JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 13 मानवीय करुणा की दिव्या चमक

Jharkhand Board JAC Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 13 मानवीय करुणा की दिव्या चमक Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 10 Hindi Solutions Kshitij Chapter 13 मानवीय करुणा की दिव्या चमक

JAC Class 10 Hindi मानवीय करुणा की दिव्या चमक Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
फ़ादर की उपस्थिति देवदार की छाया जैसी क्यों लगती थी?
उत्तर :
फ़ादर की उपस्थिति देवदार की छाया जैसी लगती थी, क्योंकि वे हर उत्सव एवं संस्कार पर बड़े भाई और धर्मगुरु की तरह शुभाषीश देते थे। उनकी उपस्थिति में प्रत्येक कार्य शांति और सरलता से संपन्न होता था। लेखक के बच्चे के मुँह में अन्न का पहला दाना फ़ादर बुल्के ने डाला था। उस क्षण उनकी नीली आँखों में जो ममता और प्यार तैर रहा था, उससे लेखक को फ़ादर बुल्के की उपस्थिति देवदार की छाया जैसी लगी।

प्रश्न 2.
फ़ादर बुल्के भारतीय संस्कृति के एक अभिन्न अंग हैं, किस आधार पर ऐसा कहा गया है ?
उत्तर :
लेखक ने फ़ादर बुल्के को भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बताया है। फ़ादर बुल्के बेल्जियम के रेम्सचैपल के रहने वाले थे। उन्होंने संन्यासी बनकर भारत आने का फैसला किया। भारत में उन्होंने भारतीय संस्कृति को जाना और समझा। मसीही धर्म से संबंध रखते हुए भी उन्होंने हिंदी में शोध किया। शोध का विषय था-‘रामकथा उत्पत्ति और विकास’। इससे उनके भारतीय संस्कृति के प्रति लगाव का पता चलता है। लेखक कहता है कि जब तक रामकथा है, उस समय तक इस विदेशी भारतीय साधु को रामकथा के लिए याद किया जाएगा। इस आधार पर कह सकते हैं कि फ़ादर बुल्के भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग हैं।

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प्रश्न 3.
पाठ में आए उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए जिनसे फ़ादर बुल्के का हिंदी प्रेम प्रकट होता है?
उत्तर :
फ़ादर बुल्के विदेशी होते हुए भी भारतीय थे। उन्हें हिंदी से विशेष लगाव था। उन्होंने हिंदी में प्रयाग विश्वविद्यालय से शोध किया। फ़ादर बुल्के ने मातरलिंक के प्रसिद्ध नाटक ‘ब्लूबर्ड’ का हिंदी में ‘नीलपंछी’ नाम से रूपांतर किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने मसीही धर्म की धार्मिक पुस्तक ‘बाइबिल’ का हिंदी में अनुवाद किया। उन्होंने अपना प्रसिद्ध अंग्रेज़ी-हिंदी शब्दकोश तैयार किया।

उनके शोध ‘रामकथा उत्पत्ति और विकास’ के कुछ अध्याय ‘परिमल’ में पढ़े गए थे। उन्होंने ‘परिमल’ में भी कार्य किया। वे सदैव हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए चिंतित रहते थे। इसके लिए वे प्रत्येक मंच पर आवाज़ उठाते थे। उन्हें उन लोगों पर झुंझलाहट होती थी, जो हिंदी जानते हुए भी हिंदी का प्रयोग नहीं करते थे। इस तरह हम कह सकते हैं कि फ़ादर बुल्के का हिंदी के प्रति विशेष लगाव और प्रेम था।

प्रश्न 4.
इस पाठ के आधार पर फ़ादर कामिल बुल्के की जो छवि उभरती है उसे अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर :
फ़ादर कामिल बुल्के एक ऐसा नाम है, जो विदेशी होते हुए भी भारतीय है। उन्होंने अपने जीवन के 73 वर्षों में से 47 वर्ष भारत को दिए। उन 47 वर्षों में उन्होंने भारत के प्रति, हिंदी के प्रति और यहाँ के साहित्य के प्रति विशेष निष्ठा दिखाई। उनका व्यक्तित्व दूसरों को तपती धूप में शीतलता प्रदान करने वाला था। उन्होंने सदैव सबके लिए एक बड़े भाई की भूमिका निभाई थी। उनकी उपस्थिति में सभी कार्य बड़ी शांति और सरलता से संपन्न होते थे। उनका व्यक्तित्व संयम धारण किए हुए था।

किसी ने भी उन्हें कभी क्रोध में नहीं देखा था। वे सबके साथ प्यार व ममता से मिलते थे। जिससे एक बार मिलते थे, उससे रिश्ता बना लेते थे, फिर वे संबंध कभी नहीं तोड़ते थे। फ़ादर अपने से संबंधित सभी लोगों के घर, परिवार और उनकी दुख-तकलीफों की जानकारी रखते थे। दुख के समय उनके मुख से निकले दो शब्द जीवन में नया जोश भर देते थे। फ़ादर बुल्के का व्यक्तित्व वास्तव में देवदार की छाया के समान था। उनसे रिश्ता जोड़ने के बाद बड़े भाई के अपनत्व, ममता, प्यार और आशीर्वाद की कभी कमी नहीं होती थी।

प्रश्न 5.
लेखक ने फ़ादर बुल्के को ‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ क्यों कहा है?
उत्तर :
फ़ादर बुल्के का व्यक्तित्व सबसे अलग था। उनके मन में सबके लिए अपनापन था। सबके साथ होते हुए भी वे अपने व्यवहार, अपनत्व व वात्सल्य के कारण अलग दिखाई देते थे। वे सबके साथ एक-सा व्यवहार करते थे। उनका मन करुणामय था। वे सभी जान-पहचान वालों के दुख-सुख की पूरी जानकारी रखते थे। हर किसी के दुख में दुखी होना तथा सुख में खुशी अनुभव करना उनका स्वभाव था। जब वे दिल्ली आते थे, तो समय न होने पर भी लेखक की खोज खबर लेकर वापस जाते थे। जिससे रिश्ता बना लिया, अपनी तरफ़ से उसे पूरी तरह निभाते थे। उनके व्यक्तित्व की यही बातें उन्हें ‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ बनाती थीं।

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प्रश्न 6.
फ़ादर बुल्के ने संन्यासी की परंपरागत छवि से अलग एक नई छवि प्रस्तुत की है, कैसे?
उत्तर :
फ़ादर बुल्के अपनी वेशभूषा और संकल्प से संन्यासी थे, परंतु वे मन से संन्यासी नहीं थे। संन्यासी सबके होते हैं; वे किसी से विशेष संबंध बनाकर नहीं रखते। परंतु फ़ादर बुल्के जिससे रिश्ता बना लेते थे, उसे कभी नहीं तोड़ते थे। वर्षों बाद मिलने पर भी उनसे अपनत्व की महक अनुभव की जा सकती थी। जब वे दिल्ली जाते थे, तो अपने जानने वाले को अवश्य मिलकर आते थे। ऐसा कोई संन्यासी नहीं करता। इसलिए वे परंपरागत संन्यासी की छवि से अलग प्रतीत होते थे।

प्रश्न 7.
आशय स्पष्ट कीजिए –
(क) नम आँखों को गिनना स्याही फैलाना है।
(ख) फ़ादर को याद करना एक उदास शांत संगीत को सुनने जैसा है।
उत्तर :
(क) इस पंक्ति में लेखक फ़ादर बुल्के को याद कर रहा है। उनके अंतिम संस्कार में जितने लोग भी शामिल हुए थे, उन सभी की आँखें रो रही थीं। यदि लेखक अब उन लोगों को गिनने लगे, तो उस क्षण को याद करके उसकी अपनी आँखों में से आँसुओं की अविरल धारा बहने लगेगी। वह उस क्षण को स्मरण नहीं कर पाएगा और सबकुछ उसे धुंधला-सा प्रतीत होगा।

