JAC Class 12 Political Science Solutions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

Jharkhand Board JAC Class 12 Political Science Solutions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध Textbook Exercise Questions and Answers.

JAC Board Class 12 Political Science Solutions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

Jharkhand Board Class 12 Political Science भारत के विदेश संबंध InText Questions and Answers

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प्रश्न 1.
चौथे अध्याय में एक बार फिर से जवाहरलाल नेहरू ! क्या वे कोई सुपरमैन थे, या उनकी भूमिका महिमा मंडित कर दी गई है?
उत्तर:
जवाहर लाल नेहरू वास्तव में एक सुपरमैन की भूमिका में ही थे। उन्होंने न केवल भारत के स्वाधीनता आंदोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी बल्कि स्वतंत्रता के पश्चात् भी उन्होंने राष्ट्रीय एजेण्डा तय करने में निर्णायक भूमिका निभायी। नेहरूजी प्रधानमन्त्री के साथ – साथ विदेश मन्त्री भी थे। उन्होंने भारत की विदेश नीति की रचना और क्रियान्वयन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। नेहरू की विदेश नीति के तीन बड़े उद्देश्य थे-

  1. कठिन संघर्ष से प्राप्त सम्प्रभुता को बचाए रखना,
  2. क्षेत्रीय अखण्डता को बनाए रखना और
  3. तेज रफ्तार से आर्थिक विकास करना। नेहरू इन उद्देश्यों को गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाकर हासिल करना चाहते थे।

इसके अतिरिक्त पण्डित नेहरू द्वारा अपनायी गई राष्ट्रवाद, अन्तर्राष्ट्रीयवाद व पंचशील की अवधारणा आज भी भारतीय विदेश नीति के आधार स्तम्भ माने जाते हैं।

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प्रश्न 2.
हम लोग आज की बनिस्बत जब ज्यादा गरीब, कमजोर और नए थे तो शायद दुनिया में हमारी पहचान कहीं ज्यादा थी। हैं ना विचित्र बात?
उत्तर:
शीत युद्ध के दौरान दुनिया दो खेमों – पूँजीवादी और साम्यवादी – में विभाजित हो गई थी। लेकिन भारत ने अपने स्वतन्त्र अस्तित्व को बनाये रखने के लिए किसी भी खेमे में सम्मिलित न होने का निर्णय किया और स्वतन्त्र विदेश नीति का संचालन करते हुए गुटनिरपेक्षता की नीति अपनायी। इसी कारण से भारत की दुनिया में एक विशेष पहचान थी और दुनिया के अल्पविकसित और विकासशील देशों ने भारत की इस नीति का अनुसरण भी किया। लेकिन शीतयुद्ध के अन्त, बदलती विश्व व्यवस्था तथा वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति की प्रासंगिकता पर एक प्रश्न चिह्न लग गया है तथा उसका झुकाव भी अमेरिका की ओर किसी- न-किसी रूप में दिखाई दे रहा है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि आज की बनिस्बत हम लोग जब ज्यादा गरीब, कमजोर और नए थे तो शायद दुनिया में हमारी पहचान ज्यादा थी।

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प्रश्न 3.
“मैंने सुना है कि 1962 के युद्ध के बाद जब लता मंगेशकर ने ‘ऐ मेरे वतन के लोगो..’ गाया तो नेहरू भरी सभा में रो पड़े थे। बड़ा अजीब लगता है यह सोचकर कि इतने बड़े लोग भी किसी भावुक लम्हे में रो पड़ते हैं!”
उत्तर:
यह बिल्कुल सत्य है कि जिन लोगों में राष्ट्रवाद व देश-प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी हुई हो और उनके सामने राष्ट्र का गुणगान किया जाए तो ऐसे लोगों का भावुक होना स्वाभाविक है। जहाँ तक पण्डित नेहरू का सवाल है, वे महान राष्ट्रवादी नेता थे। उन्होंने जीवन पर्यन्त राष्ट्र की सेवा की। इस गीत को सुनकर उनके आँसू इसलिए छलक पड़े क्योंकि इस गीत में देश के उन शहीदों की कुर्बानी की बात कही गयी थी जिन्होंने हँसते-हँसते अपनी जान न्यौछावर कर दी थी। उन्हीं की कुर्बानी ने देश को स्वतंत्रता दिलवायी थी।

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प्रश्न 4.
“हम ऐसा क्यों कहते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ? नेता झगड़े और सेनाओं के बीच युद्ध हुआ। ज्यादातर आम नागरिकों को इनसे कुछ लेना-देना न था।”
उत्तर:
भारत – पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में सेनाओं ने एक-दूसरी सेनाओं से संघर्ष किया तथा राजनेताओं ने इस संघर्ष की अनुमति दी। परन्तु युद्ध का प्रभाव आम जन-जीवन पर भी पड़ता है क्योंकि युद्ध के पीछे की परिस्थितियाँ आम नागरिकों पर भी प्रभाव डालती हैं। दूसरे, सैनिक भी आम नागरिकों में से ही होते हैं। शहीद सैनिकों के परिवारों को आंसुओं के घूँट पीने पड़ते हैं। जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि युद्ध चाहे नेताओं के वैचारिक स्तर पर हो अथवा सेनाओं के बीच हो, आम जन-जीवन इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।

