JAC Class 11 Geography Important Questions Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति

Jharkhand Board JAC Class 11 Geography Important Questions Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति Important Questions and Answers.

JAC Board Class 11 Geography Important Questions Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति

बहु-विकल्पी प्रश्न (Multiple Choice Questions)

प्रश्न – दिए चार वैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर चुनिए
1. भारत में पौधों की कितनी जातियां हैं?
(A) 42,000
(B) 45,000
(C) 47,000
(D) 50,000.
उत्तर:
(C) 47,000.

2. डैल्टा प्रदेशों में किस प्रकार की वनस्पति मिलती है?
(A) कोणधारी
(B) मानसून
(C) कंटीली झाड़ियां
(D) मैंग्रोव।
उत्तर:
(D) मैंग्रोव।

3. हिमालय पर्वत की कौन-सी ढलान पर घने वन हैं?
(A) उत्तरी
(B) पूर्वी
(C) पश्चिमी
(D) दक्षिणी।
उत्तर:
(D) दक्षिणी।

4. ऊष्ण कटिबन्ध में तापमान किस मात्रा से कम नहीं होता?
(A) 35°C
(B) 30°C
(C) 28°C
(D) 18°C.
उत्तर:
(D) 18°C.

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5. किस राज्य में वनों के अधीन क्षेत्र सबसे अधिक है?
(A) मानसून
(B) मेघालय
(C) उष्ण कटिबन्धीय सदाहरित
(D) बिहार।
उत्तर:
(C) ऊष्ण कटिबन्धीय सदाहरित।

6. सिनकोना वृक्ष किस वनस्पति से सम्बन्धित हैं?
(A) उष्ण कटिबन्धीय सदाहरित
(B) मानसून
(C) ज्वारीय
(D) टुंड्रा
उत्तर:
(A) उष्ण कटिबन्धीय सदाहरित

7. किन वनों में हाथी अधिक पाए जाते हैं?
(A) मानसून
(B) पतझड़ीय
(C) उष्ण कटिबन्धीय सदाहरित
(D) शुष्क।
उत्तर:
(C) ऊष्ण कटिबन्धीय सदाहरित।

8. देवदार वृक्ष किस ऊंचाई पर मिलते हैं?
(A) 500-1000 मीटर
(B) 1000-1500 मीटर
(C) 1500-3000 मीटर
(D) 3000-4000 मीटर।
उत्तर:
(C) 1500-3000 मीटर|

9. कौन – सी जाति खानाबदोश है?
(A) पिग्मी
(C) मसाई
(B) बकरवाल
(D) रैड इण्डियन
उत्तर:
(B) बकरवाल।

10. रायल बंगाल टाइगर कहां मिलता है?
(A) महानदी डेल्टा
(B) कावेरी डेल्टा
(C) सुन्दर वन
(D) कृष्णा डैल्टा।
उत्तर:
(C) सुन्दर वन।

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11. गिर वन किसके लिए प्रसिद्ध है?
(A) चूहों के लिए
(B) गधों
(C) ऊंट
(D) शेर
उत्तर:
(D) शेर।

12. इनमें से कौन – सा पक्षी आश्रय स्थल है?
(A) कान्हासिली
(C) कावल
(B) भरतपुर
(D) शिवपुरी।
उत्तर:
(B) भरतपुर।

13. पहला जैव- आरक्षित क्षेत्र कहां स्थगित किया गया?
(A) नीलगिरी
(B) सिमलीपाल
(C) नाकरेक
(D) पंचमड़ी।
उत्तर:
(A) नीलगिरी।

14. रबड़ का सम्बन्ध किस प्रकार की वनस्पति से है?
(A) टुण्ड्रा
(B) हिमालय
(C) मैंग्रोव
(D) उष्ण कटिबन्धीय वर्षा वन।
उत्तर:
(D) उष्ण कटिबन्धीय वर्षा वन।

15. सिनकोना के वृक्ष कितनी वर्षा वाले क्षेत्र में पाए जाते हैं?
(A) 100 सें० मी०
(B) 70 सें० मी०
(C) 50 सें० मी०
(D) 50 सें०मी० से कम वर्षा
उत्तर:
(A) 100 सें० मी०।

16. सिमलीपाल जीव मण्डल निचय कौन-से राज्य में स्थित है
(A) पंजाब
(C) उड़ीसा
(B) दिल्ली
(D) पश्चिम बंगाल
उत्तर:
(C) उड़ीसा

17. भारत के कौन-से जीव मण्डल निचय विश्व के जीव मण्डल निचयों में लिए गए हैं?
(A) मानस
(B) मन्नार की खाड़ी
(C) दिहांग – दिबांग
(D) नन्दा देवी
उत्तर:
(D) नन्दा देवी।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
भारत का कुल कितना भौगोलिक क्षेत्र वनों के अन्तर्गत है?
उत्तर:
22%.

प्रश्न 2.
भारत का कुल कितना क्षेत्र (हेक्टेयर में ) वनों के अन्तर्गत है?
उत्तर:
750 लाख हेक्टेयर।

प्रश्न 3.
लकड़ी के दो प्रयोग लिखो।
उत्तर:
(i) इमारत निर्माण के लिये
(ii) ईंधन के लिये लकड़ी।

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प्रश्न 4.
लकड़ी का एक औद्योगिक प्रयोग लिखो।
उत्तर:
खेलों का सामान बनाना, रेयॉन उद्यो।

प्रश्न 5.
बाँस तथा वन के घास के दो उपयोग लिखो।
उत्तर:

  1. कागज़ बनाने के लिये
  2. कृत्रिम रेशा।

प्रश्न 6.
वनों से प्राप्त तीन उत्पादों के नाम लिखो।
उत्तर:
रबड़, गोंद तथा चमड़ा रंगने वाले पदार्थ।

प्रश्न 7.
उन दो भौगोलिक तत्त्वों के नाम लिखो जो वनों की वृद्धि को प्रभावित करते हैं।
उत्तर:

  1. वर्षा की मात्रा
  2. ऊंचाई

प्रश्न 8.
उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वनों के लिये आवश्यक वार्षिक वर्षा तथा तापमान लिखो
उत्तर:

  1. 200 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा
  2. 25° – 27°C.

प्रश्न 9.
पतझड़ीय मानसून वनों के लिये आवश्यक वार्षिक वर्षा तथा तापमान बताओ।
उत्तर:
150-200 सेंटीमीटर।

प्रश्न 10.
उस राज्य का नाम बताओ जहां उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन पाये जाते हैं।
उत्तर:
केरल

प्रश्न 11.
भारत के एक प्रदेश का नाम बताओ जहां काँटे तथा झाड़ियों के वन पाये जाते हैं।
उत्तर;
थार मरुस्थल।

प्रश्न 12.
हिन्द महासागर में द्वीपों के समूह बताएं जहां उष्ण कटिबन्धीय वन पाये जाते हैं।
उत्तर:
अण्डमान-निकोबार द्वीप।

प्रश्न 13.
उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वनों में पाये जाने वाले तीन महत्त्वपूर्ण पेड़ों के नाम लिखो।
उत्तर:
रोज़वुड, गुर्जन, आबनूस।

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प्रश्न 14.
मानसून वनों को पतझड़ीय वन क्यों कहते हैं?
उत्तर:
क्योंकि ये गर्मियों में अपने पत्ते गिरा देते हैं।

प्रश्न 15.
उन तीन राज्यों के नाम बताएं जहां मानसून वन पाये जाते हैं।
उत्तर:
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा झारखण्ड।

प्रश्न 16.
मध्य प्रदेश के एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक वृक्ष का नाम बताएं।
उत्तर:
सागवान।

प्रश्न 17.
भारत के दो राज्य बतायें जहां देवदार के वृक्ष मिलते हैं।
उत्तर:
जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश

प्रश्न 18.
काँटेदार वन के दो पेड़ों के नाम बतायें।
उत्तर:
खैर तथा खजूरी।

प्रश्न 19.
बबूल के वृक्ष से कौन-से उत्पाद प्राप्त होते हैं?
उत्तर:
गोंद तथा रंगने वाले पदार्थ।

प्रश्न 20.
ज्वारीय वन में गुंझलदार जड़ों का क्या कार्य है?
उत्तर:
यह कीचड़ में वृक्षों का संरक्षण करती हैं।

प्रश्न 21.
भारत का वन अनुसंधान केन्द्र कहाँ पर स्थित है?
उत्तर:
देहरादून में।

प्रश्न 22.
ज्वारीय वन में पाये जाने वाले दो पेड़ों के नाम लिखो।
उत्तर:
सुन्दरी, गुर्जन।

प्रश्न 23.
वैज्ञानिक नियम पर वनों के अन्तर्गत कुल कितना क्षेत्र होना चाहिये?
उत्तर:
33%.

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प्रश्न 24.
कोणधारी वन के तीन वृक्षों के नाम लिखो।
उत्तर:
पाइन, देवदार, सिल्वर फ़र्र।

प्रश्न 25.
3500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर किस प्रकार की वनस्पति पाई जाती है?
उत्तर:
एल्पाइन चरागाह।

प्रश्न 26.
उन दो राज्यों के नाम लिखो जहां देवदार पाये जाते हैं।
उत्तर:
जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश।

प्रश्न 27.
मयरो बोलान वृक्ष का उपयोग बताओ।
उत्तर:
रंगने वाले पदार्थ प्रदान करना

प्रस्न 28.
ज्वारीय वातावरण में कौन-से वन मिलते हैं?
उत्तर:
मैंग्रोव वन।

प्रश्न 29.
भारत में आर्थिक पक्ष से कौन-सा वनस्पति क्षेत्र महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
पतझड़ीय वन।

प्रश्न 30.
अंग्रेज़ों ने उत्तर-पूर्वी भारत में वनों को क्यों साफ़ किया?
उत्तर:
चाय, कहवा व रबड़ के बागान लगाने के लिए।

प्रश्न 31.
चिनार की लकड़ी का क्या प्रयोग है?
उत्तर:
हस्तशिल्प के लिए।

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प्रश्न 32.
हिमालय की अधिक ऊंचाई पर ऋतु- प्रवास करने वाली तीन जातियां बताओ।
उत्तर:
गुज्जर, बकरवाल, भुटिया।

प्रश्न 33.
नीलगिरी पहाड़ियों पर कौन-से वन मिलते हैं?
उत्तर:
शोलावन (शीत-उष्ण कटिबन्धीय वन)।

प्रश्न 34.
वन आवरण क्षेक्षों को चार वर्गों में बांटो।
उत्तर:

प्रदेशवन आवरण का \%
1. अधिक वन संकेन्द्रण क्षेत्र>40
2. मध्यम वन संकेन्द्रण क्षेत्र20-40
3. कम वन संकेन्द्रण क्षेत्र10-20
4. अति कम वन संकेन्द्रण क्षेत्र<10

प्रश्न 35.
राष्ट्रीय वन नीति में किस उद्देश्य पर अधिक बल है?
उत्तर:
सतत पोषणीय वन का प्रबन्ध।

प्रश्न 36.
सामाजिक वानिकी को किन तीन वर्गों में बांटा गया है?
उत्तर:

  1. शहरी वानिकी
  2. ग्रामीण वानिकी
  3. फार्मवानिकी।

प्रश्न 37.
किन चार जीव मण्डल निचयों को द्वारा मान्यता प्राप्त है?
उत्तर:

  1. नीलगिरी
  2. नन्दा देवी
  3. सुन्दर वन
  4. मन्नार की खाड़ी।

प्रश्न 38.
वनों का जीवन और पर्यावरण के साथ जटिल संबंध है। उपरोक्त पंक्तियों को पढ़ो तथा निम्नलिखित के उत्तर दो
(क) नई वन नीति का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
सतत् पोषणीय वन प्रबंध।

(ख) वन संरक्षण की एक विधि बताओ।
उत्तर:
सामाजिक वानिकी।

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प्रश्न 39.
किन मूल्यों को आधार बनाकर हम यह कह सकते हैं कि वन संरक्षण क्यों आवश्यक है?
उत्तर:

  1. बढ़ती हुई जनसंख्या का प्राकृतिक वनस्पति पर दुष्प्रभाव।
  2. वनों की अत्यधिक कटाई के वातावरण पर पड़ रहे दुष्प्रभाव।

प्रश्न 40.
राष्ट्रीय वन नीति कब लागू हुई?
उत्तर:
सन् 1988.

प्रश्न 41.
बाघ परियोजना कब शुरू की गई?
उत्तर:
सन् 1973.

प्रश्न 42.
नन्दा देवी जीवमण्डल किस राज्य में है?
उत्तर:
उत्तराखंड|

प्रश्न 43.
भारत में कुल कितने जीवमंडल निचय हैं?
उत्तर:
-18

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
भारत में वनों के क्षेत्र के कम होने के क्या कारण हैं?
उत्तर:
किसी प्रदेश के कुल क्षेत्र के कम-से-कम 1/3 भाग में वनों का विस्तार होना चाहिए ताकि उस प्रदेश में पारिस्थितिक स्वास्थ्य कायम रखा जा सके। भारत में कई कारणों से वन सम्पत्ति का कम विस्तार है।

  1. वनों के विशाल क्षेत्र की कटाई
  2. स्थानान्तरित कृषि की प्रथा
  3. अत्यधिक मृदा अपरदन
  4. चरागाहों की अत्यधिक चराई
  5. लकड़ी एवं ईंधन के लिए वृक्षों की कटाई
  6. मानवीय हस्तक्षेप

प्रश्न 2.
वन सम्पदा के संरक्षण के लिए क्या तरीके अपनाए जा रहे हैं?
उत्तर:
जनसंख्या के अत्यधिक दबाव तथा पशुओं की संख्या में अत्यधिक वृद्धि के कारण वन सम्पदा का संरक्षण आवश्यक है। वन संरक्षण कृषि एवं चराई के लिए अधिक भूमि की आवश्यकता के कारण आवश्यक है। इसके लिए वनवर्द्धन के उत्तम तरीकों को अपनाया जा रहा है। तेज़ी से उगने वाले पौधों की जातियों को लगाया जा रहा है। घास के मैदानों का पुनर्विकास किया जा रहा है। वन क्षेत्रों का विस्तार किया जा रहा है।

प्रश्न 3.
भारत में विभिन्न प्रकार के घासों का वर्णन करो।
उत्तर:
घासें बारहमासी घासों की 60 प्रजातियां हैं। इनसे मिलकर ही हमारा पारितन्त्र बना है, जो हमारे पशुधन के जीवन का आधार है। वास्तविक चरागाह और घास भूमियां लगभग 12.04 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तीर्ण हैं। चराई के लिए अन्य भूमि, वृक्ष – फसलों और उद्यानों, बंजर भूमि तथा परती भूमि के रूप में हैं। जिनका क्षेत्रफल क्रमश: 37 लाख हेक्टेयर, 15 लाख हेक्टेयर और 23.3 लाख हेक्टेयर है। वनों के अपकर्ष (डिग्रेडेशन) और विनाश के परिणामस्वरूप ही चरागाह और घास भूमियां विकसित हुई हैं। कालान्तर में चरागाह सवाना में बदल जाते हैं। हिमालय की अधिक ऊंचाइयों वाले उप – अल्पाइन और अल्पाइन क्षेत्रों में वास्तविक चरागाह पाए जाते हैं। भारत में घास के तीन पृथक् आवरण हैं। उष्ण कटिंबधीय – यह मैदानों में पाया जाता है। उपोष्ण कटिबंधीय तथा शीतोष्ण कटिबंधीय घास भूमियां मुख्य रूप से हिमालय की पर्वत में ही पाई जाती हैं।

प्रश्न 4.
वन संरक्षण क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
वनों का संरक्षण – मनुष्यों और पशुओं की बढ़ती हुई संख्या का प्राकृतिक वनस्पति पर दुष्प्रभाव पड़ा है। जो क्षेत्र कभी वनों के ढके थे, आज अर्द्ध-मरुस्थल बन गए हैं। राजस्थान में भी कभी वन थे पारिस्थितिक सन्तुलन के लिए वन अनिवार्य हैं। मानव का अस्तित्व और विकास पारिस्थितिक सन्तुलन पर निर्भर है। सन्तुलित पारितन्त्र और स्वस्थ पर्यावरण के लिए भारत के कम-से-कम एक तिहाई भाग पर वन होने चाहिए। दुर्भाग्य से हमारे देश के एक चौथाई भाग पर भी वन नहीं हैं। इसीलिए वन संसाधनों के संरक्षण और प्रबन्धन के लिए एक नीति की आवश्यकता है।

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प्रश्न 5.
भारत की वन नीति के क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर:
सन् 1988 में नई राष्ट्रीय वन नीति, वनों के क्षेत्रफल में हो रही कमी को रोकने के लिए बनाई गई थी।

  1. इस नीति के अनुसार देश के 33 प्रतिशत भू-भाग को वनों के अन्तर्गत लाना था संसार के कुल भू-भाग का 27 प्रतिशत तथा भारत का लगभग 19 प्रतिशत भू-भाग वनों से ढका है।
  2. वन नीति में आगे कहा गया है कि पर्यावरण की स्थिरता कायम रखने का प्रयत्न किया जाएगा तथा जहां पारितन्त्र का सन्तुलन बिगड़ गया है, वहां पुनः वनारोपण किया जाएगा।
  3. आनुवंशिक संसाधनों की जैव विविधता को देश की प्राकृतिक विरासत कहा जाता है। इस विरासत का संरक्षण, वन नीति का अन्य उद्देश्य है।
  4. इस नीति में मृदा अपरदन, मरुभूमि के विस्तार तथा सूखे पर नियन्त्रण का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है।
  5. इस नीति में जलाशयों में गाद के जमाव को रोकने के लिए बाढ़ नियन्त्रण का भी प्रावधान है।
  6. नीति के और भी उद्देश्य हैं जैसे: अपरदित और अनुत्पादक भूमि पर सामाजिक वानिकी और वनरोपण द्वारा वनावरण में अभिवृद्धि, वनों की उत्पादकता बढ़ाना, ग्रामीण और जन- जातीय जनसंख्या के लिए इमारती लकड़ी, जलावन, चारा और भोजन जुटाना
  7. यही नहीं इस नीति में महिलाओं को शामिल करके, व्यापक जनान्दोलन द्वारा वर्तमान वनों पर दबाव कम करने के लिए भी बल दिया गया है।

प्रश्न 6.
नम उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार एवं अर्द्ध-सदाबहार वनों की दो मुख्य विशेषताएं बताइए ये भी बताइए कि ये मुख्यतः किन प्रदेशों में पाए जाते हैं?
उत्तर:
नम उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन – ये वन उष्ण कटिबन्धीय वनों के समान सदाबहार घने वन होते हैं। उष्ण- आर्द्र जलवायु के कारण ये वन तेज़ी से बढ़ते हैं तथा अधिक ऊंचे होते हैं। भारत में पाए जाने वाले ये वन कुछ खुले तथा दूर-दूर पाए जाते हैं। इन वनों में कठोर लकड़ी के वृक्ष मिलते हैं जिनके शिखर पर छाता जैसा आकार बन जाता है। भारत में ये वन पश्चिमी घाट के अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में (केरल तथा कर्नाटक) पाए जाते हैं। ये वन शिलांग पठार के पर्वतीय प्रदेश में पाए जाते हैं। महोगनी, खजूर, बांस मुख्य वृक्ष हैं। अर्द्ध- सदाबहार वन – ये वन पश्चिमी घाट तथा उत्तर-पूर्वी भारत में कम वर्षा के क्षेत्रों में मिलते हैं। ये मानसूनी पतझड़ीय वन हैं।

प्रश्न 7.
भारत में उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन कहां पाए जाते हैं? ऐसे वनों की वनस्पति भूमध्यरेखीय वनों से किस प्रकार समान है तथा किस एक प्रकार से असमान है?
उत्तर:
भारत में उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में शिलांग पठार, असम प्रदेश तथा पश्चिमी घाट पर पाए जाते हैं। ये वन भूमध्य रेखीय वनों से मिलते-जुलते हैं क्योंकि ये कठोर लकड़ी के वन हैं तथा ये अधिक आर्द्र क्षेत्रों में मिलते हैं जहां 200 सें० मी० से अधिक वार्षिक वर्षा होती है। ये वन भूमध्य रेखीय वनों की भान्ति घने नहीं हैं, परन्तु ये वन अधिक खुले – खुले मिलते हैं तथा इनका उपयोग आसान हो जाता है।

प्रश्न 8.
सामाजिक वानिकी पर टिप्पणी लिखो।
उत्तर:
सामाजिक वानिकी (Social Forestry):

  1. 1976 के राष्ट्रीय कृषि आयोग ने पहले-पहल ‘सामाजिक वानिकी’ शब्दावली का प्रयोग किया था इसका अर्थ है ग्रामीण जनसंख्या के लिए जलावन, छोटी इमारती लकड़ी और छोटे-छोटे वन उत्पादों की आपूर्ति करना।
  2. नेक राज्य सरकारों ने सामाजिक वानिकी के महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम शुरू किए हैं। अधिकतर राज्यों में वन विभागों के अन्तर्गत सामाजिक वानिकी के अलग से प्रकोष्ठ बनाए गए हैं।
  3. सामाजिक वानिकी के मुख्य रूप से तीन अंग हैं: कृषि वानिकी किसानों को अपनी भूमि पर वृक्षारोपण के लिए प्रोत्साहित करना; वन – भूखण्ड (वुडलाट्स) वन विभागों द्वारा लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सड़कों के किनारे, नहर के तटों तथा ऐसी अन्य सार्वजनिक भूमि पर वृक्षारोपण; सामुदायिक वन – भूखण्ड लोगों द्वारा स्वयं बराबर की हिस्सेदारी’ के आधार पर भूमि पर वृक्षारोपण।
  4. सामाजिक वानिकी योजनाएं असफल हो गईं, क्योंकि इसमें उन निर्धन महिलाओं को शामिल नहीं किया गया, जिन्हें इससे अधिकतर फायदा होना था यह योजना पुरुषोन्मुख हो गई। यही नहीं, यह कार्यक्रम लोगों की आधारभूत आवश्यकताओं को पूरा करने वाले कार्यक्रम के स्थान पर किसानों का धनोपार्जन कार्यक्रम बन गया।
  5. सामाजिक वानिकी कार्यक्रम के द्वारा उत्पादित लकड़ी ग्रामीण भारत के ग़रीबों को न मिलकर, नगरों और कारखानों में पहुंचने लगी है। इससे गांवों में रोज़गार के अवसर घटे हैं और अन्न- उत्पादन करने वाली भूमि पर पेड़ लग गए हैं। इससे अनिवासी भू-स्वामित्व को बढ़ावा मिला है।

प्रश्न 9.
कौन-सी वनस्पति जाति बंगाल का आतंक मानी जाती है और क्यों?
उत्तर:
कुछ विदेशज वनस्पति जाति के कारण कई प्रदेशों में समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं। भारत में वनस्पति का 40% भाग विदेशज है। ये पौधे चीनी-तिब्बती, अफ्रीका तथा इण्डो- मलेशियाई क्षेत्र से लाए गए हैं। जलहायसिंथ पौधा भारत में बाग के सजावट के पौधे के रूप में लाया गया था। इस पौधे के फैल जाने के कारण पश्चिमी बंगाल में जलमार्गों, नदियों, तालाबों तथा नालों के मुंह बड़े पैमाने पर बन्द हो गए हैं। इस पौधे के हानिकारक प्रभावों के कारण इसे “बंगाल का आतंक” (Terror of Bengal) भी कहा जाता है।

प्रश्न 10.
“हमारी अधिकांश प्राकृतिक वनस्पति वस्तुतः प्राकृतिक नहीं है।” इस कथन की व्याख्या करो यह कथन काफ़ी हद तक सही है कि भारत में अधिकांश ‘प्राकृतिक’ वनस्पति वस्तुतः प्राकृतिक नहीं है। इस देश में मानवीय निवास के कारण प्राकृतिक वनस्पति का अधिकतर भाग नष्ट हो गया है या परिवर्तित हो गया है अधिकांश वनस्पति अपनी कोटि तथा गुणों के उच्च स्तर के अनुसार नहीं है। केवल हिमालय प्रदेश के कुछ अगम्य क्षेत्रों में एवं थार मरुस्थल के कुछ भागों को छोड़ कर अन्य प्रदेशों में प्राकृतिक वनस्पति वस्तुतः प्राकृतिक नहीं है। इन प्रदेशों की वनस्पति स्थानिक जलवायु तथा मिट्टी के अनुसार पनपती है तथा इसे प्राकृतिक कहा जा सकता है1

प्रश्न 11.
भारत में मुख्य वनस्पतियों के प्रकार को प्रभावित करने वाले भौगोलिक घटकों के नाम बताइए तथा उनके एक-दूसरे पर पड़ने वाले प्रभाव का परीक्षण कीजिए।
उत्तर:
भारत में विभिन्न प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। वनस्पति की प्रकार, सघनता आदि वातावरण में कई तत्त्वों पर निर्भर है। भारत में वनस्पति विभाजन के अनुसार उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार एवं मानसूनी वन, शीतोष्ण वन, घास के मैदान आदि वनस्पति प्रकार पाए जाते हैं।

इन वनस्पति को निम्नलिखित भौगोलिक घटक प्रभावित करते हैं

  1. वर्षा की मात्रा
  2. धूप
  3. ताप की मात्रा
  4. मिट्टी की प्रकृति।

जलवायुविक घटक अन्य स्थानिक तत्त्वों के साथ मिल कर एक-दूसरे पर विशेष प्रभाव डालते हैं। अधिक वर्षा तथा उच्च तापमान के कारण असम तथा पश्चिमी घाट पर ऊष्मा कटिबन्धीय सदाबहार वनस्पति पाई जाती है। परन्तु मरुस्थलीय क्षेत्रों में कम वर्षा के कारण कांटेदार झाड़ियां पाई जाती हैं। कई भागों में मौसमी वर्षा के कारण पतझड़ीय वनस्पति पाई जाती है। उष्ण जलवायु के कारण अधिकतर चौड़ी पत्ती वाले वृक्ष पाए जाते हैं, परन्तु हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र में कम तापमान के कारण कोणधारी वन तथा अल्पला घास पाई जाती है। स्थानीय मिट्टी के प्रभाव से नदी के डेल्टाई क्षेत्रों में ज्वारीय वन या मैंग्रोव पाई जाती है। इसी प्रकार बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों में बबूल के वृक्ष मिलते हैं।

JAC Class 11 Geography Important Questions Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति

प्रश्न 12.
“हिमालय क्षेत्रों में ऊंचाई के क्रम के अनुसार उष्ण कटिबन्धीय से लेकर अल्पाइन वनस्पति प्रदेशों तक का अनुक्रम पाया जाता है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
हिमालय पर्वत में दक्षिणी ढलानों से लेकर उच्च पर्वतीय क्षेत्रों तक विभिन्न प्रकार की वनस्पति मिलती है। ऊंचाई के क्रम के अनुसार वर्षा तथा ताप की मात्रा में अन्तर पड़ता है। इस अन्तर के प्रभाव से वनस्पति में एक क्रमिक अन्तर पाया जाता है। धरातल के अनुसार तथा ऊंचाई के साथ-साथ वनों के प्रकार में भिन्नता आ जाती है। इस क्रम के अनुसार उष्ण कटिबन्धीय से लेकर अल्पाइन वनस्पति तक का विस्तार पाया जाता है।

  1. उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन: हिमालय पर्वत की दक्षिणी ढलानों पर 1200 मीटर की ऊंचाई तक उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती प्रकार के वन पाए जाते हैं। यहां वर्षा की मात्रा अधिक होती है। यहां सदाबहार घने वनों में साल के उपयोगी वृक्ष पाए जाते हैं।
  2. शीत उष्ण कटिबन्धीय वन: 2000 मीटर की ऊंचाई पर नम शीत उष्ण प्रकार के घने वन पाए जाते हैं । इनमें ओक, चेस्टनट और चीड़ के वृक्ष पाए जाते हैं।
  3. शंकुधारी वन: दो हज़ार से अधिक ऊंचाई पर शंकुधारी वृक्षों का विस्तार मिलता है। यहां कम वर्षा तथा अधिक शीत के कारण वनस्पति में अन्तर पाया जाता है। स्परूस, देवदार, चिनार और अखरोट के वृक्ष पाए जाते हैं। हिम रेखा के निकट पहुंचने पर बर्च, जूनीपर आदि वृक्ष पाए जाते हैं।
  4. अल्पाइन चरागाहें: 3000 मीटर से अधिक ऊंचाई के कई भागों में छोटी-छोटी घास के कारण चरागाहें पाई जाती हैं। पश्चिमी हिमालय में गुजरों जैसी जन-जातियां मौसमी पशु चारण द्वारा इन चरागाहों का उपयोग करते हैं।

प्रश्न 13.
कृषि वानिकी तथा फ़ार्म वानिकी में अन्तर स्पष्ट करो।
उत्तर:
कृषि वानिकी का अर्थ है कृषि योग्य तथा बंजर भूमि पर पेड़ और फ़सलें एक साथ लगाना वानिकी और खेती साथ-साथ करना जिसे – चारा, ईंधन, इमारती लकड़ी और फलों का उत्पादन एक साथ किया जाए। समुदाय वानिकी में सार्वजनिक भूमि जैसे – गांव – चरागाह, मन्दिर – भूमि, सड़कों के दोनों ओर नहर किनारे, रेल पट्टी के साथ पटरी और विद्यालयों में पेड़ लगाना शामिल है। इसका उद्देश्य पूरे समुदाय को लाभ पहुंचाना है। इस योजना का एक उद्देश्य भूमिविहीन लोगों को वानिकीकरण से जोड़ना तथा इससे उन्हें वे लाभ पहुंचाना जो केवल भूस्वामियों को ही प्राप्त होते हैं

फार्म वानिकी: फार्म वानिकी के अन्तर्गत किसान अपने खेतों में व्यापारिक महत्त्व वाले या दूसरे पेड़ लगाते हैं। वन विभाग, इसके लिए छोटे और मध्यम किसानों को निःशुल्क पौधे उपलब्ध कराता है। इस योजना के तहत कई तरह की भूमि, जैसे- खेतों की मेड़ें, चरागाह, घासस्थल, घर के पास पड़ी खाली ज़मीन और पशुओं के बाड़ों में भी पेड़ लगाए जाते हैं।

प्रश्न 14.
वन्य प्राणी संरक्षण के लिए टाईगर प्रोजैक्ट तथा एलीफैन्ट प्रोजैक्ट का वर्णन करो।
उत्तर:
यूनेस्को के ‘मानव और जीवमण्डल योजना’ (Man and Biosphere Programme) के तहत भारत सरकार ने वनस्पति ज्ञात और प्राणी जात के संरक्षण के लिए महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं। देश के 92 नैशनल पार्क, 492 वन्य प्राणी अभयवन 1.57 करोड़ हैक्टेयर भूमि पर फैले हैं। प्रोजैक्ट टाइगर (1973) और प्रोजैक्ट एलीफेंट (1992) जैसी विशेष योजनाएं इन जातियों के संरक्षण और उनके आवास के बचाव के लिए चलाई जा रही हैं। इनमें से प्रोजैक्ट टाइगर 1973 से चलाई जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में बाघों की जनसंख्या का स्तर बनाए रखना है, जिससे वैज्ञानिक, सौन्दर्यात्मक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक मूल्य बनाए रखे जा सकें।

इससे प्राकृतिक धरोहर को भी संरक्षण मिलेगा जिसका लोगों को शिक्षा और मनोरंजन के रूप में फायदा होगा। शुरू में यह योजना नौ बाघ निचयों (आरक्षित क्षेत्रों) में शुरू की गई थी और ये 16,339 वर्ग किलोमीटर पर फैली थी। अब यह योजना 27 बाघ निचयों में चल रही है और इनका क्षेत्रफल 37,761 वर्ग किलोमीटर है और 17 राज्यों में व्याप्त है । देश में बाघों की संख्या 1972 में 1,827 से बढ़कर 2001-02 में 3,642 हो गई। यह योजना मुख्य रूप से बाघ केन्द्रित है, परन्तु फिर भी पारिस्थितिक तन्त्र की स्थिरता पर जोर दिया जाता है। बाघों की संख्या का स्तर तभी ऊंचा रह सकता है जब पारिस्थितिक तन्त्र के विभिन्न पोषण स्तरों और इसकी भोजन कड़ी को बनाए रखा जाए।

निबन्धात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

प्रश्न 1.
भारत के विभिन्न प्रकार के वनों के भौगोलिक वितरण तथा आर्थिक महत्त्व का वर्णन करो
उत्तर:
भारत की वन सम्पदा (Forest Wealth of India ):
प्राचीन समय में भारत के एक बड़े भाग पर वनों का विस्तार था, परन्तु अब बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण वन क्षेत्र घटता जा रहा है। इस समय देश में 747 लाख हेक्टेयर क्षेत्र पर वनों का विस्तार है जो कि देश के कुल क्षेत्रफल का 22.7% भाग है। भारत में प्रति व्यक्ति वन क्षेत्र लगभग 0.1 हेक्टेयर है जो कि बहुत कम है। भौगोलिक दृष्टि से मध्य प्रदेश में सबसे अधिक वन क्षेत्र हैं। भारतीय वनों का वर्गीकरण – भारत में वनों का वितरण वर्षा, तापमान तथा ऊंचाई के अनुसार है। भारत में निम्नलिखित प्रकार के वन पाए जाते हैं।

1. उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests):
ये वन उन प्रदेशों में पाए जाते हैं जहां औसत वार्षिक, वर्षा 200 सें०मी० से अधिक तथा औसत तापमान 24°C है। इन वनों का विस्तार अग्रलिखित प्रदेशों में है।
JAC Class 11 Geography Important Questions Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति 1

Based upon the Survey of India map with the permission of the Surveyor General of India. The responsibility for the correctness of internal details rests with the publisher. The territorial waters of India extend into the sea to a distance of twelve nautical miles measured from the appropriate base line.

  1. पश्चिमी घाट तथा पश्चिमी तटीय मैदान
  2. अण्डमान द्वीप समूह
  3. उत्तर-पूर्व में हिमालय पर्वत की ढलानों पर।

अधिक वर्षा तथा ऊंचे तापमान के कारण ये वन बहुत घने होते हैं। ये सदाबहार वन हैं तथा भूमध्य रेखीय वनों की भान्ति कठोर लकड़ी के वन हैं। वृक्षों की ऊंचाई 30 से 60 मीटर तक है। इन वनों में रबड़, महोगनी, आबनूस, लौह- काष्ठ, ताड़ तथा चीड़ के वृक्ष पाए जाते हैं। इन वृक्षों की लकड़ी फर्नीचर, रेल के स्लीपर, जलपोत निर्माण, नावें बनाने में प्रयोग की जाती है।

2. पतझड़ीय मानसूनी वन (Monsoon Deciduous Forests):
ये वन उन प्रदेशों में पाए जाते हैं जहां औसत वार्षिक वर्षा 100 सें० मी० से 200 सें० मी० तक होती है। इन वनों में वृक्ष ग्रीष्मकाल में अपने पत्ते गिरा देते हैं। इसलिए इन्हें पतझड़ीय वन कहते हैं। ये वन निम्नलिखित प्रदेशों में मिलते हैं।

  1. तराई प्रदेश
  2. डेल्टाई प्रदेश
  3. पश्चिमी घाट की पूर्वी ढलान
  4. प्रायद्वीप का पूर्वी भाग मध्य प्रदेश, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु।

ये वन अधिक घने नहीं होते। इनमें वृक्ष कम ऊंचे होते हैं। ये वृक्ष लगभग 30 मीटर तक ऊंचे होते हैं। इन वृक्षों को सुगमतापूर्वक काटा जा सकता है। कई भागों में कृषि के लिए इन वनों को साफ कर दिया गया है।

आर्थिक महत्त्व (Economic Importance ): इन वनों में साल, सागौन, चन्दन, रोज़वुड, आम, महुआ आदि वृक्ष पाए जाते हैं। साल वृक्ष की लकड़ी रेल के स्लीपर तथा डिब्बे बनाने के काम आती है। सागौन की लकड़ी बहुत मज़बूत होती है। इसका प्रयोग इमारती लकड़ी तथा फर्नीचर में किया जाता है। इन वृक्षों पर लाख, बीड़ी, चमड़ा रंगने तथा कागज़ बनाने के उद्योग आधारित हैं।

3. शुष्क वन (Dry Forests ):
ये वन उन प्रदेशों में पाए जाते हैं जहां औसत वार्षिक वर्षा 50 सें० मी० से 100 सें० मी० तक होती है। ये वन निम्नलिखित क्षेत्रों में मिलते हैं।

  1. पूर्वी राजस्थान
  2. दक्षिणी हरियाणा
  3. दक्षिणी-पश्चिमी उत्तर प्रदेश
  4. कर्नाटक पठार

ये वृक्ष वर्षा की कमी के कारण अधिक ऊंचे नहीं होते। इन वृक्षों की जड़ें लम्बी तथा छाल मोटी होती है। ये वृक्ष अधिक गहराई से पानी प्राप्त करते हैं तथा वाष्पीकरण को रोकते हैं।
आर्थिक महत्त्व (Economic Importance ): इन वनों में शीशम, बबूल, कीकर, हल्दू आदि वृक्ष पाए जाते हैं। ये कठोर तथा टिकाऊ लकड़ी के वृक्ष होते हैं। इनका उपयोग कृषि यन्त्र, फर्नीचर, लकड़ी का कोयला, बैलगाड़ियां बनाने में किया जाता है।

4. डेल्टाई वन (Deltaic Forests): ये वन डेल्टाई क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इन्हें ज्वारीय वन (Tidal Forests) भी कहते मैं। मैनग्रोव वृक्ष के कारण इन्हें मैंग्रोव वन (Mangrove Forests) भी कहते हैं। ये वन निम्नलिखित डेल्टाई क्षेत्रों में मिलते हैं।

  1. गंगा – ब्रह्मपुत्र डेल्टा (सुन्दर वन)
  2. महानदी, कृष्ण, गोदावरी डेल्टा
  3. दक्षिणी-पूर्वी तटीय क्षेत्र ये वन प्रायः दलदली होते हैं।

गंगा – ब्रह्मपुत्र डेल्टा में सुन्दरी नामक वृक्ष मिलने के कारण इसे ‘सुन्दर वन’ कहते हैं। आर्थिक महत्त्व (Economic Importance ) इन वनों में नारियल, मैंग्रोव ताड़, सुन्दरी आदि वृक्ष मिलते हैं। ये वन आर्थिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। इनका प्रयोग ईंधन, इमारती लकड़ी, नावें बनाने तथा माचिस उद्योग में किया जाता है।

5. पर्वतीय वन (Mountain Forests ):
ये वन हिमालय प्रदेश की दक्षिणी ढलानों पर कश्मीर से लेकर असम तक पाए जाते हैं। पूर्वी हिमालय में वर्षा की मात्रा अधिक है। वहां सदाबहार तथा चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों की अधिकता के कारण कोणधारी वन पाए जाते हैं। इस प्रकार पूर्वी हिमालय तथा पश्चिमी हिमालय के वनों में काफ़ी अन्तर मिलता है। हिमालय प्रदेश में दक्षिणी ढलानों से लेकर उच्च पर्वतीय क्षेत्रों तक विभिन्न प्रकार की वनस्पति मिलती है। ऊंचाई के क्रमानुसार वर्षा तथा ताप की मात्रा में भी अन्तर पड़ता है । धरातल के अनुसार तथा ऊंचाई के साथ-साथ वनों के प्रकार में भिन्नता आ जाती है। इस क्रम के अनुसार उष्ण कटिबन्धीय से लेकर अल्पाइन वनस्पति तक का विस्तार पाया जाता है।

1. उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन:
हिमालय पर्वत की दक्षिणी ढलानों पर 1200 मीटर की ऊंचाई तक उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती प्रकार के वन पाए जाते हैं। वहां वर्षा की मात्रा अधिक होती है। वहां सदाबहार घने वनों में साल के उपयोगी वृक्ष पाए जाते हैं।

2. शीत उष्ण कटिबन्धीय वन:
2000 मीटर की ऊंचाई पर नम शीत उष्ण प्रकार के घने वन पाए जाते हैं। इनमें ओक, चेस्टनट और चीड़ के वृक्ष पाए जाते हैं। चीड़ के वृक्ष से बिरोज़ा तथा तारपीन का तेल प्राप्त किया जाता है। इसकी हल्की लकड़ी से चाय की पेटियां बनाई जाती हैं।

3. शंकुधारी वन:
दो हज़ार से अधिक ऊंचाई पर शंकुधारी वृक्षों का विस्तार मिलता है। यहां कम वर्षा तथा अधिक शीत के कारण वनस्पति में अन्तर पाया जाता है। स्परूस, देवदार, चिनार और अखरोट के वृक्ष पाए जाते हैं। हिम रेखा के निकट पहुंचने पर बर्च, जूनीपर आदि वृक्ष पाए जाते हैं। देवदार की लकड़ी रेल के स्लीपर, पुल डिब्बे बनाने में प्रयोग की जाती है। सिवर फर का प्रयोग कागज़ की लुग्दी, पैकिंग का सामान तथा दियासलाई बनाने में किया जाता है।

4. अल्पाइन चरागाहें:
3000 मीटर से अधिक ऊंचाई के कई भागों में छोटी-छोटी घास के कारण चरागाहें पाई जाती हैं। पश्चिमी हिमालय में गुजरों जैसी जन-जातियां मौसमी पशु चारण द्वारा इन चरागाहों का उपयोग करते हैं।

JAC Class 11 Geography Important Questions Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति

प्रश्न 2.
भारत में वास्तविक वनावरण का वितरण बताओ।
उत्तर;
वनक्षेत्र की भांति वनावरण में भी बहुत अन्तर है। जम्मू और कश्मीर में वास्तविक वनावरण एक प्रतिशत है, जबकि अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह की 92 प्रतिशत भूमि पर वास्तविक वनावरण है। परिशिष्ट में दी गई सारणी से स्पष्ट है कि 9 ऐसे राज्य हैं जहां कुल क्षेत्रफल के एक तिहाई भाग से अधिक पर वनावरण है। एक तिहाई वनावरण पारितन्त्र का सन्तुलन बनाए रखने के लिए मानक आवश्यकता है। चार राज्य ऐसे हैं जहां वन का प्रतिशत आदर्श स्थिति जैसा ही है।

अन्य राज्यों में वनों की स्थिति असंतोषजनक या संकटपूर्ण है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि तीन नवीन राज्यों उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ में प्रत्येक के कुल क्षेत्रफल के 40 प्रतिशत भाग पर वन हैं। इन राज्यों के पृथक् आँकड़े न मिलने के कारण इन्हें इनके पूर्व राज्यों में ही सम्मिलित किया गया है।
वास्तविक वनावरण के प्रतिशत के आधार पर भारत के राज्यों को चार प्रदेशों में विभाजित किया गया है।

  1. अधिक वनावरण वाले प्रदेश
  2. मध्यम वनावरण वाले प्रदेश
  3. कम वनावरण वाले प्रदेश
  4. बहुत कम वनावरण वाले प्रदेश।

1. अधिक वनावरण वाले प्रदेश:
इस प्रदेश में 40 प्रतिशत से अधिक वनावरण वाले राज्य सम्मिलित हैं। असम के अलावा सभी पूर्वी राज्य इस वर्ग में शामिल हैं। जलवायु की अनुकूल दशाएँ मुख्य रूप से वर्षा और तापमान अधिक वनावरण में होने का मुख्य कारण हैं। इस प्रदेश में भी वनावरण भिन्नताएँ पाई जाती हैं। अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह और मिज़ोरम, नागालैण्ड तथा अरुणाचल प्रदेश के राज्यों में कुल भौगोलिक क्षेत्र के 80 प्रतिशत भाग पर वन पाए जाते हैं। मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, सिक्किम और दादर और नागर हवेली में वनों का प्रतिशत 40 और 80 के बीच है।

2. मध्यम वनावरण वाले प्रदेश:
इसमें मध्य प्रदेश, उड़ीसा, गोवा, केरल, असम और हिमाचल प्रदेश सम्मिलित हैं। गोवा में वास्तविक वन क्षेत्र 33.79 प्रतिशत है, जो कि इस प्रदेश में सबसे अधिक है। इसके बाद असम और उड़ीसा का स्थान है। अन्य राज्यों में कुल क्षेत्र के 30 प्रतिशत भाग पर वन हैं ।

3. कम वनावरण वाले प्रदेश:
यह प्रदेश लगातार नहीं है। इसमें दो उप- प्रदेश हैं : एक प्रायद्वीप भारत में स्थित है। इसमें महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश और तमिलनाडु शामिल हैं। दूसरा उप- – प्रदेश उत्तरी भारत में हैं। इसमें उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य शामिल हैं।

4. बहुत कम वनावरण वाले प्रदेश:
भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग को इस वर्ग में रखा जाता है। इस वर्ग में शामिल राज्य हैं – राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और गुजरात इसमें चंडीगढ़ और दिल्ली दो केन्द्र शासित प्रदेश भी हैं। इनके अलावा पश्चिम बंगाल का राज्य भी इसी वर्ग में हैं। भौतिक और मानवीय कारणों से इस प्रदेश में बहुत कम वन हैं।

प्रश्न 3.
भारत में राष्ट्रीय उद्यान तथा जीव आरक्षित क्षेत्रों का वर्णन करो।
उत्तर:
आज भारत में 104 राष्ट्रीय उद्यान और 543 वन्य जीव अभयारण्य हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल क्रमशः 40,60,000 हेक्टेयर तथा 1,15,40,000 हेक्टेयर है। दोनों का कुल क्षेत्रफल 1,56,00,000 हेक्टेयर होता है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 4.74 प्रतिशत है। भारत के प्रमुख राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों का विवरण मानचित्र 2 में दिया गया है। सन् 1973 में संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने कुछ देशों में मनुष्य और जैव मण्डल पर एक कार्यक्रम शुरू किया था।

इसी के परिणामस्वरूप इनके अतिरिक्त 18 जीव आरक्षित क्षेत्र भी बनाए गए हैं। इनका कुल भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 43 लाख हेक्टेयर है। इनका कुछ क्षेत्र सुरक्षित क्षेत्र में भी शामिल हो गया। कुछ आरक्षित क्षेत्र इस प्रकार है- नीलगिरि (तमिलनाडु), नोक्रेक (मेघालय), नामदफा (अरुणाचल प्रदेश), नंदा देवी (उत्तराखंड), ग्रेट निकोबार तथा मन्नार की खाड़ी (तमिलनाडु)। विगत कुछ वर्षों में सुरक्षित क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। सन् 1990 में भारत ने 1977 विश्व दाय (हैरिटेज) समझौते का अनुसमर्थन कर दिया है। इस समझौते के अनुसार श्रेष्ठ सार्वभौम महत्त्व के चार प्राकृतिक स्थलों को चिह्नित किया गया है।

1. काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान:
यह असम के नागाँव और गोलाघाट जिलों में मिकिर पहाड़ियों की तलहटी में ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिणी तट के साथ विस्तृत है। काजीरंगा ब्रह्मपुत्र नदी के बाढ़ क्षेत्र के मैदानों में स्थित है। इस नदी आवास में ऊंची व सघन घास वाली घास भूमियां हैं। इनके बीच-बीच में खुले वन हैं। यहाँ एक-दूसरे से जुड़ी नदियां तथा छोटी-छोटी अनेक झीलें हैं। इसका तीन चौथाई या इससे भी अधिक क्षेत्र प्रतिवर्ष ब्रह्मपुत्र नदी के बाढ़ के पानी में डूब जाता है। लैंडसैट के 1986 के आंकड़ों के अनुसार इस के 41 प्रतिशत भाग में ऊंची घास, 11 प्रतिशत में छोटी घास, 29 प्रतिशत में खुले वन, 4 प्रतिशत में दल – दल, 8 प्रतिशत में नदियां और जलाशय तथा शेष 7 प्रतिशत में अन्य लक्षण हैं। इस राष्ट्रीय उद्यान के मुख्य जन्तु एक सींग वाला गैंडा तथा हाथी हैं।

2. केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान:
यह राष्ट्रीय उद्यान राजस्थान के भरतपुर में अलवणजल की दल-दल है, जो सिन्धु गंगा के मैदान का भाग है। जुलाई से लेकर सितम्बर के मानसूनी वर्षा के महीनों में यह क्षेत्र एक से लेकर 2 मीटर की गहराई तक पानी से भर जाता है। अक्तूबर से जनवरी तक जहां जल स्तर धीरे-धीरे घटने लगता है तथा फरवरी के महीने में भूमि सूखने लगती है। जून के महीनों में कुछ गड्ढों में ही पानी रह जाता है। यहां का पर्यावरण अंशत: मानव-निर्मित है। छोटे-छोटे बांधों से पूरे क्षेत्र को 10 भागों में विभाजित कर लिया गया है। जल स्तर के नियंत्रण के लिए प्रत्येक भाग में जल कपाटों की व्यवस्था है।

3. सुन्दर वन जीव आरक्षित क्षेत्र:
यह पश्चिम बंगाल में भारत की दो बड़ी नदियां गंगा और ब्रह्मपुत्र के दलदली डेल्टाई क्षेत्र में स्थित है। यह मैंग्रोव वनों, दल- दलों और वनाच्छादित द्वीपों के एक विशाल क्षेत्र में फैला है। इसका कुल क्षेत्रफल 1,300 वर्ग कि०मी० है। यहां लगभग 200 रॉयल बंगाल टाइगर (बाघ) निवास करते हैं। इस वन का कुछ भाग बांग्लादेश में हैं। ऐसा अनुमान है कि इस प्रदेश के बाघों की संयुक्त संख्या लगभग 400 हो सकती है। बाघों ने अपने आप को खारी और अलवणजल के अनुकूल बना लिया है। इस जीव आरक्षित क्षेत्र के बाघ अच्छे तैराक हैं।

4. नन्दा देवी जीव आरक्षित क्षेत्र:
यह जीव आरक्षित क्षेत्र ऋषि गंगा के जल-ग्रहण क्षेत्र में स्थित है। यह धौलीगंगा की पूर्वी सहायक है। धौलीगंगा जोशी मठ के पास अलकनंदा में मिल जाती है। यह हिमनदीय द्रोणी का विस्तृत क्षेत्र है। उत्तर-दक्षिण दिशा में फैली पहाड़ियों की समान्तर शृंखलाओं द्वारा यह क्षेत्र विभाजित है। यहां 6,400 मी० से ऊंची लगभग एक दर्जन चोटियां हैं। इनमें दूनागिरि (7,066 मी०), चंगबंग (6,864 मी०) तथा नन्दा देवी पूर्व (7,434 मी०) उल्लेखनीय हैं। हिमालय की आन्तरिक घाटी होने के कारण नन्दा देवी द्रोणी में सामान्य शुष्क दशाएं पाई जाती हैं। मानसून की अवधि को छोड़कर वार्षिक वर्षण का औसत कम रहता है। चारों ओर छाई धुंध और मानसून की ऋतु में कम ऊंचाई वाले बादलों के कारण मृदा आर्द्र बनी रहती है। वर्ष के 6 महीनों तक यह द्रोणी हिम से ढकी रहती है।
JAC Class 11 Geography Important Questions Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति 3

प्रश्न 4.
जीव मण्डल निचय क्या है? भारत में इनके विस्तार का वर्णन करो।
उत्तर:
जीव मण्डल निचय – जीवमण्डल निचय (आरक्षित क्षेत्र) विशेष प्रकार के भौमिक और तटीय पारिस्थितिक तन्त्र हैं, जिन्हें यूनेस्को (UNESCO) के मानव और जीव मण्डल प्रोग्राम (MAB) के अन्तर्गत मान्यता प्राप्त है। जीव मण्डल निचय के तीन मुख्य उद्देश्य हैं।
भारत में 18 जीव मण्डल निचय हैं इनमें से 4 जीव मण्डल निचय

  1. नीलगिरी;
  2. नन्दा देवी;
  3. सुन्दर वन;
  4. मन्नार की खाड़ी को।

यूनेस्को द्वारा जीव मण्डल निचय विश्व नेटवर्क पर मान्यता प्राप्त हैं।
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JAC Class 11 Geography Important Questions Chapter 4 जलवायु 

Jharkhand Board JAC Class 11 Geography Important Questions Chapter 4 जलवायु Important Questions and Answers.

JAC Board Class 11 Geography Important Questions Chapter 4 जलवायु

बहु-विकल्पी प्रश्न (Multiple Choice Questions )
प्रश्न – दिए गए चार वैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर चुनिए
1. भारत में सबसे ठण्डा स्थान कौन-सा है?
(A) श्रीनगर
(B) शिमला
(C) द्रास
(D) शिलांग
उत्तर:
(C) द्रास।

2. भारत में सबसे गर्म स्थान कौन-सा है?
(A) नागपुर
(B) बंगलुरु
(C) बाड़मेर
(D) कानपुर
उत्तर:
(C) बाड़मेरर।

3. ग्रीष्मकालीन मानसून की दिशा कौन-सी है?
(A) दक्षिण-पश्चिम
(B) उत्तर-पूर्व
(C) दक्षिण-पूर्व
(D) उत्तर-पश्चिम
उत्तर:
(A) दक्षिण-पश्चिम

4. काल बैसाखी किस राज्य से सम्बन्धित है?
(A) केरल
(C) तमिलनाडु
(B) असम
(D) पंजाब
उत्तर:
(A) पेरू

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5. एलनीनो किस देश के तट पर प्रवाहित है?
(A) पेरू
(B) दक्षिण अफ्रीका
(C) आस्ट्रेलिया
(D) यूरोप
उत्तर:
(C) बाड़मेर।

6. उत्तर – पश्चिम भारत में शीतकाल में कौन-सी वर्षा होती है?
(A) संवाहिक
(C) चक्रवातीय
(B) पर्वतीय
(D) पूर्व – मानसून
उत्तर;
(C) चक्रवातीय।

7. शीतकालीन चक्रवातीय वर्षा किस फसल की उपज के लिए लाभदायक है?
(A) चावल
(B) मक्का
(C) गेहूं
(D) कपास
उत्तर:
(C) गेहूं।

8. कर्नाटक राज्य में पूर्व- मानसून वर्षा को कहते हैं
(A) चक्रवातीय
(B) काल बैसाखी
(C) लू
(D) आम की बौछार
उत्तर:
(D) आम की बौछार।

9. किस स्थान पर अधिकतर वर्षा हिमपात में होती है?
(A) अमृतसर
(B) शिमला
(C) लेह
(D) कोलकाता
उत्तर:
(C) लेह

10. किस राज्य में लू चलती है?
(A) मध्यप्रदेश
(B) तमिलनाडु
(C) पंजाब
(C) गुजरात
उत्तर:
(C) पंजाब।

11. कौन-सा क्षेत्र वर्षा छाया क्षेत्र है?
(A) दक्कन पठार
(B) असम
(C) गुजरात
(D) केरल
उत्तर:
(A) दक्कन पठार।

12. उत्तर-पश्चिमी भारत से कब मानसून पवनें पीछे हटती हैं?
(A) जनवरी में
(B) अगस्त में
(C) अक्तूबर में
(D) अप्रैल में
उत्तर:
(C) अक्तूबर में।

13. भारत में मानसून पवनों की अवधि है
(A) 61 दिन
(B) 90 दिन
(C) 120 दिन
(D) 150 दिन
उत्तर:
(C) 120 दिन

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14. जाड़े के आरम्भ में तमिलनाडु के तटीय प्रदेशों में वर्षा किस कारण होती है?
(A) दक्षिण-पश्चिम मानसून
(C) शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात
(B) उत्तर-पूर्वी मानसून
(D) स्थानीय वायु परिसरण।
उत्तर:
(B) उत्तर-पूर्वी मानसून।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
भारत में किस प्रकार का जलवायु मिलता है?
उत्तर:
उष्ण कटिबन्धीय मानसून जलवायु।

प्रश्न 2.
भारत के मध्य से कौन-से अक्षांश की अक्षांश रेखा गुज़रती है?
उत्तर:
कर्क रेखा।

प्रश्न 3.
कर्क रेखा द्वारा निर्मित दो जलवायु क्षेत्रों के नाम लिखो।
उत्तर:
उष्ण कटिबन्धीय तथा शीतोष्ण कटिबन्धीय।

प्रश्न 4.
भारत में सबसे गर्म स्थान का नाम बताएं।
उत्तर:
राजस्थान में बाड़मेर (50° C)।

प्रश्न 5.
भारत में सबसे अधिक ठण्डे स्थान का नाम लिखो।
उत्तर:
द्रास (कारगिल) 45°C 1

प्रश्न 6.
भारत में सबसे अधिक वर्षा वाला स्थान का नाम लिखो।
उत्तर:
चिरापूंजी के निकट मासिनराम – 1080 सेंटीमीटर वर्षा

प्रश्न 7.
उस राज्य का नाम लिखो जहां सबसे कम तापमान अन्तर होता है।
उत्तर:
केरल

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प्रश्न 8.
भारत में सम जलवायु वाले तटीय राज्य का नाम लिखो।
उत्तर:
तमिलनाडु

प्रश्न 9.
देश के आन्तरिक भाग के एक राज्य का नाम लिखो जहां महाद्वीपीय जलवायु है।
उत्तर:
पंजाब।

प्रश्न 10.
उत्तर-पश्चिम भारत में सर्दियों में होने वाली वर्षा का क्या कारण है?
उत्तर;
उत्तर-पश्चिमी विक्षोभ (चक्रवात)।

प्रश्न 11.
भारत के दक्षिण पूर्व तट पर सर्दियों में होने वाली वर्षा का कारण लिखें।
उत्तर:
उत्तर- पूर्व मानसून।

प्रश्न 12.
मानसून शब्द कहां से बना?
उत्तर:
अरबी भाषा का शब्द – मौसिम।

प्रश्न 13.
किस प्रकार की पवनें मानसून होती हैं?
उत्तर:
मौसमी पवनें।

प्रश्न 14.
गर्मियों की मानसून की क्या दिशा होती है?
उत्तर:
दक्षिण-पश्चिम से उत्तर – पूर्व

प्रश्न 15.
सर्दियों की मानसून की क्या दिशा होती है?
उत्तर;
उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम।

प्रश्न 16.
ऊपरी वायुमण्डल की वायुराशि बताओ जो भारत में मानसून पवनें लाती है।
उत्तर:
जैट प्रवाह

प्रश्न 17.
उस राज्य का नाम बतायें जो सबसे पहले दक्षिण-पश्चिम मानसून प्राप्त करता है।
उत्तर:
केरल

प्रश्न 18.
एक राज्य बताओ जहां से मानसून पवनें सबसे पहले लौटती हैं।
उत्तर:
पंजाब

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प्रश्न 19.
मानसून वर्षा पर निर्भर रहने वाली दो खरीफ़ फसलों के नाम लिखो।
उत्तर: चावल और मक्का।

प्रश्न 20.
भारत में चार वर्षा वाले महीने लिखो।
उत्तर:
जून से सितम्बर।

प्रश्न 21.
200 cm से अधिक वर्षा प्राप्त करने वाले क्षेत्रों के नाम लिखें।
उत्तर:
पश्चिमी तट, उत्तर पूर्व पहाड़ी क्षेत्र।

प्रश्न 22.
नार्वेस्टर तथा काल बैसाखी कहां चलते हैं?
उत्तर:
पश्चिमी बंगाल तथा असम

प्रश्न 23.
पूर्व – मानसून पवनों की वर्षा का एक उदाहरण दो।
उत्तर:
Mango Showers.

प्रश्न 24.
किन प्रदेशों में शीतकाल में रात को पाला पड़ता है?
उत्तर:
पंजाब, हरियाणा।

प्रश्न 25.
लू से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
गर्मियों में गर्म धूल भरी चलने वाली पवनें।

प्रश्न 26.
उस क्षेत्र का नाम बताओ जो दोनों ऋतुओं में वर्षा प्राप्त करता है।
उत्तर:
तमिलनाडु।

प्रश्न 27.
जलवायु से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
किसी स्थान पर लम्बे समय का औसत मौसम

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प्रश्न 28.
मानसून प्रस्फोट से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
दक्षिण-पश्चिम मानसून का अचानक पहुंचना।

प्रश्न 29.
अक्तूबर गर्मी से क्या भाव है?
उत्तर;
अधिक आर्द्रता तथा गर्मी के कारण अक्तूबर का घुटन भरा मौसम।

प्रश्न 30.
उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों द्वारा किन तटीय प्रदेशों में प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, पश्चिमी बंगाल तथा उड़ीसा

प्रश्न 31.
उष्ण कटिबन्धीय मानसून जलवायु की क्या मुख्य विशेषता है?
उत्तर:
गर्म आर्द्र गर्मियां तथा ठण्डी शुष्क सर्दियां।

प्रश्न 32.
उन पवनों का नाम बताओ जो ग्रीष्म ऋतु में चलती हैं।
उत्तर:
समुद्र से स्थल की ओर चलने वाली दक्षिण पश्चिम मानसून।

प्रश्न 33.
भारतीय जलवायु में विशाल विविधता क्यों है?
उत्तर:
विशाल आकार के कारण।

प्रश्न 34.
देश के किस भाग में ‘लू’ चलती है?
उत्तर:
उत्तरी मैदान।

प्रश्न 35.
उन दो शाखाओं के नाम बतायें जिनमें दक्षिण-पश्चिमी मानसून पवनें विभाजित होती हैं।
उत्तर:

  1. बंगाल की खाड़ी शाखा
  2. अरब सागर शाखा।

प्रश्न 36.
उन पवनों का नाम बताओ जो तमिलनाडु में वर्षा प्रदान करती हैं।
उत्तर:
उत्तर-पूर्वी मानसून।

JAC Class 11 Geography Important Questions Chapter 4 जलवायु

प्रश्न 37.
वृष्टि छाया से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पर्वतीय भागों की विमुख ढलान।

प्रश्न 38.
वृष्टि छाया क्षेत्र का एक नाम बतायें।
उत्तर:
दक्कन पठार

प्रश्न 39.
किस पर्वत के कारण दक्कन पठार वृष्टि छाया है?
उत्तर:
पश्चिमी घाट।

प्रश्न 40.
प्रायद्वीपीय भारत में अधिकतर कुएं क्यों सूख जाते हैं तथा नदियां छोटे मार्ग में क्यों सिकुड़ जाती हैं?
उत्तर:
अधिक गर्मी होने के कारण

प्रश्न 41.
पठार तथा पहाड़ियां गर्मियों में ठण्डे क्यों होते है ?
उत्तर:
अधिक ऊंचाई होने के कारण।

प्रश्न 42.
सम में कौन-सी फसल गर्मियों की वर्षा से लाभ प्राप्त करती है?
उत्तर:
चाय

प्रश्न 43.
Mango Showers किन फसलों के लिये लाभदायक है?
उत्तर:
चाय तथा कहवा

प्रश्न 44.
भारत में जून सबसे अधिक गर्म महीना होता है जुलाई नहीं, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि जुलाई महीने में भारी वर्षा होने के कारण तापमान 10°C तक कम हो जाता है।

प्रश्न 45.
कौन – सा तटीय मैदान दक्षिण पश्चिम मानसून से अधिकतर वर्षा प्राप्त करता है?
उत्तर:
पश्चिमी तटीय मैदान।

प्रश्न 46.
पूर्व मानसून से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मानसून का समय से पहले आने के कारण कुछ स्थानीय पवनें पूर्व – मानसून वर्षा करती हैं।

प्रश्न 47.
बाड़मेर (राजस्थान) में दिन का उच्चतम तापमान कितना है?
उत्तर:
50°C.

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प्रश्न 48.
कारगिल (कश्मीर) में दिसम्बर मास में रात का तापमान कितना है?
उत्तर:
40°C.

प्रश्न 49.
मासिनराम (मेघालय) में वार्षिक वर्षा कितनी है?
उत्तर:
1080 सें०मी०।

प्रश्न 50.
भारत के किस भाग में शीतकाल में उच्च वायु दाब होता है?
उत्तर:
उत्तर- पश्चिमी भारत।

प्रश्न 51.
भारत में सबसे अधिक वार्षिक वर्षा वाला स्थान कौन-सा है?
उत्तर:
मासिनराम (मेघालय)।

प्रश्न 52.
जेट प्रवाह की फरवरी मास में स्थिति बताओ।
उत्तर:
25°N अक्षांश।

प्रश्न 53.
भारत में जुलाई मास में किस भाग में न्यून वायु दाब होता है?
उत्तर:
उत्तर-पश्चिमी भारत|

प्रश्न 54.
उत्तरी भारत से कब मानसून पवनें लौटती हैं?
उत्तर:
सितम्बर मास में।

प्रश्न 55.
भारत के किस भाग में पश्चिमी विक्षोभ वर्षा करते हैं?
उत्तर:
उत्तर-पश्चिमी भारत।

प्रश्न 56.
भारत के किस भाग में शीतकाल में लौटती मानसून पवनें वर्षा करती हैं?
उत्तर:
कोरोमण्डल तट पर।

प्रश्न 57.
इलाहाबाद नगर के समीप कौन-सी सम-वर्षा रेखा स्थित है?
उत्तर:
100 सेंमी०।

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प्रश्न 58.
राजस्थान में वर्षा की परिवर्तनशीलता का गुणांक क्या है?
उत्तर:
50-80 प्रतिशत।

प्रश्न 59.
लू भारत में कब चलती है?
उत्तर:
ग्रीष्म ऋतु में (मई-जून)।

प्रश्न 60.
भारत के किन राज्यों में ‘आम्र वर्षा’ होती है?
उत्तर:
केरल, कर्नाटक एवं गोआ।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
‘मानसून’ शब्द से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
मानसून शब्द वास्तव में अरबी भाषा के शब्द ‘मौसम’ से बना है। मानसून शब्द का अर्थ है मौसम के अनुसार पवनों के ढांचे में परिवर्तन होना मानसून व्यवस्था के अनुसार पवनें या मौसमी पवनें (Seasonal winds) चलती हैं जिनकी दिशा मौसम के अनुसार विपरीत हो जाती है। ये पवनें ग्रीष्मकाल के 6 मास समुद्र से स्थल की ओर तथा शीतकाल के 6 मास स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं।

प्रश्न 2.
भारतीय मौसम के रचना तन्त्र को प्रभावित करने वाले तीन महत्त्वपूर्ण कारक कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
भारतीय मौसम के रचना तन्त्र को निम्नलिखित तीन कारक प्रभावित करते हैं।

  1. दाब तथा हवा का धरातलीय वितरण जिसमें मानसून पवनें, कम वायु दाब क्षेत्र तथा उच्च वायु दाब क्षेत्रों की स्थिति महत्त्वपूर्ण कारक हैं।
  2. ऊपरी वायु परिसंचरण (Upper air circulation) में विभिन्न वायु राशियां तथा जेट प्रवाह महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं।
  3. विभिन्न वायु विक्षोभ (Atmospheric disturbances) में उष्ण कटिबन्धीय तथा पश्चिमी चक्रवात द्वारा वर्षा होना महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालती है।

प्रश्न 3.
भारत में सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करने वाला स्थान कौन-सा है?
उत्तर:
भारत में सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करने वाला स्थान मासिनराम ( Mawsynram) है। यहां औसत वार्षिक वर्षा 1080 सें० मी० है। यह स्थान मेघालय में खासी पहाड़ियों की दक्षिणी ढाल कर 1500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मासिनराम में वर्षा की मात्रा 1080 सें०मी० है।

प्रश्न 4.
भारतीय मानसून की तीन प्रमुख विशेषताएं बताओ।
उत्तर:
भारतीय मानसून व्यवस्था की तीन प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं

  1. वायु दिशा में परिवर्तन ( मौसम के अनुसार )।
  2. मानसून पवनों का अनिश्चित तथा संदिग्ध होना।
  3. मानसून पवनों का प्रादेशिक स्वरूप भिन्न-भिन्न होते हुए भी जलवायु की व्यापक एकता।

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प्रश्न 5.
पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारत के किस भाग में वे जाड़े की ऋतु में वर्षा लाते हैं?
उत्तर:
वायु मण्डलों की स्थायी दाब पेटियों में कई प्रकार के विक्षोभ उत्पन्न होते हैं। पश्चिमी विक्षोभ भी एक प्रकार के निम्न दाब केन्द्र (चक्रवात) हैं जो पश्चिमी एशिया तथा भूमध्यसागर के निकट के प्रदेशों में उत्पन्न होते हैं ये चक्रवात पश्चिमी जेट प्रवाह (Jet Stream) के कारण पूर्व की ओर ईरान, पाकिस्तान तथा भारत की ओर आते हैं। भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में जाड़े की ऋतु में ये चक्रवात क्रियाशील होते हैं। इन चक्रवातों के कारण जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में वर्षा होती है । यह वर्षा रबी की फसल (Winter Crop) विशेषकर गेहूं के लिए बहुत लाभदायक होती है। औसत वर्षा 20 सें० मी० से 50 सें० मी० तक होती है

प्रश्न 6.
लू (Loo) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
लू एक स्थानीय हवा है। यह ग्रीष्मकाल में उत्तरी भारत के कई भागों में दिन के समय चलती है। यह एक प्रबल, गर्म, धूल भरी हवा है जिसके कारण प्रायः तापमान 40°C से अधिक रहता है। लू की गर्मी असहनीय होती है जिससे प्रायः लोग इस से बीमार पड़ जाते हैं।

प्रश्न 7.
‘मानसून प्रस्फोट’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
भारत के पश्चिमी तट पर अरब सागर की मानसून पवनें दक्षिणी-पश्चिमी दिशा में चलती हैं। यहां ये पवनें जून के प्रथम सप्ताह में अचानक आरम्भ हो जाती हैं। मानसून के इस अकस्मात आरम्भ को ‘मानसून प्रस्फोट’ (Monsoon Burst) कहा जाता है क्योंकि मानसून आरम्भ होने पर बड़े ज़ोर की वर्षा होती है । जैसे किसी ने पानी से भरा गुब्बारा फोड़ दिया हो।

प्रश्न 8.
मानसूनी वर्षा की तीन प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर:
मानसूनी वर्षा की निम्नलिखित विशेषताएं हैं

  1. मौसमी वर्षा
  2. अनिश्चित वर्षा
  3. वर्षा का असमान वितरण
  4. वर्षा का लगातार न होना
  5. तट से दूर क्षेत्रों में कम वर्षा होना।

प्रश्न 9.
भारत में कितनी ऋतुएं होती हैं? क्या उनकी अवधि में दक्षिण से उत्तर कोई अन्तर मिलता है? अगर हां तो क्यों?
उत्तर:
भारत के मौसम को ऋतुवत् ढांचे के अनुसार चार ऋतुओं में बांटा जाता है।

  1. शीत ऋतु – दिसम्बर से फरवरी तक
  2. ग्रीष्म ऋतु – मार्च से मध्य जून तक
  3. वर्षा ऋतु – मध्य जून से मध्य सितम्बर तक
  4. शरद् ऋतु – मध्य सितम्बर से दिसम्बर तक।

इन ऋतुओं की अवधि में प्रादेशिक अन्तर पाए जाते हैं। दक्षिण से उत्तर की ओर जाते हुए विभिन्न प्रदेशों की ऋतुओं की अवधि में अन्तर पाया जाता है। दक्षिणी भारत में कोई स्पष्ट शीत ऋतु ही नहीं होती। तटीय भागों में कोई ऋतु परिवर्तन नहीं होता दक्षिण भारत में सदैव ग्रीष्म ऋतु रहती है। इसका मुख्य कारण यह है कि दक्षिणी भाग उष्ण कटिबन्ध में स्थित है। यहां सारा साल ग्रीष्म ऋतु रहती है, परन्तु उत्तरी भारत शीत-उष्ण कटिबन्ध में स्थित है। यहां स्पष्ट रूप से दो ऋतुएं हैं – ग्रीष्म तथा शीत ऋतु।

प्रश्न 10.
जेट प्रवाह क्या है? समझाइए।
उत्तर:
मानसून पवनों की उत्पत्ति का एक कारण ‘जेट प्रवाह’ भी माना है। ऊपरी वायुमण्डल में लगभग तीन किलोमीटर की ऊंचाई तक तीव्रगामी धाराएं चलती हैं जिन्हें जेट प्रवाह (Jet Stream) कहा जाता है। ये जेट प्रवाह 20° S, 40°N अक्षांशों के मध्य नियमित रूप से चलता है। हिमालय पर्वत के अवरोध के कारण ये प्रवाह दो भागों में बंट जाते हैं – उत्तरी जेट प्रवाह तथा दक्षिणी जेट प्रवाह दक्षिणी प्रवाह भारत की जलवायु को प्रभावित करता है।

प्रश्न 11.
पश्चिमी जेट प्रवाह जाड़े के दिनों में किस प्रकार पश्चिमी विक्षोभ को भारतीय उपमहाद्वीप में लाने में मदद करते हैं?
उत्तर:
जेट प्रवाह की दक्षिणी शाखा भारत में हिमालय पर्वत के दक्षिणी तथा पूर्वी भागों में बहती है। जेट प्रवाह की दक्षिणी शाखा की स्थिति 25° उत्तरी अक्षांश के ऊपर होती है। जेट प्रवाह की यह शाखा भारत में शीतकाल में पश्चिमी विक्षोभ लाने में सहायता करती है। पश्चिमी एशिया तथा भूमध्यसागर के निकट निम्न दाब तन्त्र में ये विक्षोभ उत्पन्न होते हैं। ये जेट प्रवाह के साथ-साथ ईरान तथा पाकिस्तान को पार करते हुए भारत आ जाते हैं। जेट प्रवाह के प्रभाव से उत्तर-पश्चिमी भारत में शीतकाल में औसत रूप से चार-पांच चक्रवात पहुंचते हैं जो इस भाग में वर्षा करते हैं।

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प्रश्न 12.
अन्तर- उष्ण कटिबंधीय अभिसरण कटिबन्ध (I. I. C. Z.) क्या है?
उत्तर:
अन्तर- उष्ण कटिबंधीय अभिसरण कटिबंध ( I. T. C. Z. ):
भूमध्य रेखीय निम्न वायुदाब कटिबन्ध है जो धरातल के निकट पाया जाता है। इसकी स्थिति उष्ण कटिबन्ध के बीच सूर्य की स्थिति के अनुसार बदलती रहती है। ग्रीष्मकाल में इसकी स्थिति उत्तर की ओर तथा शीतकाल में दक्षिण की ओर सरक जाती है। यह भूमध्य रेखीय निम्न दाब द्रोणी दोनों दिशाओं में हवाओं के प्रवाह को प्रोत्साहित करती है।

प्रश्न 13.
कौन-कौन से कारण भारतीय उपमहाद्वीप में तापमान वितरण को नियन्त्रित करते हैं?
उत्तर:
भारतीय उपमहाद्वीप में तापमान वितरण में काफ़ी अन्तर पाए जाते हैं। भारत मुख्य रूप से मानसून खण्ड में स्थित होने के कारण गर्म देश है, परन्तु कई कारकों के प्रभाव से विभिन्न प्रदेशों में तापमान वितरण में विविधता पाई जाती है। ये कारक निम्नलिखित हैं

  1. अक्षांश या भूमध्य रेखा से दूरी
  2. धरातल का प्रभाव
  3. पर्वतों की स्थिति
  4. सागर से दूरी
  5. प्रचलित पवनें
  6. चक्रवातों का प्रभाव।

प्रश्न 14.
भारत के अत्यधिक ठण्डे भाग कौन-कौन से हैं और क्यों?
उत्तर:
भारत के उत्तर-पश्चिमी पर्वतीय प्रदेश में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा हिमालय पर्वतीय प्रदेश में अधिक ठण्डे तापक्रम पाए जाते हैं। कश्मीर में कारगिल नामक स्थान पर तापक्रम न्यूनतम – 40°C तक पहुंच जाता है। इन प्रदेशों में अत्यधिक ठण्डे तापक्रम होने का मुख्य कारण यह है कि ये प्रदेश सागर तल से अधिक ऊंचाई पर स्थित हैं। इन पर्वतीय प्रदेशों में शीतकाल में हिमपात होता है तथा तापमान हिमांक से नीचे चला जाता है।

प्रश्न 15.
भारत के अत्यधिक गर्म भाग कौन-कौन से हैं और उसके कारण क्या हैं?
उत्तर:
भारत में सबसे अधिक तापमान राजस्थान के पश्चिमी भाग में पाए जाते हैं। यहां ग्रीष्म ऋतु में बाड़मेर क्षेत्र में दिन का तापमान 48°C से 50°C तक पहुंच जाता है। इस प्रदेश में उच्च तापमान मिलने का मुख्य कारण समुद्र तल से दूरी है । यह प्रदेश देश के भीतरी भागों में स्थित है। यहां सागर का समकारी प्रभाव नहीं पड़ता । ग्रीष्म काल लू के कारण भी तापमान बढ़ जाता है। रेतीली मिट्टी तथा वायु में नमी की कमी के कारण भी तापमान ऊंचे रहते हैं।

प्रश्न 16.
उन चार महीनों के नाम बताइए जिन में भारत में अधिकतम वर्षा होती है।
उत्तर:
भारत में मौसमी वर्षा के कारण अधिकतर वर्षा ग्रीष्म काल में चार महीनों में होती है। इसे वर्षा ऋतु कहा जाता है। अधिकतम वर्षा जून-जुलाई, अगस्त तथा सितम्बर के महीनों में ग्रीष्मकाल की मानसून पवनों द्वारा होती है।

प्रश्न 17.
कोपेन की जलवायु वर्गीकरण की पद्धति किन दो तत्त्वों पर आधारित है?
उत्तर”:
कोपेन ने भारत के जलवायु प्रदेशों का वर्गीकरण किया है। इस वर्गीकरण का आधार दो तत्त्वों पर आधारित है। इसमें तापमान तथा वर्षा के औसत मासिक मान का विश्लेषण किया गया है। प्राकृतिक वनस्पति द्वारा किसी स्थान के तापमान और वर्षा के प्रभाव को आंका जाता है।

प्रश्न 18.
भारत में अधिकतम एवं निम्नतम वर्षा प्राप्त करने वाले भाग कौन-कौन-से हैं? कारण बताइए।
उत्तर:
अधिकतम वर्षा वाले भाग- भारत में निम्नलिखित प्रदेशों में 200 से० मी० से अधिक वर्षा होती है

  1. उत्तर-पूर्वी हिमालयी प्रदेश ( गारो – खासी पहाड़ियां )।
  2. पश्चिमी तटीय मैदान तथा पश्चिमी घाट।

कारण:
ये प्रदेश पर्वतीय प्रदेश हैं तथा मानसून पवनों के सम्मुख स्थित हैं। उत्तर- र-पूर्वी हिमालय प्रदेश में खाड़ी बंगाल की मानसून पवनें वर्षा करती हैं। पश्चिमी घाट की सम्मुख ढाल पर अरब सागर की मानसून शाखा अत्यधिक वर्षा करती है।
JAC Class 11 Geography Important Questions Chapter 4 जलवायु  2
निम्नतम वर्षा वाले भाग: भारत के निम्नलिखित भागों में 20 सें० मी० से कम वर्षा होती है

  1. पश्चिमी राजस्थान में थार मरुस्थल ( बाड़मेर क्षेत्र),
  2. कश्मीर में लद्दाख क्षेत्र,
  3. प्रायद्वीप में दक्षिण पठार

कारण: राजस्थान में अरावली पर्वत अरब सागर की मानसून पवनों के समानान्तर स्थित है। यह पर्वत मानसून पवनों को रोक नहीं पाता। इसलिए पश्चिमी राजस्थान शुष्क क्षेत्र रह जाता है। प्रायद्वीपीय पठार पश्चिमी घाट की वृष्टि छाया में स्थित होने के कारण शुष्क रहता है। इसी प्रकार लद्दाख हिमालय की वृष्टि छाया में स्थित होने के कारण कम वर्षा प्राप्त करता है।

JAC Class 11 Geography Important Questions Chapter 4 जलवायु

प्रश्न 19.
भारतीय मानसून पर एल-नीनो का प्रभाव बताओ।
उत्तर:
एल-नीनो और भारतीय मानसून:
एल-नीनो एक जटिल मौसम तन्त्र है। यह हर पाँच या दस साल बाद प्रकट होता रहता है। इसके कारण संसार के विभिन्न भागों में सूखा, बाढ़ और मौसम की चरम अवस्थाएं आती हैं। महासागरीय और वायुमण्डलीय तन्त्र इसमें शामिल होते हैं। पूर्वी प्रशान्त महासागर में यह पेरू के तट के निकट कोष्ण समुद्री धारा के रूप में प्रकट होता है। इससे भारत सहित अनेक स्थानों का मौसम प्रभावित होता है। भारत में मानसून की लम्बी अवधि के पूर्वानुमान के लिए एल-नीनो का उपयोग होता है। सन् 1990-91 में एल-नीनो का प्रचंड रूप देखने को मिला था । इसके कारण देश के अधिकतर भागों में मानसून के आगमन में 5 से 12 दिनों तक की देरी हो गई थी।

प्रश्न 20.
कोपेन द्वारा जलवायु के प्रकारों के लिए अक्षरों का संकेत किस प्रकार प्रयोग किया गया?
उत्तर:
कोपेन ने जलवायु के प्रकारों को निर्धारित करने के लिए अक्षरों का संकेत के रूप में प्रयोग किया जैसा कि ऊपर दिया गया है। प्रत्येक प्रकार को उप-प्रकारों में विभाजित किया गया है। इस विभाजन में तापमान और वर्षा के वितरण में मौसमी भिन्नताओं को आधार बनाया गया है। उसने अंग्रेज़ी के बड़े अक्षर S को अर्द्ध मरुस्थल के लिए और W को मरुस्थल लिए प्रयोग किया। इसी तरह उप-विभागों को परिभाषित करने के लिए अंग्रेज़ी के निम्नलिखित छोटे अक्षरों का उपयोग किया है जैसे – f (पर्याप्त वर्षण), m ( शुष्क मानसून होते हुए भी वर्षा वन) w (शुष्क शीत ऋतु ), h (शुष्क और गरम ), c (चार महीनों से कम अवधि में औसत तापमान 10° से अधिक) और g (गंगा का मैदान)।

प्रश्न 21.
भारत में गरमी की लहर का वर्णन करो।
उत्तर:
भारत के कुछ भागों में मार्च से लेकर जुलाई के महीनों की अवधि में असाधारण रूप से गरम मौसम के दौर आते हैं। ये दौर एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश की ओर खिसकते रहते हैं। इन्हें गरमी की लहर कहते हैं। गरमी की लहर से प्रभावित इन प्रदेशों के तापमान सामान्य से 6° से अधिक रहते हैं । सामान्य से 8° से या इससे अधिक तापमान के बढ़ जाने पर चलने वाली गरमी की लहर की प्रचंड (severe) माना जाता है। इसे उत्तर भारत में ‘लू’ कहते हैं।