(ख) लेखक के फ़ादर बुल्के से अंतरंग संबंध थे। फ़ादर बुल्के से मिलना और उनसे बात करना लेखक को अच्छा लगता था। फ़ादर ने उसके हर दुख-सुख में उसका साथ निभाया था। इसलिए लेखक को लगता है कि फ़ादर बुल्के को याद करना उनके लिए एकांत में उदास शांत संगीत सुनने जैसा है, जो अशांत मन को शांति प्रदान करता है। फ़ादर ने सदैव उनके अशांत मन को शांति प्रदान की थी।

रचना और अभिव्यक्ति –

प्रश्न 8.
आपके विचार से बुल्के ने भारत आने का मन क्यों बनाया होगा?
उत्तर :
फादर बुल्के का जन्म बेल्जियम के रेम्सचैपल नामक शहर में हुआ था। जब वे इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में थे, तब उनके मन में संन्यासी बनने की इच्छा जागृत हुई। उन्होंने संन्यासी बनकर भारत आने का मन बनाया। उनके मन में यह बात इसलिए उठी होगी, क्योंकि भारत को साधु-संतों का देश कहा जाता है। भारत आध्यात्मिकता का केंद्र है। उन्हें लगा होगा कि भारत में ही उन्हें सच्चे अर्थों में आत्मा का ज्ञान प्राप्त हो सकता है।

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प्रश्न 9.
‘बहुत सुंदर है मेरी जन्मभूमि रेम्सचैपल’-इस पंक्ति में फ़ादर बुल्के की अपनी जन्मभूमि के प्रति कौन-सी भावनाएँ। अभिव्यक्त होती हैं ? आप अपनी जन्मभूमि के बारे में क्या सोचते हैं ?
उत्तर :
फ़ादर बुल्के का जन्म बेल्जियम के रेम्सचैपल शहर में हुआ था, परंतु उन्होंने अपनी कर्मभूमि के लिए भारत को चना। उन्होंने अपनी आयु का अधिकांश भाग भारत में बिताया था। उन्हें भारत, भारत की भाषा हिंदी तथा यहाँ के लोगों से बहुत प्यार था; परंतु वे अपनी जन्मभूमि रेम्सचैपल को कभी भूल नहीं पाए। रेम्सचैपल शहर उनके मन के एक कोने में बसा हुआ था। वे अपनी जन्मभूमि से गहरे रूप से जुड़े हुए थे। जिस मिट्टी में पलकर वे बड़े हुए थे, उसकी महक वे अपने अंदर अनुभव करते थे।

इसलिए लेखक के यह पूछने पर कि कैसी है आपकी जन्मभूमि? फ़ादर बुल्के ने तत्परता से जबाव दिया कि उनकी जन्मभूमि बहुत सुंदर है। यह उत्तर उनकी आत्मा की आवाज़ थी। हमें अपनी जन्मभूमि प्राणों से बढ़कर प्रिय है। जन्मभूमि में ही मनुष्य का उचित विकास होता है। उसकी आत्मा में अपनी जन्मभूमि की मिट्टी की महक होती है। जन्मभूमि से मनुष्य का रिश्ता उसके जन्म से शुरू होकर उसके मरणोपरांत तक रहता है। जन्मभूमि ही हमें हमारी पहचान, संस्कृति तथा सभ्यता से अवगत करवाती है। हमें अपनी जन्मभूमि के लिए कृतज्ञ होना चाहिए और उसकी रक्षा और सम्मान पर कभी आँच नहीं आने देनी चाहिए।

भाषा-अध्ययन –

प्रश्न 10.
‘मेरा देश भारत’ विषय पर 200 शब्दों का निबंध लिखिए।
उत्तर :
राष्ट्र मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति है। जिस भूमि के अन्न-जल से यह शरीर बनता एवं पुष्ट होता है, उसके प्रति अनायास ही स्नेह एवं श्रद्धा उमड़ती है। जो व्यक्ति अपने राष्ट्र की सुरक्षा एवं उसके प्रति अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करता है, वह कृतघ्न है। उसका प्रायश्चित्त संभव ही नहीं। उसका जीवन पशु के सदृश बन जाता है। रेगिस्तान में वास करने वाला व्यक्ति ग्रीष्म की भयंकरता के बीच जी लेता है, लेकिन अपनी मातृभूमि के प्रति दिव्य प्रेम संजोए रहता है।

शीत प्रदेश में वास करने वाला व्यक्ति काँप-काँप कर जी लेता है, लेकिन जब उसके देश पर कोई संकट आता है तो वह अपनी जन्मभूमि पर प्राण न्योछावर कर देता है। ‘यह मेरा देश है’ कथन में कितनी मधुरता है। इसमें जो कुछ है, वह सब मेरा है। जो व्यक्ति ऐसी भावना से रहित है, उसके लिए ठीक ही कहा गया है –

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं नर-पशु निरा है और मृतक समान है।

मेरा महान देश भारत सब देशों का मुकुट है। इसका अतीत स्वर्णिम रहा है। एक समय था, जब इसे ‘सोने की चिड़िया’ कहा जाता था। प्रकृति ने इसे अपने अपार वैभव, शक्ति एवं सौंदर्य से विभूषित किया है। इसके आकाश के नीचे मानवीय प्रतिभा ने अपने सर्वोत्तम वरदानों का सर्वश्रेष्ठ उपयोग किया है। इस देश के चिंतकों ने गूढतम प्रश्न की तह में पहुँचने का सफल प्रयास किया है। मेरा देश अति प्राचीन है। इसे सिंधु देश, आर्यावर्त, हिंदुस्तान भी कहते हैं। इसके उत्तर में ऊँचा हिमालय पर्वत इसके मुकुट के समान है। उसके पार तिब्बत तथा चीन हैं। दक्षिण में समुद्र इसके पाँव धोता है। श्रीलंका द्वीप वहाँ समीप ही है।

उसका इतिहास भी भारत से संबद्ध है। पूर्व में बांग्लादेश और म्यांमार देश हैं। पश्चिम में पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, ईरान देश हैं। प्राचीन समय में तथा आज से दो हज़ार वर्ष पहले सम्राट अशोक के राज्यकाल में और उसके बाद भी गांधार (अफ़गानिस्तान) भारत का ही प्रांत था। कुछ सौ वर्षों पहले तक बाँग्लादेश, ब्रह्मदेश व पाकिस्तान भारत के ही अंग थे। इस देश पर अंग्रेजों ने आक्रमण करके यहाँ पर विदेशी राज्य स्थापित किया और इसे खूब लूटा। पर अब वे दुख भरे दिन बीत चुके हैं। हमारे देश के वीरों, सैनिकों, देशभक्तों और क्रांतिकारियों के त्याग व बलिदान से 15 अगस्त 1947 ई० को भारत स्वतंत्र होकर दिनों-दिन उन्नत और शक्तिशाली होता जा रहा है।

26 जनवरी, 1950 से भारत में नया संविधान लागू हुआ और यह ‘संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ बन गया। अनेक ज्वारभाटों का सामना करते हुए भी इसका सांस्कृतिक गौरव अक्षुण्ण रहा है। यहाँ गंगा, यमुना, सरयू, नर्मदा, कृष्णा, गोदावरी, सोन, सतलुज, व्यास, रावी आदि पवित्र नदियाँ बहती हैं, जो इस देश को सींचकर हरा-भरा करती हैं। इनमें स्नान कर देशवासी पुण्य लाभ उठाते हैं। यहाँ बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर-ये छह ऋतुएँ क्रमशः आती हैं। इस देश में अनेक तरह की जलवायु है।

भाँति-भाँति के फल-फूल, वनस्पतियाँ, अन्न आदि यहाँ उत्पन्न होते हैं। इस देश को देखकर हृदय गदगद हो जाता है। यहाँ अनेक दर्शनीय स्थान हैं। यह एक विशाल देश है। इस समय इसकी जनसंख्या लगभग एक सौ पच्चीस करोड़ से अधिक हो गई है, जो संसार में चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। यहाँ हिंदू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई आदि मतों के लोग परस्पर मिल-जुलकर रहते हैं। यहाँ हिंदी, संस्कृत, अंग्रेज़ी, मराठी, गुजराती, पंजाबी, उर्दू, बाँग्ला, तमिल, तेलुगू आदि अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं।