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प्रश्न 5.
इस बात से तो ऐसा जान पड़ता है कि भारत सोवियत खेमे में शामिल हो गया था। क्या सोवियत संघ के साथ इस 20 वर्षीय सन्धि पर हस्ताक्षर करने के बावजूद हम कह सकते हैं कि भारत गुटनिरपेक्षता की नीति पर अमल कर रहा था?
उत्तर:
1971 में हुई भारत – सोवियत मैत्री सन्धि से गुटनिरपेक्षता के सिद्धान्तों का उल्लंघन नहीं हुआ, क्योंकि इस सन्धि के पश्चात् भी भारत गुटनिरपेक्षता के मौलिक सिद्धान्तों पर कायम रहा। वह वारसा गुट में शामिल नहीं हुआ था। उसने अपनी प्रतिरक्षा के लिए बढ़ रहे खतरे, अमेरिका तथा पाकिस्तान में बढ़ रही घनिष्ठता व सहायता के कारण रूस से 20 वर्षीय संधि की थी। उसने संधि के बावजूद गुटनिरपेक्षता की नीति पर अमल किया। यही कारण है कि जब सोवियत संघ की सेनाएँ अफगानिस्तान में पहुँचीं तो भारत ने इसकी आलोचना की। इसलिए यह कहना कि सोवियत मैत्री संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति पर अमल नहीं किया, गलत है।

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प्रश्न 6.
बड़ा घनचक्कर है! क्या यहाँ सारा मामला परमाणु बम बनाने का नहीं है? हम ऐसा सीधे-सीधे क्यों नहीं कहते?
उत्तर:
भारत ने सन् 1974 में परमाणु परीक्षण किया तो इसे उसने शांतिपूर्ण परीक्षण करार दिया। भारत ने मई, 1998 में परमाणु परीक्षण किए तथा यह जताया कि उसके पास सैन्य उद्देश्यों के लिए अणु शक्ति को प्रयोग में लाने की क्षमता है। इस दृष्टि से यह मामला यद्यपि परमाणु बम बनाने का ही था तथापि भारत की परमाणु नीति में सैद्धान्तिक तौर पर यह बात स्वीकार की गई है किं भारत अपनी रक्षा के लिए परमाणु हथियार रखेगा लेकिन इन हथियारों का प्रयोग ‘पहले नहीं’ करेगा।

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प्रश्न 1.
इन बयानों के आगे सही या गलत का निशान लगाएँ-
(क) गुनिरपेक्षता की नीति अपनाने के कारण भारत, सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका, दोनों की सहायता हासिल कर सका।
(ख) अपने पड़ोसी देशों के साथ भारत के सम्बन्ध शुरूआत से ही तनावपूर्ण रहे।
(ग) शीतयुद्ध का असर भारत-पाक सम्बन्धों पर भी पड़ा।
(घ) 1971 की शान्ति और मैत्री की सन्धि संयुक्त राज्य अमेरिका से भारत की निकटता का परिणाम थी।
उत्तर:
(क) सही
(ख) गलत
(ग) सही
(घ) गलत।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित का सही जोड़ा मिलाएँ:

(क) 1950-64 के दौरान भारत की विदेश नीति का लक्ष्य (i) तिब्बत के धार्मिक नेता जो सीमा पार करके भारत चले आए।
(ख) पंचशील (ii) क्षेत्रीय अखण्डता और सम्प्रभुता की रक्षा तथा अर्थिक विकास।
(ग) बांडुंग सम्मेलन (iii) शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धान्त।
(घ) दलाई
लामा
(iv) इसकी परिणति गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में हुई।

उत्तर:

(क) 1950-64 के दौरान भारत की विदेश नीति का लक्ष्य (ii) क्षेत्रीय अखण्डता और सम्प्रभुता की रक्षा तथा अर्थिक विकास।
(ख) पंचशील (iii) शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धान्त।
(ग) बांडुंग सम्मेलन (iv) इसकी परिणति गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में हुई।
(घ) दलाई लामा (i) तिब्बत के धार्मिक नेता जो सीमा पार करके भारत चले आए।

