व्यतीत किया जा सके।

प्रश्न 2.
बाढ़ की सही जानकारी लेने और बाढ़ का रूप देखने के लिए लेखक क्यों उत्सुक था ?
उत्तर :
लेखक बचपन से ही बाढ़ पीड़ित क्षेत्रों में ब्वॉय स्काउट, स्वयंसेवक, राजनीतिक कार्यकर्ता अथवा रिलीफ़ वर्कर के रूप में कार्य करता रहा है। इसलिए जब उसने सुना कि पटना के राजभवन, मुख्यमंत्री – निवास, राजेंद्रनगर, कंकड़बाग आदि क्षेत्रों में बाढ़ का पानी घुस आया है, तो वह बाढ़ के इस रूप को देखने के लिए उत्सुक हो उठा। अपनी इसी मनोवृत्ति के कारण बाढ़ की सही स्थिति जानने के लिए लेखक स्वयं अपनी आँखों से बाढ़ को देखना चाहता था।

प्रश्न 3.
सबकी जबान पर एक ही जिज्ञासा-‘पानी कहाँ तक आ गया है ?’- इस कथन से जनसमूह की कौन-सी भावनाएँ व्यक्त होती हैं ?
उत्तर :
‘पानी कहाँ तक आ गया है’- लोगों के इस कथन से यह ज्ञात होता है कि लोग बाढ़ की विभीषिका से चिंतित थे। उनमें यह जानने की इच्छा भी थी कि बाढ़ का पानी कहाँ तक पहुँचा है, जिससे वे यह अनुमान लगा सकें कि उनका क्षेत्र बाढ़ से कितना सुरक्षित है अथवा क्या उन तक भी बाढ़ का पानी पहुँच सकता है। वे अपनी तथा अपने परिवार की बाढ़ से सुरक्षा करने के लिए प्रयत्नशील थे।

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प्रश्न 4.
‘मृत्यु का तरल दूत’ किसे कहा गया है और क्यों ?
उत्तर :
मृत्यु का तरल दूत बाढ़ के उफनते तथा तेज़ी से सबको अपने अंदर डुबोते हुए पानी को कहा गया है। बाढ़ का पानी जिस-जिस क्षेत्र में जा रहा था, वहाँ अपनी गति और तेज़ी से सबको डुबोता जा रहा था। इसलिए जब लेखक अपने मित्र के साथ रिक्शा पर बैठकर बाढ़ देख रहा था, तो भीड़ में से एक आदमी ने उन्हें सावधान करते हुए कहा था कि करेंट बहुत तेज़ है; आगे मत जाओ।

प्रश्न 5.
आपदाओं से निपटने के लिए अपनी तरफ़ से कुछ सुझाव दीजिए।
उत्तर :
आपदाओं से निपटने के लिए हमें सदा सचेत रहना चाहिए। पानी की निकासी के लिए नगर के नालों की सफ़ाई वर्षा ऋतु से पहले ही करवा देनी चाहिए। प्लास्टिक, पोलीथीन आदि से निर्मित वस्तुओं को नालों, सीवरों आदि में नहीं डालना चाहिए। नदियों में गंदगी प्रवाहित नहीं करनी चाहिए। इससे नदियों की गहराई कम हो जाती है। अपने घर में पर्याप्त खाद्य सामग्री, पेयजल, ईंधन, आवश्यक दवाइयाँ आदि रख लेनी चाहिए।

प्रश्न 6.
‘ईह ! जब दानापुर डूब रहा था तो पटनियाँ बाबू लोग उलटकर देखने भी नहीं गए… अब बूझो !’ – इस कथन द्वारा लोगों की किस मानसिकता पर चोट की गई है ?
उत्तर :
इस कथन के द्वारा लेखक ने उन लोगों की मानसिकता पर चोट की है, जो अपनी चिंता तो करते हैं परंतु उन्हें दूसरों की कोई परवाह नहीं होती। पटना में बाढ़ आने पर सब लोग चिंतित थे तथा अपने-अपने बचाव में लगे हुए थे। लेकिन कुछ तमाशबीन बाढ़ का नज़ारा देखकर अपना मन बहला रहे थे। इसके विपरीत जब बिहार के किसी अन्य क्षेत्र में बाढ़ आती है, तो उन लोगों की दयनीय दशा की कोई चिंता नहीं करता और न ही कोई वहाँ की दुर्दशा देखने जाता है।

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प्रश्न 7.
खरीद-बिक्री बंद हो चुकने पर भी पान की बिक्री अचानक क्यों बढ़ गई थी ?
उत्तर :
जब पटना में बाढ़ आई, तो दुकानदारों ने अपनी दुकानें बंद करके दुकान का सामान सुरक्षित स्थानों अथवा दुकान की ऊपर की मंज़िल पर पहुँचाना शुरू कर दिया था। इससे समस्त व्यापारियों की खरीद-बिक्री बंद हो गई थी। इस स्थिति में भी पानवालों की बिक्री अचानक इसलिए बढ़ गई थी, क्योंकि लोग पान वाले की दुकान पर लगे ट्रांजिस्टर से आकाशवाणी पटना द्वारा प्रसारित बाढ़ से संबंधित समाचारों को सुन रहे थे। इन समाचारों को सुनते हुए वे पान भी चबा रहे थे।

प्रश्न 8.
जब लेखक को यह अहसास हुआ कि उसके इलाके में भी पानी घुसने की संभावना है तो उसने क्या-क्या प्रबंध किए ?
उत्तर :
लेखक को जनसंपर्क विभाग की घोषणा से ज्ञात हुआ कि बाढ़ का पानी रात्रि के बारह बजे तक लोहानीपुर, कंकड़बाग और राजेंद्रनगर में घुस जाएगा। उसे अहसास हुआ कि उसके क्षेत्र में भी बाढ़ का पानी आ सकता है, इसलिए वह अपनी पत्नी से पूछता है कि गैस की क्या स्थिति है ? पत्नी के उत्तर से लगता है कि फिलहाल काम चल जाएगा। वह घर में खाद्य सामग्री, पीने का पानी, पढ़ने के लिए पत्रिकाओं, दवा आदि का प्रबंध भी कर लेता है।

प्रश्न 9.
बाढ़ पीड़ित क्षेत्र में कौन-कौन सी बीमारियों के फैलने की आशंका रहती है ?
उत्तर :
बाढ़ पीड़ित क्षेत्रों में मलेरिया, हैजा, प्लेग, पैर की उँगलियों के सड़ने, तलवों में घाव होने, दस्त लगने, बुखार आदि बीमारियों के फैलने की आशंका रहती है।

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प्रश्न 10.
नौजवान के पानी में उतरते ही कुत्ता भी पानी में कूद गया। दोनों ने किन भावनाओं के वशीभूत होकर ऐसा किया ?
उत्तर :
सन् 1949 में महानंदा की बाढ़ से घिरे वापसी थाना के एक गाँव में लेखक रिलीफ़ कार्य के लिए नौका लेकर गया। नौका पर एक डॉक्टर साहब भी थे। उन्हें गाँव के कई बीमारों को नाव पर चढ़ाकर कैंप लाना था। एक बीमार नौजवान के साथ उसका कुत्ता भी नाव पर चढ़ आया। जब डॉक्टर साहब ने नौजवान के साथ कुत्ते को ले जाने से मना कर दिया, तो नौजवान कहकर पानी में उतर गया कि कुत्ता नहीं जाएगा तो मैं भी नहीं जाऊँगा उसके पीछे-पीछे कुत्ता भी पानी में कूद गया। इससे इन दोनों की एक-दूसरे के प्रति असीम स्नेह की भावना व्यक्त होती है।

प्रश्न 11.
‘अच्छा है, कुछ भी नहीं। कलम थी, वह भी चोरी चली गई। अच्छा है, कुछ भी नहीं-मेरे पास।’ मूवी कैमरा, टेप रिकॉर्डर आदि की तीव्र उत्कंठा होते हुए भी लेखक ने अंत में उपर्युक्त कथन क्यों कहा ?
उत्तर :
लेखक चाहता था कि यदि उसके पास मूवी कैमरा होता, तो वह इस बाढ़ के दृश्य की फ़िल्म बनाता और टेप रिकॉर्डर में वह उन सब ध्वनियों को रिकॉर्ड करता जो इस बाढ़ के कारण उत्पन्न हो रही थीं। इनके अभाव में वह बाढ़ पर लेख लिखना चाहता था, परंतु कलम चोरी हो जाने से वह ऐसा भी नहीं कर पाया। अंत में वह ‘अच्छा हैं, कुछ भी नहीं – मेरे पास’ इसलिए कहता है क्योंकि इन सबके अभाव में वह इस बाढ़ की विभीषिका को पूर्ण रूप से अपने मन में संजोकर रख सका है।

प्रश्न 12.
आपने भी देखा होगा कि मीडिया द्वारा प्रस्तुत की गई घटनाएँ कई बार समस्याएँ बन जाती हैं, ऐसी किसी घटना का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मीडिया द्वारा पूरी तरह से जाँचे – परखे बिना प्रस्तुत की गई घटनाएँ ही समस्याएँ बन जाती हैं। अभी – अभी समस्त संचार माध्यम यह प्रसारित कर रहे हैं कि ‘क’ देश का एक निर्दोष व्यक्ति गलती से सीमा पार कर ‘ख’ देश में चला गया है, जिसे वहाँ की सरकार आतंकवादी मानकर फाँसी की सज़ा दे रही है। ‘क’ देश उस निर्दोष को छोड़ने के लिए ‘ख’ देश से अनुरोध करता है, तो ‘ख’ देश उसके बदले में ‘क’ देश में फाँसी की सजा पाए हुए अपने नागरिक को देने के लिए कहता है। ‘ख’ देश का वह व्यक्ति अपराधी है। जब ‘ख’ देश से पूछा गया, तो उन्होंने इस प्रकार के किसी भी प्रस्ताव से इनकार कर दिया। इस प्रकार मीडिया द्वारा प्रस्तुत यह अस्पष्ट घटना समस्या बन गई।

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प्रश्न 13.
अपनी देखी-सुनी किसी आपदा का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
26 जनवरी का वह दर्दनाक दिन कभी भी भुलाया नहीं जा सकता, जब गुजरात के सब लोग दूरदर्शन पर गणतंत्र दिवस की परेड देख रहे थे कि अचानक आए भूकंप ने सारे प्रदेश को ही नहीं देश-विदेश को भी हिलाकर रख दिया। बड़े-बड़े भवन धराशायी हो गए थे और उनमें दबे हुए लोगों की चीख-पुकार से वातावरण त्रस्त था। हज़ारों दबकर मर गए। घायलों की संख्या भी अनगिनत थी। एक दुधमुँहा बालक सीढ़ियों के नीचे से सुरक्षित निकल आया था, पर उसे दूध पिलाने वाली माँ जीवित नहीं थी। राहत कार्य युद्ध- स्तर पर हो रहे थे। आवाज़ के भंडार खोल दिए गए थे। जगह-जगह राहत सामग्री पहुँचाई जा रही थी। रोते-बिलखते लोगों की दयनीय दशा सभी को व्यथित कर रही थी।

JAC Class 9 Hindi इस जल प्रलय में Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
लेखक का गाँव किस क्षेत्र में था ? वहाँ लोग क्यों आते थे ?
उत्तर :
लेखक का गाँव बिहार राज्य के ऐसे क्षेत्र में था जहाँ प्रतिवर्ष पश्चिम, पूर्व और दक्षिण की कोसी, पनार, महानंदा व गंगा की बाढ़ से पीड़ित प्राणियों के समूह सावन-भादों में आकर वहाँ शरण लेते थे क्योंकि लेखक के गाँव की धरती परती थी।

प्रश्न 2.
लेखक को बाढ़ से घिरने का पहली बार अनुभव कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर :
लेखक को बाढ़ से घिरने का पहली बार अनुभव सन् 1967 ई० में पटना में हुआ था। तब वहाँ लगातार अट्ठारह घंटे वर्षा हुई थी। इस वर्षा के कारण पुनपुन नदी का पानी पटना के राजेंद्रनगर, कंकड़बाग आदि निचले क्षेत्रों में घुस गया था। लेखक इसी क्षेत्र में रहता था, इसलिए उसने बाढ की इस विभीषिका को एक आम शहरी आदमी के रूप में भोगा था।

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प्रश्न 3.
मनिहारी में बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए लेखक द्वारा क्या ले जाना आवश्यक था ?
उत्तर :
सन् 1947 ई० में लेखक गुरुजी अर्थात् सतीनाथ भादुड़ी के साथ गंगा की बाढ़ से पीड़ित मनिहारी क्षेत्र के लोगों की सहायता के लिए नाव पर गया। वहाँ लोगों के पैरों की उँगलियाँ पानी में रहने के कारण सड़ गई थीं तथा उनके तलवों में भी घाव हो गए थे, जिसके इलाज के लिए सबने इनसे ‘पकाही घाव’ की दवा माँगी। इसके अतिरिक्त उन लोगों को किरासन तेल और दियासलाई की भी ज़रूरत होती थी। इसलिए लेखक इन तीनों वस्तुओं को बाढ़ पीड़ितों में बाँटने के लिए अपनी नाव पर अवश्य रखता था।

प्रश्न 4.
परमान नदी की बाढ़ में डूबे हुए मुसहरों की बस्ती में जब लेखक राहत सामग्री बाँटने गया, तो वहाँ कैसा दृश्य था ?
उत्तर :
लेखक जब अपने साथियों के साथ मुसहरों की बस्ती में राहत सामग्री बाँटने गया, तो वहाँ ढोलक और मंज़ीरा बजने की आवाज़ आ रही थी। वहाँ एक ऊँचे मंच पर बलवाही नाच हो रहा था। कीचड़ भरे पानी में लथपथ भूखे-प्यासे नर-नारियों का झुंड खिलखिला रहा था।

प्रश्न 5.
सन् 1967 में पुनपुन नदी के पानी के राजेंद्रनगर में घुस आने पर वहाँ के सजे-धजे युवक-युवतियों ने क्या किया था ?
उत्तर :
सन् 1967 में जब पुनपुन नदी का पानी राजेंद्रनगर में आ गया था, तब वहाँ के कुछ सजे-धजे युवक-युवतियों ने नौका विहार करने का मन बनाया। वे नौका में बैठकर स्टोव पर केतली चढ़ाकर कॉफी बना रहे थे; साथ में बिस्कुट थे तथा ट्रांजिस्टर पर फ़िल्मी गाने बज रहे थे। एक लड़की कोई सचित्र पत्रिका पढ़ रही थी। जब यह नौका लेखक के ब्लॉक के पास पहुँची, तो छतों पर खड़े लड़कों ने इन पर छींटाकसी करके उन्हें वहाँ से भगा दिया।

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प्रश्न 6.
लेखक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से किस प्रकार जुड़ा हुआ था ?
उत्तर :
लेखक का जन्म परती क्षेत्र अर्थात् जहाँ की भूमि खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती, वहाँ हुआ था। अन्य क्षेत्रों में बाढ़ आने पर लोग उनके क्षेत्र की ओर आते थे। उस समय वह ब्वॉय स्काउट, स्वयंसेवक, राजनीतिक कार्यकर्ता अथवा रिलीफ़ वर्कर की हैसियत से बाढ़ पीड़ित लोगों के लिए काम करता था। उस समय वह बाढ़ से पीड़ित लोगों की मानसिकता को समझने की कोशिश करता था। बाढ़ में संबंधित कई बातों का वर्णन लेखक ने अपने साहित्य में भी किया है।

प्रश्न 7.
पाठ के आधार पर बताइए कि लेखक ने बाढ़ पर क्या-क्या लिखा है ?
उत्तर :
लेखक ने सबसे पहले हाई स्कूल में बाढ़ पर एक लेख लिखा था, जिस पर उसे प्रथम पुरस्कार मिला था। बड़े होने पर उसने धर्मयुग में ‘कथा – दशक’ के अंतर्गत बाढ़ की पुरानी कहानी को नए रूप के साथ लिखा था। लेखक ने जय गंगा (1947), कोसी (1948), हड्डियों का पुल (1948) आदि छोटे-छोटे रिपोर्ताज लिखे हैं। उन्होंने अपने उपन्यासों में बाढ़ की विनाशलीला के अनेक चित्र अंकित किए हैं।

प्रश्न 8.
जिन लोगों का बाढ़ से पहली बार सामना होता है, उनकी बाढ़ के पानी को लेकर कैसी उत्सुकता होती है ?
उत्तर :
लेखक ने वैसे तो बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बहुत काम किया था, परंतु सन् 1967 में पटना में लेखक को बाढ़ के अनुभव से गुज़रना पड़ा। लोगों में बाढ़ के पानी को लेकर उत्सुकता थी। वह उसका जायजा लेने के लिए मौके पर पहुँचना चाहते थे। इसलिए लोग मोटर, स्कूटर, ट्रैक्टर, मोटर साइकिल, ट्रक, टमटम, साइकिल, रिक्शा आदि पर बैठकर पानी देखने जा रहे थे। जो लोग पानी देखकर लौट रहे थे, उनसे पानी देखने जाने वाले पूछते कि पानी कहाँ तक आ गया है ? जितने लोग होते उतने ही सवालों के जवाबों में पानी आगे बढ़ता जाता था। सबकी जुबान पर एक ही बात होती थी कि पानी आ गया है; घुस गया; डूब गया; बह गया।

प्रश्न 9.
बाढ़ वाले दिन गाँधी मैदान का दृश्य कैसा था ? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर :
बाढ़ वाले दिन सब तरफ पानी ही पानी था। गाँधी मैदान में पानी भर गया था। पानी की तेज़ धाराओं में दीवारों पर लगे लाल-पीले रंग के विज्ञापनों की परछाइयाँ रंगीन साँपों के समान लग रही थीं। हज़ारों की संख्या में लोग गाँधी मैदान की रेलिंग के सहारे खड़े पानी की तेज धाराओं को इस प्रकार उत्सुकता से देख रहे थे, जैसे कि दशहरे के दिन रामलीला के ‘राम’ के रथ की प्रतीक्षा करते हैं। गाँधी मैदान में होने वाले आनंद उत्सव, सभा-सम्मेलन और खेलकूद की यादों को गेरुए रंग के पानी ने ढक लिया था। वहाँ की हरियाली भी धीरे-धीरे पानी में विलीन हो रही थी। यह सब देखना लेखक के लिए एक नया अनुभव था।

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प्रश्न 10.
‘बाढ़ तो बचपन से ही देखता आया हूँ, किंतु पानी का इस तरह आना कभी नहीं देखा।’ लेखक ने ऐसा क्यों कहा ?
उत्तर :
लेखक बचपन से ही बाढ़ को देखता आ रहा था, बाढ़ पीड़ितों के लिए काम करता रहा था, परंतु उसने कभी बाढ़ के पानी को आते नहीं देखा था। उसने अपने जीवन में पहली बार बाढ़ के अनुभव को भोगा था। उसने पानी के आने का इंतजार किया था। लेखक सोचता है कि यदि यह पानी रात के समय आता तो उसका बुरा हाल हो जाता, क्योंकि रात के अँधेरे में पानी विकराल रूप धारण कर लेता है।

इस जल प्रलय में Summary in Hindi

पाठ का सार :

‘इस जल प्रलय में’ फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा रचित एक मर्मस्पर्शी रिपोर्ताज है, जिसमें उन्होंने सन् 1975 ई० में पटना में आई प्रलयंकारी बाढ़ का आँखों देखे हाल का वर्णन किया है। लेखक का गाँव एक ऐसे क्षेत्र में था, जहाँ की विशाल और परती जमीन पर सावन-भादों के महीनों में पश्चिम, पूर्व और दक्षिण में बहने वाली कोसी, पनार, महानंदा और गंगा की बाढ़ से पीड़ित मानव और पशुओं का समूह शरण लेता था। उन्हें देखने से ही उनके क्षेत्र में आई बाढ़ के भयंकर रूप का अनुमान हो जाता था।

परती क्षेत्र में जन्म लेने के कारण लेखक तैरना नहीं जानता, परंतु दस वर्ष की आयु से ही वह ब्वॉय स्काउट, स्वयंसेवक आदि के रूप में बाढ़ पीड़ितों की सहायता करता रहा है। हाई-स्कूल में बाढ़ पर लिखे लेख पर उसे प्रथम पुरस्कार मिला था। लेखक ने धर्मयुग में ‘कथा – दशक’, ‘जय गंगा’, ‘डायन कोसी’, ‘हड्डियों का प्रलय’ आदि अपनी रचनाओं में बाढ़ की विनाश-लीलाओं का वर्णन किया है। सन् 1967 ई० में जब पटना में अट्ठारह घंटे लगातार वर्षा होती रही, तो एक शहरी आदमी की हैसियत से लेखक ने भी इस बाढ़ की विभीषिका को झेला था।

पटना का पश्चिमी क्षेत्र जब छातीभर पानी में डूब गया, तो वह घर में खाद्य सामग्री, पीने का पानी आदि समेट कर बाढ़ के उतरने की प्रतीक्षा करने लगा। सुबह उसने सुना कि राजभवन और मुख्यमंत्री निवास में भी बाढ़ का पानी घुस गया है। दोपहर को पता चला कि गोलघर में भी पानी घुस आया है। सायं पाँच बजे लेखक अपने एक मित्र के साथ रिक्शे में बैठकर कॉफी हाउस तक बाढ़ के पानी की दशा देखने निकल पड़ा।

अन्य लोग भी अपने-अपने वाहनों पर पानी देखने निकल पड़े थे और सबकी एक ही जिज्ञासा थी कि पानी कहाँ तक आ गया है ? लोगों की बातचीत से लेखक को ज्ञात हुआ कि बाढ़ का पानी फ्रेजर रोड, श्रीकृष्णापुरी, पाटलिपुत्र कॉलोनी, बोरिंग रोड, वीमेंस कॉलेज आदि तक पहुँच गया था। कॉफी हाउस बंद था। पानी तेजी से उनकी ओर आ रहा था। वे रिक्शा मुड़वाकर अप्सरा सिनेमा हॉल से गांधी मैदान की ओर से निकले, तो देखा कि गांधी मैदान भी पानी से भर चुका था।

शाम को साढ़े सात बजे पटना के आकाशवाणी केंद्र ने घोषणा की कि पानी आकाशवाणी के स्टूडियो की सीढ़ियों तक पहुँच गया है। बाढ़ का पानी देखकर आ रहे लोग पान की दुकानों पर खड़े हँस-बोलकर समाचार सुन रहे थे, परंतु लेखक और उसके मित्र के चेहरों पर उदासी थी। कुछ लोग ताश खेलने की तैयारी कर रहे थे। राजेंद्रनगर चौराहे पर मैगजीन कॉर्नर पर पूर्ववत पत्र-पत्रिकाएँ बिक रही थीं।

लेखक कुछ पत्रिकाएँ लेकर तथा अपने मित्र से विदा लेकर अपने फ़्लैट में आ गया। वहाँ उसे जनसंपर्क विभाग की गाड़ी से लाउडस्पीकर पर की गई बाढ़ से संबंधित घोषणाएँ सुनाई दीं। उसमें सबको सावधान रहने के लिए कहा गया। लेखक पत्नी से गैस की स्थिति पूछता है तो वह बताती है कि फिलहाल बहुत है। रात गहरा रही है, परंतु बाढ़ के पानी के वहाँ तक आ जाने के भय से कोई सो नहीं पा रहा।

लेखक को सन् 1947 ई० में मनिहारी के क्षेत्र में गुरुजी के साथ गंगा की बाढ़ से पीड़ित क्षेत्र में नाव से जाने की याद आती है। चारों ओर पानी ही पानी था। एक द्वीप जैसे स्थान पर वह टाँगें सीधी करना चाहता था, तो गुरुजी ने उसे सावधान करते हुए कहा था कि पता नहीं वहाँ पहले से मौजूद लोग कुछ माँग न लें। इसके बाद लेखक को सन् 1949 ई० में महानंदा की बाढ़ से घिरे वापसी थाना के एक गाँव की याद आ जाती है।

इनकी नौका पर डॉक्टर भी थे। गाँव के कई बीमारों को नाव पर चढ़ाकर कैंप ले जाना था। वहाँ का एक बीमार नौजवान अपने साथ अपना कुत्ता भी ले जाना चाहता था। कुत्ता नहीं गया, तो वह भी नहीं गया। इसी प्रकार से परमान नदी की बाढ़ में डूबे मुसहरों की बस्ती में जब वे राहत सामग्री बाँटने गए, तो वहाँ के लोग भूखे-प्यासे होते हुए भी हँस-हँसकर ‘बलवाही’ नृत्य देख रहे थे। इसी संदर्भ में उसे सन् 1937 ई० की सिमरवनी-शंकरपुर की बाढ़ याद आ जाती है, जहाँ गाँव के लोग नाव के अभाव में केले के पौधे का भेला बनाकर काम चला रहे थे तथा जमींदार के लड़के नाव पर हारमोनियम-तबला के साथ जल-विहार कर रहे थे। गाँव के नौजवानों ने उनसे नाव छीन ली थी।

सन् 1967 ई० में जब पुनपुन का पानी राजेंद्रनगर में घुस गया, तो कुछ सजे-धजे युवक-युवतियों की टोली नाव पर स्टोव, केतली, बिस्कुट आदि लेकर जल-विहार करने निकले। उनके ट्रांजिस्टर पर ‘हवा में उड़ता जाए’ गाना बज रहा था। जैसे ही उनकी नाव गोलंबर पहुँची और ब्लॉकों की छतों पर खड़े लड़कों ने उनकी खिल्ली उड़ानी शुरू कर दी, तो वे दुम दबाकर हवा हो गए। रात के ढाई बज गए थे, पर पानी अभी तक वहाँ नहीं आया था।

लेखक को लगा कि शायद इंजीनियरों ने तटबंध ठीक कर दिया हो। चारों ब्लॉकों के लोग सोए नहीं थे, क्योंकि फ़्लैटों की रोशनियाँ जल-बुझ रही थीं। कुत्ते रह-रहकर भौंक रहे थे। लेखक को अपने उन मित्रों-संबंधियों की याद आ जाती है, जो पाटलिपुत्र कॉलोनी, श्रीकृष्णपुरी, बोरिंग रोड आदि क्षेत्रों में जल से घिरे हुए हैं। वह उनसे टेलीफ़ोन पर संपर्क करना चाहता है, पर टेलीफ़ोन डेड था।

बिस्तर पर करवटें बदलते हुए लेखक कुछ लिखने की सोचता रहा। उसे पिछले साल अगस्त में नरपतगंज थाना के चकरदाहा गाँव के पास छातीभर पानी में खड़ी उस गाय की याद आ जाती है, जो आजकल में ही बच्चा जनने वाली थी तथा उनकी ओर निरीह दृष्टि से देख रही थी। वह आँखें बंदकर उजले सफ़ेद भेड़ों के झुंड देखता है, जो कभी काले हो जाते हैं। तभी उसे झकझोर कर जगा दिया गया।

सुबह के साढ़े पाँच बज रहे थे। वह उठकर देखता है कि पश्चिम की ओर से थाने के सामने सड़क पर झाग-फेन लिए हुए बाढ़ का पानी आ रहा था। इसके साथ ही बच्चों का शोर भी सुनाई दे रहा था। लेकिन वह शोर बच्चों का न होकर मोड़ पर पानी के उछलने का स्वर था। पानी का पहला रेला ब्लॉक नंबर एक के पास पुलिस चौंकी के पीछे आया। फिर ब्लॉक नंबर चार के नीचे सेठ की दुकान की बायी तरफ लहरें पहुँच गईं।

लेखक दौड़कर छत पर चला गया। चारों ओर शोर और पानी की कलकल आवाज़ थी। सामने का फुटपाथ पार कर पानी अब तेज़ी से लेखक के फ़्लैट के पीछे बहने लगा। गोलंबर के पार्क के चारों ओर भी पानी था। पानी बहुत तेज़ गति से चढ़ रहा था। लेखक के घर के सामने की दीवार की ईंटें शीघ्रता से डूबती जा रही थीं। बिजली के खंभे का काला हिस्सा और ताड़ के पेड़ का तना भी डूब रहा था।

लेखक सोचता है कि यदि उसके पास मूवी कैमरा और टेप रिकॉर्डर होता, तो वह यह सारा दृश्य फ़िल्मा लेता। वह बाढ़ तो बचपन से देख रहा था, परंतु पानी का इस तरह आना उसने कभी नहीं देखा था। धीरे-धीरे गोल पार्क पानी में डूब गया। अब उनके चारों ओर पानी-ही-पानी था। वह बार-बार यही सोचता है कि काश उसके पास मूवी कैमरा, टेप रिकॉर्डर होता, कलम होती पर उसकी तो कलम भी चोरी हो गई थी। वह सोचता है कि अच्छा है कि आज उसके पास कुछ भी नहीं है।

JAC Class 9 Hindi Solutions Kritika Chapter 1 इस जल प्रलय में

कठिन शब्दों के अर्थ :

  • इलाका – क्षेत्र
  • पनाह – शरण
  • परती – जिस ज़मीन पर कुछ भी बोया-जोता नहीं जाता
  • विभीषिका – भयानकता, भयंकरता
  • अंदाज्ञा – अनुमान
  • अविराम – लगातार, बिना रुके, निरंतर
  • वृष्टि – वर्षा
  • प्लावित – पानी में डूब जाना
  • अबले – अब तक
  • अनवरत – लगातार
  • अनर्गल – व्यर्थ, बेतुकी
  • अनगढ़ – बेडौल
  • स्वगतोक्ति – अपने आप में बोलना
  • जिज्ञासा – जानने की इच्छा
  • तरल – द्रव्य
  • अस्पुट – अस्पष्ट
  • अनुनय – प्रार्थना, विनय
  • गैरिक – गेरुए रंग का
  • आच्छादित – ढका हुआ
  • शनै: शनै: – धीरे-धीरे
  • सर्वथा – बिलकुल
  • उत्कर्ण – सुनने को उत्सुक
  • आसन्न – निकट आया हुआ
  • माकूल – उचित
  • कारबारियों – व्यापारियों
  • प्रतिध्वनि – गूंज
  • सन्नाटा – खामोशी
  • स्मृतियाँ – यादें
  • आकुल – व्याकुल
  • बालू – रेत
  • बलवाही – एक लोक-नृत्य
  • रूदन – रोना
  • आसन्न प्रसवा – जो शीघ्र ही संतान उत्पन्न करने वाली हो
  • आ रहलौ है – आ गया है
  • अवरोध – रुकावट
  • पिछवाड़े – पिछला हिस्सा
  • कलरव – शोर
  • सशक्त – तेज़ी से
  • लोप – छिपना, दिखाई न देना

JAC Class 9 Hindi Solutions Sparsh Chapter 14 अग्नि पथ

Jharkhand Board JAC Class 9 Hindi Solutions Sparsh Chapter 14 अग्नि पथ Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 9 Hindi Solutions Sparsh Chapter 14 अग्नि पथ

JAC Class 9 Hindi अग्नि पथ Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –
(क) कवि ने ‘अग्नि पथ’ किसके प्रतीक स्वरूप प्रयोग किया है ?
(ख) ‘माँग मत’, ‘कर शपथ’, ‘लथपथ’ इन शब्दों का बार-बार प्रयोग कर कवि क्या कहना चाहता है ?
(ग) एक पत्र – छाँह भी माँग मत’ इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(क) कवि ने ‘अग्नि पथ’ मनुष्य के जीवन में आनेवाले संघर्षों और कठिनाइयों से भरे हुए दिनों के प्रतीक स्वरूप प्रयोग किया है।

(ख) ‘माँग मत’ शब्द के बार-बार प्रयोग से कवि यह सुनिश्चित करना चाहता है कि मनुष्य कभी किसी से कोई सहायता न माँगकर अपनी कठिनाइयों का समाधान स्वयं ही करेगा। ‘कर शपथ’ शब्दों की पुनरावृत्ति से कवि मनुष्य को कसम खाने के लिए कहता है कि वह कर्मठतापूर्वक बिना थके अपनी मंजिल की ओर बढ़ता जाएगा। ‘लथपथ’ शब्द के बार-बार प्रयोग से कवि यह सिद्ध करना चाहता है कि थका हुआ तथा खून-पसीने से सना हुआ होने पर भी मनुष्य अपने जीवन संघर्ष के मार्ग पर लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अग्रसर होगा।

(ग) इस पंक्ति के माध्यम से कवि मनुष्य को यह समझाता है कि यदि जीवन संघर्ष में कोई कठिनाई आती है तो उसका सामना भी उसे स्वयं ही करना चाहिए तथा किसी से किसी प्रकार की कोई सहायता नहीं लेनी चाहिए।

JAC Class 9 Hindi Solutions Sparsh Chapter 14 अग्नि पथ

प्रश्न 2.
निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए –
(क) तू न थमेगा कभी
तू न मुड़ेगा कभी
(ख) चल रहा मनुष्य है
अश्रु- स्वेद – रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ
उत्तर :
(क) कवि ने मानव से आग्रह किया है कि वह जीवन-मार्ग पर अग्रसर होते हुए कभी भी राह में रुकेगा नहीं। वह निराश नहीं होगा। कर्म से मुँह नहीं मोड़ेगा। वह निरंतर आगे बढ़ता जाएगा। तब तक वह आगे बढ़ेगा जब तक अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेता।
(ख) मनुष्य जीवन की राह में आगे बढ़ रहा है। वह आँसुओं, पसीने और खून से लथपथ है फिर भी आगे बढ़ रहा है। मंज़िल प्राप्त न कर पाने के कारण वह निराश हुआ था। उसने आँसू बहाए थे, पसीना बहाया था ताकि मंज़िल की प्राप्ति कर सके। जीवन संघर्ष में वह खून से लथपथ हुआ पर उत्साह नहीं त्यागा। वह आँसू-पसीने- खून से लथपथ मंजिल को प्राप्त करने के लिए बढ़ता ही गया।

प्रश्न 3.
इस कविता का मूलभाव क्या है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
‘अग्नि पथ’ कविता का मूल भाव मानव को जीवन के कठोर मार्ग पर निरंतर चलते रहने को प्रेरित करना है ताकि वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर सके। जीवन की राह पर चलते हुए हार जाना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन हारकर काम त्याग देना बुरा है। प्रत्येक व्यक्ति जीवन में सुखों की प्राप्ति की कामना करता है पर केवल कामना करने से इच्छाएँ पूरी नहीं हो जातीं। उनके लिए पसीना बहाना पड़ता है, संघर्ष करना पड़ता है और खून बहाना पड़ता है। मानव ने ऐसा ही किया है तभी तो वह अन्य सभी प्राणियों से श्रेष्ठ है। कवि ने प्रेरणा दी है कि हम जहाँ भी हैं उससे संतुष्ट न हों। हम आगे बढ़ें। निरंतर आगे बढ़ना ही जीवन है। आँसू, पसीने और खून से लथपथ होने पर भी लगातार आगे बढ़ते रहने चाहिए।

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योग्यता-विस्तार –

प्रश्न :
‘जीवन संघर्ष का ही नाम है’ इस विषय पर कक्षा में परिचर्चा का आयोजन कीजिए।
उत्तर :
विद्यार्थी अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करें।

परियोजना कार्य –

प्रश्न :
‘जीवन संघर्षमय है, इससे घबराकर थमना नहीं चाहिए’ इससे संबंधित अन्य कवियों की कविताओं को एकत्र कर एक एलबम
बनाइए।
उत्तर :
विद्यार्थी अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करें।

JAC Class 9 Hindi अग्नि पथ Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
कवि ने मानव से किस बात की शपथ लेने का आग्रह किया है और क्यों ?
उत्तर :
कवि ने मानव से आग्रह किया है कि वह जीवन की राह में आगे बढ़ता हुआ कभी निरुत्साहित नहीं होगा। जीवन की राह सरल नहीं है, यह बहुत कठोर है, पथरीली है पर इस पर आगे चलते हुए वह कभी थकान महसूस नहीं करेगा-न शारीरिक थकान और न मानसिक थकान। वह रास्ते में कभी नहीं रुकेगा। रुकना ही तो मौत है, जीवन की समाप्ति है। संभव है कि उसे जीवन की राह कठिन लगे और वह अपनी दिशा बदलना चाहे पर वह ऐसा न करे। हर रास्ता एक-सा ही कठिन कठोर है। वह वापिस न मुड़े बल्कि निरंतर आगे बढ़े। कवि मानव से इसी कर्मठता और गतिशील जीवन की शपथ लेने का आग्रह करता है।

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प्रश्न 2.
‘अग्नि पथ’ कविता की भाषा पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर :
ओज गुण से परिपूर्ण कविता की भाषा सामान्य नहीं है। उत्साह भाव से परिपूर्ण शब्दावली में प्रेरणा है जो मानव को गतिशील रहने के लिए प्रेरित करती है। वीर रस विद्यमान है। कवि ने कुछ शब्दों को बार-बार दोहराया है जिनके द्वारा वह अपनी बात पर बल देकर मानव को लड़ना सिखाता है। सीधे-सादे तत्सम-तद्भव शब्दों में प्रतीकात्मकता है। गतिशीलता का अनूठा गुण कवि की भाषा में विद्यमान है।

प्रश्न 3.
‘अग्नि पथ’ किसका प्रतीक है ?
उत्तर :
अग्नि-पथ मानव जीवन के मार्ग में आने वाली तरह-तरह की कठिनाइयों और मुसीबतों का प्रतीक है। जीवन एक संघर्ष है। इस संसार में किसी का भी जीवन सरल नहीं है। सभी की समस्याएँ भिन्न-भिन्न हैं जिनका सामना उन्हीं को करना होता है जिनके लिए वे समस्याएँ हैं, यही अग्नि पथ है।

प्रश्न 4.
वृक्ष जीवन में किसका बोध कराते हैं ?
उत्तर :
वृक्ष जीवन में सुखों का बोध कराते हैं। जीवन में संघर्ष के समान दूसरों से मिलने वाले सहारे वे वृक्ष हैं, जिनकी छाया में हम पल-भर के लिए विश्राम करते हैं, अपने जीवन के सुख ढूँढ़ते हैं। इनसे हमें अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने में मदद मिलती है।

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प्रश्न 5.
‘थकेगा’ शब्द से कवि का क्या अभिप्राय है ?
उत्तर :
कविता में ‘थकेगा’ शब्द विशेष अर्थ को प्रकट करता है। थकान दो प्रकार की होती है – शारीरिक और मानसिक। शारीरिक थकान कुछ विश्राम के बाद मिट जाती है पर मानसिक थकान व्यक्ति की दिशा बदल देती है। कवि नहीं चाहता कि जीवन में संघर्ष के मार्ग पर चलते हुए व्यक्ति थककर अपने जीवन के मार्ग को बदल दें।

प्रश्न 6.
‘तू न मुड़ेगा कभी’ में ‘मुड़ेगा’ शब्द में छिपे भाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कविता में कवि ने ‘मुड़ेगा ‘ शब्द का साभिप्राय प्रयोग किया है। जीवन के आरंभ में हम जिस राह पर आगे बढ़ते हैं, शुरू के दिनों में वह राह हमें कठोर और कठिन लगती है। हम सोचते हैं कि इस रास्ते को छोड़कर हम दूसरा पकड़ेंगे तो जल्दी ही मंजिल तक पहुँच जाएँगे। परंतु कवि यह नहीं चाहता है कि हम अस्थिर बुद्धि बनें और बार-बार रास्ता बदलें। इससे यह हो सकता है कि हम अंत में कहीं भी न पहुँच पाएँ।

प्रश्न 7.
कवि की दृष्टि में महान दृश्य क्या है ?
उत्तर :
कवि की दृष्टि में महान दृश्य यह है कि ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति मानव अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए निरंतर कठिन परिश्रम कर रहा है। इस तरह से वह अपने जीवन के साथ-साथ संसार का भी भाग्य सँवार रहा है।

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प्रश्न 8.
‘चल रहा मनुष्य है’ से कवि का क्या अभिप्राय है ?
उत्तर :
‘चल रहा मनुष्य है’ से कवि का अभिप्राय यह है कि अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा कर्मशील मानव कर्मरत है। वह कठिन परिश्रम में लीन है। वह निरंतर विकास मार्ग पर आगे बढ़ रहा है। चाहे उसके लक्ष्य की राह में अनेक रुकावटें आएँ, परंतु वह अपने दृढ़ निश्चय और निरंतर आगे बढ़ने की सोच से उन सबको पार करके अपना लक्ष्य प्राप्त कर रहा है।

प्रश्न 9.
‘अश्रु, स्वेद, रक्त’ का प्रतीकार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
‘अश्रु’ असहायता, निराशा और पीड़ा के भावों को प्रकट करता है, ‘स्वेद’ परिश्रम अर्थात् कठोर परिश्रम करके निकलने वाले पसीने को प्रकट करता है, जबकि ‘रक्त’ क्रांति, मुकाबले, संघर्ष और जुझारू प्रवृत्ति का प्रतीक है। कोई भी व्यक्ति कुछ प्राप्त न कर पाने से निराश होता है, पीड़ा अनुभव करता है और फिर उस पर विजय प्राप्त करने के लिए मेहनत करता है, पसीना बहाता है कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए अंततः विजय प्राप्त कर अपनी मंजिल पा लेता है।

अग्नि पथ Summary in Hindi

कवि-परिचय :

जीवन-परिचय – हरिवंशराय बच्चन आधुनिक युग के लोकप्रिय गीतकार हैं। इनका जन्म इलाहाबाद में 27 नवंबर, सन् 1907 को हुआ था। इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में एम० ए० की उपाधि प्राप्त की थी। कुछ समय तक अध्यापन कार्य भी किया। सन् 1952 में इंग्लैंड गए। वहाँ उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी भाषा में पी-एच० डी० की उपाधि प्राप्त की। कुछ समय तक आकाशवाणी में भी कार्य किया। सन् 1955 में इनकी नियुक्ति भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के पद पर हुई। सन् 1966 में ये राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुए। इन्हें भारत सरकार ने ‘पद्मभूषण’ सम्मान से सम्मानित किया था। इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था। 19 जनवरी, सन् 2003 को इनका निधन हो गया था।

रचनाएँ – ‘बच्चन’ जी ने किशोरावस्था में ही कविता लिखनी प्रारंभ कर दी थी। एम० ए० के अध्ययन काल में इन्होंने फ़ारसी भाषा के प्रसिद्ध कवि ‘उमर खय्याम’ की रूबाइयों का हिंदी में अनुवाद किया। इस अनुवाद के परिणामस्वरूप वे नवयुवकों के प्रिय कवि बन गए। कवि का उत्साह बढ़ गया। तेरा द्वार, मधुशाला, मधुबाला, एकांत संगीत, मधुकलश, निशा- निमंत्रण, रूपरंगिनी, टूटती चट्टानें आदि इनकी प्रसिद्ध काव्य-कृतियाँ हैं। ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ तथा ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ इनकी आत्म – कथात्मक गद्य कृतियाँ हैं।

काव्य की विशेषताएँ – बच्चन जी की कविता में मस्ती का आलम है। अपनी कविताओं में जीवन संबंधी विविध अनुभूतियों के चित्रण में इन्हें विशेष सफलता प्राप्त हुई है। इनकी कविताओं में जीवन का जो संघर्ष व्यक्त हुआ है, वह परिस्थितियों के भँवर में फँसे मानव को जीवन-पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। इनके काव्य में प्रेम, सौंदर्य, मस्ती, निराशा आदि सभी अनुभूतियों की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। कवि की रसिकता के पूर्ण दर्शन ‘मधुशाला’ में होते हैं। इस रचना में मात्र मस्ती का ही वर्णन नहीं, अपितु क्रांति और विद्रोह का स्वर भी है। इनकी कविता के ऊपर गांधीवाद का भी प्रभाव लक्षित होता है।

बच्चन जी को गीत लिखने में विशेष सफलता प्राप्त हुई है। इनके गीतों में संक्षिप्तता, लयात्मकता तथा संगीतात्मकता का सुंदर समन्वय है। इनकी भाषा सरल और प्रसाद गुण संपन्न है। भाषा पर उर्दू और फ़ारसी के प्रचलित शब्दों का भी प्रभाव है।

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कविता का सार :

‘अग्निपथ’ हरिवंशराय बच्चन द्वारा रचित एक उद्बोधनात्मक कविता है। इस कविता में कवि ने मनुष्य को यह प्रेरणा दी है कि जीवन एक संघर्ष है। इससे घबराकर भागना नहीं चाहिए बल्कि संघर्षों का सामना करते हुए निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना चाहिए। अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए हमें किसी से सहारा नहीं माँगना चाहिए तथा अपनी मंज़िल की ओर बिना थकान महसूस किए बढ़ते रहना चाहिए। आँसू, पसीने और रक्त से लथपथ होकर भी कर्मठ मनुष्य निरंतर अपने पथ पर आगे ही बढ़ता जाता है। ऐसा कर्मवीर ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाता है।

व्याख्या :

1. अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ !
वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने, हों बड़े,
एक पत्र – छाँह भी माँग मत, माँग मत, माँग मत !
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ !

शब्दार्थ पत्र पत्ता। छाँह – छाया। अग्निपथ कठिनाइयों से भरा रास्ता।

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हरिवंशराय बच्चन द्वारा रचित कविता ‘अग्निपथ’ में से ली गई हैं। इस कविता में कवि ने मानव जीवन को संघर्षमय मार्ग बताकर उस पर निरंतर गतिमान रहते हुए अपना लक्ष्य प्राप्त करने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या : कवि कहता है कि यह जीवन संघर्षमय है। अपनी मंज़िल की ओर बढ़ते हुए मनुष्य को रास्ते में चाहे कितने ही सुख रूपी घने वृक्ष हों उनसे एक पत्ते के बराबर भी सुख रूपी छाया का आश्रय नहीं लेना चाहिए, अपतु जीवन के संघर्ष – पथ पर निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए।

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2. तू न थकेगा कभी!
तू न थमेगा कभी!
तू न मुड़ेगा कभी ! – कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ !

शब्दार्थ : थकेगा – थकना। थमेगा – रुकना। शपथ झकसम।

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हरिवंशराय बच्चन द्वारा रचित कविता ‘अग्नि पथ’ में से ली गई हैं। इस कविता में कवि ने मनुष्य को निरंतर संघर्षशील रहकर अपना लक्ष्य प्राप्त करने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या : कवि संघर्ष पथ पर चलने वाले मनुष्य का उत्साहवर्धन करते हुए कहता है कि जीवन के संघर्षपूर्ण मार्ग पर चलते हुए तुम कभी मत थकना और न ही कभी रुकना। तुम पीछे मुड़कर भी कभी न देखना। तुम कसम खाओ कि तुम निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते जाओगे।

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3. यह महान दृश्य है –
चल रहा मनुष्य है
अश्रु- स्वेद – रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ !
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

शब्दार्थ : अश्रु आँसू। स्वेद पसीना। रक्त – खून। लथपथ – सना हुआ।

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हरिवंशराय बच्चन द्वारा रचित कविता ‘अग्निपथ’ में से ली गई हैं। इस कविता में कवि ने मनुष्य को निरंतर संघर्षशील रहकर अपनी मंज़िल प्राप्त करने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या : कवि मनुष्य के निरंतर संघर्षरत रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहने के दृश्य का वर्णन किया है। वह कहता है कि यह कितना महान दृश्य है कि मनुष्य आँसुओं, पसीने और रक्त से सना हुआ होने पर भी अपने जीवन की कठिनाइयों का सामना करते हुए निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता चला जा रहा है।

JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing

JAC Board Class 10th English Analytical Paragraph Writing

JAC Class 10th English Analytical Paragraph Writing Textbook Questions and Answers

An analytical paragraph is a body paragraph. It presents evidence in order to prove the thesis. In it, specific words, phrases or ideas are found as evidence. There is specific connection between the evidence and the topic sentence. Its main goal is to explain something bit by bit to enhance understanding. Analytical paragraph is written about the analysis of a text, a process or an idea. Map is actually a diagram that displays information visually. It can be created using pen and paper. The rules for creating a map are simple.

  • Write the subject in the centre of paper.
  • Write meaningful keyword to explain them.

JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing

CHART:

You must have seen graphs, charts, etc., in the newspapers, magazines, books, etc. The main purpose of chart is to show numerical facts in visual form so that they can be understood quickly, easily and clearly.

These are actually visual representation of data collected.
There are various methods through which data can be presented quickly.

1. Bar chart: Bar chart is one of the most popular and commonly used methods of presenting data. It makes the comparative study of data easy. It consists of a group of bars which are equi-distance from each other. Bar charts are read by the measurement of the length or the height of the bars. It is used for the clarity of presentation. The example is as follows:
JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing 1
2. Pie chart: Pie chart is used to compare a part of whole. It is used to represent a circular representation of data. Each part is in proportion to its share of the whole data. In circular figure, it is divided into different sectors or segments.
JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing 2
3. Tabular presentation: It is one of the most common forms of data presentation.
Production of steel and sales in rupees

Year(Production)Sales (in Rupees)
20151500 tons3 crore
20161650 tons4.5 crore
20171725 tons5.10 crore
20181850 tons6.3 crore
20191990 tons6.75 crore

JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing

4. X-Y charts: X-Y charts are represented on x-y planes. In this type of charts, the data are represented on x-y planes. In it, one axis represents one or more variable while the other axis represents an another variable. The example is as follows:
JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing 3
5. Histogram: Histogram is a bar graph that shows data in intervals. It can be represented in the following manner.

Weights (kg)20-3030-4040-5050-6060-70
No. of persons08101618

JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing 4
Vertical Bar Diagram: In the table given, the birth rate in India has been given according to census survey of different years. Put the information in the form of a vertical simple bar diagram.

Year1950-601961-701971-801981-901991-2000
Birth Rate4333292725

JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing 5
In the bar diagram discussed above, the birth rate in India has been explained in detail. The birth rate in India in 1950-60 was 43 while in 1961-70, decreased up to 33. As the year advanced, the birth rate of India decreased substantially and in 1971-80, it was 29. While in 1981-90, it decreased up to 27 and in 1991-2000, it came to its lowest, i.e., 25.

JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing

Horizontal Bar Diagram:
JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing 6
In the given diagram, the category of students and the marks obtained by them have been shown. The students of 19 category obtained 250 marks while the category of B obtained 200 marks. The category of students C obtained 150 marks, while the D category of students obtained 100 marks.

Analytical reports: Analytical reports are one of the most important business intelligence components. It is a type of business report that uses qualitative and quantitative company data to analyse as well as evaluate a business strategy or process. Analytical reporting is based on historical data statistics and can also deliver predictive analysis of a specific issue.

Hints for data interpretation:

  • Go through the data carefully. Carefully calculate or interpret things.
  • Draw logical conclusion.
  • Interpret the data in a logical and systematic way.
  • Do not repeat unnecessary details.
  • Do not interpret or calculate things which are not mentioned in the data.
  • Do not exaggerate.
  • Write whatever is depicted or presented in data.

Line Graph

A set of statistical data presented on a graph paper is called a graph. But while presenting the data on a graph paper we get different points. Each point corresponds to a value of statistical series. A line graph has X and Y axis. All line graphs must have a title and a key. All the lines must be connected to the data points. The lines on a line graph can go in upward direction and in downward direction. Line graphs are able to answer the questions pertaining to data. A line graph may also be referred to as a line chart. Line graph can be used to compare different events, situations and information.

There are two axes of a line graph. The x-axis of a graph shows the occurrences and the categories being compared over time and the y-axis represents the scale. All the line graphs must have a title. It provides a general overview of what is being displayed. A line graph represents the event, situation and information being measured in due course of time.

Questions (Solved)

Question 1.
Observe the given graph and analyse the data. Monthly production of an iron factory in(Tons) and sales in (Lakhs) rupees.
JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing 7
Answer:
In the given graph the monthly production and sales of factory are shown. In the month of January, the production of company was 5,000 tons while the sale was 7,50,000 rupees. In February, the production increased more than half and sales also went upto 10,000,00 rupees. But there was a sharp decline in the production and even sales of iron in the month of March. In the month of April, the production and sale of iron increased at a tremendous pace. From April to May the sale and production of the company also increased but from May to June the sale and production increased slightly. So, from the above graph it can be inferred that there was upward and downward trend in both the sale and production of the iron.

JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing

Question 2.

Years

 

Depts.Number of workers
MarketingProductionOfficialAccountsHR
2014151255104
20152015010106
20162516015123
201730125878
20183510512069
201940170545
20204218008414

Study the table carefully and give detailed description of the given data logically.
Answer:
The figures in the data show that maximum number of workers were engaged in production and the minimum number of employees were engaged in Human Resource (HR) dept. The numbers of workers engaged in offices were the same in 2014 and 2019 respectively. The number of workers in production increased substantially except in 2017 and 2018. The number of workers in marketing increased substantially as the year advanced.

Question 3.

Years

 

Production of different types ol bike (in thousands)
KawasakiSuzukiYamahaZF-5
2008125130131135
2009140120125120
2010130115119118
2011135113120117
2012145118121112
2013150121120109

Study the table carefully and answer the following questions.
(i) The production of which type of bike decreased substantially?
Answer:
The production of ZF-5 bike decreased substantially.

(ii) Which type of bike witnessed more production?
Answer:
Kawasaki bike witnessed more production.

(iii) How much production of Kawasaki increased between 2012-13?
Answer:
It increased approximately 3%.

(iv) In which year do you find substantial increase in the production of all types of bike?
Answer:
In 2012, we find substantial increase in the production of all types of bike.

Question 4.
Given below is the turnout of voters including male and female of Maharashtra from 1990 to 2020. Interpret the data.

Election yearsVoters (%)Male (%)female (%)
199048.645.238.2
199550.542.560.3
200047.558.254.2
200555.250.352.0
201055.65249.1
201558.556.453.2
20206062.344.2

Answer:
The following details have been discussed through tabular presentation. It shows the details of turnout of voters in Maharashtra from 1990 to 2020. In the year 2020, the turnout of voters was 60%. The percentage of male voters was 62.3%. In the year 2020, and female voters was in maximum in 1995. The turnout of male voters increased subsequently from the year 1990 to 2020. In 2000, the turnout of voters was minimum, i.e., 47.5%. The turnout of female voters was least in 1990. So the data mentioned in the table shows that the voters turnout increased in maximum number of years. But in the case of female voters, it fluctuated; sometimes it increased and sometimes it decreased.

JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing

Question 5.
Observe the given figure carefully. It shows one weeks’ sales figures of cars of different companies in percentage. Also, interpret the data in detail.
JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing 8
Ans: The above details are of number of cars sold by different auto-companies. The total number of cars sold in a particular week is 10,000. the sales is divided and presented on the pie-chart in terms of swept area according to the percentage sale of a respective car manufacturing company. The exact number of different categories of cars is as follows:
(i) The exact number of the cars of Tata Motors is 5,000.
(ii) The number of cars sold by Maruti is 2,000.
(iii) The number of cars sold by Hyundai is 1,500.
(iv) The number of cars sold by Toyota is 1000.
(v) The number of cars sold used by Ferrari is 200.
(vi) The number of cars sold by Lamborghini is 300.

Question 6.
Study the pie-chart showing the % of pass out students of an engineering college from different states. Study the data and highlight the main trends that emerge out of your study in detail.
JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing 9
Answer:
The pie-chart dearly exhibits that the pass out percentage of Delhi students is the highest. The minimum pass% of students is from Maharashtra. After Delhi, the maximum percentage of pass out students is from Uttar Pradesh. Later on the percentage of pass out students is from Bihar. The pass out % of West Bengal and Madhya Pradesh is same. So, it can be said that the students of Delhi are more intelligent and hardworking.

Question 7.
Railway carriage charges for different cities.

CitiesMumbaiPuneBengaluruBhubaneshwar
Bengaluru30354048
Bhubaneshwar35334447
Mumbai435358
Pune55534460

Read the given table showing courier charges (₹) for sending 1 kg parcel from one city to the other. Interpret the given details.
Answer:
The above table shows railway carriage charges for sending 1 kg parcel from one city to another. Mumbai, Pune, Bengaluru and Bhubaneshwar are mentioned in the table. The charges for sending parcel from Bengaluru to Mumbai is the least. The highest charges for sending parcel is from Pune to Bhubaneshwar. If the cost per kg is assumed to be directly proportionate to the distance between the cities, then it can be inferred that the distance between Pune and Bhubaneshwar is the most.

JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing

Question 8.
Study the pie-chart and explain it in detail. The ABC Publishers invested crore on all the items.
JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing 10
Answer:
From the above details, it can be inferred that ABC publishers invested a major portion of the amount, i.e., 25 lakh on paper cost. The cost incurred on binding and printing was almost the same, i.e., 20 lakh each on both heads. About 15 lakh was invested on the royalty of authors. The promotion cost and miscellaneous cost was almost the same. It was l0 lakh on each head. So, it can be said tiat the ABC Publishers spent this amount on all the heads concerning to publishing sector.