प्रचंड गरमी की लहर की अवधि जब बढ़ जाती है तब किसानों के लिए गंभीर समस्याएं पैदा हो जाती हैं। बड़ी संख्या में मनुष्य और पशु मौत के मुंह में चले जाते हैं। दक्षिण के केरल और तमिलनाडु राज्यों तथा पांडिचेरी, लक्षद्वीप तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को छोड़कर देश के लगभग सभी भागों में गरमी की लहर आती है। उत्तर-पश्चिम भारत और उत्तर-प्रदेश में सबसे अधिक गरमी की लहरें आती हैं। साल में कम-से-कम गरमी की एक लहर तो आती ही है।

प्रश्न 22.
भारत में शीत लहर का वर्णन करो।
उत्तर:
उत्तर पश्चिम भारत में नवम्बर से लेकर अप्रैल तक ठंडी और शुष्क हवाएं चलती हैं। जब न्यूनतम तापमान सामान्य से 6° से नीचे चला जाता है, तब इसे शीत लहर कहते हैं। जम्मू और कश्मीर, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में ठिठुराने वाली शीत लहर चलती है। जम्मू और कश्मीर में औसतन साल में कम-से-कम चार शीत लहर तो आती हैं। इसके विपरीत गुजरात और पश्चिमी मध्य प्रदेश में साल में एक शीत लहर आती है। ठिठुराने वाली शीत लहरों की आवृत्ति पूर्व और दक्षिण की ओर घट जाती है। दक्षिणी राज्यों में सामान्य शीत लहर नहीं चलती।

प्रश्न 23.
भारत के पश्चिमी तटीय प्रदेशों में वार्षिक वर्षा के विचरण गुणांक न्यूनतम तथा कच्छ और गुजरात में अधिक क्यों हैं?
उत्तर:
भारतीय वर्षा की मुख्य विशेषता इसमें वर्ष-दर- वर्ष होने वाली परिवर्तिता है। एक ही स्थान पर किसी वर्ष वर्षा अधिक होती है तो किसी वर्ष बहुत कम इस प्रकार वास्तविक वर्षा की मात्रा औसत वार्षिक वर्षा से कम या अधिक हो जाती है। वार्षिक वर्षा की इस परिवर्तनशीलता को वर्षा की परिवर्तिता (Variability of Rainfall) कहते हैं। यह परिवर्तिता निम्नलिखित फार्मूले से निकाली जाती है
JAC Class 11 Geography Important Questions Chapter 4 जलवायु  9

इस मूल्य को विचरण गुणांक ( Co-efficient of Variation ) कहा जाता है। भारत के पश्चिमी तटीय प्रदेश में यह विचरण गुणांक 15% से कम है। यहां सागर से समीपता के कारण मानसून पवनों का प्रभाव प्रत्येक वर्ष एक समान रहता है तथा वर्षा की मात्रा में विशेष परिवर्तन नहीं होता। कच्छ तथा गुजरात में विचरण गुणांक 50% से 80% तक पाया जाता है। यहां मानसून पवनें बहुत ही अनिश्चित होती हैं। इन पवनों को रोकने के लिए ऊंचे पर्वतों का अभाव है। इसलिए वर्षा की मात्रा में अधिक उतार-चढ़ाव होता रहता है।

प्रश्न 24.
राजस्थान का पश्चिमी भाग क्यों शुष्क है?
अथवा
‘दक्षिण-पश्चिमी मानसून की ऋतु में राजस्थान का पश्चिमी भाग लगभग शुष्क रहता है’ इस कथन के पक्ष में तीन महत्त्वपूर्ण कारण दीजिए।
उत्तर:
राजस्थान का पश्चिमी भाग एक मरुस्थल है। यहां वार्षिक वर्षा 20 सेंटीमीटर से भी कम है। राजस्थान में अरावली पर्वत दक्षिण-पश्चिमी मानसून पवनों के समानान्तर स्थित होने के कारण इन पवनों को रोक नहीं पाता। इसलिए यहां वर्षा नहीं होती। खाड़ी बंगाल की मानसून पवनें इस प्रदेश तक पहुंचते-पहुंचते शुष्क हो जाती हैं। ये पवनें नमी समाप्त होने के कारण वर्षा नहीं करतीं। यह प्रदेश हिमालय पर्वत से अधिक दूर है। इसलिए यहां वर्षा का अभाव है।

प्रश्न 25.
मासिनराम संसार में सर्वाधिक वर्षा क्यों प्राप्त करता है?
उत्तर:
मासिनराम खासी पहाड़ियों (Meghalaya) की दक्षिणी ढलान पर 1500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां औसत वार्षिक वर्षा 1187 सेंटीमीटर है तथा यह स्थान संसार में सबसे अधिक वर्षा वाला स्थान है। यह स्थान तीन ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ है। यहां धरातल की आकृति कीपनुमा (Funnel Shape) बन जाती है। खाड़ी बंगाल से आने वाली मानसून पवनें इन पहाड़ियों में फंस कर भारी वर्षा करती हैं। ये पवनें इन पहाड़ियों से बाहर निकलने का प्रयत्न करती हैं परन्तु बाहर नहीं निकल पातीं। इस प्रकार ये पवनें फिर ऊपर उठती हैं तथा फिर वर्षा करती हैं। सन् 1861 में यहां 2262 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा रिकार्ड की गई।

प्रश्न 26.
तमिलनाडु के तटीय प्रदेशों में अधिकांश वर्षा जाड़े में क्यों होती है?
उत्तर:
तमिलनाडु राज्य भारत के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित है। यहां शीतकाल की उत्तर-पूर्वी मानसून पवनें ग्रीष्मकाल की दक्षिण-पश्चिमी मानसून पवनों की अपेक्षा अधिक वर्षा करती हैं। ग्रीष्मकाल में यह प्रदेश पश्चिमी घाट की वृष्टि छाया (Rain Shadow) में स्थित होने के कारण कम वर्षा प्राप्त करती हैं। शीतकाल में लौटती हुई मानसून पवनें खाड़ी बंगाल को पार करके नमी ग्रहण कर लेती हैं। ये पवनें पूर्वी घाट की पहाड़ियों से टकरा कर वर्षा करती हैं। इस प्रकार शीतकाल में यह प्रदेश आर्द्र पवनों के सम्मुख होने के कारण अधिक वर्षा प्राप्त करता है, परन्तु ग्रीष्मकाल में वृष्टि छाया में होने के कारण कम वर्षा प्राप्त करता है।

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प्रश्न 27.
भारत में उत्तर-पश्चिमी मैदान में शीत ऋतु में वर्षा क्यों होती है?
उत्तर:
भारत में उत्तर- पश्चिमी भाग में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शीतकाल में चक्रवातीय वर्षा होती है। ये चक्रवात पश्चिमी एशिया तथा भूमध्यसागर में उत्पन्न होते हैं तथा पश्चिमी जेट प्रवाह के साथ-साथ भारत में पहुंचते हैं। औसतन शीत ऋतु में 4 से 5 चक्रवात दिसम्बर से फरवरी के मध्य इस प्रदेश में वर्षा करते हैं। पर्वतीय भागों में हिमपात होता है। पूर्व की ओर इस वर्षा की मात्रा कम होती है। इन प्रदेशों में वर्षा 5 सेंटीमीटर से 25 सेंटीमीटर तक होती है।

प्रश्न 28.
दक्षिण-पश्चिमी मानसून की एक परिघटना इसकी क्रम भंग ( वर्षा की अवधि के मध्य शुष्क मौसम के क्षण ) की प्रवृत्ति क्यों है?
उत्तर:
भारत में अधिकतर वर्षा ग्रीष्मकाल की दक्षिण-पश्चिमी मानसून पवनों द्वारा होती है। इन पवनों द्वारा वर्षा निरन्तर न होकर कुछ दिनों या सप्ताहों के अन्तर पर होती है। इस काल में एक लम्बा शुष्क मौसम (Dry Spell) आ जाता है। इससे इन पवनों द्वारा वर्षा का क्रम भंग हो जाता है। इसका मुख्य कारण उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात (Depressions) हैं जो खाड़ी बंगाल या अरब सागर में उत्पन्न होते हैं। ये चक्रवात मानसून वर्षा की मात्रा को अधिक करते हैं। परन्तु इन चक्रवातों के अनियमित प्रवाह के कारण कई बार एक लम्बा शुष्क समय आ जाता है जिससे फसलों को क्षति पहुंचती है।

प्रश्न 29.
” जैसलमेर की वार्षिक वर्षा शायद ही कभी 12 सेंटीमीटर से अधिक होती है।” कारण बताओ।
उत्तर;
जैसलमेर राजस्थान में अरावली पर्वत के पश्चिमी भाग में स्थित है। यह प्रदेश अरब सागर की मानसून पवनों के प्रभाव में है। ये पवनें अरावली पर्वत के समानान्तर चलती हुई पश्चिम से होकर आगे बढ़ जाती हैं जिससे यहां वर्षा नहीं होती। खाड़ी बंगाल की मानसून पवनें यहां तक पहुंचते-पहुंचते शुष्क हो जाती हैं। यह प्रदेश पर्वतीय भाग से भी बहुत दूर है। इसलिए यह प्रदेश वर्षा ऋतु में शुष्क रहता है जबकि सारे भारत में वर्षा होती है। औसत वार्षिक वर्षा 12 सेंटीमीटर से भी कम है। इसके विपरीत गारो, खासी पहाड़ियों में भारी वर्षा होती है। इसलिए यह कहा जाता है कि गारो पहाड़ियों में एक दिन की वर्षा जैसलमेर की दस साल की वर्षा से अधिक होती है।

प्रश्न 30.
भू-मण्डलीय तापन का प्रभाव बताओ।
उत्तर:
भू-मण्डलीय तापन का प्रभाव (Global warming):
प्राचीन काल में जलवायु में परिवर्तन हुआ है इसमें आज भी परिवर्तन हो रहे हैं। भारत में जलवायु परिवर्तन के अनेक ऐतिहासिक और भू-वैज्ञानिक प्रमाण मिलते हैं। इस परिवर्तन के लिए अनेक प्राकृतिक एवं मानवकृत कारक उत्तरदायी हैं। ऐसा कहा जाता है कि भू-मण्डलीय तापन के प्रभाव से ध्रुवीय व हिम की चादरें और पर्वतीय हिमानियां पिघल जाएंगी। इसके परिणामस्वरूप समुद्रों में जल की मात्रा बढ़ जाएगी। आजकल संसार के तापमान में काफ़ी वृद्धि हो रही है। मानवीय क्रियाओं द्वारा उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड की वृद्धि चिन्ता का प्रमुख कारण है।

जीवाश्म ईंधनों के जलने से वायुमण्डल में इस गैस की मात्रा क्रमशः बढ़ रही है। कुछ अन्य गैसें जैसे मीथेन, क्लोरो-फ्लोरो कार्बन, ओज़ोन और नाइट्रस ऑक्साइड, वायुमण्डल में अल्प मात्रा में विद्यमान हैं। इन्हें तथा कार्बन डाइऑक्साइड को हरितगृह गैसें कहते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में अन्य चार गैसें दीर्घ तरंगी विकिरण का ज्यादा अच्छी तरह से अवशोषण करती हैं। इसीलिए हरित गृह प्रभाव को बढ़ाने में उनका अधिक योगदान है। इन्हीं के प्रभाव से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है।

विगत 150 वर्षों में पृथ्वी की सतह का औसत वार्षिक तापमान बढ़ा है। ऐसा अनुमान है कि सन् 2100 में भू-मण्डलीय तापमान में लगभग 2° सेल्सियस की वृद्धि हो जाएगी। तापमान की इस वृद्धि से कई अन्य परिवर्तन भी होंगे। इनमें से एक है गरमी के कारण हिमानियों और समुद्री बर्फ के पिघलने से समुद्र तल का ऊंचा होना प्रचलित पूर्वानुमान के अनुसार औसत समुद्र तल 21वीं शताब्दी के अन्त तक 48 से०मी० ऊंचा हो जाएगा। इसके कारण प्राकृतिक बाढ़ों की संख्या बढ़ जाएगी। जलवायु परिवर्तन के कीटजन्य मलेरिया जैसी बीमारियां बढ़ जाएंगी।

साथ ही वर्तमान जलवायु सीमाएं भी बदल जाएंगी, जिसके कारण कुछ भाग अधिक जलसिक्त (Wet) और कुछ अधिक शुष्क हो जाएंगे। कृषीय प्रतिरूपों के स्थान बदल जाएंगे। जनसंख्या और पारितन्त्र में भी परिवर्तन होंगे। यदि आज का समुद्र तल 50 से०मी० ऊंचा हो जाए, तो भारत के तटवर्ती जल निम्न हो जाएंगे।

प्रश्न 31.
भारतीय मानसून की प्रवृत्ति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मानसून की प्रवृत्ति के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इसके आगमन के समय और निवर्तन (समाप्त) होने के समय में प्रत्येक वर्ष परिवर्तन होता रहता है, कभी अतिवृष्टि और कभी अनावृष्टि की समस्या उत्पन्न होती है जो बाढ़ और सूखे का भी कारण है। मानसूनी वर्षा का रुक-रुक कर होना भी एक समस्या है। अर्थात् मानसूनी वर्षा लगातार नहीं होती। इसमें एक अंतराल पाया जाता है, कभी जून में औसत वर्षा अच्छी होती है, लेकिन जुलाई-अगस्त सूखा पड़ जाता है। स्पष्टतः मानसून की प्रकृति में अस्थिरता पाई जाती है और मानसूनी वर्षा परिवर्तनशील है।

निबन्धात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

प्रश्न 1.
मानसूनी वर्षा की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए और देश की कृषि अर्थव्यवस्था में इसका महत्त्व बताइए
उत्तर:
भारतीय वर्षा की विशेषताएं (Characteristics of Indian Rainfall):
1. मानसूनी वर्षा (Dependence on Monsoons ): भारत की वर्षा का लगभग 85% भाग ग्रीष्म काल की मानसून पवनों द्वारा होता है। यह वर्षा 15 जून से 15 सितम्बर तक प्राप्त होती है जिसे वर्षा – काल कहते हैं।

2. अनिश्चितता (Uncertainty ): भारत में मानसून वर्षा समय के अनुसार एकदम अनिश्चित है। कभी मानसून पवनें जल्दी और कभी देर से आरम्भ होती हैं जिससे नदियों में बाढ़ें आ जाती हैं या फसलें सूखे से नष्ट हो जाती हैं। कई बार मानसून पवनें निश्चित समय से पूर्व ही समाप्त हो जाती हैं जिससे खरीफ की फसल को बड़ी हानि होती है।

3. असमान वितरण (Unequal Distribution ): भारत में वर्षा का प्रादेशिक वितरण असमान है। कई भागों में अत्यधिक वर्षा होती है जबकि कई प्रदेशों में कम वर्षा के कारण अकाल पड़ जाते हैं। देश के 10% भाग में 200 से० मी० से अधिक वर्षा होती है जबकि 25% भाग में 75 से० मी० से भी कम।

4. मूसलाधार वर्षा (Heavy Rains): मानसून वर्षा प्रायः मूसलाधार होती है। इसलिए कहा जाता है, “It pours, it never rains in India. ” मूसलाधार वर्षा से भूमि कटाव तथा नदियों में बाढ़ की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

5. पर्वतीय वर्षा (Relief Rainfall): भारत में मानसून पवनें ऊंचे पर्वतों से टकरा कर भारी वर्षा करती हैं, परन्तु पर्वतों के विमुख ढाल वृष्टि छाया (Rain Shadow) में रहने के कारण शुष्क रह जाते हैं।

6. अन्तरालता (No Continuity ): कभी – कभी वर्षा लगातार न होकर कुछ दिनों या सप्ताहों के अन्तर पर होती है। इस शुष्क समय (Dry Spells) के कारण फसलें नष्ट हो जाती हैं।

7. मौसमी वर्षा (Seasonal Rainfall): भारत की 85% वर्षा केवल चार महीनों के वर्षा काल में होती है । वर्ष का शेष भाग शुष्क रहता है। जिससे कृषि के लिए जल सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। साल में वर्षा के दिन बहुत कम होते हैं।

8. संदिग्ध वर्षा (Variable Rainfall ): भारत के कई क्षेत्रों की वर्षा संदिग्ध है। यह आवश्यक नहीं कि वर्षा हो या न हो। ऐसे प्रदेशों में अकाल पड़ जाते हैं। देश के भीतरी भागों में वर्षा विश्वासजनक नहीं होती।

भारतीय कृषि – व्यवस्था में मानसून वर्षा का महत्त्व (Significance of Monsoons in Agricultural System):
भारत एक कृषि प्रधान देश है। देश की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर करती है। कृषि की सफलता मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है। मानसून पवनें जब समय पर उचित मात्रा में वर्षा करती हैं तो कृषि उत्पादन बढ़ जाता है। मानसून की असफलता के कारण फसलें नष्ट हो जाती हैं। देश में सूखा पड़ जाता है तथा अनाज की कमी अनुभव होती है । मानसून पवनों के समय से पूर्व आरम्भ होने से या देर से आरम्भ होने से भी कृषि को हानि पहुंचती है। कई बार नदियों में बढ़ें आ जाती हैं जिससे फसलों की बुआई ठीक समय पर नहीं हो पाती।

वर्षा के ठीक वितरण के कारण भी वर्ष में एक से अधिक फसलें उगाई जा सकती हैं। इस प्रकार कृषि तथा मानसून पवनों में गहरा सम्बन्ध है । जल सिंचाई के पर्याप्त साधन न होने के कारण भारतीय कृषि को मानसूनी वर्षा पर ही निर्भर करना पड़ता है। कृषि पर ही भारतीय अर्थव्यवस्था टिकी हुई है। कृषि से प्राप्त कच्चे माल पर कई उद्योग निर्भर करते हैं। कृषि ही किसानों की आय का एकमात्र साधन है। मानसून के असफल होने की दशा में सारे देश की आर्थिक व्यवस्था नष्ट- भ्रष्ट हो जाती है। इसलिए देश की अर्थव्यवस्था कृषि पर तथा कृषि मानसूनी वर्षा पर निर्भर है। इसलिए कहा जाता है कि भारतीय बजट मानसून पवनों पर जुआ है। (Indian budget is a gamble on monsoon.)

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प्रश्न 2.
भारत की जलवायु किन-किन तत्त्वों पर निर्भर है?
उत्तर:
भारत एक विशाल देश है। “यहां पर अनेक प्रकार की जलवायु मिलती है।” (‘“There is great diversity of climate in India. ” ) एक कथन के अनुसार, “विश्व की लगभग समस्त जलवायु भारत में मिलती है। ” कहीं समुद्र के निकट सम जलवायु है तो कहीं भीतरी भागों में कठोर जलवायु है। कहीं अधिक वर्षा है तो कहीं बहुत कम। परन्तु भारत, मुख्य रूप से मानसून खण्ड (Monsoon Region) में स्थित होने के कारण, एक गर्म देश है। निम्नलिखित तत्त्व भारत की जलवायु पर प्रभाव डालते हैं

1. मानसून पवनें (Monsoons ):
भारत की जलवायु मूलतः मानसूनी जलवायु है। यह जलवायु विभिन्न मौसमों में प्रचलित पवनों द्वारा निर्धारित होती है। शीत काल की मानसून पवनें स्थल की ओर से आती हैं तथा शुष्क और ठण्डी होती हैं, परन्तु गीष्मकाल की मानसून पवनें समुद्र की ओर से आने के कारण भारी वर्षा करती हैं। इन्हीं पवनों के आधार पर भारत में विभिन्न मौसम बनते हैं।

2. देश का विस्तार (Extent ):
देश के विस्तार का विशेष प्रभाव तापक्रम पर पड़ता है। कर्क रेखा भारत के मध्य से होकर जाती है। देश का उत्तरी भाग शीतोष्ण कटिबन्ध में और दक्षिणी भाग उष्ण कटिबन्ध में स्थित है। इसलिए उत्तरी भाग में शीतकाल तथा ग्रीष्म काल दोनों ऋतुएं होती हैं, परन्तु दक्षिणी भाग सारा वर्ष गर्म रहता है। दक्षिणी भाग में कोई शीत ऋतु नहीं होती।

3. भूमध्य रेखा से समीपता (Nearness to Equator ):
भारत का दक्षिणी भाग भूमध्य रेखा के बहुत निकट है, इसलिए सारा वर्ष ऊंचे तापक्रम मिलते हैं। कर्क रेखा (Tropic of Cancer) भारत के मध्य में से गुज़रती है। इसलिए इसे एक गर्म देश माना जाता है।

4. हिमालय पर्वत की स्थिति (Location and Direction of the Himalayas ):
हिमालय पर्वत की स्थिति का भारत की जलवायु पर भारी प्रभाव पड़ता है। (“The Himalayas act as a climatic barrier. ” ) यह पर्वत मध्य एशिया से आने वाली बर्फीली पवनों को रोकता है और उत्तरी भारत को शीत लहर से बचाता है। हिमालय पर्वत बहुत ऊंचा है तथा खाड़ी बंगाल से उठने वाली मानसून पवनें इसे पार नहीं कर पातीं जिससे उत्तरी भारत में घनघोर वर्षा करती हैं। यदि हिमालय पर्वत न होता तो उत्तरी भारत एक मरुस्थल होता।

5. हिन्द महासागर से सम्बन्ध (Situation of India with respect to Indian Ocean ): भारत की स्थिति हिन्द महासागर के उत्तर में है। ग्रीष्म काल में हिन्द महासागर पर अधिक वायु दबाव होने के कारण ही मानसून पवनें चलती हैं। खाड़ी बंगाल, तमिलनाडु राज्य में शीतकाल की वर्षा का कारण बनता है। इसी खाड़ी से ग्रीष्म काल में चक्रवात (Depressions) चलते हैं जो भारी वर्षा करते हैं।

6. चक्रवात (Cyclones): भारत की जलवायु पर चक्रवात का विशेष प्रभाव पड़ता है। शीतकाल में पंजाब तथा उत्तर प्रदेश में रूम सागर से आने वाले चक्रवातों द्वारा वर्षा होती है। अप्रैल तथा अक्तूबर महीने में खाड़ी बंगाल से चलने वाले चक्रवात भी काफ़ी वर्षा करते हैं।

7. धरातल का प्रभाव (Effects of Relief):
भारत की जलवायु पर धरातल का गहरा प्रभाव पड़ता है। पश्चिमी घाट तथा असम में अधिक वर्षा होती है क्योंकि ये भाग पर्वतों के सम्मुख ढाल पर है, परन्तु दक्षिणी पठार विमुख ढाल पर होने के कारण वृष्टि छाया (Rain Shadow) में रह जाता है जिससे शुष्क रह जाता है। अरावली पर्वत मानसून पवनों के समानान्तर स्थित होने के कारण इन्हें रोक नहीं पाता जिससे राजस्थान में बहुत कम वर्षा होती है। इस प्रकार भारत के धरातल का यहां के तापक्रम, वायु तथा वर्षा पर स्पष्ट नियन्त्रण है । पर्वतीय प्रदेशों में तापमान कम है जबकि मैदानी भाग में अधिक तापक्रम पाए जाते हैं। आगरा तथा दार्जिलिंग एक ही अक्षांश पर स्थित हैं, परन्तु आगरा का जनवरी का तापमान 16°C है जबकि दार्जिलिंग का केवल 4°C है।

8. समुद्र से दूरी (Distance from Sea ):
भारत के तटीय भागों में सम जलवायु मिलता है। जैसे – मुम्बई में जनवरी का तापमान 24°C है तथा जुलाई का तापमान 27°C है। इलाहाबाद समुद्र से बहुत दूर है, वहां जनवरी का तापमान 16°C तथा जुलाई का तापमान 30° C है। इसलिए दक्षिणी भारत तीन ओर समुद्र से घिरा होने के कारण ग्रीष्म में कम गर्मी तथा शीत ऋतु में कम सर्दी पड़ती है।

प्रश्न 3.
“व्यापक जलवायविक एकता के होते हुए भी भारत की जलवायु में प्रादेशिक स्वरूप पाए जाते हैं।” इस कथन की पुष्टि उपयुक्त उदाहरण देते हुए कीजिए।
उत्तर:
भारत एक विशाल देश है। यहां पर अनेक प्रकार की जलवायु मिलती है। परन्तु मुख्य रूप से भारत मानसून पवनों के प्रभावाधीन है। यह मानसून व्यवस्था दक्षिण – पूर्वी एशिया के मानसूनी देशों से भारत को जोड़ती है। इस प्रकार मानसून पवनों के प्रभाव के कारण देश में जलवायविक एकता पाई जाती है। फिर भी देश के विभिन्न भागों में तापमान, वर्षा आदि जलवायु तत्त्वों में काफ़ी अन्तर पाए जाते हैं। विभिन्न प्रदेशों की जलवायु के अलग-अलग प्रादेशिक स्वरूप मिलते हैं। ये प्रादेशिक अन्तर कई कारकों के कारण उत्पन्न होते हैं। जैसे- स्थिति, समुद्र से दूरी, भूमध्य रेखा से दूरी, उच्चावच आदि। ये प्रादेशिक अन्तर एक प्रकार से मानसूनी जलवायु के उपभेद हैं। आधारभूत रूप से सारे देश में जलवायु को व्यापक एकता पाई जाती है।

प्रादेशिक अन्तरं मुख्य रूप से तापमान, वायु तथा वर्षा के ढांचे में पाए जाते हैं।
1. राजस्थान के मरुस्थल में, बाड़मेर तथा चुरू जिले में ग्रीष्म काल में 50°C तक तापमान मापे जाते हैं। इसके पर्वतीय प्रदेशों में तापमान 20°C सैंटीग्रेड के निकट रहता है।

2. दक्षिणी भारत में सारा साल ऊंचे तापमान मिलते हैं तथा कोई शीत ऋतु नहीं होती। उत्तर-पश्चिमी भाग में शीतकाल में तापमान हिमांक से नीचे चले जाते हैं। तटीय भागों में सारा साल समान रूप से दरमियाने तापमान पाए जाते हैं।

3. दिसम्बर मास में द्रास, लेह एवं कारगिल में तापमान – 45°C तक पहुंच जाता है जबकि तिरुवनन्तपुरम तथा चेन्नई में तापमान + 28°C रहता है।

4. इसी प्रकार औसत वार्षिक वर्षा में भी प्रादेशिक अन्तर पाए जाते हैं। एक ओर मासिनराम में (1080 सेंटीमीटर) संसार में सबसे अधिक वर्षा होती है तो दूसरी ओर राजस्थान शुष्क रहता है। जैसलमेर में वार्षिक वर्षा शायद ही 12 सेंटीमीटर से अधिक होती है। गारो पहाड़ियों में स्थित तुरा नामक स्थान में एक ही दिन में उतनी वर्षा हो सकती है जितनी जैसलमेर में दस वर्षों में होती है।

5. एक ओर असम, बंगाल तथा पूर्वी तट पर चक्रवातों के कारण भारी वर्षा होती है तो दूसरी ओर दक्षिण तथा पश्चिमी तट शुष्क रहता है।

6. कई भागों में मानसून वर्षा जून के पहले सप्ताह में आरम्भ हो जाती है तो कई भागों में जुलाई में वर्षा की प्रतीक्षा हो रही होती है। अधिकांश भागों में ग्रीष्म काल में वर्षा होती है तो पश्चिमी भागों में शीतकाल में वर्षा होती है। ग्रीष्म काल में उत्तरी भारत में लू चल रही होती है परन्तु दक्षिणी भारत के तटीय भागों में सुहावनी जलवायु होती है।

7. तटीय भागों में मौसम की विषमता महसूस नहीं होती परन्तु अन्तःस्थ स्थानों में मौसम विषम रहता है। शीतकाल में उत्तर-पश्चिमी भारत में शीत लहर चल रही होती है तो दक्षिणी भारत में काफ़ी ऊंचे तापमान पाए जाते हैं। इस प्रकार विभिन्न प्रदेशों में ऋतु की लहर लोगों की जीवन पद्धति में एक परिवर्तन तथा विभिन्नता उत्पन्न कर देती है। इस प्रकार इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि भारतीय जलवायु में एक व्यापक एकता होते हुए भी प्रादेशिक अन्तर पाए जाते हैं।

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प्रश्न 4.
भारतीय मौसम रचना तन्त्र का वर्णन जेट प्रवाह के सन्दर्भ में कीजिए।
उत्तर:
भारतीय मौसम रचना तन्त्र – मानसून क्रियाविधि निम्नलिखित तत्त्वों पर निर्भर करती है-

  1. वायु दाब ( Pressure) का वितरण।
  2. पवनों (Winds) का धरातलीय वितरण।
  3. ऊपरी वायु परिसंचरण (Upper air circulation)।
  4. विभिन्न वायु राशियों का प्रवाह।
  5. पश्चिमी विक्षोभ (चक्रवात) (Cyclones)।
  6. जेट प्रवाह (Jet Stream)।

1. वायु दाब तथा पवनों का वितरण (Distribution of Atmospheric Pressure and Winds):
शीत ऋतु में भारतीय मौसम मध्य एशिया तथा पश्चिमी एशिया में स्थित उच्च वायु दाब द्वारा प्रभावित होता है। इस उच्च दा केन्द्र से प्रायद्वीप की ओर शुष्क पवनें चलती हैं। भारतीय मैदान के उत्तर पश्चिमी भाग में से शुष्क हवाएं महसूस की जाती हैं। मध्य गंगा घाटी तक सम्पूर्ण उत्तर – पश्चिमी भारत उत्तर – पश्चिमी पवनों के प्रभाव में आ जाता है। ग्रीष्म काल के आरम्भ में सूर्य के उत्तरायण के समय में वायुदाब तथा पवनों के परिसंचरण में परिवर्तन आरम्भ हो जाता है।

उत्तर-पश्चिमी भारत में निम्न वायुदाब केन्द्र स्थापित हो जाता है। भूमध्य रेखीय निम्न दाब भी उत्तर की ओर बढ़ने लगता है। इस के प्रभावाधीन दक्षिणी गोलार्द्ध से व्यापारिक पवनें भूमध्य रेखा को पार करके निम्न वायु दाब की ओर बढ़ती हैं। इन्हें दक्षिण-पश्चिमी मानसून कहते हैं। ये पवनें भारत में ग्रीष्म काल में वर्षा करती हैं।

2. ऊपरी वायु परिसंचरण (Upper Air Circulation ):
वायुदाब तथा पवनें धरातलीय स्तर पर परिवर्तन लाते हैं। परन्तु भारतीय मौसम में ऊपरी वायु परिसंचरण का प्रभाव भी महत्त्वपूर्ण है। ऊपरी वायु में जेट प्रवाह भारत में पश्चिमी विक्षोभ लाने में सहायक हैं। ये जेट प्रवाह भारत के मौसम रचना तन्त्र को प्रभावित करता है।

3. पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances ):
भारत में शीतकाल में निम्न वायुदाब केन्द्रों का विस्तार होता है। ये अवदाब या विक्षोभ भूमध्य सागर में उत्पन्न होते हैं। ये ईरान, पाकिस्तान से होते हुए भारत में जनवरी-फरवरी में वर्षा करते हैं।

4. जेट प्रवाह (Jet Stream ):
जेट प्रवाह धरातल के लगभग 3 किलोमीटर की ऊंचाई पर बहने वाली एक ऊपरी वायु- धारा है। यह वायु-धारा क्षोभ मण्डल के ऊपरी वायु भाग में बहती है। यह वायु धारा पश्चिमी एशिया तथा मध्य एशिया के ऊपर बहने वाली पश्चिमी पवनों की एक शाखा है। यह शाखा हिमालय पर्वत के दक्षिण की ओर पूर्व दिशा बहती है। इस वायु -धारा की स्थिति फरवरी में 25° उत्तरी अक्षांश के ऊपर होती है। यह जेट प्रवाह भारतीय मौसम रचना तन्त्र पर कई प्रकार से प्रभाव डालती है।
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  1. इस जेट प्रवाह के कारण उत्तरी भारत में शीतकाल में उत्तर-पश्चिमी पवनें चलती हैं।
  2. इस वायु -धारा के साथ-साथ पश्चिम की ओर से भारतीय उपमहाद्वीप में शीतकालीन चक्रवात आते हैं। ये चक्रवात भूमध्य सागर में उत्पन्न होते हैं। ये चक्रवात शीतकाल में हल्की-हल्की वर्षा करते हैं।
  3. जुलाई में जेट प्रवाह भारतीय प्रदेशों से लौट चुका होता है। इसका स्थान भूमध्य रेखीय निम्न दाब कटिबन्ध ले लेता है, जो भूमध्य रेखा से उत्तर की ओर सरक जाता है। इसे अन्तर- उष्ण कटिबन्धीय अभिसरण (I.T.C.Z.) कहा जाता है।
  4. इस निम्न दाब के कारण भारत में दक्षिण-पश्चिमी मानसून पवनें, वास्तव में दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों का उत्तर की ओर विस्तार ही है।
  5. हिमालय तथा तिब्बत के उच्च स्थलों के ग्रीष्म काल में गर्म होने तथा विकिरण के कारण भारत में पूर्वी जेट प्रवाह के रूप में एक वायु धारा बहती है। यह पूर्वी जेट प्रवाह उष्ण कटिबन्धीय गर्तों को भारत की ओर लाने में सहायक है। ये गर्त दक्षिण-पश्चिमी मानसून द्वारा वर्षा की मात्रा में वृद्धि करते हैं।

प्रश्न 5.
कोपेन (Koeppen) द्वारा भारत के विभाजित जलवायु प्रदेशों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत मुख्य रूप से एक मानसूनी प्रदेश है। इस विशाल देश में जलवायु की भिन्नता तथा कई प्रादेशिक अन्तरों का होना स्वाभाविक है। देश में मानसूनी जलवायु के कई उप-प्रकार देखे जा सकते हैं। इनके आधार पर भारत को विभिन्न जलवायु विभागों में बांटा जा सकता है। कोपेन का जलवायु वर्गीकरण – जर्मनी के प्रसिद्ध जीव-विज्ञानवेत्ता कोपेन द्वारा संसार को जलवायु विभागों में बांटा गया है। इस विभाजन में मासिक तापमान और वर्षा के औसत मूल्यों के विश्लेषण के आधार पर जलवायु के पांच मुख्य प्रकार माने गए हैं। इस जलवायु प्रदेशों के वर्गों को अंग्रेजी वर्णमाला के बड़े अक्षरों A, B, C, D तथा E द्वारा प्रस्तुत किया गया है। इन वर्गों के उप प्रकार छोटे अक्षरों द्वारा दिखाए गए हैं। संसार को निम्नलिखित पांच जलवायु वर्गों में बांटा गया है।

(A) उष्ण कटिबन्धीय जलवायु।
(B) शुष्क जलवायु।
(C) गर्म जलवायु।
(D) हिम जलवाय।
(E) बर्फीली जलवायु।

कोपेन द्वारा तैयार किए गए जलवायु मानचित्र में भारत को निम्नलिखित जलवायु विभागों में बांटा गया है:

  1. लघु-शुष्क ऋतु वाला मानसून प्रदेश (Amw): इस प्रकार की जलवायु भारत के पश्चिमी तट पर गोआ के दक्षिण में पाई जाती है। यहां ग्रीष्म ऋतु में अधिक वर्षा होती है तथा शुष्क ऋतु बहुत छोटी होती है।
  2. अधिक गर्मी की अवधि में शुष्क ऋतु वाला मानसून प्रदेश (AS): इस प्रकार की जलवायु कोरोमण्डल तट पर तमिलनाडु राज्य में मिलती है। वहां ग्रीष्म ऋतु शुष्क होती है तथा शीत ऋतु में वर्षा होती है।
  3. उष्ण कटिबन्धीय सवाना प्रकार की जलवायु (AW): यह जलवायु प्रायद्वीपीय पठार के अधिकतर भागों में पाई जाती है। यहां शीत ऋतु शुष्क होती है।
  4. आर्द्र शुष्क स्टैपी जलवायु (Bshw): यह जलवायु राजस्थान तथा हरियाणा के मरुस्थलीय भागों में पाई जाती है।
  5. उष्ण मरुस्थलीय प्रकार की जलवायु (Bwhw): यह जलवायु राजस्थान के थार मरुस्थल में बहुत ही कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलती है।
  6. शुष्क शीत ऋतु वाला मानसून प्रदेश (Cwg): यह जलवायु भारत के उत्तरी मैदान में पाई जाती है। यहां अधिकतर वर्षा ग्रीष्म ऋतु में होती है।
  7. लघु ग्रीष्म के साथ शीतल आर्द्र शीत वाली जलवायु (Dfc): यह जलवायु भारत के उत्तरी-पूर्वी भाग में पाई जाती है। यहां शीत ऋतु ठण्डी, आर्द्र तथा ग्रीष्म ऋतु छोटी होती है।
  8. ध्रुवीय प्रकार (E): यह जलवायु कश्मीर तथा उसकी निकटवर्ती मालाओं में पाई जाती है। यहां वर्षा हिमपात के रूप में होती है।

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प्रश्न 6.
भारत में वार्षिक वर्षा के वितरण के बारे में बताइए यह देश के उच्चावच से किस प्रकार सम्बन्धित है?
उत्तर:
भारत में वार्षिक वर्षा का वितरण जलवायु तथा कृषि व्यवस्था पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालता है। भारत में वार्षिक वर्षा का औसत 110 सें० मी० है। परन्तु धरातलीय विभिन्नताओं के कारण इस वितरण में प्रादेशिक अन्तर जाते हैं। वार्षिक वर्षा का स्थानिक तथा मौसमी वितरण असमान है। वार्षिक वर्षा की मात्रा के आधार पर भारत के प्रमुख वर्षा विभाग क्रमशः इस प्रकार हैं

(i) अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्र (Areas of Heavy Rain):
ये वे क्षेत्र हैं जिन में वार्षिक वर्षा 200 सेंटीमीटर से अधिक होती है। ये क्षेत्र हैं – मेघालय, असम, अरुणाचल, पश्चिमी बंगाल का उत्तरी भाग, हिमालय पर्वत की दक्षिणी ढलानें, पश्चिमी तटीय मैदान तथा पश्चिमी घाट की पश्चिमी ढलानें।

(ii) मध्य वर्षा वाले क्षेत्र ( Areas of Moderate Rainfall):
ये वे क्षेत्र हैं जिनमें वार्षिक वर्षा 100 से 200 सेंटीमीटर के बीच होती है। ये क्षेत्र हैं- पश्चिमी बंगाल का दक्षिणी भाग, उड़ीसा, उत्तर-पूर्वी मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश का पूर्वी, एवं उत्तरी भाग, दक्षिणी हिमाचल के पर्वत, पश्चिमी घाट की पूर्वी ढलानें तथा तमिलनाडु के तटीय क्षेत्र। इन क्षेत्रों में वर्षा की वार्षिक मात्रा 100 से 200 सेंटीमीटर के बीच है।

(iii) साधारण वर्षा वाले क्षेत्र (Areas of Average Rainfall):
ये वे क्षेत्र हैं जिनमें वार्षिक वर्षा 50 से 100 सेंटीमीटर के बीच होती है। ये क्षेत्र हैं-उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग, हरियाणा, पंजाब एवं कश्मीर, राजस्थान के पूर्वी भाग, गुजरात तथा दक्षिणी पठार।

(iv) अति न्यून वर्षा वाले क्षेत्र (Areas of Scanty Rainfall):
ये वे क्षेत्र हैं जहां वार्षिक वर्षा 50 सेंटीमीटर से कम होती है। ये क्षेत्र हैं-कश्मीर से लद्दाख, दक्षिणी-पश्चिमी पंजाब, दक्षिण-पश्चिमी हरियाणा, पश्चिमी राजस्थान में विस्तृत थार मरुस्थल तथा गुजरात में कच्छ का रन।
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उच्चावच का वर्षा पर प्रभाव – वार्षिक वर्षा के वितरण से स्पष्ट है कि धरातलीय दिशाओं का वर्षा पर गहरा प्रभाव पड़ता है। भारत में पर्वतीय उच्च प्रदेशों में वर्षा की मात्रा अधिक होती है। जैसे पश्चिमी घाट, गारो, खासी की पहाड़ियां तथा हिमालयी क्षेत्र मैदानी प्रदेशों में कम वर्षा होती है। इसलिए उत्तरी मैदान से दक्षिण की ओर वर्षा कम होती जाती है। जल से भरी मानसून पवनें मार्ग में पड़ने वाले पर्वतों की सम्मुख ढाल पर अधिक वर्षा करती हैं, जबकि इन पर्वतों के विमुख वृष्टि छाया में रहने के कारण शुष्क रहते हैं।

इसी कारण गारो खासी पहाड़ियों में वार्षिक वर्षा की मात्रा 1000 सेंटीमीटर है, परन्तु ब्रह्मपुत्र घाटी तथा शिलांग पठार में यह मात्रा घट कर 200 सेंटीमीटर रह जाती है पश्चिमी घाट के अग्र भाग में मालाबार तट पर वर्षा की मात्रा 300 सें० मी० है। परन्तु पश्चिमी घाट की वृष्टि छाया में पठार पर यह मात्रा केवल 60 सें० मी० है। राजस्थान में अरावली पर्वत मानसून पवनों के समानान्तर स्थित होने के कारण इन पवनों को रोक नहीं पाता तथा ये प्रदेश शुष्क हैं।
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प्रश्न 7.
मानसून पवनों से क्या अभिप्राय है? ये किस प्रकार उत्पन्न होती हैं? शीतकाल तथा ग्रीष्मकाल की मानसून पवनों का वर्णन करो।
उत्तर:
परिभाषा (Definition ) :
मानसून वास्तव में अरबी भाषा के शब्द ” मौसिम” से बना है। इसका सर्वाधिक प्रयोग अरब सागर पर चलने वाली हवाओं के लिए किया गया था। मानसून पवनें वे मौसमी पवनें हैं जिनकी दिशा 6 मास समुद्र से स्थल की ओर तथा शीतकाल
मौसम के अनुसार बिल्कुल विपरीत होती है। ये पवनें ग्रीष्म काल के के 6 मास स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं।

कारण (Causes): मानसून पवनें वास्तव में एक बड़े पैमाने पर स्थल समीर (Land Breeze) तथा जल समीर (Sea Breezes) हैं। इनकी उत्पत्ति का कारण जल तथा स्थल के गर्म व ठण्डा होने में विभिन्नता (Differences in the cooling and heating of Land and Water ) है। जल और स्थल असमान रूप से गर्म और ठण्डे होते हैं। इस प्रकार मौसम के अनुसार वायुदाब में भी अन्तर हो जाता है जिससे हवाओं की दिशा पलट जाती है।

स्थल भाग जल की अपेक्षा जल्दी गर्म तथा जल्दी ठण्डा होता है। दिन के समय समुद्र के निकट स्थल पर कम दबाव (Low Pressure) तथा समुद्र पर उच्च वायु दबाव (High Pressure) होता है। परिणामस्वरूप, समुद्र से स्थल की ओर जल समीर (Sea Breeze) चलती है, परन्तु रात में दिशा विपरीत हो जाती है तथा स्थल से समुद्र की ओर स्थल – समीर (Land Breeze) चलती है। इस प्रकार प्रत्येक दिन वायु में दिशा बदलती रहती है। परन्तु मानसून पवनों की दिशा मौसम के अनुसार बदलती रहती है। ये पवनें तट के समीप के प्रदेशों में नहीं परन्तु एक पूरे महाद्वीप पर चलती हैं इसलिए मानसून पवनों को स्थल- समीर (Land Breeze) तथा जल समीर (Sea Breezes) का एक बड़े पैमाने का दूसरा रूप कह सकते हैं।

मानसून की उत्पत्ति के लिए आवश्यक दशाएं (Necessary Conditions ): मानसून पवनों की उत्पत्ति के लिए ये दशाएं आवश्यक हैं।

  1. एक विशाल महाद्वीप का होना।
  2. एक विशाल महासागर का होना।
  3. स्थल तथा जल भागों के तापमान में काफ़ी अन्तर होना चाहिए।
  4. एक लम्बी तट – रेखा।

मानसूनी क्षेत्र (Areas):
मानसूनी पवनें उष्ण कटिबन्ध से चलती हैं। परन्तु एशिया में ये पवनें 60° उत्तरी अक्षांश तक चलती हैं। इसलिए मानसूनी क्षेत्र दो भागों में बंटे हुए हैं। हिमालय पर्वत इन्हें पृथक् करता है।

1. पूर्वी एशियाई मानसून (East Asia Monsoons ): हिन्द – चीन (Indo-China), चीन तथा जापान क्षेत्र।
2. भारतीय मानसून (India Monsoons ): भारत, पाकिस्तान, बंगला देश तथा म्यांमार क्षेत्र, आस्ट्रेलिया का उत्तरी भाग।

ग्रीष्मकालीन मानसून पवनें (Summer Monsoons ): मौनसून पवनों के उत्पन्न होने तथा इनके प्रभाव को एक ही वाक्य में कहा जा सकता है, “The chain of events is from temperature through pressure and winds to rainfall.”
अथवा
Temp.-Pressure – Winds — Rainfall.
इन मानसूनी पवनों की तीन विशेषताएं हैं

  1. मौसम के साथ दिशा परिवर्तन।
  2. मौसम के साथ वायु दबाव केन्द्रों का उल्ट जाना।
  3. ग्रीष्मकाल में वर्षा।

तापक्रम की विभिन्नता के कारण वायुभार में अन्तर पड़ता है तथा अधिक वायु भार से कम वायु भार की ओर पवनें चलती हैं। समुद्र से आने वाली पवनें वर्षा करती हैं। ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर सीधी पड़ती हैं। इसलिए भारत, चीन तथा मध्य एशिया के मैदान गर्म हो जाते हैं । इन स्थल भागों में वायु दबाव केन्द्र (Low Pressure Centres) स्थापित हो जाते हैं। अतः हिन्द महासागर तथा प्रशान्त महासागर से भारत तथा चीन की ओर समुद्र से स्थल की ओर पवनें (Sea to Land winds) चलती हैं।

भारत में इन्हें दक्षिण-पश्चिमी ग्रीष्मकालीन मानसून (South-West Summer Monsoons) कहते हैं। चीन में इनकी दिशा दक्षिण-पूर्वी होती है। भारत में ये पवनें मूसलाधार वर्षा करती हैं जिसे ” मानसून का फटना” (Burst of Monsoon) भी कहा जाता है। भारत में यह वर्षा बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय कृषि इसी वर्षा पर आधारित है। इसलिए ” भारतीय बजट को मानसून का जुआ” (“Indian budget is a gamble of monsoon”) कहा जाता है।

शीतकालीन मानसून पवनें (Winter Monsoons ):
शीतकाल में मानसून पवनों की उत्पत्ति स्थल भागों पर होती है। सूर्य की किरणें मकर रेखा पर सीधी चमकती हैं, इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध के स्थल भाग आस-पास के सागरों की अपेक्षा ठण्डे हो जाते हैं। मध्य एशिया तथा भारत में राजस्थान प्रदेश में उच्च वायु दबाव हो जाता है। इसलिए इन स्थल भागों से समुद्र की ओर पवनें (Land to Sea Winds) चलती हैं। ये पवनें शुष्क तथा ठण्डी होती हैं। भारत में इन्हें उत्तरी-पूर्वी शीतकालीन मानसून (North East Winter Monsoons) कहते हैं। ये पवनें खाड़ी बंगाल को पार करने के पश्चात् तमिलनाडु प्रदेश में वर्षा करती हैं। भूमध्य रेखा पार करने के पश्चात् आस्ट्रेलिया के तटीय भागों में भी इन्हीं पवनों से वर्षा होती है।

फ्लॉन की विचारधारा (Flohn’s Concept ): मानसून पवनों के तापीय उत्पत्ति में निम्नलिखित त्रुटियां पाई जाती

  1. ग्रीष्मकाल में मानसून वर्षा निरन्तर तथा समान नहीं होती यह वर्षा किसी और तत्त्व जैसे चक्रवात पर निर्भर करती है।
  2. उच्च दाब तथा निम्न दाब केन्द्र इतने अधिक शक्तिशाली नहीं होते कि मौसम के अनुसार पवनों की दिशा उल्ट हो जाए।
  3. उच्च दाब तथा निम्न दाब केन्द्रों की उत्पत्ति केवल तापीय नहीं है।
  4. दैनिक ऋतु मानचित्रों पर ग्रीष्म ऋतु में अनेक तीव्र चक्रवात दिखाए जाते हैं।
  5. यह विचार है कि मानसून किसी मूल पवन व्यवस्था पर आरोपित है।

इन त्रुटियों को देखते हुए फ्लॉन नामक विद्वान् ने तापीय विचारधारा का खण्डन किया और एक नई विचारधारा को जन्म दिया। इसके अनुसार व्यापारिक पवनों के अभिसरण के कारण डोलड्रम के क्षेत्र के दोनों ओर एक सीमान्त उत्पन्न हो जाता है जिसे अन्तर – उष्ण कटिबन्धीय अभिसरण (Inter Tropical Convergence) कहते हैं। ग्रीष्म ऋतु में यह अभिसरण क्षेत्र सूर्य की स्थिति के साथ-साथ उत्तर की ओर खिसक जाता है। फलस्वरूप दक्षिणी गोलार्द्ध से दक्षिणी-पूर्वी व्यापारिक पवनें तथा पश्चिमी भूमध्य रेखीय पवनें उत्तर की ओर खिसक जाती हैं। इस अभिसरण क्षेत्र में चक्रवात् उत्पन्न हो जाते हैं जो भारी वर्षा करते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि दक्षिण-पश्चिम व्यापारिक पवनें तथा चक्रवात ही मानसून पवनों की उत्पत्ति का आधार हैं।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व 

Jharkhand Board JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

बहुचयनात्मक प्रश्न

1. शीत युद्ध का अंत हुआ
(अ) 1991 में
(ब) 1891
(स) 2001 में
(द) 2010 में
उत्तर:
(अ) 1991 में

2. प्रथम खाड़ी युद्ध का सम्बन्ध था
(अ) सोवियत संघ और अमेरिका के अफगानिस्तान विवाद से
(ब) ईरान और इराक के संघर्ष से
(स) अरब-इजरायल संघर्ष से
(द) अमेरिका द्वारा अपने लगभग 34 देशों की सेनाओं के साथ इराक पर हमले से।
उत्तर:
(द) अमेरिका द्वारा अपने लगभग 34 देशों की सेनाओं के साथ इराक पर हमले से।

3. न्यूयार्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादियों का हमला हुआ था
(अ) 11 सितम्बर, 2001
(स) 11 दिसम्बर, 2001
(ब) 11 सितम्बर, 2003
(द) 11 नवम्बर, 2001
उत्तर:
(अ) 11 सितम्बर, 2001

4. एकध्रुवीय शक्ति के रूप में अमरीकी वर्चस्व की शुरुआत हुई
(अ) 1991 से।
(स) 2006 से।
(ब). 1993 से।
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(अ) 1991 से।

5. वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उभरती प्रवृत्ति है।
(अ) एकल ध्रुवीय विश्व व्यवस्था
(ब) निःशस्त्रीकरण
(स) सैनिक गठबंधन
(द) शीत युद्ध में तीव्रता
उत्तर:
(अ) एकल ध्रुवीय विश्व व्यवस्था

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6. ऑपरेशन इनफाइनाइट रीच का सम्बन्ध है।
(अ) तालिबान और अलकायदा के खिलाफ
(ब) पाकिस्तान के खिलाफ
(स) अफगानिस्तान के खिलाफ
(द) सूडान पर मिसाइल से हमला
उत्तर:
(द) सूडान पर मिसाइल से हमला

7. ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म का सम्बन्ध है।
(अ) अमरीका के खिलाफ देशों का समूह
(ब) सोवियत संघ के खिलाफ देशों का समूह
(स) इराक पर हमले के इच्छुक देशों का गठबंधन
(द) भारत व पड़ौसी देशों के गठबंधन
उत्तर:
(स) इराक पर हमले के इच्छुक देशों का गठबंधन

8. अमेरिका ने आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध के रूप में चलाई मुहिम का नाम दिया-
(अ) ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम
(स) ऑपरेशन इराकी फ्रीडम
(ब) ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म
(द) ऑपरेशन इनफाइनाइट रीच
उत्तर:
(अ) ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए 

1. …………………………. के अगस्त में इराकने कुवैत पर हमला किया और उस पर कब्जा जमा लिया।
उत्तर:
1990,

2. अमरीका रक्षा विभाग का मुख्यालय …………………………….. में है।
उत्तर:
पेंटागन,

3. ……………………… में जापानियों ने …………………………… पर हमला किया था।
उत्तर:
1941, पर्ल हार्बर,

4. विश्व की अर्थव्यवस्था में अमरीका की ……………………………. प्रतिशत की हिस्सेदारी है। में की गई थी।
उत्तर:
21

5. विश्व के पहले ‘बिजनेस स्कूल’ की स्थापना सन् ………………………………. में की गई थी।
उत्तर:
1881

6. शीतयुद्ध के बाद अधिकतर मामलों में यू. ए. एन. द्वारा चुप्पी साध लेना एक नाटकीय फैसला था जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति ने ………………………….. की संज्ञा दी।
उत्तर:
नई विश्व व्यवस्था

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
न्यूयार्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला कब हुआ?
उत्तर:
11 सितम्बर, 2001 को।

प्रश्न 2.
ब्रेटनवुड प्रणाली के अन्तर्गत किस प्रकार के नियम तय किये गये?
उत्तर:
ब्रेटनवुड प्रणाली के अन्तर्गत वैश्विक व्यापार के नियम तय किये गये।

प्रश्न 3.
विश्व का पहला बिजनेस स्कूल कहाँ खोला गया?
उत्तर:
संयुक्त राज्य अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑव पेंसिलवेनिया में वाहर्टन स्कूल के नाम से सन् 1881 में विश्व का पहला स्कूल खोला गया।

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प्रश्न 4.
नागरिक परमाणु समझौता किन देशों के मध्य हुआ?
उत्तर:
भारत और अमरीका के बीच हाल ही में नागरिक परमाणु समझौता हुआ।

प्रश्न 5.
फरवरी, 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान हटती इराकी सेना पर अमरीकी विमानों द्वारा जानबूझकर सड़क पर किये गये हमले को विद्वानों ने क्या कहकर आलोचना की है?
उत्तर:
अनेक विद्वानों और पर्यवेक्षकों ने इस हमले को ‘युद्ध अपराध’ की संज्ञा दी है।

प्रश्न 6.
20 मार्च, 2003 को अमरीका ने इराक पर किस कूट नाम से सैन्य हमला किया?
उत्तर:
‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ के कूट नाम से।

प्रश्न 7.
‘हाइवे ऑव डैथ’ (मृत्यु का राजपथ ) किस सड़क को कहा गया है?
उत्तर:
कुवैत और बसरा के बीच की सड़क को।

प्रश्न 8.
सन् 1990 में किस देश ने कुवैत पर आक्रमण कर उसे अपने राज्य में मिला लिया था?
उत्तर:
इराक ने।

प्रश्न 9.
तालिबान किस देश से संबंधित है?
उत्तर:
अफगानिस्तान से

प्रश्न 10.
आतंकवाद के खिलाफ विश्वव्यापी युद्ध के अंग के रूप में अमेरिका ने कौन सा अभियान चलाया?
अथवा
आतंकवाद के विरुद्ध अमेरिका ने कौन-सा अभियान चलाया?
उत्तर:
ऑपरेशन एण्डयूरिंग फ्रीडम।

प्रश्न 11.
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में ताकत का एक ही केन्द्र हो तो इसे किस शब्द के इस्तेमाल से वर्णित करना ज्यादा उचित होगा?
उत्तर:
वर्चस्व ( हेगेमनी) शब्द के इस्तेमाल से।

प्रश्न 12.
प्रथम खाड़ी युद्ध को किस ऑपरेशन के नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
प्रथम खाड़ी युद्ध को ‘ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म’ के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 13.
समकालीन विश्व राजनीति में ‘9/11’ का प्रयोग किस घटना के लिए किया जाता है?
उत्तर:
समकालीन विश्व राजनीति में ‘ 9/11’ का प्रयोग अमेरिका में हुए आतंकवादी हमलों के लिए किया जाता

प्रश्न 14.
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 9/11 के आक्रमण में लगभग कितने लोग मारे गये थे।
उत्तर:
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर 9/11 के आक्रमण में लगभग तीन हजार लोग मारे गये।

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प्रश्न 15.
अमेरिकन वर्चस्व के तीन क्षेत्रों के नाम लिखें।
उत्तर:
सैन्य क्षेत्र , आर्थिक क्षेत्र, सांस्कृतिक क्षेत्र।

प्रश्न 16.
विश्व व्यवस्था के एकध्रुवीय होने के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:
शीत युद्ध की समाप्ति, सोवियत संघ का विघटन।

प्रश्न 17.
आर्थिक क्षेत्र में अमेरिका को किन देशों से चुनौती मिल रही है?
उत्तर:
आर्थिक क्षेत्र में संयुक्त राज्य अमेरिका को जापान, चीन एवं भारत से कड़ी चुनौती मिल रही है।

प्रश्न 18.
वर्चस्व से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में वर्चस्व का अर्थ शक्ति का केवल एक ही केन्द्र का होना है।

प्रश्न 19.
विश्व राजनीति में अमरीकी वर्चस्व से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
विश्व में राजनीतिक, आर्थिक, सामरिक व सांस्कृतिक मामलों में अमरीकी दबदबा ही अमरीकी वर्चस्व है।

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प्रश्न 20.
इराक पर अमेरिकी आक्रमण के कोई दो उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  1. इराक के तेल भण्डारों पर कब्ज़ा करना
  2. इराक में अपनी पसंद की सरकार का निर्माण करना।

प्रश्न 21.
विश्व में अमरीकी वर्चस्व की शुरुआत कब हुई?
उत्तर:
सोवियत संघ के 1991 में विघटन के बाद से विश्व में अमरीकी वर्चस्व की शुरुआत हुई।

प्रश्न 22.
भारत-अमेरिका के मध्य परस्पर सम्बन्धों को दर्शाने वाले दो तथ्यों को लिखें।
उत्तर:

  1. दोनों देश लोकतंत्र के समर्थक हैं।
  2. दोनों ही अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के विरोधी हैं।

प्रश्न 23.
कश्मीर तथा मानवाधिकार हनन के मुद्दों को लेकर अमरीका भारत पर दबाव क्यों डालता रहा है?
उत्तर:
इसके पीछे अमरीका का एकमात्र लक्ष्य परमाणु अप्रसार संधि तथा व्यापक परमाणु परीक्षण संधि पर भारत के हस्ताक्षर करवाना है।

प्रश्न 24.
सी. टी. बी. टी. का पूरा नाम क्या है?
उत्तर:
सी. टी. बी. टी. का पूरा नाम है। व्यापक परीक्षण प्रतिबंध संधि (Comprehensive Test Ban Treaty)।

प्रश्न 25.
‘ऑपरेशन डेजर्ट स्टार्म’ क्या है?
उत्तर:
अमरीका के नेतृत्व में 1991 में कुवैत को मुक्त कराने हेतु इराक के विरुद्ध छेड़ा गया सैनिक अभियान ‘ऑपरेशन डेजर्ट स्टार्म’ कहलाता है।

प्रश्न 26.
‘ऑपरेशन इन्फाइनाइट रीच’ किस अमेरिकन राष्ट्रपति के आदेश से किया गया था?
उत्तर:
राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के आदेश से।

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प्रश्न 27.
‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ क्या है?
उत्तर:
20 मार्च, 2003 को अमरीका के इराक के विरुद्ध युद्ध को ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ कहा जाता है।

प्रश्न 28.
अफगानिस्तान किन देशों के मध्य बफर राज्य है?
उत्तर:
अफगानिस्तान रूस से पृथक् हुए मध्य एशियाई राष्ट्रों, ईरान तथा भारत-पाक के मध्य बफर राज्य है।

प्रश्न 29.
अफगानिस्तान में 1979 का रूसी हस्तक्षेप ‘प्रमुखता अधिकार’ पर आधारित था। यह प्रमुखता अधिकार क्या है?
उत्तर:
प्रमुखता अधिकार किसी महाशक्ति का किसी छोटे देश में अपने हितों की रक्षा हेतु हस्तक्षेप का अधिकार है।

प्रश्न 30.
अमरीका की ढांचागत ताकत का एक उदाहरण दीजिये।
उत्तर:
अमरीका की ढांचागत ताकत का एक मानक उदाहरण एमबीए (मास्टर ऑव बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन) की अकादमिक डिग्री है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
एक- ध्रुवीयता किसे कहते हैं?
एक – ध्रुवीय विश्व- व्यवस्था से क्या आशय है?
अथवा
उत्तर:
विश्व की राजनीति में जब किसी एक ही महाशक्ति का वर्चस्व हो और अधिकांश अन्तर्राष्ट्रीय निर्णय उसकी इच्छानुसार ही लिये जाएं, तो उसे एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था कहते हैं। वर्तमान में अमेरिका का विश्व – व्यवस्था में वर्चस्व स्थापित है।

प्रश्न 2.
एक ध्रुवीय विश्व में अमेरिका अपना प्रभाव किस प्रकार जमा रहा है?
उत्तर:
एक – ध्रुवीय विश्व में अमेरिका निम्न प्रकार अपना प्रभाव जमा रहा है-

  1. अमेरिका अधिकांश देशों में आर्थिक हस्तक्षेप कर रहा है।
  2. अमेरिका दूसरे देशों में सैनिक हस्तक्षेप भी कर रहा है।
  3. यह संयुक्त राष्ट्र संघ की भी अवहेलना कर रहा है।

प्रश्न 3.
सांस्कृतिक वर्चस्व से क्या आशय है?
उत्तर:
सांस्कृतिक वर्चस्व का आशय है। सामाजिक, राजनैतिक विशेषकर विचारधारा के धरातल पर किसी वर्ग का दबदबा स्थापित होना सांस्कृतिक वर्चस्व में रजामंदी से बात मनवाई जाती है, न कि दबाव से।

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प्रश्न 4.
ऑपरेशन एन्ड्यूरिंग फ्रीडम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये। ‘ऑपरेशन एन्ड्यूरिंग फ्रीडम’ क्या था?
अथवा
उत्तर:
9/11 की घटना के पश्चात् आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध के अंग के रूप में अमरीका ने ‘ऑपरेशन एन्ड्यूरिंग फ्रीडम’ चलाया। यह अभियान उन सभी के खिलाफ चला जिन पर 9/11 का शक था। इस अभियान में मुख्य निशाना अल-कायदा और अफगानिस्तान के तालिबान शासन को बनाया गया।

प्रश्न 5.
‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ के पीछे अमरीका का असली मकसद क्या था?
उत्तर:
19 मार्च, 2003 को ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ के कूट नाम से इराक पर अमेरिकी नेतृत्व में किये गये सैनिक हमले के पीछे असली मकसद था। इराक के तेल- भंडार पर नियंत्रण करना तथा इराक में अमरीका की मनपसंद सरकार कायम करना।

प्रश्न 6.
अमरीका के मौजूदा वर्चस्व का प्रमुख आधार क्या है?
उत्तर:
अमरीका के मौजूदा वर्चस्व का प्रमुख आधार उसकी बढ़ी चढ़ी तथा बेजोड़ सैन्य शक्ति है। कोई भी देश अमरीकी सैन्य शक्ति की तुलना में उसके पासंग के बराबर भी नहीं है। इसके सैन्य प्रभुत्व का आधार सैन्य व्यय के साथ- साथ उसकी गुणात्मक बढ़त है।

प्रश्न 7.
अमरीका की आर्थिक प्रबलता किस बात से जुड़ी हुई है?
उत्तर:
अमरीका की आर्थिक प्रबलता उसकी ढांचागत ताकत अर्थात् वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक खास शक्ल में ढालने की ताकत से जुड़ी हुई है। अमरीका द्वारा कायम की गयी ब्रेटनवुड प्रणाली आज भी विश्व की अर्थव्यवस्था की मूल संरचना का काम कर रही है।

प्रश्न 8.
‘ बैंडवैगन’ रणनीति से क्या आशय है?
उत्तर:
किसी देश को सबसे ताकतवर देश के विरुद्ध रणनीति बनाने के स्थान पर उसके वर्चस्व तंत्र में रहते हुए अवसरों का फायदा उठाने की रणनीति को ही ‘बैंडवैगन’ अथवा ‘जैसी बहे बयार पीठ तैसी कीजै’ की रणनीति कहते हैं।

प्रश्न 9.
‘अपने को छुपा लें’ नीति से क्या आशय है?
उत्तर:
अपने को छुपा लें’ का अर्थ होता है। दबदबे वाले देश से यथासंभव दूर-दूर रहना चीन, रूस और यूरोपीय संघ सभी एक न एक तरीके से अपने को अमरीकी निगाह में चढ़ने से बचा रहे हैं। इस तरह अमरीका के बेवजह या बेपनाह क्रोध की चपेट में आने से ये देश अपने को बचाते हैं।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

प्रश्न 10.
अमरीकी वर्चस्व के सामने आई किन्हीं दो चुनौतियों को संक्षेप में लिखिये।
उत्तर:
अमरीकी वर्चस्व के समक्ष आतंकवादियों ने निम्न दो चुनौतियाँ प्रस्तुत कीं-

  1. अलकायदा द्वारा नैरोबी, केन्या तथा दारेसलाम (तंजानिया) स्थित अमरीकी दूतावास पर वर्ष 1998 में बम वर्षा की गई।
  2. तालिबानी आतंकवादियों ने अमेरिकी विमानों का अपहरण कर न्यूयार्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर के साथ उन्हें टकराकर भारी नुकसान पहुँचाया।

प्रश्न 11.
संयुक्त राज्य अमेरिका के संदर्भ में 9/11 का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
11 सितम्बर, 2011 को आतंकवादियों द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर हमला किया गया। इस घटना के बाद अमरीका एवं पश्चिमी देश आतंकवाद पर अधिक ध्यान देने लगे तथा अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ विश्वव्यापी अभियान छेड़ दिया ।

प्रश्न 12.
नई विश्व व्यवस्था से क्या आशय है?
उत्तर:
समकालीन विश्व में नई विश्व व्यवस्था से यह आशय है कि वर्तमान में सोवियत संघ के विखण्डन के बाद विश्व में द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था समाप्त हो गई है और उसके स्थान पर विश्व में एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था कायम हुई है। इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व की एक सबसे शक्तिशाली ताकत के रूप में उभरा है।

प्रश्न 13.
समकालीन नई विश्व व्यवस्था की शुरुआत कब से और क्यों मानी जाती है?
उत्तर:
समकालीन नई विश्व व्यवस्था में अमरीका के वर्चस्व की शुरुआत उस समय हुई, जब सन् 1991 से एक महाशक्ति के रूप में सोवियत संघ अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य से ओझल हो गया । सोवियत संघ के पतन के बाद आज विश्व में केवल अमरीका ही महाशक्ति है।

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प्रश्न 14.
खाड़ी युद्ध को अमेरिकी सैन्य अभियान ही क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
यद्यपि खाड़ी युद्ध में इराक के विरुद्ध बहुराष्ट्रीय सेना ने मिलकर आक्रमण किया, तथापि इस युद्ध को काफी हद तक अमरीकी सैन्य अभियान ही कहा जाता है क्योंकि इसके प्रमुख एक अमरीकी जनरल नार्मन स्वार्जकाव थे और मिली-जुली सेना में 75 प्रतिशत सैनिक अमरीका के ही थे।

प्रश्न 15.
‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ पर टिप्पणी लिखिये|
अथवा
अमेरिका द्वारा 2003 में इराक पर किये गये आक्रमण का संक्षिप्त विवरण दीजिये।
उत्तर:
ऑपरेशन इराकी फ्रीडम: 19 मार्च, 2003 को अमेरिका ने ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ के कूट नाम से इराक पर सैन्य हमला किया। अमेरिकी अगुवाई वाले आकांक्षियों के गठबंधन में 40 से अधिक देश शामिल हुए। कुछ ही दिनों में सद्दाम हुसैन की सरकार का पतन हो गया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस हमले की अनुमति नहीं दी थी।

प्रश्न 16.
‘बैंड- वेगन’ रणनीति क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘ बैंड वेगन’ की रणनीति:
सबसे ताकतवर देश के विरुद्ध जाने के बजाय उसके वर्चस्व – तंत्र में रहते हुए अवसरों का फायदा उठाने की रणनीति को ही ‘ बैंड वेगन’ की रणनीति कहा जाता है। इसका आशय यह है कि ” जैसी बहे बयार, पीठ तैसी कीजे।” उदाहरण के लिए – आर्थिक वृद्धि दर को ऊंचा करने के लिए व्यापार को बढ़ाना, प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण और निवेश जरूरी है और अमरीका के साथ मिलकर काम करने से इसमें आसानी होगी, न कि उसका विरोध करने से। अतः वर्चस्वजनित अवसरों से लाभ उठाने की रणनीति ही बैंड वेगन की रणनीति है।

प्रश्न 17.
इराक द्वारा कुवैत पर अधिकार जमा लेने के बाद अमेरिका के इराक के विरुद्ध कार्यवाही करने के पीछे क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
सद्दाम हुसैन के विरुद्ध कार्यवाही करने के पीछे अमरीका के सामने निम्नलिखित लक्ष्य थे-

  1. पश्चिमी एशिया के देशों से तेल की आपूर्ति को होने वाले खतरे का निवारण करना।
  2. इजरायल की सुरक्षा को आंच न आने देना।
  3. सद्दाम हुसैन के परमाणु अस्त्रों व कारखानों को नष्ट करना।
  4. समूचे खाड़ी क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखना।
  5. इराक की विस्तारवादी सोच पर प्रतिबंध लगाना।
  6. इराक को पश्चिम एशिया के राजनीतिक मानचित्र में परिवर्तन के अवसर न देना।
  7. विश्व की एकमात्र सर्वोच्च शक्ति के रूप में अमरीका की छवि तथा अमरीकी नेतृत्व की विश्वसनीयता को बनाए रखना।

प्रश्न 18.
खाड़ी युद्ध ( प्रथम ) से अमेरिका को क्या लाभ हुए?
उत्तर:
खाड़ी युद्ध (प्रथम) से अमेरिका को निम्न लाभ हुए-

  1. इस युद्ध के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका का विश्व में वर्चस्व व दबदबा कायम हुआ। अब उसे ही विश्व की एकमात्र महाशक्ति माना जाने लगा क्योंकि इस युद्ध में साम्यवादी चीन, रूस, गुट निरपेक्ष आंदोलन कुछ भी नहीं कर पाया।
  2. खाड़ी के इस तेल उत्पादक क्षेत्र पर संयुक्त राज्य अमेरिका का वर्चस्व स्थापित हो गया। उसने उसके अर्थिक आधार को मजबूती प्रदान की।
  3. इस युद्ध के बाद अमेरिका ने इराक के तेल निर्यात की बहुत बड़ी राशि क्षतिपूर्ति के रूप में वसूल कर ली।
  4. इस युद्ध में अमरीका ने जितना खर्च किया उससे ज्यादा रकम उसे जर्मनी, जापान व सऊदी अरब जैसे देशों से मिली थी।

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प्रश्न 19.
‘ऑपरेशन इनफाइनाइट रीच’ पर एक टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
ऑपरेशन इनफाइनाइट रीच – 1998 में केन्या और तंजानिया के अमरीकी दूतावासों पर आतंकवादी . आक्रमण हुए। एक अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठन अलकायदा को इन दूतावासों पर आक्रमण के लिए जिम्मेवार माना गया। परिणामतः इस बमबारी के कुछ दिनों बाद क्लिंटन प्रशासन ने आतंकवाद की समाप्ति के नाम पर एक नया अभियान शुरू किया जिसे ‘ऑपरेशन इनफाइनाइट रीच’ का नाम दिया। इस अभियान के अन्तर्गत अमेरिका ने किसी की परवाह किये बिना सूडान और अफगानिस्तान में अलकायदा के ठिकानों पर क्रूज मिसाइलों से हमले किये। इस अभियान की संयुक्त राष्ट्र संघ से भी अनुमति नहीं ली गई। विश्व में अमरीकी वर्चस्व का यह एक उदाहरण है कि वह जब चाहे जिस देश में चाहे अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय की परवाह किए बिना क्रूज मिसाइलों से हमला किया जा सकता है।

प्रश्न 20.
अलकायदा पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
अलकायदा- अलकायदा एक आतंकवादी संगठन है जो धार्मिक और राजनीतिक आतंक के माध्यम से धार्मिक वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। यह इस्लामी राज का समर्थक तथा पोषक है। इसकी जड़ें अफगानिस्तान में हैं। आधुनिक हथियारों से सुसज्जित इसके कार्यकर्ता किसी की जान लेना या अपनी जान देना एक खेल समझते हैं। इस प्रकार अलकायदा अतिवादी इस्लामी विचारधारा से प्रभावित एक आतंकवादी संगठन है। आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध के रूप में अमेरिका ने ‘ऑपरेशन एन्ड्यूरिंग फ्रीडम’ नामक सैन्य अभियान चलाया, उसका मुख्य लक्ष्य अलकायदा को बनाया गया क्योंकि 9/11 के अमेरिका के आतंकवादी हमले का सन्देह अमेरिका को अलकायदा पर ही था।

प्रश्न 21.
एक ध्रुवीय व्यवस्था के कोई तीन लाभ लिखिये।
उत्तर:
एकध्रुवीय व्यवस्था के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं-

  1. शांतिपूर्ण व्यवस्था की स्थापना: वर्तमान विश्व में एकध्रुवीय व्यवस्था का प्रमुख लाभ यह है कि इससे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शांतिपूर्ण व्यवस्था की स्थापना होती है।
  2. तकनीकी और वैज्ञानिक विकास: एकध्रुवीय विश्व में शीत युद्ध की संभावना कम होने के कारण तकनीकी तथा वैज्ञानिक विकास को बढ़ावा मिला है।
  3. जनता के जीवन स्तर में सुधार: इससे विश्वस्तर पर जनता के जीवन स्तर में बहुत सुधार आया है। एक ध्रुवीय विश्व में उदारवाद, वैश्वीकरण को बढ़ावा मिला है।

प्रश्न 22.
इतिहास हमें वर्चस्व के विषय में क्या सिखाता है? संक्षेप में लिखिये।
उत्तर:
वर्चस्व का इतिहास – इतिहास हमें वर्चस्व के विषय में निम्न बातें सिखाता है।

  • वर्चस्व बदलता रहता है-शक्ति संतुलन की दृष्टि से देखें तो वर्चस्व की स्थिति अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में एक असामान्य घटना है। हर देश को अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होती हैं। इसलिए अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था में वे किसी एक देश को इतना ताकतवर नहीं बनने देते कि वह शेष देशों के लिए भयंकर खतरा बन जाए। वर्तमान में अमरीकी वर्चस्व के स्थापित होने के बाद उसके संतुलनकारी शक्तियों पर विचार-मंथन चल रहा है। शक्ति सन्तुलन की राजनीति वर्चस्वशील देश की ताकत को आने वाले समय में कम कर देती है।
  • फ्रांस और ब्रिटेन का वर्चस्व – इतिहास में अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में वर्चस्व की स्थिति दो बार आयी है।
    1. यूरोप की राजनीति के संदर्भ में सन् 1660 से 1713 तक फ्रांस का वर्चस्व था।
    2. सन् 1860 से 1910 तक ब्रिटेन का वर्चस्व समुद्री व्यापार के बल पर कायम रहा।

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प्रश्न 23.
अमरीकी वर्चस्व को दर्शाने वाली शक्ति के चार रूपों का संक्षेप में उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
अमरीकी वर्चस्व को दर्शाने वाले चार रूप निम्नलिखित हैं-

  1. सैन्य शक्ति के रूप में: अमरीकी वर्चस्व का मुख्य आधार उसकी बढ़ी चढ़ी सैन्य शक्ति है। वर्तमान में यह सैन्य शक्ति अपने आप में सम्पूर्ण तथा बेजोड़ है।
  2. ढांचागत शक्ति के रूप में: आज अमरीका के आर्थिक कार्य व नीतियाँ पूरे विश्व में अपनी धाक जमाए हुए हैं। अभी महासागरों पर उसकी उपस्थिति देखी जा सकती है। हमें विश्वव्यापी सार्वजनिक वस्तुएँ मुहैया कराने में अमरीकी वर्चस्व की झलक दिखाई देती है। अमरीकी वर्चस्व को बढ़ाने में व्यावसायिक शिक्षा ने भी अहम भूमिका अदा की है।
  3. सांस्कृतिक शक्ति के रूप में अमरीका अपनी भाषा, साहित्य, फिल्मों, जीवन प्रणाली व शैली को किसी न किसी तरह से बढ़ावा देता रहता है। वह अन्य देशों को इसे अपनाने को प्रेरित करता रहता है।
  4. आर्थिक वर्चस्व: अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं के बाजार में अमेरिका का वर्चस्व बना हुआ है।

प्रश्न 24.
आपके मतानुसार एक स्वतन्त्र देश स्वयं को ‘वर्चस्व’ के प्रभाव से कैसे बचा सकता है? कोई चार सुझाव दीजिए। वर्चस्व पर नियंत्रण कैसे पाया जा सकता है?
अथवा
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में एक स्वतन्त्र देश वर्चस्व के प्रभाव से निम्नलिखित तरीकों से बच सकता है।

  1. सामाजिक आंदोलनों एवं जनमत निर्माण के द्वारा वर्चस्व पर नियंत्रण पाया जा सकता है
  2. गैर-सरकारी संस्थाओं के संयुक्त प्रयास द्वारा भी वर्चस्व पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
  3. वर्चस्व के प्रति विरोध द्वारा भी वर्चस्व को नियंत्रित किया जा सकता है।
  4. वर्चस्व द्वारा उत्पन्न परिस्थितियों का विरोध न करके भी वर्चस्व पर नियंत्रण पाया जा सकता।

प्रश्न 25.
अमरीकी आर्थिक वर्चस्व पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये। है।
उत्तर:
अमरीकी आर्थिक वर्चस्व: अमरीकी आर्थिक वर्चस्व से अभिप्राय यह है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में वह सर्वाधिक शक्ति – सम्पन्न है। यथा।

  1. वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमरीका के नियम-कानून लागू किये जाते हैं
  2. विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन तथा इण्टरनेट इत्यादि पर अमेरिका का वर्चस्व बना हुआ है।
  3. खुली वैश्विक अर्थव्यवस्था में मुक्त व्यापार का आधार समुद्री व्यापार है और अमेरिका का समुद्र पर वर्चस्व स्थापित है। अमरीका अपनी नौसेना के बल पर समुद्री व्यापार के मार्गों पर आने-जाने के नियम निर्धारित करता है तथा अन्तर्राष्ट्रीय समुद्री मार्ग को अबाधित करता है। अमेरिकी नौसेना की उपस्थिति विश्व के समस्त महासागरों में है।

प्रश्न 26.
सैन्य शक्ति के रूप में अमरीकी वर्चस्व के कारणों को स्पष्ट कीजिए।
अथवा
सैन्य शक्ति के रूप में अमरीका के वर्चस्व की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
अथवा
अमेरिकी वर्चस्व की सैन्य शक्ति के रूप में व्याख्या कीजिए।
अथवा
सैन्य शक्ति में अमरीकी वर्चस्व पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
सैन्य शक्ति में अमरीकी वर्चस्व: समकालीन विश्व राजनीति में अमरीका सम्पूर्ण भू-मंडल में एक प्रमुख सैन्य शक्ति है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं।

  1. आज अमरीका की सैन्य क्षमता विश्व के अन्य देशों की तुलना में बेजोड़ है । सैन्य मामलों में क्रांति और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उसकी प्रमुखता है।
  2. अमरीकी सैन्य क्षमता आज इसलिए भी सर्वोच्च है क्योंकि आज वह विश्व जनमत की परवाह किये बिना विश्व के किसी कोने पर निशाना साध सकता है। आज वह अपनी सेना को अपने घर में रखकर भी अपने दुश्मन को उसके घर में ही बरबाद कर सकता है।
  3. अमरीका का रक्षा बजट विश्व के 12 अन्य शक्तिशाली देशों के कुल सैन्य व्यय से अधिक है।
  4. अमरीका की सैन्य शक्ति, सैन्य शक्ति में गुणात्मक बढ़त भी लिए हुए है।

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प्रश्न 27.
अमरीका तथा विश्व के प्रमुख देशों के रक्षा बजट को दर्शाइये।
उत्तर:
अमरीका तथा विश्व के

देशरक्षा व्यय (अरब डालर में)
सं. रा. अमेरिका602.8
रूस76.7
चीन150.5
इटली22.9
सऊदी अरब61.2
भारत46.0
फ्रांस
ब्रिटेन52.5
जापान48.6
जर्मनी41.7
दक्षिण कोरिया35.7
आस्ट्रेलिया29.4

उक्त तालिका से स्पष्ट होता है कि अमेरिका रक्षा बजट की दृष्टि से अपने अधिकांश प्रतिद्वन्द्वियों की तुलना में अधिक सृदृढ़ स्थिति में है

प्रश्न 28.
ढाँचागत शक्ति के अर्थ में अमरीकी वर्चस्व को समझाइये
उत्तर:
ढाँचागत शक्ति के अर्थ में अमरीकी वर्चस्व – ढाँचागत शक्ति के अर्थ में अमरीकी वर्चस्व को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है-

  1. वैश्विक अर्थव्यवस्था: वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी इच्छा व नीतियाँ थोपने की स्थिति को वर्चस्व की स्थिति कह सकते हैं। आज अमरीका के आर्थिक कार्य व नीतियाँ पूरे विश्व में अपनी धाक जमाए हुए हैं। सभी महासागरों पर आज अमरीकी उपस्थिति अनुभव की जा सकती है। इंटरनेट अमरीकी सैन्य योजना शोध का ही परिणाम है।
  2. सार्वजनिक वस्तुएँ: हमें विश्वव्यापी सार्वजनिक वस्तुओं को मुहैया कराने में अमरीकी वर्चस्व की झलक दिखती है।
  3. शैक्षणिक प्रभाव: अमरीकी वर्चस्व को बढ़ाने में व्यावसायिक शिक्षा ने भी अहम भूमिका अदा की है। एम. बी. ए. जैसे शैक्षणिक पाठ्यक्रमों ने अमरीकी प्रभाव को बढ़ाया है।

प्रश्न 29.
स्पष्ट कीजिये कि अमरीकी आर्थिक प्रबलता उसकी ढाँचागत शक्ति से अलग नहीं है।
उत्तर:
अमरीका की आर्थिक प्रबलता उसकी ढाँचागत ताकत यानी वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक खास शक्ल में ढालने की ताकत से जुड़ी हुई है। यथा