प्रश्न 3.
नेहरू विदेश नीति के संचालन को स्वतन्त्रता का एक अनिवार्य संकेतक क्यों मानते थे? अपने उत्तर में दो कारण बताएँ और उनके पक्ष में उदाहरण भी दें।
उत्तर:
नेहरू विदेश नीति के संचालन को स्वतन्त्रता का एक अनिवार्य संकेत इसलिए मानते थे क्योंकि स्वतन्त्रता किसी भी देश की विदेश नीति के संचालन की प्रथम एवं अनिवार्य शर्त है। स्वतंत्रता से तात्पर्य है। राष्ट्र के पास प्रभुसत्ता का होना तथा प्रभुसत्ता के दो पक्ष हैं।

  1. आंतरिक संप्रभुता और
  2. बाह्य संप्रभुता। इसमें बाह्य संप्रभुता का सम्बन्ध विदेश नीति का स्वतन्त्रतापूर्वक बिना किसी दूसरे राष्ट्र के दबाव के संचालित करना है।

दो कारण और उदाहरण:

  1. जो देश किसी दबाव में आकर अपनी विदेश नीति का निर्धारण करता है तो उसकी स्वतंत्रता निरर्थक होती है तथा एक प्रकार से दूसरे देश के अधीन हो जाता है व उसे अनेक बार अपने राष्ट्रीय हितों की भी अनदेखी करनी पड़ती है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए नेहरू ने शीत युद्ध काल में किसी भी गुट में शामिल न होने और असंलग्नता की नीति को अपनाकर दोनों गुटों के दबाव को नहीं माना।
  2. भारत स्वतन्त्र नीति को इसलिए अनिवार्य मानता था ताकि यह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उपनिवेशवाद, जातीय भेदभाव, रंग-भेदभाव का मुकाबला डटकर कर सके। भारत ने 1949 में साम्यवादी चीन को मान्यता प्रदान की तथा सुरक्षा परिषद् में उसकी सदस्यता का समर्थन किया और सोवियत संघ ने हंगरी पर जब आक्रमण किया तो उसकी निंदा की।

प्रश्न 4.
“ विदेश नीति का निर्धारण घरेलू जरूरत और अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के दोहरे दबाव में होता है।” 1960 के दशक में भारत द्वारा अपनाई गई विदेश नीति से एक उदाहरण देते हुए अपने उत्तर की पुष्टि करें।
उत्तर:
किसी देश की विदेश नीति पर घरेलू और अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण का असर पड़ता है। विकासशील देशों के पास अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था के भीतर अपने सरोकारों को पूरा करने के लिए जरूरी संसाधनों का अभाव होता है। ऐसे देशों का जोर इस बात पर होता है कि उनके पड़ोस में अमन-चैन कायम रहे और विकास होता रहे। 1960 के दशक में भारत द्वारा गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाना भी इसका उदाहरण माना जा सकता है। उदाहरणार्थ – तत्कालीन समय में भारत की आर्थिक स्थिति अत्यधिक दयनीय थी, इसलिए उसने शीत युद्ध के काल में किसी भी गुट का समर्थन नहीं किया और दोनों ही गुटों से आर्थिक सहायता प्राप्त करता रहा।

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प्रश्न 5.
अगर आपको भारत की विदेश नीति के बारे में फैसला लेने को कहा जाए तो आप इसकी किन बातों को बदलना चाहेंगे? ठीक तरह यह भी बताएँ कि भारत की विदेश नीति के किन दो पहलुओं को आप बरकरार रखना चाहेंगे? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दीजिए
उत्तर:

  • भारतीय विदेश नीति में निम्न दो बदलाव लाना चाहूँगा-
    1. मैं वर्तमान एकध्रुवीय विश्व में भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति में बदलाव लाना चाहूँगा क्योंकि वर्तमान वैश्वीकरण और उदारीकरण के युग में गुट निरपेक्षता की नीति अप्रासंगिक हो गयी है।
    2. मैं भारत की विदेश नीति में चीन एवं पाकिस्तान के साथ जिस प्रकार की नीति अपनाई जा रही है उसमें बदलाव लाना चाहूँगा, क्योंकि इसके वांछित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं।
  • इसके अतिरिक्त मैं भारतीय विदेश नीति के निम्नलिखित दो पहलुओं को बरकरार रखना चाहूँगा
    1. सी. टी.बी. टी. के बारे में वर्तमान दृष्टिकोण को और परमाणु नीति की वर्तमान नीति को जारी रखूँगा।
    2. मैं संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता जारी रखते हुए विश्व बैंक अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से सहयोग जारी रखूँगा।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए-
(क) भारत की परमाणु नीति।
(ख) विदेश नीति के मामलों पर सर्व सहमति
उत्तर:
(क) भारत की परमाणु नीति- भारत ने मई, 1974 और 1998 में परमाणु परीक्षण करते हुए अपनी परमाणु नीति को नई दिशा प्रदान की। इसके प्रमुख पक्ष निम्नलिखित हैं-