दिल्ली इसकी राजधानी है। वहीं संसद भी है, जिसके लोकसभा और राज्यसभा दो अंग हैं। मेरे देश के प्रमुख राष्ट्रपति’ कहलाते हैं। एक उपराष्ट्रपति भी होता है। देश का शासन प्रधानमंत्री तथा उसका मंत्रिमंडल चलाता है। इस देश में विभिन्न राज्य या प्रदेश हैं, जहाँ विधानसभाएँ हैं। वहाँ मुख्यमंत्री और उसके मंत्रिमंडल द्वारा शासन होता है। यह धर्मनिरपेक्ष देश है। यहाँ बड़े धर्मात्मा, तपस्वी, त्यागी, परोपकारी, वीर, बलिदानी महापुरुष हुए हैं। यहाँ की स्त्रियाँ पतिव्रता, सती, साध्वी, वीरता और साहस की पुतलियाँ हैं।

उन्होंने कई बार जौहर व्रत किए हैं। वे योग्य और दृढ़ शासक भी हो चुकी हैं और आज भी हैं। यहाँ के ध्रुव, प्रहलाद, लव-कुश, अभिमन्यु, हकीकतराय आदि बालकों ने अपने ऊँचे जीवनादर्शों से इस देश का नाम उज्ज्वल किया है। मेरा देश गौरवशाली है। इसका इतिहास सोने के अक्षरों में लिखा हुआ है। यह स्वर्ग के समान सभी सुखों को प्रदान करने में समर्थ है। मैं इस पर तन-मन-धन न्योछावर करने के लिए तत्पर रहता हूँ। मुझे अपने देश पर और अपने भारतीय होने पर गर्व है।

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प्रश्न 11.
आपका मित्र हडसन एंड्री ऑस्ट्रेलिया में रहता है। उसे इस बार की गरमी की छुट्टियों के दौरान भारत के पर्वतीय प्रदेशों के भ्रमण हेतु निमंत्रित करते हुए पत्र लिखिए।
उत्तर :
3719, रेलवे रोड
अंबाला
15 मई, 20 ……
प्रिय मित्र हडसन एंड्री
सस्नेह नमस्कार।
आशा है कि आप सब सकुशल होंगे। आपके पत्र से ज्ञात हुआ कि आपका विद्यालय ग्रीष्मावकाश के लिए बंद हो चुका है। हमारा विद्यालय भी 28 मई को ग्रीष्मावकाश के लिए बंद हो रहा है। इस बार छुट्टियों में हम पिताजी के साथ शिमला जा रहे हैं। लगभग 20 दिन तक हम शिमला में रहेंगे। वहाँ मेरे मामाजी भी रहते हैं। अतः वहाँ रहने में पूरी सुविधा रहेगी। हमने शिमला के आस पास सभी दर्शनीय स्थान देखने का निर्णय किया है। मेरे मामाजी के बड़े सुपुत्र वहाँ अंग्रेज़ी के अध्यापक हैं। उनकी सहायता एवं मार्ग दर्शन से मैं अपने अंग्रेजी के स्तर को भी बढ़ा सकूँगा।

प्रिय मित्र, यदि आप भी हमारे साथ शिमला चलें तो यात्रा का आनंद आ जाएगा। आप किसी प्रकार का संकोच न करें। मेरे माता-पिताजी भी आपको देखकर बहुत प्रसन्न होंगे। आप शीघ्र ही अपने कार्यक्रम के बारे में सूचित करें। हमारा विचार जून के प्रथम सप्ताह में जाने का है। शिमला से लौटने के बाद जम्मू-कश्मीर जाने का विचार है, जहाँ अनेक दर्शनीय स्थान हैं। जम्मू के पास कटरा में वैष्णो देवी का मंदिर मेरे आकर्षण का केंद्र है। मुझे अभी तक इस सुंदर भवन को देखने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ। आशा है कि इस बार यह जिज्ञासा भी शांत हो जाएगी। आप अपने कार्यक्रम से शीघ्र ही सूचित करें।
अपने माता-पिता को मेरी ओर से सादर नमस्कार कहें।
आपका मित्र,
विजय कुमार

प्रश्न 12.
निम्नलिखित वाक्यों में समुच्यबोधक छाँटकर अलग लिखिए –
(क) तब भी जब वह इलाहाबाद
(ख) माँ ने बचपन से ही घोषित कर दिया था कि लड़का हथ से गया।
(ग) वे रिश्ता बनाते थे तो तोड़ते नहीं थे।
(घ) उनके मुख से सांत्वना के जादू भरे दो शब्द सुनना एक ऐसी रोशनी से भर देता था जो किसी गहरी तपस्या से जनमती है।
(ङ) पिता और भाइयों के लिए बहुत लगाव मन में नहीं था लेकिन वो स्मृति में अकसर डूब जाते।
उत्तर :
(क) और (ख) कि (ग) तो (घ) जो (ङ) लेकिन।

पाठेतर सक्रियता –

प्रश्न 1.
फ़ादर बुल्के का अंग्रेज़ी-हिंदी कोश’ उनकी एक महत्वपूर्ण देन है। इस कोश को देखिए-समझिए।
उत्तर :
विद्यार्थी अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से करें।

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प्रश्न 2.
फ़ादर बुल्के की तरह ऐसी अनेक विभूतियाँ हुई हैं जिनकी जन्मभूमि अन्यत्र थी, लेकिन कर्मभूमि के रूप में उन्होंने भारत को चुना। ऐसे अन्य व्यक्तियों के बारे में जानकारी एकत्र कीजिए।
उत्तर :
भगिनी निवेदिता, मदर टेरेसा, एनी बेसेंट ऐसी ही विभूतियाँ थीं। इनकी जन्मभूमि अन्यत्र थी, लेकिन कर्मभूमि के रूप में इन्होंने भारत को ही चुना था।

प्रश्न 3.
कुछ ऐसे व्यक्ति भी हुए हैं जिनकी जन्मभूमि भारत है लेकिन उन्होंने अपनी कर्मभूमि किसी और देश को बनाया है, उनके बारे में भी पता लगाइए।
उत्तर :
हरगोविंद खुराना, लक्ष्मी मित्तल, हिंदुजा भाई इसी प्रकार के व्यक्ति हैं।

प्रश्न 4.
एक अन्य पहलू यह भी है कि पश्चिम की चकाचौंध से आकर्षित होकर अनेक भारतीय विदेशों की ओर उन्मुख हो रहे हैं इस पर अपने विचार लिखिए।
उत्तर :
आधुनिक युग भौतिकवाद का युग है। प्रत्येक मनुष्य कम समय में बहत अधिक प्राप्त कर लेना चाहता है। भारत में रहकर वह अपनी प्रतिभा और क्षमता को व्यर्थ गँवाना नहीं चाहता। उसे अनुभव होता है कि उसे अपनी क्षमता और प्रतिभा का उतना मूल्य नहीं मिल पा रहा, जितना उसे मिलना चाहिए। इसलिए वह सबकुछ प्राप्त कर लेने की चाह में पश्चिमी चकाचौंध में खो जाता है। वहाँ की चकाचौंध में भारतीय मूल्य और संस्कृति खो जाती है। मनुष्य वहाँ के रीति-रिवाजों में जीने लग जाता है। उसे देश, परिवार किसी से प्रेम नहीं रहता। उसका प्रेम स्वयं की उन्नति तक सीमित हो जाता है। वह सबकी भावनाओं के साथ खेलता है। आज इसके कई उदाहरण सामने आ रहे हैं। आज की पीढ़ी को ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है, जो उन्हें पश्चिमी चकाचौंध से दूर रहने का सही मार्ग दिखाए।

यह भी जानें –

परिमल – निराला के प्रसिद्ध काव्य संकलन से प्रेरणा लेते हुए 10 दिसंबर 1944 को प्रयाग विश्वविद्यालय के साहित्यिक अभिरुचि रखने वाले कुछ उत्साही युवक मित्रों द्वारा परिमल समूह की स्थापना की गई। ‘परिमल’ द्वारा अखिल भारतीय स्तर की गोष्ठियाँ आयोजित की जाती थीं जिनमें कहानी, कविता, उपन्यास, नाटक आदि पर खुली आलोचना और उन्मुक्त बहस की जाती। परिमल का कार्यक्षेत्र इलाहाबाद था। जौनपुर, मुंबई, मथुरा, पटना, कटनी में भी इसकी शाखाएँ रहीं। परिमल ने इलाहाबाद में साहित्य-चिंतन के प्रति नए दृष्टिकोण का न केवल निर्माण किया बल्कि शहर के वातावरण को एक साहित्यिक संस्कार देने का प्रयास भी किया।