  1. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रेटनवुड प्रणाली कायम हुई थी। अमरीका द्वारा कायम यह प्रणाली आज भी विश्व की अर्थव्यवस्था की बुनियादी संरचना का काम कर रही है।
  2. विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन अमरीकी वर्चस्व का ही परिणाम है।
  3. अमरीका की ढाँचागत ताकत का एक मानक उदाहरण एमबीए की अकादमिक डिग्री है। एमबीए के शुरुआती पाठ्यक्रम 1900 में आरंभ हुए जबकि अमरीका के बाहर इसकी शुरुआत सन् 1950 में ही जाकर हो सकी। आज दुनिया में कोई भी देश ऐसा नहीं है जिसमें एमबीए को प्रतिष्ठित अकादमिक दर्जा हासिल न हो।

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प्रश्न 30.
अमेरिकी वर्चस्व की दो प्रमुख चुनौतियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
अमेरिकी वर्चस्व की दो प्रमुख चुनौतियाँ इस प्रकार हैं।

  1. अमरीका की संस्थागत बुनावट:
    यहाँ शासन के तीनों अंगों के बीच शक्ति का बँटवारा है और यही संस्थागत ‘बुनावट कार्यपालिका द्वारा सैन्य शक्ति के बेलगाम इस्तेमाल पर अंकुश लगाने का काम करती है।
  2. अन्दरूनी चुनौती:
    अमरीकी वर्चस्व की अन्दरूनी चुनौती के मूल में अमरीकी समाज है जो अपनी प्रकृति में उन्मुक्त है। अमरीकी राजनीतिक संस्कृति में शासन के उद्देश्य और तरीके को लेकर गहरे संदेह का भाव भरा है। अमरीका के विदेशी सैन्य अभियानों पर अंकुश रखने में यह बात बड़ी कारगर भूमिका निभाती है।

प्रश्न 31.
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भारत-अमरीकी सम्बन्धों में परिवर्तन लाने वाली स्थितियों को संक्षेप में बताइये।
उत्तर:
सोवियत संघ की समाप्ति के बाद अमरीकी नीति-निर्धारकों ने भारत-अमरीकी संबंधों की सुधार की तरफ ध्यान दिया निम्न दो घटनाओं ने अमरीकी विदेश नीति को इस दिशा में प्रेरित किया
1. सोवियत संघ के बिखराव से कुछ ही महीने पहले भारत ने आर्थिक उदारीकरण का सूत्रपात किया आर्थिक खुलेपन के कारण विदेशी व्यापारी समुदाय के लिए विशाल मध्यम वर्ग वाले भारतीय बाजार का आकर्षण काफी बढ़ गया।

2. शीत युद्ध के बाद अमरीकी विदेश नीति में आर्थिक मुद्दों पर अधिक बल दिया तथा ऐसे भारत के साथ गहरे व्यापारिक सम्बन्ध बनाने के प्रयास किये गये तथा 1995 में दोनों देशों के बीच 11 व्यापारिक समझौते किए गए। उसके बाद भारत व अमरीका के आर्थिक सम्बन्धों में और अधिक निकटता आने लगी।

प्रश्न 32.
अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने ‘नई विश्व व्यवस्था’ की संज्ञा किसे कहते हैं?
उत्तर:
1990 के अगस्त में इराक ने कुवैत पर हमला किया और बड़ी तेजी से उस पर कब्जा जमा लिया। इराक को समझाने-बुझाने की तमाम राजनायिक कोशिशें जब नाकाम रहीं तो संयुक्त राष्ट्रसंघ ने कुवैत को मुक्त कराने के लिए ल-प्रयोग की अनुमति दे दी। शीतयुद्ध के दौरान ज्यादातर मामलों में चुप्पी साध लेने वाले संयुक्त राष्ट्रसंघ के लिहाज से यह एक नाटकीय फैसला था। अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने इसे ‘नई विश्व व्यवस्था’ की संज्ञा दी।

प्रश्न 33.
‘नाइन इलेवन’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
11 सितम्बर, 2001 के दिन विभिन्न अरब देशों के 19 अरहरणकर्ताओं ने उड़ान भरने के चंद मिनटों बाद चार अमरीकी व्यावसायिक विमानों पर कब्जा कर लिया। अपहरणकर्ता इन विमानों को अमरीका की महत्त्वपूर्ण इमारतों की सीध में उड़ाकर ले गए। दो विमान न्यूयार्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के उत्तरी और दक्षिणी टावर से टकराए। तीसरा विमान वर्जिनिया के अर्लिंगटन स्थित ‘पेंटागन’ से टकराया। ‘पेंटागन’ में अमरीकी रक्षा विभाग का मुख्यालय है। चौथे विमान को अमरीकी कांग्रेस की मुख्य इमारत से टकराना था लेकिन वह पेन्सिलवेनिया के एक खेत में गिर गया। इस हमले को ‘नाइन इलेवन’ कहा जाता है।

प्रश्न 34.
‘इराक पर अमरीकी हमले से अमरीका की कुछ कमजोरियाँ उजागर हुई हैं।’ इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इराक पर अमरीकी हमले से अमरीका की कुछ कमजोरियाँ उजागर हुई हैं। अमरीका इराक की जनता को अपने नेतृत्व वाली गठबंधन सेना के आगे झुका पाने में सफल नहीं हुआ है। अमरीका की इस कमजोरी को हम ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से समझ सकते हैं। इतिहास इस बात का गवाह है कि साम्राज्यवादी शक्तियों ने सैन्य बल का प्रयोग महज चार लक्ष्यों जीतने, अपरोध करने, दंड देने ओर कानून व्यवस्था बहाल रखने के लिए किया है। इराक के उदाहरण से प्रकट है कि अमरीका की विजय क्षमता विकट है। इसी तरह अपरूद्ध करने और दंड देने की भी उसकी क्षमता स्वतः सिद्ध है। अमरीकी सैन्य क्षमता की कमजोरी सिर्फ एक बात में जाहिर हुई है। वह अपने अधिकृत भू-भाग में कानून व्यवस्था नहीं बहाल कर पाया है

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प्रश्न 35.
हाल के सालों में भारत-अमरीकी संबंधों के बीच दो नई बातें उभरी हैं। तथ्यों के माध्यम से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हाल के सालों में भारत-अमरीकी संबंधों के बीच दो नई बातें उभरी हैं। इन बातों का संबंध प्रौद्योगिकी और अमरीका में बसे अनिवासी भारतीयों से है। ये दोनों बातें आपस में जुड़ी हुई हैं। इस बात को निम्नलिखित तथ्यों के माध्यम से समझ सकते हैं।

  1. सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में भारत के कुल निर्यात का 65 प्रतिशत अमरीका को जाता है।
  2. बोईंग के 35 प्रतिशत तकनीकी कर्मचारी भारतीय मूल के हैं।
  3. 3 लाख भारतीय ‘सिलिकन वैली’ में काम करते हैं।
  4. उच्च प्रौद्योगिकी के क्षेत्र की 15 प्रतिशत कंपनियों की शुरुआत अमरीका में बसे भारतीयों ने की है।

प्रश्न 36.
वैश्विक अर्थव्यवस्था के संदर्भ में सार्वजनिक वस्तु का सबसे बढ़िया उदाहरण समुद्री व्यापार मार्ग है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वैश्विक अर्थव्यवस्था के संदर्भ में सार्वजनिक वस्तु का सबसे बढ़िया उदाहरण समुद्री व्यापार मार्ग है। जिनका इस्तेमाल व्यापारिक जहाज करते हैं। खुली वैश्विक अर्थव्यवस्था में मुक्त व्यापार समुद्री व्यापार मार्गों के खुलेपन के बिना संभव नहीं । दबदबे वाला देश अपनी नौसेना की ताकत से समुद्री व्यापार मार्गों पर आवाजाही के नियम तय करता है और अन्तर्राष्ट्रीय समुद्र में अबाध आवाजाही को सुनिश्चित करता है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश नौसेना का जोर घट गया। अब यह भूमिका अमरीकी नौसेना निभाती है जिसकी उपस्थिति दुनिया के लगभग सभी महासागरों में है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अफगानिस्तान युद्ध एवं खाड़ी युद्धों के संदर्भ में एक ध्रुवीय विश्व (अमेरिका) के विकास की व्याख्या करें।
एक – ध्रुवीय विश्व (अमेरिका) का विकास
सोवियत संघ के पतन के बाद हुई निम्नलिखित घटनाओं से एक ध्रुवीय विश्व में अमरीका के विकास की व्याख्या की जा सकती है;

1. प्रथम खाड़ी युद्ध: अमेरिका ने कुवैत को स्वतंत्र कराने के सैनिक अभियान में लगभग 75 प्रतिशत सैनिक अमेरिका के थे और अमेरिका ही इस युद्ध को निर्देशित एवं नियंत्रित कर रहा था। विश्व इतिहास में यह दूसरी बार हुआ कि जब सुरक्षा परिषद् ने किसी देश के खिलाफ सैनिक कार्यवाही की अनुमति दी हो।

2. सूडान एवं अफगानिस्तान पर अमेरिकन प्रक्षेपास्त्र हमला: अमेरिका ने सूडान एवं अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र संघ की अनुमति के बिना तथा विश्व जनमत की परवाह किये बिना अल-कायदा के ठिकानों पर क्रूज प्रक्षेपास्त्रों से हमला किया।

3. 9/11 की घटना और आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध: 11 सितम्बर, 2001 को अमेरिका में आतंकवादी हमले के विरोध में अमेरिका ने आतंकवाद के विरुद्ध चलाए ‘ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम’ नामक विश्वव्यापी युद्ध अभियान में शक के आधार पर किसी के खिलाफ भी कार्यवाही की गयी। इस अभियान के तहत अमरीकी सरकार ने अनेक स्वतंत्र राष्ट्रों में गिरफ्तारियाँ कीं और जिन देशों में गिरफ्तारियाँ की गई थीं, उन देशों की सरकारों से पूछना अमरीका ने जरूरी नहीं समझा।

4. द्वितीय खाड़ी युद्ध: खाड़ी युद्ध द्वितीय में अमेरिका ने विश्व जनमत, संयुक्त राष्ट्र संघ तथा विश्व के अन्य देशों की परवाह किये बिना इराक पर मार्च, 2003 को उसके तेल भण्डारों पर कब्जा करने तथा इराक में अपने समर्थन वाली सरकार के गठन के उद्देश्य से आक्रमण कर दिया।

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प्रश्न 2.
अमेरिका के अधिक से अधिक शक्तिशाली होने एवं विश्व के एक ध्रुवीय होने के प्रमुख कारणों का विवेचन कीजिये।
उत्तर:
अमेरिका के शक्तिशाली होने
एवं
विश्व के एक ध्रुवीय होने के कारण
अमेरिका के अधिक से अधिक शक्तिशाली होने एवं विश्व के एक ध्रुवीय होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

  1. शीत युद्ध की समाप्ति: सोवियत संघ के विघटन तथा शीत युद्ध की समाप्ति ने विश्व को एक ध्रुवीय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।
  2. रूस की कमजोर स्थिति: सोवियत संघ के पतन के बाद रूस अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण सोवियत संघ जैसी प्रभावशाली स्थिति प्राप्त नहीं कर सका है
  3. संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका का बढ़ता प्रभाव: सोवियत संघ के पतन के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की उपेक्षा करके अमेरिका अब विश्व राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने लगा है।
  4. गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता में कमी आना:शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अमेरिका पर अंकुश लगाने वाला गुटनिरपेक्ष आंदोलन कमजोर पड़ गया है, जिससे अमेरिका उत्तरोत्तर शक्तिशाली होता चला गया।
  5. उदारवादी विचारधारा का विस्तार: शीत युद्ध की समाप्ति के बाद सोवियत संघ से विघटित हुए सभी समाजवादी देशों ने लोकतांत्रिक उदारवादी चोगा धारण कर लिया है। इस प्रकार अब समूचे विश्व में उस उदारवादी राजनीतिक विचारधारा का बोलबाला हो गया। इससे विश्व राजनीति में अमेरिका का प्रभाव और बढ़ता गया तथा विश्व एक ध्रुवीय बन गया।
  6. शीत युद्ध के बाद अमेरिका के वर्चस्ववादी प्रयास – शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अमेरिका ने भी अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिए ऐसे अनेक वर्चस्ववादी प्रयास किये जिसके चलते एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था का स्वरूप एकदम स्पष्ट हो गया और विश्व – राजनीति में अमेरिका का वर्चस्व स्थापित हो गया।

प्रश्न 3.
विश्व राजनीति में अमेरिकी सैन्य शक्ति वर्चस्व की विवेचना कीजिए।
अथवा
सैनिक शक्ति के रूप में अमरीकी वर्चस्व को समझाइये।
उत्तर:
सैनिक शक्ति के अर्थ में अमरीकी वर्चस्व सैनिक शक्ति के अर्थ में अमरीकी वर्चस्व को अग्रलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है।

  1. बेजोड़ तथा अनूठी सैन्य शक्ति: अमेरिका की मौजूदा ताकत की रीढ़ उसकी बढ़ी चढ़ी सैन्य शक्ति है। आज अमेरिका की सैन्य शक्ति अपने आप में अनूठी है और बाकी देशों की तुलना में बेजोड़ है क्योंकि आज अमेरिका अपनी सैन्य क्षमता के बल पर पूरे विश्व में कहीं भी निशाना साध सकता है।
  2. सैन्य व्यय: आज कोई भी देश अमरीकी सैन्य शक्ति की तुलना में उसके पासंग के बराबर भी नहीं है। अमरीका के नीचे के कुल 12 ताकतवर देश एक साथ मिलकर अपनी सैन्य क्षमता के लिए जितना व्यय करते हैं, उससे कहीं ज्यादा अपनी सैन्य क्षमता के लिए अकेले अमरीका करता है।
  3. सैनिक दृष्टि से गुणात्मक बढ़त: अमेरिका आज सैन्य प्रौद्योगिकी के मामले में इतना आगे है कि किसी और देश के लिए इस मामले में उसकी बराबरी कर पाना संभव नहीं है।
  4. जन-मनोबल को झुकाने में पूर्ण समर्थ नहीं: इराक के उदाहरण से प्रकट हुआ है कि अमेरिका की विजय- क्षमता विकट है। उसकी अपराध करने और दंड देने की क्षमता भी स्वतः सिद्ध है, लेकिन जन – मनोबल को झुकाकर कानून व्यवस्था बहाल कर पाने की उसकी क्षमता पर सवालिया निशान उभरे हैं।

प्रश्न 4.
ढाँचागत शक्ति के अर्थ में अमेरिकन वर्चस्व पर एक लेख लिखिये।
उत्तर:
ढाँचागत शक्ति के अर्थ में अमेरिकी वर्चस्व: ढाँचागत शक्ति के अर्थ में अमेरिकन वर्चस्व को हम निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट कर सकते हैं।

  1. वैश्विक अर्थव्यवस्था की अच्छी समझ: ढांचागत शक्ति के अर्थ में अमरीकी वर्चस्व का सम्बन्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था की एक खास समझ से है। अमेरिका के पास अपने मतलब की चीजों के बनाए रखने हेतु व्यवस्था कायम करने के लिए नियमों व तरीकों को लागू करने की क्षमता व इच्छा दोनों हैं।
  2. विश्वव्यापी सार्वजनिक वस्तुओं को मुहैया करने में प्रभावी भूमिका: विश्वव्यापी ढाँचागत शक्ति के वर्चस्व की झलक हमें विश्वव्यापी सार्वजनिक वस्तुओं, जैसे स्वच्छ वायु, सड़क, समुद्री व्यापार मार्ग आदि को उपलब्ध कराने की अमेरिकी भूमिका में दिखाई देती है।
  3. समुद्री व्यापार मार्गों पर आवाजाही के नियम तय करना: आज अमेरिका अपनी नौ सेना की ताकत से समुद्री व्यापार मार्गों पर आवाजाही के नियम तय करता है और अन्तर्राष्ट्रीय समुद्र में अबाध आवाजाही को सुनिश्चित करता है।
  4. इंटरनेट पर अमरीकी वर्चस्व: इंटरनेट अमेरिकी सैन्य अनुसंधान परियोजना का परिणाम है। आज भी इंटरनेट उपग्रहों के एक वैश्विक तंत्र पर निर्भर है और इनमें से अधिकांश उपग्रह अमेरिका के हैं।
  5. वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण अमरीकी हिस्सेदारी: अमेरिका वैश्विक अर्थव्यवस्था के हर भाग, हर क्षेत्र तथा प्रौद्योगिकी के हर क्षेत्र में विद्यमान है।
  6. वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक खास शक्ल में ढालने की ताकत: दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रेटनवुड प्रणाली कायम हुई थी। अमेरिका द्वारा कायम यह प्रणाली आज भी विश्व की अर्थव्यवस्था की बुनियादी संरचना का काम कर रही है।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

प्रश्न 5.
अमेरिकी सांस्कृतिक वर्चस्व की विवेचना कीजिए।
अथवा
सांस्कृतिक अर्थ में अमेरिकन वर्चस्व की विवेचना कीजिये।
उत्तर:
सांस्कृतिक अर्थ में वर्चस्व से आशय सांस्कृतिक अर्थ में वर्चस्व का सम्बन्ध ‘सहमति गढ़ने’ की ताकत से है। कोई प्रभुत्वशाली वर्ग या देश अपने असर में रहने वालों को इस तरह सहमत कर सकता है कि वे भी दुनिया को उसी नजरिये से देखने लगें जिसमें प्रभुत्वशाली वर्ग या देश देखता है। इससे प्रभुत्वशाली देश की बढ़त और उसका वर्चस्व कायम होता है।

सांस्कृतिक अर्थ में अमरीकी वर्चस्व:
आज विश्व में अमेरिका की सांस्कृतिक मौजूदगी भी इसका एक कारण है। आज अच्छे जीवन और व्यक्तिगत सफलता के बारे में जो धारणाएँ पूरे विश्व में प्रचलित हैं; दुनिया के अधिकांश लोगों और समाजों के जो सपने हैं। – वे सब 20वीं सदी के अमरीका में प्रचलित व्यवहार के ही प्रतिबिंब हैं। अमरीकी संस्कृति बड़ी लुभावनी है और इसी कारण सबसे ताकतवर है।

वर्चस्व का यह सांस्कृतिक पहलू है जहाँ जोर-जबर्दस्ती से नहीं बल्कि रजामंदी से बात मनवायी जाती है। समय गुजरने के साथ हम इसके अत्यधिक अभ्यस्त हो गये हैं। उदाहरण के लिए सोवियत संघ की एक पूरी पीढ़ी के लिए नीली जीन्स ‘अच्छे जीवन’ की आकांक्षाओं का प्रतीक बन गयी थी – एक ऐसा ‘अच्छा जीवन’ जो सोवियत संघ में उपलब्ध नहीं था।

प्रश्न 6.
वर्तमान में ‘अमेरिका और भारत के सम्बन्ध’ विषय पर एक लेख लिखिये।
उत्तर:
अमेरिका के भारत से सम्बन्ध वर्तमान में अमेरिका और भारत के सम्बन्धों का विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है।

  1. अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर समान दृष्टिकोण: वर्तमान में भारत और अमरीका के अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के विरोध में समान दृष्टिकोण के कारण दोनों देशों में नजदीकी आई है।
  2. लोकतांत्रिक: उदारवादी राजनीतिक व्यवस्था: दोनों देशों में विद्यमान उदारवादी लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था के कारण भी सम्बन्धों में निकटता आई है।
  3. व्यापारिक सहयोग: वर्तमान में अमरीका को भारत एक बड़े बाजार के रूप में दिखाई देता है और भारत को विदेशी पूँजी के निवेश की आवश्यकता है। अमरीकी कम्पनियाँ अपने उत्पादों को भारत के बाजार में बेचने को उत्सुक हैं। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच विभिन्न व्यापारिक समझौते इस काल में हुए हैं।
  4. असैन्य नाभिकीय सहयोग: अमरीका ने भारत के साथ 2 मार्च, 2006 को ‘असैन्य नाभिकीय समझौता या परमाणु ऊर्जा समझौता’ किया है।

यह समझौता अमेरिका की विदेश नीति को भारतोन्मुखी बनाता है। एक शक्तिशाली भारत के माध्यम से वह दक्षिण एशिया क्षेत्र में अपने हितों को सुरक्षित करना चाहता है। भारत का बड़ा बाजार, भारत की बौद्धिक सम्पदा, विज्ञान तथा तकनीकी श्रेष्ठता तथा उसकी आकर्षक भू-राजनैतिक स्थिति के कारण अमरीका भारत से मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों को 21वीं सदी के लिए आवश्यक मान रहा है।

प्रश्न 7.
अमरीका से निर्वाह करने हेतु भारत को विदेश नीति की कई रणनीतियों का समुचित मेल तैयार करना होगा। किन्हीं तीन संभावित रणनीतियों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारत को अमरीका के साथ किस तरह का संबंध रखना चाहिए यह तय कर पाना कोई आसान काम नहीं है। अत: भारत में तीन संभावित रणनीतियों पर बहस चल रही है। यथा
1. भारत के जो विद्वान अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को सैन्य शक्ति के संदर्भ में देखते: समझते हैं, वे भारत और अमरीका की बढ़ती हुई नजदीकी से भयभीत हैं। इन विद्वानों के अनुसार भारत को वाशिंगटन से अपना अलगाव बनाए रखना चाहिए तथा अपना ध्यान अपनी राष्ट्रीय शक्ति को बढ़ाने पर लगाना चाहिए।

2. कुछ विद्वानों का मानना है कि भारत और अमरीका के हितों में बढ़ता हुआ हेलमेल, भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर है। ये विद्वान ऐसी रणनीति अपनाने की तरफदारी करते हैं जिससे भारत अमरीकी वर्चस्व का फायदा उठाए वे चाहते हैं कि दोनों के आपसी हितों का मेल हो तथा भारत अपने लिए सबसे बढ़िया विकल्प ढूँढ़ सके इन विद्वानों के अनुसार अमरीका के विरोध की रणनीति व्यर्थ साबित होगी और आगे चलकर इससे भारत को नुकसान होगा।

3. कुछ विद्वानों के मतानुसार भारत को अपनी अगुआई में विकासशील देशों का गठबंधन बनाना चाहिए। समय के साथ यह गठबंधन ताकतवर होगा जिससे अमरीकी वर्चस्व के प्रतिकार में सहायक होगा। अतः अमरीका से निर्वाह करने के लिए भारत को विदेश नीति की कई रणनीतियों का समुचित मेल तैयार करना होगा।

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प्रश्न 8.
भारत-अमरीकी परमाणु समझौते का भारत के संदर्भ में मूल्यांकन कीजिये।
उत्तर:
2 मार्च 2006 को नई दिल्ली में भारत और अमरीका के बीच ‘भारत-अमरीका असैन्य नाभिकीय सहयोग’ समझौता हुआ। भारत के संदर्भ में इस परमाणु समझौते का मूल्यांकन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया गया है। (अ) भारत के लिए परमाणु समझौते की उपयोगिता भारत के संदर्भ में परमाणु समझौते के पक्ष में निम्न प्रमुख तर्क दिये गये हैं।

  1. भारत के आर्थिक विकास के लिए यह समझौता उपयोगी है क्योंकि भारत इस समझौते के तहत परमाणु ऊर्जा प्राप्त कर सकेगा।
  2. इस समझौते से भारत को परमाणु सम्पन्न राष्ट्र का दर्जा भी प्राप्त हुआ है।
  3. यह समझौता इस बात का परिचायक है कि भारत अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक शक्ति के रूप में उभर रहा है।
  4. इस समझौते से भारत के परमाणु संयंत्रों को संवर्द्धित यूरेनियम की प्राप्ति हो जायेगी।

(ब) परमाणु समझौते के विपक्ष (विरोध) में तर्क: भारत के संदर्भ में भारत:अमरीका परमाणु समझौते की निम्न प्रमुख आलोचनाएँ की गई हैं:

  1. यह समझौता भारत को परमाणु सम्पन्न राष्ट्र का दर्जा प्रदान नहीं करता है।
  2. भारत के परमाणु कार्यक्रम व राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए यह समझौता खतरा साबित हो सकता है।
  3. परमाणु ऊर्जा न तो सस्ती है, न स्वच्छ है और न सुरक्षित है।

प्रश्न 9.
अमेरिकी वर्चस्व से कैसे निपटा जा सकता है?
उत्तर:
वर्तमान में बढ़ते अमेरिकी वर्चस्व से निपटने के लिए विद्वानों ने निम्नलिखित रास्ते प्रस्तुत किये हैं।
1. वर्चस्व तंत्र में रहते हुए अवसरों का लाभ उठाया जाए – बढ़ते अमरीकी वर्चस्व से निपटने के लिए उसके विरुद्ध जाने के बजाय उसके वर्चस्व तंत्र में रहते हुए अवसरों का फायदा उठाना कहीं अधिक उचित रणनीति है। इसे ‘बैंडवैगन’ अथवा ‘जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी दीजै’ की रणनीति कहते हैं।

2. वर्चस्व वाले देश से दूर रहना- देशों के सामने दूसरा विकल्प यह है कि वे वर्चस्व वाले देश से यथासंभव दूर-दूर रहें। चीन, रूस और यूरोपीय संघ सभी एक तरीके से अपने को अमेरिकी निगाह में चढ़ने से बचा रहे हैं।

3. राज्येतर संस्थाएँ अमरीकी वर्चस्व का प्रतिकार करने के लिए आगे आएँगी – कुछ लोग मानते हैं कि राज्येतर संस्थाएँ अमेरिकी वर्चस्व के प्रतिकार के लिए आगे आएँगी अमेरिकी वर्चस्व को आर्थिक और सांस्कृतिक धरातल पर चुनौती मिलेगी। यह चुनौती स्वयंसेवी संगठन, सामाजिक आन्दोलन और जनमत के आपसी मेल से प्रस्तुत होगी मीडिया का एक तबका, बुद्धिजीवी, कलाकार और लेखक आदि अमरीकी वर्चस्व के प्रतिरोध के लिए आगे आएँगे ये राज्येतर संस्थाएँ विश्वव्यापी नेटवर्क बना सकती हैं जिसमें अमेरिकी नागरिक भी शामिल होंगे और साथ मिलकर अमेरिकी नीतियों की आलोचना तथा प्रतिरोध किया जा सकेगा।

प्रश्न 10.
9/11 के बाद अमेरिकी विदेश नीति में क्या परिवर्तन आए और इसका विश्व राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ा?
अथवा
9/11 और आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
9/11 की घटना: 11 सितम्बर, 2001 को अमरीका पर एक आतंकवादी हमला हुआ इस आतंकवादी हमले के कारण अकेले अमरीका में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में भय का माहौल उत्पन्न हो गया। आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध की अमरीकी मुहिम – ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम – अमरीका पर हुए इस आतंकवादी हमले की प्रतिक्रिया में अमरीका ने आतंकवादियों के खिलाफ कई देशों में मुहिम चलायी, उसे आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध के अंग के रूप में जाना गया यह एक ऐसा अभियान था, जिसमें शक के आधार पर किसी के खिलाफ भी कार्यवाही की जा सकती थी।

अमरीका पर 9/11 के आक्रमण के लिए मुख्य रूप से अलकायदा और अफगानिस्तान के तालिबान शासन को उत्तरदायी ठहराया गया। अमरीकी वर्चस्व या दादागिरी का विकास- आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध ‘ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम’ के तहत अमरीका की विदेश नीति में यह परिवर्तन आया कि अमेरिका ने अब न केवल ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ की अवहेलना या उपेक्षा की, बल्कि देशों की ‘संप्रभुता’ की भी उपेक्षा की। यथा

  1. ‘ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम’ के तहत शक के आधार पर अमरीकी सरकार ने अनेक स्वतंत्र राष्ट्रों में गिरफ्तारियाँ कीं और जिन देशों में गिरफ्तारियाँ की गई थीं, उन देशों की सरकारों से पूछना भी जरूरी नहीं समझा।
  2. विभिन्न देशों से गिरफ्तार लोगों को अलग देशों के खुफिया जेलखानों में बंद कर दिया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिनिधियों को भी इन बंदियों से मिलने तक नहीं दिया गया।
  3. विश्व का कोई भी देश अब अमरीकी दादागिरी को रोकने की स्थिति में नहीं रहा।

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प्रश्न 11.
सोवियत संघ के विघटन के बाद उभरी अफगानिस्तान की समस्या पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
अफगानिस्तान संकट
1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया। ऐसे में सोवियत संघ के सहारे अफगानिस्तान में शासन चलाने वाले शासक मोहम्मद नजीबुल्ला को सत्ताविहीन कर दिया गया। इस्लामिक जिहाद काउंसिल का गठन-अफगानिस्तान में शासन सम्बन्धी विभिन्न धड़ों की एकता के लिए 1992 में ‘इस्लामिक जिहाद काउन्सिल’ का गठन किया गया। अनेक प्रयासों के बावजूद यह शांति स्थापित करने में सफल रही। अफगानिस्तान में तालिबान संकट – 1995 में अमेरिका और पाकिस्तान के सहयोग से तालिबान ने उत्तरी तथा मध्य अफगानिस्तान के प्रमुख क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। तालिबान को अमरीका तथा पाकिस्तान ने सशस्त्र इस्लामवादी बनाया था।

अमेरिका का तालिबान पर आक्रमण: 1999 में तालिबान अमरीका विरोधी संगठन के रूप में उभरा। अमेरिका ने तालिबान को चेतावनी दी कि वह अलकायदा को किसी प्रकार का सहयोग न करे, लेकिन अमरीका द्वारा दी गई सलाह व चेतावनी पर तालिबान ने कोई ध्यान नहीं दिया। परिणामस्वरूप 7 अक्टूबर, 2001 को अमरीका व उसके सहयोगी देशों ने अफगानिस्तान पर आक्रमण कर दिया तथा अफगानिस्तान में तालिबान शासन का पतन हो गया।

वैकल्पिक सरकार का गठन: अब अफगानिस्तान में वैकल्पिक सरकार के गठन की प्रक्रिया प्रारंभ हुई और 22 दिसम्बर, 2001 को हामिद करजई के नेतृत्व में अफगानिस्तान में सत्ता का हस्तांतरण शांतिपूर्ण तरीके से हुआ। नई सरकार के सत्तासीन होने के साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय सेना वहाँ तैनात कर दी गई।

प्रश्न 12.
‘खाड़ी युद्ध और अमरीकी हस्तक्षेप’ पर एक निबन्ध लिखिए।
उत्तर:
खाड़ी युद्ध की पृष्ठभूमि: 2-अगस्त, 1990 को इराक ने कुवैत पर आक्रमण कर उस पर अपना कब्जा कर लिया। इराक के शासक सद्दाम हुसैन ने यह घोषणा की कि वह कुवैत को किसी भी स्थिति में खाली नहीं करेगा। इराक की हठधर्मिता तथा इराक के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अमरीकी कार्यवाही – अमरीका ने इराक के विरुद्ध सीधी कार्यवाही न करके संयुक्त राष्ट्र संघ को माध्यम बनाया तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के प्रायः सभी सदस्यों इराकी आक्रमण की निंदा की, उसके खिलाफ कठोर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाये तथा यह प्रस्ताव पारित किया कि यदि इराक 15 जनवरी, 1991 तक कुवैत से नहीं हटता है तो उसके विरुद्ध सैनिक कार्यवाही की जा सकती है।

खाड़ी युद्ध संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् द्वारा इराक को दी गई समय-सीमा तक इराक ने कुवैत को खाली नहीं किया और बहुराष्ट्रीय सेना ने 17 जनवरी, 1991 को इराक पर आक्रमण कर दिया और देखते ही देखते इराक की सेनाएँ धराशायी हो गईं और कुवैत मुक्त हो गया। युद्ध की समाप्ति के पश्चात् भी इराक के खिलाफ लगाए प्रतिबंध जारी रहे ताकि इराक फिर से शस्त्रास्त्रों से लैस नहीं हो सके। खाड़ी युद्ध के निम्न प्रमुख प्रभाव हुए- खाड़ी युद्ध का प्रभाव

  1. खाड़ी युद्ध में अमरीकी सफलता के कारण विश्व में अमरीका का वर्चस्व कायम हुआ। उसे ही विश्व की एकमात्र महाशक्ति माना जाने लगा।
  2. खाड़ी के इस अमूल्य तेल उत्पादक क्षेत्र पर अमरीका का वर्चस्व स्थापित हो गया।

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प्रश्न 13.
नई विश्व व्यवस्था क्या है? नई विश्व व्यवस्था में अमरीकी वर्चस्व का एहसास किन घटनाओं के बाद हो पाया?
उत्तर:
नई विश्व व्यवस्था:
सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व में एकध्रुवीय नई विश्व व्यवस्था कायम हुई है जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व की एक सबसे शक्तिशाली ताकत के रूप में उभर गया है। सम्पूर्ण भूमण्डल में यह सैन्य व आर्थिक रूप से शक्तिशाली है। इसके अतिरिक्त सैन्य प्रौद्योगिकी तथा अनुसंधान तथा विकास सुविधाओं में इसका नेतृत्व है। अमरीकी वर्चस्व का एहसास – नई विश्व व्यवस्था में अमरीकी वर्चस्व का एहसास अग्र घटनाओं के बाद हो पाया।
1. प्रथम खाड़ी युद्ध”:
1990 के अगस्त में इराक ने कुवैत पर हमला कर उस पर कब्जा जमा लिया। इराक को समझाने-बुझाने की राजनयिक कोशिशों के असफल हो जाने के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ ने इराक पर बल प्रयोग की अनुमति दे दी। अमरीका के नेतृत्व में 34 देशों की फौज ने इराक के विरुद्ध मोर्चा खोला और उसे परास्त कर दिया। इराक को कुवैत से हटने को मजबूर होना पड़ा। इस युद्ध में अमरीका ने लाभ कमाया।

2. यूगोस्लाविया पर नाटो की बमबारी: 1999 में यूगोस्लाविया पर अमरीकी नेतृत्व में नाटो ने दो माह तक बमबारी की। यूगोस्लाविया की सरकार गिर गयी और कोसाबो (यूगोस्लाविया के एक प्रान्त) पर नाटो की सेना काबिज हो गयी।

3. सूडान और अफगानिस्तान में अलकायदा के ठिकानों पर बमबारी: 1999 में केन्या और तंजानिया में अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र की परवाह किये बिना सूडान और अफगानिस्तान के अलकायदा ठिकानों पर मिसाइलों से हमले किये।

4. आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी कार्यवाही:  9/11 की घटना के बाद अमेरिका ने अलकायदा और अफगानिस्तान के तालिबान को निशाना बनाते हुए आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी युद्ध छेड़ दिया।

5. इराक पर आक्रमण: 19 मार्च, 2003 को संयुक्त राष्ट्र को धत्ता बताते हुए इराक के तेल भंडारों पर नियंत्रण करने तथा इराक में मनपसन्द सरकार बनाने हेतु इराक पर आक्रमण कर दिया तथा उस पर नियंत्रण कर लिया।

प्रश्न 14.
अमेरिका के इराक आक्रमण के कारणों पर प्रकाश डालिये।
उत्तर:
अमेरिका के इराक आक्रमण के कारण 19. मार्च, 2003 को अमरीका ने ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ के कूट नाम से इराक पर सैन्य हमला किया। अमरीकी अगुवाई वाले ‘आकांक्षियों के महाजोट’ में 40 से ज्यादा देश शामिल हुए। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस हमले की अनुमति नहीं दी थी। अमेरिका के इराक आक्रमण के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:
1. इराक को सामूहिक संहार के हथियारों को बनाने से रोकना: अमेरिका ने इराक पर आक्रमण करने के पीछे यह कारण बताया कि इराक को सामूहिक संहार के हथियार बनाने से रोकने के लिए इराक पर यह हमला किया। लेकिन इराक में सामूहिक संहार के हथियारों की मौजूदगी के कोई प्रमाण नहीं मिले। इससे स्पष्ट होता है कि इराक पर अमेरिका के हमले के पीछे यह कारण नहीं था।

2. इराक के तेल भंडार पर नियंत्रण करना: इराक पर अमेरिकी हमले का प्रमुख कारण था। इराक के तेल भंडारों पर अमेरिकी नियंत्रण स्थापित करना। इस हमले के पश्चात् खाड़ी के इस तेल उत्पादक देश पर अमरीकी वर्चस्व स्थापित हो गया।

3. इराक में कठपुतली सरकार कायम करना: इराक पर अमेरिकी आक्रमण का एक अन्य प्रमुख कारण था। इराक में अमरीका की मनपसंद सरकार कायम करना। सद्दाम हुसैन के रहते अमरीका वहाँ अपनी कठपुतली सरकार बनाने में सफल नहीं हो पाया था। इस कारण उसका प्रमुख उद्देश्य था। इराक से सद्दाम हुसैन की सत्ता को समाप्त करना और इस उद्देश्य की पूर्ति उस पर आक्रमण कर तथा उसे समाप्त करके ही हो सकती थी।

4. अमरीकी राजनैतिक वर्चस्व का स्थापित करना: इराक पर अमरीकी आक्रमण का एक अन्य कारण था। इराक में सद्दाम हुसैन की सत्ता समाप्त कर, इराक पर अपना अधिकार जमाकर, विश्व में अपने वर्चस्व को स्थापित करना तथा यह दिखाना कि अब विश्व में उसका प्रतिरोध कोई भी शक्ति नहीं कर सकती।

प्रश्न 15.
इतिहास हमें वर्चस्व के बारे में क्या सिखाता है?
उत्तर:
शक्ति-संतुलन के तर्क को देखते हुए वर्चस्व की स्थिति अंतर्राष्ट्रीय मामलों में एक असामान्य परिघटना है। इसका कारण बड़ा सीधा-सादा है। विश्व – सरकार जैसी कोई चीज नहीं होती और ऐसे में हर देश को अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होती है। कभी-कभी अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में उसे यह भी सुनिश्चित करना होता है कि कम से कम उसका वजूद बना रहे। इस कारण, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था में विभिन्न देश शक्ति संतुलन को लेकर बड़े सतर्क होते हैं और आमतौर पर वे किसी एक देश को इतना ताकतवर नहीं बनने देते कि बाकी के देशों के लिए भयंकर खतरा बन जाए।

सौ साल बीत चुके हैं। इस दौरान सिर्फ दो अवसर आए जब किसी एक देश ने अंतर्राष्ट्रीय फलक पर वही प्रबलता प्राप्त की जो आज अमरीका को हासिल है। यूरोप की राजनीति के संदर्भ में 1660 से 1713 तक फ्रांस का दबदबा था और यह वर्चस्व का पहला उदाहरण है। ब्रिटेन का वर्चस्व और समुद्री व्यापार के बूते कायम हुआ उसका साम्राज्य 1860 से 1910 तक बना रहा। यह वर्चस्व का दूसरा उदाहरण है। वर्चस्व अपने चरमोत्कर्ष के समय अजेय जान पड़ता है लेकिन यह हमेशा के लिए कायम नहीं रहता इसके ठीक विपरीत शक्ति-संतुलन की राजनीति वर्चस्वशील देश की ताकत को आने वाले समय में कम कर देती है।

1660 में लुई 14वें के शासनकाल में फ्रांस अपराजेय था लेकिन 1713 तक इंग्लैण्ड, हैवसबर्ग, आस्ट्रिया और रूस फ्रांस की ताकत को चुनौती देने लगे। 1860 में विक्टोरियाई शासन का सूर्य अपने पूरे चरम पर था और ब्रिटिश साम्राज्य हमेशा के लिए सुरक्षित लगता था। 1910 तक यह स्पष्ट हो गया कि जर्मनी, जापान और अमरीका ब्रिटेन की ताकत को ललकारने के लिए उठ खड़े हुए हैं। अब से 20 साल बाद एक और महाशक्ति या कहें कि शक्तिशाली देशों का गठबंधन उठ खड़ा हो सकता है क्योंकि तुलनात्मक रूप से देखें तो अमरीका की ताकत कमजोर पड़ रही है।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत

Jharkhand Board JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 Political Science Important Questions Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत

बहुचयनात्मक प्रश्न

1. सोवियत संघ का विघटन हुआ
(अ) 1990 में
(स) 1992 में
(ब) 1991 में
(द) 1993 में।
उत्तर:
(ब) 1991 में

2. पूँजीवादी दुनिया और साम्यवादी दुनिया के बीच विभाजन का प्रतीक थी
अथवा
शीत युद्ध का सबसे बड़ा प्रतीक थी-
(अ) बर्लिन की दीवार का खड़ा किया जाना।
(ब) बर्लिन की दीवार का गिराया जाना।
(स) हिटलर के नेतृत्व में नाजी पार्टी का उत्थान।
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(अ) बर्लिन की दीवार का खड़ा किया जाना।

3. बर्लिन की दीवार बनाई गई थी
(अ) 1961 में
(ब) 1951 में
(स) 1971 में
(द) 1981 में।
उत्तर:
(अ) 1961 में

4. पूर्वी जर्मनी के लोगों ने बर्लिन की दीवार गिरायी-
(अ) 1946 में
(ब) 1991 में
(स) 1989 में
(द) 1961 में।
उत्तर:
(स) 1989 में

5. सोवियत संघ के विघटन के लिए किस नेता को जिम्मेदार माना गया
(अ) निकिता ख्रुश्चेव
(स) बोरिस येल्तसिन
(ब) स्टालिन
(द) मिखाइल गोर्बाचेव।
उत्तर:
(द) मिखाइल गोर्बाचेव।

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6. सोवियत संघ के विभाजन के बाद विश्व पटल पर कितने नए देशों का उद्भव हुआ
(अ) 11
(ब) 9
(स) 10
(द) 15
उत्तर:
(द) 15

7. साम्यवादी गुट के विघटन का प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय प्रभाव पड़ा
(अ) द्वि- ध्रुवीय विश्व व्यवस्था का उदय
(ब) बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का उदय
(स) एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का उदय
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(स) एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का उदय

8. वर्तमान विश्व में कौनसा देश एकमात्र महाशक्ति है-
(अ) रूस
(ब) चीन
(स) अमेरिका
(द) फ्रांस।
उत्तर:
(स) अमेरिका

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

1. 1964 से 1982 तक ………………… सोवियत संघ के राष्ट्रपति थे।
उत्तर:
लियोनेड ब्रेझनेव

2. …………………… द्वारा समाजवादी सोवियत संघ की व्यवस्था को सुधारने की चाह और प्रयास उसके विघटन का कारण बने।
उत्तर:
मिखाइल गोर्बाचेव

3. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सोवियत संघ का राष्ट्राध्यक्ष ……………………… था।
उत्तर:
जोजेफ स्टालिन

4. …………………… पूरी दुनिया में साम्यवाद के प्रेरणास्रोत थे।
उत्तर:
व्लादिमीर लेनिन

5. रूस ने भारत के अन्तरिक्ष उद्योग में जरूरत के वक्त ………………………..देकर मदद की।
उत्तर:
क्रायोजेनिक रॉकेट

6. 2001 के भारत-रूस सामरिक समझौते के अंग के रूप में भारत और रूस के बीच …………………….. पर हस्ताक्षर हुए।
उत्तर:
6.80

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
बर्लिन की दीवार किसका प्रतीक थी ?
उत्तर:
बर्लिन की दीवार पूँजीवादी दुनिया और साम्यवादी दुनिया के बीच विभाजन का प्रतीक थी।

प्रश्न 2.
समाजवादी सोवियत गणराज्य कब अस्तित्व में आया?
उत्तर:
समाजवादी सोवियत गणराज्य रूस में हुई 1917 की समाजवादी क्रांति के बाद अस्तित्व में आया।

प्रश्न 3.
बोल्शेविक कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक कौन थे?
उत्तर:
बोल्शेविक कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक ब्लादिमीर लेनिन थे।

प्रश्न 4.
1917 की रूसी क्रांति के नायक कौन थे?
उत्तर:
ब्लादिमीर लेनिन।

प्रश्न 5.
विश्व में सर्वप्रथम कब और कहाँ साम्यवादी पार्टी की सरकार लोकतांत्रिक चुनावों के आधार पर बनी?
उत्तर:
अक्टूबर, 1917 में, सोवियत संघ में।

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प्रश्न 6.
सोवियत प्रणाली के अनुसार राज्य की प्रमुख प्राथमिकता क्या थी?
उत्तर:
सोवियत प्रणाली के अनुसार राज्य की प्रमुख प्राथमिकता देश के समस्त संसाधनों पर सार्वजनिक स्वामित्व वाले साम्यवादी शासन की स्थापना थी।

प्रश्न 7.
सोवियत संघ के नेतृत्व में बने पूर्वी यूरोप के देशों के सैनिक गठबंधन का नाम लिखिये।
उत्तर:
वारसा पैक्ट।

प्रश्न 8.
लेनिन के उत्तराधिकारी कौन थे?
उत्तर:
जोजेफ स्टालिन।

प्रश्न 9.
पश्चिम के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का सुझाव रखने वाले सोवियत संघ के नेता कौन थे?
उत्तर:
निकिता ख्रुश्चेव।

प्रश्न 10.
शीतयुद्ध काल में हुए किन्हीं दो संघर्षों (युद्धों) का उल्लेख कीजिए, जिनमें अमेरिका ने निर्णायक भूमिका निभाई।
उत्तर:

  1. बर्लिन संकट
  2. क्यूबा संकट।

प्रश्न 11.
मिखाइल गोर्बाचेव ने आर्थिक और राजनैतिक सुधार हेतु किन दो नीतियों को अपनाया?
उत्तर:

  1. पेरेस्त्रोइका (पुनर्रचना) और
  2. ग्लासनोस्त ( खुलेपन) की नीतियों को।

प्रश्न 12.
सोवियत संघ कितने गणराज्यों से मिलकर बना था?
उत्तर:
15 गणराज्यों से।

प्रश्न 13.
सोवियत संघ का अन्त ( विघटन) कब हुआ?
उत्तर:
25 दिसम्बर, 1991 को।

प्रश्न 14.
सोवियत संघ के विघटन के समय राष्ट्रपति कौन था?
अथवा
सोवियत संघ का अन्तिम राष्ट्रपति कौन था ?
उत्तर:
मिखाइल गोर्बाचेव।

प्रश्न 15.
गोर्बाचेव सोवियत संघ के राष्ट्रपति किस वर्ष बने?
उत्तर:
1985 में।

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प्रश्न 16.
समाजवादी सोवियत गणराज्य कब अस्तित्व में आया?
उत्तर:
समाजवादी सोवियत गणराज्य रूस में हुई 1917 की समाजवादी क्रान्ति के बाद अस्तित्व में आया।

प्रश्न 17.
1917 की रूसी क्रान्ति क्यों हुई थी?
उत्तर:
1917 की रूसी क्रान्ति पूँजीवादी व्यवस्था के विरोध में हुई थी तथा समाजवाद के आदर्शों और समतामूलक समाज की जरूरत से प्रेरित थी।

प्रश्न 18.
सोवियत राजनीतिक प्रणाली की धुरी क्या थी?
उत्तर:
सोवियत राजनीतिक प्रणाली की धुरी कम्युनिस्ट पार्टी थी।

प्रश्न 19.
सोवियत राजनीतिक प्रणाली किस विचारधारा पर आधारित थी?
उत्तर:
सोवियत राजनीतिक प्रणाली साम्यवादी विचारधारा पर आधारित थी।

प्रश्न 20.
दूसरी दुनिया किसे कहा जाता है?
उत्तर:
पूर्वी यूरोप के जो देश समाजवादी खेमे में शामिल हुए थे, उनको दूसरी दुनिया कहा जाता है।

प्रश्न 21.
सोवियत संघ के किन क्षेत्रों की जनता उपेक्षित और दमित महसूस करती थी और क्यों?
उत्तर:
रूस गणराज्य के अतिरिक्त सोवियत संघ के अन्य क्षेत्रों की जनता प्रायः उपेक्षित और दमित महसूस करती

प्रश्न 22.
गोर्बाचेव ने सोवियत संघ में सुधार हेतु क्या प्रयत्न किये?
उत्तर:
गोर्बाचेव ने देश के अन्दर आर्थिक-राजनीतिक सुधारों और लोकतन्त्रीकरण की नीति चलायी।

प्रश्न 23.
गोर्बाचेव के सुधारों का विरोध किन नेताओं ने किया?
उत्तर:
कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने गोर्बाचेव की सुधार नीतियों का विरोध किया।

प्रश्न 24.
रूस के पहले चुने हुए राष्ट्रपति कौन थे?
उत्तर:
बोरिस येल्तसिन।

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प्रश्न 25.
‘शॉक थेरेपी’ की सर्वोपरि मान्यता क्या थी?
उत्तर:
शॉक थेरेपी की सर्वोपरि मान्यता थी कि मिल्कियत का सबसे प्रभावी रूप निजी स्वामित्व होगा।

प्रश्न 26.
सोवियत संघ के पतन का प्रमुख कारण क्या रहा?
उत्तर:
सोवियत संघ की राजनीतिक-आर्थिक संस्थाओं की अन्दरूनी कमजोरी सोवियत संघ के पतन का प्रमुख कारण रही।

प्रश्न 27.
बाल्टिक गणराज्य में कौन-कौनसे राष्ट्र आते हैं?
उत्तर:
बाल्टिक गणराज्य के अन्तर्गत एस्टोनिया, लताविया और लिथुआनिया आते हैं।

प्रश्न 28.
सोवियत संघ के विघटन का अन्तिम और सर्वाधिक तात्कालिक कारण क्या रहा?
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन का अन्तिम और सर्वाधिक तात्कालिक कारण रहा बाल्टिक गणराज्यों, उक्रेन, जार्जिया और रूस जैसे विभिन्न गणराज्यों में राष्ट्रीयता और सम्प्रभुता का उभार।

प्रश्न 29.
सोवियत संघ के विघटन के कोई दो परिणाम लिखिए।
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के परिणामस्वरूप

  1. शीत युद्ध का दौर समाप्त हो गया।
  2. एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का उदय हुआ।

प्रश्न 30.
शीत युद्ध की समाप्ति के प्रभाव का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. दूसरी दुनिया (सोवियत संघ खेमे ) का पतन तथा
  2. एकध्रुवीय विश्व का उदय शीत युद्ध की समाप्ति का प्रभाव था।

प्रश्न 31.
सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् रूस ने किस तरह की अर्थव्यवस्था को अपनाया?
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् रूस ने उदारवादी अर्थव्यवस्था को अपनाया।

प्रश्न 32.
सोवियत संघ के विघटन के बाद अधिकांश गणराज्यों की अर्थव्यवस्था के पुनर्जीवित होने का क्या कारण था?
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के बाद अधिकांश गणराज्यों की अर्थव्यवस्था खनिज तेल, प्राकृतिक गैस के निर्यात से पुनर्जीवित हुई। मिले ?

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प्रश्न 33.
सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् भारत को रूस के साथ मित्रता बनाए रखने से कौन से दो लाभ
उत्तर:

  1. भारत को रूस से आधुनिकतम सैनिक सामान मिलते रहे।
  2. विघटित हुए नवीन गणराज्यों के साथ भारत अपने व्यापारिक सम्बन्ध कायम रख पाया।

प्रश्न 34.
सोवियत संघ के विघटन के समय किन दो गणराज्यों में हिंसक अलगाववादी आंदोलन हुए?
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के समय दो पूर्व गणराज्यों

  1. चेचन्या तथा
  2. दागिस्तान में हिंसक अलगाववादी आंदोलन हुए लादना।

प्रश्न 35.
शॉक थैरेपी से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर;
शॉक थैरेपी से आशय है। धीरे-धीरे परिवर्तन न करके एकदम आमूल-चूल परिवर्तन के प्रयत्नों को

प्रश्न 36.
शॉक थैरेपी का कोई एक परिणाम बताइए।
अथवा
‘शॉक थैरेपी’ के परिणामस्वरूप सोवियत खेमे का प्रत्येक राज्य किस अर्थतन्त्र में समाहित हुआ?
उत्तर:
शॉक थैरेपी के परिणामस्वरूप सोवियंत खेमे का प्रत्येक राज्य पूँजीवादी अर्थतन्त्र में समाहित हुआ।

प्रश्न 37.
सोवियत प्रणाली की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  1. सोवियत राजनीतिक प्रणाली की धुरी कम्युनिस्ट पार्टी थी।
  2. अर्थव्यवस्था योजनाबद्ध और राज्य के नियन्त्रण में थी।

प्रश्न 38.
सोवियत प्रणाली के दो गुण बताइये।
उत्तर:

  1. सरकार बुनियादी जरूरत की चीजें रियायती दर पर उपलब्ध कराती थी।
  2. बेरोजगारी नहीं थी।

प्रश्न 39.
सोवियत प्रणाली में आये किन्हीं दो दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. सोवियत प्रणाली पर नौकरशाही का शिकंजा कसता चला गया।
  2. यह प्रणाली सत्तावादी हो गई तथा नागरिकों का जीवन कठिन होता चला गया।

प्रश्न 40.
1991 में सोवियत संघ के कौनसे गणराज्यों ने अपने लिये स्वतन्त्रता की माँग नहीं की?
उत्तर:
मध्य एशियाई गणराज्यों ने सोवियत संघ से अपने लिए स्वतन्त्रता की माँग नहीं की।

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प्रश्न 41.
सोवियत संघ पर हथियारों की होड़ से क्या प्रभाव पड़े?
उत्तर:
हथियारों की होड़ के कारण सोवियत संघ प्रौद्योगिकी और बुनियादी ढांचे (मसलन- परिवहन, मामले में पश्चिमी देशों की तुलना में पीछे रह गया।

प्रश्न 42.
सोवियत संघ से सबसे पहले और कब, किस गणराज्य ने स्वतन्त्रता की घोषणा की?
उत्तर:
मार्च, 1990 में लिथुआनिया ने सबसे पहले सोवियत संघ से स्वतन्त्रता की घोषणा की।

प्रश्न 43.
पूर्व सोवियत संघ से स्वतन्त्र हुए राष्ट्रों ने किस संगठन का निर्माण किया?
उत्तर:
पूर्व सोवियत संघ से स्वतन्त्र हुए राष्ट्रों ने ‘स्वतन्त्र राज्यों के राष्ट्रकुल’ संगठन का निर्माण किया।

प्रश्न 44.
सोवियत संघ के इतिहास की सबसे बड़ी ‘गराज सेल’ कौन सी थी?
अथवा
सोवियत संघ की ‘गराज सेल’ किसे कहा गया है?
उत्तर:
पूर्व सोवियत संघ के सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को अनाप-शनाप कीमतों पर निजी कम्पनियों को बेचने को उसके इतिहास की सबसे बड़ी ‘गराज सेल’ कहा गया।

प्रश्न 45.
मध्य एशियाई गणराज्यों में किस संसाधन का विशाल भंडार है?
उत्तर:
मध्य एशियाई गणराज्यों में हाइड्रोकार्बनिक (पेट्रोलियम) संसाधनों का विशाल भंडार है।

प्रश्न 46.
सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस ने किस तरह की अर्थव्यवस्था को अपनाया?
उत्तर:
उदारवादी अर्थव्यवस्था को।

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प्रश्न 47.
ताजिकिस्तान में हुआ गृह-युद्ध कितने वर्ष तक चलता रहा?
उत्तर:
ताजिकिस्तान में हुआ गृह-युद्ध 1991 से 2001 तक दस वर्षों तक चलता रहा।

प्रश्न 48.
पूर्व सोवियत संघ में कितने गणराज्य तथा स्वायत्तशासी गणराज्य सम्मिलित थे?
उत्तर:
पूर्व सोवियत संघ में 15 गणराज्य तथा 20 स्वायत्त गणराज्य और 18 स्वायत्तशासी गणराज्य सम्मिलित थे।

प्रश्न 49.
ब्लादिमीर लेनिन कौन थे?
उत्तर:
ब्लादिमीर लेनिन रूस में बोल्शेविक पार्टी के संस्थापक, 1917 की रूसी क्रांति के नायक तथा सोवियत संघ के संस्थापक अध्यक्ष थे।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
बर्लिन की दीवार का निर्माण एवं विध्वंस किस प्रकार की ऐतिहासिक घटना कहलाती है?
उत्तर:
शीत युद्ध के उत्कर्ष के चरम दौर में सन् 1961 में बर्लिन की दीवार खड़ी की गई। यह दीवार शीत युद्ध का प्रतीक रही। सन् 1989 में पूर्वी जर्मनी की आम जनता ने इसे गिरा दिया। यह दोनों जर्मनी के एकीकरण, साम्यवादी खेमे की समाप्ति तथा शीत युद्ध की समाप्ति की शुरूआत थी ।

प्रश्न 2.
सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था में गतिरोध क्यों आया?
उत्तर:
सोवियत संघ ने अपने संसाधनों का अधिकांश भाग परमाणु हथियारों के विकास, सैन्य साजो-सामान के निर्माण तथा पूर्वी यूरोप के देशों के विकास पर लगाया इसलिए इसकी राजनीतिक-आर्थिक संस्थाएँ आंतरिक रूप से कमजोर हो गईं। फलतः इसकी अर्थव्यवस्था में गतिरोध आ गया।

प्रश्न 3.
द्वि- ध्रुवीयता से आप क्या समझते हैं? युद्ध के पश्चात्
उत्तर:
द्विध्रुवीयता से आशय है विश्व का दो गुटों में बंटा होना द्वितीय विश्व विश्व पूँजीवादी तथा साम्यवादी दो गुटों में बंट गया पूँजीवादी गुट का नेता अमरीका तथा साम्यवादी गुट का नेता सोवियत संघ था।

प्रश्न 4.
द्वि- ध्रुवीय विश्व के पतन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व सोवियत संघ और अमेरिका के दो गुटों में विभाजित हो गया था। इसलिए इसे द्विध्रुवीय विश्व कहा जाता था। लेकिन 1991 में सोवियत संघ के पतन होने से दूसरे ध्रुव (गुट) का पतन हो गया। इसी को द्वि- ध्रुवीय विश्व का पतन कहा जाता है।

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प्रश्न 5.
शॉक थेरेपी से क्या आशय है?
उत्तर:
शॉक थेरेपी से आशय है कि धीरे-धीरें परिवर्तन न करके एकदम आमूल-चूल परिवर्तन के प्रयत्नों को लादना रूसी गणराज्य में शॉक थैरेपी के अन्तर्गत तुरत-फुरत निजी स्वामित्व, मुक्त व्यापार, वित्तीय खुलापन तथा मुद्राओं की आपसी परिवर्तनीयता पर बल दिया गया

प्रश्न 6.
आपकी राय में शॉक थेरेपी का रूस की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा? ‘शॉक थेरेपी’ से क्या हानि हुई ?
अथवा
उत्तर:

  1. शॉक थेरेपी से रूस में पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गयी;
  2. इससे इस क्षेत्र की जनता को बर्बादी की मार झेलनी पड़ी;
  3. इससे रूस का औद्योगिक ढाँचा चरमरा गया।

प्रश्न 7.
आपकी राय में सोवियत संघ के विघटन के दो मुख्य कारण क्या थे?
अथवा
सोवियत संघ के विघटन का तात्कालिक कारण क्या था ?
उत्तर:

  1. सोवियत संघ के विघटन का पहला कारण उसकी राजनीतिक आर्थिक संस्थाओं की अंदरूनी कमजोरी था।
  2. सोवियत संघ के विघटन का दूसरा और सर्वाधिक तात्कालिक कारण था – विभिन्न गणराज्यों – बाल्टिक गणराज्य, उक्रेन, रूस तथा जार्जिया आदि में राष्ट्रीयता और संप्रभुता के भावों का उभार।

प्रश्न 8.
सोवियत संघ में आम जनता कम्युनिस्ट पार्टी तथा राजनीतिक व्यवस्था तथा शासकों से अलग- थलग क्यों पड़ गयी थी?
उत्तर:
सोवियत संघ में 90 के दशक में कम्युनिस्ट पार्टी जनता के प्रति जवाबदेह नहीं रह गयी थी। गतिरुद्ध प्रशासन, भारी भ्रष्टाचार, शासकों की अक्षमता, खुलापन लाने की अनिच्छा तथा सत्ता के केंन्द्रीकृत होने आदि बातों के कारण आम जनता शासन व शासकों से अलग-थलग पड़ गयी थी।

प्रश्न 9.
सोवियत संघ के विघटन के कोई दो परिणाम स्पष्ट कीजिए।
अथवा
सोवियत संघ के पतन के परिणाम लिखिए।
उत्तर:

  1. सोवियत संघ के पतन के परिणामस्वरूप शीतयुद्ध के दौर का संघर्ष समाप्त हो गया।
  2. सोवियत संघ के पतन के परिणामस्वरूप एकध्रुवीय विश्व का उदय हुआ।
  3. सोवियत संघ के पतन के परिणामस्वरूप अनेक नये देशों को स्वतंत्र पहचान मिली।

प्रश्न 10.
भारत-रूस सम्बन्धों को संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  1. भारत-रूस सम्बन्धों का इतिहास आपसी विश्वास और साझे हितों का इतिहास है।
  2. भारत और रूस दोनों देशों के आपसी सम्बन्ध इन देशों की जनता की अपेक्षाओं से मेल खाते हैं।
  3. दोनों देशों का सपना बहुध्रुवीय विश्व का है।

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प्रश्न 11.
सोवियत प्रणाली का पूर्वी यूरोप या दूसरी दुनिया पर क्या प्रारम्भिक प्रभाव पड़ा था?
उत्तर:
दूसरे विश्व युद्ध के बाद पूर्वी यूरोप के देश सोवियत संघ के अंकुश में आ गये थे। सोवियत सेना ने उन्हें फासीवादी ताकतों के चंगुल से मुक्त कराया था। इन सभी देशों की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को सोवियत संघ की समाजवादी प्रणाली की तर्ज पर ढाला गया।

प्रश्न 12.
जोजेफ स्टालिन का सोवियत संघ के एक महत्त्वपूर्ण नेता के रूप में संक्षिप्त परिचय दीजिए
उत्तर:
जोजेफ स्टालिन – जोजेफ स्टालिन लेनिन के बाद सोवियत संघ के सर्वोच्च नेता और राष्ट्राध्यक्ष बने उन्होंने सोवियत संघ का 1924 से 1953 तक नेतृत्व किया। उनके काल में सोवियत संघ में औद्योगीकरण को बढ़ावा मिला तथा खेती का बलपूर्वक सामूहिकीकरण किया गया। उन्हीं के काल में शीतयुद्ध का प्रारम्भ हुआ।

प्रश्न 13.
निकिता ख्रुश्चेव का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
निकिता ख्रुश्चेव निकिता ख्रुश्चेव स्टालिन के बाद सन् 1953 में सोवियत संघ के राष्ट्रपति बने और 1964 तक वे इस पद पर बने रहे। उन्होंने पश्चिम के साथ ‘शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व’ का सुझाव रखा तथा हंगरी के जन- विद्रोह का दमन किया।

प्रश्न 14.
लिओनिद ब्रेझनेव का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
लिओनिद ब्रेझनेव लिओनिद ब्रेझनेव सन् 1964 से 1982 तक सोवियत संघ के राष्ट्रपति रहे थे। उन्होंने एशिया की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था का सुझाव दिया था। वे सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच सम्बन्ध सुधारने तथा पारस्परिक तनाव में कमी लाने के लिए प्रयत्नशील रहे।

प्रश्न 15.
मिखाइल गोर्बाचेव पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
मिखाइल गोर्बाचेव मिखाइल गोर्बाचेव सोवियत संघ के अन्तिम राष्ट्रपति (1985 से 1991 तक) थे। उन्होंने सोवियत संघ में पेरेस्त्रोइका (पुनर्रचना) और ग्लासनोस्त ( खुलेपन) के आर्थिक और राजनैतिक सुधार शुरू किये। उन्होंने शीतयुद्ध समाप्त किया।

प्रश्न 16.
बोरिस येल्तसिन का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
बोरिस येल्तसिन सोवियत संघ के विघटन के बाद बोरिस येल्तसिन रूस के प्रथम चुने हुए राष्ट्रपति बने । इस पद पर उन्होंने 1991 से 1999 तक कार्य किया। सन् 1991 में सोवियत संघ के शासन के विरुद्ध उठे विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व करते हुए उन्होंने सोवियत संघ के विघटन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी

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प्रश्न 17.
चेकोस्लोवाकिया के विघटन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
सोवियत संघ के साम्यवादी गठबंधन से मुक्त होकर लोकतंत्रीय आंदोलन में चेकोस्लोवाकिया में राष्ट्रवादी ज्वार उठा और चेकोस्लोवाकिया शांतिपूर्ण ढंग से चेक और स्लोवाकिया नामक दो देशों में विभाजित हो गया। चेकोस्लोवाकिया इन्हीं दो राष्ट्रीयताओं से मिलकर बना था।

प्रश्न 18.
यूगोस्लाविया का विघटन किस प्रकार हुआ ?
उत्तर:
यूगोस्लाविया में गहन जातीय संघर्ष हुआ और सन् 1991 में यूगोस्लाविया कई प्रान्तों में विभाजित हो गया। यूगोस्लाविया में शामिल बोस्निया हर्जेगोविना, स्लोवेनिया तथा क्रोएशिया ने अपने को स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया ।

प्रश्न 19.
सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् स्वतंत्र हुए 15 गणराज्यों के नाम लिखिये।
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् स्वतंत्र हुए 15 गणराज्य ये हैं।
रूसी संघ, कजाकिस्तान, एस्टोनिया, लताविया, लिथुआनिया, बेलारूस, उक्रेन, माल्दोवा, आर्मेनिया, जार्जिया, अजरबैजान, तुर्कमेनिस्तान,  उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान।

प्रश्न 20.
शीत युद्ध के दौरान भारत व सोवियत संघ के बीच आर्थिक सम्बन्धों की विवेचना कीजिए
उत्तर:
शीत युद्ध के दौरान भारत व सोवियत संघ के बीच आर्थिक सम्बन्ध घनिष्ठ थे। यथा

  1. सोवियत संघ ने भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों को ऐसे वक्त में आर्थिक और तकनीकी मदद की जब ऐसी मदद पाना मुश्किल था।
  2. भारत में जब विदेशी मुद्रा की कमी थी तब उसने रुपये में भारत के साथ व्यापार किया।

प्रश्न 21.
सोवियत संघ के प्रति राष्ट्रवादी असन्तोष यूरोपीय और अपेक्षाकृत समृद्ध गणराज्यों में सबसे प्रबल क्यों रहा?
उत्तर:
सोवियत संघ के प्रति राष्ट्रवादी असन्तोष यूरोपीय और अपेक्षाकृत समृद्ध गणराज्यों रूस, उक्रेन, जार्जिया और बाल्टिक क्षेत्र में सबसे प्रबल रहा क्योंकि-

  1. यहाँ के आम लोग अपने को मध्य एशियाई गणराज्यों के लोगों से अलग-थलग महसूस कर रहे थे।
  2. यहाँ के लोगों में यह भाव घर कर गया था कि ज्यादा पिछड़े इलाकों को सोवियत संघ में शामिल रखने की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।

प्रश्न 22.
सोवियत संघ के विघटन का तात्कालिक कारण क्या रहा तथा इसके पीछे निहित कारणों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन का अन्तिम और तात्कालिक कारण था राष्ट्रवादी भावनाओं और सम्प्रभुता की इच्छा का उभार। सोवियत संघ के विभिन्न गणराज्य सोवियत संघ से स्वतन्त्र होकर अपना पृथक् सम्प्रभु राज्य के निर्माण करने को आन्दोलनरत हुए। राष्ट्रीयता और सम्प्रभुता के ज्वार के उठने के अनेक कारण बताये जाते हैं-

  1. सोवियत संघ के आकार, विविधता तथा उसकी बढ़ती हुई आन्तरिक समस्याओं ने लोगों को इस ओर सोचने को प्रेरित किया।
  2. गोर्बाचेव के सुधारों ने राष्ट्रवादियों के असन्तोष को इस सीमा तक भड़काया कि उस पर शासकों का नियन्त्रण नहीं रहा ।
  3. यूरोपीय तथा बाल्टिक गणराज्यों में यह भाव घर कर गया था कि ज्यादा पिछड़े इलाकों को सोवियत संघ में शामिल रखने की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।

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प्रश्न 23.
सोवियत प्रणाली क्या थी?
अथवा
सोवियत प्रणाली की विशेषताओं का उल्लेख कीजिये ।
उत्तर:
समाजवादी सोवियत गणराज्य (यू.एस.एस.आर.) रूस में हुई 1917 की समाजवादी क्रान्ति के बाद अस्तित्व में आया। सोवियत प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ ये थीं

  1. सोवियत राजनीतिक प्रणाली की धुरी कम्युनिस्ट पार्टी थी। इसमें किसी अन्य राजनीतिक दल या विपक्ष के लिए जगह नहीं थी।
  2. सोवियत आर्थिक प्रणाली योजनाबद्ध और राज्य के नियन्त्रण में थी, सम्पत्ति पर राज्य का स्वामित्व व नियन्त्रण था।
  3. सोवियत संघ की संचार प्रणाली बहुत उन्नत थी।
  4. उसके पास विशाल ऊर्जा संसाधन था, घरेलू उपभोक्ता उद्योग भी बहुत उन्नत था । सरकार ने अपने सभी नागरिकों के लिए न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित कर दिया था । बेरोजगारी नहीं थी ।

प्रश्न 24.
सोवियत संघ के विघटन में गोर्बाचेव की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन में गोर्बाचेव की भूमिका – सोवियत संघ के विघटन का एक प्रमुख कारण गोर्बाचेव की सुधारवादी नीतियाँ भी रही थीं। गोर्बाचेव ने देश में स्वतंत्रता, समानता, राष्ट्रीयता और भ्रातृत्व व एकता के वातावरण को तैयार किए बिना ही पुनर्गठन (पेरेस्त्रोइका) व खुलापन ( ग्लासनोस्त) जैसी नीतियों को लागू कर दिया। परिणामस्वरूप सोवियत संघ के कुछ राष्ट्रों को संघ से अलग होने के निर्णय को मान्यता देनी पड़ी। तत्पश्चात् एक के बाद एक सभी गणराज्य : स्वतंत्र होते चले गये और देखते ही देखते सोवियत संघ का विघटन हो गया।

प्रश्न 25.
सोवियत प्रणाली की किन्हीं चार कमियों का वर्णन कीजिए।
अथवा
सोवियत प्रणाली के प्रमुख दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
सोवियत प्रणाली में निम्नलिखित प्रमुख दोषों ने अपनी पैठ बना ली थी, जिसके कारण सोवियत अर्थव्यवस्था ठहर गयी थी। यथा

  1. सोवियत प्रणाली पर नौकरशाही का शिकंजा कसता चला गया। यह प्रणाली सत्तावादी होती गई और नागरिकों का जीवन कठिन होता चला गया।
  2. सोवियत संघ में कम्युनिस्ट पार्टी के शासन का सभी संस्थाओं पर गहरा अंकुश था। यह दल जनता के प्रति जवाबदेह नहीं था।
  3. संघ के 15 गणराज्यों में रूस का हर मामले में प्रभुत्व था । अन्य गणराज्यों की जनता अक्सर उपेक्षित और दमित महसूस करती थी।
  4. उत्पादकता और प्रौद्योगिकी के मामले में सोवियत संघ पश्चिम के देशों से बहुत पीछे रह गया था। इससे हर तरह की उपभोक्ता वस्तुओं की कमी हो गई थी।

प्रश्न 26.
स्पष्ट कीजिए कि पूर्व सोवियत संघ के अधिकांश गणराज्य संघर्ष व संघर्ष की आशंका से ग्रस्त रहे हैं।
उत्तर:
पूर्व सोवियत संघ के अधिकांश गणराज्य संघर्षों से ग्रस्त रहे हैं। यथा

  1. रूस के दो गणराज्यों चेचन्या और दागिस्तान में हिंसक अलगाववादी आन्दोलन चले।
  2. ताजिकिस्तान दस वर्षों तक अर्थात् 2001 तक गृहयुद्धों की चपेट में रहा।
  3. अजरबैजान का एक प्रान्त नगरनो कराबाख है। यहाँ के कुछ स्थानीय अर्मेनियाई अलग होकर आर्मेनिया से मिलना चाहते हैं।
  4. जार्जिया में दो प्रान्त स्वतन्त्रता चाहते हैं और गृहयुद्ध लड़ रहे हैं।
  5. युक्रेन, किरगिझस्तान तथा जार्जिया में मौजूदा शासन को उखाड़ फेंकने के लिए आन्दोलन चल रहे हैं।
  6. कई देश और प्रान्त नदी – जल के प्रश्न पर आपस में भिड़े हुए हैं।

प्रश्न 27.
मध्य एशियाई गणराज्यों में बाहरी ताकतों की बढ़ती दखल की स्थिति को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मध्य एशियाई गणराज्यों में पेट्रोलियम संसाधनों का विशाल भण्डार है। इसी कारण से यह क्षेत्र बाहरी ताकतों और तेल कम्पनियों की आपसी प्रतिस्पर्द्धा का अखाड़ा भी बन गया है। यथा

  1. यह क्षेत्र रूस, चीन और अफगानिस्तान से सटा है और पश्चिम एशिया के नजदीक है।
  2. अमरीका इस क्षेत्र में सैनिक ठिकाना बनाना चाहता है।
  3. रूस इन राज्यों को अपना निकटवर्ती ‘विदेश’ मानता है और उसका मानना है कि इन राज्यों को रूस के प्रभाव में रहना चाहिए।
  4. खनिज तेल जैसे संसाधन की मौजूदगी के कारण चीन के हित भी इस क्षेत्र से जुड़े हैं और चीनियों ने सीमावर्ती क्षेत्रों में आकर व्यापार करना शुरू कर दिया है।

प्रश्न 28.
मिखाइल गोर्बाचेव सोवियत प्रणाली में सुधार क्यों लाना चाहते थे?
अथवा
किन कारणों ने गोर्बाचेव को सोवियत संघ में सुधार करने के लिए बाध्य किया?
उत्तर:
मिखाइल गोर्बाचेव सोवियत प्रणाली में निम्नलिखित कारणों की वजह से सुधार लाना चाहते थे-

  1. सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था पश्चिमी देशों की तुलना में काफी पिछड़ गई थी; अर्थव्यवस्था में गतिरोध पैदा होने की वजह से देश में उपभोक्ता वस्तुओं की भारी कमी उत्पन्न हो रही थी। सोवियत संघ को उत्पादकता और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पाश्चात्य देशों की बराबरी करने के लिए गोर्बाचेव सोवियत प्रणाली में सुधार लाना चाहते थे।
  2. सोवियत संघ के अधिकांश गणराज्य समाजवादी शासन से ऊब गये थे और वे विद्रोह करने पर आमादा हो गये थे।
  3. गोर्बाचेव ने पश्चिम के देशों के साथ संबंधों को सामान्य बनाने तथा सोवियत संघ को लोकतांत्रिक रूप देने के लिए वहां सुधार करने का फैसला किया।

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प्रश्न 29.
द्वि- ध्रुवीकरण से क्या आशय है?
उत्तर:
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में दो महाशक्तियाँ उभर कर आयीं। ये थीं-

  1. संयुक्त राज्य अमेरिका और
  2. सोवियत संघ। दोनों ने अपने प्रभाव क्षेत्र में विस्तार करने के लिए प्रयास किये; इससे उनके मध्य शीत युद्ध प्रारम्भ हो गया। इस शीत युद्ध ने यूरोप को अमेरिकी खेमे और साम्यवादी खेमे में बाँट दिया। सन्धियों व प्रतिसन्धियों ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में विश्व को परस्पर दो विरोधी खेमों में बाँट दिया, जिसमें प्रत्येक का नेतृत्व एक महाशक्ति द्वारा किया जा रहा था । इसी अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था को द्वि- ध्रुवीकरण कहा गया।

प्रश्न 30.
“भारत का उज्बेकिस्तान से मजबूत सांस्कृतिक संबंध है इसका उदाहरण यह है कि इस देश में हिन्दुस्तानी फिल्मों की धूम रहती है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
उज्बेकिस्तान तथा भारत में अच्छे तथा मजबूत सांस्कृतिक संबंध है। इसका प्रमाण हमें फिल्मों द्वारा मिलता है। सोवियत संघ को विघटित हुए सात साल बीत गए लेकिन हिन्दी फिल्मों के लिए उज्बेक लोगों में वही ललक मौजूद है। हिन्दुस्तान में कोई नई फिल्म रिलीज होने के चंद हफ्तों के भीतर इसकी पाइरेटेड कॉपियाँ उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में बिकने के लिए उपलब्ध हो जाती है । उज्बेक लोग मध्य एशियाई हैं, वे एशिया के अंग हैं। उनकी एक साझी संस्कृति है। यहाँ अधिकांश लोग – हिन्दी गा लेते हैं। अर्थ चाहे न मालूम हो लेकिन उसका उच्चारण सही होता है और वे संगीत भी पकड़ लेते हैं। भारतीय फिल्मों और उनके ‘हीरो’ के लिए उज्बेकी लोगों की दीवानगी उज्बेकिस्तानवासी अनेक भारतीयों को आश्चर्यजनक जान पड़ती है।

प्रश्न 31.
द्वि- ध्रुवीय विश्व के पतन के कोई चार कारण लिखिए।
उत्तर:
द्विध्रुवीय विश्व के पतन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  1. अमेरिकी गुट में फूट – द्वि- ध्रुवीय विश्व के पतन का एक प्रमुख कारण अमेरिकी गुट में फूट पड़ना था। फ्रांस जैसा देश अमेरिका पर अविश्वास करने लगा था।
  2. सोवियत गुट में फूट – सोवियत गुट से पूर्वी यूरोपीय देशों तथा चीन का अलग होना सोवियत खेमे को कमजोर कर गया।
  3. सोवियत संघ का पतन – द्विध्रुवीय विश्व के पतन का अन्तिम प्रभावी कारण सोवियत संघ का पतन रहा।
  4. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन – गुटनिरपेक्ष आन्दोलन ने अधिकांश विकासशील देशों को दोनों गुटों से अलग रखने में सफलता पायी। इससे द्विध्रुवीय विश्व को झटका लगा।

प्रश्न 32.
सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप की समाजवादी व्यवस्था की दूसरी दुनिया के विघटन के परिणाम विश्व राजनीति के लिहाज से गंभीर रहे – स्पष्ट कीजिये।
अथवा
सोवियत संघ तथा पूर्वी यूरोप की समाजवादी व्यवस्था के विघटन के विश्व राजनीति में क्या परिणाम निकले?
उत्तर:
पूर्वी यूरोप की समाजवादी व्यवस्था तथा सोवियत संघ के विघटन के परिणाम विश्व राजनीति के लिहाज से गंभीर रहे। इसके निम्न परिणाम रहे

  1. दूसरी दुनिया के पतन का एक परिणाम शीत युद्ध के दौर के संघर्ष की समाप्ति में हुआ। शीत युद्ध के समाप्त होने से हथियारों की होड़ भी समाप्त हो गई और एक नई शांति की संभावना का जन्म हुआ।
  2. दूसरी दुनिया के पतन से विश्व राजनीति में शक्ति-संबंध बदल गए और इस कारण विचारों और संस्थाओं के आपेक्षिक प्रभाव में भी बदलाव आया।
  3. सोवियत संघ के पतन के बाद अमरीका अकेली महाशक्ति बन कर उभरा और एक- ध्रुवीय विश्व राजनीति सामने आयी।
  4. सोवियत खेमे के अन्त से अनेक नये देशों का उदय हुआ। इन देशों ने रूस के साथ अपने मजबूत रिश्ते को जारी रखते हुए पश्चिमी देशों के साथ सम्बन्ध बढ़ाये।

प्रश्न 33.
मान लीजिए सोवियत संघ का विघटन नहीं हुआ होता तथा विश्व 1980 के मध्य की तरह द्वि- ध्रुवीय होता, तो यह अन्तिम दो दशकों के विकास को किस प्रकार प्रभावित करता? इस प्रकार के विश्व के तीन क्षेत्रों या प्रभाव तथा विकास का वर्णन करें, जो नहीं हुआ होता?
उत्तर:
1991 में यदि सोवियत संघ का पतन नहीं हुआ होता तो ये अन्तिम दोनों दशक भी शीत युद्ध की राजनीति से प्रभावित रहते और विश्व में निम्नलिखित प्रभाव होते-

  1. एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था की स्थापना नहीं होती – यदि सोवियत संघ का पतन नहीं हुआ होता तो विश्व राजनीति में एक ही महाशक्ति अमरीका का यह वर्चस्व नहीं होता।
  2. अफगानिस्तान तथा इराक देशों की स्थिति में परिवर्तन- यदि सोवियत संघ का पतन न हुआ होता तो अफगानिस्तान और इराक में सोवियत संघ अमेरिका का विरोध करता और युद्ध का विरोध करता।
  3. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थिति में परिवर्तन – यदि सोवियत संघ का पतन नहीं होता तो संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका की मनमानी नहीं चलती और संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रभावशीलता समाप्त नहीं होती।

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प्रश्न 34.
रूस और भारत दोनों का सपना बहुध्रुवीय विश्व का है। संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
रूस और भारत दोनों का सपना बहुध्रुवीय विश्व का है। बहुध्रुवीय विश्व से इन दोनों देशों का आशय यह है कि अन्तर्राष्ट्रीय फलक पर कई शक्तियाँ मौजूद हों, सुरक्षा की सामूहिक जिम्मेदारी हो (यानी किसी भी देश पर हमला हो तो सभी देश उसे अपने लिए खतरा माने और साथ मिलकर कार्रवाई करें ); क्षेत्रीयताओं का ज्यादा जगह मिले; अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों का समाधान बातचीत के द्वारा हो; हर देश की स्वतन्त्रता विदेश नीति हो और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं द्वारा फैसले किए जाएँ तथा इन संस्थाओं को मजबूत, लोकतांत्रिक और शक्तिसंपन्न बनाया जाए।

प्रश्न 35.
शीतयुद्ध के दौरान भारत और सोवियत संघ के राजनीतिक संबंध पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
शीतयुद्ध के दौरान सोवियत संघ ने कश्मीर मामले पर संयुक्त राष्ट्रसंघ में भारत के रूख को समर्थन दिया । सोवियत संघ ने भारत के संघर्ष के गाढ़े दिनों, खासकर सन् 1971 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान मदद की। भारत ने भी सोवियत संघ की विदेश नीति का अप्रत्यक्ष, लेकिन महत्त्वपूर्ण तरीके से समर्थन किया।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सोवियत संघ के विघटन के प्रमुख कारण स्पष्ट कीजिए । सोवियत संघ के विघटन के कारण
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-
1. राजनीतिक:
आर्थिक संस्थाओं की अंदरूनी कमजोरी- सोवियत संघ की राजनीतिक-आर्थिक संस्थाएँ अंदरूनी कमजोरी के कारण लोगों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकीं। कई सालों तक उसकी अर्थव्यवस्था गतिरुद्ध रही इससे उपभोक्ता वस्तुओं की बड़ी कमी हो गई और सोवियत संघ की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपनी राज व्यवस्था को शक की नजर से देखने लगा, उस पर खुले आम सवाल खड़े करने शुरू किये।