Question 9.
Study the pie-chart given below and explain it in detail. In the year 2015, Regional Market shares value at 100 crore.
JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing 11
Answer:
In the above pie-chart, the market shares of a region in 2015 have been explained in detail. In the year 2015, on transport sector 50% amount, i.e., ₹50 crore was spent. About 25 crore rupees was spent on industry sector 14% amount i.e., ₹14 crore was spent on household expenditure. In comparison to household sector 9% amount, i.e., ₹9 crore was spent on agriculture. Only 2%, i.e. about 2 crore was spent in miscellaneous expense. So, it can be said that apart from others (Miscellaneous expenses) the market value of agriculture sector was the least.

Question 10.
The chart given below explains the ten causes of deaths in India. It includes the people of all ages due to various diseases. Using the information given in the chart, interpret the data accordingly and rationally. No additional information should be added in the answer.
Ten causes of Death
(People of all age groups)

Causes of DeathMale (%)Female (%)Total (%)
1. Heart Disease18.315.917.5
2. Respiration Disease10.18.39.2
3. Dairrhoeal Disease7.58.99.1
4. Fungal Disease5.43.24.2
5. Tuberculosis7.25.36.4
6. Malignancy3.93.33.6
7. Senility5.06.15.5
8. Fractures and Injuries4.02.83.4
9. Epidemic Disease8.97.56.7
10. Unintentional injuries4.34.44.3

Answer:
The chart mentioned above shows the data regarding the top ten causes of deaths in India. It is quite evident from the data that most deaths occurred due to heart diseases in India. About 17.5% of men and women died due to heart diseases in India. The males (18.3) and female (15.9) died due to heart diseases. As the data shows, due to respiratory diseases the number of deaths in India was 9.2 in total. Again males dominate over the female in respiration disease, i.e., 10.1% and 8.3% respectively. But the sorry state of affairs is that more female, i.e., 8.9% suffered due to diarrheal diseases. This disease was seen less in male rather thin a females population. Due to fractures and injuries less number of people die. Due to epidemic diseases also, the number of deaths among male was 8.9% while among women it was 7.5%. Unintentional injury was also one of the diseases by which the female were more affected than the males. So, these were the factors that led to the death of the males as well as the females.

JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing

Question 11.
The chart given below shows the Index of Markets of various segments of the Indian industries using the information given in the chart, interpret the data in detail and rationally.

Last year(2019)This year (2020)
Real Estate15,969.0117,731.04
IT Sector7,899.028,333.05
FMCG16,764.0219,081.39
Print and Technology6,045.035,039.04
Science & Tech8,361.057,089.05
Petroleum18,079.019,069.5
FCI8,237.07,8,32.5
Education5,433.16,339.01
Private Sector9,971.99,999.2

Answer:
The given Index shows a mixed trend. In the Real Estate Sector, there was an upward trend in the year 2020 in comparison to 2019. The main jump was seen in FMCG Sector. But in Print and Technology, there was downward trend. It decreased approximately upto 1000 crore. The mixed trend was shown in the given details. In private sector, there was slight jump in comparison to the last year. In Print Technology, science and technology and FCI, there was downward trend. The upbeat mood was seen only in FMCG sector. So, it can be said that in some sectors, there was a boo but in some sectors there was a drop.

Question 12.
Observe the given line graph and analyse the data.
JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing 12
Answer:
The given graph shows the population of men and women in a village through line graph. In the year 2012, the population of men in a village was 12,000 while the population of women – was 10,000. In 2013, the population of men increased approximately half of the population
and women increased about 3%. But the population decreased in 2014 and increased marginally in 2015. But 2015 onward, the population of men increased substantially in all the three years. In 2015, the population of women decreased substantially. But in the year 2016-2017 and 2018 the population of women also increased substantially. The above graph shows the upward and downward trend in both (the number of men as well as women). In years, the population declined while in others the population increased.

JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing

Question 13.
Study the given histogram that shows the number of workers of a village corresponding to different range of weekly wages. Interpret the data and explain the main features.
JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing 13
Answer:
The histogram given above shows the number of workers of a village and the distribution of weekly wages. 7 workers were given 5-10 weekly wages while 10 workers were given 15-20 weekly wages, 27 workers were given 35-40 weekly wages. 15 workers were given 35-40 weekly wages. 6 workers were given 40-45 weekly wages. 3 workers were given 45¬65 weekly wages and 2 workers were given 70-80 weekly wages. So, this histogram clearly shows the relation between the number of workers and weekly wages.

There is least difference between the weekly wages of 10-15 and 30-40. The least number of people who were given weekly wages are between 70-80. The maximum number of workers who were given weekly wages were between 25-30.

Question 14.
Study the given histogram that shows distribution of social classes and interpret the data rationally. Also highlight its main features.
JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing 14
Answer:
The histogram mentioned above shows distribution of social classes. The categories of social classes mentioned in the given histogram are: Lower-lower, Lower-middle, upper- lower, lower upper and upper-upper. The least difference is between lower-lower and lower middle social classes. But the main and wide difference lies between the upper-lower and lower -upper classes. The upper-category has the minimum and the upper-lower class has the maximum frequency. It distribution hightlights the main features of the categories of social classes and its frequency.

JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing

Question 15.
See the given image and write an analytical report on this.
JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing 15
Answer:
The above data lays emphasis on healthcare matrices. It combines statistics and historical data. It goes deeper into the analysis of trends. It can serve as a fundamental part of generating future decisions. These are important to run and modify a hospital strategy. The data in healthcare are becoming expansive and increasing the variety of information it provides. It also uses reports in the form of a dashboards so that eveiy analytical information generated has its own measurement and quality of evidence. The average waiting time clearly increases the effectiveness of different hospital departments. The number of patients can explain why some divisions have the bigger amount of waiting time. It therefore proposes a solution to reduce it. It also reduces costs that directly affect the department. This metric is important for the finance department. The holistic view of all the analysis created and presented in this dashboard cell help management to make better decisions. This classification can also serve as an analytical report. It can then be used as road map to a successful hospital strategy.

Question 16.
See the given figure and write an analytical graph analysis on it.
JAC Class 10 English Analytical Paragraph Writing 16
Answer:
This picture shows the trend analysis of an examination at upper level. In it, questions from different segments have been asked. Most of the questions were asked from current affairs segment. The second major area of thrust was economics. Later on, 15 questions were asked from history, 14 questions were asked from polity and 8 questions were asked from science and technology. It is the area from which less number of questions were asked. So, this picture denotes that questions have been asked from almost all the Stearns. And the students will have to lay equal emphasis on all the subjects.

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

Jharkhand Board JAC Class 12 History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

1. इस्तमरारी बन्दोबस्त सबसे पहले लागू किया गया –
(क) बंगाल में
(ख) मद्रास में
(ग) बम्बई में
(घ) उत्तरप्रदेश में
उत्तर:
(क) बंगाल में

2. इस्तमरारी बन्दोबस्त लागू किया गया –
(क) 1794 में
(ख) 1792 में
(ग) 1793 में
(घ) 1795 में
उत्तर:
(ख) 1792 में

3. ‘राजा’ शब्द का प्रयोग किया जाता था–
(क) शक्तिशाली जमींदारों के लिए
(ख) ताल्लुकदारों के लिए
(ग) जोतदारों के लिए
(प) रैयतदारों के लिए
उत्तर:
(क) शक्तिशाली जमींदारों के लिए

4. बर्दवान में जमींदारी की नीलामी की गई थी, वर्ष
(क) 1798 में
(ख) 1797 में
(ग) 1897 में
(घ) 1795 में
उत्तर:
(ख) 1797 में

5. बंगाल में किस गवर्नर जनरल ने इस्तमरारी बन्दोवस्त लागू किया.
(क) लार्ड डलहौजी ने
(ख) विलियम बैंटिक ने
(ग) लार्ड कार्नवालिस ने
(घ) लार्ड एलिनवरो ने
उत्तर:
(ग) लार्ड कार्नवालिस ने

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6. रैयत शब्द का प्रयोग अंग्रेजों ने किया –
(क) किसानों के लिए
(ख) जमींदारों के लिए
(ग) ताल्लुकदारों के लिए
(घ) राजाओं के लिए
उत्तर:
(क) किसानों के लिए

7. धनी किसानों के लिए जिस शब्द का प्रयोग होता था, वह था –
(क) फौजदार
(ख) जोतदार
(ग) ताल्लुकदार
(घ) फरमाबरदार
उत्तर:
(ख) जोतदार

8. जमींदार द्वारा राजस्व वसूलने वाला अधिकारी कहलाता थ –
(क) दामुला
(ख) अमला
(ग) आमूला
(घ) अमली
उत्तर:
(ख) अमला

9. घोर आर्थिक मंदी जिस सन् में आई, वह था –
(क) 1950
(ख) 1929
(ग) 1930
(घ) 1932
उत्तर:
(ख) 1929

10. बाहरी लोग को संथाल लोग क्या कहते थे?
(क) परदेशी
(ख) अंग्रेजी बाबू
(ग) दिकू
(घ) इनमें
उत्तर:
(ग) दिकू

11. संथालों का नेतृत्व किसने किया?
(क) सोदी
(ख) कान्हू
(ग) ‘क’ तथा ‘ख’ दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) ‘क’ तथा ‘ख’ दोनों

12. बुकानन कौन था?
(क) ब्रिटिश एजेन्ट
(ग) यात्री
(ख) अंग्रेज अधिकारी
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) ब्रिटिश एजेन्ट

13. अमेरिका में गृह युद्ध कब आरम्भ हुआ?
(क) 1760 में
(ग) 1840 में
(ख) 1761 में
(घ) 1861 में
उत्तर:
(घ) 1861 में

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14. रेलों का युग प्रारम्भ होने से पहले कौनसा कस्बा दक्कन से आने वाली कपास के लिए संग्रह केन्द्र था ?
(क) मिर्जापुर
(ग) मद्रास
(ख) बम्बई
(घ) जयपुर
उत्तर:
(क) मिर्जापुर

15. दक्कन दंगा आयोग की रिपोर्ट ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत की गई –
(क) 1870 में
(ख) 1875 में
(ग) 1878 में
(घ) 1980 में
उत्तर:
(ग) 1878 में

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:

1. ………………. “शब्द का प्रयोग अक्सर शक्तिशाली जमींदारों के लिए किया जाता था।
2. इस्तमरारी बंदोबस्त ……………… ने राजस्व की राशि निश्चित करने के लिए लागू की थी।
3. अमेरिकी स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान ……………… ब्रिटिश सेना का कमाण्डर था।
4. 1793 में बंगाल में इस्तमरारी बंदोबस्त लागू करते समय वहाँ का …………… कार्नवालिस था
5. …………… शब्द का प्रयोग अंग्रेजों के विवरणों में किसानों के लिए किया जाता था।
6. …………… का शाब्दिक अर्थ है वह व्यक्ति जिसके पास लाठी या डंडा हो।
उत्तर:
1 राजा
2. ईस्ट इण्डिया कम्पनी
3. कार्नवालिस
4. गवर्नर जनरल
5. रैयत
6. लाठियाल

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
बंगाल में इस्तमरारी बन्दोबस्त कब लागू हुआ?
उत्तर:
सन् 1793

प्रश्न 2.
अंग्रेजी विवरणों के अनुसार ‘रैयत’ शब्द का प्रयोग किनके लिए किया जाता था ?
उत्तर:
किसानों के लिए।

प्रश्न 3.
राजस्व इकट्ठा करने के समय जमींदार का जो अधिकारी गाँव में आता था, उसे क्या कहा जाता था ?
उत्तर:
अमला।

प्रश्न 4.
बंगाल के धनी किसानों के वर्ग को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
जोतदार

प्रश्न 5.
जोतदारों की जमीन का काफी बड़ा भाग किनके द्वारा जोता जाता था ?
उत्तर:
बटाईदारों द्वारा

प्रश्न 6.
जब राजस्व का भुगतान न किये जाने पर जमींदार की जमींदारी को नीलाम किया जाता था तो प्रायः उन जमीनों को कौन खरीद लेते थे?
उत्तर:
जोतदार

प्रश्न 7.
1930 के दशक में अंततः जमींदारों का भट्ठा क्यों बैठ गया?
उत्तर:
1930 के दशक की घोर मंदी के कारण।

प्रश्न 8.
पहाड़िया जीवन का प्रतीक क्या था?
उत्तर:
कुदाल।

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प्रश्न 9.
संथालों की शक्ति का प्रतीक क्या था?
उत्तर:
हल

प्रश्न 10.
पहाड़िया लोग किस प्रकार की खेती करते थे?
उत्तर:
म खेती।

प्रश्न 11.
संधाल लोग किस प्रकार की खेती करते थे?
उत्तर:
स्थायी खेती।

प्रश्न 12.
1875 में पुणे के सूपा गाँव में हुआ किसानों का आन्दोलन किनके विरोध में था?
उत्तर:
साहूकारों और अनाज के व्यापारियों के विरोध

प्रश्न 13.
साहूकार कौन होता था?
उत्तर:
साहूकार पैसा उधार देता था और व्यापार भी करता था।

प्रश्न 14.
दक्षिण के गाँवों में रैयतों ने किस सन् में बगावत की?
उत्तर:
सन् 1875 में।

प्रश्न 15.
इस्तमरारी बन्दोबस्त किन-किन के मध्य लागू किया गया ?
उत्तर:
ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा बंगाल के जमींदारों के मध्य ।

प्रश्न 16.
1857 के गदर में बंगाल के किस राजा ने अंग्रेजों की मदद की थी ?
उत्तर:
बंगाल के बर्दवान के राजा मेहताबचन्द ने।

प्रश्न 17.
1930 की आर्थिक मंदी का जमींदारों पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
इसके फलस्वरूप जमींदारों की दशा दयनीय हो गई।

प्रश्न 18.
रेलों का युग शुरू होने से पहले कपास का परिवहन कैसे होता था?
उत्तर:
नौकाओं, बैलगाड़ियों तथा जानवरों के द्वारा।

प्रश्न 19.
भारत में सर्वप्रथम औपनिवेशिक शासन कहाँ स्थापित हुआ?
उत्तर:
बंगाल में।

प्रश्न 20.
गाँवों में किनकी शक्ति जमींदारों की ताकत की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होती थी?
उत्तर:
जोतदारों की।

प्रश्न 21.
बंगाल के किस क्षेत्र में जोतदार सबसे अधिक शक्तिशाली थे?
उत्तर:
उत्तरी बंगाल में।

प्रश्न 22.
बंगाल में जोतदार किन अन्य नामों से पुकारे जाते थे?
उत्तर:
‘हवलदार’, ‘गांटीदार’ तथा ‘मंडल’ के नामों

प्रश्न 23.
‘पाँचवीं रिपोर्ट’ ब्रिटिश संसद में कब प्रस्तुत की गई थी?
उत्तर:
1813 ई. में ।

प्रश्न 24.
अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने वाले संथालों का नेता कौन था?
उत्तर:
सिधू मांझी ।

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प्रश्न 25.
संथालों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कब किया?
उत्तर:
1855-56 में।

प्रश्न 26.
मैनचेस्टर काटन कम्पनी कब और कहाँ स्थापित की गई ?
उत्तर:
1859 ई. में इंग्लैण्ड में

प्रश्न 27.
रेलों के विकास से पूर्व दक्कन से आने वाली कपास के लिए कौनसा शहर संग्रह केन्द्र था?
उत्तर:
मिर्जापुर।

प्रश्न 28.
ऋणदाता लोग देहात के किस प्रथागत मानक का उल्लंघन कर किसानों का शोषण कर रहे थे?
उत्तर;
ऋणदाता मूलधन से अधिक ब्याज वसूल कर रहे थे।

प्रश्न 29.
दक्कन दंगा आयोग की रिपोर्ट ब्रिटिश संसद में कब प्रस्तुत की गई ?
उत्तर:
सन् 1878 ई. में।

प्रश्न 30.
रेग्यूलेटिंग एक्ट कब पारित किया गया ?
उत्तर:
1773 ई. में ।

प्रश्न 31.
ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने बंगाल की दीवानी कब प्राप्त की?
उत्तर:
सन् 1765 ई. में

प्रश्न 32.
रेग्यूलेटिंग एक्ट क्या था ?
उत्तर:
ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कार्यकलापों को विनियमित करने वाला अधिनियम।

प्रश्न 33.
सन् 1862 तक ब्रिटेन में जितना भी कपास का आयात होता था, उसका कितना भाग अकेले भारत से जाता था?
उत्तर:
90 प्रतिशत।

प्रश्न 34.
अमेरिका में गृह युद्ध का सूत्रपात कब हुआ?
उत्तर:
सन् 1861 ई. में ।

प्रश्न 35.
जोतदारों की स्थिति क्या थी? वे जमींदारों से किस प्रकार प्रभावशाली होते थे?
उत्तर:
जोतदार बंगाल के धनी किसान थे। उनका ग्रामवासियों पर नियन्त्रण था और वे रैयत को अपने पक्ष में रखते थे।

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प्रश्न 36.
गाँवों में जोतदार के शक्तिशाली होने के कारण लिखिए।
अथवा
गाँवों में जोतदारों की शक्ति जमींदारों की शक्ति से अधिक क्यों थी ? कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:
(1) जोतदार गाँवों में ही रहते थे, ग्रामवासियों पर नियंत्रण रखते थे।
(2) वे रैयत को अपने पक्ष में एकजुट रखते थे।

प्रश्न 37.
जोतदार जमींदारों का किस प्रकार प्रतिरोध करते थे? दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
(1) जोतदार जमींदारों द्वारा गाँव की लगान बढ़ाने का विरोध करते थे
(2) वे जमींदार को राजस्व भुगतान में देरी करा देते थे।

प्रश्न 38.
पाँचवीं रिपोर्ट से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पाँचवीं रिपोर्ट भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रशासन तथा क्रियाकलापों के विषय में तैयार की गई थी।

प्रश्न 39.
जमींदार किस प्रकार अपनी जमींदारियाँ बचा लेते थे? दो उदाहरण दीजिये ।
उत्तर:
(1) फर्जी बिक्री द्वारा
(2) अपनी जमींदारियों का कुछ हिस्सा महिलाओं को प्रदान करके।

प्रश्न 40.
1832 ई. तक किस भूमि को संथालों की भूमि के रूप में सीमांकित किया गया?
उत्तर:
दामिन-इ-कोह के रूप में सीमांकित भूमि को संथालों की भूमि घोषित किया गया।

प्रश्न 41.
दक्कन दंगा रिपोर्ट क्या थी ? इसके अनुसार रैयत विद्रोह का क्या कारण था ?
उत्तर:
दक्कन दंगा रिपोर्ट दक्कन के दंगों से सम्बन्धित रिपोर्ट थी रैयत विद्रोह का कारण ऋणदाताओं, साहूकारों न्पों की शोषण नीति थी।

प्रश्न 42.
झूम खेती किस बात पर निर्भर करती थी?
उत्तर:
झुम खेती नई जमीनें खोजने और भूमि की से प्राकृतिक उर्वरता का उपयोग करने की क्षमता पर निर्भर करती थी।

प्रश्न 43.
इस्तमरारी बन्दोबस्त कब एवं किस क्षेत्र में न्य लागू किया गया ?
उत्तर:
इस्तमरारी बन्दोबस्त 1793 में बंगाल में लागू किया गया।

प्रश्न 44.
कुदाल और हल किन लोगों के जीवन का प्रतीक माना जाता था?
उत्तर:
कुदाल’ पहाड़िया लोगों के जीवन का तथा ‘हल’ संथालों के जीवन का प्रतीक माना जाता था।

प्रश्न 45.
1860 के दशक से पूर्व ब्रिटेन में कपास न का आयात कहाँ से किया जाता था?
उत्तर:
1860 के दशक से पूर्व ब्रिटेन में कपास के समस्त आयात का 75% अमेरिका से किया जाता था।

प्रश्न 46.
रैयतवाड़ी क्या थी? इसे कहाँ लागू किया गया?
अथवा
बम्बई दक्कन में ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू की गई राजस्व प्रणाली का नाम बताइये।
उत्तर:
रैयतवाड़ी राजस्व की प्रणाली थी, जो कम्पनी सरकार तथा रैयत (किसानों) के बीच बम्बई दक्कन में लागू की गई थी।

प्रश्न 47.
दक्कन में किसानों का विद्रोह कब व कहाँ से शुरू हुआ?
उत्तर:
दक्कन में किसानों का विद्रोह 1875 में (आधुनिक पुणे जिले में) से शुरू हुआ।

प्रश्न 48.
‘दामिन-इ-कोह’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
1832 में संथालों को स्थाई रूप से बसाने के लिए ‘दामिन-इ-कोह’ नामक एक भू-भाग निश्चित किया गया।

प्रश्न 49.
बुकानन कौन था?
उत्तर:
फ्रांसिस बुकानन एक चिकित्सक था जो भारत आया तथा 1794 से 1815 तक बंगाल चिकित्सा सेवा में कार्य किया।

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प्रश्न 50.
पहाड़िया लोग कौन थे? वे अपना निर्वाह कैसे करते थे?
उत्तर:
पहाड़िया लोग राजमहल की पहाड़ियों में रहते थे तथा जंगलों की उपज से अपना जीवन निर्वाह करते थे।

प्रश्न 51.
संथाल कौन थे?
उत्तर:
संथाल लोग राजमहल की पहाड़ियों में बसे हुए थे। वे हलों द्वारा स्थायी कृषि करते थे।

प्रश्न 52.
संथालों द्वारा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध किये गए विद्रोह के कारणों पर प्रकाश डालिए।
अथवा
संथालों को विद्रोह पर क्यों उतरना पड़ा? दो कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) अंग्रेजों ने संथालों की भूमि पर भारी कर लगा दिया।
(2) साहूकार लोग बहुत ऊँची दर पर ब्याज लगा रहे

प्रश्न 53.
1875 में साहूकारों के विरुद्ध रैयत द्वारा विद्रोह करने के अन्तर्गत किए गए दो कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) रैयत ने साहूकारों के बहीखाते जला दिए और ऋणबंध नष्ट कर दिये। (2) उन्होंने साहूकारों की अनाज की दुकानें लूट लीं।

प्रश्न 54.
रैयतवाड़ी प्रणाली की एक विशेषता बताइये।
उत्तर:
रैयतवाड़ी प्रणाली के राजस्व की राशि सीधे रैयत के साथ तय की जाती थी।

प्रश्न 55.
बम्बई दक्कन में अंग्रेजों के विरुद्ध किसानों के विद्रोह के दो कारण लिखिए।
उत्तर:
(1) किसानों से बहुत अधिक राजस्व वसूल किया जाता था
(2) उन्हें ब्याज की ऊँची दरों पर साहूकारों से ऋण लेना पड़ता था।

प्रश्न 56.
ब्रिटिश काल में दक्कन में दंगा होने का मुख्य कारण बताइये।
उत्तर:
ऋणदाता ऋण चुकाने के बाद रैयत को उसकी रसीद नहीं देते थे बंधपत्रों में जाली आँकड़े भर लेते थे।

प्रश्न 57.
किन दो कारणों से भारतीय दस्तकार बेकार हो गए?
उत्तर:
(1) ब्रिटेन से तैयार माल मंगाना और कच्चा माल ब्रिटेन भेजना
(2) कपास के उत्पादन में कमी।

प्रश्न 58.
किन दो कारणों से भारतीय किसान दरिद्र हो गए?
उत्तर:
(1) किसानों पर भारी भूमि कर लगाना
(2) साहूकारों, व्यापारियों द्वारा किसानों का शोषण

प्रश्न 59.
अंग्रेजों ने भारत के विभिन्न भागों में भू- राजस्व सम्बन्धी कौन-कौन सी तीन प्रणालियाँ प्रचलित क?
उत्तर:
(1) इस्तमरारी बन्दोबस्त
(2) रैयतवाड़ी बन्दोबस्त
(3) महलवाड़ी बन्दोबस्त।

प्रश्न 60.
ब्रिटिश सरकार ने संथालों को किस क्षेत्र में बसने की अनुमति प्रदान की थी?
उत्तर:
ब्रिटिश सरकार ने संथालों को राजमहल की तलहटी में बसने की अनुमति प्रदान की थी।

प्रश्न 61.
जमीन के किस क्षेत्र को संथालों की भूमि घोषित किया गया?
उत्तर:
‘दामिन-इ-कोह’ को संथालों की भूमि घोषित किया गया।

प्रश्न 62.
पहाड़िया लोगों का क्या व्यवसाय था ?
उत्तर:
पहाड़िया लोग झूम खेती करते थे।

प्रश्न 63.
संथाल लोग कौनसी फसलें उगाते थे?
उत्तर:
संथाल लोग चावल, कपास, सरसों, तम्बाकू आदि की फसलें उगाते थे।

प्रश्न 64.
1875 में रैयत द्वारा साहूकारों के विरुद्ध विद्रोह करने के दो कारणों का उल्लेख कीजिये ।
उत्तर:
(1) ऋणदाता वर्ग अत्यन्त संवेदनहीन हो गया था।
(2) ऋणदाता ऋण चुकाए जाने के बाद रैयत को उसकी रसीद नहीं देते थे।

प्रश्न 65.
ऋणदाता लोग गांवों में प्रचलित मानकों और रूढ़ि-रिवाजों का किस प्रकार उल्लंघन कर रहे थे ?
उत्तर:
ऋणदाता लोग रैयत से मूलधन से भी अधिक ब्याज वसूल कर रहे थे।

प्रश्न 66.
साहूकार रैयत को ऋण देने से क्यों इन्कार कर रहे थे? दो कारण लिखिए।
उत्तर:
(1) भारतीय कपास की मांग घटती जा रही थी
(2) कपास की कीमतों में गिरावट आ रही थी।

प्रश्न 67.
पहाड़िया और संधाल लोग किन उपकरणों से खेती करते थे?
उत्तर:
पहाड़िया लोग कुदाल से तथा संथाल लोग हल से खेती करते थे।

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प्रश्न 68.
संथाल लोगों का बंगाल में कब आगमन हुआ?
उत्तर:
संथाल लोगों का 1780 के दशक में बंगाल में आगमन हुआ।

प्रश्न 69.
संथाल लोग अंग्रेजों को आदर्श निवासी क्यों लगे ?
उत्तर:
क्योंकि उन्हें जंगलों का सफाया करने तथा भूमि को पूरी शक्ति के साथ जोतने में कोई संकोच नहीं था।

प्रश्न 70.
रैयत ऋणदाताओं को कुटिल तथा धोखेबाज क्यों समझते थे?
उत्तर:
(1) ऋणदाता खातों में धोखाधड़ी करते थे।
(2) वे कानून को घुमाकर अपने पक्ष में कर लेते थे।

प्रश्न 71.
रैयत द्वारा साहूकारों के विरुद्ध अंग्रेजों को दिए गए प्रार्थना-पत्र में उल्लिखित दो शिकायतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) रैयत द्वारा कड़ी शर्तों पर बंधपत्र लिखना
(2) साहूकारों द्वारा रैयत की उपज ले जाना और बदले में रसीद न देना।

प्रश्न 72.
पहाड़ी लोग कौन थे?
उत्तर:
राजमहल की पहाड़ियों के आस-पास रहने वाले लोग पहाड़ी कहलाते थे। वे जंगल की उपन से अपना जीवन निर्वाह करते थे।

प्रश्न 73.
प्राय: ‘राजा’ शब्द का प्रयोग किसके लिए किया जाता था?
उत्तर:
शक्तिशाली जमींदारों के लिए।

प्रश्न 74.
रैयत व शिकमी रैयत में क्या सम्बन्ध था?
उत्तर:
रैयत जमींदारों के लिए जमीन जोतते थे एवं कुछ जमीन अन्य रैयतों को लगाने पर दे देते थे जिन्हें शिकमी रैयत कहा जाता था।

प्रश्न 75.
अमेरिका में गृहयुद्ध के समय ब्रिटेन को भारत से कपास का कितना निर्यात होता था?
उत्तर:
90 प्रतिशत।

प्रश्न 76.
ताल्लुकदार का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
ताल्लुकदार का शाब्दिक अर्थ है वह व्यक्ति जिसके साथ ताल्लुक यानी सम्बन्ध हो। आगे चलकर ताल्लुक का अर्थ क्षेत्रीय इकाई हो गया।

प्रश्न 77.
‘पाँचवीं रिपोर्ट’ किसके द्वारा तैयार की गई थी?
उत्तर:
प्रवर समिति।

लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
“संथालों और पहाड़ियों के बीच लड़ाई हल और कुदाल के बीच लड़ाई थी।” सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
पहाड़िया लोग झूम खेती करते थे और अपनी कुदाल से जमीन खुरच कर दालें तथा ज्वार बाजरा उगाते थे। दूसरी ओर संथाल लोग जंगलों को साफ करके हलों से जमीन जोतते थे तथा चावल, कपास आदि की खेती करते थे। इससे पहाड़िया लोगों को राजमहल की पहाड़ियों में पीछे हटना पड़ा। एक ओर कुदाल पहाड़िया लोगों के जीवन का प्रतीक था, तो दूसरी ओर हल संथालों के जीवन का प्रतीक था और दोनों के बीच लड़ाई हल और कुदाल के बीच लड़ाई थी।

प्रश्न 2.
‘इस्तमरारी बन्दोबस्त’ क्या था?
अथवा
स्थायी बन्दोबस्त से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
1793 ई. में बंगाल के गवर्नर जनरल ने बंगाल में ‘इस्तमरारी बन्दोबस्त’ लागू किया। इस बन्दोवस्त के अन्तर्गत ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने राजस्व की राशि निश्चित कर दी थी जो प्रत्येक जमींदार को चुकानी पड़ती थी। जो जमींदार अपनी निश्चित राशि नहीं चुका पाते थे, उनसे राजस्व वसूल करने के लिए उनकी जमींदारियां नीलाम कर दी जाती थीं। यह बन्दोबस्त ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा जमींदारों के बीच हुआ था।

प्रश्न 3.
फ्रांसिस बुकानन के बारे में आप क्या जानते हँ?
उत्तर:
फ्रांसिस बुकानन एक चिकित्सक था जो बंगाल चिकित्सा सेवा में 1794 से 1815 तक कार्यरत रहा। कुछ समय के लिए वह लार्ड वेलेजली का शल्य चिकित्सक (सर्जन) भी रहा। कलकता में उसने एक चिड़ियाघर की ‘स्थापना की जो कलकत्ता अलीपुर चिड़ियाघर के नाम से मशहूर हुआ। बंगाल सरकार के अनुरोध पर उसने ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकार क्षेत्र में आने वाली भूमि का विस्तृत सर्वेक्षण कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।

प्रश्न 4.
भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैण्ड ने पहाड़िया लोगों से शान्ति स्थापना हेतु कौनसी नीति अपनाई?
उत्तर:
भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैण्ड ने शान्ति स्थापना हेतु पहाड़िया मुखियाओं के साथ एक समझौता किया, जिसमें मुखियाओं को एक वार्षिक भत्ता दिया जाना था तथा बदले में मुखियाओं को अपने लोगों के चाल-चलन को ठीक रखने की जिम्मेदारी लेनी थी। उनसे यह भी आशा की गई थी कि वे अपनी बस्तियों में व्यवस्था बनाए रखेंगे और अपने लोगों को अनुशासन में रखेंगे। परन्तु बहुत से मुखियाओं ने भत्ता लेने से मना दिया।

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प्रश्न 5.
बुकानन द्वारा वर्णित गंजुरिया पहाड़ की यात्रा का विवरण प्रस्तुत कीजिये।
उत्तर:
बुकानन के अनुसार गंजुरिया में अभी जुताई की गई है जिससे पता चलता है कि इसे कितने शानदार इलाके में बदला जा सकता है इसकी सुन्दरता और समृद्धि विश्व के किसी भी क्षेत्र जैसी विकसित की जा सकती है। यहाँ की जमीन अलबत्ता चट्टानी है लेकिन बहुत ही ज्यादा बढ़िया है। उसने उतनी बढ़िया सरसों और तम्बाकू कहीं नहीं देखी। संथालों ने वहाँ कृषि क्षेत्र की सीमा काफी बढ़ा ली थी, वे यहाँ 1800 के आसपास आये थे।

प्रश्न 6.
संथालों के बारे में बुकानन के विचारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बुकानन ने संथालों के क्षेत्र में भ्रमण किया और उनके बारे में ये विचार व्यक्त किये कि ” नयी जमीनें साफ करने में वे बहुत होशियार होते हैं, लेकिन नीचता से रहते हैं। उनकी झोंपड़ियों में कोई बाड़ नहीं होती और दीवारें सीधी खड़ी की गई छोटी-छोटी लकड़ियों की बनी होती हैं जिन पर भीतर की ओर लेप ( पलस्तर) लगा होता है। झोंपड़ियाँ छोटी और मैली-कुचैली होती हैं, उनकी छत सपाट होती है, उनमें उभार बहुत कम होता है।”

प्रश्न 7.
कड़वा के पास की चट्टानों के बारे में बुकानन ने क्या लिखा?
उत्तर:
कडुया के पास की चट्टानों के बारे में बुकानन ने लिखा कि, “लगभग एक मील चलने के बाद मैं एक शिलाफलक पर आ गया, जिसका कोई यह एक छोटा दानेदार ग्रेनाइट है जिसमें लाल-लाल फेल्डस्पार, क्वार्ट्ज और काला अबरक लगा है …… । वहाँ से आधा मील से अधिक की दूरी पर मैं एक अन्य चट्टान पर आया वह भी स्तरहीन थी और उसमें बारीक दानों वाला ग्रेनाइट था जिसमें पीला सा फेल्डस्पार, सफेद-सा क्वार्ट्ज और काला अबरक था।”

प्रश्न 8.
जमींदार को किसानों से राजस्व एकत्रित करने में किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ता था?
उत्तर:
जमींदार को किसानों से राजस्व एकत्रित करने में निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ता था –
(1) कभी-कभी खराब फसल होने पर किसानों के लिए राजस्व का भुगतान करना कठिन हो जाता था।
(2) उपज की नीची कीमतों के कारण भी किसानों के लिए राजस्व का भुगतान करना कठिन हो जाता था।
(3) कभी-कभी किसान जानबूझकर स्वयं भी भुगतान में देरी कर देते थे।

प्रश्न 9.
एक राजस्व सम्पदा क्या थी? सूर्यास्त विधि क्या थी?
उत्तर:
ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में एक जमींदार के नीचे अनेक गाँव होते थे। ईस्ट इंडिया कम्पनी के अनुसार एक जमींदारी के भीतर आने वाले गाँव मिलकर एक राजस्व सम्पदा का रूप ले लेते थे। जमींदारों को ईस्ट इण्डिया कम्पनी को एक निश्चित तारीख को सूर्यास्त तक राजस्व जमा कराना अनिवार्य था। राजस्व जमा न होने की दशा में उसकी जमींदारी नीलाम की जा सकती थी। इसे ही सूर्यास्त विधि कहा जाता था।

प्रश्न 10.
1832 के दशक में किसानों को ऋण क्यों लेने पड़े?
उत्तर:
1832 के दशक के पश्चात् कृषि उत्पादों में तेजी से गिरावट आयी जिससे किसानों की आय में और भी तेजी से गिरावट आ गयी। इसके अतिरिक्त 1832-34 के वर्षों में ग्रामीण क्षेत्र अकाल की चपेट में आ गये जिससे जन-धन की भारी हानि हुई किसानों के पास इस संकट का सामना करने के लिए खाद्यान्न नहीं था। राजस्व की बकाया राशियाँ बढ़ती गयीं परिणामस्वरूप किसानों को ऋण लेने पड़े।

प्रश्न 11.
वनों की कटाई और स्थायी कृषि के बारे बुकानन के विचार लिखिए।
उत्तर:
राजमहल की पहाड़ियों के एक गाँव से गुजरते हुए बुकानन ने लिखा, “इस प्रदेश का दृश्य बहुत बढ़िया है। यहाँ खेती विशेष रूप से, घुमावदार संकरी घाटियों में धान की फसल, बिखरे हुए पेड़ों के साथ साफ की गई जमीन और चट्टानी पहाड़ियाँ सभी अपने आप में पूर्ण हैं, कमी है तो बस इस क्षेत्र में प्रगति की और विस्तृत तथा उन्नत खेती की, जिनके लिए यह प्रदेश अत्यन्त संवेदनशील है। यहाँ टसर और लाख के लिए बागान लगाए जा सकते हैं।”

प्रश्न 12.
16 मई, 1875 को पूना के जिला मजिस्ट्रेट ने अपने पत्र में आयुक्त को क्या लिखित सूचना दी?
उत्तर:
16 मई, 1875 को पूना के जिला मजिस्ट्रेट ने पुलिस आयुक्त को लिखा कि, “शनिवार 15 मई को सूपा आने पर मुझे इस उपद्रव का पता चला। एक साहूकार का घर पूरी तरह जला दिया गया लगभग एक दर्जन मकानों को तोड़ दिया गया और उनमें घुसकर वहाँ के सारे सामान को आग लगा दी गई। खाते पत्र बाँड, अनाज, देहाती कपड़ा सड़कों पर लाकर जला दिया गया, जहाँ राख के ढेर अब भी देखे जा सकते हैं।”

प्रश्न 13.
भाड़ा-पत्र क्या था ?
उत्तर:
जब किसान ऋणदाता का कर्ज चुकाने में असमर्थ हो जाता था तो उसके पास अपना सर्वस्व जमीन, गाड़ियाँ, पशुधन देने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं था; लेकिन जीवनयापन हेतु खेती करना जरूरी था इसलिए उसने ऋणदाता से जमीन, पशु या गाड़ी फिर किराये पर ले ली; इसके लिए उसे एक भाड़ा पत्र ( किरायानामा) लिखना पड़ता था, जिसमें साफ तौर पर यह लिखा होता था कि ये पशु और गाड़ियाँ उसकी अपनी नहीं हैं।

प्रश्न 14.
इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए राजकीय प्रतिवेदनों के प्रयोग में क्या-क्या सावधानियाँ बरतनी न चाहिए?
उत्तर:
राजकीय प्रतिवेदन सरकार की दृष्टि से तैयार किये जाते हैं जो पूरी तरह विश्वसनीय नहीं होते हैं अतः इन्हें सावधानीपूर्वक पढ़ा जाना चाहिए। इनका प्रयोग करने में से पहले समाचार पत्रों, गैर-राजकीय वृत्तान्तों, वैधानिक र अभिलेखों एवं मौखिक स्रोतों से संकलित साक्ष्य के साथ उनका मिलान करके उनकी विश्वसनीयता का सत्यापन करना आवश्यक है।

प्रश्न 15.
बर्दवान के राजा की सम्पदा क्यों नीलाम की गई?
उत्तर:
1797 में बर्दवान के राजा की कई सम्पदाएँ नीलाम की गई। बर्दवान के राजा पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के राजस्व की बड़ी रकम बकाया हो गई थी इसलिए उसकी सम्पदा नीलाम की गई खरीददारों में जिसने सबसे ऊँची बोली लगाई, उसको जमींदारी बेच दी गई। लेकिन यह खरीददारी फर्जी थी क्योंकि बोली लगाने वालों में 95% लोग राजा के एजेन्ट ही थे वैसे जमींदारी खुले तौर पर बेच दी गई थी लेकिन उन जमींदारियों का नियन्त्रण राजा के हाथ में ही रहा।

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प्रश्न 16.
सरकारी राजस्व जमा करने में जमींदारों के समक्ष कौन-कौनसी समस्याएँ आ रही थीं?
उत्तर:
1. राजस्व की माँग बहुत ऊँची थी।
2. यह ऊँची माँग 1790 के दशक में लागू की गई थी जब कृषि की उपज की कीमतें बहुत नीची थीं जिससे किसानों के लिए लगान चुकाना मुश्किल था।
3. राजस्व असमान था। फसल चाहे अच्छी हो या खराब, राजस्व का सही समय पर भुगतान करना जरूरी था।
4. यदि राजस्व निश्चित तिथि की शाम तक जमा नहीं हो पाता था तो जमींदारी नीलाम की जा सकती थी।

प्रश्न 17.
जमींदारों पर नियन्त्रण रखने के लिए कम्पनी सरकार ने क्या नीति अपनाई थी?
उत्तर:
1. जमींदारों की सैनिक टुकड़ियों को भंग कर दिया गया।
2. सीमा शुल्क समाप्त कर दिया गया और उनकी कचहरियों को कम्पनी द्वारा नियुक्त कलेक्टर की देखरेख में रख दिया गया।
3. जमींदारों से स्थानीय न्याय और स्थानीय पुलिस की व्यवस्था करने की शक्ति छीन ली गई।
4. जमींदार के अधिकार को पूरी तरह सीमित एवं प्रतिबंधित कर दिया गया। कलेक्टर के कार्यालय की शक्ति बढ़ गई।

प्रश्न 18.
जमींदार अपनी जमींदारी में राजस्व कैसे वसूल करता था?
उत्तर:
एक जमींदार की जमींदारी में अनेक गाँव होते थे। कम्पनी सारे गाँवों को मिलाकर उसे एक सम्पदा मानकर उस पर राजस्व की माँग लागू करती थी। उसके बाद जमींदार यह निर्धारित करता था कि उसे किन-किन गाँवों से कितना-कितना राजस्व वसूल करना है। राजस्व वसूल करने के लिए उसने अमला नामक एक अधिकारी नियुक्त कर रखा था। फिर जमींदार निर्धारित राजस्व को कम्पनी सरकार के खजाने में जमा करवाता था।

प्रश्न 19.
गाँवों से राजस्व वसूलने में जमींदार को क्या-क्या कठिनाइयाँ आती थीं?
उत्तर:
1. किसानों की आमदनी कम होने के कारण लगान वसूलने में कठिनाई आती थी।
2. फसल खराब होने पर राजस्व वसूली में परेशानी आती थी।
3. फसल की कीमतें नीची थीं।
4. किसान जान-बूझकर भी लगान जमा कराने में देरी करते थे।
5. जमींदार बाकीदारों पर मुकदमा तो चला सकता था, मगर न्यायिक प्रक्रिया लम्बी होने से उसे उस मुकदमे से राजस्व वसूली में कोई लाभ नहीं मिल पाता था।

प्रश्न 20.
बुकानन के अनुसार दिनाजपुर के जोतदार किस प्रकार जमींदारों का प्रतिरोध करते थे?
उत्तर:
बुकानन के अनुसार जोतदार बड़ी-बड़ी जमीनों को जोतते थे। वे बहुत हठीले और जिद्दी थे वे राजस्व के रूप में थोड़ी सी राशि देते थे और हर किस्त में कुछ-न- कुछ बकाया रकम रह जाती थी। जमींदारों द्वारा उन्हें कचहरी में बुलाये जाने पर वे उनकी शिकायत करने के लिए फौजदारी धाना या मुन्सिफ की कचहरी में पहुँच जाते थे और अपने अपमानित किये जाने की शिकायत करते थे वे रैयत को जमींदारों को राजस्व न देने के लिए भड़काते रहते थे।

प्रश्न 21.
पाँचवीं रिपोर्ट क्या थी? इसमें किसके बारे में बताया गया था?
उत्तर:
सन् 1813 में ब्रिटिश संसद में एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, जिनमें से एक रिपोर्ट पाँचवीं रिपोर्ट कहलाती थी। इस रिपोर्ट में भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रशासन और क्रियाकलापों का वर्णन था। इस रिपोर्ट में जमींदारों और रैयतों (किसानों) की अर्जियाँ तथा अलग-अलग जिलों के कलेक्टरों की रिपोर्ट, राजस्व विवरणियों से सम्बन्धित सांख्यिकीय तालिकाएँ और अधिकारियों द्वारा बंगाल तथा मद्रास (वर्तमान चेन्नई) के राजस्व तथा न्यायिक प्रशासन पर लिखी हुई टिप्पणियाँ शामिल थीं।

प्रश्न 22.
जमींदारों की भू-सम्पदाओं की नीलामी व्यवस्था के दोषों को संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
जमींदारों की भू-सम्पदाओं की नीलामी व्यवस्था के निम्न दोष थे –
(1) भू-सम्पदाओं की नीलामी में अनेक खरीददार होते थे और ऊंची बोली लगाने वाले को बेच दी जाती थी नीलामी में अधिकतर बिक्री फर्जी होती थी।
(2) भू-सम्पदाओं की नीलामी में अधिकांश खरीददार जमींदारों के ही नौकर या एजेंट होते थे जो जमींदार की ओर से नीलामी में भाग लेते थे। इस प्रकार जमींदारी की जमीनें खुले तौर पर बेच दी जाती थीं पर उनकी जमींदारी का नियन्त्रण उन्हीं के हाथों में रहता था।

प्रश्न 23.
औपनिवेशिक बंगाल में जमींदार अपने क्षेत्र से राजस्व वसूली किस प्रकार करते थे?
उत्तर:
औपनिवेशिक बंगाल में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने राजस्व वसूली हेतु जमींदारों को क्षेत्र दे रखे थे। एक जमींदार की जमींदारी में अनेक गाँव होते थे जिनकी संख्या 400 तक होती थी ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक जमींदारी के समस्त गाँवों को मिलाकर उसे एक सम्पदा मानकर उस पर राजस्व की माँग लागू करती थी राजस्व वसूल करने के लिए जमींदार एक अधिकारी नियुक्त करते थे। यही अधिकारी प्रत्येक गाँव से राजस्व वसूल करके जमींदार को देते थे तत्पश्चात् जमींदार एकत्रित राशि को कम्पनी सरकार के आदेशानुसार उसके खजाने में जमा करवाता था।

प्रश्न 24.
ब्रिटेन के उद्योगपतियों ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापारिक एकाधिकार का विरोध क्यों किया?
उत्तर:
(1) ब्रिटेन में ऐसे अन्य व्यापारिक समूह थे, जो भारत तथा चीन के साथ ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापारिक एकाधिकार का विरोध करते थे। ये समूह चाहते थे कि जिस शाही फरमान द्वारा कम्पनी को यह एकाधिकार मिला था, उसे रद्द किया जाये ब्रिटेन के उद्योगपति व निजी व्यापारी भी भारत से व्यापार करना चाहते थे।

(2) कई राजनीतिक समूहों का भी यह कहना था कि बंगाल पर मिली विजय का लाभ केवल ईस्ट इण्डिया कम्पनी को ही मिल रहा है, सम्पूर्ण ब्रिटिश राष्ट्र को नहीं।

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प्रश्न 25.
भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन को नियंत्रित करने के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा क्या कार्यवाही की गई?
उत्तर:
(1) कम्पनी शासन को विनियमित और नियंत्रित करने के लिए अठारहवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में अनेक अधिनियम पारित किये गये।
(2) कम्पनी को बाध्य किया गया कि वह भारत प्रशासन के विषय में नियमित रूप से अपनी रिपोर्ट भेजा करे।
(3) कम्पनी के कामकाज की जाँच करने के लिए कई समितियाँ नियुक्त की गयीं। एक प्रवर समिति द्वारा पाँचवीं रिपोर्ट तैयार की गई।

प्रश्न 26.
पहाड़ी लोगों को पहाड़िया क्यों कहा जाता था? इनके जीवन पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।
अथवा
पहाड़िया लोगों के जीवन की प्रमुख विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:
पहाड़ी लोग पश्चिमी बंगाल में राजमहल की पहाड़ियों एवं उसके आसपास के क्षेत्र में निवास करते थे, इसलिए इन्हें पहाड़िया कहा जाता था। इनकी आजीविका जंगल की उपज पर आधारित थी। ये जंगलों से महुआ के फूल, रेशम के कोये तथा राल और काठकोयले के लिए लकड़ी प्राप्त करते थे। वे जंगलों में झाड़ियों व घास- फूस को आग लगाकर जमीन साफ कर ‘झूम’ खेती करते थे तथा कुदाल से जमीन खुरचकर दालें तथा ज्वार- बाजरा उगाते थे।

प्रश्न 27.
कार्नवालिस ने इस्तमरारी बन्दोबस्त व्यवस्था क्यों लागू की?
उत्तर:
बंगाल के गवर्नर चार्ल्स कॉर्नवालिस ने इस्तमरारी बन्दोबस्त व्यवस्था 1793 ई. में लागू की थी। उस समय बंगाल की कृषि की स्थिति अच्छी नहीं थी सरकार को प्रतिवर्ष भूमि के ठेके देने पड़ते थे अतः कार्नवालिस ने दीर्घ अध्ययन के उपरान्त बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में इस्तमरारी बन्दोबस्त व्यवस्था लागू कर दी। इस व्यवस्था के अनुसार ठेकेदार ही भूमि के स्वामी होते थे तथा वे कम्पनी को निश्चित कर देते थे। इससे कम्पनी की आय निश्चित हो गयी।

प्रश्न 28.
कार्नवालिस की इस्तमरारी बंदोबस्त व्यवस्था के सकारात्मक परिणाम बताइए।
उत्तर:
कार्नवालिस की इस्तमरारी बंदोबस्त व्यवस्था के सकारात्मक परिणाम निम्नलिखित थे –
(1) कम्पनी की आय निश्चित बनाने में आसानी हुई।
(2) जमींदार ही स्थायी रूप से भूमि का स्वामी मान लिया गया अतः उसने अपनी भूमि उपजाऊ बनाने का प्रयास किया।
(3) कम्पनी के कर्मचारियों की संख्या सीमित हो गयी तथा राजस्व वसूलने के लिए अधिक धन तथा बल की आवश्यकता नहीं रही।
(4) इस्तमरारी बन्दोबस्त का सबसे बड़ा लाभ बंगाल के जमींदारों को हुआ। अब उन्हें सरकार को किसी प्रकार को भेंट नहीं देनी पड़ती थी।

प्रश्न 29.
कार्नवालिस की इस्तमरारी व्यवस्था के नकारात्मक परिणाम बताइए।
उत्तर:
कार्नवालिस की इस्तमरारी व्यवस्था के नकारात्मक परिणाम अग्रलिखित हैं –
(1) आरम्भ में अनेक जमींदार किसानों से लगान नहीं वसूल सके, जिसके परिणामस्वरूप उनकी जमींदारी बिक गयी।
(2) भूमि की माप तथा भू-राजस्व का निर्धारण सही ढंग से नहीं हो पाया था।
(3) आशाओं के विपरीत जमींदारों ने अपनी जमीन के सुधार पर कोई ध्यान नहीं दिया।

प्रश्न 30.
‘झूम’ खेती से आप क्या समझते हैं तथा यह किसके द्वारा की जाती थी?
उत्तर:
‘झूम’ खेती पहाड़िया लोगों द्वारा की जाती थी। ये लोग जंगल की झाड़ियाँ काटकर और घास-फूस में आग लगाकर जमीन साफ करके खेती करते थे। ये लोग कुदाल से जमीन को थोड़ा खुरचकर अपने खाने के लिए विभिन्न प्रकार की दालें तथा ज्वार, बाजरा उत्पन्न कर लेते थे। कुछ वर्षों तक उस साफ की गई जमीन पर खेती करते थे और फिर कुछ वर्षों के लिए उसे परती छोड़कर नये इलाके में चले जाते थे।

प्रश्न 31.
पहाड़िया लोगों द्वारा मैदानों में बसे हुए किसानों पर आक्रमण क्यों किये जाते थे?
उत्तर:
(1) पहाड़िया लोगों द्वारा ये आक्रमण अधिकतर अपने आप को अभाव या अकाल के वर्षों में जीवित रखने के लिए किये जाते थे।
(2) पहाड़िया लोग इन आक्रमणों के माध्यम से मैदानों में बसे हुए लोगों के सामने अपनी सत्ता का प्रदर्शन करना चाहते थे।
(3) ऐसे आक्रमण बाहरी लोगों के साथ अपने राजनीतिक सम्बन्ध बनाने के लिए भी किये जाते थे, मैदानों में रहने वाले जमींदारों को पहाड़ी मुखियाओं को नियमित रूप से खिराज देना पड़ता था।

प्रश्न 32.
ब्रिटिश सरकार पहाड़िया लोगों का दमन क्यों कर देना चाहती थी?
उत्तर:
(1) अंग्रेजों ने जंगलों की कटाई-सफाई के काम को प्रोत्साहन दिया और जमींदारों तथा जोतदारों ने परती भूमि को धान के खेतों में बदल दिया।
(2) अंग्रेजों ने स्थायी कृषि के विस्तार पर बल दिया क्योंकि उससे राजस्व के स्रोतों में वृद्धि हो सकती थी तथा नियत के लिए फसल पैदा हो सकती थी ।
(3) अंग्रेज जंगलों को उजाड़ मानते थे तथा पहाड़िया लोगों को असभ्य, बर्बर तथा उपद्रवी मानते थे।

प्रश्न 33.
बम्बई दक्कन में राजस्व की नई प्रणाली क्यों लागू की गई ?
उत्तर:
(1) 1810 के बाद उपज की कीमतों में वृद्धि होने से बंगाल के जमींदारों की आमदनी में बढ़ोतरी हुई, लेकिन कम्पनी की आमदनी में वृद्धि नहीं हुई, क्योंकि इस्तमरारी बन्दोबस्त के अनुसार कम्पनी बढ़ी हुई आमदनी में अपना दावा नहीं कर सकती थी।

(2) अपने वित्तीय साधनों में बढ़ोतरी की इच्छा से कम्पनी ने भू-राजस्व को अधिक से अधिक बढ़ाने के तरीकों पर विचार किया, इसलिए उन्नीसवीं शताब्दी में कम्पनी शासन में शामिल किये गये प्रदेशों में नए राजस्व बन्दोबस्त किए गए।

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प्रश्न 34.
“रैयतवाड़ी बन्दोबस्त’ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
अथवा
रैयतवाड़ी बन्दोबस्त से आप क्या समझते हैं ? इसकी विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
बम्बई दक्कन में 1820 के दशक में एक नई राजस्व प्रणाली लागू की गई, जिसे ‘रैयतवाड़ी बन्दोबस्त’ कहते हैं। इस प्रणाली के अन्तर्गत राजस्व की राशि सीधे रैयत (किसान) के साथ तय की जाती थी। भिन्न-भिन्न प्रकार की भूमि से होने वाली औसत आय का अनुमान लगा लिया जाता था और सरकार के हिस्से के रूप उसका एक अनुपात निर्धारित कर दिया जाता था। हर तीस वर्ष के बाद जमीनों का फिर से सर्वेक्षण किया जाता था और राजस्व की दर तदनुसार बढ़ा दी जाती थी।

प्रश्न 35.
ईस्ट इण्डिया कम्पनी को अपनी नई राजस्व नीति से क्या अपेक्षाएँ थीं?
उत्तर:
ईस्ट इण्डिया कम्पनी को अपनी राजस्व नीति से निम्न अपेक्षाएँ थीं –
(1) कम्पनी को यह आशा थी कि इस नीति से उन समस्याओं का समाधान हो जाएगा जो बंगाल की विजय के समय से ही उनके समक्ष उपस्थित हो रही थीं।
(2) अधिकारियों को यह अपेक्षा थी कि इससे छोटे किसानों एवं धनी भू-स्वामियों का एक ऐसा वर्ग उत्पन्न हो जाएगा जिनके पास कृषि में सुधार करने के लिए पूँजी तथा उद्यम दोनों होंगे।
(3) कम्पनी को यह आशा थी कि ब्रिटिश शासन से पालन-पोषण एवं प्रोत्साहन प्राप्त कर यह वर्ग कम्पनी के प्रति स्वामि भक्त बना रहेगा।

प्रश्न 36.
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के काल में जमींदारों की असफलता के कारण लिखिए।
उत्तर:
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के काल में जमींदारों की असफलता के निम्नलिखित कारण हैं-
राजस्व की प्रारम्भिक माँगें बहुत ऊँची थी, ऐसा इसलिए किया गया कि आगे कृषि की कीमतों में वृद्धि होने पर राजस्व नहीं बढ़ाया जा सकता। इस हानि को पूरा करने के लिए ऊंची दरें रखी गयी इसका यह कारण बताया गया कि जैसे ही कृषि का उत्पादन बढ़ेगा वैसे ही जमींदारों का बोझ कम हो जाएगा। राजस्व असमान था फसल अच्छी हो या खराब राजस्व का भुगतान सही समय पर करना जरूरी था इस्तमरारी बन्दोबस्त ने प्रारम्भ में जमींदारों की शक्ति को रैयत से राजस्व इकट्ठा करने और अपनी जमींदारी का प्रबन्धन करने तक ही सीमित कर दिया था।

प्रश्न 37.
बम्बई दक्कन में 1820 के दशक में लागू किए गए रैयतवाड़ी बन्दोबस्त के किसानों पर क्या प्रभाव पड़े?
उत्तर:
(1) रैयतवाड़ी बन्दोबस्त के अन्तर्गत माँगा गया राजस्य बहुत अधिक था। परिणामस्वरूप बहुत से स्थानों पर किसान अपने गाँव छोड़ कर नए क्षेत्रों में चले गए।
(2) राजस्व अधिकारी किसानों से कठोरतापूर्वक राजस्व वसूल करते थे। राजस्व न देने वाले किसानों की फसलें जब्त कर ली जाती थीं और सम्पूर्ण गाँव पर जुर्माना किया जाता था।
(3) 1832-34 के वर्षों में देहाती इलाके अकाल की चपेट में आ गए जिसके परिणामस्वरूप दक्कन में आधी मानव जनसंख्या और एक-तिहाई पशुधन मौत के मुँह में
चला गया।