फ़ादर कामिल बुल्के (1909-1982)
शिक्षा-एम०ए०, पीएच-डी० (हिंदी)
प्रमुख कृतियाँ – रामकथा : उत्पत्ति और विकास, रामकथा और तुलसीदास, मानस-कौमुदी, ईसा-जीवन और दर्शन, अंग्रेज़ी-हिंदी कोश, (1974 में पदमभूषण से सम्मानित)।

JAC Class 10 Hindi मानवीय करुणा की दिव्या चमक Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
पाठ के आधार पर फ़ादर बुल्के का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर :
‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ पाठ के लेखक ‘सर्वेश्वर दयाल सक्सेना’ हैं। उन्होंने यह पाठ फ़ादर बुल्के की स्मृतियों को याद करते हुए लिखा है। फ़ादर बुल्के का चरित्र-चित्रण करना सरल नहीं है, परंतु लेखक की स्मृतियों के आधार पर फ़ादर का चरित्र-चित्रण निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया गया है –
1. परिचय – फ़ादर का जन्म बेल्जियम के रेम्सचैपल शहर में हुआ था। उनके परिवार में माता-पिता, दो भाई और एक बहन थी। इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में उनमें संन्यासी बनने की इच्छा जागृत हुई। वे संन्यासी बनकर भारत आ गए और इस तरह उनकी कर्मभूमि भारत बनी।

2. व्यक्तित्व – फ़ादर बुल्के का व्यक्तित्व हर किसी के हृदय में अपनी छाप छोड़ता था। उनका रंग गोरा था। उनकी दाढ़ी भूरी थी, जिसमें सफ़ेदी की झलक भी दिखाई देती थी। उनकी आँखें नीली थीं। उनके चेहरे पर तेज़ था। उनका व्यक्तित्व उन्हें भीड़ – में अलग पहचान देता था।

3. शिक्षा – रेम्सचैपल शहर में जब उन्होंने संन्यास लिया उस समय वे इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में थे। भारत आकर उन्होंने कोलकाता से बी०ए०, इलाहाबाद से एम० ए० और प्रयाग विश्वविद्यालय से हिंदी में शोधकार्य किया। शोध का विषय था – ‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’।

4. अध्यापन कार्य – फादर बुल्के सेंट जेवियर्स कॉलेज रांची में हिंदी तथा संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष थे। वहाँ उन्होंने अपना अंग्रेजी-हिंदी कोश लिखा, जो बहुत प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने बाइबिल का भी अनुवाद किया।

5. शांत स्वभाव-फ़ादर बुल्के शांत स्वभाव के व्यक्ति थे। उन्हें कभी भी किसी ने क्रोध में नहीं देखा था। उनका शांत स्वभाव हर किसी को प्रभावित करता था।

6. ओजस्वी वाणी-फ़ादर बुल्के की वाणी ओजस्वी थी। उनके मुख से निकले दो सांत्वना के शब्द अँधेरे जीवन में रोशनी ला देते थे। उनके विचार ऐसे होते थे, जिन्हें कोई काट नहीं सकता था।

7. बड़े भाई की भूमिका में-फ़ादर बुल्के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बड़े भाई की भूमिका में दिखाई देते थे। उनकी उपस्थिति में सभी कार्य शांति और सरलता से संपन्न होते थे। उनका वात्सल्य सबके लिए देवदार पेड़ की छाया के समान था। ‘परिमल’ में काम करते समय वहाँ का वातावरण एक परिवार की तरह था, जिसके बड़े सदस्य फ़ादर थे। वे बड़े भाई की तरह सबको सुझाव और राय देते थे।

8. मिलनसार-फ़ादर बुल्के मिलनसार व्यक्ति थे। वे जिससे एक बार रिश्ता बना लेते थे, उसे कभी नहीं तोड़ते थे। जब भी वे दिल्ली जाते, तो सबसे मिलकर आते थे; चाहे वह मिलना दो मिनट का होता था।

9. हिंदी भाषा के प्रति प्यार-फ़ादर बुल्के एक विदेशी होते हुए भी बहुत अपने थे। उनके अपनेपन का कारण था-उनका भारत, भारत की संस्कृति और भारतीय भाषा हिंदी से विशेष प्यार। वे हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते थे और इसके लिए प्रयासरत भी रहते थे। उनकी हिंदी भाषा के प्रति चिंता प्रत्येक मंच पर स्पष्ट देखी जा सकती थी। उन्हें उस समय बहुत झुंझलाहट होती थी, जब हिंदी वाले ही हिंदी की उपेक्षा करते थे। उन्हें हिंदी भाषा और बोलियों से विशेष प्रेम था।

10. कष्टदायी मृत्यु-फ़ादर बुल्के शांत स्वभाव के व्यक्ति थे। वे दूसरों के दुख से जल्दी दुखी हो जाते थे। जिन्होंने सदैव अपने स्वभाव से मिठास बाँटी थी, उसी की मृत्यु ज़हरबाद से हुई थी। उन्हें अंतिम समय में बहुत यातना सहन करनी पड़ी थी। उन्होंने अपने जीवन के सैंतालीस साल भारत में बिताए थे। मृत्यु के समय उनकी आयु तिहत्तर वर्ष थी। 18 अगस्त 1982 को दिल्ली में उनकी मृत्यु हुई।

फ़ादर बुल्के का व्यक्तित्व तपती धूप में शीतलता प्रदान करने वाला था। इसलिए लेखक का उनको याद करना एक उदास शांत संगीत सुनने जैसा था।

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प्रश्न 2.
‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ पाठ हमें क्या संदेश देता है?
उत्तर :
‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ एक संस्मरण है। इसके माध्यम से लेखक ‘सर्वेश्वर दयाल सक्सेना’ फादर बुल्के को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। फ़ादर बुल्के का जीवन हम भारतवासियों के लिए एक प्रेरणा है। फ़ादर बुल्के विदेशी होते हुए भी भारत, भारत की भाषा और संस्कृति से बहुत गहरे जुड़े हुए थे। उन्होंने स्वयं को सदैव एक भारतीय कहा था। उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए बहुत प्रयास किए था।

हम लोगों को फ़ादर बुल्के के जीवन से यह संदेश लेना चाहिए कि जब एक विदेशी अनजान देश, अनजान लोगों और अनजान भाषा को अपना बना सकता है तो हम अपने देश, अपने लोगों और अपनी भाषा को अपना क्यों नहीं बना सकते? हमें अपने भारतीय होने पर गर्व होना चाहिए। अपने देश और उसकी राष्ट्रभाषा हिंदी के सम्मान की रक्षा के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए।

प्रश्न 3.
लेखक को ‘परिमल’ के दिन क्यों याद आते थे?
अथवा
‘परिमल’ के बारे में आप क्या जानते हैं? इस संदर्भ में लेखक को फ़ादर कामिल बुल्के क्यों याद आते हैं?
उत्तर :
‘परिमल’ में काम करने वाले सभी लोग पारिवारिक रिश्ते में बंधे हुए लगते थे, जिसके बड़े सदस्य फ़ादर बुल्के थे। फ़ादर बुल्के परिमल की सभी गतिविधियों में भाग लेते थे। वे उनकी सभाओं में गंभीर बहस करते थे। उनकी रचनाओं पर खुले दिल से अपनी राय और सुझाव देते थे। लेखक को सदैव वे बड़े भाई की भूमिका में दिखाई देते थे। इसलिए लेखक को परिमल के दिन याद आ रहे थे। परिमल उनका शोधग्रंथ भी पढ़ा गया था। परिमल में उन्होंने अनेक कार्य किए थे जिसे भुलाया नहीं जा सकता।