  1. आत्मरक्षार्थ – भारत ने आत्मरक्षा के लिए परमाणु हथियारों का निर्माण किया, ताकि कोई अन्य देश भारत पर परमाणु हमला न कर सक।
  2. प्रथम प्रयोग नहीं – भारत ने परमाणु हथियारों का युद्ध में पहले प्रयोग न करने की घोषणा कर रखी है।
  3. भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर विश्व में एक शक्तिशाली राष्ट्र बनना चाहता है तथा विश्व में प्रतिष्ठा प्राप्त करना चाहता है।
  4. परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों की भेदभावपूर्ण नीति का विरोध करना।

(ख) विदेश नीति के मामलों पर सर्व सहमति – विदेश नीति के मामलों पर सर्वसहमति आवश्यक है, क्योंकि यदि एक देश की विदेश नीति के मामलों में सर्वसहमति नहीं होगी, तो वह देश अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर अपना पक्ष प्रभावशाली ढंग से नहीं रख पायेगा। भारत की विदेश नीति के महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं जैसे गुटनिरपेक्षता, साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद का विरोध, दूसरे देशों से मित्रतापूर्ण सम्बन्ध बनाना तथा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा को बढ़ावा देना इत्यादि पर सदैव सर्वसहमति रही है।

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प्रश्न 7.
भारत की विदेश नीति का निर्माण शान्ति और सहयोग के सिद्धान्तों को आधार मानकर हुआ। लेकिन, 1962-1971 की अवधि यानी महज दस सालों में भारत को तीन युद्धों का सामना करना पड़ा। क्या आपको लगता है कि यह भारत की विदेश नीति की असफलता है अथवा आप इसे अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम मानेंगे? अपने मंतव्य के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
आजादी के समय भारत ने अपनी विदेश नीति का निर्माण शान्ति और सहयोग के सिद्धान्तों के आधार पर किया। परन्तु 1962 से लेकर 1971 तक भारत को तीन युद्ध लड़ने पड़े तो इसके पीछे कुछ हद तक भारत की विदेश नीति की असफलता भी मानी जाती है तथा अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम भी। यथा-
1. चीन का आक्रमण ( 1962 ):
चीन और भारत के दोस्ताना रिश्ते में गंभीर विवाद तब पैदा हुआ जब 1950 में चीन ने तिब्बत पर अपना अधिकार जमा लिया। क्योंकि इस वजह से भारत और चीन के बीच ऐतिहासिक रूप से जो मध्यवर्ती राज्य बना चला आ रहा था, वह खत्म हो गया। शुरू में भारत (सरकार) ने इसका खुलकर विरोध नहीं किया था । भारत की बेचैनी तब बढ़ी जब चीन ने तिब्बत की संस्कृति को दबाना शुरू किया। भारत और चीन के बीच एक सीमा विवाद भी उठ खड़ा हुआ था। यह विवाद चीन से लगी लंबी सीमा रेखा के पश्चिमी और पूर्वी छोर के बारे में था। चीन ने भारतीय भू-क्षेत्र में पड़ने वाले अक्साई चीन और अरुणाचल प्रदेश के अधिकांश हिस्सों पर अपना दावा किया। दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच लंबी चर्चा और वार्तालाप के बावजूद इस मतभेद को सुलझाया नहीं जा सका। इसलिए भारत को संघर्ष में शामिल होना पड़ा।

2. पाकिस्तान के साथ युद्ध-कश्मीर मसले को लेकर पाकिस्तान के साथ बँटवारे के तुरंत बाद ही संघर्ष छिड़ गया था। 1947 में ही कश्मीर में भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच छाया-युद्ध छिड़ गया था। 1965 में इस छाया-युद्ध ने गंभीर किस्म के सैन्य संघर्ष का रूप ले लिया। बाद में, भारतीय प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री और संजीव पास बुक्स पाकिस्तान के जनरल अयूब खान के बीच 1966 में ताशकंद – समझौता हुआ। 1965 की लड़ाई ने भारत की कठिन आर्थिक स्थिति को और गंभीर बना दिया था।

3. बांग्लादेश युद्ध, 1971-1970 में पाकिस्तान के सामने एक गहरा अंदरूनी संकट आ खड़ा हुआ। जुल्फिकार अली भुट्टो की पार्टी पश्चिमी पाकिस्तान में विजयी रही जबकि मुजीबुर्रहमान की पार्टी ने पूर्वी पाकिस्तान में कामयाबी हासिल की। पूर्वी पाकिस्तान की बंगाली आबादी ने पश्चिमी पाकिस्तान के भेदभावपूर्ण रवैये के विरोध में मतदान किया था, परंतु यह जनादेश पाकिस्तान के शासक स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।

