JAC Class 12 History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

Jharkhand Board JAC Class 12 History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 12 History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

Jharkhand Board Class 12 History विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास In-text Questions and Answers

पृष्ठ संख्या 84

प्रश्न 1.
यज्ञ के उद्देश्यों की सूची बनाइये।
उत्तर:

  • यज्ञ करने वाले की आहूति को देवताओं तक पहुँचाना।
  • प्रचुर खाद्य पदार्थ प्राप्त करना।
  • प्रचुर धन प्राप्त करना।
  • पुष्टिवर्धक गाय प्राप्त करना।
  • वंश को आगे बढ़ाने के लिए पुत्र की प्राप्ति करना।

पृष्ठ संख्या 87

प्रश्न 2.
क्या इन लोगों को नियतिवादी या भौतिकवादी कहना आपको उचित लगता है?
उत्तर:
मक्खलि गोसाल एक प्रसिद्ध नियतिवादी दार्शनिक थे। उनके अनुसार सब कुछ पूर्व निर्धारित है। सुख और दु:ख पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं। दूसरी ओर केसकम्बलिन भौतिकवादी दार्शनिक थे। उनके अनुसार दान, यज्ञ, चढ़ावा आदि सब निरर्थक हैं। इन लोगों के अलग-अलग सिद्धान्तों को देखते हुए इन्हें नियतिवादी या भौतिकवादी कहना उचित है।

पृष्ठ संख्या 87 चर्चा कीजिए

प्रश्न 3.
जब लिखित सामग्री उपलब्ध न हो अथवा किन्हीं वजहों से बच न पाई हो तो ऐसी स्थिति में विचारों और मान्यताओं के इतिहास का पुनर्निर्माण करने में क्या समस्याएँ सामने आती हैं?
उत्तर:
जब लिखित सामग्री उपलब्ध न हो अथवा किन्हीं कारणों से बच न पाई हो तो ऐसी स्थिति में विचारों और मान्यताओं के इतिहास का पुनर्निर्माण करने में निम्नलिखित समस्याएँ सामने आती हैं –

(1) हमें विचारों और मान्यताओं के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए इमारतों, मूर्तियों, अभिलेखों, चित्रों आदि का सहारा लेना पड़ता है। परन्तु दुर्भाग्य से अनेक इमारतें, मूर्तियाँ, अभिलेख, चित्र आदि नष्ट हो गए हैं। उदाहरण के लिए सांची का स्तूप तो सुरक्षित है, परन्तु अमरावती का स्तूप नष्ट हो गया है। इसलिए हमें तत्कालीन विचारों और 1. मान्यताओं के इतिहास का पुनर्निर्माण करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

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(2) किसी मूर्तिकला अंश को देखकर फूस की झोंपड़ी तथा पेड़ों वाले ग्रामीण दृश्य की झलक मिलती है। परन्तु कुछ कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक से लिया गया एक दृश्य बताते हैं। इससे स्पष्ट है कि प्राय: इतिहासकार किसी मूर्तिकला की व्याख्या, लिखित साक्ष्यों के साथ तुलना के द्वारा करते हैं। परन्तु लिखित साक्ष्यों के अभाव में ऐसा करना सम्भव नहीं होता। (चित्र 4. 13, पृ० 100 )

(3) साँची की मूर्तियों में अनेक प्रतीक पाए गए हैं। इन प्रतीकों में कमलदल और हाथियों के बीच एक महिला की मूर्ति प्रमुख है। कुछ इतिहासकार मूर्ति को बुद्ध की माता माया से जोड़ते हैं तो अन्य इतिहासकार उन्हें एक लोकप्रिय देवी गजलक्ष्मी मानते हैं। लिखित सामग्री के अभाव में इस प्रकार की निश्चित जानकारी नहीं मिल पाती।

पृष्ठ संख्या 88

प्रश्न 4.
महारानी कमलावती द्वारा अपने पति को संन्यास लेने के लिए दिया गया कौनसा तर्क आपको सबसे ज्यादा युक्तियुक्त लगता है?
उत्तर:
महारानी कमलावती ने अपने पति को संन्यास लेने के लिए यह तर्क दिया कि “यदि सम्पूर्ण विश्व और वहाँ के सभी खजाने तुम्हारे हो जायें, तब भी तुम्हें सन्तोष नहीं होगा और न ही यह सब कुछ तुम्हें बचा पाएगा। जब तुम्हारी मृत्यु होगी तो सारा धन पीछे छूट जाएगा, तब केवल धर्म अर्थात् सत्कर्म ही तुम्हारी रक्षा करेगा।” इस प्रकार महारानी कमलावती द्वारा अपने पति को संन्यास लेने के लिए यह तर्क सर्वाधिक युक्तियुक्त लगता है कि राजा को संसार के सुखों और धन-दौलत का परित्याग कर संन्यास ले लेना चाहिए।

पृष्ठ संख्या 89 : चर्चा कीजिए

प्रश्न 5.
क्या बीसवीं शताब्दी में अहिंसा की कोई प्रासंगिकता है?
उत्तर:
बीसवीं शताब्दी में भी अहिंसा की प्रासंगिकता बनी हुई है। महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध आदि चिन्तकों ने मानव जाति को अहिंसा का सन्देश दिया था। अहिंसा का सिद्धान्त आज भी महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी बना हुआ है। उग्रराष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद, शस्त्रीकरण की प्रतिस्पर्द्धा आदि के कारण युद्ध के बादल मंडराते रहते हैं युद्धों में भीषण विनाशलीला होती है तथा लोगों को भी भीषण कष्ट उठाने पड़ते हैं। युद्धों और रक्तपात से किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। हिंसा से कटुता बढ़ती है और समाज में अशान्ति एवं अव्यवस्था फैलती है। इसलिए अहिंसा का पालन करते हुए ही युद्धों और रक्तपात से बचा जा सकता है। अहिंसा के द्वारा ही समाज में सौहार्द, सहयोग, शान्ति एवं सुरक्षा का वातावरण बना रह सकता है। अत: इक्कीसवीं शताब्दी में भी अहिंसा की प्रासंगिकता है।

पृष्ठ संख्या 89

प्रश्न 6.
क्या आप इसकी (चित्र 4.6) लिपि को पहचान सकते हैं?
उत्तर:
पाठ्यपुस्तक के पृष्ठ 89 के चित्र क्रमांक 4.6 में दर्शायी गई चौदहवीं शताब्दी की जैन ग्रन्थ की पाण्डुलिपि है जो प्राकृत भाषा में लिखी गई है।

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पृष्ठ संख्या 90 चर्चा कीजिए

प्रश्न 7.
यदि आप बुद्ध के जीवन के बारे में नहीं जानते तो क्या आप मूर्ति को देखकर समझ पाते कि उसमें क्या दिखाया गया है?
उत्तर:
इतिहासकारों ने बुद्ध के जीवन के बारे में चरित लेखन से जानकारी इकट्ठी की है। अतः यदि हम बुद्ध के जीवन के बारे में नहीं जानते, तो इस मूर्ति ( पृ० 90) को देखकर हम कुछ भी सही अनुमान नहीं लगा सकते थे कि यह मूर्ति युद्ध के जीवन से सम्बन्धित किस घटना पर प्रकाश डालती है। इस मूर्ति से पता चलता है कि संन्यासी को देखकर बुद्ध ने संन्यास का रास्ता अपनाने का निश्चय किया और महल त्यागकर सत्य की खोज में निकल गए। पृष्ठ संख्या 91

प्रश्न 8.
आप सुझाव दीजिए कि माता-पिता, शिक्षकों और पत्नी के लिए किस तरह के निर्देश दिए गए होंगे?
उत्तर:
(1) माता-पिता की सेवा करनी चाहिए और उनकी आज्ञाओं का पालन करना चाहिए।
(2) शिक्षकों का सम्मान करना चाहिए और उनके आदेशों का पालन करना चाहिए।
(3) पत्नी के साथ सद्व्यवहार करना चाहिए और सुख-दुःख में उसका साथ देना चाहिए।

पृष्ठ संख्या 92 चर्चा कीजिए

प्रश्न 9.
बुद्ध द्वारा सिगल को दी गई सलाह की तुलना अशोक द्वारा उसकी प्रजा (अध्याय 2) को दी गई सलाह से कीजिए। क्या आपको कुछ समानताएँ और असमानताएँ नजर आती हैं?
उत्तर:
बुद्ध द्वारा सिंगल को दी गई सलाह की तुलना अशोक द्वारा उसकी प्रजा को दी गई सलाह से करने पर निम्नलिखित समानताएँ और असमानताएँ दिखाई देती हैं- समानताएँ-