प्रश्न 4.
फ़ादर बुल्के के परिवार के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर :
फ़ादर बुल्के का भरा-पूरा परिवार था। परिवार में दो भाई, एक बहन, माँ और पिता थे। फ़ादर बुल्के के पिता व्यवसायी थे। एक भाई पादरी था और दूसरा भाई कहीं काम करता था। उनकी बहन सख्त और जिद्दी स्वभाव की थी। उसकी शादी बहुत देर से हुई थी। उन्हें अपनी माँ से विशेष लगाव था। प्रायः वे अपनी माँ की यादों में डूब जाते थे। उनका अपने पिता और भाइयों से विशेष लगाव नहीं था। भारत आने के बाद फ़ादर दो या तीन बार ही बेल्जियम गए थे।

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प्रश्न 5.
फ़ादर बुल्के ने भारत में आकर कहाँ-कहाँ से शिक्षा प्राप्त की?
उत्तर :
फ़ादर रेम्सचैपल से संन्यासी बनकर भारत आए थे। उन्होंने दो साल तक ‘जिसेट संघ’ में रहकर पादरियों से धर्माचार की पढ़ाई की। ‘बाद में वे 9-10 सालों तक दार्जिलिंग में पढ़ते रहे। उन्होंने कोलकाता से बी० ए० और इलाहाबाद से एम० ए० की पढ़ाई की। प्रयाग में डॉ० धीरेंद्र वर्मा हिंदी के विभागाध्यक्ष थे। वहीं पर फ़ादर ने अपना शोध-कार्य पूरा किया। उनके शोध का विषय था-‘रामकथा उत्पत्ति और विकास’। इस तरह उन्होंने भारत आकर अपनी पढ़ाई को जारी रखा।

प्रश्न 6.
भारत से अपने लगाव के बारे में फ़ादर बुल्के क्या कहते थे?
उत्तर :
भारत से फ़ादर का स्वाभाविक लगाव था। अपने मन में आए संन्यासी के भाव को ईश्वर की इच्छा मानकर उन्होंने भारत आने का निर्णय किया। जब फ़ादर से पूछा गया कि वे भारत ही क्यों आए, तब उन्होंने कहा कि वे भारत के प्रति लगाव रखते हैं तथा अपने इसी लगाव के कारण वे भारत चले आए।

प्रश्न 7.
क्या फ़ादर बुल्के के जीवन का अनुकरण किया जा सकता है ?
उत्तर :
हाँ, फ़ादर बुल्के के जीवन का अनुकरण किया जा सकता है। वे मानव के रूप में एक दिव्य ज्योति थे, जो दूसरों को प्रकाश देने का काम करते थे। मानव सेवा उनका परम लक्ष्य था। मानव-समाज की भलाई के लिए वे कुछ भी कर सकते थे। इसलिए उनके जीवन एवं व्यक्तित्व का अनुकरण करना अपने आप में एक उत्तम कार्य है।

प्रश्न 8.
लेखक किसकी याद में नतमस्तक था?
उत्तर :
लेखक फ़ादर कामिल बुल्के की याद में नतमस्तक था, जो एक ज्योति के समान प्रकाशमान थे। लेखक फ़ादर की ममता, उनके हृदय में व्याप्त करुणा तथा उनकी तपस्या का अत्यधिक सम्मान करता था। इसी कारण उसका सिर फ़ादर की याद में झुका हुआ था।

प्रश्न 9.
‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ किस प्रकार की विधा है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
मानवीय करुणा की दिव्य चमक एक संस्मरण है। लेखक ने इस संस्मरण में अपने अतीत के पलों को उकेरा है। उन्होंने फ़ादर बुल्के तथा उनसे जुड़ी यादों का उल्लेख किया है। उनके प्रति अपने लगाव तथा प्रेम को उजागर किया है। उन्होंने बड़े ही भावपूर्ण स्वर में कहा है कि ‘फादर को याद करना एक उदास शांत संगीत को सुनने जैसा है।’

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प्रश्न 10.
फ़ादर की मृत्यु कब और कैसे हुई थी?
उत्तर :
फ़ादर का जन्म बेल्जियम के रैम्सचैपल नामक शहर में हुआ था। उनकी मृत्यु 18 अगस्त, 1982 को भारत में हुई थी। उनकी मृत्यु का कारण ज़हरबाद था।

प्रश्न 11.
हिंदी साहित्य में फ़ादर बुल्के का क्या योगदान था?
अथवा
फ़ादर बुल्के ने भारत में रहते हुए हिंदी के उत्थान के लिए क्या कार्य किए?
उत्तर :
फ़ादर बल्के हिंदी प्रेमी थे। हिंदी भाषा से उन्हें अत्यधिक लगाव था। वे हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते थे। इसी उन्होंने अपना शोधकार्य प्रयाग विश्वविद्याल के हिंदी विभाग से पूरा किया था। उनका सेंट जेवियर्स कॉलेज रॉची में हिंदी और संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष का कार्य भार संभालना उनके हिंदी-प्रेमी होने का पुख्ता प्रमाण है। उन्होंने पवित्र ग्रंथ बाइबिल का हिंदी में अनुवाद भी किया था।

पठित गद्याश पर आधारित बहुविकल्पी प्रश्न –

दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्नों के सही उत्तर वाले विकल्प चुनिए –
फ़ादर को याद करना एक उदास शांत संगीत को सुनने जैसा है। उनको देखना करुणा के निर्मल जल में स्नान करने जैसा था और उनसे बात करना कर्म के संकल्प से भरना था। मुझे ‘परिमल’ के वे दिन याद आते हैं जब हम सब एक पारिविरिक रिश्ते में बँधे जैसे थे जिसके बड़े फ़ादर बुल्के थे। हमारे हँसी-मजाक में वह निर्लिप्त शामिल रहते, हमारी गोष्ठियों में वह गंभीर बहस करते, हमारी रचनाओं पर बेबाक राय और सुझाव देते और हमारे घरों के किसी भी उत्सव और संस्कार में वह बड़े भाई और पुरोहित जैसे खड़े हो हमें अपने आशीषों से भर देते। मुझे अपना बच्चा और फ़ादर का उसके मुख में पहली बार अन्न डालना याद आता है और नीली आँखों की चमक में तैरता वात्सल्य भी जैसे किसी ऊँचाई पर देवदारु की छाया में खड़े हों।

(क) परिमल से आप क्या समझते हैं?
(i) एक सामाजिक संस्था का नाम है।
(ii) एक काव्य-रचना
(iii) एक नाटक मंडली का नाम है
(iv) साहित्यिक संस्था का नाम है
उत्तर :
(iv) साहित्यिक संस्था का नाम है।

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(ख) फ़ादर को याद करना कैसा है?
(i) खारे पानी के समान
(ii) एक उदास संगीत को सुनने के समान
(iii) नदी के जल स्नान करने के समान
(iv) समुद्र के जल पीने के समान
उत्तर :
(ii) एक उदास संगीत को सुनने के समान

(ग) किनको देखना करुणा के जल में स्नान करने के समान है?
(i) लेखक को
(ii) फ़ादर बुल्के को
(iii) पुरोहित को
(iv) बड़े भाई को
उत्तर :
(ii) फ़ादर बुल्के को

(घ) फ़ादर बुल्के की बातें क्या करने की प्रेरणा देती थी?
(i) परोपकार की
(ii) स्वच्छ रखने की
(ii) कर्म करने की
(iv) उपरोक्त सभी
उत्तर :
(iii) कर्म करने की

(ङ) घर के उत्सवों में फ़ादर की क्या भूमिका रहती थी?
(i) बड़े भाई की
(ii) बड़े भाई और पुरोहित की
(iii) पुरोहित की
(iv) मुखिया की
उत्तर :
(ii) बड़े भाई और पुरोहित की

उच्च चिंतन क्षमताओं एवं अभिव्यक्ति पर आधारित बहुविकल्पी प्रश्न –

पाठ पर आधारित प्रश्नों को पढ़कर सही उत्तर वाले विकल्प चुनिए –
(क) फ़ादर बुल्के किस भाषा को भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते थे?
(i) उर्दू
(ii) अंग्रेजी
(iii) संस्कृत
(iv) हिंदी
उत्तर :
(iv) हिंदी