2. लोगों को अपने पिछड़ेपन की पहचान होना:
जब पश्चिमी देशों की प्रगति और अपने पिछड़ेपन के बारे में सोवियत संघ के आम नागरिकों की जानकारी बढ़ी तो इससे सोवियत संघ के लोगों को राजनीतिक मनोवैज्ञानिक रूप से धक्का लगा।

3. प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से गतिरुद्धता:
सोवियत संघ की प्रशासनिक गतिरुद्धता, पार्टी का जनता के प्रति जवाबदेह न रह जाना, भारी भ्रष्टाचार, शासन में ज्यादा खुलापन लाने की अनिच्छा तथा सत्ता का केन्द्रीकृत रूप आदि के कारण सरकार का जनाधार खिसकता चला गया।

4. गोर्बाचेव के समर्थन की समाप्ति:
जनता का एक तबका सुधारों की धीमी गति के कारण गोर्बाचेव से नाराज हो गया, तो सुविधाभोगी वर्ग उसके सुधारों की तीव्र गति से नाराज हो गया। इस प्रकार सुधारों के कारण गोर्बाचेव का समर्थन चारों तरफ से समाप्त हो गया।
(5) राष्ट्रवादी भावनाओं और संप्रभुता का ज्वार – बाल्टिक गणराज्य, उक्रेन, जार्जिया जैसे गणराज्यों में राष्ट्रीयता और संप्रभुता के भावों का उभार सोवियत संघ के विघटन का अंतिम और तात्कालिक कारण सिद्ध हुआ।

प्रश्न 2.
सोवियत प्रणाली से आप क्या समझते हैं? विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सोवियत प्रणाली का अर्थ समाजवादी सोवियत गणराज्य 1917 की समाजवादी क्रांति के बाद अस्तित्व में आया। उसने समाजवाद के आदर्शों एवं समतामूलक समाज की जरूरतों को पूरा करने के लिए निजी संपत्ति की संस्था को समाप्त करने और समाज को समानता के सिद्धान्त पर रचने की जो कोशिश की, उसे ही सोवियत प्रणाली कहा गया। इसमें राज्य और पार्टी की संस्था को प्राथमिक महत्त्व दिया गया। इसकी धुरी कम्युनिस्ट पार्टी थी। अर्थव्यवस्था योजनाबद्ध और राज्य के नियंत्रण में थी। विशेषताएँ – सोवियत प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

  1. समाजवादी खेमे की स्थापना: दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ के नेतृत्व में पूर्वी यूरोप के देशों की राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था को सोवियत प्रणाली की तर्ज पर ढाला गया। इस खेमे का नेता समाजवादी सोवियत गणराज्य था।
  2. राज्य का स्वामित्व तथा नियंत्रण:  सोवियत प्रणाली में सम्पत्ति का प्रमुख रूप राज्य का स्वामित्व था तथा भूमि और अन्य उत्पादक संपदाओं पर स्वामित्व होने के अलावा नियंत्रण भी राज्य का ही था।
  3. सत्तावादी प्रणाली: सोवियत प्रणाली पर नौकरशाही का शिकंजा कसता चला गया और यह प्रणाली सत्तावादी हो गयी। लोगों को लोकतंत्र तथा अभिव्यक्ति की आजादी नहीं थी।
  4. कम्युनिस्ट पार्टी का शासन:  सोवियत प्रणाली में एक दल यानी कम्युनिस्ट पार्टी का शासन था और इस दल का सभी संस्थाओं पर गहरा अंकुश था। यह दल जनता के प्रति जवाबदेह नहीं था।
  5. रूसी गणराज्य का प्रभुत्व: हालांकि सोवियत संघ के नक्शे में रूस, संघ के 15 गणराज्यों में से एक था लेकिन वास्तव में रूस का हर मामले में प्रभुत्व था।

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प्रश्न 3.
सोवियत संघ के विघटन के कारणों व परिणामों का वर्णन करें।
अथवा
सोवियत संघ का विघटन क्यों हुआ? इस विघटन के परिणाम बताइए।
अथवा
सोवियत संघ के विघटन ( पतन) के उत्तरदायी कारकों का विवेचन कीजिए । सोवियत संघ के पतन के उत्तरदायी कारक
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन या पतन के प्रमुख उत्तरदायी कारक निम्नलिखित थे-

  1. सोवियत संघ की राजनीतिक-आर्थिक संस्थाएँ अपनी आन्तरिक कमजोरियों के कारण लोगों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकीं।
  2. सोवियत संघ ने अपने संसाधन परमाणु हथियार, सैन्य साजो-सामान तथा पूर्वी यूरोप के अन्य पिछलग्गू देशों के विकास पर भी खर्च किए ताकि वे सोवियत नियन्त्रण में बने रहें इससे सोवियत संघ पर गहरा आर्थिक दबाव बना और सोवियत व्यवस्था इसका सामना नहीं कर सकी।
  3. सोवियत संघ के पिछड़ेपन की पहचान से वहां के लोगों को राजनीतिक – मनोवैज्ञानिक रूप से धक्का लगा।
  4. कम्युनिस्ट पार्टी जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं रह गयी थी।
  5. गोर्बाचेव ने देश में स्वतन्त्रता, समानता और राष्ट्रीयता व भ्रातृत्व व एकता के वातावरण को तैयार किए बिना ही पुनर्गठन (पेरेस्त्रोइका) व खुलापन ( ग्लासनोस्त) जैसी महत्त्वपूर्ण नीतियों को लागू कर दिया था

सोवियत संघ के विघटन के परिणाम – विश्व राजनीति पर सोवियत संघ के विघटन के गम्भीर परिणाम रहे हैं 1

  1. सोवियत संघ के विघटन के परिणामस्वरूप शीत युद्ध समाप्त हो गया तथा हथियारों की दौड़ भी समाप्त हो गई।
  2. अब संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति बन गया तथा विश्व पर उसका वर्चस्व स्थापित हो गया।
  3. अब पूँजीवादी अर्थव्यवस्था अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभुत्वशाली अर्थव्यवस्था बन गई तथा तृतीय विश्व में साम्यवादी विचारधारा का प्रचार- प्रसार रुक गया।
  4. सोवियत संघ के विघटन के परिणामस्वरूप विश्व में 15 स्वतन्त्र और सम्प्रभु राज्यों की संख्या में बढ़ोतरी हुई।
  5. तृतीय विश्व को अब नए उपनिवेशवाद के खतरे का सामना करना पड़ रहा है तथा मध्य-पूर्व के तेल भण्डारों पर अमरीका ने अपना एकछत्र प्रभुत्व स्थापित कर लिया है।

प्रश्न 4.
मिखाइल गोर्बाचेव द्वारा किये गये सुधारों से सोवियत संघ का विघटन किस प्रकार हुआ? समझाइये गोर्बाचेव और सोवियत संघ का विघटन
उत्तर:
मिखाइल गोर्बाचेव 1980 के दशक के मध्य में सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पद पर आसीन हुए। इस समय सोवियत संघ आर्थिक, प्रशासनिक तथा राजनीतिक रूप से गतिरुद्ध हो चुका था। गोर्बाचेव ने अर्थव्यवस्था को सुधारने, पश्चिम की बराबरी पर लाने और प्रशासनिक ढांचे में ढील देने के लिए सुधारों को लागू किया। लेकिन इन सुधारों से सोवियत संघ का विघटन हो गया। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित रहे

  1. लोगों की आकांक्षाओं पर ज्वार उमड़ना: जब गोर्बाचेव ने सुधारों को लागू किया और अर्थव्यवस्था में ढील दी तो लोगों की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं का ऐसा ज्वार उमड़ा कि उस पर काबू पाना असंभव हो गया।
  2. राष्ट्रवादी भावनाओं और संप्रभुता की इच्छा का उभार: सोवियत संघ के विभिन्न गणराज्यों में राष्ट्रवादी भावना और संप्रभुता का उभार उठा। राष्ट्रीयता और संप्रभुता के भावों का उभार सोवियत संघ के विघटन का अंतिम और सर्वाधिक तात्कालिक कारण सिद्ध हुआ।
  3. राष्ट्रवादियों का असंतुष्ट होना- कुछ लोगों का मत है कि गोर्बाचेव के सुधारों ने राष्ट्रवादियों के असंतोष को इस सीमा तक भड़काया कि उस पर शासकों का नियंत्रण नहीं रहा।

प्रश्न 5.
शीत युद्ध के दौरान भारत तथा सोवियत संघ सम्बन्धों का वर्णन कीजिए।
अथवा
शीत युद्ध के दौरान पूर्ववर्ती सोवियत संघ के साथ भारत के सम्बन्धों का परीक्षण कीजिए।
उत्तर:
भारत और सोवियत संघ सम्बन्ध
शीत युद्ध के दौरान भारत और सोवियत संघ के सम्बन्ध बहुआयामी थे। यथा-
1. आर्थिक सम्बन्ध:
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में सोवियत संघ भारत का सबसे बड़ा साझीदार था। इस व्यापार का सालाना कारोबार दो हजार करोड़ रुपये से ऊपर पहुँच गया था। सोवियत संघ ने भारत के सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों की ऐसे वक्त में मदद की जब ऐसी मदद पाना मुश्किल था। भारत में जब विदेशी मुद्रा की कमी थी तब सोवियत संघ ने रुपये को माध्यम बनाकर भारत के साथ व्यापार किया।

2. राजनीतिक सम्बन्ध:
सोवियत संघ ने कश्मीर मामले पर संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के दृष्टिकोण को समर्थन दिया। सोवियत संघ ने भारत को सन् 1971 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान सहायता की। भारत ने भी सोवियत संघ की विदेश नीति का अप्रत्यक्ष, लेकिन महत्त्वपूर्ण तरीके से समर्थन किया।

3. भारत:
सोवियत सैन्य सम्बन्ध – शीत युद्ध काल में सैनिक साजो-सामान के आयात व उत्पादन के मामले में भारत सोवियत संघ पर काफी निर्भर रहा सोवियत संघ ने भारत को सैनिक सामान के सम्बन्ध में पूर्ण मदद की। उसने भारत के साथ ऐसे कई समझौते किये जिससे भारत संयुक्त रूप से सैन्य उपकरण तैयार कर सका।

4. भारत:
सोवियत सांस्कृतिक सम्बन्ध – प्रारम्भ से ही भारत व सोवियत संघ का यह प्रयत्न रहा है कि आर्थिक व सामरिक परिप्रेक्ष्य में सम्बन्धों को सांस्कृतिक आदान-प्रदान का जामा पहनाया जाए। यही कारण है कि हिन्दी फिल्म तथा भारतीय संस्कृति सोवियत संघ में काफी लोकप्रिय रहीं।

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प्रश्न 6.
शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद भारत-रूस तथा पूर्व साम्यवादी गणराज्य के सम्बन्धों का विवरण दीजिये।
उत्तर:
भारत और रूस सम्बन्ध शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भारत-रूस सम्बन्धों को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है।

  • दोनों देशों की जनता की अपेक्षाओं में समानता: भारत-रूस के आपसी सम्बन्ध इन देशों की जनता की अपेक्षाओं से मेल खाते हैं। हम वहाँ हिन्दी फिल्मों के गीत बजते सुन सकते हैं। भारत यहाँ के जनमानस का एक अंग है।
  • बहुध्रुवीय विश्व पर दोनों देशों का समान दृष्टिकोण: रूस और भारत दोनों का सपना बहुध्रुवीय विश्व का है। बहुध्रुवीय विश्व से इन दोनों का आशय यह है कि अन्तर्राष्ट्रीय फलक पर कई शक्तियाँ विद्यमान हों; सुरक्षा की सामूहिक जिम्मेदारी की व्यवस्था हो; क्षेत्रीयताओं को ज्यादा जगह मिले; अन्तर्राष्ट्रीय संघर्षों का समाधान बातचीत के द्वारा हो, हर देश की स्वतंत्र विदेश नीति हो और संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं द्वारा फैसले किये जाएं तथा इन संस्थओं को मजबूत, लोकतांत्रिक और शक्ति – सम्पन्न बनाया जाये।
  • विभिन्न मुद्दों व विषयों में परस्पर सहयोग:
    1. कश्मीर समस्या, ऊर्जा – आपूर्ति तथा अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के दृष्टिकोणों में समानता रही है।
    2. भारतीय सेनाओं को अधिकांश सैनिक साजो-सामान रूस से प्राप्त होते हैं तथा भारत रूस के लिए हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा खरीददार है।
    3. रूस ने तेल के संकट के समय हमेशा भारत की मदद की है तथा रूस के लिए भारत तेल के आयातक देशों में एक प्रमुख देश है।

भारत और पूर्व – साम्यवादी गणराज्यों के साथ सम्बन्ध: भारत कजाकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान गणराज्यों के साथ पारस्परिक सहयोग की परम्परागत नीति का पालन कर रहा है। इन गणराज्यों के साथ सहयोग के अन्तर्गत तेल वाले इलाकों में साझेदारी और निवेश करना भी शामिल है।

प्रश्न 7.
सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस की विश्व परिदृश्य पर भूमिका का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस की विश्व राजनीति में भूमिका सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस की विश्व परिदृश्य में भूमिका का विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है।

  • रूस तथा राष्ट्रकुल: सोवियत संघ के सभी गणराज्यों ने संयुक्त राष्ट्र संघ में सोवियत संघ का स्थान रूसी गणराज्य को दिये जाने की सिफारिश की।
  • रूस तथा विश्व के अन्य राष्ट्रों से सम्बन्ध:  सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस के अमरीका व विश्व के अन्य प्रमुख राष्ट्रों के बीच सम्बन्धों को निम्न प्रकार रेखांकित किया जा सकता है।
    1. रूस संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है।
    2. रूस ने अब अमरीका व यूरोपीय देशों के साथ घनिष्ठ आर्थिक सम्बन्ध स्थापित किये हैं।
    3. परस्पर एक-दूसरे के देशों की यात्राओं व समझौतों के द्वारा रूस चीन की निकटता बढ़ी है।
    4. रूस और जापान के सम्बन्धों में भी निकटता आयी है।

इस प्रकार विभिन्न प्रमुख देशों से संबंध सुधार कर रूस पुनः विश्व राजनीति में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

3. विश्व राजनीति में गौण भूमिका:
रूस (सोवियत संघ के विघटन के बाद) वर्तमान में एक महाशक्ति नहीं रहा है, यद्यपि उसके पास अणु-परमाणु अस्त्रों-प्रक्षेपास्त्रों का भण्डार है लेकिन आर्थिक दृष्टि से उसकी अर्थव्यवस्था जर्जर है। वर्तमान में दूसरे देशों की भूमि पर उनकी उपस्थिति घट गई है। अब वह घटनाओं को अपनी इच्छानुसार मोड़ नहीं दे सकता। इसी तरह अब वह अपने पुराने मित्रों की सहायता करने में सक्षम नहीं रहा है। सुरक्षा परिषद् में अब वह अमेरिका का विरोध कर सकने की स्थिति में नहीं रह गया है।

प्रश्न 8.
सोवियत खेमे के विघटन के घटना चक्र पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
सोवियत खेमे के विघटन का घटना चक्र सोवियत संघ नीति साम्यवादी गुट के विघटन की प्रक्रिया को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है।

  1. मार्च, 1985 में गोर्बाचेव सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव चुने गए। बोरिस येल्तसिन को रूस की कम्युनिस्ट पार्टी का प्रमुख बनाया। उन्होंने सोवियत संघ में सुधारों की श्रृंखला प्रारम्भ कर दी।
  2. 1988 में लिथुआनिया में आजादी के लिए आन्दोलन शुरू हुए। यह आंदोलन एस्टोनिया और लताविया में भी फैला।
  3. अक्टूबर, 1989 में सोवियत संघ ने घोषणा कर दिया कि ‘वारसा समझौते’ के सदस्य अपना भविष्य तय करने के लिए स्वतंत्र है। नवंबर में बर्लिन की दीवार गिरी।
  4. फरवरी, 1990 में गोर्बाचेव ने सोवियत संसद ड्यूमा के चुनाव के लिए बहुदलीय राजनीति की शुरुआत की। सोवियत सत्ता पर कम्युनिस्ट पार्टी का 72 वर्ष पुराना एकाधिकार समाप्त।
  5. जून, 1990 में रूसी संसद ने सोवियत संघ से अपनी स्वतंत्रता घोषित की।
  6. मार्च, 1990 में लिथुआनिया स्वतंत्रता की घेषणा करने वाला पहला सोवियत गणराज्य बना।
  7. जून, 1991 में येल्तसिन का कम्युनिस्ट पार्टी से इस्तीफा दे दिया और रूस के राष्ट्रपति बने।
  8. अगस्त, 1991 में कम्युनिस्ट पार्टी के गरमपंथियों ने गोर्बाचेव के खिलाफ एक असफल तख्तापलट किया।
  9. एस्टोनिया, लताविया और लिथुआनिया तीनों बाल्टिक गणराज्य सितंबर, 1991 में संयुक्त राष्ट्रसंघ के सदस्य बने।
  10. दिसंबर, 1991 में रूस, बेलारूस और उक्रेन ने 1922 की सोवियत संघ के निर्माण से संबद्ध संधि को समाप्त करने का फैसला किया और स्वतंत्र राष्ट्रों का राष्ट्रकुल बनाया। आर्मेनिया, अजरबैजान, माल्दोवा, कजाकिस्तान, किरगिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान ओर उज्बेकिस्तान भी राष्ट्रकुल में शामिल हुए। जार्जिया 1993 में राष्ट्रकुल का सदस्य बना। संयुक्त राष्ट्रसंघ में सोवियत संघ की सीट रूस को मिली।
  11. 25 दिसंबर, 1991 में गोर्बाचेव ने सोवियत संघ के राष्ट्रपति के पद से इस्तीफा दिया। इस प्रकार सोवियत संघ का अंत हो गया।

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प्रश्न 9.
शॉक थेरेपी का अर्थ बताते हुए इसके परिणाम बताइये।
अथवा
शॉक थेरेपी क्या है? शॉक थेरेपी के परिणाम बताइये।
अथवा
शॉक थेरेपी से क्या अभिप्राय है? उत्तर साम्यवादी सत्ताओं पर इसके परिणामों का आकलन कीजिए।
उत्तर:
शॉक थेरेपी से आशय शॉक थेरेपी का आशय है कि धीरे-धीरे परिवर्तन न करके एकदम आमूल-चूल परिवर्तन के प्रयत्नों को लादना । रूसी गणराज्य में इसके तहत तुरत-फुरत निजी स्वामित्व, मुक्त व्यापार, वित्तीय खुलापन · तथा मुद्रा परिवर्तनीयता पर बल दिया गया। ‘शॉक थेरेपी’ के परिणाम 1990 में अपनायी गयी ‘शॉक थेरेपी’ के निम्नलिखित प्रमुख परिणाम निकले

  1. अर्थव्यवस्था का तहस-नहस होना: शॉक थेरेपी से सोवियत संघ के पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गई। लगभग 90 प्रतिशत उद्योगों को निजी हाथों या कम्पनियों को बेचा गया। यह कदम सभी उद्योगों को मटियामेट करने वाला साबित हुआ।
  2. रूसी मुद्रा ( रूबल ) में गिरावट: शॉक थेरेपी के कारण ‘रूबल’ को भारी गिरावट का सामना करना पड़ा। इस गिरावट के कारण मुद्रास्फीति इतनी ज्यादा बढ़ गई कि लोगों ने जो पूँजी जमा कर रखी थी, वह धीरे-धीरे समाप्त हो गई और लोग कंगाल हो गये।
  3. खाद्यान्न सुरक्षा की समाप्ति: ‘शॉक थेरेपी’ के परिणामस्वरूप सामूहिक खेती प्रणाली समाप्त हो चुकी थी। अब लोगों की खाद्यान्न सुरक्षा व्यवस्था भी समाप्त हो गयी।
  4. समाज कल्याण की समाजवादी व्यवस्था का खात्मा: शॉक थेरेपी के परिणामस्वरूप रूस तथा अन्य राज्यों में गरीबी का दौर बढ़ता ही चला गया तथा वहाँ अमीरी और गरीबी के बीच विभाजन रेखा बढ़ती चली गई।
  5. लोकतान्त्रिक संस्थाओं के निर्माण को प्राथमिकता नहीं-‘शॉक थेरेपी’ के अन्तर्गत लोकतान्त्रिक संस्थाओं का निर्माण हड़बड़ी में किया गया। फलस्वरूप संसद अपेक्षाकृत कमजोर संस्था रह गयी।

प्रश्न 10.
सोवियत संघ से स्वतन्त्र हुए गणराज्यों में हुए आन्तरिक संघर्ष और तनाव पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन से 15 प्रभुतासम्पन्न राज्यों का जन्म हुआ सोवियत संघ का मुख्य उत्तरदायित्व रूस गणराज्य ने संभाला, क्योंकि सोवियत संघ के अधिकांश गणराज्यों में संघर्ष और तनाव की स्थिति थी। यथा
1. आंदोलन, तनाव तथा संघर्ष की स्थितियाँ: केन्द्रीय एशिया के अधिकांश राज्य सोवियत संघ से विघटन के पश्चात् अनेक समस्याओं का सामना कर रहे हैं। चेचन्या, दागिस्तान, ताजिकिस्तान तथा अजरबैजान आदि देशों में हिंसा की वारदातों के कारण गृह-युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। ये देश जातीय और धार्मिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। ताजिकिस्तान, उक्रेन, किरगिझस्तान तथा जार्जिया में शासन से जनता नाराज है और उसको उखाड़ फेंकने के लिए अनेक आन्दोलन चल रहे हैं।

2. नदी जल के सवाल पर संघर्ष – कई देश और प्रान्त नदी जल के सवाल पर परस्पर भिड़े हुए हैं।

3. विदेशी शक्तियों की इस क्षेत्र में रुचि बढ़ना – मध्य एशियाई गणराज्यों में पैट्रोलियम संसाधनों का विशाल भण्डार होने से यह क्षेत्र बाहरी ताकतों और तेल कम्पनियों की आपसी प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा भी बन चला है। फलतः अमेरिका इस क्षेत्र में सैनिक ठिकाना बनाना चाहता है। रूस इन राज्यों को अपना निकटवर्ती ‘विदेश’ मानता है और उसका मानना है कि इन राज्यों को रूस के प्रभाव में रहना चाहिए। चीन के हित भी इस क्षेत्र से जुड़े हैं और चीनियों ने सीमावर्ती क्षेत्रों में आकर व्यापार करना शुरू कर दिया है।

प्रश्न 11.
यदि सोवियत संघ का विघटन नहीं हुआ होता तो एक ध्रुवीय विश्व में हुए कौन-कौन से आर्थिक विकास नहीं होते?
उत्तर:
यदि सोवियत संघ का विघटन नहीं होता तो अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में पिछले दो दशकों में हुए निम्नलिखित आर्थिक परिवर्तन या विकास नहीं होते-
1. अर्थव्यवस्था का वैश्वीकरण शुरू नहीं होता:
द्विध्रुवीय विश्व की स्थिति में संयुक्त राष्ट्र संघ में अमरीकी वर्चस्व स्थापित नहीं होता और व्यापार संगठन पर भी उसका वर्चस्व स्थापित नहीं हो पाता ऐसी स्थिति में अमेरिका विकासशील देशों को उदारीकरण की नीति अपनाने के लिए मजबूर नहीं कर पाता तथा इन देशों में व्यापार नियंत्रण, कोटा प्रणाली और लाइसेंस नीति चलती रहती तो मुक्त व्यापार जैसी स्थितियाँ नहीं आतीं।

2. वैश्विक स्तर पर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का वर्चस्व नहीं होता:
यदि सोवियत संघ का विघटन नहीं हुआ होता तो पूँजीवादी अर्थव्यवस्था सीमा का अतिक्रमण करने वाली छलांग नहीं लगा पाती क्योंकि साम्यवादी अर्थव्यवस्था उसके मार्ग को अवरुद्ध कर देती और न ही संयुक्त राष्ट्र संघ के विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संगठन अनेक देशों से शक्तिपूर्वक अपनी बात मनवा पाते। अमेरिका ने इन अन्तर्राष्ट्रीय अभिकरणों के द्वारा ही अपने. वर्चस्व का विस्तार किया है।

3. पूर्वी यूरोप के साम्यवादी देश शॉक थेरेपी के दौर से नहीं गुजरते:
सोवियत संघ के विघटन के बाद सोवियत संघ के सभी स्वतंत्र गणराज्यों तथा पूर्वी यूरोप के देशों को शॉक थेरेपी के दौर से गुजरना पड़ा तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग निजी क्षेत्र की कम्पनियों को औने-पौने कीमत पर बेच दिये गये। यदि सोवियत संघ का विघटन नहीं हुआ होता तो ये देश शॉक थेरेपी के दौर से नहीं गुजरते।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

Jharkhand Board JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

बहुचयनात्मक प्रश्न 

1. द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत दो महाशक्तियाँ उभर कर सामने आयी थीं-
(अ) संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत
(स) संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ
(ब) सोवियत संघ और ब्रिटेन
(द) सोवियत संघ और चीन
उत्तर:
(स) संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ

2. क्यूबा प्रक्षेपास्त्र संकट किस वर्ष उत्पन्न हुआ था ?
(अ) 1967
(ब) 1971
(स)1975
(द) 1962
उत्तर:
(द) 1962

3. बर्लिन दीवार कब खड़ी की गई थी?
(अ) 1961
(बं) 1962
(स) 1960
(द) 1971
उत्तर:
(अ) 1961

4. उत्तर एटलांटिक संधि-संगठन की स्थापना की गई थी-
(अ) 1962 में
(ब) 1967 में
(स) 1949 में
(द) 1953 में
उत्तर:
(स) 1949 में

5. वारसा संधि कब हुई ?
(अ) 1965 में
(ब) 1955 में
(स) 1957 में
(द) 1954 में
उत्तर:
(ब) 1955 में

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6. तीसरी दुनिया से अभिप्राय है-
(अ) अज्ञात और शोषित देशों का समूह
(ब) विकासशील या अल्पविकसित देशों का समूह
(स) सोवियत गुट के देशों का समूह
(द) अमेरिकी गुट के देशों का समूह
उत्तर:
(ब) विकासशील या अल्पविकसित देशों का समूह

7. द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की प्रमुख
(अ) एकध्रुवीय विश्व राजनीति
(ब) द्वि-ध्रुवीय राजनीति
(स) बहुध्रुवीय राजनीति
(द) अमेरिकी गुट विशेषता है
उत्तर:
(ब) द्वि-ध्रुवीय राजनीति

8. गुटनिरपेक्ष देशों का प्रथम शिखर सम्मेलन हुआ था।
(अ) नई दिल्ली में
(ब) द्वि- ध्रुवीय राजनीति
(स) अफ्रीका में
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं

9. वर्तमान में गुटनिरपेक्ष आंदोलन में कितने सदस्य हैं। के देशों का समूह
(अ) 115
(ब) 116
(स) 117
(द) 120
उत्तर:
(द) 120

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. प्रथम विश्व युद्ध ………………….. से………………….. के बीच हुआ था।
उत्तर:
1914, 1918

2. शीतयुद्ध ……………….. और ……………….. तथा इनके साथी देशों के बीच प्रतिद्वंद्विता, तनाव और संघर्ष की श्रृंखला
उत्तर:
अमरिका, सोवियत संघ

3. धुरी – राष्ट्रों की अगुआई जर्मनी, ………………….. और जापान के हाथ में थी।
उत्तर:
इटली

4. …………………. विश्व युद्ध की समाप्ति से ही शीतयुद्ध की शुरुआत हुई।
उत्तर:
द्वितीय

5. जापान के हिरोशिमा तथा नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम का गुप्तनाम …………………. तथा ……………………. थी।
उत्तर:
लिटिल ब्वॉय, फैटमैन

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
नाटो का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर:
नाटो का पूरा नाम है। उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन)।

प्रश्न 2.
‘वारसा संधि’ की स्थापना का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर:
‘वारसा संधि’ की स्थापना का मुख्य कारण नाटो के देशों का मुकाबला करना था।

प्रश्न 3.
भारत के पहले प्रधानमंत्री कौन थे?
उत्तर:
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे।

प्रश्न 4.
यूगोस्लाविया में एकता कायम करने वाले नेता कौन थे?
उत्तर:
जोसेफ ब्रॉज टीटो।

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प्रश्न 5.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक कौन थे?
उत्तर:
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक वामे एनक्रूमा थे।

प्रश्न 6.
शीतयुद्ध का चरम बिन्दु क्या था?
उत्तर:
क्यूबा मिसाइल संकट।

प्रश्न 7.
क्यूबा में सोवियत संघ द्वारा परमाणु हथियार तैनात करने की जानकारी संयुक्त राज्य अमेरिका को कितने समय बाद लगी?
उत्तर:
तीन सप्ताह बाद।

प्रश्न 8.
शीतयुद्ध के काल के तीन पश्चिमी या अमेरिकी गठबंधनों के नाम लिखिये।
उत्तर:

  1. उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो )।
  2. दक्षिण-पूर्व एशियाई संगठन ( सेन्टो)।
  3. केन्द्रीय संधि संगठन (सीटो )।

प्रश्न 9.
मार्शल योजना क्या थी?
उत्तर:
शीतयुद्ध काल में अमेरिका ने पश्चिमी यूरोप की अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन हेतु जो आर्थिक सहायता की, वह मार्शल योजना के नाम से जानी जाती है।

प्रश्न 10.
परमाणु अप्रसार संधि कब हुई?
उत्तर;
परमाणु अप्रसार संधि 1 जुलाई, 1968 को हुई।

प्रश्न 11.
शीतयुद्ध का सम्बन्ध किन दो गुटों से था?
उत्तर:
शीत युद्ध का सम्बन्ध जिन दो गुटों से था, वे थे

  1. अमेरिका के नेतृत्व में पूँजीवादी गुट और
  2.  सोवियत संघ के नेतृत्व में साम्यवादी गुट।

प्रश्न 12.
शीतयुद्ध के दौरान महाशक्तियों के बीच
1. 1950-53
2. 1962 में हुई किन्हीं दो मुठभेड़ों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. 1950-53 कोरिया संकट
  2. 1962 में बर्लिन और कांगो मुठभेड़।

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प्रश्न 13.
नाटो में शामिल किन्हीं चार देशों के नाम लिखिय।
उत्तर:

  1. अमेरिका
  2.  ब्रिटेन
  3. फ्रांस
  4. इटली।

प्रश्न 14.
शीत युद्ध के युग में एक पूर्वी गठबंधन और तीन पश्चिमी गठबंधनों के नाम लिखिये।
उत्तर:
पूर्वी गठबंधन – वारसा पैक्ट, पश्चिमी गठबंधन

  1. नाटो,
  2. सीएटो और
  3. सैण्टो।

प्रश्न 15.
वारसा पैक्ट में शामिल किन्हीं चार देशों के नाम लिखिये।
उत्तर:

  1. सोवियत संघ
  2. पोलैण्ड
  3. पूर्वी जर्मनी
  4. हंगरी।

प्रश्न 16.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के किन्हीं चार अग्रणी देशों के नाम लिखिये।
उत्तर:

  1. भारत
  2. इण्डोनेशिया
  3. मिस्र
  4. यूगोस्लाविया।

प्रश्न 17.
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर शीत युद्ध के कोई दो नकारात्मक प्रभाव लिखिये।
उत्तर:

  1. दो विरोधी गुटों का निर्माण।
  2. शस्त्रीकरण की प्रतिस्पर्धा का जारी रहना।

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प्रश्न 18.
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर शीत युद्ध के कोई दो सकारात्मक प्रभाव लिखिये।
उत्तर:

  1. गुटनिरपेक्ष आंदोलन का जन्म
  2. शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को प्रोत्साहन।

प्रश्न 19.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रणेता कौन थे?
उत्तर:
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रणेता थे

  1. जवाहरलाल नेहरू
  2. मार्शल टीटो
  3. कर्नल नासिर और
  4. डॉ. सुकर्णो।

प्रश्न 20.
द्वितीय विश्व युद्ध में जापान को कब घुटने टेकने पड़े?
उत्तर:
सन् 1945 में अमेरिका ने जब जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराये तो जापान को घुटने टेकने पड़े।

प्रश्न 21.
शीत युद्ध में पश्चिमी गठबंधन की विचारधारा क्या थी?
उत्तर:
शीत युद्ध काल में पश्चिमी गठबंधन उदारवादी लोकतंत्र तथा पूँजीवाद का समर्थक था।

प्रश्न 22.
सोवियत गठबंधन की विचारधारा क्या थी?
उत्तर:
सोवियत संघ गुट की वैचारिक प्रतिबद्धता समाजवाद और साम्यवाद के लिए थी।

प्रश्न 23.
पारमाणविक हथियारों को सीमित या समाप्त करने के लिए दोनों पक्षों द्वारा किये गये किन्हीं दो समझौतों के नाम लिखिये।
उत्तर:

  1. परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि
  2. परमाणु अप्रसार संधि।

प्रश्न 24.
1960 में दो महाशक्तियों द्वारा किये गए किन्हीं दो समझौतों का उल्लेख करें।
उत्तर:

  1. परमाणु प्रक्षेपास्त्र परिसीमन संधि
  2. परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि।

प्रश्न 25.
पृथकतावाद से क्या आशय है?
उत्तर:
पृथकतावाद का अर्थ होता है। अपने को अन्तर्राष्ट्रीय मामलों से काटकर रखना।

प्रश्न 26.
गुटनिरपेक्षता पृथकतावाद से कैसे अलग है?
उत्तर:
पृथकतावाद अपने को अन्तर्राष्ट्रीय मामलों से काटकर रखने से है जबकि गुट निरपेक्षता में शांति और स्थिरता के लिए मध्यस्थता की सक्रिय भूमिका निभाना है।

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प्रश्न 27.
अल्प विकसित देश किन्हें कहा गया था?
उत्तर:
गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल अधिकांश देशों को अल्प विकसित देश कहा गया था।

प्रश्न 28.
अल्प विकसित देशों के सामने मुख्य चुनौती क्या थी?
उत्तर:
अल्पं विकसित देशों के सामने मुख्य चुनौती आर्थिक रूप से और ज्यादा विकास करने तथा अपनी जनता को गरीबी से उबारने की थी।

प्रश्न 29.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता के रूप में शीत युद्ध के दौर में भारत ने क्या भूमिका निभाई?
उत्तर:
भारत ने एक तरफ तो अपने को महाशक्तियों की खेमेबन्दी से अलग रखा तो दूसरी तरफ अन्य नव स्वतंत्र देशों को महाशक्तियों के खेमों में जाने से रोका।

प्रश्न 30.
भारत ‘नाटो’ अथवा ‘सीटो’ का सदस्य क्यों नहीं बना?
उत्तर:
भारत ‘नाटो’ अथवा ‘सीटो’ का सदस्य इसलिए नहीं बना क्योंकि भारत गुटनिरपेक्षता की नीति में विश्वास रखता है।

प्रश्न 31.
शीत युद्ध किनके बीच और किस रूप में जारी रहा?
उत्तर:
शीत युद्ध सोवियत संघ और अमेरिका तथा इनके साथी देशों के बीच प्रतिद्वन्द्विता, तनाव और संघर्ष की एक श्रृंखला के रूप में जारी रहा।

प्रश्न 32.
द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों की अगुवाई कौन-से देश कर रहे थे?
उत्तर:
अमरीका, सोवियत संघ, ब्रिटेन और फ्रांस।

प्रश्न 33.
शीतयुद्ध के काल में पूर्वी गठबंधन का अगुआ कौन था तथा इस गुट की प्रतिबद्धता किसके लिए थी?
उत्तर:
शीतयुद्ध के काल में पूर्वी गठबंधन का अगुआ सोवियत संघ था तथा इस गुट की प्रतिबद्धता समाजवाद तथा साम्यवाद के लिए थी।

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प्रश्न 34.
अमरीका ने जापान के किन दो शहरों पर परमाणु बम गिराया?
उत्तर:
हिरोशिमा तथा नागासाकी।

प्रश्न 35.
द्वितीय विश्व युद्ध कब से कब तक हुआ था?
उत्तर:
1939 से 1945।

प्रश्न 36.
वारसा संधि से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
सोवियत संघ की अगुआई वाले पूर्वी गठबंधन को वारसा संधि के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 37.
उत्तर अटलांटिक संधि संगठन को पश्चिमी गठबंधन भी कहा जाता है, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि पश्चिमी यूरोप के अधिकतर देश अमरीका में शामिल हुए।

प्रश्न 38.
भारत ने सोवियत संध के साथ आपसी मित्रता की संधि पर कब हस्ताक्षर किय ?
उत्तर:
1971 में।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
शीतयुद्ध का क्या अर्थ है?
शीतयुद्ध से आप क्या समझते हैं?
अथवा
उत्तर:
शीत युद्ध वह अवस्था है जब दो या दो से अधिक देशों के मध्य तनावपूर्ण वातावरण हो, लेकिन वास्तव में कोई युद्ध न हो। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच वाद-विवाद, रेडियो प्रसारणों तथा सैनिक शक्ति के प्रसार द्वारा लड़े गये स्नायु युद्ध को शीत युद्ध कहा जाता है।

प्रश्न 2.
अपरोध का तर्क किसे कहा गया?
उत्तर:
अगर कोई शत्रु पर आक्रमण करके उसके परमाणु हथियारों को नाकाम करने की कोशिश करता है तब भी दूसरे के पास उसे बर्बाद करने लायक हथियार बच जायेंगे। इसी को अपरोध का तर्क कहा गया।

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प्रश्न 3.
सीमित परमाणु परीक्षण संधि के बारे में आप क्या जानते हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सीमित परमाणु परीक्षण संधि – वायुमण्डल, बाहरी अंतरिक्ष तथा पानी के अन्दर परमाणु हथियारों पर प्रतिबंध लगाने के लिए अमरीका, ब्रिटेन तथा सोवियत संघ ने मास्को में 5 अगस्त, 1963 को इस संधि पर हस्ताक्षर किये। यह संधि 10 अक्टूबर, 1963 से प्रभावी हो गई।

प्रश्न 4.
शीत युद्ध के दायरे से क्या आशय है?
उत्तर:
शीत युद्ध के दायरे से यह आशय है कि ऐसे क्षेत्र जहाँ विरोधी खेमों में बँटे देशों के बीच संकट के अवसर आए, युद्ध हुए या इनके होने की संभावना बनी, लेकिन बातें एक हद से ज्यादा नहीं बढ़ीं।

प्रश्न 5.
तटस्थता से क्या आशय है?
उत्तर:
तटस्थता का अर्थ है – मुख्य रूप से युद्ध में शामिल न होने की नीति का पालन करना ऐसे देश युद्ध में न तो शामिल होते हैं और न ही युद्ध के सही-गलत होने के बारे में अपनी कोई राय देते हैं।

प्रश्न 6.
शीत युद्ध की कोई दो सैनिक विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:
शीत युद्ध की दो सैनिक विशेषताएँ ये थीं:

  1. सैन्य गठबंधनों का निर्माण करना तथा इनमें अधिक से अधिक देशों को शामिल करना।
  2. शस्त्रीकरण करना तथा परमाणु मिसाइलों को बनाना तथा उन्हें युद्ध के महत्त्व के ठिकानों पर स्थापित करना।

प्रश्न 7.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की आलोचना के दो आधारों को स्पष्ट कीजिये किन्हीं दो को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की आलोचना के दो आधार निम्नलिखित हैं-

  1. सिद्धान्तहीनता: गुटनिरपेक्ष आंदोलन की गुटनिरपेक्षता की नीति सिद्धान्तहीन रही है।
  2. अस्थिरता की नीति: भारत की गुटनिरपक्षता की नीति में अस्थिरता रही है।

प्रश्न 8.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने दो-ध्रुवीयता को कैसे चुनौती दी थी?
उत्तर:
गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने

  1. एशिया, अफ्रीका व लातिनी अमरीका के नव स्वतंत्र देशों को गुटों से अलग रखने का तीसरा विकल्प देकर तथा
  2. शांति व स्थिरता के लिए दोनों गुटों में मध्यस्थता द्वारा दो – ध्रुवीयता को चुनौती दी थी।

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प्रश्न 9.
शीत युद्ध में विचारधारा के स्तर पर क्या लड़ाई थी?
उत्तर:
शीत युद्ध में विचारधारा की लड़ाई इस बात को लेकर थी कि पूरे विश्व में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन को सूत्रबद्ध करने का सबसे बेहतर सिद्धान्त कौनसा है? अमरीकी गुट जहाँ उदारवादी लोकतंत्र तथा पूँजीवाद का हामी था, वहाँ सोवियत संघ गुट की प्रतिबद्धता समाजवाद और साम्यवाद के लिए थी।

प्रश्न 10.
किस घटना के बाद द्वितीय विश्वयुद्ध का अंत हुआ?
उत्तर:
अगस्त, 1945 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने जापान के दो शहर हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराये और जापान को घुटने टेकने पड़े। इन बमों के गिराने के बाद ही दूसरे विश्व युद्ध का अन्त हुआ।

प्रश्न 11.
मार्शल योजना के तहत पश्चिमी यूरोप के देशों को क्या लाभ हुआ?
उत्तर:
1947 से 1952 तक जारी की गई अमरीकी मार्शल योजना के तहत पश्चिमी यूरोप के देशों को अपने पुनर्निर्माण हेतु अमरीका की आर्थिक सहायता प्राप्त हुई।

प्रश्न 12.
शीत युद्ध के दौरान महाशक्तियों के बीच हुई किन्हीं चार मुठभेड़ों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
शीत युद्ध के दौरान दोनों महाशक्तियों के बीच निम्न मुठभेड़ें हुईं-

  1. 1950-53 का कोरिया युद्ध तथा कोरिया का दो भागों में विभक्त होना।
  2. 1954 का फ्रांस एवं वियतनाम का युद्ध जिसमें फ्रांसीसी सेना की हार हुई।
  3. बर्लिन की दीवार का निर्माण।
  4.  क्यूबा मिसाइल संकट (1962 )

प्रश्न 13.
निम्नलिखित को सुमेलित कीजिए:
(i) जवाहरलाल नेहरू मिस्र
(ii) जोसेफ ब्रॉज टीटो
(iii) गमाल अब्दुल नासिर
(iv) सुकर्णो
उत्तर:
(i) जवाहरलाल नेहरू – मिस्र
(ii) जोसेफ ब्राज टीटो – इण्डोनेशिया
(iii) गमाल अब्दुल नासिर – भारत
(iv) सुकर्णो – यूगोस्लाविया

प्रश्न 14.
महाशक्तियों के बीच गहन प्रतिद्वन्द्विता होने के बावजूद शीत युद्ध रक्तरंजित युद्ध का रूप क्यों नहीं ले सका?
उत्तर:
शीत युद्ध शुरू होने के पीछे यह समझ भी कार्य कर रही थी कि परमाणु युद्ध की सूरत में दोनों पक्षों को इतना नुकसान उठाना पड़ेगा कि उनमें विजेता कौन है यह तय करना भी असंभव होगा इसलिए कोई भी पक्ष युद्ध का खतरा नहीं उठाना चाहता था।

प्रश्न 15.
“शीत युद्ध में परस्पर प्रतिद्वन्द्वी गुटों में शामिल देशों से अपेक्षा थी कि वे तर्कसंगत और जिम्मेदारीपूर्ण व्यवहार करेंगे।” यहाँ तर्कसंगत और जिम्मेदारी भरे व्यवहार से क्या आशय है?
उत्तर:
यहाँ तर्कसंगत भरे व्यवहार से आशय है कि आपसी युद्ध में जोखिम है। पारस्परिक अपरोध की स्थिति में युद्ध लड़ना दोनों के लिए विध्वंसक साबित होगा। इस संदर्भ में जिम्मेदारी का अर्थ है- संयम से काम लेना और तीसरे विश्व युद्ध के जोखिम से बचना। बताइये।

प्रश्न 16.
शीत युद्ध के दौरान दोनों महाशक्तियों को छोटे देशों ने क्यों आकर्षित किया? कोई दो कारण
उत्तर:
शीत युद्ध के दौरान दोनों महाशक्तियों को छोटे देशों ने निम्न कारणों से आकर्षित किया

  1. महाशक्तियाँ इन देशों में अपने सैनिक अड्डे बनाकर दुश्मन के देशों की जासूसी कर सकती थीं।
  2. छोटे देश सैन्य गठबन्धन के अन्तर्गत आने वाले सैनिकों को अपने खर्चे पर अपने देश में रखते थे। इससे महाशक्तियों पर आर्थिक दबाव कम पड़ता था।

प्रश्न 17.
शीत युद्ध के दौरान अन्तर्राष्ट्रीय गठबंधनों का निर्धारण कैसे होता था?
उत्तर:
शीत युद्ध के दौरान अन्तर्राष्ट्रीय गठबंधनों का निर्धारण महाशक्तियों की जरूरतों और छोटे देशों के लाभ- हानि के गणित से होता था।

  1. दोनों महाशक्तियाँ विश्व के विभिन्न हिस्सों में अपने प्रभाव का दायरा बढ़ाने के लिए तुली हुई थीं।
  2. छोटे देशों ने सुरक्षा, हथियार और आर्थिक मदद की दृष्टि से गठबंधन किया।

प्रश्न 18.
उत्तर – एटलांटिक संधि संगठन (नाटो) कब बना तथा इसमें कितने देश शामिल थे?
उत्तर:
नाटो (NATO) : अप्रैल, 1949 में अमेरिका के नेतृत्व में उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की स्थापना हुई जिसमें 12 देश शामिल थे। ये देश थे: संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, स्पेन, पुर्तगाल, इटली, बेल्जियम, नीदरलैंड, डेनमार्क, नार्वे , फिनलैंड,

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प्रश्न 19.
वारसा संधि से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
नाटो के जवाब में सोवियत संघ के नेतृत्व में पूर्वी यूरोप के देशों के गठबंधन ने सन् 1955 में ‘वारसा संधि’ की। इसमें ये देश सम्मिलित हुए – सोवियत संघ, पोलैंड, पूर्वी जर्मनी, चैकोस्लोवाकिया, हंगरी, रोमानिया और बुल्गारिया इसका मुख्य काम था – ‘नाटो’ में शामिल देशों का यूरोप में मुकाबला करना।

प्रश्न 20.
शीतयुद्ध के कारण बताएँ।
उत्तर:
शीत युद्ध के कारण – शीत युद्ध के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  1. अमेरिका और सोवियत संघ के महाशक्ति बनने की होड़ में एक-दूसरे के मुकाबले में खड़े होना शीत युद्ध का कारण बना।
  2. विचारधाराओं के विरोध ने भी शीत युद्ध को बढ़ावा दिया।
  3. अपरोध के तर्क ने प्रत्यक्ष तीसरे युद्ध को रोक दिया। फलतः शीतयुद्ध का विकास हुआ।

प्रश्न 21.
शीतयुद्ध के अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन करें। उत्तर – शीतयुद्ध के अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ने वाले प्रभाव निम्नलिखित थे-

  1. विश्व का दो गुटों में विभाजन: शीतयुद्ध के कारण अमेरिका और सोवियत संघ के नेतृत्व में विश्व दो खेमों में विभाजित हो गया। एक खेमा पूँजीवादी गुट कहलाया और दूसरा साम्यवादी गुट कहलाया।
  2. सैनिक गठबन्धनों की राजनीति: शीतयुद्ध के कारण सैनिक गठबंधनों की राजनीति प्रारंभ हुई।
  3. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की उत्पत्ति: शीतयुद्ध के कारण गुटनिरपेक्ष आंदोलन की उत्पत्ति हुई एशिया- अफ्रीका के नव-स्वतंत्र राष्ट्रों ने दोनों गुटों से अपने को अलग रखने के लिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन का हिस्सा बनाया।
  4. शस्त्रीकरण को बढ़ावा: शीत युद्ध के प्रभावस्वरूप शस्त्रीकरण को बढ़ावा मिला। दोनों गुट खतरनाक शस्त्रों का संग्रह करने लगे।

प्रश्न 22.
शीत युद्ध की तीव्रता में कमी लाने वाले कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
निम्न कारणों से शीतयुद्ध की तीव्रता में कमी आयी-
1. अपरोध का तर्क:
अपरोध ( रोक और सन्तुलन ) के तर्क ने शीत युद्ध में संयम बरतने के लिए दोनों गुटों को मजबूर कर दिया । अपरोध का तर्क यह है कि जब दोनों ही विरोधी पक्षों के पास समान शक्ति तथा परस्पर नुकसान पहुँचाने की क्षमता होती है तो कोई भी युद्ध का खतरा नहीं उठाना चाहता।

2. गठबंधन में भेद आना:
सोवियत संघ के साम्यवादी गठबंधन में भेद पैदा होने की स्थिति ने भी शीत युद्ध की तीव्रता को कम किया। साम्यवादी चीन की 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध में सोवियत संघ से अनबन हो गयी।

3. गुटनिरपेक्ष आंदोलन का विकास: गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने भी नव-स्वतंत्र राष्ट्रों को दो ध्रुवीय विश्व की गुटबाजी से अलग रहने का मौका दिया।

प्रश्न 23.
शीत युद्ध के काल में ‘अपरोध’ की स्थिति ने युद्ध तो रोका लेकिन यह दोनों महाशक्तियों के बीच पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता को नहीं रोक सकी। क्यों? स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
अपरोध की स्थिति शीत युद्ध काल में दोनों महाशक्तियों की प्रतिद्वन्द्विता को निम्न कारणों से नहीं रोक सकी-

  1. दोनों ही गुटों के पास परमाणु बमों का भारी भण्डारण था। दोनों एक- दूसरे से निरंतर सशंकित थ। इसलिए प्रतिस्पर्द्धा बनी रही, यद्यपि सम्पूर्ण विनाश के भय ने युद्ध को रोक दिया।
  2. दोनों महाशक्तियों की पृथक्-पृथक् विचारधाराएँ थीं। दोनों में विचारधारागत प्रतिद्वन्द्विता जारी रही क्योंकि उनमें कोई समझौता संभव नहीं था।
  3. दोनों महाशक्तियाँ औद्योगीकरण के चरम विकास की अवस्था में थीं और उन्हें अपने उद्योगों के लिए कच्चा माल विश्व के अल्पविकसित देशों से ही प्राप्त हो सकता था। इसलिए सैनिक गठबंधनों के द्वारा इन क्षेत्रों में दोनों अपने- अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने के लिए छीना-झपटी कर रहे थे।

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प्रश्न 24.
महाशक्तियों ने ‘अस्त्र- नियंत्रण’ संधियाँ करने की आवश्यकता क्यों समझी?
उत्तर:
यद्यपि महाशक्तियों ने यह समझ लिया था कि परमाणु युद्ध को हर हालत में टालना जरूरी है। इसी समझ के कारण दोनों महाशक्तियों ने संयम बरता और शीत युद्ध एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र की तरफ खिसकता रहा; तथापि दोनों के बी प्रतिद्वन्द्विता जारी थी। इस प्रतिद्वन्द्विता के चलते रहने से दोनों ही महाशक्तियाँ यह समझ रही थीं कि संयम के बावजूद गलत अनुमान या मंशा को समझने की भूल या किसी परमाणु दुर्घटना या किसी मानवीय त्रुटि के कारण युद्ध हो सकता है! इस बात को समझते हुए दोनों ही महाशक्तियों ने कुछेक परमाणविक और अन्य हथियारों को सीमित या समाप्त करने के लिए आपस में सहयोग करने का फैसला किया और अस्त्र नियंत्रण संधियों द्वारा हथियारों की दौड़ पर लगाम लगाई और उसमें स्थायी संतुलन लाया है।

प्रश्न 25.
1947 से 1950 के बीच शीतयुद्ध के विकास का वर्णन करें।
उत्तर:
1947 से 1950 के बीच शीतयुद्ध का विकास:

  1. मार्शल योजना (1947): अमेरिका ने यूरोप में रूसी प्रभाव को रोकने की दृष्टि से 1947 में पश्चिमी यूरोप के पुनर्निर्माण हेतु मार्शल योजना बनायी।
  2. बर्लिन की नाकेबन्दी: सोवियत संघ ने 1948 में बर्लिन कीं नाकेबंदी कर शीत युद्ध को बढ़ावा दिया।
  3. नाटो की स्थापना: 4 अप्रैल, 1949 को अमेरिकी गुट ने नाटो की स्थापना कर शीत युद्ध को बढ़ावा
  4. कोरिया संकट: 1950 में उत्तरी तथा दक्षिणी कोरिया के बीच हुए युद्ध ने भी शीत युद्ध को बढ़ावा दिया।

प्रश्न 26.
क्यूबा का मिसाइल संकट क्या था? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
क्यूबा का मिसाइल संकट 1962 में सोवियत संघ के नेता नीकिता ख्रुश्चेव ने अमरीका के तट पर स्थित एक द्वीपीय देश क्यूबा को रूस के सैनिक अड्डे के रूप में बदलने हेतु वहाँ परमाणु मिसाइलें तैनात कर दीं। हथियारों की इस तैनाती के बाद सोवियत संघ पहले की तुलना में अब अमरीका के मुख्य भू-भाग के लगभग दो गुने ठिकानों या शहरों पर हमला बोल सकता था। क्यूबा में मिसाइलों की तैनाती की जानकारी अमरीका को तीन हफ्ते बाद लगी।

इसके बाद अमरीकी राष्ट्रपति कैनेडी ने आदेश दिया कि अमरीकी जंगी बेड़ों को आगे करके क्यूबा की तरफ जाने वाले सोवियत जहाजों को रोका जाय। इस चेतावनी से लगा कि युद्ध होकर रहेगा। इसी को क्यूबा संकट के रूप में जाना गया। लेकिन सोवियत संघ के जहाजों के वापसी का रुख कर लेने से यह संकट टल गया।

प्रश्न 27.
1960 के दशक को खतरनाक दशक क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
निम्न घटनाओं के कारण 1960 का दशक खतरनाक दशक कहा जाता है-

  1. कांगो संकट: 1960 के दशक के प्रारंभ में ही कांगो सहित अनेक स्थानों पर प्रत्यक्ष रूप से मुठभेड़ की स्थिति पैदा हो गई थी।
  2. क्यूबा संकट: 1961 में क्यूबा में अमरीका द्वारा प्रायोजित ‘बे ऑफ पिग्स’ आक्रमण और 1962 में ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ ने शीतयुद्ध को चरम पर पहुँचा दिया।
  3. अन्य: सन् 1965 में डोमिनिकन रिपब्लिक में अमेरिकी हस्तक्षेप और 1968 में चेकोस्लोवाकिया में सोवियत संघ के हस्तक्षेप से तनाव बढ़ा।

प्रश्न 28.
गुटनिरपेक्षता क्या है? क्या गुटनिरपेक्षता का अभिप्राय तटस्थता है?.
उत्तर:
गुटनिरपेक्षता का अर्थ- गुटनिरपेक्षता का अर्थ है कि महाशक्तियों के किसी भी गुट में शामिल न होना तथा इन गुटों के सैनिक गठबंधनों व संधियों से अलग रहना तथा गुटों से अलग रहते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करना तथा विश्व राजनीति में भाग लेना। गुटनिरपेक्षता तटस्थता नहीं है – गुट निरपेक्षता तटस्थता की नीति नहीं है।

तटस्थता का अभिप्राय है युद्ध में शामिल न होने की नीति का पालन करना। ऐसे देश न तो युद्ध में संलग्न होते हैं और न ही युद्ध के सही-गलत के बारे में अपना कोई पक्ष रखते हैं। लेकिन गुटनिरपेक्षता युद्ध को टालने तथा युद्ध के अन्त का प्रयास करने की नीति है।

प्रश्न 29.
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति की पाँच विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति की विशेषताएँ-

  1. भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति महाशक्तियों के गुटों से अलग रहने की नीति है।
  2. भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति एक स्वतंत्र नीति है तथा यह अन्तर्राष्ट्रीय शांति और स्थिरता हेतु अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में सक्रिय सहयोग देने की नीति है
  3. भारत की गुटनिरपेक्ष विदेश नीति सभी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने पर बल देती है।
  4. भारत की गुटनिरपेक्ष नीति नव-स्वतंत्र देशों के गुटों में शामिल होने से रोकने की नीति है।
  5. भारत की गुटनिरपेक्ष नीति अल्पविकसित देशों को आपसी सहयोग तथा आर्थिक विकास पर बल देती है।

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प्रश्न 30.
भारत के गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के कोई चार कारण बताओ। भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति क्यों अपनाई?
अथवा
उत्तर-भारत के गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  1. राष्ट्रीय हित की दृष्टि से भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति इसलिए अपनाई ताकि वह स्वतंत्र रूप से ऐसे अन्तर्राष्ट्रीय फैसले ले सके जिनसे उसका हित सधता हो; न कि महाशक्तियों और खेमे के देशों का।
  2. दोनों महाशक्तियों से सहयोग लेने हेतु भारत ने दोनों महाशक्तियों से सम्बन्ध व मित्रता स्थापित करते हुए दोनों से सहयोग लेने के लिए गुटनिरपेक्षता की नीति अपनायी।
  3. स्वतंत्र नीति-निर्धारण हेतु भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति इसलिए भी अपनाई ताकि भारत स्वतंत्र नीति का निर्धारण कर सके।
  4. भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए – भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए भारत ने गुट निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया।

प्रश्न 31.
बेलग्रेड शिखर सम्मेलन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये|
उत्तर:
बेलग्रेड शिखर सम्मेलन;
सन् 1961 में गुटनिरपेक्ष देशों का पहला शिखर सम्मेलन बेलग्रेड में हुआ। इसी को बेलग्रेड शिखर सम्मेलन के नाम से जाना जाता है। यह सम्मेलन कम-से-कम निम्न तीन बातों की परिणति था

  1. भारत, यूगोस्लाविया, मिस्र, इण्डोनेशिया और घाना इन पाँच देशों के बीच सहयोग।
  2. शीत युद्ध का प्रसार और इसके बढ़ते दायरे।
  3. अन्तर्राष्ट्रीय फलक पर बहुत से नव-स्वतंत्र अफ्रीकी देशों का नाटकीय उदय।

बेलग्रेड शिखर सम्मेलन में 25 सदस्य देश शामिल हुए। सम्मेलन में स्वीकार किये गये घोषणा-पत्र में कहा गया कि विकासशील राष्ट्र बिना किसी भय व बाधा आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास को प्रेरित करें।

प्रश्न 32.
सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता ‘साल्ट प्रथम’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता (साल्ट ) प्रथम सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता (साल्ट) का प्रथम चरण सन् 1969 के नवम्बर में प्रारंभ हुआ सोवियत संघ के नेता लियोनेड ब्रेझनेव और अमरीका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने मास्को में 26 मई, 1972 को निम्नलिखित समझौते पर हस्ताक्षर किए

  1. परमाणु मिसाइल परिसीमन संधि (ए वी एम ट्रीटी) – इस संधि के अन्तर्गत दोनों ही राष्ट्रों ने हवाई सुरक्षा एवं सामरिक प्रक्षेपास्त्र सुरक्षा को छोड़कर सामरिक युद्ध कौशल के प्रक्षेपास्त्रों व प्रणालियों पर प्रतिबंध लगा दिया था।
  2. सामरिक रूप से घातक हथियारों के परिसीमन के बारे में अंतरिम समझौता हुआ जो 3 अक्टूबर, 1972 से प्रभावी हुआ।

प्रश्न 33.
” गुटनिरपेक्ष आंदोलन वैश्विक सम्बन्धों में खतरनाक दुश्मनी के युग में एक संस्थात्मक आशावादी अनुक्रिया के रूप में सामने आया। इसका मुख्य सिद्धान्त यह था कि जो महाशक्ति नहीं है या जिनके सदस्यों की किसी भी गुट में शामिल होने की अपनी कोई इच्छा नहीं थी। हमारे नेताओं ने किसी गुट में शामिल होने से मना करके तटस्थ रहना स्वीकार किया, इस तरह उन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना की। ” ऊपर लिखित अनुच्छेद को पढ़ें एवं निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें-
(क) अनुच्छेद में संकेत दिए गए वैश्विक दुश्मनी का नाम लिखें।
(ख) दो महाशक्तियों का नाम लिखें, जिनका आपस में तनाव था।
(ग) भारत द्वारा गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल होने के कोई दो कारण बताइये।
उत्तर:
(क) इस पैरे में वैश्विक दुश्मनी का अर्थ अमेरिका एवं सोवियत संघ के बीच चल रहे शीत युद्ध से है।

(ख) अमेरिका एवं सोवियत संघ के बीच तनाव था।

(ग) भारत निम्नलिखित कारणों से गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल हुआ-
(i) भारत गुटों की राजनीति से अलग रहना चाहता था।
(ii) भारत दोनों शक्ति गुटों से लाभ प्राप्त करना चाहता था।

प्रश्न 34.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन को अनवरत जारी रखना द्वि-ध्रुवीय विश्व में एक चुनौती भरा काम था। क्यों? स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
शीत युद्ध काल के द्विध्रुवीय विश्व में गुटनिरपेक्ष आंदोलन को चलाये रखना एक चुनौती भरा काम था, क्योंकि:

  1. विश्व की दोनों महाशक्तियाँ नवस्वतंत्रता प्राप्त तीसरे विश्व के अल्पविकसित देशों को लालच देकर, दबाव डालकर तथा समझौते कर अपने-अपने गुट में मिलाने का प्रयास कर रही थीं।
  2. शीत युद्ध के दौरान महाशक्तियों द्वारा अनेक देशों पर हमले किये गये थे। ऐसी विषम परिस्थितियों में गुट- निरपेक्ष आंदोलन को निरन्तर जारी रखना स्वयं में एक चुनौतीपूर्ण कार्य था।
  3. पाँच सदस्य देशों ने मिलकर गुट निरपेक्ष आंदोलन का सफर शुरू किया था जिसकी संख्या बढ़ते हुए 120 तक हो गई है। शीतयुद्ध काल में अपने समर्थक देशों की इतनी संख्या बनाना भी एक चुनौतीपूर्ण कार्य था।

प्रश्न 35.
नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था:
नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से अभिप्राय है। ऐसी अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था जिसमें नवोदित विकासशील राष्ट्रों का राष्ट्रीय विकास पूँजीवादी राष्ट्रों की इच्छा पर निर्भर न रहे। विश्व आर्थिक व्यवस्था का संचालन एक-दूसरे की संप्रभुता का समादर, अहस्तक्षेप एवं कच्चे माल व उत्पादन राष्ट्र का पूर्ण अधिकार आदि सिद्धान्तों पर आधारित हो। नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के मूल सिद्धान्त हैं।

  1. अल्प विकसित देशों को अपने उन प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण प्राप्त हो, जिनका दोहन पश्चिम में विकसित देश करते हैं।
  2. अल्प विकसित देशों की पहुँच पश्चिमी देशों के बाजार तक हो।
  3. पश्चिमी देशों से मंगायी जा रही प्रौद्योगिकी की लागत कम हो।
  4. अल्प विकसित देशों की अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थानों में भूमिका बढ़े।

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प्रश्न 36.
नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के प्रमुख उद्देश्य लिखिये।
उत्तर:
नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के उद्देश्य – नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित

  1. नई अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था वैश्विक व्यापार प्रणाली में सुधार हेतु प्रस्तावित की गई थी।
  2. इसमें अल्पविकसित देशों को उनके उन प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण प्राप्त होने का उद्देश्य रखा गया है जिनका दोहन पश्चिम के विकसित देश करते हैं।
  3. इसमें अल्प विकसित देशों की पहुँच पश्चिमी देशों के बाजार तक होगी।
  4. इसमें पश्चिमी देशों से मंगायी जा रही प्रौद्योगिकी की लागत कम होगी।
  5. अल्प विकसित देशों की अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थानों में भूमिका बढ़ेगी।
  6. विकसित देश विकासशील देशों में पूँजी का निवेश करेंगे, उन्हें न्यूनतम ब्याज की शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराया जायेगा तथा उनके पुनर्भुगतान की शर्तें भी लचीली होंगी।

प्रश्न 37.
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति के समर्थन में दो तर्क दीजिये।
उत्तर:
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति के समर्थन में तर्क-

  1. गुटनिरपेक्षता के कारण भारत ऐसे अन्तर्राष्ट्रीय फैसले ले सका जिनसे उसका हित सता था न कि महाशक्तियों और उनके खेमे के देशों का।
  2. इसके कारण भारत हमेशा इस स्थिति में रहा कि एक महाशक्ति उसके खिलाफ हो जाए तो वह दूसरी महाशक्ति के नजदीक आने की कोशिश करे। अगर भारत को महसूस हो कि महाशक्तियों में से कोई उसकी अनदेखी कर रहा है या अनुचित दबाव डाल रहा है तो वह दूसरी महाशक्ति की तरफ अपना रुख कर सकता था। दोनों गुटों में से कोई भी भारत को लेकर न तो बेफिक्र हो सकता था और न ही धौंस जमा सकता था।

प्रश्न 38.
दक्षिण-पूर्व एशियाई संधि संगठन पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
शीतयुद्ध के दौरान अंतर्राष्ट्रीय गठबंधनों का निर्धारण महाशक्तियों की जरूरतों और छोटे देशों के लाभ-हानि के गणित से होता था। महाशक्तियों के बीच की तनातनी का मुख्य अखाड़ा यूरोप बना। कई मामलों में यह भी देखा गया है कि अपने गुट में शामिल करने के लिए महाशक्तियों ने बल प्रयोग किया। सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप में अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया। इस क्षेत्र के देशों में सोवियत संघ की सेना की व्यापक उपस्थिति ने यह सुनिश्चित करने के लिए अपना प्रभाव जमाया कि यूरोप का पूरा पूर्वी हिस्सा सोवियत संघ के दबदबे में रहे। पूर्वी और दक्षिण-पूर्व एशिया तथा पश्चिम एशिया में अमरीका ने गठबंधन का तरीका अपनाया। इन गठबंधनों को दक्षिण-पूर्व एशियाई संधि संगठन (SEATO) और केन्द्रीय संधि संगठन कहा जाता है।

प्रश्न 39.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की सटीक परिभाषा कर पाना मुश्किल है। इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समय के साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सदस्यों की संख्या बढ़ती गई। 2019 में अजरबेजान में हुए 18वें सम्मेलन में 120 सदस्य देश और 17 पर्यवेक्षक देश शामिल हुए। जैसे-जैसे गुटनिरपेक्ष आंदोलन एक लोकप्रिय अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में बढ़ता गया वैसे-वैसे इसमें विभिन्न राजनीतिक प्रणाली और अलग-अलग हितों के देश शामिल होते गए। इससे गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मूल स्वरूप में बदलाव आया इसी कारण गुटनिरपेक्ष आंदोलन की सटीक परिभाषा कर पाना मुश्किल है।

प्रश्न 40.
गुटनिरपेक्षता के आंदोलन की बदलती प्रकृति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
समय बीतने के साथ गुटनिरपेक्षता की प्रकृति भी बदली तथा इसमें आर्थिक मुद्दों को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा। बेलग्रेड में हुए पहले सम्मेलन (1961) में आर्थिक मुद्दे ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं थे। सन् 1970 के दशक के मध्य तक आर्थिक मुद्दे प्रमुख हो उठे। इसके परिणामस्वरूप गुटनिरपेक्ष आंदोलन आर्थिक दबाव समूह बन गया। सन् 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध तक नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को बनाये चलाये रखने के प्रयास मंद पड़ गए।

प्रश्न 41.
” अमरीका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराना एक राजनीतिक खेल था। ” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अगस्त, 1945 में अमरीका ने जापान के दो शहर हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए और तब जापान को आत्मसमर्पण करना पड़ा इसके साथ ही द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति हो गई। यद्यपि अमरीका इस बात को जानता था कि जापान आत्मसमर्पण करने वाला है। अमरीका की इस कार्रवाई का लक्ष्य सोवियत संघ को एशिया तथा अन्य जगहों पर सैन्य और राजनीतिक लाभ उठाने से रोकना था। वह सोवियत संघ के सामने यह भी जाहिर करना चाहता था कि अमरीका ही सबसे बड़ी ताकत है। अर्थात् यह कहा जा सकता है कि अमरीका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराना एक राजनीतिक खेल था।

प्रश्न 42.
हथियारों की होड़ पर लगाम लगाने हेतु महाशक्तियों द्वारा किए गए प्रयत्नों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दोनों महाशक्तियों को इस बात का अंदाजा था कि परमाणु युद्ध दोनों के लिए विनाशकारी होगा। इस कारण, अमेरिका और सोवियत संघ ने कुछेक परमाण्विक और अन्य हथियारों को सीमित या समाप्त करने हेतु आपस में सहयोग का फैसला किया। अतः दोनों ने ‘अस्त्र – नियन्त्रण’ का फैसला किया। इस प्रयास की शुरुआत 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध में हुई और एक ही दशक के भीतर दोनों पक्षों ने तीन अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किए। ये समझौते थे– परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि, परमाणु अप्रसार सन्धि और परमाणु प्रक्षेपास्त्र परिसीमन सन्धि तत्पश्चात् महाशक्तियों ने ‘अस्त्र परिसीमन के लिए वार्ताओं के कई दौरे किए और हथियारों पर अंकुश रखने के लिए अनेक सन्धियाँ कीं।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
क्यूबा का मिसाइल संकट क्या था? यह संकट कैसे टला ? क्यूबा का मिसाइल संकट
उत्तर:
क्यूबा में सोवियत संघ द्वारा परमाणु मिसाइलें तैनात करना: सोवियत संघ के नेता नीकिता ख्रुश्चेव ने अमरीका के तट पर स्थित एक छोटे से द्वीपीय देश क्यूबा को रूस के ‘सैनिक अड्डे’ के रूप में बदलने हेतु 1962 में क्यूबा परमाणु मिसाइलें तैनात कर दीं।

अमरीका का नजदीकी निशाने की सीमा में आना: मिसाइलों की तैनाती से पहली बार अमरीका नजदीकी निशाने की सीमा में आ गया। अब सोवियत संघ पहले की तुलना में अमरीका के मुख्य भू-भाग के लगभग दोगुने ठिकानों या शहरों पर हमला बोल सकता था।

अमरीका की प्रतिक्रिया तथा सोवियत संघ को संयम भरी चेतावनी: क्यूबा में इन परमाणु मिसाइलों की तैनाती की जानकारी अमरीका को तीन हफ्ते बाद लगी। इसके बाद अमरीकी राष्ट्रपति कैनेडी ने आदेश दिया कि अमरीकी जंगी बेड़ों को आगे करके क्यूबा की तरफ जाने वाले सोवियत जहाजों को रोका जाये। अमरीका की इस चेतावनी से ऐसा लगा कि युद्ध होकर रहेगा। इसी को क्यूबा मिसाइल संकट के रूप में जाना गया।

सोवियत संघ का संयम भरा कदम और संकट की समाप्ति: अमरीका की गंभीर चेतावनी को देखते हुए सोवियत संघ ने संयम से काम लिया और युद्ध को टालने का फैसला किया। सोवियत संघ के जहाजों ने या तो अपनी गति धीमी कर ली या वापसी का रुख कर लिया। इस प्रकार क्यूबा मिसाइल संकट टल गया।

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प्रश्न 2.
शीतयुद्ध से आप क्या समझते हैं? अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों पर इसके प्रभाव का परीक्षण कीजिये । उत्तर- शीत युद्ध का अर्थ – द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से लेकर 1990 तक विश्व राजनीति में दो महाशक्तियों- अमेरिका और सोवियत संघ के नेतृत्व में उदारवादी पूँजीवादी गुट तथा साम्यवादी समाजवादी गुट के बीच जो शक्ति व प्रभाव विस्तार की प्रतिद्वन्द्विता चलती रही, उसे शीत युद्ध का नाम दिया गया। दोनों के बीच यह वाद-विवादों, पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो प्रसारणों तथा भाषणों से लड़ा जाने वाला युद्ध; शस्त्रों की होड़ को बढ़ाने वाली एक सैनिक प्रवृत्ति तथा दो भिन्न विचारधाराओं का युद्ध था। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर शीतयुद्ध का प्रभाव: अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर शीत युद्ध के नकारात्मक और सकारात्मक दोनों प्रकार के प्रभाव पड़े। यथा
(अ) नकारात्मक प्रभाव:

  1. शीत युद्ध ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में भय और सन्देह के वातावरण को निरन्तर बनाए रखा।
  2. इसने सैनिक गठबन्धनों को जन्म दिया; सैनिक अड्डों की स्थापना की, शस्त्रों की दौड़ तेज की और विनाशकारी शस्त्रों के निर्माण को बढ़ावा दिया।
  3. इसने विश्व में दो विरोधी गुटों को जन्म दिया।
  4. इसके कारण सम्पूर्ण विश्व पर परमाणु युद्ध का भय छाया रहा।
  5. शीत युद्ध ने निःशस्त्रीकरण के प्रयासों को अप्रभावी बना दिया।

(ब) सकारात्मक प्रभाव-

  1. शीत युद्ध के कारण गुटनिरपेक्ष आंदोलन का जन्म तथा विकास हुआ।
  2. इसकी भयावहता के कारण शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को प्रोत्साहन मिला।
  3. इसके कारण आणविक शक्ति के क्षेत्र में तकनीकी और प्राविधिक विकास को प्रोत्साहन मिला।
  4. इसने नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना को प्रोत्साहित किया।

प्रश्न 3.
शीतयुद्ध के उदय के प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिये।
उत्तर:
शीत
युद्ध
शीत युद्ध के उदय के कारण के उदय के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:

  1. परस्पर सन्देह एवं भय: दोनों गुटों के बीच शीत युद्ध के प्रारंभ होने का प्रमुख कारण परस्पर संदेह, अविश्वास तथा डर का व्याप्त होना था।
  2. विरोधी विचारधारा: दोनों महाशक्तियों के अनुयायी देश परस्पर विरोधी विचारधारा वाले देश थे। विश्व में. दोनों ही अपना-अपना प्रभाव – क्षेत्र बढ़ाने में लगे थे।
  3. अणु बम का रहस्य सोवियत संघ से छिपाना: अमरीका ने अणु बम बनाने का रहस्य सोवियत संघ से छुपाया। जापान पर जब उसने अणु बम गिरा कर द्वितीय विश्व युद्ध को समाप्त किया तो सोवियत संघ ने इसे अपने विरुद्ध भी समझा। इससे दोनों महाशक्तियों के बीच दरार पड़ गयी।
  4. अमेरिका और सोवियत संघ का एक-दूसरे का प्रतिद्वन्द्वी बनना: अमरीका और सोवियत संघ का महाशक्ति बनने की होड़ में एक-दूसरे के मुकाबले खड़ा होना शीत युद्ध का कारण बना।
  5. अपरोध का तर्क: शीत युद्ध शुरू होने के पीछे यह समझ भी कार्य कर रही थी कि परमाणु युद्ध की सूरत में दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। इसे अपरोध का तर्क कहा गया।

प्रश्न 4.
शीत युद्धकालीन द्वि-ध्रुवीय विश्व की चुनौतियों का वर्णन करें।
उत्तर:
शीत युद्धकालीन द्वि-ध्रुवीय विश्व की चुनौतियाँ – शीत युद्ध के दौरान विश्व दो प्रमुख गुटों में बँट गया एक गुट का नेतृत्व संयुक्त राज्य अमेरिका कर रहा था और दूसरे गुट का नेतृत्व सोवियत संघ कर रहा था। लेकिन शीत युद्ध के दौरान ही द्विध्रुवीय विश्व को चुनौतियाँ मिलना शुरू हो गयी थीं। ये चुनौतियाँ निम्नलिखित थीं-
1. गुटनिरपेक्ष आंदोलन:
शीत युद्ध के दौरान द्विध्रुवीय विश्व को सबसे बड़ी चुनौती गुटनिरपेक्ष आंदोलन से मिली। गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने अल्पविकसित तथा विकासशील नव-स्वतंत्र देशों को दोनों गुटों से अलग रहने का तीसरा विकल्प दिया। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के देशों ने स्वतंत्र विदेश नीति अपनायी; शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिद्वन्द्वी गुटों के बीच मध्यस्थता में सक्रिय भूमिका निभायी।

2. नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था:
नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था ने भी द्विध्रुवीय विश्व को चुनौती दी। मई, 1974 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के छठे विशेष अधिवेशन में महासभा ने पुरानी विश्व अर्थव्यवस्था को समाप्त करके एक नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना के लिए विशेष कार्यक्रम बनाया; गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों ने भी इसकी स्थापना के लिए दबाव बनाया।

3. साम्यवादी गठबंधन में दरार पड़ना:
साम्यवादी चीन की 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध में सोवियत संघ से अनबन हो गई। 1971 में अमरीका ने चीन के नजदीक आने के प्रयास किये इस प्रकार साम्यवादी गठबंधन में दरार पड़ने से भी द्विध्रुवीय विश्व को चुनौती मिली।

प्रश्न 5.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन से आप क्या समझते हैं? इसकी प्रकृति एवं सिद्धान्तों की विवेचना कीजिये।
उत्तर:
गुटनिरपेक्षता का अर्थ- गुटनिरपेक्षता का अर्थ है। दोनों महाशक्तियों के गुटों से अलग रहना। यह महाशक्तियों के गुटों में शामिल न होने तथा अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाते हुए विश्व राजनीति में शांति और स्थिरतां के लिए सक्रिय रहने का आंदोलन है। अतः गुटनिरपेक्षता का अर्थ है – किसी भी देश को प्रत्येक मुद्दे पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय लेने की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय हित एवं विश्व शांति के आधार पर गुटों से अलग रहते हुए स्वतन्त्र विदेश नीति अपनाने की स्वतन्त्रता।

गुटनिरपेक्षता की प्रकृति एवं सिद्धान्त; गुटनिरपेक्षता की प्रकृति को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है-

  1. गुटनिरपेक्षता पृथकतावाद नहीं: पृथकतावाद का अर्थ होता है कि अपने को अन्तर्राष्ट्रीय मामलों से काटकर रखना। जबकि गुटनिरपेक्षता की नीति विश्व के मामलों में सक्रिय रहने की नीति है।
  2. गुटनिरपेक्ष तटस्थता नहीं है: तटस्थता का अर्थ होता है। मुख्य रूप से युद्ध में शामिल न होने की नीति का पालन करना। जबकि गुटनिरपेक्ष देश युद्ध में शामिल हुए हैं। इन देशों ने दूसरे देशों के बीच युद्ध को होने से टालने के लिए काम किया है और हो रहे युद्ध के अंत के लिए प्रयास भी किये हैं।
  3. विश्व शांति की चिन्ता: गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रमुख चिंता विश्व में शांति स्थापित करना है।
  4. आर्थिक सहायता लेना: गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल देश अपने आर्थिक विकास के लिए आर्थिक सहायता प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं, ताकि वे अपना आर्थिक विकास कर आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर हो सकें।
  5. नई अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था की स्थापना: गुटनिरपेक्ष देशों ने नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की धारणा का समर्थन किया और इसकी स्थापना के लिए अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में दबाव बनाया।

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प्रश्न 6.
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक नेता कौन थे? गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत की भूमिका बताइये
उत्तर:
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक:
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की जड़ में यूगोस्लाविया के जोसेफ ब्रॉज टीटो, भारत के जवाहर लाल नेहरू और मिस्र के गमाल अब्दुल नासिर प्रमुख थे। इंडोनेशिया के सुकर्णो और घाना के वामे एनक्रूमा ने इनका जोरदार समर्थन किया। ये पांच नेता गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक कहलाये।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत की भूमिका:
गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत की भूमिका को निम्न प्रकार स्पष्ट किया गया है-

  1. गुटनिरपेक्ष आंदोलन का संस्थापक – भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का संस्थापक सदस्य रहा है। भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्षता की नीति का प्तिपादन किया।
  2. स्वयं को महाशक्तियों की खेमेबन्दी से अलग रखा – शीत युद्ध के दौर में भारत ने सजग और सचेत रूप से अपने को दोनों महाशक्तियों की खेमेबन्दी से दूर रखा।
  3. नव – स्वतंत्र देशों को आंदोलन में आने की ओर प्रेरित किया- भारत ने नव-स्वतंत्र देशों को महाशक्तियों के खेमे में जाने का पुरजोर विरोध किया तथा उनके समक्ष तीसरा विकल्प प्रस्तुत करके उन्हें गुटनिरपेक्ष आंदोलन का सदस्य बनने को प्रेरित किया।
  4. विश्व शांति और स्थिरता के लिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन को सक्रिय रखना – भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में सक्रिय हस्तक्षेप की नीति अपनाने पर बल दिया।
  5. वैचारिक एवं संगठनात्मक ढाँचे का निर्धारण- गुटनिरपेक्ष आंदोलन के वैचारिक एवं संगठनात्मक ढाँचे के निर्धारण में भारत की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।
  6. समन्वयकारी भूमिका – भारत ने समन्वयकारी भूमिका निभाते हुए सदस्यों के बीच उठे विवादास्पद मुद्दों को टालने या स्थगित करने पर बल देकर आंदोलन को विभाजित होने से बचाया।

प्रश्न 7.
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति का आलोचनात्मक विवेचना कीजिये।
उत्तर:
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति का आलोचनात्मक विवेचना:
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति का आलोचनात्मक विवेचन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया गया है। भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति के लाभ गुटनिरपेक्षता की नीति ने निम्न क्षेत्रों में भारत का प्रत्यक्ष रूप से हित साधन किया है।

  1. राष्ट्रीय हित के अनुरूप फैसले: गुटनिरपेक्षता की नीति के कारण भारत ऐसे अन्तर्राष्ट्रीय फैसले और पक्ष ले सका जिनसे उसका हित सधता था, न कि महाशक्तियों और उनके खेमे के देशों का।
  2. अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में अपने महत्त्व को बनाए रखने में सफल: गुटनिरपेक्ष नीति अपनाने के कारण भारत हमेशा इस स्थिति में रहा कि अगर भारत को महसूस हो कि महाशक्तियों में से कोई उसकी अनदेखी कर रहा है या अनुचित दबाव डाल रहा है, तो वह दूसरी महाशक्ति की तरफ अपना रुख कर सकता था। दोनों गुटों में से कोई भी भारत सरकार को लेकर न तो बेफिक्र हो सकता था और न ही धौंस जमा सकता था।

भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति की आलोचना: भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति की निम्नलिखित कारणों से आलोचना की गई है।
1. सिद्धान्तविहीन नीति:
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति सिद्धान्तविहीन है। कहा जाता है कि भारत के अपने राष्ट्रीय हितों को साधने के नाम पर अक्सर महत्त्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय मामलों पर कोई सुनिश्चित पक्ष लेने से बचता रहा।

