JAC Class 9th Social Science Notes History Chapter 4 वन्य समाज एवं उपनिवेशवाद

JAC Board Class 9th Social Science Notes History Chapter 4 वन्य समाज एवं उपनिवेशवाद

→ जंगलों से हमें कागज, मसाले, गोंद, शहद, कॉफी, चाय, रबड़, चमड़ा, जड़ीबूटी, बाँस, कोयला, फल-फूल, पशु-पक्षी, फर्नीचर एवं जलाने हेतु लकड़ी आदि प्राप्त होते हैं।

→  औद्योगीकरण के दौर में सन् 1700 ई. से सन् 1995 ई. के मध्य 139 लाख वर्ग किमी. वन क्षेत्र कृषि, चरागाहों, ईंधन की लकड़ी एवं उद्योगों के कच्चे माल के लिए साफ कर दिया गया।

→ वन विनाश की समस्या प्राचीनकाल से चली आ रही है। वनों के लुप्त होने को सामान्यत: वन विनाश कहते हैं।

→ सन् 1600 में हिन्दुस्तान के कुल भू-भाग के लगभग ! भाग पर ही खेती होती थी आज यह आँकड़ा लगभग आधे तक पहुँच गया है।

→  सन् 1880 से 1920 के बीच खेती योग्य जमीन के क्षेत्रफल में 67 लाख हेक्टेयर की बढ़त हुई।

→ खेती के विस्तार को हम विकास का सूचक मानते हैं लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जमीन को जोतने से पहले जंगलों की कटाई करनी पड़ती है।

→  भारत में रेल-लाइनों का जाल 1860 के दशक से तेजी से फैला, सन् 1946 तक इन रेल लाइनों की लम्बाई 7,65,000 कि. मी. तक बढ़ चुकी थी। इनके विस्तार हेतु जमीन एवं स्लीपरों के लिए बड़ी मात्रा में पेड़ों को काटा गया।

→ पेड़ों की अंधाधुध कटाई पर रोक लगाने के लिए अंग्रेजों ने जर्मन विशेषज्ञ डायट्रिच भेंडिस को देश का पहला बन महानिदेशक नियुक्त किया। उसने सन् 1864 में भारतीय वन सेवा की स्थापना की।

→ वन अधिनियम द्वारा जंगलों को आरक्षित, सुरक्षित एवं ग्रामीण इन तीन श्रेणियों में बाँटा गया।

→ सरकार ने वनों की सुरक्षा के लिए घुमंतू कृषि पर रोक लगाने का फैसला किया। जंगल के कुछ भागों को बारी-बारी से काटकर और जलाकर उन पर खेती करना घुमंतू कृषि कहलाता है।

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→ सन् 1905 ई. में जब ब्रिटिश सरकार ने वनों के 2/3 भाग को आरक्षित करने, घुमन्तू कृषि को रोकने, शिकार करने एवं अनेक वन्य उत्पादों के संग्रह पर प्रतिबन्ध लगाने जैसे प्रस्ताव रखे तो बस्तर के लोग चिन्तित हो गए क्योंकि उन्हें अपनी आजीविका इन वन्य उत्पादों से ही प्राप्त होती थी। अंग्रेजों की नजर में बड़े जानवर जंगली, बर्बर और आदि समाज के प्रतीक थे इसलिए उन्होंने बाघ, भेड़िये तथा दूसरे बड़े जानवरों को मारने एवं शिकार करने को प्रोत्साहित किया।

→ जावा को आजकल इंडोनेशिया के चावल उत्पादक द्वीप के रूप में जाना जाता है लेकिन एक जमाने में यह क्षेत्र वनाच्छादित था। उन्नीसवीं सदी में डच उपनिवेशकों ने जावा में वन कानून लागू कर ग्रामीण लोगों के वनों में प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया। अब वनों में लकड़ी केवल विशिष्ट उद्देश्यों जैसे-नाव या घर बनाना आदि के लिए चुने हुए जंगलों से ही काटने की इजाजत दी गई। डचों ने वहाँ वन प्रबंधन की शुरुआत की।

→ अस्सी के दशक से एशिया और अफ्रीका की सरकारों को यह समझ में आने लगा कि वैज्ञानिक वानिकी और वन समुदायों को जंगल से बाहर रखने की नीतियों के चलते बार-बार टकराव पैदा होते हैं अत: सरकार ने यह मान लिया कि जंगलों के संरक्षण हेतु प्रदेशों में रहने वालों की मदद लेनी होगी।

→  सन् 1600 ई. – भारत के कुल भू-भाग के लगभग छठे हिस्से पर खेती होती थी।

→  सन् 1700-1995 ई. – इस काल के मध्य 139 लाख वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र अर्थात् विश्व के कुल क्षेत्रफल का 9.3 प्रतिशत भाग औद्योगिक उपयोग, कृषि कार्य, चरागाहों एवं ईंधनों की लकड़ी के लिए साफ कर दिया गया।

→  सन् 1820 ई. – सन् 1820 ई. के दशक में इंग्लैण्ड के खोजी दस्ते भारत की वन-सम्पदा का अन्वेषण करने के लिए भेजे गए।

→  सन् 1850 ई. -सन् 1850 ई. के दशक में औपनिवेशिक विस्तार के लिए रेल-लाइनों के प्रसार का कार्य एवं लकड़ी की माँग में वृद्धि हुई।

→  सन् 1860 ई. – सन् 1860 ई. के दशक में भारत में रेल-लाइनों का जाल तेजी से फैला।

→  सन् 1864 ई. – चैंडिस द्वारा भारतीय वन सेवा की स्थापना।

→  सन् 1865 ई. – भारत में वन अधिनियम लागू।

→  सन् 1878 ई. – वन अधिनियम में प्रथम बार संशोधन किया गया।

→  सन् 1880-1920 ई. – खेती योग्य जमीन के क्षेत्रफल में 67 लाख हेक्टेयर की वृद्धि हुई।

→  सन् 1899-1900 ई. – औपनिवेशिक सरकार के काल में भारत में भयंकर अकाल।

→  सन् 1906 ई. – देहरादून में इम्पीरियल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना। अब इसको वन अनुसंन्धान संस्थान कहा जाता है तथा इसे विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया है।

→  सन् 1907-1908 ई. – औपनिवेशिक सरकार के काल में पुन: अकाल का दौर।

→  सन् 1910 ई. – बस्तर रियासत में विद्रोह।

→  सन् 1927 ई. – वन अधिनियम में दूसरी बार संशोधन किया गया।

→ डायट्रिच बैंडिस – जर्मन विशेषज्ञ, जिसे भारत का प्रथम वन महानिदेशक नियुक्त किया गया।

→ जॉर्ज यूल – एक अंग्रेज अफसर जिसने 400 बाघों को अपना शिकार बनाया।

→ सुरोन्तिको सामिन – इन्होंने जावा में डच सरकार के विरुद्ध आन्दोलन किया तथा वनों पर राज्य के अधिकार को नहीं माना।

→ चरवाहे – ऐसे लोग जो भेड़-बकरियाँ एवं पशुओं को चराने के लिए इधर-उधर घूमते रहते हैं।

→ विलुप्त प्रजातियाँ – पौधों और पशुओं की ऐसी प्रजातियाँ जो बिल्कुल समाप्त हो चुकी हैं।

→ वनोन्मलन – वनोन्मूलन का अर्थ है-वन विनाश या समाप्ति। कृषि के विस्तार, रेलवे के विस्तार, जलयान-निर्माण आदि कई कार्यों के लिए वनों को बड़े पैमाने पर काटा गया।

→ वैज्ञानिक वानिकी – वन विभाग द्वारा पेड़ों की कटाई करके उनके स्थान पर पंक्तिबद्ध तरीके से एक निश्चित प्रजाति के पौधों को लगाना।

→ वन उत्पाद – वनों से प्राप्त होने वाली विभिन्न उपयोगी वस्तुएँ।

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→ वन अधिनियम – औपनिवेशिक शासकों ने वनों की उपयोगिता को जानते हुए वन अधिनियम पारित करके वनों पर नियन्त्रण स्थापित कर लिया।

→ सुरक्षित वन – वे वन, जिनमें पशुओं को चराने की अनुमति सामान्य प्रतिबन्धों के साथ प्रदान की जाती है।

→ आरक्षित वन – वे वन, जो व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इमारती लकड़ी का उत्पादन करते हैं। इन वनों में किसी भी प्रकार की कृषि करने की अनुमति नहीं होती।

→ स्लीपर – रेल की पटरी के आर-पार लगे लकड़ी के तख्ते जो पटरियों को उनकी जगह पर रोके रखते हैं।

→ परती-भूमि – वह भूमि, जिसकी उर्वरता बढ़ाने के लिए उसे कुछ समय तक जोता नहीं जाता।

→ वन-ग्राम – वे ग्राम जिन्हें इस शर्त पर आरक्षित वनों में बसने दिया जाता था कि गाँववासी पेड़ों को काटने, उनकी ढुलाई तथा वनों को आग से बचाने में वन विभाग के लिए मुफ्त में काम करेंगे।

→ लेटेक्स – रबड़ की आपूर्ति के लिए जंगली रबड़ के वृक्षों से प्राप्त होने वाला पदार्थ।

→ इजारेदारी – एकाधिकार।

→ व्यावसायिक वानिकी – जब वनों को केवल व्यावसायिक बिक्री एवं मुनाफा कमाने के उद्देश्य से उद्योग के रूप में संचालित किया जाए तो उसे व्यावसायिक वानिकी कहा जाता है।

→ बागान – जब बहुत बड़े स्तर पर एक विशाल क्षेत्र पर एक ही तरह के पेड़ लगाये जाएँ, विशेषकर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए तो उसे बागान कहा जाता है, जैसे-असम के चाय बागान।

→ झूम कृषि – इस कृषि में वन के कुछ भागों को काट कर बारी-बारी से जला दिया जाता है। पहली मानसून वर्षा के पश्चात् इस राख में बीज बोए जाते हैं तथा अक्टूबर-नवम्बर में फसल काटी जाती है। ऐसे खेतों को कुछ वर्षों के लिए जोता जाता है तथा फिर कई वर्षों तक खेतों को खाली छोड़ दिया जाता है ताकि वन फिर से पनप जाएँ। इन भूखण्डों में मिली-जुली फसलें उगाई जाती हैं।

→ भारतीय वन अधिनियम,1878 – इस अधिनियम के अन्तर्गत वनों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया-आरक्षित, संरक्षित एवं गाँव वन।

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→ ब्लैण्डाँगडिएन्स्टेन प्रणाली – इस प्रणाली का आरम्भ जावा में किया गया, जिसके अन्तर्गत कुछ ग्रामीणों को इस शर्त पर करों में छूट दी गयी थी कि वे वन काटने एवं इमारती लकड़ी ढोने के लिए भैंसें उपलब्ध कराने का काम मुफ्त करेंगे।

→ बस्तर – वर्तमान में बस्तर छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित है। वन नियन्त्रण से प्रभावित यहाँ के आदिवासी कबीलों ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विद्रोह किए। इन विद्रोहों का आरम्भ धुरवा समुदाय द्वारा हुआ था।

→ छोटा नागपुर – बिरसा मुण्डा ने छोटा नागपुर में वन समुदाय के विद्रोह का नेतृत्व किया था।

→ सन्थाल परगना – वन्य समुदाय के नेता सीधू एवं कानू के नेतृत्व में सन्थाल परगना में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह किया गया।

→ सामिन आन्दोलन – जावा के वन्य लोगों का डच सरकार के विरुद्ध एक आन्दोलन था। इसका नेतृत्व सुरोन्तिको सामिन ने किया।

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JAC Class 9th Social Science Notes History Chapter 3 नात्सीवाद और हिटलर का उदय 

JAC Board Class 9th Social Science Notes History Chapter 3 नात्सीवाद और हिटलर का उदय

→ बीसवीं शताब्दी के शुरुआती सालों में जर्मनी एक ताकतवर साम्राज्य था।

→ जर्मनी ने ऑस्ट्रिया के साथ मिलकर रूस, फ्रांस एवं इंग्लैण्ड के विरुद्ध प्रथम विश्वयुद्ध (सन् 1914-1918 ई.) लड़ा था। इस युद्ध में जर्मनी की बुरी तरह पराजय हुई।

→ जून सन् 1919 ई. में मित्र राष्ट्रों के साथ वर्साय में हुई शान्ति सन्धि जर्मनी की जनता के लिए बहुत कठोर एवं अपमानजनक थी। मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी की सेना भंग कर दी। उस पर छ: अरब पौंड का जुर्माना लगाया गया।

→ समाजवादियों, डेमोक्रेट्स और कैथलिक गुटों ने वाइमर में एकत्र होकर तत्कालीन शासन व्यवस्था का विरोध करते हुए लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना का फैसला लिया।

→ पुराने सैनिकों की मदद से इस विद्रोह को कुचल कर स्पार्टकिस्टों ने जर्मनी में कम्युनिस्ट पार्टी की नींव डाली।

→ 1929 ई. में अमेरिका में आई मंदी का सबसे बुरा प्रभाव जर्मनी की अर्थव्यवस्था पर पड़ा। चारों तरफ गहरी हताशा का माहौल था तथा लोग बेरोजगार हो रहे थे।

JAC Class 9th Social Science Notes History Chapter 3 नात्सीवाद और हिटलर का उदय 

→ अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज में गहराते जा रहे इस संकट ने हिटलर के सत्ता में पहुँचने का रास्ता साफ कर दिया।

→ सन् 1889 ई. को ऑस्ट्रिया में जन्मे एडोल्फ हिटलर का प्रारम्भिक जीवन बहुत गरीबी में गुजरा। सन् 1912 ई. में वह जर्मनी चला गया था। उसने सैनिक के रूप में प्रथम
विश्वयुद्ध में भाग लिया एवं उसे उत्कृष्ट सेवाओं के लिए विशिष्ट पदक भी मिला था।

→ सितम्बर सन् 1919 ई. में हिटलर ने राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन कामगार पार्टी की स्थापना की। बाद में यही नात्सी पार्टी कहलाई।

→ 30 जनवरी, सन् 1933 ई. को राष्ट्रपति हिंडनबर्ग ने हिटलर को चांसलर का पद ग्रहण करने का निमन्त्रण दिया।

→ सत्ता प्राप्त कर लेने के बाद हिटलर ने लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को भंग करना शुरू कर दिया तथा 28 फरवरी सन् 1933 को जारी अग्नि अध्यादेश के द्वारा अभिव्यक्त, प्रेस तथा सभा करने के अधिकारों को अनिश्चित काल के लिए निलम्बित कर दिया।

→ 3 मार्च सन् 1933 को प्रसिद्ध विशेषाधिकार अधिनियम द्वारा तानाशाही स्थापित कर दी।

→ हिटलर ने एक जन, एक साम्राज्य, एक नेता का नारा दिया तथा राईनलैंड, ऑस्ट्रिया तथा चेकोस्लोवाकिया पर कब्जा कर लिया।

→ सन् 1940 तक हिटलर अपनी ताकत के शिखर पर था। जून 1941 में उसने सोवियत संघ पर हमला कर दिया। यह द्वितीय विश्वयुद्ध मई 1945 में हिटलर की पराजय और जापान के हिरोशिमा शहर पर परमाणु बम गिराने के साथ खत्म हुआ।

→ नात्सी शासन ने भाषा और मीडिया का बड़ी होशियारी से इस्तेमाल किया और उसका जबरदस्त फायदा उठाया।

→ जर्मनी के बहुत से लोगों ने पुलिस दमन और मौत की आशंका के बावजूद नात्सीवाद का विरोध किया था।

→ 1899 ई. – ऑस्ट्रिया में हिटलर का जन्म हुआ।

→ 1अगस्त,सन् 1914 ई. – प्रथम विश्वयुद्ध प्रारम्भ।

→ 9 नवम्बर, सन् 1918 ई. – जर्मनी की पराजय एवं प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति, वाइमर गणराज्य की स्थापना।

→ 28 जून, सन् 1919 ई. – जर्मनी वर्साय की सन्धि पर हस्ताक्षर।

→ सन् 1922 ई. – नात्सी यूथ लीग का गठन।

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→ सन् 1929 ई. – अमेरिका का वॉलस्ट्रीट शेयर एक्सचेंज धराशायी।

→ 30 जनवरी, सन् 1933 ई. – हिटलर जर्मनी का चांसलर बना।

→ 28 फरवरी,सन् 1933 ई. – जर्मनी में अग्नि अध्यादेश के तहत् मुख्य नागरिक अधिकारों का अनिश्चित काल के लिए निलम्बन।

→ 3 मार्च, सन् 1933 ई. – जर्मनी में प्रसिद्ध विशेषाधिकार अधिनियम पारित।

→ सन् 1938 ई. – जर्मनी द्वारा ऑस्ट्रिया पर अधिकार।

→ 1 सितम्बर,सन् 1939 ई. – जर्मनी द्वारा पोलैण्ड पर हमला, द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारम्भ।