  • संन्यासियों और ब्राह्मणों की देखभाल करना
  • सेवकों और दासों के साथ उदार व्यवहार
  • बड़ों के प्रति आदर
  • दूसरे धर्मों और परम्पराओं का सम्मान।

असमानताएँ –

  • ब्राह्मणों और भ्रमण के स्वागत में हमेशा घर खुले रखकर और उनकी दिन-प्रतिदिन की आवश्यकताओं को पूरा करना
  • नौकरों और कर्मचारियों को भोजन और मजदूरी देना, बीमार पड़ने पर उनकी सेवा करना, उनके साथ स्वादिष्ट भोजन बाँटना और समय-समय पर उन्हें अवकाश देना।

पृष्ठ संख्या 93

प्रश्न 10.
बुद्ध की कौन-सी शिक्षाएँ ‘बेरीगाथा’ नज़र आती हैं? देना।
उत्तर:
(1) बुरे कर्मों का परित्याग।
(2) जन्म पर आधारित वर्ण व्यवस्था का विरोध।
(3) कर्मों के फल और पुनर्जन्म के सिद्धान्त पर बल
(4) सत्कर्म करने पर बल देना।
(5) आडम्बरों और कर्मकाण्डों का विरोध।

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पृष्ठ संख्या 94

प्रश्न 11.
क्या आप बता सकते हैं कि भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए नियम क्यों बनाए गए ?
उत्तर:
बुद्ध ने अपने शिष्यों के लिए संघ की स्थापना की संघ ऐसे भिक्षुओं की संस्था थी जो धम्म के शिक्षक बन गए। बाद में भिक्षुणियों को भी संघ में सम्मिलित होने की अनुमति प्रदान की गई। धीरे-धीरे भिक्षुओं और भिक्षुणियों की संख्या बढ़ने लगी। अतः संघ में अनुशासन तथा व्यवस्था बनाए रखने के लिए संघ प्रणाली को सफल बनाने के लिए और सभी कार्यों के सुचारु रूप से संचालन के लिए भिक्षुओं तथा भिक्षुणियों के लिए नियम बनाए गए। पृष्ठ संख्या 94 चर्चा कीजिए

प्रश्न 12.
पुन्ना जैसी दासी संघ में क्यों जाना चाहती थी?
उत्तर:
पुन्ना एक निर्धन दासी थी वह अपने स्वामी के घर के लिए प्रतिदिन प्रातः नदी का पानी लेने जाती थी। उच्च वर्णों के लोग निम्न वर्गीय माने जाने वाली दासियों का शोषण करते थे। वे उनके साथ कठोर व्यवहार करते थे। पुन्ना को भीषण ठंड में भी नदी से पानी लाना पड़ता था तथा ऐसा न करने पर उसे दंड भुगतना पड़ता था या उच्च घरानों की स्वियों के कटु वचन सुनने पड़ते थे अतः अपनी अपमानजनक एवं दयनीय स्थिति से मुक्ति पाने तथा समाज में सम्माननीय स्थान प्राप्त करने के लिए पुन्ना संघ में जाना चाहती थी। संघ में सभी भिक्षुओं और भिक्षुणियों को बराबर माना जाता था और वहाँ उन्हें सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त था क्योंकि भिक्षु तथा भिक्षुणी बनने पर उन्हें अपनी पुरानी पहचान को त्याग देना पड़ता था।

पृष्ठ संख्या 96

प्रश्न 13.
चित्र 4.15 (पृ. 100) को देखकर क्या आप इनमें से कुछ रीति-रिवाजों को पहचान सकते हैं?
उत्तर:
(1) यह स्तूप बुद्ध के महापरिनिर्वाण का प्रतीक है। इससे पता चलता है कि स्तूपों का निर्माण बुद्ध अथवा बोधिसत्वों के अवशेष रखने के लिए किया जाता था।
(2) इससे पता चलता है कि बौद्ध धर्म के अनुयायी स्तूपों की पूजा करते थे।
(3) स्तूप की पूजा के लिए समारोह आयोजित किए जाते थे।
(4) इस अवसर पर नृत्य तथा संगीत का भी आयोजन किया जाता था।

पृष्ठ संख्या 97 चर्चा कीजिए

प्रश्न 14.
साँची के महास्तूप के मापचित्र (चित्र 4.10क) और छायाचित्र (चित्र 4.3 ) में क्या समानताएँ और फर्क हैं?
उत्तर:
मापचित्र तथा छायाचित्र में निम्नलिखित समानताएँ और फर्क हैं –
(1) चित्र 4.10 (क) में साँची के महास्तूप की योजना को उसके समतलीय परिप्रेक्ष्य में दिखाया गया है, जबकि चित्र 43 में स्तूप को उसके वास्तविक स्वरूप में दिखाया गया है।
(2) चित्र 4.10 (क) से स्तूप की पूर्ण बनावट, उसके चारों तोरण द्वार तथा मध्य का भाग स्पष्ट होता है। जबकि चित्र 43 से ऐसा स्पष्ट नहीं होता है।
(3) चित्र 4.10 (क) में स्तूप के प्रदक्षिणा पथ को भी स्पष्ट देखा जा सकता है; जबकि चित्र 43 में प्रदक्षिणा पथ दिखाई नहीं देता है।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि स्तूप की बनावट की संरचना को समझाने हेतु चित्र 4.10
(क) एवं
(ख) सहायक हो सकते हैं।
चित्र 43 द्वारा स्तूप की संरचना को समझना कठिन है। यह चित्र 43 प्रत्यक्ष दर्शन के लिए प्रेरित करता है।

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पृष्ठ संख्या 99 : चर्चा कीजिए

प्रश्न 15.
कारण बताइये कि साँची क्यों बच गया?
उत्तर:
साँधी इसलिए बच गया क्योंकि उसके किसी पुरातात्विक अवशेष को वहाँ से उठाकर नहीं ले जाया गया तथा पुरातात्विक अवशेष खोज की जगह पर ही संरक्षित किए गए 1818 में जब साँची की खोज हुई, इसके तीन तोरणद्वार तब भी खड़े थे चौथा तोरणद्वार वहीं पर गिरा हुआ था और टीला भी अच्छी हालत में था। उस समय भी यह सुझाव दिया गया था कि तोरणद्वारों को पेरिस या लन्दन भेज दिया जाए। परन्तु ये सुझाव कार्यान्वित नहीं हुए और साँची का स्तूप वहीं बना रहा और आज भी बना हुआ है। भोपाल के शासकों ने भी इस स्तूप के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इस प्रकार साँची बच गया, जबकि अमरावती नष्ट हो गया।

पृष्ठ संख्या 103 चर्चा कीजिए

प्रश्न 16.
मूर्तिकला के लिए हड्डियों, मिट्टी और धातुओं का भी इस्तेमाल होता है। इनके विषय में पता कीजिए।
उत्तर:
हड़प्पा काल में मूर्तिकला हेतु मिट्टी, पत्थर, धातुओं और हड्डी का प्रयोग होता था। यह सामग्री इसलिए प्रयोग में लाई जाती थी कि इन पर तकनीकी रूप से उत्कीर्णन का कार्य सरल था तथा यह वस्तुएँ सर्वसुलभ और सस्ती थीं।

पृष्ठ संख्या 104

प्रश्न 17.
मूर्ति में दी गई आकृतियों के आपसी अनुपात में फर्क से क्या बात समझ में आती है?
उत्तर:
चित्र 4.23 भगवान विष्णु के दस अवतारों में से एक वराह अवतार का है। भगवान विष्णु ने अपने इस अवतार से पृथ्वी की रक्षा की थी तथा इसे पाताल लोक अथवा समुद्र से निकालकर पुनः यथास्थान स्थापित किया था चित्र में बनायी गई आकृतियों को हम निम्नलिखित रूप से समझ सकते हैं –
(1) चित्र का मुख्य कथानक भगवान विष्णु का वराह अवतार रूपी मूर्ति है। इसे आप चित्र के मध्य में तथा नीचे से ऊपर तक देख सकते हैं। इस अवतार में भगवान ने अत्यधिक विशाल रूप धारण किया था। अतः इन्हें यहाँ अन्य मूर्तियों की अपेक्षा विशाल रूप में दिखाया गया है।