1971 में पाकिस्तानी सेना ने शेख मुजीब को गिरफ्तार कर लिया और पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर जुल्म करना शुरू कर दिया। फलस्वरूप पर्वी पाकिस्तान की जनता ने अपने इलाके को पाकिस्तान से मुक्त कराने के लिए संघर्ष छेड़ दिया। 1971 में भारत को 80 लाख शरणार्थियों का भार पठाना पड़ा। ये शरणार्थी पूर्वी पाकिस्तान से भागकर आए थे। उपर्युक्त कारणों की वजह से भारत ने बांग्लादेश के ‘मुक्ति संग्राम’ को नैतिक समर्थन और भौतिक सहायता दी।

महीनों राजनयिक तनाव और सैन्य तैनाती के बाद 1971 के दिसंबर में भारत और पाकिस्तान के बीच पूर्ण पैमाने पर युद्ध छिड़ गया। पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों ने पंजाब और राजस्थान पर हमला किया और उसकी सेना ने जम्मू- कश्मीर पर हमला किया। भारत ने अपनी जल, थल और वायु सेना द्वारा इस हमले का जवाब दिया। दस दिनों के भीतर भारतीय सेना ने ढाका को तीन तरफ से घेर लिया और पाकिस्तानी सेना को आत्मसमर्पण करना पड़ा। तत्पश्चात् बांग्लादेश के रूप में एक स्वतंत्र राष्ट्र के उदय के साथ भारतीय सेना ने अपनी तरफ से एकतरफा युद्ध-विराम घोषित कर दिया। बाद में 3 जुलाई, 1972 को इंदिरा गाँधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच शिमला समझौता हुआ। अधिकांश भारतीयों ने इसे गौरव की घड़ी के रूप में देखा और माना कि भारत का सैन्य-पराक्रम प्रबल हुआ है।

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प्रश्न 8.
क्या भारत की विदेश नीति से यह झलकता है कि भारत क्षेत्रीय स्तर की महाशक्ति बनना चाहता है? 1971 के बांग्लादेश युद्ध के सन्दर्भ में इस प्रश्न पर विचार करें।
उत्तर:
भारत की विदेश नीति से यह बिल्कुल नहीं झलकता कि भारत क्षेत्रीय स्तर की महाशक्ति बनना चाहता है। 1971 के बांग्लादेश युद्ध के सन्दर्भ में देखें तो भी ऐसा प्रतीत नहीं होता। बांग्लादेश के निर्माण के लिए स्वयं पाकिस्तान की पूर्वी पाकिस्तान के प्रति उपेक्षापूर्ण नीतियाँ, बंगालियों की अपनी भाषा, संस्कृति के प्रति अटूट प्यार व गहरी आस्था को माना जा सकता है। दूसरे, भारत ने कभी भी अपने छोटे-छोटे पड़ौसी देशों को अमेरिका की तरह अपने गुट में सम्मिलित करने का प्रयास नहीं किया बल्कि 1965 तथा 1971 में जीते गये क्षेत्रों को भी वापस कर दिया। इस प्रकार भारत बलपूर्वक किसी देश पर बात मनवाना नहीं चाहता।

प्रश्न 9.
किसी राष्ट्र का राजनीतिक नेतृत्व किस तरह उस राष्ट्र की विदेश नीति पर असर डालता है? भारत की विदेश नीति के उदाहरण देते हुए इस प्रश्न पर विचार कीजिए।
उत्तर:
किसी भी देश की विदेश नीति के निर्धारण में उस देश के राजनीतिक नेतृत्व की विशेष भूमिका होती है उदाहरण के लिए, पण्डित नेहरू के विचारों से भारत की विदेश नीति पर्याप्त प्रभावित हुई। पण्डित नेहरू साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद व फासिस्टवाद के घोर विरोधी थे और वे समस्याओं का समाधान करने के लिए शान्तिपूर्ण मार्ग के समर्थक थे । वह मैत्री, सहयोग व सहअस्तित्व के प्रबल समर्थक थे। पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने अपने विचारों द्वारा भारत की विदेश नीति के ढाँचे को ढाला।