→ 22 जून, सन् 1941 ई. – जर्मन सेनाओं द्वारा सोवियत संघ पर हमला।

→ 23 जून, सन् 1941 ई. – बड़े पैमाने पर यहूदियों की हत्या।

→ 8 दिसम्बर, सन् 1941 ई. – संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग लेना।

→ 27 जनवरी, सन् 1945 ई. – सोवियत सेनाओं द्वारा औषावित्स को मुक्त कराना।

→ 8मई,सन् 1945 ई. – यूरोप के मित्र राष्ट्रों की विजय तथा जर्मनी का समर्पण।

→ एडोल्फ हिटलर – जर्मनी का तानाशाह शासक।

→ नात्सी – ‘नात्सियोणाल’ शब्द हिटलर की पार्टी के नाम का पहला शब्द था इसलिए इस पार्टी के लोगों को नात्सी कहा जाता था।

→ ह्यालमार शाख्त – हिटलर के शासनकाल का प्रमुख अर्थशास्त्री।

→ ग्योबल्स – हिटलर का प्रचार मंत्री जिसने हिटलर के साथ परिवार सहित आत्महत्या कर ली।

→ चार्ल्स डार्विन – एक प्रकृति विज्ञानी और डार्विनवाद का प्रणेता।

→ नाजीवाद – यह शब्द हिटलर द्वारा स्थापित दल अर्थात् नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी के नाम से प्रचलित हुआ।

→ हर्जाना – किसी गलती के बदले दण्ड के रूप में नुकसान की भरपाई करना।

→ प्रोपेगैंडा – जनमत को प्रभावित करने के लिए किया जाने वाला खास तरह का प्रचार।

→ जिप्सी – विशेष सामुदायिक पहचान वाले लोगों के समूह।

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→ सूदखोर – अत्यधिक ब्याज वसूल करने वाले महाजन। मेन काम्फ हिटलर द्वारा जेल में लिखी पुस्तक ‘मेरा संघर्ष’ (Mein Kampf)।

→ यन्त्रणा शिविर – यन्त्रणा शिविर जर्मनी में हिटलर द्वारा स्थापित किए गए थे। इनमें नात्सीवाद के विरोधियों को यातनाएँ दी जाती थीं।

→ मित्र राष्ट्र – चार देशों का समूह अर्थात् ब्रिटेन, फ्रांस, रूस तथा संयुक्त राज्य अमेरिका। जो धुरी शक्तियों अर्थात् जर्मनी, इटली तथा जापान के विरुद्ध द्वितीय विश्व युद्ध में लड़े।

→ धुरी शक्तियाँ – द्वितीय विश्वयुद्ध में तीन देशों का समूह जर्मनी, इटली एवं जापान।

→ वर्साय की संधि – प्रथम विश्वयुद्ध के बाद हस्ताक्षरित की हुई एक शक्ति सन्धि थी, जिसके अन्तर्गत जर्मनी पर अपमानजनक शर्ते थोपी गईं।

→ कंसन्देशन कैम्प – ऐसे स्थान जहाँ बिना किसी कानूनी कार्यवाही के लोगों को कैद रखा जाता था। ये कंसन्ट्रेशन कैम्प बिजली का करंट दौड़ते कँटीले तारों से घिरे रहते थे। इनका निर्माण हिटलर ने किया था।

→ अति-मुद्रास्फीति – कीमतों में बेहिसाब वृद्धि।

→ नॉर्डिक जर्मन आर्य – आर्यों की एक शाखा जो उत्तरी यूरोपीय देशों में रहते थे तथा वे जर्मन अथवा सम्बन्धित मूल के थे।

→ युंगफोक – 14 वर्ष से कम आयु के नात्सी युवकों का संगठन। राष्ट्रीय समाजवाद-नाजी लोगों द्वारा प्रतिपादित समाजवाद।

→ घेटो – यहूदियों के लिए रखा गया पृथक् क्षेत्र, जहाँ वे रह सकते थे। इसे दड़बा भी कहा जाता था।

→ ब्लॉण्ड – नीली आँखों और सुनहरे बालों वाले जर्मन आर्य।

→ वाल स्ट्रीट एक्सचेंज – संयुक्त राज्य अमेरिका में विश्व का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज।

→ सोवियत रेड आर्मी – द्वितीय विश्वयुद्ध में शक्तिशाली विशाल सोवियत सेना।

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→ खंदक – युद्ध के मोर्चे पर सैनिकों के छिपने के लिए खोदे गये गड्डे।

→ सर्वहाराकरण – श्रमजीवी वर्गों के निम्न स्तर तक गिरकर बहुत ही निर्धन हो जाना।

→ परसेक्यूट – किसी एक समूह या धर्मावलम्बियों को योजनाबद्ध तरीके से बड़ी सोची-समझी योजना के तहत् कत्लेआम करने की प्रक्रिया।

→ राइखस्टाग – जर्मन संसद।

→ होलोकास्ट – यहूदियों को मारने के लिए प्रयोग की जाने वाली नात्सियों की कत्लेआम प्रक्रिया। इसे महाध्वंस भी कहते हैं।

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JAC Class 10 Social Science Notes Economics Chapter 5 उपभोक्ता अधिकार 

JAC Board Class 10th Social Science Notes Economics Chapter 5 उपभोक्ता अधिकार

→ बाजार व उपभोक्ता

  • बाजार में हमारी भागीदारी उत्पादक एवं उपभोक्ता दोनों रूपों में होती है।
  • उपभोक्ता के रूप में हम बाजार से वस्तुओं और सेवाओं का क्रय करते हैं।
  • बाजार में उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा हेतु नियमों व विनियमों की आवश्यकता होती है।

JAC Class 10 Social Science Notes Economics Chapter 5 उपभोक्ता अधिकार

→ उपभोक्ता आन्दोलन

  • विश्व में उपभोक्ता आन्दोलन की शुरुआत उपभोक्ताओं के असंतोष के कारण हुई।
  • भारत में उपभोक्ता आन्दोलन का जन्म अनैतिक व अनुचित व्यवसाय कार्यों से उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने एवं उन्हें प्रोत्साहित करने की आवश्यकता के साथ हुआ।
  • हमारे देश में 1960 के दशक में व्यवस्थित रूप से उपभोक्ता आन्दोलन का जन्म हुआ।
  • 24 दिसम्बर, 1986 को भारत सरकार द्वारा उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986 का निर्माण किया गया। यह अधिनियम ‘COPRA’ के नाम से प्रसिद्ध है।
  • उपभोक्ताओं को वस्तुओं के बाजारीकरण तथा सेवाओं की प्राप्ति के विरुद्ध सुरक्षित रहने का अधिकार होता है क्योंकि ये जीवन एवं सम्पत्ति के लिए खतरनाक होते हैं।

→ सूचना का अधिकार अधिनियम

  • उपभोक्ता जिन वस्तुओं व सेवाओं को बाजार से खरीदता है उनके बारे में उसे सूचना पाने का अधिकार है।
  • अक्टूबर, 2005 में भारत सरकार ने देश में सूचना पाने के अधिकार को लागू किया जिसे RTI एक्ट कहा जाता है।
  • उपभोक्ताओं को अनुचित सौदेबाजी एवं शोषण के विरुद्ध क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार है।
  • भारत में उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण हेतु उपभोक्ता अदालतों का गठन किया गया है।
  • उपभोक्ता अदालतें उपभोक्ताओं का मार्गदर्शन करती हैं।
  • उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986 के तहत उपभोक्ता विवादों के निवारण हेतु जिला, राज्य एवं राष्ट्रीय स्तरों पर एक त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र की स्थापना की गयी है।
  • भारत में प्रतिवर्ष 24 दिसम्बर को राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है।
  • भारत में उपभोक्ता ज्ञान का धीरे-धीरे प्रसार हो रहा है। उपभोक्ताओं की सक्रिय भागीदारी से ही उपभोक्ता प्रभावी भूमिका का निर्वाह कर सकता है।

JAC Class 10 Social Science Notes Economics Chapter 5 उपभोक्ता अधिकार

→ प्रमुख पारिभाषिक शब्दावली

1. उपभोक्ता: किसी वस्तु या सेवा का बाजार से क्रय कर उपभोग करने वाले व्यक्ति को उपभोक्ता कहते हैं।

2. उपभोक्ता शोषण: उपभोक्ता शोषण का अर्थ उन क्रियाओं अथवा व्यवहारों से होता है जिनके माध्यम से उत्पादक या विक्रेता किसी उपभोक्ता से वस्तु या सेवा की अधिक कीमत लेता है अथवा घटिया स्तर की वस्तु देता है।

3. उपभोक्ता इंटरनेशनल: एक गैर सरकारी संस्था जो सम्पूर्ण विश्व में उपभोक्ता समूहों की एजेंसियों का प्रतिनिधित्व करता है।

4. उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986: भारत सरकार द्वारा सन् 1986 में उपभोक्ताओं के अधिकारों की सुरक्षा हेतु – निर्मित एक कानून।

5. भारतीय मानक ब्यूरो: मानक वस्तुओं के लिए आई.एस.आई. (ISI) चिह्न जारी करने वाली संस्था।

6. हॉलमार्क: जब उपभोक्ता स्वर्ण आभूषण खरीदता है तो उस पर लगा हॉलमार्क प्रमाणन चिह्न उन्हें अच्छी गुणवत्ता सुनिश्चित करने में मदद करते हैं। भारतीय मानक ब्यूरो हॉलमार्क प्रमाणन प्रदान करता है।

7. आर.टी.आई. राइट टू इनफॉर्मेशन (सूचना पाने का अधिकार)।

8. उपभोक्ता अदालतें: ये वे अदालतें हैं जिनकी स्थापना उपभोक्ता सुरक्षा कानून, 1986 के तहत राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर की गयी है ताकि उपभोक्ताओं को बेईमान उत्पादकों अथवा विक्रेताओं द्वारा की जाने वाली ठगी से बचाया जा सके और उनकी शिकायतों को सरल, तीव्र एवं कम खर्च में दूर किया जा सके।

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JAC Class 9 Social Science Solutions History Chapter 3 नात्सीवाद और हिटलर का उदय

JAC Board Class 9th Social Science Solutions History Chapter 3 नात्सीवाद और हिटलर का उदय

JAC Class 9th History नात्सीवाद और हिटलर का उदय InText Questions and Answers 

विद्यार्थियों हेतु आवश्यक निर्देश: पाठ्य-पुस्तक में इस अध्याय के विभिन्न पृष्ठों पर बॉक्स के अन्दर क्रियाकलाप दिए हुए हैं। इन क्रियाकलापों के अन्तर्गत पूछे गए प्रश्नों के क्रमानुसार उत्तर निम्न प्रकार से हैं

क्रियाकलाप (पृष्ठ संख्या-61)

प्रश्न 1.
इनसे हिटलर के साम्राज्यवादी मंसूबों के बारे में आपको क्या पता चलता है ?
उत्तर:

  1. स्रोत क और ख को पढ़ने से यह सिद्ध होता है कि हिटलर एक बहुत भयानक साम्राज्यवादी लक्ष्य को लेकर चल रहा था।
  2. वह अपने देश की सीमा को विस्तार देना चाहता था।
  3. हिटलर का मानना था कि एक विशाल तथा जागृत राष्ट्र अपनी जनसंख्या के आकार के अनुसार नये क्षेत्र के अधिग्रहण का रास्ता स्वयं ही चुन लेता है।
  4. हिटलर की इच्छा जर्मनी को एक विश्वशक्ति के रूप में स्थापित करने की थी। इसीलिए वह असन्तुष्ट था कि उसके देश का भौगोलिक क्षेत्रफल मात्र पाँच सौ वर्ग किमी. था जबकि कई दूसरे देशों का क्षेत्रफल महाद्वीपों के बराबर था।

प्रश्न 2.
आपकी राय में इन विचारों पर महात्मा गाँधी हिटलर से क्या कहते?
उत्तर;
मेरी राय में इन विचारों पर महात्मा गाँधी हिटलर को हिंसा रोकने की सलाह देते, क्योंकि उनका मानना था कि हिंसा ही हिंसा को जन्म देती है।

क्रियाकलाप (पृष्ठ संख्या-63)

प्रश्न 1.
आपके लिए नागरिकता का क्या मतलब है? अध्याय 1 एवं 3 को देखें और 200 शब्दों में बताएँ कि फ्रांसीसी क्रान्ति और नात्सीवाद ने नागरिकता को किस तरह परिभाषित किया?
उत्तर:
नागरिकता से तात्पर्य किसी व्यक्ति का अपने इच्छित देश अथवा जन्म के देश में रहने के अधिकार से है। फ्रांसीसी क्रान्ति और नात्सीवाद के नागरिकता के सम्बन्ध में विचार-फ्रांसीसी क्रान्ति तथा नात्सीवाद दोनों ने अलग-अलग तरीकों तथा दृष्टिकोणों से नागरिकता को परिभाषित करने की कोशिश की। फ्रांसीसी क्रान्ति-फ्रांसीसी क्रान्ति का आधार यह था कि सभी मानव जन्म से समान एवं स्वतन्त्र हैं तथा उनके अधिकार भी समान हैं।

स्वतन्त्रता, सम्पत्ति, सुरक्षा तथा शोषण का विरोध, ये नागरिक के प्रारम्भिक अधिकार हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने विचार व्यक्त करने तथा अपने इच्छित स्थान पर बस जाने के लिए स्वतन्त्र है। किसी भी लोकतान्त्रिक तथा समाजवादी समाज में कानून का शासन होना चाहिए, जिसके ऊपर कोई नहीं होता। नात्सीवाद-नात्सियों ने नागरिकता को प्रजातीय विभेद के दृष्टिकोण से परिभाषित किया।

यही कारण है कि उन्होंने यहूदियों को जर्मन नागरिक मानने से इंकार कर दिया। इतना ही नहीं, उनके साथ बहुत कठोर व्यवहार करते हुए उन्हें जर्मनी से बाहर निकाल दिया। कालान्तर में उन्हें जर्मनी से बाहर पोलैण्ड एवं पूर्वी यूरोप में भागकर बसना पड़ा। हिटलर के शासन काल में यहूदियों को सबसे निचले पायदान पर रखा जाता था उन पर अत्याचार अर्थदण्ड आदि के माध्यम से समाप्त करने का प्रयास किया जाता था तथा जर्मन आर्यों को श्रेष्ठ माना जाता था। यह विचार फ्रांसीसी क्रान्ति के आधारभूत विचार स्वतंत्रता एवं समानता के विपरीत थे।

JAC Class 9 Social Science Solutions History Chapter 3 नात्सीवाद और हिटलर का उदय

प्रश्न 2.
नात्सी जर्मनी में ‘अवांछितों’ के लिए न्यूरेम्बर्ग कानूनों का क्या मतलब था? उन्हें इस बात का अहसास कराने के लिए कि वह अवांछित हैं अन्य कौन-कौन से कानूनी कदम उठाए गए?
उत्तर:
न्यूरेम्बर्ग नियम के अनुसार नागरिक के रूप में रह रहे योग्यों के बीच अयोग्यों को रहने का कोई अधिकार नहीं था।

  • सन् 1935 ई. में निर्मित नागरिकता सम्बन्धी न्यूरेम्बर्ग नियम निम्नलिखित थे:
    1. केवल जर्मन अथवा उससे सम्बन्धित रक्त वाले व्यक्ति ही आगे से जर्मन नागरिक होंगे, जिन्हें जर्मन साम्राज्य की सुरक्षा प्राप्त होगी।
    2. यहूदियों तथा जर्मनों के बीच विवाह सम्बन्ध पर प्रतिबन्ध लागू किया गया।
    3. यहूदियों को राष्ट्र ध्वज फहराने से प्रतिबन्धित किया गया।
  • अन्य कानूनी कदमों में शामिल थे:
    1. यहूदी व्यवसायों का बहिष्कार।
    2. यहूदियों का सरकारी नौकरियों से निष्कासन।
    3. यहूदियों की सम्पत्ति को जब्त करना एवं उसकी बिक्री करना।

क्रियाकलाप (पृष्ठ संख्या-66)

प्रश्न 1.
अगर आप ऐसी किसी कक्षा में होते तो यहूदियों के प्रति आपका रवैया कैसा होता?
उत्तर:
अगर मैं ऐसी किसी कक्षा में बैठा होता तो, नात्सियों द्वारा यहूदियों के प्रति किये जाने वाले व्यवहार के कारण मुझे उनके प्रति सहानुभूति होती। मेरा हृदय यहूदियों के प्रति दयाभाव से भर जाता, साथ ही नात्सी सरकार के प्रति उतनी ही घृणा पैदा होती।