(2) चित्र में नीचे दायीं ओर पाताल देवता तथा उसकी पत्नी को छोटे रूप में दिखाया गया है, जो सपत्नीक वराह की स्तुति कर रहा है।

(3) चित्र में ऊपर दायीं ओर वराह भगवान ने अपने मुख के धुधन से पृथ्वी देवी को पकड़ा हुआ है जो पाताल से उन्हें बाहर निकालकर लाए हैं। अतः यहाँ पृथ्वी को वराह की अपेक्षा अत्यन्त लघु रूप में दिखाया गया है।

पृष्ठ संख्या 105

प्रश्न 18.
कलाकारों ने किस प्रकार गति को दिखाने की कोशिश की है? इस मूर्ति में बताई कहानी के बारे में जानकारी इकट्ठी कीजिए ।
उत्तर:
इस चित्र में कलाकारों ने युद्ध-विषयक गति दिखाने का प्रयास किया है। इसमें देवी महिषासुर नामक दैत्य को मारने का प्रयास कर रही हैं। चित्र में आप भैंसे के चित्र वाले दैत्य को भी देख सकते हैं। यहाँ देवी को सिंह पर बैठे हुए तथा हाथ में धनुष लिए दिखाया गया है। विद्यार्थी पाठ्यपुस्तक के चित्र 4.24 को देखें।

पृष्ठ संख्या 106 प्रश्न

19. गर्भगृह के प्रवेश द्वार और शिखर के अवशेषों को पहचानें।
उत्तर:
चित्र 4.25 के अवलोकन से पता लगता है कि सीढ़ियों के समक्ष वाला द्वार गर्भगृह का द्वार है। प्रवेश द्वार के शीर्ष पर मन्दिर के शिखर के अवशेष दिखाई दे रहे हैं। मन्दिर देवगढ़ में स्थित है तथा यह गुप्तकालीन मन्दिर है। मन्दिर का निर्माण एक ऊँचे चबूतरे पर किया गया है।

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निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 100-150 शब्दों में दीजिए-

प्रश्न 1.
क्या उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे? अपने जवाब के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
उपनिषदों के दार्शनिकों के विचारों की नियतिवादियों और भौतिकवादियों के विचारों से भिन्नता उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार उपनिषदों में ब्रह्म, आत्मा, कर्म और पुनर्जन्म तथा मोक्ष सम्बन्धी दार्शनिक विचारों की विवेचना की गई है। उपनिषदों के अनुसार आत्मा ब्रह्म की ही ज्योति है और उससे भिन्न नहीं है। उपनिषदों के अनुसार मनुष्य जैसे कर्म करता है, उसी के अनुसार अच्छे और बुरे कर्मों का फल भोगने के लिए उसका अगला जन्म होता है अच्छे कर्मों से मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है परन्तु नियतिवादियों और भौतिकवादियों के विचारों में ब्रह्म और आत्मा की एकता, कर्म और पुनर्जन्म तथा मोक्ष सम्बन्धी विचारों को कोई स्थान नहीं है।

नियतिवादियों तथा भौतिकवादियों के विचार – नियतिवादियों के अनुसार मनुष्य के सुख और दुःख पूर्व- निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं। इन्हें संसार में बदला नहीं जा सकता। इन्हें बढ़ाया या घटाया भी नहीं जा सकता। इसी प्रकार भौतिकवादियों की मान्यता है कि संसार में दान देना, यज्ञ करना या चढ़ावा जैसी कोई चीज नहीं होती। मनुष्य की मृत्यु के साथ ही चारों तत्व नष्ट हो जाते हैं जिनसे वह बना होता है। दान देने का सिद्धान्त मूर्खतापूर्ण और नितान्त झूठ है। इस प्रकार स्पष्ट है कि उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे।

प्रश्न 2.
जैन धर्म की महत्त्वपूर्ण शिक्षाओं को संक्षेप में लिखिए।
अथवा
जैन धर्म के अहिंसा सिद्धान्त की संक्षिप्त व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
जैन धर्म की महत्त्वपूर्ण शिक्षाएँ जैन धर्म की महत्त्वपूर्ण शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं-
(1) जैन दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण विश्व प्राणवान है। यह माना जाता है कि पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन होता है।
(2) जीवों के प्रति अहिंसा जैन दर्शन का केन्द्र बिन्दु है। जैन धर्म के अनुसार इन्सानों, जानवरों, पेड़-पौधों कीड़े- मकोड़ों आदि की हत्या नहीं करनी चाहिए। वास्तव में जैन अहिंसा के सिद्धान्त ने सम्पूर्ण भारतीय चिन्तन परम्परा को प्रभावित किया है।
(3) जैन धर्म के अनुसार जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा निर्धारित होता है। इस चक्र से मुक्ति पाने के लिए त्याग और तपस्या की आवश्यकता होती है। यह संसार के त्याग से ही सम्भव हो पाता है। इसलिए मुक्ति के लिए बिहारों में निवास करना चाहिए।
(4) जैन साधुओं और साध्वियों को पाँच व्रतों का पालन करना चाहिए। ये पाँच व्रत हैं –

  • हत्या न करना
  • चोरी न करना
  • झूठ न बोलना
  • ब्रह्मचर्य (अमृषा) का पालन करना तथा
  • धन संग्रह न करना।

प्रश्न 3.
साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस सम्बन्ध में उन्होंने निम्नलिखित कार्य किए –
(1) शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम ने इस प्राचीन स्थल के रख-रखाव के लिए धन का अनुदान दिया।
(2) सुल्तानजहाँ बेगम ने वहाँ पर एक संग्रहालय और अतिथिशाला बनाने के लिए अनुदान दिया।
(3) जॉन मार्शल ने साँची पर लिखे अपने महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों को सुल्तानजहाँ बेगम को समर्पित किया। इन पुस्तकों के प्रकाशन में सुल्तानजहाँ बेगम ने अनुदान दिया।
(4) प्रारम्भ में फ्रांसीसियों ने तथा बाद में अंग्रेजों ने साँची के पूर्वी तोरणद्वार को अपने-अपने देश में ले जाने का प्रयास किया। परन्तु भोपाल की बेगमों ने उन्हें स्तूप की प्लास्टर प्रतिकृतियाँ देकर सन्तुष्ट कर दिया। इस प्रकार बेगमों के प्रयासों के परिणामस्वरूप साँची के स्तूप की मूलकृति भोपाल राज्य में अपने स्थान पर ही रही।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित संक्षिप्त अभिलेख को पढ़िए और जवाब दीजिए – महाराज हुविष्क ( एक कुषाण शासक) के तैंतीसवें साल में गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन त्रिपिटक जानने वाले भिक्खु बल की शिष्या, त्रिपिटक जानने वाली बुद्धमिता के बहन की बेटी भिक्खुनी धनवती ने अपने माता-पिता के साथ मधुवनक में बोधिसत्त की मूर्ति स्थापित की।
(क) धनवती ने अपने अभिलेख की तारीख कैसे निश्चित की?
(ख) आपके अनुसार उन्होंने बोधिसत्त की मूर्ति क्यों स्थापित की?
(ग) वे अपने किन रिश्तेदारों का नाम लेती हैं?
(घ) वे कौन-से बौद्ध ग्रन्थों को जानती थीं?
(ङ) उन्होंने ये पाठ किससे सीखे थे?
उत्तर:
(क) धनवती ने अपने अभिलेख की तारीख कुषाण शासक महाराज हुविष्क के शासनकाल की सहायता से निश्चित की यह तारीख हुविष्क के शासनकाल के तैंतीसवें साल की ग्रीष्म ऋतु के पहले महीने का आठवाँ दिन है।
(ख) धनवती एक बौद्ध भिक्षुणी थी उनकी बौद्ध धर्म में अत्यधिक श्रद्धा थी अतः उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रति अपनी श्रद्धा एवं सम्मान प्रकट करने के लिए बोधिसत की मूर्ति स्थापित की।
(ग) वेमौसी बुद्धमिता तथा अपने माता-पित्ता का नाम लेती है.
(घ) वे त्रिपिटक नामक बौद्ध ग्रन्थों को जानती थीं।
(ङ) उन्होंने ये पाठ अपने गुरु भिक्षु बल तथा अपनी मौसी बुद्धमिता से सीखे थे।