प्रश्न 38.
1820 के दशक में लागू किये गये राजस्व के बारे में 1840 के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने क्या अनुभव किया? लिखिए।
उत्तर:
1840 के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने 1820 में लागू किये गये राजस्व के बारे में यह अनुभव किया कि –
(1) सभी जगह किसान कर्ज के बोझ से दबे हैं।
(2) 1820 के दशक में लागू किए गए राजस्व सम्बन्धी बन्दोबस्त कठोरतापूर्ण थे।
(3) राजस्व की माँग बहुत ज्यादा थी
(4) राजस्व संकलन की व्यवस्था कठोर एवं लचकहीन थी
(5) इसके बाद उन्होंने राजस्व सम्बन्धी माँग कुछ हल्की की जिससे कृषि को प्रोत्साहन मिल सके।

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प्रश्न 39.
ब्रिटेन के सूती वस्त्र निर्माता कपास की आपूर्ति हेतु वैकल्पिक स्रोत क्यों और कैसे खोज रहे थे?
उत्तर:
1860 के दशक से पूर्व ब्रिटेन में कच्चे माल के रूप में आयात की जाने वाली समस्त कपास का तीन- चौथाई भाग अमेरिका से आता था। अमेरिकी कपास पर निर्भरता के कारण ब्रिटेन के वस्त्र निर्माता अधिक परेशान थे। वे सोचते थे कि यदि कभी यह स्रोत बन्द हो गया तो हमें कपास कहाँ से मिलेगी ? अतः वे कपास के अन्य स्रोतों की खोज में जुटे। 1857 में ब्रिटेन में कपास आपूर्ति संघ की स्थापना की गई तथा 1859 में मैनचेस्टर कॉटन कम्पनी की स्थापना की गई।

प्रश्न 40.
1865 में अमेरिकी गृह युद्ध की समाप्ति का महाराष्ट्र के निर्यात व्यापारियों तथा साहूकारों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
1865 में अमेरिकी गृहयुद्ध समाप्त होने पर वहाँ कपास का उत्पादन पुनः होने से भारतीय कपास की माँग घटने लगी। इस पर महाराष्ट्र के निर्यातकों और साहूकारों ने दीर्घावधि ऋण देने से किसानों को मना कर दिया। उन्होंने यह देख लिया था कि भारतीय कपास की मांग पटती जा रही है तथा कपास की कीमतों में भी गिरावट आ रही है। अब उन्हें यह अनुभव होने लगा था कि अब किसानों में उनका ऋण चुकाने की क्षमता नहीं रही है।

प्रश्न 41.
ब्रिटेन के सूती वस्त्र निर्माता भारत से कपास का आयात क्यों करना चाहते थे?
उत्तर:
ब्रिटेन के सूती वस्त्र निर्माताओं ने भारत को एक ऐसा देश समझा जो अमेरिकी कपास के आयात का स्थान ले सकता था और अमेरिका कपास की आपूर्ति बन्द – होने पर लंकाशायर की कपास की माँग पूरी कर सकता था भारत की भूमि तथा जलवायु दोनों ही कपास की खेती के लिए अनुकूल थीं तथा यहाँ सस्तां श्रम भी उपलब्ध था। 1861 में जब अमेरिका से आने वाली कपास के आयात में भारी गिरावट आ गई, तो भारत से कपास का आयात करने का निश्चय किया गया।

प्रश्न 42.
संथालों को ‘अगुआ बाशिंदे’ किसलिए कहा गया?
उत्तर:
सन् 1800 के लगभग संथाल राजमहल की पहाड़ियों के निचले हिस्से में जंगलों को साफ कर स्थायी नी रूप से बस गये। एक ओर पहाड़िया लोग जंगल काटने के लिए हल को हाथ लगाने के लिए तैयार नहीं थे और न उपद्रवी व्यवहार कर रहे थे, दूसरी ओर संथाल अंग्रेजों को न्छ अगुआ बाशिन्दे प्रतीत हुए क्योंकि उन्हें जंगलों का सफाया करने में कोई संकोच नहीं था और वे भूमि को पूरी शक्ति की लगा कर जोतते थे।

प्रश्न 43.
ब्रिटिश कलाकार विलियम होजेज के ल्ल बारे में आप क्या जानते हो?
उत्तर:
विलियम होजेज एक ब्रिटिश कलाकार था पर जिसने कैप्टन कुक के साथ प्रशान्त महासागर की यात्रा की। न क्लीवलैंड के निमन्त्रण पर होजेज 1782 ई. में उसके साथ या जंगल भू-सम्पदाओं के भ्रमण पर गया था। वहाँ होजेज न्य ने ऐसी तस्वीरें बनाई जो ताम्रपट्टी में अम्ल की सहायता र्ति से चित्र के रूप में कटाई करके छापी जाती हैं जिन्हें एक्वाटिंट के नाम से जाना जाता था उस समय के अनेक चित्रकारों की तरह होजेज ने भी बड़े सुन्दर रमणीय दृश्यों की खोज की थी। वह उस समय के चित्रोपम दृश्यों के खोजी कलाकार स्वच्छंदतावाद की विचारधारा से प्रेरित थे।

प्रश्न 44.
डेविड रिकार्डों के बारे में आप क्या जानते हो? संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
डेविड रिकार्डों 1820 के दशक तक इंग्लैण्ड में एक जाने-माने अर्थशास्त्री के रूप में जाने जाते थे। रिकार्डों के मतानुसार, भू-स्वामी को उस समय लागू ‘औसत लगानों को प्राप्त करने का ही हक होना चाहिए। जब भूमि से ‘औसत लगान’ से अधिक प्राप्त होने लगे तो भूस्वामी को अधिशेष आय होगी जिस पर सरकार को कर लगाने की आवश्यकता होगी। यदि कर नहीं लगाया गया तो किसान किरायाजीवी में बदल जायेंगे और उनकी अधिशेष आय का भूमि के सुधार में उत्पादन रीति से निवेश नहीं होगा।

प्रश्न 45.
दक्कन दंगा आयोग की स्थापना क्यों की गई और इसने अपनी रिपोर्ट में किसे दोषी ठहराया?
उत्तर:
जब विद्रोह दक्कन में तेजी से फैला तो भारत सरकार ने 1857 के विद्रोह से सबक लेकर बम्बई की सरकार पर दबाव डाला कि वह दंगों के कारणों की छानबीन करने के लिए एक आयोग बैठाये इस प्रकार दक्कन दंगा आयोग की स्थापना की गई। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बढ़े हुए राजस्व की माँग को दोषी न मानकर सारा दोष ऋणदाताओं और साहूकारों का बताया।

प्रश्न 46.
अपनी जमींदारी को छिनने से बचाने के लिए जमींदारों ने कौन-से तरीके अपनाये?
उत्तर:
(1) जमींदारी का कुछ हिस्सा किसी महिला सम्बन्धी को दे दिया जाता था क्योंकि महिलाओं की सम्पत्ति को छीना नहीं जाता था।
(2) जमींदार की नीलाम की जाने वाली जमीन को जमींदार के एजेन्ट ही खरीद लेते थे।
(3) जमींदार कभी भी राजस्व की पूरी माँग अदा नहीं करता था।
(4) नीलामी में कोई जमीन खरीदने वाले बाहरी व्यक्ति को उस जमीन का कब्जा ही नहीं मिल पाता था अथवा पुराने जमींदार के लठियाल नये खरीददार को मार- पीट कर भगा देते थे।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 47.
“पहाड़िया लोगों का जीवन घनिष्ठ रूप से जंगलों से जुड़ा हुआ था।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिकारियों, झूम खेती करने वालों, खाद्य बटोरने वालों, काठकोयला बनाने वालों तथा रेशम के कीड़े पालने वालों के रूप में पहाड़िया लोगों का जीवन घनिष्ठ रूप से एक्वाटिंट के नाम से जाना जाता था उस समय के अनेक चित्रकारों की तरह होजेज ने भी बड़े सुन्दर रमणीय दृश्यों की खोज की थी। वह उस समय के चित्रोपम दृश्यों के खोजी कलाकार स्वच्छंदतावाद की विचारधारा से प्रेरित थे।

प्रश्न 44.
डेविड रिकार्डों के बारे में आप क्या जानते हो? संक्षेप में बताइए ।
उत्तर:
डेविड रिकार्डों 1820 के दशक तक इंग्लैण्ड में एक जाने-माने अर्थशास्त्री के रूप में जाने जाते थे। रिकार्डों के मतानुसार, भू-स्वामी को उस समय लागू ‘औसत लगानों को प्राप्त करने का ही हक होना चाहिए। जब भूमि से ‘औसत लगान’ से अधिक प्राप्त होने लगे तो भूस्वामी को अधिशेष आय होगी जिस पर सरकार को कर लगाने की आवश्यकता होगी। यदि कर नहीं लगाया गया तो किसान किरायाजीवी में बदल जायेंगे और उनकी अधिशेष आय का भूमि के सुधार में उत्पादन रीति से निवेश नहीं होगा।

प्रश्न 45.
दक्कन दंगा आयोग की स्थापना क्यों की गई और इसने अपनी रिपोर्ट में किसे दोषी ठहराया?
उत्तर:
जब विद्रोह दक्कन में तेजी से फैला तो भारत सरकार ने 1857 के विद्रोह से सबक लेकर बम्बई की सरकार पर दबाव डाला कि वह दंगों के कारणों की छानबीन करने के लिए एक आयोग बैठाये इस प्रकार दक्कन दंगा आयोग की स्थापना की गई। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बढ़े हुए राजस्व की माँग को दोषी न मानकर सारा दोष ऋणदाताओं और साहूकारों का बताया।

प्रश्न 46.
अपनी जमींदारी को छिनने से बचाने के लिए जमींदारों ने कौन-से तरीके अपनाये?
उत्तर:
(1) जमींदारी का कुछ हिस्सा किसी महिला सम्बन्धी को दे दिया जाता था क्योंकि महिलाओं की सम्पत्ति को छीना नहीं जाता था।
(2) जमींदार की नीलाम की जाने वाली जमीन को जमींदार के एजेन्ट ही खरीद लेते थे।
(3) जमींदार कभी भी राजस्व की पूरी माँग अदा नहीं करता था।
(4) नीलामी में कोई जमीन खरीदने वाले बाहरी व्यक्ति को उस जमीन का कब्जा ही नहीं मिल पाता था अथवा पुराने जमींदार के लठियाल नये खरीददार को मार- पीट कर भगा देते थे।

प्रश्न 47.
“पहाड़िया लोगों का जीवन घनिष्ठ रूप से जंगलों से जुड़ा हुआ था।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिकारियों, झूम खेती करने वालों, खाद्य बटोरने वालों, काठकोयला बनाने वालों तथा रेशम के कीड़े पालने वालों के रूप में पहाड़िया लोगों का जीवन घनिष्ठ रूप से एक्वाटिंट के नाम से जाना जाता था। उस समय के अनेक चित्रकारों की तरह होजेज ने भी बड़े सुन्दर रमणीय दृश्यों की खोज की थी। वह उस समय के चित्रोपम दृश्यों के खोजी कलाकार स्वच्छंदतावाद की विचारधारा से प्रेरित थे।

प्रश्न 44.
डेविड रिकार्डों के बारे में आप क्या जानते हो? संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
डेविड रिकार्डों 1820 के दशक तक इंग्लैण्ड में एक जाने-माने अर्थशास्त्री के रूप में जाने जाते थे। रिकार्डों के मतानुसार, भू-स्वामी को उस समय लागू ‘औसत लगानों’ को प्राप्त करने का ही हक होना चाहिए। जब भूमि से ‘औसत लगान’ से अधिक प्राप्त होने लगे तो भूस्वामी को अधिशेष आय होगी जिस पर सरकार को कर लगाने की आवश्यकता होगी। यदि कर नहीं लगाया गया तो किसान किरायाजीवी में बदल जायेंगे और उनकी अधिशेष आय का भूमि के सुधार में उत्पादन रीति से निवेश नहीं होगा।

प्रश्न 45.
दक्कन दंगा आयोग की स्थापना क्यों की गई और इसने अपनी रिपोर्ट में किसे दोषी ठहराया?
उत्तर:
जब विद्रोह दक्कन में तेजी से फैला तो भारत सरकार ने 1857 के विद्रोह से सबक लेकर बम्बई की सरकार पर दबाव डाला कि वह दंगों के कारणों की छानबीन करने के लिए एक आयोग बैठाये। इस प्रकार दक्कन दंगा आयोग की स्थापना की गई। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बड़े हुए राजस्व की माँग को दोषी न मानकर सारा दोष ऋणदाताओं और साहूकारों का बताया।

प्रश्न 46.
अपनी जमींदारी को छिनने से बचाने के लिए जमींदारों ने कौन-से तरीके अपनाये?
उत्तर:
(1) जमींदारी का कुछ हिस्सा किसी महिला सम्बन्धी को दे दिया जाता था क्योंकि महिलाओं की सम्पत्ति को छीना नहीं जाता था।
(2) जमींदार की नीलाम की जाने वाली जमीन को जमींदार के एजेन्ट ही खरीद लेते थे।
(3) जमींदार कभी भी राजस्व की पूरी माँग अदा नहीं करता था।
(4) नीलामी में कोई जमीन खरीदने वाले बाहरी व्यक्ति को उस जमीन का कब्जा ही नहीं मिल पाता था अथवा पुराने जमींदार के लठियाल नये खरीददार को मार- पीट कर भगा देते थे।

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प्रश्न 47.
” पहाड़िया लोगों का जीवन घनिष्ठ रूप से जंगलों से जुड़ा हुआ था। ” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिकारियों, झूम खेती करने वालों, खाद्य बटोरने वालों, काठकोयला बनाने वालों तथा रेशम के कीड़े पालने वालों के रूप में पहाड़िया लोगों का जीवन घनिष्ठ रूप से जंगलों से जुड़ा हुआ था। वे इमली के पेड़ों के बीच बनी अपनी झोंपड़ियों में रहते थे और आम के पेड़ों की छाँह में आराम करते थे। वे प्रदेश को अपनी निजी भूमि मानते थे और बाहरी लोगों के प्रवेश का प्रतिरोध करते थे।

प्रश्न 48.
पहाड़ियों के प्रति अंग्रेजों का क्या दृष्टिकोण था?
उत्तर:
अंग्रेज पहाड़ियों को असभ्य, बर्बर, उपद्रवी तथा क्रूर समझते थे और उन पर शासन करना एक कठिन कार्य मानते थे इसलिए उन्होंने यह विचार किया कि जंगलों का सफाया करके, वहाँ स्थायी कृषि की स्थापना की जाए तथा जंगली लोगों को पालतू एवं सभ्य बनाया जाए। अत: अंग्रेजों ने पहाड़िया लोगों को खेती का व्यवसाय अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया।

प्रश्न 49.
पहाड़िया लोग संथाल लोगों को अपना शत्रु क्यों मानते थे?
उत्तर:
संथाल लोग राजमहल के जंगलों को नष्ट करते हुए, इमारती लकड़ी को काटते हुए, जमीन जोतते हुए और चावल तथा कपास का उत्पादन करते हुए राजमहल की पहाड़ियों में बड़ी संख्या में बस गए। उन्होंने निचली पहाड़ियों पर अधिकार कर लिया। इससे पहाड़िया लोगों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया और उन्होंने संथालों का प्रतिरोध करना शुरू कर दिया।

प्रश्न 50.
अंग्रेजों ने राजमहल की पहाड़ियों में संथालों को बसाने का निश्चय क्यों किया?
उत्तर:
अंग्रेज संचालों को आदर्श निवासी मानते थे क्योंकि वे जंगलों को नष्ट करने के समर्थक थे तथा जमीन को पूरी शक्ति लगाकर जोतते थे अतः उन्होंने 1832 तक राजमहल के एक काफी बड़े क्षेत्र को ‘दामिन-इ-कोह’ के रूप में सीमांकित कर दिया और इसे संथालों की भूमि घोषित कर दिया। अतः यहाँ संथाल बड़ी संख्या में बस गए और कई प्रकार की वाणिज्यिक खेती करने लगे तथा व्यापारियों साहूकारों के साथ लेन-देन करने लगे।

प्रश्न 51.
संथालों द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने के क्या कारण थे?
उत्तर:
(1) संथालों को यह ज्ञात हो गया कि उन्होंने जिस भूमि पर खेती करना शुरू किया था, वह उनके हाथों से निकलती जा रही थी
(2) संथालों ने जिस जमीन पर खेती शुरू की थी, उस पर सरकार ने भारी कर लगा दिया था
(3) साहूकारों ने बहुत ऊँची दर पर ब्याज लगा दिया था और कर्ज अदा न किए जाने पर संथालों की जमीन पर कब्जा कर लेते थे
(4) जमींदार लोग दामिन क्षेत्र पर अपने नियंत्रण का दावा कर रहे थे।

प्रश्न 52.
बम्बई दक्कन में किसानों के विद्रोह के कारणों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
(1) अम्बई (मुम्बई) में लागू की गई रैयतवाड़ी प्रणाली के अन्तर्गत किसानों से माँगा गया राजस्व बहुत अधिक था। राजस्व अदा न करने वाले किसानों की फसलें जब्त कर ली जाती थीं।
(2) कालान्तर में साहूकारों ने ऋण देना बन्द कर दिया।
(3) ऋणदाता संवेदनहीन थे तथा ब्याज मूलधन से भी अधिक वसूल करते थे।
(4) ऋणदाता ऋण चुकायी गई राशि की रसीद नहीं देते थे तथा बंधपत्रों में जाली आँकड़े भर देते थे और किसानों की उपज को नीची कीमतों पर लेते थे।

प्रश्न 53.
1861 में अमेरिका में छिड़ने वाले गृहयुद्ध का भारतीय किसानों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
1861 में अमेरिका में गृह बुद्ध छिड़ने पर अमेरिका से आने वाली कच्ची कपास के आयात में भारी गिरावट आ गई। इस स्थिति में दक्कन के गाँवों के रैयतों (किसानों) को विपुल धनराशि ऋण के रूप में मिलने लगी। परन्तु इस अवसर पर केवल धनी किसानों को लाभ हुआ तथा अधिकांश किसान ऋण के भार से दब गए। व्यापारियों और साहूकारों ने ऋण देने से इन्कार कर दिया। दूसरी ओर राजस्व की माँग बढ़ा दी गई। ऋणदाता खातों में धोखाधड़ी करने लगे और कानून की अवहेलना करने लगे।

प्रश्न 54.
रैयत ऋणदाता को कुटिल और धोखेबाज क्यों समझने लगे थे?
उत्तर:
ऋणदाता ऋण चुकाए जाने के बाद रैयत को उसकी रसीद नहीं देते थे तथा बंधपत्रों में जाली आँकड़े भर लेते थे। वे कानून को घुमाकर अपने पक्ष में कर लेते थे और रैयत से हर तीसरे वर्ष एक नया बंधपत्र भरवाते थे। वे किसानों की फसलों को नीची कीमतों पर ले लेते थे तथा अवसर पाकर किसानों की धन सम्पत्ति पर ही अधिकार कर लेते थे। भिन्न-भिन्न प्रकार के दस्तावेजों और बंधपत्रों से किसान असंतुष्ट थे।

निबन्धात्मक प्रश्न –

प्रश्न 1.
“गाँवों में जोतदारों की स्थिति अत्यन्त मजबूत थी और जमींदारों की शक्ति की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली थी।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गाँवों में जोतदारों की सुदृढ़ स्थिति अठारहवीं शताब्दी के अन्त में बंगाल के गाँवों में जोतदारों की स्थिति अत्यन्त मजबूत थी तथा जमींदारों की शक्ति की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली थी।
(1) बड़ी-बड़ी जमीनों के स्वामी- जोतदार गाँवों में रहते थे तथा वे बड़ी-बड़ी जमीनों के स्वामी थे। ये धन-सम्पन्न किसान थे। इन जोतदारों ने जमीन के बड़े-बड़े रकों पर अधिकार कर रखा था। ये रकबे (क्षेत्र) कभी- कभी तो कई हजार एकड़ में फैले होते थे। स्थानीय व्यापारियों और साहूकारों के व्यवसाय पर भी उनका नियंत्रण था और इस प्रकार वे उस क्षेत्र के दरिद्र किसानों पर अपनी शक्ति का प्रयोग करते थे। उनकी जमीन का काफी बड़ा भाग बटाईदारों के माध्यम से जोता जाता था। ये बटाईदार स्वयं अपने हल-बैल लाकर खेती करते थे और फसल के बाद उपज का आधा हिस्सा जोतदारों को दे देते थे।

(2) गाँवों में जोतदारों की शक्ति-गाँवों में जोतदारों की शक्ति जमींदारों की शक्ति की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होती थी। जोतदार गाँवों में ही रहते थे तथा गाँवों में रहने वाले किसानों पर उनका सीधा नियंत्रण था। जमींदारों द्वारा लगान बढ़ाने के लिए किए जाने वाले प्रयासों का वे घोर प्रतिरोध करते थे तथा लगान वसूली में बाधा डालते थे जो रैयत उन पर निर्भर रहते थे, उन्हें वे अपने पक्ष में एकजुट रखते थे तथा जमींदार के राजस्व के भुगतान में जानबूझ कर देरी करा देते थे।

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(3) जोतदारों द्वारा जमींदारी को खरीदना राजस्व अदा न करने पर जब जमींदारी नीलाम होती थी, तो प्रायः जोतदार ही उन जमीनों को खरीद लेते थे।

(4) उत्तरी बंगाल में जोतदारों का सबसे अधिक शक्तिशाली होना- उत्तरी बंगाल में जोतदार सबसे अधिक शक्तिशाली थे। कुछ स्थानों पर जोतदारों को ‘हवलदार’ कहा जाता था और कुछ अन्य स्थानों पर वे ‘गांटीदार’ म अथवा ‘मंडल’ कहलाते थे। जोतदारों के उदय होने के २ फलस्वरूप जमींदारों के अधिकारों का कमजोर पड़ना अनिवार्य था।

(5) रैयत को राजस्व न देने के लिए भड़काना-जोतदार अपने राजस्व के रूप में कुछ थोड़े से रुपये दे देते थे और लगभग हर किस्त में कुछ न कुछ बकाया राशि रह जाती थी। जमींदार की रकम के कारण यदि अधिकारी उन्हें न्यायालय में बुलाते थे, तो वे तुरन्त उनकी शिकायत करने के लिए फौजदारी थाना अथवा मुन्सिफ की कचहरी में पहुँच क जाते थे तथा जमींदार के कारिन्दों द्वारा उन्हें अपमानित किए जाने की बात कहते थे। जोतदार रैयत को राजस्व न देने के लिए भी भड़काते रहते थे।

प्रश्न 2.
पहाड़िया लोग कौन थे? ब्रिटिश सरकार की उनका दमन करने के लिए क्यों प्रयत्नशील थी?
अथवा
पहाड़िया लोग कौन थे? बाहरी लोगों के आगमन पर उनकी क्या प्रतिक्रिया थी?
उत्तर:
पहाड़िया लोगों का परिचय –
(1) झूम खेती करना – पहाड़िया लोग जंगल ‍ शाड़ियों को काटकर और पास फेंस को जलाकर जमीन साफ करते थे। ये लोग अपने भोजन के लिए अनेक प्रका की दालें तथा ज्वार बाजरा उगा लेते थे।

(2) जंगलों से प्राप्त उत्पादों का उपयोग करना- पहाड़िया लोग खाने के लिए जंगलों से महुआ के फूल इकट्ठे करते थे तथा बेचने के लिए रेशम के कोया और राला तथा काठकोयला बनाने के लिए लकड़ियाँ इकट्ठी करते थे पेड़ों के नीचे उगे हुए घास-फूंस पशुओं के लिए चरागा का काम देती थी।

(3) पहाड़ियों के जीवन का जंगल से घनिष्ठ रूपा से जुड़ना पहाड़िया लोग शिकारियों, झूम खेती करने बालों, खाद्य पदार्थ इकट्ठा करने वालों, काठकोयला बनाने वालों तथा रेशम के कीड़े पालने वालों के रूप में अपना जीवन निर्वाह करते थे। उनका जीवन जंगल से मनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ था। वे इमली के पेड़ों के नीचे अपनी झोंपड़ियों में रहते थे तथा आम के वृक्षों की छाँह में विश्राम करते थे।

(4) पहाड़िया लोगों के मुखिया पहाड़िया लोगों के मुखिया अपने समूह में एकता बनाए रखते थे तथा आपसी लड़ाई-झगड़ों को निपटा देते थे। अन्य जनजातियों तथा मैदानी लोगों के साथ लड़ाई छिड़ने पर वे अपनी जन- जाति का नेतृत्व करते थे।

(5) मैदानी भागों पर आक्रमण करना पहाड़िया लोग मैदानी भागों में बसे हुए किसानों पर आक्रमण करते थे ये आक्रमण प्रायः अभाव या अकाल के वर्षों में जीवित रखने के लिए किए जाते थे। इन आक्रमणों के माध्यम से वे अपनी शक्ति का प्रदर्शन भी करना चाहते थे।

(6) अंग्रेजों द्वारा पहाड़िया लोगों का दमन करना- अंग्रेज लोग जंगलों की कटाई-सफाई कर स्थायी कृषि का विस्तार करना चाहते थे वे जंगलों को उजाड़ मानते थे तथा पहाड़िया लोगों को असभ्य, बर्बर, क्रूर तथा उपद्रवी मानते थे। 1770 के दशक में अंग्रेजों ने पहाड़ियों का क्रूरतापूर्वक दमन किया। इसके बाद पहाड़िया लोग पहाड़ों के भीतरी भागों में चले गए। बाद में संथालों ने उन्हें पराजित कर दिया और उन्हें पहाड़ियों के भीतर चले जाने के लिए बाध्य कर दिया।

प्रश्न 3.
ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी काल में बंगाल में जोतदारों के उदय को विस्तार से समझाइए।
उत्तर:
ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी काल में बंगाल में जोतदारों के उदय के विस्तार को अग्र बिन्दुओं के अन्तर्गत समझा जा सकता है-
(1) 18वीं शताब्दी में बंगाल में उदित होने वाले धनी किसानों को जोतदार कहा गया। इन्होंने गाँवों में अपनी स्थिति मजबूत कर ली थी।
(2) 19वीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों तक आते- आते जोतदारों ने जमीन के बड़े-बड़े टुकड़े प्राप्त कर लिए थे जो 1000 एकड़ में फैले हुए थे।
(3) जोतदारों का गाँवों के स्थानीय व्यापार एवं साहूकारों के कारोबार पर भी नियन्त्रण था। वे अपने क्षेत्र के निर्धन किसानों पर भी अपनी शक्ति का अधिक प्रयोग करते थे।
(4) जोतदारों की भूमि का एक बड़ा भाग बटाईदारों के माध्यम से जोता जाता था जो स्वयं अपना हल लाते थे, खेतों में मेहनत करते थे एवं फसल उत्पन्न होने के पश्चात् उपज का आधा भाग जोतदारों को प्रदान करते थे।
(5) गाँवों में जोतदारों की शक्ति जमींदारों की शक्ति से अधिक प्रभावशाली थी। जमींदार शहर में रहते थे जबकि जोतदार गाँवों में रहा करते थे फलस्वरूप जोतदारों का गाँव के अधिकांश निर्धन लोगों पर सीधा नियन्त्रण रहता था।
(6) जोतदारों का जमींदारों से संघर्ष चलता रहता था। इसके निम्न कारण हैं-
(i) जमींदारों द्वारा लगान बढ़ाने पर जोतदार विरोध करते थे।
(ii) जोतदार जमींदार के अधिकारियों को अपना कर्तव्य पालन करने से रोकते थे।
(iii) जो लोग जोतदारों पर निर्भर रहते थे उन्हें वे अपने पक्ष में एकजुट रखते थे।
(iv) जोतदार जमींदारों को परेशान करने की नीयत से किसानों द्वारा जमींदारों को दिए जाने वाले राजस्व के भुगतान में जानबूझकर देरी करने के लिए उकसाते थे।
(v) जब जमींदारों की भू-सम्पदाएँ नीलाम होती थीं तो जोतदार उनकी जमीन को खरीद लेते थे जो जमींदारों को अच्छा नहीं लगता था।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि बंगाल में जोतदार शक्तिशाली बनकर उभरे। उनके उदय से जमींदारों के अधिकारों का कमजोर पड़ना स्वाभाविक था।

प्रश्न 4.
संथाल विद्रोह कब व क्यों हुआ? इस पर एक लघु निबन्ध लिखिए।
अथवा
संथाल कौन थे? उनके विद्रोह के कारणों का विश्लेषण कीजिये।
उत्तर:
संथालों का परिचय
(1) संथालों का राजमहल की पहाड़ियों में बसना संथाल लोग 1800 के आस-पास राजमहल की पहाड़ियों में बस गए थे ब्रिटिश अधिकारियों ने संथालों को राजमहल की पहाड़ियों में बसकर स्थायी खेती करने के लिए राजी कर लिया। इस प्रकार 1800 के आसपास संचाल जंगलों को साफ कर इमारती लकड़ी को काटते हुए पहाड़ियों की तलहटी में जमीन साफ कर धान और कपास की स्थायी कृषि करने लगे। इन्होंने पहाड़िया लोगों को राजमहल की पहाड़ियों के भीतरी भाग में जाने के लिए मजबूर कर दिया।

(2) दामिन-इ-कोह का निर्माण सन् 1832 के आसपास ब्रिटिश कम्पनी ने एक बड़े भू-भाग को संथालों के लिए सीमांकित कर दिया जो ‘दामिन-इ-कोह’ कहलाया। इसे संथाल भूमि घोषित कर दिया गया।

(3) संथालों की संख्या वृद्धि – दामिन-इ-कोह के सीमांकन के बाद संथालों की बस्तियाँ तेजी से बढ़ीं। सन् 1838 में गाँवों की संख्या 40 थी जो 1851 तक 1,473 गाँवों में बदल गई और जनसंख्या जो पहले 3,000 थी, बढ़कर 82,000 से भी अधिक हो गई। खेती का विस्तार होने से कम्पनी के राजस्व में भी वृद्धि होने लगी। संथाल विद्रोह कब और क्यों? सन् 1855-56 में संथालों ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। सिधू मांझी उनका नेता था।

JAC Class 12 History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

इस विद्रोह के प्रमुख कारण अग्रलिखित थे –
(1) कम्पनी सरकार द्वारा भारी कर लगाना- कम्पनी सरकार ने प्रारम्भ में संथालों को जो भूमि दी थी, उस पर कोई राजस्व नहीं था; लेकिन जैसे ही संथालों ने कृषि में विकास किया, कम्पनी सरकार ने उन पर भारी कर लगा दिया।
(2) ऊँची ब्याज दर साहूकारों द्वारा ऊँची दर पर ब्याज लगाया गया तथा कर्ज अदा न कर पाने पर उनकी जमीन पर कब्जा कर लिया गया।
(3) जमींदारों का अपने नियंत्रण का दावा- जिस जमीन को साफ कर संथाल लोग खेती कर रहे थे, उस पर अब जमींदारों ने अपने नियंत्रण का दावा करना शुरू कर दिया ।
(4) संथालों की मानसिकता में बदलाव — संथालों ने 1850 के दशक तक यह महसूस किया कि उनका अधिकार जमीन पर से खत्म होता जा रहा है। उन्हें अपने *लिए एक ऐसे आदर्श संसार का निर्माण करना है, जहाँ उनका अपना शासन हो जमींदारों, साहूकारों और औपनिवेशिक राज के विरुद्ध विद्रोह करने का समय अब आ गया है।

प्रश्न 5.
ईस्ट इण्डिया कम्पनी की भू-राजस्व नीतियों का जमींदारों द्वारा किस प्रकार प्रतिरोध किया गया?
अथवा
ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों का जमींदारों ने कौन- कौनसी नई रणनीतियाँ बनाकर प्रतिरोध किया और उसका क्या परिणाम निकला?
उत्तर:
ग्रामीण क्षेत्रों में जोतदारों की स्थिति उभर रही श्री लेकिन जमींदारों की सत्ता पूर्णतः समाप्त नहीं हुई थी। राजस्व की अत्यधिक मांग और अपनी भू-सम्पदा को ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा नीलाम करने की समस्या से निपटने के लिए जमींदारों ने कुछ रणनीतियाँ बनाई –
(1) जमींदारों द्वारा अपनी भू-सम्पदा का स्त्रियों को हस्तान्तरण – ईस्ट इण्डिया कम्पनी महिलाओं के हिस्सों की नीलामी नहीं करती थी इसलिए जमींदार अपनी जमींदारी को नीलामी से बचाने के लिए अपनी भू-सम्पदा के कुछ भागों को अपने परिवार की स्वियों के नाम हस्तान्तरित कर देते थे।

(2) नकली नीलामी जमींदारों ने अपने एजेंटों को नीलामी के दौरान खड़ा करके नीलामी की प्रक्रिया में जोड़-तोड़ किया। वे जानबूझकर कम्पनी के अधिकारियों को परेशान करने के लिए राजस्व का भुगतान नहीं करते थे जिससे भुगतान न की गई बकाया राशि बढ़ जाती थी। जब भू-सम्पदा का हिस्सा नीलाम किया जाता था तो जमींदार के व्यक्ति ही अन्य खरीददारों के मुकाबले ऊँची बोली लगाकर सम्पत्ति को खरीद लेते थे।

(3) अन्य तरीके जमींदार लोग भू-सम्पदा को परिवारजनों के नाम स्थानान्तरित करने या फर्जी बिक्री दिखाकर अपनी भू-सम्पदा को छिनने से बचने के साथ- साथ कुछ अन्य तरीके भी अपनाते थे। यदि कम्पनी के किसी अधिकारी की जिद के कारण किसी जमींदार की भू-सम्पदा को किसी बाहर का व्यक्ति खरीद लेता था तो उसे कब्जा प्राप्त नहीं हो पाता था कभी-कभी पुराने किसान नये जमींदार को लोगों की जमीन में घुसने नहीं देते थे।
परिणाम- 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में कृषि उत्पादों में मंदी की स्थिति समाप्त हो गई। इसलिए जो जमींदार 1790 ई. के दशक की परेशानियों को झेलने में सफल हो
गए, उन्होंने अपनी सत्ता को सुदृढ़ बना लिया। राजस्व के भुगतान सम्बन्धी नियमों को लचीला बनाने के फलस्वरूप गाँवों पर जमींदारों की पकड़ और मजबूत हो गयी। परन्तु 1930 की मंदी के कारण जमींदारों को नुकसान उठाना पड़ा और ग्रामीण क्षेत्रों में जोतदारों ने अपनी स्थिति और अधिक मजबूत कर ली।

प्रश्न 6.
1820 के दशक में बम्बई दक्कन में रैयतवाड़ी बन्दोबस्त क्यों लागू किया गया? इसके किसानों पर क्या प्रभाव पड़े?
उत्तर:
बम्बई दक्कन में रैयतवाड़ी बन्दोबस्त लागू करने के कारण 1820 के दशक में बम्बई दक्कन में रैयतवाड़ी बन्दोबस्त लागू किये जाने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे –
(1) भू-राजस्व को अधिक से अधिक बढ़ाना- 1810 के बाद कृषि के मूल्य बढ़ गए, जिससे उपज के मूल्य में वृद्धि हुई और बंगाल के जमींदारों की आमदनी में वृद्धि हुई। परन्तु इस्तमरारी बन्दोबस्त के कारण ब्रिटिश सरकार इस बढ़ी हुई आय में अपने हिस्से का कोई दावा नहीं कर सकती थी। अतः उसने अपने भू-राजस्व को अधिक से अधिक बढ़ाने के लिए नवीन राजस्व प्रणालियाँ लागू करने का निश्चय कर लिया।

(2) डेविड रिकार्डों के विचारों से प्रभावित होना- ब्रिटिश अधिकारी इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डेविड रिकार्डों के विचारों से प्रभावित थे रिकार्डों के विचारों के अनुसार भू-स्वामी को उस समय लागू ‘ औसत लगानों को प्राप्त करने का ही अधिकार होना चाहिए। ब्रिटिश अधिकारियों ने महसूस किया कि बंगाल में जमींदार लोग किराया जीवियों के रूप में बदल गए थे क्योंकि उन्होंने अपनी जमीनें पट्टे पर दे दीं और किराये की आमदनी पर निर्भर रहने लगे। इसलिए ब्रिटिश अधिकारियों ने एक नवीन राजस्व प्रणाली अपनाने का निश्चय किया।

रैयतवाड़ी बन्दोबस्त लागू करना 1820 के दशक में बम्बई दक्कन में रैयतवाड़ी बन्दोबस्त लागू किया गया। इस प्रणाली के अन्तर्गत राजस्व की राशि सीधे रैयत के साथ तय की जाती थी। भिन्न-भिन्न प्रकार की भूमि से होने वाली औसत आय का अनुमान लगा लिया जाता था। रैयत की राजस्व अदा करने की क्षमता का आकलन कर लिया जाता था और सरकार के हिस्से के रूप में उसका एक अनुपात निर्धारित कर दिया जाता था। हर 30 वर्ष के बाद जमीनों का पुन: सर्वेक्षण किया जाता था और राजस्व की दर तदनुसार बढ़ा दी जाती थी।

रैयतवाड़ी बन्दोबस्त के किसानों पर प्रभाव रैयतवाड़ी बन्दोबस्त के किसानों पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े –
(1) राजस्व का अधिक होना सरकार की राजस्व की माँग इतनी अधिक थी कि बहुत से स्थानों पर किसान अपने गाँव छोड़ कर नये क्षेत्रों में चले गए।
(2) ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा कठोरतापूर्वक लगान वसूल करना इस स्थिति में भी ब्रिटिश अधिकारी कठोरतापूर्वक राजस्व वसूल करते थे और राजस्व न देने वाले किसानों की फसलों को जब्त कर लेते थे तथा सम्पूर्ण गाँव पर जुर्माना ठोक देते थे।
(3) भीषण अकाल- 1832-34 के वर्षों में देहाती इलाके अकाल की चपेट में आ गए जिससे दक्कन की आधी मानव जनसंख्या और एक-तिहाई पशुधन मौत के मुँह में चला गया।
(4) ऋणदाताओं से ऋण लेना किसानों को अपने जीवन निर्वाह के लिए ऋणदाताओं से रुपया उधार लेना पड़ा। कर्ज बढ़ता गया, उधार की राशियाँ बकाया रहती गई और ऋणदाताओं पर किसानों की निर्भरता बढ़ती गई।

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प्रश्न 7.
फ्रांसिस बुकानन कौन था? इसके दिए गए विवरण का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
उत्तर:
फ्रांसिस बुकानन एक चिकित्सक था जो बंगाल चिकित्सा सेवा में 1794 से 1815 ई. तक कार्यरत रहा। कुछ समय के लिए वह भारत के गवर्नर जनरल लार्ड वेलेजली का शल्य चिकित्सक भी रहा। कलकत्ता में रहने के दौरान उसने कलकत्ता में एक चिड़ियाघर की स्थापना की, जो कलकत्ता अलीपुर चिड़ियाघर कहलाया। बंगाल सरकार के अनुरोध पर उसने ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकार में आने वाली भूमि का विस्तृत सर्वेक्षण कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। उसके अनुसार राजस्व की वृद्धि हेतु जंगलों को कृषि भूमि में बदलना अनिवार्य था। 1815 में वह बीमार होने के पश्चात् वह इंग्लैण्ड वापस चले गए। फ्रांसिस बुकानन द्वारा दिया गया विवरण बुकानन की यात्राएं व सर्वेक्षण ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए विकास और प्रगति का आधार थे।

इनके विवरण को निम्न बिन्दुओं के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जा सकता है –
(1) बुकानन द्वारा दिया गया विवरण संथालों के बारे में, राजमहल के पहाड़िया लोगों के बारे में और अनेक अन्य बातों के विषय में विस्तृत जानकारी का स्रोत है। परन्तु उसके विवरण को पूर्णतया मान्य भी नहीं किया जा सकता था क्योंकि वह कम्पनी का कर्मचारी था।

(2) फ्रांसिस बुकानन ने विशाल वनों से परिदृश्यों और वहाँ से सरकार को सम्भवतः राजस्व देने वाले स्रोतों का सर्वेक्षण किया, खोज यात्राएँ आयोजित कीं और जानकारी इकट्ठी करने के लिए कम्पनी के माध्यम से भू-वैज्ञानिकों, भूगोलवेत्ताओं, वनस्पति वैज्ञानिकों, चिकित्सकों का सहयोग व सेवाओं का उपयोग किया।

(3) बुकानन अन्वेषण शक्ति रखने वाला असाधारण शक्ति का व्यक्ति था। उसने वाणिज्यिक दृष्टिकोण से मूल्यवान पत्थरों और खनिजों का प्रयास किया। उसने नमक बनाने और कच्चा लोहा निकालने की स्थानीय पद्धति का निरीक्षण भी किया।

(4) किसी भू-दृश्य का वर्णन करते हुए उसने उस भूमि को और उपजाऊ बनाने का अथवा वहाँ कौनसी फसलें बोयी जा सकती हैं इत्यादि का भी विवरण दिया है।

(5) प्रगति के सम्बन्ध में बुकानन का आकलन आधुनिक पाश्चात्य विचारधारा द्वारा निर्धारित होता था। वह वनवासियों की जीवनशैली का आलोचक था।

प्रश्न 8.
दक्कन विद्रोह के कारणों की विवेचना कीजिये।
उत्तर:
उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान भारत के विभिन्न प्रान्तों के किसानों ने साहूकारों और अनाज के व्यापारियों के विरुद्ध अनेक विद्रोह किए। ऐसा ही एक विद्रोह सन् 1875 में किसानों द्वारा दक्कन में किया गया, जिसे दक्कन विद्रोह कहा जाता है। यह विद्रोह पूना तथा अहमदनगर एवं उसके आसपास के क्षेत्रों में फैला था।
दक्कन विद्रोह के कारण किसानों द्वारा दक्कन में विद्रोह करने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे –
1. कम्पनी द्वारा राजस्व बढ़ाना- दक्कन में 1820 के दशक में रैयतवाड़ी नामक नयी राजस्व व्यवस्था लागू की गई और इसमें राजस्व की माँग ऊंची रखी गई। कम्पनी द्वारा 30 वर्ष पश्चात् अगले बन्दोबस्त में राजस्व 50 से 100 प्रतिशत तक बढ़ा दिया गया। किसान इस बढ़े हुए राजस्व को चुकाने की स्थिति में नहीं थे।

2. राजस्व की जबरन वसूली – जिला कलेक्टर अपनी कार्यकुशलता प्रदर्शित करने हेतु राजस्व की जबरन वसूली करते थे। फसल खराब होने पर भी कोई छूट नहीं मिलती थी।

3. कीमतों में गिरावट 1832 के बाद कृषि उत्पादों की कीमतों में तेजी से गिरावट आई। परिणामस्वरूप किसानों की आय में और गिरावट आई। 1832-34 के अकाल ने उनकी रही-सही कमर तोड़ दी।

4. साहूकारों की मनमानी ब्याज दर – राजस्व चुकाने तथा अपने दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसानों को ऋणदाताओं पर निर्भर रहना पड़ता था। साहूकार तथा ऋणदाता मूलधन पर मनमाना ब्याज लगाते थे तथा किसान से खाली कागज पर अंगूठा लगवाते थे ।

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5. ऋण के स्रोत का सूख जाना – 1865 में अमेरिका में गृहयुद्ध की समाप्ति के बाद वहाँ कपास का उत्पादन पुनः चालू हो गया और ब्रिटेन में भारतीय कपास की माँग में गिरावट आती चली गई। इससे कपास की कीमतों में गिरावट आ गई। व्यापारी और साहूकारों ने किसानों से अपने पुराने ऋण वापस माँगना शुरू कर दिया। दूसरी तरफ सरकार ने राजस्व की माँग बढ़ा दी। फलतः रैयत पर दोहरा दबाव पड़ा जिसे पूरा करने के लिए वह ऋणदाताओं की शरण में गये, लेकिन इस बार उन्होंने ऋण देने से इनकार कर दिया।

6. अन्याय का अनुभव – ऋणदाता द्वारा ऋण देने से इनकार किये जाने पर रैयत समुदाय को बहुत गुस्सा आया। वे इस बात से नाराज थे कि ऋणदाता वर्ग इतना संवेदनहीन हो गया है कि वह उनकी हालत पर कोई तरस नहीं खा रहा है। तरह-तरह के दस्तावेज और बंधपत्र इस नयी अत्याचारपूर्ण प्रणाली के प्रतीक बन गये थे। इन सब कारणों से दक्कन की रैयत ने ऋणदाताओं, व्यापारियों व साहूकारों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

विद्रोह का स्वरूप – दक्कन का यह आन्दोलन पूना जिले के सूपा नामक स्थान से जो कि एक विपणन केन्द्र था, से 12 मई, 1875 को प्रारम्भ हुआ। आसपास गाँवों के किसानों ने एकत्र होकर साहूकारों से उनके बहीखातों और ऋणबन्ध पत्रों की माँग करते हुए हमला कर दिया। बहीखाते जला दिए गये, अनाज लूट लिया गया और साहूकारों के घरों में आग लगा दी गई।

प्रश्न 9.
दक्कन विद्रोह के परिणामों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
दक्कन विद्रोह के परिणाम दक्कन विद्रोह के परिणाम विद्रोह के दमन और दक्कन दंगा आयोग की स्थापना के रूप में हुए यथा –
(1) विद्रोह का दमन जब विद्रोह तेजी से फैलने लगा तो ब्रिटिश अधिकारियों की आँखों के सामने 1857 गदर का दृश्य नाचने लगा। विद्रोही किसानों के गाँवों में पुलिस थाने स्थापित किए गए शीघ्र ही सेना भी बुला ली गई। विद्रोहियों को गिरफ्तार करके उन्हें दंडित भी किया गया, लेकिन विद्रोह को दबाने में कई महीने लग गये। (2) दक्कन दंगा आयोग व उसकी रिपोर्ट दंगा फैलने पर प्रारम्भ में बम्बई की सरकार ने इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया लेकिन भारत सरकार के दबाव पड़ने पर उसने दंगे के कारणों की छानबीन करने हेतु एक जाँच आयोग की स्थापना की जिसने पीड़ित जिलों में जाँच-पड़ताल करवाई, साहूकारों और चश्मदीद गवाहों के बयान लिए तथा जिला कलेक्टरों की रिपोटों का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट 1878 में ब्रिटिश संसद में पेश की। जाँच आयोग को यह निर्देश था कि वह यह पता लगाए कि क्या सरकारी राजस्व की माँग विद्रोह का कारण थी? आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि विद्रोह का कारण साहूकारों और ऋणदाताओं के प्रति किसानों का क्रोध था। सरकारी राजस्व की माँग इसके लिए जिम्मेदार नहीं थी। लेकिन यह रिपोर्ट एकपक्षीय थी क्योंकि औपनिवेशिक सरकार कभी भी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं थी, जबकि राजस्व की भारी माँग के कारण ही किसानों को साहूकारों से ऋण उनकी शर्तों पर लेना पड़ा।

प्रश्न 10.
रैयत (किसान) ऋणदाताओं के प्रति किन कारणों से क्रुद्ध थी? सविस्तार वर्णन कीजिए।
अथवा
रैयत ऋणदाताओं को कुटिल और धोखेबाज क्यों समझ रही थी? इस पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जब भारतीय कपास की माँग ब्रिटेन में कम हो गई तब ऋणदाताओं ने किसानों को ऋण देने से मना कर दिया। उन्हें यह लगने लगा कि अब किसानों में ऋण चुकाने की क्षमता नहीं है।
(1) अन्याय का अनुभव-जब ऋणदाताओं ने ऋण देने से मना किया तो किसानों में उसके प्रति बहुत क्रोध उत्पन्न हुआ, उन्हें इस बात का दुःख नहीं था कि वे कर्ज में डूबते जा रहे हैं अपितु इस बात का दुःख था कि साहूकार इतना संवेदनहीन कैसे हो गया है कि उनकी हालत पर दया भी नहीं कर रहा है। साहूकारों ने देहात के प्रथागत मानकों का उल्लंघन करना प्रारम्भ कर दिया। जो मानक किसान और साहूकार के सम्बन्धों को विनियमित करते थे, साहूकार उन्हें तोड़ रहा था।

(2) साहूकारों द्वारा खातों में धोखाधड़ी-साहूकारों द्वारा किसानों के साथ धोखाधड़ी की जाने लगी। किसानों से दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करा लिए जाते थे या अंगूठा लगवा लिया जाता था, पर किसान को यह पता नहीं चल पाता था कि ये किस पर हस्ताक्षर कर रहे हैं या अंगूठा लगा रहे हैं अतः किसान को ऋणदाता की मनमानी का शिकार होना पड़ता था।

(3) परिसीमन कानून और ऋणदाता की चालाकी=रैयत द्वारा साहूकारों की शिकायतें मिलने पर 1859 में अंग्रेजों ने एक परिसीमन कानून पारित किया, जिसके अनुसार ऋणदाता और रैयत के बीच हस्ताक्षरित ऋणपत्र केवल तीन वर्षों के लिए ही मान्य होगा। इसका उद्देश्य व्याज को संचित होने से रोकना था।

(4) किसान की मजबूरी यह जानते हुए कि उनके साथ धोखा या अन्याय हो रहा है फिर भी किसान अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए साहूकारों के चंगुल में फँसने को मजबूर था, क्योंकि किसान को ऋण चाहिये था और वह बिना दस्तावेज भरे मिलता नहीं था। समय के साथ, किसान यह समझने लगे कि उनके जीवन में जो दुःख तकलीफ है, वह सब बंधपत्रों और दस्तावेजों की इस नयी व्यवस्था के कारण ही है। उन्हें उन खण्डों के बारे में कुछ भी पता नहीं होता जो ऋणदाता बंधपत्रों में लिख देते थे। इस तरह रैयत साहूकारों द्वारा की गई चालबाजियों के कारण उनसे क्रुद्ध थी और अन्ततः उसने 1875 में इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठायी और दक्कन में दंगा शुरू हुआ।

प्रश्न 11.
पाँचवीं रिपोर्ट क्या थी? इसके बारे में विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
सन् 1813 में ब्रिटिश संसद में एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। उसी रिपोर्ट का एक भाग पाँचवीं रिपोर्ट कहलाया। यह भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रशासन तथा क्रियाकलापों के विषय में तैयार की गई थी। इस रिपोर्ट में 1002 पृष्ठ थे तथा इसके परिशिष्ट के रूप में 800 से अधिक पृष्ठ थे। पाँचवीं रिपोर्ट की पृष्ठभूमि पाँचवीं रिपोर्ट के निर्माण की पृष्ठभूमि को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है –

1. ईस्ट इण्डिया कम्पनी के एकाधिकार का विरोध- जब कम्पनी ने प्लासी के युद्ध (1757 ई.) के बाद बंगाल में अपनी सत्ता स्थापित की, तभी से इंग्लैण्ड में उसके क्रियाकलापों पर बारीकी से नजर रखी जा रही थी। ब्रिटेन में ऐसे बहुत से व्यापारिक समूह थे जो कम्पनी के भारत और चीन के साथ व्यापारिक एकाधिकार का विरोध कर रहे थे। उनकी माँग थी कि उस फरमान को रद्द किया जाए, जिसके अन्तर्गत कम्पनी को एकाधिकार दिया गया था। कई राजनीतिक समूहों का कहना था कि बंगाल पर मिली विजय का फायदा केवल ईस्ट इण्डिया कम्पनी को ही मिल रहा है, सम्पूर्ण ब्रिटिश राष्ट्र को नहीं।

2. कम्पनी कुशासन पर बहस ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कुशासन एवं अव्यवस्थित प्रशासन के विषय में प्राप्त सूचनाओं पर ब्रिटिश संसद में गरमागरम बहस छिड़ गई और कम्पनी के अधिकारियों के भ्रष्ट आचरण तथा लोभ- लालच की घटनाओं को ब्रिटेन के समाचार पत्रों में खूब उछाला गया।

3. ब्रिटिश संसद द्वारा पारित अधिनियम-ब्रिटेन की संसद ने भारत में कम्पनी शासन को विनियमित और नियंत्रित करने के लिए अठारहवीं शताब्दी के अन्तिम दशकों में कई अधिनियम पारित किए।

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4. समितियों की नियुक्ति-कम्पनी के प्रशासन की जाँच के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा कई समितियाँ नियुक्त की गई, जो जाँच उपरान्त अपनी रिपोर्ट भेजती थीं ऐसी ही एक प्रवर समिति द्वारा कम्पनी प्रशासन पर तैयार रिपोर्ट ब्रिटिश संसद में भेजी गई जो पाँचवीं रिपोर्ट कहलाती है। पाँचवीं रिपोर्ट के गुण-पाँचवीं रिपोर्ट में उपलब्ध साक्ष्य बहुमूल्य हैं। 18वीं शताब्दी के अन्तिम दशकों में ग्रामीण बंगाल में क्या हुआ, इसके बारे में हमारी अवधारणा लगभग डेढ़ शताब्दी तक इस पाँचवीं रिपोर्ट के आधार पर ही बनती सुधरती रही।

पाँचवीं रिपोर्ट का दोषपाँचवीं रिपोर्ट में परम्परागत जमींदारी के पतन का वर्णन बहुत बढ़ा-चढ़ाकर लिखा गया और जिस पैमाने पर जमींदार लोग अपनी जमीनें खोते जा रहे थे, उसके बारे में भी बढ़ा-चढ़ाकर कहा गया है। जब जमींदारियाँ नीलाम होती थीं तो जमींदार नए-नए हथकण्डे अपनाकर अपनी जमींदारी बचा लेते थे और बहुत कम मामलों में विस्थापित होते थे।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ 

Jharkhand Board JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

बहुचयनात्मक प्रश्न

1. भारत कब स्वतन्त्र हुआ………………………..
(क) सन् 1945 की 14 अगस्त को।
(ख) सन् 1947 के 14-15 अगस्त की मध्य रात्रि को।
(ग) सन् 1946 के 15 अगस्त की मध्यरात्रि को।
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(ख) सन् 1947 के 14-15 अगस्त की मध्य रात्रि को।

2. विभाजन के समय भारत में कुल रजवाड़ों की संख्या कितनी थी?
(क) 565
(ख) 570
(ग) 580
(घ) 562
उत्तर:
(क) 565

3. द्विराष्ट्र सिद्धान्त की बात जिस राजनीतिक दल ने सर्वप्रथम की थी, वह था।
(क) भारतीय जनता पार्टी
(ख) मुस्लिम लीग
(ग) कांग्रेस
(घ) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
उत्तर:
(ख) मुस्लिम लीग

4. राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना कब हुई?
(क) सन् 1953
(ख) सन् 1954
(ग) सन् 1955
(घ) सन् 1956
उत्तर:
(क) सन् 1953

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5. देशी रियासतों के एकीकरण में किस भारतीय नेता की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
(क) पं. जवाहरलाल नेहरू
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) सरदार पटेल
(घ) गोपाल कृष्ण गोखले
उत्तर:
(ग) सरदार पटेल

6. भारत का संविधान कब लागू किया गया
(क) 15 अगस्त, 1947
(ख) 26 जनवरी, 1950
(ग) 14 अगस्त, 1947
(घ) 30 जनवरी, 1947
उत्तर:
(ख) 26 जनवरी, 1950

7. खान अब्दुल गफ्फार खान को किस नाम से जाना जाता है
(क) महात्मा गाँधी
(ख) मोहम्मद अली जिन्ना
(ग) सीमान्त गाँधी
(घ) मौलाना
उत्तर:
(ग) सीमान्त गाँधी

8. बांग्लादेश का निर्माण किस वर्ष हुआ
(क) 1971
(ख) 1975
(ग) 1977
(घ) 1978
उत्तर:
(क) 1971

9. पूर्वी पाकिस्तान को वर्तमान में किस नाम से जाना जाता है
(क) बांग्लादेश
(ख) म्यांमार
(ग) भूटान
(घ) पश्चिमी बंगाल
उत्तर:
(क) बांग्लादेश

10. प्रसिद्ध फिल्म ‘गर्म हवा’ जिस वर्ष बनी, वह था-
(क)1971
(ख) 1965
(ग) 1947
(घ) 1973
उत्तर:
(घ) 1973

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11. 1960 में विभाजित होने से पहले बॉम्बे राज्य में कौनसी दो भाषाएँ बोली जाती थीं?
(क) पंजाबी और मराठी
(ख) गुजराती और पंजाबी
(ग) मराठी और पंजाबी
(घ) मराठी और गुजराती
उत्तर:
(घ) मराठी और गुजराती

12. ‘नोआखली’ अब जिस देश में है, वह है
(क) बांग्लादेश
(ख) पाकिस्तान
(ग) भारत
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) बांग्लादेश

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए 

1. स्वतंत्र भारत की जनता को जवाहरलाल नेहरू ने एक विशेष सत्र को संबोधित किया। उनका यह प्रसिद्ध भाषण …………………… के नाम से जाना गया।
उत्तर:
ट्रिस्ट विद् डेस्टिनी

2. सन् ………………….. का साल अभूतपूर्व हिंसा और विस्थापन की त्रासदी का साल था।
उत्तर:
1947

3. संविधान में ………………………… अधिकारों की गारंटी दी गई है और हर नागरिक को ………………. का अधिकार दिया गया है।
उत्तर:
मौलिक, मतदान

4. भारत ने संसदीय शासन पर आधारित ……………………………लोकतंत्र को अपनाया।
उत्तर:
प्रतिनिधित्वमूलक

5.. रजवाड़ों के शासक ………………… पर हस्ताक्षर करके भारतीय संघ में शामिल होते थे।
उत्तर:
इंस्टूमेंट ऑफ एक्सेशन

6. स्वतंत्र भारत के प्रथम उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ………………………थे।
उत्तर:
वल्लभभाई पटेल

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
1947 में भारत के विभाजन के पीछे कौन – सा सिद्धान्त था?
उत्तर:
द्वि- राष्ट्र सिद्धान्त।

प्रश्न 2.
भारत में राष्ट्र निर्माण के मार्ग की किन्हीं दो चुनौतियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ हैं।

  1. लोकतान्त्रिक व्यवस्था को कायम रखना
  2. राष्ट्र का विकास करना ताकि समस्त समाज का भला हो।

प्रश्न 3.
राष्ट्र निर्माण के लिए किन तत्वों का होना अनिवार्य है?
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण के लिए भाषायी एकता, सामान्य संस्कृति तथा भौगोलिक एकता जैसे तत्वों का होना आवश्यक है।

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प्रश्न 4.
मेघालय का निर्माण कब हुआ?
उत्तर:
मेघालय राज्य का निर्माण सन् 1972 में किया गया।.