इसी प्रकार श्रीमती इन्दिरा गाँधी, राजीव गाँधी और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व व व्यक्तित्व की भी भारत की विदेश नीति पर स्पष्ट छाप दिखाई देती है। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, गरीबी हटाओ का नारा दिया और रूस के साथ दीर्घ अनाक्रमण सन्धि की। इसी तरह अटल बिहारी वाजपेयी की विदेश नीति में देश में परमाणु शक्ति का विकास हुआ। उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान’ का नारा दिया। इस प्रकार देश का राजनीतिक नेतृत्व उस राष्ट्र की विदेश नीति पर प्रभाव डालता है।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दीजिए : गुटनिरपेक्षता का व्यापक अर्थ है अपने को किसी भी सैन्य गुट में शामिल नहीं करना… इसका अर्थ होता है चीजों को यथासम्भव सैन्य दृष्टिकोण से न देखना और इसकी कभी जरूरत आन पड़े तब भी किसी सैन्य गुट के नजरिए को अपनाने की जगह स्वतन्त्र रूप से स्थिति पर विचार करना तथा सभी देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते कायम करना…..
(क) नेहरू सैन्य गुटों से दूरी क्यों बनाना चाहते थे? – जवाहरलाल नेहरू
(ख) क्या आप मानते हैं कि भारत – सोवियत मैत्री की सन्धि से गुटनिरपेक्षता के सिद्धान्तों का उल्लंघन हुआ? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दीजिए।
(ग) अगर सैन्य – गुट न होते तो क्या गुटनिरपेक्षता की नीति बेमानी होती?
उत्तर:
(क) नेहरू सैन्य गुटों से दूरी बनाना चाहते थे क्योंकि वे किसी भी सैनिक गुट में शामिल न होकर एक स्वतन्त्र विदेश नीति का संचालन करना चाहते थे।

(ख) भारत – सोवियत मैत्री सन्धि से गुटनिरपेक्षता के सिद्धान्तों का उल्लंघन नहीं हुआ, क्योंकि इस सन्धि के पश्चात् भी भारत गुटनिरपेक्षता के मौलिक सिद्धान्तों पर कायम रहा तथा जब सोवियत संघ की सेनाएँ अफगानिस्तान में पहुँचीं तो भारत ने इसकी आलोचना की ।

(ग) यदि विश्व में सैनिक गुट नहीं होते तो भी गुटनिरपेक्षता की प्रासंगिकता बनी रहती, क्योंकि गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की स्थापना शान्ति एवं विकास के लिए की गई थी तथा शान्ति एवं विकास के लिए चलाया गया कोई भी आन्दोलन कभी भी अप्रासंगिक नहीं हो सकता।

भारत के विदेश संबंध JAC Class 12 Political Science Notes

→ अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ:
भारत बड़ी विकट और चुनौतीपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में आजाद हुआ था, जैसे महायुद्ध की तबाही, पुनर्निर्माण की समस्या, उपनिवेशवाद की समाप्ति, लोकतन्त्र को कायम करना तथा एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था का निर्माण करना आदि की चुनौतियाँ विश्व के समक्ष थीं। इसके अतिरिक्त भारत के समक्ष अनेक विषम घरेलू परिस्थितियाँ भी थीं, जैसे बंटवारे का दबाव, गरीबी तथा अशिक्षा आदि। ऐसे में भारत ने अपनी विदेश नीति में अन्य सभी देशों की सम्प्रभुता का सम्मान करने और शान्ति कायम करके अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने का लक्ष्य सामने रखा।

→ संवैधानिक सिद्धान्त:
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धान्तों के हवाले से कहा गया है कि राज्य को विदेशों से सम्बन्ध बनाये रखने हेतु निम्न निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है-

  • अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा में अभिवृद्धि करना।
  • राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण सम्बन्धों को बनाये रखना।
  • संगठित लोगों के एक-दूसरे से व्यवहारों में अन्तर्राष्ट्रीय विधि और संधि – बाध्यताओं के प्रति आदर की भावना रखना।
  • अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटाने का प्रयास करना।

→ गुटनिरपेक्षता की नीति:
द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद दुनिया दो खेमों (सैनिक गुटों) में विभाजित हो गई । एक खेमे का अगुआ संयुक्त राज्य अमेरिका और दूसरे का सोवियत संघ। दोनों खेमों के बीच विश्व स्तर पर आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य टकराव जारी रहा। इसी दौर में संयुक्त राष्ट्रसंघ भी अस्तित्व में आया; परमाणु हथियारों का निर्माण शुरू हुआ; चीन में कम्युनिस्ट शासन की स्थापना हुई । अनौपनिवेशीकरण की प्रक्रिया भी इसी दौर में आरंभ हुई थी। नेहरू की भूमिका – पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने भारत के प्रधानमन्त्री व विदेश मन्त्री के रूप में भारत की विदेश नीति की रचना की और इसके क्रियान्वयन में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। नेहरू की विदेश नीति के तीन बड़े उद्देश्य थे

  • कठिन संघर्ष से प्राप्त सम्प्रभुता को बचाये रखना,
  • क्षेत्रीय अखण्डता को बनाये रखना, और
  • तेज रफ्तार से आर्थिक विकास करना नेहरू इन उद्देश्यों को गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाकर हासिल करना चाहते थे।

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→ दोनों खेमों से दूरी:
आजाद भारत की विदेश नीति में शान्तिपूर्ण विश्व का सपना था और इसके लिए भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति का पालन किया। इसके लिए भारत ने शीतयुद्ध से उपजे तनाव को कम करने की कोशिश की और संयुक्त राष्ट्र संघ के शान्ति अभियानों में अपनी सेना भेजी। भारत शीतयुद्ध के दौरान किसी भी खेमे में शामिल नहीं हुआ।