प्रश्न 5.
आपके अनुसार स्त्री-पुरुष संघ में क्यों जाते
उत्तर:
बुद्ध ने अपने शिष्यों के लिए एक संघ की स्थापना की। स्त्री और पुरुष निम्नलिखित कारणों से संघ में जाते थे –
(1) वे संघ में रहते हुए बौद्ध ग्रन्थों का अध्ययन कर सकते थे।
(2) वे बौद्ध भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों से बौद्ध धर्म की शिक्षाओं और दार्शनिक सिद्धान्तों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते थे।
(3) वे संघ में जाकर धम्म के शिक्षक बन सकते थे।
(4) अनेक स्त्रियों धम्म की उपदेशिकाएँ अथवा धेरी बनना चाहती थीं।
(5) वे धम्म से सम्बन्धित अपनी शंकाओं का समाधान करना चाहते थे।
(6) वे अपने जीवन को सफल, सुखी एवं अनुशासित करना चाहते थे।

निम्नलिखित पर एक संक्षिप्त निबन्ध लिखिए। (लगभग 500 शब्दों में)

प्रश्न 6.
साँची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से कहाँ तक सहायता मिलती है?
अथवा
“साँची की खोज ने प्रारम्भिक बौद्ध धर्म सम्बन्धी हमारे ज्ञान को अत्यधिक रूपान्तरित कर दिया है।” व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
साँची की मूर्ति कला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से सहायता मिलना
साँची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से हमें निम्न रूप से सहायता मिलती है-

(1) इतिहासकारों द्वारा मूर्तिकला की व्याख्या- इस मूर्तिकला अंश में फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाले ग्रामीण दृश्य का चित्रण दिखाई देता है परन्तु साँची की मूर्तिकला का गहन अध्ययन करने वाले कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक से लिया गया एक दृश्य बताते हैं। यह कहानी एक ऐसे दानशील राजकुमार के बारे में है, जिसने अपना सर्वस्व एक ब्राह्मण को दे दिया और स्वयं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जंगल में रहने चला गया। इस उदाहरण से पता चलता है कि प्रायः इतिहासकार किसी मूर्तिकला की व्याख्या लिखित
साक्ष्यों के साथ तुलना के द्वारा करते हैं।

(2) बुद्ध के चरित लेखन के बारे में जानकारी प्राप्त करना बौद्ध मूर्तिकला को समझने के लिए कला इतिहासकारों को बुद्ध के चरित लेखन के बारे में जानकारी प्राप्त करनी पड़ी। बौद्ध चरित लेखन के अनुसार एक वृक्ष के नीचे चिंतन करते हुए बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। कई प्रारम्भिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर उनकी उपस्थिति प्रतीकों के माध्यम से दिखाने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए ‘रिक्त स्थान’ बुद्ध के ध्यान की दशा तथा स्तूप ‘महापरिनिब्बान’ के प्रतीक बन गए। ‘चक्र’ का भी प्रतीक के रूप में प्रायः प्रयोग किया गया। यह बुद्ध द्वारा सारनाथ में दिए गए प्रथम उपदेश का प्रतीक था।

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(3) लोक परम्पराएँ साँची की बहुत सी मूर्तियाँ शायद बौद्धमत से सीधी सम्बन्धित नहीं थीं। इनमें कुछ सुन्दर स्त्रियाँ भी मूर्तियों में उत्कीर्णित हैं, जो तोरणद्वार के किनारे एक वृक्ष पकड़ कर झूलती हुई दिखाई देती हैं। प्रारम्भ में विद्वान इस मूर्ति के महत्व के बारे में कुछ असमंजस में थे क्योंकि इस मूर्ति का त्याग और तपस्या से कोई सम्बन्ध दिखाई नहीं देता था परन्तु साहित्यिक परम्पराओं के अध्ययन से उन्हें यह ज्ञात हुआ कि यह संस्कृत भाषा में वर्णित ‘शालभंजिका’ की मूर्ति है। लोक परम्परां में यह माना जाता था कि इस स्वी के द्वारा हुए जाने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे और फल होने लगते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक शुभ प्रतीक माना जाता था और इसी कारण स्तूप के अलंकरण में यह प्रयुक्त हुआ।

(4) साँची की मूर्तियों में पाए गए कई प्रतीकों का लोक परम्पराओं से उभरना ‘शालभंजिका’ की मूर्ति से ज्ञात होता है कि जो लोग बौद्ध धर्म में आए, उन्होंने बुद्ध- पूर्व और बौद्ध धर्म से अलग अन्य विश्वासों, प्रथाओं और धारणाओं से बौद्ध धर्म को समृद्ध किया। साँची की मूर्तियों में पाए गए कई प्रतीक या चिह्न निश्चित रूप से इन्हीं परम्पराओं से उभरे थे।

उदाहरण के लिए, सांची में जानवरों के कुछ बहुत सुन्दर उत्कीर्णन प्राप्त हुए हैं। इन जानवरों में हाथी, घोड़े, बन्दर और गाय-बैल सम्मिलित हैं। यद्यपि साँची में जातकों से ली गई जानवरों की अनेक कहानियाँ हैं फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ पर लोगों को आकर्षित करने के लिए जानवरों का उत्कीर्णन किया गया था। साथ ही जानवरों का मनुष्यों के गुणों के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया जाता था उदाहरण के लिए, हाथी शक्ति और ज्ञान के प्रतीक माने जाते थे।

(5) कमलदल और हाथियों के बीच एक महिला की मूर्ति का उत्कीर्णन साँची में इन प्रतीकों में कमलदल और हाथियों के बीच एक महिला की मूर्ति प्रमुख है। हाथी उनके ऊपर जल छिड़क रहे हैं, जैसे वे उनका अभिषेक कर रहे हैं। कुछ इतिहासकार इस महिला को बुद्ध की माता भाषा से जोड़ते हैं तो कुछ अन्य इतिहासकार उन्हें एक लोकप्रिय देवी गजलक्ष्मी मानते हैं। गजलक्ष्मी सौभाग्य लाने वाली देवी के रूप में प्रसिद्ध थीं, जिन्हें प्रायः हाथियों के साथ जोड़ा जाता है। यह भी सम्भव है कि इन उत्कीर्णित मूर्तियों को देखने वाले उपासक इस महिला को माया और गजलक्ष्मी दोनों से जोड़ते थे।

(6) स्तम्भों पर सर्पों का उत्कीर्णन कुछ स्तम्भों पर सर्पों का उत्कीर्णन है। यह प्रतीक भी ऐसी लोक परम्पराओं से लिया गया प्रतीत होता है जिनका ग्रन्थों में सदैव उल्लेख नहीं होता था। प्रसिद्ध कलामर्मज्ञ और इतिहासकार जेम्स फर्गुसन ने साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केन्द्र माना था। वे बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे। उस 5 समय तक अधिकांश बौद्धग्रन्थों का अनुवाद नहीं हुआ था। इसलिए उन्होंने केवल उत्कीर्णित मूर्तियों का अध्ययन करके उसके निष्कर्ष निकाले थे।

प्रश्न 7.
चित्र 4.32 और 4.33 में साँची से लिए गए दो परिदृश्य दिए गए हैं। आपको इनमें क्या नजर आता है? वास्तुकला, पेड़-पौधे और जानवरों को ध्यान से देखकर तथा लोगों के काम-धन्धों को पहचानकर यह बताइये कि इनमें से कौनसे ग्रामीण और कौनसे शहरी परिदृश्य हैं?
उत्तर:
देखें पाठ्यपुस्तक, चित्र 4.32 (पृष्ठ 112) – यह चित्र ग्रामीण परिदृश्य से सम्बन्धित है। इसमें अनेक पेड़-पौधे, जानवर भी दिखाए गए हैं। इसमें मनुष्य और पशु जैसे हिरण, गाय, भैंस आदि दर्शाये गए हैं। इससे ज्ञात होता है कि ग्रामीण लोगों के जीवन में पशुओं का अत्यधिक महत्त्व था। चित्र में लोगों को संगीत-नृत्य की मुद्रा में दिखाया गया है जिससे ज्ञात होता है कि संगीत-नृत्य आदि उनके मनोरंजन के प्रमुख साधन थे। चित्र में लोगों को बुद्ध और बोधिसत्वों की पूजा करते हुए दिखाया गया है। इससे पता चलता है कि बुद्ध और बोधिसत्वों की मूर्तियाँ बनाई जाती थीं तथा उनकी उपासना की जाती थी ये बुद्ध और बोधिसतों की उपासना करते हुए दिखाए गए हैं।