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(ख) फ़ादर ने ‘जिसेट संघ’ में दो वर्ष किस विषय की पढ़ाई की?
(i) इंजीनियरिंग की
(ii) डॉक्टर की
(iii) धर्माचार की
(iv) शिक्षण की
उत्तर :
(iii) धर्माचार की

(ग) फ़ादर की उपस्थिति किस वृक्ष की छाया के समान प्रतीत होती थी?
(i) पीपल की
(ii) देवदार की
(iii) कीकर की
(iv) बरगद की
उत्तर :
(ii) देवदार की

(घ) फ़ादर कामिल बुल्के अकसर किसकी यादों में खो जाते थे?
(i) पत्नी की
(ii) बहन की
(iii) माँ की
(iv) पुत्री की
उत्तर :
(ii) माँ की

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(ङ) फ़ादर ने किसके प्रसिद्ध नाटक का रूपांतर हिंदी में किया?
(i) नीला पंछी
(ii) ब्लूबर्ड
(iii) मातरलिंक
(iv) लहरों के राजहंस
उत्तर :
(iii) मातरलिंक

महत्वपूर्ण गद्यांशों के अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर – 

1. फ़ादर को जहरबाद से नहीं मरना चाहिए था। जिसकी रगों में दूसरों के लिए मिठास भरे अमृत के अतिरिक्त और कुछ नहीं था उसके लिए इस ज़हर का विधान क्यों हो? यह सवाल किस ईश्वर से पूछे ? प्रभु की आस्था ही जिसका अस्तित्व था। वह देह की इस यातना की परीक्षा की उम्र की आखिरी देहरी पर क्यों दें?

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
2. ‘फ़ादर’ शब्द से किस व्यक्ति की ओर संकेत किया गया है और उनकी मृत्यु कैसे हुई ?
3. लोगों के प्रति फ़ादर का व्यवहार कैसा था?
4. ईश्वर के प्रति फ़ादर के क्या विचार थे ?
5. ‘उम्र की आखिरी देहरी’ का भाव स्पष्ट कीजिए। लेखक ने इन शब्दों का क्यों प्रयोग किया है?
उत्तर :
1. पाठ-मानवीय करुणा की दिव्य चमक, लेखक-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना।
2. बेल्जियम से भारत में राम-कथा पर शोध करने आए डॉ० कामिल बुल्के को ‘फ़ादर’ कहा गया है। उनकी मृत्यु गैंग्रीन से हुई थी। गैंग्रीन एक प्रकार का फोडा होता है, जिसका ज़हर सारे शरीर में फैल जाता है और व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है।
3. फ़ादर कामिल बुल्के का लोगों के प्रति अत्यंत प्रेमपूर्ण तथा मधुर व्यवहार था। वे सबसे खुले दिल से मिलते थे। उनके मन में सबके प्रति ममता तथा अपनत्व का भाव भरा था। वे सबको सुखी देखना चाहते थे।
4. फ़ादर कामिल बुल्के की ईश्वर पर अटूट आस्था थी। वे उस परमात्मा की ही इच्छा को ही सबकुछ मानकर अपने सभी कार्य करते थे। वे परमात्मा के दिए हुए सुख-दुखों को उसकी देन मानकर स्वीकार करते थे।
5. ‘उम्र की आखिरी देहरी’ से तात्पर्य बुढ़ापे से है। लेखक ने यहाँ इन शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा है कि जब फ़ादर बुल्के सारा जीवन लोगों की भलाई करते रहे, तो उन्हें बुढ़ापे में ईश्वर ने इतनी कष्टप्रद भयंकर बीमारी उनकी कौन-सी परीक्षा लेने के लिए दी थी?

फ़ादर को याद करना एक उदास शांत संगीत को सुनने जैसा है। उनको देखना करुणा के निर्मल जल में स्नान करने जैसा था और उनसे बात करना कर्म के संकल्प से भरना था। मुझे ‘परिमल’ के वे दिन याद आते हैं जब हम सब एक पारिवारिक रिश्ते में बँधे जैसे थे जिसके बड़े फ़ादर बुल्के थे। हमारे हँसी-मज़ाक में वह निर्लिप्त शामिल रहते, हमारी गोष्ठियों में वह गंभीर बहस करते, हमारी रचनाओं पर बेबाक राय और सुझाव देते और हमारे घरों के किसी भी उत्सव और संस्कार में वह बड़े भाई और पुरोहित जैसे खड़े हो हमें अपने आशीषों से भर देते।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. लेखक के अनुसार फ़ादर को याद करना कैसा और क्यों है?
2. लेखक के अनुसार फ़ादर को देखना और सुनना कैसा था?
3. ‘परिमल’ क्या था? वहाँ कैसी चर्चाएँ होती थीं?
4. घर के उत्सवों में फ़ादर का क्या योगदान रहता था?
उत्तर :
1. लेखक के अनुसार फ़ादर कामिल बुल्के को याद करना ऐसा है, जैसे हम खामोश बैठकर उदास शांत संगीत सुन रहे हों। उन्हें स्मरण करने से उदासी घेर लेती है, परंतु उनके शांत स्वरूप का ध्यान आते ही मनोरम संगीत के स्वर गूंजने लग जाते हैं।

2. लेखक के अनुसार फ़ादर बुल्के को देखने मात्र से ऐसा लगता था, जैसे उन्हें हम किसी पवित्र सरोवर के उज्ज्वल जल में स्नान करके पवित्र हो गए हों। उनसे बातचीत करना तथा उनकी बातें सुनना कर्म करने की प्रेरणा भर देता था।

3. ‘परिमल’ एक साहित्यिक संस्था थी। इसमें समय-समय पर साहित्यिक विचार गोष्ठियाँ आयोजित की जाती थीं, जिनमें तत्कालीन साहित्य की विभिन्न विधाओं पर चर्चा होती थी। इन गोष्ठियाँ में नए-पुराने सभी साहित्यकार अपने-अपने विचार व्यक्त करते थे।

4. घर के उत्सवों में फ़ादर बुल्के सबके साथ मिल-जुलकर उत्साहपूर्वक भाग लेते थे। वे एक बड़े भाई के समान अथवा एक पारिवारिक पुरोहित के समान सबको आशीर्वाद देते थे। उनके इस व्यवहार से सभी पुलकित हो उठते थे।

3. फ़ादर बुल्के संकल्प से संन्यासी थे। कभी-कभी लगता है वह मन में संन्यासी नहीं थे। रिश्ता बनाते थे तो तोड़ते नहीं थे। दसियों साल बाद मिलने के बाद भी उसकी गंध महसूस होती थी। वह जब भी दिल्ली आते ज़रूर मिलते-खोजकर, समय निकालकर, गरमी, सरदी, बरसात झेलकर मिलते, चाहे दो मिनट के लिए ही सही। यह कौन संन्यासी करता है?

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अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. फ़ादर बुल्के को ‘संकल्प से संन्यासी’ कहने से लेखक का क्या अभिप्राय है?
2. रिश्तों के संबंध में फ़ादर बुल्के के क्या विचार थे ?
3. लेखक ने किस गंध के महसूस होने की बात कही है?
4. ‘यह कौन संन्यासी करता है?’ इस कथन से लेखक का क्या आशय है?
उत्तर :
1. लेखक के इस कथन का अभिप्राय है कि फ़ादर बुल्के ने दृढ़ निश्चयपूर्वक संन्यास लिया था। उन्होंने किसी के कहने अथवा दबाव में आकर संन्यास नहीं लिया था। किसी लालच के वशीभूत होकर अथवा कर्म-क्षेत्र से पलायन करने के लिए भी उन्होंने संन्यास नहीं लिया था। उन्होंने स्वेच्छा से संन्यास लिया था।

2. एक संन्यासी होते हुए भी फ़ादर बुल्के रिश्तों की गरिमा समझते थे। तथा रिश्तों को निभाना जानते थे। जिसके साथ उनका कोई संबंध बन जाता था, उसे वे अंतकाल तक निभाते थे। वे रिश्ते जोड़कर तोड़ते नहीं थे।

3. लेखक कहता है कि यदि फ़ादर बुल्के से कई वर्षों बाद मुलाकात होती थी, तो भी वे बड़ी प्रगाढ़ता से मिलते थे। उनके साथ जो रिश्ते थे, उसकी गहराई की सुगंध उस मिलन से महसूस होती थी। उनका अपनापन रिश्तों को और भी अधिक मज़बूती देता था।