प्रश्न 5.
भारत में राष्ट्र-निर्माण के मार्ग में बाधक तत्त्व कौन-कौनसे हैं?
उत्तर:
भारत में राष्ट्र-निर्माण के मार्ग में बाधक तत्त्वों में निर्धनता, अशिक्षा, बेरोजगारी, जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न 6.
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री कौन थे?
उत्तर:
भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू थे।

प्रश्न 7.
देश के विभाजन से सर्वाधिक प्रभावित दो राज्यों के नाम बताइये।
उत्तर:
देश के विभाजन से सर्वाधिक प्रभावित दो राज्य थे— पंजाब और बंगाल।

प्रश्न 8.
भारत विभाजन के समय धार्मिक बहुसंख्यकों के आधार पर विभाजित हुए दो प्रान्तों के नाम बताइये।
अथवा
भारत के विभाजन में किन दो प्रान्तों का भी बँटवारा किया गया ?
उत्तर:

  1. पंजाब
  2. बंगाल- दोनों प्रान्तों का भी बँटवारा भारत के विभाजन के समय किया गया।

प्रश्न 9.
आजादी के तुरंत बाद सबसे प्रमुख चुनौती क्या थी?
उत्तर:
राष्ट्र – निर्माण।

प्रश्न 10.
स्वतन्त्र राज्य बनने से पहले गुजरात और हरियाणा किन मूल राज्यों के अंग थे?
उत्तर:
गुजरात बम्बई राज्य का भाग था जबकि हरियाणा पंजाब का अंग था।

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प्रश्न 11.
उन मूल राज्यों के नाम लिखिये जिनसे निम्नलिखित राज्यों को पृथक् किया गया।
(अ) मेघालय
(ब) गुजरात।
उत्तर:
(अ) असम राज्य
(ब) बम्बई प्रेसीडेंसी।

प्रश्न 12.
सन् 2000 में जिन तीन नए राज्यों का निर्माण किया गया, उनके नाम लिखिए।
उत्तर:
सन् 2000 में निम्न तीन राज्य बने:  झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और उत्तरांचल (उत्तराखण्ड)।

प्रश्न 13.
विभाजन के पश्चात् कौन-कौनसे राज्यों ने भारत और पाकिस्तान दोनों में शामिल होने से मना कर दिया?
उत्तर:
विभाजन के पश्चात् हैदराबाद तथा जम्मू-कश्मीर जैसी रियासतों ने भारत तथा पाकिस्तान दोनों में से किसी भी राज्य में शामिल होने से मना कर दिया।

प्रश्न 14.
पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त के उस नेता का नाम लिखिये जो द्वि-राष्ट्र सिद्धान्त का विरोधी था।
उत्तर:
खान अब्दुल गफ्फार खां।

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प्रश्न 15.
भारत के प्रथम गृहमंत्री कौन थे?
उत्तर:
भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल थे।

प्रश्न 16.
ब्रिटिश गवर्नर जनरल ने भारत विभाजन की घोषणा कब की?
उत्तर:
ब्रिटिश गवर्नर जनरल ने 3 जून, 1947 को विभाजन योजना की घोषणा की।

प्रश्न 17.
रियासतों से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
रियासतों पर उन राजाओं का शासन था जिन्होंने अंग्रेजों के वर्चस्व के तहत अपने आंतरिक मामलों पर नियंत्रण का कोई रूप नियोजित किया था।

प्रश्न 18.
भारत के किस राज्य में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के सिद्धान्त को अपनाकर सर्वप्रथम चुनाव हुए थे?
उत्तर:
मणिपुर में।

प्रश्न 19.
राज्य पुनर्गठन अधिनियम कब लागू किया गया ?
उत्तर:
राज्य पुनर्गठन अधिनियम सन् 1956 में लागू किया गया।

प्रश्न 20.
राज्य पुनर्गठन अधिनियम के आधार पर कितने राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों की स्थापना की गई?
उत्तर:
राज्य पुनर्गठन अधिनियम के आधार पर 14 राज्य और 6 केन्द्र शासित प्रदेशों की स्थापना की गई।

प्रश्न 21.
भाषा के आधार पर सर्वप्रथम कब और किस राज्य का निर्माण किया गया?
उत्तर:
दिसम्बर, 1952 में सर्वप्रथम भाषा के आधार पर आंध्रप्रदेश राज्य का निर्माण हुआ।

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प्रश्न 22.
स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने 14-15 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि को संविधान सभा में जो भाषण दिया, वह किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का वह भाषण ‘भाग्यवधु से चिर-प्रतीक्षित भेंट’ या ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 23.
‘भाग्यवधू से चिर-प्रतीक्षित भेंट या ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ प्रसिद्ध भाषण किस प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया?
उत्तर:
स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के द्वारा।

प्रश्न 24.
राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट का आधार क्या था?
उत्तर:
राज्यों के पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट भाषाई पहलुओं को प्रतिबिंबित करने के लिए भाषा के आधार पर राज्यों की सीमाओं के वितरण पर आधारित थी।

प्रश्न 25.
सन् 1960 में मुम्बई राज्य का विभाजन करके कौन-कौनसे दो राज्यों का निर्माण किया गया?
उत्तर:
सन् 1960 में मुम्बई राज्य का विभाजन करके महाराष्ट्र और गुजरात नामक दो राज्यों का निर्माण किया गया।

प्रश्न 26.
राज्य पुनर्गठन आयोग की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सिफारिश क्या है?
उत्तर:
राज्य पुनर्गठन आयोग की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सिफारिश भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन है।

प्रश्न 27.
किन चार देशी रियासतों का भारतीय संघ में विलय अन्यों की तुलना में अधिक कठिन साबित हुआ?
उत्तर:

  1. हैदराबाद
  2. जम्मू एवं कश्मीर
  3. जूनागढ़
  4. मणिपुर।

प्रश्न 28.
अलगाववाद से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब एक समुदाय या सम्प्रदाय संकीर्ण भावना से ग्रस्त होकर अलग एवं स्वतन्त्र राज्य बनाने की मांग करे तो उसे अलगाववाद कहा जाता है

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प्रश्न 29.
राज्य पुनर्गठन से क्या अभिप्राय है? यह कब किया गया?
उत्तर:
राज्यों के पुनर्गठन का अर्थ है कि राज्यों का भाषा के आधार पर पुनः गठन करना। भारत में राज्यों का पुनर्गठन 1956 में किया गया।

प्रश्न 30.
स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत द्वारा किन दो चुनौतियों का सामना किया जा रहा था?
उत्तर:

  1. शरणार्थियों के पुनर्वास की समस्या।
  2. राज्यों के पुनर्गठन की समस्या।

प्रश्न 31. भारत में वर्तमान में राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों की स्थिति बताइये।
उत्तर:
भारत में वर्तमान में 28 राज्य और 9 केन्द्रशासित प्रदेश हैं।

प्रश्न 32.
राज्यों के पुनर्गठन के लिए भाषा आधार होगा। यह प्रस्ताव कांग्रेस के किस सत्र में माना गया?
उत्तर:
सन् 1920 में कांग्रेस का नागपुर अधिवेशन।

प्रश्न 33.
मद्रास प्रांत के तेलुगुवासी इलाकों को अलग करके नया राज्य बनाने की माँग किस आंदोलन द्वारा की गयी थी?
उत्तर:
विशाल आंध्र आंदोलन|

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प्रश्न 34.
महाराष्ट्र और गुजरात राज्य का गठन किस सन् में हुआ?
उत्तर:
महाराष्ट्र और गुजरात राज्य का गठन सन् 1960 में हुआ।

प्रश्न 35.
मुस्लिम लीग का गठन क्यों हुआ था?
उत्तर:
मुस्लिम लीग का गठन मुख्य रूप से औपनिवेशिक भारत में मुसलमानों के हितों की रक्षा के लिए हुआ था। प्रश्न 36, भारत और पाकिस्तान के बँटवारे के समय वित्तीय संपदा के साथ-साथ किन चीजों का बँटवारा हुआ ? उत्तर-वित्तीय संपदा के साथ-साथ टेबल, कुर्सी, टाईपराइटर और पुलिस के वाद्ययंत्रों तक का बँटवारा हुआ था।

लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत के सामने मुख्य चुनौतियाँ कौन-कौनसी थीं?
उत्तर:
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत के सामने निम्नलिखित मुख्य चुनौतियाँ थीं

  1. भारत की क्षेत्रीय अखण्डता को कायम रखना।
  2. लोकतांत्रिक व्यवस्था को लागू करना।
  3. सभी वर्गों का समान विकास करना।

प्रश्न 2.
“भारत को किसी अन्य देश के बजाय बहुत कठिन परिस्थितियों में स्वतंत्रता मिली।” कथन को सत्यापित कीजिए।
उत्तर:
भारत को स्वतंत्रता बहुत कठिन परिस्थितियों में मिली:

  1. भारत की स्वतंत्रता भारत के बँटवारे के साथ आई।
  2. वर्ष 1947 अभूतपूर्व हिंसा और आघात का वर्ष बन गया।
  3. फिर भी हमारे नेताओं ने क्षेत्रीय विविधताओं को भी समायोजित करके इन सभी चुनौतियों का सराहनीय तरीके से सामना किया।

प्रश्न 3.
क्षेत्र से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भूमि के उस छोटे से टुकड़े को रहने वाले लोगों में एकता की भावना है। यह सामाजिक जीवन के कारण उत्पन्न होती है। क्षेत्र कहा जाता है जो किसी बड़े संगठित क्षेत्र का एक भाग है और जिसमें भावना सामान्य भाषा, सामान्य धर्म, भौगोलिक समीपता, आर्थिक और

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प्रश्न 4.
भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन का क्या आधार तय किया गया था?
उत्तर:
भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन का आधार धार्मिक बहुसंख्या को बनाया गया था कि जिन क्षेत्रों में मुसलमान बहुसंख्यक थे, वे क्षेत्र पाकिस्तान के भू-भाग होंगे तथा शेष भाग ‘भारत’ कहलायेगा।

प्रश्न 5.
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् रजवाड़ों के विलय का क्या आधार निश्चित किया गया था?
उत्तर:
स्वतंत्रता के बाद रजवाड़ों को भी कानूनी रूप से स्वतंत्र होना था। ब्रिटिश शासन ने यह दृष्टिकोण दिया कि रजवाड़े अपनी मर्जी से भारत या पाकिस्तान में शामिल हो सकते हैं या वे चाहें तो अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रख सकते हैं। यह फैसला लेने का अधिकार राजाओं को दिया गया था, न कि वहाँ की जनता को।

प्रश्न 6.
भारत में हरियाणा राज्य का पुनर्गठन कब हुआ ? इसकी प्रमुख समस्याएँ बताइए।
उत्तर:
1 नवम्बर, 1966 को पंजाब से हिन्दी भाषी क्षेत्र को पंजाब से अलग करके हरियाणा और हिमाचल प्रदेश राज्यों का निर्माण हुआ। पंजाब और हरियाणा में भाषा के आधार पर अब भी विवाद बना हुआ है। पंजाब हरियाणा के पंजाबी भाषी क्षेत्रों को पंजाब को हस्तान्तरित करने की माँग करता है, जबकि हरियाणा पंजाब के हिन्दी भाषी क्षेत्रों को हरियाणा को देने की माँग करता है ।

प्रश्न 7.
पोट्टी श्रीरामुलु कौन थे?
उत्तर:
पोट्टी श्रीरामुलु गाँधीवादी विचारों से प्रभावित कार्यकर्ता थे। इन्होंने नमक सत्याग्रह में भाग लेने के लिए सरकारी पद को त्याग दिया। 19 अक्टूबर, 1952 को वह आन्ध्रप्रदेश नाम से अलग राज्य निर्माण की माँग को लेकर अनशन पर बैठे। 15 दिसम्बर, 1952 को अनशन के दौरान ही वह मृत्यु को प्राप्त हो गये।

प्रश्न 8.
संक्षेप में देश विभाजन से हुई जन-हानि का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
एक अनुमान के अनुसार विभाजन के फलस्वरूप 80 लाख लोगों को अपना घर-बार छोड़कर सीमा पार जाना पड़ा। विभाजन की हिंसा में लगभग पाँच से दस लाख लोगों ने अपनी जान गँवाई । अनेक लोगों के अंग-भंग कर दिए गए। उनके बच्चे अनाथ हो गये।

प्रश्न 9.
राष्ट्रीय आंदोलन के नेता एक पंथ निरपेक्ष राज्य के पक्षधर क्यों थे?
उत्तर:
राष्ट्रीय आंदोलन के नेता एक पंथनिरपेक्ष राज्य के पक्षधर थे क्योंकि वे जानते थे कि बहुधर्मावलम्बी देश भारत में किसी धर्म विशेष को संरक्षण देना भारत की एकता के लिए बाधक बनेगा तथा इससे विविध धर्मावलम्बियों के मूल अधिकारों का हनन होगा।

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प्रश्न 10.
अमृता प्रीतम कौन थी?
उत्तर:
अमृता प्रीतम पंजाबी भाषा की प्रमुख कवयित्री और कथाकार, साहित्य उपलब्धियों के लिए साहित्य अकादमी, पद्मश्री और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित महिला थी। राष्ट्र विभाजन के बाद वह दिल्ली में ही स्थायी रूप से बस गई। उन्होंने जीवन के अन्तिम समय पंजाब की साहित्यिक पत्रिका ‘नागमणि’ का सम्पादन किया।

प्रश्न 11.
फैज अहमद फैज पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
प्रसिद्ध मानवतावादी तथा क्रांतिकारी कवि फैज अहमद फैज़ का जन्म सियालकोट (अब पाकिस्तान में ) हुआ। वह विभाजन के बाद पाकिस्तान में ही रहे। वामपंथी रुझान के कारण उनका पाकिस्तानी शासन से हमेशा टकराव बना रहा। उन्होंने लम्बा समय कारावास में बिताया । नक्से फिरयादी, दस्त-ए-सबा तथा जिंदानामा उनके प्रमुख कविता संग्रह हैं।

प्रश्न 12.
क्षेत्रीय संस्कृति तथा क्षेत्रीय असन्तुलन के आधार पर किन राज्यों का निर्माण किया गया है?
उत्तर:
अनेक उपक्षेत्रों ने अलग क्षेत्रीय संस्कृति अथवा विकास के मामले में क्षेत्रीय असन्तुलन का मुद्दा उठाकर अलग राज्य बनाने की माँग की। ऐसे तीन राज्य झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और उत्तरांचल ( अब उत्तराखंड) सन् 2000 में बने तथा तेलंगाना 2014 में बना।

प्रश्न 13.
निम्न पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए:
1. द्वि- राष्ट्र सिद्धान्त
2. मुस्लिम लीग।
उत्तर:

  1. द्वि-राष्ट्र सिद्धान्त: द्विराष्ट्र सिद्धान्त के अनुसार भारत किसी एक कौम का नहीं बल्कि हिन्दू और मुसलमान नामक दो कौमों का है।
  2. मुस्लिम लीग: स्वतंत्रता से पूर्व मुस्लिम लीग मुसलमानों का राजनैतिक दल था। विभाजन से पूर्व इसने द्विराष्ट्र सिद्धान्त के तहत मुसलमानों के लिए पाकिस्तान की माँग की और अन्ततः भारत का विभाजन हुआ।

प्रश्न 14.
भारत धर्मनिरपेक्ष राज्य कैसे बना?
उत्तर:
यद्यपि भारत और पाकिस्तान का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था, परन्तु विभाजन के बाद 1951 में भारत की कुल आबादी में 12 प्रतिशत मुसलमान थे। इसके अतिरिक्त अन्य अल्पसंख्यक धर्मावलम्बी भी थे। भारत सरकार के अधिकतर नेता सभी नागरिकों को समान दर्जा देने के पक्षधर थे, चाहे वह किसी भी धर्म का हो। वे मानते थे कि नागरिक चाहे जिस धर्म को माने, उसका दर्जा बाकी नागरिकों के बराबर ही होना चाहिए। धर्म को नागरिकता की कसौटी नहीं बनाया जाना चाहिए। उनके इस धर्मनिरपेक्ष आदर्श की अभिव्यक्ति भारतीय संविधान में हुई। इस प्रकार भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बना।

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प्रश्न 15.
विभाजन के समय पाकिस्तान को दो भागों-पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान में क्यों बांटा गया?
उत्तर:
भारत के विभाजन का यह आधार तय किया गया कि ब्रिटिश इण्डिया के जिन इलाकों में मुसलमान बहुसंख्यक थे, वे इलाके पाकिस्तान के भू-भाग होंगे। अविभाजित भारत में ऐसे दो इलाके थे। एक इलाका पश्चिम में था तो दूसरा इलाका पूर्व में। इसे देखते हुए फैसला हुआ कि पाकिस्तान में ये दो इलाके शामिल होंगे। ये पूर्वी पाकिस्तान तथा पश्चिमी पाकिस्तान कहलाये। ऐसा कोई तरीका नहीं था कि इन दो इलाकों को जोड़कर एक जगह कर दिया जाये। इसलिए पाकिस्तान को दो भागों में बाँटा गया।

प्रश्न 16.
भारतीय संघ में जूनागढ़ को शामिल करने की घटना पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
जूनागढ़ रियासत का भारत में विलय:
जूनागढ़ गुजरात के दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक रियासत थी। जूनागढ़ की लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दू थी। जूनागढ़ के नवाब महाबत खान ने पाकिस्तान के साथ शामिल होने का निर्णय किया। जबकि भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर जूनागढ़ भारत में ही शामिल हो सकता था। जूनागढ़ के शासक के न मानने पर सरदार पटेल ने जूनागढ़ के शासक के विरुद्ध बल प्रयोग का आदेश दिया। जूनागढ़ में भारतीय सैनिकों का सामना करने की क्षमता नहीं थी अन्ततः दिसम्बर, 1947 में करवाये गए जनमत संग्रह में जूनागढ़ के लगभग 99 प्रतिशत लोगों ने भारत में शामिल होने की बात कही।

प्रश्न 17.
हैदराबाद को भारत में किस प्रकार सम्मिलित किया?
उत्तर:
हैदराबाद रियासत का भारत में विलय:
स्वतन्त्रता प्राप्ति एवं भारत के विभाजन के पश्चात् हैदराबाद के निजाम उसमान अली खान ने हैदराबाद को स्वतन्त्र रखने का निर्णय लिया परन्तु हैदराबाद का निजाम परोक्ष रूप से पाकिस्तान का समर्थक था। हैदराबाद भारत के केन्द्र में स्थित होने के कारण तथा यहाँ की जनसंख्या का हिन्दू बहुसंख्यक होने के कारण भारत में विलय आवश्यक था। तत्कालीन गृहमन्त्री सरदार पटेल को आशंका थी कि आने वाले समय में हैदराबाद पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के लिए खतरा उत्पन्न कर सकता है। सरदार पटेल तथा लार्ड माउंटबेटन के निजाम को समझाने के प्रयासों की विफलता के बाद भारत ने सैनिक कार्यवाही करके हैदराबाद को भारत में मिला लिया।

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प्रश्न 18.
‘ट्रिस्ट विद् डेस्टिनी’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
भारत 14-15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि को आजाद हुआ। स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस रात संविधान सभा के एक विशेष सत्र को संबोधित किया था। उनका यह प्रसिद्ध भाषण ‘भाग्यवधू से चिर-प्रतीक्षित भेंट’ या ‘ट्रिस्ट विद् डेस्टिनी’ के नाम से जाना गया।

प्रश्न 19.
भारत में देसी रजवाड़ों के एकीकरण में सरदार पटेल की भूमिका की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारत में देशी रजवाड़ों के एकीकरण में सरदार पटेल की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रही है। उनके अथक प्रयास के फलस्वरूप सभी रजवाड़ों का भारत में विलय तो हुआ और साथ ही हैदराबाद के निजाम तथा जूनागढ़ के नवाब के साथ सरदार पटेल को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। किन्तु उन्होंने उन दिक्कतों के बारे में सोचे बिना इन दोनों रियासतों को भारत का अभिन्न अंग बना दिया।

प्रश्न 20.
देशी राज्यों (रजवाड़ों) के भारत संघ में विलय के संदर्भ में तीन विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:
देशी राज्यों के भारत संघ में विलय सम्बन्धी विशेषताएँ निम्नलिखित थीं-

  1. अधिकतर रजवाड़ों के लोग भारतीय संघ में शामिल होना चाहते थे।
  2. इस संदर्भ में भारत सरकार का रुख लचीला था और वह कुछ इलाकों को स्वायत्तता देने के लिए तैयार थी, जैसा कि जम्मू-कश्मीर में हुआ। भारत सरकार ने विभिन्नताओं को सम्मान देने और
  3. विभिन्न क्षेत्रों की माँगों को संतुष्ट करने के लिये यह रुख अपनाया था।
  4. विभाजन की पृष्ठभूमि में विभिन्न इलाकों के सीमांकन के सवाल पर खींचतान जोर पकड़ रही थी। ऐसे में देश की क्षेत्रीय अखंडता एकता का प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो उठा था।

प्रश्न 21.
सीमान्त गाँधी कौन थे? उनके द्वि-राष्ट्र सिद्धान्त के बारे में दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए उनकी भूमिका का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
खान अब्दुल गफ्फार खान को सीमान्त गाँधी कहा जाता है। वे पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त (पेशावर के मूलतः निवासी) के निर्विवाद नेता थे। वे कांग्रेस के नेता तथा लाल कुर्ती नामक संगठन के समर्थक थे। सच्चे गाँधीवादी, अहिंसा व शान्ति के समर्थक होने के कारण उनको ‘सीमान्त गाँधी’ कहा जाता था। वे द्वि-राष्ट्र सिद्धान्त के एकदम विरोधी थे। संयोग से उनकी आवाज की अनदेखी की गई और ‘पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत’ को पाकिस्तान में शामिल मान लिया गया।

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प्रश्न 22.
रजवाड़ों के संदर्भ में सहमति-पत्र का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
रजवाड़ों का सहमति – पत्र – आजादी के तुरन्त पहले अंग्रेजी शासन ने घोषणा की कि भारत पर ब्रिटिश प्रभुत्व के समाप्त होने के साथ ही रजवाड़े भी ब्रिटिश- अधीनता से आजाद हो जाएँगे और उसके राजा या शासक अपनी इच्छानुसार भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित हो सकते हैं या अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाए रख सकते। शांतिपूर्ण बातचीत के जरिए लगभग सभी रजवाड़े जिनकी सीमाएँ आजाद हिन्दुस्तान की नयी सीमाओं से मिलती थीं, के शासकों ने भारतीय संघ में अपने विलय के सहमति – पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये। इस सहमति – पत्र को इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन कहा जाता है। इस पर हस्ताक्षर का अर्थ था कि रजवाड़े भारतीय संघ का अंग बनने के लिए सहमते हैं।

प्रश्न 23.
संक्षेप में राज्य पुनर्गठन आयोग के निर्माण की पृष्ठभूमि, कार्य तथा इससे जुड़े एक्ट का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
राज्य पुनर्गठन आयोग:
भारत में आंध्रप्रदेश के गठन के साथ ही देश के दूसरे हिस्सों की भाषायी आधार पर राज्यों को गठित करने का संघर्ष चल पड़ा। इन संघर्षों से बाध्य होकर केन्द्र सरकार ने 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया। इस आयोग का काम राज्यों के सीमांकन के मामलों पर गौर करना था। इसने अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया कि राज्यों की सीमाओं का निर्धारण वहाँ बोली जाने वाली भाषा के आधार पर होना चाहिए। इस आयोग की रिपोर्ट के आधार पर 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियमं पास हुआ। इस अधिनियम के आधार पर 14 राज्य और 6 केन्द्र शासित प्रदेश बनाए गए।

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प्रश्न 24.
मोहम्मद अली जिन्ना कौन थे? उनके बारे में संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
मोहम्मद अली जिन्ना:
मोहम्मद अली जिन्ना आधुनिक पाकिस्तान के जनक थे। वे स्वराज्य संघर्ष के कुछ प्रारम्भिक वर्षों में कांग्रेस पार्टी में रहे। बाद में वे मुस्लिम लीग में शामिल हो गये। वे देश विभाजन के साथ-साथ अपने जीवन के सबसे बड़े राजनीतिक उद्देश्य पाकिस्तान निर्माण की प्राप्ति को समीप देखकर साम्प्रदायिक सद्भाव बनाने के पक्ष में बातें भी करने लगे। जिन्ना ने अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक समुदायों में पारस्परिक एकता के मार्ग पर चलने का सन्देश दिया। पाकिस्तान की संविधान सभा में अध्यक्षीय भाषण में आपने कहा कि पाकिस्तान में आप अपने मंदिर या मस्जिद में जाने या किसी भी अन्य पूजास्थल पर जाने के लिये आजाद हैं। आपके धर्म, आपकी जाति या विश्वास से राज्य का कुछ लेना-देना नहीं है।

प्रश्न 25.
भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन से उपजी समस्या को संक्षेप में समझाइये।
उत्तर:
भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की समस्या – भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन करने से कई राज्यों के लोग सन्तुष्ट नहीं थे, क्योंकि कई राज्यों में रहते लोग, अपनी भाषा के आधार पर अलग राज्य की स्थापना चाहते थे। इसी कारण देश के कई भागों में लोगों द्वारा गम्भीर आंदोलन आरम्भ कर दिए और सरकार को विवश होकर नए राज्य स्थापित करने पड़े। उदाहरणार्थ- 1960 में बम्बई राज्य को महाराष्ट्र और गुजरात दो राज्यों में, 1966 में पंजाब राज्य को हरियाणा और पंजाब दो राज्यों में बांटना पड़ा था।

इसी प्रकार 1963 में नागालैण्ड और 1972 में मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा राज्य की स्थापना करनी पड़ी तथा 1987 में अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम राज्य वजूद में आए। 2014 में तेलंगाना राज्य वजूद में आया। वर्तमान समय में विदर्भ, मैथली, बोडो, डोगरालैण्ड, गोरखा व कच्छ आदि राज्यों की माँग भाषा के आधार पर ही की जा रही है।

प्रश्न 26.
भारतीय राजनीति पर भाषा के प्रभावों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय राजनीति पर भाषा के प्रभाव – भाषा ने राजनीति को अग्र प्रकार से प्रभावित किया

  1. राष्ट्रीय एकता को खतरा: भारत को बहुभाषी होने के कारण अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा है। यद्यपि हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा माना गया है लेकिन दक्षिण के राज्यों तथा उत्तर के राज्यों में मुख्य विवाद का कारण भाषा ही है।
  2. भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन: राज्य पुनर्गठन कानून 1956 के आधार पर भारत को 14 राज्यों तथा 6 संघीय क्षेत्रों में विभाजित किया गया। लेकिन इसके बाद भी समस्या का समाधान नहीं हुआ और भाषा के आधार पर राज्यों की माँग की समस्या वर्तमान में भी बनी हुई है।
  3. सीमा विवाद: भाषा के कारण अनेक राज्यों में सीमा विवाद उत्पन्न हुए हैं और आज भी अनेक राज्यों के बीच यह विवाद चल रहे हैं। पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

प्रश्न 27.
स्वतंत्र भारत को राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के दौरान किन तीन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
उत्तर:
स्वतंत्र भारत को राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के दौरान निम्न तीन चुनौतियों का सामना करना पड़ा:

  1. राष्ट्र निर्माण की चुनौती:
    स्वतंत्रता के समय भारत अलग-अलग राज्यों में विभाजित था। इसलिए पहली चुनौती एकता के सूत्र में बँधे एक ऐसे भारत को गढ़ने की थी जिसमें भारतीय समाज में सारी विविधताओं के लिए जगह हो। इस कार्य को पूरा करने का काम सरदार वल्लभभाई पटेल ने किया। इस कार्य को अलग-अलग चरणों में पूरा करने के लिए उन्होंने राजनीति तथा कूटनीति दोनों का प्रयोग किया।
  2. लोकतंत्र कायम करना:
    भारत ने सरकार के संसदीय स्वरूप के आधार पर प्रतिनिधि लोकतंत्र का गठन किया और राष्ट्र में इन लोकतांत्रिक प्रथाओं को विकसित करना एक बड़ी चुनौती थी।
  3. समाज का विकास और कल्याण सुनिश्चित करना:
    भारतीय राजनीति ने राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के अंतर्गत लोक-कल्याण के उन लक्ष्यों को स्पष्ट कर दिया था जिन्हें राजनीति को जरूर पूरा करना चाहिए ।

प्रश्न 28.
“कल हम अंग्रेजी की गुलामी से आजाद हो जायेंगे लेकिन आधी रात को भारत का बँटवारा होगा इसलिए कल का दिन हमारे लिए खुशी का दिन होगा और गम का भी।” गाँधीजी के उपर्युक्त कथन के अनुसार कल का दिन हमारे लिए क्यों खुशी एवं गम दोनों का होगा? उत्तर- गाँधीजी के अनुसार यह दिन खुशी एवं गम का इसलिए होगा क्योंकि 14 अगस्त, 1947 की आधी रात को लगभग 12 बजे से भारत में लम्बे समय से चला आ रहा ब्रिटिश राज का अन्त हो जायेगा तथा लोग स्वतन्त्रता के वातावरण में जीवन व्यतीत करेंगे। इसलिए 15 अगस्त, 1947 का दिन सभी भारतवासियों के लिए खुशी का दिन होगा । लेकिन उसी दिन गम को भी सहन करना होगा क्योंकि देश का दो स्वतन्त्र राष्ट्रों भारत एवं पाकिस्तान के रूप में विभाजन हो जायेगा।

प्रश्न 29.
हमें बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदायों की इन जटिलताओं को दूर करने की भावना चाहिए। बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों ही समुदायों में तरह-तरह के लोग शामिल हैं। अगर मुसलमान पठान, पंजाबी, शिया और सुन्नी आदि समुदायों में बँटे हैं तो हिन्दू भी ब्राह्मण, वैष्णव, खत्री तथा बंगाली, मद्रासी आदि समुदायों। पाकिस्तान में आप आजाद हैं। जिन्ना साहब के उपर्युक्त कथन को समझाइये।
उत्तर:
पाकिस्तान की मुस्लिम लीग की माँग जब लगभग समीप दिखाई दी तो जिन्ना साहब ने पंथ निरपेक्षता एवं साम्प्रदायिक सद्भाव उत्पन्न करने के लिए अपने भाव व्यक्त किये। उनके विचारानुसार पाकिस्तान में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदायों की जटिलताओं को दूर करने की भावना से काम करना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों ही समुदायों में तरह-तरह के लोग शामिल हैं।

जैसे कि अगर हम पाकिस्तान के बहुसंख्यक समुदाय यानी मुसलमानों की बात करते हैं तो हमें मानना पड़ेगा कि उनमें कुछ लोग पठान हैं तो कुछ लोग पंजाबी, कुछ लोग शिया तो कुछ सुन्नी इत्यादि भी हैं अर्थात् बहुसंख्यक भी ‘स्थल’ पर विभाजित हैं। दूसरी ओर पाकिस्तान में हिन्दू समाज यदि अल्पसंख्यक हैं तो वे भी कई जातियों या वर्णों में विभाजित हैं, जैसे—ब्राह्मण, वैश्य, खत्री, बंगाली, मद्रासी आदि। पाकिस्तान में सभी लोग स्वतन्त्र हैं। वे अपने या अन्य पूजा स्थलों पर जाने के लिए स्वतन्त्र हैं।

प्रश्न 30.
महात्मा गाँधी की शहादत (बलिदान) से जुड़ी प्रमुख घटनाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
महात्मा गाँधी की शहादत (बलिदान) से जुड़ी प्रमुख घटनाएँ निम्नलिखित हैं।

  1. महात्मा गाँधी की नीति एवं कार्यों से तत्कालीन समय के अतिवादी हिन्दू एवं मुसलमान दोनों अप्रसन्न थे। दोनों समुदायों के अतिवादी गाँधीजी पर दोष मंढ रहे थे।
  2. हिन्दू-मुस्लिम एकता के अनेक अडिग प्रयासों से अतिवादी हिन्दू महात्मा गाँधी से इतने नाराज थे कि उन्होंने अनेक बार गाँधीजी को जान से मारने का प्रयास किया।
  3. गाँधीजी ने प्रार्थना सभा में हर किसी से मिलना जारी रखा। आखिरकार 30 जनवरी, 1948 के दिन एक हिन्दू अतिवादी नाथूराम विनायक गोडसे ने गोली मारकर गाँधीजी की हत्या कर दी।
  4. गाँधीजी की मौत का देश के साम्प्रदायिक माहौल पर जादुई असर हुआ । विभाजन से जुड़ा क्रोध और हिंसा अचानक मंद पड़ गये। भारत सरकार ने साम्प्रदायिक संगठनों की मुश्कें कस दीं और साम्प्रदायिक राजनीति का जोश लोगों में घटने लगा।

प्रश्न 31.
“हम भारत के इतिहास के एक यादगार मुकाम पर खड़े हैं। साथ मिलकर चलें तो देश को हम महानता की नयी बुलंदियों तक पहुँचा सकते हैं, जबकि एकता के अभाव में हम अप्रत्याशित विपदाओं के घेरे में होंगे। मैं उम्मीद करता हूँ कि भारत की रियासतें इस बात को पूरी तरह समझेंगी कि अगर हमने सहयोग नहीं किया और सर्व-सामान्य की भलाई में साथ मिलकर कदम नहीं बढ़ाया तो अराजकता और अव्यवस्था हममें से सबको चाहे कोई छोटा हो या बड़ा घेर लेंगी और हमें बर्बादी की तरफ ले जाएँगी सरदार पटेल के उपर्युक्त कथन को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
उपर्युक्त कथन में सरदार पटेल ने देश की अनेकानेक रियासतों के शासकों को सम्बोधित कर एक पत्र के माध्यम से (1947) बताया कि हम सभी देशवासी अपने भारत के इतिहास के स्मरणीय क्षण पर खड़े हैं। यदि हम सभी देशवासी साथ-साथ मिलकर चलें तो निःसन्देह देश को महानता की नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकते हैं। बकि एकता के अभाव में हम अप्रत्याशित संकट से घिर जायेंगे। सरदार पटेल ने आशा प्रकट की कि देशी रियासतें इस बात को पूरी तरह समझेंगी कि यदि हमने परस्पर सहयोग नहीं किया और जनसामान्य की भलाई में साथ मिलकर कदम नहीं बढ़ाया तो देश में अराजकता और अव्यवस्था हम सभी को घेर लेंगी और हमें बर्बादी की ओर ले जायेंगी। एकता में बल है, पारस्परिक फूट में बर्बादी है।

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प्रश्न 32.
भारत विभाजन से संबंधित किन्हीं दो परिणामों पर प्रकाश डालिये।
उत्तर:
14-15 अगस्त, 1947 को भारत का विभाजन हुआ तथा भारत व पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र राष्ट्र अस्तित्व में आए। इस विभाजन के दो परिणाम निम्नलिखित हैं।

  1. आबादी का स्थानान्तरण: विभाजन से बड़े पैमाने पर एक जगह की अल्पसंख्यक आबादी दूसरी जगह जाने को मजबूर हुई। आबादी का यह स्थानान्तरण आकस्मिक, अनियोजित और त्रासदीपूर्ण था।
  2. हिंसक अलगाववाद: विभाजन में सिर्फ सम्पत्ति, देनदारी और परिसम्पत्तियों का ही बंटवारा नहीं हुआ बल्कि दो समुदायों, जो अब तक पड़ौसियों की तरह रहते थे, में हिंसक अलगाववाद व्याप्त हो गया। धर्म के नाम पर एक समुदाय के लोगों ने दूसरे समुदाय के लोगों को अत्यन्त बेरहमी से मारा।

प्रश्न 33.
भारत की स्वतंत्रता के समय देश के समक्ष आई किन्हीं दो चुनौतियों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
भारत की स्वतंत्रता के समय देश के समक्ष आई दो प्रमुख चुनौतियाँ निम्नलिखित थीं।

  1. राष्ट्रीय एकता की चुनौती: स्वतंत्र भारत के सामने तात्कालिक चुनौती विविधता से भरे भारत में एकता की स्थापना करती थी। इस समय भारत की क्षेत्रीय अखण्डता को कायम रखने की चुनौती प्रमुख थी क्योंकि अनेक रियासतें अपने को स्वतंत्र रखना चाह रही थीं तो अनेक पाकिस्तान में मिलने की इच्छा बता रही थीं।
  2. लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम करने की चुनौती: स्वतंत्र भारत के समक्ष दूसरी प्रमुख चुनौती लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम करने की थी। यद्यपि भारतीय संविधान में संसदीय लोकतंत्र की स्थापना की थी, नागरिकों को मौलिक अधिकारों की गारण्टी दी गई थी, वयस्क मताधिकार प्रदान किया गया था, तथापि संविधान से मेल खाते लोकतांत्रिक व्यवहार को प्रचलन में लाने की चुनौती बनी हुई थी।

प्रश्न 34.
जवाहर लाल नेहरू ने भारत में मुसलमान अल्पसंख्यकों के संदर्भ में 15 अक्टूबर, 1947 को मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में क्या लिखा था?
उत्तर:
मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में नेहरूजी ने लिखा था कि- “भारत में मुसलमान अल्पसंख्यकों की संख्या इतनी ज्यादा है कि यदि वे चाहें तब भी यहाँ से कहीं और नहीं जा सकते। यह एक बुनियादी तथ्य है और इस पर कोई अँगुली नहीं उठाई जा सकती। पाकिस्तान चाहे जितना उकसावा दे या वहाँ के गैर-मुस्लिमों को अपमान और भय के चाहे जितने भी घूँट पीने पड़ें, हमें अल्पसंख्यकों के साथ सभ्यता और शालीनता के साथ पेश आना है। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में हमें उन्हें नागरिक के अधिकार देने होंगे और उनकी रक्षा करनी होगी। अगर हम ऐसा करने में कामयाब नहीं होते तो यह एक नासूर बन जाएगा जो पूरी राज व्यवस्था में जहर फैलाएगा और शायद उसको तबाह भी कर दे।”

प्रश्न 35.
पाकिस्तान के द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की माँग क्यों मान ली?
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय मुस्लिम लीग ने ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ की बात कही और इस सिद्धांत के अनुसार भारत किसी एक कौम का नहीं बल्कि ‘हिन्दू’ और ‘मुसलमान’ इन दो कौमों का देश था और इसीलिए मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए अलग देश यानि पाकिस्तान की माँग की। काँग्रेस ने इस सिद्धांत का विरोध किया। सन् 1940 के दशक में राजनीतिक मोर्चे पर कई बदलाव आए, काँग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा तथा ब्रिटिश- शासन की भूमिका जैसी कई बातों का जोर रहा । फलस्वरूप पाकिस्तान की माँग मान ली गई ।

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प्रश्न 36.
विभाजन के परिणाम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
सन् 1947 के विभाजन पर एक जगह की आबादी दूसरी जगह जाने को मजबूर हुई थी। यह स्थानांतरण मानव-इतिहास के अब तक सबसे बड़े स्थानांतरणों में से एक था। धर्म के नाम पर एक समुदाय के लोगों ने दूसरे समुदाय के लोगों को बेरहमी से मारा। लोग अपना घर – बार छोड़ने पर मजबूर हुए। दोनों ही तरफ के अल्पसंख्यक अपने घरों से भाग गए और उन्होंने शरणार्थी शिविर में पनाह ली। सीमा के दोनों ओर हजारों की तादाद में औरतों को अगवा करने वाले का धर्म भी अपनाना पड़ा। कई मामलों में यह भी हुआ कि खुद परिवार के लोगों ने अपने ‘कुल की इज्जत’ बचाने के नाम पर घर की बहू-बेटियों को मार डाला । बहुत से बच्चे अपने माँ-बाप से बिछड़ गए। लाखों की संख्या में लोग बेघर हो गए।

प्रश्न 37.
भारत के नेताओं ने नागरिकता की कसौटी धर्म को नहीं बनाया । इस कथन को सत्यापित कीजिए।
उत्तर:
मुस्लिम लीग का गठन मुख्य रूप से औपनिवेशिक भारत में मुसलमानों के हितों की रक्षा के लिए हुआ था। इसी प्रकार कुछ भारतीय संगठनों ने भी भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए हिन्दुओं को लामबंद करने की कोशिश की। लेकिन भारत की कौमी सरकार के अधिकतर नेता सभी नागरिकों को समान दर्जा देने के पक्षधर थे चाहे नागरिक किसी भी धर्म का हो। वे भारत को ऐसे राष्ट्र के रूप में नहीं देखना चाहते थे जहाँ किसी एक धर्म के अनुयायियों को दूसरे धर्मावलंबियों के ऊपर वरीयता दी जाए अथवा किसी एक धर्म के विश्वासियों के मुकाबले बाकियों को हीन समझा जाता हो। वे मानते थे कि नागरिक चाहे किसी भी धर्म का हो, उसका दर्जा बाकी नागरिकों के बराबर होना चाहिए। हमारे नेतागण धर्मनिरपेक्ष राज्य के आदर्श के हिमायती थे।

प्रश्न 38.
अंग्रेजी – राज का नजरिया यह था कि रजवाड़े अपनी मर्जी से चाहें तो भारत या पाकिस्तान में शामिल हो जाएँ या फिर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखें। यह अपने आप में गंभीर समस्या थी। उदाहरण के साथ स्पष्ट करें।
उत्तर:
आजादी के तुरंत पहले अंग्रेजी शासन ने घोषणा की कि भारत पर ब्रिटिश-प्रभुत्व के साथ ही रजवाड़े भी ब्रिटिश- अधीनता से आजाद हो जाएँगे। अंग्रेजी राज के अनुसार रजवाड़े अपनी इच्छानुसार भारत या पाकिस्तान में मिल सकते हैं या स्वतंत्र रह सकते हैं । यह अपने आप में गंभीर समस्या थी और इससे अखंड भारत के अस्तित्व पर ही खतरा मँडरा रहा था। उदाहरण के लिए – त्रावणकोर के राजा ने अपने राज्य को आजाद रखने की घोषणा की। अगले दिन हैदराबाद के निजाम ने भी ऐसी ही घोषणा की। कुछ शासक जैसे कि भोपाल के नवाब संविधान सभा में शामिल नहीं होना चाहते थे । अतः रजवाड़ों के शासकों के रवैये से यह बात साफ हो गई कि आजादी के बाद हिन्दुस्तान कई छोटे- छोटे देशों की शक्ल में बँट जाने वाला था।

प्रश्न 39.
देशी रजवाड़ों की चर्चा से कौन-सी तीन बातें सामने आती हैं?
उत्तर:
देशी रजवाड़ों की चर्चा से निम्न तीन बातें सामने आती हैं।

  1. अधिकतर रजवाड़ों के लोग भारतीय संघ में शामिल होना चाहते थे संजीव पास बुक्स
  2. भारत सरकार का रुख लचीला था और वह कुछ इलाकों को स्वायत्तता देने के लिए तैयार थी जैसा कि जम्मू-कश्मीर में हुआ।
  3. विभाजन की पृष्ठभूमि में विभिन्न इलाकों के सीमांकन के सवाल पर खींचतान जोर पकड़ रही थी और ऐसे में देश की क्षेत्रीय अखंडता एकता का सवाल सबसे अहम था।

प्रश्न 40.
यदि आजाद भारत को प्रांतों में बाँटने का आधार भाषा को बनाया गया तो अव्यवस्था फैल सकती है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आजादी और बँटवारे के बाद स्थितियाँ बदलीं भारत के नेताओं को यह आभास हो गया था कि अगर भाषा के आधार पर प्रांत बनाए गए तो इससे अव्यवस्था फैल सकती है तथा देश के टूटने का खतरा पैदा हो सकता है। भाषावार राज्यों के गठन से दूसरी सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से ध्यान भटक सकता।

प्रश्न 41.
आंध्रप्रदेश राज्य का गठन क्यों करना पड़ा?
उत्तर:
भारत के आज़ाद होने पर भारतीय नेताओं ने भाषा के आधार पर प्रांत बनाने का फैसला स्थगित कर दिया। केन्द्रीय नेतृत्व के इस फैसले को स्थानीय नेताओं और लोगों ने चुनौती दी। पुराने मद्रास प्रांत में आज के तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश शामिल थे। विशाल आंध्र आंदोलन ने माँग की कि मद्रास प्रांत के तेलुगुवासी इलाकों को अलग करके एक नया राज्य आंध्रप्रदेश बनाया जाए। इस आंदोलन को लोगों का सहयोग मिला।

कांग्रेस के नेता और दिग्गज गाँधीवादी, पोट्टी श्रीरामुलु, अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए। 56 दिनों की हड़ताल के बाद उनकी मृत्यु हो गई। फलस्वरूप आंध्रप्रदेश में जगह-जगह हिंसक घटनाएँ हुईं। लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर निकल आए। पुलिस फायरिंग में अनेक लोग घायल हुए या मारे गए। मद्रास में अनेक विधायकों ने विरोध जताते हुए अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया। आखिरकार 1952 के दिसंबर में प्रधानमंत्री ने आंध्रप्रदेश नाम से अलग राज्य बनाने की घोषणा की।

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प्रश्न 42.
भाषाई राज्य तथा इन राज्यों के गठन के लिए चले आंदोलनों ने लोकतांत्रिक राजनीति तथा नेतृत्व की प्रकृति को बुनियादी रूपों में बदला है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाषावार राज्यों के पुनर्गठन की घटना को आज 50 साल से भी अधिक समय हो गया। अर्थात् हम यह कह सकते हैं क़ि भाषाई राज्य तथा इन राज्यों के गठन के लिए चले आंदोलनों ने लोकतांत्रिक राजनीति तथा नेतृत्व की प्रकृति को बुनियादी रूपों में बदला है। क्योंकि राजनीति और सत्ता में भागीदारी का रास्ता अब एक छोटे-से अंग्रेजी भाषी अभिजात तबके के लिए ही नहीं बल्कि बाकियों के लिए भी खुल चुका था। भाषावार पुनर्गठन से राज्यों के सीमांकन के लिए एक समरूप आधार भी मिला । बहुतों की आशंका के विपरीत इससे देश नहीं टूटा। इसके विपरीत देश की एकता . और ज्यादा मजबूत हुई। सबसे बड़ी बात यह कि भाषावार राज्यों के पुनर्गठन से विभिन्नता के सिद्धांत को स्वीकृति मिली।

प्रश्न 43.
भारत देश के लोकतांत्रिक होने का वृहत्तर अर्थ है। संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जब हम यह कहते हैं कि भारत ने लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को अपनाया है तो इसका मतलब मात्र यह नहीं है कि भारत में लोकतांत्रिक संविधान पर अमल होता है अथवा भारत में चुनाव करवाए जाते हैं। भारत के लोकतांत्रिक होने का वृहत्तर अर्थ है । लोकतंत्र को चुनने का अर्थ था विभिन्नताओं को पहचानना और उन्हें स्वीकार करना। इसके साथ ही यह भी मानकर चलना कि विभिन्नताओं में आपसी विरोध भी हो सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत में लोकतंत्र की धारणा विचारों और जीवन-पद्धतियों की बहुलता की धारणा से जुड़ी हुई थी ।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत विभाजन में आने वाली कठिनाइयों की विवेचना कीजिये।
उत्तर:
भारत विभाजन में आने वाली कठिनाइयाँ: भारत के विभाजन में आने वाली प्रमुख कठिनाइयाँ निम्नलिखित थीं।

1. मुस्लिम बहुल इलाकों का निर्धारण करना: भारत में दो इलाके ऐसे थे जहाँ मुसलमानों की आबादी ज्यादा थी। एक इलाका पश्चिम में था तो दूसरा इलाका पूर्व में था। ऐसा कोई तरीका न था कि इन दोनों इलाकों को जोड़कर एक जगह कर दिया जाये।

2. प्रत्येक मुस्लिम बहुल क्षेत्र को पाकिस्तान में जाने को राजी करना: मुस्लिम बहुल हर इलाका पाकिस्तान में जाने को राजी हो, ऐसा भी नहीं था। विशेषकर पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त जिसके नेता खान अब्दुल गफ्फार खां थे, जो द्विराष्ट्र सिद्धान्त के खिलाफ थे।

3. पंजाब और बंगाल के बँटवारे की समस्या: तीसरी कठिनाई यह थी कि ‘ब्रिटिश इण्डिया’ के मुस्लिम बहुल प्रान्त पंजाब और बंगाल में अनेक हिस्से बहुसंख्यक गैर-मुस्लिम आबादी वाले थे। इन प्रान्तों का बंटवारा किस प्रकार किया जाये। 14-15 अगस्त मध्य रात्रि तक यह फैसला नहीं हो पाया था।

4. अल्पसंख्यकों की समस्या: सीमा के दोनों तरफ अल्पसंख्यक थे। ये लोग एक तरह से सांसत में थे। जैसे ही यह बात साफ हुई कि देश का बँटवारा होने वाला है, वैसे ही दोनों तरफ से अल्पसंख्यकों पर हमले होने लगे आबादी का यह स्थानान्तरण आकस्मिक, अनियोजित और त्रासदी भरा था। दोनों ही तरफ के अल्पसंख्यक अपने घरों से भाग खड़े हुए और अक्सर अस्थाई तौर पर उन्हें शरणार्थी शिविरों में पनाह लेनी पड़ी। इस प्रकार विभाजन में सिर्फ संपदा, देनदारी और परिसम्पत्तियों का ही बँटवारा नहीं हुआ, बल्कि इसमें दोनों समुदाय हिंसक अलगाव के शिकार भी हुए।

प्रश्न 2.
भारत विभाजन में आने वाली कठिनाइयों का हल किस प्रकार किया गया?
उत्तर:
भारत विभाजन में आने वाली कठिनाइयों का हल निम्न प्रकार किया गया।

  • मुस्लिम बहुल इलाकों का निर्धारण करना: भारत में दो इलाके ऐसे थे जहाँ मुसलमानों की आबादी ज्यादा थी। एक इलाका पश्चिम में था तो दूसरा पूर्व में। अतः यह निर्णय किया गया कि पाकिस्तान के दो इलाके होंगे
    1. पूर्वी पाकिस्तान और
    2. पश्चिमी पाकिस्तान।
  • प्रत्येक मुस्लिम बहुल क्षेत्र को पाकिस्तान में जाने को राजी करना: जो मुस्लिम बहुल इलाका पाकिस्तान में जाने को राजी नहीं था, जैसे पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त। उसकी आवाज की अनदेखी कर उसे पाकिस्तान में मिलाया गया।
  • पंजाब व बंगाल के बंटवारे की समस्या: इस सम्बन्ध में यह फैसला किया गया कि इन दोनों प्रान्तों का बंटवारा धार्मिक बहुसंख्यकों के आधार पर होगा तथा इसमें जिले अथवा तहसील को आधार माना जायेगा। लेकिन यह फैसला देर से होने के कारण दोनों प्रान्तों के बंटवारे में जान-माल की भारी हानि हुई।
  • अल्पसंख्यकों की समस्या: हर हाल में अल्पसंख्यकों को सीमा के दूसरी तरफ जाना पड़ा। दोनों तरफ शरणार्थी शिविर लगाये गये और फिर उन्हें बसाया गया।

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प्रश्न 3.
1947 में भारत के विभाजन के क्या परिणाम हुए?
अथवा
‘भारत और पाकिस्तान का विभाजन अत्यन्त दर्दनाक था । ‘ विभाजन के परिणामों का उल्लेख उपर्युक्त तथ्य के प्रकाश में कीजिये।
उत्तर:
भारत-विभाजन के परिणाम: 14 – 15 अगस्त, 1947 को ‘ब्रिटिश इंडिया’ का दो राष्ट्रों में विभाजन हो गया। ये राष्ट्र हैं। भारत और पाकिस्तान भारत और पाकिस्तान के विभाजन के निम्न प्रमुख परिणाम सामने आये-

  1. आबादी का स्थानान्तरण: इसके कारण बड़े पैमाने पर एक जगह की अल्पसंख्यक आबादी दूसरी जगह जाने को मजबूर हुई थी। आबादी का यह स्थानान्तरण आकस्मिक, अनियोजित और त्रासदी से भरा था।
  2. घर बार छोड़ने की मजबूरी: विभाजन के परिणामस्वरूप दोनों तरफ के 80 लाख अल्पसंख्यक लोगों को अस्थाई तौर पर शरणार्थी शिविरों में पनाह लेनी पड़ी। वहाँ का स्थानीय प्रशासन इन लोगों के साथ रुखाई का बरताव कर रहा था।
  3. महिलाओं तथा बच्चों के साथ अत्याचार हुए- सीमा के दोनों ओर हजारों की तादाद में अल्पसंख्यक औरतों को अगवा कर लिया गया। उन्हें जबरन शादी करनी पड़ी और अगवा करने वाले का धर्म भी अपनाना पड़ा। बहुत से बच्चे अपने माँ-बाप से बिछड़ गये।
  4. हिंसक अलगाव: इस विभाजन में दो समुदाय हिंसक अलगाव के शिकार हुए। विभाजन की हिंसा में लगभग 5 से 10 लाख लोग मारे गये।
  5. भौतिक सम्पत्ति का बँटवारा: विभाजन में वित्तीय संपदा, परिसम्पत्तियों, सरकारी काम-काज में आने वाले फर्नीचर, मशीनरी तथा सरकारी व रेलवे के कर्मचारियों का बँटवारा हुआ। साथ ही साथ टेबल, कुर्सी, टाइपराइटर और पुलिस के वाद्य यंत्रों तक का बंटवारा हुआ था। अतः स्पष्ट है कि भारत तथा पाकिस्तान का विभाजन दर्दनाक तथा त्रासदी से भरा था।

प्रश्न 4.
देशी रियासतों के एकीकरण में सरदार वल्लभ भाई पटेल के योगदान पर प्रकाश डालिए।
अथवा
भारत में देशी राज्यों (रजवाड़ों) के विलय पर एक निबन्ध लिखिए।
उत्तर:
देशी राज्यों या रजवाड़ों के विलय की समस्या:
स्वतंत्रता के तुरन्त पहले ब्रिटिश शासन ने घोषणा की कि भारत पर ब्रिटिश प्रभुत्व के साथ ही रजवाड़े भी ब्रिटिश- अधीनता से स्वतंत्र हो जायेंगे तथा ये रजवाड़े अपनी मर्जी से चाहें तो भारत या पाकिस्तान में शामिल हो जाएँ या फिर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखें। यह फैसला लेने का अधिकार राजाओं को दिया गया है। यह एक गंभीर समस्या थी और इससे अखंड भारत के अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा था। राज्यों के पुनर्गठन की समस्या का समाधान सरदार पटेल के नेतृत्व में देशी रियासतों के विलय की समस्या का समाधान निम्न प्रकार तीन चरणों में किया गया