इस चित्र से पशुओं, पेड़-पौधों के प्रति बौद्धों के करुणामय दृष्टिकोण तथा अहिंसा के प्रति अटूट श्रद्धा की जानकारी मिलती है। यद्यपि साँची में जातकों से ली गई जानवरों की कई कहानियाँ हैं, फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ पर लोगों को आकर्षित करने के लिए जानवरों का उत्कीर्णन किया गया था। साथ ही जानवरों का मनुष्यों के गुणों के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया जाता था।

साँची में पेड़-पौधों का भी प्रतीक के रूप में प्रयोग किया जाता था। पेड़ का तात्पर्य एक पेड़ नहीं था, वरन् वह बुद्ध के जीवन की एक घटना का प्रतीक था इस प्रकार इस चित्र में तत्कालीन ग्रामीण परिवेश के बारे में जानकारी मिलती। है। इससे हमें तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्थिति की जानकारी मिलती है।

देखें पाठ्यपुस्तक, चित्र 4.33 ( पृष्ठ 112 ) – यह चित्र शहरी परिदृश्य से सम्बन्धित है। इससे तत्कालीन वास्तुकला एवं मूर्तिकला की विशेषताओं के बारे में जानकारी मिलती है। इस चित्र में बड़े-बड़े सुन्दर स्तम्भ, स्तम्भों के ऊपर उल्टे कलश और उनके ऊपर विभिन्न पशुओं का उत्कीर्णन किया गया है। कलशों के ऊपर दो दिशाओं में घोड़े तथा शेर आदि की मूर्तियाँ बनी हुई है। इसमें प्रथम दो भागों में एक आसन पर एक राजा बैठा हुआ है जिसके ऊपर एक छत्र लगा है तथा उसके पीछे दो सेवक पंखा कर रहे हैं।

स्तम्भों के नीचे जालीदार सुन्दर कार्य दर्शाया गया है। इसमें विभिन्न भिक्षुओं, भिक्षुणियों, व्यवसायियों आदि को विभिन्न रूपों में उत्कीर्णित किया गया है। इस चित्र के निचले भाग में भिक्षु बुद्ध और बोधिसत्तों की उपासना में लीन हैं। इसमें वाद्ययन्त्र बजाते हुए भी लोगों को दिखाया गया है। इसमें विभिन्न पशुओं की जो मूर्तियाँ दर्शाई गई हैं वे मनुष्यों के गुणों के प्रतीक के रूप में हैं। उदाहरण के लिए हाथी शक्ति और ज्ञान के प्रतीक माने जाते थे।

प्रश्न 8.
वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला और मूर्तिकला के विकास की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
वैष्णववाद तथा शैववाद का इतिहास अत्यधिक प्राचीन है। यदि हम जॉन मार्शल के कथन को सही मानें तो मोहन जोदड़ो से प्राप्त एक मुद्रा जिस पर योगी की मुद्रा उभरी हुई है वह और कोई नहीं अपितु शिव ही हैं। इस प्रकार देखा जाए तो शैववाद आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व के अपने पुरातात्त्विक साक्ष्य प्रस्तुत करता है। इसके अतिरिक्त हड़प्पा सभ्यता से हमें अनेक प्रस्तर लिंग भी प्राप्त होते हैं। ऋग्वैदिक काल में शैववाद तथा वैष्णववाद के साक्ष्य नहीं मिलते हैं। ऋग्वैदिक आर्यों के प्रमुख देवता इन्द्र अग्नि तथा वरुण थे। यहाँ शिव को हम पशुओं के देवता अर्थात् पूषन के रूप में देखते हैं तथा विष्णु को हम एक सामान्य देवता के रूप में देखते हैं।

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इस समय आराधना का मुख्य आधार यज्ञ था। देवताओं की आराधना तथा उनको प्रसन्न करने का एकमात्र माध्यम यज्ञ था। उत्तरवैदिक काल में बहुदेववाद एकेश्वरवाद में परिवर्तित हुआ। इसके परिणामस्वरूप भागवत धर्म तथा शैवधर्म की स्थापना हुई। इनके विधिवत रूप से स्थापित होने का समय लगभग 600 ई.पू. रहा होगा। परन्तु इस काल के शैववाद अथवा वैष्णववाद से सम्बन्धित कोई मूर्ति अथवा मन्दिर नहीं मिलते हैं। भारत में मूर्तिकला का प्रथम विधिवत आरम्भ हम मथुरा कला तथा गांधार कला में पाते हैं।

वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला का विकास निम्न प्रकार है –
(1) अवतारवाद – प्राचीन काल में भारत में वैष्णव और शैव परम्परायें भी प्रचलित थीं। वैष्णववाद में विष्णु की तथा शौववाद में शिव की पूजा प्रचलित थी उनकी उपासना भक्ति के माध्यम से की जाती थी। वैष्णववाद में कई अवतारों की पूजा पद्धतियाँ विकसित हुई। इस परम्परा के अन्तर्गत दस अवतारों की कल्पना की गई। विष्णु और उनके अनेक अवतारों की मूर्तियाँ बनाई जाने लगीं। शिव की भी मूर्तियाँ बनाई गई।

(2) मन्दिरों का निर्माण जिस समय साँची जैसे स्थानों में स्तूप अपने विकसित रूप में आ गए थे, उसी समय देवी-देवताओं की मूर्तियों को रखने के लिए सबसे पहले मन्दिर भी बनाएं गए। प्रारम्भिक मन्दिर एक चौकोर कमरे के रूप में थे, जिन्हें गर्भगृह कहा जाता था। इनमें एक दरवाजा होता था जिससे उपासक मूर्ति की पूजा करने के लिए अन्दर प्रविष्ट हो सकता था। धीरे-धीरे गर्भगृह के ऊपर एक ऊँचा ढाँचा बनाया जाने लगा, जिसे शिखर कहा जाता था। मन्दिर की दीवारों पर प्रायः भित्ति चित्र उत्कीर्ण किये जाते थे। कालान्तर में मन्दिरों के स्थापत्य का काफी विकास हुआ। अब मन्दिरों के साथ विशाल सभा स्थल, ऊँची दीवारें और तोरण भी बनाए जाने लगे। मन्दिरों में जल आपूर्ति की व्यवस्था की जाने लगी।

(3) कृत्रिम गुफाओं का निर्माण आरम्भिक मन्दिरों की एक विशेषता यह थी कि इनमें से कुछ मन्दिर पहाड़ियों को काटकर खोखला करके कृत्रिम गुफाओं के रूप में बनाए गए थे। कृत्रिम गुफाएँ बनाने की परम्परा काफी पुरानी थी। सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में अशोक के आदेश से आजीविक सम्प्रदाय के सन्तों के लिए बनाई गई थीं।

कृत्रिम गुफाएँ बनाने की परम्परा अलग-अलग चरणों में विकसित होती रही। इसका सबसे विकसित रूप हमें आठवीं सदी के कैलाशनाथ के मन्दिर में दिखाई देता है जिसमें पूरी पहाड़ी काटकर उसे मन्दिर का रूप दे दिया गया था। यह तत्कालीन वास्तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना है। एक ताम्रपत्र अभिलेख से हमें ज्ञात होता है कि इस मन्दिर का निर्माण समाप्त करने के बाद इसके प्रमुख मूर्तिकार ने अपना आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि “हे भगवान! यह मैंने कैसे बनाया।”

(4) मूर्तिकला का विकास इस युग में विष्णु और शिव की अनेक मूर्तियों का निर्माण किया गया। विष्णु के कई अवतारों को मूर्तियों के रूप में दर्शाया गया है। अनेक देवताओं की भी मूर्तियाँ बनाई गईं। इनमें उदयगिरी से प्राप्त वराह की मूर्ति तथा देवगढ़ की विष्णु की मूर्ति उल्लेखनीय है। शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में बनाया जाता था। परन्तु उन्हें कई बार मनुष्य के रूप में भी दर्शाया गया है। ये समस्त चित्रण देवताओं से सम्बन्धित मिश्रित अवधारणाओं पर आधारित थे। उनकी विशेषताओं तथा प्रतीकों को उनके शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुधों (हथियार और हाथ में धारण किए गए अन्य शुभ अस्त्र) और बैठने की शैली से दर्शाया जाता था।

प्रश्न 9.
स्तूप क्यों और कैसे बनाए जाते थे? चर्चा कीजिए।
उत्तर:
स्तूप क्यों बनाए जाते थे?
कुछ पवित्र स्थानों पर बुद्ध से जुड़े कुछ अवशेष जैसे उनकी अस्थियाँ या उनके द्वारा प्रयुक्त सामान गाड़ दिए जाते थे। इन टीलों को स्तूप कहते थे। स्तूप बनाने की परम्परा शायद बुद्ध के पहले से ही प्रचलित थी, परन्तु यह बौद्ध धर्म से जुड़ गई। चूंकि इन स्तूपों में पवित्र अवशेष होते थे, इसलिए समूचे स्तूप को ही बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठा मिली। ‘अशोकावदान’ नामक एक बौद्ध ग्रन्थ के अनुसार अशोक ने बुद्ध के अवशेषों को प्रत्येक महत्त्वपूर्ण नगर में बाँट कर उनके ऊपर स्तूप बनाने का आदेश दिया था ईसापूर्व दूसरी शताब्दी तक भरहुत, साँची तथा सारनाथ आदि स्थानों पर स्तूप बन चुके थे। बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार अशोक ने 84,000 स्तूप बनवाये।

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स्तूप कैसे बनाए गए?