→ एफ्रो-एशियाई एकता:
भारत के आकार, अवस्थिति और शक्ति सम्भावनाओं को देखते हुए नेहरू ने विश्व के मामलों, विशेषकर एशियाई मामलों में भारत के लिए बड़ी भूमिका निभाने का स्वप्न देखा। नेहरू के दौर में भारत ने एशिया और अफ्रीका के नव- स्वतन्त्र देशों के साथ सम्पर्क बनाए। 1940 और 1950 के दशकों में नेहरू ने बड़े मुखर स्वर में एशियाई एकता की पेशकश की। नेहरू की अगुआई में भारत में मार्च, 1947 में एशियाई सम्बन्ध सम्मेलन का आयोजन किया गया। भारत ने इंडोनेशिया के स्वतंत्रता संग्राम के समर्थन में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन किया।

भारत अनौपनिवेशीकरण की प्रक्रिया का प्रबल समर्थक था और उसने पूरी दृढ़ता से नस्लवाद का, खासकर दक्षिण अफ्रीका में हो रहे रंगभेद का विरोध किया । इण्डोनेशिया के शहर बांडुंग में एफ्रो-एशियाई सम्मेलन 1955 में हुआ। इसी सम्मेलन में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव पड़ी। गुटनिरपेक्ष आंदोलन का पहला सम्मेलन 1961 के सितंबर में बेलग्रेड में हुआ।

→ चीन के साथ शान्ति और संघर्ष:
आजाद भारत ने चीन के साथ अपने रिश्तों की शुरूआत बड़े मैत्रीपूर्ण ढंग से की। चीनी क्रान्ति 1949 में हुई थी। इस क्रान्ति के बाद भारत, चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता देने वाला पहला देश था। इसके अतिरिक्त शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व के पाँच सिद्धान्तों यानी पंचशील की घोषणा भारत के प्रधानमन्त्री नेहरू और चीन के प्रमुख नेता चाऊ एन लाई ने संयुक्त रूप से 29 अप्रैल, 1954 को की। दोनों देशों के बीच मजबूत सम्बन्ध की दिशा में यह एक अगला कदम था। भारत और चीन के नेता एक-दूसरे के देश का दौरा करते थे और उनके स्वागत के लिए भारी भीड़ जुटती थी।

→ चीन का आक्रमण, 1962:
चीन के साथ भारत के दोस्ताना रिश्ते में दो कारणों से खटास आई। चीन ने 1950 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया। तिब्बत की संस्कृति को कुचलने की खबर आने पर भारत की बेचैनी भी बढ़ी। तिब्बत के धार्मिक नेता दलाई लामा ने भारत से राजनीतिक शरण माँगी और 1959 में भारत ने उन्हें शरण दे दी। इससे कुछ दिनों पहले भारत और चीन के बीच सीमा विवाद भी उठा था। मुख्य विवाद चीन से लगी लंबी सीमा-रेखा के पश्चिमी और पूर्वी छोर के बारे में था। चीन ने भारतीय भू-क्षेत्र में पड़ने वाले दो इलाकों जम्मू-कश्मीर के लद्दाख वाले हिस्से के अक्साई चीन और अरुणाचल प्रदेश के अधिकांश हिस्सों पर अपना अधिकार जताया। 1957. से 1959 के बीच चीन ने अक्साई चीन इलाके पर कब्जा कर लिया और इस इलाके में उसने रणनीतिक बढ़त हासिल करने के लिए एक सड़क बनाई।

जिस समय पूरे विश्व का ध्यान दो महाशक्तियों की तनातनी से पैदा इस संकट की तरफ लगा हुआ था, उसी समय चीन ने 1962 के अक्टूबर में दोनों विवादित क्षेत्रों पर बड़ी तेजी तथा व्यापक स्तर पर हमला किया। पहले हमले में चीनी सेना ने अरुणाचल प्रदेश के कुछ महत्त्वपूर्ण इलाकों पर कब्जा कर लिया। दूसरे हमले में लद्दाख से लगे पश्चिमी मोर्चे पर भारतीय सेना ने चीनी सेना को रोक लिया था परंतु पूर्व में चीनी सेना आगे बढ़ते हुए असम के मैदानी हिस्से तक पहुँच गई। आखिरकार, चीन ने एकतरफा युद्ध विराम घोषित किया और चीन की सेना अपने पुराने जगह पर वापस चली गई। चीन-युद्ध से भारत की छवि को देश और विदेश दोनों ही जगह धक्का लगा। इस युद्ध से भारतीय राष्ट्रीय स्वाभिमान को चोट पहुँची परंतु इसके साथ-साथ राष्ट्र – भावना भी बलवती हुई।