2. अस्थिर नीति: भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति में अस्थिरता रही है और कई बार तो भारत की स्थिति विरोधाभासी रही।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

प्रश्न 8.
शीत युद्ध काल में दोनों महाशक्तियों द्वारा निःशस्त्रीकरण की दिशा में किये गये प्रयासों का उल्लेख कीजिये
उत्तर:
निःशस्त्रीकरण के प्रयास: शीत युद्ध काल में दोनों पक्षों ने निःशस्त्रीकरण की दिशा में निम्नलिखित प्रमुख प्रयास किये
1. सीमित परमाणु परीक्षण संधि (एलटीबीटी):
1963, वायुमण्डल, बाहरी अंतरिक्ष तथा पानी के अन्दर परमाणु हथियारों के परीक्षण पर प्रतिबंध लगाने के लिए अमरीका, ब्रिटेन तथा सोवियत संघ ने मास्को में 5 अगस्त, 1963 को इस संधि पर हस्ताक्षर किये। यह संधि 10 अक्टूबर, 1963 से प्रभावी हो गयी।

2. परमाणु अप्रसार संधि, 1967: यह संधि केवल पांच परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों को ही एटमी हथियार रखने की अनुमति देती है और शेष सभी देशों को ऐसे हथियार हासिल करने से रोकती है। यह संधि 5 मार्च, 1970 से प्रभावी हुई। इस संधि को 1995 में अनियतकाल के लिए बढ़ा दिया गया है।

3. सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता – I ( स्ट्रेटजिक आर्म्स लिमिटेशन टॉक्स – साल्ट – I) सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता का पहला चरण सन् 1969 के नवम्बर में आरंभ हुआ सोवियत संघ के नेता लियोनेड ब्रेझनेव और अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने मास्को में 26 मई, 1972 को निम्नलिखित समझौते पर हस्ताक्षर किए-
(क) परमाणु मिसाइल परिसीमन संधि (एबीएम ट्रीटी)।
(ख) सामरिक रूप से घातक हथियारों के परिसीमन के बारे में अंतरिम समझौता। ये अक्टूबर, 1972 से प्रभावी

4. सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता – II ( स्ट्रेटजिक आर्म्स लिमिटेशन टॉक्स – सॉल्ट – II ) यह संधि अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर और सोवियत संघ के नेता लियोनेड ब्रेझनेव के बीच 18 जून, 1979 को हुआ था। इस संधि का उद्देश्य सामरिक रूप से घातक हथियारों पर प्रतिबंध लगाना था।

5. सामरिक अस्त्र न्यूनीकरण संधि – I: अमरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश (सीनियर) और सोवियत संघ के राष्ट्रपति गोर्बाचेव ने 31 जुलाई, 1991 को घातक हथियारों के परिसीमन और उनकी संख्या में कमी लाने से संबंधित संधि पर हस्ताक्षर किए।

6. सामरिक अस्त्र न्यूनीकरण संधि – II: सामरिक रूप से घातक हथियारों को सीमित करने और उनकी संख्या में कमी करने हेतु इस संधि पर रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन और अमरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश (सीनियर) ने मास्को में 3 जनवरी, 1993 को हस्ताक्षर किए।

प्रश्न 9.
नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था से आप क्या समझते हैं? इसके बुनियादी सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से आशय – नई अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में जिन बातों पर जोर दिया गया है, वे हैं। विकासशील देशों को खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना; साधनों को विकसित देशों से विकासशील देशों में भेजना अल्प विकसित देशों का अपने उन प्राकृतिक साधनों पर नियंत्रण प्राप्त हो, जिनका दोहन पश्चिमी विकसित देश करते हैं; अल्प विकसित देशों की पहुँच पश्चिमी देशों के बाजार तक हो तथा पश्चिमी देशों से मंगायी जा रही प्रौद्योगिकी की लागत कम हो। नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद तथा नव उपनिवेशवाद व नव-साम्राज्यवाद को उनके सभी रूपों में समाप्त करना चाहती है। यह न्याय तथा समानता पर आधारित, लोकतंत्र के सिद्धान्त पर आधारित अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था है।

नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के मूल सिद्धान्त: नवीन अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के मूल सिद्धान्त इस प्रकार हैं-

  1. खनिज पदार्थों और समस्त प्रकार के आर्थिक क्रियाकलापों पर उसी राष्ट्र की संप्रभुता की स्थापना करना।
  2. कच्चे माल और तैयार माल की कीमतों में ज्यादा अन्तर न होना।
  3. विकसित देशों के साथ व्यापार की वरीयता का विस्तार करना।
  4. विकासशील देशों द्वारा उत्पादित औद्योगिक माल के निर्यात को प्रोत्साहन देना।
  5. विकासशील देशों द्वारा विकसित देशों के मध्य तकनीकी विकास की खाई को पाटना।
  6. विकासशील देशों पर वित्तीय ऋणों के भार को कम करना।
  7. बहुराष्ट्रीय निगमों की गतिविधियों पर समुचित नियंत्रण लगाना।

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प्रश्न 10.
नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की स्थापना हेतु विभिन्न संगठनों द्वारा किये गये प्रयासों का वर्णन करें।
उत्तर:
नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की स्थापना हेतु विभिन्न संगठनों द्वारा किये गये प्रयास 70 के दशक में नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की स्थापना के लिए विभिन्न स्तरों पर अनेक प्रयास हुए हैं।

1. संयुक्त राष्ट्र संघ के स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ के स्तर पर ‘अंकटाड’ तथा ‘यू.एन.आई.डी. ओ. के माध्यम से अनेक प्रयत्न किये गये:
(अ) अंकटाड के स्तर पर 1964 से लेकर कई सम्मेलन हुए जिनका उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को संप्रभुता सम्पन्न, समानता तथा सहयोग के आधार पर पुनर्गठित करना रहा है जिससे इसको न्याय पर आधारित बनाया जा सके। 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ के व्यापार एवं विकास से संबंधित सम्मेलन वैश्विक व्यापार प्रणाली में सुधार का प्रस्ताव किया गया ताकि अल्प विकसित देशों के अपने समस्त प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण प्राप्त हो सके, वे अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अपना माल बेच सकें। कम लागत से उन्हें प्रौद्योगिकी मिल सके आदि।

(ब) यू.एन.आई.डी.ओ. के माध्यम से विकासशील देशों में औद्योगीकरण की गति को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया हैं

2. गुटनिरपेक्ष आंदोलन के स्तर पर: 1970 के दशक में गुटनिरपेक्ष आंदोलन आर्थिक दबाव समूह बन गया । इन देशों की पहल के क्रियान्वयन के रूप में संयुक्त राष्ट्र महासभा का छठा अधिवेशन बुलाया गया जिसने ‘नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था’ स्थापित करने की घोषणा की।

3. विकासशील राष्ट्रों के स्तर पर: 1982 में दिल्ली में हुए विकासशील देशों के सम्मेलन में इनको आत्मनिर्भर बनाने के लिए आह्वान किया गया और नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था में सहयोग हेतु आठ सूत्री कार्यक्रम रखा गया। इसमें संरक्षणवाद की समाप्ति पर भी बल दिया गया।

प्रश्न 11.
‘अपरोध’ का तर्क किसे कहा गया है? विस्तार में समझाइये।
उत्तर:
दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति से ही शीतयुद्ध की शुरुआत हुई। विश्वयुद्ध की समाप्ति के कारण कुछ भी हो परंतु इसका परिणामस्वरूप वैश्विक राजनीति के मंच पर दो महाशक्तियों का उदय हो गया। जर्मनी और जापान हार चुके थे और यूरोप तथा शेष विश्व विध्वंस की मार झेल रहे थे। अब अमरीका और सोवियत संघ विश्व की सबसे बड़ी शक्ति थे। इनके पास इतनी क्षमता थी कि विश्व की किसी भी घटना को प्रभावित कर सके। अमरीका और सोवियत संघ का महाशक्ति बनने की होड़ में एक-दूसरे के मुकाबले खड़ा होना शीतयुद्ध का कारण बना। शीतयुद्ध शुरू होने के पीछे यह समझ भी काम कर रही थी कि परमाणु बम होने वाले विध्वंस की मार झेलना किसी भी राष्ट्र के बूते की बात नहीं।

जब दोनों महाशक्तियों के पास इतनी क्षमता के परमाणु हथियार हों कि वे एक-दूसरे को असहनीय क्षति पहुँचा सके तो ऐसे में दोनों के बीच रक्तरंजित युद्ध होने की संभावना कम रह जाती है। उकसावे के बावजूद कोई भी पक्ष युद्ध का जोखिम मोल लेना नहीं चाहेंगा क्योंकि युद्ध से राजनीतिक फायदा चाहे किसी को भी हो, लेकिन इससे होने वाले विध्वंस को औचित्यपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता। परमाणु युद्ध की सूरत में दोनों पक्षों को इतना नुकसान उठाना पड़ेगा कि उनमें से विजेता कौन है – यह तय करना भी मुश्किल होगा। यदि कोई अपने शत्रु पर आक्रमण करके उसके परमाणु हथियारों को नाकाम करने की कोशिश करता है तब भी दूसरे के पास उसे बर्बाद करने लायक हथियार बच जाएँगे। इसे ‘अपरोध’ का तर्क कहा गया है।

JAC Class 11 History Solutions Chapter 8 संस्कृतियों का टकराव

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पृष्ठ 170

क्रियाकलाप 1 : अरावाकों और स्पेनवासियों के बीच पाए जाने वाले अन्तरों को स्पष्ट कीजिए। इनमें से कौनसे अन्तरों को आप सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं और क्यों?
उत्तर:
अरावाकों और स्पेनवासियों के बीच पाए जाने वाले अन्तर –
(1) कैरीबियन द्वीप-समूहों में रहने वाले अरावाक शान्तिप्रिय थे तथा लड़ने की बजाय वार्तालाप द्वारा झगड़े निपटाना चाहते थे। दूसरी ओर स्पेनवासी अच्छे योद्धा तथा साम्राज्यवादी थे। वे अपनी सैन्य शक्ति के बल पर अमेरिका में अपने उपनिवेश स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील रहते थे।

(2) अरावाक लोगों के पास एक शक्तिशाली तथा प्रशिक्षित सेना का अभाव था जबकि स्पेनवासियों के पास घोड़ों के प्रयोग पर आधारित एक शक्तिशाली सेना थी।

(3) अरावाक लोग सोने को अधिक महत्त्व नहीं देते थे। उन्हें यदि यूरोपवासी सोने के बदले काँच के मनके दे देते थे, तो वे प्रसन्न हो जाते थे। इसके विपरीत स्पेनवासी सोना-चाँदी प्राप्त करने के लिए लालायित रहते थे। वे उचित- अनुचित सभी प्रकार के तरीकों द्वारा अधिकाधिक सोना-चाँदी प्राप्त करना चाहते थे।

(4) अरावाक लोगों का व्यवहार बहुत उदारतापूर्ण होता था और वे सोने की तलाश में स्पेनी लोगों का साथ देने के लिए सदैव तैयार रहते थे। इसके विपरीत स्पेनी लोग बड़े स्वार्थी, लालची तथा क्रूर होते थे। उन्होंने सोना-चाँदी प्राप्त करने के लिए अऱावक लोगों पर भारी अत्याचार किये। उन्होंने अराबाक लोगों को गुलाम बनाकर सोने-चाँदी की खानों में काम करने के लिए बाध्य किया।

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(5) अरावाक लोग अपने वंश के बुजुर्गों के अधीन संगठित थे। उनमें बहुविवाह प्रथा प्रचलित थी। वे जीववादी थे। परन्तु स्पेन के लोग अभिजात वर्ग, पादरी वर्ग तथा कृषक वर्ग तथा व्यापारी वर्ग आदि में विभाजित थे।

(6) अरावाक लोगों के पास बन्दूकों, बारूद और उत्तम घोड़ों का अभाव था परन्तु स्पेन के पास एक शक्तिशाली सेना थी। उनके सैनिकों के पास बन्दूकें, गोला-बारूद और उत्तम घोड़े थे।

पृष्ठ 177

क्रियाकलाप 3 : आपके विचार से ऐसे कौनसे कारण थे, जिनसे प्रेरित होकर यूरोप के भिन्न-भिन्न देशों के लोगों ने खोज यात्राओं पर जाने का जोखिम उठाया?
उत्तर:
खोज – यात्राओं के कारण – यूरोप के भिन्न-भिन्न देशों के लोगों द्वारा खोज – यात्राएँ करने के निम्नलिखित कारण थे –
(1) 1380 ई. में कुतुबनुमा का आविष्कार हो चुका था। 15वीं शताब्दी में इसका प्रयोग समुद्री यात्राओं में होने लगा।

(2) 1477 में टालेमी की ‘ज्योग्राफी’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुई। इस पुस्तक के अध्ययन से यूरोपवासियों को संसार के बारे में काफी जानकारी मिली जिसे उन्होंने तीन महाद्वीपों अर्थात् यूरोप, एशिया और अफ्रीका में बँटा हुआ समझा। यूरोपवासियों को इस बात का कोई अनुमान नहीं था कि अटलान्टिक के दूसरी ओर भूमि पर पहुँचने के लिए कितनी दूरी तय करनी होगी। उनका विचार था कि यह दूरी बहुत कम होगी, इसलिए अनेक साहसिक लोग समुद्रों में यात्रा करने के लिए उत्सुक रहते थे।

(3) 14वीं शताब्दी के मध्य से 15वीं शताब्दी के मध्य तक यूरोप की अर्थव्यवस्था में गिरावट आ गई। वहाँ व्यापार में मंदी आ गई तथा सोने और चाँदी की कमी आ गई। 1453 में तुर्कों ने कुस्तुन्तुनिया पर अधिकार कर लिया। यद्यपि इटलीवासियों ने तुर्कों के साथ व्यवसाय करने की व्यवस्था तो कर ली, परन्तु उन्हें व्यापार पर अधिक कर देना पड़ता था। अतः अब यूरोपवासी पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने हेतु नये समुद्री मार्ग खोजने लगे।

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(4) यूरोप के धर्मपरायण ईसाई विभिन्न देशों की खोज करके वहाँ ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे

(5) धर्म-युद्धों के कारण एशिया और यूरोप के बीच व्यापार में वृद्धि हुई। अब यूरोपवासियों की एशिया के उत्पादों, विशेषकर मसालों के प्रति रुचि बढ़ गई।

(6) यूरोपवासी सोने और मसालों की तलाश में नए-नए प्रदेशों की खोज करने लगे। इस प्रकार स्पेनवासियों ने मुख्यतः आर्थिक कारणों से प्रेरित होकर नये-नये देशों की खोज करना शुरू कर दिया।

पृष्ठ 181

क्रियाकलाप 4: दक्षिणी अमेरिका के मूल निवासियों पर यूरोपीय लोगों के सम्पर्क से क्या प्रभाव पड़ा ? विश्लेषण कीजिए। यूरोप से आकर दक्षिणी अमेरिका में बसे लोगों और जेसुइट पादरियों के प्रति स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दक्षिणी अमेरिका के मूल निवासियों पर यूरोपवासियों के सम्पर्क से प्रभाव –
(1) यूरोपवासियों की मार-काट के कारण दक्षिणी अमेरिका के मूल निवासियों की जनसंख्या कम हो गई, उनकी जीवन-शैली का विनाश हो गया और उन्हें गुलाम बनाकर खानों, बागानों तथा कारखानों में उनसे काम लिया जाने लगा।

(2) वहाँ दास प्रथा को प्रोत्साहन मिला। दक्षिणी अमेरिका के पराजित लोगों को गुलाम बना लिया जाता था।

(3) वहाँ उत्पादन की पूँजीवादी प्रणाली का प्रादुर्भाव हुआ। अधिक से अधिक धन कमाने के लिए यूरोपवासी यहाँ के स्थानीय लोगों का शोषण करते थे जिससे उनकी स्थिति अत्यन्त शोचनीय हो गई।

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(4) दक्षिणी अमेरिका में नई-नई आर्थिक गतिविधियाँ शुरू हो गईं। जंगलों का सफाया करके प्राप्त की गई भूमि पर पशु-पालन किया जाने लगा। 1700 में सोने की खोज के बाद खानों का काम चल पड़ा और इन सभी कामों के लिए सस्ते श्रम की आवश्यकता थी। अतः बड़ी संख्या में गुलाम अफ्रीका से मँगवाये गए।

(5) स्पेनी अभियानों के कारण भारी संख्या में एजटेक लोग मारे गए। इसके अतिरिक्त स्पेनियों के साथ आई चेचक की महामारी से भी हजारों एजटेक लोग मौत के मुँह में चले गए।

(6) अमेरिकी लोगों की पाण्डुलिपियों तथा स्मारकों को निर्ममतापूर्वक नष्ट कर दिया गया।

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लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
एजटेक और मेसोपोटामियाई लोगों की सभ्यता की तुलना कीजिए।
उत्तर:
एजटेक लोगों की सभ्यता की विशेषताएँ –

  1. एजटेक समाज श्रेणीबद्ध था। समाज में अभिजात, योद्धाओं, व्यापारियों, शिल्पियों, किसानों व दासों में विभाजित था। प्रतिभाशाली शिल्पियों, चिकित्सकों और विशिष्ट अध्यापकों को आदर की दृष्टि से देखा जाता था।
  2. एजटेक लोगों ने मैक्सिको झील में कृत्रिम टापू बनाये। राजधानी में बने हुए राजमहल और पिरामिड झील के बीच में खड़े हुए बड़े आकर्षक लगते थे।
  3. साम्राज्य ग्रामीण आधार पर टिका हुआ था। ये लोग मक्का, फलियाँ, कद्दू, कसावा, आलू आदि की फसलें उगाते थे।
  4. एजटेक लोग अपने बच्चों को स्कूलों में भेजते थे।
  5. दास-प्रथा प्रचलित थी। गरीब लोग कभी-कभी अपने बच्चों को भी गुलामों के रूप में बेच देते थे।
  6. एजटेक लोगों की लिपि चित्रात्मक थी।
  7. एजटेक लोग अच्छे भवन निर्माता थे। उन्होंने अनेक भव्य मन्दिरों का निर्माण किया। उनके सर्वाधिक भव्य मन्दिर भी युद्ध के देवताओं और सूर्य भगवान की समर्पित थे।
  8. एजटेक लोगों उनके देवी-देवताओं की पूजा करते थे। सूर्य, युद्ध का देवता आदि उनके प्रमुख देवता थे।
  9. एजटेक लोग इस बात का पूरा ध्यान रखते थे कि उनके सभी बच्चे स्कूल अवश्य जाएँ।

मेसोपोटामिया की सभ्यता की विशेषताएं –

  1. मेसोपोटामियावासी गेहूँ, जौ, मटर, मसूर की खेती करते थे। खेतों की सिंचाई की जाती थी। ये लोग भेड़, बकरी आदि अनेक जानवर पालते थे।
  2. मेसोपोटामिया के लोगों ने सर्वप्रथम लेखन कला का विकास किया। उनकी लिपि ‘क्यूनीफार्म’ कहलाती थी।
  3. ये लोग काँसा, टिन, ताँबा आदि धातुओं से परिचित थे।
  4. मेसोपोटामियावासी लकड़ी, ताँबा, राँगा, चाँदी, सोना, सीपी आदि तुर्की, ईरान आदि से मँगाते थे तथा वे अपना कपड़ा, कृषि जन्य उत्पाद उन्हें निर्यात करते थे।
  5. इनका समाज उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग और दास वर्ग में विभक्त था।
  6. मेसोपोटामिया में अनेक मन्दिर बने हुए थे। मन्दिरों में अनेक देवी-देवताओं की उपासना की जाती थी। उर तथा इन्नाना प्रमुख देवी – देवता थे।
  7. कुम्हार चाक से बर्तन बनाते थे।
  8. युद्ध-बन्दियों और स्थानीय लोगों को अनिवार्य रूप से मन्दिर का अथवा शासक का काम करना पड़ता था। उन्हें काम के बदले अनाज दिया जाता था।
  9. समाज में एकल परिवार की प्रथा प्रचलित थी।
  10. उन्होंने चन्द्रमा के आधार पर एक पंचांग बनाया। उन्होंने एक वर्ष को 12 महीनों में, एक महीने को 30 दिनों में, एक दिन को 24 घण्टों में, एक घण्टे को 60 मिनट में विभाजित किया।

प्रश्न 2.
ऐसे कौनसे कारण थे जिनसे 15वीं शताब्दी में यूरोपीय नौचालन को सहायता मिली?
उत्तर:
यूरोपीय नौचालन – 15वीं शताब्दी में निम्नलिखित कारणों से यूरोपीय नौचालन को सहायता मिली –
(1) 1380 ई. में कुतुबुनुमा अर्थात् दिशा सूचक यन्त्र का आविष्कार हो चुका था। इससे यात्रियों को खुले समुद्र में दिशाओं की सही जानकारी मिलती थी।

(2) समुद्री यात्रा पर जाने वाले यूरोपीय जहाजों में भी काफी सुधार हो चुका था। बड़े-बड़े जहाजों का निर्माण होने लगा था, जो विशाल मात्रा में माल की ढुलाई करते थे। ये जहाज आत्म-रक्षा के अस्त्र- -शस्त्रों से भी सुसज्जित होते थे ताकि शत्रुओं के आक्रमण का मुकाबला किया जा सके।

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(3) 15वीं सदी के अन्तर्गत यात्रा – – वृत्तान्तों और सृष्टि-वर्णन तथा भूगोल की पुस्तकों के प्रसार ने यूरोपीय लोगों में समुद्री खोजों के प्रति रुचि उत्पन्न की।

(4) 1477 में टालेमी की पुस्तक ‘ज्योग्राफी’ प्रकाशित हुई । टालेमी ने विभिन्न क्षेत्रों की स्थिति को अक्षांश और देशान्तर रेखाओं के रूप में व्यवस्थित किया था। इसके अध्ययन से यूरोपवासियों को विश्व के बारे में पर्याप्त जानकारी मिली। टालेमी ने यह भी बताया कि पृथ्वी गोल है।

(5) 1453 में कुस्तुन्तुनिया पर तुर्कों का अधिकार हो जाने से यूरोपवासियों को नये समुद्री मार्ग खोजने की प्रेरणा मिली।

(6) स्पेन और पुर्तगाल के लोग महत्त्वाकांक्षी थे तथा नये देशों की खोज कर वहाँ अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहते थे। स्पेन तथा पुर्तगाल के शासक सोना तथा धन-सम्पत्ति के भण्डार प्राप्त करना चाहते थे। वे नये-नये प्रदेशों की खोज करके वहाँ अपने साम्राज्य स्थापित करके यश और सम्मान प्राप्त करने हेतु लालायित थे।

(7) यूरोपीय लोग बाहरी विश्व के लोगों को ईसाई बनाना चाहते थे। इसने भी यूरोप के धर्मपरायण ईसाइयों को इन साहसिक कार्यों की ओर उन्मुख किया।

प्रश्न 3.
किन कारणों से स्पेन और पुर्तगाल ने पन्द्रहवीं शताब्दी में. सबसे पहले अटलांटिक महासागर के पार जाने का साहस किया?
उत्तर:
स्पेन और पुर्तगाल द्वारा अटलांटिक महासागर के पार जाने के कारण –
(1) स्पेन में आर्थिक कारणों ने लोगों को ‘महासागरीय शूरवीर’ बनने के लिए प्रोत्साहन दिया। धर्म- युद्धों की स्मृति और रीकां क्विस्टा (ईसाई राजाओं द्वारा आइबेरियन द्वीप पर प्राप्त की गई विजय ) की सफलता ने स्पेन के लोगों को उत्साहित किया और इकरारनामों को प्रारम्भ किया। इन इकरारनामों के तहत स्पेन का शासक नये विजित क्षेत्रों पर अपनी प्रभुसत्ता स्थापित कर लेता था और उन्हें जीतने वाले अभियानों के नेताओं को पुरस्कार के रूप में उपाधियाँ और विजित देशों पर शासनाधिकार प्रदान करता था।

(2) स्पेन और पुर्तगाल के शासक नई समुद्री खोजों के लिए सदैव धन जुटाने को तैयार रहते थे। वे नाविकों और साहसी यात्रियों को नये-नये देशों की खोज करने के लिए प्रोत्साहित करते थे और उन्हें हर संभव सहायता प्रदान करते थे। स्पेन के शासक ने कोलम्बस को नई समुद्री खोजों के लिए प्रोत्साहित किया। पुर्तगाल का राजकुमार हेनरी नाविक के नाम से प्रसिद्ध था। उसने पश्चिमी अफ्रीका की तटीय यात्रा की और 1405 में सिउटा पर अधिकार कर लिया।

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(3) चौदहवीं शताब्दी के मध्य से पन्द्रहवीं शताब्दी के मध्य तक यूरोप की अर्थव्यवस्था में गिरावट आ गई थी।. व्यापार में मन्दी आ गई तथा वहाँ सोने-चाँदी की कमी आ गई।

(4) स्पेन और पुर्तगाल के धर्म-परायण ईसाई बाहरी दुनिया के लोगों को ईसाई बनाने के लिए लालायित थे।

(5). स्पेनी और पुर्तगाली सोने और मसालों की खोज में नये-नये प्रदेशों में जाने के लिए उत्सुक रहते थे।

(6) 1453 में तुर्कों ने कुस्तुन्तुनिया पर अधिकार कर लिया। इससे व्यापार करना कठिन हो गया। अतः यूरोपवासियों ने पूर्वी देशों से व्यापार के लिए नये समुद्री मार्गों की तलाश करना शुरू कर दिया।

(7) स्पेन और पुर्तगाल के लोग बाहरी दुनिया के लोगों को ईसाई बनाने के लिए लालायित थे। इस कारण भी वे नवीन समुद्री मार्गों की खोज के लिए उन्मुख हुए।

प्रश्न 4.
कौनसी नई खाद्य वस्तुएँ दक्षिणी अमेरिका से बाकी दुनिया में भेजी जाती थीं?
उत्तर:
दक्षिणी अमेरिका से मक्का, आलू, कसावा, कुमाला, तम्बाकू, गन्ने की चीनी, ककाओ, रबड़, लाल मिर्च आदि खाद्य वस्तुएँ बाकी दुनिया को भेजी जाती थीं।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 5.
गुलाम के रूप में पकड़ कर ब्राजील ले जाए गए सत्रह वर्षीय अफ्रीकी लड़के की यात्रा का वर्णन करें।
उत्तर:
गुलाम के रूप में पकड़ कर ब्राजील ले जाए गए सत्रह वर्षीय अफ्रीकी लड़के की यात्रा – ब्राजील पर पुर्तगालियों का अधिकार था। ब्राजील में इमारती लकड़ी बड़े पैमाने पर उपलब्ध थी। पुर्तगालियों ने स्थानीय लोगों को गुलाम बनाना शुरू कर दिया। 1540 के दशक में पुर्तगालियों ने बड़े – बड़े बागानों में गन्ना उगाना और चीनी बनाने के लिए मिलें चलाना शुरू कर दिया। यह चीनी यूरोप के बाजारों में बेची जाती थी।

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बहुत ही गर्म तथा नम जलवायु में चीनी मिलों में काम करने के लिए पुर्तगाली लोग स्थानीय लोगों पर निर्भर थे। परन्तु जब उन लोगों ने इस थकाने वाले नीरस काम को करने से इनकार कर दिया तो मिल मालिकों ने उनका अपहरण करवाकर उन्हें गुलाम बनाना शुरू कर दिया। इस पर स्थानीय लोग इन गुलाम बनाने वाले मिल मालिकों से बचने के लिए जंगलों में भागने लगे। विवश होकर मिल मालिकों ने अफ्रीका से गुलाम प्राप्त करने का निश्चय किया। अतः अंगोला से एक 17 वर्षीय अफ्रीकी को गुलाम के रूप में पकड़ कर ब्राजील लाया गया।

इस सत्रह वर्षीय लड़के की ब्राजील – यात्रा बड़ी कष्टदायक थी। उसे सैकड़ों अन्य गुलामों के साथ पकड़कर एक जहाज द्वारा ब्राजील लाया गया था। इस यात्रा में उसे किसी प्रकार की सुविधा नहीं दी गई थी। उसे पशुओं की भाँति जहाज में ठूंस कर लाया गया। उसकी गतिविधियों पर कठोर नजर रखी जाती थी।

उसे बेड़ियों में जकड़ कर रखा जाता था ताकि वह भागने का प्रयास न करे। उसे भर पेट भोजन नहीं दिया जाता था। उससे जहाज पर कठोर परिश्रम करवाया जाता था और साधारण-सी गलती करने पर उसे कोड़ों से पीटा जाता था। पुर्तगाली लोग बड़े क्रूर थे और वे गुलामों के साथ पशुओं जैसा व्यवहार करते थे। उससे बेगार ली जाती थी। उसे काम के बदले में कुछ भी पारिश्रमिक नहीं दिया जाता था। इस प्रकार उसके साथ कई दिनों तक अमानवीय व्यवहार किया गया और उसे अमानुषिक यातनाएँ सहनी पड़ीं।

प्रश्न 6.
दक्षिणी अमरीका की खोज ने यूरोपीय उपनिवेशवाद के विकास को कैसे जन्म दिया?
उत्तर:
यूरोपीय उपनिवेशवाद का विकास – दक्षिण अमरीका की खोज ने यूरोपीय देशों को वहाँ अपने उपनिवेश स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया। इस सन्दर्भ में स्पेन तथा पुर्तगाल को विशेष सफलताएँ मिलीं और उन्हें दक्षिण अमेरिका में अपने उपनिवेश स्थापित करने का अवसर मिल गया।

1. स्पेन के उपनिवेशवाद का विकास – कोलम्बस द्वारा अमेरिका की खोज के बाद स्पेन को दक्षिणी अमेरिका में अपने उपनिवेश स्थापित करने की प्रेरणा मिली। स्पेनवासी धन-लोलुप थे। वे दक्षिणी अमेरिकी से सोना-चाँदी प्राप्त कर अपने देश में लाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने दक्षिणी अमेरिका के विभिन्न प्रदेशों में जाकर बसना शुरू कर दिया। स्पेन के पास एक शक्तिशाली सेना थी। अतः उसने बारूद और घोड़ों के प्रयोग पर आधारित सैन्य शक्ति के बल पर दक्षिणी अमेरिका में अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया। उन्होंने स्थानीय लोगों को कर, भेंट देने तथा सोने-चाँदी की खानों में काम करने के लिए बाध्य किया।

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स्थानीय प्रधानों को नये-नये प्रदेश तथा सोने के नए-नए स्रोत खोजने के लिए भर्ती किया जाता था। जब स्थानीय लोगों ने प्रतिरोध किया, तो स्पेन के सैनिकों ने उनका कठोरतापूर्वक दमन किया। लम्बस के अभियानों के बाद आधी शताब्दी में ही स्पेनवासियों ने मध्यवर्ती तथा दक्षिणी अमेरिका में लगभग 40 डिग्री उत्तरी से 40 डिग्री दक्षिणी अक्षांश तक के समस्त क्षेत्र को खोज लिया और उस पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। मैक्सिको तथा इंका साम्राज्य पर अधिकार – स्पेन के निवासी कोर्टेस तथा उसके सैनिकों ने सरलता से मैक्सिको पर अधिकार कर लिया। 1519 में स्पेनी सैनिकों ने ट्लैक्सकलानों को पराजित कर टेनोक्ट्रिटलैन पर अधिकार कर लिया।

जब यहाँ के एजटेक लोगों ने स्पेन के साम्राज्यवाद का विरोध किया, तो स्पेन की सेना ने एजटेक लोगों के विद्रोह को कुचल दिया और अनेक विद्रोहियों को मौत के घाट उतार दिया। 1532 में स्पेन के निवासी पिजारों ने इंका – साम्राज्य पर अधिकार कर लिया। स्पेन के सैनिकों की दमनकारी नीति के विरुद्ध 1534 में इंका – साम्राज्य के लोगों ने विद्रोह कर दिया, जो दो वर्ष तक जारी रहा। इस अवधि में हजारों विद्रोही मारे गये। अगले पाँच वर्षों में स्पेनियों ने पोटोसी (ऊपरी पेरू) की खानों में चाँदी के विशाल भण्डारों का पता लगा लिया और उन खानों में काम करने के लिए उन्होंने इंका लोगों को गुलाम बना लिया।

2. पुर्तगाल के उपनिवेशवाद का विकास – पुर्तगाली कुशल नाविक तथा महत्त्वाकांक्षी लोग थे। दक्षिणी अमरीका की खोज के बाद पुर्तगालियों ने भी वहाँ अपने उपनिवेश स्थापित करने शुरू कर दिये। 1500 ई. में पुर्तगाल निवासी कैब्राल जहाजों का एक बेड़ा लेकर ब्राजील पहुँच गया। ब्राजील में इमारती लकड़ी बड़े पैमाने पर उपलब्ध थी। इमारती लकड़ी के इस व्यापार के कारण पुर्तगाली और फ्रांसीसी व्यापारियों के बीच भीषण लड़ाइयाँ हुईं।

अन्त में इनमें पुर्तगालियों की विजय हुईं क्योंकि वे स्वयं तटीय क्षेत्र में बसना तथा उपनिवेश स्थापित करना चाहते थे 1534 में पुर्तगाल के राजा ने ब्राजील के तट को 14 आनुवंशिक कप्तानों में बाँट दिया। उनके मालिकाना अधिकार उन पुर्तगालियों को दे दिये गये जो वहाँ स्थायी रूप से रहना चाहते थे। उन्हें स्थानीय लोगों को गुलाम बनाने का भी अधिकार दे दिया गया। 1540 के दशक में पुर्तगालियों ने बड़े-बड़े बागानों में गन्ने उगाना और चीनी बनाने के लिए मिलें चलाना शुरू कर दिया। 1549 में पुर्तगाली राजा के अधीन एक औपचारिक सरकार स्थापित की गई और बहिया ( सैल्वाडोर) को उसकी राजधानी बनाया गया।

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संस्कृतियों का टकराव JAC Class 11 History Notes

पाठ-सार

1. कैरीबियन द्वीप समूह और ब्राजील के जन-समुदाय – अरावाकी लुकायो समुदाय के लोग कैरीबियन सागर में स्थित छोटे-छोटे द्वीप समूहों और बृहत्तर ऐंटिलीज में रहते थे –
(i) अरावाक – अरावाक लोग शान्तिप्रिय थे तथा बातचीत से झगड़े निपटाना अधिक पसन्द करते थे। वे खेती, शिकार और मछली पकड़कर अपना जीवन-निर्वाह करते थे। उनमें बहुविवाह प्रथा प्रचलित थी। वे अपने वंश के बुजुर्गों के अधीन संगठित रहते थे। वे सोने को अधिक महत्त्व नहीं देते थे। वे बुनाई में निपुण थे। उनका व्यवहार उदारतापूर्ण होता था।

(ii) तुपिनांबा – तुपिनांबा लोग दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी समुद्री तट पर और ब्राजील नामक पेड़ों के जंगलों में बसे हुए गाँवों में रहते थे। वहाँ फल, सब्जियाँ तथा मछलियाँ बहुतायत में उपलब्ध थीं। इससे उन्हें खेती पर निर्भर नहीं होना पड़ा।

2. मध्य और दक्षिणी अमरीका की राज-व्यवस्थाएँ – मध्य और दक्षिणी अमरीका में एजटेक, माया तथा इंका जनसमुदाय निवास करते थे। यथा –
(i) एजटेकजन – बारहवीं शताब्दी में एजटेक लोग उत्तर से आकर मैक्सिको की मध्यवर्ती घाटी में बस गए थे। एजटेक समाज श्रेणीबद्ध था। अभिजात लोग अपने में से एक सर्वोच्च नेता चुनते थे जो आजीवन शासक बना रहता था। एजटेक लोगों ने मैक्सिको झील में कृत्रिम टापू बनाए। उनके द्वारा निर्मित राजमहल तथा पिरामिड बड़े सुन्दर थे। वे अपने बच्चों को स्कूलों में भेजते थे। कुलीन वर्ग के बच्चे सेना अधिकारी और धार्मिक नेता बनने के लिए प्रशिक्षण लेते थे।

(ii) माया लोग – मैक्सिको की माया संस्कृति की ग्यारहवीं शताब्दी से चौदहवीं शताब्दी के बीच महत्त्वपूर्ण उन्नति हुई। वहाँ मक्के की खेती खूब होती थी। उनके खेती करने के तरीके उन्नत थे। माया लोगों ने वास्तुकला, खगोल विज्ञान, गणित आदि में भी प्रगति की।

(iii) पेरू के इंका लोग – दक्षिणी अमेरिकी देशों की संस्कृतियों में सबसे बड़ी संस्कृति पेरू में क्वेचुआ या इंका लोगों की संस्कृति थी। इंका साम्राज्य इक्वेडोर से चिली तक 3000 मील में फैला हुआ था। राजा सर्वोच्च अधिकारी था। अनुमानतः इस साम्राज्य में 10 लाख से अधिक लोग रहते थे। इंका लोग उच्चकोटि के भवन निर्माता थे। उन्होंने पहाड़ों के बीच इक्वेडोर से लेकर चिली तक अनेक सड़कें नाई थीं। उनके किले शिलापट्टियों को बारीकी से तराश कर बनाये जाते थे । राजमिस्त्री खण्डों को सुन्दर रूप देने के लिए शल्क पद्धति (फ्लेकिंग) का प्रयोग करते थे। इंका सभ्यता का आधार कृषि था। उनकी बुनाई और मिट्टी के बर्तन बनाने की कला उच्चकोटि की थी।

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3. यूरोपवासियों की खोज यात्राएँ –
(i) स्पेन और पुर्तगाल के लोग खोज – यात्राओं में सबसे आगे थे। स्पेन और पुर्तगाल के शासक आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक कारणों से समुद्री यात्राओं के लिए प्रेरित हुए। ये देश सोने-चाँदी तथा मसालों की खोज में नए-नए प्रदेशों में जाने की योजना बनाने लगे। पुर्तगाल के राजकुमार हेनरी ने पश्चिमी अफ्रीका की तटीय यात्रा आयोजित की और 1415 में सिउय पर आक्रमण कर दिया। पुर्तगालियों ने अफ्रीका के बोजाडोर अन्तरीप में अपना व्यापार केन्द्र स्थापित कर लिया। अफ्रीकियों को बड़ी संख्या में गुलाम बना लिया गया।

(ii) स्पेन में आर्थिक कारणों ने लोगों को ‘महासागरीय शूरवीर’ बनने के लिए प्रोत्साहित किया। इकरारनामों के अन्तर्गत स्पेन का शासक नये विजित प्रदेशों पर अपनी प्रभुसत्ता स्थापित कर लेता था।

4. अटलांटिक पारगमन –
(i) 3 अगस्त, 1492 को कोलम्बस ने जहाजों और नाविकों के साथ पश्चिम की ओर प्रस्थान किया। अन्त में 12 अक्टूबर, 1492 को कोलम्बस बहामा द्वीप समूह पहुँच गया। अरावाक लोगों ने नाविकों का स्वागत किया। कोलम्बस ने इस स्थान का नाम सैन सैल्वाडोर रखा और अपने आपको वायसराय घोषित कर दिया। आगे चलकर ऐसी तीन यात्राएँ और आयोजित की गईं जिनके दौरान कोलम्बस ने बहामा और बृहत्तर ऐंटिलीज द्वीपों, दक्षिणी अमरीका की मुख्य भूमि और उसके तटवर्ती प्रदेशों में अपना खोज कार्य पूरा किया। बाद में पता चला कि इन स्पेनी नाविकों ने ‘इंडीज’ नहीं बल्कि एक नया महाद्वीप ही खोज निकाला।

(ii) कोलम्बस के द्वारा खोजे गए दो महाद्वीपों उत्तरी और दक्षिणी अमरीका का नामकरण फ्लोरेंन्स के एक भूगोलवेत्ता ‘अमेरिगो वेस्पुस्सी’ के नाम पर किया गया जिसने उन्हें ‘नई दुनिया’ की संज्ञा दी।

5. अमेरिका में स्पेन के साम्राज्य की स्थापना –
(i) अमेरिका में स्पेनी साम्राज्य का विस्तार बारूद और घोड़ों के प्रयोग पर आधारित सैन्य शक्ति के आधार पर हुआ । स्पेनी लोग वहाँ बस्ती बसाते थे तथा स्थानीय मजदूरों पर निगरानी रखते थे। सोने के लालच में स्पेनी लोग स्थानीय शान्तिप्रिय अरावाक लोगों पर अत्याचार करते थे। चेचक जैसी महामारी के कारण भी अरावाकों को बड़ी संख्या में मौत के मुँह में जाना पड़ा।

(ii) कोलम्बस के बाद स्पेनवासियों ने मध्यवर्ती और दक्षिणी अमरीका में खोज का कार्य जारी रखा। आधी शताब्दी में ही स्पेनवासियों ने लगभग 40 डिग्री उत्तरी से 40 डिग्री दक्षिणी अक्षांश तक के समस्त क्षेत्र को खोज निकाला और उस पर अधिकार कर लिया।

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(iii) स्पेन के दो व्यक्तियों हरमन कोर्टेस तथा फ्रांसिस्को पिजारो ने दो बड़े साम्राज्यों को जीत कर उन्हें स्पेन के अधीन किया। उनके अभियानों का ख़र्चा स्पेन के जमींदारों, नगर परिषदों के अधिकारियों और अभिजात वर्ग ने उठाया था।

6. कोर्टेस और एजटेक लोग –
(i) कोर्टेस और उसके सैनिकों ने बड़ी सरलता से मैक्सिको को जीत लिया। 1519 में कोर्टेस क्यूबा से मैक्सिको आया था जहाँ उसने टाटानैक लोगों से मैत्री कर ली। स्पेनी सैनिकों ने ट्लैक्सक्लानों को पराजित कर दिया और टेनोक्ट्रिटलैन नगर पर अधिकार कर लिया।

(ii) एजटेक के शासक मोंटेजुमा ने कोर्टेस का स्वागत किया और उसे बहुमूल्य उपहार दिए। परन्तु कोर्टेस ने सम्राट को नजरबन्द कर लिया और उसके नाम पर शासन चलाने लगा।

(iii) कोर्टेस के क्यूबा लौट जाने के बाद स्पेनी शासन के अत्याचारों के कारण सामान्य जनता ने विद्रोह कर दिया। इस पर कोर्टेस के सहायक ऐल्वारैडो ने कत्ले-आम का आदेश दे दिया। जब 25 जून, 1520 को कोर्टेस वापस लौटा तो उसे भीषण संकटों का सामना करना पड़ा और उसे विवश होकर वापस लौटना पड़ा।

(iv) इसी समय मोटेजुमा की मृत्यु हो गई। एजटेकों तथा स्पेनियों के बीच लड़ाई चलती रही। उस समय एजटेक लोग यूरोपीय लोगों के साथ आई चेचक के प्रकोप से मौत के मुँह में जा रहे थे। मेक्सिको पर विजय प्राप्त करने में दो वर्ष का समय लग गया। कोर्टेस मैक्सिको में न्यू स्पेन का कैप्टन जनरल बन गया। मैक्सिको में स्पेनियों ने ग्वातेमाला, निकारागुआ और होंडुरास पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लिया।

7. पिजारो और इंका लोग –
(i) पिजारो एक निर्धन और अनपढ़ व्यक्ति था। वह सेना में भर्ती होकर 1502 में कैरीबियन द्वीप-समूह में आया था। स्पेन के राजा ने पिजारो को यह वचन दिया था कि यदि वह इंका प्रदेश पर विजय प्राप्त कर लेगा, तो उसे वहाँ का राज्यपाल बना दिया जायेगा।

(ii) 1532 में अताहुआल्पा ने इंका साम्राज्य की बागडोर अपने हाथ में ले ली थी। पिजारो वहां पहुँच गया और धोखे से वहाँ के राजा को बन्दी बना लिया। राजा ने अपने आप को मुक्त कराने के लिए एक कमरा – भर सोना फिरौती में देने का प्रस्ताव किया, परन्तु पिजारो ने राजा का वध करवा दिया। पिजारो के सैनिकों ने वहाँ खूब लूट-मार की और इंका – साम्राज्य पर अधिकार कर लिया।

(iii) अगले पाँच वर्षों में स्पेन के लोगों ने पोटोसी, ऊपरी पेरू आदि की खानों में चाँदी के विशाल भण्डारों का पता लगा लिया और उन खानों में काम करने के लिए उन्होंने इंका लोगों को गुलाम बना लिया।

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8. कैब्राल और ब्राजील –
(i) 1500 ई. में पुर्तगाल निवासी पेड्रो अल्वारिस कैब्राल जहाज लेकर भारत के लिए रवाना हुआ, परन्तु वह ब्राजील पहुँच गया। ब्राजील इमारती लकड़ी के लिए प्रसिद्ध था। इमारती लकड़ी के व्यापार के कारण पुर्तगाली और फ्रांसीसी व्यापारियों में भयंकर लड़ाइयाँ हुईं। इनमें अन्ततः पुर्तगालियों की विजय हुई 1534 में पुर्तगाल के राजा ने ब्राजील के तट को 14 आनुवंशिक कप्तानियों में बाँट दिया। उन्हें स्थानीय लोगों को गुलाम बनाने का अधिकार भी दे दिया।

(ii) 1540 में पुर्तगालियों ने बड़े-बड़े बागानों में गन्ना उगाना और चीनी बनाने के लिए मिलें चलाना शुरू कर दिया। मिल मालिकों ने स्थानीय लोगों को गुलाम बनाना शुरू कर दिया। इस पर स्थानीय लोग गाँव छोड़ कर जंगलों की ओर भागने
लगे।

(iii) 1549 में पुर्तगाली राजा के अधीन एक औपचारिक सरकार स्थापित की गई। इस समय तक जेसुइट पादरी ब्राजील पहुँचने लगे। यूरोपीय लोग इन जेसुइट पादरियों को पसन्द नहीं करते थे क्योंकि वे मूल निवासियों के साथ दया का बर्ताव करने की सलाह देते थे। वे दास प्रथा की कटु आलोचना करते थे।

9. विजय, उपनिवेश और दास व्यापार – अमरीका की खोज के अनेक दीर्घकालीन परिणाम निकले –
(i) सोने-चाँदी की बाढ़ ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार और औद्योगीकरण का और अधिक विस्तार किया। 1560 से 1600 तक सैकड़ों जहाज हर वर्ष दक्षिणी अमेरिका की खानों से चाँदी स्पेन को लाते रहे।

(ii) इंग्लैण्ड, फ्रांस, बेल्जियम, हालैण्ड आदि देशों के व्यापारियों ने बड़ी-बड़ी संयुक्त पूँजी कम्पनियाँ बनाईं। अपने बड़े-बड़े व्यापारिक अभियान चलाए और उपनिवेश स्थापित किये।

(iii) यूरोपवासी नई दुनिया में पैदा होने वाली नई-नई चीजों, जैसे- आलू, तम्बाकू, गन्ने की चीनी, रबड़ आदि से परिचित हुए।

(iv) मार-काट के कारण उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका के मूल निवासियों की जनसंख्या कम हो गई, उनकी जीवन-शैली नष्ट हो गई और उन्हें गुलाम बनाकर खानों, बागानों, कारखानों में उनसे काम लिया जाने लगा।

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(v) अब नई-नई आर्थिक गतिविधियाँ शुरू हो गईं। सोने की खोज के बाद खानों का काम जोरों से चल पड़ा। अफ्रीका से गुलाम बड़ी संख्या में मँगाए गए। 1550 के दशक से 1880 के दशक तक ब्राजील में 36 लाख से भी अधिक अफ्रीकी गुलामों का आयात किया गया। परन्तु यह अमरीकी महाद्वीपों में आयातित अफ्रीकी गुलामों की संख्या का लगभग आधा था।

तिथियूरोपवासियों द्वारा समुद्री यात्राएँ –
1492कोलम्बस ने बहामा द्वीप – समूह और क्यूबा पर स्पेन की दावेदारी की।
1494‘अनखोजी दुनिया’ का पुर्तगाल और स्पेन के बीच बँटवारा हुआ।
1497एक अंग्रेजी यात्री जॉन कैबोट ने उत्तरी अमरीका के समुद्रतट की खोज की।
1498वास्कोडिगामा कालीकट / कोझीकोड पहुँचा।
1499अमेरिगो वेस्पुसी ने दक्षिणी अमरीका के समुद्र तट को देखा।
1500कैब्राल ने ब्राजील पर पुर्तगाल की दावेदारी की।
1513बालबोआ ने पनामा इस्थमस को पार किया और प्रशान्त महासागर को देखा।
1521कोर्टेस ने ऐजटक लोगों को पराजित किया।
1522स्पेनवासी मैगलन ने जहाज में बैठकर पृथ्वी का चक्कर लगाया।
1532पिजारो ने इंका राज्य को जीता।
1571स्पेन के सैनिकों ने फिलिपीन्स को जीता।
1600ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना हुई।
1602डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना हुई।

JAC Class 11 History Solutions Chapter 6 तीन वर्ग

Jharkhand Board JAC Class 11 History Solutions Chapter 6 तीन वर्ग Textbook Exercise Questions and Answers.

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Jharkhand Board Class 11 History तीन वर्ग In-text Questions and Answers

पृष्ठ 137 क्रियाकलाप 1:

प्रश्न 1.
विभिन्न मानकों; जैसे व्यवसाय, भाषा, धन और शिक्षा पर आधारित श्रेणीबद्ध सामाजिक ढाँचे की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
मध्यकालीन फ्रांस का समाज मुख्य रूप से तीन वर्गों में विभाजित था –
(1) पादरी वर्ग
(2) अभिजात वर्ग तथा
(3) कृषक वर्ग।

1. पादरी वर्ग – यूरोप में ईसाई समाज का मार्गदर्शन बिशपों तथा पादरियों द्वारा किया जाता था। ये प्रथम वर्ग के अंग थे। बिशपों के पास भी विस्तृत जागीरें थीं और वे शानदार महलों में रहते थे। कुछ धार्मिक व्यक्ति मठों में रहते थे। ये भिक्षु कहलाते थे। ये लोग अपना समय प्रार्थना करने, अध्ययन करने आदि में व्यतीत करते थे। स्त्री और पुरुष दोनों ही भिक्षु का जीवन अपना सकते थे। पादरियों, भिक्षुओं तथा भिक्षुणियों के लिए विवाह करना वर्जित था। मठों के साथ स्कूल या कॉलेज और अस्पताल सम्बद्ध थे।

2. अभिजात वर्ग-अभिजात वर्ग दूसरे वर्ग में रखा गया था। बड़े-बड़े भू-स्वामी तथा अभिजात वर्ग राजा के अधीन होते थे। अभिजात वर्ग की एक विशेष हैसियत थी। उनका अपनी सम्पदा पर स्थायी तौर पर पूर्ण नियन्त्रण था। वे अपनी सेना रखते थे, अपना स्वयं का न्यायालय लगा सकते थे और अपनी मुद्रा भी प्रचलित कर सकते थे।

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वे अपनी भूमि पर बसे सभी लोगों के मालिक थे। उनका घर ‘मेनर’ कहलाता था। उनकी व्यक्तिगत भूमि कृषकों द्वारा जोती जाती थी। उसका अपना मेनर, भवन होता था। वह गाँवों पर नियन्त्रण रखता था। प्रतिदिन के उपभोग की प्रत्येक वस्तु जागीर पर मिलती थी। नाइट (कुशल घुड़सवार) लार्ड से सम्बद्ध थे। लार्ड नाइट को भूमि का एक भाग देता था जिसे फीफ कहा जाता था। बदले में नाइट अपने लार्ड को एक निश्चित रकम देता था तथा युद्ध में उसकी ओर से लड़ने का वचन देता था।

3. कृषक वर्ग – कृषक वर्ग को तीसरे वर्ग में रखा गया। कृषक दो प्रकार के होते थे –
(1) स्वतन्त्र कृषक
(2) कृषि – दास (सर्फ )।

स्वतन्त्र कृषक अपनी भूमि को लार्ड के काश्तकार के रूप में देखते थे। पुरुष कृषक सैनिक सेवा में योगदान देते थे। कृषक परिवारों को लार्ड की जागीर पर जाकर काम करना पड़ता था। उन्हें बेगार भी देनी पड़ती थी। कृषि दासों को उन भूखण्डों पर भी खेती करनी पड़ती थी जो केवल लार्ड के स्वामित्व में थी, इसके लिए उन्हें कोई मजदूरी नहीं मिलती थी।

4. चौथा वर्ग – नगरवासी – कालान्तर में नगरों का विकास हुआ। नगरों में रहने वाले लोग या तो स्वतन्त्र कृषक या भगोड़े कृषि – दास थे, जो कार्य की दृष्टि से अकुशल श्रमिक होते थे। बाद में साहूकारों और वकीलों का प्रादुर्भाव हुआ। इस प्रकार नगरों में रहने वाले लोगों ने चौथा वर्ग बना लिया था नगरों में रहने वाले मध्यम वर्ग के लोग भी थे जिनमें व्यापारी, व्यवसायी, शिल्पकार, लेखक, विद्वान आदि थे। यद्यपि इनके पास पर्याप्त धन था, परन्तु अभिजात वर्ग की तुलना में इन्हें कम महत्त्व दिया जाता था। व्यवसायियों की अनेक श्रेणियाँ बनी हुई थीं।

प्रश्न 2.
मध्यकालीन फ्रांस की तुलना मेसोपोटामिया तथा रोमन साम्राज्य से करें।
उत्तर:
1. मध्यकालीन फ्रांस की मेसोपोटामिया से तुलना – मेसोपोटामिया का समाज तीन वर्गों में विभाजित –
(1) उच्च वर्ग
(2) मध्यम वर्ग
(3) निम्न वर्ग।

उच्च वर्ग में राजा उसका परिवार, सामन्त, पुरोहित, उच्च पदाधिकारी आदि सम्मिलित थे। अधिकांश धन-दौलत पर इसी वर्ग का अधिकार था । मध्यम वर्ग में व्यापारी, कारीगर, बुद्धिजीवी तथा स्वतन्त्र किसान थे। निम्न वर्ग में अर्द्ध स्वतन्त्र किसान तथा दास लोग सम्मिलित थे। इस वर्ग के लोगों को किसी प्रकार के अधिकार प्राप्त नहीं थे । मध्यकालीन फ्रांस में भी समाज तीन वर्गों में विभाजित था।

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ये तीन वर्ग थे –
(1) पादरी वर्ग
(2) अभिजात वर्ग
(3) कृषक वर्ग। समाज में पादरी वर्ग तथा अभिजात वर्ग का बोलबाला था। इस वर्ग के लोग विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। ये लोग कृषकों का शोषण करते थे । कृषक वर्ग की दशा शोचनीय थी।

2. मध्यकालीन फ्रांस की रोमन साम्राज्य से तुलना – पूर्ववर्ती काल में रोमन समाज अनेक वर्गों में बँटा हुआ था। ये वर्ग थे –
(1) सैनेटर
(2) अश्वारोही या नाइट वर्ग
(3) सम्माननीय जनता का वर्ग
(4) फूहड़ निम्नतर वर्ग।

परवर्तीकाल में रोमन समाज निम्नलिखित वर्गों में विभाजित था –
(1) अभिजात वर्ग – इस काल में सैनेटर तथा नाइट एकीकृत होकर अभिजात वर्ग बन चुके थे।
(2) मध्य वर्ग – इस वर्ग में सेना तथा नौकरशाही से सम्बन्धित लोग थे। इसमें धनी सौदागर तथा किसान भी शामिल थे।
(3) निम्न वर्ग – इस वर्ग में ग्रामीण श्रमिक, कामगार, शिल्पकार, दास आदि शामिल थे।

दूसरी ओर मध्यकालीन फ्रांस में समाज तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित था –
(1) पादरी वर्ग
(2) अभिजात वर्ग तथा
(3) कृषक वर्ग। कालान्तर में वहाँ नगरों में रहने वाले एक चौथे वर्ग का भी प्रादुर्भाव हुआ।

पृष्ठ 138

क्रियाकलाप 2: मध्यकालीन मेनर, महल और पूजा के स्थान पर विभिन्न सामाजिक स्तर के व्यक्तियों से अपेक्षित व्यवहार के तरीकों की उदाहरण देते हुए चर्चा कीजिए।
उत्तर:
1. मध्यकालीन मेनर के व्यक्तियों से अपेक्षित व्यवहार – अभिजात वर्ग का घर मेनर कहलाता था। लार्ड का अपना मेनर – भवन होता था। वह गाँवों पर नियन्त्रण रखता था। कुछ लार्ड अनेक गाँवों के मालिक थे। स्त्रियाँ वस्त्र कातती तथा बुनती थीं और बच्चे लार्ड की मदिरा – सम्पीडक में कार्य करते थे । लार्ड जंगलों में जाकर शिकार करते थे। एक नए वर्ग का उदय हुआ जो ‘नाइट्स’ कहलाते थे। वे लार्ड से सम्बद्ध थे। लार्ड नाइट को भूमि का एक भाग (फीफ) देते थे और उसकी रक्षा का वचन देते थे।

सामन्ती मेनर की तरह फीफ की भूमि को कृषक जोतते थे। बदले नाइट अपने लार्ड को एक निश्चित रकम देता था और युद्ध में उसकी ओर से लड़ने का वचन देता था । अभिजात वर्ग की व्यक्तिगत भूमि कृषकों द्वारा जोती जाती थी जिनको आवश्यकता पड़ने पर युद्ध के समय पैदल सैनिकों के रूप में कार्य करना पड़ता था और साथ ही साथ अपने खेतों पर भी काम करना पड़ता था।

2. मध्यकालीन महल के व्यक्तियों से अपेक्षित व्यवहार – अभिजात वर्ग की एक विशेष हैसियत थी। उनके पास एक शक्तिशाली सेना होती थी। वे अपना स्वयं का न्यायालय लगा सकते थे और यहाँ तक कि अपने सिक्के भी चला सकते थे। वे अपनी भूमि पर बसे सभी लोगों के स्वामी थे। वे विस्तृत क्षेत्रों के मालिक थे जिनमें उनके शानदार महल, निजी खेत, जोत व चरागाह और उनके असामी- कृषकों के घर और खेत होते थे।

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उनका घर ‘मेनर’ कहलाता था। उनकी व्यक्तिगत …भूमि कृषकों द्वारा जोती जाती थी। वे आवश्यकता पड़ने पर युद्ध के समय पैदल सैनिकों के रूप में भी कार्य करते थे। वे शानदार महलों में निवास करते थे। इन महलों में सभी प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त थीं तथा अभिजात वर्ग के लोग ऐश्वर्यपूर्ण न व्यतीत करते थे। उनकी सेवा के लिए सैकड़ों नौकर-चाकर होते थे1

3. मध्यकालीन पूजा के स्थान पर व्यक्तियों से अपेक्षित व्यवहार – यूरोप में पूजा-स्थल के रूप में चर्च होता था। यूरोप में ईसाई समाज का मार्गदर्शन बिशपों तथा पादरियों द्वारा किया जाता था। चर्च में प्रत्येक रविवार को लोग पादरियों के धर्मोपदेश सुनने तथा सामूहिक प्रार्थना करने के लिए एकत्रित होते थे। पुरुष पादरी विवाह नहीं कर सकते थे।

स्त्रियों, दास- कृषक और विकलांगों के पादरी बनने पर प्रतिबन्ध था। बिशपों के पास भी लार्ड की तरह बड़ी-बड़ी जागीरें होती थीं और वे शानदार महलों में रहते थे। कृषक अपनी उपज का दसवाँ भाग चर्च को देते थे, जिसे ‘टीथ’ कहते थे। लोग चर्च में प्रार्थना करते समय हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर घुटनों के बल झुकते थे। नाइट भी अपने वरिष्ठ लार्ड के प्रति स्वामि भक्ति की शपथ लेते समय यही तरीका अपनाते थे।

पृष्ठ 149.

क्रियाकलाप 4 : तिथियों के साथ दी गई घटनाओं और प्रक्रियाओं को पढ़िए और उनका विवरणात्मक लेखा-जोखा दीजिए।
उत्तर:
1. तिथि 1066-1066 ई. में नारमैंडी के ड्यूक विलियम ने एक सेना लेकर इंग्लिश चैनल को पार किया और इंग्लैण्ड के सैक्सन राजा को पराजित कर दिया। विलियम ने भूमि नपवाई, उसके नक्शे बनवाये तथा उसे अपने साथ आए 180 नारमन अभिजातों में बाँट दिया।

2. 1100 के पश्चात् – धनी व्यापारी चर्च को दान देते थे। 1100 के पश्चात् फ्रांस में कथीड्रल कहलाने वाले चर्चों का निर्माण होने लगा। यद्यपि वे मठों की सम्पत्ति थे, परन्तु लोगों के विभिन्न समूहों ने अपने श्रम, वस्तुओं और धन से कथीड्रलों के निर्माण में सहयोग दिया।

3. 1315-1317 – चौदहवीं शताब्दी में यूरोप को अनेक संकटों का सामना करना पड़ा। 1315 और 1317 के बीच यूरोप में भयंकर अकाल पड़े। इसके बाद 1320 के दशक में अनगिनत पशुओं की मौतें हुईं।

4. 1347-1350 – पश्चिमी यूरोप 1347-1350 के मध्य महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुआ। यूरोप की आबादी का लगभग 20 प्रतिशत भाग मौत के मुँह में चला गया जबकि कुछ स्थानों पर मरने वालों की संख्या वहाँ की जनसंख्या का 40% तक थी।

5. 1338-1461-1338 से 1461 की अवधि में इंग्लैण्ड तथा फ्रांस के बीच युद्ध हुआ जो ‘सौ वर्षीय युद्ध’ कहलाता है।

6. 1381 – मजदूरों की दरें बढ़ने तथा कृषि सम्बन्धी मूल्यों में कमी के कारण अभिजात वर्ग की आमदनी घट गई। इसके परिणामस्वरूप उन्होंने पुराने धन सम्बन्धी अनुबन्धों को तोड़ दिया। इसका कृषकों विशेषकर शिक्षित तथा धनी कृषकों द्वारा हिंसक विरोध किया गया। परिणामस्वरूप 1381 में ब्रिटेन में कृषकों ने विद्रोह कर दिया।

JAC Class 11 History Solutions Chapter 6 तीन वर्ग

Jharkhand Board Class 11 History तीन वर्ग Text Book Questions and Answers

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
फ्रांस के प्रारम्भिक सामन्ती समाज के दो लक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
फ्रांस के प्रारम्भिक सामन्ती समाज के लक्षण-फ्रांस के प्रारम्भिक सामन्ती समाज के दो प्रमुख लक्षण निम्नलिखित थे-
(1) फ्रांस में सामन्तवाद सामन्त और कृषकों के सम्बन्धों पर आधारित था। कृषक अपने खेतों के साथ-साथ लार्ड के खेतों पर कार्य करते थे। कृषक लार्ड को श्रम सेवा देते थे तथा बदले में लार्ड उन्हें सैनिक सुरक्षा प्रदान करते थे। लार्ड के कृषकों पर न्यायिक अधिकार भी थे।

(2) फ्रांस का प्रारंभिक सामन्ती समाज तीन वर्गों में विभाजित था। प्रथम वर्ग पादरी था; द्वितीय वर्ग अभिजात वर्ग था और तृतीय वर्ग कृषक वर्ग था। पादरी वर्ग कैथोलिक चर्च से जुड़ा था। यह राजा पर निर्भर संस्था नहीं थी। अभिजात वर्ग राजा से जुड़ा था तथा धनी और भू-स्वामी था। तीसरा वर्ग किसान भूस्वामी वर्ग के अधीन था तथा इसी दशा दयनीय थी।

प्रश्न 2.
जनसंख्या के स्तर में होने वाले लम्बी अवधि के परिवर्तनों ने किस प्रकार यूरोप की अर्थव्यवस्था और समाज को प्रभावित किया?
उत्तर:
जनसंख्या के स्तर में होने वाले परिवर्तनों का प्रभाव – जनसंख्या के स्तर में होने वाले परिवर्तनों के यूरोप की अर्थव्यवस्था और समाज पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े-

(1) कृषि के विस्तार के परिणामस्वरूप यूरोप में जनसंख्या में भी वृद्धि हुई। यूरोप की जनसंख्या जो 1000 में लगभग 420 लाख थी, वह बढ़कर 1200 में लगभग 620 लाख और 1300 में 730 लाख हो गई। पौष्टिक आहार मिलने के कारण व्यक्ति की जीवन-अवधि लम्बी हो गई। तेरहवीं सदी तक एक औसत यूरोपीय व्यक्ति आठवीं सदी की तुलना में दस वर्ष अधिक जी सकता था। पुरुषों की तुलना में स्त्रियों और बालिकाओं की जीवन-अवधि छोटी होती थी, क्योंकि पुरुष बेहतर भोजन करते थे।

(2) जनसंख्या में वृद्धि होने से नगरों का विकास हुआ, परन्तु 14वीं शताब्दी में इस स्थिति में परिवर्तन आया। पिछले 300 वर्षों की तीव्र ग्रीष्म ऋतु का स्थान तीव्र ठण्डी ग्रीष्म ऋतु ने ले लिया। उत्तरी यूरोप में तेरहवीं सदी के अन्त तक उपज वाले मौसम छोटे हो गए, चरागाहों की कमी हो गई तथा पशुओं की संख्या में कमी आ गई। जनसंख्या वृद्धि इतनी तेजी से हुई कि उपलब्ध संसाधन कम हो गए, जिसके परिणामस्वरूप भीषण अकाल पड़े। 1315 और 1317 के बीच यूरोप में भयंकर अकाल पड़े। 1347 और 1350 के बीच यूरोप में महामारी का प्रकोप हुआ जिससे यूरोप की जनसंख्या का लगभग 20% भाग मौत के मुँह में चला गया। यूरोप की जनसंख्या 1300 में 730 लाख से घटकर 1400 में 450 लाख रह गई।

इस विनाशलीला के अतिरिक्त आर्थिक मन्दी से व्यापक सामाजिक विस्थापन हुआ। जनसंख्या में कमी होने के कारण मजदूरों की संख्या में बहुत कमी आई। कृषि उत्पादों के मूल्यों में भी कमी आई। महामारी के बाद इंग्लैण्ड में मजदूरों विशेषकर कृषि मजदूरों की भारी माँग के कारण मजदूरी की दरों में 250 प्रतिशत तक की वृद्धि हो गई। आमदनी घटने से अभिजात वर्ग ने धन सम्बन्धी अनुबन्धों को तोड़ दिया। इसका कृषकों विशेषकर पढ़े-लिखे और समृद्ध कृषकों द्वारा हिंसक विरोध किया गया।

प्रश्न 3.
नाइट एक अलग वर्ग क्यों बने और उनका पतन कब हुआ?
उत्तर:
नाइट- नौवीं शताब्दी से यूरोप में स्थानीय युद्ध प्रायः होते रहते थे। शौकिया कृषक- सैनिक पर्याप्त नहीं थे। अतः इन युद्धों के लिए कुशल घुड़सवारों की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक नये वर्ग का उदय हुआ, जो ‘नाइट्स’ कहलाते थे। वे लार्ड से इसी प्रकार सम्बद्ध थे, जिस प्रकार लार्ड राजा से सम्बद्ध थे। लार्ड ने नाइट को भूमि का एक भाग दिया, जिसे ‘फीफ’ कहा जाता था और उसकी रक्षा करने का वचन दिया।

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फीफ 1000-2000 एकड़ या उसके अधिक में फैली हुई हो सकती थी तथा इसे उत्तराधिकार में प्राप्त किया जा सकता था। फीफ में नाइट और उसके परिवार के लिए एक पन-चक्की, मदिरा संपीडक, घर, चर्च आदि थे। दूसरी ओर नाइट अपने लार्ड को एक निश्चित रकम देता था और युद्ध में उसकी ओर से लड़ने का वचन देता था। नाइट्स अपनी वीरता तथा युद्ध-कौशल के लिए प्रसिद्ध थे। बारहवीं शताब्दी में नाइट वर्ग का पतन हो गया। बारहवीं सदी से गायक फ्रांस के मेनरों में पराक्रमी राजाओं तथा नाइट्स की वीरता की कहानियाँ, गीतों के रूप में सुनाते हुए घूमते रहते थे, जो अंशत: ऐतिहासिक एवं अंशतः काल्पनिक होती थीं। अब नाइट्स साहित्यिक रचनाओं के रूप में ही सीमित रह गए थे।

प्रश्न 4.
मध्यकालीन मठों का क्या कार्य था ?
उत्तर:
मध्यकालीन मठों का कार्य – मध्यकालीन मठों में भिक्षु रहा करते थे। वे प्रार्थना करते, अध्ययन करते तथा कृषि-कार्य भी करते थे। पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग मठ थे। भिक्षु का जीवन पुरुष और स्त्रियाँ दोनों ही अपना सकते थे। ऐसे पुरुषों को ‘मौंक’ तथा स्त्रियों को ‘नन’ कहते थे। भिक्षु एवं भिक्षुणियाँ विवाह नहीं कर सकती थीं। मठों में रहने वाले भिक्षु ईसाई धर्म के ग्रन्थों का अध्ययन करते थे तथा ईसाई धर्म का प्रचार करते थे।

कुछ मठ सैकड़ों लोगों के समुदाय बन गए जिससे स्कूल या कॉलेज और अस्पताल सम्बद्ध थे। इन मठों ने कला के विकास में भी योगदान दिया। आबेस हिल्डेगार्ड एक कुशल संगीतज्ञ था जिसने चर्च की प्रार्थनाओं में सामुदायिक गायन की प्रथा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। चौदहवीं शताब्दी तक आते-आते मठवाद के महत्त्व और उद्देश्य के बारे में कुछ शंकाएँ उत्पन्न हो गईं।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 5.
मध्यकालीन फ्रांस के नगर में एक शिल्पकार के एक दिन के जीवन की कल्पना कीजिए और इसका वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मध्यकालीन फ्रांस के नगर में एक शिल्पकार के एक दिन के जीवन की कल्पना – मध्यकालीन फ्रांस के नगरों में दुकानदारों, व्यापारियों के साथ-साथ शिल्पकार भी रहते थे। इन शिल्पकारों में लुहार, बढ़ई, मिस्त्री, पत्थर पर डिजाइन बनाने वाले, जुलाहा, अस्त्र-शस्त्र और शराब बनाने वाले शिल्पकार उल्लेखनीय थे। उनकी दिनचर्या काफी व्यस्त रहती थी।

हम पत्थर पर काम करने वाले शिल्पकार के एक दिन के जीवन की कल्पना करते हुए इसका वर्णन करते हैं –
(1) सबसे पहले वह शिल्पकार उस पत्थर को अपने सामने लाता है और उसे उचित ढंग से रखता है।

(2) इसके बाद वह अपने औजारों के बक्से से हथौड़े और छेनी निकालता है। उन्हें काम करने हेतु तैयार करता है। ठीक प्रकार से काम करने योग्य हो जाने पर वह पत्थर पर कार्य हेतु तैयार हो जाता है।

(3) पत्थर पर वह चॉक से डिजायन बनाता है। फिर अपने कार्य में जुट जाता है। वह हथौड़े से छेनी को कभी तेज व कभी धीमी मारता है और पत्थर से कभी बड़ा टुकड़ा और कभी छोटा टुकड़ा निकलता है।

(4) बीच-बीच में म नोरंजन हेतु गाना गुनगुनाता है। वह दोपहर के समय काम बंद कर खाने के लिए चला जाता है और खाना खाने के बाद थोड़ा विश्राम कर पुन: उसी कार्य में जुट जाता है।

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(5) शाम तक वह पत्थर के एक छोटे से भाग पर सुन्दर डिजायन का रूप दे देता है।

(6) इस प्रकार वह दिन भर अपने काम को मनोयोग से करता है। वह दिन भर परिश्रम करता रहता है और शाम को काम बंद कर अपने सामान – पत्थर व औजारों को उचित स्थान पर रखकर प्रसन्न मन से घर को चला जाता है। इस प्रकार उसकी दिनचर्या पूर्णतः व्यस्त रहती है।

प्रश्न 6.
फ्रांस के सर्फ और रोम के दास के जीवन की दशा की तुलना कीजिए।
उत्तर:
1. रोम के दास – रोम में बड़ी संख्या में दास रहते थे। दास सबसे निम्न वर्ग में सम्मिलित थे। उन्हें सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे । यद्यपि उच्च वर्ग के लोग दासों के प्रति प्राय: क्रूरतापूर्ण व्यवहार करते थे, परन्तु साधारण लोग उनके साथ सहानुभूतिपूर्ण बर्ताव करते थे। दासों को कठोर परिश्रम करना पड़ता था। समूहों में काम करने वाले दासों को प्रायः पैरों में जंजीर डालकर एक-साथ रखा जाता था। दासों के बच्चे भी दास ही कहलाते थे। रोम में दासों को अधिकतर घरेलू कार्यों में लगाया जाता था। उन्हें दिन भर कठोर परिश्रम करना पड़ता था और उन्हें भरपेट भोजन भी प्राप्त नहीं होता था। उन्हें कारखानों, खेतों, जलपोतों आदि पर कार्य पर लगाया जा सकता था। उन्हें मनोरंजन के लिए हिंसक जंगली जानवरों से भी लड़ाया जाता था। रोम में दासों का क्रय-विक्रय भी किया जाता था।

2. फ्रांस के सर्फ-फ्रांस में सर्फ (कृषि – दास) बहुत बड़ी संख्या में थे। ये निम्न वर्ग के अन्तर्गत सम्मिलित थे। अपने जीवन-निर्वाह के लिए जिन भूखण्डों पर कृषि करते थे, वे लार्ड के स्वामित्व में थे। इसलिए उनकी अधिकतर उपज भी लार्ड को ही मिलती थीं। सर्फ उन भूखण्डों पर भी कृषि करते थे, जो केवल लार्ड के स्वामित्व में थी। इसके लिए उन्हें कोई मजदूरी नहीं मिलती थी। सर्फ लार्ड की आज्ञा के बिना जागीर नहीं छोड़ सकते थे। सर्फ केवल अपने लार्ड की चक्की में ही आटा पीस सकते थे, उनके तन्दूर में ही रोटी सेंक सकते थे तथा उनकी मदिरा सम्पीडक में ही शराब और बीयर तैयार कर सकते थे। लार्ड को कृषि – दासों के विवाह तय करने का भी अधिकार था।

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दोनों की जीवन-दशाओं में अन्तर –
(1) फ्रांस में सर्फ लोगों को अधिकतर लार्ड के खेतों पर ही काम करना पड़ता था। उन्हें बेगार भी करनी पड़ती थी। परन्तु उन्हें कारखानों, जलपोतों आदि पर काम नहीं करना पड़ता था और न ही उन्हें हिंसक जानवरों से लड़ाया जाता था। जबकि सर्पों को केवल कृषि, पशुपालन आदि कार्य ही करने पड़ते थे। चौदहवीं शताब्दी तक आते-आते मठवाद के महत्त्व और उद्देश्य के बारे में कुछ शंकाएँ उत्पन्न हो गईं।
(2) रोम में दासों का क्रय-विक्रय किया जाता था, वहाँ फ्रांस में सर्फ (कृषि-दासों) के क्रय-विक्रय करने की कोई व्यवस्था नहीं थी।
(3) कृषि-दास लार्ड के स्वामित्व वाले भूखण्डों पर कृषि करते थे तथा लार्ड की उपज में से कृषिदासों को कुछ हिस्सा मिलता था, परन्तु रोमन साम्राज्य में ऐसी व्यवस्था नहीं थी।

तीन वर्ग JAC Class 11 History Notes

पाठ-सार

1. तीन वर्ग – नौवीं से 16वीं सदी के मध्य पश्चिमी यूरोप में होने वाले सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक परिवर्तनों में तीन सामाजिक श्रेणियों (वर्गों) –

  • ईसाई पादरी
  • भूमिधारक अभिजात वर्ग और
  • कृषक वर्ग- के बीच बदलते सम्बन्ध इतिहास को गढने वाले प्रमुख कारक थे।

2. सामन्तवाद-सामन्तवाद जर्मन शब्द ‘फ्यूड’ से बना है जिसका अर्थ ‘एक भूमि का टुकड़ा’ है और यह एक ऐसे समाज की ओर संकेत करता है जो मध्य फ्रांस और बाद में इंग्लैण्ड तथा दक्षिणी इटली में भी विकसित हुआ। आर्थिक सन्दर्भ में सामन्तवाद कृषि उत्पादन को इंगित करता है जो सामन्त और कृषकों के सम्बन्धों पर आधारित है। सामन्तवाद की उत्पत्ति यूरोप के अनेक भागों में 11वीं सदी के उत्तरार्द्ध में हई।

3. फ्रांस – गॉल रोमन साम्राज्य का एक प्रान्त था। जर्मनी की एक जनजाति फ्रैंक ने गॉल को अपना नाम देकर उसे फ्रांस बना दिया। छठी सदी से यह ईसाई राजाओं द्वारा शासित राज्य था। फ्रांसीसियों के चर्च के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध थे।

4. इंग्लैण्ड – एक संकरे जल मार्ग के पार स्थित इंग्लैण्ड – स्काटलैण्ड द्वीपों को ग्यारहवीं शताब्दी में फ्रांस के एक प्रान्त नारमंडी के राजकुमार द्वारा जीत लिया गया।

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5. द्वितीय वर्ग – अभिजात वर्ग-सामाजिक प्रक्रिया में अभिजात वर्ग की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। अभिजात वर्ग राजा के अधीन होते थे जबकि कृषक अभिजात वर्ग (भू-स्वामियों) के अधीन होते थे। इस वर्ग की एक विशेष हैसियत थी। उनका अपनी सम्पदा पर स्थायी तौर पर पूर्ण नियन्त्रण था। वे अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा सकते थे । वे अपना स्वयं का न्यायालय लगा सकते थे। वे अपनी भूमि पर बसे सभी लोगों के स्वामी थे। वे विस्तृत क्षेत्रों के स्वामी थे जिसमें उनके घर, उनके निजी खेत जोत व चरागाह और उनके असामी- कृषकों के घर और खेत होते थे। उनका घर ‘मेनर’ कहलाता था।

6. मेनर की जागीर – लार्ड का अपना मेनर – भवन होता था। वह गाँवों पर नियन्त्रण रखता था। किसी छोटे मेनर की जागीर में दर्जन भर और बड़ी जागीर में 50 या 60 परिवार होते थे। प्रतिदिन के उपभोग की प्रत्येक वस्तु जागीर पर मिलती थी। लार्ड की भूमि कृषक जोतते थे। जागीरों में विस्तृत अभयारण्य तथा वन चरागाह होते थे तथा एक दुर्ग होता था।

7. नाइट – नौवीं सदी में यूरोप के स्थानीय युद्धों में कुशल अश्व सेना की आवश्यकता हुई। इससे एक नए वर्ग नाइट्स को बढ़ावा मिला। नाइट्स का लार्ड से उसी प्रकार का सम्बन्ध था जिस प्रकार का लार्ड का राजा से सम्बन्ध था। लार्ड ने नाइट को भूमि का एक भाग (जिसे फीफ कहा गया) दिया और उसकी रक्षा करने का वचन दिया। इस फीफ में नाइट और उसके परिवार के लिए पनचक्की, मदिरा – संपीडक, घर, चर्च आदि होते थे। फीफ की भूमि को कृषक जोतते थे तथा बदले में नाइट अपने लार्ड को एक निश्चित रकम देता था तथा युद्ध में उसकी ओर से लड़ने का वचन देता था।

8. प्रथम वर्ग – पादरी वर्ग-पादरियों ने स्वयं को प्रथम वर्ग में रखा था। कैथोलिक चर्च अपनी भूमियों से कर वसूल कर सकते थे। यूरोप में ईसाई समाज का मार्गदर्शन बिशपों तथा पादरियों द्वारा किया जाता था। धर्म के क्षेत्र में बिशप अभिजात माने जाते थे। बिशपों के पास भी बड़ी-बड़ी जागीरें थीं और वे शानदार महलों में रहते थे।

9. भिक्षु-ये अत्यधिक धार्मिक व्यक्ति होते थे जो मठों में रहते थे। भिक्षु अपना सारा जीवन मठों में रहने और हर समय प्रार्थना करने, अध्ययन और कृषि जैसे शारीरिक श्रम में लगाने का व्रत लेता था। भिक्षु और भिक्षुणियां विवाह नहीं कर सकते थे। मठ छोटे समुदाय से बढ़कर सैकड़ों की संख्या के समुदाय बन गए जिनसे बड़ी इमारतें, भू- जागीरें, स्कूल, कॉलेज और अस्पताल सम्बद्ध थे। इन्होंने कला के विकास में योगदान दिया।

10. चर्च और समाज- चौथी सदी से ही क्रिसमस तथा ईस्टर कैलेंडर की महत्त्वपूर्ण तिथियाँ बन गए थे। 25 दिसम्बर को मनाये जाने वाले ईसा मसीह के जन्मदिन ने एक पुराने पूर्व – रोमन त्यौहार का स्थान ले लिया। तीर्थयात्रा ईसाइयों के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा थी।

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11. तीसरा वर्ग – किसान, स्वतंत्र और बंधक – किसान वर्ग तीसरा वर्ग कहलाता था । किसान दो तरह के होते थे –
(1) स्वतन्त्र किसान
(2) सर्फ ( कृषि – दास)।

स्वतन्त्र किसान अपनी भूमि को लार्ड के काश्तकार के रूप में देखते थे। कृषकों के परिवारों को लार्ड की जागीरों पर जाकर काम करने के लिए सप्ताह के तीन या उससे अधिक कुछ दिन निश्चित करने पड़ते थे । कृषि दास अपने गुजारे के लिए जिन भूखण्डों पर कृषि करते थे, वे लार्ड के स्वामित्व में थे। इसलिए उनकी अधिकतर उपज भी लार्ड को हीं मिलती थी। कृषि – दास अपने लार्ड की चक्की में ही आटा पीस सकते थे तथा उनके तंदूर में ही रोटी सेंक सकते थे।

12. इंग्लैण्ड में सामन्तवाद का विकास – इंग्लैण्ड में सामन्तवाद का विकास ग्यारहवीं सदी में हुआ। ग्यारहवीं सदी में नामैंडी के ड्यूक विलियम ने इंग्लैण्ड के सैक्सन राजा को पराजित कर दिया। उसने भूमि को अपने साथ आए 180 नारमन अभिजातों में बाँट दिया। यही लार्ड राजा के प्रमुख काश्तकार बन गए थे।

13. सामाजिक और आर्थिक सम्बन्धों को प्रभावित करने वाले कारक – लार्ड और सामन्तों के सामाजिक तथा आर्थिक सम्बन्धों को प्रभावित करने वाले अनेक कारक थे, जिनमें –

  • पर्यावरण
  • भूमि का उपयोग
  • नई कृषि प्रौद्योगिकी आदि उल्लेखनीय थे।

14. चौथा वर्ग – नये नगर और नगरवासी – ग्यारहवीं शताब्दी में कृषि का विस्तार होने के कारण कृषक लोग नगरों में आने लगे। स्वतन्त्र होने की इच्छा रखने वाले अनेक कृषिदास भाग कर नगरों में छिप जाते थे। अपने लार्ड की नजरों से एक वर्ष व एक दिन तक छिपे रहने में सफल रहने वाला कृषि दास एक स्वतन्त्र नागरिक बन जाता था । नगरों में रहने वाले अधिकतर व्यक्ति या तो स्वतन्त्र कृषक या भगोड़े कृषि – दास थे जो अकुशल श्रमिक होते थे। दुकानदार और व्यापारी काफी बड़ी संख्या में थे।

15. श्रेणी ( गिल्ड ) – आर्थिक संस्था का आधार श्रेणी (गिल्ड) था। प्रत्येक शिल्प या उद्योग एक ‘श्रेणी’ के रूप में संगठित था। यह उत्पाद की गुणवत्ता, उसके मूल्य और बिक्री पर नियन्त्रण रखती थी। ‘ श्रेणी सभागार’ प्रत्येक नगर का आवश्यक अंग था।

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16. कथीड्रल नगर – बारहवीं सदी से फ्रांस में कथीड्रल कहलाने वाले बड़े चर्चों का निर्माण होने लगा। कथीड्रल का निर्माण करते समय कथीड्रल के आसपास का क्षेत्र और अधिक बस गया और जब उनका निर्माण पूरा हुआ तो वे स्थान तीर्थ-स्थान बन गए। इस प्रकार उनके चारों ओर छोटे नगर विकसित हुए।

17. चौदहवीं सदी का संकट – 14वीं सदी की शुरुआत तक यूरोप का आर्थिक विस्तार धीमा पड़ गया। ऐसा तीन कारकों के वजह से हुआ। ये तीन कारक थे –

  • 1315-17 के बीच पड़े भयंकर अकाल
  • धातु मुद्रा में कमी आना तथा
  • प्लेग।

इससे भारी विनाश हुआ। जनसंख्या बढ़ी तथा आर्थिक मंदी के और जुड़ने से सामाजिक विस्थापन हुआ तथा श्रमिक बल में कमी आ गई।

18. सामाजिक असन्तोष- मजदूरी की दरें बढ़ने तथा कृषि सम्बन्धी मूल्यों की गिरावट ने अभिजात वर्ग की आय को घटा दिया। अतः उन्होंने धन सम्बन्धी अनुबन्धों को तोड़ दिया और पुरानी मजदूरी सेवाओं को फिर से प्रचलित कर दिया । इसके फलस्वरूप अनेक स्थानों पर कृषकों के विद्रोह हुए।

19. राजनीतिक परिवर्तन – पन्द्रहवीं और सोलहवीं सदियों में यूरोपीय शासकों ने अपनी सैनिक एवं वित्तीय शक्ति को बढ़ाया। अनेक सम्राटों ने स्थायी सेनाओं, स्थायी नौकरशाही तथा राष्ट्रीय कर प्रणाली स्थापित करने की प्रक्रिया को शुरू किया। स्पेन और पुर्तगाल ने यूरोप के समुद्र पार विस्तार की योजनाएँ बनाईं।

फ्रांस का प्रारम्भिक इतिहास

तिथि ( ई.)घटना
481क्लोविस फ्रैंक लोगों का राजा बना।
486क्लोविस और फ्रैंक.ने उत्तरी गॉल का विजय अभियान शुरू किया।
496क्लोविस और फ्रैंक लोग धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बने।
714चार्ल्स मारटल राजमहंल का मेयर बना।
751मारटल का पुत्र पेपिन फ्रैंक लोगों के शासक को अपदस्थ करके शासक बना और उसने एक अलग वंश की स्थापना की। उसके विजय-अभियानों ने राज्य का आकार दुगुना कर दिया। पेपिन का स्थान उसके पुत्र शार्लमेन/चार्ल्स महान द्वारा लिया गया।
768पोप लियो III ने शार्लमेन को पवित्र रोमन सम्राट का ताज पहनाया।
800नार्वे से वाइकिंग लोगों के हमले।
840मारटल का पुत्र पेपिन फ्रैंक लोगों के शासक को अपदस्थ करके शासक बना और उसने एक अलग वंश की स्थापना की। उसके विजय-अभियानों ने राज्य का आकार दुगुना कर दिया। पेपिन का स्थान उसके पुत्र शार्लमेन/चार्ल्स महान द्वारा लिया गया।
ग्यारहवीं से चौदहवीं शताब्दियों में (यूरोप)
तिथि (ई.)घटना
1066नारमन लोगों की एंग्लो-सेक्सन लोगों को हराकर इंग्लैण्ड पर विजय
1100 के पश्चात्फ्रांस में कथीड्रल का निर्माण
1315-1317यूरोप में महान अकाल
1347-1350ब्यूबोनिक प्लेग (Black Death)
1338-1461इंग्लैण्ड और फ्रांस के मध्य ‘सौ वर्षीय युद्ध’
1381कृषकों के विद्रोह।

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 4 सत्ता के वैकल्पिक केंद्र

Jharkhand Board JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 4 सत्ता के वैकल्पिक केंद्र Important Questions and Answers.