स्तूपों के निर्माण के लिए अनेक लोगों ने दान दिए। स्तूपों की वेदिकाओं और स्तम्भों पर मिले अभिलेखों से हमें इन्हें बनाने और सुसज्जित करने के लिए दिए गए दानों का पता चलता है। कुछ दान राजाओं के द्वारा दिए गए थे, जैसे सातवाहन वंश के राजाओं द्वारा दिए गए दान कुछ दान शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियों द्वारा दिए गए। उदाहरण के लिए साँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा हाथीदाँत का काम करने वाले शिल्पकारों के दान से बनाया गया था। इसके अतिरिक्त सैकड़ों स्त्रियों और पुरुषों ने भी स्तूपों के निर्माण के लिए दान दिये। दान के अभिलेखों में उनके नाम मिलते हैं। कभी-कभी वे अपने गाँव अथवा शहर का नाम बताते हैं और कभी-कभी अपना व्यवसाय तथा सम्बन्धियों -के नाम भी बताते हैं। इन स्तूपों के निर्माण में भिक्षुओं और भिक्षुणियों ने भी दान दिया।

स्तूप की संरचना स्तूप की संरचना के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित थे –
(1) अंड – स्तूप ( संस्कृत अर्थ टीला) का जन्म एक गोलार्ध लिए हुए मिट्टी के टीले से हुआ, जिसे बाद में अंड कहा गया। धीरे-धीरे इसकी संरचना जटिल हो गई, जिसमें कई चौकोर और गोल आकारों का सन्तुलन बनाया गया।
(2) हर्मिका – अंड के ऊपर एक हर्मिका होती थी। यह छज्जे के जैसा ढाँचा देवताओं के घर का प्रतीक था।
(3) यष्टि हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था, जिसे यष्टि कहते थे। इस पर प्राय: एक छत्री लगी होती थी।
(4) वेदिका – टीले के चारों ओर एक वेदिका होती थी, जो पवित्र स्थल को सामान्य संसार से अलग करती थी।

साँची और भरहुत के स्तूप-साँची और भरहुत के प्रारम्भिक स्तूप बिना अलंकरण के हैं। इनमें पत्थर की वेदिकाएँ और तोरणद्वार हैं ये पत्थर की वेदिकाएँ किसी बाँस के या काठ के घेरे के समान थीं और चारों दिशाओं में खड़े तोरणद्वार पर अच्छी नक्काशी की गई थी। उपासक पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश करके टीले को दाई ओर देखते हुए

दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे ऐसा प्रतीत होता था कि वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे थे। बाद में स्तूप के टीले पर भी अलंकरण और नक्काशी की जाने लगी। अमरावती और पेशावर (पाकिस्तान) में शाहजी की देरी में स्तूपों में ताख और मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गई हैं।

विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास JAC Class 12 History Notes

→ प्रमुख ऐतिहासिक स्त्रोत ईसा पूर्व 600 से 600 ईसवी तक के काल के प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत बौद्ध-जैन और ब्राह्मण ग्रन्थों के अतिरिक्त इमारतें और अभिलेख आदि हैं।

→ साँची भोपाल राज्य के प्राचीन अवशेषों में साँची कनखेड़ा की इमारतें सबसे अद्भुत हैं। साँची का स्तूप भोपाल से बीस मील उत्तर-पूर्व की ओर एक पहाड़ी की तलहटी में बसे गाँव में स्थित है। यह एक पहाड़ी के ऊपर बना हुआ है और एक मुकुट जैसा दिखाई देता है। भोपाल के शासकों, शाहजहाँ बेगम और उसकी उत्तराधिकारी सुल्तान जहाँ बेगम ने इस स्तूप के रख-रखाव के लिए प्रचुर धन का अनुदान दिया। साँची बौद्ध धर्म का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र है।

→ चिन्तकों का उद्भव ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी में ईरान में जरथुख, चीन में खुंगत्सी, यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तू तथा भारत में महावीर और बुद्ध आदि अनेक चिन्तकों का उद्भव हुआ। उन्होंने जीवन के रहस्यों तथा मनुष्यों और विश्व व्यवस्था के बीच सम्बन्धों को समझने का प्रयास किया।

→ यज्ञों की परम्परा – पूर्व वैदिक परम्परा ऋग्वेद से मिलती है। ऋग्वेद का संकलन 1500 से 1000 ई. पूर्व में हुआ था। ऋग्वेद इन्द्र, अग्नि, सोम आदि अनेक देवताओं की स्तुति सम्बन्धी सूक्तियों का संग्रह है। यज्ञों के समय इन सूक्तियों का उच्चारण किया जाता था और लोग पशु, पुत्र, स्वास्थ्य, दीर्घ आयु आदि के लिए प्रार्थना करते थे। प्रारम्भ में यज्ञ सामूहिक रूप से किये जाते थे बाद में कुछ यज्ञ घरों के स्वामियों के द्वारा किए जाते थे।

→ वाद-विवाद और चर्चाएँ समकालीन बौद्ध ग्रन्थों में हमें 64 सम्प्रदायों या चिन्तन परम्पराओं का उल्लेख मिलता है। इससे हमें जीवन्त चचाओं और विवादों की एक झांकी मिलती है। महावीर और बुद्ध ने वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाया और कहा कि जीवन के दुःखों से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता था। यह बात ब्राह्मणवाद से बिल्कुल भिन्न थी।

→ नियतिवादी और भौतिकवादी नियतिवादी लोग आजीविक परम्परा के थे। उनका विश्वास था कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है। भौतिकवादी लोकायत परम्परा के थे भौतिकवादियों के अनुसार दान, यज्ञ या चढ़ावा आदि की बात मूर्खों का सिद्धान्त है, खोखला झूठ है।

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→ महावीर की शिक्षाएँ महावीर जैन धर्म तीर्थकर वे महापुरुष थे जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं –
(1) जीवों के प्रति अहिंसा का पालन करना।
(2) जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा निर्धारित होता है।
(3) कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या की आवश्यकता है। यह संसार के त्याग से ही सम्भव है।
(4) पाँच व्रतों पर बल देना –

  • हत्या न करना
  • चोरी न करना
  • झूठ न बोलना
  • ब्रह्मचर्य और
  • धन संग्रह न करना।

→ जैन धर्म का विस्तार धीरे-धीरे जैन धर्म भारत के कई भागों में फैल गया। जैनों ने प्राकृत, संस्कृत तथा तमिल आदि अनेक भाषाओं में अपने ग्रन्थ लिखे।

→ बुद्ध और ज्ञान की खोज-बुद्ध तत्कालीन युग के सबसे प्रभावशाली शिक्षकों में से एक थे सैकड़ों वर्षों के दौरान उनकी शिक्षाएँ सम्पूर्ण उपमहाद्वीप में और उसके बाद मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया, जापान, श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड और इण्डोनेशिया तक फैल गई। बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। वे शाक्य कबीले के सरदार के पुत्र थे। नगर का भ्रमण करते समय उन्हें एक वृद्ध व्यक्ति, एक रोगी, एक संन्यासी और एक मृतक को देखकर प्रबल आघात पहुँचा। कुछ समय बाद वे महल त्यागकर सत्य की खोज में निकल गए। उन्होंने साधना के कई मार्ग अपनाए और अन्त में ज्ञान प्राप्त कर लिया। इसके बाद वे बुद्ध कहलाए।