4. लेखक बताता है कि फ़ादर बुल्के जब कभी दिल्ली आते थे, तो वे अपने व्यस्त कार्यक्रम में से समय निकालकर उससे मिलने अवश्य आते थे। इस प्रकार मिलने में चाहे उन्हें गरमी अथवा सरदी का सामना करना पड़ता, वे इसकी भी चिंता नहीं करते थे। उनकी इसी स्वभावगत विशेषता के कारण लेखक को कहना पड़ा कि मिलने के लिए ऐसा प्रयास कोई भी संन्यासी नहीं करता है।

4. उनकी चिंता हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखने की थी। हर मंच में इसकी तकलीफ़ बयान करते, इसके लिए अकाट्य तर्क देते। बस इसी एक सवाल पर उन्हें झुंझलाते देखा है और हिंदी वालों द्वारा ही हिंदी की उपेक्षा पर दुख करते उन्हें पाया है। घर-परिवार के बारे में, निजी दुख-तकलीफ़ के बारे में पूछना उनका स्वभाव था और बड़े से बड़े दुख में उनके मुख से सांत्वना के जादू भरे दो शब्द सुनना एक ऐसी रोशनी से भर देता था जो किसी गहरी तपस्या से जनमती है।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. फ़ादर कामिल बुल्के को किसकी और क्यों चिंता रहती थी? इसे वे कैसे व्यक्त करते थे?
2. फ़ादर बुल्के झुंझलाते क्यों थे? उन्हें क्या दुख था?
3. लेखक ने यहाँ फ़ादर बुल्के के किस स्वभाव की विशेषता का वर्णन किया है?
4. फ़ादर बुल्के के सांत्वना भरे शब्द कैसे होते थे?
उत्तर :
1. फ़ादर बुल्के को इस बात की चिंता रहती थी कि हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान नहीं मिल रहा है। हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिलाने के लिए वे जहाँ कहीं भी वक्तव्य देते थे, अपनी इस चिंता को व्यक्त करते थे तथा हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन करने के पक्ष में उचित तर्क देते थे।

2. फ़ादर बुल्के इसी प्रश्न पर झुंझलाते थे कि हिंदी को अपने ही देश में उचित स्थान नहीं मिल पा रहा। उन्हें इस बात पर बहुत दुख था कि स्वयं हिंदी वाले ही हिंदी की उपेक्षा कर रहे हैं। हिंदी वालों द्वारा हिंदी का अनादर तथा अनदेखी करने पर वे बहुत दुखी हो जाते थे।

3. इन पंक्तियों में लेखक ने फ़ादर बुल्के के स्वभाव का उल्लेख करते हुए कहा है कि वे जब भी किसी से मिलते थे, तो एक आत्मीय के रूप में उस व्यक्ति से उसके घर-परिवार, उसके सुख-दुख आदि के बारे में पूछते थे।

4. यदि कोई दुखी व्यक्ति फ़ादर बुल्के को अपनी दुखभरी कहानी सुनाता था, तो फ़ादर उस व्यक्ति को इस प्रकार से सांत्वना देते थे कि उस व्यक्ति को लगता था मानो उसके सभी कष्ट व दुख दूर हो गए हों। लेखक को लगता है कि फ़ादर ने किसी के दुख को दूर करने वाले सांत्वना के इन शब्दों को गहरी तपस्या से ही प्राप्त किया था।

5. इस तरह हमारे बीच से वह चला गया जो हममें से सबसे अधिक छायादार फल-फूल गंध से भरा और सबसे अलग, सबका होकर, सबसे ऊँचाई पर, मानवीय करुणा की दिव्य चमक में लहलहाता खड़ा था। जिसकी स्मृति हम सबके मन में जो उनके निकट थे किसी यज्ञ की पवित्र आग की आँच की तरह आजीवन बनी रहेगी। मैं उस पवित्र ज्योति की याद में श्रद्धानत हूँ।

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अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न :
1. लेखक ने फ़ादर बुल्के को ‘छायादार फल-फूल, गंध से भरा’ क्यों कहा है ?
2. लेखक के लिए फ़ादर की स्मृति कैसी और क्यों है?
3. लेखक ने फ़ादर को कैसे श्रद्धांजलि दी?
4. लेखक के लिए फ़ादर बुल्के क्या थे?
उत्तर :
1. लेखक ने फ़ादर बुल्के के स्वभाव में सबके प्रति ममता, स्नेह, दया, करुणा आदि गुणों को देखकर कहा है कि वे एक ऐसे विशाल वृक्ष के समान थे जो सबको अपनी छाया, फल-फूल और सुगंध प्रदान करता रहता है; परंतु स्वयं कुछ नहीं लेता। फ़ादर सबको अपना स्नेह बाँटते रहे।

2. लेखक के लिए फ़ादर बुल्के की स्मृति पवित्र भावनाओं से युक्त है। जैसे किसी यज्ञ की पवित्र अग्नि की तपस सदा अनुभव की जा सकती है, उसी प्रकार से लेखक के मन में भी फ़ादर की पुनीत स्मृति आजीवन बनी रहेगी। उनकी मानवीय करुणा ने लेखक के मन में यह भावना जागृत की है।

3. लेखक ने अपने इस आलेख ‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ के माध्यम से फ़ादर को श्रद्धांजलि दी है। लेखक उनकी पवित्र एवं करुणामय जीवन-पद्धति से प्रभावित रहा है।

4. लेखक के लिए फ़ादर कामिल बुल्के मानवीय करुणा की दिव्य चमक के समान थे। वे लेखक के लिए बड़े भाई के समान मार्गदर्शक, आशीर्वाददाता तथा शुभचिंतक थे। लेखक को उन जैसा हिंदी-प्रेमी, संन्यासी होते हुए भी संबंधों को गरिमा प्रदान करने वाला, सबके सुख-दुख का साथी अन्य कोई नहीं दिखाई देता था।

मानवीय करुणा की दिव्या चमक Summary in Hindi

लेखक-परिचय :

जीवन-नई कविता के सशक्त कवि तथा प्रतिभावान साहित्यकार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में सन 1927 ई० हुआ था। सन 1949 ई० में इन्होंने इलाहाबाद से एम० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। इन्होंने कुछ वर्ष तक अध्यापन कार्य करने के पश्चात आकाशवाणी में सहायक प्रोड्यूसर के रूप में काम किया। इन्होंने ‘दिनमान’ में उपसंपादक तथा बच्चों की पत्रिका ‘पराग’ में संपादक के रूप में कार्य किया था। इन्हें ‘टियों पर टंगे लोग’ कविता-संग्रह पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ था। सन 1983 ई० में इनका निधन हो गया था।

रचनाएँ – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने साहित्य की विभिन्न विधाओं को अपनी लेखनी से समृद्ध किया। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं –
कविता-संग्रह – काठ की घंटियाँ, खूटियों पर टँगे लोग, जंगल का दर्द, कुआनो नदी।
उपन्यास – पागल कुत्तों का मसीहा, सोया हुआ जल।
कहानी संग्रह – लड़ाई।
नाटक – बकरी।
लेख-संग्रह – चरचे और चरखे।
बाल-साहित्य-लाख की नाक, बतूता का जूता, भौं-भौं, खौं-खौँ।