  1. प्रथम चरण: एकीकरण प्रथम चरण में अधिकांश देशी रियासतों के शासकों ने भारतीय संघ में स्वेच्छा से अपने विलय के एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये, जिसे ‘इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ कहा जाता है। इस पर हस्ताक्षर का अर्थ था कि रजवाड़े भारतीय संघ का अंग बनने के लिए सहमत है।
  2. द्वितीय चरण- अधिमिलन: मणिपुर, जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर जैसी रियासतों ने स्वेच्छा से भारत में शामिल होना स्वीकार नहीं किया था, परन्तु सरदार पटेल ने अपने रणनीतिक कौशल एवं सूझ-बूझ से इन रियासतों को भारत में विलय होने के लिए मजबूर कर दिया।
  3. तृतीय चरण: प्रजातन्त्रीकरण: इस चरण में देशी राज्यों के प्रान्तों में भी संसदीय प्रणाली लागू की गई तथा निर्वाचित विधानसभाओं की स्थापना की गई। इस प्रकार इनमें प्रजातन्त्रीकरण की समस्या को हल किया गया।

प्रश्न 5.
विभाजन की विरासतों पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
अथवा
भारत विभाजन के साथ भारत को जो समस्याएँ विरासत में मिलीं उनका उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारत को विभाजन के साथ मिली समस्याएँ: भारत विभाजन के साथ भारत को जो समस्याएँ विरासत में मिलीं उन्हें विभाजन की विरासत कहा जाता है। यह समस्याएँ निम्नलिखित हैं।
1. शरणार्थियों की समस्या:
भारत के विभाजन के फलस्वरूप पाकिस्तान छोड़कर भारत आने वाले शरणार्थियों की संख्या लाखों में थी। अतः सरकार के सामने इन लोगों के पुनर्वास की कठिन समस्या सामने आयी। भारत सरकार को न केवल इन शरणार्थी लोगों को भारत में रहने के लिए घरों की व्यवस्था करनी थी, बल्कि उन्हें मनोवैज्ञानिक आधार पर यह समझाना भी था कि यहाँ उन्हें सुरक्षित रूप से जीवन व्यतीत करने की व्यवस्था भी की जाएगी। पं. नेहरू ने इस समस्या के समाधान हेतु पुनर्वास मन्त्रालय बनाया, शरणार्थियों के लिए जगह- जगह शिविर लगाये,
उन्हें बसाया तथा मुआवजे के रूप में यथायोग्य जमीन-जायदाद दी तथा उन्हें भारत का नागरिक बनाया।

2. कश्मीर समस्या:
भारत के विभाजन के समय देशी रियासत कश्मीर के राजा हरि सिंह ने कश्मीर को एक स्वतन्त्र राज्य बनाने का निर्णय लिया। परन्तु पाकिस्तान ने पश्चिमी सीमा प्रान्त के कबाइली लोगों को प्रेरणा और सहायता देकर कश्मीर पर आक्रमण करवा दिया। फलतः आक्रमणकारियों में अधिकांशतः पाकिस्तानी सैनिक थे। इस आक्रमण से कश्मीर के अस्तित्व को खतरा हो गया।

3. कश्मीर के राजा हरिसिंह ने कश्मीर के भारत में विलय के घोषणा: पत्र पर हस्ताक्षर कर भारत से सहायता माँगी पं. नेहरू और सरदार पटेल ने भारतीय सेना को कश्मीर भेजा, इसके साथ भारत ने पाकिस्तान से यह आग्रह किया कि वह कश्मीर में अपनी सैनिक गतिविधियाँ बन्द करे। परन्तु पाकिस्तान ने इससे इन्कार कर दिया। कश्मीर की समस्या पर कोई सर्वमान्य हल निकल सके, इस हेतु पं. नेहरू इसे संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गये परन्तु कश्मीर की समस्या का अब तक भी कोई सर्वमान्य हल नहीं निकल पाया है।

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प्रश्न 6.
स्वतंत्रता के बाद राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों को समझाते हुए राज्यों का पुनर्गठन समझाइए।
अथवा
राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन कब और क्यों हुआ? इसकी मुख्य सिफारिश क्या थी?
अथवा
राज्य पुनर्गठन आयोग का क्या कार्य था? इसकी प्रमुख सिफारिशों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये।
उत्तर:
राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन: भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की माँग के जोर पकड़ने पर केन्द्र सरकार ने सन् 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया। राज्य पुनर्गठन आयोग का कार्य: राज्य पुनर्गठन आयोग का काम राज्यों के सीमांकन के मसले पर गौर करना था। राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश ।

राज्य पुनर्गठन आयोग ने यह सिफारिश की कि राज्यों की सीमाओं का निर्धारण वहाँ बोली जाने वाली भाषा के आधार पर होना चाहिए इस आयोग की सिफारिश के आधार पर 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पास हुआ जिसके आधार पर 14 राज्य और 6 केन्द्र: शासित प्रदेश बनाये गये। सिफारिशों का आलोचनात्मक विश्लेषण: भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के निम्न परिणाम निकले हैं।

  1. एक लोकतांत्रिक कदम: भाषा के आधार पर नये राज्यों का गठन करना एक लोकतांत्रिक कदम के रूप में देखा गया।
  2. सीमांकन का समरूप आधार: भाषावार पुनर्गठन से राज्यों के सीमांकन के लिए एक समरूप आधार भी मिला।
  3. एकता को बल: भाषावार पुनर्गठन से देश की एकता और ज्यादा मजबूत हुई।
  4. विभिन्नता के सिद्धान्त को स्वीकृति भाषावार राज्यों के पुनर्गठन से विभिन्नता के सिद्धान्त को स्वीकृति

प्रश्न 7.
भारत में भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की समस्या का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन करने से भारतीय राजनीतिक क्षेत्र में कई गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो गयी थीं। कई राज्यों के लोग अपनी भाषा के आधार पर नये राज्यों की माँग करने लगे। इसी कारण देश के कई भागों में लोगों द्वारा गंभीर आंदोलन आरंभ कर दिए गए और भारत सरकार को विवश होकर नए राज्य स्थापित करने पड़े। सन् 1960 में बंबई (मुम्बई) राज्य को महाराष्ट्र और गुजरात दो राज्यों में और 1966 में पंजाब राज्य को हरियाणा और पंजाब दो राज्यों में बाँटना पड़ा।

इसी प्रकार, 1963 में नगालैण्ड और 1972 में मेघालय राज्य की स्थापना करनी पड़ी। इसी वर्ष मणिपुर, त्रिपुरा भी अलग राज्य बने तथा अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम 1987 में वजूद में आए। नवम्बर, 2000 में तीन राज्यों उत्तरांचल (उत्तराखण्ड), छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के गठन तथा 2014 में तेलंगाना के गठन के बावजूद भाषा के आधार पर जम्मू-कश्मीर में डोगरालैंड, पश्चिमी बंगाल में गोरखा राज्य, गुजरात में कच्छ राज्य, मध्य प्रदेश में विदर्भ राज्य की मांग भाषा के आधार पर ही की जा रही है।

भाषायी क्षेत्रवाद की यह भावना देश की राजनीतिक और क्षेत्रीय एकता के लिए निरंतर ख़तरा बन रही है। यदि शुद्ध भाषात्मक एकरूपता के आधार पर भारतीय संघ का गठन किया जाए तो हमारा देश इतने अधिक राज्यों में बँट जाएगा कि भारत के लिए एक राष्ट्र के रूप में अपना अस्तित्व कायम रखना असंभव हो सकता है।

प्रश्न 8.
स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत की प्रमुख चुनौतियाँ कौन-कौनसी थीं? व्याख्या करें।
अथवा
स्वतंत्रता के समय, भारत के समक्ष आई किन्हीं तीन चुनौतियों की विस्तार से व्याख्या कीजिये। स्वतंत्रता के समय भारत के समक्ष आई चुनौतियाँ
उत्तर:
भारत की स्वतंत्रता के समय भारत के समक्ष निम्नलिखित तीन तरह की चुनौतियाँ थीं-
1. राष्ट्र निर्माण की चुनौती:
स्वतंत्रता के तुरन्त बाद राष्ट्र-निर्माण की चुनौती प्रमुख थी। यहाँ विभिन्न धर्मों, जातियों, वर्गों, भाषाओं और संस्कृति को मानने वाले लोग रहते थे, इनमें एकता कायम करने की एक चुनौती थी। क्योंकि हर क्षेत्रीय व उप-क्षेत्रीय पहचान को कायम रखते हुए देश की एकता व अखण्डता को कायम रखना था। दूसरे, देशी राज्यों को भारत संघ में विलीन करने की भी एक विकट समस्या थी। इस तरह स्वतंत्रता के बाद तात्कालिक प्रश्न राष्ट्र निर्माण की चुनौतीका था।

2. लोकतांत्रिक व्यवस्था को कायम करना:
देश के सामने दूसरी प्रमुख चुनौती लोकतंत्र को कायम करने की थी। स्वतन्त्रता के बाद भारत ने संसदीय प्रतिनिध्यात्मक लोकतान्त्रिक मॉडल को अपनाया। लेकिन अब देश के सामने यह चुनौती थी कि संविधान पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवहार की व्यवस्थाएँ चलन में आएं ताकि लोकतंत्र कायम रह सके। दूसरी चुनौती यह थी कि एक ऐसे समतामूलक समाज का विकास किया जाये जिसमें सभी वर्गों का भला हो सके।

3. आर्थिक विकास हेतु नीति निर्धारित करना:
स्वतंत्रता के समय देश के समक्ष तीसरी प्रमुख चुनौती आर्थिक विकास हेतु नीतियों का निर्धारण करना था। अतः देश के सामने नीति निर्देशक सिद्धान्तों के अनुरूप आर्थिक विकास करने और गरीबी को खत्म करने के लिए कारगर नीतियों का निर्धारण करने की चुनौती थी।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

प्रश्न 9.
स्वतंत्रता के बाद भारत के एकीकरण को समझाइए स्वतंत्रता के बाद भारत का एकीकरण
उत्तर:
संजीव पास बुक्स: स्वतंत्रता के बाद भारत के समक्ष एकीकरण की प्रमुख चुनौती थी। यह चुनौती तीन रूपों में हमारे देश के नेताओं के समक्ष आई। यथा।
1. विभाजन:
विस्थापन और पुनर्वास तथा धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना – परिणामतः स्वतन्त्रता के बाद दोनों तरफ के अल्पसंख्यकों को अपने-अपने घरों को छोड़कर स्थानान्तरण के लिए मजबूर होना पड़ा। यह स्थानान्तरण त्रासदी भरा रहा। दूसरे, विभाजित भारत में अब भी 12% मुसलमान भारत में रह गये थे। इसके अतिरिक्त अन्य धर्मावलम्बी भी यहाँ रह रहे थे। इस समस्या का निपटारा भारतीय शासकों ने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाकर किया तथा संविधान में सभी नागरिकों को समान दर्जा देकर देश के एकीकरण का प्रथम चरण पूरा किया गया।

2. रजवाड़ों का विलय:
स्वतंत्रता के बाद रजवाड़ों का स्वतंत्र होना अपने आप में एक गहरी समस्या थी । इससे अखंड भारत के अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा था। लेकिन शांतिपूर्ण बातचीत के जरिये लगभग सभी रजवाड़े जिनकी सीमाएँ आजाद भारत की सीमाओं से मिलती थीं, 15 अगस्त, 1947 से पहले ही भारतीय संघ में शामिल हो गये। हैदराबाद, जूनागढ़, कश्मीर तथा मणिपुर की रियासतों का विलय सरदार पटेल की सूझबूझ, जनता के दबाव तथा भारतीय सेना के माध्यम से किया जा सका।

4. राज्यों का पुनर्गठन:
भारतीय प्रान्तों की आंतरिक सीमाओं को तय करने की चुनौती को हल करने हेतु 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया गया और 1956 में इसकी सिफारिशों के आधार पर 14 राज्य और 6 केन्द्र शासित प्रदेश बनाए गए। इससे देश में विभिन्नता के सिद्धान्त को स्वीकृति मिली और देश की एकता भी सुदृढ़ हुई।

प्रश्न 10.
राज्यों के पुनर्गठन के मसले ने देश में अलगाववाद की भावना को कैसे पनपाया? भाषाई आधार पर राज्य पुनर्गठन की सफलताओं का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
आजादी के बाद के शुरुआती सालों में एक बड़ी चिंता यह थी कि अलग राज्य बनाने की माँग से देश की एकता पर आँच आएगी। आशंका थी कि नए भाषाई राज्यों में अलगाववाद की भावना पनपेगी और नवनिर्मित भारतीय राष्ट्र पर दबाव बढ़ेगा। जनता के दबाव में आखिरकार केन्द्रीय नेतृत्व ने भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का मन बनाया।

आशंका यह थी कि अगर हर इलाके के क्षेत्रीय और भाषाई दावे को मान लिया गया तो बँटवारें और अलगाववाद के खतरे में कमी आएगी। इसके अलावा क्षेत्रीय माँगों को मानना और भाषा के आधार पर नए राज्यों का गठन करना ‘एक लोकतांत्रिक कदम के रूप में भी देखा गया। भाषावार राज्यों के पुनर्गठन की घटना को आज 50 साल से भी अधिक का समय व्यतीत हो चुका है। अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भाषाई राज्य तथा इन राज्यों के गठन के लिए चले आन्दोलनों ने लोकतांत्रिक राजनीति तथा नेतृत्व की प्रकृति को बुनियादी रूपों में बदला है।

राजनीति और सत्ता में हिस्सेदारी का रास्ता अब एक सीमित अंग्रेजी अभिजात वर्ग के लिए ही नहीं बल्कि बाकियों के लिए भी खुल चुका है। भाषावार पुनर्गठन से राज्यों के सीमांकन ‘के लिए एक समरूप आधार भी मिला । बहुतों की आशंका के विपरीत इससे देश नहीं टूटा। इसके विपरीत देश की एकता और ज्यादा मजबूत हुई। सबसे बड़ी बात यह कि भाषावार राज्यों के पुनर्गठन से विभिन्नता के सिद्धान्त को स्वीकृति मिली।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण

Jharkhand Board JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण

बहुचयनात्मक प्रश्न

1. भारत में नई आर्थिक नीति शुरू हुई।
(अ) 1990 में
(ब) 1991 में
(स) 1992 में
(द) 1993 में
उत्तर:
(ब) 1991 में

2. एक अवधारणा के रूप में वैश्वीकरण का प्रवाह है।
(अ) विश्व के एक हिस्से से विचारों का दूसरे हिस्सों में पहुँचना
(ब) पूँजी का एक से ज्यादा जगहों पर जाना
(स) वस्तुओं का कई-कई देशों में पहुँचना
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी

3. निम्न में से कौनसा वैश्वीकरण का कारण नहीं है।
(अ) किसी देश की पारंपरिक वेशभूषा
(ब) प्रौद्योगिकी
(स) विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव
(द) संचार के साधनों की तरक्की
उत्तर:
(अ) किसी देश की पारंपरिक वेशभूषा

4. वैश्वीकरण के फलस्वरूप राज्य की शक्ति में वृद्धि हुई है।
(अ) कानून-व्यवस्था के सम्बन्ध में
(ब) राष्ट्रीय सुरक्षा के सम्बन्ध में
(स) नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटाने के सम्बन्ध में
(द) आर्थिक कार्यों के सम्बन्ध में
उत्तर:
(स) नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटाने के सम्बन्ध में

5. वैश्वीकरण के कारण जिस सीमा तक वस्तुओं का प्रवाह बढ़ा है उस सीमा तक प्रवाह नहीं बढ़ा है।
(अ) पूँजी का
(ब) व्यापार का
(स) लोगों की आवाजाही का
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(स) लोगों की आवाजाही का

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6. आर्थिक वैश्वीकरण का दुष्परिणाम है।
(अ) व्यापार में वृद्धि
(ब) पूँजी के प्रवाह में वृद्धि
(स) जनमत के विभाजन में वृद्धि
(द) विचारों के प्रवाह में वृद्धि
उत्तर:
(स) जनमत के विभाजन में वृद्धि

7. भारत में नई आर्थिक नीति के संचालक हैं।
(अ) डॉ. मनमोहन सिंह
(ब) यशवन्त सिन्हा
(स) वी. पी. सिंह
(द) इन्दिरा गांधी
उत्तर:
(अ) डॉ. मनमोहन सिंह

8. टेलीग्राफ, टेलीफोन और माइक्रोचिप के नवीनतम आविष्कारों ने विश्व के विभिन्न भागों के बीच किसकी क्रांति कर दिखाई है?
(अ) विचार की
(ब) संचार की
(स) पूँजी की
(द) वस्तु की
उत्तर:
(ब) संचार की

9. वैश्वीकरण के किस प्रभाव ने पूरे विश्व के जनमत को गहराई से बाँट दिया है?
(अ) आर्थिक
(ब) सामाजिक
(स) राजनीतिक
(द) व्यावहारिक
उत्तर:
(अ) आर्थिक

10. वैश्वीकरण के किस प्रभाव को देखते हुए इस बात का भय है कि यह प्रक्रिया विश्व की संस्कृति को खतरा पहुँचाएगी?
(अ) राजनीतिक
(ब) आर्थिक
(स) सांस्थानिक
(द) सांस्कृतिक
उत्तर:
(द) सांस्कृतिक

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:

1…………………….. वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं के समर्थकों का तर्क है कि इससे समृद्धि बढ़ती है।
उत्तर:
आर्थिक

2. कुछ अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक वैश्वीकरण को विश्व का ……………………. कहा है।
उत्तर:
पुनः उपनिवेशीकरण

3. वैश्वीकरण एक ………………………….. धारणा है।
उत्तर:
बहुआयामी

4. वैश्वीकरण से हर संस्कृति अलग और विशिष्ट हो रही है, इस प्रक्रिया को ……………….. कहते हैं।
उत्तर:
सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण

5. औपनिवेशिक दौर में भारत आधारभूत वस्तुओं और कच्चे माल का ……………………….. तथा बने-बनाये सामानों का ………………… देश था।
उत्तर:
निर्यातक, आयातक

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वैश्वीकरण का बुनियादी अर्थ क्या है?
उत्तर:
वैश्वीकरण का बुनियादी अर्थ है – विचार, पूँजी, वस्तु और सेवाओं का विश्वव्यापी प्रवाह।

प्रश्न 2.
वर्ल्ड सोशल फोरम (W.S.F.) क्या है?
उत्तर:
वर्ल्ड सोशल फोरम वैश्वीकरण का विरोध करने वाले पर्यावरणविदों, मजदूरों, युवकों और महिला कार्यकर्ताओं का एक विश्वव्यापी मंच है।

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प्रश्न 3.
वैश्वीकरण की नीति में अभी भी सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन कौन-सा है?
उत्तर:
प्रौद्योगिकी।

प्रश्न 4.
‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ की पहली बैठक कब और कहाँ हुई?
उत्तर:
वर्ल्ड सोशल फोरम की पहली बैठक 2001 में ब्राजील में हुई।

प्रश्न 5.
वर्ल्ड सोशल फोरम की चौथी बैठक कब और कहाँ हुई?
उत्तर:
वर्ल्ड सोशल फोरम की चौथी बैठक 2004 में मुम्बई में हुई।

प्रश्न 6.
जनार्दन काल सेंटर में काम करते हुए हजारों किलोमीटर दूर बसे अपने ग्राहकों से बात करता है, यह वैश्वीकरण का कौनसा पक्ष है?
उत्तर:
इसमें जनार्दन सेवाओं के वैश्वीकरण में हिस्सेदारी कर रहा है।

प्रश्न 7.
कोमिन्टर्न का सम्बन्ध किस एशियाई देश से था?
उत्तर:
कोमिन्टर्न का सम्बन्ध साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद के शिकार हुए चीन से था।

प्रश्न 8.
वैश्वीकरण के विभिन्न प्रवाहों की निरंतरता से क्या पैदा हुआ है?
उत्तर:
वैश्वीकरण के विभिन्न प्रवाहों की निरन्तरता से ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव पैदा हुआ है।

प्रश्न 9.
राष्ट्रवाद की आधारशिला किस प्रौद्योगिकी ने रखी?
उत्तर:
छपाई (मुद्रण) की तकनीक ने।

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प्रश्न 10.
किन आविष्कारों ने विश्व के विभिन्न भागों के बीच संचार क्रांति कर दिखाई है?
उत्तर:
टेलीग्राफ, टेलीफोन और माइक्रोचिप के नवीनतम आविष्कारों ने।

प्रश्न 11.
विचार, पूँजी, वस्तु और लोगों की विश्व के विभिन्न भागों में आवाजाही की आसानी किसके कारण संभव हुई है?
उत्तर:
प्रौद्योगिकी में हुई तरक्की के कारण।

प्रश्न 12.
कोई ऐसी दो घटनाओं के नाम लिखिये जो राष्ट्रीय सीमाओं का जोर नहीं मानतीं।
उत्तर:

  1. बर्ड फ्लू
  2. सुनामी किसी एक राष्ट्र की हदों में सिमटे नहीं रहते।

प्रश्न 13.
वैश्वीकरण की प्रक्रिया में विश्व में कल्याणकारी राज्य की धारणा की जगह किस धारणा ने ले ली है?
उत्तर:
न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य की धारणा ने।

प्रश्न 14.
वैश्वीकरण की प्रक्रिया के तहत राज्य अब किन कामों तक ही अपने को सीमित रखता है?
उत्तर:
राज्य अब कानून और व्यवस्था को बनाए रखने तथा अपने नागरिकों की सुरक्षा करने तक ही अपने को. सीमित रखता है।

प्रश्न 15.
भूमंडलीकरण का क्या अर्थ है?
उत्तर:
यातायात और संचार के साधनों ने दुनिया के देशों को एक-दूसरे से जोड़कर विश्व ग्राम में बदल दिया है। इसी को भूमंडलीकरण कहते हैं।

प्रश्न 16.
वैश्वीकरण के दौर में अब आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रमुख निर्धारक कौन है?
उत्तर:
वैश्वीकरण के दौर में अब बाजार आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रमुख निर्धारक है।

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प्रश्न 17.
वैश्वीकरण के जिम्मेदार कोई दो कारण बताइये।
उत्तर:
वैश्वीकरण के जिम्मेदार दो कारण ये हैं।

  1. प्रौद्योगिकी में तरक्की
  2. विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव।

प्रश्न 18.
वैश्वीकरण के कारण किस क्षेत्र में राज्य की शक्ति में वृद्धि हुई है?
उत्तर:
अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के बूते अब राज्य अपने नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकते हैं

प्रश्न 19.
वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभावों को देखते हुए किस भय को बल मिला है?
उत्तर:
वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभावों को देखते हुए इस भय को बल मिला है कि यह प्रक्रिया विश्व की संस्कृतियों को खतरा पहुँचायेगी ।

प्रश्न 20.
विश्व – संस्कृति के नाम पर क्या हो रहा है?
उत्तर:
विश्व – संस्कृति के नाम पर शेष विश्व पर पश्चिमी संस्कृति लादी जा रही है।

प्रश्न 21.
वैश्वीकरण का एक सकारात्मक प्रभाव लिखिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण का एक सकारात्मक प्रभाव यह है कि इससे हमारी पसंद-नापसंद का दायरा बढ़ता है।

प्रश्न 22.
औपनिवेशिक दौर में भारत किस प्रकार का देश था?
उत्तर:
पनिवेशिक दौर में भारत आधारभूत वस्तुओं और कच्चे माल का निर्यातक तथा बने-बनाए सामानों का आयातक देश था।

प्रश्न 23.
स्वतंत्रता के बाद भारत ने आर्थिक दृष्टि से कौनसी नीति अपनाई?
उत्तर:
स्वतंत्रता के बाद भारत ने संरक्षणवाद की नीति अपनाई।

प्रश्न 24.
संरक्षणवाद की नीति क्या है?
उत्तर;
संरक्षणवाद की नीति वैश्वीकरण का विरोध करती है तथा देशी उद्योगों एवं वस्तुओं को प्रतिस्पर्द्धा से बचाने हेतु चुंगी तथा तटकर का पक्ष लेती है।

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प्रश्न 25.
मैक्डोनाल्डीकरण से क्या आशय है?
उत्तर:
मैक्डोनाल्डीकरण का तात्पर्य है कि संसार की विभिन्न संस्कृतियाँ अब अपने आप को प्रभुत्वशाली अमेरिकी ढर्रे पर ढालने लगी हैं।

प्रश्न 26.
साम्राज्यवाद से क्या आशय है?
उत्तर:
जब कोई देश अपनी सीमा से बाहर के क्षेत्र के लोगों के आर्थिक तथा राजनीतिक जीवन पर अपना आधिपत्य स्थापित कर ले, उसे साम्राज्यवाद कहते हैं।

प्रश्न 27.
‘संरक्षणवाद’ की नीति से भारत को क्या दिक्कतें पैदा हुईं।
उत्तर:
संरक्षणवाद की नीति के कारण प्रथमतः भारत स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास के क्षेत्र में ध्यान नहीं दे पाया। दूसरे, भारत की आर्थिक वृद्धि दर धीमी रही।

प्रश्न 28.
1991 में भारत ने आर्थिक सुधारों की योजना क्यों शुरू की?
उत्तर:

  1. वित्तीय संकट से उबरने तथा
  2. आर्थिक वृद्धि की ऊँची दर हासिल करने के लिए 1991 में भारत आर्थिक सुधारों की योजना शुरू की।

प्रश्न 29.
आर्थिक सुधारों की योजना की दो विशेषताएँ लिखिये।
उत्तर:

  1. इसके अन्तर्गत विभिन्न क्षेत्रों पर से आयात प्रतिबंध हटाये गए।
  2. व्यापार और विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया गया।

प्रश्न 30.
वामपंथी आलोचक वैश्वीकरण के विरोध में क्या तर्क देते हैं?
उत्तर:
वामपंथी आलोचकों का कहना है कि वैश्वीकरण विश्वव्यापी पूँजीवाद की एक खास अवस्था है जो धनी और निर्धनों के बीच की खाई को और बढ़ायेगा।

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प्रश्न 31.
दक्षिणपंथी आलोचक वैश्वीकरण के विरोध में क्या तर्क देते हैं?
उत्तर:
दक्षिणपंथी आलोचकों का कहना है कि इससे राज्य कमजोर हो रहा है; परम्परागत संस्कृति की हानि होगी।

प्रश्न 32. वैश्वीकरण के विरोधी आंदोलनों का स्वरूप क्या है?
उत्तर:
वैश्वीकरण विरोधी बहुत से आंदोलन वैश्वीकरण के विरोधी नहीं बल्कि वैश्वीकरण के साम्राज्यवादी समर्थक कार्यक्रम के विरोधी हैंहोगी ।

प्रश्न 33.
1999 में सिएटल में विश्व व्यापार संगठन की मंत्री स्तरीय बैठक में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन क्यों हुए?
उत्तर:
ये विरोध-प्रदर्शन आर्थिक रूप से ताकतवर देशों द्वारा व्यापार के अनुचित तौर-तरीकों के अपनाने के विरोधमें हुए।

प्रश्न 34.
सिएटल (1999) के विरोध प्रदर्शनकारियों का क्या तर्क था?
उत्तर:
सिएटल (1999) के विरोध प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि उदीयमान वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में विकासशील देशों के हितों को समुचित महत्त्व नहीं दिया गया है।

प्रश्न 35.
नव-उदारवादी वैश्वीकरण के विरोध का एक विश्वव्यापी मंच कौनसा है?
उत्तर:
नव-उदारवादी वैश्वीकरण के विरोध का एक विश्वव्यापी मंच ‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ (WSF) है।

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प्रश्न 36.
वर्ल्ड सोशल फोरम’ में कौन लोग सम्मिलित हैं?
उत्तर:
‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ में मानवाधिकार कार्यकर्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर, युवा और महिला कार्यकर्ता एकजुट -उदारवादी वैश्वीकरण का विरोध करते हैं।

प्रश्न 37.
भारत में वैश्वीकरण का विरोध करने वाले किन्हीं दो क्षेत्रों का नाम बताइये।
उत्तर:

  1. वामपंथी राजनैतिक दल
  2. इन्डियन सोशल फोरम
  3. औद्योगिक श्रमिक और किसान संगठन।

प्रश्न 38.
भारत में दक्षिणपंथी खेमों से वैश्वीकरण का विरोध किस संदर्भ में किया जा रहा है?
उत्तर:
भारत में दक्षिणपंथी खेमा वैश्वीकरण के विभिन्न सांस्कृतिक प्रभावों का विरोध कर रहा है।

प्रश्न 39.
बहुराष्ट्रीय निगम से क्या आशय है?
उत्तर:
बहुराष्ट्रीय निगम वह कम्पनी है जो एक से अधिक देशों में अपनी आर्थिक व व्यापारिक गतिविधियाँ चलाती है।

प्रश्न 40.
सांस्कृतिक समरूपता से क्या आशय है?
उत्तर:
सांस्कृतिक समरूपता का आशय हैथोपना। विश्व संस्कृति के नाम पर पश्चिमी संस्कृति को विकासशील देशों में थोपना।

प्रश्न 41.
सामाजिक सुरक्षा कवच से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को वैश्वीकरण के प्रभाव से बचाने का सांस्थानिक उपाय को सामाजिक सुरक्षा कवच कहा गया है।

प्रश्न 42.
बहुराष्ट्रीय निगम से आप क्या समझते हो?
उत्तर:
वह कंपनियाँ जो एक से अधिक दिशाओं में आर्थिक गतिविधियाँ चलाती हैं।

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प्रश्न 43.
क्या साम्राज्यवाद ही वैश्वीकरण है?
उत्तर:
नहीं, साम्राज्यवाद में एक देश अपनी सीमा के बाहर के देश पर आर्थिक और राजनीतिक कब्जा करता है जबकि वैश्वीकरण में इस प्रकार का हस्तक्षेप नहीं होता है।

प्रश्न 44.
कल और आज के वैश्वीकरण में आप क्या अंतर देखते हैं?
उत्तर:
पहले दो देशों के बीच वस्तु तथा कच्चे माल का आवागमन होता था और आज के युग में व्यक्ति, विचार, पूँजी, तकनीक तथा कच्चे माल का आवागमन होता है। वस्तु,

प्रश्न 45.
दो महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं के नाम बताइए।
उत्तर:

  1. अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष
  2. विश्व व्यापार संगठन।

प्रश्न 46.
वैश्वीकरण के लिए अपरिहार्य कारक क्या है?
उत्तर:
प्रौद्योगिकी

प्रश्न 47.
भारत वैश्वीकरण को किन तरीकों से प्रभावित कर रहा है? कोई दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  1. भारत विदेशी भूमि पर भारतीय संस्कृति तथा रीति-रिवाजों को बढ़ावा दे रहा है।
  2. भारत में उपलब्ध सस्ते श्रम ने विश्व को अपनी ओर आकर्षित किया है।

प्रश्न 48.
आर्थिक वैश्वीकरण का सरकारों पर क्या प्रभाव पड़ा है?
उत्तर:
आर्थिक वैश्वीकरण के कारण सरकारें कुछ जिम्मेदारियों से अपना हाथ पीछे कर रही हैं।

प्रश्न 49.
वैश्वीकरण के मध्यमार्गी समर्थकों का वैश्वीकरण के संदर्भ में क्या कहना है?
उत्तर:
वैश्वीकरण के मध्यमार्गी समर्थकों का कहना है कि वैश्वीकरण ने चुनौतियाँ पेश की हैं और लोगों को इसका सामना सजग और सचेत रूप में करना चाहिए।

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प्रश्न 50.
सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप हर संस्कृति अलग और विशिष्ट होती जा रही है। इस प्रक्रिया को सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण कहते हैं।

लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ क्या है?
उत्तर:
वर्ल्ड सोशल फोरम (WSF) – नव-उदारवादी वैश्वीकरण के विरोध का एक विश्वव्यापी मंच ‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ है। इस मंच के तहत मानवाधिकार कार्यकर्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर, युवा और महिला कार्यकर्ता एकजुट होकर नव-उदारवादी वैश्वीकरण का विरोध करते हैं।

प्रश्न 2.
वैश्वीकरण के विरोध में वामपंथी क्या तर्क देते हैं?
उत्तर:
वैश्वीकरण के विरोध में वामपंथी आलोचकों का तर्क है कि मौजूदा वैश्वीकरण विश्वव्यापी पूँजीवाद की एक खास अवस्था है जो धनिकों को और ज्यादा धनी ( तथा इनकी संख्या में कमी) और गरीब को और ज्यादा गरीब बनाती है।

प्रश्न 3.
दक्षिणपंथी आलोचक वैश्वीकरण के विरोध में क्या तर्क देते हैं?
उत्तर:
वैश्वीकरण के दक्षिणपंथी आलोचकों को

  1. राजनीतिक अर्थों में राज्य के कमजोर होने की चिंता है।
  2. आर्थिक क्षेत्र में वे चाहते हैं कि कम से कम कुछ क्षेत्रों में आर्थिक आत्मनिर्भरता और संरक्षणवाद का दौर फिर कायम हो और
  3. सांस्कृतिक संदर्भ में इनकी चिंता है कि इससे परंपरागत संस्कृति की हानि होग ।

प्रश्न 4.
सांस्कृतिक विभिन्नीकरण को परिभाषित कीजिए।
अथवा
सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण की प्रक्रिया से क्या आशय है?
उत्तर:
सांस्कृतिक विभिन्नीकरण:
वैश्वीकरण से हर संस्कृति कहीं ज्यादा अलग और विशिष्ट होती जा रही है। इस प्रक्रिया को सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण कहते हैं। इसका आशय यह है कि सांस्कृतिक मेलजोल का प्रभाव एकतरफा नहीं होता है, बल्कि दुतरफा होता है।

प्रश्न 5.
विश्व सामाजिक मंच एक मुक्त आकाश का द्योतक है। स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण में विश्व सामाजिक मंच एक मुक्त आकाश के समान होगा। जिस प्रकार मुक्त आकाश सम्पूर्ण पक्षियों के लिए खुला होता है, ठीक उसी प्रकार विश्व को एक सामाजिक मंच मान लिया जाये तो सभी जगह उदारीकरण की अर्थव्यवस्था आ जायेगी जो सभी के लिए खुली होगी।

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प्रश्न 6.
उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये कि वैश्वीकरण में परम्परागत सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़े बिना संस्कृति का परिष्कार होता है।
उत्तर:
बाहरी संस्कृति के प्रभावों से कभी-कभी परम्परागत सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़े बिना संस्कृति का परिष्कार होता है। उदाहरण के लिए, नीली जीन्स भी हथकरघा पर बुने खादी के कुर्ते के साथ खूब चलती है। जीन्स के ऊपर कुर्ता पहने अमरीकियों को देखना अब संभव है।

प्रश्न 7.
स्पष्ट कीजिये कि कभी-कभी बाहरी प्रभावों से हमारी पसंद-नापसंद का दायरा बढ़ता है।
उत्तर:
कभी-कभी बाहरी प्रभावों से हमारी पसंद-नापसंद का दायरा बढ़ता है। उदाहरण के लिए बर्गर, मसाला- डोसा का विकल्प नहीं है, इसलिए बर्गर से मसाला डोसा को कोई खतरा नहीं है। इससे इतना मात्र हुआ है कि हमारे भोजन की पसंद में एक और चीज शामिल हो गयी ह ।

प्रश्न 8.
वैश्वीकरण की प्रक्रिया में लोगों की आवाजाही वस्तुओं और पूँजी के प्रवाह के समान क्यों नहीं बढ़ी है?
उत्तर:
वैश्वीकरण की प्रक्रिया में लोगों की आवाजाही वस्तुओं और पूँजी के प्रवाह के समान नहीं बढ़ी है। क्योंकि विकसित देश अपनी वीजा नीति के जरिये अपनी राष्ट्रीय सीमाओं को अभेद्य बनाए रखते हैं ताकि दूसरे देशों के नागरिक आकर कहीं उनके नागरिकों के नौकरी-धंधे न हथिया लें।

प्रश्न 9.
वैश्वीकरण की चार विशेषताएँ लिखिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण की चार विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. वैश्वीकरण के कारण वित्तीय क्रियाकलापों में तेजी आती है।
  2. वैश्वीकरण में अन्तर्राष्ट्रीय बाजार का प्रादुर्भाव होता है।
  3. वैश्वीकरण में बहुराष्ट्रीय निगमों का अधिक विकास होता है।
  4. वैश्वीकरण में भौगोलिक और राजनैतिक गतिरोध कम हो जाता है।

प्रश्न 10.
जनार्दन के एक काल सेंटर में काम करने तथा विदेशी ग्राहकों को सेवा प्रदान करने, रामधारी का अपनी बेटी के लिए चीनी – साइकिल खरीदने तथा सारिका के नौकरी करने में वैश्वीकरण के कौन-कौनसे पहलू दिखते हैं?
उत्तर:
उक्त तीनों उदाहरणों में वैश्वीकरण का कोई न कोई पहलू दिखता है। यथा।

  1. जनार्दन सेवाओं में वैश्वीकरण में हिस्सेदारी कर रहा है.
  2. रामधारी जन्मदिन के लिए चीनी – साइकिल के रूप में जो उपहार खरीद रहा है उससे हमें विश्व के एक भाग से दूसरे भाग में वस्तुओं की आवाजाही का पता लगता है।
  3. सारिका के सामने जीवन-मूल्यों के बीच दुविधा की स्थिति है। यह दुविधा अन्ततः उन अवसरों के कारण पैदा हुई है जो उसके परिवार की महिलाओं कों पहले उपलब्ध नहीं थे, लेकिन आज वे एक सच्चाई हैं और जिन्हें व्यापक स्वीकृति मिल रही है।

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प्रश्न 11.
वैश्वीकरण की अवधारणा से आप क्या समझते हैं? व्याख्या कीजि।
अथवा
वैश्वीकरण की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण की अवधारणा – एक अवधारणा के रूप में वैश्वीकरण की बुनियादी बात है। प्रवाह प्रवाह कई तरह के हो सकते हैं, जैसे- विचार – प्रवाह, पूँजी – प्रवाह, वस्तु – प्रवाह, व्यापार – प्रवाह, आवाजाही का प्रवाह आदि। विश्व के एक हिस्से के विचारों का दूसरे हिस्सों में पहुँचना विचार प्रवाह है। पूँजी का एक से ज्यादा देशों में जाना पूँजी प्रवाह है; वस्तुओं का कई देशों में पहुँचना वस्तु प्रवाह है और उनका व्यापार तथा बेहतर आजीविका की तलाश में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लोगों की आवाजाही क्रमशः व्यापार प्रवाह तथा लोगों की आवाजाही का प्रवाह है। इन सब प्रवाहों की निरन्तरता से ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव पैदा हुआ है और फिर यह जुड़ाव निरन्तर बना रहता है। इस सबका मिला-जुला रूप ही वैश्वीकरण की अवधारणा है।

प्रश्न 12.
वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधारणा है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधारणा है। वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधारणा है क्योंकि इसके राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव हैं। यथा।

  1. आर्थिक आयाम: वैश्वीकरण के कारण व्यापार में खुलापन आता है, व्यापार में वृद्धि होती है, पूँजी निवेश बढ़ता है, वस्तुओं तथा सेवाओं की आवाजाही एक देश से दूसरे देश में बढ़ती है।
  2. राजनैतिक आयाम: वैश्वीकरण के कारण दुनिया में लोककल्याणकारी राज्य की धारणा अब पुरानी पड़ गई है और इसकी जगह न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य की धारणा ने ले ली है।
  3. सांस्कृतिक आयाम: वैश्वीकरण से हमारी पसंद-नापसंद का निर्धारण होता है। हम जो कुछ खाते-पीते- पहनते हैं अथवा सोचते हैं। सब पर इसका असर नजर आता है। अतः स्पष्ट है कि वैश्वीकरण एक बहुआयामी धारणा है।

प्रश्न 13.
आपकी राय में वैश्वीकरण के क्या कारण हैं? किन्हीं चार की विवेचना कीजिये।
अथवा
वैश्वीकरण के चार कारणों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
वैश्वीकरण के कारकों की व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
हमारी राय में वैश्वीकरण के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैंअथवा

  1. प्रौद्योगिकी और वैश्वीकरण: विचार, पूंजी, वस्तु और लोगों की विश्व के विभिन्न भागों में आवाजाही की आसानी प्रौद्योगिकी में हुई तरक्की के कारण संभव हुई है। इसी प्रकार हमारे सोचने के तरीके पर भी प्रौद्योगिकी का प्रभाव पड़ा है।
  2. विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव: विश्व के विभिन्न भागों के लोग अब इस बात को लेकर सजग हैं कि विश्व के एक भाग में घटने वाली घटना का प्रभाव विश्व के दूसरे भाग में भी पड़ेगा। इससे वैश्वीकरण को बढ़ावा मिला।
  3. आर्थिक प्रवाह में तीव्रता: न्यूनतम हस्तक्षेप की राज्य की अवधारणा, पूँजीवादी व्यवस्था के वर्चस्व तथा बहुराष्ट्रीय निगमों की बढ़ती भूमिका ने वैश्वीकरण को बढ़ावा दिया है।
  4. साम्यवादी गुट का पतन: साम्यवादी गुट के पतन के बाद पूँजीवाद का वर्चस्व स्थापित हुआ जिसने वैश्वीकरण को गति दी।

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प्रश्न 14.
वैश्वीकरण ने विश्व की राज व्यवस्थाओं को प्रभावित किया है।
अथवा
आपके मतानुसार कोई चार प्रभावों की विवेचना कीजिए। वैश्वीकरण के राजनीतिक प्रभाव क्या हैं?
अथवा
वैश्वीकरण के राजनीतिक प्रभावों को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण के राजनीतिक प्रभाव: वैश्वीकरण के राजनीतिक प्रभावों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया गया, राज्य की क्षमता में कमी- वैश्वीकरण के कारण राज्य की क्षमता यानी सरकारों को जो करना है, उसे करने की ताकत में कमी आती है। यथा

(अ) पूरी दुनिया ने वैश्वीकरण के दौर में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को त्याग कर न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य की अवधारणा को अपना लिया है।

(ब) वैश्वीकरण के चलते राज्य अब आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का ही निर्धारण करता है।

(स) बहुराष्ट्रीय निगमों की भूमिका बढ़ी है। इससे सरकारों के अपने दम पर फैसला करने की क्षमता में कमी आयी है। राज्य की ताकत में वृद्धि – कुछ मायनों में वैश्वीकरण के फलस्वरूप राज्य की ताकत में वृद्धि हुई है।

(द) अब राज्यों के हाथ में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी मौजूद है जिसके बूते राज्य अपने नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकते हैं।

प्रश्न 15.
आर्थिक वैश्वीकरण की प्रक्रिया से क्या आशय है?
उत्तर:
र्थिक वैश्वीकरण की प्रक्रिया – आर्थिक वैश्वीकरण की प्रक्रिया से आशय है। विश्व में वस्तुओं, पूँजी, श्रम तथा विचारों के प्रवाह का व्यापक होना।

  1. वैश्वीकरण के चलते पूरी दुनिया में वस्तुओं के व्यापार का इजाफा हुआ है क्योंकि आयात प्रतिबंधों को कम किया गया है।
  2. वैश्वीकरण के चलते दुनियाभर में पूँजी की आवाजाही पर अब अपेक्षाकृत कम प्रतिबंध हैं इसलिए विदेशी निवेश बढ़ रहा है।
  3. वैश्वीकरण के चलते अब विचारों के सामने राष्ट्र की सीमाओं की बाधा नहीं रही, उनका प्रवाह अबाध हो उठा है। इंटरनेट और कंप्यूटर से जुड़ी सेवाओं का विस्तार इसका एक उदाहरण है।
  4. वैश्वीकरण के चलते एक देश से दूसरे देश में लोगों की आवाजाही भी बढ़ी है। एक देश के लोग अब दूसरे देश में जाकर नौकरी कर रहे हैं।

प्रश्न 16.
आर्थिक वैश्वीकरण के विरोध में तर्क दीजिये।
उत्तर:
आर्थिक वैश्वीकरण के विरोध में तर्क-आर्थिक वैश्वीकरण के विरोध में निम्न प्रमुख तर्क दिये जाते हैं।

  1. जनमत का विभाजन: आर्थिक वैश्वीकरण के कारण पूरे विश्व में जनमत बड़ी गहराई से बंट गया है।
  2. सरकारों द्वारा सामाजिक न्याय की उपेक्षा- आर्थिक वैश्वीकरण के कारण सरकारें कुछ जिम्मेदारियों से अपना हाथ खींच रही हैं और इससे सामाजिक न्याय से सरोकार रखने वाले लोग चिंतित हैं क्योंकि इससे नौकरी और जनकल्याण के लिए सरकार पर आश्रित रहने वाले लोग बदहाल हो जायेंगे।
  3. विश्व का पुनः उपनिवेशीकरण: आर्थिक वैश्वीकरण विश्व का पुनः उपनिवेशीकरण है।
  4. गरीब देशों के लिए अहितकर: वैश्वीकरण से गरीब देशों के गरीब लोग आर्थिक रूप से बर्बादी की कगार पर पहुँच जाएंगे।

प्रश्न 17.
आर्थिक वैश्वीकरण के समर्थन में तीन तर्क दीजिये।
उत्तर:
आर्थिक वैश्वीकरण के समर्थन में तर्क-आर्थिक वैश्वीकरण के समर्थन में अग्रलिखित तर्क दिये जाते संजीव पास बुक्स

  1. समृद्धि का बढ़ना: आर्थिक वैश्वीकरण से समृद्धि बढ़ती है और खुलेपन के कारण ज्यादा से ज्यादा जनसंख्या की खुशहाली बढ़ती है।
  2. व्यापार में वृद्धि: आर्थिक वैश्वीकरण से व्यापार में वृद्धि होती है। इससे पूरी दुनिया को फायदा होता है।
  3. पारस्परिक जुड़ाव का बढ़ना: आर्थिक वैश्वीकरण से लोगों में पारस्परिक जुड़ाव बढ़ रहा है। पारस्परिक निर्भरता की रफ्तार अब तेज हो चली है। वैश्वीकरण के फलस्वरूप विश्व के विभिन्न भागों में सरकार, व्यवसाय तथा लोगों के बीच जुड़ाव बढ़ रहा है।

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प्रश्न 18.
वैश्वीकरण की प्रक्रिया किस रूप में विश्व की संस्कृतियों को खतरा पहुँचायेगी?
उत्तर:
वैश्वीकरण सांस्कृतिक समरूपता लेकर आता है। सांस्कृतिक समरूपता में विश्व संस्कृति के नाम पर शेष विश्व पर पश्चिमी संस्कृति को लादा जा रहा है। राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभुत्वशाली संस्कृति कम ताकतवर समाजों पर अपनी छाप छोड़ती है और संसार वैसा ही दीखता है जैसा ताकतवर संस्कृति इसे बनाना चाहती है। यही कारण है कि बर्गर या नीली जीन्स की लोकप्रियता का नजदीकी रिश्ता अमरीकी जीवनशैली के गहरे प्रभाव से है। विभिन्न संस्कृतियाँ वैश्वीकरण की सांस्कृतिक समरूपता के तहत अब अपने को प्रभुत्वशाली अमरीकी ढर्रे पर ढालने लगी हैं। इससे पूरे विश्व की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर धीरे – धीरे खत्म हो रही है और यह समूची मानवता के लिए भी खतरनाक है।

प्रश्न 19.
आपके अनुसार क्या भविष्य में वैश्वीकरण जारी रहेगा? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हाँ, वैश्वीकरण भविष्य में भी जारी रहेगा। इसके निम्न कारक हैं।

  1. प्रत्येक व्यक्ति तथा देश एक दूसरे पर निर्भर है।
  2. कोई भी व्यक्ति स्वयं अपनी आवश्यकता को पूरी नहीं कर सकता है।
  3. क्षेत्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का निर्माण और आपसी निर्भरता के कारण।
  4. भविष्य में विश्व सहयोग बढेगा तथा विकसित देश दूसरे देशों के शोषण के बजाय सहयोग करेंगे।

प्रश्न 20.
वैश्वीकरण की दिशा में भारत द्वारा उठाये गये किन्हीं चार कदमों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
भारत के वैश्वीकरण की दिशा में बढ़ते कदम: भारत ने वैश्वीकरण की दिशा में निम्नलिखित प्रमुख कदम उठाये हैं।

  1. उद्योग नीति में सुधार: सन् 1991 से भारत सरकार ने नई औद्योगिक नीति के अन्तर्गत कुछ उद्योगों को छोड़कर सभी उद्योगों को लाइसेंस मुक्त कर दिया है।
  2. विदेशी निवेश को बढ़ावा: भारत में विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के अवसरों का पता लगाने के प्रयास तेज करने पर बल दिया गया है। उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों में 51 प्रतिशत तक विदेशी पूँजी निवेश को तथा अनिवासी भारतीयों द्वारा भारत में निवेश करने को प्रोत्साहन दिया जाएगा।
  3. विदेशी प्रौद्योगिकी समझौते: भारत सरकार ने औद्योगिक विकास और प्रतिस्पर्धा की दृष्टि से विदेशों से प्रौद्योगिकी समझौते करने पर विशेष बल दिया है।
  4. विनिमय दर: 1992-93 से भारतीय रुपये को विदेशी मुद्रा में पूर्ण परिवर्तनीय बना दिया गया है।

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प्रश्न 21.
वैश्वीकरण के प्रतिरोध के प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए।
अथवा
वैश्वीकरण का प्रतिरोध क्यों हो रहा है? प्रमुख कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वैश्वीकरण का प्रतिरोध निम्न कारणों से हो रहा है।

  1. वैश्वीकरण विश्वव्यापी पूँजीवाद की खास अवस्था है जो धनिकों को और ज्यादा धनी और गरीबों को और ज्यादा गरीब बनाती है।
  2. राजनीतिक अर्थ में वैश्वीकरण में राज्य के कमजोर होने की चिंता है। इससे गरीबों के हितों की रक्षा करने की राज्य की क्षमता में कमी आती है।
  3. सांस्कृतिक स्तर पर परम्परागत संस्कृति की हानि हो रही है। लोग अपने सदियों पुराने जीवन-मूल्य तथा तौर-तरीकों से हाथ धो बैठेंगे।
  4. यह साम्राज्यवाद का नया रूप है। इसके चलते विकासशील देशों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की एकाधिकारवादी प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
  5. वैश्वीकरण की प्रक्रिया का लाभ अधिकांश जनता तक नहीं पहुँचता है। इससे तृतीय विश्व के देशों में गरीबी व आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है।

प्रश्न 22.
वैश्वीकरण के कारण विकासशील देशों में राज्यों की बदलती भूमिका का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण के कारण विकासशील देशों में राज्यों की भूमिका में परिवर्तन आया है। यथा।

  1. वैश्वीकरण के कारण राज्यों की आत्मनिर्भरता की नीतियाँ समाप्त होती जा रही हैं; क्योंकि वर्तमान वैश्वीकरण के युग में कोई भी विकासशील देश आत्मनिर्भर नहीं हो सकता।
  2. वैश्वीकरण के युग में पूँजी निवेश के कारण विकासशील देशों ने भी अपने बाजार विश्व के लिए खोल दिये हैं।
  3. वैश्वीकरण के कारण अंब प्रत्येक देश आर्थिक नीति को बनाते समय विश्व में होने वाले आर्थिक घटनाक्रम तथा विश्व संगठनों जैसे विश्व बैंक व विश्व व्यापार संगठन के प्रभाव में रहता है।
  4. राज्यों द्वारा बनाई जाने वाली निजीकरण की नीतियाँ, कर्मचारियों की छंटनी, सरकारी अनुदानों में कमी तथा कृषि से संबंधित नीतियों पर वैश्वीकरण का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है।

प्रश्न 23.
भारतीय राजनीति का दक्षिणपंथी खेमा वैश्वीकरण का विरोध क्यों कर रहा है?
उत्तर:
भारतीय राजनीति का दक्षिणपंथी खेमा वैश्वीकरण का विरोध कर रहा है क्योंकि इस खेमे के अनुसार केबल नेटवर्क के जरिए उपलब्ध कराए जा रहे विदेशी टी.वी. चैनलों के कारण स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राएँ वैलेन्टाइन डे मना रहे हैं तथा पश्चिमी पोशाकों की तरफ उनकी अभिरूची बढ़ रही है।

प्रश्न 24.
1999 में सिएटल में विश्व व्यापार संगठन की मंत्री स्तरीय बैठक में क्या घटनाएँ हुई थीं?
उत्तर:
1999 में सिएटल में विश्व व्यापार संगठन की मंत्री – स्तरीय बैठक में वैश्वीकरण के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ। ये विरोध आर्थिक रूप से ताकतवर देशों द्वारा व्यापार के अनुचित तौर-तरीकों के अपनाने के विरोध में ये प्रदर्शन हुए थे। विरोधियों के अनुसार उदीयमान वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में विकासशील देशों के हितों को समुचित महत्त्व नहीं दिया गया था।

प्रश्न 25.
आजादी हासिल करने के बाद भारत ने क्या फैसला किया? इन फैसलों की वजह से कौनसी दिक्कतें पैदा हुई?
उत्तर:
औपनिवेशिक दौर में ब्रिटेन के साम्राज्यवादी नीति के परिणामस्वरूप भारत आधारभूत वस्तुओं और कच्चे माल का निर्यातक देश था तथा बने बनाए सामानों का आयातक देश था। आजादी हासिल करने के बाद ब्रिटेन के साथ अपने अनुभवों से सबक लेते हुए भारत ने फैसला किया कि दूसरे पर निर्भर रहने के बजाय खुद सामान बनाया जाए तथा दूसरे देशों को निर्यात की अनुमति नहीं होगी ताकि हमारे अपने उत्पादक चीजों का बनाना सीख सकें। इस ‘संरक्षणवाद’ से कुछ नयी दिक्कतें पैदा हुईं। कुछ क्षेत्रों में तरक्की हुई तो कुछ जरूरी क्षेत्रों जैसे स्वास्थ्य, आवास और प्राथमिक शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया गया जितने के वे हकदार थे। भारत में आर्थिक वृद्धि की दर धीमी रही।

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प्रश्न 26.
क्या हम कह सकते हैं कि वैश्वीकरण केवल एक आर्थिक आयाम है?
उत्तर:
नहीं, वैश्वीकरण केवल एक आर्थिक आयाम नहीं है बल्कि यह राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों वाली बहुआयामी अवधारणा है। वैश्वीकरण विचारों, पूँजी, वस्तुओं और लोगों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया है।

प्रश्न 27.
” वैश्वीकरण एक बहुआयामी धारणा है।” कथन के पक्ष में अपना तर्क दीजिए।
उत्तर:
वैश्वीकरण का अर्थ अन्य देशों के साथ अन्योन्याश्रितता के आधार पर अर्थव्यवस्था के एकीकरण से है। यह राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति वाली अवधारणा है तथा इसमें विचारों, पूँजीगत वस्तुओं और लोगों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया होती है।

प्रश्न 28.
एक उग्रवादी समूह ने एक बयान जारी किया जिसमें कॉलेज की छात्राओं को पश्चिमी कपड़े पहने की धमकी दी गई थी। इस कथन का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
यह कथन वैश्वीकरण की सांस्कृतिक निहितार्थों को दर्शाता है, जो कि समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के सिकुड़ने का नेतृत्व करने के लिए पश्चिमी संस्कृति को थोपने के बारे में एक रक्षा समूह के डर के रूप में है।

प्रश्न 29.
भारत पर वैश्वीकरण के प्रभावों के विषय में दो भिन्न विचारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत पर वैश्वीकरण के प्रभावों पर दो विचार निम्न है।

  1. वैश्वीकरण अपनाने से भारत की आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।
  2. वैश्वीकरण के बारे में इसके आलोचकों का विचार है कि भारत द्वारा वैश्वीकरण की योजनाएँ लागू करने से देश के श्रम बाजार पर बुरा प्रभाव पड़ेगा और बेरोजगारी बढ़ेगी।

प्रश्न 30.
यह कहना कहाँ तक सही है कि वैश्वीकरण राज्य की सम्प्रभुता का हनन करता है। उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ऊपर दिया गया कथन सही है क्योंकि वैश्वीकरण से राज्य की संप्रभुता प्रभावित होना हैं। राज्यों को वैश्विक मुद्दों पर अंतर्राष्ट्रीय नियमों का पालन करना होता है। उदाहरण के लिए वैश्विक बाजार की भूमिका में वृद्धि, समुन्नत प्रौद्योगिकी, पर्यावरण संबंधी अंतर्राष्ट्रीय कानून कुछ हद तक राज्यों की संप्रभुता को प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 31.
नव-उपनिवेशवाद क्या है?
उत्तर:
समय तथा युग के साथ-साथ उपनिवेशवाद का रूप भी बदल गया है। नव उपनिवेशवाद परंपरागत उपनिवेशवाद का एक नया रूप है। ‘नव उपनिवेशवाद’ का लक्ष्य सैनिक तथा राजनीतिक प्रभुत्व के स्थान पर आर्थिक प्रभुत्व की स्थापना करना है। एक समृद्ध तथा शक्तिशाली देश, कमजोर देश को आर्थिक सहायता देकर उस देश की नीतियाँ तथा राजनीतिक गतिविधियों पर नियंत्रण करता है और उन नीतियों तथा गतिविधियों को अपने लाभ की ओर प्रभावकारी बनाता है।