→ बुद्ध की शिक्षाएँ

  • विश्व अनित्य और निरन्तर परिवर्तनशील है, यह आत्माविहीन है
  • यह संसार दुःखों का घर है
  • मध्यम मार्ग अपनाकर मनुष्य दुःखों से मुक्ति पा सकता है
  • समाज का निर्माण इन्सानों ने किया है, न कि ईश्वर ने
  • जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति, आत्मज्ञान और निर्वाण के लिए व्यक्ति केन्द्रित हस्तक्षेप और सम्यक् कर्म पर बल देना
  • अपने लिए ज्योति बनना तथा अपनी मुक्ति का मार्ग ढूंढ़ना।

→ बुद्ध के अनुयायी बुद्ध ने अपने शिष्यों के लिए एक संघ की स्थापना की। संघ ऐसे भिक्षुओं की एक संस्था थी, जो धम्म के शिक्षक बन गए। ये भ्रमण सादा जीवन बिताते थे और उपासकों से भोजन दान पाने के लिए एक कटोरा रखते थे। संघ में पुरुष एवं स्त्री दोनों ही सम्मिलित थे बुद्ध के अनुयायियों में राजा, धनवान, गृहपति और सामान्यजन सभी शामिल थे संघ में सभी भिक्षुओं को समान माना जाता था।

→ बेरीगाथा यह अनूठा बौद्ध ग्रन्थ ‘सुत्तपिटक’ का भाग है। इसमें भिक्षुणियों द्वारा रचित छन्दों का संकलन किया गया है। इससे महिलाओं के सामाजिक और आध्यात्मिक अनुभवों के बारे में जानकारी मिलती है।

→ भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए नियम –
(1) जब कोई भिक्षु एक नया कम्बल या गलीचा बनाएगा तो उसे उसका प्रयोग कम से कम छः वर्षों तक करना पड़ेगा।
(2) यदि कोई भिक्षु किसी गृहस्थी के घर जाता है और उसे भोजन दिया जाता है, तो वह दो से तीन कटोरा भर ही भोजन स्वीकार कर सकता है।
(3) यदि कोई भिक्षू किसी विहार से प्रस्थान के पहले अपने द्वारा बिछाए गए बिस्तर को नहीं समेटता है, न ही समेटवाता है, तो उसे अपना अपराध स्वीकार करना होगा।

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→ बौद्ध धर्म के प्रसार के तेजी से फैलने के कारण –
(1) लोग समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असन्तुष्ट थे
(2) बौद्ध धर्म में जन्म के आधार पर श्रेष्ठता की बजाय अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व दिए जाने से स्त्री और पुरुष इस धर्म की ओर आकर्षित हुए।
(3) छोटे और कमजोर लोगों से मैत्रीपूर्ण और दयापूर्ण व्यवहार करने पर बल दिए जाने से भी लोग बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हुए।

→ स्तूप- शवदाह के पश्चात् शरीर के कुछ अवशेष टीलों पर सुरक्षित रख दिए जाते थे। अन्तिम संस्कार से जुड़े ये टीले चैत्य के रूप में जाने गए कुछ पवित्र स्थल पर एक छोटी-सी वेदी बनी रहती थी, जिन्हें कभी-कभी चैत्य कहा जाता था। बौद्ध साहित्य में कई चैत्यों का उल्लेख है। इसमें बुद्ध के जीवन से जुड़े स्थानों का भी वर्णन है- लुम्बिनी (जन्म-स्थल), बोधगया (जहाँ ज्ञान प्राप्त किया), सारनाथ (जहाँ प्रथम उपदेश दिया) तथा कुशीनगर (जहाँ निर्वाण प्राप्त किया)।

→ स्तूप क्यों बनाए जाते थे? कुछ पवित्र स्थलों पर बुद्ध से जुड़े कुछ अवशेष जैसे उनकी अस्थियाँ या उनके द्वारा प्रयुक्त सामान गाड़ दिए गए थे, इन टीलों को स्तूप कहते थे स्तूप बनाने की परम्परा बुद्ध से पहले की रही होगी, परन्तु वह बौद्ध धर्म से जुड़ गई। चूँकि उनमें ऐसे अवशेष रहते थे, जिन्हें पवित्र समझा जाता था, इसलिए समूचे स्तूप को ही बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठा मिली।

→ स्तूप कैसे बनाए गए स्तूप बनाने के लिए कुछ राजाओं (जैसे सातवाहन वंश के राजा) तथा कुछ शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियों के द्वारा दान दिए गए। साँची के एक तोरणद्वार का भाग हाथीदांत का काम करने वाले शिल्पकारों के दान से बनाया गया था। स्तूपों के निर्माण में भिक्षुओं और भिक्षुणियों ने भी दान दिया।

→ स्तूप की संरचना स्तूप (संस्कृत अर्थ टीला) का जन्म एक गोलार्ध लिए हुए मिट्टी के टीले से हुआ, जिसे बाद में ‘अंड’ कहा गया। अंड के ऊपर एक हर्मिका होती थी। यह छज्जे जैसा ढाँचा, देवताओं के घर का प्रतीक था। हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था जिसे ‘यष्टि’ कहते थे, जिस पर प्राय: एक छत्री लगी होती थी। टीले के चारों ओर एक वेदिका होती थी।

→ साँची और भरहुत के स्तूप-साँची और भरहुत के प्रारम्भिक स्तूप बिना अलंकरण के हैं सिवाए इसके कि उनमें पत्थर की वेदिकाएँ और तोरणद्वार हैं ये पत्थर की वेदिकाएँ किसी बांस के या काठ के घेरे के समान थीं और चारों दिशाओं में खड़े तोरणद्वार पर खूब नक्काशी की गई थी। बाद में स्तूप के टीले पर भी अलंकरण और नक्काशी की जाने लगी। अमरावती और पेशावर (पाकिस्तान) में शाहजी की ढेरी में स्तूपों में ताख और मूर्तियाँ उत्कीर्ण करने की कला के काफी उदाहरण मिलते हैं।

→ स्तूपों की खोज- 1796 में एक स्थानीय राजा को अचानक अमरावती के स्तूप के अवशेष मिल गए। कुछ वर्षों के बाद कॉलिन मेकेंजी नामक एक अंग्रेज अधिकारी को यहाँ अनेक मूर्तियाँ मिलीं 1854 में गुन्टूर (आन्ध्रप्रदेश) के कमिश्नर ने अमरावती की यात्रा की। उन्होंने कई मूर्तियाँ और उत्कीर्ण पत्थर जमा किए और वे उन्हें मद्रास ले गए। उन्होंने पश्चिमी तोरणद्वार को भी खोज निकाला और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अमरावती का स्तूप बौद्धों का सबसे विशाल और शानदार स्तूप था 1850 के दशक में अमरावती के उत्कीर्ण पत्थर अनेक स्थानों पर ले जाए जा रहे थे।

→ अमरावती के स्तूप का नष्ट हो जाना यद्यपि साँची का स्तूप बच गया, परन्तु अमरावती का स्तूप नष्ट हो गया। विद्वान इस बात के महत्त्व को नहीं समझ पाए थे कि किसी पुरातात्विक अवशेष को उठाकर ले जाने की बजाए खोज के स्थान पर ही संरक्षित करना कितना महत्त्वपूर्ण था दूसरी ओर 1818 में जब साँची की खोज हुई, उसके तीन तोरणद्वार तब भी खड़े थे, चौथा वहीं गिरा हुआ था और टीला भी अच्छी स्थिति में था।

→ मूर्तिकला बौद्ध मूर्तिकला को समझने के लिए कला इतिहासकारों को बुद्ध के चरित्र लेखन का सहारा लेना पड़ा। बौद्ध चरित्र लेखन के अनुसार एक वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति हुई। कई प्रारम्भिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव के रूप में न दिखाकर उनकी उपस्थिति प्रतीकों के माध्यम से दिखाने का प्रयास किया।

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→ लोक परम्पराएँ- साँची में उत्कीर्णित अनेक मूर्तियाँ शायद बौद्ध धर्म से सीधी जुड़ी हुई नहीं थीं। इनमें से कुछ सुन्दर स्त्रियाँ भी मूर्तियों में उत्कीर्णित हैं साहित्यिक परम्पराओं के अध्ययन से विद्वान यह समझ पाए कि यह संस्कृत भाषा में वर्णित ‘शालभंजिका’ की मूर्ति है। लोक परम्परा में यह माना जाता था कि इस स्वी द्वारा छुए जाने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे और फल आने लगते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक शुभ प्रतीक माना जाता था और इस कारण स्तूप के अलंकरण में प्रयुक्त हुआ।