भाषा-शैली – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की भाषा-शैली अत्यंत सहज, सरल, व्यावहारिक, भावपूर्ण तथा प्रवाहमयी है। इन्होंने कहीं भी असाधारण अथवा कलिष्ट भाषा का प्रयोग नहीं किया है। मानवीय करुणा की दिव्य चमक इनका फ़ादर कामिल बुल्के से संबंधित संस्मरण है, जिसमें लेखक ने उनसे संबंधित कुछ अंतरंग प्रसंगों को उजागर किया है। फ़ादर की मृत्यु पर लेखक का यह कथन इसी ओर संकेत करता है-‘फ़ादर को ज़हरबाद से नहीं मरना चाहिए था। जिसकी रगों में दूसरे के लिए मिठास भरे अमृत के अतिरिक्त कुछ नहीं था उसके लिए इस ज़हर का विधान क्यों?’ लेखक ने वात्सल्य, यातना, आकृति, साक्षी, वृत्त जैसे तत्सम शब्दों के साथ ही महसूस, ज़हर, छोर, सँकरी, कब्र जैसे विदेशी तथा देशज शब्दों का भी भरपूर प्रयोग किया है। लेखक ने भावपूर्ण शैली में फ़ादर को स्मरण करते हुए लिखा है-‘फ़ादर को याद करना एक उदास शांत संगीत को सुनने जैसा है। उनको देखना करुणा के निर्मल जल में स्नान करने जैसा था और उनसे बात करना कर्म के संकल्प से भरना था।’ लेखक ने फ़ादर से संबंधित अपनी स्मृतियों को अत्यंत सहज रूप से प्रस्तुत किया है।

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पाठ का सार :

‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ पाठ के लेखक ‘सर्वेश्वर दयाल सक्सेना’ हैं। यह पाठ एक संस्मरण है। लेखक ने इस पाठ में फ़ादर कामिल बुल्के से संबंधित स्मृतियों का वर्णन किया है। फादर बुल्के ने अपनी जन्मभूमि रैम्सचैपल (बेल्जियम) को छोड़कर भारत को अपनी कार्यभूमि बनाया। उन्हें हिंदी भाषा और बोलियों से विशेष लगाव था। फ़ादर की मृत्यु जहरबाद से हुई थी। उनके साथ ऐसा होना ईश्वर का अन्याय था। इसका कारण यह था कि वे सारी उम्र दूसरों को अमृत सी मिठास देते रहे थे।

उनका व्यक्तित्व ही नहीं अपितु स्वभाव भी साधुओं जैसा था। लेखक उन्हें पैंतीस सालों से जानता था। वे जहाँ भी रहे, अपने प्रियजनों पर ममता लुटाते रहे। फ़ादर को याद करना, देखना और सुनना-ये सबकुछ लेखक के मन में अजीब शांत-सी हलचल मचा देते थे। उसे ‘परिमल’ के वे दिन याद आते हैं, जब वह उनके साथ काम करता था। फादर बड़े भाई की भूमिका में सदैव सहायता के लिए तत्पर रहते थे। उनका वात्सल्य सबके लिए देवदार पेड़ की छाया के समान था। लेखक को यह समझ में नहीं आता कि वह फ़ादर की बात कहाँ से शुरू करे।

फ़ादर जब भी मिलते थे, जोश में होते थे। उनमें प्यार और ममता कूट-कूटकर भरी हुई थी। किसी ने भी कभी उन्हें क्रोध में नहीं देखा था। फ़ादर बेल्जियम में इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में थे, जब वे संन्यासी होकर भारत आ गए। उनका पूरा परिवार बेल्जियम के रैम्सचैपल में रहता था। भारत में रहते हुए वे अपनी जन्मभूमि रैम्सचैपल और अपनी माँ को प्रायः याद करते थे। वे अपने विषय में बताते थे कि उनकी माँ ने उनके बचपन में ही घोषणा कर दी थी कि यह लड़का हाथ से निकल गया है और उन्होंने अपनी माँ की बात पूरी कर दी। वे संन्यासी बनकर भारत के गिरजाघर में आ गए।

आरंभ के दो साल उन्होंने धर्माचार की पढ़ाई की। इसके बाद 9-10 साल तक दार्जिलिंग में पढ़ाई की। कलकत्ता से उन्होंने बी० ए० तथा इलाहाबाद से एम०ए० किया था। वर्ष 1950 में उन्होंने अपना शोधकार्य प्रयाग विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से पूरा किया था। उनके शोधकार्य का विषय-‘रामकथा उत्पत्ति और विकास’ था। उन्होंने मातरलिंक के प्रसिद्ध नाटक ‘ब्लूबर्ड’ का हिंदी में ‘नीलपंछी’ नाम से रूपांतर किया। वे सेंट जेवियर्स कॉलेज रांची में हिंदी और संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष रहे। यहाँ रहकर उन्होंने अपना प्रसिद्ध अंग्रेजी-हिंदी कोश तैयार किया। उन्होंने बाइबिल का हिंदी में अनुवाद भी किया। राँची में उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा था।

फादर बुल्के मन से नहीं अपितु संकल्प से संन्यासी थे। वे जिससे एक बार रिश्ता जोड़ लेते थे, उसे कभी नहीं तोड़ते थे। दिल्ली आकर कभी वे बिना मिले नहीं जाते थे। मिलने के लिए सभी प्रकार की तकलीफों को सहन कर लेते थे। ऐसा कोई भी संन्यासी नहीं करता था। वे हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते थे। वे हर सभा में हिंदी को सर्वोच्च भाषा बनाने की बात करते थे। वे उन लोगों पर झुंझलाते थे, जो हिंदी भाषा वाले होते हुए भी हिंदी की उपेक्षा करते थे। उनका स्वभाव सभी लोगों की दुख-तकलीफों में उनका साथ देता था। उनके मुँह से निकले सांत्वना के दो बोल जीवन में रोशनी भर देते थे।

लेखक की जब पत्नी और पुत्र की मृत्यु हुई, उस समय फ़ादर ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, “हर मौत दिखाती है जीवन को नई राह।” लेखक को फ़ादर की बीमारी का पता नहीं चला। वह उनकी मृत्यु के बाद दिल्ली पहुंचा था। वे चिरशांति की अवस्था में लेटे थे। उनकी मृत्यु 18 अगस्त 1982 को हुई। उन्हें कश्मीरी गेट के निकलसन कब्रगाह में ले जाया गया। उनके ताबूत के साथ रघुवंश जी, जैनेंद्र कुमार, डॉ० सत्य प्रकाश, अजित कुमार, डॉ० निर्मला जैन, विजयेंद्र स्नातक और रघुवंश जी का बेटा आदि थे। साथ में मसीही समुदाय के लोग तथा पादरीगण थे।

सभी दुखी और उदास थे। उनका अंतिम संस्कार मसीही विधि से हुआ। उनकी अंतिम यात्रा में रोने वालों की कमी नहीं थी। इस तरह एक छायादार व फल-फूल गंध से भरा वृक्ष हम सबसे अलग हो गया। उनकी स्मृति जीवन भर यज्ञ की पवित्र अग्नि की आँच की तरह सबके मन में बनी रहेगी। लेखक उनकी पवित्र ज्योति की याद में श्रद्धा से नतमस्तक है।

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कठिन शब्दों के अर्थ :

देह – शरीर। यातना – कष्ट। परीक्षा – इम्तिहान। आकृति – आकार। साक्षी – गवाह। महसूस – अनुभव। निर्मल – साफ़, स्वच्छ। संकल्प – निश्चय। उत्सव – त्योहार, शुभ अवसर। आशीष – आशीर्वाद। वात्सल्य – ममता, प्यार। स्मृति – यादें। डूब जाना – खो जाना। सांत्वना – सहानुभूति। छोर – किनारा। वृत्त – घेरा। आवेश – जोश, उत्साह। जहरबाद – गैंग्रीन, एक तरह का ज़हरीला और कष्ट साध्य फोड़ा। आस्था – विश्वास, श्रद्धा। देहरी – दहलीज़। सँकरी – तंग। पादरी – ईसाई धर्म का पुरोहित या आचार्य। आतुर – अधीर, उत्सुक। निर्लिप्त – आसक्ति रहित, जो लिप्त न हो। आवेश – जोश, उत्साह। लबालब – भरा हुआ। गंध – महक। धर्माचार – धर्म का पालन या आचरण। रूपांतर – किसी वस्तु का बदला हुआ रूप। अकाट्य – जो कट न सके, जो बात काटी न जा सके। विरल – कम मिलने वाली। ताबूत – शव या मुरदा ले जाने वाला संदूक या बक्सा। करील – झाड़ी के रूप में उगने वाला एक कँटीला और बिना पत्ते का पौधा। गैरिक वसन – साधुओं द्वारा धारण किए जाने वाले गेरुए वस्त्र। श्रद्धानत – प्रेम और भक्तियुक्त पूज्यभाव।

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