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प्रश्न 2.
क्या आपने कभी सोचा है कि आपके जान-पहचान वाले अन्य समुदायों के बारे में क्या सोचते हैं? उन्होंने इस तरह की छवियाँ कहाँ से हासिल की हैं?
उत्तर:
हाँ, हमने अपने चारों तरफ फैले अपनी जान-पहचान वाले अन्य समुदायों के बारे में प्रचलित रूढिबद्ध धारणाओं के बारे में सोचा है। ऐसी अधिकतर छवियाँ किसी खास समुदाय, उसके नेताओं, उनमें प्रचलित परम्पराओं एवं रीति-रिवाजों से विकसित होती हैं।

क्रियाकलाप (पृष्ठ संख्या-67)

प्रश्न 1.
चित्र 23, 24 और 27 को देखिए। कल्पना कीजिए कि आप नात्सी जर्मनी में रहने वाले यहूदी या पोलिश मूल के व्यक्ति हैं। आप सितम्बर सन् 1941 ई. में जी रहे हैं और अभी-अभी कानून बनाया गया है सामाजिक विज्ञान कक्षा-9 कि यहूदियों को डेविड का तमगा पहनकर रहना होगा। ऐसी परिस्थिति में अपने जीवन के एक दिन का ब्यौरा लिखिए।
उत्तर:
मैं बर्लिन की सड़कों एवं गलियों में भटक रहा हूँ। मुझे बहुत तेज भूख एवं प्यास लग रही है। मेरी आँखें बालकोनी में खड़ी किसी सज्जन जर्मन महिला को खोज रही हैं जो मुझे एक रोटी दे सके। परन्तु आह ! मेरी यह खोज है कि समाप्त ही नहीं हो रही। शीघ्र ही मुझे कुछ लड़कों के पीछे भागती एक भीड़ की आवाज सुनाई देती है। भीड़ में सम्मिलित लोग मुझे भी शामिल होने के लिए कह रहे थे।

सभी के शरीर पर डेविड का तमगा लगा हुआ है। जैसे ही मैंने महसूस किया कि वे भी मेरी तरह यहूदी हैं तो मैं भी उनके साथ भागने लगा किन्तु वाह रे मेरा भाग्य ! अन्त में उनके साथ मुझे भी पकड़ लिया गया तथा कंसन्ट्रेशन कैंप में डाल दिया गया। हमारे सभी कपड़े उतार लिए गए तथा हमें बेरहमी से मारा-पीटा गया। ठीक अर्धरात्रि में हमें गैस चैम्बर्स में मरने के लिए छोड़ दिया गया।

क्रियाकलाप (पृष्ठ संख्या-69)

प्रश्न 1.
अगर आप:
1. यहूदी औरत या
2. गैर-यहूदी जर्मन औरत होतीं तो हिटलर के विचारों पर किस तरह की प्रतिक्रिया देती?
उत्तर:
1. यहदी औरत: यदि मैं यहदी औरत होती तो मैं जनता के बीच जाकर हिटलर के विचारों की आलोचना करती। मैं अपने घर तक सुरक्षित रास्ता, जीविकोपार्जन के समान अवसर एवं भेदभाव रहित जीवन की माँग का समर्थन करती।

2. गैर-यहूदी जर्मन औरत: यदि मैं एक गैर-यहूदी जर्मन औरत होती तो मैं खुशी-खुशी रहती, अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने एवं समाज में प्रतिष्ठा पाने की कोशिश करती तथा हिटलर के विचारों की प्रशंसा करती।

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प्रश्न 2.
आपके विचार से इस पोस्टर (चित्र 28) में क्या दिखाने की कोशिश की जा रही है?
उत्तर:
इस पोस्टर के द्वारा यहूदी लोगों के प्रति नफरत का भाव जगाने की कोशिश की जा रही है। इस पोस्टर के अनुसार यहूदी पैसों के भूखे यानी हर तरह से पैसा कमाने वाले हैं और उस पैसे को इकट्टा करके अपनी तिजोरियों को भरना चाहते हैं।

क्रियाकलाप (पृष्ठ संख्या-70)

प्रश्न 1.
इनसे नात्सी प्रचार के बारे में हमें क्या पता चलता है? आबादी के विभिन्न हिस्सों को गोलबन्द करने के लिए नात्सी क्या प्रयास कर रहे हैं?
उत्तर:
चित्र 29-30 से हमें नात्सी प्रचार के बारे में यह पता चलता है कि नात्सी किसानों को अमेरिकी अर्थव्यवस्था और विश्व यहूदीवाद का भय दिखाकर अपने पक्ष में करना चाहते हैं। आबादी के विभिन्न हिस्सों को गोलबन्द करने के लिए नात्सी हिटलर को एक अग्रिम मोर्चे का सिपाही बता रहे हैं तथा इन वर्गों को बेहतर भविष्य का सपना दिखाकर उनका समर्थन प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं।

क्रियाकलाप ( पृष्ठ संख्या-71)

प्रश्न 1.
एर्ना क्रॉत्स ने ये क्यों कहा-‘कम से कम मुझे तो यही लगता था’ ? आप उनकी राय को किस तरह देखते हैं?
उत्तर:
एर्ना क्रॉत्स, लॉरेंस रीस को सन् 1930 ई. के दशक के अपने व्यक्तिगत अनुभवों के बारे में बता रही थीं। उनके अनुसार अब लोगों को उम्मीद नजर आ रही है। लोगों का वेतन बढ़ा है। जर्मनी का पुन: नये सिरे से विकास होगा। अब अच्छा दौर प्रारम्भ होने वाला है।

क्रियाकलाप (पृष्ठ संख्या-74)

प्रश्न 1.
एक पन्ने में जर्मनी का इतिहास लिखें:
1. नात्सी जर्मनी के एक स्कूली बच्चे की नजर से।
2. यातना गृह से जिन्दा बच निकले एक यहूदी की नजर से।
3. नात्सी शासन के राजनीतिक विरोधी की नजर से।
उत्तर:
1. जर्मनी का इतिहास (नात्सी जर्मनी के एक स्कूली बच्चे की नजर से):
नात्सी जर्मनी की परिस्थितियाँ विशेषकर स्कूली बच्चों के लिए बहुत ही कष्टप्रद थीं। स्कूली बच्चों को तीन वर्ष की अवस्था से ही नात्सी विचारधाराओं की शिक्षा की शुरुआत कर दी जाती थी। उन्हें उस आयु में एक छोटा-सा झंडा लहराना पड़ता था जबकि उसके बारे में उनकी कोई सोच भी विकसित नहीं हुई होती थी।

10 वर्ष का होने पर बच्चों को नात्सी युवा संगठन ‘युंगफोक’ में दाखिल करा दिया जाता था। उसके बाद 14 वर्ष की उम्र में सभी बच्चों को नात्सियों के युवा संगठन हिटलर यूथ की सदस्यता तथा 18 वर्ष की उम्र में श्रम सेना में सम्मिलित होना पड़ता था। इसके बाद उन्हें सेना में काम करना पड़ता था और किसी नात्सी संगठन की सहायता लेनी पड़ती थी। इस तरह उनकी पूरी जिन्दगी ही थोपे गये विकृत विचारों के अनुसार गुजरती थी।

स्कूली बच्चों को उनके यहूदी मित्रों से अलग कर एक निश्चित दूरी पर बिठाया जाता था। उन्हें ऐसी पुस्तकें पढ़ाई जाती थीं जो नात्सी विचारों के प्रसार के लिए तैयार की गई थीं। नात्सियों ने खेल को भी अपनी विचारधारा से दूर नहीं रखा। उस पर भी अपने विचार थोपे। बच्चों को खेल के रूप में मुक्केबाजी का चुनाव करने के लिए बाध्य किया जाता था।

2. जaर्मनी का इतिहास (यातना गृह से जिन्दा बध निकले एक यहूदी की नजर से):
जर्मनी नात्सियों को यहूदियों पर किये गये अत्याचार के लिए सदैव याद किया जाएगा। यह जर्मन इतिहास का एक काला अध्याय है। समस्त यूरोप के यहूदी मकानों, यातना गृह और घेटो बस्तियों के रहने वाले यहूदियों को मालगाड़ियों में भर-भरकर मौत के कारखानों ‘कंसन्ट्रेशन कैम्पों (यातना गृहों)’ में डाल दिया जाता था जहाँ उन्हें घोर यातनाएँ दी जाती थीं।

आज भी मुझे वहाँ के दृश्यों को याद कर डर लगने लगता है। वहाँ मैं जिन्दा रहते हुए भी सैकड़ों बार मरा हूँ। बहुत दिनों तक विभिन्न तरह के अत्याचार के बाद यहदियों को गैस चैम्बर्स में मरने के लिए छोड़ दिया जाता था। कंसन्ट्रेशन कैम्प से बाहर के यहूदियों की स्थिति भी दयनीय थी। उन्हें समाज में घोर अपमान सहना पड़ता था। अपनी पहचान प्रदर्शित करने के लिए उन्हें डेविड का पीला सितारा युक्त वस्त्र पहनने पड़ते थे एवं उनके घरों पर विशेष चिह्न छाप दिया जाता था।

किसी भी तरह के सन्देह की स्थिति अथवा कानून के मामली उल्लंघन पर उन्हें कसन्ट्रेशन कैम्प भेज दिया जाता था, जहाँ अत्याचार का एक नया दौर शुरू होता था जिसकी अन्तिम परिणति मौत के रूप में होती थी। हमारी आँखों के सामने हजारों-लाखों यहदियों को गैस चैम्बरों में दम घोट कर मारा गया।

3. जर्मनी का इतिहास (नात्सी शासन के राजनीतिक विरोधी की नजर से):
जर्मनी में नात्सी शासन प्रचार के खोखले एवं कमजोर पैरों पर टिका हुआ था। युद्ध द्वारा नये क्षेत्रों के हड़पने की नीति से कुछ भी प्राप्त होने वाला नहीं था। यह कभी भी देश में एक लम्बी शान्ति तथा समृद्धि का दौर नहीं ला सकती थी। हालांकि, मैं राष्ट्रवाद जैसे विचारों का समर्थक है, किन्तु नात्सी लोग इसका जो अर्थ लगाते थे तथा जिन साधनों तथा नीतियों के उपयोग द्वारा अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते थे, उससे बिल्कुल भी सहमत नहीं हुआ जा सकता है।

जर्मन राष्ट्रवाद की प्राप्ति के लिए, पहले से अल्प धन की मात्रा को सेना या सैन्य उपकरणों पर खर्च करना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं था। महिलाओं तथा बच्चों के प्रति नात्सियों की नीति पूर्णतः असंगत थी। जर्मन बच्चों को उनके नैसर्गिक व्यक्तित्व के विकास से दूर हटाकर उन पर नात्सी विचारधारा को थोपना और नात्सी विचारों को सही ठहराने के लिए नस्ल विज्ञान के नाम से एक नया विषय पाठ्यक्रम में चलाना।

यहूदियों से नफरत करना एवं हिटलर की पूजा करना उनके साथ घोर अन्याय था। महिलाओं पर अव्यावहारिक आचार संहिताओं का थोपा जाना उनकी स्वतन्त्रता को खत्म करने जैसा था। एक प्रकार से नात्सी लोगों ने असभ्यता के सभी लक्षणों के प्रचार द्वारा जर्मन जनता को भ्रष्ट करने का असफल प्रयास किया जिसके लिए इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।

JAC Class 9 Social Science Solutions History Chapter 3 नात्सीवाद और हिटलर का उदय

प्रश्न 2.
कल्पना कीजिए कि आप हेलमुट हैं। स्कूल में आपके बहुत सारे यहूदी दोस्त हैं। आपका मानना है कि यहूदी खराब नहीं होते। ऐसे में आप अपने पिता से क्या कहेंगे? इस बारे में एक पैराग्राफ लिखें।
उत्तर:
प्रिय पिताजी, मेरे कई यहूदी दोस्त हैं। हमारे विद्यालय में यहूदियों से नफरत करना सिखाया जा रहा है। नात्सियों द्वारा यहूदी बच्चों को विद्यालय से निकाला जा रहा है तथा उन्हें गैस चैम्बरों में मरने के लिए ले जाया जा रहा है। आखिर यहूदियों ने कौन-सा ऐसा पाप किया है जिसके लिए निर्दयतापूर्वक उनकी हत्या की जा रही है? यदि हममें से कोई हत्यारा है तथा नात्सी शासन का समर्थक है तो उनको लेकर मैं लज्जित हूँ।

वे ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्यों यहूदियों को गैर-कानूनी रूप से मारा जा रहा है? क्या वे हमारी तरह इंसान नहीं हैं? क्या उनमें वही सारी भावनाएँ नहीं हैं जो हममें हैं? आप कल्पना कर सकते हैं कि यदि मुझे कोई गैस चैम्बर्स में मरने के लिए छोड़ दे तो आप पर क्या गुजरेगी? उनकी सिर्फ यही गलती है कि वे यहूदी हैं, तो क्या यहूदी होना गुनाह है? यदि हाँ, तो जो ईसाई कर रहे हैं उस गुनाह की क्या सजा होनी चाहिए। नात्सियों के द्वारा किया जा रहा यह अत्याचार प्रभु ईसा मसीह कभी भी माफ नहीं करेंगे।

JAC Class 9th History और हिटलर का उदय Textbook Questions and Answers 

प्रश्न 1.
वाइमर गणराज्य के सामने क्या समस्याएँ थीं?
उत्तर:
वाइमर गणराज्य के सामने निम्नलिखित समस्याएँ थीं

  1. प्रथम विश्वयुद्ध में पराजय के पश्चात् जर्मनी पर विजयी देशों ने बहुत कठोर शर्ते थोप दी थीं।
  2. इसे वर्साय की अपमानजनक सन्धि पर हस्ताक्षर करने पड़े।
  3. इसे मित्र राष्ट्रों को युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में भारी धन-राशि देनी पड़ी।
  4. देश में मुद्रास्फीति के कारण कीमतों में अत्यधिक वृद्धि हो चुकी थी। वाइमर सरकार मूल्य-वृद्धि को रोकने में पूर्णत: असफल रही।
  5. देश में बेरोजगारी बढ़ गई थी तथा उद्योग एवं व्यापार पिछड़ गए थे।
  6. मित्र-राष्ट्रों ने जर्मनी को कमजोर करने के लिए उसकी सेना को भंग कर दिया।
  7. युद्ध अपराध न्यायाधिकरण ने जर्मनी को युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराने के साथ-साथ मित्र-राष्ट्रों को हुए नुकसान के लिए भी उत्तरदायी ठहराया।
  8. वाइमर गणराज्य की स्थापना के साथ ही स्पार्टकिस्ट लीग अपनी क्रांतिकारी विद्रोह की योजनाओं को अंजाम देने लगी।

प्रश्न 2.
इस बारे में चर्चा कीजिए कि सन् 1930 ई. तक आते-आते जर्मनी में नात्सीवाद को लोकप्रियता क्यों मिलने लगी?
उत्तर:
प्रथम विश्वयुद्ध के उपरान्त पराजित होने पर विजयी देशों ने बहुत कठोर शर्ते थोप दी थीं । जर्मनी के लिए वर्साय की सन्धि बड़ी अपमानजनक थी। इसकी कठोरता के कारण जर्मनी में नात्सीवाद का उत्थान हुआ। इसके नेता हिटलर ने वर्साय संधि-पत्र की अपमानजनक शर्तों की धीरे-धीरे अवहेलना करनी प्रारम्भ कर दी। वह उपनिवेशवाद, सैन्यवाद एवं विस्तारवाद में विश्वास करता था। जर्मनी में निम्न कारकों ने नात्सीवाद की लोकप्रियता बढ़ाने में योगदान दिया

1. जर्मनी में राजनीतिक अस्थिरता:
हिटलर के उत्थान से पूर्व जर्मनी पर वाइमर गणराज्य का शासन था। इसके शासनकाल में देश में बेरोजगारी एवं कीमतों में अत्यधिक वृद्धि हुई, इससे सेना में भी असन्तोष फैल गया। हिटलर ने ऐसी स्थिति का पूरा-पूरा लाभ उठाया। उसने जर्मनी की जनता को विश्वास दिलाया कि वह राष्ट्र का खोया हुआ सम्मान पुनः वापस लाएगा। जर्मनी की सभी समस्याओं का समाधान करके वह उसे विश्व की नई महाशक्ति बनाएगा।

2. जर्मन जनता का प्रजातन्त्र में अविश्वास:
जर्मनी के लोगों का स्वभाव से ही प्रजातन्त्र में विश्वास नहीं था। प्रजातन्त्र उनकी सभ्यता एवं परम्पराओं के विरुद्ध था। वे पार्लियामेंट्री संस्थाओं एवं उसके क्रिया-कलापों को समझने में असमर्थ थे। अत: जर्मनी में वाइमर संविधान बड़े प्रतिकूल वातावरण में लागू हुआ, जिसका सफल होना भी सम्भव नहीं था। अत: वहाँ के लोगों की मनोवृत्ति नात्सी दल के विकास और हिटलर के अधिनायक बनने में सहायक सिद्ध हुई।