JAC Board Class 12 Political Science Important Questions Chapter 4 सत्ता के वैकल्पिक केंद्र

बहुचयनात्मक प्रश्न

1. मास्ट्रिस्ट संधि पर हस्ताक्षर कब हुए थे?
(अ) फरवरी, 1993
(स) जून, 1992
(ब) फरवरी, 1992
(द) जुलाई, 1992
उत्तर:
(ब) फरवरी, 1992

2. मास्ट्रिस्ट संधि किस संगठन का आधार है
(अ) गैट
(ब) विश्व – व्यापार संगठन
(स) नाफ्टा
(द) यूरोपीय संघ
उत्तर:
(द) यूरोपीय संघ

3. यूरोपीय संघ के झंडे में सितारों की संख्या है
(अ) 15
(ब) 13
(स) 12
(द) 14
उत्तर:
(स) 12

4. देंग श्याओपंग ने ‘ओपेन डोर’ की नीति चलाई-
(अं) दिसंबर, 1978
(स) फरवरी 1947
(ब) जुलाई, 1949
(द) जून, 1947
उत्तर:
(अं) दिसंबर, 1978

JAC Class 12 Political Science Important Questions Chapter 4 सत्ता के वैकल्पिक केंद्र

5. यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना कब
(अं) 1949
(ब) 1950
(स) 1966
(द) 1951
उत्तर:
(स) 1966

6. यूरोपीय संसद के लिए पहला प्रत्यक्ष चुनाव हुआ
(अ) जून, 1979
(ब.) मई, 2004
(स) अप्रैल, 1951
(द) जनवरी, 1973
उत्तर:
(अ) जून, 1979

7. आसियान की स्थापना किस वर्ष में हुई थी?
(अ) 1967
(ब) 1977
(स) 1966
(द) 1958
उत्तर:
(अ) 1967

8. चीन की साम्यवादी क्रांति कब हुई?
(अ) दिसम्बर, 1948
(ब) जनवरी, 1949
(स) अक्टूबर, 1949
(द) फरवरी, 1950
उत्तर:
(स) अक्टूबर, 1949

9. आसियान के झंडे का वृत्त किसका प्रतीक है?
(अ) प्रगति का
(ब) मित्रता का
(स) एकता का
(द) समृद्धि का
उत्तर:
(स) एकता का

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:

1. ……………………………. में यूरोपीय संघ ने एक साझा संविधान बनाने की कोशिश की थी।
उत्तर:
2003

2. आसियान के प्रतीक चिन्ह में धान की ………………………… बालियाँ दक्षिण-पूर्व एशिया के दस देशों को इंगित करती है।
उत्तर:
दस

3. …………………………. का उद्देश्य मुख्य रूप से आर्थिक विकास को तेज करना था।
उत्तर:
आसियान

4. …………….. में आसियान क्षेत्रीय मंच ( ARF) की स्थापना की गई।
उत्तर:
1994

5. भारत ने 1991 से ………………….. और 2014 से ………………… नीति अपनायी।
उत्तर:
लुक ईस्ट, एक्ट ईस्ट

6. चीन ने …………………… में खेती का निजीकरण किया और ………………………… में उद्योगों का निजीकरण किया।
उत्तर:
1982, 1998

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जर्मनी का एकीकरण कब हुआ?
उत्तर:
अक्टूबर, 1990 में जर्मनी का एकीकरण हुआ।

प्रश्न 2.
यूरोपीय संघ के गठन के लिए मास्ट्रिस्ट संधि पर हस्ताक्षर कब हुए?
उत्तर:
फरवरी, 1992 में यूरोपीय संघ के गठन के लिए मास्ट्रिस्ट संधि पर हस्ताक्षर हुए।

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प्रश्न 3.
ASEAN (आसियान) का क्या अर्थ है?
उत्तर:
एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एसियन नेशन्स।

प्रश्न 4.
यूरोपीय संघ के झण्डे में 12 सितारे क्यों हैं?
उत्तर:
यूरोपीय संघ के झण्डे में 12 सितारे हैं क्योंकि बारह की संख्या को वहाँ पारम्परिक रूप से पूर्णता, समग्रता और एकता का प्रतीक माना जाता है।

प्रश्न 5.
आसियान शैली किसे कहा जाता है?
उत्तर:
आसियान देशों की अनौपचारिक, टकरावरहित और सहयोगात्मक मेल-मिलाप की नीति को आसियान शैली कहा जाता है।

प्रश्न 6.
चीन में साम्यवादी क्रांति किस वर्ष और किसके नेतृत्व में हुई?
उत्तर:
चीन में सन् 1949 में माओ के नेतृत्व में साम्यवादी क्रांति हुई।

प्रश्न 7.
चीन में ‘ओपेन डोर’ की नीति किसने और कब चलायी?
उत्तर:
चीन में ‘ओपेन डोर’ की नीति देंग श्याओपेंग ने 1978 के दिसम्बर में चलायी।

प्रश्न 8.
चीन ने खेती के निजीकरण को कब अपनाया?
उत्तर:
चीन में सन् 1982 में खेती के निजीकरण को अपनायां।

प्रश्न 9.
भारत और चीन के बीच किस वर्ष युद्ध लड़ा गया?
उत्तर:
सन् 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध लड़ा गया।

प्रश्न 10.
यूरोपीयन इकॉनामिक कम्युनिटी का गठन कैसे ‘हुआ?
उत्तर:
यूरोप के पूँजीवादी देशों की अर्थव्यवस्था के आपसी एकीकरण की प्रक्रिया चरणबद्ध ढंग से आगे बढ़ी और इसके परिणामस्वरूप 1957 में यूरोपीयन इकॉनामिक कम्युनिटी का गठन हुआ।

प्रश्न 11.
परमाणु बम की विभीषिका झेलने वाला देश कौनसा है?
उत्तर:
परमाणु बम की विभीषिका झेलने वाला एकमात्र देश जापान है।

प्रश्न 12.
यूरोपीय संघ के झंडे में कितने सितारे हैं?
उत्तर:
यूरोपीय संघ के झण्डे में 12 सितारे हैं।

प्रश्न 13.
जापान के किन शहरों पर परमाणु बम गिराए गए थे?
उत्तर:
हिरोशिमा और, नागासाकी शहरों में।

प्रश्न 14.
यूरोपीय संघ के कौनसे दो देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य हैं?
उत्तर:
ब्रिटेन और  फ्रांस।

प्रश्न 15.
यूरोपीय संघ की स्थापना कब हुई? यूरोपीय संघ द्वारा प्रेरित किन्हीं दो प्रकार के प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
यूरोपीय संघ की स्थापना 1992 में हुई थी। यूरोपीय संघ द्वारा प्रेरित दो प्रभाव हैं। आर्थिक, राजनीतिक।

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प्रश्न 16.
यूरोपीय आर्थिक समुदाय का प्रमुख उद्देश्य क्या था?
उत्तर:
यूरोपीय देशों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करना।

प्रश्न 17.
आसियान की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य क्या था?
उत्तर:
आसियान के देशों का आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास करना।

प्रश्न 18.
भारत के उस पड़ोसी देश का नाम लिखिये जो आसियान का सदस्य है।
उत्तर:
म्यांमार

प्रश्न 19.
वर्तमान में आसियान के सदस्य देशों की संख्या कितनी है?
उत्तर:
दस।

प्रश्न 20.
आसियान किस प्रकार का संगठन है?
उत्तर:
आसियान एक असैनिक आर्थिक संगठन है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
यूरोपीय संघ के झण्डे में बना हुआ सोने के रंग के सितारों का घेरा किस बात का प्रतीक है?
अथवा
यूरोपीय संघ के झंडे में 12 सितारों का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
यूरोपीय संघ के झंडे में सोने के रंग के 12 सितारों का घेरा यूरोप के लोगों की एकता और मेलमिलाप का प्रतीक है; क्योंकि 12 की संख्या को वहाँ पूर्णता, समग्रता और एकता का प्रतीक माना जाता है।

प्रश्न 2.
मार्शल योजना क्या है?
उत्तर:
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमरीका ने यूरोप की अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन के लिए जबरदस्त सहायता की। इसे मार्शल योजना के नाम से जाना जाता है। यह योजना अमेरिकी विदेश मंत्री मार्शल के नाम से प्रसिद्ध हुई।

प्रश्न 3.
यूरोपीय कोयला और इस्पात समुदाय का गठन कब और कैसे हुआ?
उत्तर:
अप्रेल, 1951 में पश्चिमी यूरोप के छः देशों – फ्रांस, पश्चिम जर्मनी, इटली, बेल्जियम, नीदरलैंड और लक्जमबर्ग ने पेरिस संधि पर हस्ताक्षर कर यूरोपीय कोयला और इस्पात समुदाय का गठन किया।

प्रश्न 4.
रोम संधि ( 1957 ) के द्वारा यूरोप की किन संस्थाओं का गठन हुआ?
उत्तर:
मार्च, 1957 में यूरोप के छः देशों ने रोम संधि के माध्यम से

  1. यूरोपीय आर्थिक समुदाय और
  2. यूरोपीय एटमी ऊर्जा समुदाय का गठन किया।

प्रश्न 5.
यूरोपीय संघ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
यूरोपीय संघ की स्थापना 1992 में हुई। यूरोपीय संघ यूरोप के देशों का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है। इसका आर्थिक, सैनिक, राजनैतिक व कूटनीतिक रूप में विश्व राजनीति में महत्त्वपूर्ण स्थान है।

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प्रश्न 6.
यूरोपीय संघ के निर्माण के कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  1. यूरोपीय संघ का निर्माण यूरोप के आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए किया गया।
  2. इसका निर्माण अमेरिका की आर्थिक शक्ति के मुकाबले के लिए किया गया।

प्रश्न 7.
यूरोपीय संघ के विस्तार के कोई दो चरण लिखें।
उत्तर:

  1. 1948 में यूरोपीय राज्यों ने आर्थिक पुनर्निर्माण हेतु यूरोपीय आर्थिक समुदाय का निर्माण किया।
  2. 18 अप्रेल, 1951 को यूरोपीय राज्यों ने यूरोपीय कोयला एवं इस्पात समुदाय की स्थापना की।

प्रश्न 8.
यूरोपीय कोयला एवं इस्पात समुदाय का प्रमुख कार्य क्या था?
उत्तर:
इसका मुख्य कार्य सदस्य राष्ट्रों के कोयले एवं इस्पात के उत्पादन व वितरण पर नियंत्रण रखना तथा सदस्य राज्यों के कोयले व इस्पात के साधनों की एक सामान्य मण्डी बनाकर उनके उपयोग की व्यवस्था करना था।

प्रश्न 9.
आसियान की स्थापना कब और किसने की?
उत्तर:
1967 में दक्षिण-पूर्व एशियायी क्षेत्र के 5 देशों इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिपींस, सिंगापुर और थाइलैंड ने बैंकाक घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करके ‘आसियान’ की स्थापना की।

प्रश्न 10.
आसियान आर्थिक समुदाय का उद्देश्य स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
आसियान आर्थिक समुदाय का उद्देश्य है। सदस्य देशों के सामाजिक, आर्थिक विकास में सहायता करना तथा उन्हें साझा बाजार देना।

प्रश्न 11.
आसियान के मुख्य स्तंभों के नाम लिखिये।
उत्तर:
2003 में आसियान ने तीन मुख्य स्तंभ बताये हैं।

  1. आसियान सुरक्षा समुदाय
  2. आसियान आर्थिक समुदाय और
  3. आसियान सामाजिक- सांस्कृतिक समुदाय।

प्रश्न 12.
आसियान सुरक्षा समुदाय का उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
आसियान सुरक्षा समुदाय का मुख्य उद्देश्य है। क्षेत्रीय विवादों को सैनिक टकराव तक न ले जाकर उन्हें बातचीत के द्वारा सुलझाने का प्रयास करना।

प्रश्न 13.
आसियान के दस देशों के नाम लिखिये।
उत्तर:
आसियान के दस देश ये हैं।

  1. मलेशिया,
  2. सिंगापुर,
  3. इण्डोनेशिया,
  4. थाइलैंड,
  5. फिलीपींस,
  6. लाओस,
  7. कम्बोडिया,
  8. म्यांमार,
  9. वियतनाम और
  10. ब्रुनेई।

प्रश्न 14.
चीन में विदेशी व्यापार वृद्धि के कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  1. चीन ने विदेशी व्यापार वृद्धि के लिए 1978 में ‘खुले द्वार’ की नीति की घोषणा की।
  2. विदेशी निवेश एवं व्यापार को आकर्षित करने के लिए उसने विशेष आर्थिक क्षेत्रों का निर्माण किया।

प्रश्न 15.
चीन की नई आर्थिक नीति की कोई दो असफलताएँ लिखिए।
उत्तर:

  1. नई आर्थिक नीति के सुधारों का लाभ चीन में सभी क्षेत्रों को नहीं मिल पाया है।
  2. नई आर्थिक नीति से चीन में बेरोजगारी की समस्या पैदा हुई है।

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प्रश्न 16.
आसियान के झण्डे की व्याख्या करें।
उत्तर:
आसियान के प्रतीक चिन्ह में धान की दस बालियाँ दक्षिण-पूर्व एशिया के दस देशों को इंगित करती हैं जो आपस में मित्रता और एकता के धागे से बंधे हैं। वृत्त आसियान की एकता का प्रतीक है

प्रश्न 17.
1978 से पहले एवं बाद में चीन की आर्थिक नीतियों में कोई दो अन्तर बताएँ।
उत्तर:

  1. चीन ने आर्थिक क्षेत्र में 1978 से पहले एकान्तवास की नीति अपनायी थी, जबकि 1978 के पश्चात् खुले द्वार की नीति अपनायी।
  2. 1978 से पहले कृषि राज्य नियंत्रित थी जबकि 1978 के बाद कृषि का निजीकरण कर दिया गया।

प्रश्न 18.
समेकित कीजिए।
(i) आसियान की स्थापना 1948
(ii) यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना 1992
(iii) यूरोपीय परिषद की स्थापना 1967
(iv) यूरोपीय संघ की स्थापना 1949
उत्तर:
(i) 1967
(ii) 1948
(iii) 1949
(iv) 1992

प्रश्न 19.
किस कारण से आज भारत और चीन के बीच संबंधों को ज्यादा मजबूत बनाने में मदद मिली है?
उत्तर:
परिवहन और संचार मार्गों की बढ़ोतरी, समान आर्थिक हित तथा एक जैसे वैश्विक सरोकारों के कारण भारत और चीन के बीच सम्बन्धों को ज्यादा सकारात्मक तथा मजबूत बनाने में मदद मिली है।

प्रश्न 20.
दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को आसियान संगठन बनाने की पहल क्यों करनी पड़ी?
उत्तर:
द्वितीय विश्व युद्ध से पहले और उसके दौरान एशिया का कुछ हिस्सा बार-बार यूरोपीय और जापानी उपनिवेशवाद का शिकार हुआ तथा भारी राजनैतिक और आर्थिक कीमत चुकाई युद्ध समाप्त होने पर इसे राष्ट्र-निर्माण, आर्थिक पिछड़ेपन और गरीबी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। इसे शीतयुद्ध के दौर में किसी एक महाशक्ति के साथ जाने के दबाव को भी झेलना पड़ा। टकरावों और भागमभाग की ऐसी स्थिति को दक्षिण-पूर्व एशिया संभालने की स्थिति में नहीं था।

बांडुंग सम्मेलन और गुटनिरपेक्ष आंदोलन वगैरह के माध्यम से एशिया और तीसरी दुनिया के देशों में एकता कायम करने के प्रयास अनौपचारिक स्तर पर सहयोग और मेलजोल कराने के मामले में कारगर नहीं हो रहे थे। इसी के चलते दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने दक्षिण-पूर्व एशियाई संगठन (आसियान) बनाकर एक वैकल्पिक पहल की।

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प्रश्न 21.
आसियान क्षेत्रीय मंच की स्थापना क्यों की गई?
उत्तर:
आसियान के सदस्य देशों ने 2003 तक कई समझौते किए जिनके द्वारा हर सदस्य देश ने शांति, निष्पक्षता, सहयोग, अहस्तक्षेप को बढ़ावा देने और राष्ट्रों के आपसी अंतर तथा संप्रभुता के अधिकारों का सम्मान करने पर अपनी वचनबद्धता जाहिर की। आसियान के देशों की सुरक्षा और विदेश नीतियों में तालमेल बनाने के लिए 1994 में आसियान क्षेत्रीय मंच (ARF) की स्थापना की गई।

प्रश्न 22.
भारत व चीन के मध्य अच्छे संबंध बनाने हेतु दो सुझाव दीजिये।
उत्तर:
भारत व चीन के मध्य अच्छे संबंध बनाने हेतु निम्न सुझाव दिये जा सकते हैं।

  1. दोनों देशों की सरकारें, पारस्परिक बातचीत के द्वारा विवादों का हल निकालने का प्रयत्न करें।
  2. दोनों देश अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर समान दृष्टिकोण अपनाकर सहयोग को बढ़ावा दें।

प्रश्न 23.
यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना कब व किन उद्देश्यों को लेकर की गई? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यूरोप के देशों में मेल-मिलाप तथा यूरोप की अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन के उद्देश्यों को लेकर मार्शल योजना के तहत सन् 1948 में यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना की गई। इसके माध्यम से पश्चिमी यूरोप के देशों को आर्थिक मदद दी गई।

प्रश्न 24.
यूरोपीय संघ की चार प्रमुख विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:
यूरोपीय संघ की प्रमुख विशेषताएँ ये हैं।

  1. यूरोपीय संघ की साझी मुद्रा यूरो, स्थापना दिवस, गान तथा झण्डा है।
  2. यूरोपीय संघ आर्थिक-राजनैतिक मामलों में हस्तक्षेप करने में सक्षम है।
  3. इसके दो सदस्य ब्रिटेन और फ्रांस- सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं।
  4. इसका आर्थिक, राजनैतिक, सैनिक तथा कूटनीतिक वैश्विक प्रभाव बहुत अधिक है।

प्रश्न 25.
यूरोपीय संघ के राजनैतिक स्वरूप पर एक टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
यूरोपीय संघ का राजनैतिक स्वरूप – एक लम्बे समय में बना यूरोपीय संघ आर्थिक सहयोग वाली व्यवस्था से बदलकर ज्यादा से ज्यादा राजनैतिक रूप लेता गया है। यथा।

  1. अब यूरोपीय संघ स्वयं काफी हद तक एक विशाल राष्ट्र-राज्य की तरह ही काम करने लगा है।
  2. यद्यपि यूरोपीय संघ की एक संविधान बनाने की कोशिश तो असफल हो गई लेकिन इसका अपना झंडा, गानं, स्थापना – दिवस और अपनी मुद्रायूरो है।
  3. अन्य देशों से सम्बन्धों के मामले में इसने काफी हद तक साझी विदेश और सुरक्षा नीति भी बना ली है।
  4.  नये सदस्यों को शामिल करते हुए यूरोपीय संघ ने सहयोग के दायरे में विस्तार की कोशिश की। नये सदस्य मुख्यतः भूतपूर्व सोवियत खेमे के थे।
  5.  सैनिक ताकत के हिसाब से यूरोपीय संघ के पास दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना है।

प्रश्न 26.
यूरोपीय संघ के देशों में पाये जाने वाले मतभेदों को बताइये।
उत्तर:
यूरोपीय संघ के देशों के मध्य पाये जाने वाले प्रमुख मतभेद ये हैं।

  1. यूरोपीय देशों की विदेश एवं रक्षा नीति में परस्पर मतभेद विद्यमान हैं।
  2. इराक के सम्बन्ध में यूरोपीय देशों में मतभेद हैं।
  3. यूरोप के कुछ देशों में यूरो मुद्रा को लागू करने के सम्बन्ध में मतभेद हैं।

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प्रश्न 27.
1962 के युद्ध का भारत-चीन सम्बन्धों पर क्या असर हुआ?
उत्तर:
1962 के युद्ध में भारत को सैनिक पराजय झेलनी पड़ी और भारत-चीन सम्बन्धों पर इसका दीर्घकालिक असर हुआ। 1976 तक दोनों देशों के बीच कूटनैतिक संबंध समाप्त हो गए।

प्रश्न 28.
आसियान की स्थापना कब हुई? इसके सदस्य देशों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
आसियान की स्थापना: 1967 में दक्षिण – पूर्व एशिया के पांच देशों ने बैंकाक घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करके ‘आसियान’ की स्थापना की। ये देश थे – इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिपींस, सिंगापुर और थाइलैंड ब्रूनई दारुसलेम इस समूह में 1984 में शामिल हो गया। उसके बाद 28 जुलाई, 1995 को वितयनाम, 23 जुलाई, 1997 को लाओस और म्यांमार तथा 30 अप्रेल, 1999 को कम्बोडिया इसमें शामिल हो गये। इस प्रकार वर्तमान में आसियान के 10 सदस्य हैं। ये है। इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिपींस, सिंगापुर, थाइलैंड, ब्रूनई दारुसलेम, वियतनाम, लाओस, म्यांमार और कम्बोडिया।

प्रश्न 29.
आसियान के उद्देश्यों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
आसियान के प्रमुख उद्देश्य ये हैं।

  1. दक्षिण एशिया क्षेत्र में आर्थिक विकास को तेज करना।
  2. सदस्य राष्ट्रों में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक, वैज्ञानिक तथा तकनीकी क्षेत्रों में परस्पर सहायता करना।
  3. सामूहिक सहयोग तथा बातचीत से साझी समस्याओं का हल ढूँढ़ना।
  4. इस क्षेत्र में साझा बाजार तैयार करना।
  5. क्षेत्रीय शांति और स्थायित्व को बढ़ावा देना।

प्रश्न 30.
आसियान के मौलिक सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
आसियान के मौलिक सिद्धान्त – सन् 1976 में बाली शिखर सम्मेलन में एक संधि के द्वारा आसियान ने निम्नलिखित सिद्धान्तों को अंगीकृत किया है। सम्मान।

  1. सभी राष्ट्रों की स्वतंत्रता, सार्वभौमिकता, समानता, राजक्षेत्रीय संपूर्णता और राष्ट्रीय पहचान के प्रति पारस्परिक
  2. बाह्य हस्तक्षेप, अवपीड़न से मुक्ति तथा अपने राष्ट्रीय अस्तित्व के संचालन का प्रत्येक राष्ट्र का अधिकार।
  3. एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप।
  4. शांतिपूर्ण तरीकों से मतभेदों या झगड़ों का समाधान।
  5. धमकी या बल प्रयोग का परित्याग।
  6. आपस में कारगर सहयोग।

प्रश्न 31.
मास्ट्रिस्ट संधि पर एक टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
मास्ट्रिस्टं संधि-यूरोपीय आर्थिक समुदाय के सभी 12 सदस्यों को बैठक नीदरलैंड के नगर मास्ट्रिस्ट में 9 व 10 दिसम्बर को हुई थी, 1991 को 12 सदस्यीय यूरोपीय आर्थिक समुदाय ने यूरोपीय मौद्रिक संघ के एक समझौते पर हस्ताक्षर किये, जिसे ‘मास्ट्रिस्ट संधि’ कहा जाता है। फरवरी, 1992 में यूरोपीय संघ के गठन के लिए सभी देशों ने मास्ट्रिस्ट संधि पर हस्ताक्षर किये। मास्ट्रिस्ट संधि यूरोप के एकीकरण के मार्ग में एक मील का पत्थर है। इस संधि ने पूरे यूरोप के लिए एक अर्थव्यवस्था, एक मुद्रा, एक बाजार, एक नागरिकता, एक संसद, एक सरकार, एक सुरक्षा व्यवस्था, एक विदेश नीति का मार्ग प्रशस्त किया।

प्रश्न 32.
यूरोपीय संघ के वर्तमान में कितने राष्ट्र सदस्य हैं? उनके नाम लिखिये।
उत्तर:
1 जुलाई, 2013 को क्रोएशिया द्वारा यूरोपीय संघ की सदस्यता ग्रहण करने के पश्चात् यूरोपीय संघ के सदस्य राष्ट्रों की कुल संख्या 28 हो गई है। ये राष्ट्र हैं।
आयरलैंड, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, पुर्तगाल, स्पेन, लक्जमबर्ग, बेल्जियम, नीदरलैंड, जर्मनी, डेनमार्क, स्वीडन,  फिनलैंड, आस्ट्रिया, इटली, माल्टा, एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया, पोलैण्ड, चेकरिपब्लिक, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया,  हंगरी, ग्रीस, साइप्रस, बुल्गारिया, रूमानिया, क्रोएशियां।

प्रश्न 33.
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् यूरोप के समक्ष आने वाली प्रमुख समस्याओं को लिखिये
उत्तर:
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् यूरोप के समक्ष निम्नलिखित प्रमुख समस्यायें आयीं:

  1. यूरोपीय देशों के समक्ष द्वितीय विश्व युद्ध में तहस-नहस हुई अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण की समस्या थी।
  2. यूरोपीय देशों के समक्ष यूरोपीय नागरिकों की नष्ट हुई मान्यताओं और मूल्यों को पुनः बहाल करने की समस्या थी।
  3. इनके समक्ष विश्व स्तर पर अपने राजनैतिक और आर्थिक सम्बन्धों को स्थापित करने की समस्या थी।
  4. यूरोपीय देशों के बीच पारस्परिक शत्रुता विद्यमान थी। इस शत्रुता को छोड़कर परस्पर सहयोग करने की और बढ़ने की समस्या थी।

प्रश्न 34.
यूरोपीय आर्थिक समुदाय पर एक टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
र-यूरोपीय आर्थिक समुदाय या यूरोपीय साझा बाजार: यूरोपीय आर्थिक समुदाय या यूरोपीय साझा बाजार का जन्म 25 मार्च, 1957 को रोम की संधि के तहत 1 जनवरी, 1958 को हुआ था । इस पर हस्ताक्षर करने वाले छः राष्ट्र थे।

  1. फ्रांस,
  2. जर्मनी
  3. इटली
  4. बेल्जियम
  5. नीदरलैंड और
  6. लक्जमबर्ग।

वर्तमान में इसके सदस्यों की संख्या बढ़कर 28 हो गई है।
उद्देश्य: यूरोपीय साझा बाजार का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों की आर्थिक नीतियों में उत्तरोत्तर सामञ्जस्य स्थापित करके समुदाय के क्रमबद्ध आर्थिक विकास की उन्नति करना, सदस्य देशों में निकटता स्थापित कराना है। यूरोपीय साझा बाजार के साथ ही यूरोपीय एकीकरण की नींव पड़ी और यूरोपीय आर्थिक समुदाय ही 1992 में यूरोपीय संघ में बदल गया है।

प्रश्न 35.
विश्व राजनीति में यूरोपीय संघ की भूमिका पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:

  1. यूरोपीय संघ अब काफी हद तक विशाल राष्ट्र-राज्य की तरह ही काम करने लगा है। इसका अपना झंडा, गान, स्थापना दिवस और अपनी मुद्रा है।
  2. अन्य देशों से संबंधों के मामले में यूरोपीय संघ ने काफी हद तक साझी विदेश और सुरक्षा नीति बना ली है। अब यह एक सार्थक राजनैतिक इकाई के रूप में विश्व व्यापार संगठन में अपनी भूमिका निभा रहा है।
  3. आज यूरो मुद्रा अमरीकी डालर को चुनौती दे रही है। यूरोपीय संघ विश्व के सबसे बड़े व्यापार ब्लॉक के रूप में उभरकर इस क्षेत्र में अमेरिका के लिए समस्या पैदा कर रहा है।
  4. यूरोपीय संघ के कई देश सुरक्षा परिषद् के स्थायी और अस्थायी सदस्यों में शामिल हैं। इसके चलते यह अमरीका समेत सभी देशों की नीतियों को प्रभावित करता है।

प्रश्न 36.
यूरो, अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व के लिए खतरा कैसे बन सकता है?
उत्तर:
निम्न रूप में यूरो अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व के लिए खतरा बन सकता है।

  1. यूरोपीय संघ के सदस्यों की संयुक्त मुद्रा यूरो का प्रचलन दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही चला जा रहा है और यह डॉलर को चुनौती प्रस्तुत करता नजर आ रहा है क्योंकि विश्व व्यापार में यूरोपीय संघ की भूमिका अमेरिका से तिगुनी है।
  2. यूरोपीय संघ राजनैतिक, कूटनीतिक तथा सैनिक रूप से भी अधिक प्रभावी है। इसे अमेरिका धमका नहीं सकता।
  3. यूरोपीय संघ की आर्थिक शक्ति का प्रभाव अपने पड़ौसी देशों के साथ-साथ एशिया और अफ्रीका के राष्ट्रों पर भी है।
  4. यूरोपीय संघ की विश्व की एक विशाल अर्थव्यवस्था है जो सकल घरेलू उत्पादन में अमेरिका से भी अधिक

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प्रश्न 37.
यूरोपीय संघ ने अपना राजनीतिक तथा कूटनीतिक प्रभाव किस प्रकार क्रियान्वित किया है? उत्तर – यूरोपीय संघ ने निम्न रूप में अपना राजनीतिक और कूटनीतिक प्रभाव क्रियान्वित किया है।

  1. यूरोपीय संघ विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा है। विश्व व्यापार में इसकी सहभागिता अमेरिका से तिगुनी है।
  2. यूरोपीय संघ के दो सदस्य संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं तथा कई देश इसके अस्थायी सदस्य हैं। इसीलिये यह अमरीका सहित सभी देशों की नीतियों को प्रभावित कर रहा है।
  3. सैन्य शक्ति के दृष्टिकोण से इसके पास विश्व की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। इसका कुल रक्षा बजट अमेरिका के पश्चात् सर्वाधिक है। अंतरिक्ष विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में इसका स्थान दूसरा है।
  4. अन्तर्राष्ट्रीय संगठन के रूप में यह राजनीतिक तथा सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप करने में सक्षम है।

प्रश्न 38.
संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच समानताओं का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
अमेरिका तथा यूरोपीय संघ में समानताएँ-

  1. अमेरिका और यूरोपीय संघ के देश लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को अपनाए हुए हैं।
  2. दोनों ही वैश्वीकरण, उदारवादी तथा पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का समर्थन करते हैं।
  3. अमेरिका सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है तो यूरोपीय संघ के दो सदस्य ब्रिटेन और फ्रांस भी सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं।
  4. अमेरिका और यूरोपीय संघ दोनों ही परमाणु हथियारों से सम्पन्न हैं।
  5. दोनों की अपनी-अपनी मुद्राएँ हैं। अमेरिका की मुद्रा डालर है तो यूरोपीय संघ की मुद्रा यूरो है।

प्रश्न 39.
दक्षिण-पूर्वी एशियाई राष्ट्रों ने आसियान के निर्माण की पहल क्यों की?
उत्तर:
दक्षिण-पूर्वी एशियाई राष्ट्रों ने निम्नलिखित कारणों से आसियान के निर्माण की पहल की

  1. दूसरे विश्व युद्ध से पहले और उसके दौरान, दक्षिण-पूर्वी एशियाई राष्ट्र यूरोपीय और जापानी उपनिवेशवाद के शिकार हुए तथा भारी राजनैतिक और आर्थिक कीमत चुकाई।
  2. युद्ध के बाद इन्हें राष्ट्र निर्माण, आर्थिक पिछड़ेपन और गरीबी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।
  3. शीत युद्ध काल में इन्हें किसी एक महाशक्ति के साथ जाने के दबावों को भी झेलना पड़ा था।
  4. परस्पर टकरावों की स्थिति में ये देश अपने आपको संभालने की स्थिति में नहीं थे।
  5. गुट निरपेक्ष आंदोलन तीसरी दुनिया के देशों में सहयोग और मेलजोल कराने में सफल नहीं हो रहे थे।

प्रश्न 40.
“विजन 2020 में अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय में आसियान की एक बहिर्मुखी भूमिका को प्रमुखता दी गई है।” कथन के पक्ष में चार तर्क दीजिए।
अथवा
‘आसियान तेजी से बढ़ता हुआ एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है।” कथन के पक्ष में चार तर्क दीजिए।
अथवा
आसियान की प्रासंगिकता पर एक टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
आसियान की प्रासंगिकता या महत्त्व:

  1. आसियान तेजी से बढ़ता हुआ एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है। यह टकराव की जगह बातचीत को बढ़ावा देने की नीति पर बल देता है।
  2. इसने पूर्व: एशियायी सहयोग पर बातचीत के लिए 1999 से नियमित रूप से वार्षिक बैठक आयोजित की है। बातचीत की नीति के तहत ही इसने कंबोडिया के टकराव को समाप्त किया है और पूर्वी तिमोर के संकट को संभाला है।
  3. आसियान की मौजूदा आर्थिक शक्ति ने चीन और भारत के साथ व्यापार और निवेश के मामले में अपनी प्रासंगिकता को स्पष्ट किया है।
  4. यह एशिया का एकमात्र ऐसा क्षेत्रीय संगठन है जो एशियायी देशों और विश्व शक्तियों को राजनैतिक और सुरक्षा मामलों पर चर्चा के लिए राजनैतिक मंच उपलब्ध कराता है।

प्रश्न 41.
आर्थिक शक्ति के रूप में चीन के उदय को किस तरह देखा जा रहा है?
उत्तर:
1978 के बाद से जारी चीन की आर्थिक सफलता को एक महाशक्ति के रूप में इसके उभरने के रूप में देखा जा रहा है। यथा

  1. आर्थिक सुधारों की शुरुआत करने के बाद से चीन सबसे ज्यादा तेजी से आर्थिक विकास कर रहा है और यह माना जाता है कि इस रफ्तार से चलते हुए 2040 तक वह दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति, अमरीका से भी आगे निकल जाएगा।
  2. आर्थिक स्तर पर अपने पड़ोसी देशों से जुड़ाव के चलते चीन पूर्व एशिया के विकास का इंजन जैसा बना हुआ है और इस कारण क्षेत्रीय मामलों में उसका प्रभाव बहुत बढ़ गया है।
  3. इसकी विशाल आबादी, बड़ा भू-भाग, संसाधन, क्षेत्रीय अवस्थिति, सैन्य शक्ति और राजनैतिक प्रभाव इस तेज आर्थिक वृद्धि के साथ मिलकर चीन के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देते हैं।

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प्रश्न 42.
1970 के दशक में चीनी नेतृत्व ने किन कारणों से आधुनिकीकरण और खुले द्वार की नीति को अपनाया? ये थीं-
उत्तर:
1970 तक आते-आते चीन में राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था की कमियाँ सामने आ गयीं। कुछ प्रमुख कमियाँ

  1. खेती की पैदावार उद्योगों को पूरी जरूरत लायक अधिशेष नहीं दे पाती थी। इससे औद्योगिक उत्पादन में गतिरोध आ गया था। यह पर्याप्त तेजी से आगे नहीं बढ़ पा रहा था।
  2. आर्थिक एकांतवास और राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था के कारण विदेशी निवेश और विदेशी व्यापार न के बराबर था।
  3. चीन की प्रति व्यक्ति आय बहुत कम थी।

प्रश्न 43.
1970 के दशक में चीनी नेतृत्व ने कौनसे बड़े नीतिगत निर्णय लिये?
उत्तर:
चीनी नेतृत्व ने 1970 के दशक में कुछ बड़े नीतिगत निर्णय लिये। ये थे

  1. चीन ने 1972 में अमरीका से सम्बन्ध बढ़ाकर अपने राजनैतिक और आर्थिक एकान्तवास को खत्म किया।
  2. सन् 1973 में चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई ने कृषि, उद्योग, सेना और विज्ञान-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आधुनिकीकरण के चार प्रस्ताव रखे।
  3. 1978 में तत्कालीन नेता देंग श्याओपेंग ने चीन में आर्थिक सुधारों और ‘खुले द्वार की नीति’ की घोषणा की। अब नीति यह हो गयी कि विदेशी पूँजी और प्रौद्योगिकी के निवेश से उच्चतर उत्पादकता को प्राप्त किया जाए।

प्रश्न 44.
बाजारमूलक अर्थव्यवस्था को अपनाने के लिए चीन ने क्या तरीका अपनाया?
उत्तर:
बाजारमूलक अर्थव्यवस्था को अपनाने के लिए चीन ने अर्थव्यवस्था को चरणबद्ध ढंग से खोलने का तरीका अपनाया। यथा:

  1. सन् 1978 में चीन ने आर्थिक सुधारों और खुले द्वार की नीति की घोषणा की तथा विदेशी पूँजी और प्रौद्योगिकी के निवेश से उच्चतर उत्पादकता प्राप्त करने पर बल दिया गया।
  2. 1982 में चीन ने खेती का निजीकरण किया।
  3. 1998 में उसने उद्योगों का निजीकरण किया।
  4. चीन ने व्यापार सम्बन्धी अवरोधों को सिर्फ ‘विशेष आर्थिक क्षेत्रों’ के लिए ही हटाया है, जहाँ विदेशी निवेशक अपने उद्यम लगा सकते हैं।

प्रश्न 45.
भारत-चीन के सम्बन्धों में कटुता पैदा करने वाले कोई चार मुद्दे लिखिये।
उत्तर:
भारत-चीन सम्बन्धों में कटुता पैदा करने वाले प्रमुख मुद्दे निम्नलिखित हैं।

  1. सीमा विवाद: भारत-चीन के बीच सीमा विवाद चल रहा है । यह विवाद मैकमोहन रेखा, अरुणाचल प्रदेश के एक भाग तवांग तथा अक्साई चिन के क्षेत्र को लेकर है।
  2. पाक को परमाणु सहायता: चीन गोपनीय तरीके से पाकिस्तान को परमाणु ऊर्जा एवं तकनीक प्रदान कर रहा है। इससे चीन के प्रति भारत में खिन्नता है।
  3. हिन्द महासागर में पैठ: चीन हिन्द महासागर में अपनी पैठ जमाना चाहता है । इस हेतु उसने म्यांमार से कोको द्वीप लिया है तथा पाकिस्तान में कराची के पास ग्वादर का बन्दरगाह बना रहा है।
  4. भारत विरोधी रवैया: चीन भारत की परमाणु नीति की आलोचना करता है और सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का विरोधी है।

प्रश्न 46.
चीन के साथ भारत के सम्बन्धों को बेहतर बनाने के लिए आप क्या सुझाव देंगे?
उत्तर:
चीन के साथ भारत के सम्बन्धों में सुधार हेतु सुझाव:

  1. सांस्कृतिक सम्बन्धों में सुदृढ़ता लाना: चीन और भारत दोनों के बीच सांस्कृतिक सम्बन्ध सुदृढ़ हों इसके लिए भाषा और साहित्य का आदान-प्रदान एवं अध्ययन किया जाये।
  2. नेताओं का आवागमन: दोनों देशों के प्रमुख नेता परस्पर एक-दूसरे का भ्रमण करें, अपने विचारों का आदान-प्रदान कर परस्पर सहयोग एवं सद्भाव की भावना को विकसित करें।
  3. व्यापारिक सम्बन्धों में बढ़ावा: दोनों देशों के बीच व्यापारिक सम्बन्धों में निरन्तर विस्तार किया जाना चाहिए।
  4. पर्यावरण सुरक्षा पर समान दृष्टिकोण: दोनों ही देश विश्व सम्मेलनों में पर्यावरण सुरक्षा के सम्बन्ध में समानं दृष्टिकोण अपना कर परस्पर एकता को बढ़ावा दे सकते हैं।
  5. बातचीत द्वारा विवादों का समाधान: दोनों देश अपने विवादों का समाधान निरन्तर बातचीत द्वारा करने का प्रयास करते रहें

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प्रश्न 47.
नयी आर्थिक नीतियों के कारण चीन की अर्थव्यवस्था में क्या परिवर्तन आये?
उत्तर:
नयी आर्थिक नीतियों के कारण चीन की अर्थव्यवस्था को अपनी जड़ता से उबरने में मदद मिली। यथा

  1. कृषि के निजीकरण के कारण कृषि उत्पादों तथा ग्रामीणों की आय में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हुई। इससे ग्रामीण उद्योगों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ी।
  2. उद्योग और कृषि दोनों ही क्षेत्रों में चीन की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर तेज रही।
  3. व्यापार के नये कानून तथा विशेष आर्थिक क्षेत्रों के निर्माण से विदेश व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
  4. चीन अब पूरे विश्व में विदेशी निवेशी के लिए सबसे आकर्षक देश बनकर उभरा है। उसके पास विदेशी मुद्रा का विशाल भंडार हो गया है और इसके दम पर वह दूसरे देशों में निवेश कर रहा है।

प्रश्न 48.
सत्ता के उभरते हुए वैकल्पिक केन्द्रों द्वारा विभिन्न देशों में समृद्धशाली अर्थव्यवस्थाओं का रूप देने में निभाई गई भूमिका की व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
विश्व राजनीति में एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था के शुरू होने पर राजनीति तथा आर्थिक सत्ता के वैकल्पिक केन्द्रों ने कुछ सीमा तक अमरीका के प्रभुत्व को सीमित किया है। यथा है।

  1. यूरोप में यूरोपीय संघ तथा एशिया में आसियान का प्रादुर्भाव एक समृद्धशाली अर्थव्यवस्थाओं के रूप में हुआ
  2. यूरोपीय संघ और आसियान दोनों ने ही अपने-अपने क्षेत्रों में चलने वाली ऐतिहासिक दुश्मनियों तथा कमजोरियों का क्षेत्रीय स्तर पर समाधान तलाशा है तथा अपने-अपने क्षेत्रों में शांतिपूर्ण एवं सहकारी क्षेत्रीय व्यवस्था विकसित की है।
  3. यूरोपीय संघ और आसियान के अतिरिक्त चीन के आर्थिक उभार ने भी विश्व राजनीति पर प्रभावी प्रभाव डाला है।

प्रश्न 49.
नयी अर्थव्यवस्था को अपनाने से चीन में कौन-कौन सी समस्यायें उभरी हैं?
उत्तर:
नयी अर्थव्यवस्था को अपनाने से चीन में निम्न समस्यायें उभरी हैं। मिला है।

  1. चीन में आर्थिक सुधारों का लाभ प्रत्येक व्यक्ति को नहीं मिला है। इन सुधारों का लाभ कुछ ही वर्गों को
  2. सुधारों के कारण चीन में बेरोजगारी बढ़ी है और 10 करोड़ लोग रोजगार की तलाश में हैं।
  3. नयी अर्थव्यवस्था में पर्यावरण के नुकसान और भ्रष्टाचार के बढ़ने जैसे परिणाम भी सामने आये हैं
  4. गांव और शहर के तथा तटीय और मुख्य भूमि पर रहने वाले लोगों के बीच आर्थिक फासला बढ़ता जा रहा

प्रश्न 50.
वैश्विक स्तर पर चीन के आर्थिक प्रभाव को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
वैश्विक स्तर पर चीन का आर्थिक प्रभाव निम्नलिखित है।

  1. चीन की अर्थव्यवस्था का बाहरी दुनिया से जुड़ाव और पारस्परिक निर्भरता ने अब यह स्थिति बना दी है कि अपने व्यावसायिक साझीदारों पर चीन का जबरदस्त प्रभाव बन चुका है और यही कारण है कि जापान, आसियान, अमरीका और रूस — सभी व्यापार के लिए चीन से अपने विवादों को भुला चुके हैं।
  2. 1997 के वित्तीय संकट के बाद आसियान देशों की अर्थव्यवस्था को टिकाए रखने में चीन के आर्थिक उभार ने काफी मदद की है।
  3. लातिनी अमरीका और अफ्रीका में निवेश और मदद की इसकी नीतियाँ बताती हैं कि विकासशील देशों के मामले में चीन एक नई विश्व शक्ति के रूप में उभरता जा रहा है।

प्रश्न 51.
यूरोपीय संघ अमरीका और चीन से व्यापारिक विवादों में पूरी धौंस के साथ बात करता है। इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यूरोपीय संघ का आर्थिक, राजनैतिक, कूटनीतिक तथा सैनिक प्रभाव बहुत ज्यादा है। 2016 में यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी और इसका सकल घरेलू उत्पादन 17000 अरब डॉलर से ज्यादा था जो अमरीका के ही लगभग है। इसकी मुद्रा यूरो अमरीका डालर के प्रभुत्व के लिए खतरा बन सकती है। विश्व व्यापार में इसकी हिस्सेदारी अमेरिका से तीन गुनी ज्यादा है औरइसी के कारण यह अमरीका ओर चीन से व्यापारिक विवादों में पूरी धौंस के साथ बात करता है।

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प्रश्न 52.
“हान नदी पर चमत्कार” किसे कहा जाता है?
उत्तर:
1 – द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात कोरियाई प्रायद्वीप को दक्षिण और उत्तरी कोरिया में विभाजित किया गया। 1950-53 के बीच कोरियाई युद्ध और शीतयुद्ध काल की गतिशीलता ने दोनों पक्षों के बीच प्रतिद्वंद्विता को तेज कर दिया। 17 सितंबर को दोनों कोरिया संयुक्त राष्ट्र के सदस्य बने। 1960 से 1980 के दशक के बीच इसका आर्थिक शक्ति के रूप में तेजी से विकास हुआ, जिसे ‘हान नदी पर चमत्कार’ की संज्ञा दी गई।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पश्चिमी यूरोप को एकताबद्ध करने के प्रयासों के आर्थिक तथा राजनैतिक प्रयासों की विवेचना कीजिये।
उत्तर:
पश्चिमी यूरोप का आर्थिक पुनरुद्धार और एकीकरण: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पश्चिमी यूरोप को एकताबद्ध करने के आर्थिक-राजनैतिक प्रयास निम्नलिखित रहे:

  1. शीत युद्ध: शीत युद्ध के दौर में पूर्वी यूरोप तथा पश्चिमी यूरोप के देश अपने-अपने खेमों में एक-दूसरे के नजदीक आए।
  2. मार्शल योजना-1947: इस योजना के तहत अमरीका ने पश्चिमी यूरोप की अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन के लिए जबरदस्त मदद की।
  3. नाटो: अमेरिका ने नाटो के तहत पश्चिमी यूरोप में एक सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को जन्म दिया।
  4. यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन: 1948 में यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन के माध्यम से पश्चिमी यूरोप के देशों ने व्यापार और आर्थिक मामलों में एक- दूसरे की मदद शुरू की।
  5. यूरोपीय परिषद् 5 मई, 1949 को यूरोपीय परिषद् की स्थापना हुई। जिसके तहत आर्थिक और सामाजिक प्रगति के लिए अपनी सामान्य विरासत के आदर्शों और सिद्धान्तों में एकता लाने का प्रयास किया गया।
  6. यूरोपीय कोयला तथा इस्पात समुदाय: 18 अप्रेल, 1951 को पश्चिमी यूरोप के छः देशों ने यूरोपीय कोयला और इस्पात समुदाय का गठन किया।
  7. यूरोपीय अणु-शक्ति समुदाय तथा यूरोपीय आर्थिक समुदाय – 25 मार्च, 1957 को यूरोपीय आर्थिक समुदाय ( यूरोपीय साझा बाजार) और यूरोपीय अणु शक्ति समुदाय का गठन किया गया।
  8. मास्ट्रिस्ट संधि ( 1991 ): इस संधि ने यूरोप के लिए एक अर्थव्यवस्था, एक मुद्रा, एक बाजार, एक नागरिकता, एक संसद, एक सरकार, एक सुरक्षा व्यवस्था तथा एक विदेश नीति का मार्ग प्रशस्त किया।
  9. यूरोपीय संघ ( 1992 ): 1992 में यूरोपीय संघ के रूप में समान विदेश और सुरक्षा नीति, आंतरिक मामलों तथा न्याय से जुड़े मुद्दों पर सहयोग और एक समान मुद्रा के चलन के लिए रास्ता तैयार हो गया। 1 जनवरी, 1999 को यूरोपीय संघ की साझा यूरो मुद्रा को औपचारिक रूप से स्वीकृति दे दी।

प्रश्न 2.
यूरोपीय संघ की संस्थाओं या अंगों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
यूरोपीय संघ की संस्थाएँ ( अंग ) यूरोपीय संघ सात प्रधान संस्थाओं ( अंगों ) के माध्यम से कार्य करता है। ये निम्नलिखित हैं।

  1. यूरोपियन संघीय परिषद्: यह मुख्य निर्णयकारी संस्था है। इसमें 15 सदस्य देशों के मंत्री शामिल होते हैं। यह परिषद् संघीय कानूनों का निर्माण करती है।
  2. यूरोपीय संसद: 2003 में यूरोपीय संसद के सदस्यों की संख्या 626 थी। ये सदस्य सीधे 5 साल के लिए चुने जाते हैं। यह यूरोपीय संघ के लिए राजनीतिक मंच का कार्य पूरा करती है।
  3. यूरोपीय आयोग: यूरोपीय आयोग के तहत सभी अधिशासियों का विलय कर दिया गया है। इसे यूरोपीय संघ की कार्यकारी संस्था का स्थान प्राप्त है। इसके सदस्यों की संख्या 30 है। इसका कार्यकाल 5 वर्ष होता है।
  4. न्यायालय: यूरोपीय संघ के दो न्यायालय हैं।
    • (अ) न्याय का न्यायालय और
    • (ब) उपाय का न्यायालय। दोनों में 15-15 न्यायाधीश होते हैं। इनके न्यायाधीशों की नियुक्ति सदस्य राज्यों की आपसी सहमति से की जाती है। इनका कार्यकाल 6 वर्ष होता है।
  5. लेखा परीक्षकों का न्यायालय-यूरोपीय संघ में लेखा-परीक्षकों का एक न्यायालय है जिसमें 15 सदस्य होते हैं। इसका कार्य यह देखना है कि संघ का आय तथा व्यय कानून के अनुसार हो।
  6. आर्थिक व सामाजिक समिति: यह एक सलाहकार संस्था है। इसमें 222 सदस्य होते हैं। यह समिति नौकरी देने वाले व्यापार संघों तथा उपभोक्ताओं का प्रतिनिधित्व करती है।
  7. यूरोपीय निवेश बैंक: विभिन्न प्रोजेक्टों को धन देना, समुदाय के हितों की रक्षा तथा साझे बाजार के संतुलित विकास के लिए कार्य करना इस बैंक के मुख्य उद्देश्य हैं।

प्रश्न 3.
माओ युग के पश्चात् चीन में अपनायी गई नयी आर्थिक नीतियों, उसके कारणों तथा परिणामों को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
माओ के पश्चात् नवीन आर्थिक नीतियाँ अपनाने के कारण – 1950-60 के दशक में चीन अपना उतना आर्थिक विकास नहीं कर पा रहा था, जितना वह चाह रहा था; क्योंकि-

  1. अर्थव्यवस्था की विकास दर 5-6 फीसदी थी, लेकिन जनसंख्या में 2-3 फीसदी की वार्षिक वृद्धि इस विकास दर पर पानी फेर रही थी और बढ़ती आबादी विकास के लाभ से वंचित रह जा रही थी।
  2. खेती की पैदावार उद्योगों की पूरी जरूरत लायक अधिशेष नहीं दे पा रही थी।
  3. इसका औद्योगिक उत्पादन तेजी से नहीं बढ़ रहा था। विदेशी व्यापार न के बराबर था और प्रति व्यक्ति आय बहुत कम थी।

माओ युग के पश्चात् चीन की नयी आर्थिक नीतियाँ: 1970 के दशक में आर्थिक संकट से उबरने के लिये अमरीका से संबंध बढ़ाकर अपने राजनैतिक और आर्थिक एकान्तवास को खत्म किया; कृषि, उद्योग, सेना तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आधुनिकीकरण का रास्ता अपनाया; आर्थिक सुधारों और खुले द्वार की नीति अपनायी और खेती तथा उद्योगों का निजीकरण किया।

नयी आर्थिक नीतियों के लाभकारी परिणाम: नयी आर्थिक नीतियों के निम्न परिणाम निकले

  1. कृषि-उत्पादों तथा ग्रामीण आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई तथा ग्रामीण उद्योगों की तादाद बड़ी तेजी से
  2. उद्योग और कृषि दोनों ही क्षेत्रों में चीन की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर तेज रही।
  3. विदेश – व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
  4. अब चीन पूरे विश्व में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए सबसे आकर्षक देश बनकर उभरा।
  5. लेकिन इससे चीन में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार तथा गरीबी- अमीरी की खाई भी बढ़ी है।

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प्रश्न 4.
आसियान के संगठन तथा उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
दक्षिण – पूर्वी एशियायी राष्ट्रों का संघ – आसियान आसियान की स्थापना 8 अगस्त, 1967 को बैंकाक में 5 मौलिक सदस्यों :

  1. इंडोनेशिया
  2. थाइलैंड
  3. फिलिपींस,
  4. मलेशिया और
  5. सिंगापुर द्वारा की गई। बाद में 1984 में
  6. ब्रूनई दारुस्सलेम, 1995 में
  7. वियतनाम, 1997 में
  8. लाओस और
  9. म्यांमार तथा 1999 में
  10. कम्बोडिया इसमें शामिल हो गये। इस प्रकार आसियान में वर्तमान में 10 सदस्य देश हैं। इसका कार्यालय जकार्ता (इण्डोनेशिया) में है और उसका अध्यक्ष महासचिव होता है।

आसियान की प्रमुख संस्थाएँ ये हैं।

  1. विदेश मंत्रियों के सम्मेलन
  2. सचिवालय
  3. आसियान सुरक्षा समुदाय
  4. आसियान क्षेत्रीय सुरक्षा मंच
  5. आसियान आर्थिक समुदाय आसियान की संस्थाएँ
  6. आसियान सामाजिक-सांस्कृतिक समुदाय।

आसियान के उद्देश्य – आसियान निर्माण के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  1. आसियान क्षेत्र में आर्थिक प्रगति को तेज करना तथा उसके आर्थिक स्थायित्व को बनाए रखना।
  2. सदस्य राष्ट्रों में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और प्रशासनिक क्षेत्रों में परस्पर सहायता करना।
  3. सामूहिक सहयोग से साझी समस्याओं का हल ढूँढ़ना।
  4. साझा बाजार तैयार करना तथा सदस्य देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देना।
  5. कानून के शासन और संयुक्त राष्ट्र के कायदों पर आधारित क्षेत्रीय शांति और स्थायित्व को बढ़ावा देना।

प्रश्न 5.
आसियान के कार्य, भूमिका एवं उपलब्धियों की चर्चा कीजिये।
उत्तर:
आसियान के कार्य, भूमिका तथा उपलब्धियाँ आसियान तेजी से बढ़ता हुआ एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है। आसियान टकराव की जगह बातचीत को बढ़ावा देने की नीति अपनाये हुए है। अनौपचारिक, टकराव रहितं और सहयोगात्मक मेल-मिलाप की आसियान शैली से आसियान ने कंबोडिया के टकराव को समाप्त किया है, पूर्वी तिमोर के संकट को संभाला है।

आसियान की कुछ प्रमुख उपलब्धियाँ इस प्रकार रही हैं।

  1. राजनैतिक सुरक्षा व सहयोग: आसियान सुरक्षा समुदाय तथा आसियान क्षेत्रीय सुरक्षा मंच ने मैत्री और सहयोग संधि, दक्षिण चीन सागर में पक्षकार देशों के आचार पर घोषणा, दक्षिण-पूर्व एशिया नाभिकीय शस्त्र मुक्त क्षेत्र · आयोग आदि के द्वारा सदस्य देशों के बीच सुरक्षा व स्थिरता बनाए रखने के लिए सहकारी ढांचे के निर्माण के प्रयास किये हैं।
  2. आर्थिक सहयोग के प्रयत्न: आर्थिक सहयोग की दिशा में आसियान ने ‘आसियान मुक्त व्यापार क्षेत्र’ तथा ‘आसियान आर्थिक समुदाय’ का गठन कर चीन तथा दक्षिण कोरिया के साथ मुक्त व्यापार सम्बन्धी मसौदे पर हस्ताक्षर किये हैं तथा अन्य देशों के साथ इस ओर प्रयत्न जारी है।
  3. सामाजिक व सांस्कृतिक क्षेत्र में भूमिका: आसियान ने सामाजिक व सांस्कृतिक क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।
  4. एशियायी समुदाय के गठन के मार्ग को प्रशस्त करना: एशियायी समुदाय के गठन की दिशा में आसियान प्रयासरत है।
  5.  एक राजनैतिक मंच के रूप में: आसियान एशिया का एकमात्र ऐसा क्षेत्रीय संगठन है जो एशियायी देशों और विश्व शक्तियों को राजनैतिक और सुरक्षा मामलों पर चर्चा के लिए राजनैतिक मंच उपलब्ध कराता है।

प्रश्न 6.
भारत-चीन के बीच संघर्ष के मुद्दों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
भारत-चीन के संघर्ष के मुद्दे चीन की स्वतंत्रता- 1949 के बाद से कुछ समय के लिए दोनों देशों के सम्बन्ध मैत्रीपूर्ण रहे। कुछ समय के लिए ‘हिन्दी – चीनी भाई-भाई’ का नारा भी लोकप्रिय हुआ किन्तु निम्न मुद्दों के कारण दोनों देशों के बीच संघर्ष व कटुता पैदा हो गयी।

1. तिब्बत का प्रश्न :1949 से पूर्व तिब्बत नाममात्र के लिए चीन के अधीन था और आन्तरिक तथा बाह्य मामलों में पूर्णतः स्वतंत्र था। भारत के साथ तिब्बत के घनिष्ठ व्यापारिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध रहे हैं। 1950 में चीन ने तिब्बत को हड़पने की प्रक्रिया चालू कर दी तथा 1954 में चीन की सरकार ने तिब्बत पर अपना सम्पूर्ण अधिकार जमा लिया। तिब्बतियों ने चीन की नीति का विरोध किया और दलाईलामा ने भारत में आकर शरण ली। चीन ने शरण दिये जाने की भारत की कार्यवाही को अपने प्रति शत्रुता की संज्ञा दी। दलाईलामा की भारत में उपस्थिति वर्तमान में भी चीन के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है।

2. मैकमोहन रेखा तथा सीमा विवाद:
भारत के साथ सीमा विवाद एक ऐतिहासिक देन है। भारत मैकमोहन रेखा को दोनों के बीच सीमा रेखा मानता है, लेकिन चीन इसे स्वीकार नहीं करता है। फलतः वह भारतीय भू-भाग में घुसपैठ करता रहता है। सन् 1962 में भारत और चीन दोनों देश अरुणाचल प्रदेश के कुछ इलाकों और लद्दाख के अक्साई-चिन क्षेत्र पर प्रतिस्पर्धी दावों के चलते लड़ पड़े । 1962 के भारत को सैनिक पराजय झेलनी पड़ी तथा भारत का काफी भू-भाग उसने अपने कब्जे में ले लिया। 1962 से लेकर 1976 तक दोनों देशों के बीच कूटनीतिक सम्बन्ध समाप्त रहे। 1981 के दशक के बाद दोनों देशों के बीच सीमा विवादों को दूर करने के लिए वार्ताओं का सिलसिला जारी है।

3. सिक्किम का भारत में विलय:
श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने सन् 1975 में सिक्किम को भारत में मिलाकर उसे देश का 22वां राज्य घोषित कर दिया। चीन ने इसकी आलोचना की तथा उसके द्वारा प्रदर्शित मानचित्रों में सिक्किम को भारत के हिस्से के रूप में नहीं दर्शाया गया। लेकिन वर्ष 2005 में चीन ने सिक्किम को भारतीय भू-भाग में शामिल कर इसे मान्यता दे दी है और दोनों के मध्य यह विवाद समाप्त हो गया है।

4. भारत के परमाणु परीक्षण पर चीन का विरोध:
मई, 1998 में भारत द्वारा परमाणु परीक्षण किये जाने पर चीन ने अमेरिका के साथ मिलकर भारत की निंदा की। चीन ने भारत पर यह आरोप लगाया कि इससे दक्षिण एशिया में संजीव पास बुक्स परमाणु होड़ शुरू हो जाएगी। वह एक सुसंगठित अभियान चलाकर भारत पर एन. पी. टी. पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डालता रहा । ऐसी स्थिति में दोनों देशों के मध्य कड़वाहट होना स्वाभाविक था।

5. चीन-पाकिस्तान के बीच बढ़ती निकटता:
पाकिस्तान ने परमाणु कार्यक्रम को विकसित करने एवं मिसाइलों के निर्माण में चीन की अहम भूमिका रही है। चीन पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को विकसित कर रहा है तथा पाकिस्तान को सैन्य सहयोग दे रहा है। ये सभी तथ्य भारत के मन में चीन के प्रति संदेह पैदा करते हैं।

6. अन्य मुद्दे – भारत – चीन के कटुता के अन्य मुद्दे ये हैं-

  1. चीन नेपाल को भारत से अलग कर वहाँ अपने सैनिक अड्डे बनाने के प्रयास कर रहा है।
  2. वह समय-समय पर भारतीय सीमा में घुसपैठ करता रहता है।

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प्रश्न 7.
वैकल्पिक शक्ति केन्द्र के रूप में जापान प्रभावकारी है। तथ्यों के माध्यम से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वैकल्पिक शक्ति केन्द्र के रूप में जापान अत्यंत प्रभावकारी है इस बात का अनुमान निम्न तथ्यों से लगाया जा सकता है।

  1. सोनी, पैनासोनिक, कैनन, सुजुकी, होंडा, ट्योटा और माज्दा आदि प्रसिद्ध ब्रांड जापान के हैं। इनके नाम उच्च प्रौद्योगिकी के उत्पाद बनाने के लिए मशहूर हैं।
  2. जापान के पास प्राकृतिक संसाधन कम हैं और वह ज्यादातर कच्चे माल का आयात करता है। इसके बावजूद दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जापान ने बड़ी तेजी से प्रगति की।
  3. जापान 1964 में आर्थिक सहयोग तथा विकास संगठन ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकॉनामिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (OCED) का सदस्य बन गया। 2017 में जापान की अर्थव्यवस्था विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया।
  4. एशिया के देशों में अकेला जापान ही समूह -7 के देशों में शामिल है। आबादी के लिहाज से विश्व में जापान ग्यारहवें स्थान पर है।
  5. परमाणु बम की विभीषिका झेलने वाला जापान इकलौता देश है। जापान संयुक्त राष्ट्रसंघ के बजट में 10 प्रतिशत का योगदान करता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के बजट में अंशदान करने के लिहाज से जापान दूसरा सबसे बड़ा देश है।
  6. 1951 से जापान का अमरीका के साथ सुरक्षा – गठबंधन है। जापान के संविधान के अनुच्छेद 9 के अनुसार- “राष्ट्र के संप्रभु अधिकार के रूप में युद्ध को तथा अंतर्राष्ट्रीय विवादों को सुलझाने में बल-प्रयोग अथवा धमकी से काम लेने के तरीके का जापान के लोग हमेशा त्याग करते हैं।”
  7. जापान का सैन्य व्यय उसके सकल घरेलू उत्पाद का केवल 1 प्रतिशत है फिर भी सैन्य व्यय के लिहाज से जापान सातवें स्थान पर है। उपरोक्त तथ्यों से हम अनुमान लगा सकते हैं कि वैकल्पिक शक्ति केन्द्र के रूप में जापान अत्यंत प्रभावकारी है।

प्रश्न 8.
शीतयुद्ध के पश्चात् दक्षिण कोरिया के अर्थव्यवस्था में तेजी आई। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कोरियाई प्रायद्वीप को द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में दक्षिण कोरिया और उत्तरी कोरिया में 38वें समानांतर के साथ-साथ विभाजित किया गया था। 1950-53 के दौरान कोरियाई युद्ध और शीत युद्ध काल की गतिशीलत ने दोनों पक्षों के बीच प्रतिद्वंद्विता को तेज कर दिया। अंतत: 17 सितंबर, 1991 को दोनों कोरिया संयुक्त राष्ट्र के सदस्य बने। इसी बीच दक्षिण कोरिया एशिया में सत्ता के रूप में केन्द्र बनकर उभरा। 1960 के दशक से 1980 के दशक के बीच, इसका आर्थिक शक्ति के रूप में तेजी से विकास हुआ, जिसे “हान नदी पर चमत्कार” कहा जाता है।

अपने सर्वांगीण विकास को संकेतित करते हुए, दक्षिण कोरिया 1996 में ओईसीडी का सदस्य बन गया। 2017 में इसकी अर्थव्यवस्था दुनिया में ग्यारहवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और सैन्य खर्च में इसका दसवां स्थान है। मानव विकास रिपोर्ट, 2016 के अनुसार दक्षिण कोरिया का एचडीआई रैंक 18 है। दक्षिण कोरिया के उच्च मानव विकास के प्रमुख कारण ‘सफल भूमि सुधार, ग्रामीण विकास, व्यापक मानव संसाधन विकास, तीव्र न्यायसंगत आर्थिक वृद्धि, निर्यात उन्मुखीकरण, मजबूत पुनर्वितरण नीतियाँ, निर्यात उन्मुखीकरण, मजबूत पुनर्वितरण नीतियाँ, सार्वजनिक अवसंरचना विकास, प्रभावी संस्थाएँ और शासन आदि हैं।’

JAC Class 12 History Solutions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

Jharkhand Board JAC Class 12 History Solutions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Solutions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

Jharkhand Board Class 12 History भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ In-text Questions and Answers

पृष्ठ संख्या 144

प्रश्न 1.
क्या आपको लगता है कि तोंदराडिप्पोडि जाति- व्यवस्था के विरोधी थे?
उत्तर:
हाँ, मुझे लगता है कि तोंदराडिप्पोडि जाति- व्यवस्था के विरोधी थे तोंदराडिप्पोडि नामक ब्राह्मण अलवार का कहना था कि यदि चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण भी भगवान विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते तो वे भगवान विष्णु को प्रिय नहीं हैं। दूसरी ओर भगवान विष्णु उन दासों को अधिक पसन्द करते हैं, जो भगवान के चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वे वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत नहीं आते।

पृष्ठ संख्या 144

प्रश्न 2.
क्या ब्राह्मणों के प्रति तोंदराडिप्पोडी और अप्यार के विचारों में समानता है अथवा नहीं?
उत्तर:
स्रोत में प्रस्तुत उद्धरण को पढ़कर लगता कि तोंदराडिप्पोडी और नयनार संत अप्पार के विचारों में पर्याप्त समानता है। अप्पार का उद्धरण भी शास्त्रों को उद्धृत करने वाले ब्राह्मणों की धूर्तता की ओर लक्ष्य करते हुए उन्हें शिव के प्रति निष्ठा और समर्पण तथा उन्हें अपना एकमात्र आश्रयदाता मानकर नतमस्तक होने के लिए प्रेरित करता है।

पृष्ठ संख्या 145

प्रश्न 3.
उन उपायों की सूची बनाइये जिन उपायों से कराइक्काल अम्मइयार अपने आपको प्रस्तुत करती है किस भाँति ये उपाय स्त्री सौन्दर्य की पारम्परिक अवधारणा से भिन्न हैं?
उत्तर:

  • फूली हुई गाड़ियाँ
  • बाहर निकली हुई आँखें
  • सफेद दाँत
  • अन्दर धंसा हुआ पेट
  • लाल केश
  • आगे की ओर निकले दाँत
  • टखनों तक फैली हुई लम्बी पिंडली की नली।

ये उपाय निम्न प्रकार से स्वी सौन्दर्य की पारम्परिक अवधारणा से भिन्न है –

  • काजल लगी हुई मछली जैसी आंखें
  • सफेद दाँत तथा होठों पर लगी हुई लाली
  • काले व गहरे केश
  • मुँह में सही स्थिति में सुन्दर दाँत
  • लम्बी तथा सुन्दर पिंडली तथा पाँवों में पायजेब

पृष्ठ संख्या 146 चर्चा कीजिए

प्रश्न 4.
आपको क्यों लगता है कि शासक भक्तों से अपने सम्बन्ध को दर्शाने के लिए उत्सुक थे?
उत्तर:
वेल्लाल कृषक नयनार और अलवार सन्तों को सम्मानित करते थे। इसलिए शासक भी इन सन्तों का समर्थन प्राप्त करने का प्रयास करते थे। उदाहरण के लिए चोल सम्राटों ने दैवीय समर्थन पाने का दावा किया और अपनी सत्ता के प्रदर्शन के लिए सुन्दर और विशाल मन्दिरों का निर्माण करवाया जिनमें पत्थर और धातु से बनी मूर्तियाँ सुसज्जित थीं। इन सम्राटों ने तमिल भाषा के शैव भजनों का गायना इन मन्दिरों में प्रचलित किया। 945 ई. के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि चोल सम्राट परांतक प्रथम ने सन्त कवि अप्पार संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिवमन्दिर में स्थापित करवाई।

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पृष्ठ संख्या 147

प्रश्न 5.
अनुष्ठानों के प्रति वासवन्ना के रवैये की व्याख्या कीजिए वे किस तरह श्रोता को अपनी बात समझाने का प्रयत्न करते हैं?
उत्तर:
बासवन्ना, लोगों द्वारा किये जा रहे आडम्बर, कर्मकाण्ड तथा मूर्ति पूजा पर कटाक्ष करते हैं। उनका कहना है कि पत्थर से बने सर्प को दूध पिलाते हैं जो पी नहीं लगते सकता और वहीं दूसरी तरफ जीवित सर्प को देखते ही मारने हैं। इसी प्रकार पत्थर की मूर्तियों को भोग लगाते हैं परन्तु भूखे-प्यासे भगवान के सेवकों को भगाने का प्रयास करते हैं।

पृष्ठ संख्या 149

प्रश्न 6.
वे लोग कौन थे जिनकी तरफ से अकबर को अपने फरमान की बेअदबी का अंदेशा था?
उत्तर:
बादशाह अकबर को खम्बायत गुजरात में गिरजाघर के निर्माण में यह हुक्मनामा इसलिए जारी करना पड़ा कि बादशाह को ऐसा अंदेशा था कि सम्भवतः अन्य धर्मों के लोग गिरजाघर के निर्माण का विरोध करें। उस काल में ईसाई धर्म के लोगों की संख्या भी कम थी। अकबर अपनी उदारवादी नीति के कारण अल्पसंख्यक लोगों के संरक्षण हेतु प्रतिबद्ध था।

पृष्ठ संख्या 150

प्रश्न 7.
जोगी द्वारा वंदनीय देवता की पहचान कीजिए जोगी के प्रति बादशाह के रवैये का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
औरंगजेब द्वारा जोगी को लिखे पत्र द्वारा जात होता है कि जोगी शैव धर्म का उपासक है और जोगी के आराध्य देवता भगवान शिव हैं। बादशाह जोगी का बहुत सम्मान करता है और जोगी की हर तरह से मदद करता है। बादशाह के पत्र से औरंगजेब का जोगी के प्रति श्रद्धाभाव प्रकट होता है।

पृष्ठ संख्या 156

प्रश्न 8.
जहाँआरा कौनसी चेष्टाओं का जिक्र करती हैं जो शेख के प्रति उसकी भक्ति को दर्शाते हैं। दरगाह की खासियत को वह किस तरह दर्शाती है?
उत्तर:
वे चेष्टाएँ जो जहाँआरा, शेख मुइनुद्दीन चिश्ती के प्रति श्रद्धा दर्शाती हैं, इस प्रकार हैं-मार्ग में कम-से- कम दो बार नमाज पढ़ना (प्रत्येक पड़ाव पर), रात को बाघ के चमड़े पर न सोना दरगाह की दिशा की ओर पैर न करना, दरगाह की तरफ अपनी पीठ न करना आदि। जहाँआरा दरगाह की विशिष्टताओं का इस प्रकार वर्णन करती है- दरगाह का वातावरण चिराग तथा इत्र से खुशनुमा है, दरगाह पाक और मुकद्दस भी दरगाह के अन्दर पवित्र आत्मिक आनन्द की अनुभूति हुई और जहाँआरा ने दरगाह की चौखट पर अपना सिर रखा।

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पृष्ठ संख्या 157

प्रश्न 9.
इस गाने (स्रोत 8 चरखानामा) के विचार और अभिव्यक्ति के तरीके जहाँआरा की जियारत (स्त्रोत 7) में वर्णित विचारों और अभिव्यक्ति के तरीकों से कैसे समान और भिन्न है?
उत्तर:
इस गाने के विचार और अभिव्यक्ति के तरीके जहाँआरा की जियारत में वर्णित विचारों और अभिव्यक्ति के तरीकों से इस प्रकार भिन्न हैं कि जहाँआरा ने जियारत यानी अपनी भक्ति और इबादत के लिए बाह्य पूजा; जैसाकि शारीरिक कष्ट उठाकर नंगे पाँव जाना, कठिन नियमों का पालन करना आदि का सहारा लिया है। यहाँ पर आत्मपूजा पर बल दिया गया है, अपने अन्दर बैठे परमात्मा की हर श्वास में पूजा करनी है कहीं बाहर नहीं जाना है। समानता इस बात की है कि दोनों पद्धतियों के भाव में कोई फर्क नहीं है। भाव तो परम सत्ता की इबादत का ही है। पृष्ठ संख्या 159 चर्चा कीजिए

प्रश्न 10.
धार्मिक और राजनीतिक नेताओं में टकराव के सम्भावित स्रोत क्या-क्या हैं?
उत्तर:
धार्मिक और राजनीतिक नेताओं में टकराव के सम्भावित स्रोत निम्नलिखित हैं-
(1) अपनी सत्ता का दावा करने के लिए दोनों ही कुछ आचारों पर बल देते थे, जैसे झुककर प्रणाम और कदम चूमना।
(2) कभी-कभी सूफी शेखों को आडम्बरपूर्ण पदवी से सम्बोधित किया जाता था। उदाहरण के लिए शेख निजामुद्दीन औलिया के अनुयायी उन्हें सुल्तान-उल-मशेख (अर्थात् शेखों में सुल्तान) कहकर सम्बोधित करते थे। इसे शासक वर्ग के लोग अपने अहं के विरुद्ध मानते थे।
(3) कभी-कभी धार्मिक नेता शाही भेंट अस्वीकार कर देते थे।

पृष्ठ संख्या 159

प्रश्न 11.
सूफियों और राज्य के बीच सम्बन्ध का कौनसा पहलू इस कहानी से स्पष्ट होता है? यह किस्सा हमें शेख और उनके अनुयायियों के बीच सम्पर्क के तरीकों के बारे में क्या बताता है?
उत्तर:
सूफियों और राज्य के बीच सम्बन्ध का निम्नांकित पहलू इस कहानी से स्पष्ट होता है—शासक वर्ग सूफियों और सन्तों का सम्मान करता था, सूफियों और सन्तों की कृपा प्राप्त करने हेतु शासक वर्ग, सूफियों को आर्थिक तथा अन्य प्रकार की भेंट दिया करता था। सूफी लोग किसी से भेंट का आग्रह नहीं करते थे और न ही संग्रह करते थे सूफी संतों की लोकप्रियता बहुत थी, इसलिए शासक वर्ग भी इनके आशीर्वाद का आकांक्षी रहता था। यह कहानी सूफियों की निस्पृह भावना को भी उजागर करती है, वे निर्लिप्त भाव से रहते थे। वे चीज जैसेकि भूमि आदि, वे अनावश्यक समझते थे, उसे अस्वीकार कर देते थे।

पृष्ठ संख्या 160

प्रश्न 12.
विभिन्न समुदायों के ईश्वर के बीच पार्थक्य के विरुद्ध कबीर किस तरह की दलील पेश करते हैं?
उत्तर:
कबीर के अनुसार संसार का स्वामी एक ही है जो ईश्वर है। लोग ईश्वर को अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि, हजरत आदि नामों से पुकारते हैं कबीर के अनुसार ईश्वर के नाम के बारे में विभिन्नताएं तो केवल शब्दों में हैं जो हमारे द्वारा ही बनाए गए हैं। कबीर कहते हैं कि हिन्दू और मुसलमान दोनों ही भुलाने में हैं। इनमें से कोई भी एक ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता। वे अपना सम्पूर्ण जीवन सत्य से दूर विवादों में ही नष्ट कर देते हैं। पृष्ठ संख्या 164 चर्चा कीजिए

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प्रश्न 13.
आपको क्यों लगता है कि कबीर, गुरुनानक देव और मीराबाई इक्कीसवीं सदी में भी महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
कबीर, गुरुनानक देव तथा मीराबाई ने सामाजिक और धार्मिक क्षेत्रों में व्याप्त कुरीतियों, आडम्बरों एवं अन्धविश्वासों का विरोध किया था। इक्कीसवीं शताब्दी में भी सामाजिक और धार्मिक क्षेत्रों में धार्मिक आडम्बर, कर्मकाण्ड और अन्धविश्वास प्रचलित हैं। अतः कबीर, गुरुनानक देव तथा मीराबाई इक्कीसवीं शताब्दी में भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। उनकी शिक्षाएँ आज भी मानव जाति के लिए उपयोगी हैं।

पृष्ठ संख्या 164

प्रश्न 14.
यह उद्धरण राणा के प्रति मीरा बाई के रुख के बारे में क्या बताता है?
उत्तर:
यह उद्धरण मीरा की भगवान कृष्ण के प्रति आसक्ति एवं अनुराग की पराकाष्ठा का द्योतक है, साथ ही साथ मीरा इस गीत के द्वारा सांसारिक जीवन के प्रति अपने वैराग्य भाव का भी वर्णन करती है। उनके अनुसार गोविन्द के गुण गाने के अतिरिक्त उन्हें अन्य कोई अभिलाषा नहीं है।

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निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 100-150 शब्दों में दीजिए-