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प्रश्न 32.
कल और आज के वैश्वीकरण में अंतर के कुछ तर्क दीजिए।
उत्तर:
कल और आज के वैश्वीकरण में बहुत अंतर है। इसको हम निम्न तर्क द्वारा देख सकते हैं।

  1. आज न केवल वस्तुएँ बल्कि लोग भी बड़ी संख्या में एक देश से दूसरे देश में जा रहे हैं।
  2. पहले पूर्व के देशों को ही अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रमुखता प्राप्त थी किन्तु आज विपरीत स्थिति है। पश्चिम की वस्तुओं को भी उतना ही सम्मान मिलता है।
  3. कई कंपनियाँ विकासशील देशों के उत्पाद पर अपना लेबल लगाकर पूरे विश्व बाजार में विकसित देशों के उत्पाद के रूप में बेच रही है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वैश्वीकरण को परिभाषित कीजिये इसके अंग तथा सिद्धान्तों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण का अर्थ एवं परिभाषा; वैश्वीकरण विचार, पूँजी, वस्तु और लोगों की वैश्विक आवाजाही से जुड़ी वह परिघटना है, जिसमें इन प्रवाहों का धरातल सम्पूर्ण विश्व है और इन प्रवाहों की गति तीव्र तथा निरन्तरता लिए हुए है जो अन्ततः ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव पैदा कर रही है। गाय ब्रायंबंटी के शब्दों में, “वैश्वीकरण की प्रक्रिया केवल विश्व व्यापार की खुली व्यवस्था, संचार के आधुनिकतम तरीकों के विकास, वित्तीय बाजार के अन्तर्राष्ट्रीयकरण, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बढ़ते महत्त्व, जनसंख्या के देशान्तरगमन तथा विशेषतः लोगों, वस्तुओं, पूँजी तथा विचारों के गतिशील होने से ही संबंधित नहीं है बल्कि संक्रामक रोगों तथा प्रदूषण का प्रसार भी इसमें शामिल है।

  • वैश्वीकरण के अंग- विद्वानों के मतानुसार वैश्वीकरण के प्रमुख अंग निम्नलिखित हैं।
    1. व्यापार या वस्तुओं का विभिन्न देशों में निर्बाध प्रवाह,
    2. विभिन्न देशों में पूँजी का स्वतन्त्र प्रवाह,
    3. तकनीक तथा विचार का बेरोकटोक प्रवाह तथा
    4. विभिन्न देशों में श्रम प्रवाह।
  • वैश्वीकरण के लिए निर्देशक सिद्धान्त: वैश्वीकरण के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं।
    1. राजकोषीय अनुशासन।
    2. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को खुला रखना।
    3. संस्थागत एवं रचनात्मक सुधार।
    4. बाजार की शक्तियों द्वारा आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं को निर्धारित करना।
    5. निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन देना।
    6. व्यापार का उदारीकरण करना।
    7. कर प्रणाली में सुधार करना।
    8. पारदर्शिता लाना।
    9. अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के निर्देशों का पालन करना।
    10. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग।

प्रश्न 2.
“वैश्वीकरण एक बहुआयामी धारणा है। “इस कथन की विवेचना कीजिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधारणा के रूप में: वैश्वीकरण एक बहुआयामी धारणा है; इसके राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आयाम हैं। यथा।

  • वैश्वीकरण का राजनैतिक आयाम: वैश्वीकरण के प्रमुख राजनीतिक आयाम इस प्रकार हैं।
    1. वैश्वीकरण के कारण राज्य अब मुख्य कार्यों, जैसे: कानून-व्यवस्था तथा नागरिक सुरक्षा तक ही अपने को सीमित रखता है। इससे आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में राज्य की शक्तियाँ कम हुई हैं।
    2. वैश्वीकरण के चलते अब राज्यों के हाथों में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी मौजूद है जिसके बूते राज्य अपने नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकते हैं। इससे राज्य की क्षमता बढ़ी है।
  • वैश्वीकरण का आर्थिक आयाम: आर्थिक वैश्वीकरण की प्रक्रिया में दुनिया के विभिन्न देशों के बीच आर्थिक प्रवाह तेज हो जाता है। इसके चलते दुनिया में वस्तुओं के व्यापार में वृद्धि हुई है, पूँजी के निवेश की बाधाएँ हटी हैं, विचारों का प्रवाह अबाध हुआ है।
  • वैश्वीकरण के सांस्कृतिक आयाम: वैश्वीकरण में राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभुत्वशाली संस्कृति कम ताकतवर समाजों पर अपनी छाप छोड़ती हैं और संसार वैसा ही दीखता है जैसा ताकतवर संस्कृति इसे बनाना चाहती है। इससे विश्व की सांस्कृतिक धरोहरें खत्म हो रही हैं। दूसरी तरफ, हमारी पसंद-नापसंद का दायरा बढ़ रहा है, और प्रभुत्वशाली संस्कृति के सांस्कृतिक प्रभावों के अन्तर्गत ही परम्परागत सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़े बिना स्थानीय संस्कृति का परिष्कार भी हो रहा है।

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प्रश्न 3.
वैश्वीकरण के कारण तथा इसके राजनैतिक प्रभावों का विवेचन कीजिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण के कारण: वैश्वीकरण के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं।
1. प्रौद्योगिकी: प्रौद्योगिकी में हुई प्रगति के कारण ही विचार, पूंजी, वस्तु और लोगों की विश्व के विभिन्न भागों में आवाजाही में आसानी हुई है।
2. विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव: विश्वव्यापी प्रवाहों की निरन्तरता से लोगों में विश्वव्यापी पारस्परिक पैदा हुआ और इस जुड़ाव ने वैश्वीकरण की प्रक्रिया को तीव्र कर दिया है।
वैश्वीकरण के राजनैतिक प्रभाव: वैश्वीकरण के राजनैतिक प्रभाव का विवेचन निम्नलिखित तीन बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है।

  • वैश्वीकरण ने कुछ क्षेत्रों में राज्य की शक्ति को कमजोर किया है- यथा-
    1. वैश्वीकरण के कारण पूरी दुनिया में अब राज्य कुछेक मुख्य कामों, जैसे कानून व्यवस्था को बनाये रखना तथा अपने नागरिकों की सुरक्षा करना आदि तक ही अपने को सीमित रखता है।
    2. वैश्वीकरण की प्रक्रिया के कारण राज्य की जगह अब बाजार आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रमुख निर्धारक है।
    3. बहुराष्ट्रीय निगमों का बढ़ता प्रभाव: वैश्वीकरण के चलते पूरे विश्व में बहुराष्ट्रीय निगमों की भूमिका बढ़ी है। इससे सरकारों के अपने दम पर फैसला करने की क्षमता में कमी आती हैं।
  • कुछ क्षेत्रों में राज्य की शक्ति पर वैश्वीकरण का कोई प्रभाव नहीं राजनीतिक समुदाय के आधार के रूप में राज्य की प्रधानता को वैश्वीकरण से कोई चुनौती नहीं मिली है।
  • वैश्वीकरण ने राज्य की शक्ति में वृद्धि भी की है। वैश्वीकरण के फलस्वरूप अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के बूते राज्य अपने नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकता है। इस सूचना के दम पर राज्य ज्यादा कारगर ढंग से काम कर सकते हैं।

प्रश्न 4.
वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभाव पर एक निबंध लिखिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभाव: वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभाव निम्नलिखित हैं।

I. वैश्वीकरण के नकारात्मक सांस्कृतिक प्रभाव:
वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभावों को देखते हुए इस भय मिला है कि यह प्रक्रिया विश्व की संस्कृतियों को खतरा पहुँचायेगी; क्योंकि वैश्वीकरण सांस्कृतिक समरूपता लाता है जिसमें विश्व संस्कृति के नाम पर पश्चिमी संस्कृति लादी जा रही है। इस कारण विभिन्न संस्कृतियाँ अब अपने को प्रभुत्वशाली अमेरिकी ढर्रे पर ढालने लगी हैं। इससे पूरे विश्व में विभिन्न संस्कृतियों की समृद्ध धरोहर धीरे धीरे खत्म होती जा रही है। यह स्थिति समूची मानवता के लिए खतरनाक है।

II. वैश्वीकरण के सकारात्मक सांस्कृतिक प्रभाव- वैश्वीकरण के कुछ सकारात्मक सांस्कृतिक प्रभाव भी पड़े हैं। जैसे
1. बाहरी संस्कृति के प्रभावों से हमारी पसंद-नापसंद का दायरा बढ़ता है; जैसे—बर्गर के साथ-साथ मसाला- डोसा भी अब हमारे खाने में शामिल हो गया है।
2. इसके प्रभावस्वरूप कभी-कभी संस्कृति का परिष्कार भी होता है, जैसे- नीली जीन्स के साथ खादी का कुर्ता पहनना।
3. वैश्वीकरण से हर संस्कृति कहीं ज्यादा अलग और विशिष्ट होती जा रही है। प्रश्न 5. वैश्वीकरण के पक्ष तथा विपक्ष में तर्क दीजिये।
उत्तर:

  • वैश्वीकरण के पक्ष में तर्कवैश्वीकरण के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये गये हैं।
    1. वैश्वीकरण से लोगों में विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव बढ़ा है।
    2. वैश्वीकरण के कारण पूँजी की गतिशीलता बढ़ी है। इससे प्रत्यक्ष विदेशी पूँजी निवेश बढ़ा है तथा विकासशील देशों की अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं पर निर्भरता कम हुई है।
    3. वैश्वीकरण की प्रक्रिया द्वारा विकासशील देशों को उन्नत तकनीक का लाभ मिल सकता है।
    4. वैश्वीकरण ने विश्वव्यापी सूचना क्रांति को जन्म दिया है। इससे सामाजिक गतिशीलता बढ़ी है।
    5. वैश्वीकरण के कारण रोजगार की गतिशीलता में भारी वृद्धि हुई है।
  • वैश्वीकरण के विपक्ष में तर्क: वैश्वीकरण के विपक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं।
    1. वैश्वीकरण की व्यवस्था धनिकों को ज्यादा धनी और गरीब को और ज्यादा गरीब बनाती है। इससे आर्थिक असमानता को बढ़ावा मिला है तथा तीसरी दुनिया के देशों में गरीबी बढ़ती जा रही है।
    2. वैश्वीकरण से राज्य की गरीबों के हित की रक्षा करने की उसकी क्षमता में कमी आती है।
    3. वैश्वीकरण से परम्परागत संस्कृति की हानि होगी और लोग अपने सदियों पुराने जीवन-मूल्य तथा तौर- तरीकों से हाथ धो बैठेंगे।
    4. वैश्वीकरण के चलते विकासशील देशों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की एकाधिकारवादी प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
    5. वैश्वीकरण की प्रक्रिया प्रभुतासम्पन्न राष्ट्रों द्वारा विकासशील देशों के बाजारों को हस्तगत करने के लिए कमजोर राष्ट्रों पर जबरन थोपी जा रही है।

प्रश्न 6.
वैश्वीकरण विरोधी आन्दोलन पर एक निबन्ध लिखिये।
उत्तर:
वैश्वीकरण विरोधी आंदोलन: वैश्वीकरण की पूरी दुनिया में आलोचना हो रही है। वैश्वीकरण के विरोध में आंदोलन किये जा रहे हैं। वैश्वीकरण विरोधी आन्दोलनों को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है।
1. किसी खास कार्यक्रम का विरोध:
वैश्वीकरण – विरोधी बहुत से आन्दोलन वैश्वीकरण की धारणा के विरोधी नहीं हैं; बल्कि वे वैश्वीकरण के किसी खास कार्यक्रम के विरोधी हैं जिसे वे साम्राज्यवाद का एक रूप मानते हैं।

2. बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन:
वैश्वीकरण के प्रति विरोध के प्रदर्शन मुख्यतः आर्थिक रूप से ताकतवर देशों द्वारा व्यापार के अनुचित तौर-तरीकों के अपनाने के विरोध में हुए थे। उनका तर्क था कि उदीयमान वैश्विक आर्थिक- व्यवस्था में विकासशील देशों के हितों को समुचित महत्त्व नहीं दिया गया है।

3. वर्ल्ड सोशल फोरम (WSF ):
नव-उदारवादी वैश्वीकरण के विरोध का एक विश्व व्यापी मंच ‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ (WSF) है। इस मंच के तहत मानवाधिकार कार्यकर्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर, युवा और महिला कार्यकर्ता एकजुट होकर नव-उदारवादी वैश्वीकरण का विरोध करते हैं ।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण

प्रश्न 7.
भारत सरकार द्वारा वैश्वीकरण की दिशा में क्या-क्या कदम उठाये गये हैं तथा उसके क्या प्रभाव पड़े हैं? समझाइये
उत्तर:

  • भारत द्वारा वैश्वीकरण की दिशा में उठाये गये कदम सन् 1991 के बाद से आर्थिक सुधारों को अपनाते हुए भारत ने वैश्वीकरण की दिशा में निम्नलिखित प्रमुख कदम उठाये हैं।
    1. 1990 के दशक में उदारीकरण वैश्वीकरण की नीति के तहत औद्योगिक लाइसेंस युग को समाप्त कर दिया गया, सार्वजनिक क्षेत्र में कटौती की गई, व्यापारिक गतिविधियों पर सरकार का एकाधिकार समाप्त कर दिया गया तथा निजीकरण सम्बन्धी कार्यक्रमों की पहल की गई।
    2. 1990 के दशक के दौरान ही विभिन्न क्षेत्रों पर आयात बाधायें हटायी गईं। इन क्षेत्रों में व्यापार और विदेशी निवेश भी शामिल थे।
    3. भारतीय शुल्क दरों में तेजी से कमी की गई। भारत में वैश्वीकरण के सकारात्मक परिणाम
  • वैश्वीकरण के भारत में निम्नलिखित सकारात्मक परिणाम परिलक्षित हो रहे हैं।
    1. वैश्वीकरण को अपनाने से भारत में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) दर तथा विकास दर में तेजी से वृद्धि हुई है।
    2. उदारीकरण के बाद GDP विकास में जो उछाल आया, उसने भारत की वैश्विक स्थिति में सुधार ला दिया।
    3. वैश्वीकरण के प्रभावस्वरूप भारत में गरीबी में जीवन-यापन कर रहे लोगों का अनुपात धीरे-धीरे घट रहा है। भारत में वैश्वीकरण के नकारात्मक प्रभाव
  • आर्थिक सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर कुछेक प्रतिकूल प्रभाव भी डाले हैं, यथा।
    1. वैश्वीकरण के कारण कृषि में सब्सिडी को कम किये जाने से अनाज की कीमतों में वृद्धि हुई है तथा कृषि क्षेत्र में आधारिक संरचना में कमी आई है।
    2. वैश्वीकरण के प्रभावस्वरूप बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारतीय बाजार को धीरे-धीरे हड़प रही हैं।
    3. अपनी विनिवेश नीति के तहत सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने से सरकार को बहुत नुकसान उठाना पड़

प्रश्न 8.
वैश्वीकरण के प्रतिरोध को लेकर भारत के अनुभव क्या हैं?
उत्तर:
भारत में भी वैश्वीकरण का प्रतिरोध हुआ है और कई आंदोलन हुए हैं। सामाजिक आंदोलनों के द्वारा हमें आस-पड़ोस की दुनिया और समाज को समझने में सहायता मिलती है। इस आंदोलनों के माध्यम से हम अपनी समस्याओं का हल तलाश सकते हैं। भारत में वैश्वीकरण का विरोध कई माध्यमों द्वारा हो रहा है।

  1. वामपंथी राजनीतिक दलों ने आर्थिक वैश्वीकरण के खिलाफ आवाज उठाई है तो दूसरी तरफ मानवाधिकार- कार्यकर्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर, युवा और महिला कार्यकर्ता इंडियन सोशल फोरम के मंचों के माध्यम से नव-उदारवादी वैश्वीकरण के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।
  2. औद्योगिक श्रमिक और किसानों के संगठनों ने बहुराष्ट्रीय निगमों के प्रवेश का विरोध किया है।
  3. कुछ औषधीय वनस्पतियों जैसे ‘नीम’ को अमरीकी और यूरोपीय कंपनी ने पेटेन्ट कराने का प्रयास किया इसका भी कड़ा विरोध हुआ है।
  4. वैश्वीकरण का विरोध राजनीति के दक्षिण पंथी खेमा भी कर रहा है। यह खेमा विभिन्न सांस्कृतिक प्रभावों का विरोध कर रहा है जैसे- केवल नेटवर्क के द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे विदेशी टी.वी. चैनलों से लेकर वैलेन्टाईन- डे मनाने तथा स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं की पश्चिमी पोशाकों के लिए बढ़ी अभिरुचि का विरोध भी शामिल है।

प्रश्न 9.
वैश्वीकरण की व्याख्या कीजिए। वैश्वीकरण को बढ़ावा देने में प्रौद्योगिकी का क्या योगदान रहा है?
उत्तर:
अवधारणा के रूप में वैश्वीकरण मौलिक रूप से प्रवाह से संबंधित है। ये प्रवाह कई तरह के हो सकते हैं। दुनिया के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाने वाले विचार, दो या दो से अधिक स्थानों के बीच पूँजी का टकराव, सीमाओं के पार होने वाली वस्तुओं और दुनिया के विभिन्न भागों में बेहतर आजीविका की तलाश में घूम रहे लोग ‘विश्वव्यापी अन्तर्सम्बन्ध’ एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है जो इन निरंतर प्रवाह के परिणामस्वरूप बना और टिका हुआ है। जबकि वैश्वीकरण का कोई एक कारण नहीं है अपितु प्रौद्योगिकी इसका एक अपरिहार्य वजह है । इसमें कोई संदेह नहीं है कि हाल के वर्षों में टेलीग्राफ, टेलीफोन और माइक्रोचिप के आविष्कार ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों के बीच संचार में क्रांति लाई है। जब शुरू में मुद्रण हुआ तो यह राष्ट्रवाद के निर्माण का आधार बना। इसलिए आज हमें यह भी उम्मीद करनी चाहिए कि प्रौद्योगिकी हमारे व्यक्तिगत ही नहीं बल्कि हमारे सामाजिक जीवन के बारे में सोचती है। दुनिया के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में अधिक आसानीपूर्वक आने जाने के लिए विचारों, पूँजी, वस्तुओं और लोगों की क्षमता को तकनीकी विकास द्वारा बड़े पैमाने पर संभव बनाया गया है। इन प्रवाहों की गति भिन्न हो सकती है।

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प्रश्न 10.
वैश्वीकरण की प्रक्रिया को आलोचक कैसे देखते हैं?
उत्तर:
वैश्वीकरण ने कुछ सकारात्मक आलोचनाओं को भी इसके सकारात्मक प्रभावों के बावजूद आमंत्रित किया है। इसके महत्त्वपूर्ण तर्कों को इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है।
1. आर्थिक:
(अ) विदेशी लेनदारों को शक्तिशाली बनाने के लिए बड़े पैमाने पर उपभोग के सामान पर सब्सिडी में कमी।
(ब) इसने अमीर और गरीब राष्ट्रों के बीच असमानता बढ़ा दी है, अमीर राष्ट्र और अधिक अमीर और गरीब राष्ट्र और अधिक गरीब हुए हैं।
(स) राज्यों ने भी विकसित और विकासशील राष्ट्रों के बीच असमानताएँ पैदा की हैं।

2. राजनीतिक:
(अ) राज्य के कल्याण कार्यों को कम कर दिया गया है।
(ब) राज्यों की संप्रभुता प्रभावित हुई है ।
(स) राज्य अपने लिए निर्णय लेने में कमजोर हुए हैं।

3. सांस्कृतिक:
(अ) लोग अपने पुराने मूल्यों और परंपराओं को खो रहे हैं।
(ब) दुनिया कम शक्तिशाली समाज पर अपना प्रभुत्व जमा रही है।
(स) यह संपूर्ण विश्व की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सिकोड़ता है।

JAC Class 11 History Solutions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

Jharkhand Board JAC Class 11 History Solutions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 11 History Solutions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

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क्रियाकलाप 1: जल प्लावन के बारे में अनेक समाजों में अपनी-अपनी पुराण कथाएँ प्रचलित हैं। ये कुछ हैं जो इतिहास में हुए महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों की यादों को अमिट रखते हुए अभिव्यक्त करते हैं। इनके बारे में कुछ और जानकारी का पता लगाएँ और यह बताएँ कि जलप्लावन से पहले और उसके बाद का जन-जीवन कैसा रहा होगा?
उत्तर:
जल-प्लावन के बारे में अनेक समाजों में अपनी-अपनी पुराण कथाएँ प्रचलित हैं। ये कथाएँ इतिहास में हुए महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों के अतीत को अपने ढंग से अभिव्यक्त करती हैं। यहूदियों की बाइबिल के अनुसार यह जल-प्लावन पृथ्वी पर सम्पूर्ण जीवन को नष्ट करने वाला था। परन्तु ईश्वर ने जल-प्लावन के बाद भी जीवन को पृथ्वी पर सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी नोआ नामक एक मनुष्य को सौंपी। नोआ ने सभी जीव-जन्तुओं के एक-एक जोड़े को अपनी विशाल नाव में रख लिया। जब जल – प्लावन हुआ तो बाकी सब कुछ नष्ट हो गया, परन्तु नाव में रखे सभी जोड़े सुरक्षित बच गए।

जल – प्लावन के इसी प्रकार के आख्यान विश्व की अनेक प्राचीन सभ्यताओं में विविध रूपों में मिलते हैं। ऐसी ही कहानी मेसोपोटामिया के परम्परागत साहित्य में भी मिलती है। इस ‘जल प्रलय के आख्यान’ के अनुसार देवताओं ने मनुष्य जाति को नष्ट करने के लिए जल प्रलय करने का निश्चय किया। इस अवसर पर जिउसूद्र नामक व्यक्ति ने एक नाव बनाई और उसे अनेक जीवों के जोड़ों तथा अन्नादि से भर लिया। अन्त में जिउसूद्र ने देवताओं को बलि दी जिससे वे बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे अमृत्व प्रदान किया और उसे दिलमुन पर्वत पर स्थान दिया।

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इस प्रकार जल-प्लावन के आख्यानों से सृष्टि की रचना, उसके विनाश, तत्कालीन धार्मिक स्थिति आदि पर प्रकाश पड़ता है। जल-प्लावन से पहले मनुष्य का जीवन अनेक गतिविधियों से परिपूर्ण था। मानव-समाज खेती, पशु-पालन आदि क्रिया-कलापों में व्यस्त रहता था। उद्योग-धन्धे, व्यापार आदि विकसित थे। उस समय छोटे-बड़े सभी प्रकार के भवन, राजप्रासाद बने हुए थे। परन्तु जल – प्लावन के बाद मानव समाज को भीषण विनाशलीला का सामना करना पड़ा होगा। सर्वत्र पानी ही पानी होने के कारण बड़ी संख्या में स्त्री-पुरुषों को अपने प्राणों से हाथ धोने पड़े होंगे और भव्य भवन, कलाकृतियाँ आदि नष्ट हो गए होंगे।

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क्रियाकलाप 2 : क्या शहरी जीवन धातुओं के इस्तेमाल के बिना सम्भव होता? इस विषय पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
शहरी जीवन में खाद्य उत्पादन के अलावा व्यापार, उत्पादन और विभिन्न प्रकार की सेवाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। शहरी जीवन श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण पर निर्भर करता है। नगर के लोग आत्म-निर्भर नहीं रहते और उन्हें अनेक वस्तुओं तथा सेवाओं के लिए अन्य लोगों पर आश्रित होना पड़ता है। उदाहरण के लिए एक पत्थर की मुद्रा बनाने वाले को पत्थर उकेरने के लिए काँसे के औजारों की आवश्यकता पड़ती है, वह स्वयं ऐसे औजार नहीं बना सकता। वह यह भी नहीं जानता कि मुद्राओं के लिए आवश्यक रंगीन पत्थर वह कहाँ से प्राप्त करे। काँसे के औजार बनाने वाला भी धातु ताँबा या राँगा (टिन) लाने के लिए स्वयं बाहर नहीं जाता। इस प्रकार पारस्परिक निर्भरता शहरी जीवन की विशेषता हैं। अतः शहरी जीवन धातुओं के इस्तेमाल के बिना सम्भव नहीं होता।

मेसोपोटामिया में काँसे का बहुत महत्त्व था। काँसा, ताँबे और राँगे के मिश्रण से बनता है। ये धातुएँ दूर-दूर . से मँगायी जाती थीं। शहरों में रहने वाले नागरिकों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धातुओं के औजारों और उनका इस्तेमाल करने वालों की आवश्यकता पड़ती है।

बढ़ई का सही काम करने, पत्थर की मुद्राएँ उकेरने, फर्नीचर में जड़ने, सीपियाँ काटने, धातुओं के बर्तन बनाने आदि कामों के लिए धातु के औजारों और कुशल शिल्पियों की जरूरत पड़ती है। अतः शहरी जीवन धातुओं के इस्तेमाल के बिना सम्भव नहीं है। मेसोपोटामिया में खनिज संसाधनों का अभाव था। अतः मेसोपोटामिया के लोग ताँबा, राँगा, सोना, चाँदी आदि धातुओं को तुर्की, ईरान तथा खाड़ी पार के देशों से मँगाते थे । ये धातुएँ शहरी जीवन के विकास के लिए आवश्यक थीं।

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क्रियाकलाप 4 : आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि असुरबनिपाल और नैबोनिडस ने मेसोपोटामिया की प्राचीन परम्पराओं की कद्र की?
उत्तर:
मेसोपोटामियावासी शहरी जीवन को महत्त्व देते थे। युद्ध में शहरों के नष्ट हो जाने के बाद वे अपने काव्यों के द्वारा उन्हें याद किया करते थे। वे अपनी लेखन कला के कारण ही अपनी अनेक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों को सुरक्षित रख सके हैं। असीरिया का अन्तिम शासक असुरबनिपाल (668-627 ई.पू.) मेसोपोटामिया की प्राचीन परम्पराओं का संरक्षक था।

उसने अपनी राजधानी निनवै में एक पुस्तकालय की स्थापना की। उसने इतिहास, महाकाव्य, शकुन साहित्य, ज्योतिष- विद्या, स्तुतियों तथा कविताओं की पट्टिकाओं को इकट्ठा करने का भरसक प्रयास किया और उसमें सफल रहा। उसने अपने लिपिकों को दक्षिण में पुरानी पट्टिकाओं की खोज करने के लिए भेजा क्योंकि दक्षिण में लिपिकों को विद्यालयों में पढ़ना- संजीव पास बुक्स लिखना सिखाया जाता था, जहाँ उन्हें बड़ी संख्या में पट्टिकाओं की नकलें तैयार करनी होती थीं।

गिलगमेश के महाकाव्य की पट्टिकाओं की प्रतियाँ तैयार की गईं। कुछ पट्टिकाओं के अन्त में असुरबनिपाल का उल्लेख भी मिलता है : “मैं असुरबनिपाल, ब्रह्माण्ड का सम्राट, असीरिया का शासक, जिसे देवताओं ने विशाल बुद्धि प्रदान की है, जिसने विद्वानों के पाण्डित्य के गूढ़ ज्ञान को प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की। मैंने देवताओं के बुद्धि-विवेक पर पट्टिकाओं पर लिखा है…और मैंने पट्टिकाओं की जाँच की और उन्हें संग्रहित किया।

मैंने उन्हें निनवै स्थित अपने इष्टदेव नाबू के मन्दिर के पुस्तकालय में भविष्य में उपयोग के लिए रख दिया- अपने जीवन के लिए, अपनी आत्मा के कल्याण के लिए और अपने शाही सिंहासन की नींव को मजबूत बनाए रखने के लिए। ” असुरबनिपाल ने इन पट्टिकाओं की सूची भी तैयार करवाई। असुरबनिपाल के पुस्तकालय में कुल मिलाकर 1000 मूल ग्रन्थ थे तथा लगभग 30,000 पट्टिकाएँ थीं जिन्हें विषयानुसार वर्गीकृत किया गया था।

tatase स्वतन्त्र बेबीलोन का अन्तिम शासक था। उसने लिखा है कि उर के नगर – देवता ने उसे सपने में दर्शन दिए और उसे सुदूर दक्षिण के उस पुरातन नगर का कार्य – भार सम्भालने के लिए एक महिला पुरोहित को नियुक्त करने का आदेश दिया। उसने बताया कि उसे एक बहुत पुराने राजा का पट्टलेख मिला और उस पर उसने महिला पुरोहित की आकृति अंकित देखी।

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इसके बाद नैबोनिडस ने अपनी पुत्री को महिला पुरोहित के रूप में प्रतिष्ठित किया। एक अन्य अवसर पर नैबोनिडस के व्यक्ति उसके पास अक्कद के राजा सारगोन की एक टूटी हुई मूर्ति लाए। नैबोनिडस ने लिखा है कि ” देवताओं के प्रति भक्ति और राजा के प्रति अपनी निष्ठा के कारण, मैंने कुशल शिल्पियों को बुलाया और उसका खण्डित सिर बदलवा दिया। ” इससे सिद्ध होता है कि असुरबनिपाल और नैबोनिडस ने मेसोपोटामिया की प्राचीन परम्पराओं की कद्र की।

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लघूत्तरात्मक प्रश्न –

प्रश्न 1.
आप यह कैसे कह सकते हैं कि प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर ही आरम्भ में शहरीकरण के कारण थे?
उत्तर:
विद्वानों के मतानुसार प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर ही आरम्भ में शहरीकरण के कारण। प्रमाण के रूप में रोम साम्राज्य सहित सभी पुरानी व्यवस्थाओं में दक्षिणी मेसोपोटामिया में सबसे पहले नगरों का विकास हुआ क्योंकि दजला और फरात नदियों के कारण दक्षिणी मेसोपोटामिया की खेती सर्वाधिक उपज देने वाली थी क्योंकि यहाँ मिट्टी प्राकृतिक रूप से उपजाऊ थी। खेती के अलावा वहाँ पशुपालन की उच्च स्थितियाँ थीं तथा नदियों में पर्याप्त मछलियाँ थीं तथा गर्मियों में खजूर के पेड़ खूब पिंड खजूर होते थे। इस प्रकार प्राकृतिक उर्वरता और खाद्य उत्पादन की उच्च स्थितियों के कारण ही वहाँ सबसे पहले नगरों का विकास हुआ।

इस सम्बन्ध में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये जा सकते हैं –

(1) प्राकृतिक उर्वरता के कारण खाद्य पदार्थों का उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जाता था। कृषक लोग अपना फालतू अनाज शहरों में लाने लगे जहाँ उन्हें अच्छा लाभ मिलता था। इससे शहरीकरण को प्रोत्साहन मिला।

(2) प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर के कारण जनसंख्या बढ़ी। इसके फलस्वरूप शहर बसने लगे। क्योंकि शहरी अर्थव्यवस्थाओं में खाद्य उत्पादन, व्यापार और विभिन्न प्रकार की सेवाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है

(3) शहरों में अनाज तथा अन्य खाद्य पदार्थों के संग्रह तथा वितरण के लिए व्यवस्था करनी होती थी। इससे शहरीकरण को प्रोत्साहन मिला।

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प्रश्न 2.
आपके विचार से निम्नलिखित में से कौनसी आवश्यक दशाएँ थीं जिनकी वजह से प्रारम्भ में शहरीकरण हुआ था और निम्नलिखित में से कौन – कौनसी बातें शहरों के विकास के फलस्वरूप उत्पन्न हुईं?
(क) अत्यन्त उत्पादक खेती
(ख) जल परिवहन
(ग) धातु और पत्थर की कमी
(घ) श्रम विभाजन
(ङ) मुद्राओं का प्रयोग
(च) राजाओं की सैन्य शक्ति जिसने श्रम को अनिवार्य बना दिया।
उत्तर:
शहरीकरण के लिए आवश्यक दशाएँ –
शहरीकरण के लिए आवश्यक दशाएँ निम्नलिखित थीं –
(क) अत्यन्त उत्पादक खेती – अत्यन्त उत्पादक खेती प्रारंभिक शहरीकरण की अत्यन्त आवश्यक दशा थी क्योंकि शहरीकरण तभी संभव है जब खेती में इतनी उपज हो कि वह शहरों के लिए भरण-पोषण का साधन बन सके। यही कारण है कि दक्षिणी मेसोपोटामिया में खेती की उर्वरता एवं खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर के कारण ही विश्व में सबसे पहले शहरों का प्रादुर्भाव हुआ।

(ख) जल परिवहन – कुशल परिवहन व्यवस्था भी शहरी विकास के लिए आवश्यक है, शहरी अर्थव्यवस्था के विकास के लिए जल – परिवहन सबसे सस्ता तरीका है। भारवाही पशुओं की पीठ पर रखकर या बैलगाड़ियों में डाल कर शहरों में अनाज या काठ – कोयला लाना – ले जाना बहुत कठिन होता है क्योंकि उसमें बहुत अधिक समय लगता है और उस पर काफी खर्च आता है। इसलिए परिवहन का सबसे सस्ता तरीका सर्वत्र जलमार्ग ही होता है। अनाज के बोरों से लदी हुई नावें या बजरे नदी की धारा अथवा हवा के वेग से चलते हैं, जिसमें कोई खर्च नहीं लगता था। प्राचीन मेसोपोटामिया की नहरें परिवहन के अच्छे साधनों के रूप में कार्य करती थीं। फलतः जल परिवहन वहाँ प्रारंभिक शहरीकरण के विकास का एक महत्त्वपूर्ण कारक सिद्ध हुआ।

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(ग) धातु और पत्थर की कमी – दक्षिणी मेसोपोटामिया में औजार, मोहरें (मुद्राएँ) तथा आभूषण बनाने के लिए पत्थरों की कमी थी । वहाँ औजार, पात्र का आभूषण बनाने के लिए धातुएँ भी उपलब्ध नहीं थीं। इसलिए वहाँ के लोग ताँबा, राँगा, चाँदी, सोना, सीपी तथा विभिन्न प्रकार के पत्थर तुर्की, ईरान तथा खाड़ी पार के देशों से मँगाते थे तथा कृषि सम्बन्धी उत्पादों को अन्य देशों के लिए निर्यात किया जाता था। इसके लिए दक्षिणी मेसोपोटामिया में व्यापारिक संगठनों का निर्माण हुआ तथा व्यापार की उन्नत अवस्था ने वहाँ प्रारंभिक शहरीकरण के प्रादुर्भाव में योगदान दिया। शहरों के विकास के फलस्वरूप उत्पन्न दशाएँ :

(घ) श्रम-विभाजन – नगर के लोग आत्मनिर्भर नहीं रहते। उन्हें दूसरे लोगों द्वारा उत्पन्न वस्तुओं या दी जाने वाली सेवाओं पर निर्भर रहना पड़ता है। इस प्रकार पारस्परिक निर्भरता के कारण नगरीय जीवन में श्रम विभाजन का विकास होता है। उदाहरण के लिए पत्थर को तराशने वाले को काँसे के औजारों की आवश्यकता होती है। वह स्वयं ऐसे औजार नहीं बना सकता और न ही वह पत्थर मँगा सकता है। इस प्रकार श्रम विभाजन शहरी जीवन की विशेषता है1

(ङ) मुद्राओं का प्रयोग – लेखन कार्य तभी शुरू हुआ जब समाज को अपने लेन-देन का स्थायी हिसाब रखने की जरूरत पड़ी क्योंकि शहरी जीवन में लेन-देन अलग-अलग समय पर, विभिन्न लोगों द्वारा तथा विभिन्न मामलों के लिए होता था। वह कई प्रकार के मोलभावों के रूप में होता था। परिणामतः पट्टिकाओं के रूप में मुद्राओं का विकास हुआ।

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(च) राजाओं की सैन्य शक्ति जिसने श्रम को अनिवार्य बना दिया- राजा का स्थान ऊँचा था तथा समुदाय पर उसका नियन्त्रण था। राजा की आज्ञा से आम लोगों को पत्थर खोदने, धातु खनिज लाने, मिट्टी से ईंटें तैयार करने और मन्दिर में लगाने आदि के कार्य करने पड़ते थे। इससे प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारी परिवर्तन आया जो शहरी अर्थव्यवस्था के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुआ।

प्रश्न 3.
यह कहना क्यों सही होगा कि खानाबदोश पशुचारक निश्चित रूप से शहरी जीवन के लिए खतरा थे?
उत्तर:
पशुचारक – शहरी जीवन के लिए खतरा – खानाबदोश पशुचारक निम्नलिखित कारणों से शहरी जीवन के लिए खतरा थे-

  1. खानाबदोश पशुचारक कई बार अपनी भेड़-बकरियों को पानी पिलाने के लिए बोए हुए खेतों से गुजार कर ले जाते थे जिससे किसानों की फसलों को हानि पहुँचती थी। इसके फलस्वरूप किसानों एवं खानाबदोश पशुचारकों में कई बार झगड़े हो जाते थे।
  2. खानाबदोश पशुचारक कई बार किसानों के गाँवों पर हमला कर देते थे तथा उनका माल लूट ले जाते थे इससे अशान्ति एवं अराजकता फैलती थी जो शहरी जीवन के लिए घातक थी।
  3. कई बार बस्तियों में रहने वाले लोग भी इन खानाबदोश पशुचारकों का रास्ता रोक देते थे तथा उन्हें अपने पशुओं को नदी – नहरों तक नहीं ले जाने देते थे। इससे दोनों पक्षों में संघर्ष की स्थिति बनी रहती थी।
  4. कभी-कभी खानाबदोश पशुचारकों के पशु किसानों की तैयार फसल को नष्ट कर देते थे। इसके अतिरिक्त खानाबदोश पशुचारकों के पशुओं की चराई के कारण बहुत-सी उपजाऊ भूमि बंजर हो जाती थी।

प्रश्न 4.
आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि पुराने मन्दिर बहुत कुछ घर जैसे ही होंगे?
उत्तर:
मेसोपोटामिया के पुराने मन्दिर – मन्दिर विभिन्न प्रकार के देवी-देवताओं के निवास-स्थान थे। ये मन्दिर ईंट से बनाए जाते थे। समय के साथ इनका आकार बढ़ता गया। इनके खुले आँगनों के चारों ओर कई कमरे बने होते थे। कुछ प्रारम्भिक मन्दिर घरों की तरह ही होते थे क्योंकि मन्दिर भी किसी देवता का घर ही होता था। परन्तु मन्दिरों एवं घरों में कुछ अन्तर भी था। उदाहरण के लिए मन्दिरों की बाहरी दीवारें कुछ विशेष अन्तरालों के बाद भीतर और बाहर की ओर मुड़ी हुई थीं परन्तु साधारण घरों की दीवारें ऐसी नहीं होती थीं।

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निबन्धात्मक प्रश्न –

प्रश्न 5.
शहरी जीवन शुरू होने के बाद कौन-कौनसी नई संस्थाएँ अस्तित्व में आईं। आपके विचार से उनमें से कौन-कौनसी संस्थाएँ राजा की पहल पर निर्भर थीं?
उत्तर – मेसोपोटामिया में शहरी जीवन – दक्षिणी मेसोपोटामिया में लगभग 5000 ई.पू. बस्तियों का विकास होने लगा था। इन बस्तियों में से कुछ ने प्राचीन शहरों का रूप ले लिया । ये शहर तीन प्रकार के थे –

  1. वे शहर जो मन्दिरों के चारों ओर विकसित हुए।
  2. वे शहर जो व्यापार के केन्द्रों के रूप में विकसित हुए।
  3. शाही शहर।

मेसोपोटामिया में शहरी जीवन शुरू होने के बाद अस्तित्व में आने वाली नई संस्थाएँ –
शहरी जीवन शुरू होने के बाद मेसोपोटामिया में निम्नलिखित नई संस्थाएँ अस्तित्व में आईं –

(1) मन्दिर – बाहर से आकर बसने वाले लोगों ने अपने गाँवों में मन्दिर बनाना या उनका पुनर्निर्माण करना शुरू कर दिया। सबसे पहला ज्ञात मन्दिर एक छोटा-सा देवालय था, जो कच्ची ईंटों का बना हुआ था। मन्दिर विभिन्न प्रकार के देवी-देवताओं के रहने के स्थान थे। जैसे उर जो चन्द्र देवता था तथा इन्नाना जो प्रेम तथा युद्ध की देवी थी । ये मन्दिर ईंटों से बनाए जाते थे और समय के साथ इनका आकार बढ़ता गया। देवता पूजा का केन्द्र-बिन्दु होता था।

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लोग देवी-देवता के लिए अन्न, दही, मछली आदि लाते थे । आराध्य देव सैद्धान्तिक रूप से खेतों, मत्स्य क्षेत्रों और स्थानीय लोगों के पशुधन का स्वामी माना जाता था। कुछ समय बाद मन्दिरों में उपज को उत्पादित वस्तुओं में बदलने की प्रक्रिया शुरू हो गई। घर-परिवार से ऊपर के स्तर के व्यवस्थापक, व्यापारियों के नियोक्ता, अन्न, हल जोतने वाले पशुओं, रोटी, शराब, मछली आदि के आवंटन और वितरण के लिखित अभिलेखों के पालक के रूप में मन्दिर ने अपने क्रियाकलाप बढ़ा लिए और मुख्य शहरी संस्था का रूप ले लिया।

(2) समुदाय के नेताओं का प्रादुर्भाव – जो मुखिया लड़ाई जीतते थे, वे अपने साथियों व अनुयायियों को लूट का माल बाँट कर प्रसन्न कर देते थे तथा पराजित लोगों को बन्दी बनाकर अपने साथ ले जाते थे, जिन्हें वे अपने चौकीदार अथवा नौकर बना लेते थे। परन्तु युद्ध में विजयी होने वाले ये नेता लोग स्थायी रूप से समुदाय के मुखिया नहीं बने रहते थे। कालान्तर में इन नेताओं ने समुदायों के कल्याण पर अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया और उसके फलस्वरूप नई-नई संस्थाएँ तथा परिपाटियाँ स्थापित हो गईं।

इन विजेता मुखियाओं ने देवताओं की सेवा में बहुमूल्य भेंटें अर्पित करना शुरू कर दिया। उन्होंने मन्दिरों की धन-सम्पदा के वितरण का और मन्दिरों में आने-जाने वाली वस्तुओं का हिसाब-किताब रखकर प्रभावी तरीके से संचालन करने की व्यवस्था की। इसके फलस्वरूप इस व्यवस्था ने राजा को ऊँचा स्थान दिलाया तथा समुदाय पर उसका पूर्ण नियन्त्रण स्थापित हो गया।

(3) सेना – मुखिया लोगों ने ग्रामीणों को अपने पास बसने के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे कि वे आवश्यकता पड़ने पर तुरन्त अपनी सेना एकत्रित कर सकें। उरुक नगर से हमें सशस्त्र वीरों के चित्र मिले हैं।

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(4) सामाजिक संस्थाएँ – नगरों की सामाजिक व्यवस्था में एक उच्च या संभ्रान्त वर्ग का प्रादुर्भाव हो चुका था। अधिकांश धन-सम्पत्ति पर समाज के एक छोटे से वर्ग का अधिकार था। समाज में एकल परिवार को ही आदर्श माना जाता था। पिता परिवार का मुखिया होता था। कन्या के माता – पिता की सहमति से कन्या का विवाह किया जाता था। विवाह की रस्म पूरी हो जाने के बाद वर-वधू दोनों पक्षों की ओर से उपहारों का आदान-प्रदान किया जाता था। पिता का घर, पशु-धन, खेत आदि उसके पुत्रों को मिलते थे।

(5) लिपि – लेखन कार्य तभी शुरू हुआ जब समाज को अपने लेन-देन का स्थायी हिसाब रखने की जरूरत पड़ी। चूंकि शहरी जीवन में लेन-देन अलग-अलग समय पर, अलग-अलग लोगों के साथ होते थे तथा सौदा भी कई प्रकार के माल के बारे में होता था। इसलिए शहरीकरण के बाद लिपि का विकास हुआ। मेसोपोटामियावासियों ने ही विश्व में सर्वप्रथम एक लिपि का आविष्कार किया जिसे कीलाकार लिपि कहा जाता था। मेसोपोटामिया के लोग मिट्टी की पट्टिकाओं पर लिखा करते थे।

(6) विद्यालय – मेसोपोटामिया में देवालय ही शिक्षा के केन्द्र थे। विद्यार्थियों को हिसाब-किताब रखने की कानूनी तथा व्यापारिक शिक्षा दी जाती थी।

(7) व्यापार – शहरीकरण के कारण व्यापार संस्था अस्तित्व में आई। शहरी अर्थव्यवस्थाओं में खाद्य उत्पादन के अलावा व्यापार, उत्पादन तथा तरह-तरह की सेवाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। शहरी लोग आत्मनिर्भर नहीं होते, बल्कि एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। इसलिए इस स्थिति में व्यापार, सेवा तथा श्रम विभाजन नामक संस्थाओं का विकास हुआ। मारी नामक नगर व्यापार का प्रमुख केन्द्र था जहाँ से होकर लकड़ी, ताँबा, राँगा, तेल, मदिरा आदि वस्तुएं तुर्की, सीरिया, लेबनान आदि भेजी जाती थी।

प्रश्न 6.
किन पुरानी कहानियों से हमें मेसोपोटामिया की सभ्यता की झलक मिलती है ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया सभ्यता की झलक –
मेसोपोटामियां में प्रचलित कहानियों से मेसोपोटामिया की सभ्यता की झलक मिलती हैं। निम्नलिखित प्रचलित कहानियों से हमें मेसोपोटामिया की सभ्यता की जानकारी मिलती है –

(1) सुमेरियन महाकाव्य में वर्णित एनमर्कर की कहानी : लेखन और व्यापार का प्रयोग – मेसोपोटामिया की परम्परागत कथाओं के अनुसार उरुक के राजा एनमर्कर ने ही मेसोपोटामिया में सर्वप्रथम लेखन और व्यापार की व्यवस्था की थी। परम्परागत कथा के अनुसार उरुक के राजा एनमर्कर ने एक सुन्दर मन्दिर को सजाने के लिए बहुमूल्य रत्न और धातुएँ लाने के लिए अपने दूत को अरट्टा नामक देश के शासक के पास भेजा।

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परन्तु जब दूत अपनी बात को सही तरह से व्यक्त नहीं कर पाया, तो राजा एनमर्कर ने अपने हाथ से चिकनी मिट्टी की पट्टिका बनाई और उस पर शब्द लिख दिए। दूत ने लिखी हुई पट्टिका अरट्टा के शासक के हाथ में दी। उच्चरित शब्द कीलाकार शब्द थे। इस कहानी से ज्ञात होता है कि एनमर्कर ने मेसोपोटामिया में सर्वप्रथम व्यापार और लेखन की व्यवस्था की थी। मेसोपोटामिया के लोग मिट्टी की पट्टिकाओं पर लिखा करते थे। उनकी लिपि कीलाकार लिपि कहलाती थी।

(2) बाइबिल के प्रथम भाग ‘ ओल्ड टेस्टामेंट’ में ‘सुमेर’ की जानकारी – यूरोपवासियों के लिए मेसोपोटामिया इसलिए महत्त्वपूर्ण था क्योंकि बाइबिल के प्रथम भाग ‘ओल्ड टेस्टामेन्ट’ में इसका उल्लेख कई सन्दर्भों में किया गया है। बाइबल के प्रथम भाग ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ की ‘बुक ऑफ जेनेसिस’ (Book of Genesis) में ‘शिमार’ अर्थात् सुमेर के बारे में उल्लेख हुआ है। उसके अनुसार वहाँ ईंटों के बने शहर हैं। यूरोप के यात्री और विद्वान मेसोपोटामिया को एक प्रकार से अपने पूर्वजों की भूमि मानते थे और जब इस क्षेत्र में पुरातत्वीय खोज प्रारम्भ हुई तो ओल्ड टेस्टामेन्ट के अक्षरशः सत्य को सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया।

(3) जल-प्लावन की कहानी – बाइबल में जल – प्लावन की कहानी का उल्लेख है । बाइबल के अनुसार यह जल-प्लावन पृथ्वी पर सम्पूर्ण जीवन को नष्ट करने वाला था। किन्तु ईश्वर ने जल-प्लावन के बाद भी जीवन को पृथ्वी पर सुरक्षित रखने के लिए नोआ नामक एक मनुष्य को चुना। नोआ ने एक बहुत बड़ी नाव बनाई और उसमें सभी जीव- जन्तुओं का एक-एक जोड़ा रख लिया। जब जल – प्लावन हुआ तो बाकी सब कुछ नष्ट हो गया परन्तु नाव में रखे गए सभी जोड़े सुरक्षित बच गए। इसी प्रकार की एक कहानी मेसोपोटामिया के परम्परागत साहित्य में भी मिलती है। इस कहानी के मुख्य पात्र को ‘जिउसूद्र’ या ‘उतनापिष्टम’ कहा जाता है।

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(4) गिलगमेश की कहानी – ‘गिलगमेश’ नामक महाकाव्य से ज्ञात होता है कि मेसोपोटामिया के लोगों को अपने नगरों पर बहुत गर्व था। ऐसा कहा जाता है कि गिलगमेश ने एनमर्कर के कुछ समय बाद उरुक नगर पर शासन किया था। गिलगमेश एक महान योद्धा था जिसने दूर-दूर तक के प्रदेशों को अपने अधीन कर लिया था। परन्तु उसे संजीव पास बुक्स उस समय प्रबल आघात पहुँचा जब उसके वीर मित्र की अचानक मृत्यु हो गई।

इससे दुःखी हो वह अमृत्व की खोज में निकल पड़ा। उसने सागरों – महासागरों को पार किया और दुनिया भर का चक्कर लगाया परन्तु उसे अपने साहसिक अभियान में सफलता नहीं मिली। निराश होकर गिलगमेश अपने नगर उरुक लौट आया। वहाँ जब वह शहर की चहारदीवारी के पास चहलकदमी कर रहा था, तभी उसकी दृष्टि उन पकी ईंटों पर पड़ी जिनसे उसकी नींव गई थी। वह बहुत भाव-विभोर हो गया। इस प्रकार उरुंक नगर की विशाल प्राचीर पर आकर उस महाकाव्य की लम्बी वीरतापूर्ण और साहसभरी कथा का अन्त हो गया। इस प्रकार गिलगमेश को अपने नगर में ही सान्त्वना मिलती है, जिसे उसकी प्रजा ने बनाया था।

लेखन कला और शहरी जीवन JAC Class 11 History Notes

पाठ-सार

1. शहरी जीवन की शुरुआत – शहरी जीवन की शुरुआत मेसोपोटामिया में हुई थी।

2. मेसोपोटामिया की स्थिति – मेसोपोटामिया दजला और फरात नदियों के बीच स्थित था। वर्तमान में यह प्रदेश इराक गणराज्य का भाग है। मेसोपोटामिया की सभ्यता अपनी सम्पन्नता, शहरी जीवन, विशाल साहित्य, गणित और खगोल विद्या के लिए प्रसिद्ध है। मेसोपोटामिया की लेखन प्रणाली और उसका साहित्य पूर्वी भूमध्यसागरीय प्रदेशों तथा उत्तरी सीरिया और तुर्की में 2000 ई. पूर्व के बाद फैला।

3. सुमेर तथा अक्कद- इतिहास के आरम्भिक काल में इस प्रदेश को मुख्यतः इसके शहरीकृत दक्षिणी भाग को सुमेर और अक्कद कहा जाता था।

4. बेबीलोनिया – 2000 ई. पूर्व के बाद जब बेबीलोन एक महत्वपूर्ण शहर बन गया तब दक्षिणी क्षेत्र को बेबीलोनिया कहा जाने लगा ।

5. असीरिया – लगभग 1100 ई. पूर्व से जब असीरियन लोगों ने उत्तर में अपना राज्य स्थापित कर लिया, तब उस क्षेत्र को असीरिया कहा जाने लगा।

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6. भाषाएँ – इस प्रदेश की प्रथम ज्ञात भाषा सुमेरियन अर्थात् सुमेरी थी । 2400 ई. पूर्व के आस-पास अक्कदी भाषा प्रचलित हुई। 1400 ई. पूर्व से अरामाइक भाषा का भी प्रचलन होने लगा। यह भाषा हिब्रू से मिलती-जुलती थी और 1000 ई. पूर्व के बाद व्यापक रूप से बोली जाने लगी।

7. मेसोपोटामिया और उसका भूगोल- इराक भौगोलिक विविधता का देश है। यहाँ अच्छी फसल के लिए पर्याप्त वर्षा हो जाती है। यहाँ पशुपालन खेती की अपेक्षा आजीविका का अधिक अच्छा साधन है। पूर्व में दजला की सहायक नदियाँ परिवहन का अच्छा साधन हैं। इसका दक्षिणी भाग रेगिस्तान है और यहाँ पर ही सबसे पहले नगरों और लेखन – प्रणाली का प्रादुर्भाव हुआ। फरात और दजला नदियाँ सिंचाई तथा उपजाऊ मिट्टी यहाँ लाने का काम करती थीं। यहाँ गेहूँ, जौ, मटर, मसूर आदि की खेती की जाती थी तथा भेड़-बकरी आदि जानवर पाले जाते थे। नदियों में मछलियां थीं तथा गर्मी में पिंड खजूर थे।

8. शहरीकरण का महत्त्व – शहरी अर्थव्यवस्थाओं में खाद्य उत्पादन के अतिरिक्त व्यापार, उत्पादन और विभिन्न प्रकार की सेवाओं श्रम विभाजन एवं एक सामाजिक संगठन की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। शहरों में संगठित व्यापार, भण्डारण की आवश्यकता भी होती है।

9. शहरों में माल की आवाजाही – मेसोपोटामिया के लोग लकड़ी, ताँबा, सोना, चाँदी आदि विदेशों से मँगाते थे तथा कपड़ा और कृषि जन्य उत्पाद निर्यात करते थे । शिल्प, व्यापार और सेवाओं के अलावा मेसोपोटामिया की नहरें और प्राकृतिक जलधाराएँ छोटी-बड़ी बस्तियों के बीच माल के परिवहन के अच्छे मार्ग थे। फरात नदी व्यापार के लिए विश्व – मार्ग के रूप में प्रसिद्ध थी।

10. लेखन कला का विकास – मेसोपोटामिया के लोग मिट्टी की पट्टिकाओं पर लिखा करते थे। वे अपना हिसाब-किताब रखने तथा शब्दकोश बनाने, राजाओं के कार्यों का वर्णन करने आदि में लेखन का प्रयोग करने लगे। उनकी लिपि क्यूनीफार्म (कीलाकार) थी। यहाँ 2600 ई. पू. के आस-पास वर्ण कीलाकार हो गए और भाषा सुमेरियन थी, लेकिन कीलाकार लेखन का रिवाज पहली शताब्दी तक बना रहा।

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11. लेखन प्रणाली – जिस ध्वनि के लिए कीलाक्षर या कीलाकार चिह्न का प्रयोग किया जाता था, वह एक अकेला व्यंजन या स्वर नहीं होता था, परन्तु अक्षर होते थे। इस प्रकार लिपिक को सैकड़ों चिह्न सीखने पड़ते थे। 12. साक्षरता – मेसोपोटामिया के बहुत कम लोग पढ़-लिख सकते थे । इसका कारण था कि प्रतीकों या चिह्नों की संख्या सैकड़ों में थी तथा ये काफी जटिल थे।

13. लेखन का प्रयोग- मेसोपोटामिया में व्यापार और लेखन कला की शुरुआत करने वाला उसका राजा एनमर्कर

14. दक्षिणी मेसोपोटामिया का शहरीकरण – मन्दिर और राजा – दक्षिणी मेसोपेटामिया में कई तरह के शहर विकसित हुए। कुछ मंदिरों के चारों ओर विकसित हुए, कुछ शहर व्यापारिक केन्द्र थे और कुछ शाही शहर थे। मंदिर शहर – मेसोपोटामिया में अनेक मन्दिरों का निर्माण किया गया। ये मन्दिर देवी-देवताओं के निवास-स्थान थे। ये मन्दिर ईंटों से बनाए जाते थे। देवता पूजा का केन्द्र-बिन्दु होता था । लोग देवी – देवता के लिए अन्न, दही, मछली आदि लाते थे।

कुछ विजेता मुखियाओं ने देवताओं की सेवा में कीमती भेंटें अर्पित करना शुरू कर दिया, जिससे समुदाय के मन्दिरों की सुन्दरता तथा भव्यता बढ़ गई। इससे समुदाय में राजा को ऊँचा स्थान प्राप्त हुआ और समुदाय पर उसका पूर्ण नियन्त्रण स्थापित हो गया। युद्धबन्दियों और स्थानीय लोगों को अनिवार्य रूप से मन्दिर का अथवा प्रत्यक्ष रूप से शासक का काम करना पड़ता था। मेसोपोटामिया में खूब तकनीकी प्रगति भी हुई। अनेक प्रकार के शिल्पों के लिए काँसे के औजारों का प्रयोग होता था। वास्तुविदों ने ईंटों के स्तम्भ बनाना सीख लिया थ। मूर्तिकला के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण उन्नति हुई। कुम्हार चाक के द्वारा बड़े पैमाने पर सुन्दर बर्तन बनाने लगा तथा चित्रों का भी निर्माण हुआ।

15. शहरी जीवन- नगरों की सामाजिक व्यवस्था में एक उच्च वर्ग का उदय हो चुका था। अधिकांश धन-दौलत पर एक छोटे से वर्ग का कब्जा था। समाज में एकल परिवार को ही आदर्श माना जाता था। पिता परिवार का मुखिया होता था। पिता के घर, पशु-धन, खेत आदि पर उसके पुत्रों का अधिकार था। कन्या के माता-पिता कन्या के विवाह के लिए अपनी सहमति देते थे।

16. उर नगर-उर नगर की गलियाँ टेढ़ी-मेढ़ी व संकरी थीं। जल निकासी के लिए नालियाँ नहीं थीं। लोग अपने घर का सारा कूड़ा-कचरा बुहार कर गलियों में डाल देते थे । कमरों के अन्दर रोशनी खिड़कियों से नहीं, बल्कि उन दरवाजों से होकर आती थी, जो आंगन में खुला करते थे।

17. पशु- चारक क्षेत्र में एक व्यापारिक नगर- 2000 ई.पू. के बाद मारी नगर शाही राजधानी के रूप में खूब फला-फूला। मारी राज्य में किसान और पशुचारक दोनों ही तरह के लोग रहते थे, परन्तु उस प्रदेश का अधिकांश भाग भेड़-बकरी चराने के लिए ही काम में लिया जाता था। मारी के राजा एमोराइट समुदाय के थे ।

उन्होंने मेसोपोटामिया के देवी-देवताओं का आदर ही नहीं किया, बल्कि स्टेपी क्षेत्र के देवता डैगन के लिए मारी नगर में एक मन्दिर भी बनवाया। मारी का विशाल राजमहल वहाँ के शाही परिवार का निवास-स्थान तो था ही, साथ ही वह प्रशासन और उत्पादन, विशेष रूप से कीमती धातुओं के आभूषणों के निर्माण का मुख्य केन्द्र भी था। मारी नगर एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्यापारिक स्थल भी था।

18. मेसोपोटामिया संस्कृति में शहरों का महत्त्व – मेसोपोटामिया के लोग शहरी जीवन को महत्त्व देते थे जहाँ अनेक समुदायों तथा संस्कृतियों के लोग साथ – साथ रहा करते थे। ये लोग अपने नगरों पर बहुत अधिक गर्व करते थे।

19. लेखन कला की देन – मेसोपोटामिया की काल-गणना तथा गणित की विद्वत्तापूर्ण परम्परा मेसोपोटामिया की विश्व को सबसे बड़ी देन है। मेसोपोटामियावासी गुणा, भाग, वर्ग तथा वर्गमूल आदि से परिचित थे। उन्होंने एक वर्ष को 12 महीनों में, एक महीने को चार सप्ताहों में, एक दिन को 24 घण्टों में तथा एक घण्टे को 60 मिनट में विभाजित किया था। अपनी लेखन कला और विद्यालयों के कारण ही मेसोपोटामियावासी अपनी उपलब्धियों को सुरक्षित रख सके।

20. एक पुराकालीन पुस्तकालय – असीरियाई शासक असुरबनिपाल (668-627 ई. पू.) ने अपनी राजधानी निनवै में एक पुस्तकालय की स्थापना की थी। उसने इतिहास, महाकाव्य, ज्योतिष विद्या, कविताओं की पट्टिकाओं को इकट्ठा करने का सफल प्रयास किया था। गिलगमेश के महाकाव्य जैसी महत्त्वपूर्ण पट्टिकाओं की प्रतियाँ तैयार की गईं। असुरबनिपाल के पुस्तकालय में कुल मिलाकर 1000 मूल ग्रन्थ थे और लगभग 30,000 पट्टिकाएँ थीं जिन्हें विषयवार वर्गीकृत किया गया था।

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21. एक आरम्भिक पुरातत्ववेत्ता – 625 ई. पूर्व में दक्षिणी कछार के एक शूरवीर नैबोपोलास्सर ने बेबीलोनिया को असीरियनों के आधिपत्य से मुक्त कराया। बेबीलोन एक प्रसिद्ध नगर था जिसमें अनेक बड़े-बड़े राजमहल तथा मन्दिर विद्यमान थे। इसमें एक जिगुरात अर्थात् सीढ़ीदार मीनार थी। यहाँ का व्यापार उन्नत अवस्था में था । नैबोनिडस स्वतन्त्र बेबीलोन का अन्तिम शासक था। उसने अपनी पुत्री को महिला पुरोहित के रूप में प्रतिष्ठित किया। उसने अक्कद के राजा सारगोन की मूर्ति की मरम्मत करवाई और उसका खण्डित सिर बदलवा दिया।

कालरेखा

1. लगभग 7000-6000$ ई.पू.उत्तरी मेसोपोटामिया के मैदानों में खेती की शुरुआत।
2. लगभग 5000 ई.पू.दक्षिणी मेसोपोटामिया में सबसे पुराने मन्दिरों का बनना।
3. लगभग 3200 ई.पू.मेसोपोटामिया में लेखन-कार्य की शुरुआत।
4. लगभग 3000 ई.पू.उरुक का एक विशाल नगर के रूप में विकास : काँसे के औजारों के प्रयोग में वृद्धि।
5. लगभग $2700-2500$ ई.पू.आरम्भिक राजाओं का शासन काल जिनमें गिल्गेमिश जैसे पौराणिक राजा भी सम्मिलित हैं।
6. लगभग 2600 ई.पू.कीलाकार लिपि का विकास।
7. लगभग 2400 ई.पू.सुमेरियन के स्थान पर अक्कदी भाषा का प्रयोग।
8. 2370 ई.पू.सारगोन, अक्कद सम्राट।
9. लगभग 2000 ई.पू.सीरिया, तुर्की और मिस्न तक कीलाकार लिपि का प्रसार; महत्त्वपूर्ण शहरी केन्द्रों के रूप में मारी और बेबीलोन का उद्भव।
10. लगभग 1800 ई.पू.गणितीय मूलपाठों की रचना; अब सुमेरियन बोलचाल की भाषा नहीं रही।
11. लगभग 1100 ई.पू.असीरियाई राज्य की स्थापना।
12. लगभग 1000 ई.पू.लोहे का प्रयोग।
13. $720-610$ ई.पू.असीरियाई साप्राज्य।
14. 668-627 ई.पू.असुरबनिपाल का शासन।
15. 331 ई.पू.सिकन्दर द्वारा बेबीलोनिया को जीतना।
16. लगभग पहली शताब्दी (ईस्वी)अक्कदी भाषा और कीलाकार लिपि प्रयोग में रहीं।
17. 1850कीलाकार लिपि के अक्षरों को पहचाना व पढ़ा गया।

 

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Jharkhand Board JAC Class 11 History Solutions Chapter 1 समय की शुरुआत से Textbook Exercise Questions and Answers.