3. आर्थिक संकट:
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी को गहरे आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। इस युद्ध में जर्मनी को अपार जन एवं धन की हानि उठानी पड़ी। इसके शहर एवं कस्बे, व्यापार एवं वाणिज्य, कारखानों एवं उद्योगों को पूर्णतया नष्ट कर दिया गया था। सन् 1929 ई. की आर्थिक मन्दी ने जर्मनी की आर्थिक स्थिति पर और भी बुरा प्रभाव डाला। जर्मनी की गणतन्त्रीय सरकार देश की आर्थिक समस्याओं का समाधान करने में पूर्ण रूप से असफल रही।

4. नात्सियों ने यहूदियों के प्रति घृणा:
भावना का प्रचार स्कूल के छोटे-छोटे बच्चों से ही करना प्रारम्भ कर दिया। पाठ्यक्रम परिवर्तित कर दिया गया। स्कूलों से यहूदी शिक्षकों को निकाल दिया गया अत: जर्मनी की नई पीढ़ी में यहूदियों के प्रति घृणा एवं द्वेष के भाव पहले से ही भर दिए गए।

JAC Class 9 Social Science Solutions History Chapter 3 नात्सीवाद और हिटलर का उदय

प्रश्न 5.
नात्सी समाज में औरतों की क्या भूमिका थी? फ्रांसीसी क्रान्ति के बारे में जानने के लिए अध्याय 1 देखें। फ्रांसीसी क्रान्ति और नात्सी शासन में औरतों की भूमिका के बीच क्या फर्क था? एक पैराग्राफ में बताएँ।
उत्तर:
नात्सी समाज में औरतों की भूमिका-नात्सी समाज में महिलाओं को बड़े सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। उन्हें आर्य संस्कृति का संवाहक माना जाता था। दुनिया के सभी प्रजातान्त्रिक देशों में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त थे, लेकिन नात्सी जर्मनी में महिला का महत्व सिर्फ “आर्य सन्तान की माँ” के रूप में था।

महिलाओं को आर्य नस्ल की शुद्धता को बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था और दबाव बनाया जाता था कि वह यहूदी पुरुष के साथ किसी प्रकार का प्रेम सम्बन्ध स्थापित न करे। अनेक सन्तानों को जन्म देने वाली माँ को विशेष पुरस्कार दिया जाता था। निर्धारित आचार संहिता का उल्लंघन करने वाली ‘आर्य’ औरतों की सार्वजनिक रूप से निन्दा की जाती थी और उन्हें कठोर दण्ड दिया जाता था।

फ्रांसीसी क्रान्ति और नात्सी शासन में औरतों की भूमिका के बीच तुलना:
1. नात्सी समाज में औरतों को पुरुषों के समान दर्जा नहीं दिया जाता था, जबकि फ्रांसीसी समाज में स्त्री-पुरुष को समान समझा जाता था। महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त थे।

2. नात्सी समाज में महिलाएँ स्वतन्त्र नहीं थीं उनका काम केवल घर-परिवार की देखभाल और बच्चों को जन्म देना था। इसके विपरीत फ्रांसीसी समाज में महिलाओं को बराबर का साझीदार माना जाता सकती थीं।

3. नात्सी महिलाओं को अपनी मर्जी से विवाह करने का अधिकार नहीं था। महिलाओं के लिए निर्धारित आचार संहिता का उल्लंघन करने वाली महिलाओं को सार्वजनिक रूप से दंडित किया जाता था। उन्हें न केवल जेल की सजा दी जाती थी अपितु अनेक तरह के नागरिक सम्मान एवं उनके पति एवं परिवार भी छीन लिए जाते थे। इसके विपरीत फ्रांसीसी महिलाएं अपनी मर्जी से शादी करने के लिए स्वतन्त्र थीं। महिलाओं को तलाक लेने का अधिकार प्रदान किया गया। महिलाएँ व्यावसायिक प्रशिक्षण ले सकती थीं।

प्रश्न 6.
नासियों ने जनता पर पूरा नियन्त्रण हासिल करने के लिए कौन-कौन से तरीके अपनाए?
उत्तर:
नात्सी सरकार ने जनता पर सम्पूर्ण नियन्त्रण स्थापित करने के लिए निम्नलिखित तरीके अपनाए
1. स्कूली बच्चों का विचार परिवर्तन:
नात्सी सरकार ने अपनी विचारधारा पर आधारित नए पाठ्यक्रम के अनुरूप पुस्तके तैयार करवाई। नस्ल विज्ञान को पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया। उनसे कहा जाता था कि वे यहूदियों से पूणा करें तथा हिटलर की पूजा करें।

2. पुवाओं का विचार परिवर्तन:
बाल्यावस्था से ही नात्सी सरकार ने बच्चों के मन-मस्तिष्क पर कब्जा कर लिया। जैसे-जैसे वे बड़े होते गये उन्हें वैचारिक प्रशिक्षण द्वारा नात्सीवाद की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया गया।

3. लड़कियों का विधार परिवर्तन:
लड़कियों को शिक्षा दी जाती थी कि उन्हें अच्छी माँ बनना था तथा शुद्ध आर्य रक्त वाले बच्चों को जन्म देकर उनका लालन-पालन करना था।

4. खेल गतिविधियाँ:
उन सभी खेल गतिविधियों विशेषकर मुक्केबाजी को प्रोत्साहित किया गया जो बच्चों में हिंसा तथा आक्रामकता की भावना उत्पन्न करती थीं।

5. आर्यों के आर्थिक हितों की रक्षा:
आर्य प्रजाति के लोगों के लिए आर्थिक अवसरों की पर्याप्त उपलब्धता थी। उन्हें रोजगार दिया जाता था, उनके व्यापार को सुरक्षा दी जाती थी तथा सरकार की तरफ से उन्हें हर सम्भव सहायता दी जाती थी।

6. महिलाओं के बीच भेदभाव:
महिलाओं के बीच उनके बच्चों के आधार पर भेदभाव किया जाता था। एक अनुपयुक्त बच्चे की माँ होने पर महिलाओं को दण्डित किया जाता था तथा जेल में कैद कर दिया जाता था, किन्तु बच्चे के शुद्ध आर्य प्रजाति का होने पर महिलाओं को सम्मानित किया जाता था।

7. नात्सी विचारधारा का प्रचार:
जनता पर पूर्ण नियन्त्रण स्थापित करने में नात्सियों द्वारा विशेष पूर्व नियोजित प्रचार का सर्वाधिक योगदान था। नाजियों ने शासन के लिए समर्थन पाने तथा अपनी विचारधारा को लोकप्रिय बनाने के लिए दृश्य चित्रों, फिल्मों, रेडियो, पोस्टरों, नारों तथा इश्तहारी पर्चों द्वारा प्रचार किया। पोस्टरों में समाजवादियों एवं

8. नात्सियों:
ने जनसंख्या के विभिन्न हिस्से को अपील करने का हर संभव प्रयास किया। उन्होंने इस आधार पर उनका समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया कि केवल नात्सी ही उनकी हर समस्या का हल ढूँढ़ सकते थे।

JAC Class 9 Social Science Solutions

JAC Class 10 Social Science Notes Economics Chapter 4 वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

JAC Board Class 10th Social Science Notes Economics Chapter 4 वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

→ अन्तरदेशीय उत्पादन

  • पिछले कुछ वर्षों से भारतीय बाजार पूर्णतः परिवर्तित हो गया है। अब हमारे उपभोक्ताओं के समक्ष वस्तुओं एवं सेवाओं के विस्तृत विकल्प उपलब्ध हैं।
  • बीसवीं शताब्दी के मध्य तक उत्पादन मुख्य रूप से देश की सीमाओं के भीतर तक ही सीमित था।
  • भारत जैसे उपनिवेशों से कच्चे माल का विदेशों को निर्यात होता था तथा तैयार माल का आयात होता था।

→  बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ

  • बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के उद्भव के पश्चात् व्यापार विश्व स्तर पर होने लगा।
  • सामान्यतः बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ उन्हीं स्थानों पर अपने कारखाने स्थापित करती हैं जहाँ उन्हें विभिन्न सुविधाएँ प्राप्त होती हैं, जैसे- बाजार की समीपता, सस्ते श्रम की उपलब्धता आदि।
  • बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा वस्तुओं तथा सेवाओं का विश्व स्तर पर उत्पादन करने के परिणामस्वरूप उत्पादन प्रक्रिया क्रमशः जटिल ढंग से संगठित हुई है।
  • बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा कोई भी निवेश लाभ अर्जित करने की दृष्टि से ही किया जाता है।
  • सामान्यत: बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ विश्व के विभिन्न देशों में स्थानीय कम्पनियों को खरीदकर उत्पादन का प्रसार करती हैं।
  • अमेरिकी कम्पनी फोर्ड मोटर्स विश्व के 26 देशों में प्रसार के साथ विश्व की सबसे बड़ी मोटरगाड़ी निर्माता कम्पनी है। सन् 1995 में भारत आने वाली फोर्ड मोटर्स ने 1700 करोड़ रुपए का निवेश चेन्नई के समीप एक विशाल संयंत्र की स्थापना की। यह संयंत्र महिन्द्रा एण्ड महिन्द्रा (भारत में जीपों व ट्रकों की प्रमुख निर्माता कम्पनी) के सहयोग से  पित
    किया।

JAC Class 10 Social Science Notes Economics Chapter 4 वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

→  विदेशी व्यापार

  • बहुत लम्बे समय से विदेश व्यापार विभिन्न देशों को आपस में जोड़ने या एकीकरण करने का एक माध्यम रहा है।
  • विदेश व्यापार अपने देश के बाजारों से बाहर के बाजारों में पहुँचने के लिए उत्पादकों को एक अवसर प्रदान करता है।
  • विदेश व्यापार विभिन्न देशों के बाजार को जोड़ने या एकीकरण करने में एक सहायक का कार्य करता है।
  • अधिकांश बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के क्रियाकलापों में वस्तुओं एवं सेवाओं का वृहत स्तर पर व्यापार सम्मिलित होता है।

→  वैश्वीकरण

  • विभिन्न देशों के मध्य परस्पर सम्बन्ध तथा तीव्र एकीकरण की प्रक्रिया को ही वैश्वीकरण कहा जाता है।
  • आज विश्व के विभिन्न देशों के मध्य अधिक से अधिक वस्तुओं और सेवाओं, निवेश एवं प्रौद्योगिकी का आदान-प्रदान हो रहा है। लोगों का आवागमन भी विभिन्न देशों को आपस में जोड़ने का एक माध्यम है।
  • वैश्वीकरण की प्रक्रिया को उत्प्रेरित करने वाला मुख्य कारक प्रौद्योगिकी में तीव्र उन्नति है। इससे लम्बी दूरियों तक वस्तुओं की तीव्रतर आपूर्ति कम लागत पर सम्भव हुई है।
  • सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के विकास से भी विश्व स्तर पर व्यापार में वृद्धि हुई है।

JAC Class 10 Social Science Notes Economics Chapter 4 वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

→  विदेशी व्यापार व विदेशी निवेश का उदारीकरण

  • आयात पर कर, व्यापार अवरोधक का एक उदाहरण हैं क्योंकि यह कुछ प्रतिबन्ध लगाता है।
  • भारत सरकार द्वारा सन् 1991 से विदेश व्यापार व विदेशी निवेश पर से अधिकांश अवरोधों को हटा दिया गया है।
  • सरकार द्वारा अवरोधों या प्रतिबन्धों को हटाने की प्रक्रिया को उदारीकरण कहा जाता है।
  • विश्व व्यापार संगठन एक ऐसा संगठन है जिसका मुख्य उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के तौर-तरीकों को सरल बनाना है। यह अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से सम्बन्धित नियमों को निर्धारित करता है।
  • भारत सरकार व राज्य सरकारें विदेशी निवेश को आकर्षित करने हेतु अनेक कदम उठा रही हैं।
  • वैश्वीकरण से सभी उपभोक्ता, कुशल, शिक्षित एवं धंनी उत्पादक ही लाभान्वित हुए हैं परन्तु बढ़ती हुई प्रतियोगिता से अनेक छोटे उत्पादक एवं श्रमिक प्रभावित हुए हैं।
  • वैश्वीकरण के कारण टाटा मोटर्स, इंफोसिस (आईटी), रैनबैक्सी (दवाइयाँ), एशियन पेंट्स (पेंट) तथा सुंदरम फास्नर्स (नट व बोल्ट) जैसी कुछ भारतीय कम्पनियाँ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के रूप में उभरी हैं।
  • न्यायसंगत वैश्वीकरण सभी के लिए अवसरों का सृजन करेगा एवं यह भी सुनिश्चित करेगा कि वैश्वीकरण के लाभों में सभी की बेहतर हिस्सेदारी हो।

JAC Class 10 Social Science Notes Economics Chapter 4 वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

→  प्रमुख पारिभाषिक शब्दावली
1. बहुराष्ट्रीय कम्पनी: वह कम्पनी जो एक से अधिक देशों में उत्पादन पर नियन्त्रण अथवा स्वामित्व रखती है।

2. निवेश: परिसम्पतियों, जैसे-भूमि, भवन, मशीन व अन्य उपकरणों की खरीद में व्यय की गई मुद्रा को निवेश कहते हैं।

3. विदेशी निवेश: बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा किया गया निवेश विदेशी निवेश कहलाता है।

4. विदेशी व्यापार: दो या दो से अधिक देशों के मध्य वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान विदेशी व्यापार कहलाता है।

5. वैश्वीकरण: अपनी अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ना वैश्वीकरण कहलाता है।

6. व्यापार: अवरोधक विदेशों से होने वाले आयात पर लगने वाले प्रतिबन्ध।

7. उदारीकरण: सरकार द्वारा अवरोधों अथवा प्रतिबन्धों को हटाने की प्रक्रिया।

8. कोटा: सरकार द्वारा आयात की जाने वाली वस्तुओं की संख्या को सीमित करना ‘कोटा’ कहलाता है।

9. विश्व व्यापार संगठन: अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से सम्बन्धित नियमों को निर्धारित करने वाला अन्तर्राष्ट्रीय संगठन।

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JAC Class 9th Social Science Notes History Chapter 2 यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति 

JAC Board Class 9th Social Science Notes History Chapter 2 यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति

→ फ्रांस की क्रान्ति के पश्चात् यूरोप एवं एशिया सहित विश्व के बहुत से भागों में एक विशेष प्रकार की सामाजिक एवं राजनीतिक क्रान्ति आयी।

→ उन्नीसवीं शताब्दी में समाज में परिवर्तन के विषय में लोग विभिन्न विचारधाराओं-उदारवादी (लिबरल), क्रान्तिकारी (रैडिकल) तथा रूढ़िवादी (कंजरवेटिव) श्रेणियों में बँटे हुए थे। उदारवादी विचारक धार्मिक एवं आर्थिक मामलों में राज्य के हस्तक्षेप के विरुद्ध थे। वे जीवन के अधिकार, नागरिक व धार्मिक स्वतन्त्रता, सम्पत्ति की सुरक्षा एवं कोई भी व्यापार या व्यवसाय करने की स्वतन्त्रता के अधिकार पर बल देते थे। ये केवल सम्पत्तिधारी वयस्क मताधिकार के पक्ष में थे।

→ क्रान्तिकारी विचारक राजनीति में अधिक से अधिक व्यक्तियों की भागीदारी के पक्ष में थे। ये बड़े जमींदारों एवं उद्योगपतियों को प्राप्त विशेषाधिकारों के विरोधी तथा सभी वयस्कों के मताधिकार के पक्षधर थे।

→ रूढ़िवादी विचारक रैडिकल और उदारवादी दोनों के खिलाफ थे। वे चाहते थे कि आवश्यकतानुसार तथा धीमी गति से बदलाव आये।

→ सन् 1760 ई. के आस-पास यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति हुई। परिवहन के नये साधन विशेषकर रेल परिवहन का विकास हुआ। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप शहर तेजी से बसते और फैलते जा रहे थे जिससे आवास और साफ-सफाई के कार्यों में मुश्किल हो रही थी।

→ समाजवादी निजी सम्पत्ति के विरोधी थे। तत्कालीन विचारक कार्ल मार्क्स का मानना था कि पूँजीपतियों का मुनाफा मजदूरों की मेहनत से पैदा होता है अत: जब तक सम्पत्तियों पर सामाजिक नियन्त्रण एवं स्वामित्व नहीं होगा तब तक मजदूरों की स्थिति में सुधार नहीं हो सकता है। 9 जनवरी, सन् 1905 ई. को रूस में प्रथम क्रान्ति हुई जिसे ‘खूनी रविवार’ के रूप में याद किया जाता है।

→ सन् 1914 ई. में प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ हुआ जिसमें एक तरफ थे जर्मनी, ऑस्ट्रिया, बल्गारिया व तुर्की तथा दूसरी तरफ-फ्रांस, ब्रिटेन व रूस। 16 अक्टूबर 1917 को लेनिन ने पेत्रोग्राद सोवियत और बोल्शेविक पार्टी को सत्ता पर कब्जा करने के लिए राजी कर लिया।