इस संघर्ष का असर विपक्षी दलों पर भी हुआ। चीन के साथ हुए युद्ध ने भारत के नेताओं को पूर्वोत्तर की डाँवाडोल स्थिति के प्रति संचेत किया। यह इलाका अत्यंत पिछड़ी दशा में था और अलग-थलग पड़ गया था। राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिहाज से भी यह इलाका चुनौतीपूर्ण था। चीन – युद्ध के तुरंत बाद इस इलाके को नयी तरतीब में ढालने की कोशिशें शुरू की गईं। नागालैंड को प्रांत का दर्जा दिया गया। मणिपुर और त्रिपुरा केन्द्र शासित प्रदेश थे लेकिन उन्हें अपनी विधानसभा के निर्वाचन का अधिकार मिला।

→ पाकिस्तान के साथ युद्ध और शान्ति:
पाकिस्तान की स्थापना सन् 1947 में भारत के विभाजन के परिणामस्वरूप हुई। आरम्भ से ही भारत तथा पाकिस्तान के आपसी सम्बन्ध तनावपूर्ण रहे। सन् 1947 में कश्मीर मुद्दे को लेकर दोनों देशों की सेनाओं के मध्य छाया- युद्ध हुआ । बहरहाल यह संघर्ष पूर्णव्यापी युद्ध का रूप न ले सका। यह मसला संयुक्त राष्ट्र संघ के हवाले कर दिया गया। सन् 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर फिर आक्रमण किया परन्तु भारत ने इसका मुँहतोड़ जवाब दिया और पाकिस्तान को बुरी तरह पराजित किया। अन्त में संयुक्त राष्ट्रसंघ के माध्यम से दोनों देशों के बीच ताशकन्द समझौता हुआ, जिसके परिणामस्वरूप भारत ने पाकिस्तान के जीते हुए क्षेत्र वापस लौटा दिए।

JAC Class 12 Political Science Solutions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

→ बांग्लादेश युद्ध, 1971:
सन् 1971 में बांग्लादेश की समस्या को लेकर भारत तथा पाकिस्तान के बीच पुनः युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में पाकिस्तान पुनः पराजित हुआ और पाकिस्तान का एक बहुत बड़ा भाग उसके हाथ से छिन गया अर्थात् बांग्लादेश नामक एक स्वतन्त्र राज्य की स्थापना हुई।

→ करगिल संघर्ष:
1999 – सन् 1999 में पाकिस्तान ने भारत के नियन्त्रण रेखा के कई ठिकानों जैसे द्रास, मश्कोह, काकसर और बतालिक क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। भारतीय सेना ने जवाबी कार्यवाही की इससे दोनों देशों के मध्य संघर्ष छिड़ गया। इसे करगिल की लड़ाई के नाम से जाना जाता है। 26 जुलाई, 1999 तक भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को खदेड़ते हुए पुनः अपने क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया । पाकिस्तान के इस आक्रमण की अन्तर्राष्ट्रीय जगत में तीव्र आलोचना की गई। भारत एवं पाकिस्तान के मध्य तनावपूर्ण सम्बन्धों को सुधारने हेतु अनेक प्रयास किये गये जिसमें रेल व बस यात्राएँ शुरू करना, द्विपक्षीय वार्ताएँ की गईं लेकिन अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है।

→ भारत की परमाणु नीति:
भारत मई, 1974 में पहला परमाणु परीक्षण कर परमाणु आयुध सम्पन्न राष्ट्रों की श्रेणी में आया लेकिन इसकी शुरूआत 1940 के दशक के अन्तिम सालों में होमी जहाँगीर भाभा के निर्देशन में हो चुकी थी। भारत शान्तिपूर्ण उद्देश्यों में इस्तेमाल के लिए अणु ऊर्जा का उपयोग करने के पक्ष में है। भारत ने परमाणु अप्रसार के लक्ष्य को ध्यान में रखकर की गई सन्धियों का विरोध किया क्योंकि ये सन्धियाँ उन्हीं देशों पर लागू होती थीं जो परमाणु शक्तिहीन राष्ट्र थे। मई, 1998 में भारत ने परमाणु परीक्षण किए और दुनिया को यह जताया कि उसके पास भी सैन्य उद्देश्यों के लिए अणु-शक्ति के इस्तेमाल की क्षमता है। भारत की परमाणु नीति में सैद्धान्तिक तौर पर यह बात स्वीकार की गई है कि भारत अपनी रक्षा के लिए परमाणु हथियार रखेगा लेकिन वह हथियारों का प्रयोग पहले नहीं करेगा। इसके साथ ही भारत वैश्विक स्तर पर लागू और भेदभावहीन परमाणु निःशस्त्रीकरण के प्रति वचनबद्ध है ताकि परमाणु हथियारों से मुक्त विश्व की रचना हो।

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