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पृष्ठ 9.

क्रिया-कलाप संख्या 1 : अधिकांश धर्मों में मानव प्राणियों की रचना के बारे में अनेक केहानियाँ कही गई हैं, पर अक्सर वे वैज्ञानिक खोजों से मेल नहीं खातीं। ऐसी कुछ धार्मिक कथाओं के बारे में पता लगाइए और उनकी तुलना, इस अध्याय में चर्चित मानव के क्रमिक विकास के इतिहास से कीजिए। आप उनके बीच क्या समानताएँ और अन्तर देखते हैं?
उत्तर:
आदि मानव की उत्पत्ति – आदि मानव की उत्पत्ति के विषय में दो मत प्रमुख हैं –
(1) धार्मिक तथा
(2) वैज्ञानिक।
धार्मिक मत के अनुसार इस पृथ्वी का निर्माण ईश्वर ने ही किया है तथा उसी की इच्छा से मनुष्य की भी सृष्टि हुई तथा ईश्वर की कृपा से ही मनुष्य ने निरन्तर विकास किया। ईसाइयों के पवित्र ग्रन्थ बाइबल के ओल्ड टेस्टामेन्ट में यह बताया गया है कि ईश्वर ने सृष्टि की रचना करते समय अन्य प्राणियों के साथ-साथ मनुष्य की भी रचना की। सुमेरियन लोगों के अनुसार ‘देवसमूह’ ने विश्व का निर्माण किया। इस प्रकार ईश्वर ने सब प्रकार के प्राणियों की सृष्टि की थी, बाद में उनकी वंशानुवंश परम्परा चलती रही। परन्तु आधुनिक काल में हुई वैज्ञानिक खोजों ने इस विश्वास को निराधार एवं असत्य सिद्ध कर दिया है।

मानव का विकास – मानव के इतिहास की जानकारी मानव के जीवाश्मों, पत्थर के औजारों और गुफाओं की चित्रकारियों की खोजों से मिलती है । परन्तु जब 200 वर्ष पूर्व ऐसी खोजें सर्वप्रथम की गई थीं, तब अनेक विद्वान् यह मानने को तैयार नहीं थे कि ये जीवाश्म प्रारम्भिक मानवों के हैं। अधिकांश विद्वानों को आदिकालीन मानव द्वारा पत्थर के औजार, चित्रकारियाँ बनाये जाने की योग्यता के बारे में भी सन्देह था। दीर्घकाल के बाद ही इन जीवाश्मों, औजारों और चित्रकारियों के वास्तविक महत्त्व को स्वीकार किया गया। इसका कारण यह था कि बाइबल के ओल्ड टेस्टामेन्ट में यह बताया गया था कि ईश्वर की सृष्टि की रचना करते समय अन्य प्राणियों के साथ-साथ मनुष्य की भी रचना की थी।

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अगस्त, 1856 में निअंडर की घाटी में चूने के पत्थरों की खान की खुदाई करते समय मजदूरों को एक खोपड़ी और अस्थिपंजर के कुछ टुकड़े मिले। उस समय विद्वानों ने घोषित किया कि यह खोपड़ी आधुनिक मानव की नहीं है तथा यह खोपड़ी किसी ‘मूर्ख’ या जड़बुद्धि प्राणी की है। प्रो. हरमन शाफहौसेन ने यह दावा किया कि यह खोपड़ी एक ऐसे मानव रूप की है, जो अब अस्तित्व में नहीं है, परन्तु लोगों ने उनके इस दावे को अस्वीकार कर दिया। इस प्रकार उस समय आदि मानव की उत्पत्ति के सम्बन्ध में धार्मिक धारणाएँ प्रचलित थीं। मानव का विकास क्रमिक रूप से हुआ है। इस बात का प्रमाण हमें मानव की उन प्रजातियों के जीवाश्मों से मिलता है जो अब लुप्त हो चुकी हैं।

पृष्ठ 24
क्रियाकलाप 3 : हादजा लोग जमीन और उसके संसाधनों पर अपने अधिकारों का दावा क्यों नहीं करते? उनके शिविरों के आकार और स्थिति में मौसम के अनुसार परिवर्तन क्यों होता रहता है? सूखा पड़ने पर भी उनके पास भोजन की कमी क्यों नहीं होती? क्या आप आज के भारत के किसी शिकारी-संग्राहक का नाम बता सकते हैं?
उत्तर:
हादजा लोगों का परिचय – हादजा शिकारियों तथा संग्राहकों का एक छोटा समूह है जो ‘लेक इयासी’ नामक एक खारे पानी की विभ्रंश घाटी में बनी झील के निकट रहते हैं । पूर्वी हादजा का क्षेत्र सूखा और चट्टानी है, परन्तु यहाँ जंगली खाद्य वस्तुएँ प्रचुर मात्रा में मिलती हैं। यहाँ हाथी, गैंडे, भैंसे, जिराफ, जेब्रे, हिरण, चिंकारा, जंगली सूअर, शेर, तेन्दुए आदि अनेक बड़े जानवर मिलते हैं। यहाँ साही मछली, खरगोश, गीदड़, कछुए आदि . जानवर भी उपलब्ध हैं। हादजा लोग हाथी को छोड़कर शेष सभी प्रकार के जानवरों का शिकार करते हैं तथा उनका मांस खाते हैं।

(1) हादजा लोग जमीन और उसके संसाधनों पर अपने अधिकारों का दावा क्यों नहीं करते ? – हादजा लोग जमीन और उसके संसाधनों पर अपने अधिकारों का दावा नहीं करते। कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छानुसार कहीं भी रह सकता है, पशुओं का शिकार कर सकता है, कहीं पर भी कंदमूल – फल, शहद आदि इकट्ठा कर सकता है और पानी ले सकता है। इस सम्बन्ध में हाजा लोगों पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता है।

(2) हादजा लोगों के शिविरों के आकार और स्थिति में मौसम के अनुसार परिवर्तन – सूखे मौसम में हाजा लोगों के शिविर प्रायः जलस्रोत से एक किलोमीटर की दूरी में ही स्थापित किये जाते हैं। उनके शिविर पेड़ों अथवा चट्टानों के बीच विशेषकर वहाँ लगाए जाते हैं जहाँ पेड़ तथा चट्टानें दोनों उपलब्ध हैं । नमी के मौसम में हादजा लोगों के शिविर प्राय: छोटे और दूर-दूर तक फैले हुए होते हैं और सूखे के मौसम में पानी के स्रोतों के निकट बड़े और घने बसे होते हैं।

(3) सूखे के समय में भी हादजा लोगों को भोजन की कमी न होना- सूखे के समय में भी हादजा लोगों के पास भोजन की कमी नहीं होती है। हादजा प्रदेश में जंगली खाद्य वस्तुएँ प्रचुर मात्रा में मिलती हैं। यहाँ सूखे मौसम में भी वनस्पति खाद्य-कन्दमूल, बेर, बाओबाब पेड़ के फल आदि प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं। हादजा लोग यहाँ पाई जाने वाली जंगली मधुमक्खियों के शहद तथा सुंडियों को भी खाते थे, अतः यहाँ खाद्य वस्तुओं की कोई कमी नहीं रहती। अतः सूखे के समय में भी हादजा लोगों के पास भोजन की कमी नहीं होती।

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पृष्ठ 25

क्रियाकलाप 4: आप क्या सोचते हैं कि प्राचीनतम मानव समाजों के जीवन के बारे में जानने के लिए ‘संजाति वृत्त’ सम्बन्धी वृत्तान्तों का इस्तेमाल करना, कितना उपयोगी अथवा अनुपयोगी है?
उत्तर:
प्राचीनतम मानव समाजों के जीवन के बारे में जानने के लिए ‘संजातिवृत्त’ सम्बन्धी वृत्तान्तों का प्रयोग करना – प्राचीनतम मानव समाजों के जीवन के बारे में जानने के लिए ‘संजातिवृत्त’ सम्बन्धी वृत्तान्तों का प्रयोग करना कितना उपयोगी है अथवा अनुपयोगी है। इस सम्बन्ध में दो विचारधाराएँ प्रचलित हैं –

(1) पहली विचारधारा – इस विचारधारा के समर्थक विद्वानों ने आज के शिकारी संग्राहक समाजों से प्राप्त तथ्यों तथा आंकड़ों का सीधे अतीत के अवशेषों की व्याख्या करने के लिए उपयोग कर लिया है। उदाहरणार्थ, कुछ पुरातत्त्वविदों का कहना है कि 20 लाख वर्ष पहले होमिनिड स्थल जो तुर्काना झील के किनारे स्थित है, सम्भवत: आदिकालीन मानवों के शिविर या निवास-स्थान थे, जहाँ वे सूखे के मौसम में आकर रहते थे। यह विशेषता वर्तमान हादजा तथा कुंगसैन समाजों में भी पाई जाती है।

(2) दूसरी विचारधारा – इस विचारधारा के समर्थक विद्वानों का मत है कि ‘संजातिवृत्त’ सम्बन्धी तथ्यों और आँकड़ों का उपयोग अतीत के समाजों के अध्ययन के लिए नहीं किया जा सकता है। उनके मतानुसार ये चीजें एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं। उदाहरण के लिए –

  • आज के शिकारी संग्राहक समाज शिकार और संग्रहण के साथ-साथ और अनेक आर्थिक क्रिया-कलापों में भी लगे रहते हैं।
  • ये जिन परिस्थितियों में रहते हैं, वे आरम्भिक मानव की अवस्था से बहुत भिन्न हैं।
  • आज के शिकारी-संग्राहक समाजों में आपस में भी बहुत भिन्नता है। वे सब समाज शिकार और संग्रहण को अलग-अलग महत्त्व देते हैं, उनके आकार तथा गतिविधियों में भी अन्तर पाया जाता है।
  • भोजन प्राप्त करने के सम्बन्ध में श्रम विभाजन को लेकर भी उनमें कोई आम सहमति नहीं है। अतः वर्तमान स्थिति के समाजों के आधार पर अतीत के बारे में कोई निष्कर्ष निकालना कठिन है।

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लघूत्तरात्मक प्रश्न 

प्रश्न 1.
पाठ्यपुस्तक के पृष्ठ 13 पर दिए गए सकारात्मक प्रतिपुष्टि व्यवस्था (Positive Feedback Mechanism) को दर्शाने वाले आरेख को देखिए। क्या आप उन निवेशों (Inputs) की सूची दे सकते हैं जो औजारों के निर्माण में सहायक हुए? औजारों के निर्माण से किन-किन प्रक्रियाओं को बल मिला?
उत्तर:
औजारों के निर्माण में सहायक निवेश – निम्नलिखित निवेश औजारों के निर्माण में सहायक सिद्ध हुए –

  1. मस्तिष्क के आकार और उसकी क्षमता में वृद्धि।
  2. दो पैरों पर खड़े होकर चलने की क्षमता के कारण औजारों के प्रयोग के लिए बच्चों व चीजों को ले जाने के लिए हाथों का मुक्त होना।
  3. सीधे खड़े होकर चलना।
  4. आँखों से निगरानी, भोजन और शिकार की तलाश में लम्बी दूरी तक चलना।
  5. सीधे दो पैरों पर चलने से शारीरिक ऊर्जा की खपत कम होने लगी।

प्रक्रियाएँ जिनको औजारों के निर्माण से बल मिला –

औजारों के निर्माण से निम्न प्रक्रियाओं को बल मिला –
(1) भोजन में सुधार – औजारों की सहायता से मांस को साफ कर लिया जाता था तथा उसे सुखा कर सुरक्षित रख लिया जाता था। इस प्रकार सुरक्षित रखे खाद्य को बाद में खाया जा सकता था।
(2) वस्त्र – कुछ जानवरों की खाल का कपड़ों के रूप में प्रयोग किया जाने लगा। सुई की सहायता से कपड़ों की सिलाई की जाने लगी।
(3) कला – छेनी या रुखानी जैसे छोटे-छोटे औजार बनाने के लिए तकनीक शुरू हो गई। इन नुकीले ब्लेडों से हड्डी, सींग, हाथीदाँत या लकड़ी पर नक्काशी करना या कुरेदना अब सम्भव हो गया।
(4) आत्मरक्षा – औजारों की सहायता से मनुष्य जंगली एवं हिंसक जानवरों से अपने जीवन की रक्षा करने में सफल हुआ।
(5) यातायात के साधन – पहिए के आविष्कार के फलस्वरूप बैलगाड़ियों का निर्माण किया जाने लगा, जिससे यातायात के साधनों का विकास हुआ।
(6) शिकार करना – औजारों के निर्माण से जानवरों को मारने अथवा शिकार करने के तरीकों में सुधार हुआ।

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प्रश्न 2.
मानव और लंगूर तथा वानरों जैसे स्तनपायियों के व्यवहार तथा शरीर रचना में कुछ समानताएँ पाई जाती हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि सम्भवतः मानव का क्रमिक विकास वानरों से हुआ।
(कं) व्यवहार और
(ख) शरीर रचना शीर्षकों के अन्तर्गत दो अलग-अलग स्तम्भ बनाइए और उन समानताओं की सूची दीजिए। दोनों के बीच पाये जाने वाले उन अन्तरों का भी उल्लेख कीजिए जिन्हें आप महत्त्वपूर्ण समझते हैं।
उत्तर:
मानव तथा लंगूर और वानरों जैसे स्तनपायियों के व्यवहार में निम्नलिखित समानताएँ पाई जाती हैं –
समानताएँ –
(क) व्यवहार

मानववानर तथा लंगूर
1. माताएँ अपने बच्चों को दूध पिलाती हैं।मादा वानर भी अपने बच्चों को दूध पिलाती हैं। वानर भी पेड़ों पर चढ़ सकते हैं।
2. मानव वृक्षों पर चढ़ सकता है।वानरों में भी सन्तान उत्पन्न करने की क्षमता है।
3. मानव में सन्तान उत्पन्न करने की क्षमता पाई जाती है।वानर भी लम्बी दूरी तक चल सकते हैं।
4. मानव लम्बी दूरी तक चल सकता है।वानर भी अपने बच्चों की सुरक्षा का ध्यान रखते हैं और अपनी सन्तानों से प्यार करते हैं।
5. मानव अपने बच्चों की सुरक्षा का ध्यान रखते हैं और उन्हें प्यार करते हैं।वानर तथा लंगूर

(ख) शरीर-रचना

मानववानर तथा लंगूर
1. मानव रीढ़धारी है।वानर भी रीढ़धारी है।
2. मादा मानव के बच्यों को दूध पिलाने हेतु स्तन होते हैं।मादा वानरों के बच्चों को दूध पिलाने हेतु स्तन होते हैं।
3. बच्चा पैदा होने से पहले अपेक्षाकृत दीर्घकाल तक वह माता के गर्भ में पलता है।बंच्चा पैदा होने से पहले वह अपेक्षाकृत दीर्घकाल तक मादा वानर के गर्भ में पलता है।
4. मानव के शरीर पर बाल होते हैं।लंगूर तथा वानर के शरीर पर भी बाल होते हैं।

(क) व्यवहार

मानववानर तथा लंगूर
1. मानव दो पैरों के बल चलता है।1. वानर चार पैरों के बल चलता है।
2. मानव खेती और पशुपालन का कार्य करते हैं।2. वानर खेती और पशुपालन का कार्य नहीं कर सकते।
3. मानव में औजार बनाने की विशेषताएँ होती हैं। उसके हाथों की रचना विशेष प्रकार की होती है।3. मनुष्य में औजार बनाने की जो विशेषताएँ होती हैं, वे वानरों में नहीं पाई जातीं।
4. मानव सीधे खडे होकर चल सकता है।4. वानर सीधे खड़े होकर नहीं चल सकते।

(ख) शरीर-रचना

मानववानर तथा लंगूर
मानव का शरीर वानरों से बड़ा होता है।वानरों का शरीर अपेक्षाकृत छोटा होता है।
मानव की पूँछ नहीं होती।वानरों की पूँछ होती है।
मानव के हाथ की पकड़ सशक्त होती है।वानर के हाथ की पकड़ अपेक्षाकृत कमजोर होती है
मानव का मस्तिष्क बड़ा होता है।वानर का मस्तिष्क छोटा होता है।

प्रश्न 3.
मानव उद्भव के क्षेत्रीय निरन्तरता मॉडल के पक्ष में दिए गए तर्कों पर चर्चा कीजिए। क्या आपके विचार से यह मॉडल पुरातात्विक साक्ष्य का युक्तियुक्त स्पष्टीकरण देता है?
उत्तर:
मानव उद्भव का क्षेत्रीय निरन्तरता मॉडल – मानव उद्भव के क्षेत्रीय निरन्तरता मॉडल के अनुसार आधुनिक मानव का विकास भिन्न-भिन्न प्रदेशों में रहने वाले होमो सैपियन्स से अलग-अलग समय में हुआ। आधुनिक मानव का विकास धीरे-धीरे तथा अलग-अलग गति से हुआ। इसीलिए आधुनिक मानव विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में अलग-अलग स्वरूप में दिखाई दिया।

यह तर्क इस बात पर आधारित है कि आज के मनुष्यों के विभिन्न लक्षण पाये जाते हैं। इस मॉडल के समर्थकों का कहना है कि ये असमानताएँ एक ही क्षेत्र में पहले से रहने वाले होमो एरेक्टस तथा होमो हाइंडल-बर्गेसिस समुदायों में पाई जाने वाली भिन्नताओं के कारण हैं। हमारे विचार में क्षेत्रीयता निरन्तरता मॉडल पुरातात्विक साक्ष्य का युक्तियुक्त स्पष्टीकरण देता है।

प्रश्न 4.
इनमें से कौनसी क्रिया के साक्ष्य व प्रमाण पुरातात्विक अभिलेख में सर्वाधिक मिलते हैं :
(क) संग्रहण
(ख) औजार बनाना
(ग) आग का प्रयोग।
उत्तर:
औजार बनाना – पुरातात्विक अभिलेख में संग्रहण, औजार बनाने और आग का प्रयोग क्रियाओं में औजार बनाने की क्रिया के साक्ष्य व प्रमाण सर्वाधिक मिलते हैं।

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यथा –

  1. आदि मानव द्वारा पत्थर के औजार बनाने और उनका प्रयोग करने का सबसे प्राचीन साक्ष्य इथियोपिया और केन्या के पुरास्थलों से मिला है। ये औजार सम्भवतः आस्ट्रेलोपिथिकस ने बनाए थे।
  2. ओल्डुवई नामक स्थान से प्राप्त आरम्भिक औजारों में एक गंडासा प्राप्त हुआ है, जिसके शल्कों को निकालकर धारदार बना दिया गया है।
  3. इसके अतिरिक्त दूसरा औजार एक हस्त – कुठार है।
  4. लगभग 35,000 वर्ष पहले ‘फेंककर मारने वाले भालों’ तथा ‘तीर-कमान’ जैसे नये प्रकार के औजार बनाए जाने लगे।
  5. सिलने के लिए सूई का आविष्कार भी हुआ । सिले हुए कपड़ों का सबसे पहला साक्ष्य लगभग 21,000 वर्ष पुराना है।
  6. इसके बाद ‘छेनी’ या ‘रुखानी’ जैसे छोटे-छोटे औजार बनाये जाने लगे। इन नुकीले ब्लेडों से हड्डी, सींग, हाथी- दाँत या लकड़ी पर नक्काशी करना सम्भव हो गया।

संक्षेप में निबन्ध लिखिए –

प्रश्न 5.
भाषा के प्रयोग से (क) शिकार करने और (ख) आश्रय बनाने के काम में कितनी मदद मिली होगी? इस पर चर्चा करिए। इन क्रिया-कलापों के लिए विचार सम्प्रेषण के अन्य किन तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता था?
उत्तर:
(क) भाषा के प्रयोग से शिकार करने में मदद मिलना-जीवित प्राणियों में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो भाषा के माध्यम से अपने विचारों को अभिव्यक्त कर सकता है। भाषा और कला दोनों ही सम्प्रेषण अर्थात् विचार – अभिव्यक्ति के माध्यम हैं। भाषा के प्रयोग

से शिकार करने में काफी मदद मिली होगी जिसका वर्णन निम्नानुसार है-
(1) लोग शिकार की योजना बना सकते थे।
(2) फ्रांस में स्थित लैसकाक्स और शोवे की गुफाओं में और स्पेन में स्थित आल्टामीरा की गुफा में जानवरों की सैकड़ों चित्रकारियाँ प्राप्त हुई हैं। विद्वानों के अनुसार जीवन में शिकार का महत्त्व होने के कारण जानवरों की चित्रकारियाँ धार्मिक क्रियाओं, रस्मों और जादू-टोनों से जुड़ी होती थीं। जानवरों का चित्रण इसलिए किया जाता था कि ऐसी रस्म का पालन करने से शिकार करने में सफलता मिले।
(3) लोग शिकार के तरीकों तथा तकनीकों पर एक-दूसरे से चर्चा कर सकते थे।
(4) वे विभिन्न क्षेत्रों में पाये जाने वाले जानवरों की जानकारी प्राप्त कर सकते थे।
(5) वे जंगली जानवरों से अपनी सुरक्षा के उपायों के बारे में विचार-विमर्श कर सकते थे।
(6) जंगली जानवरों का शिकार करते समय प्रस्तुत होने वाले खतरों के बारे में चर्चा कर सकते थे 1
(7) वे विभिन्न सरकार के जानवरों की प्रकृति एवं स्वभाव के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते थे (8) वे जानवरों के शिकार करते समय सुरक्षात्मक उपायों के बारे में आपस में विचार-विमर्श कर सकते थे।
(9) वे आवश्यकतानुसार नवीन औजारों का निर्माण कर सकते थे।
(10) वे जानवरों की आवाजाही के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते थे तथा उनका जल्दी से बड़ी संख्या में वध करने के तरीकों के बारे में चर्चा कर सकते थे।
(11) शिकारी लोग वर्षा के मौसम में तथा सूखे मौसम में शिकार के लिए उपयुक्त स्थानों पर अपने शिविर लगा सकते हैं।
(12) वे मारे गए पशुओं के मांस, खाल, हड्डियों आदि के उपयोग पर चर्चा कर सकते हैं।

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(ख) भाषा के प्रयोग से आश्रय बनाने में मदद मिलना – भाषा के प्रयोग से आश्रय बनाने में निम्नलिखित सुविधाएँ प्राप्त की जा सकती हैं-

  1. लोग जंगली जानवरों तथा मौसम की प्रतिकूलता से अपनी सुरक्षा के लिए उपयुक्त आश्रय स्थलों के निर्माण के बारे में आपस में चर्चा कर सकते थे।
  2. आश्रय स्थल के निर्माण के लिए पत्थरों और अन्य सामग्री के उपयोग के बारे में चर्चा की जा सकती थी।
  3. लोग आश्रय स्थल के निर्माण के लिए उपलब्ध औजारों में सुधार कर सकते थे तथा उनका उपयोग कर सकते थे।
  4. वे आश्रय-स्थल बनाने के लिए उपयुक्त सामग्री की जानकारी प्राप्त कर सकते थे।
  5. वे आश्रय स्थल बनाने के तरीकों तथा तकनीकों के बारे में परस्पर चर्चा कर सकते थे।
  6. वे आश्रय स्थल को अधिकाधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बनाने के उपायों पर विचार-विमर्श कर सकते थे।

(ग) विचार – सम्प्रेषण के अन्य तरीके- विचार – सम्प्रेषण के लिए चित्रकारी तथा संकेतों का प्रयोग भी किया जाता था। फ्रांस के लैसकाक्स और शोवे की गुफाओं में और स्पेन में स्थित आल्टामीरा की गुफाओं में जानवरों की अनेक चित्रकारियाँ पाई गई हैं। इनमें जंगली बैलों, घोड़ों- हिरनों, गैंडों, शेरों, भालुओं, तेन्दुओं, लकड़बग्घों और उल्लुओं के चित्र सम्मिलित हैं। इन चित्रों के माध्यम से मनुष्य ने अपने साथियों तथा आगे आने वाली पीढ़ियों को शिकार के तरीकों एवं तकनीकों का सन्देश दिया होगा।

प्रश्न 6.
अध्याय के अन्त में दिए गए प्रत्येक कालानुक्रम में से किन्हीं दो घटनाओं को चुनिए और यह बताइए कि इनका क्या महत्त्व है?
उत्तर:
कालानुक्रम-1 में से दो घटनाओं का विवरण –
1. होमिनाइड और होमिनिड की शाखाओं में विभाजन (64 लाख वर्ष पूर्व ) – लगभग 64 लाख वर्ष पूर्व होमिनिड वर्ग का होमिनाइड उपसमूह से विकास हुआ। होमिनाइडों का मस्तिष्क होमिनिडों की अपेक्षा छोटा होता था। संजीव पास बुक्स होमिनाइड चार पैरों के बल चलते थे, परन्तु उनके शरीर का अगला हिस्सा और अगले दोनों पैर लचकदार होते थे। परन्तु होमिनिड सीधे खड़े होकर पिछले दो पैरों के बल चलते थे। उनके हाथ विशेष प्रकार के होते थे जिनकी सहायता से वे औजार बना सकते थे तथा उनका प्रयोग कर सकते थे।

2. आस्ट्रेलोपिथिकस (56 लाख वर्ष पूर्व ) – ‘आस्ट्रेलोपिथिकस, होमिनिडों’ की शाखाओं में से एक होते हैं। इन शाखाओं को जीनस कहते हैं। होमिनिडों की दूसरी प्रमुख शाखा ‘होमो’ कहलाती है। आस्ट्रेलोपिथिकस का समय 56 लाख वर्ष पहले का माना जाता है। ‘आस्ट्रेलोपिथिकस’ दो शब्दों के मेल से बना है – लैटिन शब्द ‘आस्ट्रल’ अर्थात् ‘दक्षिणी’ तथा यूनानी भाषा के शब्द ‘पिथिकस’ अर्थात् वानर। यह नाम इसलिए दिया गया कि मानव के प्राचीन रूप में उसकी वानर अवस्था के अनेक लक्षण पाये जाते थे।

ये लक्षण निम्नलिखित थे –

  1. होमो की तुलना में उनके मस्तिष्क का आकार छोटा था।
  2. उनके पिछले दाँत बड़े थे।
  3. उनके हाथों की दक्षता सीमित थी।
  4. उनमें सीधे खड़े होकर चलने की क्षमता अधिक नहीं थी क्योंकि वे अभी भी अपना अधिकतर समय पेड़ों पर बिताते थे।

इसलिए उनमें पेड़ों पर जीवन व्यतीत करने के लिए आवश्यक अनेक विशेषताएँ अब भी विद्यमान थीं जैसे आगे के अंगों का लम्बा होना, हाथ और पैरों की हड्डियों का मुड़ा होना तथा टखने के जोड़ों का घुमावदार होना।

कालानुक्रम-2 में से दो घटनाओं का विवरण –
(1) आधुनिक मानव का प्रादुर्भाव – आधुनिक मानव (होमो सैपियन्स) एक चिन्तनशील और बुद्धिमान प्राणी माना जाता है। (होमो सैपियन्स के अस्तित्व के बारे में प्राचीनतम साक्ष्य हमें अफ्रीका के भिन्न-भिन्न भागों से मिले हैं। विद्वानों के अनुसार आधुनिक मानव का प्रादुर्भाव 1,95,000 से 1,60,000 वर्ष पूर्व हुआ था। इसके प्राचीनतम जीवाश्म इथियोपिया के ओमोकिबिश नामक स्थान से मिले हैं। आधुनिक मानव के मस्तिष्क का आकार बड़ा था। वह दो पैरों के बल सीधा खड़ा हो सकता था तथा सीधा चलता था। अपने हाथों की दक्षता के कारण वह औजार बना सकता था तथा उनका प्रयोग कर सकता था।

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(2) स्वर – तन्त्र का विकास – जीवित प्राणियों में मनुष्य ही एकमात्र प्राणी है, जिसकी अपनी भाषा है। उच्चरित भाषा से पहले गाने या गुनगुनाने जैसे मौखिक या अ-शाब्दिक संचार का प्रयोग होता था। होमो हैबिलिस के मस्तिष्क में कुछ ऐसी विशेषताएँ थीं, जिनके कारण उसके लिए बोलना सम्भव हुआ होगा । इस प्रकार सम्भवतः भाषा का विकास सबसे पहले 20 लाख वर्ष पूर्व शुरू हुआ। मस्तिष्क में हुए परिवर्तनों के अलावा स्वर-तंत्र का विकास भी उतना ही महत्त्वपूर्ण था। स्वर-तन्त्र का विकास लगभग 2,00,000 वर्ष पूर्व हुआ था। इसका सम्बन्ध विशेष रूप से आधुनिक मानव से रहा है।

समय की शुरुआत से JAC Class 11 History Notes

पाठ- सार

1. मानव का प्रादुर्भाव – विद्वानों के अनुसार 56 लाख वर्ष पहले पृथ्वी पर मानव का प्रादुर्भाव हुआ। आधुनिक मानव का जन्म 1,60,000 वर्ष पहले हुआ था।

2. मानव का विकास – मानव का विकास क्रमिक रूप से हुआ इस बात का साक्ष्य हमें मानव की उन प्रजातियों के जीवाश्मों से मिलता है जो अब लुप्त हो चुकी हैं। 24 नवम्बर, 1859 को चार्ल्स डार्विन की पुस्तक ‘ऑन दि ओरिजन ऑफ स्पीशीज’ प्रकाशित हुई जिसमें डार्विन ने बताया कि मानव का विकास बहुत समय पहले जानवरों से हुआ।

3. आधुनिक मानव के पूर्वज – लगभग 56 लाख वर्ष पहले होमिनिड प्राणियों का प्रादुर्भाव हुआ। इनका उद्भव अफ्रीका में हुआ था । होमिनिड समूह के प्राणियों की विशेषताएँ हैं –
(1) मस्तिष्क का बड़ा आका
(2) पैरों के बल सीधे खड़े होने की क्षमता
(3) दो पैरों के बल चलना
(4) हाथ की विशेष क्षमता जिससे वह औजार बना सकता था। होमिनिडों को कई शाखाओं (जीनस) में बाँटा जा सकता है। इनमें आस्ट्रेलोपिथिकस और होमो अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। आस्ट्रेलोपिथिकस और होमो के बीच मुख्य अन्तर उनके मस्तिष्क के आकार, जबड़े और दाँतों के सम्बन्ध में पाये जाते हैं।

4. आस्ट्रेलोपिथिकस – आस्ट्रेलोपिथिकस नाम लैटिन भाषा के शब्द ‘आस्ट्रल’ अर्थात् दक्षिणी तथा यूनानी भाषा के शब्द ‘पिथिकस’ अर्थात् ‘वानर’ से मिलकर बना है। होमो की अपेक्षा आस्ट्रेलोपिथिकस का मस्तिष्क छोटा होता था, पिछले दाँत बड़े होते थे तथा उसमें सीधे खड़े होकर चलने की क्षमता अधिक नहीं होती थी।

5. आदिकालीन मानव के अवशेषों को भिन्न-भिन्न प्रजातियों में वर्गीकृत करना – आदिकालीन मानव के अवशेषों को भिन्न-भिन्न प्रजातियों में वर्गीकृत किया गया है। इन प्रजातियों को प्रायः उनकी हड्डियों की रचना में पाए जाने वाले अन्तर के आधार पर एक-दूसरे से अलग किया गया है। उदाहरणार्थ, प्रारम्भिक मानवों की प्रजातियों को उनकी खोपड़ी के आकार और जबड़े की विशिष्टता के आधार पर विभाजित किया गया है।

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6. होमो – लगभग 25 लाख वर्ष पहले, ध्रुवीय हिमाच्छादन से जब पृथ्वी के बड़े-बड़े भाग बर्फ से ढक गए तो जलवायु तथा वनस्पति की स्थिति में भारी परिवर्तन आए । जंगल कम हो गए तथा जंगलों में रहने के अभ्यस्त आस्ट्रेलोपिथिकस के प्रारम्भिक रूप लुप्त होते गए तथा उनके स्थान पर उनकी दूसरी प्रजातियों का उद्भव हुआ जिनमें होमो के सबसे पुराने प्रतिनिधि सम्मिलित थे।

7. होमो की प्रजातियाँ – होमो लैटिन भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ है- ‘आदमी’। वैज्ञानिकों ने होमो को होमो हैबिलिस (औजार बनाने वाले), होमो एरेक्टस (सीधे खड़े होकर पैरों के बल चलने वाले) और होमो सैपियन्स (प्राज्ञ या चिन्तनशील मनुष्य) नामक विभिन्न प्रजातियों में बाँटा है। होमो हैबिलिस के जीवाश्म इथियोपिया में ओमो और तंजानिया में ओल्डुवई गोर्ज से प्राप्त हुए हैं।

होमो एरेक्टस के जीवाश्म अफ्रीका तथा एशिया दोनों महाद्वीपों में पाए गए हैं। एशिया में पाए गए जीवाश्म अफ्रीकी जीवाश्मों की तुलना में परवर्ती काल के हैं। संभवतः ही मीनिड पूर्वी अफ्रीका से चलकर दक्षिणी और उत्तरी अमरीका, दक्षिणी एशिया और शायद यूरोप में गए होंगे। यूरोप में मिले सबसे पुराने जीवाश्म होमो सैपियन्स प्रजाति के होमो हाइडलबर्गेसिस तथा होमोनिअंडरथलैसिस हैं।

8. विश्व में मानव प्रजातियों का निवास –

  • आस्ट्रेलोपिथिकस, प्रारम्भिक होमो तथा होमो एरेक्टस नामक मानव प्रजातियाँ अफ्रीका में सहारा के आसपास के प्रदेश में 50 लाख से 10 लाख वर्ष पूर्व तक निवास करती थीं।
  • होमो एरेक्टस, आद्य होमो सैपियन्स, निअंडरथल मानव, होमो सैपियन्स आधुनिक मानव अफ्रीका, एशिया और यूरोप के मध्य – अक्षांश क्षेत्र में 10 लाख से 40 हजार वर्ष पूर्व निवास करते थे।
  • आधुनिक मानव आस्ट्रेलिया में 45,000 वर्ष पूर्व तक निवास करता था।
  • बाद वाले निअंडरथल, आधुनिक मानव नामक प्रजातियाँ उच्च अक्षांश पर यूरोप तथा एशिया-प्रशान्त द्वीप – समूह तथा उत्तरी और दक्षिणी अमेरिकी रेगिस्तान और वर्षा वन में 40,000 वर्ष से अब तक निवास करती हैं।

9. आधुनिक मानव का उद्भव – क्षेत्रीय निरन्तरता मॉडल के अनुसार अनेक क्षेत्रों में अलग-अलग मनुष्यों की उत्पत्ति हुई है। प्रतिस्थापन मॉडल के अनुसार मनुष्य का उद्भव एक ही स्थान – अफ्रीका में हुआ था।

10. आधुनिक मानवों के प्राचीनतम जीवाश्म-

1. कहाँकब (वर्षों पहले)
2. इथियोपिया
ओमोकिबिश
1,95,000-1,60,000
3. दक्षिणी अफ्रीका
बार्डर गुफा
दी केल्डर्स
क्लासीज नदी का मुहाना
1,20,000-50,000
4. मोरक्को
दर एस सुल्तान
70,000-50,000
5. इजराइल
कफजेह स्खुल
100,000-80,000
6. आस्ट्रेलिया
मुंगो लेक (मुंगो झील)
45,000-35,000
7. बोर्नियो
नियाह गुफा
40,000
8. फ्रांस
क्रोमैगनन
लेस आइजीस के पास
35,000

11. आदिकालीन मानव का भोजन – आदिकालीन मानव कई तरीकों से अपना भोजन जुटाते थे जैसे संग्रहण, शिकार, मछली पकड़ना, अपमार्जन द्वारा अपने आप मरे या अन्य हिंसक जानवरों द्वारा मार दिये गए जानवरों की लाशों से मांस – मज्जा खुरचना।

12. आदिकालीन मानव का निवास स्थान- एक ही क्षेत्र में होमिनिड अन्य प्राइमेटों तथा मांसाहारियों के साथ निवास करते थे। पुरातत्त्वविदों का मत है कि पूर्व होमिनिड्स भी होमो हैबिलिस की भाँति जहाँ कहीं भी भोजन मिलता था, वहीं खा लेते थे। वे विभिन्न स्थानों पर सोते थे तथा अपना अधिकांश समय वृक्षों पर बिताते थे। 4,00,000 से 1,25,000 वर्ष पहले गुफाओं तथा खुले निवास-क्षेत्रों का प्रयोग किया जाता था। दक्षिणी फ्रांस कलेजले गुफा में 12×4 मीटर आकार का एक आश्रय स्थल मिला है। इसके अन्दर दो चूल्हों तथा विभिन्न भोजन-स्रोतों के प्रमाण मिले हैं।

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13. आदिकालीन मानव के औजार- आदिकालीन मानव द्वारा पत्थर के औजार बनाने तथा उनका प्रयोग किये जाने के प्रमाण इथियोपिया और केन्या के पुरास्थलों से प्राप्त हुए हैं। आस्ट्रेलोपिथिकस ने सम्भवतया सबसे पहले पत्थर के औजार बनाए थे। फेंककर मारने वाले भाले तथा तीर-कमान जैसे औजार बनाये जाने लगे। सिले हुए कपड़ों का सबसे पहला प्रमाण लगभग 21,000 वर्ष पुराना है। छेनी तथा रुखानी जैसे छोटे-छोटे औजार भी बनाये जाने लगे। इन नुकीले ब्लेडों से हड्डी, सींग, हाथीदाँत या लकड़ी पर नक्काशी करना या कुरेदना अब सम्भव हो गया।

14. भाषा और कला – जीवित प्राणियों में केवल मनुष्य ही भाषा का प्रयोग करता है। होमो हैबिलिस के मस्तिष्क में कुछ ऐसी विशेषताएँ थीं जिनके कारण उसके लिए बोलना सम्भव हुआ होगा। पहला विचार यह है कि, सम्भवतया भाषा का विकास सर्वप्रथम 20 लाख वर्ष पूर्व शुरू हुआ होगा। दूसरा विचार यह है कि, स्वर तंत्र का विकास 2 लाख वर्ष पहले हुआ था। तीसरा विचार यह है कि भाषा, कला के साथ-साथ लगभग 40,000-35000 साल पहले विकसित हुई।

15. उपसंहार – 10,000 से 4,500 वर्ष पहले तक लोगों ने कुछ जंगली पौधों का अपने उपयोग के लिए उगाना और जानवरों को पालतू बनाना सीख लिया। इसके परिणामस्वरूप खेती और पशु चारण कार्य उनकी जीवन-पद्धति का हिस्सा बन गया। अब लोगों ने गारे, कच्ची ईंटों तथा पत्थरों से स्थायी घर बना लिए। अब लोगों ने मिट्टी के बर्तन बनाना, नये प्रकार के औजारों का प्रयोग करना शुरू कर दिया।

16. काल-रेखा-1 (लाख वर्ष पूर्व)

1. 360-240 लाख वर्ष पूर्वनर-वानर (प्राइमेट); बन्दर एशिया और अफ्रीका में।
2. 240 लाख वर्ष पूर्व(अधिपरिवार) होमिनाइड; गिब्बन, एशियाई ओरांगउटान और अफ्रीकी वानर (गोरिल्ला, चिंपैंजी और बोनोबो ‘पिग्मी’ चिंपैंजी)।
3. 64 लाख वर्ष पूर्वहोमिनाइड और होमिनिड की शाखाओं में विभाजन।
4. 56 लाख वर्ष पूर्वआस्ट्रेलोपिथिकस।
5. 26-25 लाख वर्ष पूर्वपत्थर के सबसे पहले औजार।
6. 25-20 लाख वर्ष पूर्वअफ्रीका का ठण्डा और शुष्क होना, जिसके परिणामस्वरूप जंगलों में कमी और घास के मैदानों में वृद्धि हुई।
7 25-20 लाख वर्ष पूर्वहोमो
8. 22 लाख वर्ष पूर्वहोमो हैबिलिस
9. 18 लाख वर्ष पूर्वहोमो एरेक्टस
10. 13 लाख वर्ष पूर्वआस्ट्रेलोपिथिकस का विलुप्त होना
11. 8 लाख वर्ष पूर्व‘आद्य’ सैपियन्स, होमोहाइडलबर्गेसिस
12. 1.9-1.6 लाख वर्ष पूर्वहोमो सैपियन्स सैपियन्स (आधुनिक मानव)
काल-रेखा-2 (लाख वर्ष पूर्व)
1. दफनाने की प्रथा का सबसे पहला साक्ष्य3,00,000
2. होमो एरेक्टस का लोप2,00,000
3. स्वर-तन्त्र का विकास2 ,00000
4. नर्मदा घाटी, भारत में आद्य होमो सैपियन्स की खोपड़ी200,0O0-1 ,30,000
5. आधुनिक मानव का प्रादुर्भाव1,95,000-1 40,000
6. निअंडरथल मानव का प्रादुर्भाव1,30,000
7. चूल्हों के प्रयोग के विषय में सबसे पहला साक्ष्य1,25,000
8. निअंडरथल मानवों का लोप35,000
9. आग में पकाई गई चिकनी मिट्टी की छोटी-छोटी मूर्तियों का सबसे पहला प्रमाण27,000
10. सिलाई वाली सुई का आविष्कार21,000

JAC Class 11 History Solutions Chapter 10 मूल निवासियों का विस्थापन

Jharkhand Board JAC Class 11 History Solutions Chapter 10 मूल निवासियों का विस्थापन Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 11 History Solutions Chapter 10 मूल निवासियों का विस्थापन

Jharkhand Board Class 11 History मूल निवासियों का विस्थापन In-text Questions and Answers

पृष्ठ 219

क्रियाकलाप 1: यूरोपीय लोगों और अमरीकी मूल निवासियों के मन में एक-दूसरे की जो छवि थी तथा प्रकृति को देखने के जो उनके अलग-अलग तरीके थे, उन पर विचार करें।
उत्तर:
यूरोपीय लोगों तथा अमरीकी मूल निवासियों का एक-दूसरे के प्रति दृष्टिकोण
यूरोपीय लोगों तथा अमरीकी मूल निवासियों के एक-दूसरे के प्रति दृष्टिकोण का विवेचन निम्नानुसार है –

1. यूरोपीय लोगों द्वारा अमरीकी मूल निवासियों को ‘असभ्य’ समझना – अठारहवीं शताब्दी में पश्चिमी यूरोप के लोग सभ्य मनुष्य की तरह पहचान साक्षरता, संगठित धर्म तथा शहरीकरण के आधार पर ही करते थे। अतः उन्हें अमरीकी मूल निवासी ‘असभ्य’ प्रतीत हुए। इंग्लैण्ड के कवि वर्ड्सवर्थ ने अमरीकी मूल निवासियों के विषय में लिखा है कि, ” वे जंगलों में रहते हैं, जहाँ कल्पना – शक्ति के पास उन्हें भाव – सम्पन्न करने, उन्हें ऊँचा उठाने या परिष्कृत करने के अवसर बहुत कम हैं। ”

2. अमरीकी मूल निवासियों द्वारा यूरोपीय लोगों को लालची समझना – अमरीका के मूल निवासी यूरोपीय लोगों के साथ जिन चीजों का आदान-प्रदान करते थे, वे उनके लिए मित्रता में दिए गए ‘उपहार’ थे। इसके पीछे उनका कोई स्वार्थ संजीव पास बुक्स नहीं था, परन्तु धनी बनने की आशा में यूरोपीय लोगों के लिए मछली और रोएँदार खाल माल थे, जिन्हें वे यूरोप में बेच कर भारी मुनाफा कमाना चाहते थे। मूल निवासियों को सुदूर यूरोप में स्थित ‘बाजार’ का तनिक भी ज्ञान नहीं था।

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उनके लिए यह बात रहस्य बनी हुई थी कि यूरोपीय व्यापारी उनकी वस्तुओं के बदले में कभी तो उन्हें बहुत सारा सामान देते थे और कभी बहुत कम। वे यूरोपीय लोगों के लालच को देख कर दुःखी होते थे। मूल निवासियों की कई लोककथाओं में यूरोपीय लोगों का उपहास किया गया था और उनका वर्णन लालची तथा धूर्त के रूप में किया गया था। प्रचुर मात्रा में रोएंदार खाल प्राप्त क़रने के लिए उन्होंने सैकड़ों ऊदबिलावों की हत्या कर दी थी। इससे मूल निवासी बड़े परेशान थे। उन्हें डर था कि जानवर उनसे इस विनाश – लीला का बदला लेंगे।

3. जंगल के विषय में अलग-अलग दृष्टिकोण-मूल निवासियों ने उन मार्गों को चिन्हित किया, जो यूरोपीय लोगों के लिए अदृश्य थे। यूरोपीय लोग कटे हुए जंगलों के स्थान पर मक्के के खेत देखना चाहते थे। मूल निवासी अपनी आवश्यकताओं के लिए फसलें उगाते थे, न कि बिक्री और मुनाफे के लिए। वे जमीन का मालिक बनने को गलत मानते थे।

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क्रियाकलाप 2 : अमरीकी इतिहासकार होवर्ड स्पाडेक के इस कथन पर टिप्पणी करें : ” अमरीकी क्रान्तिका जो प्रभाव गोरे आबादकारों के लिए था, उससे ठीक विपरीत मूल निवासियों के लिए था – फैलाव सिकुड़न बन गया, लोकतन्त्र तानाशाही बन गया, सम्पन्नता विपन्नता बन गई और मुक्ति कैद बन गई। ”
उत्तर:
अमरीकी मूल निवासियों की दशा दयनीय थी। अमरीकी क्रान्ति से गोरे आबादकार ही लाभान्वित हुए। इसके परिणामस्वरूप गोरे लोगों का प्रशासन और राजनीति में वर्चस्व स्थापित हो गया। उनकी धन-सम्पन्नता में वृद्धि हुई और वे समाज तथा राजनीति में अत्यधिक प्रभावशाली एवं शक्तिशाली बन गए। परन्तु इसके विपरीत अमरीकी मूल निवासियों की दशा शोचनीय बनी रही। उनके लिए लोकतन्त्र तानाशाही बन गया, सम्पन्नता विपन्नता बन गई और मुक्ति कैद बन गई। मूल निवासी छोटे इलाकों में कैद कर दिए गए थे जिन्हें ‘रिजर्वेशन्स’ कहा जाता था। जार्जिया प्रान्त के लगभग 15000 चिरोकियों को उनकी जमीनों से बेदखल कर दिया गया।

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संयुक्त राज्य अमेरिका में लोकतान्त्रिक अधिकार ( राष्ट्रपति और कांग्रेस के प्रतिनिधियों के चुनाव में वोट देने का अधिकार) और सम्पत्ति का अधिकार दोनों केवल गोरे आबादकारों के लिए ही थे, मूल निवासियों के लिए नहीं। मूल निवासी अपनी संस्कृति को पूरी तरह से निभा नहीं सकते थे। उन्हें नागरिकता के अधिकारों से भी वंचित रखा जाता था । स्वास्थ्य एवं शिक्षा सुविधाएँ भी अपर्याप्त थीं।

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लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
दक्षिणी और उत्तरी अमरीका के मूल निवासियों के बीच के फर्कों से सम्बन्धित किसी भी बिन्दु पर टिप्पणी करिए।
उत्तर:
(i) दक्षिणी अमरीका का आधार कृषि था। वहाँ जमीन खेती के लिए बहुत उपजाऊ नहीं थी, इसलिए लोगों ने पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ीदार खेत बनाए और जल निकासी तथा सिंचाई की प्रणालियों का विकास किया। वहाँ खेती बड़े पैमाने पर की जाती थी। मक्का, आलू आदि प्रमुख फसलें थीं। उत्तरी अमरीका के लोगों ने बड़े पैमाने पर खेती करने का प्रयास नहीं किया। वे अपनी आवश्यकताओं से अधिक उत्पादन नहीं करते थे। वे मछली और मांस खाते थे और सब्जियाँ तथा मकई उगाते थे। वे प्रायः मांस की खोज में लम्बी यात्राओं पर जाया करते थे। मुख्य रूप से उन्हें ‘बाइसन’ अर्थात् उन जंगली भैंसों की तलाश रहती थी, जो घास के मैदानों में घूमते थे। परन्तु वे उतने ही जानवरों का वध करते थे, जितने की उन्हें भोजन के लिए आवश्यकता होती थी।

(ii) चूंकि उत्तरी अमेरिका के मूल निवासियों ने बड़े पैमाने पर खेती नहीं की और वे अधिशेष अन्न का उत्पादन नहीं करते थे। इसलिए वहाँ केन्द्रीय तथा दक्षिणी अमरीका की भाँति राजशाही तथा साम्राज्य का विकास नहीं हुआ। वे जमीन पर अपना स्वामित्व स्थापित करने की आवश्यकता अनुभव नहीं करते थे तथा उससे मिलने वाले भोजन और आश्रय से सन्तुष्ट थे दूसरी ओर दक्षिणी अमरीका में और मध्य अमेरिका में एजटेक, इंका आदि लोगों ने विशाल साम्राज्य स्थापित कर रखे थे। वे अपनी भूमि के लिए युद्ध करते थे।

प्रश्न 2.
आप उन्नीसवीं सदी के संयुक्त राज्य अमेरिका में अंग्रेजी के उपयोग के अतिरिक्त अंग्रेजों के आर्थिक और सामाजिक जीवन की कौनसी विशेषताएँ देखते हैं?
उत्तर:
(1) जमीन के प्रति यूरोपीय लोगों का दृष्टिकोण मूल निवासियों से अलग था। ब्रिटेन और फ्रांस से आए कुछ प्रवासी ऐसे थे जो छोटे पुत्र होने के कारण पिता की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी नहीं बन सकते थे। वे इसी कारण से अमरीका में जमीन के स्वामी बनना चाहते थे।

(2) संयुक्त राज्य अमरीका में जर्मनी, स्वीडन, इटली आदि देशों से ऐसे आप्रवासी भी बड़ी संख्या में आए, जिनकी जमीनें बड़े किसानों ने खरीद ली थीं। वे ऐसी जमीन चाहते थे जिसे वे अपना कह सकें।