→ जब बोल्शेविकों ने जमीन के पुनर्वितरण के आदेश दिये तो गृह युद्ध की स्थिति पैदा हो गयी, लेकिन उन्होंने उद्योगों और बैंकों के राष्ट्रीयकरण को जारी रखा।

→ लेनिन के बाद स्तालिन ने पार्टी की कमान सम्हाली तथा खेती के सामूहिकीकरण पर बल दिया, जिसका काफी विरोध हुआ।

→ बीसवीं सदी के अन्त तक एक समाजवादी देश के रूप में सोवियत संघ की प्रतिष्ठा काफी कम हो गयी थी।

अध्याय की महत्वपूर्ण तिथियाँ एवं सम्बन्धित घटनाएँ

→ सन् 1850-1880 ई. — तीस वर्षों का कालखण्ड जिसमें रूस में समाजवाद पर बहस जारी रही।

→ सन् 1898 ई. — रशियन सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी का गठन किया गया।

→ सन् 1900 ई. — सोशलिस्ट रेवलूशनरी पार्टी का गठन किया गया।

→ सन् 1905 ई. — रूसी क्रान्ति एवं खूनी रविवार की घटना तथा जार द्वारा ड्यूमा के गठन की सहमति।

→ सन् 1914 ई. — प्रथम विश्व युद्ध का आरम्भ। सन् 1916 ई. रोटी की दुकानों पर दंगे होने लगे।

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→ सन् 1917 ई. — 2 मार्च को रूस के जार को सत्ता से हटना पड़ा तथा 24 अक्टूबर को पैत्रोग्राद में बोल्शेविक क्रान्ति हुई। जिसमें रूस की सत्ता पर समाजवादियों का कब्जा हो गया।

→ सन् 1918-1920 ई. — रूस में गृहयुद्ध जारी रहा।

→ सन् 1919 ई. — कॉमिन्टर्न का गठन।

→ सन् 1927-1932 ई. — रूस में प्रथम पंचवर्षीय योजना।

→ सन् 1929 ई. — रूस में सामूहिकीकरण की शुरुआत।

→ सन् 1930-1933 ई. — सोवियत रूस के इतिहास का सबसे बड़ा अकाल, 40 लाख से अधिक लोग मारे गये।

→ सन् 1933-1938 ई. — रूस की द्वितीय पंचवर्षीय योजना की समयावधि।

→ जार निकोलस द्वितीयरूसी — क्रान्ति जार निकोलस द्वितीय के शासनकाल में हुई।

→ कार्ल मार्क्स — समाजवादी दार्शनिक एवं विचारक।

→ फ्रेडरिक एंगेल्स — समाजवादी दार्शनिक एवं विचारक।

→ केरेंस्की — अक्टूबर सन् 1917 ई. की क्रान्ति के समय रूस के प्रधानमंत्री।

→ जदीदी — रूसी साम्राज्य में सक्रिय मुस्लिम सुधारवादी।

→ मेजिनी — इटली का राष्ट्रवादी नेता।

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→ मार्फा वासीलेवा — मार्फा वासीलेवा नामक महिला ने अकेले ही एक सफल हड़ताल की।

→ लुई ब्लां — फ्रांसीसी समाजवादी विचारक।

→ लेनिन — रूस का एक क्रान्तिकारी नेता। उसने रूस की बोल्शेविक क्रान्ति का नेतृत्व किया।

→ स्टालिन — लेनिन के बाद पार्टी का नेतृत्व, कृषि के सामूहिकीकरण का फैसला एवं श्रम शिविरों की स्थापना।

→ रॉबर्ट ओवन — अंग्रेज समाजवादी विचारक एवं उद्योगपति।

→ अतिवादी — ये निजी सम्पत्ति के केन्द्रीकरण के विरोधी थे।

→ रूढ़िवादी — ये समाज की व्यवस्था में धीरे-धीरे परिवर्तन लाने के पक्षधर थे। उनका विश्वास था कि अतीत का सम्मान होना चाहिए।

→ इयमा — ड्यूमा रूस की राष्ट्रीय सभा अथवा संसद थी। इसका गठन सन् 1905 ई. में प्रथम बार हुआ। रूस के जार निकोलस द्वितीय ने इसे मात्र एक सलाहकार समिति में बदल दिया था।

→ उदारवादी — उदारवादी यूरोप के समाज के वे लोग थे जो वंशानुगत शासकों की निरंकुश शक्तियों के विरुद्ध थे। उदारवादी एक ऐसे राष्ट्र की स्थापना करना चाहते थे जिसमें सभी धर्मों को बराबर का सम्मान एवं स्थान मिले।

→ रूसी आर्थोडॉक्स चर्च — ईसाई धर्म की एक शाखा जो रूसी साम्राज्य का प्रमुख धर्म था। कोलखोज-रूस में सामूहिक खेतों को ‘कोलखोज’ कहा जाता था।

→  रूसी साम्यवादी दल — सन् 1917 ई. में रूस की क्रान्ति के पश्चात् बोल्शेविक पार्टी को ‘रूसी कम्युनिस्ट पार्टी’ (बोल्शेविक) का नाम दिया गया।

→ घुमन्तु — ऐसे लोग जो अपनी आजीविका के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते थे। इन्हें ‘खानाबदोश’ भी कहा जाता है।

→ सुफ्फरेगेट — महिलाओं को मताधिकार दिए जाने के लिए चलाया गया आन्दोलन। कुलक-रूस में सम्पन्न किसानों को ‘कुलक’ कहा जाता था।

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→ चेका — चेका एक ‘कमीशन’ था जिसका कार्य रूसी साम्यवादी पार्टी के विरोधियों को दण्ड देना था।

→ तालाबन्दी — कारखाने को स्थायी रूप से बन्द करने के लिए कारखाना मालिकों द्वारा फाटक पर ताला लगा देना।

→ कॉमिन्टन — कम्युनिस्ट पार्टियों की अन्तर्राष्ट्रीय संस्था।

→ खूनी रविवार — 9 जनवरी, सन् 1905 ई. को पुलिस ने मजदूरों के एक समूह पर गोलियाँ चलायीं, जिसमें सौ से अधिक मजदूर मारे गए। इस दिन को खूनी रविवार कहा जाता है।

→ अप्रैल थीसिस — बोल्शेविक नेता लेनिन की सन् 1917 ई. की रूसी क्रान्ति से पूर्व तीन माँगें- शक्ति, भूमि को किसानों को स्थानान्तरित करना एवं बैंकों का राष्ट्रीयकरण ‘अप्रैल थीसिस’ के नाम से जानी गई।

→ रूसी स्टीम रोलर — शाही रूसी सेना को ‘रूसी स्टीम रोलर’ कहा जाता था।

→ ऑरोरा — यह एक रूसी युद्धपोत था।

→ ओजीपीयू व एनकेवीडी — गुप्तचर पुलिस जो बोल्शेविकों की आलोचना करने वालों को दण्डित करती थी।

→ सोवियत — रूस के स्थानीय स्वशासी संगठन।

→ मताधिकार आन्दोलन — वोट डालने का अधिकार पाने के लिए किया गया आन्दोलन।

JAC Class 9th Social Science Notes History Chapter 2 यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति 

→ निरंकुश राजशाही — राजा द्वारा बिना रोकटोक के शासन करना!

→ स्वायत्तता — अपना शासन स्वयं चलाने का अधिकार।

→ कार्यस्थितियाँ — काम करने की परिस्थितियाँ।

→ प्रतिक्रांतिकारी — क्रांति का विरोध करने वाले।

→ फरवरी क्रान्ति — रूस की यह क्रान्ति पुराने रूसी कैलेंडर के अनुसार 27, फरवरी सन् 1917 ई. को हुई थी। अत: इसे फरवरी क्रान्ति के नाम से पुकारा जाता है। जार ने राजगद्दी छोड़ दी तथा अन्तरिम सरकार की स्थापना हुई।

→ अक्टूबर क्रान्ति — पुराने रूसी कैलेंडर के अनुसार 24 अक्टूबर, सन् 1917 ई. को ‘अक्टूबर क्रान्ति’ हुई। इस क्रान्ति के फलस्वरूप केरेस्की सरकार’ का पतन हो गया।

→ बोल्शेविक क्रान्ति — अक्टूबर सन् 1917 ई. की रूसी क्रान्ति को बोल्शेविक क्रान्ति के नाम से भी जाना जाता है।

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JAC Class 10 Social Science Notes Economics Chapter 3 मुद्रा और साख 

JAC Board Class 10th Social Science Notes Economics Chapter 3 मुद्रा और साख

→ मुद्रा विनिमय माध्यम के रूप में

  • हमारे दैनिक जीवन में मुद्रा का बहुत अधिक प्रयोग होता है। मुद्रा के माध्यम से ही वस्तुएँ खरीदी क बेची जाती हैं।
  • जब दोनों पक्ष एक-दूसरे से वस्तुएँ खरीदने और बेचने पर सहमति र त्रते हैं तो इसे आवश्यकताओं का दोहरा संयोग कहते हैं।
  • वस्तु विनिमय प्रणाली में मुद्रा का उपयोग किये बिना वस्तुओं का विनमय किया जाता है।
  • मुद्रा, विनिमय प्रक्रिया में मध्यस्थता का काम करती है इसलिए इसे रनिमय का माध्यम कहा जाता है।
  • मुद्रा वह चीज है जो लेन-देन में विनिमय का माध्यम बन सकती है। सिक्कों के प्रचलन में आने से पहले विभिन्न प्रकार की चीजों को मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किया जाता था; जैसे-अनाज पशु, सोना, चाँदी तथा ताँबे के सिक्के आदि।
  • मुद्रा के कई आधुनिक रूप हैं जिनमें करेंसी, कागज के नोट और सिके प्रमुख हैं।
  • मुद्रा को देश की सरकार प्राधिकृत करती है इसलिए इसे विनिमय का माध्यम स्वीकार किया जाता है।
  • हमारे देश में भारतीय रिजर्व बैंक केन्द्रीय सरकार की तरफ से करेंसी नोट जारी करता है।

→ बैंक की भूमिका

  • बैंक लोगों से जमा स्वीकार करते हैं एवं उस पर ब्याज भी प्रदान कर हैं।
  • बैंक खातों में जमा धन को माँग के द्वारा निकाला जा सकता है, इस कारण इस जमा को माँग जमा कहते हैं।
  • चेक एक ऐसा कागज का टुकड़ा है जो बैंक को किसी व्यक्ति के खाते से चेक पर लिखे नाम के किसी दूसरे व्यक्ति को एक विशेष रकम का भुगतान करने का आदेश देता है।
  • चेक को भी आधुनिक अर्थव्यवस्था में मुद्रा समझा जाता है।

JAC Class 10 Social Science Notes Economics Chapter 3 मुद्रा और साख

→ बैंक ऋण

  • बैंक अपने यहाँ जमा नगद राशि के एक बड़े भाग को ऋण देने के लिए प्रयोग करते हैं।
  • बैंक जमा पर जो ब्याज देते हैं उससे अधिक ब्याज ऋण पर लेते हैं।
  • जमाकर्ताओं को दिये गये ब्याज और कर्जदारों से लिए गए ब्याज के बीच का अन्तर बैंकों की आय का प्रमुख स्रोत है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में साख की मुख्य माँग फसल उगाने के लिए होती है।

→ ऋण की शर्ते

  • प्रत्येक ऋण समझौते में ब्याज दर निश्चित कर दी जाती है, जिसे कर्जः महाजन को मूल रकम के साथ अदा करता है।
  • ब्याज दर, समर्थक ऋणाधार, जरूरी कागजात तथा भुगतान के तरीकों को सम्मिलित रूप से ऋण की शर्त कहते हैं। ये शर्ते उधारदाता तथा कर्जदार की प्रकृति पर भी निर्भर करती है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों में अतिरिक्त सस्ते ऋण का एक अन्य स्रोत सहकारी समितियाँ हैं जो अपने सदस्यों को ऋण प्रदान करती हैं।

JAC Class 10 Social Science Notes Economics Chapter 3 मुद्रा और साख

→ भारत में औपचारिक क्षेत्रक में साख

  • विभिन्न प्रकार के ऋणों को दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है
  • औपचारिक एवं अनौपचारिक क्षेत्रक ऋण। औपचारिक क्षेत्रक ऋण में बैंकों व सहकारी समितियों से लिए गए ऋणों को सम्मिलित किया जाता है।
  • अनौपचारिक क्षेत्रक ऋण में साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार व दोस्त आदि से लिए गए ऋण आते हैं।
  • हमारे देश में भारतीय रिजर्व बैंक ऋणों के औपचारिक स्रोतों की कार्य प्रणाली पर नियन्त्रण रखता है।
  • अनौपचारिक क्षेत्रक में ऋणदाताओं की गतिविधियों की देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं है। फलस्वरूप कर्जदार का शोषण होता है।
  • ऋण की ऊँची लागत का अर्थ है-कर्जदार की आय का ज्यादातर हिस्सा ऋण की अदायगी में खर्च होना।
  • देश के विकास के लिए सस्ता तथा सामर्थ्य के अनुकूल कर्ज (ऋण) अति आवश्यक है।
  • वर्तमान समय में धनिक वर्ग ही औपचारिक स्रोतों से ऋण प्राप्त करते हैं जबकि निर्धन वर्ग को अनौपचारिक स्रोतों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
  • स्वयं सहायता समूह कर्जदारों को ऋणाधार की कमी की समस्या से उबारने में सहायता करते हैं।

JAC Class 10 Social Science Notes Economics Chapter 3 मुद्रा और साख

→ प्रमुख पारिभाषिक शब्दावली
1. मुद्रा: मुद्रा से अभिप्राय उस वैधानिक वस्तु से है, जिसका उपयोग सामान्यतः विनिमय माध्यम के रूप में किया जाता है।

2. विनिमय: दो पक्षों के बीच होने वाले वस्तुओं व सेवाओं के लेन-देन को विनिमय कहते हैं।

3. वस्तु विनिमय: जब चीजों का लेन-देन बिना मुद्रा के प्रयोग से आपस में ही हो जाता है तो ऐसी व्यवस्था को वस्तु विनिमय कहते हैं।

4. मुद्रा विनिमय: जब वस्तुओं का लेन-देन मुद्रा के माध्यम से होता है तो उसे मुद्रा विनिमय कहते हैं।

5. करेंसी: मुद्रा का आधुनिक रूप-कागज के नोट व सिक्के।

6. माँग जमा: जब बैंक खातों में जमा धन को ग्राहक द्वारा माँग अनुसार निकाला जाता है तो इसे माँग जमा कहते हैं।

7. चेक: यह एक ऐसा कागज है, जो बैंक को किसी व्यक्ति के खाते से चेक पर लिखे नाम के किसी दूसरे व्यक्ति को एक विशेष रकम का भुगतान करने का आदेश देता है।

8. व्यावसायिक बैंक: वह संस्था जो कि मुद्रा की प्राप्ति एवं ग्राहकों की माँग पर उसका भुगतान करता है।

9. ऋण: ऋण या उधार का तात्पर्य एक सहमति से है जहाँ साहूकार कर्जदार को धन, वस्तुएँ या सेवाएँ उपलब्ध कराता है और बदले में भविष्य में कर्जदार से भुगतान करने का वायदा लेता है।

10. पूँजी: उत्पादन का एक प्रमुख साधन, जिसके अन्तर्गत मुद्रा तथा वस्तुओं का भंडार आता है और जिसका प्रयोग उत्पादन हेतु होता है।

11. सहकारी समितियाँ: यह लोगों का एक ऐच्छिक संगठन होता है जिसमें वे अपने आर्थिक हितों की पूर्ति हेतु एक साथ मिलकर काम करते हैं।

12. समर्थक ऋणाधार: समर्थक ऋणाधार वह सम्पत्ति है जिसका मालिक कर्जदार है (जैसे-भूमि, मकान, गाड़ी, पशु व बैंकों में पूँजी आदि) तथा इसका इस्तेमाल वह ऋणदाता को गारण्टी के रूप में करता है जब तक कि ऋण का भुगतान नहीं हो जाता।

13. बैंक जमा राशि बैंक कुल जमा का एक छोटा: सा हिस्सा जमाकर्ताओं की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपने पास रखते हैं। कुल जमा का वह हिस्सा जो बैंक अपने पास नकद के रूप में रखते हैं, बैंक जमा राशि कहलाती है।

14. विनिमय प्रणाली वस्तुओं के आदान: प्रदान की प्रणाली को विनिमय प्रणाली कहते हैं।

15. कृषक सहकारी समिति: वह सहकारी समिति जो कृषि उपकरण खरीदने, खेती, कृषि व्यापार करने, मछली पकड़ने, – घर बनाने एवं अन्य विभिन्न प्रकार के खर्चों के लिए ऋण उपलब्ध कराती है।

16. निक्षेप जमा करना। बैंक में राशि जमा करना।

17. आर. बी. आई: भारतीय रिजर्व बैंक 1 अप्रैल, 1935 को स्थापित भारत का केन्द्रीय बैंक। यह देश में करेन्सी नोटों का निर्गमन करता है।

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JAC Class 9 Social Science Important Questions Civics Chapter 1 लोकतंत्र क्या? लोकतंत्र क्यों?