प्रश्न 1.
उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए कि सम्प्रदाय के समन्वय से इतिहासकार क्या अर्थ निकालते हैं?
उत्तर:
इतिहासकारों के अनुसार यहाँ कम-से-कम दो प्रक्रियाएँ कार्यरत थीं-
(1) प्रथम प्रक्रिया-प्रथम प्रक्रिया ब्राह्मणीय विचरारा के प्रचार की थी। इसका प्रसार पौराणिक ग्रन्थों की रचना, संकलन और परिरक्षण द्वारा हुआ ये ग्रन्थ सरल संस्कृत छन्दों में थे, जिन्हें वैदिक विद्या से विहीन स्विय और शूद्र भी पढ़ सकते थे।
(2) द्वितीय प्रक्रिया द्वितीय प्रक्रिया थी स्त्रिय शूद्रों व अन्य सामाजिक वर्गों की आस्थाओं और आचरणों को ब्राह्मण द्वारा स्वीकृत किया जाना और उसे एक नया रूप प्रदान करना।

समाजशास्त्रियों का मत – कुछ समाजशास्त्रियों की यह मान्यता है कि सम्पूर्ण उपमहाद्वीप में अनेक धार्मिक विचारधाराएँ तथा पद्धतियाँ ‘महान’ संस्कृत पौराणिक परिपाटी तथा ‘लघु’ परम्परा के बीच हुए निरन्तर संवाद का परिणाम हैं। इस प्रक्रिया का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण पुरी (उड़ीसा) में मिलता है, जहाँ बारहवीं शताब्दी तक आते-आते मुख्य देवता को जगन्नाथ के रूप में प्रस्तुत किया गया और उन्हें विष्णु का एक स्वरूप माना गया। समन्वय के ऐसे उदाहरण देवी सम्प्रदायों में भी मिलते हैं। स्थानीय देवियों को पौराणिक परम्परा के भीतर मुख्य देवताओं की पत्नी के रूप में मान्यता दी गई थी। कभी वह लक्ष्मी के रूप में विष्णु की पत्नी बनीं और कभी शिव की पत्नी पार्वती के रूप में सामने आई।

प्रश्न 2.
किस हद तक उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली मस्जिदों का स्थापत्य स्थानीय परिपाटी और सार्वभौमिक आदर्शों का सम्मिश्रण है?
उत्तर:
उपमहाद्वीप में अनेक मुस्लिम शासकों ने अनेक मस्जिदें बनवाई। इन मस्जिदों की स्थापत्य कला में स्थानीय परिपाटी और सार्वभौमिक धर्म का जटिल मिश्रण दिखाई देता है। इन मस्जिदों के कुछ स्थापत्य सम्बन्धी तत्त्व सार्वभौमिक थे-जैसे इमारत का मक्का की ओर अनुस्थापन जो मेहराब (प्रार्थना का आला) तथा मिनवार ( व्यासपीठ) की स्थापना से चिन्हित होता था।

दूसरी ओर स्थापत्य सम्बन्धी कुछ जैसे छत और निर्माण की सामग्री उदाहरण के लिए केरल में तेरहवीं शताब्दी में निर्मित एक मस्जिद जिसकी छत मन्दिर के शिखर से मिलती-जुलती है। दूसरी ओर जिला मैमनसिंग (बांग्लादेश) में ईटों की बनी अतिया मस्जिद की छत गुम्बददार है जो केरल में निर्मित मस्जिद की छत से भिन्न है। इसी प्रकार श्रीनगर की झेलम नदी के किनारे बनी शाह हमदान मस्जिद के स्थापत्य सम्बन्धी तत्त्व उपर्युक्त दोनों मस्जिदों के स्थापत्य सम्बन्धी तत्त्वों से अलग हैं। यह मस्जिद कश्मीरी लकड़ी की स्थापत्यकला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

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प्रश्न 3.
बे-शरिया और बा- शरिया सूफी परम्परा के बीच एकरूपता और अन्तर दोनों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मुस्लिम कानूनों के संग्रह को शरिया कहते हैं। यह कुरान शरीफ और हदीस पर आधारित है। यह कानून मुस्लिम समुदाय को निर्देशित करता है। हदीस का तात्पर्य है पैगम्बर मोहम्मद साहब से जुड़ी परम्पराएँ। इन परम्पराओं में मोहम्मद साहब की स्मृति से जुड़े हुए शब्द और उनके क्रियाकलापों का समावेश है कुछ रहस्यवादियों ने सूफी सिद्धान्तों की मौलिक व्याख्या के आधार पर नवीन आन्दोलनों की नींव रखी।

खानकाह का तिरस्कार करके ये रहस्यवादी, फकीर का जीवन बिताते थे निर्धनता तथा ब्रह्मचर्य को उन्होंने गौरव प्रदान किया। इन्हें मदारी, कलंदर, मलंग हैदरी आदि नामों से जाना जाता था। शरिया की अवहेलना करने के कारण उन्हें शरिया कहा जाता था। दूसरी ओर का पालन करने वाले सूफी वा शरिया कहलाते थे। यहाँ रोचक तथ्य यह है कि वे शरिया तथा बा- शरिया दोनों ही इस्लाम से सम्बन्ध रखते थे। इन सूफी परम्पराओं के बीच एकरूपता भी थी। बे शरिया तथा बा-शरिया दोनों परम्पराओं के सूफी इस्लाम से सम्बन्धित थे दोनों ही इस्लाम के मूल सिद्धान्तों में विश्वास करते थे।

प्रश्न 4.
चर्चा कीजिए कि अलवार, नवनार और वीरशैवों ने किस प्रकार जाति प्रथा की आलोचना प्रस्तुत की?
उत्तर:
(1) अलवार और नयनार तमिलनाडु के भक्ति संत थे। कुछ इतिहासकारों का यह मानना है कि अलवार और नयनार सन्तों ने जातिप्रथा व ब्राह्मणों की प्रभुता का विरोध किया। कुछ सीमा तक यह बात सत्य प्रतीत होती है कि क्योंकि भक्ति संत विविध समुदायों में से थे जैसे ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान आदि कुछ भक्तिसंत तो ‘अस्पृश्य’ मानी जाने वाली जातियों से सम्बन्धित थे। उन्होंने अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए विभिन्न भाषाओं का प्रयोग किया। इन्होंने सम्पूर्ण उपमहाद्वीप में घूम-घूम कर अपनी शिक्षाओं का प्रचार किया। उन्होंने अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए स्थानीय भाषाओं का प्रयोग किया, जिन्हें अधिकाधिक लोग समझ सकते थे और उन्हें अपने जीवन में ग्रहण कर सकते थे।

उनके उपदेश और शिक्षाएँ भी सरल और व्यावहारिक थीं जिन्हें जनसाधारण की भाषाओं में व्यक्त करना उपयोगी था। यदि वे किसी एक विशिष्ट भाषा को अपने विचार व्यक्त करने के लिए माध्यम बनाते तो उन्हें अपने उद्देश्यों में सफलता मिलना बहुत कठिन था, इसलिए जन साधारण तक पहुँचने के लिए भक्ति तथा सूफी चिन्तकों ने जन साधारण को भाषाओं का ही सहारा लिया।

इस तथ्य की पुष्टि के लिए निम्नलिखित उदाहरणों से होती है –
उदाहरण –
(1) नमनार और अलवार सन्तों ने अपनी शिक्षाओं का प्रचार तमिल भाषा में किया। वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करते हुए तमिल में अपनी शिक्षाओं का प्रचार करते थे।
(2) कबीर के भजन अनेक भाषाओं और बोलियों में मिलते हैं। उनकी भाषा खिचड़ी है जिसमें पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूर्वी ब्रजभाषा आदि अनेक भाषाओं का मेल है।
(3) गुरु नानक ने अपने विचार पंजाबी भाषा में ‘शब्द’ के माध्यम से लोगों के सामने रखे उनके पदों और भजनों में उर्दू-फारसी के तत्कालीन प्रचलित शब्दों का प्रयोग मिलता है। सम्भवतः इसका कारण यह था कि उनका जन्म स्थान और प्रचारक्षेत्र पंजाब था, जहाँ उन शब्दों का जन साधारण में प्रचलन हो चुका था।
(4) मीरा ने भी अपने विचार बोलचाल की भाषा राजस्थानी में व्यक्त किये। इस पर ब्रज भाषा, गुजराती और खड़ी बोली का भी रंग चढ़ा हुआ है।
(5) सूफी सन्तों ने जन साधारण की भाषा खड़ी बोली में अपने विचार व्यक्त किये। सूफी सन्त बाबा फरीद ने क्षेत्रीय भाषा में काव्य रचना की। इसके अतिरिक्त उन्होंने पंजाबी, गुजराती आदि भाषाओं में भी अपने विचार लोगों के सामने रखे।

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प्रश्न 9.
इस अध्याय में प्रयुक्त किन्हीं पाँच स्रोतों का अध्ययन कीजिए और उनमें निहित सामाजिक व धार्मिक विचारों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक एवं धार्मिक विचार इस अध्याय में प्रयुक्त स्रोतों के अध्ययन से उनमें निहित सामाजिक व धार्मिक विचारों का वर्णन इस प्रकार है –
(1) स्रोत 1 (चतुर्वेदी और अस्पृश्य) चतुर्वेदी ब्राह्मण चारों वेदों के ज्ञाता थे परन्तु वे भगवान विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते थे। इसलिए भगवान विष्णु उन दासों को अधिक पसन्द करते हैं जो उनके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे दास वर्ण व्यवस्था में शामिल नहीं थे। इस स्रोत से प्रकट होता है कि तमिलनाडु के अलवार सन्त जाति व्यवस्था के विरोधी थे।

(2) स्रोत 4 (अनुष्ठान और यथार्थं संसार) – इस स्रोत में बताया गया है कि ब्राह्मण सर्प की पत्थर की मूर्ति पर दूध चढ़ाते हैं, परन्तु असली साँप को देखते ही वे उसे मारने पर कटिबद्ध हो जाते हैं। इसी प्रकार ब्राह्मण देवता के भूखे सेवक को भोजन देने से इन्कार कर देते हैं, जबकि यह भोजन परोसने पर खा सकता है। इसके विपरीत, वे भगवान की प्रतिमा को भोजन परोसते हैं, जबकि वह भोजन नहीं खा सकती है। इस स्रोत में अनुष्ठानों की निरर्थकता पर प्रकाश डाला गया है।

(3) स्रोत 5 (खम्बात का गिरजाघर)- जब मुगल- सम्राट अकबर को ज्ञात हुआ कि ईसाई धर्म के पादरी गुजरात के खम्बात शहर में उपासना के लिए एक गिरजाघर का निर्माण करना चाहते थे, तो अकबर की ओर से एक शाही फरमान जारी किया गया कि खम्बात के महानुभाव किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न न करें और ईसाइयों को गिरजाघर का निर्माण करने दें। इससे मुगल सम्राट अकबर की उदारता, धर्म-सहिष्णुता और सभी धर्मों के प्रति सम्मान की भावना के बारे में जानकारी मिलती है।

(4) स्रोत 6 (जोगी के प्रति श्रद्धा)- इस स्रोत के अध्ययन से पता चलता है कि मुगल सम्राट औरंगजेब ने गुरु आनन्दनाथ नामक एक जोगी के प्रति अत्यधिक सम्मान प्रकट किया और उसने जोगी को पोशाक के लिए वस्व तथा पच्चीस रुपये भेंट के रूप में भेजे। उसने जोगी को यह भी लिखा कि वह किसी भी प्रकार की सहायता के लिए उन्हें लिख सकते थे इस स्रोत से औरंगजेब की दानशीलता तथा अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णुता तथा सम्मान की भावना का बोध होता है।

(5) स्त्रोत 10 (एक ईश्वर )-इस खोत से कबीर की शिक्षाओं के बारे में जानकारी मिलती है। इसमें कबीर ने बताया है कि संसार का एक ही स्वामी है। ईश्वर को अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि तथा हजरत आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है। विभिन्नताएँ तो केवल शब्दों में ही जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं। कबीर कहते हैं दोनों ही भुलावे में हैं। वे पूरा जीवन विवादों में ही बिता देते हैं। इस स्रोत से पता चलता है कि कबीर एकेश्वरवादी धे तथा बहुदेववाद के विरुद्ध थे। उन्होंने धार्मिक आडम्बरों की भी कटु आलोचना की है और एक ईश्वर की उपासना पर ही बल दिया है।

भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ JAC Class 12 History Notes

→ साहित्य और मूर्तिकला में देवी-देवताओं का दृष्टिगत होना लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी तक के काल की सम्भवत: सबसे प्रभावी विशिष्टता यह है कि साहित्य और मूर्तिकला दोनों में ही अनेक प्रकार के देवी- देवता अधिकाधिक दृष्टिगत होते हैं। इससे पता चलता है कि विष्णु, शिव और देवी की आराधना की परिपाटी न केवल चलती रही, बल्कि और अधिक विस्तृत हुई।

→ पूजा प्रणालियों का समन्वय इतिहासकारों के अनुसार यहाँ कम से कम दो प्रक्रियाएँ कार्यरत थीं। एक प्रक्रिया ब्राह्मणीय विचारधारा के प्रचार की थी। इसी काल की एक अन्य प्रक्रिया थी जिसमें स्वियों शूद्रों तथा अन्य सामाजिक वर्गों की आस्थाओं और आचरणों को ब्राह्मणों ने स्वीकृति प्रदान की थी और उसे एक नवीन रूप प्रदान किया
था।

→ तान्त्रिक पूजा पद्धति-अधिकांशतः देवी की आराधना पद्धति को तान्त्रिक नाम से जाना जाता है। तान्त्रिक पूजा पद्धति उपमहाद्वीप के कई भागों में प्रचलित थी। इसके अन्तर्गत स्वी और पुरुष दोनों ही शामिल हो सकते थे। इस पद्धति के विचारों ने शैव और बौद्ध दर्शन को भी प्रभावित किया, विशेष रूप से उपमहाद्वीप के पूर्वी उत्तरी और दक्षिणी भागों में कभी-कभी पूजा परम्पराओं में संघर्ष की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती थी। वैदिक परिपाटी के अनुयायी उन सभी आचारों की निन्दा करते थे, जो ईश्वर की उपासना के लिए मन्त्रों के उच्चारण के साथ यहाँ के सम्पादन से अलग थे। इसके विपरीत वे लोग थे, जो तान्त्रिक आराधना के उपासक थे और वैदिक सत्ता को स्वीकार नहीं करते थे।

JAC Class 12 History Solutions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

→ भक्ति परम्परा आठवीं से अठारहवीं सदी के काल से पूर्व लगभग एक हजार वर्ष प्राचीन भक्तिपूर्ण उपासना की परम्परा रही है। इस समय भक्ति प्रदर्शन में मन्दिरों में इष्टदेव की आराधना से लेकर उपासकों के प्रेमभाव में तल्लीन हो जाना दिखाई पड़ता है। भक्ति रचनाओं का उच्चारण अथवा गाया जाना इस उपासना पद्धति के अंश थे।

→ उपासना की कविताएँ प्रारम्भिक भक्ति परम्परा कई बार संत कवि ऐसे नेता के रूप में उभरे जिनके आस-पास भक्तजनों का एक पूरा समुदाय रहता था। इन परम्पराओं ने स्वियों तथा निम्न वर्गों को भी स्वीकृति प्रदान की विविधता भक्ति परम्परा की एक अन्य विशेषता भी धर्म के इतिहासकार भक्ति परम्परा को दो मुख्य वर्गों में बाँटते हैं –

  • सगुण (विशेषण सहित ) तथा
  • निर्गुण (विशेषण विहीन) प्रथम वर्ग में शिव, विष्णु तथा उनके अवतार व देवियों की आराधना आती है।

इनकी मूर्त रूप में अवधारणा हुई। निर्गुण भक्ति परम्परा में अमूर्त, निराकार ईश्वर की उपासना की जाती थी।

→ तमिलनाडु के अलवार और नवनार संत-प्रारम्भिक भक्ति आन्दोलन लगभग छठी शताब्दी में अलवारों एवं नयनारों के नेतृत्व में हुआ अलवार विष्णु के उपासक थे, जबकि नयनार शिव की उपासना करते थे। अपनी यात्राओं के दौरान अलवार और नयनार संतों ने कुछ पवित्र स्थलों को अपने इष्ट का निवास स्थल घोषित किया। बाद में इन्हीं स्थलों पर विशाल मन्दिरों का निर्माण हुआ और वे तीर्थ स्थल माने गए।

→ जाति के प्रति दृष्टिकोण-कुछ इतिहासकारों के अनुसार अलवार और नयनार सन्तों ने जातिप्रथा व ब्राह्मणों के प्रभुत्व के विरोध में आवाज उठाई अलवार और नवनार संतों की रचनाओं को वेद जितना महत्त्वपूर्ण बताकर इस परम्परा को सम्मानित किया गया। अलवार सन्तों के एक मुख्य काव्य संकलन ‘नलविरादिव्य प्रबन्धम्’ का वर्णन तमिल वेद के रूप में किया जाता था।

→ स्त्री भक्त इस परम्परा की सबसे बड़ी विशिष्टता इसमें स्विर्षो की उपस्थिति थी। अंडाल नामक अलवार स्वी के भक्तिगीत व्यापक स्तर पर गाए जाते थे और आज भी गाए जाते हैं। करइक्काल अम्मदवार एक शिवभक्त महिला श्री जिसने घोर तपस्या का मार्ग अपनाया।

→ राज्य के साथ सम्बन्ध-तमिल भक्ति रचनाओं में बौद्ध और जैन धर्म के प्रति विरोध की भावना व्यक्त की गई है। नयनार सन्तों की रचनाओं में यह विरोध विशेष रूप से दिखाई देता है। इसका कारण यह था कि परस्पर- विरोधी धार्मिक समुदायों में राजकीय अनुदान को लेकर प्रतिस्पद्धां थी। शक्तिशाली चोल सम्राटों ने ब्राह्मणीय तथा भक्ति परम्परा को समर्थन दिया तथा विष्णु और शिव के मन्दिरों के निर्माण के लिए भूमि अनुदान दिया। चिदम्बरम, तंजावुर तथा गंगैकोंडचोलपुरम के विशाल शिव मन्दिर चोल सम्राटों की सहायता से ही बनाए गए थे चोल सम्राटों ने अपनी सत्ता के प्रदर्शन के लिए सुन्दर मन्दिर बनवाये जिनमें पत्थर तथा धातु से बनी मूर्तियाँ सुसज्जित थीं।

→ कर्नाटक की वीर शैव परम्परा-बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक में एक नवीन आन्दोलन का सूत्रपात हुआ जिसका नेतृत्व बासवन्ना ( 1106-1168) नामक एक ब्राह्मण ने किया। बासवन्ना के अनुयायी वीरशैव (शिव के बीर) व लिंगायत (लिंग धारण करने वाले) कहलाए। लिंगायत शिव की आराधना लिंग के रूप में करते हैं। इनका विश्वास है कि मृत्योपरान्त भक्त शिव में लीन हो जायेंगे तथा इस संसार में पुनः नहीं लौटेंगे। ये लोग श्राद्ध संस्कार का पालन नहीं करते तथा अपने मृतकों को विधिपूर्वक दफनाते हैं। लिंगायतों ने जाति की अवधारणा तथा कुछ समुदायों के दूषित होने की ब्राह्मणीय अवधारणा का विरोध किया। उन्होंने वयस्क विवाह तथा विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया।

JAC Class 12 History Solutions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

→ उत्तरी भारत में धार्मिक उफान उत्तरी भारत में अनेक राजपूत राज्यों का उद्भव हुआ। इन सभी राज्यों में ब्राह्मणों का महत्त्वपूर्ण स्थान था और वे ऐहिक और आनुष्ठानिक दोनों ही कार्य करते थे। इसी समय नाथ, जोगी तथा सिद्ध नामक धार्मिक नेताओं का प्रादुर्भाव हुआ। अनेक नवीन धार्मिक नेताओं ने वेदों की सत्ता को चुनौती दी और अपने विचार आम लोगों की भाषा में व्यक्त किए। तेरहवीं सदी में दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई। सल्तनत की स्थापना से राजपूत राज्यों का और उनसे जुड़े ब्राह्मणों का पराभव हुआ। इन परिवर्तनों का प्रभाव संस्कृति और धर्म पर भी पड़ा।

→ शासकों और शासितों के धार्मिक विश्वास बहुत से क्षेत्रों में इस्लाम शासकों का स्वीकृत धर्म था। सैद्धान्तिक रूप से मुसलमान शासकों को उलमा के मार्गदर्शन पर चलना होता था। उलमा से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे शासन में शरिया का पालन करवाएँगे। परन्तु उपमहाद्वीप में स्थिति जटिल थी क्योंकि बड़ी जनसंख्या इस्लाम धर्म को मानने वाली नहीं थी। इस संदर्भ में जिम्मी अर्थात् संरक्षित श्रेणी का प्रादुर्भाव हुआ। जिम्मी वे लोग थे जो उद्घाटित धर्म ग्रन्थ को मानने वाले थे।

ये लोग जजिया नामक कर चुका कर मुसलमान शासकों द्वारा संरक्षण दिए जाने के अधिकारी हो जाते थे। हिन्दू भी इनमें सम्मिलित कर लिए गए। वास्तव में शासक शासितों की ओर काफी लचीली नीति अपनाते थे। उदाहरण के लिए बहुत से शासकों ने भूमि अनुदान व कर की छूट हिन्दू, जैन, पारसी, ईसाई और यहूदी धर्म संस्थाओं को दी तथा गैर मुसलमान धार्मिक नेताओं के प्रति श्रद्धाभाव व्यक्त किया।

→ लोक प्रचलन में इस्लाम इस्लाम धर्म के पाँच प्रमुख सिद्धान्त हैं –

  • अल्लाह एकमात्र ईश्वर है, पैगम्बर मोहम्मद उनके दूत हैं
  • दिन में पाँच बार नमाज पढ़ी जानी चाहिए।
  • खैरात (जात) बॉटनी चाहिए।
  • रमजान के महीने में रोजा रखना चाहिए
  • हज के लिए मक्का जाना चाहिए।

→ मस्जिदों के स्थापत्य सम्बन्धी सार्वभौमिक तत्त्व-मस्जिदों के कुछ स्थापत्य सम्बन्धी तत्त्व सार्वभौमिक थे जैसे इमारत का मक्का की ओर अनुस्थापन जो मेहराब और मिनबार की स्थापना से लक्षित होता था बहुत से तत्त्व ऐसे थे जिनमें भिन्नता देखने में आती है जैसे छत और निर्माण का सामान।

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→ समुदायों के नाम- लोगों का वर्गीकरण उनके जन्म स्थान के आधार पर किया जाता था जैसे तुर्की मुसलमानों को तुरुष्क तथा तजाकिस्तान से आए लोगों को ताजिक और फारस से आए लोगों को पारसीक नाम से सम्बोधित किया गया। प्रवासी समुदायों के लिए ‘म्लेच्छ’ शब्द का प्रयोग किया जाता था इससे ज्ञात होता है कि वे वर्ण नियमों का पालन नहीं करते थे तथा ऐसी भाषाएँ बोलते थे जो संस्कृत से नहीं उपजी थीं।

→ सूफी मत का विकास खिलाफत की बढ़ती विषयशक्ति के विरुद्ध कुछ आध्यात्मिक लोगों का रहस्यवाद और वैराग्य की ओर शुकाव बढ़ा जिन्हें सूफी कहा जाता था। इन लोगों ने रूढ़िवादी परिभाषाओं तथा धर्माचार्यों द्वारा ‘की गई कुरान और सुन्ना (पैगम्बर के व्यवहार) की बौद्धिक व्याख्या की आलोचना की। उन्होंने मुक्ति की प्राप्ति के लिए ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों के पालन पर बल दिया। उन्होंने पैगम्बर मोहम्मद साहब को इंसान-ए- कामिल बताते हुए उनका अनुसरण करने का उपदेश दिया।

→ खानकाह और सिलसिला संस्थागत दृष्टि से सूफी अपने को एक संगठित समुदाय खानकाह के इर्द- गिर्द स्थापित करते थे। खानकाह का नियन्त्रण शेख, पीर अथवा मुशींद के हाथ में था। बारहवीं शताब्दी के आस-पास इस्लामी जगत् में सूफी सिलसिलों का गठन होने लगा। सिलसिला का शाब्दिक अर्थ है जंजीर जो शेख और मुरीद के बीच एक निरन्तर रिश्ते का प्रतीक है जिसकी पहली अटूट कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है पीर की मृत्यु के बाद उसकी दरगाह उसके मुरीदों के लिए भक्ति का स्थल बन जाती थी। इस प्रकार पीर की दरगाह पर जियारत के लिए जाने की, विशेषकर उनकी बरसी के अवसर पर परिपाटी चल निकली। इस परिपाटी को ‘उर्स’ कहा जाता था।

→ खानकाह के बाहर कुछ रहस्यवादी खानकाह का तिरस्कार करके फकीर का जीवन विताते थे। ये गरीबी में रहते थे तथा ब्रह्मचर्य का पालन करते थे। ये कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी आदि नामों से जाने जाते थे। 19. उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला बारहवीं सदी के अन्त में भारत आने वाले सूफी समुदायों में चिश्ती सबसे अधिक प्रभावशाली थे। खानकाह सामाजिक जीवन का केन्द्र बिन्दु था शेख निजामुद्दीन औलिया का खानकाह दिल्ली शहर की बाहरी सीमा पर यमुना नदी के किनारे गियासपुर में था जहाँ सहवासी और अतिथि रहते थे और उपासना करते थे।

यहाँ एक सामुदायिक रसोई (लंगर) फुतूह (बिना मांगी खैर) पर चलती थी। यहाँ विभिन्न वर्गों के लोग आते थे। कुछ अन्य मिलने वालों में अमीर हसन सिजजी और अमीर खुसरो जैसे कवि तथा दरबारी इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी जैसे लोग शामिल थे। शेख निजामुद्दीन ने कई आध्यात्मिक वारिसों का चुनाव किया और उन्हें उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों में खानकाह स्थापित करने के लिए नियुक्त किया।

→ चिश्ती उपासना जियारत और कव्वाली सूफी सन्तों की दरगाह पर की गई जियारत सम्पूर्ण इस्लामी जगत् में प्रचलित है। इनमें सबसे अधिक पूजनीय दरगाह ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की है, जिन्हें ‘गरीब नवाज कहा जाता है। अजमेर में स्थित यह दरगाह शेख की सदाचारिता और धर्मनिष्ठा तथा उनके आध्यात्मिक वारिसों की महानता आदि के कारण लोकप्रिय थी। सोलहवीं सदी तक अजमेर की यह दरगाह बहुत ही लोकप्रिय हो गई थी।

अकबर ने 14 बार इस दरगाह की यात्रा की प्रत्येक यात्रा पर वह दान भेंट दिया करता था। 1568 में अकबर ने तीर्थयात्रियों के लिए खाना पकाने के लिए एक विशाल देग दरगाह को भेंट की। नाच और संगीत भी जियारत के भाग थे, विशेष रूप से कव्वालों द्वारा प्रस्तुत रहस्यवादी गुणगान, जिससे परमानन्द की भावना को जागृत किया जा सके। सूफी सन्त क्रि (ईश्वर का नाम-जप) या फिर समा अर्थात् आध्यात्मिक संगीत की महफिल के द्वारा ईश्वर की उपासना में विश्वास खते थे।

→ भाषा और सम्पर्क चिश्तियों ने स्थानीय भाषा को अपनाया। दिल्ली में चिश्ती सिलसिले के लोग हिन्दवी में बातचीत करते थे बाबा फरीद ने क्षेत्रीय भाषा में काव्य रचना की। बीजापुर कर्नाटक में दक्खनी (उर्दू का रूप) में चिश्ती सन्तों ने छोटी कविताएँ लिखीं।

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→ सूफी और राज्य सुल्तानों ने खानकाहों को करमुक्त (इनाम) भूमि अनुदान में दी और दान सम्बन्धी न्यास स्थापित किये चिश्ती धन और सामान के रूप में दान स्वीकार करते थे किन्तु इनको संजोने के बजाय भोजन, कपड़े, रहने की व्यवस्था, अनुष्ठानों आदि पर पूरी तरह खर्च कर देते थे। शासक न केवल सूफी सन्तों से सम्पर्क रखना चाहते थे, अपितु उनका समर्थन पाने के भी इच्छुक थे जब तुकों ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की तो उलमा द्वारा शरिया लागू किए जाने की मांग की गई जिसे सुल्तानों ने ठुकरा दिया। ऐसे समय सुल्तानों ने सूफी सन्तों का सहारा लिया। सुल्तानों और सूफियों के बीच तनाव के उदाहरण भी मिलते हैं।

→ नवीन भक्ति पंथ-कबीर की ‘बानी’ तीन विशिष्ट परिपाटियों में संकलित है। ‘कवीर बीसक’ कबीरपंथियों द्वारा वाराणसी तथा उत्तर प्रदेश के अन्य स्थानों पर संरक्षित है। ‘कबीर ग्रन्थावली’ का सम्बन्ध राजस्थान के दादुपधियों से है। कबीर के कई पद ‘ आदि ग्रन्थ साहिब’ में भी संकलित हैं। कबीर की रचनाएँ अनेक भाषाओं और बोलियों में मिलती हैं। उनकी कुछ रचनाएँ ‘उलटबांसी’ कहलाती हैं जो इस प्रकार लिखी गई हैं कि उनके दैनिक अर्थ को उलट दिया गया।

इन उलटबाँसी रचनाओं का तात्पर्य परम सत्य के स्वरूप को समझने की कठिनाई दर्शाता है ‘कबीर वानी’ की एक प्रमुख विशिष्टता यह भी है कि उन्होंने परम सत्य का वर्णन करने के लिए अनेक परिपाटियों का सहारा लिया है। वैष्णव परम्परा की जीवनियों में कबीर को जन्म से हिन्दू कबीरदास बताया गया है किन्तु उनका पालन गरीब मुसलमान परिवार में हुआ, जो जुलाहे थे और कुछ समय पहले ही इस्लाम धर्म के अनुयायी बने थे। इन जीवनियों में रामानन्द को कबीर का गुरु बताया गया है। परन्तु इतिहासकारों का यह मानना है कि कबीर और रामानन्द का समकालीन होना कठिन प्रतीत होता है।

→ बाबा गुरुनानक बाबा गुरुनानक का जन्म 1469 ई. में एक हिन्दू व्यापारी परिवार में हुआ। उनका जन्म स्थान पंजाब का ननकाना गाँव था जो रावी नदी के पास था उनका विवाह छोटी आयु में हो गया था, परन्तु वह अपना अधिक समय सूफी और भक्त संतों के बीच व्यतीत करते थे। उन्होंने निर्गुण भक्ति का प्रचार किया। उन्होंने यज्ञ, आनुष्ठानिक स्थान, मूर्तिपूजा, कठोर तप आदि बाहरी आडम्बरों का विरोध किया।

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उन्होंने हिन्दू तथा मुसलमानों के धर्मग्रन्थों को भी नकार दिया। उन्होंने रब (ईश्वर) की उपासना के लिए एक सरल उपाय बताया और वह था उनका निरन्तर स्मरण व नाम का जाप उन्होंने अपने विचार पंजाबी भाषा में ‘शब्द’ के माध्यम से सामने रखे। उन्होंने अपने | अनुयायियों को एक समुदाय में संगठित किया। उन्होंने अपने अनुवायी अंगद को अपने बाद गुरुपद पर आसीन किया। इस परिपाटी का पालन 200 वर्षों तक होता रहा।

→ गुरबानी पाँचवें गुरु अर्जुनदेवजी ने बाबा गुरुनानक तथा उनके चार उत्तराधिकारियों, बाबा फरीद रविदास तथा कबीर की बानी को ‘आदि ग्रंथ साहिब’ में संकलित किया। इनको ‘गुरबानी’ कहा जाता है। सत्रहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में दसवें गुरु गोविन्द सिंहजी ने नवें गुरु तेग बहादुर की रचनाओं को भी इसमें शामिल किया और इस ग्रन्थ को ‘गुरु ग्रन्थ साहिब’ कहा गया।

→ खालसा पंथ गुरु गोविन्द सिंह ने खालसा पंथ (पवित्रों की सेना) की नींव डाली और उनके पाँच प्रतीकों का वर्णन किया –

  • बिना कटे केश
  • कृपाण
  • कच्छा
  • कंघा
  • लोहे का कड़ा।

→ मीराबाई, भक्तिमय राजकुमारी मीराबाई संभवतः भक्ति परम्परा की सबसे सुप्रसिद्ध कवयित्री हैं। मीरा का विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध मेवाड़ के सिसोदिया कुल में कर दिया गया। उनके पति की मृत्यु के बाद उन पर भारी अत्याचार किये गए उनके ससुराल वालों ने उन्हें विष देने का प्रयत्न किया किन्तु वह राजभवन से निकलकर एक घुमक्कड़ गायिका बन गई। वह भगवान कृष्ण की अनन्य उपासिका थीं। कुछ परम्पराओं के अनुसार मीरा के गुरु रैदास थे। इससे ज्ञात होता है कि मोरा ने जातिवादी समाज की रूढ़ियों का उल्लंघन किया। ऐसा माना जाता है कि अपने पति के राजमहल के ऐश्वर्य को त्याग कर उन्होंने विधवा के सफेद वस्त्र अथवा संन्यासिनी के जोगिया वस्व धारण किये।

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→ शंकर देव-पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में असम के शंकर देव वैष्णव धर्म के मुख्य प्रचारक के रूप में उभरे। उनके उपदेशों को ‘भगवती धर्म’ कहकर सम्बोधित किया जाता है क्योंकि वे भगवद्‌गीता और भागवत पुराण पर आधारित थे शंकर देव ने भक्ति के लिए नाम कीर्तन और श्रद्धावान भक्तों के सत्संग में ईश्वर के नाम पर बल दिया। उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार के लिए सत्र या मठ तथा नामपर जैसे प्रार्थना गृह की स्थापना को बढ़ावा दिया। उनकी प्रमुख काव्य रचनाओं में ‘कीर्तनपोष’ भी है।

→ सूफी परम्परा के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए विभिन्न स्रोत-
उच्चारण –
(1) अली विन उस्मान हुजवरी ने ‘कश्फ-उल-महजुब’ नामक पुस्तक लिखी जो सूफी विचारों और आचारों पर प्रबन्ध पुस्तिका है। इससे यह जानकारी मिलती है कि उपमहाद्वीप के बाहर की परम्पराओं ने भारत में सूफी चिन्तन को किस प्रकार प्रभावित किया।

(2) मुलफुजात (सूफी सन्तों की बातचीत) – मुलफुतात’ पर एक आरम्भिक ग्रन्थ ‘फवाइद-अल-फुआद’ है यह शेख निजामुद्दीन औलिया की बातचीत पर आधारित एक संग्रह है जिसका संकलन प्रसिद्ध फारसी कवि अमीर हसन सिजजी देहलवी ने किया।

(3) मक्तुबात लिखे हुए पत्रों का संकलन ) ये वे पत्र थे जो सूफी सन्तों द्वारा अपने अनुयायियों और सहयोगियों को लिखे गए। इन पत्रों से धार्मिक सत्य के बारे में शेख के अनुभवों का वर्णन मिलता है जिसे वह अन्य लोगों के साथ बांटना चाहते थे।

(4) तजकिरा ( सूफी सन्तों की जीवनियों का स्मरण ) भारत में लिखा पहला ‘सूफी तजकिरा’ ‘मीर खुर्द किरमानी’ का ‘सियार-उल-औलिया है। यह तजकिरा मुख्यतः चिश्ती संतों के बारे में था सबसे प्रसिद्ध तजकिरा अब्दुल हक मुहाद्दिस देहलवी का ‘अखबार-उल-अखबार है।

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किरा के लेखकों का मुख्य उद्देश्य अपने सिलसिले की प्रधानता स्थापित करना और साथ ही अपनी आध्यात्मिक वंशावली की महिमा का वर्णन करना था। तजकिरे के बहुत से वर्णन अद्भुत और अविश्वसनीय हैं, किन्तु फिर भी वे इतिहासकारों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं और सूफी परम्परा के स्वरूप को समझने में सहायक सिद्ध होते हैं। इतिहासकार धार्मिक परम्परा के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए अनेक स्रोतों का उपयोग करते हैं जैसे मूर्तिकला, स्थापत्य, धर्मगुरुओं से जुड़ी कहानियाँ, काव्य रचनाएँ आदि।

काल-रेखा
भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ मुख्य धार्मिक शिक्षक

लगभग 500-800 ईस्वीतमिलनाडु में अप्पार, संबंदर, सुन्दरमूर्ति
लगभग 800-900 ईस्वीतमिलनाडु में नम्मलवर, मणिक्वचक्कार, अंडाल, तोंदराडिप्पोडी
लगभग 1000-1100 ईस्वीपंजाब में अल हुजविरी, दातागंज बवश; तमिलनाडु में रामानुजाचार्य
लगभग 1100-1200 ईस्वीकर्नाटक में बसवन्ना
लगभग 1200-1300 ईस्वीमहाराष्ट्र में ज्ञानदेव मुक्ता बाई; राजस्थान में ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती; पंजाब में बहाउद्दीन जकारिया और फरीदुद्दीन गंज-ए-शकर; दिल्ली में कुतुबुद्दीन बरिखियार काकी
लगभग 1300-1400 ईस्वीकश्मीर में लालदेद; सिन्ध में लाल शाहबाज कलन्दर; दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया; उत्तरप्रदेश में रामानन्द; महाराष्ट्र में चोखमेला; बिहार में शराफुद्दीन याह्या मनेरी
लगभग 1400- 1500 ईस्वीउत्तरप्रदेश में कबीर, रैदास, सूरदास; पंजाब में बाबा गुरु नानक; गुजरात में बल्लभाचार्य; ग्वालियर में अब्दुल्ला सत्तारी; गुजरात में मुहम्मद शाह आलम; गुलबर्गा में मीर सैयद, मोहम्मद गेसू दराज़; असम में शंकर देव; महाराष्ट्र में तुकाराम
लगभग 1500-1600 ईस्वीबंगाल में श्री चैतन्य; राजस्थान में मीराबाई; उत्तरप्रदेश में शेख अब्दुल कुहस गंगोही, मलिक मोहम्मद जायसी, तुलसीदास
लगभग 1600-1700 ईस्वीहरियाणा में शेख अहमद सरहिन्दी; पंजाब में मियाँ मीर।

JAC Class 12 History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

Jharkhand Board JAC Class 12 History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

Jharkhand Board Class 12 History विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास In-text Questions and Answers

पृष्ठ संख्या 84

प्रश्न 1.
यज्ञ के उद्देश्यों की सूची बनाइये।
उत्तर:

  • यज्ञ करने वाले की आहूति को देवताओं तक पहुँचाना।
  • प्रचुर खाद्य पदार्थ प्राप्त करना।
  • प्रचुर धन प्राप्त करना।
  • पुष्टिवर्धक गाय प्राप्त करना।
  • वंश को आगे बढ़ाने के लिए पुत्र की प्राप्ति करना।

पृष्ठ संख्या 87

प्रश्न 2.
क्या इन लोगों को नियतिवादी या भौतिकवादी कहना आपको उचित लगता है?
उत्तर:
मक्खलि गोसाल एक प्रसिद्ध नियतिवादी दार्शनिक थे। उनके अनुसार सब कुछ पूर्व निर्धारित है। सुख और दु:ख पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं। दूसरी ओर केसकम्बलिन भौतिकवादी दार्शनिक थे। उनके अनुसार दान, यज्ञ, चढ़ावा आदि सब निरर्थक हैं। इन लोगों के अलग-अलग सिद्धान्तों को देखते हुए इन्हें नियतिवादी या भौतिकवादी कहना उचित है।

पृष्ठ संख्या 87 चर्चा कीजिए

प्रश्न 3.
जब लिखित सामग्री उपलब्ध न हो अथवा किन्हीं वजहों से बच न पाई हो तो ऐसी स्थिति में विचारों और मान्यताओं के इतिहास का पुनर्निर्माण करने में क्या समस्याएँ सामने आती हैं?
उत्तर:
जब लिखित सामग्री उपलब्ध न हो अथवा किन्हीं कारणों से बच न पाई हो तो ऐसी स्थिति में विचारों और मान्यताओं के इतिहास का पुनर्निर्माण करने में निम्नलिखित समस्याएँ सामने आती हैं –

(1) हमें विचारों और मान्यताओं के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए इमारतों, मूर्तियों, अभिलेखों, चित्रों आदि का सहारा लेना पड़ता है। परन्तु दुर्भाग्य से अनेक इमारतें, मूर्तियाँ, अभिलेख, चित्र आदि नष्ट हो गए हैं। उदाहरण के लिए सांची का स्तूप तो सुरक्षित है, परन्तु अमरावती का स्तूप नष्ट हो गया है। इसलिए हमें तत्कालीन विचारों और 1. मान्यताओं के इतिहास का पुनर्निर्माण करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

JAC Class 12 History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

(2) किसी मूर्तिकला अंश को देखकर फूस की झोंपड़ी तथा पेड़ों वाले ग्रामीण दृश्य की झलक मिलती है। परन्तु कुछ कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक से लिया गया एक दृश्य बताते हैं। इससे स्पष्ट है कि प्राय: इतिहासकार किसी मूर्तिकला की व्याख्या, लिखित साक्ष्यों के साथ तुलना के द्वारा करते हैं। परन्तु लिखित साक्ष्यों के अभाव में ऐसा करना सम्भव नहीं होता। (चित्र 4. 13, पृ० 100 )

(3) साँची की मूर्तियों में अनेक प्रतीक पाए गए हैं। इन प्रतीकों में कमलदल और हाथियों के बीच एक महिला की मूर्ति प्रमुख है। कुछ इतिहासकार मूर्ति को बुद्ध की माता माया से जोड़ते हैं तो अन्य इतिहासकार उन्हें एक लोकप्रिय देवी गजलक्ष्मी मानते हैं। लिखित सामग्री के अभाव में इस प्रकार की निश्चित जानकारी नहीं मिल पाती।

पृष्ठ संख्या 88

प्रश्न 4.
महारानी कमलावती द्वारा अपने पति को संन्यास लेने के लिए दिया गया कौनसा तर्क आपको सबसे ज्यादा युक्तियुक्त लगता है?
उत्तर:
महारानी कमलावती ने अपने पति को संन्यास लेने के लिए यह तर्क दिया कि “यदि सम्पूर्ण विश्व और वहाँ के सभी खजाने तुम्हारे हो जायें, तब भी तुम्हें सन्तोष नहीं होगा और न ही यह सब कुछ तुम्हें बचा पाएगा। जब तुम्हारी मृत्यु होगी तो सारा धन पीछे छूट जाएगा, तब केवल धर्म अर्थात् सत्कर्म ही तुम्हारी रक्षा करेगा।” इस प्रकार महारानी कमलावती द्वारा अपने पति को संन्यास लेने के लिए यह तर्क सर्वाधिक युक्तियुक्त लगता है कि राजा को संसार के सुखों और धन-दौलत का परित्याग कर संन्यास ले लेना चाहिए।

पृष्ठ संख्या 89 : चर्चा कीजिए

प्रश्न 5.
क्या बीसवीं शताब्दी में अहिंसा की कोई प्रासंगिकता है?
उत्तर:
बीसवीं शताब्दी में भी अहिंसा की प्रासंगिकता बनी हुई है। महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध आदि चिन्तकों ने मानव जाति को अहिंसा का सन्देश दिया था। अहिंसा का सिद्धान्त आज भी महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी बना हुआ है। उग्रराष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद, शस्त्रीकरण की प्रतिस्पर्द्धा आदि के कारण युद्ध के बादल मंडराते रहते हैं युद्धों में भीषण विनाशलीला होती है तथा लोगों को भी भीषण कष्ट उठाने पड़ते हैं। युद्धों और रक्तपात से किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। हिंसा से कटुता बढ़ती है और समाज में अशान्ति एवं अव्यवस्था फैलती है। इसलिए अहिंसा का पालन करते हुए ही युद्धों और रक्तपात से बचा जा सकता है। अहिंसा के द्वारा ही समाज में सौहार्द, सहयोग, शान्ति एवं सुरक्षा का वातावरण बना रह सकता है। अत: इक्कीसवीं शताब्दी में भी अहिंसा की प्रासंगिकता है।

पृष्ठ संख्या 89

प्रश्न 6.
क्या आप इसकी (चित्र 4.6) लिपि को पहचान सकते हैं?
उत्तर:
पाठ्यपुस्तक के पृष्ठ 89 के चित्र क्रमांक 4.6 में दर्शायी गई चौदहवीं शताब्दी की जैन ग्रन्थ की पाण्डुलिपि है जो प्राकृत भाषा में लिखी गई है।

JAC Class 12 History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

पृष्ठ संख्या 90 चर्चा कीजिए

प्रश्न 7.
यदि आप बुद्ध के जीवन के बारे में नहीं जानते तो क्या आप मूर्ति को देखकर समझ पाते कि उसमें क्या दिखाया गया है?
उत्तर:
इतिहासकारों ने बुद्ध के जीवन के बारे में चरित लेखन से जानकारी इकट्ठी की है। अतः यदि हम बुद्ध के जीवन के बारे में नहीं जानते, तो इस मूर्ति ( पृ० 90) को देखकर हम कुछ भी सही अनुमान नहीं लगा सकते थे कि यह मूर्ति युद्ध के जीवन से सम्बन्धित किस घटना पर प्रकाश डालती है। इस मूर्ति से पता चलता है कि संन्यासी को देखकर बुद्ध ने संन्यास का रास्ता अपनाने का निश्चय किया और महल त्यागकर सत्य की खोज में निकल गए। पृष्ठ संख्या 91

प्रश्न 8.
आप सुझाव दीजिए कि माता-पिता, शिक्षकों और पत्नी के लिए किस तरह के निर्देश दिए गए होंगे?
उत्तर:
(1) माता-पिता की सेवा करनी चाहिए और उनकी आज्ञाओं का पालन करना चाहिए।
(2) शिक्षकों का सम्मान करना चाहिए और उनके आदेशों का पालन करना चाहिए।
(3) पत्नी के साथ सद्व्यवहार करना चाहिए और सुख-दुःख में उसका साथ देना चाहिए।

पृष्ठ संख्या 92 चर्चा कीजिए

प्रश्न 9.
बुद्ध द्वारा सिगल को दी गई सलाह की तुलना अशोक द्वारा उसकी प्रजा (अध्याय 2) को दी गई सलाह से कीजिए। क्या आपको कुछ समानताएँ और असमानताएँ नजर आती हैं?
उत्तर:
बुद्ध द्वारा सिंगल को दी गई सलाह की तुलना अशोक द्वारा उसकी प्रजा को दी गई सलाह से करने पर निम्नलिखित समानताएँ और असमानताएँ दिखाई देती हैं- समानताएँ-

  • संन्यासियों और ब्राह्मणों की देखभाल करना
  • सेवकों और दासों के साथ उदार व्यवहार
  • बड़ों के प्रति आदर
  • दूसरे धर्मों और परम्पराओं का सम्मान।

असमानताएँ –

  • ब्राह्मणों और भ्रमण के स्वागत में हमेशा घर खुले रखकर और उनकी दिन-प्रतिदिन की आवश्यकताओं को पूरा करना
  • नौकरों और कर्मचारियों को भोजन और मजदूरी देना, बीमार पड़ने पर उनकी सेवा करना, उनके साथ स्वादिष्ट भोजन बाँटना और समय-समय पर उन्हें अवकाश देना।

पृष्ठ संख्या 93

प्रश्न 10.
बुद्ध की कौन-सी शिक्षाएँ ‘बेरीगाथा’ नज़र आती हैं? देना।
उत्तर:
(1) बुरे कर्मों का परित्याग।
(2) जन्म पर आधारित वर्ण व्यवस्था का विरोध।
(3) कर्मों के फल और पुनर्जन्म के सिद्धान्त पर बल
(4) सत्कर्म करने पर बल देना।
(5) आडम्बरों और कर्मकाण्डों का विरोध।

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पृष्ठ संख्या 94

प्रश्न 11.
क्या आप बता सकते हैं कि भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए नियम क्यों बनाए गए ?
उत्तर:
बुद्ध ने अपने शिष्यों के लिए संघ की स्थापना की संघ ऐसे भिक्षुओं की संस्था थी जो धम्म के शिक्षक बन गए। बाद में भिक्षुणियों को भी संघ में सम्मिलित होने की अनुमति प्रदान की गई। धीरे-धीरे भिक्षुओं और भिक्षुणियों की संख्या बढ़ने लगी। अतः संघ में अनुशासन तथा व्यवस्था बनाए रखने के लिए संघ प्रणाली को सफल बनाने के लिए और सभी कार्यों के सुचारु रूप से संचालन के लिए भिक्षुओं तथा भिक्षुणियों के लिए नियम बनाए गए। पृष्ठ संख्या 94 चर्चा कीजिए

प्रश्न 12.
पुन्ना जैसी दासी संघ में क्यों जाना चाहती थी?
उत्तर:
पुन्ना एक निर्धन दासी थी वह अपने स्वामी के घर के लिए प्रतिदिन प्रातः नदी का पानी लेने जाती थी। उच्च वर्णों के लोग निम्न वर्गीय माने जाने वाली दासियों का शोषण करते थे। वे उनके साथ कठोर व्यवहार करते थे। पुन्ना को भीषण ठंड में भी नदी से पानी लाना पड़ता था तथा ऐसा न करने पर उसे दंड भुगतना पड़ता था या उच्च घरानों की स्वियों के कटु वचन सुनने पड़ते थे अतः अपनी अपमानजनक एवं दयनीय स्थिति से मुक्ति पाने तथा समाज में सम्माननीय स्थान प्राप्त करने के लिए पुन्ना संघ में जाना चाहती थी। संघ में सभी भिक्षुओं और भिक्षुणियों को बराबर माना जाता था और वहाँ उन्हें सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त था क्योंकि भिक्षु तथा भिक्षुणी बनने पर उन्हें अपनी पुरानी पहचान को त्याग देना पड़ता था।

पृष्ठ संख्या 96

प्रश्न 13.
चित्र 4.15 (पृ. 100) को देखकर क्या आप इनमें से कुछ रीति-रिवाजों को पहचान सकते हैं?
उत्तर:
(1) यह स्तूप बुद्ध के महापरिनिर्वाण का प्रतीक है। इससे पता चलता है कि स्तूपों का निर्माण बुद्ध अथवा बोधिसत्वों के अवशेष रखने के लिए किया जाता था।
(2) इससे पता चलता है कि बौद्ध धर्म के अनुयायी स्तूपों की पूजा करते थे।
(3) स्तूप की पूजा के लिए समारोह आयोजित किए जाते थे।
(4) इस अवसर पर नृत्य तथा संगीत का भी आयोजन किया जाता था।

पृष्ठ संख्या 97 चर्चा कीजिए

प्रश्न 14.
साँची के महास्तूप के मापचित्र (चित्र 4.10क) और छायाचित्र (चित्र 4.3 ) में क्या समानताएँ और फर्क हैं?
उत्तर:
मापचित्र तथा छायाचित्र में निम्नलिखित समानताएँ और फर्क हैं –
(1) चित्र 4.10 (क) में साँची के महास्तूप की योजना को उसके समतलीय परिप्रेक्ष्य में दिखाया गया है, जबकि चित्र 43 में स्तूप को उसके वास्तविक स्वरूप में दिखाया गया है।
(2) चित्र 4.10 (क) से स्तूप की पूर्ण बनावट, उसके चारों तोरण द्वार तथा मध्य का भाग स्पष्ट होता है। जबकि चित्र 43 से ऐसा स्पष्ट नहीं होता है।
(3) चित्र 4.10 (क) में स्तूप के प्रदक्षिणा पथ को भी स्पष्ट देखा जा सकता है; जबकि चित्र 43 में प्रदक्षिणा पथ दिखाई नहीं देता है।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि स्तूप की बनावट की संरचना को समझाने हेतु चित्र 4.10
(क) एवं
(ख) सहायक हो सकते हैं।
चित्र 43 द्वारा स्तूप की संरचना को समझना कठिन है। यह चित्र 43 प्रत्यक्ष दर्शन के लिए प्रेरित करता है।

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पृष्ठ संख्या 99 : चर्चा कीजिए

प्रश्न 15.
कारण बताइये कि साँची क्यों बच गया?
उत्तर:
साँधी इसलिए बच गया क्योंकि उसके किसी पुरातात्विक अवशेष को वहाँ से उठाकर नहीं ले जाया गया तथा पुरातात्विक अवशेष खोज की जगह पर ही संरक्षित किए गए 1818 में जब साँची की खोज हुई, इसके तीन तोरणद्वार तब भी खड़े थे चौथा तोरणद्वार वहीं पर गिरा हुआ था और टीला भी अच्छी हालत में था। उस समय भी यह सुझाव दिया गया था कि तोरणद्वारों को पेरिस या लन्दन भेज दिया जाए। परन्तु ये सुझाव कार्यान्वित नहीं हुए और साँची का स्तूप वहीं बना रहा और आज भी बना हुआ है। भोपाल के शासकों ने भी इस स्तूप के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इस प्रकार साँची बच गया, जबकि अमरावती नष्ट हो गया।

पृष्ठ संख्या 103 चर्चा कीजिए

प्रश्न 16.
मूर्तिकला के लिए हड्डियों, मिट्टी और धातुओं का भी इस्तेमाल होता है। इनके विषय में पता कीजिए।
उत्तर:
हड़प्पा काल में मूर्तिकला हेतु मिट्टी, पत्थर, धातुओं और हड्डी का प्रयोग होता था। यह सामग्री इसलिए प्रयोग में लाई जाती थी कि इन पर तकनीकी रूप से उत्कीर्णन का कार्य सरल था तथा यह वस्तुएँ सर्वसुलभ और सस्ती थीं।

पृष्ठ संख्या 104

प्रश्न 17.
मूर्ति में दी गई आकृतियों के आपसी अनुपात में फर्क से क्या बात समझ में आती है?
उत्तर:
चित्र 4.23 भगवान विष्णु के दस अवतारों में से एक वराह अवतार का है। भगवान विष्णु ने अपने इस अवतार से पृथ्वी की रक्षा की थी तथा इसे पाताल लोक अथवा समुद्र से निकालकर पुनः यथास्थान स्थापित किया था चित्र में बनायी गई आकृतियों को हम निम्नलिखित रूप से समझ सकते हैं –
(1) चित्र का मुख्य कथानक भगवान विष्णु का वराह अवतार रूपी मूर्ति है। इसे आप चित्र के मध्य में तथा नीचे से ऊपर तक देख सकते हैं। इस अवतार में भगवान ने अत्यधिक विशाल रूप धारण किया था। अतः इन्हें यहाँ अन्य मूर्तियों की अपेक्षा विशाल रूप में दिखाया गया है।

(2) चित्र में नीचे दायीं ओर पाताल देवता तथा उसकी पत्नी को छोटे रूप में दिखाया गया है, जो सपत्नीक वराह की स्तुति कर रहा है।

(3) चित्र में ऊपर दायीं ओर वराह भगवान ने अपने मुख के धुधन से पृथ्वी देवी को पकड़ा हुआ है जो पाताल से उन्हें बाहर निकालकर लाए हैं। अतः यहाँ पृथ्वी को वराह की अपेक्षा अत्यन्त लघु रूप में दिखाया गया है।

पृष्ठ संख्या 105

प्रश्न 18.
कलाकारों ने किस प्रकार गति को दिखाने की कोशिश की है? इस मूर्ति में बताई कहानी के बारे में जानकारी इकट्ठी कीजिए ।
उत्तर:
इस चित्र में कलाकारों ने युद्ध-विषयक गति दिखाने का प्रयास किया है। इसमें देवी महिषासुर नामक दैत्य को मारने का प्रयास कर रही हैं। चित्र में आप भैंसे के चित्र वाले दैत्य को भी देख सकते हैं। यहाँ देवी को सिंह पर बैठे हुए तथा हाथ में धनुष लिए दिखाया गया है। विद्यार्थी पाठ्यपुस्तक के चित्र 4.24 को देखें।

पृष्ठ संख्या 106 प्रश्न

19. गर्भगृह के प्रवेश द्वार और शिखर के अवशेषों को पहचानें।
उत्तर:
चित्र 4.25 के अवलोकन से पता लगता है कि सीढ़ियों के समक्ष वाला द्वार गर्भगृह का द्वार है। प्रवेश द्वार के शीर्ष पर मन्दिर के शिखर के अवशेष दिखाई दे रहे हैं। मन्दिर देवगढ़ में स्थित है तथा यह गुप्तकालीन मन्दिर है। मन्दिर का निर्माण एक ऊँचे चबूतरे पर किया गया है।

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Jharkhand Board Class 12 History विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास Text Book Questions and Answers

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 100-150 शब्दों में दीजिए-

प्रश्न 1.
क्या उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे? अपने जवाब के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
उपनिषदों के दार्शनिकों के विचारों की नियतिवादियों और भौतिकवादियों के विचारों से भिन्नता उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार उपनिषदों में ब्रह्म, आत्मा, कर्म और पुनर्जन्म तथा मोक्ष सम्बन्धी दार्शनिक विचारों की विवेचना की गई है। उपनिषदों के अनुसार आत्मा ब्रह्म की ही ज्योति है और उससे भिन्न नहीं है। उपनिषदों के अनुसार मनुष्य जैसे कर्म करता है, उसी के अनुसार अच्छे और बुरे कर्मों का फल भोगने के लिए उसका अगला जन्म होता है अच्छे कर्मों से मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है परन्तु नियतिवादियों और भौतिकवादियों के विचारों में ब्रह्म और आत्मा की एकता, कर्म और पुनर्जन्म तथा मोक्ष सम्बन्धी विचारों को कोई स्थान नहीं है।

नियतिवादियों तथा भौतिकवादियों के विचार – नियतिवादियों के अनुसार मनुष्य के सुख और दुःख पूर्व- निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं। इन्हें संसार में बदला नहीं जा सकता। इन्हें बढ़ाया या घटाया भी नहीं जा सकता। इसी प्रकार भौतिकवादियों की मान्यता है कि संसार में दान देना, यज्ञ करना या चढ़ावा जैसी कोई चीज नहीं होती। मनुष्य की मृत्यु के साथ ही चारों तत्व नष्ट हो जाते हैं जिनसे वह बना होता है। दान देने का सिद्धान्त मूर्खतापूर्ण और नितान्त झूठ है। इस प्रकार स्पष्ट है कि उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे।

प्रश्न 2.
जैन धर्म की महत्त्वपूर्ण शिक्षाओं को संक्षेप में लिखिए।
अथवा
जैन धर्म के अहिंसा सिद्धान्त की संक्षिप्त व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
जैन धर्म की महत्त्वपूर्ण शिक्षाएँ जैन धर्म की महत्त्वपूर्ण शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं-
(1) जैन दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण विश्व प्राणवान है। यह माना जाता है कि पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन होता है।
(2) जीवों के प्रति अहिंसा जैन दर्शन का केन्द्र बिन्दु है। जैन धर्म के अनुसार इन्सानों, जानवरों, पेड़-पौधों कीड़े- मकोड़ों आदि की हत्या नहीं करनी चाहिए। वास्तव में जैन अहिंसा के सिद्धान्त ने सम्पूर्ण भारतीय चिन्तन परम्परा को प्रभावित किया है।
(3) जैन धर्म के अनुसार जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा निर्धारित होता है। इस चक्र से मुक्ति पाने के लिए त्याग और तपस्या की आवश्यकता होती है। यह संसार के त्याग से ही सम्भव हो पाता है। इसलिए मुक्ति के लिए बिहारों में निवास करना चाहिए।
(4) जैन साधुओं और साध्वियों को पाँच व्रतों का पालन करना चाहिए। ये पाँच व्रत हैं –

  • हत्या न करना
  • चोरी न करना
  • झूठ न बोलना
  • ब्रह्मचर्य (अमृषा) का पालन करना तथा
  • धन संग्रह न करना।

प्रश्न 3.
साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस सम्बन्ध में उन्होंने निम्नलिखित कार्य किए –
(1) शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम ने इस प्राचीन स्थल के रख-रखाव के लिए धन का अनुदान दिया।
(2) सुल्तानजहाँ बेगम ने वहाँ पर एक संग्रहालय और अतिथिशाला बनाने के लिए अनुदान दिया।
(3) जॉन मार्शल ने साँची पर लिखे अपने महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों को सुल्तानजहाँ बेगम को समर्पित किया। इन पुस्तकों के प्रकाशन में सुल्तानजहाँ बेगम ने अनुदान दिया।
(4) प्रारम्भ में फ्रांसीसियों ने तथा बाद में अंग्रेजों ने साँची के पूर्वी तोरणद्वार को अपने-अपने देश में ले जाने का प्रयास किया। परन्तु भोपाल की बेगमों ने उन्हें स्तूप की प्लास्टर प्रतिकृतियाँ देकर सन्तुष्ट कर दिया। इस प्रकार बेगमों के प्रयासों के परिणामस्वरूप साँची के स्तूप की मूलकृति भोपाल राज्य में अपने स्थान पर ही रही।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित संक्षिप्त अभिलेख को पढ़िए और जवाब दीजिए – महाराज हुविष्क ( एक कुषाण शासक) के तैंतीसवें साल में गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन त्रिपिटक जानने वाले भिक्खु बल की शिष्या, त्रिपिटक जानने वाली बुद्धमिता के बहन की बेटी भिक्खुनी धनवती ने अपने माता-पिता के साथ मधुवनक में बोधिसत्त की मूर्ति स्थापित की।
(क) धनवती ने अपने अभिलेख की तारीख कैसे निश्चित की?
(ख) आपके अनुसार उन्होंने बोधिसत्त की मूर्ति क्यों स्थापित की?
(ग) वे अपने किन रिश्तेदारों का नाम लेती हैं?
(घ) वे कौन-से बौद्ध ग्रन्थों को जानती थीं?
(ङ) उन्होंने ये पाठ किससे सीखे थे?
उत्तर:
(क) धनवती ने अपने अभिलेख की तारीख कुषाण शासक महाराज हुविष्क के शासनकाल की सहायता से निश्चित की यह तारीख हुविष्क के शासनकाल के तैंतीसवें साल की ग्रीष्म ऋतु के पहले महीने का आठवाँ दिन है।
(ख) धनवती एक बौद्ध भिक्षुणी थी उनकी बौद्ध धर्म में अत्यधिक श्रद्धा थी अतः उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रति अपनी श्रद्धा एवं सम्मान प्रकट करने के लिए बोधिसत की मूर्ति स्थापित की।
(ग) वेमौसी बुद्धमिता तथा अपने माता-पित्ता का नाम लेती है.
(घ) वे त्रिपिटक नामक बौद्ध ग्रन्थों को जानती थीं।
(ङ) उन्होंने ये पाठ अपने गुरु भिक्षु बल तथा अपनी मौसी बुद्धमिता से सीखे थे।

प्रश्न 5.
आपके अनुसार स्त्री-पुरुष संघ में क्यों जाते
उत्तर:
बुद्ध ने अपने शिष्यों के लिए एक संघ की स्थापना की। स्त्री और पुरुष निम्नलिखित कारणों से संघ में जाते थे –
(1) वे संघ में रहते हुए बौद्ध ग्रन्थों का अध्ययन कर सकते थे।
(2) वे बौद्ध भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों से बौद्ध धर्म की शिक्षाओं और दार्शनिक सिद्धान्तों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते थे।
(3) वे संघ में जाकर धम्म के शिक्षक बन सकते थे।
(4) अनेक स्त्रियों धम्म की उपदेशिकाएँ अथवा धेरी बनना चाहती थीं।
(5) वे धम्म से सम्बन्धित अपनी शंकाओं का समाधान करना चाहते थे।
(6) वे अपने जीवन को सफल, सुखी एवं अनुशासित करना चाहते थे।

निम्नलिखित पर एक संक्षिप्त निबन्ध लिखिए। (लगभग 500 शब्दों में)

प्रश्न 6.
साँची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से कहाँ तक सहायता मिलती है?
अथवा
“साँची की खोज ने प्रारम्भिक बौद्ध धर्म सम्बन्धी हमारे ज्ञान को अत्यधिक रूपान्तरित कर दिया है।” व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
साँची की मूर्ति कला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से सहायता मिलना
साँची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से हमें निम्न रूप से सहायता मिलती है-

(1) इतिहासकारों द्वारा मूर्तिकला की व्याख्या- इस मूर्तिकला अंश में फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाले ग्रामीण दृश्य का चित्रण दिखाई देता है परन्तु साँची की मूर्तिकला का गहन अध्ययन करने वाले कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक से लिया गया एक दृश्य बताते हैं। यह कहानी एक ऐसे दानशील राजकुमार के बारे में है, जिसने अपना सर्वस्व एक ब्राह्मण को दे दिया और स्वयं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जंगल में रहने चला गया। इस उदाहरण से पता चलता है कि प्रायः इतिहासकार किसी मूर्तिकला की व्याख्या लिखित
साक्ष्यों के साथ तुलना के द्वारा करते हैं।

(2) बुद्ध के चरित लेखन के बारे में जानकारी प्राप्त करना बौद्ध मूर्तिकला को समझने के लिए कला इतिहासकारों को बुद्ध के चरित लेखन के बारे में जानकारी प्राप्त करनी पड़ी। बौद्ध चरित लेखन के अनुसार एक वृक्ष के नीचे चिंतन करते हुए बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। कई प्रारम्भिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर उनकी उपस्थिति प्रतीकों के माध्यम से दिखाने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए ‘रिक्त स्थान’ बुद्ध के ध्यान की दशा तथा स्तूप ‘महापरिनिब्बान’ के प्रतीक बन गए। ‘चक्र’ का भी प्रतीक के रूप में प्रायः प्रयोग किया गया। यह बुद्ध द्वारा सारनाथ में दिए गए प्रथम उपदेश का प्रतीक था।

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(3) लोक परम्पराएँ साँची की बहुत सी मूर्तियाँ शायद बौद्धमत से सीधी सम्बन्धित नहीं थीं। इनमें कुछ सुन्दर स्त्रियाँ भी मूर्तियों में उत्कीर्णित हैं, जो तोरणद्वार के किनारे एक वृक्ष पकड़ कर झूलती हुई दिखाई देती हैं। प्रारम्भ में विद्वान इस मूर्ति के महत्व के बारे में कुछ असमंजस में थे क्योंकि इस मूर्ति का त्याग और तपस्या से कोई सम्बन्ध दिखाई नहीं देता था परन्तु साहित्यिक परम्पराओं के अध्ययन से उन्हें यह ज्ञात हुआ कि यह संस्कृत भाषा में वर्णित ‘शालभंजिका’ की मूर्ति है। लोक परम्परां में यह माना जाता था कि इस स्वी के द्वारा हुए जाने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे और फल होने लगते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक शुभ प्रतीक माना जाता था और इसी कारण स्तूप के अलंकरण में यह प्रयुक्त हुआ।

(4) साँची की मूर्तियों में पाए गए कई प्रतीकों का लोक परम्पराओं से उभरना ‘शालभंजिका’ की मूर्ति से ज्ञात होता है कि जो लोग बौद्ध धर्म में आए, उन्होंने बुद्ध- पूर्व और बौद्ध धर्म से अलग अन्य विश्वासों, प्रथाओं और धारणाओं से बौद्ध धर्म को समृद्ध किया। साँची की मूर्तियों में पाए गए कई प्रतीक या चिह्न निश्चित रूप से इन्हीं परम्पराओं से उभरे थे।

उदाहरण के लिए, सांची में जानवरों के कुछ बहुत सुन्दर उत्कीर्णन प्राप्त हुए हैं। इन जानवरों में हाथी, घोड़े, बन्दर और गाय-बैल सम्मिलित हैं। यद्यपि साँची में जातकों से ली गई जानवरों की अनेक कहानियाँ हैं फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ पर लोगों को आकर्षित करने के लिए जानवरों का उत्कीर्णन किया गया था। साथ ही जानवरों का मनुष्यों के गुणों के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया जाता था उदाहरण के लिए, हाथी शक्ति और ज्ञान के प्रतीक माने जाते थे।

(5) कमलदल और हाथियों के बीच एक महिला की मूर्ति का उत्कीर्णन साँची में इन प्रतीकों में कमलदल और हाथियों के बीच एक महिला की मूर्ति प्रमुख है। हाथी उनके ऊपर जल छिड़क रहे हैं, जैसे वे उनका अभिषेक कर रहे हैं। कुछ इतिहासकार इस महिला को बुद्ध की माता भाषा से जोड़ते हैं तो कुछ अन्य इतिहासकार उन्हें एक लोकप्रिय देवी गजलक्ष्मी मानते हैं। गजलक्ष्मी सौभाग्य लाने वाली देवी के रूप में प्रसिद्ध थीं, जिन्हें प्रायः हाथियों के साथ जोड़ा जाता है। यह भी सम्भव है कि इन उत्कीर्णित मूर्तियों को देखने वाले उपासक इस महिला को माया और गजलक्ष्मी दोनों से जोड़ते थे।

(6) स्तम्भों पर सर्पों का उत्कीर्णन कुछ स्तम्भों पर सर्पों का उत्कीर्णन है। यह प्रतीक भी ऐसी लोक परम्पराओं से लिया गया प्रतीत होता है जिनका ग्रन्थों में सदैव उल्लेख नहीं होता था। प्रसिद्ध कलामर्मज्ञ और इतिहासकार जेम्स फर्गुसन ने साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केन्द्र माना था। वे बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे। उस 5 समय तक अधिकांश बौद्धग्रन्थों का अनुवाद नहीं हुआ था। इसलिए उन्होंने केवल उत्कीर्णित मूर्तियों का अध्ययन करके उसके निष्कर्ष निकाले थे।

प्रश्न 7.
चित्र 4.32 और 4.33 में साँची से लिए गए दो परिदृश्य दिए गए हैं। आपको इनमें क्या नजर आता है? वास्तुकला, पेड़-पौधे और जानवरों को ध्यान से देखकर तथा लोगों के काम-धन्धों को पहचानकर यह बताइये कि इनमें से कौनसे ग्रामीण और कौनसे शहरी परिदृश्य हैं?
उत्तर:
देखें पाठ्यपुस्तक, चित्र 4.32 (पृष्ठ 112) – यह चित्र ग्रामीण परिदृश्य से सम्बन्धित है। इसमें अनेक पेड़-पौधे, जानवर भी दिखाए गए हैं। इसमें मनुष्य और पशु जैसे हिरण, गाय, भैंस आदि दर्शाये गए हैं। इससे ज्ञात होता है कि ग्रामीण लोगों के जीवन में पशुओं का अत्यधिक महत्त्व था। चित्र में लोगों को संगीत-नृत्य की मुद्रा में दिखाया गया है जिससे ज्ञात होता है कि संगीत-नृत्य आदि उनके मनोरंजन के प्रमुख साधन थे। चित्र में लोगों को बुद्ध और बोधिसत्वों की पूजा करते हुए दिखाया गया है। इससे पता चलता है कि बुद्ध और बोधिसत्वों की मूर्तियाँ बनाई जाती थीं तथा उनकी उपासना की जाती थी ये बुद्ध और बोधिसतों की उपासना करते हुए दिखाए गए हैं।

इस चित्र से पशुओं, पेड़-पौधों के प्रति बौद्धों के करुणामय दृष्टिकोण तथा अहिंसा के प्रति अटूट श्रद्धा की जानकारी मिलती है। यद्यपि साँची में जातकों से ली गई जानवरों की कई कहानियाँ हैं, फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ पर लोगों को आकर्षित करने के लिए जानवरों का उत्कीर्णन किया गया था। साथ ही जानवरों का मनुष्यों के गुणों के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया जाता था।

साँची में पेड़-पौधों का भी प्रतीक के रूप में प्रयोग किया जाता था। पेड़ का तात्पर्य एक पेड़ नहीं था, वरन् वह बुद्ध के जीवन की एक घटना का प्रतीक था इस प्रकार इस चित्र में तत्कालीन ग्रामीण परिवेश के बारे में जानकारी मिलती। है। इससे हमें तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्थिति की जानकारी मिलती है।

देखें पाठ्यपुस्तक, चित्र 4.33 ( पृष्ठ 112 ) – यह चित्र शहरी परिदृश्य से सम्बन्धित है। इससे तत्कालीन वास्तुकला एवं मूर्तिकला की विशेषताओं के बारे में जानकारी मिलती है। इस चित्र में बड़े-बड़े सुन्दर स्तम्भ, स्तम्भों के ऊपर उल्टे कलश और उनके ऊपर विभिन्न पशुओं का उत्कीर्णन किया गया है। कलशों के ऊपर दो दिशाओं में घोड़े तथा शेर आदि की मूर्तियाँ बनी हुई है। इसमें प्रथम दो भागों में एक आसन पर एक राजा बैठा हुआ है जिसके ऊपर एक छत्र लगा है तथा उसके पीछे दो सेवक पंखा कर रहे हैं।

स्तम्भों के नीचे जालीदार सुन्दर कार्य दर्शाया गया है। इसमें विभिन्न भिक्षुओं, भिक्षुणियों, व्यवसायियों आदि को विभिन्न रूपों में उत्कीर्णित किया गया है। इस चित्र के निचले भाग में भिक्षु बुद्ध और बोधिसत्तों की उपासना में लीन हैं। इसमें वाद्ययन्त्र बजाते हुए भी लोगों को दिखाया गया है। इसमें विभिन्न पशुओं की जो मूर्तियाँ दर्शाई गई हैं वे मनुष्यों के गुणों के प्रतीक के रूप में हैं। उदाहरण के लिए हाथी शक्ति और ज्ञान के प्रतीक माने जाते थे।

प्रश्न 8.
वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला और मूर्तिकला के विकास की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
वैष्णववाद तथा शैववाद का इतिहास अत्यधिक प्राचीन है। यदि हम जॉन मार्शल के कथन को सही मानें तो मोहन जोदड़ो से प्राप्त एक मुद्रा जिस पर योगी की मुद्रा उभरी हुई है वह और कोई नहीं अपितु शिव ही हैं। इस प्रकार देखा जाए तो शैववाद आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व के अपने पुरातात्त्विक साक्ष्य प्रस्तुत करता है। इसके अतिरिक्त हड़प्पा सभ्यता से हमें अनेक प्रस्तर लिंग भी प्राप्त होते हैं। ऋग्वैदिक काल में शैववाद तथा वैष्णववाद के साक्ष्य नहीं मिलते हैं। ऋग्वैदिक आर्यों के प्रमुख देवता इन्द्र अग्नि तथा वरुण थे। यहाँ शिव को हम पशुओं के देवता अर्थात् पूषन के रूप में देखते हैं तथा विष्णु को हम एक सामान्य देवता के रूप में देखते हैं।

JAC Class 12 History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

इस समय आराधना का मुख्य आधार यज्ञ था। देवताओं की आराधना तथा उनको प्रसन्न करने का एकमात्र माध्यम यज्ञ था। उत्तरवैदिक काल में बहुदेववाद एकेश्वरवाद में परिवर्तित हुआ। इसके परिणामस्वरूप भागवत धर्म तथा शैवधर्म की स्थापना हुई। इनके विधिवत रूप से स्थापित होने का समय लगभग 600 ई.पू. रहा होगा। परन्तु इस काल के शैववाद अथवा वैष्णववाद से सम्बन्धित कोई मूर्ति अथवा मन्दिर नहीं मिलते हैं। भारत में मूर्तिकला का प्रथम विधिवत आरम्भ हम मथुरा कला तथा गांधार कला में पाते हैं।

वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला का विकास निम्न प्रकार है –
(1) अवतारवाद – प्राचीन काल में भारत में वैष्णव और शैव परम्परायें भी प्रचलित थीं। वैष्णववाद में विष्णु की तथा शौववाद में शिव की पूजा प्रचलित थी उनकी उपासना भक्ति के माध्यम से की जाती थी। वैष्णववाद में कई अवतारों की पूजा पद्धतियाँ विकसित हुई। इस परम्परा के अन्तर्गत दस अवतारों की कल्पना की गई। विष्णु और उनके अनेक अवतारों की मूर्तियाँ बनाई जाने लगीं। शिव की भी मूर्तियाँ बनाई गई।

(2) मन्दिरों का निर्माण जिस समय साँची जैसे स्थानों में स्तूप अपने विकसित रूप में आ गए थे, उसी समय देवी-देवताओं की मूर्तियों को रखने के लिए सबसे पहले मन्दिर भी बनाएं गए। प्रारम्भिक मन्दिर एक चौकोर कमरे के रूप में थे, जिन्हें गर्भगृह कहा जाता था। इनमें एक दरवाजा होता था जिससे उपासक मूर्ति की पूजा करने के लिए अन्दर प्रविष्ट हो सकता था। धीरे-धीरे गर्भगृह के ऊपर एक ऊँचा ढाँचा बनाया जाने लगा, जिसे शिखर कहा जाता था। मन्दिर की दीवारों पर प्रायः भित्ति चित्र उत्कीर्ण किये जाते थे। कालान्तर में मन्दिरों के स्थापत्य का काफी विकास हुआ। अब मन्दिरों के साथ विशाल सभा स्थल, ऊँची दीवारें और तोरण भी बनाए जाने लगे। मन्दिरों में जल आपूर्ति की व्यवस्था की जाने लगी।

(3) कृत्रिम गुफाओं का निर्माण आरम्भिक मन्दिरों की एक विशेषता यह थी कि इनमें से कुछ मन्दिर पहाड़ियों को काटकर खोखला करके कृत्रिम गुफाओं के रूप में बनाए गए थे। कृत्रिम गुफाएँ बनाने की परम्परा काफी पुरानी थी। सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में अशोक के आदेश से आजीविक सम्प्रदाय के सन्तों के लिए बनाई गई थीं।

कृत्रिम गुफाएँ बनाने की परम्परा अलग-अलग चरणों में विकसित होती रही। इसका सबसे विकसित रूप हमें आठवीं सदी के कैलाशनाथ के मन्दिर में दिखाई देता है जिसमें पूरी पहाड़ी काटकर उसे मन्दिर का रूप दे दिया गया था। यह तत्कालीन वास्तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना है। एक ताम्रपत्र अभिलेख से हमें ज्ञात होता है कि इस मन्दिर का निर्माण समाप्त करने के बाद इसके प्रमुख मूर्तिकार ने अपना आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि “हे भगवान! यह मैंने कैसे बनाया।”

(4) मूर्तिकला का विकास इस युग में विष्णु और शिव की अनेक मूर्तियों का निर्माण किया गया। विष्णु के कई अवतारों को मूर्तियों के रूप में दर्शाया गया है। अनेक देवताओं की भी मूर्तियाँ बनाई गईं। इनमें उदयगिरी से प्राप्त वराह की मूर्ति तथा देवगढ़ की विष्णु की मूर्ति उल्लेखनीय है। शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में बनाया जाता था। परन्तु उन्हें कई बार मनुष्य के रूप में भी दर्शाया गया है। ये समस्त चित्रण देवताओं से सम्बन्धित मिश्रित अवधारणाओं पर आधारित थे। उनकी विशेषताओं तथा प्रतीकों को उनके शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुधों (हथियार और हाथ में धारण किए गए अन्य शुभ अस्त्र) और बैठने की शैली से दर्शाया जाता था।

प्रश्न 9.
स्तूप क्यों और कैसे बनाए जाते थे? चर्चा कीजिए।
उत्तर:
स्तूप क्यों बनाए जाते थे?
कुछ पवित्र स्थानों पर बुद्ध से जुड़े कुछ अवशेष जैसे उनकी अस्थियाँ या उनके द्वारा प्रयुक्त सामान गाड़ दिए जाते थे। इन टीलों को स्तूप कहते थे। स्तूप बनाने की परम्परा शायद बुद्ध के पहले से ही प्रचलित थी, परन्तु यह बौद्ध धर्म से जुड़ गई। चूंकि इन स्तूपों में पवित्र अवशेष होते थे, इसलिए समूचे स्तूप को ही बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठा मिली। ‘अशोकावदान’ नामक एक बौद्ध ग्रन्थ के अनुसार अशोक ने बुद्ध के अवशेषों को प्रत्येक महत्त्वपूर्ण नगर में बाँट कर उनके ऊपर स्तूप बनाने का आदेश दिया था ईसापूर्व दूसरी शताब्दी तक भरहुत, साँची तथा सारनाथ आदि स्थानों पर स्तूप बन चुके थे। बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार अशोक ने 84,000 स्तूप बनवाये।

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स्तूप कैसे बनाए गए?