(3) पोलैण्ड से आए लोगों को प्रेयरी चरागाहों में काम करना अच्छा लगता था जो उन्हें अपने देश के स्टेपीज (घास के मैदान) की याद दिलाते थे।

(4) यूरोपीय लोगों ने संयुक्त राज्य अमेरिका में बहुत कम मूल्य पर बड़ी सम्पत्तियाँ खरीद लीं। उन्होंने जमीन को साफ किया और खेती का विकास किया। उन्होंने धान, कपास आदि की फसलें उगाईं, जो यूरोप में नहीं उगाई जा सकती थीं। इन्हें यूरोप में ऊँचे मुनाफे पर बेचा जा सकता था।

(5) उन्होंने अपने खेतों को जंगली जानवरों से बचाने के लिए शिकार के द्वारा उनका सफाया कर दिया। 1873 में कंटीले तारों की खोज के पश्चात् वे इन जंगली जानवरों से पूर्णतया सुरक्षित हो गए।

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(6) अंग्रेजों ने संयुक्त राज्य अमेरिका में अपनी बस्तियों के विस्तार के लिए खरीदी गई जमीन से वहाँ के मूल निवासियों को हटा दिया। उन्होंने या तो बहुत कम कीमत देकर या धोखे से उनसे भूमि हथिया ली।

(7) उच्च अधिकारी मूल निवासियों की बेदखली को गलत नहीं मानते थे।

प्रश्न 3.
अमरीकियों के लिए ‘फ्रंटियर’ के क्या मायने थे?
उत्तर:
यूरोपीय द्वारा जीती गई तथा खरीदी गई भूमि के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका की पश्चिमी सीमा (फ्रंटियर) खिसकती रहती थी। इस सीमा के खिसकने के साथ-साथ मूल निवासी भी पीछे खिसकने के लिए विवश किए जाते थे। वे संयुक्त राज्य अमेरिका की जिस सीमा तक पहुँच जाते थे, उसे ‘फ्रंटियर’ कहा जाता था।

प्रश्न 4.
इतिहास की किताबों में आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों को शामिल क्यों नहीं किया गया था ?
उत्तर:
इतिहास की किताबों में आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों को शामिल नहीं किए जाने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे –
(i) इतिहासकारों को यूरोपीय लोगों की तुलना में आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों का निम्न कोटि का जीवन-स्तर, आर्थिक पिछड़ापन आदि आकर्षित नहीं कर सका।

(ii) इतिहासकार केवल यूरोपीय लोगों की उपलब्धियों से चकाचौंध थे और उनका वर्णन करना ही अपना कर्त्तव्य मानते थे। उन्होंने यह जानने का प्रयास ही नहीं किया कि आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के पास अपनी कथाओं, कपड़ासाजी, चित्रकारी, हस्तशिल्प के कौशल का विशाल भण्डार था और वह भण्डार आदर तथा अभिलेखन के योग्य था।

(iii) एक मूल निवासी द्वारा कैप्टन कुक की हत्या कर दिए जाने से यूरोपीय लोग नाराज थे। कैप्टन कुक की हत्या से उत्पन्न कटुता के कारण यूरोपवासियों ने आस्ट्रेलिया के विषय में जानकारी देने का प्रयत्न नहीं किया।

(iv) वे इस कारण भी मूल निवासियों से नाराज थे कि इंग्लैण्ड से केवल अपराधी लोग. आस्ट्रेलिया भेजे जाते थे और उनके कारावास पूरा होने पर ब्रिटेन वापस न लौटने की शर्त पर उन्हें आस्ट्रेलिया में स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करने की अनुमति दी गई थी। इन लोगों ने मूल निवासियों को जबरदस्ती उनकी जमीनों से निकालकर बाहर कर दिया । इससे नफरत का वातावरण पैदा होता चला गया। इस कारण भी यूरोपीय लोगों में मूल निवासियों के प्रति नाराजगी थी।

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निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 5.
लोगों की संस्कृति को समझाने में संग्रहालय की गैलरी में प्रदर्शित चीजें कितनी कामयाब रहती हैं? किसी संग्रहालय को देखने के अपने अनुभव के आधार पर सोदाहरण विचार करिए।
उत्तर:
लोगों की संस्कृति को समझाने में संग्रहालय की गैलरी में प्रदर्शित वस्तुओं का सहायक होना- किसी भी देश के लोगों की संस्कृति को समझने में संग्रहालय की गैलरी में प्रदर्शित वस्तुएँ बड़ी सहायक सिद्ध होती हैं। संग्रहालय में संजीव पास बुक्स विभिन्न प्रकार के औजार, हथियार, मिट्टी के बर्तन, विभिन्न प्रकार के सिक्के, मिट्टी, पत्थर और धातुओं की बनी हुई मूर्तियाँ, विभिन्न प्रकार के शिलालेख, विभिन्न प्रकार के वस्त्र, वेश-भूषाएँ, ग्रन्थ, चित्र आदि उपलब्ध होते हैं। इनकी सहायता से किसी भी देश के लोगों की संस्कृति के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। आस्ट्रेलिया की आदि संस्कृतियाँ इसका उदाहरण हैं। कक्ष हैं –

अलवर संग्रहालय – अलवर संग्रहालय की स्थापना 1940 में की गई थी। इस संग्रहालय में निम्नलिखित चार –
1. प्रथम कक्ष – प्रथम कक्ष में पत्थर की मूर्तियाँ और शिलालेख हैं।

2. द्वितीय कक्ष – द्वितीय कक्ष में विभिन्न शासकों के वस्त्र, चंवर, सिंगारदान, हाथीदाँत की पंखी, खिलौने, पीतल एवं मिट्टी के बर्तन, चाँदी से निर्मित मेज आदि कला के सुन्दर नमूने उपलब्ध हैं।

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3. तृतीय कक्ष – तृतीय कक्ष में हस्तशिल्प कला की अनेक वस्तुएँ जैसे विभिन्न कलाकारों द्वारा बनाए गए चित्र आदि उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त इसमें ‘शाहनामा’, ‘कुरानशरीफ’, ‘अकबरनामा’, ‘नल-दमयन्ती’ आदि अनेक ग्रन्थ विद्यमान हैं।

4. चतुर्थ कक्ष- इस कक्ष में विभिन्न शासकों एवं योद्धाओं की तलवारें, बन्दूकें, नागफांस, बाघनख आदि अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र विद्यमान हैं। संग्रहालय में प्रदर्शित वस्तुओं से किसी भी देश के लोगों के रहन-सहन, वेश-भूषा, धार्मिक विश्वासों, विभिन्न कलाओं, चित्रकला, मूर्तिकला, हस्तशिल्प कला आदि के बारे में जानकारी मिलती है। इनसे लोगों की आर्थिक स्थिति, कला के स्तरों, राजनीतिक स्थिति, विभिन्न शासकों तथा उनकी उपलब्धियों आदि के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है।

प्रश्न 6.
कैलिफोर्निया में चार लोगों के बीच 1880 में हुई किसी मुलाकात की कल्पना कीजिए। ये चार लोग हैं – एक अफ्रीकी गुलाम, एक चीनी मजदूर, गोल्ड रश के चक्कर में आया हुआ एक जर्मन और होपी कबीले का एक मूल निवासी। उनकी बातचीत का वर्णन करिए।
उत्तर:
कैलिफोर्निया संयुक्त राज्य अमेरिका का एक राज्य है। कैलिफोर्निया में चार लोग साथ – साथ रहते थे। इन चार लोगों के बीच प्रायः सबकी छुट्टी के बिना आपसी बातचीत होती रहती थी। इन चार लोगों के बीच 1880 में मुलाकात हुई। ये चार लोग थे –
(1) एक अफ्रीकी गुलाम – जोजेफ
(2) एक चीनी मजदूर – यू-मिन
(3) गोल्ड रश के चक्कर में आया हुआ एक जर्मन व्यापारी – मार्शल
(4) होपी कबीले का एक मूल निवासी बॉव।

उनकी बातचीत का वर्णन निम्नानुसार है –
1. अफ्रीकी गुलाम – जोसेफ – 1861 में दास प्रथा का उन्मूलन हो चुका था। इसलिए अब वह एक स्वतंत्र दास था। वह मार्शल से कहता है कि आप 1850 ई. में अमेरिका आ गये थे। यहाँ आकर आपने सोने के व्यापार से अच्छा लाभ कमाया और एक धनी व्यक्ति हो गए। आपका मकान शानदार तथा सभी सुख-सुविधाओं वाला है। आप एक सहृदय व्यक्ति हैं । इसलिए आप इतने धनी होने के बावजूद हमें कभी-कभी अपने यहाँ दावत पर बुला लेते हैं।

2. चीनी मजदूर – यू मिन- मैं भी जोसेफ के विचारों से पूर्णतः सहमत हूँ कि इतने धनी होने पर भी मार्शल साहब मेरे जैसे रेल विभाग में एक मजदूर के रूप में काम करने वाले व्यक्ति अपने यहाँ दावत पर बुला लेते हैं। आज के युग में हमारे जैसे गरीब को कौन पूछता है ?

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3. एक मूल निवासी – बॉव- मेरे पास तो मार्शल साहब की इंसानियत को बखान करने के लिए शब्द ही नहीं हैं। एक दिन मेरी पत्नी अधिक बीमार हो गई, उसे तुरन्त अस्पताल ले जाने हेतु मेरे पास न तो धन था और न गाड़ी। तभी मार्शल साहब यहाँ आकर अपनी कार में मेरी पत्नी को अस्पताल ले गए और उन्होंने बिना बताए उसके इलाज हेतु पैसे भी जमा कर दिए। मैं और मेरा परिवार आपके इस कर्ज को अदा नहीं कर सकता। मार्शल साहब, आप इंसान नहीं देवता हैं।

4. मार्शल – मुझे कैलीफोर्निया आए लगभग 30 वर्ष हो गए हैं और अब मैं अपने मूल देश के बारे में बहुत कुछ भूल चुका हूँ। आप लोगों ने यहाँ मुझे इतना प्यार दिया है कि मैं यहाँ का ही होकर रह गया हूँ। आप लोगों की सेवा करने से मुझे आनंद मिलता है। मैं वास्तव में बहुत खुशकिस्मत हूँ कि मुझे आप जैसे सच्चे मित्र मिले हैं। हमारी मित्रता सदा बनी रहे, यही ईश्वर से कामना है।

मूल निवासियों का विस्थापन JAC Class 11 History Notes

पाठ-सार

1. यूरोपीय साम्राज्यवाद – सत्रहवीं शताब्दी के बाद स्पेन और पुर्तगाल के अमरीकी साम्राज्य का विस्तार नहीं हुआ। दूसरी ओर फ्रांस, हालैण्ड तथा इंग्लैण्ड आदि देशों ने अपनी व्यापारिक गतिविधियों का विस्तार करना तथा अमरीका, अफ्रीका एवं एशिया में अपने उपनिवेश बसाना शुरू कर दिया था। दक्षिण एशिया में कंपनियों ने अपने को राजनीतिक सत्ता का रूप दिया।

स्थानीय शासकों को हराकर पुरानी व्यवस्था को कायम रखते हुए भू-स्वामियों से कर वसूला तथा व्यापारिक लाभ हेतु रेलवे, खदानों तथा बागानों का विकास किया। दक्षिणी अफ्रीका को छोड़कर शेष सम्पूर्ण अफ्रीका में यूरोपवासी सब जगह समुद्र तटों पर ही व्यापार करते रहे। इसके बाद कुछ यूरोपीय देशों में अपने उपनिवेशों के रूप में अफ्रीका का बँटवारा करने का समझौता हुआ। इन उपनिवेशों की राजभाषा अंग्रेजी थी। ( कनाडा को छोड़ कर जहाँ फ्रांसीसी भी एक राज – भाषा है ।)

2. उत्तरी अमरीका – उत्तरी अमरीका का महाद्वीप उत्तर ध्रुवीय वृत्त से लेकर कर्करेखा तक और प्रशान्त महासागर से अटलांटिक महासागर तक फैला है। कनाडा का 40 प्रतिशत क्षेत्र जंगलों से ढका है। वहाँ कई क्षेत्रों में तेल, गैस और खनिज संसाधन उपलब्ध हैं। वहाँ अनेक बड़े उद्योग हैं तथा गेहूँ, मकई, फल बड़े पैमाने पर पैदा किए जाते हैं।

3. उत्तरी अमरीका के मूल निवासी- उत्तरी अमरीका के सबसे पहले निवासी 30,000 वर्ष पहले बेरिंग स्ट्रेट्स के आर-पार फैले एशिया से आए और 10,000 वर्ष पहले अन्तिम हिमयुग के दौरान वे दक्षिण की ओर बढ़े। वे लोग नदी – घाटी के साथ-साथ बने गाँवों में समूह बनाकर रहते थे। वे मछली और मांस खाते थे तथा सब्जियाँ और मकई उगाते थे। उन्होंने बड़े पैमाने पर खेती करने का कोई प्रयास नहीं किया। उनके बीच औपचारिक सम्बन्ध थे। वे परस्पर मित्रता स्थापित करते थे तथा उपहारों का आदान-प्रदान करते थे। वे कुशल कारीगर थे और सुन्दर वस्त्र पहनते थे।

4. यूरोपियनों से मुकाबला – 17वीं सदी में यूरोपीय लोग उत्तरी अमेरिकी तट पर पहुँचे। ये लोग मछली और रोएंदार खाल के व्यापार के लिए आए थे। इसमें उन्हें शिकार कुशल देसी लोगों की ओर से अपेक्षित मदद मिली। देसी लोग अपने कबीलों में बने हस्तशिल्पों के बदले कंबल, लोहे के बर्तन, बंदूकें और शराब प्राप्त करते थे। जल्दी ही वे शराब की आदत के शिकार हो गए। इसने यूरोपीय व्यापारियों को उन पर शर्तें थोपने में सक्षम बताया।

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5. पारस्परिक धारणाएँ – यूरोपियन लोगों को अमरीका के मूल निवासी ‘असभ्य’ या उदात्त उत्तम जंगली प्रतीत हुए। यूरोपीय लोग वहाँ से मछली और रोएँदार खाल प्राप्त कर यूरोप में बेचना चाहते थे और मुनाफा कमाना चाहते थे। बहुत से यूरोपीय लोग धार्मिक अत्याचारों से बचने के लिए यूरोप छोड़ कर अमरीका में आकर बस गए। कनाडा तथा संयुक्त राज्य अमरीका 18वीं सदी के अन्त में अस्तित्व में आए। अमरीका ने कई विशाल क्षेत्रों को खरीद लिया तथा उसने युद्ध में दक्षिणी अमरीका का अधिकांश भाग मैक्सिको से जीत लिया। संयुक्त राज्य अमरीका की पश्चिमी सरहद खिसकती रहती थी और जैसे-जैसे यह खिसकती जाती, मूल निवासी भी पीछे खिसकने को बाध्य किए जाते।

दक्षिण अमरीका के बागान – मालिकों ने अफ्रीका से दास खरीदे। दास-प्रथा विरोधी समूहों के विरोध के चलते वहाँ दासों के व्यापार पर तो रोक लग गई, परन्तु जो अफ्रीकी संयुक्त राज्य अमरीका में थे, वे और उनके बच्चे दास ही बने रहे। 1861-65 में अमरीका में दास प्रथा को जारी रखने वाले और उसे समाप्त करने की वकालत करने वाले राज्यों के बीच युद्ध हुआ जिसमें दासता – विरोधियों की जीत हुई। दास-प्रथा समाप्त कर दी गई।

6. अपनी जमीन से मूल निवासियों की बेदखली – जब अमरीका ने अपनी बस्तियों का विस्तार करना शुरू किया, तो मूल निवासियों को वहाँ से हटने के लिए प्रेरित या बाध्य किया गया। उन्हें जमीनों की जो कीमतें दी गईं, वे बहुत कम थीं। 1832 में अमेरिका के राष्ट्रपति जैक्सन ने चिरोकी कबीले के लोगों को अपनी जमीन से हटाकर | विस्तृत अमरीकी भूमि की ओर खदेड़ने के लिए अमरीकी सेना भेज दी। जिन 15,000 लोगों को वहाँ से हटने पर बाध्य किया गया, उनमें से एक-चौथाई मौत के मुँह में चले गए।

8. गोल्ड रश और उद्योगों में वृद्धि – 1840 में संयुक्त राज्य अमरीका के कैलीफोर्निया में सोने के कुछ चिन्ह मिले। इसने ‘गोल्ड रश’ को जन्म दिया। हजारों लोग अपने भाग्य – निर्माण की आशा में अमरीका पहुँचे। इसके चलते पूरे महाद्वीप में रेलवे लाइनों का निर्माण हुआ जिसके लिए हजारों चीनी मजदूरों की नियुक्ति हुई। संयुक्त राज्य अमरीका तथा कनाडा में औद्योगिक नगरों का विकास हुआ और अनेक कारखानों की स्थापना हुई। बड़े पैमाने पर खेती का भी विस्तार हुआ।

9. संवैधानिक अधिकार – अमेरिका के संविधान में व्यक्ति के ‘सम्पत्ति के अधिकार’ को शामिल किया गया, जिसे रद्द करने की छूट राज्य को नहीं थी। परन्तु लोकतान्त्रिक अधिकार और सम्पत्ति का अधिकार दोनों केवल गोरे लोगों के लिए थे।

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10. परिवर्तन की लहर – 1934 में इण्डियन री आर्गेनाइजेशन एक्ट पारित किया गया जिसके द्वारा रिजर्वेशन्स में मूल निवासियों को जमीन खरीदने तथा ऋण लेने का अधिकार प्राप्त हुआ। 1954 में अनेक मूल निवासियों ने अपने द्वारा तैयार किए गए ‘डिक्लेरेशन ऑफ इण्डियन राइट्स’ में इस शर्त के साथ संयुक्त राज्य अमरीका की नागरिकता स्वीकार की कि उनके रिजर्वेशन्स वापस नहीं लिए जायेंगे और उनकी परम्पराओं में हस्तक्षेप नहीं किया जायेगा।

11. आस्ट्रेलिया – 18वीं सदी के अन्तिम दौर में आस्ट्रेलिया में मूल निवासियों के 350 से 750 तक समुदाय थे। हर समुदाय की अपनी भाषा थी। आस्ट्रेलिया के प्रारम्भिक अधिकांश आबादकार इंग्लैण्ड से निर्वासित होकर आए थे और उनके कारावास की सजा पूरी होने पर ब्रिटेन न लौटने की शर्त पर उन्हें आस्ट्रेलिया में स्वतन्त्र जीवन जीने की अनुमति दे दी गई थी। उन्होंने खेती के लिए ली गई जमीन से मूल निवासियों को निकालना शुरू कर दिया।

12. परिवर्तन की लहर – आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की संस्कृतियों का अध्ययन करने हेतु विश्वविद्यालयी विभागों की स्थापना हुई है। कला – दीर्घाओं में देशी कलाओं की दीर्घाएँ शामिल की गई हैं। अब मूल निवासियों ने अपने जीवन – इतिहासों को लिखना शुरू किया है। 1974 से ‘बहुसंस्कृतिवाद’ आस्ट्रेलिया की राजकीय नीति रही है, जिसने मूल निवासियों की संस्कृतियों और यूरोप तथा एशिया के आप्रवासियों की तरह – तरह की बहुसंस्कृतियों को समान आदर दिया है।

VI. महत्त्वपूर्ण तिथियाँ तथा घटनाएँ

तिथिकनाडा
1701क्यूबेक के मूल निवासियों के साथ फ्रांसीसियों का समझौता
1763क्यूबेक पर ब्रिटेन की विजय
1774क्यूबेक एक्ट
1791कनाडा संवैधानिक एक्ट
1837फ्रांसीसी कनाडाई विद्रोह
1840उच्चतर और निम्नतर कनाडा की कैनेडियन यूनियन
1859कनाडा गोल्ड रश
1867कनाडा महासंघ
1869-85कनाडा में मेटिसों द्वारा रेड रिवर विद्रोह
1876कनाडा इण्डियन्स एक्ट
1885पार-महाद्वीपीय रेलवे के द्वारा पूर्वी और पश्चिमी तटों का जुड़ाव

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JAC Class 11 History Solutions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

Jharkhand Board JAC Class 11 History Solutions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 11 History Solutions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

Jharkhand Board Class 11 History औद्योगिक क्रांति In-text Questions and Answers

पृष्ठ 198

क्रियाकलाप 1 : अठारहवीं शताब्दी में इंग्लैण्ड और विश्व के अन्य भागों में हुए उन परिवर्तनों एवं विकास क्रमों पर चर्चा कीजिए जिनसे ब्रिटेन में औद्योगीकरण को प्रोत्साहन मिला।
उत्तर:
ब्रिटेन में औद्योगीकरण को प्रोत्साहन मिलना-ब्रिटेन में औद्योगीकरण को प्रोत्साहन देने वाले परिवर्तन एवं विकास क्रम निम्नलिखित थे-
(1) सम्पूर्ण देश में एक ही कानून व्यवस्था, एक ही मुद्रा प्रणाली तथा एक ही बाजार व्यवस्था का होना- इंग्लैण्ड की राजनीतिक स्थिति सुदृढ़ एवं स्थिर थी। सम्पूर्ण देश में एक ही कानून व्यवस्था, एक ही मुद्रा- प्रणाली और एक ही बाजार – व्यवस्था थी। इस बाजार व्यवस्था में स्थानीय प्राधिकरणों का कोई हस्तक्षेप नहीं था।

सत्रहवीं शताब्दी के संजीव पास बुक्स अन्त तक आते-आते, मुद्रा का प्रयोग विनिमय अर्थात् आदान-प्रदान के माध्यम के रूप में होने लगा था। तब तक लोग अपनी कमाई, वस्तुओं की अपेक्षा, मजदूरी और वेतन के रूप में पाने लगे। इससे लोगों को अपनी आय से खर्च करने के लिए अधिक विकल्प मिल गए और वस्तुओं की बिक्री के लिए बाजार का विस्तार हो गया।

JAC Class 11 History Solutions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

(2) कृषि क्रांति – अठारहवीं शताब्दी में इंग्लैण्ड एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजरा था जिसे ‘कृषि क्रान्ति’ के नाम से पुकारा जाता है। बड़े जमींदारों ने छोटे-छोटे खेत खरीद लिए और अपने बड़े फार्मों में मिला लिए। इससे खाद्य उत्पादन की वृद्धि हुई। इससे भूमिहीन किसानों, चरवाहों एवं पशुपालकों को अपने जीवन-निर्वाह के लिए शहरों में जाना पड़ा।

(3) नगरों का विकास- ब्रिटेन में अनेक नगरों का विकास हुआ और नगरों की जनसंख्या में काफी वृद्धि हो गई। यूरोप के जिन 19 शहरों की आबादी सन् 1750 से 1800 ई. के बीच दोगुनी हो गई थी, उनमें से 11 शहर ब्रिटेन में थे। अतः जनसंख्या बढ़ने से वस्तुओं की माँग बढ़ी जिससे उद्योगपतियों को अधिकाधिक माल तैयार करने की प्रेरणा मिली। इन शहरों में लन्दन सबसे बड़ा शहर था जो देश के बाजारों का केन्द्र था।

(4) भूमण्डलीय व्यापार का केन्द्र हो जाना – 18वीं शताब्दी तक आते-आते भूमण्डलीय व्यापार का केन्द्र इटली तथा फ्रांस के भूमध्यसागरीय बन्दरगाहों से हटकर हालैण्ड और ब्रिटेन के अटलान्टिक बन्दरगाहों पर आ गया था। लन्दन अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए ऋण – प्राप्ति के प्रधान स्रोत के रूप में एमस्टरडम का स्थान ले चुका था। वह इंग्लैण्ड, अफ्रीका और वेस्ट इण्डीज के बीच स्थापित त्रिकोणीय व्यापार का केन्द्र भी बन गया।

(5) नौ-यातायात की सुविधा – इंग्लैण्ड की नदियों के सभी नौचालनीय भाग समुद्र से जुड़े हुए थे, इसलिए नदी पोतों के द्वारा ढोया जाने वाला माल समुद्र तटीय जहाजों तक सरलता से ले जाया जा सकता था।

(6) बैंकों का विकास – इंग्लैण्ड में बैंकों का विकास हो चुका था। देश की वित्तीय प्रणाली का केन्द्र बैंक ऑफ इंग्लैण्ड था। 1784 तक इंग्लैण्ड में कुल मिलाकर एक सौ से अधिक प्रान्तीय बैंक थे। बड़े-बड़े औद्योगिक उद्यम स्थापित करने तथा चलाने के लिए आवश्यक वित्तीय साधन इन्हीं बैंकों द्वारा उपलब्ध कराए जाते थे।

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(7) कारखानों के लिए श्रमिकों व पूँजी की उपलब्धता – इंग्लैण्ड में गाँवों से आए अनेक गरीब लोग नगरों में कारखानों में काम करने के लिए उपलब्ध हो गए थे। वहाँ बड़े-बड़े उद्योग-धन्धे स्थापित करने के लिए आवश्यक ऋण- राशि उपलब्ध कराने के लिए बैंक भी विद्यमान थे। वहाँ परिवहन के लिए एक अच्छी व्यवस्था उपलब्ध थी।

(8) विभिन्न आविष्कार – इंग्लैण्ड में 18वीं शताब्दी में अनेक आविष्कार हुए जिनके कारण लोहा उद्योग, वस्त्र उद्योग, भाप की शक्ति तथा रेल मार्गों के विकास आदि में अनेक परिवर्तन हुए।

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क्रियाकलाप 2 : आइरन ब्रिज गोर्ज आज एक प्रमुख विरासत स्थल है। क्या आप बता सकते हैं क्यों?
उत्तर:
इंग्लैण्ड में लोहे के उत्पादन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण उन्नति हुई। 1709 में प्रथम डर्बी ने धमन भट्टी का आविष्कार किया। द्वितीय डर्बी ने ढलवाँ लोहे से पिटवाँ लोहे का विकास किया। हेनरी कोर्ट ने आलोडन भट्टी तथा बेल मिल का आविष्कार किया। 1779 में तृतीय डर्बी ने विश्व में पहला लोहे का पुल कोलब्रुक डेल में सेर्वन नदी पर बनाया।

विल्किनसन ने पानी की पाइपें पहली बार ढलवाँ लोहे से बनाईं। उसके बाद लोहा उद्योग कुछ विशेष क्षेत्रों में केन्द्रित हो गया। यह क्षेत्र ‘आइरन ब्रिज’ नामक गाँव के रूप में विकसित हुआ। यह आज एक प्रमुख विरासत स्थल है क्योंकि यह देश की अर्थव्यवस्था का एक सुदृढ़ आधार है। यह स्थान बड़े पैमाने पर आम लोहे के उत्पादन के रूप में प्रसिद्ध है। इसके कारण इंग्लैण्ड की राष्ट्रीय पूँजी में वृद्धि हुई और बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ।

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क्रियाकलाप 3 : औद्योगीकरण के प्रारम्भ में ब्रिटिश शहरों और गाँवों पर पड़ने वाले प्रभावों पर विचार करें और इसकी तुलना ठीक उसी प्रकार की परिस्थितियों में भारत के सन्दर्भ में करें।
उत्तर:
औद्योगीकरण के प्रारम्भ में ब्रिटिश शहरों और गाँवों पर प्रभाव – औद्योगीकरण के प्रारम्भ में ब्रिटिश शहरों और गाँवों पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े –
(1) नगरों की जनसंख्या बढ़ गई परन्तु गाँवों की जनसंख्या कम हो गई। गाँवों के लोग रोजगार की तलाश में शहरों की ओर भागने लगे। परिवार विघटित हो गए।

(2) नगरों में रहने वालों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा। नगरों में सफाई, शुद्ध जल और शुद्ध वातावरण का अभाव हो गया। बाहर से आकर नये बसे लोगों को नगरों में कारखानों के आस-पास भीड़-भाड़ वाली गन्दी बस्तियों में रहना पड़ा। धनवान लोग नगर छोड़ कर आस-पास के उपनगरों में साफ-सुथरे मकान बनाकर रहने लगे जहाँ की हवा स्वच्छ थी और पीने का पानी भी साफ एवं सुरक्षित था।

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(3) नगरों में वेतनभोगी मजदूरों की औसत अवधि नगरों में रहने वाले अन्य सामाजिक समूहों के जीवन काल से कम थी। नए औद्योगिक नगरों में गाँव से आकर रहने वाले लोग ग्रामीण लोगों की तुलना में काफी छोटी आयु में मर जाते थे। ये मौतें हैजा, आंत्रशोथ, क्षय रोग आदि से होती थीं।

(4) नगरों में कारखानों में काम करने वाले बच्चों और स्त्रियों की दशा अत्यन्त शोचनीय थी। कारखानों में काम करते समय बच्चे दुर्घटनाग्रस्त हो जाते थे। उन्हें बहुत थोड़ी मजदूरी दी जाती थी तथा उन्हें साधारण-सी गल्ती करने पर बुरी तरह पीटा जाता था। स्त्रियों के बच्चे पैदा होते ही या शैशवावस्था में ही मर जाते थे और उन्हें विवश होकर शहर की घिनौनी व गन्दी बस्तियों में रहना पड़ता था। भारत के सन्दर्भ में तुलना – औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप भारत के नगरों की जनसंख्या काफी बढ़ गई। कोयला और लोहा उत्पादन करने वाले केन्द्रों के आस-पास बड़े – बड़े नगर बस गए।

रोजगार की तलाश में गाँव वालों को शहरों में आना पड़ा जिससे अनेक गाँव उजड़ गए। गाँवों में प्रचलित कुटीर उद्योग-धन्धे नष्ट हो गए तथा वहाँ और गरीब फैल गई। संयुक्त परिवार विघटित होते चले गए। पूँजीपतियों द्वारा मजदूरों का शोषण करने से उनकी स्थिति शोचनीय हो गई। जीवन निर्वाह करने के लिए स्त्रियों और बच्चों को भी कारखानों में काम करना पड़ा जिसके फलस्वरूप अनेक समस्याएँ उत्पन्न हुईं। भारत में अधिकांश कारखानों के स्वामी विदेशी पूँजीपति थे। अतः भारत का विपुल धन इंग्लैण्ड भेजा गया जिससे भारत में पूँजी का अभाव हो गया और देश में गरीबी तथा बेकारी में वृद्धि हुई।

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क्रियाकलाप 4 : उद्योगों में काम की परिस्थितियों के बारे में बनाए गए सरकारी विनियमों के पक्ष और विपक्ष में अपनी दलीलें दें।
उत्तर-कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की दशा सुधारने के लिए सरकार ने निम्नलिखित नियम बनाए –
(1) 1819 में कुछ कानून बनाए गए जिनके तहत नौ वर्ष से कम की आयु वाले बच्चों से फैक्ट्रियों में काम करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। 9 से 16 वर्ष की आयु वाले बच्चों से काम कराने की सीमा 12 घण्टे तक सीमित कर दी गई।

(2) 1833 के अधिनियम के अन्तर्गत 9 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों को केवल रेशम की फैक्ट्रियों में काम पर लगाने की अनुमति दी गई, बड़े बच्चों के लिए काम के घण्टे सीमित कर दिए गए। कुछ फैक्टरी निरीक्षकों की व्यवस्था की गई ताकि अधिनियम के प्रवर्तन और पालन को सुनिश्चित किया जा सके।

(3) 1847 में ‘दस घण्टा विधेयक’ परित किया गया जिसके अन्तर्गत स्त्रियों और युवकों के लिए काम के घण्टे सीमित कर दिये और पुरुष श्रमिकों के लिए 10 घण्टे का दिन निश्चित कर दिया।

(4) 1842 के खान और कोयला खान अधिनियम के अन्तर्गत दस वर्ष से कम आयु के बच्चों और स्त्रियों से खानों में नीचे काम लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।

(5) फील्डर्स फैक्टरी अधिनियम ने 1847 में यह कानून बना दिया कि 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों और स्त्रियों से 10 घण्टे प्रतिदिन से अधिक काम न लिया जाए।

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पक्ष में तर्क –

  • कारखानों में मजदूरों के काम करने के घण्टे निश्चित करने से उन्हें राहत मिली।
  • अब पूँजीपति अपनी इच्छानुसार मजदूरों से निर्धारित अवधि से अधिक समय तक काम नहीं ले सकते थे।
  • कारखानों में इन्स्पेक्टर नियुक्त किये गए जो सरकारी नियमों का पालन करवाते थे 1

विपक्ष में तर्क –

  1. मजदूरों के लिए 10 घण्टे का दिन निश्चित करना अधिक था।
  2. 1819 के कानून में इसका पालन कराने के लिए आवश्यक अधिकारियों की व्यवस्था नहीं की गई थी।
  3. उनके लिए अच्छे वेतन, बीमा, पेंशन आदि की व्यवस्था नहीं की गई ।
  4. कारखानों में छोटे बच्चों के काम करने पर पूर्ण प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया । (5) 1842 से पूर्व खानों में मजदूरों के लिए नियम नहीं बनाए गए।
  5. निरीक्षक अपना काम ईमानदारी से नहीं करते थे । उनका वेतन बहुत कम था और कारखानों के मालिक उन्हें रिश्वत देकर उनका मुँह बन्द कर देते थे।

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लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
ब्रिटेन 1793 से 1815 तक कई युद्धों में लिप्त रहा। इसका ब्रिटेन के उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
युद्धों का ब्रिटेन के उद्योगों पर प्रभाव – ब्रिटेन 1793 से 1815 तक कई युद्धों में लिप्त रहा। इसका ब्रिटेन के उद्योगों पर निम्न प्रभाव पड़े –
(i) इन युद्धों के कारण जो पूँजी निवेश के लिए उधार ली गई थी, वह युद्ध लड़ने में खर्च की गई। युद्ध का 35 प्रतिशत तक खर्च लोगों की आय पर कर लगाकर पूरा किया जाता था। कामगारों तथा श्रमिकों को कारखानों और खेतों में से निकाल कर उन्हें सेना में भर्ती कर लिया जाता था। परिणामस्वरूप कारखानों में उत्पादन का काम ठप हो गया । खाद्य सामग्रियों के दाम अत्यधिक बढ़ गए।

(ii) महाद्वीपीय नाकाबन्दी के कारण ब्रिटिश व्यापार को काफी क्षति पहुँची। ब्रिटेन से निर्यात होने वाला अधिकांश सामान ब्रिटेन के व्यापारियों की पहुँच से बाहर हो गया। इससे अनेक कारखाने बन्द हो गए और हजारों लोग बेरोजगार हो गए। आवश्यक वस्तुओं के दाम बहुत अधिक बढ़ गए।

प्रश्न 2.
नहर और रेलवे परिवहन के सापेक्षिक लाभ क्या-क्या हैं ?
उत्तर:
I. नहर के सापेक्षिक लाभ – नहर के सापेक्षिक लाभ निम्नलिखित हैं-
(1) नहरें कोयले को शहरों तक ले जाने में बड़ी सहायक सिद्ध हुईं। कोयले को उसके परिमाण तथा भार के कारण सड़क मार्ग से ले जाने में समय बहुत लगता था और उस पर धन खर्च भी अधिक आता था। परन्तु कोयले को बज़रों में भर कर नहरों के मार्ग से ले जाने में समय भी कम लगता था तथा खर्चा भी कम आता था।

(2) प्राय: नहरें बड़े-बड़े जमींदारों द्वारा अपनी जमीनों पर स्थित खानों, खदानों या जंगलों के मूल्य को बढ़ाने के लिए बनाई जाती थीं। नहरों के आपस में जुड़ जाने से नये-नये शहरों में बाजार बन गए। इससे अनेक शहरों का विकास हुआ। बर्मिंघम शहर का विकास केवल इसीलिए तेजी से हुआ क्योंकि वह लन्दन, ब्रिस्टल चैनल और मरसी तथा हंबर नदियों के साथ जुड़ने वाली नहर प्रणाली के बीच में स्थित था।

II. रेलवे परिवहन के सापेक्षिक लाभ – रेलवे परिवहन के सापेक्षिक लाभ निम्नलिखित हैं-
(1) रेलवे परिवहन एक ऐसा साधन है, जो वर्ष भर उपलब्ध रहता है । यह सस्ता तथा तेज भी है। इससे माल देश के भीतरी भागों में भी पहुँचाया जा सकता है, जो नहरों द्वारा सम्भव नहीं है।
(2) रेलवे परिवहन माल तथा यात्री दोनों को ढो सकता है।
(3) नहरों के रास्ते परिवहन में अनेक समस्याएँ हैं । नहरों के कुछ हिस्सों में जलपोतों की भीड़-भाड़ के कारण परिवहन की गति धीमी पड़ जाती है और पाले, बाढ़ या सूखे के कारण उनके उपयोग का समय भी सीमित हो जाता है। परन्तु रेलवे परिवहन में यह समस्या नहीं है। इसलिए, रेलमार्ग ही परिवहन का सबसे सुविधाजनक विकल्प दिखाई दे रहा है।

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प्रश्न 3.
इस अवधि में किए गए ‘आविष्कारों’ की दिलचस्प विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर:
यह पता लगाना अवश्य ही दिलचस्प होगा कि वे लोग कौन थे जिनके प्रयत्नों से ये परिवर्तन हुए। उनमें से कुछ लोग प्रशिक्षित वैज्ञानिक थे। चूँकि इन आविष्कारों को सम्पन्न करने के लिए भौतिकी या रसायन विज्ञान के उन सिद्धान्तों या नियमों की पूर्ण जानकारी होना आवश्यक नहीं था जिन पर ये आविष्कार आधारित थे, इसलिए ये वैज्ञानिक आविष्कार प्रतिभाशाली परन्तु अन्तःप्रज्ञ विचारकों तथा लगनशील प्रयोगकर्ताओं द्वारा किए गए। थीं – आविष्कारों की दिलचस्प विशेषताएँ – इस अवधि में किए गए आविष्कारों की दिलचस्प विशेषताएँ अग्रलिखित –

  1. इस अवधि में अधिकतर आविष्कार वैज्ञानिक ज्ञान के अनुप्रयोग की अपेक्षा दृढ़ता, लगन, रुचि, जिज्ञासा तथा भाग्य के बल पर हुए।
  2. कपास उद्योग के क्षेत्र में कुछ आविष्कारक जैसे जॉन के तथा जेम्स हारग्रीव्ज बुनाई और बढ़ईगीरी से परिचित थे। परन्तु रिचर्ड आर्कराइट एक नाई था तथा बालों की विग बनाता था।
  3. सैम्युल क्राम्पटन तकनीकी दृष्टि से कुशल नहीं था।
  4. एडमंड कार्टराइट ने साहित्य, आयुर्विज्ञान तथा कृषि का अध्ययन किया था। प्रारम्भ में वह पादरी बनना चाहता था और वह यान्त्रिकी के बारे में बहुत कम जानता था।
  5. भाप के इंजनों के क्षेत्र में थामस सेवरी नामक व्यक्ति एक सैन्य अधिकारी था।
  6. थॉमस न्यूकोमेन एक लुहार तथा तालासाज था। जेम्स वाट का यन्त्र सम्बन्धी कामकाज की ओर बहुत झुकाव था। उन सबमें अपने-अपने आविष्कार के प्रति कुछ संगत ज्ञान अवश्य था।
  7. सड़क निर्माता जान मेटकाफ, जिसने व्यक्तिगत रूप से सड़कों की सतहों का सर्वेक्षण किया था और उनके बारे में योजना बनाई थी, अन्धा था।
  8. नहर निर्माता जेम्स ब्रिंडले स्वयं निरक्षर था। शब्दों की ‘वर्तनी’ के बारे में उसका ज्ञान इतना कमजोर था कि वह ‘नौ – चालन’ शब्द की सही वर्तनी कभी नहीं बता सका। परन्तु उसमें अद्भुत स्मरण शक्ति, कल्पना – शक्ति तथा एकाग्रता थी।

प्रश्न 4.
बताइए कि ब्रिटेन के औद्योगीकरण के स्वरूप पर कच्चे माल की आपूर्ति का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
ब्रिटेन के औद्योगीकरण के स्वरूप पर कच्चे माल की आपूर्ति का प्रभाव – ब्रिटेन निवासी सदैव ऊन और सन से कपड़ा बुना करते थे। सत्रहवीं शताब्दी से इंग्लैण्ड भारत से सूती कपड़ा आयात करता था। परन्तु जब भारत पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित हो गया, तो इंग्लैण्ड ने कपड़े के साथ-साथ कच्चे कपास (रुई) का आयात करना भी शुरू कर दिया। इसे इंग्लैण्ड में आने पर काता जाता था और उससे कपड़े बुने जाते थे।

कच्चे माल के रूप में इंग्लैण्ड को आवश्यक कपास का आयात करना पड़ता था और जब उनसे कपड़ा तैयार हो जाता, तो उसका अधिकांश भाग बाहर निर्यात किया जाता था। इसके लिए इंग्लैण्ड के पास अपने उपनिवेश होना आवश्यक था जिससे कि इन उपनिवेशों से कच्ची कपास बड़ी मात्रा में मंगाई जा सके और फिर इंग्लैण्ड में उससे कपड़ा बनाकर उन्हीं उपनिवेशों के बाजारों में बेचा जा सके। इस प्रकार औद्योगीकरण के फलस्वरूप इंग्लैंड में कच्चे माल की आपूर्ति उपनिवेशों से होने लगी।

निबन्धात्मक प्रश्न 

प्रश्न 5.
ब्रिटेन में स्त्रियों के भिन्न-भिन्न वर्गों के जीवन पर औद्योगिक क्रान्ति का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
ब्रिटेन में स्त्रियों के भिन्न-भिन्न वर्गों के जीवन पर औद्योगिक क्रान्ति का प्रभाव ब्रिटेन में स्त्रियों के भिन्न-भिन्न वर्गों के जीवन पर औद्योगिक क्रान्ति के निम्नलिखित प्रभाव पड़े –

(1) निर्धन वर्ग की स्त्रियों द्वारा कारखानों में काम करना – पुरुषों को कारखानों में साधारण मजदूरी मिलती थी जिससे अकेले घर का खर्च नहीं चल सकता था। अतः परिवार का खर्चा चलाने के लिए निर्धन वर्ग की स्त्रियों को भी कारखानों में काम करना पड़ा। कारखानों में उन्हें निरन्तर कई घन्टों तक कठोर अनुशासन में रहते हुए काम करना पड़ता था।

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उद्योगपति, पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों और बच्चों को अपने कारखानों में भर्ती करना अधिक पसन्द करते थे क्योंकि उनकी मजदूरी कम होती थी तथा वे कठिन और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी शान्तिपूर्वक अपना काम करते थे। स्त्रियों और बच्चों को लंकाशायर और यार्कशायर नगरों के सूती कपड़ा उद्योग में बड़ी संख्या में काम पर लगाया जाता था। रेशम, फीते बनाने और बुनने के उद्योग-धन्धों में और बर्मिंघम के धातु उद्योगों में स्त्रियों को ही अधिकतर नौकरियाँ दी जाती थीं।

(2) स्त्रियों की दयनीय स्थिति-कारखानों में काम करने वाली स्त्रियों की स्थिति बड़ी दयनीय थी। पुरुष मजदूरों की तुलना में उन्हें कम वेतन दिया जाता था। पुरुष मजदूरों को प्रति सप्ताह 25 शिलिंग मज़दूरी दी जाती थी, परन्तु स्त्रियों को केवल 7 शिलिंग मजदूरी ही दी जाती थी। साधारण-सी गलती करने पर स्त्रियों को दण्डित किया जाता संजीव पास बुक्स था। उन्हें कारखानों में गन्दे वातावरण में काम करना पड़ता था। प्रायः उनके बच्चे पैदा होते ही मर जाते थे या शैशवावस्था में ही मर जाते थे। उन्हें विवश होकर शहर की घिनौनी एवं गन्दी बस्तियों में रहना पड़ता था। उनका पारिवारिक जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। मिश्रित परिवार टूट गए और एकल परिवार बन गए। अब उनका पारिवारिक जीवन नीरस हो गया।

(3) मध्यम वर्ग व धनी वर्ग की स्त्रियों पर प्रभाव – मध्यम वर्ग एवं धनी वर्ग की स्त्रियाँ औद्योगिक क्रान्ति से लाभान्वित हुईं। उनके रहन-सहन, खान-पान, वस्त्रादि में परिवर्तन आ गया । अब उन्हें रेडियो, सिनेमा, टेलीविजन आदि के रूप में मनोरंजन के नये साधन प्राप्त हुए। अब उनका जीवन-स्तर काफी उन्नत हो गया। अब वे विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करने लगीं तथा सुन्दर वस्त्रों, आभूषणों एवं सौन्दर्य प्रसाधनों का प्रयोग करने लगी। अब घूमने और भ्रमण करने के लिए उन्हें मोटर गाड़ियों, रेलों, वायुयानों आदि की सुविधा भी उपलब्ध हो गई थी।

प्रश्न 6.
विश्व के भिन्न-भिन्न देशों में रेलवे आ जाने से वहाँ के जन-जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा? तुलनात्मक विवेचना कीजिए
उत्तर:
विश्व के भिन्न-भिन्न देशों में रेलवे आ जाने से वहाँ के जन-जीवन पर प्रभाव –

(अ) औद्योगिक एवं साम्राज्यवादी देशों के जीवन पर प्रभाव – रेल मार्ग परिवहन का सबसे अधिक सुविधाजनक साधन था। रेलवे के आ जाने से शक्तिशाली, औद्योगिक तथा साम्राज्यवादी देश बड़े लाभान्वित हुए। इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, जापान आदि अनेक देशों का कायाकल्प हो गया। रेलों के विकास के कारण इन देशों के व्यापार-वाणिज्य और उद्योग-धन्धों का विकास अत्यधिक हुआ। राष्ट्रीय पूँजी में वृद्धि हुई। इन देशों ने कच्चा माल प्राप्त करने तथा अपना तैयार माल बेचने के लिए अपने उपनिवेश स्थापित कर लिए।

परिणामस्वरूप ये अपना तैयार माल उपनिवेशों में भेजकर भारी मुनाफा कमाने लगे। रेलवे मार्ग से सामान का आयात-निर्यात करना अधिक सुगम व सस्ता था, इसलिए विदेशी माल अन्य यूरोपीय देशों से सस्ता पड़ता था। इससे ब्रिटिश उद्योगपतियों का खूब लाभ हुआ और औद्योगीकरण की प्रक्रिया तेज हो गई। अतः रेलवे के आ जाने से इन देशों की आर्थिक स्थिति अत्यन्त सुदृढ़ हो गई। इन देशों के लोगों का जीवन- स्तर उन्नत हो गया और उन्हें सभी प्रकार की भौतिक सुख-सुविधाएँ आसानी से मिलने लगीं।

(ब) अफ्रीका व एशिया महाद्वीप के देशों पर प्रभाव – इसके विपरीत जिन देशों में रेलों का विकास नहीं किया गया, वे देश आर्थिक क्षेत्र में पिछड़ गए। अफ्रीका, एशिया आदि महाद्वीपों के अनेक देशों में रेलों का आगमन नहीं हुआ। परिणामस्वरूप वे वाणिज्य – व्यापार एवं उद्योगों के क्षेत्र में उन्नति नहीं कर सके। औद्योगिक एवं साम्राज्यवादी देश उनका आर्थिक शोषण करते रहे। इसके परिणामस्वरूप वहाँ गरीबी तथा बेरोजगारी में वृद्धि हुई। वे अपने जीवन-स्तर को उन्नत बनाने में असफल रहे और अनेक प्रकार की रूढ़ियों तथा अन्धविश्वासों के शिकार हो गए।

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औद्योगिक क्रांति JAC Class 11 History Notes

पाठ-सार

1. औद्योगिक क्रान्ति – ब्रिटेन में, 1780 के दशक और 1850 के दशक के बीच उद्योग और अर्थव्यवस्था का जो रूपान्तरण हुआ, उसे ‘प्रथम औद्योगिक क्रान्ति’ के नाम से पुकारा जाता है। ब्रिटेन में औद्योगिक विकास का यह चरण नयी मशीनों एवं तकनीकियों से गहराई से जुड़ा है।
2. इंग्लैण्ड में सर्वप्रथम औद्योगिक क्रान्ति का सूत्रपात – इंग्लैण्ड में ही सर्वप्रथम औद्योगिक क्रान्ति का सूत्रपात हुआ।

इसके कारण थे –

  1. इंग्लैण्ड की राजनीतिक स्थिति सुदृढ़ थी।
  2. मुद्रा का प्रयोग विनिमय के रूप में होने लगा था।
  3. इंग्लैण्ड में कृषि क्रान्ति सम्पन्न हो चुकी थी।
  4. नगरों का विकास हो गया था तथा नगरों की जनसंख्या में काफी वृद्धि हो गई थी।
  5. लन्दन व्यापार का प्रमुख केन्द्र बन गया था।
  6. इंग्लैण्ड में बैंकों का विकास हो चुका था।
  7. प्रौद्योगिक परिवर्तनों की श्रृंखला।
  8. नवीन परिवहन तन्त्र का विकास।

3. कोयले एवं लोहे के क्षेत्र में परिवर्तन –

  • 1709 में अब्राहम डर्बी ने धमनभट्टी का आविष्कार किया जिसमें सर्वप्रथम कोक का प्रयोग किया गया।
  • हेनरी कोर्ट ने आलोडन भट्टी और बेलन मिल का आविष्कार किया।
  • 1779 में तृतीय डर्बी ने विश्व में पहला लोहे का पुल बनाया।
  • ब्रिटेन ने लौह उद्योग में 1800 से 1830 के दौरान अपने उत्पादन को चौगुना बढ़ा लिया।

4. कपास की कताई और बुनाई – 18वीं सदी में कपास की कताई व बुनाई के क्षेत्र में हुए निम्न प्रमुख आविष्कारों से कताई-बुनाई का कार्य कताईगरों और बुनकरों से हटकर कारखानों में चला गया –

  • 1733 में जॉन के ने फ्लाइंग शटल लूम (उड़न तुरी करघे) का आविष्कार किया।
  • 1765 में जेम्स हारग्रीव्ज ने स्पिन्निंग जैनी नामक मशीन का आविष्कार किया।
  • 1769 में रिचर्ड आर्क राइट ने वाटर फ्रेम नामक मशीन बनाई।
  • 1779 में सैम्युल क्राम्पटन ने ‘म्यूल’ नामक मशीन का आविष्कार किया।
  • 1787 में एडमंड कार्ट राइट ने पॉवर लूम का आविष्कार किया।

5. भाप की शक्ति – 1712 में थॉमस न्यूकामेन ने भाप का इंजन बनाया। 1769 में जेम्स वाट ने भाप के इंजन का आविष्कार किया। अब भाप का इंजन एक साधारण पंप की बजाय एक प्रमुख चालक (मूवर) के रूप में काम देने लगा, जिससे कारखानों में शक्ति चालित मशीनों को ऊर्जा मिलने लगी।

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6. नहरें-प्रारंभ में नहरें कोयले को शहरों तक ले जाने के लिए बनाई गईं क्योंकि इनमें कम समय व कम खर्च होता था। 1761 में जेम्स ब्रिंडली ने इंग्लैण्ड में पहली नहर ‘वर्सली कैनाल’ बनाई। 1760 से 1790 की अवधि में नहरें बनाने की 25 नई परियोजनाएं शुरू की गईं।

7. रेलें –
(1) 1801 में रिचर्ड ट्रेविथिक ने एक इंजन का निर्माण किया। 1814 में जार्ज स्टीफेन्सन ने एक रेल इंजन बनाया जिसे ‘ब्लुचर’ कहा जाता था।
(2) रेलवे के आविष्कार के साथ औद्योगीकरण की सम्पूर्ण प्रक्रिया ने दूसरे चरण में प्रवेश कर लिया। 1830 से 1850 के बीच ब्रिटेन में रेल मार्ग कुल मिलाकर दो चरणों में लगभग 6000 मील लम्बा हो गया।

8. परिवर्तित जीवन-

  • औद्योगीकरण से ब्रिटिश पूँजी निवेशकों को भारी लाभ हुआ। उनकी पूँजी कई गुना बढ़ी।
  • धन में, माल, आय, सेवाओं, ज्ञान और उत्पादन कुशलता के रूप में वृद्धि हुई।
  • लेकिन इससे गरीब लोगों को भारी खामियाजा उठाना पड़ा।

9. मजदूर –

  • जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि हुई।
  • बाहर से आकर बसे लोगों को नगरों में कारखानों के आस-पास भीड़-भाड़ वाली गन्दी बस्तियों में रहना पड़ा।
  • नये औद्योगिक नगरों में गाँवों से आकर रहने वाले लोग ग्रामीण लोगों की तुलना में काफी छोटी आयु में मर जाते थे।
  • मौतें अधिकतर हैजा, आन्त्रशोथ, क्षय-रोग आदि बीमारियों से होती थीं।

10. औरतें, बच्चे और औद्योगीकरण –

  • मजदूरी मामूली होने के कारण, स्त्रियों और बच्चों को भी कारखानों में काम करना पड़ता था। स्त्रियों और बच्चों को लंकाशायर तथा यार्कशायर नगरों के सूती वस्त्र उद्योग में बड़ी संख्या में काम पर लगाया जाता था।
  • बच्चों से कई-कई घण्टों तक काम लिया जाता था। कई बार बच्चों के बाल मशीनों में फँस जाते थे या उनके हाथ कुचल जाते थे।
  • कोयले की खानों में भी छोटे बच्चों को ‘ट्रैपर’ का काम करना पड़ता था।
  • स्त्रियों को औद्योगिक काम की वजह से विवश होकर शहर की गंदी बस्तियों में रहना पड़ता था।

11. विरोध आन्दोलन –
(1) इंग्लैण्ड में कारखानों में काम करने की कठोर परिस्थितियों के विरुद्ध राजनीतिक विरोध बढ़ता गया और श्रम-जीवी लोग मताधिकार प्राप्त करने के लिए आन्दोलन करने लगे। परन्तु, सरकार ने दमनकारी नीति अपनाते हुए लोगों से विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार ही छीन लिया।

(2) सरकार की दमनकारी नीति के बावजूद श्रमिक लोगों ने आन्दोलन जारी रखा। 1790 के दशक में सम्पूर्ण देश में खाद्य (ब्रेड) के लिए दंगे होने लगे। उन्होंने ब्रेड के भण्डारों पर अधिकार कर लिया और उन्हें काफी कम मूल्य में बेचा जाने लगा।

(3) कपड़ा उद्योगों में मशीनों के प्रचलन से हजारों की संख्या में हथकरघा बुनकर बेरोजगार हो गए।

(4) हताश होकर सूती कपड़ों के बुनकरों ने लंकाशायर में पावरलूमों को नष्ट कर दिया।

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(5) जनरल नेडलुड के नेतृत्व में लुडिज्म नामक एक अन्य आन्दोलन चलाया गया। लुडिज्म के अनुयायी मशीनों की तोड़-फोड़ में ही विश्वास नहीं करते थे, बल्कि न्यूनतम मजदूरी, नारी एवं बाल श्रम पर नियन्त्रण, बेरोजगार लोगों के लिए काम और मजदूर संघ बनाने के अधिकारों की भी माँग करते थे।

12. कानूनों के द्वारा सुधार –

(1) 1819 में सरकार ने कुछ कानून बनाए जिनके अन्तर्गत 9 वर्ष से कम की आयु वाले बच्चों से कारखानों में काम करवाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।

(2) 9 से 16 वर्ष की आयु वाले बच्चों में काम करने की सीमा 12 घण्टे तक सीमित कर दी गई।

(3) 1833 में एक अधिनियम पारित किया गया जिसके अन्तर्गत 9 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों को केवल रेशम की फैक्ट्रियों में काम पर लगाने की अनुमति दी गई, बड़े बच्चों के लिए काम के घण्टे सीमित कर दिये गए और कुछ फैक्ट्री निरीक्षकों की व्यवस्था कर दी गई। 1847 में एक अन्य विधेयक पारित किया गया जिसके अन्तर्गत यह व्यवस्था की गई कि 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों और स्त्रियों से 10 घण्टे प्रतिदिन से अधिक काम न लिया जाए।

औद्योगिक क्रांति के विषय में तर्क-वितर्क –

  • दरअसल औद्योगीकरण की प्रक्रिया इतनी धीमी गति से रही कि इसे क्रांति कहना ठीक नहीं होगा।
  • ब्रिटेन में औद्योगिक विकास 18145 से पहले की अपेक्षा उसके बाद अधिक तेजी से हुआ। इसका कारण औद्योगीकरण के साथ – साथ युद्ध भी रहे।
  • इस काल में हुआ रूपान्तरण केवल आर्थिक व औद्योगिक क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि इसका विस्तार समाज के सर्वहारा वर्ग तथा बुर्जुआ वर्ग तक रहा। इसलिए इस क्रांति को केवल औद्योगिक नहीं कहा जा सकता।