JAC Board Class 9th Social Science Important Questions Civics Chapter 1 लोकतंत्र क्या? लोकतंत्र क्यों?

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित विकल्पों में से उपयुक्त उत्तर चुनिए
1. डेमोक्रेसी किस भाषा का शब्द है
(क) हिन्दी
(ख) संस्कृत
(ग) अरबी
(घ) यूनानी।
उत्तर:
(घ) यूनानी।

2. ‘जनता का, जनता के लिए एवं जनता द्वारा शासन’ यह कथन किस प्रसिद्ध राजनेता का है
(क) जवाहरलाल नेहरू
(ख) जार्ज वाशिंगटन
(ग) अब्राहम लिंकन
(घ) जार्ज बुश।
उत्तर:
(ग) अब्राहम लिंकन।

3. ‘जनता का शासन’ किस प्रकार की शासन व्यवस्था में होता है
(अ) राजतन्त्र
(ख) लोकतन्त्र तत्र
(ग) तानाशाही
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(ख) लोकतन्त्र।

4. अक्टूबर 1999 में पाकिस्तान में सैनिक तख्तापलट की अगुवाई की थी
(क) बेनजीर भुट्टो ने
(ख) नवाज शरीफ ने
(ग) परवेज मुशर्रफ ने
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) परवेज मुशर्रफ ने।

5. किस देश की संसद को कवांगुओ रेममिन दाइवियाओ दाहुई (राष्ट्रीय जन संसद)कहा जाता है
(क) चीन
(ख) जापान
(ग) रूस
(द) कोरिया।
उत्तर:
(क) चीन।

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘डेमोक्रेसी’ शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
‘डेमोक्रेसी’ शब्द की उत्पत्ति यूनानी भाषा के ‘डेमोक्रेसी’ से हुई है। यूनानी भाषा में डेमो का अर्थ होता है, जनता तथा क्रेशिया का अर्थ होता है, शासन अर्थात् डेमोक्रेसी शब्द का अर्थ होता है ‘जनता का शासन’।

प्रश्न 2.
चीन में चुनाव लड़ने से पहले किससे अनुमति लेनी होती है?
उत्तर:
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से।

प्रश्न 3.
लोकतन्त्र की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  1. स्वतन्त्र व निष्पक्ष चुनाव,
  2. समय पर चुनाव।

प्रश्न 4.
लोकतन्त्र की ऐसी परिभाषा दीजिए जो लोकतान्त्रिक देशों को गैर-लोकतान्त्रिक देशों से अलग करती हो?
उत्तर:
लोकतन्त्र सरकार का एक ऐसा रूप है | जिसमें जनता अपने शासकों का चुनाव करती है।

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प्रश्न 5.
वयस्क मताधिकार से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वयस्क मताधिकार में सभी वयस्कों को बिना किसी भेदभाव के मतदान करने का अधिकार दिया जाता है जिसके द्वारा वे अपने प्रतिनिधियों का चयन करते

प्रश्न 6.
राजशाही तथा सैनिक शासन में चुनी हुई संसद एवं सरकार होने के बावजूद उन्हें लोकतन्त्र नहीं कहा जा सकता। क्यों?
उत्तर:
क्योंकि चुनी हुई संसद नाममात्र की होती है, वास्तविक सत्ता उन्हीं लोगों के हाथ में होती है जिन्हें जनता ने नहीं चुना होता है।

प्रश्न 7.
लोकतन्त्र में अन्तिम निर्णय लेने की शक्ति किसके पास होती है।
उत्तर:
लोकतन्त्र में अन्तिम निर्णय लेने की शक्ति जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथ में ही होती है।

प्रश्न 8.
सउदी अरब में औरतों को वोट देने का अधिकार कब प्राप्त हुआ?
उत्तर:
सन् 2015 में।

प्रश्न 9.
क्या समकालीन इराक को एक लोकतान्त्रिक देश कहा जा सकता है?
उत्तर:
नहीं, यद्यपि इराक में चुनी हुई सरकार है परन्तु वास्तविक शक्ति संयुक्त राज्य अमेरिका एवं मित्र देशों के पास ही है न कि चुने हुए स्थानीय प्रतिनिधियों के पास।

प्रश्न 10.
मताधिकार लोकतन्त्र से किस प्रकार सम्बन्धित है?
उत्तर:
लोकतन्त्र में प्रत्येक वयस्क नागरिक के पास एक मत होना चाहिए एवं प्रत्येक मत का मूल्य एक समान होना चाहिए।

प्रश्न 11.
चीन में नियमित रूप से चुनाव होते हैं? क्या इसे एक लोकतन्त्र कहा जा सकता है?
उत्तर:
नहीं, क्योंकि चुनाव सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी एवं उससे सम्बद्ध कुछ छोटी पार्टियों के सदस्यों के बीच लड़ा जाता है और हमेशा सरकार कम्युनिस्ट पार्टी की ही बनती है।

प्रश्न 12.
लोकतन्त्र के समर्थन में एक तर्क दीजिए।
उत्तर:
लोकतन्त्र बेहतर निर्णय लेने की सम्भावना बढ़ाता है।

प्रश्न 13.
लोकतन्त्र के विरोध में एक तर्क दीजिए।
उत्तर:
लोकतन्त्र में नेता बदलते रहते हैं। इससे अस्थिरता पैदा होती है।

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प्रश्न 14.
लोकतान्त्रिक व्यवस्था दूसरों से बेहतर क्यों है?
उत्तर:
क्योंकि यह शासन का अधिक जवाब देही वाला स्वरूप है।

प्रश्न 15.
लोकतंत्र में अन्तिम निर्णय लेने की शक्ति किसके पास होती है?
उत्तर:
लोकतंत्र में अन्तिम निर्णय लेने की शक्ति चुने हुए प्रतिनिधियों के पास होती है।

प्रश्न 16.
चीन में हमेशा किस पार्टी की सरकार बनती है?
उत्तर:
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की।

प्रश्न 17.
आप लोकतन्त्र को सरकार के दूसरे रूपों से किस प्रकार अलग करेंगे?
उत्तर:
सरकार के दूसरे रूप; जैसे-राजशाही, तानाशाही, सैनिक शासन आदि में सभी नागरिक राजनीति में भाग नहीं लेते हैं जबकि लोकतन्त्र सभी नागरिकों की राजनीतिक सहभागिता पर निर्भर करता है।

प्रश्न 18.
स्थानीय लोकतन्त्र का क्या अर्थ है?
उत्तर:
ग्राम तथा नगरों के स्तर पर चुनी हुई स्वशासनिक संस्थाओं की प्रणाली को स्थानीय लोकतन्त्र कहते हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
लोकतन्त्र, राजतन्त्र और सैनिक शासन से किस प्रकार भिन्न है? शासन के प्रत्येक रूप का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
1. लोकतन्त्र:
यह सरकार का एक ऐसा रूप है जिसमें जनता पर उसके चुने हुई प्रतिनिधियों द्वारा शासन किया जाता है, जैसे-भारत। राजतन्त्र-यह सरकार का एक ऐसा रूप है जिसमें राज्य के प्रमुख या शासक को शासन का अधिकार जन्म के आधार पर (वंशानुगत परम्परा) अपने पूर्ववर्ती शासक से प्राप्त होता है। इसमें जनता का कोई प्रतिनिधित्व नहीं होता, जैसे-सऊदी अरब।

2. सैनिक शासन:
सैनिक शासन में एक तानाशाह जनता की अनुमति के स्थान पर अपनी शक्ति के बल पर राज्य पर शासन करता है। यह शासन सेना पर नियन्त्रण वाले लोगों द्वारा संचालित होता है, जैसे-म्यांमार।

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प्रश्न 2.
लोकतन्त्र राजनीतिक समानता के बुनियादी सिद्धान्त पर आधारित है। इस सिद्धान्त के उल्लंघन के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
लोकतन्त्र राजनीतिक समानता के बुनियादी सिद्धान्त पर आधारित है। इस सिद्धान्त के उल्लंघन के निम्न तीन उदाहरण हैं

  1. एशियाई देश सऊदी अरब में महिलाओं को मत देने का अधिकार सन् 2015 से पहले नहीं था।
  2. एस्टोनिया ने अपना नागरिक कानून इस तरह बनाया है कि रूसी अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को मतदान का अधिकार प्राप्त करना बहुत कठिन हो गया है।
  3. फिजी की चुनाव प्रणाली इस तरह की है कि स्थानीय निवासी के मत का मूल्य भारतीय मूल के फिजी नागरिक के मत से अधिक होता है।

प्रश्न 3.
लोकतन्न की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
लोकतन्त्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. जनता द्वारा चुनी हुई सरकार।
  2. जनता के द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में निर्णय करने की शक्ति।
  3. स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष चुनाव।
  4. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार
  5. प्रत्येक व्यक्ति के मत का मूल्य एक समान।
  6. कानून द्वारा शासन का संचालन।

प्रश्न 4.
लोकतान्त्रिक एवं अलोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लोकतान्त्रिक एवं अलोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था में निम्नलिखित अन्तर हैंलोकतान्त्रिक

लोकतान्त्रिकअलोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था
1. लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था में चुनाव नियमित अंतराल पर होते हैं।1. अलोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था में चुनाव का कोई महत्व नहीं होता है।
2. लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था में सत्ता के पदों पर पहुँच सबके लिए खुली होती है।2. अलोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था में सत्ता के पदों पर पहुँच सबके लिए ख़ुली नहीं होती है। केवल शक्तिशाली व्यक्ति या वंशानुगत आधार पर व्यक्ति सर्वोच्च पद पर पहुँच सकता है।
3. लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था में राज्य के समस्त नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त होते हैं।3. अलोकतान्त्रिक शासन-व्यवस्था में नागरिकों को समान अधिकार नहीं दिये जाते हैं।
4. लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था में नागरिकों को सरकार का विरोध करने का अधिकार होता है।4. अलोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था में नागरिक सरकार के कार्यों का विरोध नहीं कर सकते।

प्रश्न 5.
लोकतन्त्र के विपक्ष में कोई चार तर्क दीजिए।
उत्तर:
लोकतन्त्र के विपक्ष में चार तर्क निम्नलिखित हैं

  1. लोकतन्त्र में नेतृत्व परिवर्तन होता रहता है जिससे अस्थिरता पैदा होती है।
  2. लोकतन्त्र में नैतिकता का कोई स्थान नहीं होता है।
  3. जनता द्वारा चुने हुए नेताओं को लोगों के हित की जानकारी नहीं होती है जिस कारण उनके द्वारा गलत फैसले लिए जाते हैं।
  4. लोकतन्त्र मूलत: चुनावी प्रतियोगिता पर आधारित होता है अत: इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।

प्रश्न 6.
“निश्चित रूप से लोकतन्त्र सभी समस्याओं को खत्म करने वाली जादू की छड़ी नहीं है।” उक्त कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
निश्चित रूप से लोकतन्त्र सभी समस्याओं को खत्म करने वाली जादू की छड़ी नहीं है। क्योंकि जनता का शासकों को चुनने का फैसला हमेशा सही होगा यह नहीं कहा जा सकता है अर्थात् जनता भी गलत लोगों को चुन सकती है। इसके अतिरिक्त यह भी हो सकता है कि चुने हुए लोग जनता की समस्याओं से अनभिज्ञ हों या वे समाधान के लिए सक्षम ही न हों। कभी-कभी लम्बे समय में होने वाले परिवर्तनों पर नेतृत्व परिवर्तन का भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।

JAC Class 9 Social Science Important Questions Civics Chapter 1 लोकतंत्र क्या? लोकतंत्र क्यों?

प्रश्न 7.
लोकतन्त्र राजनीतिक समानता के सिद्धान्त पर आधारित है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लोकतन्त्र राजनीतिक समानता के सिद्धान्त पर आधारित है। लोकतन्त्र में सबसे निर्धन एवं अशिक्षित व्यक्ति को भी वही दर्जा प्राप्त है जो धनवान और शिक्षित लोगों को है। लोग किसी शासक की प्रजा न होकर स्वयं अपने शासक हैं। अगर वे गलतियाँ करते हैं तब भी वे स्वयं इसके लिए जवाबदेह होते हैं।

प्रश्न 8.
जनता लोकतान्त्रिक सरकार क्यों चाहती है?
उत्तर;
जनता निम्नलिखित कारणों से लोकतान्त्रिक सरकार चाहती है

  1. लोकतन्त्र सभी लोगों के साथ समानता का व्यवहार करता है।
  2. लोकतन्त्र में बहुमत के सिद्धान्त के आधार पर फैसले लिये जाते हैं।
  3. लोकतन्त्र सरकार को अधिक जवाबदेह एवं सक्रिय बनाता है।
  4. लोकतन्त्र में सरकार को अपनी समस्त जनता के हितों की सुरक्षा करनी पड़ती है।
  5. लोकतन्त्र खुली बहस व विचार-विमर्श आदि में विश्वास करता है।

प्रश्न 9.
प्रतिनिधित्व लोकतन्त्र क्या है? यह क्यों जरूरी है?
उत्तर:
प्रतिनिधित्व लोकतान्त्रिक वह व्यवस्था है जिसमें सभी लोगों द्वारा शासन नहीं किया जाता है। जनता की ओर से एक बहुमत को निर्णय लेने की अनुमति प्रदान की जाती है।
प्रतिनिधित्व लोकतन्त्र इसलिए जरूरी है क्योंकि

  1. वर्तमान लोकतन्त्र व्यवस्था में इतने अधिक लोग होते हैं कि प्रत्येक बात के लिए सबको साथ बैठाकर सामूहिक फैसला कर पाना असम्भव है।
  2. यदि सभी लोग साथ बैठ भी लें तो निर्णय लेने की प्रक्रिया में भाग लेने के लिए अपेक्षित समय, इच्छा या योग्यता और कौशल आदि का उनमें अभाव होता है।

प्रश्न 10.
वर्तमान समय में प्रत्यक्ष लोकतन्त्र के स्थान पर किस लोकतान्त्रिक व्यवस्था को अपनाया गया है? इस व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
वर्तमान समय में प्रत्यक्ष लोकतन्त्र के स्थान पर प्रतिनिधित्व लोकतन्त्र व्यवस्था को अपनाया गया है। इस व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. इस शासन व्यवस्था में सर्वोच्च शक्ति जनता में ही निहित होती है। भले ही इस शक्ति का प्रयोग उनके प्रतिनिधियों के द्वारा किया जाये।
  2. यदि सरकार लोकहित के कार्य करने में असफल रहती है तो उसे बदला जा सकता है एवं उसके स्थान पर कोई दूसरा शासन स्थापित किया जा सकता है।
  3. इस शासन व्यवस्था में जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है जो व्यवस्थापिका का निर्माण करते हैं। व्यवस्थापिका का कार्य कानून बनाना एवं सरकार के कार्यों पर निगरानी रखना है।
  4. इस व्यवस्था में चुनाव स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष होते हैं। किसी भी राजनीतिक दल को चुनाव में भाग लेने से नहीं रोका जा सकता।

JAC Class 9 Social Science Important Questions Civics Chapter 1 लोकतंत्र क्या? लोकतंत्र क्यों?