→ साँची में जानवरों के सुन्दर उत्कीर्णन – साँची में जानवरों के कुछ बहुत सुन्दर उत्कीर्णन पाए गए हैं। इन जानवरों में हाथी, घोड़े, बन्दर और गाय बैल शामिल हैं। यद्यपि साँची में जातकों से ली गई जानवरों की कई कहानियाँ हैं, ऐसा लगता है कि यहाँ पर लोगों को आकर्षित करने के लिए जानवरों का उत्कीर्णन किया गया था। साथ ही जानवरों को मनुष्यों के गुणों के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त किया जाता था। उदाहरण के लिए हाथी शक्ति और ज्ञान के प्रतीक माने जाते थे।

→ महायान बौद्धमत का विकास प्रारम्भ में बुद्ध को भी एक मनुष्य माना जाता था परन्तु धीरे-धीरे एक मुक्तिदाता के रूप में बुद्ध की कल्पना उभरने लगी। यह विश्वास किया जाने लगा कि वे मुक्ति दिलवा सकते थे। साथ-साथ बोधिसत की अवधारणा भी पनपने लगी। बोधिसत्तों को परम करुणामय जीव माना गया जो अपने सत्कार्यों से पुण्य कमाते थे परन्तु वे इस पुण्य से दूसरों की सहायता करते थे बुद्ध और बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा इस परम्परा का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गई। इस नई परम्परा को ‘महायान’ के नाम से जाना गया। महायान के अनुयायी पुरानी परम्परा को ‘हीनयान’ के नाम से पुकारते थे।

→ पौराणिक हिन्दू धर्म का उदय हिन्दू धर्म में दो परम्पराएँ शामिल थीं- वैष्णव तथा शैव वैष्णव परम्परा में विष्णु को सबसे महत्त्वपूर्ण देवता माना जाता है और शैव परम्परा में शिव परमेश्वर है। इस प्रकार की आराधना में उपासना और ईश्वर के बीच का सम्बन्ध प्रेम और समर्पण का सम्बन्ध माना जाता था इसे भक्ति कहते हैं।

→ वैष्णववाद में अवतारों की कल्पना वैष्णववाद में कई अवतारों के इर्द-गिर्द पूजा पद्धतियाँ विकसित हुई वैष्णव धर्म में दस अवतारों की कल्पना की गई। यह माना जाता है कि पापियों के बढ़ते प्रभाव के कारण जब विश्व में अव्यवस्था और विनाश की स्थिति आ जाती थी तब विश्व की रक्षा के लिए भगवान अलग-अलग रूपों में अवतार लेते थे।

→ अवतारों को मूर्तियों के रूप में दिखाना कई अवतारों को मूर्तियों के रूप में दिखाया गया है। अन्य देवताओं की भी मूर्तियों का निर्माण हुआ। शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में बनाया जाता था परन्तु उन्हें कई बार मनुष्य के रूप में भी दिखाया गया है। ये सारे चित्रण देवताओं से जुड़ी हुई मिश्रित अवधारणाओं पर आधारित थे। इन मूर्तियों के अंकन का अभिप्राय समझने के लिए इतिहासकारों को इनसे जुड़ी हुई कहानियों से परिचित होना पड़ता है। कई कहानियाँ प्रथम सहस्राब्दी के मध्य से ब्राह्मणों द्वारा रचित पुराणों में पाई जाती हैं। इनमें देवी-देवताओं की कहानियाँ हैं।

→ मन्दिरों का निर्माण आरम्भिक मन्दिर एक चौकोर कमरे के रूप में थे, जिन्हें गर्भगृह कहा जाता था। इनमें एक द्वार होता था जिससे उपासक मूर्ति की पूजा करने के लिए भीतर प्रविष्ट हो सकता था। धीरे-धीरे गर्भगृह के ऊपर शिखर बनाया जाने लगा। मन्दिरों की दीवारों पर प्रायः भित्ति चित्र उत्कीर्ण किए जाते थे। बाद के युगों में मन्दिरों के स्थापत्य का काफी विकास हुआ। अब मन्दिरों के साथ विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें और तोरण भी जुड़ गए।

→ कृत्रिम गुफाएँ – प्रारम्भ में कुछ मन्दिर पहाड़ियों को काट कर खोखला करके कृत्रिम गुफाओं के रूप में बनाए गए थे। सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ई. पूर्व तीसरी सदी में अशोक के आदेश से आजीविक सम्प्रदाय के सन्तों के लिए बनाई गई थीं। इसका सबसे विकसित रूप हमें आठवीं शताब्दी के कैलाशनाथ के मन्दिर में दिखाई देता है। इसमें पूरी पहाड़ी काट कर उसे मन्दिर का रूप दे दिया गया था।

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→ अज्ञात को समझने का प्रयास- यद्यपि यूरोपीय विद्वान प्रारम्भिक भारतीय मूर्तिकला को यूनान की कला से निम्नस्तर का मानते थे, फिर भी वे बुद्ध और बोधिसत्व की मूर्तियों की खोज से काफी उत्साहित हुए। इसका कारण यह था कि ये मूर्तियाँ यूनानी प्रतिमानों से प्रभावित थीं। ये मूर्तियाँ अधिकतर तक्षशिला और पेशावर के नगरों में मिली थीं। ये मूर्तियाँ यूनानी मूर्तियों से काफी मिलती जुलती थीं। चूँकि ये विद्वान् यूनानी परम्परा से परिचित थे, इसलिए उन्होंने इन मूर्तियों को भारतीय मूर्तिकला का सर्वश्रेष्ठ नमूना बताया। इन्होंने इस कला को समझने के लिए यह तरीका अपनाया-परिचित चीजों के आधार पर अपरिचित चीजों को समझने का पैमाना तैयार करना।

→ लिखित ग्रन्थों से जानकारी प्राप्त करना किसी मूर्ति का महत्व और संदर्भ समझने के लिए कला के इतिहासकार प्राय: लिखित ग्रन्थों से जानकारी एकत्रित करते हैं भारतीय मूर्तियों की यूनानी मूर्तियों से तुलना कर निष्कर्ष निकालने की अपेक्षा यह निश्चय ही अधिक उत्तम तरीका है परन्तु यह तरीका आसान नहीं।

कालरेखा 1
महत्वपूर्ण धार्मिक बदलाव

लगभग 1500-1000 ई. पूर्व प्रारम्भिक वैदिक परम्पराएँ
लगभग 1000-500 ई.पूर्व उत्तरवैदिक परम्पराएँ
लगभग छठी सदी ई. पूर्व प्रारम्भिक उपनिषद्, जैन धर्म, बौद्ध धर्म
लगभग तीसरी सदी ई. पूर्व आरम्भिक स्तूप
लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे महायान बौद्ध मत का विकास, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परम्पराएँ
लगभग तीसरी सदी ईसवी सबसे पुराने मन्दिर

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कालरेखा 2
प्राचीन इमारतों और मूर्तियों की खोज और संरक्षण के महत्त्वपूर्ण चरण

उन्नीसवीं सदी –
1814 इंडियन म्यूजियम, कोलकाता की स्थापना।
1834 रामराजा लिखित एसेज ऑन द आर्किटैक्चर आफ द हिन्दूज का प्रकाशन; कनिंघम ने सारनाथ के स्तूप की छानबीन की।
1835-1842 जेम्स फर्गुसन ने महत्त्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों का सर्वेक्षण किया।
1851 गवर्नमेंट म्यूजियम, मद्रास की स्थापना।
1854 अलैक्जैंडर कनिंघम ने भिलसा टोप्स लिखी जो साँची पर लिखी गई सबसे प्रारम्भिक पुस्तकों में से एक है।
1878 राजेन्द्र लाल मित्र की पुस्तक, बुद्ध गया : द हेरिटेज आफ शाक्य मुनि का प्रकाशन।
1880 एच.एच. कोल को प्राचीन इमारतों का संग्रहाध्यक्ष बनाया गया।
1888 ट्रेजर-ट्रोव एक्ट का बनाया जाना। इसके अनुसार सरकार पुरातात्विक महत्त्व की किसी भी चीज को हस्तगत कर सकती थी।
बीसवीं सदी-
1914 जॉन मार्शल और अल्फ्रेड फूसे की ‘द मान्युमेंट्स आफ साँची’ पुस्तक का प्रकाशन।
1923 जॉन मार्शल की पुस्तक ‘कन्जर्वेशन मैनुअल’ का प्रकाशन।
1955 प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली की नींव रखी।
1989 साँची को एक विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया।

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