स्तूपों के निर्माण के लिए अनेक लोगों ने दान दिए। स्तूपों की वेदिकाओं और स्तम्भों पर मिले अभिलेखों से हमें इन्हें बनाने और सुसज्जित करने के लिए दिए गए दानों का पता चलता है। कुछ दान राजाओं के द्वारा दिए गए थे, जैसे सातवाहन वंश के राजाओं द्वारा दिए गए दान कुछ दान शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियों द्वारा दिए गए। उदाहरण के लिए साँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा हाथीदाँत का काम करने वाले शिल्पकारों के दान से बनाया गया था। इसके अतिरिक्त सैकड़ों स्त्रियों और पुरुषों ने भी स्तूपों के निर्माण के लिए दान दिये। दान के अभिलेखों में उनके नाम मिलते हैं। कभी-कभी वे अपने गाँव अथवा शहर का नाम बताते हैं और कभी-कभी अपना व्यवसाय तथा सम्बन्धियों -के नाम भी बताते हैं। इन स्तूपों के निर्माण में भिक्षुओं और भिक्षुणियों ने भी दान दिया।

स्तूप की संरचना स्तूप की संरचना के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित थे –
(1) अंड – स्तूप ( संस्कृत अर्थ टीला) का जन्म एक गोलार्ध लिए हुए मिट्टी के टीले से हुआ, जिसे बाद में अंड कहा गया। धीरे-धीरे इसकी संरचना जटिल हो गई, जिसमें कई चौकोर और गोल आकारों का सन्तुलन बनाया गया।
(2) हर्मिका – अंड के ऊपर एक हर्मिका होती थी। यह छज्जे के जैसा ढाँचा देवताओं के घर का प्रतीक था।
(3) यष्टि हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था, जिसे यष्टि कहते थे। इस पर प्राय: एक छत्री लगी होती थी।
(4) वेदिका – टीले के चारों ओर एक वेदिका होती थी, जो पवित्र स्थल को सामान्य संसार से अलग करती थी।

साँची और भरहुत के स्तूप-साँची और भरहुत के प्रारम्भिक स्तूप बिना अलंकरण के हैं। इनमें पत्थर की वेदिकाएँ और तोरणद्वार हैं ये पत्थर की वेदिकाएँ किसी बाँस के या काठ के घेरे के समान थीं और चारों दिशाओं में खड़े तोरणद्वार पर अच्छी नक्काशी की गई थी। उपासक पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश करके टीले को दाई ओर देखते हुए

दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे ऐसा प्रतीत होता था कि वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे थे। बाद में स्तूप के टीले पर भी अलंकरण और नक्काशी की जाने लगी। अमरावती और पेशावर (पाकिस्तान) में शाहजी की देरी में स्तूपों में ताख और मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गई हैं।

विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास JAC Class 12 History Notes

→ प्रमुख ऐतिहासिक स्त्रोत ईसा पूर्व 600 से 600 ईसवी तक के काल के प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत बौद्ध-जैन और ब्राह्मण ग्रन्थों के अतिरिक्त इमारतें और अभिलेख आदि हैं।

→ साँची भोपाल राज्य के प्राचीन अवशेषों में साँची कनखेड़ा की इमारतें सबसे अद्भुत हैं। साँची का स्तूप भोपाल से बीस मील उत्तर-पूर्व की ओर एक पहाड़ी की तलहटी में बसे गाँव में स्थित है। यह एक पहाड़ी के ऊपर बना हुआ है और एक मुकुट जैसा दिखाई देता है। भोपाल के शासकों, शाहजहाँ बेगम और उसकी उत्तराधिकारी सुल्तान जहाँ बेगम ने इस स्तूप के रख-रखाव के लिए प्रचुर धन का अनुदान दिया। साँची बौद्ध धर्म का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र है।

→ चिन्तकों का उद्भव ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी में ईरान में जरथुख, चीन में खुंगत्सी, यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तू तथा भारत में महावीर और बुद्ध आदि अनेक चिन्तकों का उद्भव हुआ। उन्होंने जीवन के रहस्यों तथा मनुष्यों और विश्व व्यवस्था के बीच सम्बन्धों को समझने का प्रयास किया।

→ यज्ञों की परम्परा – पूर्व वैदिक परम्परा ऋग्वेद से मिलती है। ऋग्वेद का संकलन 1500 से 1000 ई. पूर्व में हुआ था। ऋग्वेद इन्द्र, अग्नि, सोम आदि अनेक देवताओं की स्तुति सम्बन्धी सूक्तियों का संग्रह है। यज्ञों के समय इन सूक्तियों का उच्चारण किया जाता था और लोग पशु, पुत्र, स्वास्थ्य, दीर्घ आयु आदि के लिए प्रार्थना करते थे। प्रारम्भ में यज्ञ सामूहिक रूप से किये जाते थे बाद में कुछ यज्ञ घरों के स्वामियों के द्वारा किए जाते थे।

→ वाद-विवाद और चर्चाएँ समकालीन बौद्ध ग्रन्थों में हमें 64 सम्प्रदायों या चिन्तन परम्पराओं का उल्लेख मिलता है। इससे हमें जीवन्त चचाओं और विवादों की एक झांकी मिलती है। महावीर और बुद्ध ने वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाया और कहा कि जीवन के दुःखों से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता था। यह बात ब्राह्मणवाद से बिल्कुल भिन्न थी।

→ नियतिवादी और भौतिकवादी नियतिवादी लोग आजीविक परम्परा के थे। उनका विश्वास था कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है। भौतिकवादी लोकायत परम्परा के थे भौतिकवादियों के अनुसार दान, यज्ञ या चढ़ावा आदि की बात मूर्खों का सिद्धान्त है, खोखला झूठ है।

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→ महावीर की शिक्षाएँ महावीर जैन धर्म तीर्थकर वे महापुरुष थे जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं –
(1) जीवों के प्रति अहिंसा का पालन करना।
(2) जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा निर्धारित होता है।
(3) कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या की आवश्यकता है। यह संसार के त्याग से ही सम्भव है।
(4) पाँच व्रतों पर बल देना –

  • हत्या न करना
  • चोरी न करना
  • झूठ न बोलना
  • ब्रह्मचर्य और
  • धन संग्रह न करना।

→ जैन धर्म का विस्तार धीरे-धीरे जैन धर्म भारत के कई भागों में फैल गया। जैनों ने प्राकृत, संस्कृत तथा तमिल आदि अनेक भाषाओं में अपने ग्रन्थ लिखे।

→ बुद्ध और ज्ञान की खोज-बुद्ध तत्कालीन युग के सबसे प्रभावशाली शिक्षकों में से एक थे सैकड़ों वर्षों के दौरान उनकी शिक्षाएँ सम्पूर्ण उपमहाद्वीप में और उसके बाद मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया, जापान, श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड और इण्डोनेशिया तक फैल गई। बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। वे शाक्य कबीले के सरदार के पुत्र थे। नगर का भ्रमण करते समय उन्हें एक वृद्ध व्यक्ति, एक रोगी, एक संन्यासी और एक मृतक को देखकर प्रबल आघात पहुँचा। कुछ समय बाद वे महल त्यागकर सत्य की खोज में निकल गए। उन्होंने साधना के कई मार्ग अपनाए और अन्त में ज्ञान प्राप्त कर लिया। इसके बाद वे बुद्ध कहलाए।

→ बुद्ध की शिक्षाएँ

  • विश्व अनित्य और निरन्तर परिवर्तनशील है, यह आत्माविहीन है
  • यह संसार दुःखों का घर है
  • मध्यम मार्ग अपनाकर मनुष्य दुःखों से मुक्ति पा सकता है
  • समाज का निर्माण इन्सानों ने किया है, न कि ईश्वर ने
  • जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति, आत्मज्ञान और निर्वाण के लिए व्यक्ति केन्द्रित हस्तक्षेप और सम्यक् कर्म पर बल देना
  • अपने लिए ज्योति बनना तथा अपनी मुक्ति का मार्ग ढूंढ़ना।

→ बुद्ध के अनुयायी बुद्ध ने अपने शिष्यों के लिए एक संघ की स्थापना की। संघ ऐसे भिक्षुओं की एक संस्था थी, जो धम्म के शिक्षक बन गए। ये भ्रमण सादा जीवन बिताते थे और उपासकों से भोजन दान पाने के लिए एक कटोरा रखते थे। संघ में पुरुष एवं स्त्री दोनों ही सम्मिलित थे बुद्ध के अनुयायियों में राजा, धनवान, गृहपति और सामान्यजन सभी शामिल थे संघ में सभी भिक्षुओं को समान माना जाता था।

→ बेरीगाथा यह अनूठा बौद्ध ग्रन्थ ‘सुत्तपिटक’ का भाग है। इसमें भिक्षुणियों द्वारा रचित छन्दों का संकलन किया गया है। इससे महिलाओं के सामाजिक और आध्यात्मिक अनुभवों के बारे में जानकारी मिलती है।

→ भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए नियम –
(1) जब कोई भिक्षु एक नया कम्बल या गलीचा बनाएगा तो उसे उसका प्रयोग कम से कम छः वर्षों तक करना पड़ेगा।
(2) यदि कोई भिक्षु किसी गृहस्थी के घर जाता है और उसे भोजन दिया जाता है, तो वह दो से तीन कटोरा भर ही भोजन स्वीकार कर सकता है।
(3) यदि कोई भिक्षू किसी विहार से प्रस्थान के पहले अपने द्वारा बिछाए गए बिस्तर को नहीं समेटता है, न ही समेटवाता है, तो उसे अपना अपराध स्वीकार करना होगा।

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→ बौद्ध धर्म के प्रसार के तेजी से फैलने के कारण –
(1) लोग समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असन्तुष्ट थे
(2) बौद्ध धर्म में जन्म के आधार पर श्रेष्ठता की बजाय अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व दिए जाने से स्त्री और पुरुष इस धर्म की ओर आकर्षित हुए।
(3) छोटे और कमजोर लोगों से मैत्रीपूर्ण और दयापूर्ण व्यवहार करने पर बल दिए जाने से भी लोग बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हुए।

→ स्तूप- शवदाह के पश्चात् शरीर के कुछ अवशेष टीलों पर सुरक्षित रख दिए जाते थे। अन्तिम संस्कार से जुड़े ये टीले चैत्य के रूप में जाने गए कुछ पवित्र स्थल पर एक छोटी-सी वेदी बनी रहती थी, जिन्हें कभी-कभी चैत्य कहा जाता था। बौद्ध साहित्य में कई चैत्यों का उल्लेख है। इसमें बुद्ध के जीवन से जुड़े स्थानों का भी वर्णन है- लुम्बिनी (जन्म-स्थल), बोधगया (जहाँ ज्ञान प्राप्त किया), सारनाथ (जहाँ प्रथम उपदेश दिया) तथा कुशीनगर (जहाँ निर्वाण प्राप्त किया)।

→ स्तूप क्यों बनाए जाते थे? कुछ पवित्र स्थलों पर बुद्ध से जुड़े कुछ अवशेष जैसे उनकी अस्थियाँ या उनके द्वारा प्रयुक्त सामान गाड़ दिए गए थे, इन टीलों को स्तूप कहते थे स्तूप बनाने की परम्परा बुद्ध से पहले की रही होगी, परन्तु वह बौद्ध धर्म से जुड़ गई। चूँकि उनमें ऐसे अवशेष रहते थे, जिन्हें पवित्र समझा जाता था, इसलिए समूचे स्तूप को ही बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठा मिली।

→ स्तूप कैसे बनाए गए स्तूप बनाने के लिए कुछ राजाओं (जैसे सातवाहन वंश के राजा) तथा कुछ शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियों के द्वारा दान दिए गए। साँची के एक तोरणद्वार का भाग हाथीदांत का काम करने वाले शिल्पकारों के दान से बनाया गया था। स्तूपों के निर्माण में भिक्षुओं और भिक्षुणियों ने भी दान दिया।

→ स्तूप की संरचना स्तूप (संस्कृत अर्थ टीला) का जन्म एक गोलार्ध लिए हुए मिट्टी के टीले से हुआ, जिसे बाद में ‘अंड’ कहा गया। अंड के ऊपर एक हर्मिका होती थी। यह छज्जे जैसा ढाँचा, देवताओं के घर का प्रतीक था। हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था जिसे ‘यष्टि’ कहते थे, जिस पर प्राय: एक छत्री लगी होती थी। टीले के चारों ओर एक वेदिका होती थी।

→ साँची और भरहुत के स्तूप-साँची और भरहुत के प्रारम्भिक स्तूप बिना अलंकरण के हैं सिवाए इसके कि उनमें पत्थर की वेदिकाएँ और तोरणद्वार हैं ये पत्थर की वेदिकाएँ किसी बांस के या काठ के घेरे के समान थीं और चारों दिशाओं में खड़े तोरणद्वार पर खूब नक्काशी की गई थी। बाद में स्तूप के टीले पर भी अलंकरण और नक्काशी की जाने लगी। अमरावती और पेशावर (पाकिस्तान) में शाहजी की ढेरी में स्तूपों में ताख और मूर्तियाँ उत्कीर्ण करने की कला के काफी उदाहरण मिलते हैं।

→ स्तूपों की खोज- 1796 में एक स्थानीय राजा को अचानक अमरावती के स्तूप के अवशेष मिल गए। कुछ वर्षों के बाद कॉलिन मेकेंजी नामक एक अंग्रेज अधिकारी को यहाँ अनेक मूर्तियाँ मिलीं 1854 में गुन्टूर (आन्ध्रप्रदेश) के कमिश्नर ने अमरावती की यात्रा की। उन्होंने कई मूर्तियाँ और उत्कीर्ण पत्थर जमा किए और वे उन्हें मद्रास ले गए। उन्होंने पश्चिमी तोरणद्वार को भी खोज निकाला और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अमरावती का स्तूप बौद्धों का सबसे विशाल और शानदार स्तूप था 1850 के दशक में अमरावती के उत्कीर्ण पत्थर अनेक स्थानों पर ले जाए जा रहे थे।

→ अमरावती के स्तूप का नष्ट हो जाना यद्यपि साँची का स्तूप बच गया, परन्तु अमरावती का स्तूप नष्ट हो गया। विद्वान इस बात के महत्त्व को नहीं समझ पाए थे कि किसी पुरातात्विक अवशेष को उठाकर ले जाने की बजाए खोज के स्थान पर ही संरक्षित करना कितना महत्त्वपूर्ण था दूसरी ओर 1818 में जब साँची की खोज हुई, उसके तीन तोरणद्वार तब भी खड़े थे, चौथा वहीं गिरा हुआ था और टीला भी अच्छी स्थिति में था।

→ मूर्तिकला बौद्ध मूर्तिकला को समझने के लिए कला इतिहासकारों को बुद्ध के चरित्र लेखन का सहारा लेना पड़ा। बौद्ध चरित्र लेखन के अनुसार एक वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति हुई। कई प्रारम्भिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव के रूप में न दिखाकर उनकी उपस्थिति प्रतीकों के माध्यम से दिखाने का प्रयास किया।

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→ लोक परम्पराएँ- साँची में उत्कीर्णित अनेक मूर्तियाँ शायद बौद्ध धर्म से सीधी जुड़ी हुई नहीं थीं। इनमें से कुछ सुन्दर स्त्रियाँ भी मूर्तियों में उत्कीर्णित हैं साहित्यिक परम्पराओं के अध्ययन से विद्वान यह समझ पाए कि यह संस्कृत भाषा में वर्णित ‘शालभंजिका’ की मूर्ति है। लोक परम्परा में यह माना जाता था कि इस स्वी द्वारा छुए जाने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे और फल आने लगते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक शुभ प्रतीक माना जाता था और इस कारण स्तूप के अलंकरण में प्रयुक्त हुआ।

→ साँची में जानवरों के सुन्दर उत्कीर्णन – साँची में जानवरों के कुछ बहुत सुन्दर उत्कीर्णन पाए गए हैं। इन जानवरों में हाथी, घोड़े, बन्दर और गाय बैल शामिल हैं। यद्यपि साँची में जातकों से ली गई जानवरों की कई कहानियाँ हैं, ऐसा लगता है कि यहाँ पर लोगों को आकर्षित करने के लिए जानवरों का उत्कीर्णन किया गया था। साथ ही जानवरों को मनुष्यों के गुणों के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त किया जाता था। उदाहरण के लिए हाथी शक्ति और ज्ञान के प्रतीक माने जाते थे।

→ महायान बौद्धमत का विकास प्रारम्भ में बुद्ध को भी एक मनुष्य माना जाता था परन्तु धीरे-धीरे एक मुक्तिदाता के रूप में बुद्ध की कल्पना उभरने लगी। यह विश्वास किया जाने लगा कि वे मुक्ति दिलवा सकते थे। साथ-साथ बोधिसत की अवधारणा भी पनपने लगी। बोधिसत्तों को परम करुणामय जीव माना गया जो अपने सत्कार्यों से पुण्य कमाते थे परन्तु वे इस पुण्य से दूसरों की सहायता करते थे बुद्ध और बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा इस परम्परा का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गई। इस नई परम्परा को ‘महायान’ के नाम से जाना गया। महायान के अनुयायी पुरानी परम्परा को ‘हीनयान’ के नाम से पुकारते थे।

→ पौराणिक हिन्दू धर्म का उदय हिन्दू धर्म में दो परम्पराएँ शामिल थीं- वैष्णव तथा शैव वैष्णव परम्परा में विष्णु को सबसे महत्त्वपूर्ण देवता माना जाता है और शैव परम्परा में शिव परमेश्वर है। इस प्रकार की आराधना में उपासना और ईश्वर के बीच का सम्बन्ध प्रेम और समर्पण का सम्बन्ध माना जाता था इसे भक्ति कहते हैं।

→ वैष्णववाद में अवतारों की कल्पना वैष्णववाद में कई अवतारों के इर्द-गिर्द पूजा पद्धतियाँ विकसित हुई वैष्णव धर्म में दस अवतारों की कल्पना की गई। यह माना जाता है कि पापियों के बढ़ते प्रभाव के कारण जब विश्व में अव्यवस्था और विनाश की स्थिति आ जाती थी तब विश्व की रक्षा के लिए भगवान अलग-अलग रूपों में अवतार लेते थे।

→ अवतारों को मूर्तियों के रूप में दिखाना कई अवतारों को मूर्तियों के रूप में दिखाया गया है। अन्य देवताओं की भी मूर्तियों का निर्माण हुआ। शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में बनाया जाता था परन्तु उन्हें कई बार मनुष्य के रूप में भी दिखाया गया है। ये सारे चित्रण देवताओं से जुड़ी हुई मिश्रित अवधारणाओं पर आधारित थे। इन मूर्तियों के अंकन का अभिप्राय समझने के लिए इतिहासकारों को इनसे जुड़ी हुई कहानियों से परिचित होना पड़ता है। कई कहानियाँ प्रथम सहस्राब्दी के मध्य से ब्राह्मणों द्वारा रचित पुराणों में पाई जाती हैं। इनमें देवी-देवताओं की कहानियाँ हैं।

→ मन्दिरों का निर्माण आरम्भिक मन्दिर एक चौकोर कमरे के रूप में थे, जिन्हें गर्भगृह कहा जाता था। इनमें एक द्वार होता था जिससे उपासक मूर्ति की पूजा करने के लिए भीतर प्रविष्ट हो सकता था। धीरे-धीरे गर्भगृह के ऊपर शिखर बनाया जाने लगा। मन्दिरों की दीवारों पर प्रायः भित्ति चित्र उत्कीर्ण किए जाते थे। बाद के युगों में मन्दिरों के स्थापत्य का काफी विकास हुआ। अब मन्दिरों के साथ विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें और तोरण भी जुड़ गए।

→ कृत्रिम गुफाएँ – प्रारम्भ में कुछ मन्दिर पहाड़ियों को काट कर खोखला करके कृत्रिम गुफाओं के रूप में बनाए गए थे। सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ई. पूर्व तीसरी सदी में अशोक के आदेश से आजीविक सम्प्रदाय के सन्तों के लिए बनाई गई थीं। इसका सबसे विकसित रूप हमें आठवीं शताब्दी के कैलाशनाथ के मन्दिर में दिखाई देता है। इसमें पूरी पहाड़ी काट कर उसे मन्दिर का रूप दे दिया गया था।

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→ अज्ञात को समझने का प्रयास- यद्यपि यूरोपीय विद्वान प्रारम्भिक भारतीय मूर्तिकला को यूनान की कला से निम्नस्तर का मानते थे, फिर भी वे बुद्ध और बोधिसत्व की मूर्तियों की खोज से काफी उत्साहित हुए। इसका कारण यह था कि ये मूर्तियाँ यूनानी प्रतिमानों से प्रभावित थीं। ये मूर्तियाँ अधिकतर तक्षशिला और पेशावर के नगरों में मिली थीं। ये मूर्तियाँ यूनानी मूर्तियों से काफी मिलती जुलती थीं। चूँकि ये विद्वान् यूनानी परम्परा से परिचित थे, इसलिए उन्होंने इन मूर्तियों को भारतीय मूर्तिकला का सर्वश्रेष्ठ नमूना बताया। इन्होंने इस कला को समझने के लिए यह तरीका अपनाया-परिचित चीजों के आधार पर अपरिचित चीजों को समझने का पैमाना तैयार करना।

→ लिखित ग्रन्थों से जानकारी प्राप्त करना किसी मूर्ति का महत्व और संदर्भ समझने के लिए कला के इतिहासकार प्राय: लिखित ग्रन्थों से जानकारी एकत्रित करते हैं भारतीय मूर्तियों की यूनानी मूर्तियों से तुलना कर निष्कर्ष निकालने की अपेक्षा यह निश्चय ही अधिक उत्तम तरीका है परन्तु यह तरीका आसान नहीं।

कालरेखा 1
महत्वपूर्ण धार्मिक बदलाव

लगभग 1500-1000 ई. पूर्वप्रारम्भिक वैदिक परम्पराएँ
लगभग 1000-500 ई.पूर्वउत्तरवैदिक परम्पराएँ
लगभग छठी सदी ई. पूर्वप्रारम्भिक उपनिषद्, जैन धर्म, बौद्ध धर्म
लगभग तीसरी सदी ई. पूर्वआरम्भिक स्तूप
लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगेमहायान बौद्ध मत का विकास, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परम्पराएँ
लगभग तीसरी सदी ईसवीसबसे पुराने मन्दिर

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कालरेखा 2
प्राचीन इमारतों और मूर्तियों की खोज और संरक्षण के महत्त्वपूर्ण चरण

उन्नीसवीं सदी –
1814इंडियन म्यूजियम, कोलकाता की स्थापना।
1834रामराजा लिखित एसेज ऑन द आर्किटैक्चर आफ द हिन्दूज का प्रकाशन; कनिंघम ने सारनाथ के स्तूप की छानबीन की।
1835-1842जेम्स फर्गुसन ने महत्त्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों का सर्वेक्षण किया।
1851गवर्नमेंट म्यूजियम, मद्रास की स्थापना।
1854अलैक्जैंडर कनिंघम ने भिलसा टोप्स लिखी जो साँची पर लिखी गई सबसे प्रारम्भिक पुस्तकों में से एक है।
1878राजेन्द्र लाल मित्र की पुस्तक, बुद्ध गया : द हेरिटेज आफ शाक्य मुनि का प्रकाशन।
1880एच.एच. कोल को प्राचीन इमारतों का संग्रहाध्यक्ष बनाया गया।
1888ट्रेजर-ट्रोव एक्ट का बनाया जाना। इसके अनुसार सरकार पुरातात्विक महत्त्व की किसी भी चीज को हस्तगत कर सकती थी।
बीसवीं सदी-
1914जॉन मार्शल और अल्फ्रेड फूसे की ‘द मान्युमेंट्स आफ साँची’ पुस्तक का प्रकाशन।
1923जॉन मार्शल की पुस्तक ‘कन्जर्वेशन मैनुअल’ का प्रकाशन।
1955प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली की नींव रखी।
1989साँची को एक विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया।

JAC Class 12 History Solutions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

Jharkhand Board JAC Class 12 History Solutions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Solutions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

Jharkhand Board Class 12 History यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ In-text Questions and Answers

पृष्ठ संख्या 116

प्रश्न 1.
अल-बिरुनी की कृति का अंश पढ़िए (स्रोत – 5) तथा चर्चा कीजिये कि क्या यह कृति इन उद्देश्यों को पूरा करती है ?
उत्तर:
अल-बिरुनी द्वारा ‘किताब – उल – हिन्द’ नामक पुस्तक लिखने के दो प्रमुख उद्देश्य थे –
(1) उन लोगों की सहायता करना जो हिन्दुओं से धार्मिक विषयों पर चर्चा करना चाहते थे तथा
(2) ऐसे लोगों के लिए सूचना का संग्रह करना, जो हिन्दुओं के साथ सम्बद्ध होना चाहते थे।
अल बिरूनी ने अपनी कृति के ‘अंश स्रोत – 5’ में भारत में प्रचलित वर्ण-व्यवस्था तथा समाज में ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों के स्थान का वर्णन किया है। इस दृष्टि से अल-बिरुनी की कृति तत्कालीन वर्ण व्यवस्था को समझने में उपयोगी है।

पृष्ठ संख्या 117 : चर्चा कीजिए

प्रश्न 2.
यदि अल-बिरुनी इक्कीसवीं शताब्दी में रहता, तो वही भाषाएँ, जानने पर भी उसे विश्व के किन क्षेत्रों में आसानी से समझा जा सकता था ?
उत्तर:
यदि अल-बिरुनी इक्कीसवीं शताब्दी में रहता, तो उसे इजरायल, सीरिया, मिस्र, साउदी अरेबिया, लेबेनान, ईरान, इराक, खाड़ी देश भारत, पाकिस्तान आदि देशों में आसानी से समझा जा सकता था।

पृष्ठ संख्या 117

प्रश्न 3.
पाठ्यपुस्तक की पृष्ठ संख्या 117 पर चित्र संख्या 5.2 में सोलोन तथा उनके विद्यार्थियों के कपड़ों को ध्यान से देखिए । क्या ये कपड़े यूनानी हैं अथवा अरबी ?
उत्तर:
उपर्युक्त चित्र को देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह कपड़े अरबी हैं।

पृष्ठ संख्या 118

प्रश्न 4.
आप डाकुओं को यात्रियों से कैसे अलग करेंगे ?
उत्तर:

  • पाठ्य पुस्तक के चित्र 53 में दिखाया गया है
  • कि कुछ यात्रियों के हाथों में
  • सामान है तथा डाकू लोग उ
  • डाकू उनका पीछा कर रहे हैं।
  • पर हमला कर रहे हैं। यात्री अपने प्राण बचाने के लिए आगे-आगे दौड़ रहे हैं तथा

पृष्ठ संख्या 119

प्रश्न 5.
आपके मत में कुछ यात्रियों के हाथों में हथियार क्यों हैं ?
उत्तर:
पाठ्य पुस्तक के चित्र 54 में कुछ व्यापारी एक नाव में बैठ कर यात्रा कर रहे हैं। इस चित्र में कुछ यात्रियों के हाथों में हथियार दिखाए गए हैं क्योंकि उस समय समुद्री यात्रा करना अत्यन्त जोखिम भरा कार्य था। अतः वे समुद्री डाकुओं से अपने माल व प्राणों की रक्षा के लिए हथियारों से सुसज्जित होकर यात्रा करते थे।

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पृष्ठ संख्या 121 चर्चा कीजिए

प्रश्न 6.
आपके विचार में अल-विरुनी और इब्नबतूता के उद्देश्य किन मायनों में समान / भिन्न थे?
उत्तर:
समानताएँ-अल-विरुनी और इब्नबतूता के उद्देश्यों में निम्नलिखित समानताएँ थीं –
(1) अल-बिहनी और इब्नबतूता ने अपने ग्रन्थ अरबी भाषा में लिखे।
(2) दोनों ने ही भारतीय सामाजिक जीवन, रीति- रिवाज, प्रथाओं, धार्मिक जीवन त्यौहारों आदि का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।
(3) दोनों ही उच्चकोटि के विद्वान थे तथा दोनों की भारतीय साहित्य, सम्मान, धर्म तथा संस्कृति में गहरी रुचि थी।

असमानताएँ –
(1) अल बिरुनी संस्कृत भाषा का अच्छा ज्ञाता था। उसने अनेक संस्कृत ग्रन्थों का अरबी में अनुवाद किया था। परन्तु इब्नबतूता संस्कृत से अनभिज्ञ था।
(2) अल बिरूनी ने ब्राह्मणों, पुरोहितों तथा विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताए और संस्कृत धर्म तथा दर्शन का ज्ञान प्राप्त किया। परन्तु इब्नबतूता को इस प्रकार का अवसर प्राप्त नहीं हुआ।
(3) अल बिरुनी का भारतीय विवरण संस्कृतवादी परम्पराओं पर आधारित था परन्तु इब्नबतूता ने संस्कृतवादी परम्परा का अनुसरण नहीं किया।
(4) अल बिरानी ने अपने ग्रन्थ के प्रत्येक अध्याय में एक विशिष्ट शैली का प्रयोग किया, जिसमें आरम्भ में एक प्रश्न होता था, फिर संस्कृतवादी परम्पराओं पर आधारित वर्णन और अन्त में अन्य संस्कृतियों से तुलना करना दूसरी ओर इब्नबतूता ने नवीन संस्कृतियों, लोगों, आस्थाओं तथा मान्यताओं आदि के विषय में अपने अभिमत का सावधानी तथा कुशलतापूर्वक वर्णन किया है।

पृष्ठ संख्या 123

प्रश्न 7.
स्रोत चार में बर्नियर द्वारा दी गई सूची में कौनसी वस्तुएँ हैं, जो आज आप यात्रा में साथ ले जायेंगे?
उत्तर:
स्रोत चार में वर्नियर द्वारा दी गई सूची में वर्णित निम्नलिखित वस्तुओं को मैं यात्रा में साथ लेकर चलूँगा

  • दरी
  • बिहीना
  • तकिया
  • अंगोछे/ नैपकिन
  • झोले
  • वस्त्र
  • चावल
  • रोटी
  • नींबू
  • चीनी
  • पानी
  • पानी पीने का

पृष्ठ संख्या 125 चर्चा कीजिए

प्रश्न 8.
एक अन्य क्षेत्र से आए यात्री के लिए स्थानीय क्षेत्र की भाषा का ज्ञान कितना आवश्यक है?
उत्तर:
एक अन्य क्षेत्र से आए यात्री के लिए स्थानीय क्षेत्र की भाषा का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है। अन्य क्षेत्र से आए यात्री को लोगों के धर्म और दर्शन, रीति-रिवाजों, मान्यताओं, प्रथाओं, सामाजिक जीवन, कला कानून आदि का विवरण प्रस्तुत करना होता है परन्तु स्थानीय क्षेत्र की भाषा के ज्ञान के अभाव में इनका यथार्थ, युक्तियुक्त और सटीक वर्णन करना अत्यन्त कठिन होता है। परिणामस्वरूप उसका वृत्तान्त अपूर्ण, संदिग्ध और भ्रामक होता है। उसे अपने ग्रन्थों में सुनी-सुनाई बातों पर अवलम्बित होना पड़ता है वह उनका उचित विश्लेषण नहीं कर पाता और तथ्यों की जांच-पड़ताल किये बिना ही उसे अपने ग्रन्थ में वर्णित करता है। अतः यात्री के लिए स्थानीय भाषा का पर्याप्त ज्ञान होना अत्यन्त आवश्यक है।

JAC Class 12 History Solutions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

पृष्ठ संख्या 126

प्रश्न 9.
नारियल कैसे होते हैं अपने पाठकों को यह समझाने के लिए इब्नबतूता किस तरह की तुलनाएँ प्रस्तुत करता है? क्या ये तुलनाएँ वाजिब हैं? वह किस तरह से यह दिखाता है कि नारियल असाधारण फल है? इब्नबतूता का वर्णन कितना सटीक है?
उत्तर:
इब्नबतूता ने लिखा है कि नारियल का वृक्ष बिल्कुल खजूर के वृक्ष जैसा दिखता है। इनमें अन्तर यह है कि एक से काष्ठ फल प्राप्त होता है जबकि दूसरे से खजूर इब्नबतूता ने नारियल को मानव सिर से तुलना करते हुए लिखा है कि नारियल के वृक्ष का फल मानव सिर से मिलता-जुलता है क्योंकि इसमें भी दो आँखें और एक मुख है। इसके अन्दर का भाग हरा होने पर मस्तिष्क जैसा दिखता है और इससे जुड़ा रेशा बालों जैसा दिखाई देता है। इब्नबतूता की तुलनाएँ वाजिब प्रतीत होती हैं। इब्नबतूता के अनुसार नारियल एक असाधारण फल है क्योंकि लोग इससे रस्सी बनाते हैं और इनसे जहाजों को सिलते हैं। उसका वर्णन बिल्कुल सटीक है।

पृष्ठ संख्या 126

प्रश्न 10.
आपके विचार में इसने इब्नबतूता का ध्यान क्यों खींचा? क्या आप इस विवरण में कुछ और जोड़ना चाहेंगे ?
उत्तर:
इब्नबतूता के देश के लोग पान से अपरिचित थे क्योंकि वहाँ पान नहीं उगाया जाता था अतः पान ने इब्नबतूता का ध्यान खींचा सुपारी के अतिरिक्त इलायची, गुलकन्द, मुलहठी, सौंफ आदि वस्तुएँ भी पान में डाली जाती हैं। पान में जर्द आदि का भी प्रयोग किया जाता है।

पृष्ठ संख्या 127

प्रश्न 11.
स्थापत्य के कौनसे अभिलक्षणों पर इब्नबतूता ने ध्यान दिया?
उत्तर:
इब्नबतूता ने स्थापत्य कला के विभिन्न अभिलक्षणों पर ध्यान दिया है; जैसेकि किले की प्राचीर, प्राचीर में खिड़की प्राचीरों में उपलब्ध विभिन्न सामग्री, प्राचीरों तथा इनके निर्माण की वास्तुकला, किले के विभिन्न प्रवेश द्वार, मेहराब, मीनारें, गुम्बद आदि ।

पृष्ठ संख्या 128

प्रश्न 12.
अपने वर्णन में इब्नबतूता ने इन गतिविधियों को उजागर क्यों किया?
उत्तर:
इब्नबतूता ने अपने यात्रा-वृत्तान्त में उन सभी गतिविधियों को सम्मिलित किया जो उसके पाठकों के लिए अपरिचित थीं। इब्नबतूता दौलताबाद में गायकों के लिए निर्धारित बाजार, यहाँ की दुकानों, अन्य वस्तुओं, गायिकाओं द्वारा प्रस्तुत संगीत व नृत्य के कार्यक्रमों को देखकर अत्यधिक प्रभावित हुआ। अतः उसने इन गतिविधियों से अपने देशवासियों को परिचित कराने के लिए इन गतिविधियों को उजागर किया।

पृष्ठ संख्या 129

प्रश्न 13.
क्या सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक की पैदल डाक व्यवस्था पूरे उपमहाद्वीप में संचालित की जाती होगी?
उत्तर:
यह सम्भव नहीं है कि सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक की पैदल डाक व्यवस्था पूरे उपमहाद्वीप में संचालित की जाती होगी। इसके लिए निम्नलिखित तर्फ प्रस्तुत किए जा सकते हैं–

  1. मुहम्मद बिन तुगलक का साम्राज्य सम्पूर्ण उपमहाद्वीप में फैला हुआ नहीं था। विजयनगर, बहमनी आदि दक्षिण भारत के राज्य सुल्तान के साम्राज्य में सम्मिलित नहीं थे। सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर भी मुहम्मद तुगलक का आधिपत्य नहीं था।
  2. भारत एक विशाल देश था। एक ओर यहाँ कठिन पर्वतीय क्षेत्र तथा रेगिस्तानी क्षेत्र स्थित थे, तो दूसरी ओर कुछ क्षेत्र समुद्रों से घिरे हुए थे इन सभी क्षेत्रों में पैदल डाक व्यवस्था का संचालन करना अत्यन्त कठिन था।
  3. मुहम्मद तुगलक को अपने शासन काल में निरन्तर विद्रोहों का सामना करना पड़ा। इसके अतिरिक्त उसकी योजनाओं की असफलता के कारण भी उपमहाद्वीप में अशान्ति, अराजकता एवं अव्यवस्था फैली हुई थी। अतः इन परिस्थितियों में सम्पूर्ण उपमहाद्वीप में मुहम्मद बिन तुगलक की पैदल डाक व्यवस्था का संचालित होना सम्भव नहीं था।

पृष्ठ संख्या 131

प्रश्न 14.
बर्नियर के अनुसार उपमहाद्वीप में किसानों को किन-किन समस्याओं से जूझना पड़ता था? क्या आपको लगता है कि उसका विवरण उसके पक्ष को सुदृढ़ करने में सहायक होता?
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार उपमहाद्वीप में किसानों को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ता था –

  1. विशाल ग्रामीण अंचलों की भूमियाँ रेतीली या बंजर, पथरीली थीं।
  2. यहाँ की खेती अच्छी नहीं थी।
  3. कृषि योग्य भूमि का एक बड़ा भाग भी श्रमिकों के अभाव में कृषि विहीन रह जाता था।
  4. गवर्नरों द्वारा किए गए अत्याचारों के कारण अनेक श्रमिक मर जाते थे।
  5. जब गरीब कृषक अपने स्वामियों की माँगों को पूरा करने में असमर्थ होते थे तो उन्हें जीवन निर्वाह के साधनों से वंचित कर दिया जाता था तथा उनके बच्चों को दास बना कर ले जाया जाता था।
  6. सरकार के निरंकुशतापूर्ण व्यवहार से हताश होकर अनेक किसान गाँव छोड़कर चले जाते थे।

बनिंदर निजी स्वामित्व का प्रबल समर्थक था। उसके अनुसार राजकीय भू-स्वामित्व ही भारतीय कृषकों को दयनीय दशा के लिए उत्तरदायी था। वह चाहता था कि मुगलकालीन भारत से सम्बन्धित उसका विवरण यूरोप में उन लोगों के लिए एक चेतावनी का कार्य करेगा, जो निजी स्वामित्व की अच्छाइयों को स्वीकार नहीं करते थे अतः हमें लगता है कि बर्नियर का विवरण उसके पक्ष को सुदृढ़ करने में सहायक रहा।

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पृष्ठ संख्या 132

प्रश्न 15.
बर्नियर सर्वनाश के दृश्य का चित्रण किस प्रकार करता है?
उत्तर:
बर्नियर ने मुगल शासकों की नीतियों के कारण भारतीय उपमहाद्वीप की भयावह स्थिति का चित्रण किया है उसके अनुसार मुगल शासकों की नीतियाँ कतई हितकारी नहीं हैं; उनका अनुसरण करने पर उनके राज्य इतने सुशिष्ट और फलते-फूलते नहीं रह जाएंगे तथा वह भी मुगल शासकों की तरह जल्दी ही रेगिस्तान तथा निर्जन स्थानों के भिखारियों तथा क्रूर लोगों के राजा बनकर रह जायेंगे। पृष्ठ संख्या 133

प्रश्न 16.
इस उद्धरण में दिया गया विवरण स्रोत 11 में दिए गए विवरण से किन मायनों में भिन्न है?
उत्तर:
इस उद्धरण में दिया गया विवरण स्रोत 11 के उद्धरण में दिए गए विवरण के बिल्कुल विपरीत है। एक तरफ तो बर्निचर स्रोत 11 में भारत की सामाजिक-आर्थिक विपन्नता का वर्णन करता है, दूसरी तरफ इस खोत में दिए गए विवरण में बर्नियर ने भारत की सामाजिक-आर्थिक सम्पन्नता का वर्णन किया है। इस स्त्रोत में बर्नियर ने भारत की उच्च कृषि, शिल्पकारी, वाणिज्यिक वस्तुओं का निर्यात जिसके एवज में पर्याप्त सोना, चाँदी भारत में आता था आदि का वर्णन किया है।

बर्नियर के वर्णन में यह भिन्नता सम्भवत: इसलिए है कि बर्नियर ने सर्वप्रथम जिस क्षेत्र का भ्रमण किया; वहाँ की सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक परिस्थितियाँ इतनी उच्च नहीं थीं। बाद में वह ऐसे क्षेत्र में पहुँचा जहाँ कि विकास से सम्बन्धित परिस्थितियाँ बेहतर थीं। जैसेकि उपजाऊ कृषि भूमि, पर्याप्त श्रम उपलब्धता, विकसित शिल्पकारी इसलिए वहाँ की सम्पन्नता को देखकर बर्नियर ने अपने वृत्तान्त में इसका वर्णन किया है।

पृष्ठ संख्या 134

प्रश्न 17.
बर्नियर इस विचार को किस प्रकार प्रेषित करता है कि हालांकि हर तरफ बहुत सक्रियता है, परन्तु उन्नति बहुत कम ?
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार शिल्पकार अपने कारखानों में प्रतिदिन सुबह आते थे जहाँ ये पूरे दिन कार्यरत रहते थे और शाम को अपने-अपने घर चले जाते थे। इस प्रकार नौरस वातावरण में कार्य करते हुए उनका समय बीतता जाता था। बर्नियर के अनुसार यद्यपि हर ओर बहुत सक्रियता है, परन्तु शिल्पकारों के जीवन में बहुत अधिक प्रगति दिखाई नहीं देती थी। वास्तव में कोई भी शिल्पकार जीवन की उन परिस्थितियों में सुधार करने का इच्छुक नहीं था जिनमें वह उत्पन्न हुआ था।

पृष्ठ संख्या 134

प्रश्न 18.
आपके विचार में बर्नियर जैसे विद्वानों ने भारत की यूरोप से तुलना क्यों की ?
उत्तर:
बर्नियर ने अपने ग्रंथ ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ में भारत की तुलना तत्कालीन यूरोप से की है। वह पश्चिमी संस्कृति का प्रबल समर्थक था उसने महसूस किया कि यूरोपीय संस्कृति के मुकाबले में भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति निम्न कोटि की है अतः उसने भारत को यूरोप के प्रतिलोम के रूप में दिखलाया है अथवा फिर यूरोप का विपरीत दर्शाया है। उसने भारत में जो भिन्नताएँ देखीं, उन्हें इस प्रकार क्रमबद्ध किया, जिससे भारत पश्चिमी संसार को निम्न कोटि का प्रतीत हो।

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पृष्ठ संख्या 136 चर्चा कीजिए

प्रश्न 19.
आपके विचार में सामान्य महिला श्रमिकों के जीवन ने इब्नबतूता और बर्नियर जैसे यात्रियों का ध्यान अपनी ओर क्यों नहीं खींचा?
उत्तर:
तत्कालीन युग में यात्रा-वृत्तान्त लिखने वाले यात्री राजदरबार, अभिजात वर्ग के लोगों की गतिविधियों का चित्रण करने में अधिक रुचि लेते थे। वे पुरुष प्रधान समाज का चित्रण करना ही अपना प्रमुख कर्तव्य समझते थे। अतः उन्होंने सामान्य महिला श्रमिकों के जीवन से सम्बन्धित गतिविधियों पर ध्यान नहीं दिया।

पृष्ठ संख्या 136

प्रश्न 20.
यहाँ यातायात के कौन-कौनसे साधन अपनाए गए हैं ?
उत्तर:
पाठ्यपुस्तक के चित्र 5.13 में यातायात के निम्नलिखित साधन अपनाए गए हैं-घोड़ा, घुड़सवार, घोड़ा- गाड़ी अथवा रथ, हाथी, महावत

Jharkhand Board Class 12 History यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ Text Book Questions and Answers

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 100 से 150 शब्दों में दीजिए।

प्रश्न 1.
‘किताब-उल-हिन्द’ पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
(1) ‘किताब-उल-हिन्द’ अरबी में लिखी गई अल बिरूनी की कृति है। इसकी भाषा सरल और स्पष्ट है। यह एक विस्तृत ग्रन्थ है जिसमें धर्म और दर्शन, त्योहारों, खगोल विज्ञान, रीति-रिवाज तथा प्रथाओं, सामाजिक जीवन, भार तौल तथा मापन विधियों, मूर्तिकला, कानून, मापतन्त्र विज्ञान आदि विषयों का विवेचन किया गया है। यह ग्रन्थ अम्मी अध्यायों में विभाजित है।

(2) अल बिरनी ने प्राय: प्रत्येक अध्याय में एक विशिष्ट शैल का प्रयोग किया. जिसमें आरम्भ में एक प्रश्न होता था, फिर संस्कृतवादी परम्पराओं पर आधारित वर्णन था और अना में अन्य संस्कृतियों के साथ तुलना की गई थी। विद्वानों के अनुसार यह लगभग एक ज्यामितीय संरचना है, जिसका मुख्य कारण अल बिरूनी का गणित की ओर झुकाव था। यह ग्रन्थ अपनी स्पष्टता तथा पूर्वानुमेयता के लिए प्रसिद्ध है।

(3) अल बिरूनी ने सम्भवतः अपनी कृतियाँ उपमहाद्वीप के सीमान्त क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए लिखी थीं। यह संस्कृत, प्राकृत तथा पालि ग्रन्थों के अरजी भाषा में अनुवादों तथा रूपान्तरणों से परिचित था। इनमें दंत कथाओं से लेकर खगोल विज्ञान और चिकित्सा सम्बन्धी कृतियाँ भी शामिल थीं।

प्रश्न 2.
इब्नबतूता और बर्नियर ने जिन दृष्टिकोण से भारत में अपनी यात्राओं के वृत्तान्त लिखे थे, उनकी तुलना कीजिए तथा अन्तर बताइये।
उत्तर:
(1) इब्नबतूता अन्य यात्रियों के विपरीत, पुस्तकों के स्थान पर यात्राओं से अर्जित अनुभव को ज्ञान का अधिक महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था उसने नवीन संस्कृतियों, लोगों, आस्थाओं, मान्यताओं आदि के विषय में अपने विचारों को सावधानी तथा कुशलतापूर्वक व्यक्त किया। राजाओं तथा सामान्य पुरुषों और महिलाओं के बारे में उसे जो कुछ भी विचित्र लगता था, उसका यह विशेष रूप से वर्णन करता था, ताकि श्रोता अथवा पाठक सुदूर देशों के वृत्तान्तों से पूर्ण रूप से प्रभावित हो सकें। उसके पाठक नारियल तथा पान से अपरिचित थे अतः उसने इनका बड़ा रोचक वर्णन किया है। उसने कृषि, व्यापार तथा उद्योगों के उन्नत अवस्था में होने का वर्णन भी किया है। उसने भारत की डाक प्रणाली की कार्यकुशलता का भी वर्णन किया है जिसे देखकर वह चकित हो गया था।

(2) जहाँ इब्नबतूता ने हर उस चीज का वर्णन किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया, वहीं दूसरी ओर बर्नियर ने भारत में जो भी देखा, वह उसकी सामान्य रूप से यूरोप और विशेषकर फ्रांस में व्याप्त स्थितियों से तुलना तथा भिन्नता को उजागर करना चाहता था। उसका प्रमुख उद्देश्य भारतीय समाज और संस्कृति की त्रुटियों को दर्शाना तथा यूरोपीय समाज, प्रशासन तथा संस्कृति की सर्वश्रेष्ठता का प्रतिपादन करना था।

प्रश्न 3.
बर्नियर के वृत्तान्त से उभरने वाले शहरी केन्द्रों के चित्र पर चर्चा कीजिए।
उत्तर-
शहरी केन्द्र
(1) बर्नियर ने मुगलकालीन शहरों को ‘शिविर नगर’ कहा है जिससे उसका आशय उन नगरों से था, जो अपने अस्तित्व और बने रहने के लिए राजकीय शिविरों पर निर्भर थे। उसकी मान्यता थी कि वे नगर राजदरबार के आगमन के साथ अस्तित्व में आते थे तथा इसके कहीं और चले जाने के बाद तेजी से पतनोन्मुख हो जाते थे उसका यह भी कहना था कि इन नगरों का सामाजिक और आर्थिक आधार व्यावहारिक नहीं होता था और ये राजकीय संरक्षण पर आश्रित रहते थे। परन्तु बर्नियर का यह विवरण सही प्रतीत नहीं होता।

(2) वास्तव में उस समय सभी प्रकार के नगर अस्तित्व में थे उत्पादन केन्द्र, व्यापारिक नगर, बन्दरगाह नगर, धार्मिक केन्द्र तीर्थ स्थान आदि।

(3) सामान्यतः नगर में व्यापारियों का संगठन होता था पश्चिमी भारत में ऐसे समूहों को ‘महाजन’ कहा जाता था तथा उनके मुखिया को ‘सेट’ अहमदाबाद जैसे शहरी केन्द्रों में सभी महाजनों का सामूहिक प्रतिनिधित्व व्यापारिक समुदाय के मुखिया द्वारा होता था जिसे ‘नगर सेठ’ कहा जाता था।

(4) अन्य शहरी समूहों में व्यावसायिक वर्ग जैसे चिकित्सक (हकीम अथवा वैद्य), अध्यापक (पंडित या मुल्ला), अधिवक्ता (वकील), चित्रकार, वास्तुविद संगीतकार, सुलेखक आदि सम्मिलित थे। इनमें से कुछ वर्गों को राज्याश्रय प्राप्त था तथा कुछ सामान्य लोगों की सेवा करके जीवनयापन करते थे।

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प्रश्न 4.
इब्नबतूता द्वारा दास प्रथा के सम्बन्ध में दिए गए साक्ष्यों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
(1) बाजारों में दास अन्य वस्तुओं की भाँति खुलेआम बेचे जाते थे और नियमित रूप से भेंट स्वरूप दिए जाते थे।
(2) सिन्ध पहुँचने पर इब्नबतूता ने सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के लिए भेंट स्वरूप घोड़े, ऊँट तथा दास खरीदे थे।
(3) इब्नबतूता बताता है कि सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने नसीरुद्दीन नामक एक धर्मोपदेशक के प्रवचन से प्रसन्न होकर उसे एक लाख टके (मुद्रा) तथा दो सौ दास प्रदान किए थे।
(4) इब्नबतूता के विवरण से ज्ञात होता है कि दास भिन्न-भिन्न प्रकार के होते थे सुल्तान की सेवा में कार्यरत कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं। इब्नबतूता सुल्तान की बहिन की शादी के अवसर पर दासियों के घरेलू श्रम के लिए प्रदर्शन से अत्यधिक आनन्दित हुआ। सुल्तान अपने अमीर की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए दासियों को भी नियुक्त करता था।
(5) सामान्यतः दासों का ह प्रयोग किया जाता था। ये दास पालकी या डोले में पुरुषों और महिलाओं को ले जाने का काम करते थे। दासों विशेषकर उन दासियों की कीमत बहुत कम होती थी, जिनकी आवश्यकता घरेलू श्रम के लिए होती थी। अधिकांश परिवार कम से कम एक या दो दासों को तो रखते ही थे।

प्रश्न 5.
सती प्रथा के कौन से तत्वों ने बर्नियर का ध्यान अपनी ओर खींचा?
अथवा
सती प्रथा के बारे में बर्नियर ने क्या लिखा था ?
उत्तर:
लाहौर में वर्नियर ने एक अत्यधिक सुन्दर 12 वर्षीय विधवा को सती होते हुए देखा। इसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि सती प्रथा के निम्नलिखित तत्त्वों ने बर्निवर का ध्यान अपनी ओर खींचा –

  1. बर्नियर के अनुसार अधिकांश विधवाओं को सती होने के लिए बाध्य किया जाता था।
  2. अल्पवयस्क विधवा को जलने के लिए बाध्य किया जाता भी आग में जीवित था उसके रोने, चिल्लाने पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था उसके मस्तिष्क की पीड़ा अवर्णनीय थी।
  3. इस प्रक्रिया में ब्राह्मण तथा बूढ़ी महिलाएँ भी भाग लेती थीं।
  4. विधवा को उसकी इच्छा के विरुद्ध चिता में जलने के लिए जबरन ले जाया जाता था।
  5. सती होने वाली विधवा के हाथ-पांव बाँध दिए जाते थे, ताकि वह भाग न जाए।
  6. इस कोलाहलपूर्ण वातावरण में सती होने वाली विधवा के करुणाजनक विलाप की ओर किसी का ध्यान नहीं जा पाता था।

निम्नलिखित पर एक लघु निबन्ध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
भारतीय जाति व्यवस्था के बारे में अल- बिरुनी का यात्रा वर्णन क्यों महत्त्वपूर्ण है?
अथवा
जाति व्यवस्था के सम्बन्ध में अल-बिरुनी की व्याख्या पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
जाति व्यवस्था के सम्बन्ध में अल-विरुनी की व्याख्या अल बिरूनी ने अन्य समुदायों में प्रतिरूपों की खोज के द्वारा जाति व्यवस्था को समझने और उसकी व्याख्या करने का प्रयास किया।
(1) प्राचीन फारस में सामाजिक वर्गों को मान्यता- अल बिरुनी के अनुसार प्राचीन फारस में चार सामाजिक वर्गों को मान्यता प्राप्त थी।

ये चार वर्ग निम्नलिखित थे-

  • घुड़सवार और शासक वर्ग
  • भिक्षु, आनुष्ठानिक पुरोहित तथा चिकित्सक
  • खगोल शास्त्री तथा अन्य वैज्ञानिक
  • कृषक तथा शिल्पकार।

(2) अल बिरुनी का उद्देश्य फारस के सामाजिक वर्गों का उल्लेख करके अल-बिरनी यह दिखाना चाहता था कि ये सामाजिक वर्ग केवल भारत तक ही सीमित नहीं थे अपितु अन्य देशों में भी थे। इसके साथ ही उसने यह भी बताया कि इस्लाम में सभी लोगों को समन माना जाता था और उनमें भिन्नताएँ केवल धार्मिकता के पालन में थीं।

(3) अपवित्रता की मान्यता को अस्वीकार करना- यद्यपि अल बिरूनी जाति व्यवस्था के सम्बन्ध में ब्राह्मणवादी व्याख्या को मानता था, फिर भी उसने अपवित्रता की मान्यता को अस्वीकार कर दिया। उसने लिखा कि प्रत्येक यह वस्तु जो अपवित्र हो जाती है, अपनी पवित्रता की मूल स्थिति को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करती है और सफल होती है। उदाहरण के लिए सूर्य वायु को स्वच्छ करता है और समुद्र में नमक पानी को गन्दा होने से बचाता है। अल-विरुनी इस बात पर बल देकर कहता है कि यदि ऐसा नहीं होता, तो पृथ्वी पर जीवन असम्भव हो जाता। अल बिरूनी का कहना था कि जाति व्यवस्था में संलग्न अपवित्रता की अवधारणा प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी।

(4) भारत में प्रचलित वर्ण-व्यवस्था-अल-विरुनी ने भारत में प्रचलित वर्ण-व्यवस्था का उल्लेख निम्न प्रकार से किया है –

  • ब्राह्मण-ब्राह्मणों की जाति सबसे ऊँची थी हिन्दू ग्रन्थों के अनुसार ब्राह्मण ब्रह्मन् के सिर से उत्पन्न हुए थे। इसी वजह से हिन्दू ब्राह्मणों को मानव जाति में सबसे उत्तम मानते हैं।
  • क्षत्रिय अल बिरूनी के अनुसार ऐसी मान्यता थी कि क्षत्रिय ब्रह्मन् के कंधों और हाथों से उत्पन्न हुए थे। उनका दर्जा ब्राह्मणों से अधिक नीचे नहीं है।
  • वैश्य क्षत्रियों के बाद वैश्य आते हैं। वैश्य ब्रह्मन् की जंघाओं से उत्पन्न हुए थे।
  • शूद्र इनका जन्म ब्रह्मन् के चरणों से हुआ अल बिरुनी के अनुसार अन्तिम दो वर्गों में अधिक अन्तर नहीं था परन्तु इन वर्गों के बीच भिन्नता होने पर भी शहरों और गांवों में मिल-जुल कर रहते थे।

जाति व्यवस्था के बारे में अल बिरूनी का विवरण संस्कृत ग्रन्थों पर आधारित होना-जाति-व्यवस्था के विषय में अल बिरूनी का विवरण संस्कृत ग्रन्थों के अध्ययन से पूर्णतथा प्रभावित था। परन्तु वास्तविक जीवन में यह व्यवस्था इतनी कठोर नहीं थी। उदाहरण के लिए, अन्त्यज (जाति व्यवस्था में सम्मिलित नहीं की जाने वाली जाति) नामक श्रेणियों से सामान्यतया यह अपेक्षा की जाती थी कि वे कृषकों और जमींदारों के लिए सस्ता श्रम प्रदान करें।

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प्रश्न 7.
क्या आपको लगता है कि समकालीन शहरी केन्द्रों में जीवन शैली की सही जानकारी प्राप्त करने में इब्नबतूता का वृत्तांत सहायक है? अपने उत्तर के कारण दीजिए।
उत्तर:
समकालीन शहरी केन्द्रों में जीवन शैली को समझने में इब्नबतूता के वृत्तान्त का सहायक होना हो, हमें लगता है कि समकालीन शहरी केन्द्रों में जीवन शैली की सही जानकारी प्राप्त करने में इब्नबतूता का वृत्तांत काफी सहायक है। इसका कारण यह है कि उसने समकालीन शहरी केन्द्रों का विस्तृत विवरण दिया है उसकी जानकारी का मुख्य आधार उसका व्यक्तिगत सूक्ष्म अध्ययन एवं अवलोकन था। इब्नबतूता वृत्तान्त समकालीन शहरी केन्द्रों की जीवन-शैली के बारे में निम्नलिखित जानकारियाँ प्राप्त होती है –
(1) घनी आबादी वाले तथा समृद्ध शहर इब्नबतूत के अनुसार तत्कालीन नगर घनी आबादी वाले तथा समृद्ध थे। परन्तु कभी-कभी युद्धों तथा अभियानों के कारण कुछ नगर नष्ट भी हो जाया करते थे।

(2) भीड़-भाड़ वाली सड़कें तथा चमक-दमक वाले बाजार अधिकांश शहरों में
भीड़-भाड़ वाली सड़कें तथा चमक-दमक वाले और रंगीन बाजार थे। ये बाजार विविध प्रकार की वस्तुओं से भरे रहते थे।

(3) बड़े शहर इब्नबतूता के अनुसार दिल्ली एक बहुत बड़ा शहर था जिसकी आबादी बहुत अधिक थी। उसके अनुसार दिल्ली भारत का सबसे बड़ा शहर था दौलताबाद (महाराष्ट्र में भी कम नहीं था और आकार में वह दिल्ली को चुनौती देता था।

(4) सामाजिक तथा आर्थिक गतिविधियों के केन्द्रबाजार केवल आर्थिक विनिमय के स्थान ही नहीं थे, बल्कि ये सामाजिक तथा आर्थिक गतिविधियों के केन्द्र भी थे। अधिकांश बाजारों में एक मस्जिद तथा एक मन्दिर होता था और उनमें से कम से कम कुछ में तो नर्तकों, संगीतकारों तथा गायकों के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए स्थान भी निर्धारित थे।

(5) इतिहासकारों द्वारा इब्नबतूता के वृत्तान्त का प्रयोग करना – इतिहासकारों ने उसके वृत्तान्त का प्रयोग यह तर्क देने में किया है कि शहर अपनी सम्पत्ति का एक बड़ा भाग गाँवों से अधिशेष के अधिग्रहण से प्राप्त करते थे।

(6) कृषि का उत्पादनकारी होना इब्नबतूता के अनुसार भारतीय कृषि के बहुत अधिक उत्पादनकारी होने का कारण मिट्टी का उपजाऊपन था। इसी कारण किसान एक वर्ष में दो फसलें उगाते थे।

(7) उपमहाद्वीप का व्यापार तथा वाणिज्य के अन्तर- एशियाई तन्त्रों से जुड़ा होना इब्नबतूता के अनुसार उपमहाद्वीप का व्यापार तथा वाणिज्य अन्तर- एशियाई तत्वों से भली-भांति जुड़ा हुआ था। भारतीय माल की मध्य तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में बहुत माँग थी। इससे शिल्पकारों तथा व्यापारियों को भारी लाभ होता था भारतीय सूती कपड़े, महीन मलमल, रेशम, जरी तथा साटन की अत्यधिक मांग थी। इब्नबतूता लिखता है कि महीन मलमल की कई किस्में तो इतनी अधिक महँगी थीं कि उन्हें अमीर वर्ग के तथा बहुत धनी लोग ही पहन सकते थे।

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प्रश्न 8.
चर्चा कीजिए कि बर्निचर का वृत्तान्त किस सीमा तक इतिहासकारों को समकालीन ग्रामीण समाज को पुनर्निर्मित करने में सक्षम करता है?
अथवा
बर्नियर के अनुसार मुगलकालीन भारत में किसानों की क्या समस्याएँ थीं?
अथवा
बर्नियर के वृत्तान्त में समकालीन भारतीय समाज का जो चित्र उभरता है, उसकी चर्चा कीजिये।
उत्तर:
बर्नियर ने समकालीन ग्रामीण समाज का जो वृत्तान्त प्रस्तुत किया है, वह सर्वथा सत्य नहीं है इसलिए क बर्नियर का वृत्तान्त इतिहासकारों को समकालीन ग्रामीण समाज को पुनर्निर्मित करने में आंशिक रूप से ही सक्षम करता है, पूर्ण रूप से नहीं। बर्नियर ने तत्कालीन ग्रामीण समाज का जो वृत्तान्त प्रस्तुत किया है, उसे निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत वर्णित किया जा सकता है-

(1) भारत में निजी भू-स्वामित्व का अभाव बर्नियर न्द्र के अनुसार भारत में निजी भू-स्वामित्व का अभाव था। न्दर उसके अनुसार मुगल साम्राज्य में सम्राट सम्पूर्ण भूमि का कों, स्वामी था सम्राट इस भूमि को अपने अमीरों के बीच बाँटता था। इसके अर्थव्यवस्था तथा समाज पर हानिप्रद प्रभाव पड़ते थे।

(2) भूधारकों पर प्रतिकूल प्रभाव बर्नियर के अनुसार राजकीय भूस्वामित्व के कारण भूधारक अपने बच्चों को भूमि नहीं दे सकते थे। परिणामस्वरूप निजी भू- स्वामित्व के अभाव से बेहतर भूधारकों के वर्ग का उदय नहीं हो सका, जो भूमि के रख-रखाव तथा सुधार के लिए प्रयास करता। इस वजह से कृषि का विनाश हुआ, किसानों का अत्यधिक उत्पीड़न हुआ और समाज के सभी वर्गों के जीवन स्तर में निरन्तर पतन की स्थिति उत्पन्न हुई। परन्तु शासक वर्ग पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा।

(3) भारतीय समाज दरिद्र लोगों का जनसमूह- बर्नियर के अनुसार भारतीय समाज दरिद्र लोगों के जनसमूह से बना था। यह समाज अत्यन्त अमीर तथा शक्तिशाली शासक वर्ग के अधीन था। वर्नियर के अनुसार “भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं हैं।”

(4) मुगल साम्राज्य का रूप बर्नियर के अनुसार मुगल साम्राज्य का राजा ‘भिखारियों और क्रूर लोगों का राजा था। इसके शहर तथा नगर विनष्ट थे तथा खराब हवा’ से दूषित थे। इसके खेत ‘शाड़ीदार’ तथा ‘घातक दलदल से भरे हुए थे, इसका केवल एक ही कारण था- राजकीय भूस्वामित्व बर्नियर के अनुसार ” यहाँ की खेती अच्छी नहीं है।

यहाँ तक कि कृषि योग्य भूमि का एक बड़ा हिस्सा भी श्रमिकों के अभाव में कृषि-विहीन रह जाता है। इनमें से कई श्रमिक गवर्नरों द्वारा किए गए बुरे व्यवहार के फलस्वरूप मर जाते हैं गरीब लोग जब अपने लोभी मालिकों की माँगों को पूरा नहीं कर पाते हैं, तो उन्हें न केवल जीवन निर्वहन के साधनों से वंचित कर दिया जाता है, बल्कि उन्हें अपने बच्चों से भी हाथ धोना पड़ता है, जिन्हें दास बनाकर ले जाया जाता है।”

(5) बर्नियर के वृत्तान्त की अन्य साक्ष्यों से पुष्टि नहीं होना आश्चर्य की बात यह है कि एक भी सरकारी मुगल दस्तावेज यह संकेत नहीं करता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था। बर्नियर का ग्रामीण समाज का चित्रण सच्चाई से बहुत दूर होना वास्तव में बर्नियर द्वारा प्रस्तुत ग्रामीण समाज का यह चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था।

सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी में ग्रामीण समाज में चारित्रिक रूप से बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था। एक ओर बड़े जमींदार थे तथा दूसरी ओर अस्पृश्य’ भूमिविहीन श्रमिक (बलाहार) थे। इन दोनों के बीच में बड़ा किसान था। इसके साथ ही कुछ छोटे किसान भी थे, जो बड़ी कठिनाई से अपने गुजारे के योग्य उत्पादन कर पाते थे।

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प्रश्न 9.
यह बर्नियर से लिया गया एक उद्धरण है – “ऐसे लोगों द्वारा तैयार सुन्दर शिल्प कारीगरी के बहुत उदाहरण हैं, जिनके पास औजारों का अभाव है, और जिनके विषय में यह भी नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने किसी निपुण कारीगर से कार्य सीखा है कभी- कभी वे यूरोप में तैयार वस्तुओं की इतनी निपुणता से नकल करते हैं कि असली और नकली के बीच अन्तर कर पाना मुश्किल हो जाता है। अन्य वस्तुओं में भारतीय लोग बेहतरीन बन्दूकें और ऐसे सुन्दर स्वर्णाभूषण बनाते हैं कि सन्देह होता है कि कोई यूरोपीय स्वर्णकार कारीगरी के इन उत्कृष्ट नमूनों से बेहतर बना सकता है। मैं अक्सर इनके चित्रों की सुन्दरता, मृदुलता तथा सूक्ष्मता से आकर्षित हुआ हूँ।” उसके द्वारा उल्लिखित शिल्प कार्यों को सूचीबद्ध कीजिए तथा इसकी तुलना अध्याय में वर्णित शिल्प गतिविधियों से कीजिए।
उत्तर:
बर्नियर ने इस उद्धरण में बन्दूकें बनाने तथा सुन्दर स्वर्णाभूषण बनाने आदि शिल्प कार्यों का उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि भारतीय स्वर्णकार ऐसे सुन्दर स्वर्णाभूषण बनाते हैं कि सन्देह होता है कि कोई यूरोपीय स्वर्णकार कारीगरी के इन उत्कृष्ट नमूनों से बेहतर बना सकता है।
तुलना –
इस अध्याय में वर्णित अन्य शिल्प गतिविधियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. कसीदाकारी
  2. चित्रकारी
  3. रंग-रोगन करना
  4. बद्देगिरी
  5. खरादी
  6. कपड़े सीन
  7. जूते बनाना
  8. रेशम, जरी और बारीक मलमल का काम
  9. सोने और चांदी के वस्त्र बनाना
  10. गलीचे बनानें का काम
  11. सोने के बर्तन बनाना आदि।

बर्नियर के अतिरिक्त मोरक्को निवासी इब्नबतूता ने भी भारतीय वस्तुओं की अत्यधिक प्रशंख की है। इब्नबतूता ने शिल्प गतिविधियों का उल्लेख किया है उसके अनुसार सूती वस्त्र, महीन मलमल, रेशम के वस्त्र, जरी साटन आदि की विदेशों में अत्यधिक मांग थी। राजकीय कारखाने यनियर ने राजकीय कारखानों में होने वाली विविध शिल्प गतिविधियों का उल्लेख किया है शिल्पकार प्रतिदिन सुबह कारखानों में आते थे तथा वहाँ वे पूरे दिन कार्यरत रहते थे और शाम को अपने-अपने घर चले जाते थे।

यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ JAC Class 12 History Notes

→ मध्यकालीन भारत में विदेशी यात्रियों का आगमन मध्यकाल में भारत में अनेक विदेशी यात्री आए, जिनमें अल- विरुनी, इब्नबतूता तथा फ्रांस्वा बर्नियर उल्लेखनीय हैं। इनके यात्रा वृत्तान्तों से मध्यकालीन भारत के सामाजिक जीवन के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है।

→ अल बिरूनी- अल बिरुनी का जन्म आधुनिक उत्बेकिस्तान में स्थित ख़्वारिज्म में सन् 973 में हुआ था। अल बिरुनी सीरियाई, फारसी, हिब्रू, संस्कृत आदि भाषाओं का जाता था। 1017 में ख़्वारिज्य पर आक्रमण के बाद सुल्तान महमूद गजनवी अल बिरुनी आदि अनेक विद्वानों को अपने साथ गजनी ले आया था। अल-बिरुनी ने भारतीय धर्म, दर्शन, संस्कृत आदि का ज्ञान प्राप्त किया।

→ किताब-उल-हिन्द-अल-बिरूनी ने अरबी भाषा में किताब-उल-हिन्द नामक पुस्तक की रचना की। यह ग्रन्थ अस्सी अध्यायों में विभाजित है। इसमें धर्म, दर्शन, त्यौहारों, खगोल विज्ञान, रीति-रिवाजों, प्रथाओं, सामाजिक जीवन, कानून, मापतन्त्र विज्ञान आदि विषयों का वर्णन है।

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→ इब्नबतूता इनका जन्म मोरक्को के सैंजियर नामक नगर में हुआ था। वह 1333 ई. में सिन्ध पहुँचा। सुल्तान महमूद तुगलक ने उसकी विद्वता से प्रभावित होकर उसे दिल्ली का काशी या न्यायाधीश नियुक्त किया। 1342 में उसे सुल्तान के दूत के रूप में चीन जाने का आदेश दिया गया 1347 में उसने वापस अपने घर जाने का निश्चय कर लिया 1354 में इब्नबतूता मोरक्को पहुँच गया। उसने अपना यात्रा-वृत्तान्त अरबी भाषा में लिखा, जो ‘रिला’ के नाम से प्रसिद्ध है। उसने अपने या वृत्तान्त में नवीन संस्कृतियों, लोगों, आस्थाओं, मान्यताओं आदि के बारे में लिखा है।

→ फ्रांस्वा बर्नियर-फ्रांस का निवासी फ्रांस्वा बर्नियर एक चिकित्सक, राजनीतिक दार्शनिक तथा इतिहासकार था। वह 1656 से 1668 तक भारत में 12 वर्ष तक रहा और मुगल दरबार से निकटता से जुड़ा रहा।

→ ‘पूर्व’ और ‘पश्चिम’ की तुलना बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया। परन्तु उसका आकलन हमेशा सटीक नहीं था। बर्नियर के कार्य प्रांस में 1670-71 में प्रकाशित हुए थे और अगले पाँच वर्षों में ही अंग्रेजी, डच, जर्मन तथा इतालवी भाषाओं में इनका अनुवाद हो गया।

→ भारतीय सामाजिक जीवन को समझने में बाधाएँ अल बिरुनी को भारतीय सामाजिक जीवन को समझने में अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ा। ये बाधाएँ थीं –
(1) संस्कृत भाषा की कठिनाई
(2) धार्मिक अवस्था और प्रथाओं में मित्रता
(3) अभिमान

→ अल बिरूनी का जाति व्यवस्था का विवरण अल बिरूनी ने जाति-व्यवस्था के सम्बन्ध में ब्राह्मणवादी सिद्धान्तों को स्वीकार किया; परन्तु उसने अपवित्रता की मान्यता को अस्वीकार कर दिया। उसके अनुसार प्रत्येक वह वस्तु जो अपवित्र हो जाती है, अपनी पवित्रता की मूल स्थिति को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करती है और सफल होती है। जाति व्यवस्था के विषय में अल बिरुनी का विवरण उसके नियामक संस्कृत ग्रन्थों के अध्ययन से पूर्ण रूप से प्रभावित था।

→ इब्नबतूता तथा अनजाने को जानने की उत्कंठा इब्नबतूता ने अपनी भारत यात्रा के दौरान जो भी अपरिचित था, उसे विशेष रूप से रेखांकित किया ताकि श्रोता अथवा पाठक सुदूर देशों के वृत्तान्तों से प्रभावित हो सकें।

→ इब्नबतूता तथा नारियल और पान इब्नबतूता ने नारियल और पान दो ऐसी वानस्पतिक उपजों का वर्णन किया है, जिनसे उसके पाठक पूरी तरह से अपरिचित थे उसके अनुसार नारियल के वृक्ष का फल मानव सिर से मेल खाता है क्योंकि इसमें भी मानो दो आँखें तथा एक मुख है और अन्दर का भाग हरा होने पर मस्तिष्क जैसा दिखता है। उसके अनुसार पान एक ऐसा वृक्ष है, जिसे अंगूर लता की तरह ही उगाया जाता है।

→ इब्नबतूता और भारतीय शहर इब्नबतूता के अनुसार भारतीय शहर घनी आबादी वाले तथा समृद्ध थे। अधिकांश शहरों में भीड़-भाड़ वाली सड़कें तथा चमक-दमक वाले और रंगीन बाजार थे जो विविध प्रकार की वस्तुओं से भरे रहते थे इब्नबतूता दिल्ली को बड़ा शहर, विशाल आबादी वाला तथा भारत में सबसे बड़ा बताता है। दौलताबाद (महाराष्ट्र) भी कम नहीं था और आकार में दिल्ली को चुनौती देता था। बाजार केवल आर्थिक विनिमय के स्थान ही नहीं थे, बल्कि ये सामाजिक तथा आर्थिक गतिविधियों के केन्द्र भी थे। दौलताबाद में पुरुष और महिला गायकों के लिए एक बाजार था जिसे ‘तारावबाद’ कहते थे।

→ कृषि और व्यापार इब्नबतूता के अनुसार कृषि बड़ी उत्पादनकारी थी। इसका कारण मिट्टी का उपजाऊपन था। किसान वर्ष में दो फसलें उगाते थे। भारतीय माल को मध्य तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया दोनों में बहुत माँग थी जिससे शिल्पकारों तथा व्यापारियों को भारी मुनाफा होता था। भारतीय कपड़ों विशेष रूप से सूती कपड़े, महीन मलमल, रेशम, जरी तथा साटन की अत्यधिक माँग थी महीन मलमल की कई किस्में इतनी अधिक महँगी होती थीं कि उन्हें अमीर वर्ग के तथा बहुत ही धनाढ्य लोग ही पहन सकते थे।

→ संचार की एक अनूठी प्रणाली इब्नबतूता के अनुसार लगभग सभी व्यापारिक मार्गों पर सराय तथा विश्राम गृह बने हुए थे। इब्नबतूता भारत की डाक प्रणाली की कार्यकुशलता देखकर चकित हुआ। डाक प्रणाली इतनी कुशल थी कि जहाँ सिन्ध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे, वहीं गुप्तचरों की खबरें सुल्तान तक इस डाक व्यवस्था के माध्यम से मात्र पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं। इब्नबतूता के अनुसार भारत में दो प्रकार की डाक व्यवस्था थी। अश्व डाक व्यवस्था जिसे ‘उलुक’ कहा जा था, हर चार मील की दूरी पर स्थापित राजकीय घोड़ों द्वारा चालित होती थी पैदल डाक व्यवस्था में प्रति मील ती / अवस्थान होते थे, जिसे ‘दावा’ कहा जाता था। यह एक मील का एक तिहाई होता था।

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→ इब्नबतूता और बर्नियर जहाँ इब्नबतूता ने हर उस बात का वर्णन किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित किया, वहीं बर्नियर एक भिन्न बुद्धिजीवी परम्परा से सम्बन्धित था। उसने भारत में जो भी देखा, उसको उसने यूरोप में व्याप्त स्थितियों से तुलना की। उसका उद्देश्य यूरोपीय संस्कृति की श्रेष्ठता प्रतिपादित करना था।

→ ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर बर्नियर ने ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ नामक ग्रन्थ की रचना की। यह ग्रन्थ अपने गहन प्रेक्षण, आलोचनात्मक अन्तर्दृष्टि तथा गहन चिन्तन के लिए उल्लेखनीय है। बर्नियर ने अपने ग्रन्थ में मुगलों के इतिहास को एक प्रकार के वैश्विक ढाँचे में स्थापित करने का प्रयास किया है। इस ग्रन्थ में बर्नियर ने मुगलकालीन भारत की तुलना तत्कालीन यूरोप से की है तथा प्रायः यूरोप की श्रेष्ठता को दर्शाया है। उसने भारत को यूरोप के प्रतिलोम के रूप में दिखाया है अथवा फिर यूरोप का विपरीत दर्शाया है। उसने भारत में जो भिन्नताएँ देखीं, उन्हें इस प्रकार क्रमबद्ध किया, जिससे भारत पश्चिमी संसार को निम्न कोटि का प्रतीत हो।

→ भूमि स्वामित्व का प्रश्न बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच मूल भिन्नताओं में से एक भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव था। बर्नियर के अनुसार भूमि पर राजकीय स्वामित्व राज्य तथा उसके निवासियों, दोनों के लिए हानिकारक था। राजकीय भू-स्वामित्व के कारण, भूधारक अपने बच्चों को भूमि नहीं दे सकते थे इसलिए वे उत्पादन के स्तर को बनाए रखने और उसमें वृद्धि करने के लिए दूरगामी निवेश के प्रति उदासीन रहते थे। इस प्रकार निजी भूस्वामित्व के अभाव ने बेहतर भू-धारकों के वर्ग के उदय को रोका। इसके परिणामस्वरूप कृषि का विनाश हुआ तथा किसानों का उत्पीड़न हुआ।

→ बर्नियर द्वारा मुगल साम्राज्य का चित्रण वर्नियर के अनुसार मुगल साम्राज्य का राजा भिखारियों और क्रूर लोगों का राजा था। इसके शहर और नगर विनष्ट तथा ‘खराब हवा’ से दूषित थे। इसके खेत ‘झाड़ीदार’ तथा ‘घातक दलदल से भरे हुए थे तथा इसका मात्र एक ही कारण था- राजकीय भूस्वामित्व। परन्तु किसी भी सरकारी मुगल दस्तावेज से यह बात नहीं होता कि राज्य ही भूमि का एक मात्र स्वामी था।

→ बर्नियर के विवरणों द्वारा पश्चिमी विचारकों को प्रभावित करना वर्नियर के विवरणों ने पश्चिमी विचारकों को भी प्रभावित किया। फ्रांसीसी दार्शनिक मॉटेस्क्यू ने उसके वृत्तांत का प्रयोग प्राच्य निरकुंशवाद के सिद्धान्त को विकसित करने में किया। इसके अनुसार एशिया में शासक अपनी प्रजा के ऊपर अपनी प्रभुता का उपभोग करते थे, जिसे दासता तथा गरीबी की स्थितियों में रखा जाता था। इस तर्क का आधार यह था कि समस्त भूमि पर राजा का स्वामित्व होता तथा निजी सम्पत्ति अस्तित्व में नहीं थी। इसके अनुसार राजा और उसके अमीर वर्ग को छोड़कर प्रत्येक व्यक्ति कठिनाई से जीवन-यापन कर पाता था। उन्नीसवीं शताब्दी में कार्ल माक्र्स ने इस विचार को एशियाई उत्पादन शैली के सिद्धांत के रूप में और आगे बढ़ाया।

→ बर्नियर द्वारा ग्रामीण समाज का चित्रण सच्चाई से दूर होना बर्नियर द्वारा ग्रामीण समाज का यह चित्रण सच्चाई से दूर था। एक ओर बड़े जमींदार थे जो भूमि पर उच्चाधिकारों का उपभोग करते थे और दूसरी ओर ‘अस्पृश्य’, भूमि विहीन श्रमिक (बलाहार) थे। इन दोनों के बीच में बड़ा किसान था, जो किराए के श्रम का प्रयोग करता था और माल उत्पादन में लगा रहता था। कुछ छोटे किसान भी थे जो बड़ी कठिनाई से अपने जीवन निर्वाह के योग्य उत्पादन कर पाते थे।

→ एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई बर्नियर के विवरण से कभी-कभी एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई भी उजागर होती है। उसका कहना है कि यद्यपि उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख था, फिर भी सम्पूर्ण विश्व से बड़ी मात्रा में बहुमूल्य धातुएँ भारत में आती थीं क्योंकि उत्पादों का सोने और चांदी के बदले निर्यात होता था। उसने एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय के अस्तित्व को भी स्वीकार किया है।

→ नगरों की स्थिति सत्रहवीं शताब्दी में जनसंख्या का लगभग पन्द्रह प्रतिशत भाग नगरों में रहता था। यह औसतन उसी समय पश्चिमी यूरोप की नगरीय जनसंख्या के अनुपात से अधिक था। इतने पर भी बनिंवर ने मुगलकालीन शहरों को शिविर नगर’ कहा है जी अपने अस्तित्व और बने रहने के लिए राजकीय शिविरों पर निर्भर थे उसका विश्वास था कि ये शिविर नगर राजकीय दरबार के आगमन के साथ अस्तित्व में आते थे और इसके कहीं और चले जाने के बाद तेजी से पतनोन्मुख हो जाते थे उस समय सभी प्रकार के नगर अस्तित्व में थे जैसे उत्पादन केन्द्र, व्यापारिक नगर, बन्दरगाह नगर, धार्मिक केन्द्र तीर्थ स्थान आदि।

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→ व्यापारी वर्ग वर्नियर के अनुसार व्यापारी प्रायः सुद्द सामुदायिक अथवा बन्धुत्व के सम्बन्धों से जुड़े होते थे और अपनी जाति तथा व्यावसायिक संस्थाओं के माध्यम से संगठित रहते थे। पश्चिमी भारत में ऐसे समूहों को महाजन कहा जाता था और उनका मुखिया सेठ कहलाता था।

→ व्यावसायिक वर्ग-अन्य शहरी समूहों में व्यावसायिक वर्ग जैसे चिकित्सक (हकीम अथवा वैद्य), अध्यापक (पंडित या मुल्ला), अधिवक्ता (वकील), चित्रकार, वास्तुविद्, संगीतकार, सुलेखक आदि सम्मिलित थे।

→ राजकीय कारखाने सम्भवतः बर्नियर एकमात्र ऐसा इतिहासकार है जो राजकीय कारखानों की कार्य प्रणाली का विस्तृत विवरण देता है। उसने लिखा है कि कई स्थानों पर बड़े कक्ष दिखाई देते हैं, जिन्हें कारखाना अथवा शिल्पकारों की कार्यशाला कहते हैं। एक कक्ष में कसीदाकार, एक अन्य में सुनार, तीसरे में चित्रकार, चौथे में प्रलाक्षा रस का रोगन लगाने वाले पाँचवें में बढ़ई, छठे में रेशम, जरी तथा महीन मलमल का काम करने वाले रहते हैं।

→ महिलाएँ दासियाँ, सती तथा श्रमिक बाजारों में दास खुले आम बेचे जाते थे सुल्तान की सेवा में कार्यरत कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं। इब्नबतूता सुल्तान की बहिन की शादी के अवसर पर दासियाँ के संगीत और नृत्य के प्रदर्शन से खूब आनन्दित हुआ। सुल्तान अपने अमीरों पर नजर रखने के लिए दासियों को भी नियुक्त करता था। दासों का सामान्यतः घरेलू श्रम के लिए ही प्रयोग किया जाता था। मुगलकालीन भारत में सती प्रथा प्रचलित थी। बर्नियर ने लिखा है कि यद्यपि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, परन्तु अन्यों को मरने के लिए बाध्य किया जाता था। महिलाओं का श्रम कृषि तथा कृषि के अलावा होने वाले उत्पादन दोनों में महत्त्वपूर्ण था। व्यापारिक परिवारों से आने वाली महिलाएँ व्यापारिक गतिविधियों में भाग लेती थीं। अतः महिलाओं को उनके घरों के विशेष स्थानों तक परिसीमित कर नहीं रखा जाता था।

काल-रेखा
कुछ यात्री जिन्होंने वृत्तान्त छोड़े

दसरीं-ग्यारहवीं शताब्दियाँ 973-1048मोहम्मद इब्न अहमद अबू रेहान अल-बिरुनी (उज्ञेकिस्तान से)
तेरहवीं शताब्दी 1254-1323मार्को पोलो (इटली से)
चौदहर्वीं शताब्दी 1304-77इब्नतूता (मोरक्को से)
पन्द्रहवीं शताब्दी 1413-82अब्द अल-रज़्जाक कमाल अल-दिन इब्न इस्हाक अल-समरकन्दी (समरकन्द से)
1466-72अफानासी निकितिच निकितिन (पन्द्रहर्वीं शताब्दी, रूस से)
(भारत में बिताये वर्ष)दूरते बारबोसा, मृत्यु 1521 (पुर्तगाल से)
सोलहवीं शताब्दी 1518 (भारत की यात्रा)सयदी अली रेइस (तुर्की से)
1562 (मृत्यु का वर्ष)अन्तोनियो मानसेरते (स्पेन से)
1536-1600महमूद वली बलखी (बल्खू से)
सत्रहवीं शताब्दी 1626-31 (भारत में बिताए वर्ष)पींटरमुंडी (इंग्लैण्ड से)
1600-67ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर (फ्रांस से)
1605-89फ्रांस्वा बर्नियर (फ्रांस से)
1620-88मोहम्मद इब्न अहमद अबू रेहान अल-बिरुनी (उज्ञेकिस्तान से)
नोट-जहाँ कोई अन्य संकेत नहीं है तिथियाँ यात्री के जीवन काल को बता रही हैं।