प्रश्न 11.
लोकतन्त्र के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
लोकतन्त्र के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं

  1. लोकतान्त्रिक शासन पद्धति अधिक जवाबदेही वाला स्वरूप है।
  2. लोकतन्त्र बेहतर निर्णय लेने की सम्भावना बढ़ाता है।
  3. लोकतन्त्र मतभेदों और टकरावों को संभालने का तरीका उपलब्ध कराता है।
  4. लोकतन्त्र नागरिकों का सम्मान बढ़ाता है।
  5. लोकतन्त्र में गलती ठीक करने का अवसर भी मिलता है।

प्रश्न 12.
‘लोकतन्त्र बेहतर निर्णय लेने की सम्भावना में वृद्धि करता है।’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गैर-लोकतान्त्रिक सरकारों की तुलना में लोकतान्त्रिक सरकारें बेहतर फैसला लेती हैं। बेहतर लोकतन्त्र का मूल आधार व्यापक चर्चा एवं बहसें हैं। लोकतान्त्रिक फैसले में हमेशा अधिक लोग सम्मिलित होते हैं। उनकी बैठकें होती हैं एवं चर्चा करके फैसले लिये जाते हैं। अगर किसी एक विषय पर अनेक लोगों की सोच सम्मिलित है तो उसमें गलतियाँ होने की गुंजाइश कम से कम रहती है।

इसमें समय जरूर अधिक लगता है पर महत्वपूर्ण विषयों पर थोड़ा अधिक समय लेकर फैसला करने के अपने लाभ भी हैं। इससे ज्यादा अच्छे फैसले होते हैं तथा गैर-जिम्मेदार व अधिक उग्र फैसले लेने की सम्भावना घटती है। इस प्रकार लोकतन्त्र बेहतर निर्णय लेने की सम्भावना में वृद्धि करता है।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित देश लोकतान्त्रिक क्यों नहीं कहला सकते? कारण स्पष्ट कीजिए
1. फिजी,
2. एस्टोनिया,
3. सऊदी अरब।
उत्तर:
फिजी, एस्टोनिया एवं सऊदी अरब निम्नलिखित कारणों से लोकतान्त्रिक देश नहीं कहला सकते

  1. फिजी-फिजी की चुनाव प्रणाली में वहाँ के मूल निवासियों के मत का मूल्य भारतीय मूल के फिजी नागरिकों के मत से अधिक है।
  2. एस्टोनिया-एस्टोनिया ने नागरिकता के नियम कुछ इस तरह बनाये हैं कि रूसी अल्पसंख्यक समाज के एस्टोनियाई नागरिकों को मतदान का अधिकार प्राप्त करने में कठिनाई होती है।
  3. सऊदी अरब-सऊदी अरब में 2015 के बाद महिलाओं को वोट देने का अधिकार तो दे दिया गया है लेकिन अब भी वहाँ शासन के महत्वपूर्ण अधिकार राजा में ही निहित हैं, जो पैत्रिक रूप से चुना जाता है।

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प्रश्न 14.
जिम्बाब्वे को लोकतान्त्रिक देश क्यों नहीं कहा जा सकता? कारण दीजिए।
उत्तर:
जिम्बाब्वे को लोकतान्त्रिक देश निम्नलिखित कारणों से नहीं कहा जा सकता

  1. जिम्बाब्वे में नियमित चुनाव होते हैं परन्तु केवल एक ही पार्टी जानु-पीएफ द्वारा ही चुनाव जीते जाते हैं। यह दल चुनावों में गलत तरीके अपनाता है। यह बात लोकतन्त्र के नियमों के विरुद्ध है।
  2. जिम्बाब्वे में टेलीविजन एवं रेडियो पर वहाँ की सरकार का नियन्त्रण है।
  3. लोकतन्त्र में जनता और विपक्ष सरकार की आलोचना कर सकते हैं परन्तु ऐसा करने की जिम्बाब्वे में अनुमति नहीं है।
  4. जिम्बाब्वे में अखबार स्वतन्त्र हैं पर सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को परेशान किया जाता है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
लोकतन्त्र क्या है? इसकी प्रमुख विशेषताओं का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
लोकतन्त्र से आशय: जनता के लिए, जनता द्वारा, जनता की शासन व्यवस्था लोकतन्त्र कहलाती है। इसमें शासन के सभी निर्णयों में जनता के बहुमत की राय को ही सर्वोपरि माना जाता है। लोकतन्त्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
1. प्रमुख फैसले निर्वाचित नेताओं के हाथ:
लोकतन्त्र में सभी प्रमुख निर्णय जनता द्वारा निर्वाचित नेताओं द्वारा किये जाते हैं। ये नेता जनता की राय को ध्यान में रखकर ही निर्णय लेते हैं। अत: नेताओं के सभी फैसलों में उनको वोट देने वाली जनता का हित शामिल होता है।

2. एक व्यक्ति एक वोट:
एक मोल-लोकतन्त्र के लिए यह आवश्यक है कि देश के सभी नागरिकों को वोट देने तथा चुनाव में खड़े होने एवं जीतकर सत्ता में शामिल होने के समान अवसर दिये जायें। इसमें किसी विशेष आधार पर नागरिकों को कम या अधिक महत्व देकर विभाजन नहीं किया जा सकता है।

3. स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष चुनावी मुकाबला:
चीन में प्रति 5 वर्ष बाद चुनाव होते हैं लेकिन वहाँ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की अनुमति के बिना कोई चुनाव नहीं लड़ सकता है अत: इसे लोकतंत्र नहीं कह सकते। लोकतन्त्र में सत्ता में बैठे लोगों तथा अन्य शेष लोगों को जीत-हार के समान अवसर मिलने चाहिए। यदि सत्ता में बैठे लोग सत्ता का दुरुपयोग करके पुन: सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो ऐसी स्थिति को लोकतन्त्र नहीं कहा जा सकता है।

4. कानून का राज और अधिकारों का आदर:
जिंबाब्वे में राष्ट्रपति मुगाबे स्वतन्त्रता के बाद से सन् 2017 तक गलत तरीके अपनाकर तथा अपने पक्ष में बार-बार संविधान में परिवर्तन करके राष्ट्रपति बने रहे, यह स्वस्थ लोकतंत्र नहीं है। एक लोकतान्त्रिक सरकार को संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं के अन्दर ही कार्य करना चाहिए तथा राष्ट्र के सभी लोगों को न्याय प्रदान करना चाहिए। लोकतान्त्रिक सरकार को अपनी आलोचना सुननी चाहिए तथा लोगों के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए।

JAC Class 9 Social Science Important Questions

JAC Class 10 Social Science Notes Economics Chapter 2 भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक

JAC Board Class 10th Social Science Notes Economics Chapter 2 भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक

→ आर्थिक कार्यों के क्षेत्रक

  • जब हम प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके किसी वस्तु का उत्पादन करते हैं, तो उसे प्राथमिक क्षेत्रक की गतिविधियाँ कहा जाता है। उदाहरण-कपास की खेती, डेयरी उत्पाद (दूध) आदि।
  • प्राथमिक क्षेत्रक को कृषि एवं सहायक क्षेत्रक भी कहा जाता है, क्योंकि हम अधिकतर प्राकृतिक उत्पाद कृषि, डेयरी, मत्स्यन तथा वनों से प्राप्त करते हैं। द्वितीयक क्षेत्र में वे गतिविधियाँ सम्मिलित होती हैं जिनके द्वारा प्राकृतिक उत्पादों को अन्य रूपों में परिवर्तित किया जाता है, जैसे-कपास के पौधों से प्राप्त रेशे का प्रयोग सूत कातना एवं कपड़ा बुनना, गन्ने से चीनी व गुड़ बनाना आदि।
  • द्वितीयक क्षेत्रक में विनिर्माण की प्रक्रिया अपरिहार्य है। यह क्षेत्रक क्रमशः संवर्धित विभिन्न प्रकार के उद्योगों से संबद्ध है, इसी कारण यह औद्योगिक क्षेत्रक भी कहलाता है।
  • तृतीयक क्षेत्रक उपर्युक्त दोनों ही क्षेत्रकों से भिन्न है। इस क्षेत्रक की गतिविधियाँ प्राथमिक एवं द्वितीयक क्षेत्रक के विकास में मदद करती हैं। ये गतिविधियाँ स्वतः वस्तुओं का उत्पादन नहीं करतीं वरन् वस्तुओं के उत्पादन में सहायता करती हैं। उदाहरण- परिवहन, संचार, बैंक सेवाएँ, भण्डारण, व्यापार आदि।
  • तृतीयक क्षेत्रक को सेवा क्षेत्रक भी कहा जाता है। सेवा क्षेत्रक में कुछ ऐसी अति आवश्यक सेवाएँ भी हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से वस्तुओं के उत्पादन में सहायता नहीं करती हैं, जैसे-शिक्षक, वकील, डॉक्टर, धोबी, नाई, मोची आदि।

JAC Class 10 Social Science Notes Economics Chapter 2 भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक

→ आर्थिक क्षेत्रकों की तुलना

  • प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रक के विभिन्न उत्पादन कार्यों से बहुत अधिक मात्रा में वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन होता है तथा अनेक लोग इस कार्य में संलग्न हैं। मध्यवर्ती वस्तुओं का उपयोग अन्तिम वस्तुओं तथा सेवाओं के निर्माण में किया जाता है। इन वस्तुओं का मूल्य अन्तिम वस्तुओं के मूल्य में पहले से ही शामिल होता है।
  • किसी वर्ष विशेष में प्रत्येक क्षेत्रक द्वारा उत्पादित वस्तुओं तथा सेवाओं का मूल्य उस वर्ष में क्षेत्रक के कुल उत्पादन की जानकारी प्रदान करता है।
  • सकल घरेलू उत्पादन (जी.डी.पी.) तीनों क्षेत्रकों के उत्पादनों का योगफल होता है जो किसी देश के अन्दर किसी विशेष वर्ष में उत्पादित सभी अन्तिम वस्तुओं तथा सेवाओं का मूल्य होता है।

→ क्षेत्रकों में परिवर्तन

  • भारत के पिछले चालीस वर्षों के आँकड़ों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में सबसे अधिक योगदान तृतीयक क्षेत्रक से उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का है जबकि रोजगार अधिकांशतः प्राथमिक क्षेत्रक में मिलता है।
  • सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) अर्थव्यवस्था की विशालता को प्रदर्शित करता है। इसका प्रकाशन केन्द्र सरकार द्वारा किया जाता है।
  • उत्पादन में तृतीयक क्षेत्रक (सेवा क्षेत्रक) का महत्त्व लगातार बढ़ता जा रहा है। सेवा क्षेत्रक की सभी सेवाओं में समान दर से संवृद्धि नहीं हो पा रही है।
  • द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रक में रोजगार के पर्याप्त अवसरों का सृजन नहीं हुआ है।
  • हमारे देश में आधे से अधिक श्रमिक प्राथमिक क्षेत्रक (मुख्यतः कृषि क्षेत्र) में कार्यरत हैं।
  • कृषि क्षेत्र का जी.डी.पी. में योगदान लगभग एक-छठा भाग है जबकि शेष द्वितीयक व तृतीयक क्षेत्रक का योगदान है।
  • कषि क्षेत्रक के श्रमिकों में अल्प बेरोजगारी देखने को मिलती है अर्थात् कृषि क्षेत्र से कुछ लोगों को हटा देने पर भी उत्पादन
  • प्रभावित नहीं होगा। अल्प बेरोजगारी को प्रच्छन बेरोजगारी भी कहते हैं।

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→ रोजगार का सृजन

  • नीति (योजना) आयोग द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार अकेले शिक्षा क्षेत्र में लगभग 20 लाख रोजगारों का
  • सृजन किया जा सकता है।
  • हमारे देश में कार्य का अधिकार लागू करने के लिए एक कानून बनाया गया है जिसे महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम, 2005 के नाम से जाना जाता है।
  • आर्थिक कार्यों को विभाजित करने का एक अन्य तरीका संगठित एवं असंगठित के रूप में क्षेत्रकों का विभाजन है।
  • संगठित क्षेत्रक में वे उद्यम अथवा कार्य स्थान सम्मिलित हैं जहाँ रोजगार की अवधि नियमित होती है और इसलिए लोगों के पास सुनिश्चित काम होता है।
  • असंगठित क्षेत्रक छोटी-छोटी और बिखरी इकाइयाँ, जो अधिकाशंतः राजकीय नियन्त्रण से बाहर होती हैं, से निर्मित होता है। इन कार्यों में रोजगार की अवधि नियमित नहीं होती तथा रोजगार की सुरक्षा भी नहीं है।
  • सन् 1990 से हमारे देश में यह देखा गया है कि संगठित क्षेत्रक के अत्यधिक श्रमिक अपना रोजगार खोते जा रहे हैं। ये लोग असंगठित क्षेत्रक में कम वेतन पर काम करने के लिए मजबूर हैं। अतः असंगठित क्षेत्रक में रोजगार बढ़ाने की आवश्यकता के अतिरिक्त श्रमिकों को संरक्षण एवं सहायता की भी आवश्यकता है।
  • भारत में लगभग 80 प्रतिशत ग्रामीण परिवार छोटे तथा सीमान्त किसानों की श्रेणी में आते हैं।
  • हमारे देश में बहुसंख्यक श्रमिक अनुसूचित जाति, जनजाति तथा पिछड़ी जातियों से हैं, जो असंगठित क्षेत्रक में कार्य करते हैं।

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→ स्वामित्व आधारित क्षेत्रक:

  • स्वामित्व के आधार पर क्षेत्रक को सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रक में बाँटा जा सकता है।
  • सार्वजनिक क्षेत्रक में परिसंपत्तियों पर सरकार का स्वामित्व रहता है एवं सरकार ही समस्त सेवाएँ उपलब्ध कराती है।
  • निजी क्षेत्रक में परिसम्पतियों पर स्वामित्व एवं सेवाओं के वितरण की जिम्मेदारी एकल व्यक्ति अथवा कम्पनी के हाथों में होती है।
  • भारत सरकार किसानों से उचित मूल्य पर गेहूँ तथा चावल आदि खरीदती है। इसे अपने गोदामों में भण्डारित करती है तथा राशन की दुकानों के माध्यम से उपभोक्ताओं को कम कीमत पर बेचती है।
  • अधिकांश आर्थिक गतिविधियों की प्राथमिक जिम्मेदारी सरकार पर होती है जिस पर व्यय करना सरकार की अनिवार्यता होती है।
  • सरकार को सुरक्षित पेयजल, निर्धनों के लिए आवासीय सुविधाएँ, भोजन व पोषण जैसे मानव विकास के पक्षों पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

JAC Class 10 Social Science Notes Economics Chapter 2 भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक

→ प्रमुख पारिभाषिक शब्दावली

1. प्राथमिक क्षेत्रक की गतिविधियाँ:
जब हम प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके किसी वस्तु का उत्पादन करते हैं तो इसे प्राथमिक क्षेत्रक की गतिविधियाँ कहा जाता है। उदाहरण-कृषि, खनन, मत्स्य पालन, डेयरी, शिकार आदि।

2. द्वितीयक क्षेत्रक की गतिविधियाँ:
इससे उत्पन्न प्राकृतिक उत्पादों को विनिर्माण प्रणाली द्वारा अन्य रूपों में परिवर्तित किया जाता है। उदाहरण-कपास से कपड़ा, गन्ने से चीनी एवं लौह अयस्क से इस्पात बनाना आदि ।

3. तृतीयक क्षेत्रक की गतिविधियाँ:
इसके अन्तर्गत सभी सेवाओं वाले व्यवसाय सम्मिलित हैं। उदाहरण-परिवहन, संचार, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं प्रबन्धन आदि ।

4. सूचना प्रौद्योगिकी:
सूचना प्रौद्योगिकी किसी इलेक्ट्रानिक विधि से सूचना भेजने, प्राप्त करने एवं संग्रहित करने की एक पद्धति है। जिसमें कम्प्यूटर, डाटाबेस एवं मॉडम का उपयोग किया जाता है। इसमें सूचनाओं का तीव्रगति से त्रुटिरहित एवं कुशलतापूर्वक सम्पादन होता है।

5. सकल घरेलू उत्पाद:
किसी देश के भीतर किसी विशेष वर्ष में उत्पादित सभी अन्तिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य सकल घरेलू उत्पाद (स. घ. उ. अथवा जी. डी. पी.) कहलाता है।

6. बेरोजगारी:
जब प्रचलित मजदूरी पर काम करने के इच्छुक व सक्षम व्यक्तियों को कोई कार्य उपलब्ध नहीं होता तो ऐसे व्यक्ति बेरोजगार एवं ऐसी स्थिति बेरोजगारी कहलाती है।

7. छिपी हुई बेरोजगारी:
जब किसी कार्य में आवश्यकता से अधिक व्यक्ति लगे रहते हैं तो उसे छिपी हुई अथवा प्रच्छन्न बेरोजगारी कहा जाता है। यदि इन लोगों को वहाँ से स्थानान्तरित कर दिया जाए तो कुल उत्पादन पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इसे अल्प बेरोजगारी भी कहा जाता है। इस प्रकार की बेरोजगारी प्रायः कृषि क्षेत्र में पायी जाती है।

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8. मध्यवर्ती वस्तुएँ:
मध्यवर्ती वस्तुएँ वे उत्पादित वस्तुएँ हैं जिनका प्रयोग उत्पादक कच्चे माल के रूप में उत्पादन की प्रक्रिया में करता है अथवा उन्हें फिर से बेचने के लिए खरीदा जाता है।

9. अन्तिम वस्तुएँ:
अन्तिम वस्तुएँ वे वस्तुएँ हैं जिनका प्रयोग अन्तिम उपभोग अथवा पूँजी निर्माण में होता है, इन्हें फिर से नहीं बेचा जाता है।

10. बुनियादी सेवाएँ:
किसी भी देश में अनेक सेवाओं; जैसे-अस्पताल, शैक्षिक संस्थाएँ, डाक व तार सेवा, थाना, न्यायालय, ग्रामीण प्रशासनिक कार्यालय, नगर निगम, रक्षा, परिवहन, बैंक, बीमा कम्पनी आदि की आवश्यकता होती है, इन्हें बुनियादी सेवाएँ माना जाता है।

11. संगठित क्षेत्रक: संगठित क्षेत्रक में वे उद्यम अथवा कार्य स्थान आते हैं जहाँ रोजगार की अवधि नियमित होती है। काम सुनिश्चित होता है और सरकारी नियमों व विनियमों का पालन किया जाता है।

12. असंगठित क्षेत्रक असंगठित क्षेत्रक छोटी-छोटी और बिखरी इकाइयों से जो अधिकांशतः सरकारी नियन्त्रण से बाहर होती हैं से निर्मित होता है। इस क्षेत्रक के नियम व विनियम तो होते हैं परन्तु उनका अनुपालन नहीं होता।

13. सार्वजनिक क्षेत्रक: सार्वजनिक क्षेत्रक में उत्पादन के साधनों पर सरकार का स्वामित्व, प्रबन्धन व नियन्त्रण होता है।

14. निजी क्षेत्रक: निजी क्षेत्रक में उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व होता है। इसके अन्तर्गत उपक्रमों का प्रबन्ध उपक्रम के स्वामी द्वारा ही किया जाता है।

15. खुली बेरोजगारी: जब देश की श्रम शक्ति रोजगार के अवसर प्राप्त नहीं कर पाती है तो इस स्थिति में इसे खुली बेरोजगारी कहते हैं। इस प्रकार की बेरोजगारी देश के औद्योगिक क्षेत्रों में पायी जाती है।

JAC Class 10 Social Science Notes

JAC Class 9th Social Science Notes Geography Chapter 6 जनसंख्या

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→ मानव, संसाधनों का निर्माण एवं उपयोग करने के साथ-साथ, वे स्वयं भी विभिन्न गुणों वाले संसाधन होते हैं। इसलिए यह जानना आवश्यक है कि हमारे देश में कितने लोग निवास करते हैं, वे कैसे एवं कहाँ रहते हैं।

→ एक निश्चित समयांतराल में जनसंख्या की आधिकारिक गणना ‘जनगणना’ कहलाती है।

→ भारत में सर्वप्रथम जनगणना सन् 1872 ई. में की गई थी परन्तु सन् 1881 ई. में प्रथम बार एक सम्पूर्ण जनगणना की गयी थी। उसी समय से प्रत्येक 10 वर्ष बाद हमारे देश में जनगणना होती है।

→ भारतीय जनगणना हमारे देश की जनसंख्या से सम्बन्धित विभिन्न जानकारियाँ हमें प्रदान करती है।

→ मार्च 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 1.21 अरब थी जो समस्त विश्व की कुल जनसंख्या का का 17.5 प्रतिशत थी।

→ भारत में लगभग 32.8 लाख वर्ग किमी. क्षेत्र पर विश्व की लगभग 2.4 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है।

→ सन् 2011 की जनगणना के अनुसार देश का सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य उत्तर प्रदेश है। यहाँ देश की 16 प्रतिशत आबादी निवास करती है।

JAC Class 9th Social Science Notes Geography Chapter 6 जनसंख्या

→ क्षेत्रफल की दृष्टि में राजस्थान देश का सबसे बड़ा राज्य है। यहाँ भारत की जनसंख्या को केवल 5.5 प्रतिशत लोग निवास करते हैं।

→ सन् 2011 में भारत का जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी. था।

→ सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व बिहार में 1,102 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. एवं न्यूनतम अरुणाचल प्रदेश में 17 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. है।

→ प्रत्येक वर्ष या एक दशक में बढ़ी जनसंख्या, कुल संख्या में वृद्धि का परिमाण है पहले की जनसंख्या को बाद की जनसंख्या से घटाकर इसे प्राप्त किया जाता है। इसे ‘निरपेक्ष वृद्धि’ कहते हैं।

→ प्रत्येक 100 व्यक्तियों पर एक वर्ष में जितनी वृद्धि होती है उसे वार्षिक वृद्धि दर कहते हैं।

→ पिछले कुछ वर्षों में जनसंख्या वृद्धि दर में कमी आयी है फिर भी भारत की जनसंख्या वृद्धि जारी है।

→ जनसंख्या में होने वाले परिवर्तन की तीन मुख्य प्रक्रियाएँ होती हैं-जन्म-दर, मृत्यु-दर एवं प्रवास।

→ एक वर्ष में प्रतिहजार व्यक्तियों में जितने जीवित बच्चे जन्म लेते हैं उसे ‘जन्मदर’ कहते हैं तथा एक वर्ष में प्रतिहजार व्यक्तियों में मरने वालों की संख्या को ‘मृत्युदर’ कहते हैं।

JAC Class 9th Social Science Notes Geography Chapter 6 जनसंख्या

→ लोगों के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में चले जाने के प्रवास कहते हैं। प्रवास आन्तरिक (देश के भीतर) तथा अन्तर्राष्ट्रीय हो सकता है।

→ प्रति एक हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या को ‘लिंग अनुपात’ कहा जाता है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में एक हजार पुरुषों पर 943 महिलाएँ थीं।

→ साक्षरता किसी जनसंख्या का बहुत ही महत्वपूर्ण गुण है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार एक व्यक्ति जिसकी उम्र 7 वर्ष या उससे अधिक है जो किसी भी भाषा को समझकर लिख या पढ़ सकता है उसे साक्षर की श्रेणी में माना जाता है। भारत की साक्षरता दर में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है।

→ व्यवसायों को सामान्यतः प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है।

→ भारत में कुल जनसंख्या का 64 प्रतिशत भाग कृषि पर निर्भर है।

→ स्वास्थ्य जनसंख्या की संरचना का एक महत्वपूर्ण घटक है। भारत में मृत्युदर में कमी आयी है लेकिन कुपोषण एवं स्वास्थ्य रक्षा सुविधाओं के लिए काफी काम करना बाकी है।

→ राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 निःशुल्क शिक्षा, शिशु मृत्यु दर, टीकाकरण, शादी की उम्र को बढ़ाने तथा परिवार नियोजन को एक जनकेन्द्रित कार्यक्रम बनाने के लिए नीतिगत ढाँचा प्रदान करती है।

→ जनसंख्या – किसी प्रदेश या देश में रहने वाले लोगों की कुल संख्या को जनसंख्या कहते हैं।

→ जनसंख्या घनत्व – प्रति वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में रहने वाले लोगों की संख्या को जनसंख्या घनत्व कहते हैं।

→ जन्म-दर – किसी क्षेत्र, प्रदेश अथवा देश में एक वर्ष में प्रति हजार व्यक्तियों में जीवित जन्मे बच्चों की संख्या को जन्म-दर कहते हैं। इसे प्रति हजार में व्यक्त किया जाता है। मृत्यु-दर-एक वर्ष की जनसंख्या में प्रति हजार लोगों में मरने वाले लोगों की संख्या को मृत्यु-दर कहते हैं। इसे प्रति हजार में व्यक्त किया जाता है।

→ प्राकृतिक वृद्धि-किसी क्षेत्र अथवा देश की जनसंख्या में जन्म-दर एवं मृत्यु-दर के बीच का अन्तर जनसंख्या की प्राकृतिक वृद्धि कहलाता है।

→ निरपेक्ष वृद्धि-पहले की जनसंख्या (2001) को बाद की जनसंख्या (2011) में से घटाकर जो जनसंख्या आती है उसे निरपेक्ष वृद्धि कहते हैं।

→ प्रवास – व्यक्तियों का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में चले जाने को प्रवास कहते हैं।

→ लिंग अनुपात – प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या लिंग अनुपात कहलाती है।

→ व्यावसायिक संरचना – विभिन्न प्रकार के व्यवसायों के अनुसार किए गए जनसंख्या के वितरण को व्यावसायिक संरचना कहते हैं।

→ प्राथमिक क्रियाएँ – कृषि, पशुपालन, वानिकी, खनन एवं मत्स्य पालन आदि व्यवसाय प्राथमिक क्रियाएँ अथवा प्राथमिक व्यवसाय माने जाते हैं।

JAC Class 9th Social Science Notes Geography Chapter 6 जनसंख्या

→ द्वितीयक क्रियाएँ – उद्योग, भवन एवं वस्तु निर्माण कार्य आदि को द्वितीयक क्रियाएँ कहा जाता है।

→ तृतीयक क्रियाएँ – परिवहन एवं संचार के साधन, वाणिज्य, प्रशासन एवं सेवाएँ आदि तृतीयक व्यवसाय कहे जाते

→ जनसंख्या वृद्धि – किसी विशेष समय अन्तराल में किसी देश अथवा राज्य के निवासियों की संख्या में धनात्मक परिवर्तन।

→ जनगणना – किसी प्रदेश अथवा देश में किसी विशेष दिन आर्थिक एवं सामाजिक सांख्यिकी सहित जनसंख्या की सरकारी गणना को जनगणना कहते हैं।

→ आयु संरचना – किसी देश में विभिन्न आयु समूहों के लोगों की संख्या।

JAC Class 9 Social Science Notes

JAC Class 9th Social Science Notes Geography Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति एवं वन्य जीवन

JAC Board Class 9th Social Science Notes  Geography Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति एवं वन्य जीवन

→ भारत विश्व के मुख्य 12 जैव विविधता वाले देशों में से एक है।

→ भारत में लगभग 47,000 विभिन्न जातियों के पेड़-पौधे तथा लगभग 90,000 जातियों के जानवर तथा विभिन्न प्रकार की मछलियाँ ताजे एवं समुद्री पानी में पायी जाती हैं। इस दृष्टि से भारत एशिया में चौथा एवं विश्व में दसवाँ स्थान रखता है।

→ बिना फूल वाले पेड़-पौधे जैसे शैवाल (एलेगी) एवं कवक (फंजाई) भी बहुत बड़ी संख्या में हमारे देश में पाये जाते हैं। प्राकृतिक वनस्पति का आशय वनस्पति के उस भाग से है जो मनुष्य की सहायता के बिना अपने आप पैदा होता है

→ और लम्बे समय तक उस पर मानवीय प्रभाव नहीं पड़ता। वनस्पति तथा वन्य प्राणियों में इतनी विविधता भू-भाग, मृदा, तापमान, सूर्य का प्रकाश, वर्षण आदि के कारण है।

→ सन् 2003 में वनों का कुल क्षेत्रफल 68 लाख वर्ग किमी. था।

→ सन् 2011 में भारत में वनों का कुल क्षेत्रफल भारत के क्षेत्रफल का 21.05 प्रतिशत था। पृथ्वी पर पादपों एवं जीवों का वितरण मुख्यतः जलवायु द्वारा निर्धारित होता है।

JAC Class 9th Social Science Notes Geography Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति एवं वन्य जीवन

→ हमारे देश में 5 प्रकार की प्राकृतिक वनस्पतियाँ पायी जाती हैं जिनमें उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन, उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन, कंटीले वन एवं झाड़ियाँ, पर्वतीय वन एवं मैंग्रोव वन हैं।

→ उष्ण कटिबंधीय वर्षा वन पश्चिमी घाटों के अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों, लक्षद्वीप, अंडमान, और निकोबार द्वीप समूहों, असम के ऊपरी भागों तथा तमिलनाडु के तट तक सीमित है।

→ उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन भारत के सबसे बड़े क्षेत्र में फैले हैं इन्हें मानसूनी वन भी कहते हैं।

→ जिन क्षेत्रों में 70 से. मी से कम वर्षा होती है वहाँ कंटीले वन तथा झाड़ियाँ पायी जाती हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान तथा ऊँचाई के साथ-साथ प्राकृतिक वनस्पति में भी अन्तर पाया जाता है।

→ तटवर्तीय क्षेत्रों में जहाँ ज्वार-भाटा आता है वहाँ मैंग्रोव वन पाये जाते हैं।

→ भारत में मछलियों की लगभग 2,546 प्रजातियाँ पायी जाती हैं जो संसार में पाई जाने वाली कुल मछलियों का 12 प्रतिशत है। भारत में अनेक प्रकार के सरीसृप, उभयचरी एवं स्तनधारी जीव पाये जाते हैं जो संसार के कुल प्राणियों का 5 से 8 प्रतिशत है।

→ धरातल पर एक विशिष्ट प्रकार की वनस्पति या प्राणी जीवन वाले विशाल पारिस्थितिक तंत्र को ‘जीवोम’ कहते हैं।

→ भारतीय जीव सुरक्षा अधिनियम सन् 1972 में लागू किया गया था।

→ भारत विश्व का एकमात्र ऐसा देश है जहाँ शेर और बाघ दोनों पाये जाते हैं।

JAC Class 9th Social Science Notes Geography Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति एवं वन्य जीवन

→ एशियाई शेर केवल गुजरात के ‘गिर’ जंगलों में पाये जाते हैं। भारत सरकार ने पादप और जीव सम्पत्ति की सुरक्षा हेतु अनेक उपाय किये हैं जिनमें 18 जीवमण्डल आरक्षित क्षेत्र
स्थापित करना प्रमुख है।

→ भारत में 103 नेशनल पार्क, 535 वन्य प्राणी अभयारण्य एवं कई चिड़ियाघर राष्ट्र की पादप और जीव सम्पत्ति की सुरक्षा हेतु बनाए गए हैं।

→ हम सभी को अपनी अतिजीविता के लिये प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र के सन्तुलन हेतु प्राकृतिक वनस्पति और वन्य जीवों के महत्व को समझना चाहिये। यह पर्यावरण के विशिष्ट उपहार एवं देश की समृद्धि का आधार हैं। महत्वपूर्ण भौगोलिक शब्दावली

→ जैव विविधता सन्तुलित पर्यावरण निर्मित करने वाले भिन्न-भिन्न किस्म के जन्तु और पेड़-पौधों का बड़ी संख्या में अस्तित्वशील रहना।

→ वनस्पति जगत – किसी विशिष्ट प्रदेश, क्षेत्र अथवा काल के किसी विशिष्ट जाति के पेड़-पौधे जिन्हें एक समूह में रखा जाता है।

→ प्राकृतिक वनस्पति – किसी स्थान, क्षेत्र या प्रदेश में जलवायु के अनुसार स्वत: ही उत्पन्न हुए पेड़-पौधे, झाड़ियाँ, घास आदि को उस प्रदेश की प्राकृतिक वनस्पति कहते हैं।

→ अक्षत वनस्पति – मानव की सहायता के बिना प्राकृतिक रूप से उत्पन्न पादप समुदाय।

→ देशज वनस्पति – वह वनस्पति जो मूल रूप से भारत में ही जन्मी एवं विकसित हुई हैं।

→ विदेशज पौधे-भारत के बाहर से लाये गये पेड़-पौधे।

→ शंकुधारी वन-वे सदाहरित वृक्ष जिनके पत्ते सुई के समान नुकीले होते हैं।

→ पर्णपाती वन-ऐसे वृक्ष जो प्रत्येक वर्ष किसी समय विशेष पर अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं।

→ अल्पाइन वनस्पति-3,600 मीटर से अधिक ऊँचाई पर पर्वतीय क्षेत्रों में पायी जाने वाली वनस्पति।

→ नवीकरण योग्य संसाधन-वह संसाधन जिनका नये सिरे से पुनर्निर्माण सम्भव है।

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→ पारिस्थितिक तंत्र-एक तंत्र जो भौतिक पर्यावरण एवं उसमें रहने वाले पादप एवं जीव-जन्तुओं से मिलकर बना

→ जीवोम – धरातल पर एक विशिष्ट प्रकार की वनस्पति या प्राणी जीवन वाले विशाल पारिस्थितिक तंत्र को जीवोम कहते हैं।

→ मृदा – पृथ्वी की ऊपरी सतह, जो मूल चट्टानों के विखण्डित पदार्थों, वनस्पति और जीव-जन्तुओं के अवशेषों से बनती है।

→ वन – वृक्षों से परिपूर्ण एक गहन क्षेत्र।

→ नेशनल पार्क – वह आरक्षित क्षेत्र जहाँ प्राकृतिक वनस्पति, प्रकृति की सुन्दरता और वन्य जीवों को उनके प्राकृतिक पर्यावरण में संरक्षित रखा जाता है।

→ विनष्ट प्रजातियाँ – पादप और जीवों की वह प्रजातियाँ जो नष्ट हो गई हैं।

→ संकटापन्न प्रजातियाँ – पादप और प्राणियों की वे प्रजातियाँ जिनके लुप्त होने की आशंका है।

→ वन्य प्राणी अभयवन – वह प्राकृतिक वन्य क्षेत्र जिसमें वन्य प्राणियों को पकड़ना एवं शिकार करना पूर्णरूपेण प्रतिबन्धित होता है।

→ वन्य प्राणी-पशु – पक्षी और समस्त प्रकार के जीव-जन्तु जो अपने प्राकृतिक पर्यावरण में स्वतन्त्र रूप से विचरण करते हैं।

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→ जीवमण्डल – वायुमण्डल, स्थलमण्डल और जलमण्डल के मध्य एक संकरी पट्टी जहाँ समस्त जीव-जन्तु पाये जाते हैं।

→ स्तनधारी – शिशुओं को जन्म देने एवं उन्हें स्तनपान कराने वाले जन्तुओं का जैविक वर्गीकरण।

→ उभयचर – स्थल एवं जल क्षेत्रों पर रहने में सक्षम जन्तु।

→ पशु-पक्षी – किसी दिये हुए क्षेत्र की जैव सम्पदा।

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